Transcription
[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]
बताया गया है कि जो भी व्यक्ति संसार में जन्म लेता है उसे तीन प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं। ऐसा कोई व्यक्ति आज तक संसार में नहीं हुआ जिसने जन्म लिया हो और दुख ना भोगा हो। ऐसा कोई भी व्यक्ति आज तक नहीं हुआ, ना आगे होगा। जो भी संसार में जन्म लेता है उसको दुख भोगने पड़ते हैं।
दुख के विभाजन कई प्रकार से किए गए हैं। कहीं बताया कि दुख एक है, कहीं बताया गया दुख दो प्रकार का है, कहीं तीन प्रकार का, कहीं चार प्रकार का, कहीं पांच प्रकार का। अलग-अलग दृष्टिकोण से उसका विभाजन किया गया है।
न्याय दर्शन में बताया है, "बाध लक्षणं दुखम्"। बोलेंगे, बोलिए, "बाध लक्षणं दुखम्"। दुख किसे कहते हैं? बाधा लक्षण है जिसका, उसको दुख कहते हैं। जो बाधा स्वरूप है, पीड़ा है, कष्ट है, संताप है, इसको दुख कहते हैं। यह परिभाषा कर दी दुख की। इस दृष्टि से देखें तो दुख एक ही है। जो भी किसी भी तरह की बाधा हो, कष्ट हो, परेशानी हो, उसका नाम दुख है।
फिर कहीं-कहीं शास्त्रों में प्रसंग से दो तरह के दुख बताए। एक बाह्य कारणों से, एक आंतरिक कारणों से। उस दृष्टि से दो तरह का दुख हो गया। बाहर से चोट लगती है, गर्मी लगती है, ठंडी लगती है, यह बाहर का दुख है। और अंदर से पुरानी कोई घटना याद आ गई, खराब घटना तो दुख होता है, यह आंतरिक है।
सांख्य दर्शन में जो दुख का विभाजन किया है, वह तीन प्रकार का। उन तीन दुखों के नाम बोलिए। आध्यात्मिक दुख, आधि भौतिक दुख, आधि दैविक दुख। यह तीन प्रकार का दुख यहां सांख्य दर्शन में बताया।
आध्यात्मिक दुख का मतलब जो दुख हमारी अपनी गलतियों से हमें भोगने पड़ते हैं। मनुष्य अल्पज्ञ है या सर्वज्ञ है? अल्पज्ञ है। अल्प शक्तिमान भी है। तो अल्पज्ञ होने से, अल्प शक्तिमान होने से कई जगह पर वह गलतियां कर देता है। कहीं-कहीं जानबूझकर भी करता है, कहीं-कहीं अनजाने में भी करता है। दोनों तरह से गलतियां होती रहती हैं। चाहे वह गलती जानबूझकर की गई हो, चाहे अनजाने में की गई हो। यदि कोई व्यक्ति अपनी गलती करता है, स्वयं गलती करता है, जाने-अनजाने उसकी गलती से जो उसको दुख भोगना पड़ता है, स्वयं की गलती से उसका नाम आध्यात्मिक दुख है।
जैसे कोई व्यक्ति सड़क पर चल रहा था और चलते-चलते वह बाजार में बोर्ड पढ़ने लगा, दुकानों के बोर्ड पढ़ने लगा और सामने एक ईंट रखी थी और ईंट से पांव टकराया और लगी चोट। ऐसा होता है या नहीं हो जाता ना? यह किसकी गलती से चोट लगी? अपनी गलती से। देख रहा है दुकान के बोर्ड और चल रहा है सड़क पर और उधर ध्यान नहीं दे रहा कि आगे पत्थर है, ईंट है, क्या है, गड्ढा है, कांटे हैं, क्या है। देख के चलना चाहिए पर उसने ध्यान नहीं दिया, गलती की और फिर ईंट से टकराया, चोट खाई। इसका नाम है आध्यात्मिक दुख। अपनी गलती से हुआ।
एक व्यक्ति सब्जी काट रहा था और सब्जी काटते-काटते ध्यान नहीं दिया, लापरवाही से उंगली काट ली। दूसरे व्यक्ति से बात कर रहा था और बात करते-करते सब्जी भी काट रहा था, अपनी उंगली काट ली। किसकी गलती से हुआ दुख? अपनी गलती से।
सड़क पर स्कूटर पर जा रहा है पर ध्यान नहीं दिया। आगे गड्ढा था, छोटा ही था गड्ढा था छोटा सा। अब उसने ध्यान नहीं दिया कि आगे गड्ढा है और स्कूटर उसमें गड्ढे में गिरा और झटका लगा, ऊंचा-नीचा हुआ, बेचारे की स्थिति बिगड़ गई। यह दुख किसकी गलती से हुआ? अपनी गलती से। तो इस प्रकार के जो अपनी गलती से होने वाले दुख हैं, वह सारे आध्यात्मिक दुख कहलाते हैं।
एक व्यक्ति सिगरेट पीता है, लंबे समय तक पीता है, रोज पीता है। कोई शराब पीता है, कोई सिगरेट पीता है, फिर रोगी हो जाता है। किसकी गलती से रोगी हुआ? अपनी गलती से। तो यह कौन सा दुख? आध्यात्मिक। अपनी गलती से होने वाला दुख आध्यात्मिक।
दूसरा जो है, वह है आधि भौतिक दुख। आध्यात्मिक का मतलब आत्मा स्वयं, आधि आत्मिक स्वयं के कारण होने वाला दुख आध्यात्मिक। आधि भौतिक भूतों के द्वारा होने वाला दुख आधि भौतिक। यहां भूत शब्द के बहुत सारे अर्थ होते हैं। यह जो शब्द है, आधि भौतिक, यहां भूत शब्द का अर्थ है प्राणी। क्या अर्थ है? प्राणी। तो आधि भौतिक का अर्थ दूसरे प्राणियों से जो दुख मुझे अन्याय से प्राप्त होता है। एक शब्द का ध्यान रखिएगा, अन्याय से। हां, इस पर खास ध्यान दीजिए, नहीं तो फिर भटक जाएंगे। दूसरे लोगों से हमें न्याय से भी दुख मिलता है, अन्याय से भी मिलता है। दोनों तरह से मिलता है। चोर ने चोरी की, जज साहब ने जेल में डाल दिया, न्याय होता रहता है। आजकल कोर्ट में न्याय मिलता है, नहीं मिलता? बहुत कम मिलता है।
एक बार एक न्यायालय में गया। न्याय अलग चीज है, निर्णय अलग चीज। तो मैंने पूछा, "यहां आजकल न्याय होता है कोर्ट में?" बोले, "नहीं होता।" मैंने कहा, "फिर क्या होता है?" बोले, "निर्णय होता है।" तो मैंने उसको बोला, "फिर यह बाहर जो लगा रखा है, उसको न्यायालय क्यों लिखा है? निर्णाल लिखो ना, जब आप न्याय तो करते नहीं, निर्णय करते तो निर्णय आले लिखो।" तो कहीं-कहीं न्याय होता है, कहीं अन्याय भी होता है। जब अन्याय से दुख मिलता है, उसका नाम आधि भौतिक। दूसरे प्राणियों से जो अन्याय से दुख मिलता है, वह आधि भौतिक दुख है। चाहे चोर से हो, डाकू से हो, राजा से हो, प्रजा से हो, पड़ोसी से हो, मित्रों से हो, दुश्मनों से हो, कोई रेल यात्री से हो, बस यात्री से हो, कोई पैदल यात्री से हो, चाहे स्कूटर वाला एक्सीडेंट ठोक दे, कार वाला ठोक दे, कुत्ते ने काट लिया, सांप ने काट लिया, बिच्छू ने काट खाया, शेर ने हमला कर दिया। तो यह जैसे दूसरे प्राणी हैं, इनसे जो हमें अन्याय पूर्वक दुख मिलता है, वह सारा आदि भौतिक दुख।
तीसरा आधि दैविक दुख। तीसरा कौन सा? आधि दैविक। तो देव का अर्थ है यहां पर जो जड़ देवता है, अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, सूर्य, यह सारे देवता हैं, जड़ देवता। इन जड़ देवताओं के कारण से भी हमें कई बार दुख हो जाता है। वैसे तो सुख मिलता रहता है। सूर्य चमकता है, गर्मी मिलती है, मिलता है। दिन भर खूब अच्छी तरह काम करते हैं हम, कोई कष्ट नहीं होता। रात को अंधेरा होता है, तब सूर्य नहीं दिखता हमको, तो अंधेरे में चलने-फिरने में कठिनाई होती है। पर दिन में तो कोई कठिनाई नहीं है, दूर तक साफ दिखता है एकदम। तो बहुत सारा लाभ होता है इससे सूर्य से। लेकिन कभी-कभी हानि भी हो जाती है।
जैसे अब गर्मी चल रही है आजकल, खूब बढ़िया गर्मी चल रही है। जोर से 45 डिग्री, 40 डिग्री, 47 डिग्री तापमान बढ़ता जा रहा है। तो कहीं-कहीं 50 भी हो जाता है। तो जब खूब तेज गर्मी पड़ती है, उस गर्मी से कुछ लोगों को लू लग जाती है, रोगी हो जाते हैं और कई प्रकार के रोग लग जाते हैं, मृत्यु भी हो जाती है। सन स्ट्रोक बोलते हैं, सूर्य का आक्रमण हो गया और गर्मी से व्यक्ति बेहाल हो जाता है, परेशान हो जाता है। उसको हार्ट की समस्या भी हो जाती है, मृत्यु भी हो जाती है, बहुत सारी समस्या आती है। तो बहुत तेज गर्मी से जब हानि होती है, तो इसको आधि दैविक दुख बोलेंगे।
कहीं आंधी आती है, जोर से तूफान आता है, समुद्र में चक्रवात आता है, भूमि पर भी आता है, समुद्र में भी आता है। तो कहीं तीव्र वायु से, आंधी से, तूफान से, कहीं बाढ़ से, कहीं भूकंप से, अग्नि, जल आदि इन पदार्थों में गड़बड़ होने से जो हमें नुकसान होते रहते हैं, हानियां होती रहती हैं, दुख आते रहते हैं, इनका नाम है आधि दैविक दुख।
क्या नाम? क्या आप यह तीन प्रकार के दुख भोगना चाहते हैं? हां या ना? ना। तीन में से एक भी दुख भोगना नहीं चाहते। दुख तो भोगना चाहते ही नहीं, दुख से तो छूटना चाहते हैं। कितने प्रतिशत दुख से छूटना चाहते हैं? 50, 60, 80 या 100?
[संगीत]
100। संसार में जन्म लेने के बाद कोई व्यक्ति इन तीन दुखों से 100% छूट सकता है? नहीं छूट सकता। इसलिए सांख्य दर्शन बनाया महर्षि कपिल जी ने। इसलिए बनाया कि भाइयों, यह जो भी जन्म लेगा, तीन दुख भोगने पड़ेंगे। इससे छूटो, इससे बाहर निकलो। दुखों से कैसे निकले, वह सारी विद्या इस सांख्य दर्शन में बताई।
तो पहले ही सूत्र में बताया था, "अथ त्रिविध दुख अत्यंत निवृत्ति अत्यंत पुरुषार्थ"। इन तीन प्रकार के दुखों से पूरी तरह से छूटना, अत्यंत निवृत्ति, पूरी तरह छूटना, बहुत लंबे समय तक के लिए छूटना, अरबों-खरबों वर्षों तक एक भी दुख नहीं आना चाहिए। यह पुरुषार्थ, पुरुष का प्रयोजन है। और केवल प्रयोजन ही नहीं, अत्यंत पुरुषार्था। यह पुरुष का अंतिम प्रयोजन, सबसे ऊंचा लक्ष्य है। तीन प्रकार के दुखों से पूरी तरह से छूटना, यह पुरुष का अंतिम लक्ष्य है।
पुरुष मतलब आत्मा। वैसे पुरुष का मतलब ईश्वर भी होता है। पुरुष शब्द दोनों के लिए प्रयोग होता है, ईश्वर के लिए भी, आत्मा के लिए भी। पर यहां इस सूत्र में पुरुष का अर्थ है आत्मा। यह पुरुष का अंतिम प्रयोजन है। क्या? दुखों से छूटना। तो छूटना कौन चाहेगा? जो दुख से दुखी हो, वही तो छूटना चाहेगा। क्या ईश्वर दुखी होता है? वोह तो दुखी होता ही नहीं। तो यह बात उस पर लागू ही नहीं होती। जो दुखी नहीं है, वो क्या काहे को छूटना चाहेगा? छूटना तो वह चाहेगा जो दुखी है। तो दुखी तो आत्मा है। इसलिए यहां पुरुष का अर्थ आत्मा करना, ईश्वर नहीं। ईश्वर तो पहले ही छूटा-छूटा है, सदा से दुख से छूटा हुआ है। उस पर यह बात लागू नहीं होती। आत्मा पर यह बात लागू होती है कि वह दुख से छूटना चाहता है।
तो यह कपिल मुनि जी ने पहले ही सूत्र में सूचना दी। तीन प्रकार के दुखों से छूटना जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य है। अब वो क्यों बंध गया इस दुख के चक्कर में, क्यों पड़ गया? यह सारी चर्चा चल रही है। तो क्या कारण है? क्यों जीवात्मा शरीर के बंधन में आ जाता है? जब वह बंधन में आ जाता है, तब उसको दुख भोगने पड़ते हैं। जब तक वह शरीर धारण नहीं करेगा, तब तक कोई दुख नहीं आएगा। और शरीर के बंधन में आ गया, अब उसको यह तीनों दुख भोगने पड़ेंगे। किसी को कम, किसी को अधिक। वह तो हर एक की अपनी परिस्थितियां अलग-अलग हैं। उन परिस्थितियों की भिन्नता के कारण यह दुख भी कम-अधिक भोगने पड़ते हैं।
फिर कोई व्यक्ति बुद्धि का उपयोग करता है और वह दुख से छूटने का रास्ता ढूंढता है, तो बहुत सारा वह अपने दुख को कम कर लेता है। जीते जी भी पूरी तरह तो नहीं छूट पाता, लेकिन काफी कुछ छूट सकता है। बुद्धि का उपयोग करे, पुरुषार्थ करे, मेहनत करे, तो बहुत कुछ दुखों से व्यक्ति छूट जाता है। जीते जी भी छूट जाता है। 100% नहीं छूटता, वह तो मोक्ष में छूटेगा। तो दूसरे शब्दों में कहें कि 100% छूटना मनुष्य का या आत्मा का अंतिम प्रयोजन है। इसी का नाम मोक्ष। 100% दुख से छूटने का नाम ही तो मोक्ष है। मोक्ष का अर्थ है छूटना। मोक्ष शब्द का अर्थ ही सीधा-सीधा ये है, छूटना। किससे छूटना? दुखों से। कितना छूटना? पूरी तरह छूटना। इसका नाम मोक्ष है। मोक्ष, मुक्ति, यह दोनों का अर्थ एक ही है। मुक्ति या मोक्ष, एक ही बात। तो दुखों से मुक्ति चाहिए, दुखों से मोक्ष चाहिए। वहां 100% मोक्ष हो जाएगा, जब 100% दुखों से छूटी-छुट्टी हो जाएगी, छूट जाएंगे।
[संगीत]