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Ek Larki Aakhir Bandar Kay Bachy ki Maa Kesy Bani | Islamic Moral Story | Stories Forever

Stories Forever21:28

Transcription

एक लड़की जो तनहा थी, उसने एक बंदर को अपने घर में जगह दी। उसका नाम मोनी रखा। उसे बातें की। उसे दोस्त बनाया। मगर एक दिन बंदर ने लड़की के साथ कुछ ऐसा किया कि चंद महीने बाद लड़की के पेट में एक बच्चा पलने लगा।

गांव वाले हंसे, ताने दिए। मगर उसके पास कोई जवाब ना था। क्योंकि उसने कभी किसी इंसान को छुआ तक ना था। क्या यह वाकई बंदर का बच्चा था? इसका राज जानने के लिए पूरी कहानी सुने।

यह दास्तान चंद्रपुर के एक खामोश मगर पुरसरार गांव की है। जहां हर साया एक राज छुपाए हुए था। जहां ना शहर की चमक थी ना जिंदगी की रफ्तार। पहाड़ियों के दामन में बसा यह गांव हरियाली से ढक्का कुदरती खामोशी में लिपटा हुआ था।

इसी गांव के कोने में एक झोपड़ी थी। जहां रहती थी महक। एक सादा दिल, तन्हा और खामोश लड़की। उसकी दुनिया बस उसके अंगूरों का बाग था जो उसके मां-बाप के मरने के बाद उसे विरासत में मिला था। वो तनहाई की आदि हो चुकी थी। ना सहेलियां, ना कोई रिश्ता, ना दिल बहलाने वाला।

हर सुबह वो सूरज निकलने से पहले बाग में जाती। अपने नाजुक हाथों से अंगूर तोड़ती, और फिर बाजार जाकर उन्हें बेचती। महक के बारे में गांव में एक ही बात मशहूर थी। वो अंगूरों वाली लड़की है। हमेशा अकेली रहती है। मगर उसके अंगूर बहुत मीठे होते हैं।

एक दिन जब महक बाग में मामूल के मुताबिक अंगूर तोड़ रही थी। धूप हल्की-हल्की दरख्तों की शाखों को छूकर जमीन पर पड़ रही थी। परिंदे चहचहा रहे थे और महक अपने ख्यालों में गुम थी। उसके चेहरे पर थकन और खामोशी के साए थे। जैसे कोई बहुत बड़ी बात उसके दिल में दबी हो।

अचानक उसकी नजर एक बंदर पर पड़ी। वो आम बंदरों जैसा नहीं था। ना शरारती ना शोर मचाने वाला। वो पुरसकून बैठा। महक को देख रहा था। उसकी आंखों में अजब सी मासूमियत थी। महक चौंकी। पहले पहल तो घबरा गई। जल्दी से एक सूखी लकड़ी उठाई और बुलंद आवाज में बोली। चले जाओ। मेरा बाघ बर्बाद मत करो।

लेकिन बंदर वहीं बैठा रहा। उसकी आंखों में खौफ नहीं, दर्द छुपा था। महक उसकी तरफ बढ़ी लेकिन जैसे-जैसे करीब गई, उसकी हिम्मत कम होती गई। बंदर ने कोई हरकत ना की। बस आंखें झुका ली। कुछ पल महक खामोश रही। फिर आहिस्तगी से बोली, ठीक है। मगर नुकसान मत करना।

उस दिन वो बंदर नहीं भागा। वो उस जगह से उठा और एक कोने में बैठ गया और महक अपनी टकरियां भरती रही। अगले दिन जब वो बाक में वापस आई, वही बंदर उसी जगह बैठा था। अबकी बार वह हैरान हुई मगर डरी नहीं। तुम फिर आ गए। बंदर ने इस बार सर हिलाया।

महक के होठों पर हल्की सी मुस्कान आई। उसने अपने हाथों में थोड़े से अंगूर रखे और आहिस्ता से बंदर के पास रख दिए। बंदर ने चुपचाप अंगूर ले लिए और खाने लगा। फिर दिन गुजरते गए। हर रोज महक आती, बाग में काम करती और बंदर भी वहीं होता। वो शरारती नहीं था। वो मदद करता शाखों से अंगूर तोड़कर नीचे गिराता और बाज औकात महक के सामने हाथ फैलाए बैठ जाता। जैसे कहता हो आज का इनाम कहां है?

महक को उस बंदर की आदत हो गई थी। वो अब उससे बातें करने लगी थी जैसे वो उसे समझता हो। काश मेरी अम्मी होती। वो भी तुम जैसी खामोश तबीयत थी। बंदर सब कुछ सुनता रहता और अपनी आंखों से जवाब देता। कभी हल्का सा सर हिलाता, कभी ठंडी सांस लेता। महक को उसके साथ सुकून मिलने लगा।

कुछ हफ्तों बाद एक दिन बारिश शुरू हो गई। महक भागती हुई झोपड़ी की तरफ जा रही थी कि उसने पीछे मुड़कर देखा। बंदर अभी भी बाग में था। वो तन्हा भीग रहा था। वो लम्हा महक के दिल को चीर गया। वो दौड़ती हुई पलटी और बंदर के पास आई। तुम क्यों नहीं आए मेरे साथ?

बंदर ने नम आंखों से उसे देखा जैसे उसके वजूद में कोई राज छुपा हो। महक ने उसका हाथ पकड़ा और बोली, चलो मेरे साथ घर चलो। तुम अकेले नहीं रहोगे अब। बंदर ने खामोशी से उसकी बात मान ली।

अब महक की झोपड़ी में तनहाई नहीं थी। वो बंदर अब उसके साथ रहता और एक कोने में बैठा रहता। और रात को महक के किस्से सुनता। वो अब उसे मोनी कहकर पुकारती। मोनी आ जाओ खाना तैयार है। मोनी चलो बाजार चलें। अंगूर बेचने हैं।

गांव वाले चौंकते कुछ हंसते कुछ सरगोशियां करते। यह लड़की पागल हो गई है। बंदर को घर ले आई है। मगर महक पर अब किसी बात का असर ना होता। वो अपनी दुनिया में खुश थी। जिसमें मोनी था, बागा था और दिल का सुकून था।

एक रात महक अपनी चारपाई पर लेटी हुई थी। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। अंदर मिट्टी का चिराग जल रहा था। मोनी कोने में बैठा उसे देख रहा था। उसकी नजरें नम थी जैसे उसके दिल में एक राज हो और वो उसे महक से छुपाना चाहता हो। महक की आंखें आहिस्ता-आहिस्ता बंद हो रही थी। वो बड़बड़ाई। तुम मेरे साथ रहोगे ना? हमेशा। बंदर ने आहिस्ता से सर हिला दिया। महक बेखबरी में नींद की आगोश में चली गई। मगर उस रात कुछ बदलने वाला था। कुछ ऐसा जो वक्त के पहहिए को मोड़ देगा।

चंद्रपुर की फिजा में खिजा की ठंडक घुल चुकी थी। सूरज की रोशनी मध्यम हो चुकी थी। दरख्तों के पत्ते जर्द होकर जमीन पर गिरने लगे थे और अंगूरों का मौसम भी रफ्तार रफ्ता खत्म हो रहा था। महक का जिस्म कुछ दिनों से टूट रहा था। उसके चेहरे पर कमजोरी छाई हुई थी। होठों पर वह मासूम सी मुस्कान भी अब शायद ही आती थी। पहलेपल तो उसने इसे आम थकान समझा लेकिन फिर नजला बुखार और नकाहत ने उसे बिस्तर पर गिरा दिया।

बंदर जिसे वो अब मोनी के नाम से बुलाती थी। हर पल उसके पास बैठा रहता। कभी उसके माथे पर गीला कपड़ा रखता। कभी पानी लाता और कभी महक के लिए बाजार से फल चुरा लाता। महक की सांसे धीमी हो चुकी थी। लेकिन दिल में सुकून था कि कोई है जो उसके करीब है। जिसने उसे कभी तना नहीं छोड़ा।

एक शाम जब आसमान पर बादल छा चुके थे। महक ने मोनी की तरफ कमजोर नजरों से देखा और थकी थकी आवाज में कहा मोनी अगर तू ना होता तो शायद मैं मर चुकी होती। मोनी ने उसके हाथों को थाम लिया। जैसे वो कुछ कहना चाहता हो, कुछ छुपाना चाहता हो।

चंद दिनों बाद महक की तबीयत बेहतर होने लगी। वह धीरे-धीरे दोबारा चलने फिरने लगी। उसने अपनी पुरानी आदतों को फिर से जिंदा किया। झोपड़ी की सफाई, बाघ का दौरा और मोनी के साथ लंबी बातें। एक रात जब आसमान पर चांद पूरी आबोताब से चमक रहा था। महक ने दरी बिछाकर आसमान को देखा और धीरे से मोनी को गले लगाते हुए कहा, "तुमने मेरी जिंदगी बदल दी है मोनी। कभी मत जाना। वादा करो।" मोनी ने आहिस्ता से उसके गाल पर हाथ रखा। उसकी नजरें कुछ और कह रही थी। महक जल्दी सो गई और उस रात उसकी नींद बहुत गहरी थी।

रात का पिछला पहर था। बाहर खामोशी का राज था। हवा भी थमी हुई थी। चिराग की लौह हल्की हो चुकी थी। महक गहरी नींद में थी। शायद किसी ख्वाब में या फिर किसी ऐसी हकीकत में जिसका उसे कोई इल्म ना था। मोनी उसके करीब आया। उसकी आंखों में कुछ बदला-बदला सा था। उसकी हरकात इंसानों से मिलती जुलती हो चुकी थी। उसने महक की पेशानी पर हाथ रखा और फिर कुछ ऐसा किया जिसका महक को एहसास तक ना हुआ।

सुबह महक की आंख खुली तो बदन थका हुआ था जैसे वो लंबी मुसाफत तय कर चुकी हो। उसने कुछ महसूस तो किया मगर इसे कोई खास अहमियत ना दी। उसका दिल फिर भी मुतम था। मोनी उसके पास था। वो तन्हा नहीं थी।

महीने गुजर गए। वक्त खामोशी से गुजरता गया। जैसे कोई गहरा राज बहता हुआ नीचे जा रहा हो। महक को अब कुछ अजीब सा महसूस होने लगा था। उसके जिस्म में तब्दीलियां आ रही थी। सुबह-सुबह मतली, कमजोरी और सीने में बेचैनी। पहले तो उसने समझा शायद दोबारा बीमारी आ गई है। फिर एक दिन वो अचानक बेहोश हो गई।

गांव के एक हकीम को बुलाया गया। वो पुराना और तजुर्बेकार तबीब था। उसने नब्ज़ चेक की। महक की हालत देखी और कुछ देर के बाद सन्नाटे में एक जुमला कहा तुम मां बनने वाली हो। महक के कानों में जैसे जलजला आ गया हो। क्या क्या कहा आपने? तबीब ने नरमी से कहा हां बेटी तुम हां मिला हो चार माह का वक्त गुजर चुका है।

महक की जुबान खुश हो गई सांस रुकने लगी वो हक लाकर बोली मगर मैं तो कभी किसी के करीब भी नहीं गई मैंने तो किसी को छुआ तक नहीं। तबीब खामोशी से उसे देखता रहा। और फिर सिर्फ इतना कहा। कभी-कभी तकदीर वो लिख देती है जो अकल भी ना समझे।

महक घंटों आईने में अपने आप को देखती रही। उसके हाथ बार-बार पेट पर जाते। आंखों में आंसू, दिल में जख्म और दिमाग में एक ही सवाल। यह बच्चा किसका है? उसने हर किसी पर शक किया। मगर फिर उसकी नजरें मोनी पर पड़ी। वो उसके सामने बैठा था। खामोश मासूम आंखों से उसे देखता। उसमें अब भी वही खामोश वफादारी थी। मगर महक की नजर में पहली बार शक था। क्या तुम वो? बड़बड़ाई? उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे। मोनी ने सर झुका लिया। उस पल महक को यूं लगा जैसे उसका दिल फट गया हो। वो चिल्ला उठी। तुमने मेरी इज्जत को धोखा दिया। तुम मेरे दोस्त थे। मेरे वाहिद साथी।

मोनी साकेत खड़ा रहा जैसे वो इंसान हो मगर जुबान बंद हो। महक ने चीख कर कहा निकल जाओ मेरे घर से। अभी के अभी। मोनी दरवाजे के पास गया। मुड़कर एक बार उसकी तरफ देखा और फिर बाहर चला गया। वो दरवाजे पर बैठकर रोता रहा। हर रात हर दिन। मगर महक ने दरवाजा ना खोला।

महक अब बजाहिर ठीक थी। वो बाहर जाती, अंगूर तोड़ती, बाजार में बेचती मगर अंदर से वो टूट चुकी थी। गांव वालों की नजरें बदलने लगी थी। कुछ पूछते, कुछ हंसते, कुछ चुपचाप तमाशा देखते। और मोनी वो अब दरख्तों में नहीं महक के दरवाजे के साए में बैठा नजर आता था। एक खामोश गवाह, एक लालाज पछतावा और एक अनकही मोहब्बत। दुनिया में कुछ जख्म ऐसे भी होते हैं जो जिस्म पर नहीं रूह पर लगते हैं। और महक की रूह अब दिन-ब दिन बोझल होती जा रही थी।

चार माह की हामिला महक जब गांव की गलियों से गुजरती तो लोग सरगोशियां करते, हंसते, उंगलियां उठाते। जिन आंखों ने कभी उसके अंगूर खरीदे थे। वही अब उसकी इज्जत का सौदा कर रही थी।

गांव के चौराहे में एक दिन चंद औरतें आपस में बात कर रही थी। सुना तुमने वो अंगूर वाली महक मां बनने वाली है। हद है शादी के बिना बच्चा। यह गांव है या शहर। जरूर किसी ग्राहक के साथ चक्कर चल रहा था। दूसरी औरत हंसी। ग्राहक कौन? वो तो हमेशा अकेली रहती थी। शायद कोई जिन या साया। वो हंसी और बाकी औरतें भी कहके मारने लगी।

कुछ मर्द तो खुलेआम आवाजें लगाते। अरे महक बता दो ना यह बच्चा किसका है। हमें भी तो मालूम हो। हम भी अंगूर खरीदेंगे। अगर फ्री ऑफर के साथ कुछ और भी मिले तो। यह जुमले महक के दिल में तीर बनकर चुभते थे। उसने अपने घर का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। मगर बदजबानियां दीवारों को चीर कर आती।

महक आईने में खुद को देखती। अपना उभरता पेट देखती और आंखों से खामोश आंसू बहते। वो खुद से सवाल करती। क्या मैं गलत हूं? क्या वाकई में बदचलन हूं? क्या मैं अब किसी की इज्जत के काबिल नहीं? वो जवाब ढूंढती मगर खामोशी के सिवा कुछ ना मिलता।

अक्सर रातों में वो अपने झोपड़ी के कोने में बैठकर दरवाजे को देखती। जहां मोनी अब भी रोज आता बैठता और घंटों उसे देखता। वो अब ना उछलता था। ना हंसता ना महक के इर्द-गिर्द घूमता था। वो बस सर झुकाए खामोश बैठा रहता। महक उसे देखती और दिल में तूफान बरपा हो जाता। एक दिन उसने हिम्मत करके दरवाजे के पास जाकर पूछा क्या तुमने मेरे साथ वो किया जो नहीं करना चाहिए था?

मोनी ने कुछ ना कहा। उसने बस धीरे से आंखें बंद की और सर झुका लिया। यही काफी था महक के लिए। महक के अंदर जैसे आतिश फशा फट गया। निकल जाओ निकल जाओ मेरी जिंदगी से। तुमने मुझे तबाह कर दिया। तुमने मेरी इज्जत को मिट्टी में मिला दिया।

मुनी ने कुछ ना कहा। वो खामोशी से पीछे हटा और आंगन के कोने में बैठ गया। महक ने उस पर पानी फेंका, छड़ी से मारा। यहां तक कि वो झोपड़ी से बाहर निकल गया। मगर वो अगले ही दिन वापस आ गया। फिर अगले दिन और अगले दिन भी रोज वो दरवाजे पर आकर बैठता और रोज महक उस पर चिल्लाती। मगर दरवाजा ना खोलती।

गांव की पंचायत में इस बात का भी जिक्र हुआ। मौलवी, नंबरदार और बुजुर्ग मर्द बैठे और फैसले करने लगे। यह लड़की हमारे गांव की इज्जत खराब कर रही है। बिना शादी, बेनाम बच्चा। हम कैसे बर्दाश्त करें? इसे गांव से निकाल देना चाहिए। महक को पैगाम दिया गया कि अगर वह बच्चे के बाप का नाम नहीं बताएगी तो उसे गांव से निकाल दिया जाएगा।

महक खामोश रही। घर से बाहर सिर्फ कुछ औरतें ही उसे देखने आती थी। और वह भी तरस या तजसुस की नजरों से। एक औरत ने आकर कहा, अगर तू किसी मर्द का नाम ले लेती तो कम अज कम बच्चा हलाल हो जाता। महक की आंखों में आंसू थे। मैं झूठ नहीं बोल सकती। मुझे नहीं मालूम। बस इतना जानती हूं कि जो हुआ मेरी समझ से बाहर था।

दूसरी तरफ मोनी भी खामोश अज़यत में मुब्तला था। वो खाता ना पीता। बस झोपड़ी के सामने बैठा रहता। उसके बाल झड़ने लगे। आंखें अंदर धंस गई और वह अब एक कमजोर साया लगने लगा था। कभी-कभी वह महक की तरफ देखता जैसे कहना चाहता हो। मुझे माफ कर दो।

महक की आंखों में भी दर्द था मगर उसे समझ नहीं आता था कि क्या वो किसी हैवान से प्यार कर बैठी है या फिर क्या वो कोई धोखा था। वक्त गुजर रहा था और महक की उम्मीदें भी कमजोर होती जा रही थी। उसने सोचा काश मेरे मां-बाप जिंदा होते तो मैं यह सब उनसे बांट सकती। काश यह सब एक ख्वाब होता और आंख खुलते ही सब खत्म हो जाता। मगर हकीकत यह थी कि उसके जिस्म में एक नई जान परवान चढ़ रही थी और बाहर दुनिया उसे रुसवाई कह रही थी।

महकब एक नई दुनिया में दाखिल हो चुकी थी। एक ऐसी दुनिया जहां उसके आसपास सिर्फ सवाल थे। जवाब नहीं सिर्फ जख्म थे। मरहम नहीं और सिर्फ साएं थे। रोशनी नहीं। मौनी अब भी दरवाजे पर रोज आता था। खामोश टूटा हुआ। लेकिन महक का दिल अब बंद हो चुका था। मगर सच की राहें दूर जरूर होती हैं। लेकिन कभी बंद नहीं होती।

दिन ढल चुका था। शाम की खामोशी गांव पर उतर रही थी। महक झोपड़ी में खामोश बैठी थी। हाथ पेट पर रखे। आंखों में वही सवाल जो हर रोज उठता था। मगर जवाब ना देता। दरवाजे पर आहट हुई। महक ने नजर उठाई। वो समझ गई कि फिर वहीं आया है। मोनी जो अब रोज ना कुछ खाता ना बोलता। बस आकर बैठ जाता। आंखों से इल्तजा करता। महक अब उसे नजरअंदाज करती थी। मगर दिल के किसी कोने में एक अनजाने डर ने जगह बना ली थी। क्या वो वाकई मामूली जानवर था?

उसी रात गांव में एक अजनबी मौलवी का आना हुआ। वो एक बुजुर्ग खामोश तबीयत इंसान था जिसके चेहरे पर हिकमत के आसार झलकते थे। मौलवी सीधा महक की झोपड़ी के सामने आया और कहा बेटी मुझे तुमसे कुछ कहना है जो तुम्हारी तकदीर बदल सकता है। महक चौकी तो बुजुर्ग ने आहिस्तगी से कहा तुम जिस जानवर के साथ रहती थी वो जानवर नहीं एक लानतजादा इंसान था।

महक की आंखें फट गई। उसने सोचा यह किसी नई अफवाह का आगाज है। यह क्या कह रहे हैं आप? वो एक बंदर था। मौलवी ने सर झुकाया। नहीं बेटी बरसों पहले एक बदबख्त शहजादे ने जंगल की एक जादूगरनी का दिल तोड़ा था। बद्दुआ में उस जादूगरनी ने उसे बंदर बना दिया। और कहा कि जब तक कोई औरत उससे सच्चा ताल्लुक कायम नहीं करेगी। उसकी लानत नहीं टूटेगी। और वो औरत तुम बन गई महक।

मौलवी के अल्फाज़ महक के दिल में एक जलजला बनकर उतरे तो वो उस रात जो कुछ हुआ वो लानत तोड़ने का जरिया था। मौलवी ने हां में सर हिलाया। वो मुजरिम नहीं था। मजबूर था और शायद उसके दिल में मोहब्बत भी जन्म ले चुकी थी। तभी वह पलट कर रोज आता रहा।

महक की सांसे भारी हो गई। उसने दरवाजा खोला और उस तरफ देखा जहां मोनी हर रोज बैठा करता था। लेकिन आज वहां मोनी नहीं बल्कि एक खूबसूरत नौजवान खड़ा था। सफेद लिबास, सादा चेहरा, आंखों में नमी और लरजती आवाज। महक मैं वही हूं। वही जिसे तुमने मोनी कहा था। वही जिसे तुमने अपने घर में जगह दी। और दिल में भी मैं इंसान हूं। तुम्हारे सच और लम्स ने मुझे लानत से आजाद कर दिया।

महक साकित खड़ी रह गई। महक के लबों से बम मुश्किल अल्फाज निकले। तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद की। मेरी इज्जत को खाक में मिला दिया। और अब आकर कहते हो कि तुम मुझसे मोहब्बत करते हो। नौजवान ने जमीन पर घुटने टेक दिए। मैं जानता हूं कि तुम्हें अज़यत दी मगर जानबूझकर नहीं। मैं सिर्फ जिंदा रहने का एक मौका चाहता था। तुम वो वाहिद शख्स थी जिसने मुझे जानवर समझकर भी मोहब्बत दी। और अब जब मैं इंसान बन गया हूं। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।

अगली सुबह पूरा चंद्रपुर गांव हैरत में डूबा हुआ था। लोगों ने जब देखा कि महक के दरवाजे पर एक अजनबी खूबसूरत नौजवान खड़ा है। और वही महक जिसे कल तक रुसवा किया जा रहा था। आज उसके साथ सर उठाकर खड़ी है। तो हर जुबान बंद हो गई।

मौलवी ने गांव के मजमे में सबको बताया तुम सब ने जो समझा वो गलत था। जिसे तुम बंदर कहते रहे वो इंसान था। तुमने महक को गुनहगार समझा मगर वो तो किसी के मुकद्दर की रोशनी बनी। गांव की औरतें शर्मिंदा हो गई। मर्दों ने नजरें झुका ली। महक ने एक नजर उन सब पर डाली और कहा तुम सब ने मुझ पर जुल्म किया। मगर मैं किसी का हिसाब नहीं मांगती क्योंकि मेरी मोहब्बत वापस आ गई है।

चंद दिन बाद महक और वो नौजवान जिसका नाम अब जाहिद रखा गया का निकाह महक से हुआ। मौलवी ने निकाह पढ़ाया गांव वाले बतौर गवाह शामिल हुए वही लोग जो कल तक ताना देते थे आज महक के लिए दुआ मांग रहे थे। निकाह के बाद जाहिद ने महक का हाथ थामा और कहा तुमने मुझे आजादी दी मैं तुम्हें जिंदगी दूंगा। महक की आंखों में आंसू थे मगर उनमें अब दर्द नहीं खुशी छुपी भी थी।

कुछ महीने बाद महक ने एक खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया। गांव में पहली बार किसी गैर शादीशुदा मां के बच्चे को इतनी इज्जत मिली थी। बच्चा उस बंधन की निशानी था जिसमें मोहब्बत, कुर्बानी और माफी का रंग था। जाहिद रोज अंगूरों के बाग में काम करता। महक उसके साथ-साथ रहती। वो झोपड़ी अब भी वहीं थी। मगर उसमें अब तन्हाई नहीं मोहब्बत बसती थी।

शाम का वक्त था। सूरज की नारंजी रोशनी अंगूरों पर चमक रही थी। महक और जाहिद अपने बच्चे को लेकर बैठे थे। जाहिद ने आहिस्तगी से कहा, "तुमने मुझे तन्हाई से निकाला और लानत से आजाद किया। अब हम हमेशा साथ रहेंगे।" महक ने उसका हाथ थामा और मुस्कुरा दी।