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What if Internet Crashes in the Whole World? | Dhruv Rathee

Dhruv Rathee13:29

Transcription

कि नमस्कार दोस्तों।

वैसे देखा जाए, इंटरनेट एक नेट की तरह है। करोड़ों स्मार्ट फोंस, कंप्यूटर्स, और ढेरों डिवाइस इस से बने एक नेट में आप कुछ दो-तीन धागे काट दें, दस-पंद्रह धक्के कर दें, ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। कनेक्शन बनाने के ढेरों और तरीके मिल जाएं।

इस नेट के एक एरिया को आप कट ऑफ कर सकते हो, जैसे कंट्री जब अपने देश के अंदर इंटरनेट को ब्लॉक कर देती है। यह कुछ ही दिनों के अंदर हो जाता है। लेकिन अगर लार्ज स्केल पर बात करें, तो दुनिया के लेवल पर सारे इंटरनेट को एक साथ क्रश करना, यह स्विच ऑफ करना थियोरेटिकली पॉसिबल है, लेकिन प्रैक्टिकली इंपासिबल है।

लेकिन इस प्रैक्टिकली इंपासिबल चीज को अचीव करने के कितने करीब आ सकते हो, इसका एक रियल लाइफ एग्जांपल हमें कुछ दिन पहले देखने को मिला। जब Facebook, WhatsApp, Twitter, ग्राफ दिनों बड़ी सोशल मीडिया एप्स डाउन चली गईं, काम करना बंद कर दिया, 1956 घंटे के लिए।

उसे फॉलो मिलियंस ऑफ पीपल अराउंड यू। गुयस, फॉर क्लास 10 साइंस, Facebook, Instagram प्रॉब्लम्स ऑफलाइन थे। जब हम अश्लील सब्सक्राइब कर रहे थे, तो आप सोच रहे होंगे कि यह तो इंटरनेट है। इसके अलावा भी बहुत कुछ है।

लेकिन दोस्तों, दुनिया में लोगों के लिए यह इंटरनेट का इस्तेमाल करते हो। मैं WhatsApp टेक्स्ट मैसेज भेजने के लिए करता हूं, Facebook करने के लिए करता हूं, या फिर YouTube वीडियो देखने के लिए। डेवलपिंग कंट्री की बात करें, तो शीघ्र बेसिक इस्तेमाल करती हैं।

स्मार्टफोन में बेसिक जिसका इस्तेमाल करके Facebook को विजिट कर सकते हैं और कुछ और अपनी वेबसाइट से जो प्री डिसाइड Facebook द्वारा सिर्फ उसे ही विजिट कर सकते हैं। उनके अलावा कोई और आप नहीं चलती। वह बाकी इंटरनेट को एक्सेस ही नहीं कर सकते।

अगर आपको याद हो, 2016 के अराउंड इंडिया में भी बड़ी कॉन्ट्रोवर्सी हुई थी इस चीज को लेकर कि Facebook इंडिया में फ्री बेसिक्स लाने वाला था। लेकिन थैंकफूली जनता ने आवाज़ उठाई थी। इस चीज के गेम स्टार्ट फ्री बेसिक्स को इंडिया में अपने ऑपरेशंस कैंसिल करने पड़े।

लेकिन इतने ढेरों लोग जो कि आज के दिन फ्री बेसिक्स इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके लिए Facebook डाले जाने का मतलब है पूरा इंटरनेट डाउन जाना। जब भी Facebook, WhatsApp डुंगा, हम सब लोगों ने चीज से काफ़ी मज़ाक भी उड़ाया था। मींस बनाए थे, यह देखो अब लोग फाइनली या ऑफलाइन अपना किसी चीज में टाइम बिता पाएंगे।

लोगों को फालतू के WhatsApp फॉरवर्ड नहीं देखने को मिलेंगे। लेकिन रियलिस्टिकली बात करें, तो भैरव ऐसे छोटे बिजनेस हैं जो Facebook पर डिपेंड अपना बिजनेस चलाने के लिए। कई छोटे होटल्स हैं जो सिर्फ Facebook मैसेजेस, WhatsApp का इस्तेमाल करते हैं कस्टमर के साथ कम्युनिकेट करने के लिए।

कई ऐसे लोग हैं जो बाकी एप्स में लॉग इन करते हैं, Facebook लॉगिन का इस्तेमाल करते हैं। तो अगर आप ज़ूम पर Facebook लॉगइन यूज कर रहे हैं, तो आप अपने बिजनेस मीटिंग कर पाएंगे। जो Facebook अकाउंट है, तुम तो बहुत से लोग ऐसे ही बाकी एप्स फॉर एक्सेस नहीं कर पा रहे।

स्मार्ट टीवी को एक्सेस नहीं कर पा रहे हैं। अगर उसने Facebook लॉगिन यूज किया था, तो वह। और मैं बताना चाहूंगा, यह जो Facebook, WhatsApp, Instagram डुंग है, दिखने में चीज काफी light-hearted सी लग रही थी हमें। लेकिन इसकी काफी भयंकर कंसीक्वेंसेस थे दुनिया में कई लोगों के लिए।

क्योंकि इंटरनेट काफी सेंट्रलाइज्ड बन गया है। आज फिर एक टाइम था जब WhatsApp, Instagram, Facebook तीन अलग कंपनी दुआ करती थीं। लेकिन Facebook ने इन दोनों कंपनी को खरीद लिया और अब सब कुछ Facebook के कंट्रोल में आ गया।

यह चीज इतनी सेंट्रलाइज्ड है कि Facebook रेफर करता है, तो WhatsApp पर Instagram फीड क्रश कर जाते हैं। इन्हें दिन कीजिए कि गूगल के सब्सक्राइब कर जाते, तो जिम्मेर YouTube भी काम करना बंद कर दे। इंटरनेट आज के दिन कितना सेंट्रलाइज्ड हो गया है कि दो-तीन कंपनीज पूरे इंटरनेट को मानो हैंडल कर रही हैं।

लेकिन जब इंटरनेट XUV में इन्वेंट किया गया था दोस्तों, तो इसका ओरिजिनल परपज इसका बिल्कुल उल्टा था। आईएस के इतिहास को देखते हैं, का समानार्थक कोल्ड वॉर का। यूएसए और सोवियत यूनियन के बीच में कोल्ड वॉर चल रहे थे।

अमेरिकन साइंटिस्ट और मिलिट्री एक्सपर्ट्स को डर था कि अगर सोवियत यूनियन ने अमेरिका पर हमला किया, तो एक मिसाइल से भी उनका पूरा कम्युनिकेशन सिस्टम डिस्ट्रॉय हो सकता था। क्योंकि इनका जो इस कम्युनिकेशन का सिस्टम था, उस वक्त काफी सेंट्रलाइज था।

जैसे कि लैंडलाइन फोन होते थे। उन्होंने सोचा कि अगर हमें अपने सिस्टम को और सिक्योर बनाना है, तो इसे डिसेंट्रलाइज करना पड़ेगा। ऐसा नहीं होना चाहिए कि सिर्फ एक सिंगल कंप्यूटर पर हम महिलाएं करेंगी। सारे कम्युनिकेशन उसी के थ्रू जा रहे हैं।

या फिर किसी सिंगल कम्युनिकेशन वायर पर। यह लाइन पर हम डिपेंड हैं। ईजीली सेंट्रलाइजेशन होनी चाहिए। अगर पूरे सिस्टम का कोई एक पाठ भी फेल हो जाता है, तो बाकी का पाठ कम से कम फंक्शन करता रहे।

1962 में रोमांटिक एक साइंटिस्ट हैं, जिनका नाम चाहिए जुए। से की डिफेंस डिपार्टमेंट की एक एजेंसी थी, कि आर पार करके एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी में काम करते थे। इन्होंने सलूशन प्रपोज किया कि सारे कंप्यूटर के बीच में गैलेक्टिक नेटवर्क होना चाहिए।

ऐसा नेटवर्क जिससे सरकार के लीडर्स कम्युनिकेट कर पाएं। और दूसरे से बेनिफिट यूनियन हमारे देश का टेलीफोन सिस्टम डिस्ट्रॉयर कर दे। तो 1968 में इसी आईडिया के बेस पर एक कंप्यूटर नेटवर्क डेवलप किया गया, जिसका नाम था आसफ खान नेक्स्ट एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी नेटवर्क।

यह उस वक्त के कंप्यूटर स्कूलिंग करता था। 2016 रोज़ तो यह व्वे चौराहों व इंजीनियर ट्यूब हो गई। अब स्किन फिर रोड व दीवार पर नियति एक लुटेरे को दबोच लिया। उस वक्त कंप्यूटर्स मौजूद थे।

यूनिवर्सिटीज, गवर्नमेंट एजेंसीज, डिफरेंस कांट्रैक्टर और कंप्यूटर थे। वह बहुत बड़ी हुआ करते थे। इन्फ्रेंस कहा जाता था और स्टोर करने के लिए पूरी बेसमेंट जाती थी। कंप्यूटर एक दूसरे से तो कर दिया, लेकिन प्रॉब्लम कंप्यूटर पर अपनी भाषा बोलता था।

अलग-अलग सॉफ्टवेयर उन्हें और कंप्यूटर कंप्यूटर किसी दूसरे सिस्टम का इस्तेमाल करता था। कि आप हिंदी में लेटर लिखना है और फ्रांस, ब्रिटेन और एक्सपेक्ट करते हो। ठीक फ्रेंड्स की तरफ का हिंदी में लेटर समझ पाए।

इसका सलूशन निकाला गया इंटरनेटवर्किंग यानी अलग-अलग नेटवर्क को किसी दूसरे से कम्यूनिकेट कराना। दोआबा के रिसोर्ट से रोबट कान और विंडसर इन दोनों ने डेवलप किया। इस तरीके से सारे कंप्यूटर्स एक दूसरे से बात कर पाए।

अलग-अलग भाषा समझते हैं दूसरे की। इसे इंवेंशन को कहा जाता है ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकोल या फिर टीसीपी। बाद में उन्हें एक एडिशन प्रोटोकॉल भी त्याग कर दिया था, इंटरनेट प्रोटोकॉल।

तो इससे हम आज के दिन रेफर करते हैं एसपी सिटी शैलेश आईपी। इस चीज को अक्सर हैंड शेक भी कहा जाता है। कि अलग टाइप के कंप्यूटर से दूसरे से हाथ मिला रहे हैं और एक-दूसरे की भाषा समझ पा रहे हैं।

जनवरी फर्स्ट 1993 में अर्पण लैटर ने इस पीस लें चाए प्रोटोकॉल को ऐड कर लिया। लेकिन इस पॉइंट टू टाइम तक दोस्तों, इंटरनेट सिर्फ अवेलेबल था यूनिवर्सिटीज के पास, साइंटिस्ट के पास और सरकारों के पास।

इन सबके बीच में इंफोर्मेशन शेयर करने के काम आता था। आम जनता ने नेट को अभी तक नहीं चखा था। आम लोगों के पास इंटरनेट तभी आया जब वर्ल्ड वाइड वेब व्यक्ति में।

दोस्तों, इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब को कोई दूसरे से कंफ्यूज कर देते हैं। लेकिन रियालिटी में यह दो अलग-अलग चीज़ें हैं। वर्ल्ड वाइड वेब के लिए सब्सक्राइब तरीका है जो इंटरनेट पर डाटा अवेलेबल है।

उसे एक्सेस करने के लिए ब्राउज़र खोलते हैं और उस पर किसी वेबसाइट पर जाते हैं। व्यक्ति का नाम लेकर, तो यहां पर आप इस्तेमाल कर रहे हैं वर्ल्ड वाइड वेब का।

अगर आप अपने स्मार्ट टीवी पर नेटफ्लिक्स देख रहे हैं, तो आप वर्ल्ड वाइड वेब के जरिए इंटरनेट पर मौजूद डाटा को एक्सेस कर रहे हैं। एक जिस पर आप अलग-अलग शहर को देख सकते हैं, को देख सकते हैं और शहरों को सड़कों से कनेक्ट किया गया।

तो इंटरनेट बेसिकली सड़कों की तरह है, लाइन बिछाई जा रही है शहर के बीच में। और वेब एक्चुअली में वह चीज है जो आपको सड़कों पर दिखाई देती है। जैसे कि घर और दुकानें और जो गाड़ियां सड़कों पर चलने लग रही हैं, वह फ्री में डाटा हैज ओवरराइड करने लग रहा है।

इंटरनेट पर कुछ गाड़ियां सड़कों से गुजरती हैं वर्ल्ड वाइड वेब के जरिए। यानी सड़कों पर मौजूद घरों के जरिए। लेकिन हर गाड़ी को वहां से गुजरने की जरूरत नहीं है।

अगर आप दिनभर Facebook पर बैठे हैं, ट्विटर पर हैं, स्काइप पर बात करते हैं अपने स्मार्टफोन के द्वारा किसी और के साथ, एक बॉक्स पर गेम खेलते हैं ऑनलाइन और नेटफ्लिक्स पर कोई और देखते हैं, तो पूरे दिन आप इंटरनेट पर थे।

लेकिन व्यक्ति पर नहीं थे। कि बैक पर आप तभी होंगे जब अपने ब्राउजर में URL लिखेंगे और उस जब साइड पर जाएंगे। इस पिछली तो इस वर्ल्ड वाइड वेब को इन्वेंट किया था ब्रिटिश साइंटिस्ट्स टिम बरनर्स् ली ने।

जो सर में काम कर रहे थे। उन्होंने किया था 99 हज़ार 999 में। इन्होंने अपना सॉफ्टवेयर ओपनली पब्लिक के सामने अवेलेबल कर दिया, फ्री ऑफ कॉस्ट। 19 मीटर ऑफ सॉफ्टवेयर डेमो।

इस विशाल उस पर जितना व जूते ने इन्फॉर्मेशन स्टोर लुधियाना फ्रेंड तक है। सिंध में व्याघ्र ट्रांसफर झुक मांय तरफ शॉट।

इन वर्ल्ड वाइड वेब करने के पीछे का बेसिकली प्रॉस्ट्रेट की दुनिया में कोई भी इंसान किसी भी इंसान के साथ कोई भी इन्फॉर्मेशन शेयर कर पाए। कभी भी।

इंवेंशन की खास बात यह थी कि दुनिया में किसी के पास भी कंप्यूटर होने की जरूरत थी और इंटरनेट चाहिए था। और इंवेंशन का फायदा उठा सकता था। ना सिर्फ इंटरनेट पर मौजूद डाटा को एक्सेस किया जा सकता था, बल्कि इंवेंशन के द्वारा और चीजें खरीदी जा सकती थीं।

अपनी वेबसाइट से बनाई जा सकती थी। एक सब्सक्राइब की दुनिया में कुछ अच्छा करने के लिए। लेकिन आज के दिन बॉयज का मानना है कि इस फैसले को पढ़कर सुनाता हूं।

मैं जब स्कूल पोस्ट एंड फील्ड इन है कि आज के दिन में फेल हो चुका है। यह कहते हैं बेसिकली रेफर कर रहे थे कैंब्रिज क्वालिटी का के स्कीम के बारे में। उनका कहना है कि वे हर इंसान इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकें।

आज के दिन कुछ कंपनी ने अपनी इंटरनेट Facebook, Google और सब्सक्राइब Note 3 था। उस वक्त हर कोई का इस्तेमाल करता था और आप जो इन्फॉर्मेशन तो बेटा था, वह डिफरेंट होता था।

इन ईमेल कंपनी के सर्विस के लिए वेब 2.0 सोशल मीडिया का करके आज के दिन किया जाता है। इन बड़ी मीडिया कंपनी इस वर्ष के शुरू में कुछ कंपनियां जैसे कि Facebook को इस हद तक पहुंच गई।

उन्होंने प्रोवाइडर कंपनी के साथ पार्टनरशिप करनी शुरू कर दी थी। हमारी आप फ्री में लोगों को इंटरनेट पर सर्च करना है, तो उसके लिए अलग से चार्ज।

तो इसलिए कुछ लोगों के लिए अब मतलब इंटरनेट सिर्फ Facebook ही रह गया। ऐसी सिचुएशन को काउंटर करने के लिए बहुत से लोग, इंक्लूडिंग टाइम बात करते हैं बैक 3.4 की। यानी इंटरनेट का फ्यूचर क्या होगा।

चाहते हैं इंटरनेट का वापस से एक डिसेंट्रलाइज्ड फ्यूचर बने। एक ऐसा इंटरनेट, किसी एक कंपनी के कंधों पर ना टीका। एक ऐसा इंटरनेट जो किसी दो-तीन कंपनी सिल्वर मोनोपलाइज ना किया गया।

करेंगे इंटरनेट जो पूरी तरह से क्रश नहीं कर जाता। लोगों की जिंदगी पर असर नहीं डालता। करेगी कंपनी के सर्वश्रेष्ठ कर जाते हैं।

तो बहुत से लोग अपने आइडियाज लेकर आए हैं इस नए डिसेंट्रलाइज इंटरनेट को लेकर। जर्मनी में एक व्यंग्य को डरने एक डिसेंट्रलाइज्ड वर्जन बनाया Twitter। आप इसे मास्टर डोंट करके कहते हैं।

बॉक्स जैसी टेक्नोलॉजी भी यही डिसेंट्रलाइजेशन लाने की कोशिश करते हैं हमारे फाइनैंशल सिस्टम में। अब इंट्रस्टिंग चीज बताया दोस्तों की टीम वन असली भी खुद के एक प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं।

अपने अपनी मर्जी का व्यक्ति रिपोर्ट बनाने के लिए। इनके प्लेटफॉर्म का नाम है सॉलिड। सॉलिड यह कहते हैं जैसा प्लेटफार्म है कि हिंदी विजुअल्स को खुद से क्वालिटी देता है।

अपने डाटा को कंट्रोल में रखने की। इनसे रॉकी हम अपना डाटा इन बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथों में दे। इनकी राह में सॉलिड जो है, वह बेसिकली इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइड करिए।

कि आप अपना डाटा अपने पास कैसे रख सकते हैं। अगर कोई सोशल नेटवर्क पॉइंट का इस्तेमाल करता है अपने आप को बनाने के लिए, तो उन्हें सोशल नेटवर्किंग साइट्स ऊपर बिल्ड अपऑन है।

तो उसमें क्या होगा? आपका डाटा एक पर्सनल पॉइंट में स्टोर किया जाएगा। इंसटिड ऑफ कि आपका डाटा इन कंपनीज के सर्वर में सॉल्व किया जाए।

तो यह कुछ नए आने वाले तरीके हैं दोस्तों, जिसकी मदद से इंटरनेट और व्यक्ति को और डिसेंट्रलाइज करने की कोशिश करी जा रही है। यह होगा वेब 3.4 जिसमें डिसेंट्रलाइज्ड एप्स होंगी और डिसेंट्रलाइज्ड ब्रोकर।

एक्चुअली में कितना सक्सेसफुल हो पाता है, यह तो टाइम ही बताएगा। और अगर आपको यह सारी बातें काफी कन्फ्यूजिंग लग रही हैं, तो थोड़ा और पढ़ने की कोशिश की।

जिसके बारे में उम्मीद करता हूं वीडियो आपको इंफोर्मेटिव लगा होगा। और अगर आपको यह वीडियो पसंद आए, तो एक और वीडियो में आपको रेकमेंड करूंगा।

अपना पुराना एक वीडियो जो मैंने इंटरनेट पर बनाया था, वह भी आपको पसंद आएगा। क्योंकि वह भी सिमिलर ही टॉपिक पर है कि इंटरनेट को कंट्रोल करता है। इंटरनेट एक्टिवेट चलता कैसे।

उस विडियो का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में डाल दिया। मिलते हैं फिर अगले वीडियो में। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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