Transcription
[संगीत] मोर पंख का अपना विशेषताएं फायदा होता है। ऐसे अश्व कर्म अशोक चिंतन योग्यताओं को हर लेट। नारायण नारायण परमात्मा चेतन। [संगीत] साड़ी सृष्टि में व्याप रहा है। उसको पीसकर हवा में फूंक मार के आंखों से ओझल कर सकते। लेकिन उसका तत्व रहे। जैसे बी है। बी नष्ट हो गया। पौधा नष्ट हो गया। बोले पेड़ बन गया। पेड़ को कैट दिया। फर्नीचर है। लकड़ी को जल दिया। तो कौन सा है? कौन से को जल दिया? तो रहा को वह। [संगीत] रख को इधर-उधर करके ओझल करो। तो कहानी ना कहानी उसका अस्तित्व है। ऐसे यह पांच भौतिक शरीर भ्रूण है। मां के गर्भ में बालक है। जन्म बड़ा हुआ। भरण से लेकर साहब है। सेठ है। इसका मौजूद है। मा गया तो मुर्दा। अब जल दिया तो क्या? और हड्डियों के रूप में शमशान में नीचे पड़ा है। नष्ट हो गया। नष्ट नहीं हुआ। परिवर्तन हुआ। बैक्टीरिया में जो चेतन कीड़े में मकोड़े में हाथी में कीड़ी में गुंजन। उपमात्मा का सत्य। सत्य तो है। उनके शरीर के अनुसार सब जगह। आनंद जो सुख। तो पीढ़ी को भी मिश्री खाने में सुख मिलता है। तो सुख का ऐसा सुख। परमात्मा की आनंद राय। नीचे इतना के कारण होता है। पत्नी को प्यार है। उनको भी जो सुखाभास होता है। तो वह सुपारी जैसे गोल पत्थर की पूजा नहीं करता है। [संगीत] वह सब में छुपी हुए सर्वलो के एक अनाथ क्षमता कर्म पद्मनाभन सुरेश धर्म गगन मेघवाल लक्ष्मीकांत योग विधानम वंदे विष्णु भवरणम। सर्वलो के एक तुम्हारे 500 के पत्थर की मूर्ति का पत्थर की पूजा नहीं करता। बहुत सर्व लोकन में जो व्याप्त है। उसे एक ईश्वर की पूजा कर रहा है। शालिग्राम की पूजा करता है। तभी भी सर्वलोक महेश्वर की पूजा करता है। वह गोल भगवान की पूजा करता है। उसमें भी व्यापक भगवान है। और लंबे भगवान की पूजा करता है। जगदंबा की। तो ऐसा नहीं की है लंबी मूर्ति अथवा अष्टभुजा तुम्हारे को में प्रणाम नहीं। अनंत ब्रह्मांड के रूप में मां के रूप में शालिग्राम के रूप में अथवा गणपति के रूप में। गम गणपतए नमः। बुद्धि इनको जो चेतन देता है। वह गणपति। तो हाथी रूप में जिसका मस्तक है। उसकी पूजा करता है। तो वह कोई हाथी की पूजा नहीं करता। हिंदू। लेकिन हाथी मस्तक धारी गानों का स्वामी। पीपल की पूजा करता है। तो किसी लकड़ी की या वृक्ष की पूजा नहीं करता। लेकिन वृक्ष में जो परमात्मा चेतन है। लक्ष्मी को भी प्रसन्नता का एहसास होता है। यह जगदीश बसु हिंदुस्तान के वैज्ञानिक ने खोज थे। बेईमान विज्ञान ए और अपना नाम लगाना चाहे। लेकिन आखिर सत्य प्रकट हुआ। और जगदीश बसु की खोज के पहले आपके ऋषियों की खोज। जगदीश महसूषण को पेड़ पर चढ़ रहे। तो मनिका बेटा अभी ना चढ़ पेड़ पे। उनको आराम करने डोलमा ये सोते हैं। मिले हां बेटे। ये जल और पृथ्वी के कान खाता भी हैं। रात्रि को सोते भी हैं। और अच्छे व्यक्ति मिलते तो प्रश्न भी होते हैं। और किसी पास वाले वृक्ष को कोई कैट के आए। तो यह उसको देखकर करोड़ व्यक्ति को जो पड़ोसी वृक्ष को काटा। तो उसको देखकर घबराते भी हैं। और जो शिनचैन वाला आता है। तो उसको देखकर प्रश्न भी होते। तो मां ने कहा। जो दे हाथों में माताएं रहती थी। कथाएं सुनकर बच्चों को कहा। वह अभी जख्म मार के विज्ञानियों को प्रयोग करके। उस बात पर आना पड़ता है। तो हिंदू जब सावित्री बाई की पूजा करता है। तुलसी की पूजा करता है। तो एक पौधे की पूजा नहीं करता है। उसे एक पौधे में जो सत्य आनंद छुपा है। वह विश्वविद्यालय की पूजा करता है। मां भगवान। और जितनी पत्तियों की पत्तियां है। वह लक्ष्मी होगा पति सचमुच में नारायण रूप है। और बच्चे गोपाल गोविंद गोपाल ग्रुप। क्योंकि वो गोविंद गोपाल सच्चिदानंद परमेश्वर। बच्चे में भी आनंद स्वभाव को लिए हुए। ग्रह लक्ष्मी में भी वही छुपा है। स्त्री लक्ष्मी हनुमान भगवान कृष्णा भगवान माता भगवान पिता भगवान। अरे भैया अगर एक आकृति को भगवान मैन। तो उतना ही भगवान र जाएगा। फिर भगवान की सर्व व्यापकता सत्ता और चेतनता मनुष्य को कैसे पता चलेगा। अगर एक ही रूप वाला एक ही आकृति वाला कोई भगवान हो। तो उसके शिवाय का अब भगवान हो जाएगा। असत जड़ दुखहरो हो जाएगा। लेकिन सब में सब चित आनंद स्वरूप छुपा है। सबकी गहराई में सत्ता छुपी है। हमारा वेदांत दर्शन और हमारा दर्शन शास्त्र और वेद। तो आपके रेती के डेन में भी पत्थर के थेली में भी सच्चिदानंद के अस्तित्व को स्वीकार करता है। उसमें भी समय प्रकार परिवर्तन होता है। तो परमात्मा की कर [संगीत] अवस्थाओं में पहाड़ों में सच्चिदानंद की सत्ता। घनश्याम वृक्षों में परमात्मा की सत्ता। [संगीत] और चौथ होते हैं। जो सच्चिदानंद को ठीक से जान गए। उनकी वह परमात्मा की जागृत अवस्था होती है। तो पत्थर पहाड़ों की घनशूति। इसलिए पत्थर में भी परमात्मा को पूजन। वो वहीं से परमात्मा को प्रकट कर सकता है। घनशूति में है। जैसे दिया सलाई में अग्नि चुप है। लकड़ी में अग्नि छुपी है। संयुक्त मिलते ही प्रकट हो सकती है। ऐसे ही पत्थर में भी सच्चिदानंद की मौजूदगी है। चेतन की और जीवो में वृक्ष आदि में शिवा शक्ति। मनुष्य आदि में स्वप्नवस्था। तो बचपन आपका सपना की नहीं बादल गया। अभी आप महसूस करोगे। बचपन के दुख सुख समय महत्व लगता थे। अभी स्वप्न हो गया। लेकिन अभी का फिर सपना नहीं लगता। क्योंकि आप अपने आत्मा में नहीं जागे। तो स्वप्न से स्वप्नांतर हो रहा है। जब सत्संग सुने साधन करें। और परमात्मा के पूरे स्वरूप को जन की तड़प और महापुरुष की कृपा हो। तब आप परमात्मा के उस जागृत स्वभाव को समझ लेंगे। तुम हिंदू जब पूजा करता है। तो वह यह किसी पत्थर की या मूर्ति की यहां पेड़-पौधे की या माता के शरीर की या पिता के शरीर की सीमा में नहीं बंद जाता है। पिता भागवत स्वरूप है। माता जगदंबा शुरू है। बच्चे बाल गोपाल। और जहां जहां उसकी भावना और श्रद्धा धरण हुई माही। वहां वो परमात्मा के आनंद स्वभाव को अपने में प्रकट करने में सफल हो जाता है। चेतन स्वभाव तो है। कीड़ी में भी चेतन है। तो जो सत्य है उसका अस्तित्व सदा है। जो चेतन है उसमें ज्ञान है। तो कीड़ी में भी ज्ञान है। की यह शक्कर है और यह मक्का कंकर है। यहां से भाग चल रही है। हमारे बिल में बच्चे पढ़े कहानी दूर एन जाए। छोटे से छोटा अगर ब्रह्मांड में कोई चीज है। तो भगवान ईश्वर से बढ़कर कोई छोटा नहीं। अनुरोध और बड़े से बड़ा भी ईश्वर है। महत्व दिखती है। बैक्टीरिया को भी अनुकूल वातावरण में मजा आता है। और बैक्टीरिया का भी शरीर जो भी है। छोटा मोटा होम बैक्टीरिया। [संगीत] कंगन है। कुंडल है। अंगूठी है। चैन है। पता है। बाकी नाम के आधार पर रखें गए। सुंदर देखा है। तो सोनी को देखा है। एक को हुआ की चलो भगवान की दया हुई। तेल में कमाई हुई है। चलो ठाकुर जी की मूर्ति सोनी की बना ले। और तेल में ए गई। तेजी महाराज तो बोले राम जी की मूर्ति तो ले हैं। लेकिन सेवक के बिना स्वामी की मूर्ति। तो चलो सरकार का सेवक भी ले आया। तो हनुमान जी को भी ले आए। आप कुछ तेजी मंडी में घाट पद गया। तो राम जी को भी उठाया। और हनुमान जी को भी उठाया। रखा थैली में बेचे गया। हनुमान जी के तो आपको हम 8000 दे सकते। राम जी के 2000 मिलेंगे। [संगीत] शास्त्रों की और धर्म की नजर है। उसे पर ब्रह्म परमात्मा। तो सभी को परब्रह्म परमात्मा का सत्ता का चेतनता का अनांदता का ज्ञान हो। इसीलिए सारे कर्मकांड विधि-विधान है। बच्चे के पूज्य संस्कार से लेकर घर में बचाएं तब से लेकर मृत्यु के सोल में संस्कार तक। हमारे व्यवस्था ही है। कि आपके अंदर छुपी हुए परमात्मा के सत्यता को चेतनता को आनंद को प्रकार आप निदुख हो जैन। [संगीत] रसमय हो जाए। सुखमय हो जाए। आनंदमय हो जाए। वैसे भी कीर्तन के पहले हम लोगों ने थोड़ा मृत्यु जैसा किया। तो क्या है कि हमारे पैरों में और हमारे हाथों में सारे शरीर की नदियों का स्विच। थोड़ा बहुत नृत्य करने से इसमें स्वास्थ्य। उन न्यूरॉन्स को पुष्ट करने वाली सुषमा नदी। जितना सजक रहेगी। उतने वी न्यूरो से सजग होंगे। एक एक न्यूरो से एक-एक ग्रह नक्षत्र कर सकता है। रिमोट कंट्रोल की नहीं। उनसे कम करवा सकता है। इतनी उनमें ताकत। इतनी छोटे इतना सा है। और दुनिया के हर घर और ऑफिस में उसकी रिंग चमत्कार दिखा देती है। तो इस सेल्यूलर की खोज भी तो तुम्हारे सोनी दिमाग नहीं की पैदा करने वाला को पैदा करने वाला। मनुष्य का मस्तक बड़ा। मनुष्य के मस्त के पीछे जो चेतन सत्य आनंद की कम कर रही हो बड़ी। तो बस उसे तक पहुंचने की व्यवस्था का नाम है। भारत के संस्कृति सामग्र ज्ञान। भारत हुआ सच्चिदानंद रुपए विश्व उत्पत्ति आदि है। तभी [संगीत] श्री कृष्णा। [संगीत] ये भागवत के पहले स्कंध में मंगलाचरण के वक्त आता। फिर भी मंगलाचरण में क्या-क्या हम किसका पूजन करते हैं। सच्चिदानंद रुपए जो सत्य है। चेतन है और आनंद रूप है। श्री कृष्णा रूप आए नहीं। सच्चिदानंद रुपए। वह सच्चिदानंद कैसे हैं। जगत की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय के करण। तो उनको हम क्यों प्रणाम करते। किताबें में संसार तप रहा है। उन टेपों से हम मुक्ति चने के लिए परमात्मा को प्रणाम करते हैं। विनाश आया। श्री कृष्णा। [संगीत] तो कौन से कृष्णा है। कि जो सत्य आनंद है। कृष्णा का वास्तविक श्री कृष्णा नंद यशोदा के घर आए। वासुदेव देवकी के घर आए। उसके पर उसके बाद में हम लोग कृष्णा करते हैं। ऐसी बात नहीं। श्री कृष्णा प्रेक्टे। उसके पहले वेदों में कृष्णा शब्द की महिमा है। जो सबको कष्ट करते आकर्षित कर दे। आनंदित कर दे। उसे कृष्णा कहते हैं। तो वही सच्चिदानंद सबको आकर्षित करते हैं। सबको आनंदित करते हैं। और सब के कर्मों के नियामक है। और प्रेरणादाता है। और फल देता है। आप चुप कर भी कुछ निर्दोष पक्षियों को पड़कर कमरे में ले जाओ। अथवा कीड़े मकोड़ों और कोई नहीं देखा। कीड़े मकोड़े आप पर कोई कैसे भी नहीं कर शक्ति। और कन्ना कौन देता है। और कोई नहीं देखें। और उनको आपने कुछ खाने की मधुर वास्तु दी। तो हृदय में शांति प्रसन्नता अच्छाई का फल कौन देता है। वही सच्चिदानंद देता है। तो हिंदू की पूजा में मूर्ति पूजा को को जो बेवकूफ मानते हैं। अथवा अनेक देवता वो माने वाले हिंदू लोग ऐसे हैं। वैसे हैं। उन विचारों को पता ही नहीं की तुम्हारा तो क्या। तुम्हारे पुरखा का भी जन्म नहीं हुआ था। उनके पहले तुम्हारे कलर का जन्म नहीं हुआ था। उनके पहले ही हिंदुओं ने जड़ में से भी भगवान को प्रकट किया। और चेतन गुरु में से और माता पिता में से भी ईश्वर के आशीर्वाद को बातचीत को प्रकट किया। यहां तक की ऋषभ से भी ईश्वर के प्रगति का वर्णन आता है। उपनिषदों में शिष्य ने प्रार्थना की गुरुदेव मुझे भगवान का दर्शन करना है। जो सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति पर लेख करण है। मुझे ब्रह्म ज्ञान हो जाए। तब आना। तो तुमको परमात्मा प्रताप हो का वचन। जब 1000 गायों से भी एक ध ज्यादा हो गई। तो ऋषभ बछड़ा हो गई। जिसको तुम खोजने हो वही मैं बोल रहा। उपदेश दीजिए। तो ब्रह्मा के प्रथम पद का उपदेश। उसे ऋषभ के द्वारा सच्चिदानंद प्रभु ने दिया। बेल के द्वारा। [संगीत] प्रतिज्ञा। प्रतिज्ञा। [संगीत] अपने आश्रमों में गौशाला की गे घूमने का मैंने का दिया घूमती है। वाटिका में भी घूमती है। यहां भी हालात। यहां तो कोई भूत प्रेत नहीं। फिर भी गायों के शरीर से जो गोरा निकलते है। वह सूर्य के गोत्र का प्रभाव वातावरण बिखरता है। टीवी के परमाणु नहीं र सकते। अशुद्ध भाषण को शुद्ध करने के लिए गे का घूमने और गे का होना बहुत अच्छा है। और शुद्ध है तो और शुद्ध होता है। वह सच्चिदानंद परमात्मा है। विश्व की उत्पत्ति स्थिति और पार्ले का करण। जैसे गनो की स्थिति और गनो की शोभा और गनो का करण सोना है। ऐसे सृष्टि की उत्पत्ति सृष्टि का स्थिति और सृष्टि के ले का करण। वह सच्चिदानंद परमात्मा है। कृष्णानंद और कृष्णा रूप में भी प्रकट हुए। उसको हम नमन करते हैं। ऐसे राम नाम दशरथ नंदन राम आए। उसके बाद हम राम राम जपते हैं। ऐसी बात नहीं है। राजा दशरथ और उनके पिता और उनके पिता के पिता दिलीप राजा और रघु राजा भी राम राम जब थे। राम का मतलब क्या है। की जो रोम रोम में राम रहा है। साछिड़क संस्कृति भारतीय संस्कृति तो भाई दुनिया के कई मजहब और कई ईश्वर के पुत्र और खुदा के पैगंबर आए और चले गए। उसके पहले की नहीं आए थे। तभी की संस्कृति है। तो इस संस्कृति के लिए यह कहां पर है। मूर्ति पूजा है। कि ऐसे हैं। इस प्रकार दोष दर्शन नहीं करना चाहिए। आप जो पूछते हैं। आप भले मजार को पूछते। लेकिन वहां भी सच्चिदानंद छुपा है। हाफ कर को पूछते हैं। वहां भी सच्चिदानंद छुपा है। आप गॉड को पूछते हैं। वहां भी सच्चिदानंद छुपा है। और हिंदू मूर्ति को पूछता है। वहां भी सच्चिदानंद छुपा है। फिर संकीर्णता करके किसी को मूर्ख और बेवकूफ मानकर मनुष्य मनुष्य में मनुष्यता पैदा करने की क्या जरूरत है। तुझे राम मुझमें राम सब में राम समय है। कर लो सभी से स्नेहा। जगत में कोई नहीं पराया है। सब अपनी-अपनी बोले। बेटा ऐसा है। पड़ोसी ऐसा ही ऐसा है। भाई स्वस्थ अपनी अपनी प्रकृति से सब चलते रहते। अपने-अपने ज्ञान साक्षात्कार होने के बाद भी सच्चिदानंद का दर्शन करने के बाद भी ज्ञानियों की भी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा तो जो साक्षात्कार सच्चिदानंद का सुखदेव जी को हुआ है। इतने मस्त की फिर जगत की सुदी नहीं। और दूसरे राजा जनक इतना की जगत का राजकाज कर रहे हैं। शुक्र त्यागी कृष्णा भोगी कृष्णा तो द्वारका करेंगे। संध्या का समय हुआ। आत्मा साक्षात्कार हो जाए। फिर भी ज्ञानी प्रकृति के अनुसार देते हैं। तो जरूरी नहीं की बेटा आपके प्रकृति के अनुसार जिए। पत्नी आपके अनुसार ही चले। पति आपके अनुसार ही चले। चलते तो अच्छा है। एन चले चलते हैं तो ए शक्ति हो। इसीलिए आप तो इस संसार को अनाड़ी कल से चला रहा है। सब्जियां की अपनी-अपनी प्रकृति है। स्वास्थ्य प्रकृति प्रेरित ना सही। मजार ज्ञानी महापुरुष अब मेरे गुरुदेव रखते। संसार है खून पसीना भट्ट जतन के चादर सता जा। ये नव तो हिलती जाएगी। तू रास्ता जाएगा। तो ऐसी बटन को कभी याद ना करो। जिससे दुख और बेईमान से पैदा करें। ऐसा है मेरा ये हो गया। इसी का नाम तो दुनिया है। कभी अनुकूल होगा। कभी कम थी। उन्होंने की गहराई में जो सच्चिदानंद बैठा है। उसका ठीक लेकिन इसके भीतर जो सोना है। उसे पर नजर। छोटा तरंग यह जहां गए बुलबुले। लेकिन सब पानी का ही खेल है। ऐसे सब मेरे सच्चिदानंद का खेल है। तो मां जल्दी ब्रह्मा परमात्मा में आएगा। वहां सच्चिदानंद का ज्ञान रख दो। समाधान क्या कर हम भजन करते हैं। वहां प्रभु राम कैसे लोग हैं। मैं तो भजन करती हूं। लेकिन तुझे ही खोज रहे। और मैं माला घूमर सात्विक सुख लेना चाहता हूं। तुझे ही राम है। तो टीवी का विक्षेप भी भक्ति में बादल सकता है। वह टीवी चला कर भी तुझे खोज रहे आनंद को। और मैं माला घुमा कर भी तुझे खोज रहा। वह खोजने खोजने नीचे जा रहा है। और मैं खोजने खोजने तेरे तरफ ए रहा हूं। तेरी कृपा हमारे यहां तो बेवकूफ नाम भी भगवान का रखा गया। विष्णु सहस्त्रनाम में आया आजा भगवान है। अवतार में भी भगवान को शिवा जी के मंदिर में जो तो बेल मिलता है। पशुपति पशुओं में भी वह सच्चिदानंद जीव जंतुओं में मत्स्य होता है। नरसी अवतार नंद गोपाल का बाल गोपाल। एक संध्या को नामदेव जी जा रहे थे। कोई बड़ी इमली का पेड़ था। उसमें भूतड़ा राहत है। [संगीत] लेकिन नामदेव ज्ञान देव गोरा कुंभार आदि यात्रा करके जब शाम होती तो अलग-अलग अपना छोटा लगा देते और भजन बनाते। कई यात्री अपनी जगह तो सूर्यास्त का पहले भजन बन जाए। भगवान को भोग लगा के आरती के समय खाना है। तो वहां कोई गांव के नजदीक डाटा डाला। तो कोई कल कुत्ता है। कल कुत्ता ए गया। बाद में आना। यह श्याम मेरा श्याम। इस रूप में आया। और रुक जा गी के बिना खाएगा तो पेट में दुखेगा। रोटी मेरी कौन रोटी खाओ मुरारी जीव धारी खोलें। बुड्ढे तो कैसे ए गया था मूर्ति में। तो उससे तुझे अच्छा नहीं लगा। तो इस रूप में आया। ठहर तो सही जरा सच्चिदानंद ने प्रणाम तो ऐसी संस्कृति वालों को भाई। यह जरासे गोल पत्थर को पूज रहे। यह तो हनुमान को पूछ रहे। बंदर वाले चेहरे को। यह तुम हाथी वाले सर को पूज रहे। बेवकूफ है। सबकी चेतनता भी सब मिले। लेकिन वो तीसरा गन जो आनंद है। इस के लिए सारे खोज रहे। जब आनंद मिलता है तो अच्छा लगता है। लेकिन आनंद मिलता है तो बाहर की चीजों से मिलता है। फिर बादल जाता है। तो यह करके आनंद मिला। जितनी देर मजा ए रहा। फिर दूसरी जगह जाएंगे। सोते-सोते ठीक लगता है। तो करवट बदलते। तो बीबी आनंद के लिए झगड़ा करते। तो भी आनंद के लिए। और मट्ठा जो कहते। तो भी सुख के लिए। डायवर्स देते। तो भी सुख के लिए। कि पत्नी कहना नहीं मानती। पति ऐसे हैं। चलो मैं दूसरा करूं। वह भी सुख के लिए। लेकिन यह खोज गलत है। पत्नी बदलने से पति बदलने से शुभ टिकाऊ सुख नहीं मिलता है। अपने समझ बदलने से टिकाऊ सुख को खोज कर वहां गोटा करने से टिकाऊ सुख की प्रताप हो जाती है। मां तू ज्योति स्वरूप अपना मूल विचार तो ज्ञान स्वरूप है। तो जानता है। सुख आता है। उसको भी जानता है। दुखता है। उसको भी जानता है। और बड़ा है। उसको भी जानता है। बनाया उसको भी जानता है। तो तू चेतन स्वरूप है। जो चेतन है वही आनंद है। पत्थर की मूर्ति को कोई स्वाद आएगा क्या। रॉबर्ट को कोई स्वाद आएगा क्या। बाबू के दर्शन नहीं है। लेकिन वह मनुष्य में तो स्वप्नवस्था में चेतन है। तो मनुष्य तो चेतन के एकदम करीब। पत्थर में भी परमात्मा की है। तो पत्थर की मूर्ति में अगर कोई भागवत बुद्धि करता है। उसके भागवत भावना यहां स्वप्नवस्था में जो चेतन है। वहां तो पत्थर की मूर्ति डर से भी और आप आकर्षित कर सकती है। चल सकती है। दूध पी सकती है। मेरी मां कोई किसी का कोई बेटा को गया हो। कोई खाने को गए हो। कोई मुसीबत ए गई। तो मेरी मां के पास आते हैं। वह क्या करती यह रख लेकर थोड़ा धरती पर लिप दे दे। कोई बाहर चले गया है। पड़ोसी ले गया है। समाज मिलेगा नहीं मिलेगा। मिले तो बड़ी बधाई। सिद्धपुर में एक आदमी होता था। रोड के पास हम पहले वहां रहते थे। कोई छोड़ दिया था। वहां के लोगों अभी यह देने का विचार है। कोई मिल जाए। पास में हम जा रहे थे। थोड़े दूरी तक किसी खेत में। उसे भी माता का ढूंढने वाला हुआ था। तो हमारे कुआं के देखें। सच्चाई है कि तुम्हारे पास दिशा का कोई भगत है। शादीशुदा था। तो हम जरा आपस में सेटिंग करके गए हुआ तो ढूंढ चुका था। अरे की आसाराम महाराज दिशा का गर्भवती। [संगीत] [संगीत] यह लड़का मारा है। तो बोले ना पड़ोसी ने उसे करो। उसे पर माता न्यू वचन खाली ना जा ले। दूर्तता का आधार लेते। जैसे हमने मजाक हूं। तो पंख का अपना प्रभाव है। लेकिन अंक घूमर टुना टोटका करके किसी को इंप्रेस करके कुछ छीना या फिर नुकसान भी उतना ही करता है। तो सच्चिदानंद और आप सच्चाई से उन चीजों का उपयोग करो। तो सफलता भी होती है। जैसे ठीक हो रहा। और चम्मच और मेरी मां को कुछ लेना नहीं होता था। तो उसका सच्चा करता था। सच्चाई नहीं आई। [संगीत] जब स्वार्थ हो जाए। क्या यह आए और अपने को कुछ मिले। तो फिर वह सच्चिदानंद का आनंद और सत्संग का वो प्रभाव नहीं र सकता। जो अभी है। तो सत्संग में अगर कुछ प्रभाव है। या अच्छाई है। या आपकी भलाई होती है। तो इसमें मेरा कुछ नहीं है। इस सच्चिदानंद रुपए सच्चिदानंद रूप विश्व उत्पत्ति आदि है। तभी जो सच्चिदानंद स्वरूप है। विश्व की उत्पत्ति स्थिति और पर लाइका जो वही परमात्मा की साड़ी। तो जो कुछ अच्छा होता है। भला होता है। इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है। उसे परमात्मा की विशेषता है। और कहानी गड़बड़ होती। तो उसमें मेरी ही गड़बड़ी ए जाता है। तो आपसे अन्य तो होगा तब होगा। मैं अपने से अन्य शुरू कर दूंगा। और जब मैं सच्चाई से चला हूं। तो आपका भला होगा। तब होगा। मेरा पहले वाला हो जाता है। तो गांधीजी क्यों सफल हुए। कि सच्चाई का हंस रहे थे। सच्चिदानंद के करीब। दूसरे लोग गांधीजी से भी ज्यादा। उस समय के प्रसिद्ध लोग। कौन सी खाई में खाप गए। क्योंकि बुद्धिमान तो वकील रहे होंगे। उस समय भी। लेकिन उन विचारों को सच्चिदानंद की इतनी महत नहीं जानते होगी। आप जितना भी सच्चिदानंद को ईश्वर को हाजिर हजूर मानते हैं। या उसको अपने के लिए जितनी सच्चाई से व्यवहार करते उतरेंगे। आपका मंगल होता है। निकट हो जाते हैं। और अपनी गांधी इच्छाएं वासना इसको इतने मिलियन होगा। तो मैं भी कमाओ। मैं भी करूं। तो ऐसे नहीं बुरे लोगों की नकल करेगा। तो पाटन होना पक्का है। और महापुरुषों की बुद्ध पुरुषों की भक्तों की और ज्ञानियों की नकल करेगा। तो बेड़ा पर होना पक्का है। [संगीत] तो कैसे ग गए शबरी बेलन ने मातंग ऋषि का गुरु मंत्र लिया। आप कैसी ग गई। तो उसे अनुकरण करोगे। तो आप ऊंचे उठो जी। लेकिन दूसरे लोग को कानून करो करोगे। तो वैसे भी। इसीलिए जब सत्संग में आते हैं। साधना के तो लगता है कि यह सच्चा है। लेकिन जब नाइजर लोगों के बीच लगता हैं। तो पुराने संस्कार में फिर फिसलने में भी डर नहीं होती। इसलिए सावधान रहना चाहिए। [संगीत]