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अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
नमो विष्णुपादाय कृष्णप्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिवेदान्त-स्वामी इति नामिने॥
नमस्ते सरस्वते देवे गौरवाणी प्रचारिणे।
निर्विशेष शून्यवादी पाश्चात्य देशतारिणे॥
जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद।
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्त वृंद॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्णा हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्णा आप सबके चरणों में मेरा बारंबार प्रणाम। आपने बड़ी कृपा करके इस कार्तिक के महीने में प्रतिदिन अपना संग प्रदान किया और श्रील प्रभुपाद के अनुगति में होकर सभी वैष्णवों के कृपा पात्र के रूप में हम यहां आप सबके सानिध्य में आपकी सेवा के लिए यहां हैं।
तो वेणु गीत का सत्र चल रहा है और कल हमने श्री गिरिराज गोवर्धन जिनको हरिदास वर्य नाम से श्री राधा रानी ने घोषित कराया और उनको सभी भक्तों में सर्वश्रेष्ठ भक्त की पदवी प्रदान की। इन्हीं की महिमा जारी है। तो आज यहां पर भी और भारत में भी मुझे लगता है कि गिरिराज गोवर्धन के अन्नकूट महोत्सव का बड़ा सुंदर अवसर है। सब भक्त उसी में लगे हैं। तो आज उन्हीं की चर्चा आगे चलाएंगे। दशम स्कंध के 21वें अध्याय 18वें श्लोक पर चर्चा हो रही है।
"हताय मदबल हरिदास वरियो यद्रामा कृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद मानम।
तनोति सहगणस्तयोत पानी सूय वस कंदर कंद मूल॥"
श्री गिरिराज गोवर्धन के विषय में श्री राधा रानी आदिक सखियां यही कहती हैं। श्री राधा रानी अपनी सखियों से कहती हैं हे अबला। अबला का अर्थ है जो बलहीन हो। बल कहते हैं स्ट्रेंथ, शक्ति और अला माने जिनमें शक्ति ना हो। तो अधिकांश देखा जाता है कि हिंदी भाषा में अथवा संस्कृत भाषा में जो प्रकृति शरीर के हैं, जो स्त्री शरीर धारी हैं, इनको अबला शब्द दिया गया। परंतु इस संदर्भ में सखियों के लिए संबोधन अबला बहुत महत्वपूर्ण है। इसके पीछे एक कारण है।
एक छोटी सी कथा हो जाए। वर्णन आता है कि श्री गिरिराज गोवर्धन पर्वत के रूप में द्रोणगिरी के पुत्र के रूप में विराजमान। द्रोणगिरी के पुत्र और द्रोणगिरी पिता हैं पर्वत रूप में और गिरिराज गोवर्धन उनके सुपुत्र के रूप में सुपुत्र के रूप में अवतरित हुए। पुलस्त ऋषि नामक ऋषि जो यह बड़ी प्रसिद्ध कथा है गिरिराज के संदर्भ में कि पुलस्त ऋषि काशी में भजन कर रहे थे। तपस्याशील थे। परंतु वहां उनको एक कंदरा की आवश्यकता थी। एक गुफा की आवश्यकता थी। एक हिल की आवश्यकता थी एक पर्वत की। तो वह पुलस्ति मुनि अपने योग बल के सिद्धि पर द्रोणगिरी के पर्वत समूह में अथवा कुटुंब में आते हैं अतिथि के रूप में और एक याचना करते हैं। यह पहले की रीति होती थी। जैसे ब्राह्मण कोई राजा के राज्य में प्रवेश करके ये रामायण में भी देखी गई। कहीं विश्वा विश्वामित्र मुनि हो वशिष्ठ मुनि हो दशरथ महाराज के राज्य में प्रवेश करके कहते हैं कि आप हमारे आप अपने सुपुत्र श्री रघुनंदन श्री रामचंद्र को सौंपे क्योंकि कई निशाचरी है। निशाचरी का अर्थ है वह राक्षस जो रात में भ्रमण करें। निशा माने रात्र और चर माने विचरण करना। रात में जो विचरण करें और जो भूत प्रेत के रूप में आकर हावी हो जाए। हम जो भी यज्ञ करते हैं, यज्ञ अनुष्ठान करते हैं, इसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कूड़े कचरे को थाम देते हैं, फेंक देते हैं। और यह सब राक्षसी प्रवृत्ति के नारकी प्रवृत्ति के जो व्यक्ति हैं इनकी हत्या करना इनको मुक्ति देना, मुक्ति देना यह अनिवार्य हो चुका। तो हे दशरथ महाराज आप दशरथ नंदन श्री राम को हमारे इस सेवा के लिए सौंपे।
यह विधि रही गौर लीला में भी पाया जाता है। श्री नित्यानंद प्रभु के अवतार काल में उनके पिता हड़ाई पंडित के घर में एक ब्राह्मण आते हैं। जब नित्यानंद प्रभु केवल 12 वर्ष के छोटे बालक हैं तो ब्राह्मण आते हैं और कहते हैं कि मुझे एक एक सेवक की आवश्यकता है। एक दास की आवश्यकता है। मैं पर्यटन करता रहता हूं। भ्रमण करता रहता हूं। तीर्थ परिभ्रमण करता हूं। तो यदि एक मेरे साथ चल चलता हुआ अनुयाई अनुगामी दास के रूप में मिल जाए तो मैं उनको हर जगह ले जाऊं। तो हड़ाई पंडित जो नित्यानंद प्रभु के पिता हैं वो कहे मैं मैं आने को तैयार हूं। बोले आप नहीं मैं आपके सुपुत्र को चाहता हूं। तो हड़ाई पंडित उसी दशरथ महाराज की अवस्था में उसी प्रकार कहे हम आने को तैयार हैं। आप हमें हमारे पुत्र से दूर ना कराएं। क्योंकि यह छोटा है। दशरथ महाराज भी प्रभु राम के विषय में यही कहते हैं कि यह छोटा है। हड़ाई पंडित भी कहते हैं नित्यानंद प्रभु के संदर्भ में कि यह छोटे हैं। यह क्या अब आएंगे आपके साथ? यह क्या कर पाएंगे? आपको वन से चलना होगा। कहीं मार्ग भी जो है यह सीधी रास्ता ठीक नहीं रहेगा। कोई पक्का नहीं होगा। कोई कच्चा मार्ग होगा। तो आप इनको ना ले जाएं। हमें ले जाएं। परंतु दोनों पक्ष में श्री रामचंद्र के लीला में भी और खड़ाई पंडित की लीला में भी नित्यानंद प्रभु की लीला में भी वो घर में आए अतिथि स्वरूप ब्राह्मण कहते हैं कि नहीं आप नहीं आपके सुपुत्र की ही आवश्यकता है।
यहीं पे भी इस लीला में भी वही हुई कि पुलस्ति ऋषि आते हैं द्रोणगिरी पर्वत के पास और कहते हैं आपका पुत्र गोवर्धन मुझे आप सौंप दें। इनके बड़े सुंदर कंदराएं हैं और अच्छा नवयुवक शरीर है गिरी के रूप में पर्वत अद्री के रूप में तो आप कृपया करके उन्हें सौंपे हम उनको ले जाना चाहते हैं काशी ताकि हम उनके कंदराओं में बैठकर भजन कर पाए। द्रोणगिरी जो पिता रूप में है गिरिराज गोवर्धन को पूछते हैं कि आप आने को तैयार हैं इन साधु के साथ तो गिरिराज जी कहते हैं कोई बात नहीं यदि साधु की सेवा हमसे हो तो यह हमारा सौभाग्य होगा। पर हमारा एक ही नियम है कि हे मुनिवर आप जहां हमें नीचे रख देंगे हम वहां से फिर उठेंगे नहीं। आप एक बार हमें अपने कर कमल से लेकर जमीन पर रख दें तो हम फिर वहीं स्थित हो जाएंगे। हम बार-बार उचल कूद हमें पसंद नहीं। तो आप एक बार हमें ले लें और फिर जहां रख देंगे हम वहीं धर जाएंगे। तो पुलस्त ऋषि कहे कि आपको कहीं बीच में रखने की आवश्यकता नहीं। हम तो आपको काशी ले जा रहे हैं तो वहीं गंतव्य स्थान है। वहीं आकर आपको छोड़ दें। गिरिराज गोवर्धन कहें ठीक।
जैसे पुलस्त ऋषि ने अपने योग बल पर गिरिराज गोवर्धन को अपने कर कमल पर उठाकर वो चलने लगे। अब वृंदावन प्रवेश हुआ। गोवर्धन के मन में यह लालसा हुई कि यह राधा और कृष्ण की नित्य विहार लीला है। अब यह छोड़कर मैं कहां कहीं अन्य स्थान जाऊं। यह रसिकों की वाणी है कि वृंदावन कहीं छूटे ना शरीर से वृंदावन छूट जाए कई बार मन से वृंदावन ना छूटे। तो गिरिराज गोवर्धन के हृदय में यह भाव उदित होने लगा कि हम ब्रज से प्रवेश करके बाहर निकल रहे हैं ना ना एक बार ब्रज प्राप्त हो जाए अब कहीं जाना नहीं अब कुछ नहीं चाहिए हम यहीं हो जाएंगे। पर अब करें तो करें क्या? अकस्मात क्योंकि देखिए वृंदावन के बाहर का वातावरण और वृंदावन में वातावरण दो अलग प्रकृति हैं। बाहर महामाया का खेल है। यहां योग माया का खेल है। तो पुलस्त ऋषि तो महामाया को जीत लिए थे। बड़े जितेंद्रिय थे और योग बल तपब बल से बड़े थे।
श्री सूरदास जी ने लिखा "अपबल तपबल और बाहुबल चौथो बल है दाम। सूर किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरि नाम॥" श्री सूरदास जी ने कहा कि जब तक यह भाव है कि मेरा अपबल है, मेरा तपबल है, मेरा बाहुबल है, कहीं मेरे घोड़ों का बल है, मेरे धन का बल बल है, बुद्धि का बल है, शक्ति का बल है, प्रभाव का बल है, कीर्ति का बल है। जब तक यह हो प्रभु नहीं मिलेंगे। और जब यह हो "सूर किशोर कृपात ते सब बल हे प्रभु हम हार गए। हमारे पास कोई बल नहीं है। हम बलहीन हैं और निर्बल के बल आप हैं। राम आप हमारे निर्बल के बल हैं।" जब यह व्यक्ति हार जाए ऐसा व्यक्ति जब थक कर हार जाए हे प्रभु हम में कोई बल नहीं तो श्री सूरदास जी ने कहा "हारे को हरि नाम" तब हरि नाम अपना बल दिखाना प्रारंभ करता है। हमारे जीवन में हरि नाम बड़ा शक्तिशाली है। बड़ा शक्तिशाली साधन परंतु पूर्णतया उसका आस्वादन नहीं हो पाता। हरि नाम का पूर्ण स्वाद जीभा पर चखने पर भी किंतु आदराद अनुदिनम श्री रूप गोस्वामी पाद ने कहा प्रतिदिन जप रहे हैं आदर भाव से जप रहे हैं फिर भी स्वाद नहीं चखने हो रहा क्यों? क्योंकि अभी भी अहंकार है हृदय में कि मैं बलवान हूं मैं हरि नाम को जप रहा हूं मैं यह हूं मैं वो हूं मैं पंडित हूं मैं ब्राह्मण कुलोत्पन्न हूं मैं यह हूं अमुक अमुक बातें। क्योंकि जब तक यह अहंकार बनी रहती है हरि नाम चुप चुप रहते हैं और जब व्यक्ति हार कर थक कर शरणागत हो जाए हे कृष्ण निर्बल के बल राम हम में कोई बल नहीं तब "हारे को हरि नाम" जो हारता है वह जीतता है ये आध्यात्मिक नियम है। जो जीतता है वह हारता है जो हारता है वह जीतता है। यह सिद्धांत हम पकड़ पाए तो जीवन सार्थक है कि जो जीते जो यह सोचे कि मैं यह हूं मैं वो हूं वो व्यक्ति हार जाता है और जो हार हार कर प्रभु के पास पास आए। जैसे विभीषण जी हार कर आए प्रभु के पास। हे प्रभु मेरे पास तो कुछ नहीं है। लंकेश ने मुझे धक्के मारकर बाहर कर दिया। आप मुझे स्वीकारें। जो हारे उनको हरि नाम वो जीतता है। हरि नाम फिर बल अपना दिखाना शुरू।
तो सर्वश्रेष्ठ बाधक भक्ति के पथ में मिथ्या अहंकार है। मिथ्या अहंकार व्यक्ति जो गर्व घमंड अहंकार के साथ बना रहे तो हर सेवा में यह भाव होता है कि मैं कथा कर रहा हूं। मैं कीर्तन कर रहा हूं। मैं जप कर रहा हूं। मैं सेवा कर रहा हूं। इस अहंकार इस ममकार ममता को ही तो पूर्णतया हमें निकालना है हमारे चित्त से। तो वाणी कैसी होनी चाहिए? प्रभु के कृपा से कथा हो पा रही है। प्रभु के कृपा से हरि नाम जी्हा पर आ सकती है। यदि प्रभु चाहे तो प्रभु कृपा करके नेत्र में दृष्टि दे रहे हैं ताकि हम शास्त्र पढ़ के उनका भजन कर पाए। देखिए इन सभी इसमें मैं कर रहा हूं। यह अहंकार नहीं है। "प्रकृति क्रियावाणि गुई कर्माण सर्वश अहंकार विमुढ़ात्मा कर्ता अहम मन्यते" गीता। प्रभु कहते हैं जब तक यह कर्तृत्व अभिमान हो कि मैं यह हूं मैं वो हूं तब तक तो बात बनेगी नहीं।
तो हम यह कह रहे हैं कि गिरिराज गोवर्धन जब वृंदावन से यात्रा कर रहे थे। वृंदावन की बाहर की प्रकृति महामाया की है जो पुलस्त ऋषि जीत चुके थे। पर वृंदावन के अंदर की प्रकृति योग माया है। प्रभु की लीला शक्ति है। तो पुलस्त ऋषि के लिए अब यह स्थानांतर था। यह अलग पर्यावरण था। तो अंदर प्रवेश किए गिरिराज की बड़ी प्रबल इच्छा हुई कि मैं यहीं थम जाऊं। यहीं वास करूं। अब पुलस्त ऋषि बाहर की प्रकृति को संभाल सके। अंदर की प्रकृति को नहीं समझ पाए। वृंदावन के अंदर की और शरीर के अंदर की। अब यह बात हुई कि कहीं मल क्रिया हो, शौच क्रिया हो, हम सेवा करके आए, शरीर की सेवा करके आए। तो गिरिराज को नीचे थाम के रख दिए। बोले, अब दो मिनट में मैं आया। मैं स्नान करके आ गया। गिरिराज वहां बैठ गए। रज को प्राप्त हो गए। वृंदावन के रज को। अब पुलस्त ऋषि स्नान इत्यादि शुद्ध करके गायत्री अनुष्ठान करके फिर आ गए। बोले चलो। गिरिराज बोले कहां? पुलस्ते कहा अब तो जाना है ना। गिरिराज बोले आपकी विस्मृति हो रही है। शर्त तो यह थी कि जब आप मुझे नीचे रख दोगे हम वही वास करेंगे। अखंड वास वही होगा।
तो ऐसे कई लोग कहते भी हैं आगे कि पुलिस्त ऋषि ने फिर गिरिराज को श्राप दिया कि यदि तुम नहीं चलोगे मेरे साथ तो मैं तप बल से तुम्हें श्राप दे दूंगा। अखिलराज बोले आप जैसे जिस प्रसाद अब आप आप देना चाहे महाराज आप दे दें हम ब्रज छोड़कर नहीं जाएंगे। श्रीपाद प्रबोधनांद सरस्वती जी ने श्री वृंदावन महिमामृत में यहां तक कहा कि हे प्रभु मेरा शरीर जल जाए मेरा शरीर कट जाए मृत्यु भी हो जाए पर वृंदावन से एक कदम बाहर ना हो मेरा शरीर। वो ऐसे लिखते हैं कि कोई आकर मुझे वृंदावन से बाहर घसीट के ले जाए रिश्तेदार वो मेरा शत्रु है और जो शत्रु मुझे वृंदावन में आकर लूटे जिसके कारण मेरा शरीर मरण अवस्था को प्राप्त हो पर रज को प्राप्त हो वह मेरा वास्तविक मित्र है। मेरा मित्र जो मुझे बाहर करे वह मेरा शत्रु है। और जो शत्रु मुझे यहां मृत्यु के घाट भी क्यों ना उतारे पर रज को प्राप्त कराए वो मेरा मित्र है। उत्तम बात है। यह सब कम से कम मैं कह रहा हूं अनुभव तो नहीं है और ना इतनी निष्ठा है। पर श्री प्रबोधनंद सरस्वती की बात मैं केवल अक्षरश दोहराने का प्रयास कर रहा हूं। उनकी बड़ी ब्रज निष्ठा है। बड़ी अद्भुत ब्रज निष्ठा।
तो यदि कभी वृंदावन आप में से किन्ही का जाने का सौभाग्य हो तो यमुना के काली दह पे पास में श्री प्रबोधनंद सरस्वती जी की बड़ी सुंदर समाधि है। गुप्त स्थान है। इतना प्रसिद्ध मंदिर नहीं है। परंतु आप ढूंढे कहीं कालीदय वृंदावन परिक्रमा के पथ पर ही आप देखेंगे काली देय के पास ही लगकर एक छोटी गली निकलती है। पर वहां एक गली है श्री प्रबोधनंद सरस्वती जी की वहां समाधि है। तो उनकी बड़ी ब्रज निष्ठा थी।
तो गिरिराज गोवर्धन वहीं रह गए। कथा आती है कि पुलस्त ऋषि ने उनको श्राप दे दिया कि प्रतिदिन आप छोटे बीज आप छोटे छोटे बीज के रूप में आपके शरीर आकृति में घटन होगा। आप बड़े शरीर आकृति वाले हैं। परंतु हर दिन एक दिन चले जाएं तो एक बीज एक दाना के रूप में घटन होगा आपके शरीर में। तो ऐसे कहा जाता है कि गिरिराज इतने भव्य विशाल थे परंतु अब वृंदावन जाए तो छोटे हैं क्योंकि उतने दिन उतने साल उतने युग बीत गए और पुलस्त ऋषि के श्राप अनुगत हैं। परंतु हमारे आचार्यों ने इस बात को नहीं माना क्योंकि श्री गिरिराज गोवर्धन बड़े रसिक वैष्णव मुकुट मणि है। पुलस्त ऋषि का श्राप उन पर कैसे लागू हो सकता है? तो घटन क्यों हुआ शरीर में? गर्ग संहिता उठाकर पढ़ लेते हैं तो देखते हैं कि गिरिराज की आकृति बड़ी भव्य विशाल आकृति है। बहुत ऊंचे हैं। बहुत बड़े हैं। परंतु अब वृंदावन जाओ तो वैसी आकृति नहीं दिखाई पड़ती। आचार्य कहते हैं क्योंकि घटन तो हुआ परंतु पुलस्त्य मुनि के श्रापानुसार नहीं। राधा और कृष्ण जब तिरोभूत हुए सत्ययुग त्रेता युग द्वापर युग के अंत में जब राधा कृष्ण अपनी लीला को संपन्न करके नित्य धाम में पुनः प्रस्थान किए तब गिरिराज राधा और कृष्ण के अंग सानिध्य उनके लीला दर्शन से वंचित होकर विरह से जैसा एक व्यक्ति जब खड़ा खड़ा होता है और फिर बैठ जाता है तो आकृति में घटन नहीं होता परंतु दिखता है कि व्यक्ति छोटी आकृति का हो चुका। यही अभी बड़ी पीड़ा हो हृदय में व्यक्ति और झुक जाए ऐसे करके कहीं लेट जाए मुझे दर्द है शरीर में दर्द है वक्षस्थल में दर्द है पेट में दर्द है करके कहीं व्यक्ति शयन करें तो आकृति तो वही है पर लगता है कि और छोटे हो गए हैं। उस प्रकार से गिरिराज गोवर्धन की आकृति तो वही है। परंतु अब जमीन के नीचे पिघल गए विरह से कि हाय मेरी राधा रानी कहां है? हाय मेरे श्याम सुंदर कहां है? इस विरह वेदना से गिरिराज पिघले।
तो यहां अबला शब्द से यह कथा का संदर्भ है क्योंकि श्री राधा रानी कहती हैं अरे सखियों हम में वो बल नहीं जो गिरिराज में है। गिरिराज ने देखो पुलस्त ऋषि क्या आ गए? गिरिराज ने अपने परिवार को छोड़ दिया। गिरिराज में इतना बल है कि बाहर के पुलस्त ऋषि क्या आ गए? उनके साथ जाने के लिए गिरिराज ने अपने द्रोणगिरी अद्री पर्वत कुटुंब को त्याग दिया। इतने बलवान हैं और हम सब देखो हतबागिनी अबला हैं। बलहीन हैं कि श्याम सुंदर कहीं बांसुरी भी बजाएं। फिर भी हम में कोई बल नहीं कि हम हमारे परिवार के घर गृह कृत कार्यों को त्याग कर वन की ओर प्रस्थान करें। हम अला हैं, बलहीन हैं। गिरिराज के चरणों में हमें प्रार्थना करनी चाहिए।
क्यों? क्योंकि जैसा संग वैसा रंग। क्योंकि यह प्रश्न हो सकता है कि यहां गिरिराज की महिमा गाई गई वेणु गीत में। वेणु गीत में भले गिरिराज का क्या काम है? कोई प्रश्न पूछ सकता है क्योंकि प्रत्येक श्लोक में इस अध्याय के वेणु शब्द आया है। "धन्यास्म मूढ़ गतयोप हरण्य एत या नंद नंदन उपतम विचित्र वेषम आकर वेणुितम" कि वेणु से आकृष्ट होकर हरिणी वन में प्रभु के चरण को प्राप्त की। वेणु से आकृष्ट होकर सभी पक्षी समाज प्रभु के पास आ गई। वेणों से आकृष्ट होकर गौ समाज बछड़ों का समूह यह आकृष्ट होकर प्रभु के पास आ गए। कहीं यह आया कि वेणों से आकृष्ट होकर नदियां प्रभु के चरणों को प्राप्त की। कहीं यह आया कि वेणु से आकृष्ट होकर बादल बरसने लगे। कहीं यह सब आया ये अध्याय में। कहीं यह आया कि वेणु से आकृष्ट होकर मोर भी नृत्य करने लगा। परंतु इस श्लोक में तो वेणु शब्द नहीं आया। तो यहां श्री राधा रानी राधिका वक्र चंद्रात अपने मुख मंडल से गिरिराज गोवर्धन की महिमा क्यों गा रही है और यदि गाएं भी तो इसको भागवत में आगे जाकर गिरिराज गोवर्धन के संदर्भ में जहां प्रभु गिरिराज उठाते हैं उस संदर्भ में इस श्लोक को सुखदेव गोस्वामी जी कह सकते थे इस अध्याय में क्यों कहा?
क्योंकि उत्तर यह है हमारे आचार्यों ने इस विषय में बड़ी सुंदर बात कही कि गिरिराज गोवर्धन वरिष्ठ भगवान के भक्त हैं और बलवान हैं। तो कहीं इनके संग में आकर हमारे भक्ति शक्ति बलवती हो जाए क्योंकि जैसा संग वैसा रंग। हम अला हैं। हम अपने परिवार को छोड़ नहीं पा रहे हैं ठाकुर जी के लिए और यह देखो गिरिराज अपने परिवार को लांग कर पार कर ठाकुर जी के ब्रज को प्राप्त किए तो कहीं इनके संग में आने से हमें इनके गुण आ जाए ये एक बात।
अब दूसरी बात जब अपने बल से साधन ना हो पाए तो एक ही बल है वरिष्ठों के चरणों की सेवा बस यही बल है। अगर अपने नाम से नाम भजन से कोई रुचि नहीं आ रही अपने पठन से कोई बात नहीं बन रही तो फिर एक ही बल है "सुशुषो श्रद्धधानस वासुदेव कथा रुचि सन महत सेवया विप्र वासुदेव भगवती भक्ति योग प्रयोजित जन आसु वैराग्यम ज्ञानम य अहतुकम" कि यदि शुद्ध भक्तों के संग में उनकी सेवा की जाए। देखिए शास्त्र में तीन बातें हैं। एक तो महत का संग वरिष्ठों का संग। दूसरी बात है महत सेवा उनकी सेवा और तीसरी बात है महत कृपा उनकी कृपा। पहले तो उत्तम वैष्णव को प्राप्त करें जीवन में फिर उनकी सेवा करें। सेवा का अर्थ यह भी हो सकता है कि कथा में आगे बैठकर ध्यानपूक सुना जाए यह भी बड़ी सेवा है। सेवा का यह भी अर्थ है कि कहीं उनके आने जाने की व्यवस्था इसमें इसमें हम कोई सहयोग बने, कहीं कोई गाड़ी चलाए, कहीं कोई इत्यादि करें। यह भी सेवा है। जैसे अभी हमारे गुरुजन आए, कोई वरिष्ठ गुरु आए तो कहीं उनके लिए कुछ प्रसाद पवाने की सेवा में अथवा उनके कपड़ों के कोई सेवा में अथवा कहीं उनके गाड़ी चलाने की कहीं सेवा में कहीं उनके ठाकुर जी के लिए कोई फल फूल यह सेवा में। अच्छा कुछ भी ना हो सके। कई बार होता है कि हमारे जैसे हम सबके गुरुजन हो, गुरुदेव हो, उनके अंग सेवक होते हैं। तो हम तब क्या सेवा कर पाएं? तब हम यह सेवा कर सकते हैं कि जो गुरुजन कह रहे हैं, उस कथा में आगे बैठकर एक टक नजर से एकाग्र चित्त से उनकी बात को कहीं बिना कहीं मन यहां विचलित हुए, उनके मन को सीधा उस अमृत को हमारे हृदय रूपी कलश में उतारे। यह भी बड़ी सेवा है। क्योंकि यदि कोई चार रोटी बनाए गुरुदेव के लिए कोई कपड़े धोएं, कई कपड़े, कोई स्त्री कर दें या कोई गाड़ी चलाएं, परंतु उनकी कथा में सो जाए, यह बड़ी सेवा नहीं है। यह बड़ी सेवा नहीं है। परंतु व्यक्ति अगर कथा सुने और उसको जीवन में उतारे, पहले हृदय में उतारे, उसका मनन चिंतन करें और जीवन में उसको उतारने का प्रयास करें। ऐसा व्यक्ति कहीं अंग सेवक भी ना हो सके वह हृदय का सेवक हो जाता है। हृदय का सेवक हो जाता है।
तो हम सब में यह बात होती है ना कि हम हम कहीं हमारे वरिष्ठों के लिए कहीं चरणों की सेवा करें अथवा उनके लिए कुछ कपड़े की सेवा करें अथवा कोई रोटी पवाएं। उनको घर में प्रसाद हम सबके हृदय में ये भाव होती है। पर सबको यह प्राप्त नहीं होता। तो क्या करें? जब वरिष्ठ कथा करें, उपदेश दें, इसको जीवन में उतारने का प्रयास करें। यह सबसे बड़ी सेवा है। तो जब महत संग मिले और फिर महत सेवा मिले तो फिर महत की कृपा मिलती है। ये तीन बातें हैं। वरिष्ठों का संग, वरिष्ठों की सेवा, वरिष्ठों की कृपा। अब ये कृपा हमें वहां ले जा सकती है जहां हमारा हमारे स्वयं के साधना में बल ना हो ना हो।
तो श्री राधा रानी और सखियां यह पूरे अध्याय को कहते कहते अंत में थक कर हार कर।
कहती है, "हे सखियों, हम में बल नहीं जो इस सर्वश्रेष्ठ गिरिराज गोवर्धन में है।" तो "अयम् अद्री" कहकर श्री राधा रानी अपनी उंगली से इंगित कर रही हैं। वैसे सब तो गांव में है। गिरिराज तो वन में है। परंतु यह बात कही जा सकती है। सभी सखियों के समूह में श्री राधा रानी नेत्र मूंदकर, सब अपने भाव नेत्र से गिरिराज के तलहटी में हैं और श्री राधा रानी ऐसे उंगली करके कहती हैं, "अयम् अद्रही।"
"हंत हंत" के दो अर्थ हुए। हंत का एक अर्थ हुआ, "हाय हाय, हमारा क्या दुर्भाग्य है, हम बलहीना हैं और यह बलवान है। इन्होंने जो किया, अपने परिवार को छोड़कर कृष्ण की सेवा के लिए ब्रज आना। हाय हाय, हम हतभागिनी हैं, हम अबला हैं।" हंत हंत, "हम में वो कहां सौभाग्य।" अथवा हंत का एक और अर्थ है, "अरे वाह, आश्चर्य, अद्भुत! इतनी इतनी सुंदर बात।" हंत, "ओह, अबलाहा!" देखो, 17 श्लोक के बाद 18वें श्लोक में राधा रानी कहती हैं, "ओह, इतनी अद्भुत बात! हमसे जो बात बनी नहीं, अब इनके संग इनकी सेवा, इनकी कृपा से यह प्राप्त हो सकता है।" तो यह बात दूसरी बात है। इसलिए यह गिरिराज गोवर्धन की महिमा वेणुगीत में गाई गई।
अब तीसरी बात, जब व्यक्ति भक्ति में बड़े विनम्रता से, हताश, उदास होकर, "हे प्रभु, आप मुझे मिल जाओ। हे प्रभु, आप मुझे मिल जाओ। आप मुझे दर्शन कराओ।" ऐसे करके जब व्यक्ति हताश, उदास हो जाता है। पहले तो बड़ी महिमा गाई जाती है भगवान के कुंडल की, भगवान के नेत्रों की, भगवान के मुखमंडल की, भगवान के भृकुटी की और घुंघराले बाल की। फिर व्यक्ति समझ लेता है कि हम इतना सब वर्णन कर रहे हैं, पर हम में सामर्थ्य नहीं कि हम उन रूप का दर्शन कर पाएं। तो हताश, उदास होकर, दीनहीन, दास्य भाव में व्यक्ति रोता है। "हे प्रभु, आपके चरणों की जय हो। आप इन चरणों को हमारे सिर पर रख दीजिए।"
कोई भी व्यक्ति माधुरी रति का हो, सख्य रति का हो, वात्सल्य रति का हो, कभी ना कभी वैसे जीवन में हमेशा सख्य रति, वात्सल्य रति, माधुर्य रति में दास रति की प्रधानता है। हमेशा कोई सखा भी क्यों ना हो, वो दास बनकर ही सोचता है कि यदि मैं ऐसे करूं ना, मेरे कृष्ण प्रसन्न होंगे, जैसा दास सोचता है, स्वामी को प्रसन्न करूं। वैसे ही सखा भी सोचते हैं, वैसे ही मैया भी सोचती है, वैसे ही गोपियां भी सोचती हैं। परंतु कभी एक ऐसा क्षण आता है, जहां अन्य भाव थोड़े गौण हो जाते हैं और दास भाव उदित होता है, क्योंकि व्यक्ति हताश, उदास हो जाता है। "दास्यस्ते कृपणायामे सखे दर्शत सन्निधि।" रास पंचाध्याय में भी जब कृष्ण अप्रकट हो जाते हैं, श्री राधा रानी उस दासता को ही प्रकट करके कहती हैं कि "दासस्ते कृपणायामे, मुझे दासी मानकर, हे स्वामी, हे श्याम सुंदर, आप प्रकट हो जाएं।" शिक्षाष्टकम में भी "स्थित धूली सदृश्यम विचिंतय" यहां श्रीमन महाप्रभु कहते हैं, "आई नंद तनुज किंकरम।" अभी किंकर शब्द से दास भाव का ही प्रकटीकरण हुआ। किंकर माने, "किम करोमि? मैं क्या कार्य करूं आपके लिए? मैं दास हूं, आप स्वामी हो।" तो यह एक भाव आता है।
तो यहां पूर्व राग के इस वेणु गीत सत्र में श्री राधा रानी भी हताश, उदास होकर अपने गोपियों सहित कहती हैं, "हम हतभागिनी हैं, हम भला क्या चर्चा करें श्याम सुंदर के विषय में? हम तो केवल दासी हैं। हमारा कर्तव्य है कि अपना मस्तक उनके चरणों में रखा जाए।" तब बड़ा विचार आया कि इनके चरण हैं कहां? ठाकुर के कहां हैं चरण? तब विचार आया, "यद रामकृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद।" ओ हो, ठाकुर के चरण तो गिरिराज पर हैं। तो कहीं पूर्व राग में कई-कई बातें हैं। एक तो प्रभु हमें प्राप्त नहीं हो रहे हैं, तो हम कोई वरिष्ठ का संग करें। तो इसलिए हरिदास वरिय के पास चले गए। फिर एक भाव आया कि हम देखो ना, हम घर कृत, घर गृह कृत्य कार्य में हम फंसे हैं। हम बलहीना हैं, तो अबला हैं, तो बलवान किन के पास जाएं? जो समस्या का निवारण करें, वो तो बलवान गिरिराज हैं, क्योंकि वो अपने परिवार को छोड़कर ठाकुर के पास आए। फिर तीसरा भाव यह है कि प्रभु हमें नहीं मिलेंगे, इसलिए उनके चरणों की हमें याचना करनी होगी। परंतु है कहां यह चरण? तो "यद रामकृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद" तब गिरिराज का स्मरण आया। वो गिरिराज जिनके श्री विग्रह अंग में प्रभु दैनिक तौर पर अपने चरण चिन्ह अंकित करते हैं। तो इस प्रकार यह संदर्भ है कि कैसे गिरिराज की महिमा वेणु गीत में इस पूर्व राग के अध्याय में आया। तो यह एक पृष्ठभूमि है।
तो "हंत" यह उत्साह में हो सकता है। हां, यह बात तो अब तक आई नहीं। देखो, हमें तो समस्या का निवारण हो चुका, आप पूर्ति हो गई। अथवा "हत हतभागिनी" होकर, "हंत" माने देखो ना, हमारा जीवन कितना विफल है। "हंत अयम् अद्रही अबला हरिदास वरियो।" यह हरिदास वर्य हैं।
अब श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा सार्थ दर्शनी टीका में एक बड़ी अच्छी बात कही गई। चक्रवर्ती पाद ने बहुत अमृत घोला इस श्लोक में। चक्रवर्ती पाद लिखते हैं कि वैसे तो कई सारे सारे हरिदास हैं। नारद मुनि भी हरिदास हैं। कहीं सुखदेव जी भी हरिदास हैं। कहीं व्यासदेव भी हरिदास हैं। कहीं पराशर जी भी हरिदास हैं। चार कुमार ये भी हरिदास हैं। कहीं हनुमान जी भी हरिदास हैं। तो कहीं पांडव भी हरिदास हैं। प्रह्लाद भी हरिदास हैं। अंबरीश भी हरिदास हैं। ध्रुव भी हरिदास हैं। हरिदास माने हरि के दास। "हरे हे दास इति हरिदास।" षष्ठी तत्पुरुष समास। तो जो ध्रुव हैं, अंबरीश हैं, गजेंद्र हैं, द्रौपदी हैं, सब हरिदास, दासी, दासी। परंतु श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने कहा, भागवत में तीन हरिदासों का वर्णन है। तीन प्रमुख हरिदास। तीसरे स्थान पर हैं श्री युधिष्ठिर महाराज। दशम स्कंध में पाया गया 10, 75, 27। कैंो 10 चैप्टर 75 टेक्स्ट 27 में यहां पर इस संदर्भ में आया कि युधिष्ठिर महाराज दशम स्कंध में उनको हरिदास यह शब्द क्यों कहा गया? "हरिदास्य राज्ष राजसूय महोदयम।" राजसूय महोदय। इन्होंने ऐसी बड़ी सुंदर राजसूय यज्ञ का एक अनुष्ठान किया युधिष्ठिर महाराज ने, जिससे हुआ क्या? ठाकुर द्वारिका से आए और उस राजसूय सभा में, राजसूय सभा में बड़े-बड़े दिग्गज जैसे नारद मुनि भी थे और कहीं व्यासदेव भी थे, बड़े-बड़े महानुभाव उपस्थित थे और उस राजसूय सभा में अग्र पूजा सर्वश्रेष्ठ पूजनीय व्यक्ति घोषित किए गए ठाकुर जी कृष्ण। तो राजसूय यज्ञ युधिष्ठिर महाराज ने इसलिए उसका अनुष्ठान किया, क्योंकि यदि यदि द्वारिका में ठाकुर बैठे, तो हमें सेवा का सौभाग्य नहीं। तो यदि राजसूय सभा के बात पर ठाकुर यहां आ जाएं, फिर सब उनकी सेवा कर पाएं और पूरे विश्व के सभी राजाओं की दृष्टि इस राजसूय सभा में होंगी। तो उस सभा में जिनको अग्र पूजा का स्थान दिया जाए। यह हो सकता है। यह कहा जा सकता है, सिद्ध प्रमाण के रूप में इसको स्थापित किया जा सकता है कि यही व्यक्ति सभी पूजनीयों में पूजनीय है। तो क्योंकि युधिष्ठिर महाराज ने यह सेवा की, इसीलिए उनको "हरिदास्य राज ऋष" ऐसे करके भागवत में घोषित किया। युधिष्ठिर महाराज सभी हरिदासों में श्रेष्ठ हैं। इसलिए तीसरे स्तर पर युधिष्ठिर महाराज, उनके ऊपर स्थान दिया गया उद्धव जी को।
यह 47वें अध्याय में पाया गया, दशम स्कंध के 47वें अध्याय में 56वां श्लोक क्रमांक। उद्धव जी के विषय में सुखदेव जी कहते हैं, "कृष्णम संस्मारयन रेमे हरिदासो व्रजो कसा।" उद्धव जी हरिदास हैं। क्यों उद्धव जी हरिदास हैं? क्योंकि "कृष्णम संस्मारयन रेमे" दूसरों को कृष्ण कथा सुनाकर, कृष्ण के विषय में कहकर, जो आनंदित हो, वो हरिदास है। ऐसे भागवत में कहा गया। दूसरों को कृष्ण के विषय में कहकर, कृष्ण का स्मरण दूसरों के हृदय में जगाकर, जो व्यक्ति उस इस सेवा में प्रसन्नता को प्राप्त करता है, वो हरिदास है। तो "कृष्णम संस्मरयन रेमे हरिदासो ब्रजऊ कसाम।" ब्रजवासी, विशेष करके ब्रजांगनाय श्री राधा रानी आदि सखियों के सेवक के रूप में उद्धव जी वृंदावन में 10-11 महीने उपस्थित रहे। वैसे तो मथुरा जी से श्याम सुंदर ने उद्धव जी को भेजा था, अपने पत्र को सुनाने के लिए, पर व्यक्ति वहां जाकर श्री राधा रानी के पक्षपाती हो गए। इस पक्ष से उस पक्ष हो गए। देखिए, रामायण में भी यह बात आती है कि हनुमान जी पहले रामदूत बनकर गए। सीता के अन्वेषण लीला में रामदूत बनकर गए। राम की अंगूठी को दिए। और फिर सीता देवी के समाचार को सीता दूत बनकर प्रभु राम के पास आए। देखने योग्य बात यह है कि जब राम दूत बनकर गए हनुमान जी सीता के अन्वेषण में, तो कई सारे महासागर पार करते समय कई सारे बाधाएं आईं, जैसे मैनक पर्वत था, कहीं सुरसा, कहीं सिंहिका, कई राक्षसियों का सामना आमना-सामना करना पड़ा हनुमान जी को। प्रभु राम के चरण के दास्ता को प्राप्त करके दूत बनकर जब गए, कहीं बाधा ही हुई। और यही जब सीता दूत बनकर आए, तो कोई बाधा नहीं है। यहां आकर देखो, प्रभु राम आलिंगन दिए हनुमान जी को। तो राम कथा से यह दिखता है कि यदि प्रभु के दूत बनके चले जाएं, तो कई बार बाधा हो सकती है जीवन में। परंतु श्री सीता देवी, श्री किशोरी जी, श्री जी, श्री राधा रानी के पक्ष से यदि ठाकुर के पास जाएं, तो बाधा नहीं। वहां केवल राधा है, राधा कृपा है। राधा रानी की कृपा हो, तो जहां-जहां है राधा, वहां नहीं कोई बाधा। तो हनुमान जी राम पक्ष से गए, तो थोड़ी बाधाएं हुईं, क्योंकि सीता देवी को मिले नहीं अब तक। और एक बार सीता देवी के चरण आश्रित होकर उनके दूत बने, तो सभी गतिरोधक, सभी कंठक तक निकल गए।
तो उद्धव जी भी कृष्ण दूत बनकर गए और फिर वहां जाकर श्री राधा रानी के दूत बन गए और फिर पूर्ण विस्मृति हो गई मथुरा की और वृंदावन में वास करके श्री राधा रानी के साथ उन्होंने ब्रजमंडल किया। सोचिए, सखियों के साथ ललिता, विशाखा, इंदुलेखा, रंग देवी, सुदेवी, चंपक लता, तुंग विद्या, अष्ट सखियों सहित श्री राधा रानी, अष्ट सखी शिरोमणि सहित ब्रजमंडल करने का सौभाग्य उद्धव जी को रहा, जहां श्री राधा रानी कथा कर रही हैं कृष्ण के विषय में, कहीं उद्धव जी कृष्ण के लिए कृष्ण के विषय में कथा कर रहे। दोनों परस्पर बोधयंत, परस्परम कह के, कहीं गीता में प्रभु ने इसका भी संकेत किया, "मत मदगत प्राण बोधयंत परस परस्परम कथयंत माम नित्यम तशती च रमती च।" कि हे अर्जुन, उद्धव कहीं वृंदावन जाकर, "मच्छित मदत प्राण" वो तो मचित थे और श्री राधा रानी मदगत प्राण थीं और दोनों ने "बोधयंत परस्परम" दोनों ने परस्पर अपने आप को, अपने में जो कृष्ण लीला है, कृष्ण अनुभव है, वो एक दूसरे को कराया और "कथयंत माम नित्यम" मेरे विषय में कथा करके, "तष्यती च रमती च।" दोनों पक्ष जो व्यक्ति सिखाने गए, वह सीख गए। पहले उद्धव जी मुस्कुरा रहे थे, वह सोचे कि यह रो रहे हैं। इनको भी मैं मुस्कुराऊंगा। इनको भी ऐसी तथा तत्व कथा सिखाऊंगा, जैसे इनके रुदन से ये हास परिहास में परिवर्तित हो जाएं। यह भी प्रसन्न हो जाएं। उद्धव क्या जाने। पहले उद्धव मुस्कुरा रहे थे, श्री राधा रानी रो रही थीं और संग से रंग चढ़ा। अब दोनों पक्ष रोने लगे। दोनों कृष्ण का स्मरण करके, दोनों कृष्ण दर्शन लालसा से, दोनों पक्ष रोने लगे। तो यहां उद्धव जी को दशम स्कंध के 47वें अध्याय में उनको भी हरिदास कहा गया।
तो चक्रवर्ती पाद कहते हैं कि युधिष्ठिर महाराज हरिदास हैं। जैसे तारतम्य होता है, कंपैरेटिव सुपरलेटिव केस होता है इंग्लिश में कि गुड होता है, फिर बेटर होता है, फिर बेस्ट होता है। उसी प्रकार तीन पक्ष कहे गए कि कहीं युधिष्ठिर महाराज को हरिदास, उद्धव को उनके ऊपर के हरिदास और सर्वश्रेष्ठ हरिदास के रूप में गिरिराज गोवर्धन को घोषित किया गया। हरिदास वरय के रूप में। तो ना हरिदास हैं, यह हरिदास वर्य हैं। "हंत अयम् अद्रही अबला हरिदास वरय।" तो कोई पूछ सकता है कि गिरिराज गोवर्धन इन तीनों में हरिदास वर्य क्यों हैं? यह कोई प्रश्न पूछ सकता है। क्योंकि युधिष्ठिर महाराज एक बार वृंदावन आए। उनके अज्ञात वास के समय काम्यवन में, काम्यवन में उनकी अज्ञात लीला हुई। तो एक वर्ष के जो अज्ञात वास में पांडवों के साथ, जैसे युधिष्ठिर महाराज, पांडव, अन्य पांडवों के साथ वृंदावन में प्रवेश किए, परंतु वृंदावन छोड़कर भी बाहर गए थे। उद्धव जी वृंदावन में प्रवेश किए और गोपियों के साथ मिलन होकर उनके चरणाश्रित हुए। कथा कीर्तन हुआ और इससे बढ़कर श्री गोवर्धन है। उद्धव जी और युधिष्ठिर महाराज दोनों ब्रज में आकर फिर ब्रज को छोड़ना पड़ा। परंतु गोवर्धन एक बार वृंदावन के आगे कभी छोड़े नहीं। वृंदावन में वह रहने के लिए श्राप तक अंगीकार करने को तैयार हो गए। फिर कहा गया कि युधिष्ठिर महाराज सख्य लीला तक ठीक हैं, प्रभु के सखा के रूप में अथवा कई बार बड़े भाई के रूप तक ठीक हैं। परंतु उद्धव जी उससे भी ऊपर हैं, क्योंकि वह दास भी हैं, सखा भी हैं और साथ-साथ मंत्री के रूप में राधा और कृष्ण के परस्पर संदेश को भी वह दूत के रूप में, दूत दूती कृत के रूप में उन्होंने वह सेवा की। और इनके ऊपर श्री गिरिराज गोवर्धन हैं, क्योंकि गिरिराज गोवर्धन कहीं शांति में, कहीं दासरति में, कहीं सख्य लीलाओं में, कहीं बलराम जी के साथ वात्सल्य लीलाओं में और कहीं श्री गोपांगनाओं के साथ, कहीं मधुर लीला, कहीं दान घाटी, कहीं गोविंद कुंड, कहीं मानसी गंगा, कई उत्कृष्ट, उत्तम, उन्नत, उज्जवल लीलाओं का भी वर्णन है। गिरिराज गोवर्धन एक संकुलित रति को धारण करके, सभी रति के सभी स्थाई भावों के साथ, सभी व्यभिचारी भाव, संचरी भाव का मिश्रण करके एक रस स्वरूप में एक पदार्थ प्रस्तुति ठाकुर को सेवा के रूप में कराते हैं।
कल हम यह भी देख रहे थे कि कैसे श्री जीव गोस्वामी पाद ने कई बातों को रखकर यह कहा कि कैसे गिरिराज गोवर्धन इकी सेवा करते हैं। तो युधिष्ठिर महाराज, उद्धव जी का कहीं वर्णन नहीं कि वो इकी सेवा प्रतिदिन करें ठाकुर को, जो गिरिराज करते हैं। और कोई अन्य भक्त की भी कहीं यहां वर्णन आया नहीं, उल्लेख आया नहीं, जो प्रतिदिन 21 शोडश उपचार तो भक्त करते हैं, परंतु 21 उपचारों का प्रयोग करके प्रतिदिन, प्रति क्षण भगवान की सेवा में लगे। यह केवल गिरिराज गोवर्धन है। तो इसलिए ये हरिदास नहीं हैं, हरिदास वर्य हैं। ठीक है?
अब इन 21 सेवाओं को एक बार गिन लेते हैं। कल मुझे लगता है हमने 12 तक किए थे। हम 12 तक तो एक बार उनको गिन लेते हैं, फिर आगे। पहला है आसन, कहीं अपने शिला के रूप में, कहीं रत्न भंडार के रूप में, कहीं राज्य सिंहासन के रूप में आसन। फिर दूसरे में स्वागत, कहीं पक्षी के रूप में, पंछी और पशुओं के रूप में, कहीं किनहीं के चोंच से प्रयोग करके गिरिराज गोवर्धन उनको प्रेरणा देते हैं कि रंगोली बनाई जाए। कई ऐसे पक्षी हैं जो बैठ-बैठकर ब्रज के रज में, गिरिराज के तलहटी रज में अपने चोंच से बड़े सुंदर आकृति रंगोली बनाते हैं। तो वो स्वागतम भी है। कहीं अपने बड़े सुंदर, सुमधुर कंठ से गाकर, गीत, पद्य, श्लोकों की रचना करके गिरिराज गोवर्धन इन पक्षियों को, प्राणियों को, पंछियों को प्रभु के स्वागत लीला में उनको रत रखते हैं। तीसरी बात, पाद्य, कहीं उनके चरण धोने के, चरण प्रक्षालन की सेवा। फिर चौथे में अर्घ्य, कहीं मुख में जल पान करने की सेवा। फिर पांचवें में आचमन, मुख प्रक्षालन करने की सेवा। छठवें में मधुपर्क। अब मधुपर्क भी कई प्रकार के होते हैं, जैसे पंचामृत का जो होता है, इसमें दूध की प्रधानता होती है, शहद की प्रधानता होती है, तो जो पंच, फिर पंचगव्य होता है, तो पंचगव्य, पंचामृत सब मिलाकर गिरिराज अलग-अलग ऋतु अनुसार, अलग-अलग दिन अनुसार। वृंदावन में एक अद्भुत बात है कि वहां एक ही समय की लीला, एक ही जैसे कभी नहीं होती। क्योंकि एक ही समय की लीला, एक ही तरह प्रतिदिन हो जाए, तो व्यक्ति को यह कहीं मन में विचार आए कि वहां की लीला कहीं मनोरम्य ना हो, क्योंकि मुझे लगता है कि इस जगत की लीला बहुत मनोरम्य होती है, क्योंकि एक ही बात दोहराई नहीं जाती, हर दिन अलग होता है। पर यह बात वहां के लिए कहा नहीं जा सकता। ऐसे लोगों को भ्रम होता है। क्योंकि रोज शायद ठाकुर वहीं घर जाएं, ठाकुर वही मटकी खाएं, अथवा कहीं सखाओं के साथ वही लीला, उसी समय पर, कहीं व्यक्ति को बोर्डम ना हो, कहीं यह ना लगे कि मन में कि इस जगत की लीला, हम हमारी लीला, हमारे जो कर्म की लीला, उस जगत के प्रभु के स्वच्छंद लीला से बेहतर है। कदापि नहीं। वो लीलाओं में भी वैशिष्ट्य बहुत है। प्रभु के लीलाओं में भी विषमता है। रोज एक ही लीला, एक ही समान, एक ही तरह नहीं होती। अलग-अलग स्थान, अलग-अलग वेश, अलग-अलग राग, अलग-अलग ताल, अलग-अलग परिकर, अलग-अलग रस, अलग-अलग कथाएं, सब कुछ अलग है। वृंदा देवी, पूर्णमासी देवी, गिरिराज गोवर्धन, यमुना रसरानी, गोपेश्वर महादेव, ललिता सखी, ये सब दिग्गज महापुरुष हैं। सब ब्रज में विराजमान होके राधा और कृष्ण को, प्रिया प्रीतम को, राधा श्याम सुंदर को कैसे लाड लड़ाएं? अलग-अलग लीलाओं में, अलग-अलग स्थान में, अलग-अलग परिकरों के साथ, इसमें बड़ी प्रवीणता है उनको।
तो छठवें में मधुपर्क, कहीं दूध गाय से और कहीं शहद वृक्षों से। सातवें में जल, यह स्नान करने हेतु झरने हैं, कहीं कुंड हैं, कहीं पुकुर है, कहीं सरोवर है, कहीं नदी है। आठवें में वस्त्र। नौवें में कहीं गंध, सुगंध, सुगंध की सेवा, कहीं चंदन, कहीं हरि चंदन, अलग-अलग प्रकार के चंदन। दसवें में भिन्न-भिन्न नाना आकृति के रंग-बिरंगे पुष्पों की माला, कहीं कृष्ण के लिए, कहीं कंदरा में सोने की व्यवस्था हो, शय्यासन की कहीं व्यवस्था हो, वह भी पुष्पों से बनी जाती है। गिरिराज गोवर्धन वो तैयार रखते हैं। ठाकुर यहां कहीं लुका-छुपी खेल रहे हैं, आंख में छोनी खेल रहे हैं और थक गए, तो कहीं कंदरा में चले जाएं। गिरिराज ने तैयार रखा, एकदम बड़े सुंदर, सुकोमल पुष्पों का एक शैया रख दिया। यह 11वें में। 12वें में कहीं धूप है। अकस्मात यृच्छया कहीं धुआं कहीं पाया जाता है गिरिराज में। 12वें में दीप। वृंदावन के गिरिराज की शीला कहीं खंडित हो जाए, कहीं अंदर के उनके रूप को प्रकाशित करें और अलग-अलग रंग में चमके वो शीलाएं। यह बात भी जानने योग्य है कि गिरिराज की शीलाओं में भी अलग-अलग रंग के शीलाएं हैं। कोई ऐसी शीलाएं हैं, जो कल हमने इस बात को भी कही थी कि गिरिराज क्योंकि राधा और कृष्ण के हृदय से उत्पन्न हुए हैं। दोनों के हृदय के जो इष्ट हैं, इनके एक-एक अंश से गिरिराज बने हैं। जैसे श्री राधा रानी के हृदय में कृष्ण है, तो उनके हृदय में कौन है? भगवान है। तो उस भगवत का अंश है गिरिराज में। और कहीं कृष्ण के हृदय में श्री राधा रानी हैं, जो उत्तम श्रेणी के भक्त हैं। तो वो भक्त भाव भी मिश्रित है कहीं गिरिराज में। तो गिरिराज में क्योंकि यह दोनों भाव हैं, भगवत भाव और भागवत भाव, भगवान का भाव और भक्त का भाव दोनों मिश्रित हैं। इसीलिए उनके रंग भी अलग-अलग हैं। जैसे आप कहीं परिक्रमा में चले जाएं, तो गिरिराज की शीला कहीं-कहीं श्याम वर्णीय होती है, काले वर्ण की। हम कहीं भूरी वर्ण की, जैसे कि ब्राउन कलर की, हम जिसको पिसंग कहते हैं, इस रंग की होती है। यह ठाकुर जी का, ठाकुर जी के अंग कांति का एक प्रतीक है, डार्क कलर। फिर कहीं गिरिराज की शीला पांडु वर्णीय होती है, श्वेत वर्णीय, वाइट। कहीं यह बलराम जी के श्री अंग का प्रतीक, अथवा कहीं गिरिराज की शीला कहीं स्वर्ण कांति होती है, गोपांगनाय श्री राधा रानी के अंग कांति का प्रतीक।
तो श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने एक संदर्भ में बड़ी सुंदर बात कही कि जब कृष्ण की लीला बलराम जी और सखा सहित होती है, तो श्री राधा रानी वहां नहीं जातीं, क्योंकि आदर होता है, क्योंकि बलराम जी कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता हैं। तो यह कैसे पता कि वहां कृष्ण बलराम के साथ लीला कर रहे हैं, सखा के साथ लीला कर रहे हैं। यह कैसे पता श्री राधा रानी को? क्योंकि श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने ब्रजरीति चिंतामणि नामक ग्रंथ में यह लिखा कि जब श्री बलराम जी गिरिराज की तलहटी में कहीं विचरण कर रहे हैं, तो जहां से बलराम जी चलते हैं, वो सब शीलाएं दोनों पक्ष में सफेद हो जाते हैं। तो श्री राधा रानी जब वहां आए और देखें कि यहां शीलाएं सब सफेद हो चुकीं, तो फिर प्रवेश नहीं करतीं, क्योंकि वहां बलदाऊ जी हैं। और यही जब श्री राधा रानी सखियों के सहित श्री कृष्ण कहीं क्रीड़ा होती है, कहीं पाश क्रीड़ा होती है। गिरिराज के तलहटी में, राधा कुंड में कहीं पाश क्रीड़ा होती है। राधा, ललिता सखी जी कहीं ठाकुर जी को चुनौती देती हैं। "बड़े आए बलवान व्यक्ति, चरण खोदकर कहीं राधा कुंड, श्याम कुंड का प्रकटीकरण करते हो। हर जगह केवल दुष्टों को मारना, मार गिराना, कहीं हत्या करना, बस यही बाहुबल दिखाते रहते हो। तो कहीं बुद्धि बल भी दिखाया करो कभी।" ठाकुर जी को ललिता सखी चुनौती देती है। ठाकुर बोले कि जो व्यक्ति यहां बलवान है, तो यहां तो बलवान होगा ही। ललिता सखी कह, "जब तक प्रमाण ना करो, हम अपनी बात को नहीं मानेंगे। बचपन से झूठ बोलते आए, कहीं चोरी करता है, कहीं मिट्टी ये मृद भक्षण करता आए, तो कहीं तस्करी करता है। फिर किसी और पर हाथ उंगली उठाकर, हमने नहीं किया। मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो।" माखन चोर यदि कहे कि माखन ना खायो, फिर और कौन खायो? ललिता सखी कहती है, "बचपन से झूठ बोले, अब तो तुम्हें पाश क्रीड़ा खेलनी होगी, कहीं चतुरंगा खेलना होगा, कहीं बुद्धिबल खेलना होगा, कहीं चेस खेल लिए, कहीं डाइस की कोई गेम खेल लिए। अब यहां तुम वृषभानु नंदिनी श्री राधा रानी को पराजित करके दिखाओ, फिर हम मानें कि तुम यहां भी बलवान और यहां भी बलवान।" पर श्री राधा।
रानी के पक्ष में ललित, ललिता, विशाखा सब हैं। तो कहीं वाक युद्ध भी हो, कहीं पाश क्रीड़ा हो, कहीं फिर चतुरंग हो, कहीं बुद्धिबल हो, तो हर लीला में श्री राधा रानी का पक्ष भारी होता है और ठाकुर जी हार जाते हैं।
तो फिर और सुनो ललिता सखी की बातें। ये सब बड़ी सुंदर लीलाएं गिरिराज गोवर्धन संपन्न कराते हैं। बहुत सुंदर आयोजन वो करते हैं। तो बलराम जी कैसे जाने कि सखियों के समूह लीला हो रही है, कि सखाओं सहित लीला हो रही है? क्योंकि जहाँ से श्री राधा रानी चले, दोनों पक्ष की शीलाएं स्वर्णकांत हो जाती हैं। तो बलदाऊ वो देखे बोले, "ठीक है, अब ठाकुर जी आप कहीं पराजित हो रहे हैं। कहीं सखाओं के साथ बाहुबल में पराजित होते हैं, कई सखियों के साथ बुद्धि बल में पराजित होते हैं।"
ठाकुर जी के इस हार में ही जीत है। अपने भक्तों के पक्ष में हारना, भक्तों को विजय प्राप्त कराना, विजय घोषित करना और स्वयं पूरे ब्रह्मांड को जीतने वाले स्वामी उनके नीचे, उनके चरणों के अधीन होकर हार जाते हैं और स्वयं हारकर जीते हैं। यही उनमें उनकी जीत है।
तो ऐसे कहा गया कि कहीं गिरिराज की शीला अलग-अलग रंग में होती है, तो अंदर की शीला की रंग-बिरंगी जो का चित्र का चित्रण है, यही सूर्योदय या सूर्यास्त की किरणों के साथ चमक कर ऐसा लगता है कि गिरिराज अपने अंग कांत से कहीं ठाकुर जी को दिया दिखा रहे हैं। जिस प्रकार हनुमान जी ने राम लीला में अपने शरीर को जगमग कर दिया था। वैसे तो अतुलित बलधाम हेम शैला देहम, ऐसे हनुमान जी का वर्णन सुंदरकांड में आया कि वो गोरे वर्ण के हैं। स्वर्ण कांत, एक अचल पर्वत समान है और उस अचल पर्वत पर आग लग चुकी थी लंका में और उसी जलते हुए शरीर से हनुमान जी ने प्रभु राम की सेवा की। तो यहाँ भी वर्णन आया कि प्रत्येक शीला में जगमग दिया का वर्णन है, क्योंकि इतना रंग है और सूर्योदय सूर्यास्त की किरण तो चमकते हैं। उसके साथ-साथ प्रत्येक शीला में इतने अंदर खंडित शीला में इतने रंग हैं। तो कहीं हवे के झोंके लगते हैं। कहीं सूर्योदय। कहीं गिरिराज अपने-अपने शीलाओं से चमकते चमकते दीपक से जैसे हनुमान जी ने अपने शरीर से ही आग लगाकर राम की सेवा की, वैसे गिरिराज ने स्वयं अपने शरीर में दीपक लगाकर श्री कृष्ण की सेवा की।
कहीं यह भी वर्णन आया शास्त्र में, यह 12वें गुण का ही 12वीं सेवा का ही विस्तार चल रहा है। कहीं शास्त्र में यह भी वर्णन आया स्कंद पुराण, पद्म पुराण, भविष्यत पुराण, गर्गजिता। यहाँ इन सभी प्रमाणों में गिरिराज की विशेष महिमा प्रचुर मात्रा में गाई गई।
तो शास्त्र में कहीं यह भी वर्णन है कि राम अवतार में कहीं महासागर पार करते समय पत्थर की सेतु, सेतु बंधन के समय एक घोषणा हुई थी कि जो सेवक जिस मात्रा में जिस दिशा में जाकर पत्थर ले आएं, जितनी बड़ी शीला हो उतनी बेहतर, क्योंकि प्रभु राम और अपने सखा के साथ यह महासागर पार कर सकते हैं। तो कहीं छोटे-छोटे पक्षी केवल रेत फेंक रहे हैं। इस सेतु बंधन में कहीं बंदर छोटे-छोटे पत्थर ले आ रहे हैं। हनुमान जी सोचे, "मैं तो गिरिराज के पास जाऊँगा। कहीं गिरिराज को ही ले आऊँ तो समुद्र मन समुद्र इस सेतु बंधन में एक गिरिराज को रख दूँ। प्रभु इस पार से उस पार चले जाएँगे।" कहीं गिरिराज के पास गए हनुमान जी, उनको उठा लिए। गिरिराज बोले, "कहाँ ले जा रहे हो?"
"वृंदावन के बाहर।"
हनुमान जी बोले, "वृंदावन के बाहर ले जा रहे हैं सेवा के लिए। आप चलिए, प्रभु राम आप पर चरण रख के इस पार से उस पार जाएँगे।"
गिरिराज बोले, "ये तो बड़ा सौभाग्य होगा। हनुमान जी, आप मुझे ले जाएँ।" तब शंख की घोषणा हुई। "यह कहते कहते जो जहाँ है, वहीं पत्थर छोड़ दें, क्योंकि सेतु बंधन पूरा हुआ।" अब हनुमान जी गिरिराज को पुनः ब्रज में रख दिए। बोले, "गिरिराज, अब तो सेतु बंधन पूरा हुआ। अब तो आप नहीं आ सकते।"
गिरिराज बोले, "हम द्रोणगिरी छोड़कर ब्रज आए। पुलस्तिशील लेकर आए थे, यहाँ आ गए। यहाँ सतयुग में आए। पूरी सतयुग, पूरी त्रेता युग हो गई। हमें सोचा प्रभु का दर्शन होगा। आपको देखा तो अब हमें लगा कि आशा जागी कि अभी प्रभु के दर्शन होंगे। आपने भी केवल उठाकर हमें रख दिया। हनुमान जी, आपने तो वंचित कर दिया हमें।"
हनुमान जी बोले, "आप चिंता ना करो, हम विशेष प्रार्थना करेंगे। बड़ी उत्तम बात है, राम लीला के हरिदास वर्य और कृष्ण लीला के हरिदास वरीय आसपास मिल रहे हैं। श्री हनुमान जी महाराज की जय! श्री गिरिराज महाराज की जय!" हनुमान जी कहते हैं, "ये शास्त्र में प्रमाणित श्लोकों के साथ कथा है।" हनुमान जी कहते हैं, "गिरिराज से हम प्रार्थना करेंगे, आप दुखी ना हो। हम प्रार्थना करेंगे कि इस बार तो केवल एक बार प्रभु चरण रखने वाले थे ना, हम प्रार्थना करेंगे कि अगले युग में जब राम श्याम बन के आएँगे, जिस प्रकार यहाँ राम लक्ष्मण चरण रखने वाले थे, अगले युग में राम लक्ष्मण कृष्ण बलराम बन के आएँगे और एक दिन नहीं, प्रत्येक दिन आकर आपके श्री अंग पर चरण रखेंगे। ऐसे मैं प्रार्थना करता हूँ।" तो हनुमान जी ने भी विशेष प्रार्थना, आशीर्वाद प्रदान किया।
तो यह भी पाया जाता है कि यद राम कृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद, दूसरे पंक्ति में कहीं उसका भी एक संकेत है, एक अर्थ है। राम कृष्ण का बलराम और कृष्ण। दूसरा संकेत यह भी है, जिन राम के चरण को प्राप्त करने के लिए गिरिराज लालायित थे, अब वही राम कृष्ण बनकर आकर चरण स्पर्श प्रमोद यद राम कृष्ण, तो राम कृष्ण का एक अर्थ हुआ बलराम और कृष्ण। दो और एक अर्थ हुआ कि वही राम जो कृष्ण बनकर आकर चरण स्पर्श की सेवा गिरिराज को दे दिए। तो भागवत खजाना है। एक-एक शब्द में कई-कई अर्थ और कथाएं मिश्रित हैं।
ये 12वीं बात, एक दीपक दिया। अब 13वीं सेवा यह है, आभरण सेवा। आभरण माने आभूषण, ऑर्नामेंट्स। गिरिराज गोवर्धन कहीं चूतत प्रवाल बरहस्त भकोतलाब्ज मालानुक्त परिधान विचित्र वेशव, यह सब गिरिराज के तलहटी में उपलब्धि पाई जाती है। सब उपस्थिति प्राप्त करती है। गिरिराज कहीं मोर पंख भी धारण कराते हैं ठाकुर को, कहीं गुंज माला। गुंजमाला की बड़ी प्रसिद्धि है गिरिराज में। आज भी आप गिरिराज की परिक्रमा लगाओ तो कहीं गुंज प्राप्त होती है। तो गुंज जैसे श्री राधा रानी का ही प्रतीक है। तो गिरिराज गोवर्धन अपने फूल, अपने फल, अपने पत्ते, कहीं मोर पाक, कहीं गुंज, अलग-अलग प्रकार के धातुओं से प्रभु के आवरण सेवा में नियुक्त हैं।
फिर चतुर्दश, 14वीं बात, आहार, आहार, नैवेद्य। यदि प्रभु की बड़ी सेवा हो और प्रभु को पवाने के लिए कुछ ना दिया जाए, तो प्रभु बड़े रुष्ट होते हैं। यह बात आप शकट भंजन लीला में भी देख सकते हैं। मैया यशोदा ने बड़ा उत्सव मनाया कि ठाकुर जी अब तीन महीने के हो गए। उत्थानिक लीला हुई। इस पक्ष से उस पक्ष, छोटे नंद गोपाल करवट बदल लिए। इसलिए मैया ने ब्रज में घोषणा करके बड़ा उत्सव मनाया। ठाकुर सोच रहे हैं कि बैंड बाजे वाले आ गए। कहीं मंत्र अनुष्ठान वाले पुजारी आ गए। कहीं रंगोली है, कहीं तोरण है। हर जगह मंत्र अनुष्ठान हो रहा है। सब गीत वाद्य यंत्र चल रहा है। यह सब तो ठीक है। जब तक व्यक्ति मुझे पवा ना दे, वात्सव उत्सव तो प्रारंभ ही नहीं हुआ।
तो ठाकुर को तो मैया ने कहीं नीचे रख दिया। ठाकुर खूब रो रहे हैं। शकट के नीचे रखे हुए ठाकुर जी खूब रो रहे हैं। इस भाव से रो रहे हैं कि मैया, इस बड़े-बड़े उत्सव में व्यक्ति मुझे पवाना भूल जाए, तो मैं खूब रोता हूँ। विग्रह को यदि सोचिए, सुबह 4:00 बजे से उठाकर 4-5:00 बजे उठाकर कई बार उत्सव हो जाता है। हमारे समाज में भी कई एक-दो बजे तक दोपहर में उत्सव चलता है। तो ठाकुर जी भी यही सोच रहे हैं, कोई बड़ी लंबी कथा सुना रहा है, कोई कीर्तन करा रहा है, कोई अपनी ऑफरिंग सुना रहा है, कोई आकर आभरण, आभूषण, कहीं वस्त्रालंकार हो रहा है, पर नैवेद्य की बात कब होगी? ठाकुर, क्या अपने भक्त भी यही सोचते हैं कि लंबी चौड़ी कथा होती है, भैया आप बंद करा दो। अब प्रसाद का समय आया।
तो ठाकुर जी भी यही सोचते हैं कि मुझे नैवेद्य करा दो। कहीं भोग अर्पण कराओ। मैया, मुझे कोई उत्सव नहीं चाहिए। एक उत्सव जो मुझे चाहिए, भावोत्सवेन भजता रसकाम धेनुम। भाव के उत्सव से मुझे भजो। मैया, यहाँ के बाहर की दृष्टि से यह जो मंत्र अनुष्ठान है, यह तो ठीक है। आप मुझे अपने वक्षस्थल से लगाकर अपना स्तनपान कराओ। बस इसी में मेरी पूर्ति है। ऐसे सोचकर श्री हरि सूरी जी ने ऐसी व्याख्या की शकट भंजन लीला में कि ठाकुर वहाँ रो इसलिए रहे थे कि मैया, यह सब अनुष्ठान छोड़ दो। विधि भक्ति छोड़कर राग मार्ग में प्रवेश हो जाओ। कहीं मुझे छाती से लगाकर कहीं मुझे आप दूध पान करा दो। बस नैविद्य हो, तो मैं प्रसन्न हूँ।
तो यहाँ पर इतनी सेवा होकर चतुर्दश, 14वीं सेवा यह है कि आहार, गिरिराज कहीं अच्छे-अच्छे फल से, कहीं खाद्य, कहीं कंद मूल, कहीं मूल प्राप्त होता है, कहीं कंद प्राप्त होता है। कंद और मूल में भेद यही है कि वो वस्तुएं, वो सब्जियां जिनको पकाना अनिवार्य है, पानी से पहले। और वो सब्जियां जिनको बिना पकाए भी खाया जा सकता है। यह भेद है कंद और मूल में। थिंग्स व्हिच कैन बी ईटन रॉ एंड थिंग्स व्हिच हैव टू बी कुक्ड बिफोर ईटिंग। यह यह दो भेद हैं।
फिर 15वीं बात, मुखवास। यहाँ यहाँ वर्णन है कि कहीं गिरिराज मुखवास भी पवाते हैं ठाकुर जी को। गिरिराज के वन विहार में, वन आसपास के प्रभु वनचारी हैं। तो वन में कहीं ऐसे-ऐसे बड़ी सुंदर औषधी लताएं हैं जिसको ठाकुर पा सकते हैं भोजन के बाद मुखवास के रूप में। हम सब पाते हैं थोड़ा कहीं मुखवास पा लेते हैं, तो ठाकुर जी भी गिरिराज के तलहटी में मुखवास प्राप्त करते हैं।
यह 15वीं सेवा। 16वीं सेवा तो है आरती की सेवा। कैसी आरती की सेवा? कहा जाता है कि गिरिराज गोवर्धन प्रभु को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, कहीं चंपक के मालाएं, कहीं चमर, कहीं गीत, कहीं यह सब करके एक आरती अनुष्ठान। एक ही समय में पहले तो एक-एक करके आया, फिर कई बार ठाकुर जी विराजमान हैं, कोई शीला में, तो कहीं से हवा चल रही है, तो मानो ये चामर ढुलाया जा रहा है। कहीं-कहीं शीला से चमक आ रही है, तो कहीं यहाँ पे दीप जल रही है। कहीं से धुआँ है, तो कहीं धूप चल रही है। ठाकुर जी की एक ही क्षण में गिरिराज बड़े सौष्टव भाव से आरती करते हैं। यह शोडस उपचार यहाँ समाप्त हुआ।
17वीं बात, आतपत्र। आतपत्र कहते हैं छाँव। छाँव, अंब्रेला, कहीं छाता, छत्र। गिरिराज के तलखटी में ऐसे वन वृक्ष हैं जो बड़े ऊँचे हैं और घन हैं, गहन हैं, जिसके नीचे सघन है, जिसके नीचे बैठो तो सूरज दिखता ही नहीं। ऐसा लगता है कि कहीं छाँव में बैठे। हर जगह कड़कती धूप है, परंतु गिरिराज गोवर्धन ठाकुर जी और सखागण विचरण कर रहे हैं। कभी तो ऐसे वन में प्रवेश करा देते हैं जहाँ पे बड़े-बड़े वृक्ष और आतपत्र एक छाता के रूप में छाँव देते देते ठाकुर। कहीं ऐसे शीला में विराजमान, तो गिरिराज गोवर्धन कहीं-कहीं शैया बने हैं, कहीं आतपत्र बने हैं। कहीं दास बनके चमर ढुला रहे हैं।
और यही 18वीं बात है कि चमर व्यजन, चामर व्यजनेन। भाई ठाकुर के लिए पंखा कहीं झुलाते हैं गिरिराज। अब यह कैसे करते हैं? ऐसे कहा जाता है कि गिरिराज गोवर्धन कई बार अपने मलयगिरी पर्वत सखाओं के सहित, क्योंकि मलयगिरी से चंदन की बड़ी प्रसिद्धि है। मलय मलयन माउंटेंस पर चंदन मलय भिल पुरंदरी चंदनतुरु काष्टम इंदनम च कुरते कि कहीं मलय गिरी पर चंदन के काष्ट पाए जाते हैं। तो गिरिराज बड़ी सख्य भाव रखते हैं मलय पर्वत के साथ। तो मलय पर्वत वहाँ कहीं पवन के झोंके से चंदन के बड़े सुगंध को अपने घर से गिरिराज की ओर, गिरिराज की दिशा में भेजते हैं और गिरिराज उसी को बड़े वृक्ष के बीच में कहीं पत्तों के बीच में झुलाते हुए हवे के झोंके चल रहे हैं, उसमें पत्ते हिल रहे हैं, वृक्ष हिल रहे हैं। ठाकुर जी को कहीं पंखा लग रहा है और साथ ही साथ जैसे इस जगत में अगरबत्ती, कहीं चंदन की अगरबत्ती का सुगंध है, तो मलयगिरी से लेते हुए पवन के झोंके वहाँ के चंदन को ले आकर गिरिराज की सेवा में और गिरिराज उसको ठाकुर की सेवा में, ठाकुर के नासिका में। यह हो गई 18वीं बात।
फिर 19वीं बात, यहाँ है कि प्रत्येक दिन सुबह हो, दोपहर हो, शाम हो, गिरिराज के तलघटी में ऐसे-ऐसे मोर हैं, मोर, मोरनी जो केवल इस सेवा में नियुक्त हैं कि इन बादल को देखो तो नृत्य करो। बादल रूपी श्याम सुंदर, यह नियुक्त नट हैं। वैसे बादल तो नटवर हैं, वो इनके लिए भी गिरिराज ने नियुक्त करके कहीं मोर, मोरनी सजा के रख दी। तो दिन भर जो इन बादल को देख के नृत्य करते रहे, तो 19वीं सेवा नृत्य सेवा है।
20वीं सेवा शयन सेवा है, जिसको हमने कहा गिरिराज कई बार ठाकुर जी के साथ सहयोगी बनकर गिरिराज के तलहटी में कहीं वन में बांस के भी वृक्ष हैं, बंबू। तो ठाकुर जी यहाँ बांसुरी बजा रहे हैं और अच्छा लगता है कि कहीं कलाकार यदि अच्छा बजाएं तो सुनने वाले दर्शक भी बड़े गुणी हो तो अच्छा लगता है। तो गिरिराज क्या करते हैं? शयन लीला करते हैं। शयन लीला कहते हैं ठाकुर जी के लिए विश्राम स्थली। इसका विषय में हमने पहले कह दिया था, कंदरों में अथवा अन्य स्थानों में ठाकुर जी कई बार विश्राम करते हैं और फिर उठकर कहीं बांसुरी बजाते हैं।
तो गिरिराज क्या करते हैं? शयन लीला में तो कहीं पत्तों से, फूल से बड़ा सुकोमल एक बेड बना देते हैं। और ठाकुर जी जब जग जाएँ और बांसुरी बजाने लगें, तो उनके बांस के गिरिराज अपने बांस के वन में जो बांस के वृक्ष हैं, वहीं से पवन के झोंके के माध्यम से करके ठाकुर जी जैसे बांसुरी बजाएं, उसी स्केल में, उसी स्वर में स्वर मिलाकर कई कलाकार भी गा रहे हैं और दर्शक भी उसी स्वर, उसी सुर में, उसी राग में गा रहे हैं। तो कहीं यह भी कहा गया, कई बार ठाकुर जी बांसुरी नहीं बजाते हैं, केवल लेटे हैं। तो गिरिराज अलग-अलग वृक्षों के माध्यम से पवन के झोंके और दिशा के माध्यम से, जैसे बड़े वृक्ष, कहीं छोटे वृक्ष, कहीं बड़े पत्तों वाले वृक्ष, तो सबके बीच से जब पवन के झोंके चलते हैं, तो अलग-अलग सुर सुनाई पड़ता है। तो गिरिराज कई बार ठाकुर को सुलाने हेतु सैया तो लगाती हैं और पवन के झोंके से ऐसे सुंदर राग सुनाते हैं। ठाकुर जी स्वयं सुनते सुनते कई बार कथा में सुनते सुनते जैसे श्रोता सो जाते हैं, वैसे ठाकुर जी भी स्वयं गिरिराज की बड़ी सुंदर व्यवस्था से ठाकुर जी भी निद्रा को प्राप्त करते हैं।
यह हुआ 20 और 21वीं लीला यह है। 21वीं सेवा यह है कि जैसे मोर होते हैं नृत्य के लिए, वैसे कोयल होते हैं गाने के लिए। गाने के लिए यह 21वीं गाने की सेवा।
इस प्रकार पाँच नहीं, 10 नहीं, 16 नहीं, श्री जीव गोस्वामी पाद ने वर्णन किया गिरिराज गोवर्धन 21 उपचारों के प्रयोग से कहीं आसन, स्वागत, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, जल, वस्त्र, गंध, गंध, पुष्प, धूप, दीप, आभरण, आहार, मुखवास, आरती, आतपत्र, व्यजन अथवा चामर, फिर नृत्य, शयन और गान, ऐसे 21 सेवा करके प्रतिदिन, प्रति क्षण भगवान को, उनके भक्तों को, गौ समाज को, बलदाऊ को, सखागण को, सखियों को, सबकी सेवा करते हैं। इसलिए हरिदास वर्य के रूप में विराजमान।
कल एक और दिन गिरिराज के विषय में आगे चर्चा होगी। आज तो वाणी यहीं समाप्त होगा। समय तो काफी हो चुका, जो भारत में है। आपके लिए, आपके चरणों में मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, क्योंकि आज अन्य कोई सेवा थी, इसलिए थोड़ी विलंब हो गई कथा में। तो कल उचित समय पर एक घंटे की कथा होगी। आज वाणी को यहीं विराम देंगे और गिरिराज की अपूर्व महिमा, यद रामकृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद, यह श्लोक पर टीकाओं के साथ और आचार्य ने जो बड़ी अद्भुत, अमूल्य, अमृतमय, अद्वितीय शब्दों का चयन करके हम सबके लिए कृपा रूप में प्रस्तुत किया, इसका आस्वादन, रसास्वादन कल प्रयास करेंगे।
वंछ कल पत्रभ्य कृपा सिंधुभ्य एवच पतित नाम पावभ्यो वैष्णवभ्यो नमो नमः। ग्रंथराज श्रीमद् भागवत प्रथम की जय! गिरिराज गोवर्धन की जय! जय जय श्री राधे श्याम! जय हो! जय हो!