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Ek Bahadur Shahzadi Ki Ajeeb o Ghareeb Waqia || Moral Stories in Urdu & Hindi

VibeElevate28:21

Transcription

एक जमाने की बात है कि एक शहर में एक सुल्तान था जिसका नाम सुल्तान हारून था। उसकी दौलत की कोई हद ना थी मगर वह बहुत जल्दबाज था।

एक रात उसने ख्वाब देखा कि एक [संगीत] बाग में मोर के पांव की शक्ल के फूल खिल रहे हैं। सुबह उठकर सुल्तान ने दरबार सजा लिया और उलेमा हकीम और [संगीत] ख्वाब की ताबीरर बताने वालों को बुलाया। अपना ख्वाब बयान किया तो सब सोच में पड़ गए। आखिरकार उन्होंने अर्ज की कि जहां पनाह इस ख्वाब की कोई [संगीत] ताबीरर नहीं और हर ख्वाब की ताबीरर भी नहीं होती।

मगर सुल्तान परस्तू हो गया और बोला या तो मुझे इस फूल की ताबीरर बताओ या ऐसा फूल मुझे अपनी आंखों से दिखाओ वरना आज दरबार बर्खास्त नहीं होगा। सुबह से शाम हो गई। दरबारी भूखे प्यासे बैठे थे। किसी में हिम्मत ना थी कि मुंह खोले। आखिरकार सुल्तान ने एक तश्तरी में पान का बीड़ा बनवा कर रख दिया कि जो हिम्मत वाला यह काम कर सकता है, वह बीड़ा उठा ले। मगर कोई तीर की तरह जान [संगीत] का दुश्मन ना था।

सुल्तान की एक ही बेटी थी। निहायत हसीन, जमीला, अक्लमंद, बहादुर और हिम्मत वाली जिसका नाम लैला था। जब उसने दरबार का यह हाल देखा तो आई पीड़ा उठाकर [संगीत] खा लिया। सुल्तान दंग रह गया। बेटी तूने क्या कर दिया? शहजादी बोली परवरदिगार आपने तो अपने इतनी [संगीत] लोगों को भूखे प्यासे मारने का इंतजाम कर रखा है। इससे तो बेहतर है कि एक अकेली मेरी जान से सब मिल जाए। या तो आपको ऐसा फूल दिखा दूंगी या कभी [संगीत] अपना मुंह ना दिखाऊंगी।

दरबार बर्खास्त हो गया। इतनी लोगों के सामने यह वादा हो गया कि सुल्तान हारून के सामने इज्जत का सवाल था। मां ने सुना तो कलेजा पकड़ लिया। अकेली बेटी सुल्तान की इज्जत [संगीत] की भेंट चढ़ने वाली थी। शहजादी लैला की मंगनी मलिक दमिश्क के शहजादे [संगीत] यूसुफ से हो चुकी थी और एक साल बाद शादी तय थी। महल में तैयारियां शुरू हो चुकी थी कि यह मुसीबत आ पड़ी। तीर कमा [संगीत] से निकल चुका था।

शहजादी ने मां-बाप को यकीन दिलाया कि मैं तो एक साल के अंदर वापस आ जाऊंगी। क्या अगर मर गई तो सुल्तान हारून से मदद कर लेंगे। शहजादी ने मर्दाना लिबास बनाया। थैला भरकर ऐंठी तलवार ली। कुछ खानेपीने [संगीत] का सामान लेकर अल्लाह के भरोसे अपने वफादार घोड़े पर सवार होकर निकल पड़ी। जंगल जंगल लहरा लहरा [संगीत] बस्ती बस्ती सफर करती। हर बस्ती में जाती सराय में ठहरती और सराय के मालिक से पूछती कि यहां कोई देखने लायक जगह तो नहीं मगर कहीं गुलामी ना मिलती।

दो महीने की मसाफत [संगीत] के बाद एक शहर में पहुंची जो बगदाद था बहुत ही खूबसूरत और सरसब था। जिस सराय में ठहरी वहां के मालिक से वही [संगीत] सवाल पूछा। बूढ़ा बोला बेटा यून तो यह पूरा शहर बड़ा खूबसूरत है। मगर यहां के सुल्तान का एक बाग है। जहां सुना है मोर के पर जैसे फूल खिलते हैं। मगर यहां परिंदा पर ना मार सकता है। सरख्त पहरा रहता है। बात सिर्फ अपने खास दोस्तों को ही वहां जाने देते हैं।

शहजादी की मंजिल तो मिल गई। मगर सवाल यह था कि इस बाघा तक कैसे पहुंचे? बूढ़े से बोली, बाबा, मैं मुसाफिर हूं। रोजगार की तलाश में मारे-मारे फिर रही हूं। मुझे अपने यहां काम दे दो। मुझे खाना पकाना बहुत अच्छा आता है। बूढ़े ने कहा, बेटा, मैं खुद गरीब आदमी हूं। तुझे क्या दूंगा? अलबत्ता [संगीत] अगर किसी तरह तू सुल्तान तक पहुंच जाएगी तो तेरी तकदीर बन सकती है। यहां का सुल्तान बड़ा आदिल है और हर माह की नौचंदी जुमेरात को शहर में सुल्तान की सलामती की सैर निकलती है। यह मजलूमों [संगीत] की फरियाद और जरूरतमंदों की जरूरत सुनता है और मुरादों को पूरी करता है। अगर तू किसी तरह सुल्तान को मुतासिर कर ले तो तेरा काम बन सकता है।

शहजादी ने दिल में हिसाब लगाया। नौचंदी में अभी 15 [संगीत] दिन थे। बूढ़े से पूछा बाबा इस शहर का नाम क्या है? बूढ़े ने जवाब दिया बेटा इस शहर का नाम बगदाद है। मुब्तदा बाजार गजस्ता साल ही [संगीत] अपने वालिद की मौत के बाद गद्दी पर बैठा है। शहजादी बगदाद का नाम सुनकर परेशान [संगीत] सी हो गई। यानी वह अपने ही होने वाले ससुराल में है और उसे अपने ही शौहर को झेलना है। मगर वह बहादुर थी, [संगीत] थरा ना घबराई।

15 दिन तक उसने बूढ़े की सराय में ऐसे ऐसे मजेदार खाने पकाए कि उसकी शोहरत दूर-दूर तक फैल गई और बूढ़े की आमदनी [संगीत] दुगुनी रात चौगुनी हो गई। बूढ़ा दुआ देता ना रुकता था। वह सुल्तान की बेटी थी। मगर हर फन में माहिर। नौचंदी को शहजादी ने बड़ी मोहब्बत और लगन से नान नस्तली पकड़ा। ऐसा दिल फरेब और जायकादार की देखने वालों की नजर ना हटती थी। खुद साफ सुथरा लिबास [संगीत] पहनकर खाना लेकर रास्ते में खड़ी हो गई। अधर से सुल्तान की सैर आने वाली थी। सैर आई तो [संगीत] उसने नरमी से सलाम करके तहफा पेश किया। सुल्तान की नजर उसके हसीन चेहरे और मजेदार खाने पर ऐसे टिक गई जैसे मक्खन पर मक्खी।

सुल्तान ने तहफा कबूल करके [संगीत] ताकीद की कि यह हमारे दस्तरखान पर पेश किया जाएगा और अजनबी लड़के को इनाम देना चाहा। मगर उसने फौरन [संगीत] खड़े होकर अर्ज की जहां पनाह एक बार बोल दो। मुझे इनाम नहीं नौकरी चाहिए। मैं परदेसी हूं और रोजगार की तलाश में दर-दर [संगीत] भटकता हूं। सुल्तान ने अगले दिन दरबार में बुलाया और बावर्ची खाने का [संगीत] दरोगा मुकर्रर कर दिया। मगर सुल्तान तो उसके ऐसे कर गए कि हर वक्त उसे साथ रखने लगे। शतरंज हो या घुड़सवारी तलवारबाजी हो या जहरबाजी [संगीत] सुल्तान इतना कायल हो जाते। यह सब था मगर ना जाने क्यों सुल्तान को लगता था कि यह जो लड़का दिखता है वह है नहीं। [संगीत]

एक दिन सुल्तान ने अपनी मां से कहा, "अम्मा जान, मैंने जो नया लड़का मुलाजिम रखा है, [संगीत] उसे देखकर ऐसा लगता है कि उसके हाथों में जाना नाहपन है। मां बोली, यह कौन सी मुश्किल बात है? बहुत सी ऐसी आजमाइशें हैं जो हकीकत का पता दे देंगी। ऐसा करो कि बाजार में एक तरफ [संगीत] हथियारों की दुकानें और एक तरफ जेवाहिरात की। फिर उसे अपने साथ ले जाओ। अगर लड़की है तो बस जेवाहिरात की तरफ जाएगी और अगर लड़का है तो हथियारों पर [संगीत] ना जाएगी।

सुल्तान ने ऐसा ही किया। बाजार को लेकर शहर की सैर पर निकला। बाजार में पहुंचकर शहजादी समझ गई कि उसका इम्तिहान है। उसने जेवाहिरात की तरफ रुख ना किया बल्कि हथियार देखती रही और उनकी तारीफ करती रही। आखिरकार सुल्तान को कहना पड़ा वहां एक नजर अधर भी तो डालो। इस पर वह भड़क कर बोली, क्या हजरत? आप भी औरतों की तरह देख रहे हैं। इधर देखिए यह मर्दों के हथियार हैं। सुल्तान बेचारा अपना मुंह हाथ में पकड़े वापस महल पहुंचा। मां ने पूछा, "क्या हुआ? सुल्तान ने सारा हाल [संगीत] बयान किया। मां बोली, बेटा, वह लड़का ही होगा। आपका बाहर लड़कों दाढ़ी मूछ [संगीत] निकलने से पहले लड़कियों जैसे लगते हैं।

मगर सुल्तान को तो वैसे ही ना मानी। मां हाथों में जानाहपन तो है मगर मर्दाना भी। मां बोली, "अच्छा, एक आजमाइश और है। खाने में बहुत मिर्च भांग। अगर लड़की [संगीत] है तो हाय करने लगेगी और लड़का है तो चाहे आंखों से पानी बहे मगर हाय ना करेगा। अगले दिन सुल्तान [संगीत] ने बावर्ची को हुक्म दिया कि आज खाने में बेहिसाब मिर्च हो। शहजादी तो थी ही। सिर हानने की तरफ मड़ा हुआ उसे पता चल गया कि आज फिर इम्तिहान है। टहलती हुई महल के बाहर निकल गई और खाने से आधा घंटा पहले हकीम से मुंह में सूंठ [संगीत] करने की दवा लगवाई। दस्तरखवान बिछा। सुल्तान ने पहला कौना दिया था कि हाय-हाय करने लगे। जबकि वह आराम से मजे लेकर [संगीत] पूरा खाना खा गई। ना मुंह से हाय निकली ना आंखों से आंसू। उलटा सुल्तान से बोली, "क्या जरूरत है [संगीत] आप औरतों की तरह हाय कर रहे हैं।"

चालानखाने में पहुंचकर सुल्तान ने मां को सारी बात बताई। मां ने फिर समझाया, बेटा, वह लड़का ही है। मगर सुल्तान की वही परेशानी रही। मां बोली, एक आजमाइश और है और यह आखिरी है। तुम पहले चमेली के फूलों की सेज बनवाओ और उसे सुला दोगे। अगर लड़की है तो फूल बिल्कुल मुरझा जाएंगे और लड़का है तो उन्हें ताजगी [संगीत] बाकी रहेगी। सुल्तान ने मां को दो पलंग की सब्जी बनवाने का हुक्म दिया और शहजादी से [संगीत] कहा कि आज रात हम लोग बाग में सोएंगे। शहजादी ने फूलों की सेज [संगीत] बिस्तर पर सजी देखी तो फौरन समझ गई कि माजरा क्या है। उसने माली को एक अशरफी दी कि बिल्कुल ऐसी [संगीत] ही सेज मेरे लिए भी बनाकर लाओ और बिस्तर के करीब झाड़ी में छिप गई। माली ने ऐसा [संगीत] ही किया।

रात को सुल्तान तो सो गए मगर शहजादी जागती रही। इस वजह से कुछ [संगीत] पहले उसने अपने बिस्तर से बांसी फूलों की सेज हटा दी और ताजा फूलों की सेज बिछाकर आराम से सो गई। एक घंटा [संगीत] गुजरा होगा कि बजट का वक्त हो गया। सुल्तान उठा और उसे झांका। फिर दोनों बिस्तर [संगीत] लेकर मां के पास पहुंचा। सुल्तान की सेज पर रात भर सोया रहा। फूल बू सीधा हो गए। मगर दूसरी सेज [संगीत] बिल्कुल ताजा थी। मां बोली, बेटा, अब यह छोड़ दो। वह लड़का ही है। सुल्तान चुप हो गया।

शहजादी को [संगीत] कुछ अबहम हो गया कि सुल्तान बिल्कुल उसके पर ऐतबार करने लगा है। तो एक दिन वह बोली सुल्तान सलामत मैंने सुना है कि आपका एक बाग है जहां मोर्के पर जैसे फूल खिलते हैं। आपने मुझे आज तक ना दिखाया। सुल्तान शर्मिंदा हो गया और फौरन उसे लेकर बाग में पहुंचा। बाघ जैसे जन्नत से जमीन पर उतर आया था। हर तरफ मोर के पंख जैसे फूल निकल रहे थे। शहजादी [संगीत] ने जी भरकर तारफ की। मेरा जी चाहता है कि रोज आऊं। सुल्तान बोला तू आजा। किसने रोका है? शहजादी बोली, मगर यहां तो सख्त पहरा है। सुल्तान बोला, तेरे लिए कोई पाबंदी नहीं। जब चाहे आ सकते हो। [संगीत] पहरेदारों को बुलाया और कहा, "यह हमारा महबूब है। इसे बाग में आने से ना रोका [संगीत] जाए।"

शहजादी को तो दिल की मुराद मिल गई। एक रात मौका पड़ा तो दो फूल तोड़ लिए और कपड़ों में छिपा [संगीत] कर ले आई। वही रात को जब सब सो गए और पहरेदार भी तो उसने सुल्तान के नाम [संगीत] एक खत लिखा और उसे अपने बिस्तर पर रख दिया। महल से निकल आई। लाइव स्टाल टाइम है। उसका वफादार घोड़ा बंधा हुआ था। उसने घोड़े को एड़ लगाई और बगदाद की सरहदों से दूर निकल आई। वह सिपाही उसे पहले ही देख चुके थे। इसलिए किसी ने ना रोका।

अगले दिन सुल्तान जब अपने मुन्हा को याद किया तो गुलाम ने खत लेकर रख दिया। लिखा था मैं फातिमा की शहजादी हूं। आपकी मंगेतर हूं। आपने बड़ी-बड़ी आसमान बातें की मगर मुझे पहचान ना सके। मगर मैं इसका बदला जरूर लूंगी जब तक आपकी पांच शादियां ना करा दूंगी। आपके पास ना आऊंगी। सुल्तान ने पढ़ा तो गुस्से से बेकाबू हो गया। फौरन मां को बुलाया दिखाया और बोला देखा मैंने कहा था कि दाल में कुछ काला [संगीत] है। मगर आप मेरी बात मानने को तैयार ना थी। वह सबको चूना लगा गई और ऊपर से [संगीत] धमकी भी दे गई। मैं भी कसम खाता हूं। जब तक उसकी कसम पूरी ना कर लूं। चीन से ना बैठूंगा। आप उसके घर पर हमला भिजवाइए कि हम इसी मोहब्बत लेकर आ रहे हैं।

अधर शहजादी की वापसी [संगीत] की खुशियां मनाई जा रही थी। जब तक यह पैगाम पहुंचा शादी समझ गई कि इससे बदला लेने की साजिश है। एक तरफ महल में शोरशराबे से शादी की तैयारियां [संगीत] हो रही थी और अध शहजादी ने खुफिया तौर पर शाही कारीगर को बुलाया। 100 अशरफियाओं दी और कहा [संगीत] जल्दी से जल्दी एक लकड़ी की आरूस बनाओ जो अंदर से खोखली हो और अंदर सामान रखने का खाना और एक आदमी के खड़े [संगीत] होने की जगह हो। किसी को कानों कान खबर ना होनी चाहिए। हरूस तैयार करके मेरे कमरे के तहखाने [संगीत] में छिपा दो।

शादी से एक दिन पहले उसने मेहंदी और साबुन से भूनकर औरत का पुतला बनाया और उसके पेट में लाल शरबत का सिरा भर दिया। अपनी राजदारनी को हिदायत कर दी कि रुखसत के वक्त इसे दलहन बनाकर पालकी में बिठा देना। मगर खबरदार किसी को पता ना चले। शादी बड़े धूमधाम से हुई। रुखसत भी धूमधाम [संगीत] से हुई। बाजे तश ऊंटों और चाकरों पर दहेज लती हुई। गुलाम यूसुफ पूरा कब पहुंचे कि शहजादी [संगीत] खुद उस कट की आरूस में छिप गई और जिस रास्ते से बगदाद की वापसी थी वहां जाकर पेड़ के पीछे खड़ी हो गई। वह जानती थी कुछ ना कुछ होकर [संगीत] रहेगा और वही हुआ।

सुल्तान गुस्से में आग बगूला था। आधे रास्ते पहुंचकर सब बाजेगाजे और दहेज लौटा दी और बारातियों से कहा कि वापस चलो। किसी को कुछ पूछने की [संगीत] हिम्मत ना थी। शादी से पहले ही मां-बाप से कह दिया था कि अगर सामान लौट आए तो चुपचाप रख [संगीत] लो और फिर ना करो। जब सब लोग चले गए तो सुल्तान गुस्से में भरा हुआ आया और दलहन [संगीत] के पेट में खंजर भोंक दिया। लाल शरबत उबलने लगा तो सुल्तान ने अपनी कसम पूरी करने [संगीत] के लिए ढाई चूल्हा भर लिया और बोला कमबख्त का खून भी मीठा है। कुछ अफसोस और कुछ नदामत में घोड़े पर सवार होकर धीरे-धीरे [संगीत] चला तो पीछे से एक कटकट की आवाज आई। मुड़कर देखा तो लकड़ी की एक [संगीत] आरूस आ रही है। जंगल बांध हर तरफ सन्नाटा। ऊपर से लकड़ी की कटकट। सुल्तान को थोड़ा सा डर लगा। डपट कर पूछा तू कौन है और मेरा पीछा क्यों कर रही है? कट की आरूस बोली सुल्तान सलामत मेरा नाम सुमैया है। मैं शादी का खिलौना थी। उनका जी बहलाती थी। आपने मेरी शहजादी को तो कत्ल कर दिया। अब मैं कहां जाऊं? मैं तो आपके साथ ही जाऊंगी। सुल्तान बोला [संगीत] नहीं मेरे साथ आने की कोई जरूरत नहीं। जाओ मगर वह ना मानी। इसी तरह डांटते डपटते [संगीत] आकर अपने महल पहुंच गए।

सारा शहर सजा हुआ था। सुल्तान और मल्लिका के इस्तकबाल [संगीत] की तैयारियां हो रही थी। सुल्तान को यूं ना अकेला देखकर सब परेशान हो गए। मां ने पूछा, दुल्हन कहां है? सुल्तान बोला, मार दी। कसम तो [संगीत] पूरी करनी चाहिए थी। मां ने सिर पकड़ लिया। तभी टकटक की आवाज आई। देखा तो लकड़ी की एक आरू [संगीत] खड़ी है। अम्मा ने डरकर सुल्तान से पूछा, "यह कैसे ले आए हो।" सुल्तान बोला, जाने कौन भला है। मेरा पीछा [संगीत] ही ना छोड़ती। बूढ़ी बोली, आधा बेगम, मेरा नाम तो अनमोल है कि मैं शादी का खिलौना थी। सुल्तान सलामत। [संगीत] मेरी शहजादी को तो मार डाला था। अब मैं कहां जाऊं? सुल्तान बोला, [संगीत] मैं भी तुझे तोड़कर फेंक दूंगा। मां ने डांट फटकार और कहा, खबरदार इसे हाथ ना लगाना बहुत नायाब है। अब चलो इससे ही मेरा दिल बहलाएगा। इसे रहने दो।

इस तरह टूटी मन सुल्तान सलामत की मां की दोस्त [संगीत] बन गई। दिनभर उनसे बातें करती। कैफ से कहानियां सुनाती। सलाह मशवरे देती रहती। अम्मा जान को भी उसकी आदत पड़ गई। रात को जब सब सो जाते [संगीत] तो शहजादी कठ से निकल कर जाती। खानेपीने का सामान दिन भर के लिए अपने कठ में रखती और कमरा बंद करके [संगीत] थोड़ी देर सो जाती। सुबह के करीब वापस अपने कठ छिप जाती।

छ महीने गुजर गए तो उसने अम्माओं से कहना शुरू किया बेगम साहिबा सुल्तान सलामत की शादी कर [संगीत] दीजिए। इतना बड़ा महल में आप खालियों के साथ तन्हा रहती हैं। बहू आ जाएगी तो कुछ रौनक हो जाएगी। पहले तो अम्मा जान मना करती। बेटे को पहली बीवी के मरने पर बुरा लगता है। [संगीत] मगर कहती रहती आखिरकार मान गई। अपने ही एक वजीर की बेटी से [संगीत] रिश्ता कर दिया। शादी की तैयारियां होने लगी।

जब शादी में दो दिन रहे तो आरूस बोली बेगम साहिबा शादी का दिन आ गया। इजाजत हो [संगीत] तो मैं भी नहा लूं और अपना कपड़ा बदल लूं। अम्मा बोली है तू कैसे नहाएगी? नंगोड़ी लकड़ी की कड़ियां आओ। मैं किसी से कहती हूं [संगीत] वह देगी। नहीं बेगम साहिबा मैं किसी को हाथ ना लगाने दूंगी। मेरा कोई कल पुरजा टूट गया तो मुसीबत [संगीत] हो जाएगी। मेरी शहजादी भी तो ठीक करवा देती थी। आप तो बस थोड़ा [संगीत] बेसन और चमेली की माला मेरे हाथ पर रख दें। मैं खुद य लूंगी। अम्मा जान मान गई तो हरमन खटपट करती नदी [संगीत] के एक इंतहाई नराले घाट पर पहुंच गई। घाट की आरूष झाड़ियों में छिप गई। खुद बाहर निकल कर नहाई। सर खुरचिया कपड़े [संगीत] बदले और लड़की वालों के पास पहुंच गई। लड़की वालों ने हाथों हाथ ले लिया। आ गई सामान [संगीत] आ गया। शहजादी बोली नहीं बहन मैं समझदार पड़ोसी हूं कि आपकी बेटी की शादी है इसीलिए चली आई हूं। और कहने लगी कि पड़ोसी [संगीत] कितनी खूबसूरत है। उनकी आंखें तो देखो कैसे जगमगा रही हैं। जैसे ही शहजादी [संगीत] बोली बहन मेरी आंखें तो इतनी जरा जरा सी थी। जैसे जिनमें हर वक्त पानी और कीचड़ [संगीत] बहता है। वह तो मेरी मां को किसी ने बताया कि नील की साली आंखों में डालो। उस वक्त तो धरा तकलीफ हुई। फिर जो मेरी आंखें चमक गई तो तुम देख रही हो तो बात होने लगी हम भी अपनी [संगीत] बेटी की आंखों में नील की साली रखेंगे। आखिर सुल्तान की मलिका बनकर जा रही है। उसकी आंखें भी हसीन दिखनी चाहिए।

शहजादी तो रुख सब लेकर आ गई और खटखट करती महल में [संगीत] पहुंच गई। अधर उन जाहिल औरतों ने मिलीमिली कर सालियां मिला दी। लड़की की आंखों में फेर दी। लड़की दर्द से [संगीत] तड़पने लगी। आंखों से खून निकलने लगा। डॉक्टर हकीम दौड़ने लगे। इसी हालत में रुखसत हो गया। रुखसत का वक्त आया तो पता चला कि लड़की अंधी है और उसकी [संगीत] हालत भी खराब है। सुल्तान गुस्से से लाल पीला हो गया। मेरे जिए होकर मुझे धोखा दिया। तलाक दे दिया। बारातियों को हुक्म हुआ कि वापस चलो। अम्मान जान बहू के [संगीत] इंतजार में बैठी थी। सुल्तान को अकेला आता देखकर दिल धड़क गया। अब क्या हुआ? तिल्हन कहां है? सुल्तान बोला। अंधी बीमार लड़की से मेरी शादी करवा दी। मैंने तलाका दे दिया। अम्मा जान ने सिर [संगीत] पकड़ लिया। लगता है तेरी किस्मत में भी ना लिखा। एक को मारा और दूसरी को तलाक [संगीत] दे दिया।

सुल्तान बोला शौक उसको है मत कीजिए। मेरी शादी या तो शहजादी लैला से होगी। अम्मा जान के सबब [संगीत] बाराती रहे। 5 छ महीने गुजरे तो आरूष ने फिर सुल्तान की शादी का तलब शुरू कर दिया। अम्मा बोली अरे रहने दो। अब ना करूंगी मुझे किसी लड़की की तकलीफ बुरी लगती है। आरूस कहने लगी है बेगम साहिबा भलोई कीजिए। अब इसमें सुल्तान सलामत का क्या कसूर क्या अंधी लड़की ले आए और मेरी शहजादी भी अल्लाह बख्श है तो मेरी मालिका थी मगर उसने तो ऐसा तीखा [संगीत] का धोखा दिया कोई मर्द बर्दाश्त करता अच्छा हुआ जो मार डाला अगर सुल्तान सलामत को इतनी इत्तला [संगीत] हो जाती तो मेरा बाण होते अब किसी अमीर लड़की देखिए अच्छी तरह देख लिया तो शादी की तारीख पक्की करा दे शादी में अगर रह गई तो फिर टर्न ऑन अपना कट देने गई और लड़की वालों के पास [संगीत] जा पहुंची बड़ी खिरदारी हुई तिलहन की मां बोली, देखो तो पड़ोसी के बाल कितने लंबे, घने और चमकदार हैं। हम अपनी बेटी के तो 50ों चीजें आजमा कर थक गए। बाल बढ़ते ही नहीं। [संगीत] आरूस बोली बहन मेरे बाल तो ऐसे सूखे मोटे झाड़ू जैसे थे कि क्या बताऊं? [संगीत] मेरी मां ने 500 लगाई पर कुछ ना हुआ। दुल्हन की बड़ी बहन ने पूछा, फिर आपके बाल इतने खूबसूरत कैसे [संगीत] हुए? अरे क्या बताऊं? तुम्हें एक हकीम साहिब ने बताया कि इसका असीर [संगीत] मोड़ दो। लाल चमगादड़ों के अंडों को पीसकर इसमें हकीम साहिब की दी हुई बूटी मिलाकर रात को सर पर लगाई। [संगीत] सुबह उठी तो यह लंबे बाल चमकदार बार लहरा रहे थे। दुल्हन वाली हाथ मलकर बोली लांच यूतों के अंडे तो मिल जाएंगे। बरसात का मौसम है मगर फकीरी साहिब की बूटी कहां से लाए? तो आरूस [संगीत] ने झट अपने बटुए से एक बड़ी बोतल निकाल कर दी। यह लो बची हुई बहुत मेरे पास है। अगर आपकी बेटी का भला हो जाए तो क्या कहने? लोग वालों [संगीत] का ढेरों शुक्रिया अदा करके तुरंत अपने घर सधरे। उन लोगों ने बेचारी दुल्हन के सर पर उतरा फिर कर रात को लेप [संगीत] लगाया तो दिल दर्द और खुजली के मारे रात भर तड़पती रही और सुबह सवेरा सर पर बड़े-बड़े उमल बाहर आए। इस बात का दिन था जैसे तैसे निकाह हो गया। सुल्तान के [संगीत] जासूस ने जाकर सुल्तान के कान में कहा कि दिल ना सिर्फ कोई है बल्कि उसके सर पर झुमके हैं। और हकीम कहते हैं [संगीत] कि उसके सर पर कभी बाल ना उगेंगे। यह सुनना था कि सुल्तान मारे गुस्से के चेहरा नोच कर खड़ा हो गया और तलाक देकर [संगीत] वापस महल में आ गया। अम्मा जान ने सुना तो हजार साल बातें सुनाई। वह रिश्ता आप [संगीत] किसी बंदर की मां से निकाह पढ़वा दें और मैं लगाऊं। क्या चाहती हैं आप? खैर बच्चे की अमानत है कि करवाई तो पता चला कि वहां की बात सच थी। दिल महसूस [संगीत] कर गई। अल्लाह की मर्जी समझकर चुप हो गई। मगर बहुत

यही बदला था। समय बीतता गया। जब बात पुरानी हो गई, तो आरूस ने फिर सुल्तान की शादी का प्रस्ताव शुरू कर दिया।

पहले तो अम्मा जान ने साफ इनकार कर दिया, परंतु फिर वह ऐसी हो गईं कि किसी और अमीर की बेटी देखी गई। सब डरे हुए थे। परंतु जब सुल्तान के घर से संदेश आए, तो इनकार की गुंजाइश कहाँ थी?

शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। हमेशा की तरह, शादी से दो दिन पहले, टोन अपना 'कट' देने गई और दुल्हन वालों के पास जा पहुँची। सब ने उसका हाथों-हाथ स्वागत किया। वे सब बहुत डरे हुए थे। उन्होंने बताया कि दरअसल सुल्तान सलामत को बहुत हसीन लड़की चाहिए।

"यदि लड़की में कोई कमी हो, तो वह तलाक दे देते हैं।" दुल्हन की चाची बोली, "लड़की तो हमारी बहुत खूबसूरत है। बस उसके दाँत टेढ़े-मेढ़े हैं।" "पड़ोसी, आपके दाँत तो मोतियों जैसे जड़े हुए हैं। आप कोई नुस्खा बताइए। अभी तो दो दिन हैं। हम अभी कुछ कोशिश कर लें।"

तो आरूस बोली, "हाय, मैं क्या बताऊँ? मेरे दाँत तो ऐसे खराब थे कि बस छोटे-छोटे चूहे जैसे, पीले और ऊपर के दाँत तो होठों पर रखे रहते थे। मेरी अम्मा एक फ़कीर साहब के पास ले गईं। उनका बड़ा परिचय था। उन्होंने एक जादुई मंजन दिया और कहा कि आगे के आठ दाँत उखाड़कर रात को यह मंजन लगाओ।"

मेरी माँ ने ऐसा ही किया। तकलीफ़ तो बहुत हुई, परंतु अगले दिन सुबह जादू के ज़ोर से सारे दाँत दोबारा निकल आए और ऐसे खूबसूरत! दुल्हन की माँ बोली, "परंतु वह फ़कीर और वह मंजन हमें कहाँ मिलेगा?" तो टोन ने झट मंजन की पुड़िया निकालकर दे दी। "यह मेरा बचा हुआ मंजन है, इससे तुम्हारा भी भला हो जाएगा।"

तो वह उस खानदान को एहसान के बोझ तले छोड़कर चली गई और लोगों ने उसी रात लड़की के दाँत उखाड़कर उन्हें मंजन मल दिया। बेचारी लड़की का सारा मुँह सूजा हुआ था और तकलीफ़ से उसकी जान निकल रही थी। परंतु बात छिपाई गई।

निकाह हो गया। खाना खाकर जब विदाई का समय हुआ, तो सुल्तान के एक शुभचिंतक ने सुल्तान को असली दुल्हन के बारे में आगाह किया। सुल्तान का जो हाल था, वह एक तमाशा बन गया। सुल्तान ने तलाक लेकर चला आया।

अम्मा जान को विदाई की खबर मिल चुकी थी। वह दरवाज़े पर दुल्हन के स्वागत के लिए खड़ी थीं कि सुल्तान गुस्से में भरा हुआ अकेला आया। "अब क्या हुआ?" "अमानत में खयानत कर दी। शादी का नाम लीजिए! अब मेरे आगे अपने शहर भर की जितनी अंधी, गंजी, और बदज़ुबान लड़कियाँ हैं, आपने मेरे ही नसीब में लिख रखी हैं!"

अगले दिन अम्मा जान को पता चला कि बाज़ार सही कह रहा था। उन्हें गुस्सा भी आया और बेटे के लिए अफ़सोस भी हुआ। परंतु अब क्या हो सकता था? अब टोन उनके सामने अपने दिल की बात बताई।

वह कमाल होशियारी से मरहम लगाती थी। इस दफ़ा उन्हें अम्मा-बेटे की शादी पर शादी करने में पूरा साल लग गया। जिस अमीर के घर में रिश्ता हुआ, वहाँ अम्मा जान खुद जाकर लड़की देख रही थीं। रूप को अच्छी तरह परखकर देखा। सुल्तान ने कह दिया था कि "अब मैं आपके हाथों से राजी हूँ। परंतु यह आखिरी मौका है। इसके बाद मैं कोई तमाशा नहीं होने दूँगा।"

शादी से दो दिन पहले, टोन अपना 'कट' देने गई और दुल्हन वालों के पास जा पहुँची। आरूस ने खुद बताया कि "मैं सुल्तान सलामत की पड़ोसी हूँ। महल में मेरा आना-जाना है। मैंने सोचा कि आपको उनके यहाँ के रीति-रिवाज़ बताऊँ-समझाऊँ।" "यानी कि सारी औरतें खामोश बैठेंगी।" "बहुत अच्छा किया पड़ोसी आपने। हम तो बहुत डरे हुए थे। सुना है, वह बहुत गुस्से में आँखें देख चुके हैं।"

पड़ोसी बोली, "दरअसल सुल्तान सलामत को अपने रीति-रिवाज़ बहुत अज़ीज़ हैं। लोगों ने उनके रिवाजों के मुताबिक उनकी और बारात की आवभगत नहीं की, तो इसीलिए वह नाराज़ हो गए। तुम तो जानते हो, सुल्तान नाराज़ होकर तलाक ले आए। अब आप लोग जैसा मैं बताऊँ, वैसा ही करो।"

"अच्छा बताइए कि बारात के स्वागत के लिए क्या किया जाएगा?" लड़की वालों ने बताया कि "सुल्तान सलामत के लिए सोने और हीरों का हार और भाइयों के लिए गुलाब के फूलों के हारों का इंतज़ाम है, और खाने में हर किस्म के मुग़लई खाने पकाने के लिए दूर-दूर से बावर्ची बुलाए गए हैं।"

तो आरूस बोली, "अरे, यही तो सबसे बड़ी गलती आप लोग करने जा रहे हैं! सुल्तान के यहाँ का रिवाज़ है कि पहले दिन जब दूल्हा आए, तो उसे मिट्टी की हांडी को सुर्ख करके उसका हार पहनाया जाएगा और बारातियों को टूटी टिकियों का हार पहनाया जाएगा और खाने में मिट्टी के कुंडों में नमकीन दलिया पेश किया जाएगा। मिट्टी के बर्तनों को सुल्तान के खानदान में बड़ा मुक़द्दस समझा जाता है। दूसरे दिन भले ही आप उन्हें हीरे-जेवरात के हार पेश करें और लज़ीज़ खाने खिलाएँ, कोई हर्ज नहीं।"

लड़की वाले पहले तो हैरान हुए। फिर शुक्रिया अदा करते न रुके कि "पड़ोसी, आपने तो हमें सच बता दिया और हमारी आँखें खोल दीं। आपने यह सब बताकर हम पर एहसान किया, वरना हमारी लड़की भी तलाक पाकर घर में बैठी रहती।" अपने इस मक़सद की कामयाबी का यक़ीन करने के बाद, टोन दुआएँ देती वापस महल में आ गई।

धूमधाम से बारात चली। जैसे-जैसे बाराती शादी के हॉल में दाखिल होते, उन्हें टूटी टिकियों का हार पहनाया जाता। हर एक हैरान होकर पूछता कि "यह क्या है?" पहनाने वाले कहते कि "जनाब, यह आपके यहाँ की ही रीत है।" आखिर में जब सुल्तान सलामत दाखिल हुए, तो ससुराल वालों ने मिट्टी की हांडियों का हार बड़े अदब से उनके गले में डाल दिया।

सुल्तान तो हैरान-परेशान खड़ा था। उसने पूछा, "यह क्या है?" तो उन्होंने अदब से कहा, "हज़रत, यह आप ही के यहाँ की रीति-रिवाज़ है।" यह सुनते ही उसने हार उतारकर ज़मीन पर मार दिया। साथ ही साथ सारे बारातियों ने भी अपने हार फेंक दिए और सारा पंडाल हारों से भर गया।

लड़की वाले समझे, "यह भी शायद कुछ ज़रूरी होगा।" सुल्तान को गुस्सा तो बहुत आया, परंतु अम्मा जान की धमकियों और क़समों के बारे में सोचकर वह खून का घूँट पीकर रह गए। खैर, निकाह हो गया। खाने के लिए जब दस्तरख़्वान बिछा, तो हर बाराती के आगे मिट्टी का कुंडा रखा गया और इसमें गरम-गरम पतला दलिया डाला जाने लगा।

जो भी पूछता, "यह क्या है?" तो जवाब मिलता, "यह यहाँ की रीत है।" लोग सुल्तान के हिसाब से ही रहे। परंतु जब सुल्तान के आगे सबसे बड़ा कुंडा रख दिया गया, तो सुल्तान का गुस्सा अपनी आखिरी हदों को छू रहा था। उन्होंने कुंडा उठाकर दूर फेंक दिया और उठकर खड़े हो गए। "बेइज़्ज़ती की भी हद होती है! और मैं चुप रहा, तो तुम लोग सर पर ही चढ़े हुए हो! तुम लोगों ने सारे दरबारियों की और मेरी बेइज़्ज़ती की है। मुझे नहीं लाना था। अपनी बेटी को अपने पास रखो। मैंने इसे तलाक दे दी है।" तीन तलाक देकर, गुस्से में भरा, वह पैदल ही महल में वापस आ गया।

टोन इंतज़ार कर रही थी क्योंकि अम्मा जान को यकीन था कि दुल्हन घर में ज़रूर आएगी। वह खुद जाकर लड़की ले आई थीं। सुल्तान ने अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। हैरान-परेशान अम्मा जान को बारातियों ने सारी व्यथा सुनाई कि कैसे लड़की वालों ने बेइज़्ज़ती में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब माँ की आँखों में आँसू भर आए कि उनकी किस्मत में बहू और पोते खिलाने का सुख नहीं लिखा था। अम्मा जान ने सुल्तान के व्यवहार को सही साबित करने की कोशिश की। दिन बीतने लगे, परंतु अब सुल्तान के दिमाग में तो उनके किरदार को लेकर शंकाएँ और संदेह जन्म लेने लगे।

शहज़ादी की क़सम याद आई और अपनी पाँच शादियों का एहसास हुआ। सुल्तान अपना खाली वक़्त अम्मा जान के हुजरे में गुज़ारने लगा, जहाँ टोन खड़ी रहती थी। कभी कहता, "अम्मा, अपनी टोन से कहिए कि मुझे पानी पिला दे।" कभी कहता, "टोन, ज़रा मेरे पाँव दबा दो।" तो टोन ठंडी आह भरकर कहती, "देख लीजिए बेगम साहिबा, सुल्तान सलामत खेल कर रहे हैं। मेरा कोई कल-पुर्ज़ा टूट गया तो कौन ठीक करवाएगा? मेरी शहज़ादी भी अल्लाह को प्यारी हो चुकी है।"

अम्मा जान सुल्तान को डाँटती, "इसको परेशान मत किया करो। यह मेरी तन्हाई की दोस्त है। बहुत नायाब है। मेरी किस्मत में यह टूट-फूट गई तो मैं कैसे जीऊँगी?" परंतु सुल्तान लगातार उसकी टोह में रहा। एक दिन अम्मा जान हुजरे में ही सो गईं। टोन का भूख से बुरा हाल था। काफी देर इंतज़ार किया।

जब यक़ीन हो गया कि सब सो गए हैं, तो वह अपने 'कट' से निकली। धीरे-धीरे बावर्चीखाने से खाना लेकर लौट रही थी कि पीछे से कोई सामने आकर उसकी कलाई पकड़ ली। घबराहट में सारा खाना ज़मीन पर गिर गया। वह सुल्तान था। सुल्तान बोला, "अब कब तक छिपोगी मुझसे? अब तो तेरी क़सम भी पूरी हो गई। मैं हारा और तू जीती। अब तो आ जा।"

शहज़ादी बोली, "अगर आप बात जीते, तो मैं भी शहज़ादी हूँ। फिर हम दोनों ने अपनी-अपनी क़समों को पूरा करना पड़ा। अब मैं अपने पिता के घर जा रही हूँ। दोबारा बारात कराइए और मुझे ले जाइए। और हाँ, अम्मा जान को भी साथ ले जाइएगा।" शहज़ादी ने सुल्तान से घोड़ा माँगा और उसी वक़्त अपने घर रवाना हो गई।

सुल्तान ने सुबह जब उठकर अम्मा जान को टोन की हक़ीक़त बताई, तो वह खुशी से फूले न समाए। फ़ौरन महल में शादी की तैयारियाँ होने लगीं। धूमधाम से बारात चली और दुल्हन को बड़े अरमानों से विदा करवाकर महल में ले आए। पूरे महल में और शहर में खुशियाँ छा गईं।

शहज़ादी ने सबसे पहला काम यह किया कि उन 39 लड़कियों का शाही खर्च पर बेहतरीन इलाज करवाया, जिनकी तकलीफ़ों ने उन्हें बर्बाद किया था, और फिर अमीर और शरीफ़ लड़कों से उनकी शादियाँ करवाईं। अल्लाह ने जैसे उनके दिन फिराए, उसके बाद शहज़ादी और सुल्तान खुशी-खुशी रहने लगे थे।