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प्यारे दोस्तों, आज की कहानी बहुत दिलचस्प और हैरान कर देने वाली कहानी है। और यह कोई कहानी नहीं बल्कि एक सच्चा वाकया है जो मेरे वालिद साहब मुझे सुनाया करते थे। यह किस्सा मुझे इतना पसंद आया कि मैंने इसे याददाश्त की रोशनी में तफसील से तरतीब दिया। किरदारों के नाम खुद से रखे और इसे एक मुकम्मल कहानी की सूरत में आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूं। मुझे यकीन है कि यह कहानी आपको जरूर बहुत पसंद आएगी।
तो चलिए बगैर वक्त जाया किए इस खूबसूरत और हिरतंगेज कहानी का आगाज करते हैं। कदीम जमानों की बात है जब फारस के दिल में छोटे-छोटे गांव बसते थे और जिंदगी सादगी और कनाहत की धुन पर रुकती थी। इन्हीं में से एक गुमनाम गांव में सरसब्ज खेतों और मिट्टी की सौधी खुशबू के दरमियान एक चरो आहा रहता था। जिसे गांव वाले प्यार से करम कहा करते थे। करम का असली नाम करीम था। मगर वह अपनी सादगी और खुश अखलाकी की वजह से हर खास ओआम में करम के नाम से जाना जाता था। उसकी दुनिया बहुत छोटी थी मगर मोहब्बत और सुकून से भरी हुई थी। उसकी मलकियत में फकत दो मासूम बच्चे, सात साल बेटा बिलाल और पांच साल बेटी फातिमा और एक सलीकामंद बीवी आमीना थी।
आमना एक ऐसी औरत थी जो अपनी खामोशी में भी एक पूरी कायनात समेटे हुए थी। उसकी आंखों में सब्र का समंदर था और उसके हाथों में तो वह जादू था जो मामूली से मामूली खाने को भी लजीज बना देता था और एक कच्चे घर को भी जन्नत बना देता था। गरीबी उनका मकदर थी। उन्हें अक्सर दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मयस्सर आती थी। मगर उनके घर में एक ऐसा सुकून था जो कई मालदार खानदानों को भी नसीब नहीं होता। वह सब अपनी छोटी सी दुनिया में खुश थे। एक दूसरे का सहारा थे। हर दुख सुख को साथ बांटते थे और उनके दिलों में रब की रजा समाई हुई थी।
करम का हर रोज का मामूल सुबह सवेरे शुरू होता। वह सुबह होते ही उठ जाता जब आसमान में सितारे टिमटिमाते होते और मशरिक में हल्की सी सरखी नुमाया होने लगती थी। वह तड़के उठकर नमाज अदा करता। अल्लाह से अपने और अपने खानदान के लिए खैरो और बरकत की दुआ करता। फिर अपनी लकड़ी उठाता और गांव के जमींदार रहीम के मवेशियों का बड़ा सा रेवड़ हाक कर चरागाह की तरफ निकल जाता।
जमींदार रहीम अपने नाम ही के बरकत से एक निहायत नेक दिल और रहम दिल इंसान था। जो गरीबों की मदद और सबके साथ अच्छे सुलूक के लिए मशहूर था। रहीम अपनी दौलत को मोहज अपनी जात तक महदूद नहीं रखता था। बल्कि उसे दूसरों की भलाई और घाव की खुशहाली के लिए इस्तेमाल करता था। जरूरतमंदों की मदद करना, उनका हाल अहवाल पूछना और गरीब अमीर सबके साथ एक शान सुलूक करना उसका शिया था। उसके पास कई लोग काम करते थे और उसने सबको उनके काम बड़ी ईमानदारी से सौंप रखे थे और उनके हक का पूरा ख्याल रखता था। उसकी नेक दली का यह असर था कि उसके पास काम करने वाले उसके काम को अपने घर का काम समझते थे और बड़ी लगन के साथ अंजाम देते थे। जब हफ्ते का दिन आता तो वह सबको बुलाकर उनका पूरा और सही सही हिसाब करता और कभी किसी के साथ नाइंसाफी नहीं की थी। उसकी यह कसाइश उस छोटे से गाओं को खुशहाल बनाए हुए थी। लोग गरीब जरूर थे मगर उनके दिलों में कना और सुकून रचा बसा था।
करम भी इन्हीं गरीब मगर खुश लोगों में शामिल था। जो जमींदार के मवेशी चराने का काम बड़ी जिम्मेदारी से करता था। उसके चेहरे पर हमेशा एक नर्म सी मुस्कुराहट रहती थी जो उसके आंतरिक सुकून और अल्लाह पर मुकम्मल तवकुल की अकसी की करती थी। वह अपने छोटे से घर में अपने बच्चों और बीवी के साथ खुश था और अपनी जिंदगी से मुतमई था।
एक दिन जिसकी सुबह भी आम दिनों की तरह तलवर हुई थी। सूरज ने अपनी सुनहरी किरणें बिखेर दी थी और परिंदे शजरों पर चहचहा रहे थे। करम अपने मवेशियों के साथ गांव से दूर एक चरागाह की तरफ निकला। वह चरागाह ऐसी थी जहां हरीभरी घास दूर-दूर तक फैली हुई थी और उसके दरमियान से एक छोटी सी नदी गुजरती थी जो गर्मियों में अक्सर सूख जाती थी और उसमें पानी की सतह कम होकर कीचड़ में बदल जाती थी। आज भी नदी का पानी बहुत कम था। बस कीचड़ ही कीचड़ थी। दिनभर मवेशी खूब चरे और सैर होकर घास खाई। करम भी एक घने बरद के दरख्त के नीचे अपने मामूल के मुताबिक बैठा हुआ था और परिंदों की चहचहाट एक ऐसा माहौल बना रही थी जहां दुनिया के सारे गम भूल जाते थे और फकत सुकून का राज होता था।
जब सूरज मगरिब के अफक पर ढलने लगा और नारंगी रंग की शफकत आसमान पर फैल गई जिसने पूरे माहौल को एक हुस्न रंगत दे दी। करम ने मवेशियों को घाव की तरफ हाकना शुरू किया ताकि वक रहते घर पहुंच सके। मगर आज तकदीर ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा था। एक ऐसा इम्तिहान जो उसकी जिंदगी बदलने वाला था। उसके रेवट में एक भारी भरकम और कदरे सरगर्म भैंस थी जो जरा गाफिल थी और अपने अर्धगिर्द से बेखबर थी। वह चलते-चलते अचानक उस नदी के एक ऐसे हिस्से में जा फंसी जहां कीचड़ बहुत गहरा था। उसने निकलने की कोशिश की मगर जितनी कोशिश करती उतनी ही गहरी धंसती चली जाती। उसका जिस्म आधा कीचड़ में डूब चुका था और वह हर हरकत के साथ मजीद गहरी होती जा रही थी।
एक लम्हे के लिए तो करम समझा कि यह आम बात है। भैंस खुद ही निकल आएगी। मगर जब भैंस ने जोर लगाया और मजीद गहरी धंसती चली गई तो करम के दिल की धड़कनें तेज हो गई। भैंस ने अपनी सारी ताकत लगा दी। जिस्म को बल दिया, टांगे हटाई मगर वह कीचड़ की गिरफ्त से आजाद ना हो सकी। उसकी आंखों में बेबसी और थकन नुमाया होने लगी। उसकी सांसे अखड़ने लगी। वह आखिर थक कर चोर हो गई और कीचड़ में अधूरी सी लेटी पड़ी गई। उसका सारा जिस्म कीचड़ में लथड़ा हो चुका था और वह बेहद पड़ी थी।
करम ने जब यह मंजर देखा तो उसके माथे पर पसीने के कतरे नुमाया हो गए और उसके पैरों तले से जमीन निकल गई। उसने फौरन भागकर भैंस की रस्सी पकड़ी और उसे खींचने लगा। वह पूरी ताकत से खींचता रहा। उसकी सांसे फूलने लगी। उसके बाजुओं में दर्द उठने लगा। मगर भैंस टस से मस ना हुई। कीचड़ की गिरफ्त इतनी मजबूत थी कि भैंस का भारी वजन उसे मजीद गहराई में ले जा रहा था। करम ने अकेले उसे निकालने की हर मुमकिन कोशिश की। यहां तक कि उसके हाथ जख्मी हो गए और उसके जिस्म में दर्द उठने लगा मगर कामयाबी ना मिली।
वक तेजी से गुजरता जा रहा था और शाम की तारीकी फैल रही थी। जंगल से आने वाली हुंकार आवाजें माहौल को मजीद खौफनाक बना रही थी। उसे एहसास हुआ कि अब तन्हा इस भैंस को निकालना नामुमकिन है। उसने सोचा कि अब रात होने वाली है और जंगली जानवरों का खतरा बढ़ जाएगा। खासतौर पर शेर और भेड़िए इस इलाके में अक्सर नजर आते थे। उसने बाकी मवेशियों को जमा किया और भैंस को कीचड़ में बेरो मददगार छोड़कर गांव की तरफ रुख किया। उसके दिल पर एक बोझ सा था। वह अपनी भैंस को इस हाल में छोड़कर जाना नहीं चाहता था। मगर कोई चारा भी नहीं था। उसके दिल में मुसलसल यह ख्याल आ रहा था कि भैंस का क्या होगा।
गांव पहुंचकर करम ने मवेशियों को उनके बाड़ों में बांधा और सीधा जमींदार रहीम के घर की तरफ भागा। रात का अंधेरा छा चुका था और घांव में खामोशी छाई हुई थी। फकत कहीं-कहीं लाल टीनों की मध्यम रोशनी नजर आ रही थी। जमींदार अपने सहन में एक पुरानी चारपाई पर बैठा किसी से बात कर रहा था। करम की परेशानी उसके चेहरे से झलक रही थी। जमींदार ने उसे देखते ही भांप लिया कि कोई अहम बात है। "क्या हुआ? इतना परेशान क्यों हो?" जमींदार ने पूछा।
करम ने हापंपते हुए सारी सूरत हाल तफसील से बयान की। भैंस के कीचड़ में फंस जाने से लेकर अपनी नाकाम कोशिशों तक सब कुछ बता दिया। उसकी आवाज में बेबसी और फिक्र नुमाया थी। वह करीब रो देने की हालत में था। जमींदार रहीम ने सब्र और सुकून से उसकी बात सुनी। उसके चेहरे पर कोई नाराजगी नहीं थी। "कोई बात नहीं करम। फिक्र मत करो। अब बहुत रात हो चुकी है। अंधेरे में कुछ करना मुश्किल है। हम कल सुबह गांव के कुछ ताकतवर लोगों को ले जाकर उसे आसानी से निकाल लेंगे। इसमें क्या बड़ी बात है?" जमींदार ने एक लम्हे के लिए सोचा। फिर कहा, "मगर एक मसला है। रात के वक्त जंगली जानवरों का खतरा है कि कहीं भैंस को नुकसान ना पहुंचा दें। खासतौर पर शेर और भेड़िए इस चरागाह के आसपास अक्सर घूमते रहते हैं। तुम एक काम करो घर जाकर खाना पीना खाओ और अपने घर वालों को बताकर भैंस की रखवाली करने के लिए दोबारा वहां चले जाओ।"
जमींदार ने मजीद कहा, "अगर कहो तो मैं दो लोगों को तुम्हारे साथ कर देता हूं ताकि तुम्हें रात गुजारने के लिए सहारा मिले और डर भी ना लगे। जंगल में तन्हा रात काटना मुश्किल होता है और खासतौर पर इस मौसम में जब जानवर पानी की तलाश में घाव के करीब आ जाते हैं।"
करम ने जमींदार की पेशकश को सुनी अनसुनी कर दी। उसका दिल इस बात पर राजी नहीं था कि वह अपने काम के लिए दूसरों को परेशान करे। उसे अपने ऊपर पूरा भरोसा था। "नहीं मालिक," उसने पूरे एतमाद लहजे में कहा। "डर की कोई बात नहीं। अल्लाह मालिक है। मैं अकेला ही चला जाऊंगा और भैंस की देखभाल अच्छे से कर लूंगा। सुबह आप कुछ लोगों को भेज दीजिएगा तो हम उसे निकाल लेंगे। मेरे रब का करम है कि वह मुझे हर मुश्किल से निकालता है।"
जमींदार ने करम की इस हिम्मत और लगन को सराहा और उसे जाने की इजाजत दे दी। उसे करम पर पूरा भरोसा था और उसने उसे मजीद जोर नहीं दिया।
जमींदार रहीम से इजाजत लेकर करम सीधा अपने घर की तरफ लौटा। घांव की तंग गलियां रात के सन्नाटे में डूबी हुई थी। फकत हवा की सरसराहट और दूर से कुत्तों के भौकने की आवाज सुनाई दे रही थी। चांद की हल्की रोशनी धूल उड़ाती सड़कों पर पड़ रही थी और हर घर में खामोशी का राज था। उसका दिल भारी था क्योंकि वह जानता था कि आमना उसके इस फैसले पर परेशान होगी। मगर चेहरे पर उसने मजबूती का नकाब चढ़ा रखा था। वह जानता था कि अगर उसने जरा भी कमजोरी दिखाई तो आमना जो पहले ही फिक्रमंद थी मजीद परेशान हो जाएगी।
जैसे ही करम ने घर के दरवाजे पर दस्तक दी, आमना ने फौरन दरवाजा खोल दिया। उसकी आंखों में नींद के बजाय तशवीश तीर रही थी। वह बहुत बेचैन थी। "आज आपको आने में बहुत देर हो गई," आमना ने नरमी से मगर परेशानी के साथ पूछा। उसकी आवाज में हल्की सी लज्जा थी। "मैं कब से आपका इंतजार कर रही थी। मेरा दिल डूब रहा था। बच्चों को भी नींद नहीं आ रही थी। वह आपको पूछ रहे थे।"
करम अंदर आया और उसने अपनी टूटी हुई खट पर बैठकर अपनी बीवी आमना को सारी सूरत हाल तफसील से बताई। भैंस के कीचड़ में फंस जाने से लेकर जमींदार की हिदायत तक कि उसे रात भर वहां रखवाली के लिए रहना होगा। उसने यह भी बताया कि जमींदार ने उसे दो आदमी साथ देने की पेशकश की थी जो उसने कबूल नहीं की।
आमीना का चेहरा सना हो गया। जब उसने सुना कि उसका शौहर अकेला रात भर जंगल में एक बेयारो मददगार भैंस की हिफाजत करेगा। उसकी आंखों में खौफ के साए लहराने लगे और उसका रंग पीला पड़ गया। "तो क्या आप अकेले रात भर वहां रहेंगे?" उसने कांपती आवाज में पूछा। उसका पूरा जिस्म खौफ से कांप रहा था। उसके दिल में जंगल के खतरात, दरंदों का डर और इनगिनत वहमों ने डेरा डाल लिया था। उसे शेर और भेड़ियों की कहानियां याद आ गई जो गांव के बूढ़े सुनाया करते थे। "अगर किसी जंगली जानवर ने आपको नुकसान पहुंचा दिया तो खुदा ना खास्ता मेरे बच्चों का क्या होगा?" उसने रोते हुए कहा और मुझे तो भूत प्रेत का भी डर लगता है। जंगल में अकेले क्या करेंगे आप?" उसने करीब गड़गड़ाते हुए कहा, "नहीं आप वहां अकेले ना जाएं। जमींदार साहब से कहकर किसी और को भिजवा दें या फिर अपने साथ एक दो लोग और भी ले जाएं। मुझे तो बहुत डर लगता है।" खुदा ना खास्ता कुछ हो गया तो।
आमना के चेहरे पर खौफ की परछाइयां वाज थी। उसकी आंखों से आंसू जारी थे। करम जिसे गांव वाले उसकी बहादुरी और साबित कदम की वजह से जानते थे। अपनी बीवी की परेशानी देखकर मुस्कुराया। उसने अपना एक हाथ आमीना के कंधे पर रखकर उसे तसल्ली दी। "अरे पगली," करम ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "तू तू बेकार ही डरती है। ऐसा कुछ नहीं होगा। मैं कोई डरपोक हूं जो जमींदार साहब से बजदिदली वाली बात करूं। यह तो मेरे काम का हिस्सा है।" उसने अपने लहजे में एतमाद भरते हुए कहा, "तू फिक्र मत कर। मुझे कुछ नहीं होगा। मेरा रब मेरा मुहाफिज है।" उसने जल्दी से बात खत्म की ताकि आमीना को मजीद बहस का मौका ना मिले और जल्दी कर। "मुझे भूख लगी है। खाना दे क्योंकि बहुत रात हो गई है और मुझे जल्दी जाना होगा। भैंस अकेली है। कहीं उसे कोई दंद नुकसान ना पहुंचा दे।"
आमीना जानती थी कि उसका शौहर जिद्दी है और जो फैसला कर लेता है उस पर कायम रहता है। वह उसे रोक नहीं सकती थी। उसका दिल चीख रहा था कि उसे रोके। मगर वह अपने शौहर की इज्जत नफ्स और उसकी जिम्मेदारी को भी समझती थी। खामोशी से उसने गरमगरम रोटियां और चावल निकालकर करम के सामने रख दिए। करम ने जल्दी-जल्दी खाना खाया और हर लखमे के साथ उसने खुदा का शुक्र अदा किया कि आज भी उसे पेट भरकर खाने को मिला।
खाना खाने के बाद जब करम दोबारा भैंस के पास जाने लगा तो उसने आमना से कहा, "ठीक है मैं जा रहा हूं। घर के दोनों दरवाजे अच्छे तौर पर बंद कर लेना और डरना मत।" "ठीक है," आमना ने एक गहरा सांस लिया और भरे हुए दिल के साथ कहा, "ठीक है, अपना ख्याल रखना। अल्लाह हाफिज।" उसकी आंखों में आंसू तीरने लगे थे, मगर उसने उन्हें अंदर ही उतार लिया ताकि करम की हिम्मत ना टूटे। उसने बिस्तर पर लेटे बच्चों के माथे पर हाथ फेरा। उन्हें गले लगाया और फिर दरवाजा बंद करके करम के लिए दुआ करने लगी।
और फिर करम अपनी लकड़ी के साथ रात की तारीकी में अकेला ही जंगल की तरफ चल पड़ा। गांव की मध्यम रोशनियों से दूर वह आहिस्ता-आहिस्ता तारीख और परसरार जंगल के अंदर दाखिल होता गया। रात की खामोशी उसके कदमों की आहट को भी सुन रही थी और दरख्तों के पत्तों की सरसराहट ऐसी महसूस हो रही थी जैसे कोई अनकही कहानियां सुना रही हो। जंगल में कदम रखते ही माहौल में एक अजीब सा खौफ फैल गया। दरख्तों के साए ऐसे लग रहे थे जैसे कोई परासरार मखलूका उसका पीछा कर रही हो। दूर से किसी लोमड़ी की चालाक आवाज फिर किसी उल्लू की हौलनाक चीख हर आवाज उसके दिल की धड़कनों को तेज कर रही थी। वह अपने अंदर के खौफ से लड़ रहा था जो एक ऐसी जंग थी जिसे फकत वही जानता था। उसकी हिम्मत और जिम्मेदारी उसे आगे बढ़ने पर मजबूर कर रही थी। मगर इंसानी फितरत उसे डरा रही थी। वह हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहा था। लकड़ी को मजबूती से पकड़े हुए था। उसके दिमाग में आमीना की वहम परस्ती, बच्चों के मासूम चेहरे, उनकी यादें और जमींदार रहीम का उस पर एतमाद सब घूम रहा था। वह किसी भी सूरत हार नहीं मानना चाहता था। उसे अपनी जात से ज्यादा अपनी जिम्मेदारी की फिक्र थी।
करीब आधा घंटे की मुसलसल और परखतर मसाफत के बाद वह उस नदी के करीब पहुंचा जहां भैंस फंसी हुई थी। चारों तरफ तारीकी और खामोशी का राज था। जिसे फख जंगली हयात की आवाजें तोड़ रही थी। उसे दूर से ही भैंस की गहरी सांसों की आवाज सुनाई दी। वहां पहुंचकर उसने देखा कि भैंस कीचड़ में उसी तौर पर बेबसी से फंसी हुई है और बहुत थक चुकी है। उसकी आंखें गमगीन और बेजान लग रही थी। करम को उसे इस हालत में देखकर बहुत अफसोस हुआ। उसने फैसला किया कि सबसे पहले आग जलाई जाए ताकि जंगली जानवर करीब ना आए। उसने अर्धगिर्ध से सूखी लकड़ियां और झाड़ियां जमा की। यह काम तारीकी में आसान नहीं था। मगर उसने लगन से किया। थोड़ी देर बाद उसने पत्थरों को रगड़कर चिंगारी पैदा की और सूखी घास में आग लगा दी। आग की लपटें तेजी से बुलंद हुई और तारीकी को चीरने लगी। उसकी रोशनी से माहौल में कुछ सुकून आया। मगर जंगल का खौफ मुकम्मल तौर पर खत्म नहीं हुआ।
करम आग के पास बैठ गया। रात के गहरे साए में करम ने अपने दिल को मजबूत किया। वह भैंस से बातें करने लगा। उसे तसल्ली देता जैसे वह उसे समझ रही हो। "फिक्र मत कर। सुबह होते ही हम तुम्हें यहां से निकाल लेंगे। बस यह रात काट लें।" वह ना जाने कब तक उससे बातें करता रहा। आग की रोशनी में उसका चेहरा कभी रोशन होता तो कभी तारीकी में छिप जाता। वक्त आहिस्ताआहिस्ता गुजरता गया। उसने अपनी लकड़ी को अपने पास रखा और हर आने वाली आवाज पर कान लगाए रखता था। कभी किसी सरसराहट पर चौंक उठता तो कभी किसी जानवर की आवाज पर उसका दिल जोर से धड़कने लगता।
आधी रात गुजर चुकी थी जब करम की आंखों में नींद का गलबा होने लगा। दिन भर की मशकतक और रात की परेशानी ने उसे थका दिया था। उसकी आंखें बोझिल हो रही थी और वह झपकियां लेने लगा। इसी झपकी के आलम में जब वह बिल्कुल गनूदगी में था। अचानक उसे किसी जानवर के गुरने की एक हौलनाक आवाज सुनाई दी। यह आवाज इतनी करीब और गरजदार थी कि करम फौरन चौंक कर उठ बैठा। उसकी सारी नींद एक पल में गायब हो गई। उसका जिस्म सर्द पड़ गया और पूरे बदन में कांपन तार हो गई। उसने नजर उठाकर देखा। आग की मध्यम होती रोशनी में कुछ दूरी पर दरख्तों के झुंड से बाहर निकलता हुआ एक बहुत बड़ा और खौफनाक शेर उसकी तरफ कदम बढ़ा रहा था। उसका कद उसकी अपनी भैंस से भी बड़ा मालूम हो रहा था। उसकी आंखें अंधेरे में देखते हुए अंगारों की तौर पर चमक रही थी।
करम के जिस्म में सेहसन दौड़ गई और उसका खून जम सा गया। उसका दिल हल्का में आ गया था। यह वह मंजर था जिसका खौफ आमीना ने उसे दिलाया था और अब वह हकीकत बनकर उसके सामने खड़ा था। उसे लगा कि यह उसकी जिंदगी का आखिरी लम्हा है। शेर को अपनी तरफ बढ़ता देखकर करम के होश और हवास बाखते हो गए। उसके जिस्म में सर्द लहर दौड़ गई और उसके दिल की धड़कनें इतनी तेज हो गई कि उसे लगा जैसे वह उसके सीने को चीर कर बाहर निकल आएंगी। शेर आहिस्ता-आहिस्ता मगर पर यकीन और खौफनाक अंदाज में उसकी तरफ आ रहा था। उसकी आंखें रात के अंधेरे में दहकते हुए अंगारों की मानिंद चमक रही थी जो बेरहम करम के दिल पर वार कर रही थी। खौफ ने कर्म के पूरे वजूद को अपनी लपेट में ले लिया था। उसने अपनी लकड़ी को मजबूती से थाम लिया। उसे यूं महसूस हो रहा था जैसे यह लकड़ी ही उसकी जिंदगी का आखिरी सहारा है। मगर उसे मालूम था कि एक छोटी सी लकड़ी का टुकड़ा इस खौफनाक जानवर के सामने बेमानी है। उसके दिमाग में आमना की वहम परस्ती बच्चों के मासूम चेहरे, उनकी यादें और जमींदार रहीम का उस पर एतमाद सब घूमने लगा। उसे लगा कि यह उसकी जिंदगी की आखिरी रात है। आज शेर उसे नहीं छोड़ेगा। उसे मौत के घाट उतार देगा।
शेर इतना करीब आ गया था कि अब कर्म के लिए भागने का कोई इमकान नहीं था। वह अपनी जगह पर जमकर रह गया था जैसे उसके पैरों में शीशा भर दिया गया हो। उसकी जुबान सूख चुकी थी और उसके हलकम में कांटे चुभ रहे थे। वह चुपचाप और सांस रोक कर आग के करीब बैठा रहा। उसके अलावा वह कुछ कर भी नहीं सकता था। उसने अपनी आंखों को बंद करने की कोशिश की मगर वह बंद ना हो सकी। वह शेर के खौफनाक चेहरे को देखता रहा। यह एक ऐसी बेबसी थी जिसे अल्फाज में बयान करना मुश्किल है। शेर अब उसके बिल्कुल
सामने था। आग की रोशनी उसके भारी जिस्म, मजबूत पेशियों और तेजधार पंजों को नुमाया कर रही थी जो किसी भी लम्हे करम को चीर सकते थे। जब शेर उसके और करीब आया और आग की लपटें उसके चेहरे पर पड़ी तो करम ने एक अजीब मंजर देखा।
शेर जो बजाहिर बिल्कुल तंदुरुस्त और खतरनाक नजर आ रहा था, एक पांव से लंगड़ा रहा था। उसका बाया अगला पंजा जमीन पर पूरी तौर पर नहीं पड़ रहा था और वह उसे घसीटता हुआ आ रहा था। करम को उसके लंगड़ाने पर तज्जुब हुआ। मगर खौफ का आलम ऐसा था कि यह तज्जुब भी उसके दिल से डर को ना निकाल सका। वह अभी भी अपनी सांस रोक कर खामोश बैठा रहा। उसकी निगाहें शेर के चेहरे पर जमी हुई थी।
शेर उसके बिल्कुल पास आकर आग के करीब उसके सामने आ बैठा। उसका कद करम के बैठे हुए कद से कहीं ज्यादा ऊंचा था और उसका सर करम के बराबर में आकर ठहर गया। एक लम्हे के लिए करम की सांसे रुक गई। उसे लगा कि अब शेर उस पर हमला कर देगा। वह अपने आप को मौत के लिए तैयार कर चुका था।
मगर शेर ने ऐसा नहीं किया। उसने एक हल्की सी घुनघुर्र की जो किसी दहाड़ की तौर पर खौफनाक नहीं थी, बल्कि उसमें कुछ बेचैनी, तकलीफ और एक अजीब सी इल्तजा की आमीजिश थी। उसके बाद शेर ने वही जख्मी पांव जिससे वह लंगड़ा रहा था करम की तरफ फैलाया। उसकी आंखों में एक शदीद दर्द साफ झलक रहा था, जैसे वह करम से कह रहा हो देखो मैं तकलीफ में हूं।
इस गैर मुंतजिर हरकत ने करम को हैरान कर दिया। शेर की यह हरकत उसकी आंखों में अजीब सी इल्तजा और उसके घुन-गुर्र में छिपी तकलीफ, यह सब करम को एक अजीब पैगाम दे रहे थे। उसने शेर की आंखों में गहराई से देखा तो उसे महसूस हुआ कि यह शेर हमलावर नहीं है, बल्कि मदद का तलबगार है। करम को फौरन समझ आ गया कि उसका पांव जख्मी है और यह मुंह से मदद मांग रहा है।
यह एक गैर मामूली लम्हा था, जहां एक शिकारी शिकार के सामने अपनी बेबसी का इजहार कर रहा था और एक इंसान जो शेर के रहम ओ करम पर था, उसे यह महसूस हो रहा था कि कदरत उसे किसी इम्तिहान में डाल रही है। करम को डर तो बहुत लग रहा था और डर क्यों ना लगता, उसके सामने एक शेर था, एक ऐसा दरंद जो अपनी फितरत में खून खार होता है। मौत बिल्कुल करीब नजर आती है। उसकी पसलियां तेजी से ऊपर नीचे हो रही थी और उसके पूरे जिस्म पर सर्दी का एहसास था। उसका पूरा वजूद लर्ज रहा था।
खैर करम ने अपनी पूरी हिम्मत जमा की। उसने आहिस्ता से लरजते हुए अपना हाथ शेर के पंजे की तरफ बढ़ाया। जैसे ही उसका हाथ शेर के पंजे के करीब पहुंचा, शेर ने एक और घुनघुर्र की, मगर यह घुनघुर्र पहले से ज्यादा शदीद और तकलीफ तलब थी। यह घुनघुर्र दर्द की शिद्दत से थी, जैसे वह करम को खबरदार कर रहा हो कि उसे छूने से मजीद तकलीफ होगी।
करम ने जल्दी से अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसे लगा कि शायद शेर उसे काट लेगा। उसकी हिम्मत एक लम्हे के लिए जवाब दे गई थी। वह थोड़ी देर उसी हालत में बैठा रहा। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने फिर से शेर की तरफ देखा। शेर उसी तौर पर अपना जख्मी पंजा उसकी तरफ किए हुए था। उसकी आंखों में वही इल्तजा थी।
करम ने अपने अंदर की आवाज सुनी जो उसे कह रही थी कि यह शेर वाकई मदद चाहता है। यह तुम्हारा दुश्मन नहीं है। उसने दोबारा हिम्मत की और बहुत आहिस्ता से अपना हाथ शेर के पंजे की तरफ बढ़ाया। उसने अपनी उंगलियां शेर के बड़े और भारी पंजे पर रखी और उसे छुआ। जैसे ही उसने अपने हाथ से शेर के पंजे को छुआ, उसे महसूस हुआ कि कोई बड़ा सा कांटा शेर के पंजे में गहरा घुसा हुआ है जो थोड़ा सा बाहर है और बाकी पूरा उसके पंजे में ढसा हुआ है। यह कांटा देखने में एक लकड़ी का मोटा और नुकीला टुकड़ा लग रहा था।
करम के हाथ ने जब शेर के पंजे को छुआ तो शेर ने तकलीफ की वजह से एक और घुनघुर्र की, मगर इस बार वह घुनघुर्र हल्की थी और उसके साथ ही शेर ने अपना पंजा थोड़ा सा ऊपर उठाया जैसे वह उसे मजीद सहूलत फराहम कर रहा हो। करम ने जल्दी से अपना हाथ वापस खींच लिया। उसकी आंखें अब कांटे पर मुरकूज थी।
करम सोचने लगा कि अगर मैं उसके पंजे से यह कांटा निकालता हूं तो उसे बहुत दर्द होगा और दर्द की वजह से गुस्से में उसने मुझ पर हमला कर दिया तो उसके दिमाग में कई तरह के ख्यालात आ रहे थे। क्या यह फैसला सही है? क्या वह अपनी जान खतरे में डाल रहा है? उसे अपने घर, अपनी बीवी और बच्चों की याद आई। एक लम्हे के लिए उसे लगा कि उसे यहां से भाग जाना चाहिए। मगर वह भाग नहीं सकता था।
मगर फिर उसने सोचा कि अगर उसे मुझे मारना होता तो अब तक मार चुका होता। वह खामोश क्यों बैठा है और अपना पंजा क्यों मेरी तरफ किए हुए है? जरूर उसे मेरी मदद की जरूरत है। वह एक अजीब कशमकश में मुतासिर था। एक तरफ खौफ था जो उसे भागने पर उकसा रहा था और दूसरी तरफ उसकी इंसानियत और उसके अंदर का चरवाहा जो किसी भी जानदार को तकलीफ में देखकर बेचैन हो जाता था, उसे मदद करने पर जोर दे रहा था।
करम ने आमना की बात को रद्द किया था कि वह अकेला चला जाएगा और अब उसे अपनी इस बात पर पूरा उतरना था। मगर फिर उसने सोचा कि जो भी हो मुझे उसके पांव से कांटा निकालना ही चाहिए। मौत और जिंदगी तो खुदा के हाथ में है। अगर मरूंगा तो एक नेक काम करके ही मरूंगा। यह ख्याल उसके दिल में एक अजीब सी हिम्मत भर गया। यह उसके ईमान का लम्हा था, जब उसने अपनी जान को अल्लाह पर तवकुल करते हुए कुर्बान करने का फैसला कर लिया था, चाहे नतीजा कुछ भी हो।
मगर शेर का डर करम के दिल और दिमाग पर पूरी तौर पर छाया हुआ था। उसने एक गहरा सांस लिया। अपने अंदर की सारी हिम्मत जमा की। उसने अपने हाथ को आहिस्ता-आहिस्ता शेर के पंजे की तरफ बढ़ाया। इस बार उसके हाथ में लजिश कम थी। उसका इरादा मजबूत था। उसने कांटे के सिरे को मजबूती से पकड़ा। अपनी आंखें बंद की और एकदम झटके से उसे खींच दिया।
जैसे ही कांटा बाहर निकला, शेर ने दर्द की वजह से एक जोरदार दहाड़ मारी। यह दहाड़ इतनी गरजदार और हौलनाक थी कि पूरा जंगल गूंज उठा। करम के दिल की धड़कनें बंद हो गई और उसके होश ओ हवास जवाब दे गए। शेर की दहाड़ ने उसके अंदर का सारा खौफ दोबारा जिंदा कर दिया और उसका जिस्म कांपने लगा। वह इस दहाड़ की शिद्दत को बर्दाश्त ना कर सका और बेहोश होकर वहीं ढेर हो गया। उसका जिस्म बेजान होकर आग के करीब गिर गया।
शेर अब भी दहाड़ रहा था। शेर की दहाड़ जंगल में गूंजी और फिर एक प्रहार खामोशी छा गई। करम बेहोश होकर आग के करीब ही गिर चुका था। उसका जिस्म बेजान पड़ा था। उसे यह भी मालूम ना था कि अगला लम्हा उसकी जिंदगी का आखिरी लम्हा होगा।
शेर ने जब दर्द की शिद्दत से दहाड़ा था तो उसके पंजे से जहां करम ने कांटा निकाला था, मादा यानी पीप की एक धार बह निकली थी। वह जगह कांटा लगने की वजह से बहुत मजीद पक चुकी थी और उसमें गहरा जख्म हो गया था। मादा का एक ढेर वहीं जमीन पर जमा हो गया।
शेर जिसकी दहाड़ ने कर्म को बेहोश किया था, अब आहिस्ता-आहिस्ता खामोश हो गया था। उसके चेहरे पर दर्द से निजात की एक अजीब सी तसल्ली नजर आ रही थी। कुछ लम्हे वह वहीं बैठा रहा। अपनी तकलीफ से आजाद होकर उसने अपने पंजे को हल्का सा हरकत दी। दर्द की जगह अब हल्का सा आराम महसूस होने लगा था और उसकी धड़कनें मामूल पर आ रही थी।
जंगल का सन्नाटा और भी गहरा हो गया था। रात अपने आखिरी पहर में थी। सितारे आसमान में चमक रहे थे और हवा में एक अजीब सी खून की थी। शेर को दर्द से राहत मिली तो उसने अपनी निगाहें कीचड़ में फंसी हुई भैंस की तरफ फेर दी। भैंस अब भी उसी जगह लेटी पड़ी थी, थकी हुई और बेबस।
शेर अपनी जगह से उठा। उसका जख्मी पंजा अब मजीद तकलीफ नहीं दे रहा था। उसने एक गहरी सांस ली और एक छलांग लगाई। उसकी यह छलांग इतनी ताकतवर थी कि करम अगर होश में होता तो हैरान रह जाता। एक झटके के साथ उसने अपने मजबूत पंजों से भैंस को मजबूती से पकड़ा। भैंस जो अब तक बेहोश हरकत पड़ी थी, शेर की इस अचानक हरकत से हड़बड़ा गई और खौफ से उसकी आंखें फट गई।
शेर ने अपनी पूरी ताकत लगाई और एक ही वार में भैंस को कीचड़ से बाहर निकालकर नदी के किनारे पर खड़ा कर दिया। शेर ने भैंस को साहिल पर धकेल दिया और उसने जोर से अपने जिस्म को झटका दिया। उसके जिस्म पर जो कीचड़ लगा था, वह झटके की वजह से साहिल पर फैल गया। भैंस खौफजदा थी, मगर उसके जिस्म पर कोई जख्म नहीं आया था। वह किनारे पर खड़ी हांफ रही थी। उसकी आंखों में अभी भी हिरत और डर था।
शेर ने भैंस को किनारे पर लाकर खड़ा किया और फिर करम की तरफ देखा जो बेहोश पड़ा था। शेर ने एक लम्हे के लिए करम के करीब आकर उसे सूंघा जैसे वह उसकी हालत का जायजा ले रहा हो। उसे यकीन हो गया था कि करम बेखतरे है। उसके बाद वह आहिस्ता-आहिस्ता अपने लंगड़ाते हुए कदमों से एक सिम को चल दिया और जंगल की गहराइयों में गायब हो गया। उसने करम को कोई नुकसान ना पहुंचाया। उसका बदला पूरा हो चुका था। वह एक आजिम शान बा असूल जंगली जानवर साबित हुआ था जो अपनी फितरत के खिलाफ एक इंसान के एहसान का बदला चखा गया था।
अब तक रात काफी बीत चुकी थी। भैंस किनारे पर खड़ी थी और करम बेहोश पड़ा था। जंगल में खामोशी का राज था जिसे फख परिंदों की सुबह की चहचहाट तोड़ रही थी। आहिस्ता-आहिस्ता आसमान पर सुबह की पहली किरणें फूटने लगी। अफक पर हल्की गुलाबी और नारंगी रंगत फैलने लगी। तारीकी छत रही थी और दिन की रोशनी चारों तरफ फैलने लगी थी। माहौल में एक नई ताजगी का एहसास था।
जब सूरज की सुनहरी किरणें सीधी करम के चेहरे पर पड़ी तो उसे आहिस्ता-आहिस्ता होश आने लगा। उसने करवट बदली और अपनी आंखें खोल दी। पहले तो उसे समझ ना आया कि वह कहां है। फिर उसे रात का सारा वाकया याद आ गया। शेर की दहाड़ उसका बेहोश होना। उसके जिस्म में एक सर्द लहर दौड़ गई। उसने खौफदा होकर अपने अर्धगिर्द देखा। उसे लगा कि वह अब शेर का निवाला बन चुका होगा। उसने घबराकर अपने दाएं बाएं नजर दौड़ाई।
उसकी नजर सबसे पहले अपनी भैंस पर पड़ी। उसने देखा कि भैंस कीचड़ में लिपटी हुई बिल्कुल सही सलामत नदी के किनारे पर खड़ी थी। करम को अपनी आंखों पर यकीन ना आया। वह तेजी से उठ बैठा और भैंस की तरफ भागा। उसने भैंस को छू कर देखा। वह वाकई किनारे पर खड़ी थी। उसने भैंस के पूरे जिस्म को छू कर देखा कि कहीं कोई जख्म तो नहीं। जब उसे तसल्ली हो गई तो वह भैंस के पास ही खड़ा रहा।
शेर वहां मौजूद ना था। करम ने चारों तरफ नजर दौड़ाई मगर शेर का कोई निशान ना था। फिर उसने गौर से उस जगह को देखा जहां वह शेर के पंजे से कांटा निकाल रहा था। वहां जमीन पर पीप का एक ढेर लगा हुआ था और उसके आसपास ताजा खून के कुछ निशानात भी थे। यह देखकर करम की आंखें खुल गई और उसे रात के वाक्य की पूरी हकीकत समझ में आ गई।
उसका दिल शेर के लिए एहतराम से भर गया। उसे यह समझने में जरा देर ना लगी कि यह सब शेर ही का काम है। उसके बेहोश हो जाने के बाद शेर ने ही अपनी तकलीफ से निजात पाने के बाद उसकी भैंस को कीचड़ से बाहर निकाला और फिर बगैर कोई नुकसान पहुंचाए अपने रास्ते चल गया। यह एक ऐसा वाकया था जिसने करम को हैरान कर दिया था। उसने कभी नहीं सोचा था कि एक खूनखार शेर भी किसी पर एहसान का बदला चका सकता है। यह कुदरत की एक ऐसी मिसाल थी जो उसके दिल पर हमेशा के लिए नक्श हो गई और उसका ईमान अल्लाह पर मजीद गहरा हो गया।
करम ने खुदा का बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया कि उसने उसे ना फक्त मौत के मुंह से बचाया बल्कि उसके मवेशी की हिफाजत भी की और उसे एक सबक भी सिखाया। उसकी आंखों में तशकुर के आंसू थे और उसके दिल में एक अजीब सा सुकून। यह रात उसके लिए एक डरावना ख्वाब भी थी और एक नाकाबिले फरामोश तजुर्बा भी। उसे लगा कि उसकी जिंदगी में अब एक नया मकसद शामिल हो चुका है। उसने अपनी भैंस के सर पर हाथ फेरा और फिर उसे लेकर घाव की तरफ चल पड़ा।
सूरज पूरी आबो तब से चमक रहा था और माहौल में परिंदों की चहचहाट सुनाई दे रही थी। हवा में एक ताजा खुशबू फैली हुई थी, जैसे रात के खौफनाक लम्हात को धोकर ले गई हो। करम के कदमों में अब एक नई ताकत थी, एक नई सोच और एक नई चमक।
जब वह गांव में पहुंचा तो जमींदार रहीम और कुछ गांव वाले उसे मिले। जमींदार ने रात भर नींद ना ली थी। वह करम और भैंस के लिए परेशान था। वह करम को भैंस के साथ सही सलामत देखकर हैरान हो गया। "करम, तुम भैंस को कीचड़ से बाहर कैसे निकाल कर ले आए?" जमींदार ने तज्जुब से पूछा। "तुमने तो कहा था कि यह एक आदमी के बस की बात नहीं।"
करम ने एक गहरा सांस लिया और फिर जमींदार को रात का सारा वाकया तफसील से बताया। उसने शेर के अचानक आने से लेकर उसके जख्मी पंजे, अपनी हिम्मत करके कांटा निकालने, शेर के दहाड़ने, अपने बेहोश होने और फिर सुबह जब होश आया तो भैंस को किनारे पर पा लेने तक की पूरी कहानी बयान की। उसकी बातों में एक अजीब सी हकीकत और हिरत थी। उसकी आंखों में जो चमक थी वह किसी दरंदे के खौफ की नहीं बल्कि एक गैर मामूली तजुर्बे की गवाही दे रही थी।
जमींदार रहीम और दूसरे गांव वाले करम की कहानी सुनकर दंग रह गए। उनमें से किसी को यकीन ना आ रहा था कि एक शेर ऐसा भी कर सकता है। यह एक ऐसा वाकया था जो उनके लिए बिल्कुल नया और नाकाबिल यकीन था। उन सब ने अल्लाह का शुक्र अदा किया और करम की जान बचने पर खुशी मनाई।
जमींदार ने भी अल्लाह का शुक्र अदा किया और करम को शाबाशी भी दी। "करम, वाकई तुम बहुत बहादुर हो और तुमने अपनी बहादुरी का सबूत भी दिया है," जमींदार ने कहा। "वो तुम बेहोश हुए। इस जगह कोई भी होता उसका भी यही हाल होता। मगर तुमने शेर के पंजे से कांटा निकाला और उसके सामने अपने होश बाहर हाल रखे। यह एक बहादुर शख्स ही कर सकता है और शेर भी अपना कर्ज चका कर चला गया। यह कुदरत का एक अनमोल सबक है।" जमींदार ने कर्म की पीठ थपथपाई। उसकी आंखों में कर्म के लिए गहरा एहतराम था।
करम की यह कहानी पूरे गांव में जंगल की आग के तौर पर फैल गई और हर जबान पर थी। लोग उसकी हिम्मत और शेर के इस गैर मुंतजिर एहसान पर हैरान थे। यह वाकया करम की जिंदगी का एक अहम बाप था, जिसने उसे ना फकत एक बहादुर चरोहा बना दिया था, बल्कि उसे जिंदगी का एक गहरा सबक भी सिखाया था। इस वाक्य के बाद करम की शोहरत दूर-दूर तक फैल गई और लोग उसे इज्जत की निगाह से देखने लगे। उसने अपने अमल से यह साबित कर दिया था कि सच्ची इंसानियत और नेकी किसी भी खतरात से बड़ी होती है।
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