Transcription
आप सभी जानते हैं के अक्स बतर मसाइल के अंदर खलाफा है। समझे ना कोई भी मसला हो, वजू के अंदर भी, नमाज के मसाइल के अंदर भी, अक्स बतर मसाइल में उलमा के लोगों के खलाफा है। किसी मसलक में उसको करने का कोई तरीका है, दूसरे मसलक में उसका करने का कोई दूसरा तरीका है। कोई आलिम कुछ कहता है, दूसरा आलिम कुछ और फतवा देता है। अब इसलिए ये खलाफा जो पाए जाते हैं, इसमें हमारा मौक़ क्या होना चाहिए? इसमें हमें क्या करना है? ये बहुत अहम पॉइंट है, कि जिसको हम अभी से ही इसको समझ लें, क्योंकि आगे हम पढ़ते हुए देखेंगे कि बहुत सी चीज आपके सामने गुजरेगी, कि जिसमें आप देखेंगे भी, हमारे यहां तो इसको ऐसे किया जाता है और यहां पर कुछ और तरीके से लिखा हुआ है। आप इस तरह की चीज देखेंगे तो वहां पर ताकि कंफ्यूजन ना हो, आदमी परेशान ना हो, तो वहां पर क्या है? हमें पहले से ही रूल हमारे सामने हो। इसमें कुरान और सुन्नत का क्या रूल है? हमें अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ से क्या तालीमात हैं?
फला रसूल बल्कि आत का शुरू हम लेते हैं। या आमन अला रसू, मनक वो लोगों जो ईमान लाए हो, ताआत करो अल्लाह की और ताआत करो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की और जो तुम्हारे उली अमर हैं, उनसे मुराद यानी तुम्हारे हुक्मरान और उलमा। यहां पर थोड़ा सा मेरे साथ गौर फ़रमाइए अल्लाह के लफ़्ज़ के साथ। अती ताआत करो रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ, अती ताआत करो। लेकिन जब तीसरी चीज उली अमर की बात आई है, हुक्मरानों की या उलमा की बात आई है, तो वहां पर अती नहीं है। वहां पर उनको वैसे ही साथ ज़िक्र किया गया है। उनकी भी ताआत करना है। तो अल्लाह और उसके रसूल के साथ आती का लफ़्ज़ क्यों लगा और उमर के साथ क्यों नहीं लगा? कुरान का एक-एक लफ़्ज़ जो है हकीकत में बहुत बड़ी, बहुत बड़ा दर्स होता है। कौन बता सकता है कि इसकी क्या वजह हो सकती है? अल्लाह के साथ अति लगा, रसूल के साथ अती लगा, लेकिन उमर के साथ अती नहीं लगा। क्या है जी? जल्दी जल्दी, माशाअल्लाह, भाई का जवाब करीब करीब है कि अल्लाह की ताआत मुस्तक़िल है, क्योंकि वही हमारा रब है, हम उसी के बंदे हैं। इसी तरह रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इता भी मुस्तक़िल है। मुस्तक़िल होने का माना कि अगर कुरआने करीम में आपने जो हुक्म दिया है, कुरान में उसका कोई ज़िक्र ना भी हो, तब भी हम आपकी इता करें। किसलिए? क्योंकि आप अल्लाह के रसूल हैं और आपका हुक्म अल्लाह का हुक्म है। आप जो भी हमें हुक्म देते हैं, अल्लाह ही की तरफ से हुक्म हमें सुनाते हैं। लेकिन आपके बाद हुक्मरानों की बात आती है, उलमा की बात आती है, हमें उनकी भी इता करना है, लेकिन उनकी ताआत मुस्तक़िल मुस्तक़िल ना होने का माना, उनमें देखेंगे हमें, अगर ऐसी चीज़ का हुक्म देते हैं जो कुरान और हदीस के मुताबिक़ है, तो उनकी हम इता करेंगे। अगर ऐसी चीज़ का हुक्म देते हैं कि जो कुरान और हदीस के ख़िलाफ़ है, फिर उनकी ताआत नहीं की जाएगी। ये बड़ा फ़र्क़ है और इस जुमले के अंदर ही, आयत के जुमले के अंदर हमें पता चल जाता है कि अल्लाह और उसके रसूल की ताआत की हैसियत क्या है और हमारे आमा कराम, उलमा कराम, उनकी ताआत किस अंदाज़ से होगी? कि उनकी ताआत अल्लाह और उसके रसूल की ताआत के ताबे है, उनके अंडर है, अलग नहीं है। समझे ना? तो वैसे तो बाज़ औक़ात आप कहोगे, ये भी ट्रैफ़िक पुलिस के जो सारे सिस्टम हैं, क्या कुरान में है? क्या ख़्याल है? हदीस में है? तो फिर इनको फ़ॉलो करें ना करें? क्या ख़्याल है? करना चाहिए फ़ॉलो इनको? नहीं। ये भी कुरान में नहीं, हदीस में नहीं। सिग्नल तोड़ो, कोई मुश्किल नहीं। क्या ख़्याल है? यहां पर एक और चीज़ भी है के उलमा की तरफ़ से, हुक्मरानों की तरफ़ से बाज़ औक़ात तो वही हुक्म दिया जाता है जो कुरान और हदीस में है। बाज़ औक़ात हुक्म वो दिया जाता है जो कुरान और हदीस में उसका ज़िक्र तो नहीं है लेकिन कुरान और हदीस के ख़िलाफ़ भी नहीं है। बात मेरी समझ आ रही है? उनकी तरफ़ से जो हुक्म जा रहा है वो कुरान हदीस में नहीं है लेकिन कुरान और हदीस के ख़िलाफ़ भी नहीं है। जिसकी अभी आपको मिसाल दी, ट्रैफ़िक के जो सिस्टम हैं ये कुरान के ख़िलाफ़ नहीं है, लोगों को या उनके उनको नुकसान से बचाने के लिए, उनको मुनासिब करने के लिए एक रेगुलर अंदाज़ से ट्रैफ़िक को चलाने के एक सिस्टम है। कुरान हदीस के ख़िलाफ़ नहीं है तो क्या हम इसमें उनको फ़ॉलो करेंगे? हाँ, करेंगे। इसमें हम उनकी ताआत करेंगे क्योंकि कुरान और हदीस के ख़िलाफ़ नहीं है। लेकिन फ़र्ज़ करो कोई आलिम, कोई हुक्मरान, कोई लीडर ऐसी बात का हुक्म देता है कि जिसको अल्लाह और उसके रसूल ने हराम किया है, नाज़ायज़ किया है। के फ़र्ज़ करो सूद का काम करो, भी वैसे अलग बात है मना ना करे वो अलग, लेकिन वैसे हुक्म दे कि सूद का कारोबार करना है या नाज़ायज़ को, ज़िना, बक़ारी का, इस तरह के मामलात और आजकल ऐसे ऐसे बाज़ सिस्टम बैन अवामी सतह पर दिए जाते हैं। हुकूमत को, हुकूमत को ये कानून नाफ़िज़ करना है तो उसमें हम देखेंगे हमारी शरीयत उसकी इजाज़त देती है? नहीं, नहीं देती। उसमें उनको ताआत नहीं की जाएगी। किसलिए? क्योंकि अल्लाह ताला क्या क्या फ़रमाते हैं? ताआत देखिए कब हम अपने उलमा, हुक्मरानों की ताआत नहीं करेंगे? जब वो अल्लाह की नाफ़रमानी का हुक्म दें। और अल्लाह के फ़ज़ल से मुसलमान हुक्मरान अमूमन चीज़ों, इन चीज़ों की पाबंदी करते हैं। लेना भी चाहिए। अगर कहीं ग़लती होती है तो उनके लिए दुआ कीजिए। तो ये एक बड़ा मसला है। अच्छा, यहां पर हम देखना चाहते हैं कि कुरआने करीम में हमने देख लिया कि अल्लाह ताला का फ़रमान क्या है? कि अगर तुम्हारा कहीं इख़्तलाफ़ हो जाए, फ़ला रसूल इख़्तलाफ़ हो जाना बड़ी बात नहीं है। मेरी सोच, मेरी ज़हनीयत या मेरी सोच का जो एंगल है आपसे अलग होगा। आपको आयत पढ़ेंगे, हदीस पढ़ेंगे, उसमें से आपको कुछ समझ आएगी। दूसरा पढ़ेगा उसको दूसरी चीज़ समझ आ सकती है। इसलिए समझ में, सोच सोच, फ़िक्र में इख़्तलाफ़ हो जाना कोई बड़ी बात नहीं, ये इंसानी फ़ितरत है। सहाबा के दरमियान भी इख़्तलाफ़ होते रहे थे, ताबीन के दरमियान भी इख़्तलाफ़ होते रहे थे, के दरमियान भी मसाइल में इख़्तलाफ़। लेकिन इख़्तलाफ़ का हल कहां से लेते थे? तनाज़ुर तुम्हारा इख़्तलाफ़ हो जाए किसी भी चीज़ में, फ़ला रसूल उसका फैसला कहां से लेना है? उसको अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ लौटा आओ। उसका फैसला अल्लाह और उसके रसूल से लेना है। अल्लाह से लेने का माना अल्लाह का कुरान और नबी से लेने का माना कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सही हदीस, हदीस के हवाले से। एक शर्त और भी है, हदीस सही हो, क्योंकि कुछ हदीस ऐसी भी शामिल कर दी गई है कि जो सही नहीं है। लेकिन उलमा ने हर एक को अलग-अलग कर दिया है। इसमें किसी तरह की परेशानी की बात नहीं। तो कुरान या हदीस तो माता है कि तुम्हारा इख़्तलाफ़ हो जाए तो उसका फैसला कहां से लेना है? अल्लाह और उसके रसूल से। बल्कि आगे अल्लाह ने फ़रमाया, इला अगर वाक़ई तुम्हारा अल्लाह पर, आख़िरत पर, क़यामत पर ईमान है तो उसे ईमान का तकाज़ा ये है कि अपने इख़्तलाफ़ का हल कुरान और सुन्नत से लो। अगर तुम्हारा अल्लाह और रसूल पर ईमान है और इसका माना क्या हुआ? अगर कोई अपने इख़्तलाफ़ का हल कुरान और सुन्नत से नहीं लेता तो अपने ईमान के तकाज़े में पूरा नहीं है। उसका ईमान का दावा ग़लत है। अल्लाह ने शर्त बयान की है, शर्त है तुम्हारे ईमान की, अगर तुम वाक़ई मोमिन हो तो तुम्हारे इख़्तलाफ़ का फैसला कुरान सुन्नत से लो, ये ईमान की शर्त भी है। आगे उसका नतीजा भी बयान किया। इसका फ़ायदा क्या होगा? इसका फ़ायदा ये है, ला हा ये काम जो है कुरान सुन्नत से फैसला लेने का यही बेहतरी है, यही ख़ैर है, क्योंकि अल्लाह का हुक्म है और इसी का अंजाम भी अच्छा है, इसी का नतीजा भी, रिजल्ट भी अच्छा है। दुनिया के अंदर भी रिजल्ट अच्छा होगा। मेरा और आपका किसी मसले पर इख़्तलाफ़ हुआ, अगर मैं कहूं कि मैं फ़ला हूं, आप कहें मैं तो फ़ला हूं, तो हल होगा उसका। लेकिन अगर हम सभी दोनों ही इस पर मुत्तफ़िक़ हो जाएँ कि आइए कुरआने करीम को देखें, अल्लाह इसके बारे में क्या फ़रमाया है? आइए सही हदीस को देखें कि सही हदीस इसके बारे में आपकी क्या तालीम है? तो वहां पर कोई इख़्तलाफ़ आपको नज़र नहीं आएगा, मसला हल हो जाएगा और हम हमारा इख़्तलाफ़ ख़त्म हो गया, हम इकट्ठे हो जाएंगे। दुनिया के अंदर भी इसी में इत्तेहाद, इत्तेफ़ाक़ है, कुरान सुन्नत की तरफ़ रुजू करने में ही असल इख़्तलाफ़ ख़त्म होने का सारा इख़्तलाफ़ वहीं पर ख़त्म हो गया और आख़िरत में भी, क़यामत के दिन भी फ़र्ज़ करें मैं कोई चीज़ करता रहा किसी के कहने पर, क़यामत के दिन मुझसे पूछ लिया गया कि तुम ये चीज़ ऐसी क्यों करते रहे थे? मैं क्या कहूँ? कि मुझे फ़ला ने कहा था ऐसे करो। अल्लाह के यहां ये जवाब माकूल है? अल्लाह को मैं बताऊँ, मुझे फ़ला साहब ने कहा था कि ऐसे करना है, मैं इसलिए ऐसे करता रहा। अल्लाह के यहां भाइयों ये जवाब माकूल नहीं है। अल्लाह ने कुरान सुन्नत दिया हमको इसलिए है ताकि हम इस पर चलें। लेकिन फ़र्ज़ करें मैं किसी मसले पर अमल करता रहा, किसी चीज़ पर चलता रहा, कुरान की दलील से, हदीस की दलील से और क़यामत के दिन मुझसे पूछ लिया गया, तुम ऐसा क्यों करते रहे थे? मैं कहूँ, अल्लाह तेरे कुरान में ऐसे लिखा हुआ था, तेरे नबी की सुन्नत में ऐसे था। तो जवाब माकूल है ना? इसलिए अल्लाह माता है, इसका अंजाम भी, इसी का नतीजा अच्छा है, दुनिया के अंदर भी और आख़िरत में भी। इसलिए बड़ी अहम चीज़ है, बहुत बड़ा पॉइंट है जिसे हम समझने की ज़रूरत है।
इसी तरह दूसरी आयत आपके सामने ली गई है। रब्बुल आलमीन अल्लाह ताला फ़रमाता है, उसकी पैरवी करो कि जो तुम्हारी तरफ़ नाज़िल किया गया, किसकी तरफ़ से? रब्ब की तरफ़ से। जो रब्ब की तरफ़ से आया है वही आई है कुरान में से, सुन्नत में से, उसकी पैरवी करो। ला म लिया और उसको छोड़कर और औलिया का, का माना अपने बड़े, अपने जिनको जिनसे आपकी मोहब्बत, अकीदत है, बाज़ औक़ात या इस तरह के लोगों की पैरवी ना करो। क्योंकि बाज़ औक़ात उनकी बात सही होती है और बात ग़लत भी हो सकती है। इसलिए भाइयों अगर कहीं ग़लती नहीं है तो कहां पर नहीं है? कुरान और सुन्नत में ग़लती नहीं। कुरान और सुन्नत ये वो दो चीज़ें हैं, अल्लाह की वही है कि जिसमें ग़लती होने का कोई चांस ही नहीं। लाया कुरान के बारे में अल्लाह ताला फ़रमाता है इसके आगे पीछे कहीं से कोई ग़लत चीज़ आने का कोई चांस नहीं और सही हदीस भी, नबी से साबित, उसमें भी कोई ग़लती का चांस नहीं। समझे ना? लेकिन मैं बात करता हूं, मेरी बात ग़लत हो सकती है और आलिम, मुफ़्ती फतवा देता है, उसकी बात में ग़लती हो सकती है और यही फ़र्क़ है बहुत बड़ा। हमने फ़र्स्ट पढ़ा ना अल्लाह के रसूल की ताआत मुस्तक़िल क्यों है? उलमा की ताआत मुस्तक़िल क्यों नहीं है? क्योंकि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, आप पहली बात तो ग़लती कर सकते नहीं। अगर कहीं पर इत्तेफ़ाक़न तौर पर आपने किसी चीज़ में खुद सोचा कि ऐसा होना चाहिए लेकिन अल्लाह ताला की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ तो अल्लाह फ़ौरन बता देता है, यहां पर ऐसे नहीं, ऐसे है और कुरआने करीम में ये आयत मौजूद है। फ़ौरन अल्लाह की तरफ़ से उसकी इस्लाह हो जाती है, उसकी करेक्शन हो जाती है। कहीं भी मामूली किस्म की अगर कोई ऐसी चीज़ हो जाए अल्लाह के नबी रसूल से। लेकिन मुझसे हो जाए, मेरे ऊपर वही आयत है मुझे पता चलेगा। हाँ बाज़ औक़ात आगे चलकर पता चल सकता है मैंने यहां पर ग़लती की है और हुआ ऐसा हमारे बड़े-बड़े उलमा से, आमा कराम, उन्होने कोई फतवा दिया, बाद में देखा मेरा फतवा तो फ़ला हदीस के मुताबिक़ नहीं है, उसको चेंज कर दिया। यानी अपने तौर पर खुद को किसी वक़्त ग़लती का एहसास हो गया तो हो गया। अल्लाह की तरफ़ से वही नहीं आती, लेकिन किस पर आती है? नबी और रसूल पर। यही वजह है कि नबी रसूलों की ताआत मुस्तक़िल है जो उन्होंने कह दिया हमें उस पर चलना है और उनके अलावा कितना बड़ा भी आलिम, मुफ़्ती क्यों ना हो, उसकी ताआत उसी वक़्त है जब उसकी बात अल्लाह और उसके रसूल के हुक्म के मुताबिक़ है और यही वो चीज़ है कि जो हमारे आमा कराम की तालीमात हैं, उनकी क्या हमें नसीहत हैं? जमाने के तबार से सबसे पहले इमाम कौन है? वक़्त के तबार से सबसे पहले इमाम कौन है? इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह, हमेशा रहमतुल्लाह कहा करें। ये वो शख़्सियत हैं कि जिनके उम्मत पर बड़े एहसान हैं। जिस तरह सहाबा का ज़िक्र आए तो रज़ियल्लाहु अन्हु कहें, आराम है, मुहसिन है, इनका ज़िक्र आए तो रहमतुल्लाह। उनकी हमारे ऊपर बहुत, उनके हमारे ऊपर बड़े एहसान हैं। इतना बड़ा इल्म छोड़कर गए हैं। समझे ना? तो जमाने के तबार से सबसे पहले इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह, कब पैदा हुए थे? कौन बताएगा? हाँ जी, 80 हिजरी में। माशाअल्लाह। इमाम हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह 80, 80 हिजरी में पैदा हुए। हिजरी से मुराद यानी जो इस्लामी साल है, आपकी हिज्रत। तो 80 हिजरी में पैदा हुए और फ़ौत कब हुए? 150 में। 150 में इमाम फ़ौत होते हैं। तो जमाने के तबार से, वक़्त के तबार से सबसे पहले इमाम अबू हनीफ़ा। उनका फ़रमान क्या है? देखिए कहते हैं, इ हदीस मजबी, जब तुम्हें सही हदीस मिल जाए, इमाम साहब फ़रमाते हैं, मेरा मसलक वही है जो मेरा भी कौल है, वही कौल है। अब इससे बढ़कर और चीज़ हो सकती है कि फ़र्ज़ करो इमाम साहब को वो हदीस ना मिली और मुंकर है। मैं एक बात बताना चाहता हूं। इमाम रहमतुल्लाह अलैह, अगरचे जमाने के तबार से सबसे पहले हैं लेकिन इमाम हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह के जमाने में बुखारी मौजूद थी? नहीं थी। मुस्लिम मौजूद थी? नहीं। हम जिनको सहा सिहा, वैसे कुतुब सिहा, उनका सही नाम है ये कुतुब सिहा मौजूद थी उनके जमाने में? उनसे एक 100 साल के बाद, तक़रीबन 100 साल से भी ज़्यादा उसके बाद लिखी गई है। इसका माना कि इमाम हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह के जमाने में ये हदीस जमा नहीं थी। अब ये हदीस जो है ये थोड़ा सा इससे दूर हटके बैठे, वरना फिर हाँ जी। तो इमाम रहमतुल्लाह अलैह के जमाने में हदीस अभी तक लिखी जा रही थी, जमा हो रही थी। तो कोई हदीस उनको मिल गई, उसके मुताबिक़ फतवा दे दिया और जहां हदीस ना मिली तो उन्होने क्या किया? खुद फ़रमाते हैं कि जहां हदीस नहीं मिलती फिर हम खुद इत्तेहाद करते हैं, अपनी राय से काम लेते हैं। इसलिए कभी अगर उनकी बात हमें किसी हदीस के मुताबिक़ ना मिले तो इसमें कोई उनकी ग़लती नहीं है। उन्होने अपने अपने तौर पर इत्तेहाद से फतवा दे दिया। लेकिन हमारा फ़र्ज़ क्या बनता है? हमें उन्होंने क्या तालीम दे दी? कि तुम सही हदीस देखो। जब सही हदीस तुमको मिल जाए तो मेरा भी मसलक, मेरा भी कौल, मेरी बात भी वही है। मज़हब क्या फ़रमाते हैं? किसी शख्स के लिए जायज़ नहीं हमारा क़ौल इख़्तियार करे जब तक वो मालूम ना करे कि ये क़ौल, इस क़ौल की दलील क्या है? इससे ऊपर आपने लफ़्ज़ पढ़ रहे हैं, तक़लीद से मना किया। कि तक़लीद क्या होती है? वैसे किसी को फ़ॉलो करना, एक होता है तक़लीद और एक है इतिबा। इतिबा करना, तक़रीर करना, दोनों में फ़र्क़ को बता सकते हैं? तक़लीद का माना कि किसी के साथ चलना बग़ैर दलील के, पता नहीं कहाँ जा रहा है, मैं भी साथ हूँ। समझे ना? एक आदमी जा रहा है कहीं पर, अब ये पीछे चल पड़ते हैं। कहाँ जा रहा है, कुछ पता नहीं। एक आदमी आपको हाथ से पकड़कर के ले जा रहा है, कहाँ ले जा रहा है, कुछ पता नहीं। ये क्या है? ये तक़लीद है। अच्छा, एक आदमी कहता है कि हम फ़ला जगह पर जा रहे हैं और वहां पर हमने जाकर ये कुछ करना है, मेरे साथ आओ। अब आप उसके साथ चल रहे हैं, क्या कर रहे हैं? इतिबा कर रहे हैं क्योंकि आपको पता है कि आप कहाँ जा रहे हैं, किस लिए जा रहे हैं। समझे ना? आपके सामने हर चीज़। इसी तरह इल्म के मैदान में भी किसी आलिम की, किसी मुफ़्ती की बात को ले लेना जो उसने कह दिया, आँखें बंद करके ले ली। ये क्या है? ये है तक़लीद। लेकिन वो आलिम, मुफ़्ती आपको दलील देता है, इस मसले की दलील कुरान से ये है, हदीस से ये है। आप उस वक़्त सिर्फ़ आलिम, मुफ़्ती की बात नहीं बल्कि आप कुरान और हदीस सुन रहे हो, आप इतिबा कर रहे हो। समझे ना बात? इसलिए इमाम फ़रमाते हैं कि मेरा क़ौल उस वक़्त तक ना लो जब तक ये ना देखो कि इस मेरे क़ौल की दलील क्या है? मैंने कहाँ से लिया है? इसलिये माना क्या हुआ कि हमारे आमा कराम हमारी तरबियत करते थे कि जब तक दीन के बारे में, भाइयों, दीन का मसला बड़ा नाज़ुक है, बड़ा हसीस, हसीस है। इसमें बड़े मोहतात होने की ज़रूरत है हमको, इसमें हमें जब तक दलील ना हो, उस वक़्त तक कोई चीज़ ना करें। समझे ना? तो इसलिए इमाम साहब फ़रमाते हैं कि जब तक दलील मालूम ना हो, उस वक़्त तक मेरी बात ना मानो। आप देखो मैंने कहाँ से लिया है। तो आमा कराम हमारी तरबियत करते गए हैं कि हम हमेशा दलील को फ़ॉलो करें, दलील के साथ चलें और इसलिए आज भी हम किसी आलिम, मुफ़्ती से मसला पूछें तो उससे ये पूछा करें कि इसकी दलील क्या है? एहतराम करते हुए के, हमें अगर इसकी आप दलील दे सकें ताकि हम मुतमईन हो जाएँ। तो ये ये वो तरीका है जो नबी अलैहि सलाम का था, जिस पर आपने सहाबा की तरबियत की और इसी पर सहाबा कराम ने ताबीन कराम की तरबियत की। इसी तरह मज़ीद फ़रमाते हैं के मेरे फतवे की दलील मालूम ना हो, उसे फतवा दे देना हराम है। जिस शख्स को मेरे फतवे की दलील मालूम ना हो, उस पर हराम है कि मेरे फतवा दे। क्योंकि हम बशर हैं। इमाम साहब फ़रमाते हैं हम बशर हैं, इंसान हैं। आज कोई बात कहते हैं और कल उससे रुजू कर लेते हैं। आज को फतवा दिया किसी चीज़ के बारे में, मसला, लेकिन कल पता चला कि ये तो फतवा सही नहीं था, उससे रुजू। रुजू के माने उसको कैंसिल करके नया फतवा दे दिया और ये चीज़ आप देखेंगे आमा कराम, चार, किसी एक-एक मसले में उनके दो-दो, तीन-तीन, बल्कि बाज़ औक़ात चार-चार क़ौल होते हैं। एक वक़्त में फतवा दिया, बाद में हदीस मिल गई, फतवा बदल दिया। बाद में और हदीस मिल गई, पता चला कि ऐसे भी नहीं बल्कि और है और फतवा बदल दिया। किसलिए? के बशर है, ग़लती होती है और ये आमा कराम के हक़ पर होने की दलील है कि किस क़दर उनकी कोशिश थी हक़ को फ़ॉलो करने। ये नहीं कि मैंने फतवा दे दिया, मैं कैसे चेंज करूँ? आज हमारे दो टके के मौलवी बेचारे, ग़लत फतवा छोड़ दिया, बस बात कह दी, अब कैसे इसको चेंज करूँ? कैसे होगा? आमा कराम फ़रमाते हैं कि आज को बात कही, कल उससे रुजू करते हैं, कल उसको बदलकर कोई दूसरा फतवा दे दिया। उनके यहां मुश्किल नहीं। इस और यही भाइयों हक़ पर चलने का अंदाज़ है, हक़ को फ़ॉलो करने का ये तरीका है। तो ये थे इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह के मु, आपके सामने। इसी तरह उनके बाद इमाम मालिक। जमाने के तबार से इमाम हनीफ़ा के बाद कौन है? इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह। इमाम मालिक कब पैदा हुए? ये फ़ौत कब हुए? दोनों को पता नहीं? इमाम हनीफ़ा 150 में फ़ौत हुए थे और इमाम मालिक जो है 179, 179, 179 में फ़ौत हुए। तो जमाने के तबार से इमाम मालिक जो है इमाम हनीफ़ा के बाद है लेकिन दोनों एक दूसरे के शागिर्द, उस्ताद नहीं है। क्यों? इमाम हनीफ़ा क़ूफ़ा में थे, इराक़ में थे और इमाम मालिक मदीना में थे। तो अगरचे जमाना दोनों का करीब-करीब है लेकिन इमाम मालिक ने इमाम हनीफ़ा से कोई इल्म हासिल नहीं किया। दोनों एक दूसरे के उस्ताद, शागिर्द नहीं है। इमाम क्या फ़रमाते हैं? कहते हैं, इनमा अना बशर, मैं तो बशर हूँ, इंसान हूँ। कभी सही बात कहता हूँ, कभी ग़लत बात भी हो जाती है। तो इसलिए मेरी, मेरी बात को, मेरी जो क़ौल, उसको देखो अगर तो कुरान हदीस के मुवाफ़िक़ है तो ले लो, अगर मुवाफ़िक़ नहीं है तो उसको छोड़ दो। मेरी बात को, मेरे क़ौल को देखो अगर कुरान हदीस के मुताबिक़ है तो ले लो, अगर मुताबिक़ नहीं है तो उसको छोड़ दो। अब कोई अपने आप को मालकी कहलाने वाला कि मैं इमाम मालिक का फ़ॉलोअर हूँ, उनका तक़रीर करने वाला हूँ, मैं तो वही करूँगा जो उन्होने कहा। तो इमाम मालिक तो ये फ़रमाते हैं कि मेरी बात देखो, कुरान और हदीस के मुताबिक़ है तो लो, वरना नहीं लो। और इसलिए हम कहेंगे कि आज सही माने में हनफ़ी वो है कि जो इमाम अनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात, आमा कराम की तालीमात ली भी जा सकती है, क़बूल की जा सकती है, उसकी बात रद्द भी की जा सकती है। किसलिए? क्योंकि सिर्फ़ नबी करीम वो हस्ती हैं कि जिनके अल्लाह ने हमें मुस्तक़िल तौर पर इता करने का हुक्म दिया है। बार-बार कुरआने करीम में, अती रसूल, अती रसूल और ये कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ग़लती नहीं करते, आपकी जो बात है वो ऐन अल्लाह की तरफ़ से है। इसलिए औरों की बातों में ग़लती हो सकती है। तो इमाम मालिक इसी हक़ को बयान करते हुए फ़रमाते हैं कि मेरी बातों के अलावा हर एक की बात ली भी जा सकती है, छोड़ी भी। अगर सही बात हो तो ले लो, कुरान हदीस के मुताबिक़ है तो ले लो, वरना छोड़ दो। सिर्फ़ नबी की वो हस्ती है कि जिनकी बात को छोड़ा नहीं जा सकता। इसी तरह फ़रमाते हैं इब्ने वाहब, उनके शागिर्द हैं। जरा देखिए आमा कराम का अंदाज़ क्या है? इब्ने वाहब, अब्दुल्लाह इब्ने वाहब, उनका नाम है, इमाम मालिक के शागिर्द हैं। तो उन्होंने इमाम मालिक से पूछा, वजू करते हुए उंगलियों में ख़िलाफ़ करना। ख़िलाफ़ करने का माना आप वजू करते हुए ऐसी उंगलियों के साथ उंगलियां डालें ताकि उंगलियों के दरमियान तक पानी अच्छी तरह पहुँच जाए। तो इमाम मालिक से उनके शागिर्द इब्ने वाहब ने पूछा ख़िलाफ़ करने के बारे में, तो इमाम मालिक ने क्या कहा? ऐसा करना नहीं है। यानी उन्होने चीज़ का इंकार किया कि नहीं है। लेकिन फिर उनको पता चला, उनको हदीस सुनाई गई। इमाम मालिक को हदीस सुनाई गई कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उंगलियों का ख़िलाफ़ करते थे वजू करते हुए। इमाम मालिक ने फ़ौरन अपना फतवा बदल दिया और उस हदीस के मुताबिक़ फतवा देना शुरू कर दिया कि अगर हदीस में आया है तो फिर वाक़ई ख़िलाफ़ किया करो। ये सिर्फ़ एक मिसाल आपको दी है कि आमा कराम किस अंदाज़ से हदीस के साथ चलते थे। बल्कि आपको एक इनकी एक और भी हदीस सुनाता चलूँ। एक आदमी उनके पास आया, मदीना से जा रहा था मक्का उमरा करने के लिए। कहने लगा कि मेरा दिल चाहता है कि मिकाते से एहराम बाँध के, मिकाते है ना, जहां से एहराम बाँधते हैं, कहता है कि और मदीना वालों की मिकाते कहाँ पर है? भाई को पता होगा। मदीना से निकलते हुए। अब जब मक्का जा रहे होते ना तो जैसे मदीना से निकलते हैं वहीं पर मिकाते आती है, वहाँ से एहराम बाँध जाता है और ये मस्जिद नबवी से तक़रीबन कोई 10-12 किलोमीटर का फ़ासला होगा। तो उस आदमी ने कहा कि मेरा दिल चाहता है कि बजाय मिकाते से एहराम बाँधने के, मस्जिद नबवी उससे पहले है तो मेरा दिल चाहता है कि मस्जिद नबवी में और मस्जिद नबवी में बल्कि रियाज़ुल जन्ना है, सुनते हैं ना? रियाज़ुल जन्ना से एहराम बाँधूँ। क्या ख़्याल है? कितना अच्छा प्रोग्राम है कि बजाय मिकाते, मिकाते तो आम जगह है, ले मस्जिद नबवी और मस्जिद नबवी में भी रियाज़ुल जन्ना के जो जन्नत का टुकड़ा है वहाँ से एहराम बाँधूँ। कहने लगे मेरा दिल चाहता है कि यहां से एहराम बाँधूँ। तो इमाम मालिक फ़रमाते हैं, नहीं, ऐसा नहीं करो, कि मुझे ख़तरा है कि तुम कहीं किसी गुमराही में ना पड़ जाओ। कहता है कि इसमें क्या गुमराही है? चंद किलोमीटर का फ़ासला है, मिकाते आगे रास्ते में आनी है, मैं मस्जिद नबवी से एहराम बाँध के चलता हूँ। इमाम मालिक क्या फ़रमाते हैं? जरा सुनिए। कहते हैं, इससे बढ़कर क्या गुमराही है कि तुम वो चीज़ करो कि जो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नहीं की? कैसी तालीम है? क्या तरबियत है? अल्लाह के नबी के मस्जिद नबवी से नहीं चले थे? आपका हुजरा इसी मस्जिद नबवी के साथ-साथ तो है। आप क्या यहां से एहराम नहीं बाँध सकते थे? तुम समझते हो कि यहां से एहराम बाँधना ज़्यादा बड़ी नेकी है? आपको क्या नेकी मालूम नहीं हुई? हाँ, ये है आमा कराम की तरबियत, इसे हमें वाक़ई लेना चाहिए। इसी तरह इमाम शाफ़ी रहमतुल्लाह अलैह, जमाने के तबार से इमाम मालिक के बाद वो आते हैं। इमाम शाफ़ी का जमाना कौन सा है
कहता हूं अच्छा तीसरा क्या है? कहते हैं कि हर वो मसला, हर वो मसला जो सही हदीस में साबित हो, जबक मैंने उसके खिलाफ कह दिया हो, यानी हदीस में कुछ है और इमाम शाफी ने उसके खिलाफ कोई फतवा दे दिया, पता नहीं चला, हदीस का इमाम शाफी क्या फरमाते हैं? कि मैं जिंदगी में भी उस मसले से रुजू करता हूं और फौत होने के बाद भी रुजू करता हूं। फौत होने के बाद भी रुजू करता हूं। फौत होने के बाद रुजू करने का माना कि मेरे फौत होने के बाद भी ना कहे कि इमाम शाफी ने कहा था, मैं उस पर चलूंगा नहीं। अगर हदीस के खिलाफ है तो मेरा वह कॉल नहीं है, मेरा वो कॉल कैंसिल है, मनसुख है, उसको नहीं देखना।
इस तरफ़ चौथे इमाम की बात भी ले ले, इमाम अहमद बनल रहमतुल्लाह ये कब फौत हुए थे? हाँ, 241 हिजरी में, 241 टू 41। तो यह क्या फरमाते हैं? ला तुकलीद दनी, ना मेरी तकलीद करो, ना मालिक की, ना शाफी की, ना औजाई की, ना सौरी की। दो और भी इमाम के उन्होंने नाम दे दिए। हम तो सिर्फ चारों अइम्मा को जानते हैं। ना आपके इल्म में होना चाहिए कि चारों अइम्मा इसलिए हैं क्योंकि इनके बहुत बड़े फॉलोअर बने, लेकिन इनके अलावा और भी बड़े इमाम थे। ये आप नाम जो पढ़ रहे हैं, औजाई, फौरी और ये इस तरह के बड़े-बड़े इमाम थे। वक्त के, उनके उस वक्त फॉलोअर थे, लेकिन बाद में ना चले तो फतवे हैं ना इनकी पैरवी करो, इनकी तकलीद ना करो। बल्कि जहां से इन्होंने इल्म दिया है, वहीं से तुम भी लो। जहां से इन्होंने इल्म लिया है, वहीं से तुम भी लो।
तो यह है इसी तरह दूसरा उनका कौल, अपने दीन में, अपने दीन में, अराम में से किसी की तकलीद ना करो, बल्कि वही लो जो रसूल करीम और सहाबा से साबित है। और यह सारे मामाराम के अवाल हमको इस की दलील देते हैं कि हमें आराम की तालीमाबाद।