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और आखिरी चौथा स्टेप कि यही बैक्टीरिया पेस्टिसाइड्स को रिप्लेस कर देगा। सात दिन में क्या करना है? यह बैक्टीरिया 3 लीटर पंप में लेना है, 3 लीटर छाछ और 9 लीटर पानी। कोई भी फसल हो, स्प्रे कर दो, अच्छा खत्म। अपने शरीर में से ऐसे एंजाइम्स छोड़ता है, 14 बैक्टीरिया इसके अंदर जो न काम के फंगस, कीटक सबको दूर रखता है, उसके अंडे पनपने नहीं देता है।
जैसे आयुर्वेद में बोला है कि कच्चा दूध पीना चाहिए। अच्छा, जैसे ही दूध आप ले रहे हो, तो कोई फल उसके साथ नहीं लेना है। विरुद्ध एक ही फल जमेगा, आम, वो भी मीठा है तो अच्छा। एक ही सब्जी जमेगा, परवल, वो भी घी में बना है, खटास नहीं डली तो बाकी कोई भी सब्जी के साथ रुदर है। अच्छा, और रोटी भी अगर सैदा नमक वाली है तो ही उसके साथ जमेगी। अब बताइए कितने लोग इसको फॉलो करते हैं?
गोबर का काम करना, खेती का काम करना, गर्व का विषय है, शर्म का नहीं है। यह वास्तविकता है। उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, कनिष्ठ नौकरी है। यह किसान उत्तम क्यों है? क्योंकि रियल प्रोडक्ट वही करता है, कोई और कागज थोड़ी खाएंगे? [संगीत]
नमस्ते। संगम टॉक्स के एक और एपिसोड में आपका वेलकम। आज मेरे साथ गोपाल सतरिया जी हैं, जो भावनगर से हैं, गुजरात में। और बहुत वर्ष पहले मैंने इनके बारे में सुना था। आज पाँच-छः वर्ष के बाद फाइनली इकट्ठे बैठ के इंटरव्यू करने का मौका मिल रहा है। तो गोपाल जी बड़ी फैमिली से हैं, है ना? मैंने जितना पढ़ा था, डायमंड बैकग्राउंड से सब छोड़कर एक गौशाला और गौशा, गौ, गौ माता के अराउंड पूरी इकॉनमी डेवलप करने के कार्य में लगे हैं।
पहले तो मैं राहुल जी, आपका बहुत धन्यवाद कहूंगा। भारतीय ज्ञान की परंपरा को आप बढ़ा रहे हैं और उसमें मौका मिला मुझे बात रखने के लिए। जी, उसके लिए हृदयपूर्वक धन्यवाद। और जो इतने साल कम रहे, उसके लिए भी क्षमा। और बिल्कुल आज अब और, और ज्यादा ज्ञान के साथ, और ज्यादा एरियाज ऑफ वर्क। जैसे हम चर्चा कर रहे थे कि आप गौशाला से आगे अब एक गौ के अराउंड गुरुकुल और वो सब। अब शायद वो सब पहले इतना डेवलप नहीं हुआ होता अगर हम पाँच साल पहले मिलते तो। पहले आपके बैकग्राउंड से थोड़ा सा शुरू करते हैं। आप कैसे इंस्पायर हुए कि अपनी व्यवसाय का जीवन से निकलकर इसमें?
मैं आठवीं कक्षा में था। जी, तभी मेरे गुरुदेव जी गंगोत्री से पर गुफा में रहते थे। परम संन्यासी और नाम मेरा उन्होंने रखा। राशि से नहीं है। वो कहते थे और बहुत स्पष्ट थे, ईश्वर प्राप्त संत थे। उन्होंने कहा कि बेटा, गौ माता और किसान दुखी रहेगा, धरती माता तो देश कभी खुश नहीं रह सकता। विकास होगा या फिर आध्यात्मिक विकास, कोई भी हो, वह खोखलापन रहेगा। तो यह दोनों मूल हैं, तो धरती माता और गौ माता तो खुश होने चाहिए। जी, तो वही एक शब्द रम रहा था और उनके जो मार्गदर्शन दिए हुए थे। तो फर्स्ट ईयर कॉलेज मुंबई करके छोड़ने का तय कि आगे का सिलेबस देखा, काम का नहीं लगा। तो पापा को बोला, ये करना है। बोले, आर्थिक व्यवस्था करके करना चाहिए। बात भी सही है। तो 10 साल डायमंड का बिजनेस करना पड़ा और फिर 18 साल पहले मुंबई छोड़ के हम अहमदाबाद आए। वहाँ पे प्रयोग नहीं हो सकते थे, इतना बड़ा भी कारोबार नहीं था। जो है, सत्य बोलना चाहिए। लेकिन आकर के हमने प्रयोग शुरू किए। जी, क्योंकि हमें कोई हवाबाजी नहीं करनी थी। ठीक है, गौ माता का विषय है। छः महीने में डेढ़ लाख किलोमीटर घुमा, वही-वही गाड़ी लेके। हम मानते हैं कि कोई भी विषय में कमेंट करने से पहले वैज्ञानिक पक्ष, आयुर्वेदिक पक्ष, आध्यात्मिक पक्ष, आर्थिक पक्ष और प्राकृतिक पक्ष, ये पाँचों पक्षों को देखा जाना चाहिए। कहीं हानि तो नहीं हो रही है, सब तरीके से ठीक है, फिर मुँह से शब्द निकालना। तो गौशाला शुरू करी, तो उसमें हमने देखा कि किसी का भी शोषण ना करके प्रगति करना, वो प्रगति सच्ची है। तो कोई गौ माता को बांधना बंद कर दिया। अच्छा, वो उसकी मर्जी से खाना खाती है, उसकी मर्जी से पानी पीती है। दोने के समय हमने नाम से बुलाना शुरू किया, तो जिसको नाम बोलते वो दूध देने के लिए बाहर आती है।
अरे वाह! और 10 दिन का बच्चा भी मां का नाम सुन के वही बच्चा दूध पीने के लिए बाहर आता है। दूसरा, आधा ही दूध लेते, आधे बच्चे को पिलाते कि उसका शोषण करके भारत की पूरी परंपरा थी, आजादी से पहले कि आधा दूध हमारा, आधा उसके बच्चे का। तो हमने वही शुरू किया और कुछ आशीर्वाद अलग बरसने लगा, उसका क्षमता अलग होने लगी। तो एक अलग संबंध बना और गाय के विषय में गहराई में काम करना था, तो 18 गोत्र की गिरगाय हमने जमा करी, एक ही छत्र के नीचे। 18 गोत्र मतलब क्या हुआ? गोत्र, 18 गोत्र पेडिग्री अलग-अलग। जो पेडिग्री मतलब, सॉरी, लाइनें अलग-अलग। जैसे भावनगर के राजा के वंशज की गिरगाय, मोरबी राजा के वंशज, जूनागढ़ नवाब, तो ऐसे 18 जीन पूल। अच्छा, और हर वाड़े के नंदी हमारे अलग होते हैं। इस नंदी की बछड़ी दूसरे विभाग में जाएगी, दूसरे की तीसरे में जाएगी। तो जैसे मनुष्य के अंदर पिता-पुत्री, भाई-बहन में ब्याह नहीं होता है, ऐसे एवरी ईयर का प्रोग्राम होता है कि किस नंदी से कौन गाय होनी है। तो डीएनए सुपीरियर होगा, अनुवांशिक रोग नहीं आएंगे। अदरवाइज इनब्रेडिंग में डीएनए डिटेरियोरेशन होता है। तो दिन ब दिन अच्छा होता गया और मेजर गायों के पाँच पीढ़ी के रिकॉर्ड हैं, कोई-कोई 15 पीढ़ी के। जनरली तीन-चार बच्चे के बाद परफॉर्मेंस नहीं होता है। वर्ल्डवाइड, भारत में पाँच बच्चे के बाद इतना नहीं रहता। उसके बाद बच्चा नहीं होता, नहीं होता या फिर परफॉर्मेंस कम होता है या फिर कोई छोड़ देते हैं, ऐसा होता है। हमारे यहाँ पर बच्चे देने के बाद भी दूध में परफॉर्मेंस अलग लेवल पर चालू है, 18 लीटर से प्लस वाली। तो यह जीन पूल वर्ल्ड में कहीं नहीं है। तो ऐसी गौ माताएँ पैदा हो कि लोग घर से निकाले नहीं जल्दी घर से। तो ऐसी गायों के बछड़े हम जिस गांव में 100 गाय, 50 गाय, उसको फ्री देते हैं, फॉर ब्रीडिंग। और ऐसे हमारे 360 से ज्यादा फ्री ब्रीडिंग सेंटर चलते हैं, पूरे गुजरात में।
गुजरात में, पूरे गुजरात में। और जन्म, सारे बछड़े बुकड हैं, जन्म नहीं हुआ, ऐसे 300 से ज्यादा एडवांस बुकिंग हैं। यार, तो बहुत बढ़िया। तो आप अगर फ्री दे देते हैं, तो इकोनॉमिक मॉडल कैसे बन रहा है?
गौ के अराउंड, जैसे हमने जब शुरू किया, उस चिंतन में था कि खाली हमारा नहीं, गौ माता का सच्चा घर है, वो किसान का घर है। अच्छा, गौशाला हमारा आपातकालीन धर्म है। पिंजरापोल, आपातकाल। यह सीरियसली आपातकालीन है। मतलब ये, यह शास्त्र में इसका कोई वो नहीं है, गौशाला रखने का। नहीं, शास्त्र में गौशाला है, जैसे राजा, रजवंश, सबके अपने-अपने बड़े हर्ड होते थे। जी, लेकिन मेजर जो उसका पालन-पोषण होता था, वो किसान के घर पर होता। हर किसान के घर पर पाँच, दस, पाँच, दस, 20 गाय होती थी। तो मेजर संख्या 90% किसानों के घर पर होती थी। ठीक है, तो वो क्यों छूट गया? तो हमने, अगर हम गौशाला का देखो तो मुझे मुनाफा है, लेकिन मैं उसको सेवा की भाव से जब देखता हूँ कि यह सबका अधिकार है। अच्छा, नंदी आज गांव में कोई 5 लाख का नंदी कैसे खरीदेगा? तो हमारे नंदी बहुत अलग लेवल के हैं। तो वह नंदी जो ब्रीडर्स लोग ऊँची-ऊँची कीमत में बेचते हैं, 5 लाख, 15 लाख, सीमेंट कलेक्शन। तो हमने ये सीधा लोक-भोग्य बनाने के लिए गांव में, ये गांव का, गाय माता का और देश का अधिकार है। तो यह हमने फ्री चेंज शुरू किया जो पहले के राजवंश में होती थी, हर गांव में एक नंदी होता था, तीन साल में उसके वाड़े चेंज होते थे। अच्छा, तो ये एक पक्ष हमने जरूरी था, वो किया और सच में इतने सुंदर परिणाम हैं। और नेचुरल सर्विस जो गायों को नंदी के द्वारा मिलती है, उसमें 90% सक्सेस रेशियो है। आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन से अभी 32% ही है। अच्छा, तो नेचुरल सर्विस से उनकी रीप्रोडक्शन डिस्टर्ब नहीं होती है, सक्सेस रेशियो बढ़ जाता है, उसकी ओवरी के अंदर कोई डिस्टर्बेंस नहीं होता, इसलिए ज्यादा ब तक वो गाय स्वस्थ पूर्वक रह सकती है।
तो पहले तो एक प्रश्न जो एकदम मेरे दिमाग में आ रहा है कि अभी जो सारा नैरेटिव है, सब जगह यह है कि गाय जब दूध देना बंद कर दे तो गाय का करें क्या? सारे भारत में यह फैला पड़ा है कि आप देखिए, अभी एक डॉक्टर बजाज है, सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज, उन्होंने एक टॉक दी थी, द संगम टॉक्स पे, कुछ मेरे ख्याल 2019 या 20 की टॉक है। हाउ पॉपुलेशन ऑफ काउस एंड बफेलो। जो 80% गाय होती थी और 20% भैंसे होते थे, वह पूरी रिवर्स हो गई है। मोस्ट स्टेट्स में, छत्तीसगढ़ शायद उन्होंने कहा कि इसमें नहीं हुई है क्योंकि लॉज इस तरह के हैं। यह रिवर्स इसलिए हुई है क्योंकि सारा का सारा इंडस्ट्री अराउंड भैंस के स्लॉटर पे है कि दूध दे दिया, जब दूध देना बंद करा तो दो। वो स्लॉटर, जो 82 स्लॉटर हाउसेस हैं, मुसलमानों के लार्जली 81 ओन और उनमें जाएंगे और वहाँ पर फिर एक्सपोर्ट होता है। रोज के हर रोज के भारत एक लाख भैंसा काटता है। सेकंड-थर्ड लार्जेस्ट बीफ एक्सपोर्टर है। मतलब बीफ हुआ अगर भैंस का है तो सारा नैरेटिव है कि सड़क पर घूमती रहते हैं जब दूध नहीं देंगी तो करें क्या? फिर जाकर खेतों को खराब करती हैं। नंदी का तो करें क्या? अब आप, आप बोल रहे हैं कि सब सलूशन है आपके पास।
जी, देखिए, गौ माता को केंद्र में रखते हुए भारत हजारों साल श्रेष्ठ रहा। जी, हम उसकी गहराई में गए कि किसान को दूध ऊँचा-नीचा होता है तो सबकी नज़र ऊँची-नीची होगी। क्योंकि ऑफकोर्स जो पैसा नहीं मिलेगा तो किसान बेचारा तकलीफ में है। जी, तो उसके लिए हमने मेन प्रोडक्ट गोबर बनाया। 10 साल हमने रिसर्च किया कि गाय का गोबर मुख्य प्रोडक्ट बन जाए, दूध बायप्रोडक्ट बन जाए। जब दूध नहीं दे तब भी। आज आपको मैं इतनी सरल मानवीयता छोड़ दी हमने कि सगी माँ एक साल दूध पिलाती है, बाकी के 99 साल ये हमको पालती है। फिर भी उस गौ माता के संग यह व्यवहार तो दम हो जाएगा देश में। बिल्कुल। तो उसने, मैंने सोचा कि नहीं, दूध के अलावा जो मुख्य प्रोडक्ट आर्थिक व्यवस्था के संग जोड़ेंगे और साथ-साथ में सम्मान के साथ में तो अच्छा होगा। तो हमने एक पद्धति की तैयार करी। हमने गोबर, गौमूत्र, दूध, दही की पाँचों गव्य और 21 औषधियों में से गुड बैक्टीरिया को आइसोलेट किया। उसके मेटा जिनोमिक्स की चेन ऑफ सीरीज करी, डीएनए-आरएनए टेस्ट करवाए। वो बैक्टीरिया जमीन पर जाकर क्या करेगा, वनस्पति पर जाकर क्या करेगा, उसका पूरा एनालिसिस करवाया। एनएबीएल एक्रेडिटेड लैबोरेटरी में करवाया ताकि सर्व जगह पर मान्य हो। फिर उसकी चेन ऑफ सीरीज करी, प्रैक्टिसेस की। इसके साथ ये होगा, जमीन पर जाकर ये हो रहा है, यह वनस्पति ये हो रहा है, पूरी। फिर 10 साल रिसर्च के बाद एक हमने कृषि की पद्धति तैयार करी कि वह जीवाणु के द्वारा और गोबर के द्वारा ऐसी पद्धति हो कि सात दिन में यूरिया, डीएपी और पेस्टिसाइड बंद हो जाता है। और केमिकल जितना उससे डेढ़ गुना, डबल और कोई-कोई फसल में तीन गुना भी परिणाम आता है। और पहली सीजन में किसान डरता क्यों है गौ आधारित या ऑर्गेनिक या प्राकृतिक कृषि करने से? क्योंकि उत्पादन कम होता है, यही तो। यह भी नैरेटिव है कि दो या तीन साल लगते हैं। जो व्यक्ति यूरिया और फर्टिलाइजर यूज़ कर रहा हो, उसको अपने लैंड को इस सबसे रिवाइव करने के लिए तीन साल। ऐसा बोलते हैं। ये नॉर्मल मैंने सुना है। भाई, जो आप बोल रहे हैं, फर्स्ट, फर्स्ट सीजन में ये रिवर्स हो जाएगा और नॉट ओनली फर्स्ट सीजन बट सात दिन के अंदर आप बंद कर सकते हैं। सात दिन के अंदर बंद होना। उसके भले केमिकल के रेसिड्यू ग्रैजुअली उसका धीरे-धीरे। बट सबसे बड़ा डर किसानों का ये भी है क्योंकि उसको उत्पादन होने वाली पद्धति दुनिया में सिखाई जाती है। लेकिन इस पद्धति में ऐसा है कि सात दिन में बंद होगा और पहली सीजन में केमिकल जितना उससे डेढ़ गुना और कोई-कोई फसल में डबल से ज्यादा उत्पादन आ जाता है। तो किसान स्वीकार कर पाएगा। और हमने वो कार्य शुरू किया। ये डॉक्युमेंटेड है। यस, हमने उसकी चेन ऑफ सीरीज करी और, और, और जगह पर पूरे भारत में एक्सपेरिमेंट किया जहाँ पर सिमिलर रिजल्ट ऐसे हैं, सब जगह। हमने अब तक 22 राज्यों में काम किया, 65 से ज्यादा फसल, 10 प्रकार से ज्यादा मिट्टी, काली, चिकनी, रेतीली, सब मिट्टी, सभी पानी। 1200 टीडीएस के ऊपर आम नहीं उगता है। हमने कच्छ में 1800 टीडीएस और पर्टिकुलर एक एरिया में 3500 टीडीएस, जहाँ दूध में डालने से फट जाता है। अरे, वहाँ पे हमने आम से लेके 15 फसल उगवाई। तो ये गौ माता का जो गोबर है, उसमें बोलते हैं कि गौमूत्र वस्ते लक्ष्मी, वो नज़र के सामने हमको मिला और वो हमने प्रयोग किए और इतने सुंदर, भाई साहब, परिणाम हैं कि जैसे हमारे एक सूरत के पास बंधु है, 30 टन गन्ने की उत्पादन है, भारत भर में एवरेज केमिकल से पर एकड़। तो वो आदिवासी बंधु को पहली सीजन में 78 टन गन्ना निकला। शुगर मिल के अधिकारी गए, उन्होंने शुगर का टेस्ट करवाया। जनरली 10% रिकवरी आती है, इनकी साढ़े 15%, मतलब इसका क्या मतलब? गुड़ ज्यादा निकला, शुगर ज्यादा निकला। तो उनका 55 लाख रुपए का मुनाफा हुआ, पर एकड़। तो वह बंधु, आदिवासी बंधु है, उन्होंने तीन गाय और गोबर के लिए पिंजरापोल से लेकर के आ गए। नहीं, दूध देने वाली, हमको गोबर चाहिए। यह प्रोडक्शन मिल रहा है। ऐसे ही दूसरे बंधु ने मिल के अभी 65 लाख का गोबर खरीदा और 25 गाय गोबर के लिए लाए। ऐसे दक्षिण भारत में सुनील जी करके हैं, कर्नाटक में, उनका उत्पादन 110 टन पर एकड़ है। अभी कहाँ 30 टन, कहाँ 110 टन। वो सुनील जी 15 से ज्यादा फसल इस पर कर रहे हैं और अभी देसी गाय की सेवा कर रहे हैं और पूरा परिवार इतने भाव से गाय रख रहा है क्योंकि ₹1 लाख पर एकड़ उसका एवरेज प्रॉफिट है। और एक अमरीश जी पाटिल है, अनार, सबसे जटिल फसल है। अच्छा, पर एकड़ का खाली पेस्टिसाइड का अनार में खर्चा होता है 12 लाख का। अच्छा, पोमोग्रेनेट में तो 21 प्रकार के पेस्टिसाइड्स डलते हैं और बहुत किसानों को लॉस जाता है उसमें। कभी-कभी थोड़ा फर्क हो गया तो जी, वो सात साल से इस पद्धति से खाली अनार उगा रहे हैं और 65 लाख का प्रॉफिट है उनका, एवरेज है सात साल का। वो 15 लाख की गाड़ी लेकर घूम रहे हैं, बंगला है उसका। बेटा अभी शहर नहीं जाना चाहता है। तो युवा लोग गांव में, शहर से ज्यादा पैसा मिलेगा। अच्छा, मुझे बताइए, अभी जो 5 लाख मुनाफा कर रहे हैं, दो-चार एकड़ जमीन है, 15 लाख रुपए निकले, वो जमीन बेचेगा क्या? क्यों नहीं? बिल्कुल, बिल्कुल भी नहीं। बै, अच्छा, उसको शहर में कोई पैकेज देगा क्या? नहीं, पॉसिबल ही नहीं ना। तो लाइफ वैसी है, सबको पता है कि गांव की लाइफ बहुत बेटर है, बट वहाँ जाकर मारामारी है और फाइनली कुछ बचता नहीं है। शरीर तो खत्म होता है, बचता किसी के लिए कुछ नहीं है। तो ऑप्शन रहेगी तो सब वापस आयेंगे।
अच्छा, गोपाल भाई, यह बताइए, मगर क्या यह छोटे खेतों पर भी काम करेगा? हमारे लैंड, लैंड ओनरशिप बड़ी-छोटी है।
बिल्कुल। देखिए, छोटे के लिए हमने यह ज्यादा फोकस किया। वो कितना उसका कारण है? नहीं-नहीं, कितनी कमाई हो सकती है, गौ इकॉनमी के अराउंड। कितना छोटे खेत में एक परिवार, पाँच लोगों का, छः लोगों का, अपने आप को सेल्फ सस्टेनेबिलिटी में आने के लिए। जैसे भारत में 80% किसान दो एकड़ से छोटे। ठीक है, तो हमने यही चिंतन किया कि यह दो एकड़ में से पाँच-छः एकड़ का उत्पादन निकल गया। ठीक, और खर्चा कम हो गया तो स्वाभिमान से टिक जाएगा। तो दो एकड़ से पाँच-छः एकड़ का अगर आपका यह गोल था कि अगर इतना निकल जाए तो पूरा सेल्फ रिस्पेक्ट, स्वाभिमान से अपनी जीवन यापन कर सकता है और यह होने लगा। जैसे इस छोटे से एक एकड़ के अंदर हम किसानों को बताते हैं कि हमारे पद्धति में सरल पाँच चरणों में खेती है। ठीक है, और हमारा चिंतन था कि 100 बच्चे गांव छोड़ते हैं, उसमें से एक का कैरियर मुश्किल से बनता है, बाकी 99 का पूरी जिंदगी मेहनत करके घर नहीं बनता है और पूरी जिंदगी यस-बस, यस-बस करना है। बिल्कुल। तो वही परिवार ना टूटे, गांव में रह जाए, जमीन बच जाए, गाय बच जाए, स्वास्थ्य बच जाए। जी, तो अभी हम लोगों ने क्या किया कि पाँच चरणों में खेती का पूरा एक पद्धति निकाला। तो जैसे पहला चरण है कि हमने ये बैक्टीरिया आइसोलेट किया, वो है क्या। ठीक है, तो 110 प्रकार के बैक्टीरिया उसके अंदर, एक बोतल के हम लोग फ्री देते हैं। तो पहला चरण है, उसको मल्टीपल कैसे करना? तो एक लीटर बोतल हम फ्री देते हैं किसानों को। ठीक है, उसको 200 लीटर पानी में डालना है, दो किलो अंदर गुड़ डालना है और दो लीटर छाछ डालनी है, देसी गाय की। ठीक है, एक हफ्ते में एक का 200 बन जाएगा। अच्छा, मैंने आपको दिया, आपने 200 बना के एक लीटर किसी और को दिया, उसने भी घर पे जाके उसका ये किया तो उसका बना, तो ये सादी भाषा में बोलो तो जामन हो गया, जामन खराब होगा। ठीक है, बिल्कुल। हम पता है, दही, दही आपके घर पे बनता रहेगा। तो ये पहला स्टेप है कि उसके घर पे ही ये बनता है। तो वो स्टेप का कैसा डिटेलिंग में है वो हमारे फुल वीडियो में कभी देख सकते हैं। ठीक है, तो उसके घर पर बनेगा, पहली बात। और 110 बैक्टीरिया किसान के घर पर बनने वाला, यह दुनिया का पहला प्रोडक्ट है। ठीक है, तो यह हो गया पहला स्टेप। अभी दूसरा स्टेप है कि एक एकड़ कम से कम एक से दो गाय, हमारा दर्शन है। ठीक है, समझ लीजिए, मूंगफली, तुअर, चना, कुछ भी उगाया, दाना बाहर बेचा, पत्ता तो निकलेगा। भाई, एक एकड़ में दो गाय खाए, उतना पत्ता आराम से निकलता है। तो दो गाय का मिलके, बड़ी गाय का 10 टन गोबर और गौमूत्र आराम से निकलता है। तो इसमें आजकल अब जैसे मैंने भी देवघर के बाहर एक जमीन ली है, वहाँ पर गौशाला शुरू करने का विचार कर रहा हूँ। तो वहाँ पर ये बोल रहे हैं कि कोई नेपियर ग्रास या कुछ लगानी चाहिए क्योंकि गाय के लिए न्यूट्रिशन के लिए वो बेस्ट है। आप बोल रहे हैं कि जो खेत में उग रहा है उसमें ही हो जाता है।
नहीं, नेपियर को हमने भी प्रमोट किया है और ऑलरेडी हमारा चालू भी है। तो वो विषय भी मैं आपको इसमें जोड़ता हूँ। जैसे ये आपके मूंगफली का पत्ता निकला, वो उससे दो गाय आराम से पलती है। ठीक है, तो दो गाय का मिलके 10 गोबर हो गया। चलो, आपका बागायती कोई फसल है तो बाउंड्री पर आपने नेपियर लगा दिया, एक छोटा सा पार्ट नेपियर लगा दिया। तो हमने सवा सौ घासों पे R&D की है आप तक। ठीक है, तो उसमें से अच्छी वैरायटी नेपियर की, अच्छी जिंजवा की वैरायटी, अच्छी पैरा की वैरायटी हम लोग किसानों को निशुल्क थोड़ी-थोड़ी गांठें देते हैं। उसमें से उनका मल्टीप्लिकेशन हो जाता है। तो बाउंड्री पे हम बोलते हैं, सजना लगा दो। अच्छा, मोरिंगा, ड्रमस्टिक, उसकी एक इंच मोटी डाली, पत्तों के साथ खिला दो गाय को। उसके जैसा दुनिया में कोई भी चारा नहीं है।
अरे वाह! तो वो गाय फ्री में और कंसंट्रेट फीड का खर्चा भी लॉस, मतलब आधा ही रहेगा। तो इतने गाय के समाधान हो जाते हैं, तबीयत अच्छी हो जाती है, इनफर्टिलिटी के समाधान हो जाते हैं। मास्टाइटिस का इशू नहीं है, प्रोलेप्स के केसेस नहीं होता है। तो बाउंड्री से गाय पाल जाना। ठीक है, फिर जो दो गाय का मिलके 10 टन गोबर निकला, फ्री में मिला और 10 टन गोबर के ऊपर ये बैक्टीरिया छिड़कना है। दो फीट ऊँचा, दो फीट चौड़ा लाइन करके, कोई पेड़ के नीचे, कोई कंस्ट्रक्शन, कुछ नहीं कर रहा है। तो यह बैक्टीरिया जैसे ही छिड़केंगे तो पूरी दुनिया भर में अर्थवर्म, वर्मीकम्पोस्ट उसका फेमस है, खाद बनाना। हम तो वर्मीकम्पोस्ट में महंगा पड़ता है क्योंकि एक टन के पीछे 2500 का खर्चा होता है। कुत्ते-बिल्ली आके खाते हैं उसको, पक्षी आके खाते हैं। इसको ये झंझट नहीं है। ये बैक्टीरिया छिड़क के जाओ, उससे नमी बना के रखना है। 60 दिन में भाई साहब वर्मीकम्पोस्ट से अच्छा खाद बन जाएगा।
अरे बाप रे! वर्मीकम्पोस्ट में 4 से 6% कार्बन होता है, इसमें 19% प्लस चला जाता है। तो जो छिड़कना है वो एक वर्मीकम्पोस्ट जैसी जगह में, ऐसा नहीं है कि गोबर खेत में डाल के फिर छिड़कना। हां, ऐसा नहीं, एक जगह कोई उसको, उसको ठीक है। कोई पेड़ के नीचे होगा, कोई ग्रेनेट के नीचे। हां, वर्मीकम्पोस्ट जैसा खर्चा करने की जरूरत नहीं कि ये ऐसे प्लेटफॉर्म बनाना पड़ेगा, ये होगा। इतना डेप्थ में कुछ नहीं, कुछ नहीं, सिंपल गोबर आपने एक जगह पे, पेड़ के नीचे लाइन किया, ऊपर बैक्टीरिया छिड़का या ड्रिप लगा दी बैक्टीरिया की, खत्म। 60 दिन में वर्मीकम्पोस्ट से अच्छा खाद। 4 से 6% कार्बन वर्मी में आता है, इसमें 18 प्लस, 19 प्लस। फिर कॉपर, मैंगनीज, सारे मैक्रो और माइक्रो न्यूट्रिशन बदल जाते हैं। और सबसे इम्पोर्टेंट, देशी गाय के गोबर का हमने एनालिसिस कराया, 1200 कंपाउंड निकले। देशी गाय के मूत्र का हमने 300 गाय का सेपरेट एनालिसिस करा है, 5100 कंपाउंड निकले जो विश्व में किसी के मल-मूत्र में नहीं हैं। तो यह कंपाउंड जो है वह अवेलेबल फॉर्म में यह बैक्टीरिया रखते हुए उसको कंपोस्ट करता है। तो यह दुनिया का सबसे ताकतवर कंपाउंड वाला खाद हो गया। आज दुनिया बोलती है कार्बन चाहिए खेती में, लेकिन वनस्पति के कार्बन जो आता है उसको भी कार्बन बोलते हैं, भैंस के गोबर को भी कार्बन बोलेंगे और देशी गाय के गोबर को भी कार्बन बोलता है आज का साइंस। लेकिन वनस्पति के कचरे में 50 कंपाउंड हैं, देशी गाय के गोबर में 1200 कंपाउंड हैं। तो 1200 कंपाउंड और 50 कंपाउंड वाला कार्बन अनमैच्ड नहीं होगा। तो हमने दुनिया का श्रेष्ठ कार्बन कौन सा है वो परिभाषा दी। सिक्किम 30 साल से ऑर्गेनिक कर रहा है लेकिन उत्पादन क्यों घटा? केमिकल से क्यों कम है या उतना ही क्यों है? क्योंकि वो वनस्पति का कचरा है, गाय नहीं जोड़ी है। तो हमने गोबर मेन प्रोडक्ट हो गया। ये हो गया सेकंड स्टेप। वो गोबर खेत में हम डलवाते हैं एक बार साल में, बिजाई से या बारिश से 10 दिन पहले। आपने जो अभी बात बोली ना उससे एक बस थॉट ट्रिगर हुआ। मैं ऑडियंस के लिए बोलना चाहता हूँ। संगम टॉक्स पे एक प्रोफेसर है, आईआईटी के, मैं नाम भूल रहा हूँ, उनका श्री श्री रविशंकर के साथ कुछ काम करते हैं। उन्होंने बताया था कि नेचुरल फार्मिंग जो आजकल बोलते हैं वो बिल्कुल फाइनेंशियली अनवायबल है और क्योंकि ये वर्मीकम्पोस्ट, सेम बात आप ही बोल रहे हैं। वो मैंने पहली बार वहाँ सुनी क्योंकि अभी तक तो हमेशा नेचुरल फार्मिंग, नेचुरल फार्मिंग करते हैं। वो कहते हैं बिल्कुल फाइनेंशियली अनवायबल है। वो भी गाय के ऊपर उनकी रिसर्च थी कि जो इंटेस्टाइन में से यही माइक्रो बैक्टीरिया निकलते हैं। तो बस मैं इतने यहाँ पर छोड़ता हूँ, बट यह मुझे थॉट ट्रिगर हुआ कि वो फाइनेंशियली अनवायबल है, यह मैं दूसरी बार सुन रहा हूँ। जी, और वो खाद 2000 किलो, एक टन पड़ता था वर्मी और ये 200 में खाली गुड़ का ही खर्चा हो गया। That's it! तो बहुत सरल, ज्यादा प्रभावी खाद मिल गया। वो खेत में डाला। ये हो गया सेकंड स्टेप कृषि का। अभी तीसरा स्टेप, यही बैक्टीरिया पानी के साथ छोड़ना होता है, जो भी पानी आप छोड़ो फसल के लिए, उसके साथ 2000 लीटर पर एकड़ छोड़ देना है, महीने में। यह हो गया तीसरा स्टेप। सारी खेती को ही वो बेनिफिट कर रहा है। सारी खेती को उसका क्या गुल खिलाएगा मैं आगे बताता हूँ। तो ये तीसरा स्टेप हो गया कि बैक्टीरिया छोड़ देना है।
और आखिरी चौथा स्टेप कि यही बैक्टीरिया पेस्टिसाइड्स को रिप्लेस कर देगा। सात दिन में क्या करना है? यह बैक्टीरिया 3 लीटर पंप में लेना है, 3 लीटर छाछ और 9 लीटर पानी। कोई भी फसल हो, स्प्रे कर दो, खत्म। अपने शरीर में से ऐसे एंजाइम्स छोड़ता है, 14 बैक्टीरिया इसके अंदर जो नहीं काम के फंगस, कीटक सबको दूर रखता है, उसके अंडे पनपने नहीं देता है। तो जो 2000 लीटर पेस्टिसाइड नहीं कर रहा, यह 30 पैसे, किसान के घर पर बनेगा। अभी मूल बात पे आता हूँ कि ये बैक्टीरिया यूरिया, डीएपी, पेस्टिसाइड कैसे रिप्लेस करेगा? टेक्निकली तो यूरिया क्या है? नाइट्रोजन है। हवा में से ग्रैन्यूलर फॉर्म में वो लोग बनाते हैं बड़ी-बड़ी कंपनियाँ। उसमें उसके अंदर 46% नाइट्रोजन होता है और बाकी के हानिकारक कंपाउंड होते हैं। ठीक है, ये जीवाणु जो ड्रम है उसके अंदर 244 जीवाणु ऐसे हैं, बैक्टीरिया जीनस जो खेत में गोबर डाला उसका उपयोग करके डायरेक्ट हवा में से नाइट्रोजन फिक्स करते हैं और उतनी स्पीड में कि जितनी स्पीड में यूरिया, उससे भी ज्यादा। तो भले 30 साल से यूरिया डाला हो, ये जीवाणु खेत के अंदर ही वो हवा से नाइट्रोजन फिक्सेशन का काम करेंगे। तो सात दिन में यूरिया बन जाएगा। भले 30 साल से, 40 साल से बाप-दादा। सेकंड, इसी के अंदर आठ बैक्टीरिया फास्फोरस फिक्स करने वाले, तो डीएपी बन जाएगा। इसी के अंदर सात से ज्यादा बैक्टीरिया सल्फर उपलब्ध करने वाले, तो सल्फर नहीं खरीदना है। इसी के अंदर दो बैक्टीरिया पोटाश उपलब्ध करने वाले, पोटाश खरीदना नहीं है। ग्रोथ प्रमोटिंग के लिए सात बैक्टीरिया अंदर हैं तो ग्रोथ प्रमोटर्स का
14 जीवाणु है उसके अंदर। सोमन सब फेमस है इसके अंदर। सूडो मोनस, सोल्ट मोनस, एंटर बैक्टर, एंटर कोकस ऐसे करके 14 स्ट्रेंथ ऐसी है जो एक्सीलेंट लेवल पर काम करके बड़ी से बड़ी मुश्किल जो 00 हज लीटर दवाई से काम नहीं होता, यह 30 पैसे बन जाता है। तो यह सारा मामला बंद। और सबसे खुशी की बात कि यह केचवे वाला जो है वो विदेशी केच पर रहता है, लेकिन ये जहां पर भी हमारे पांचों स्टेप फॉलो हो गए, 10 दिन के अंदर देशी केचुआ एक्टिव हो जाता है जमीन में। मुझे नहीं पता था विदेशी केचुआ भी हम डालते हैं, नहीं। ऊपर तो विदेशी वाला ही करता है, देशी वाला तो अभी शुरू हुआ, अभी तो है ही नहीं। अब तक तो विदेशी से इम्पोर्ट करके उसी को मल्टीपल करके उसका बर्म कंपोस्ट बनता था, पता था मुझे। यस यस यस। उसकी काफी कंट्रोवर्शियल बातें भी, कोई प्लस माइनस, लेकिन मैं इसमें नहीं जाना चाहता हूं क्योंकि उसमें केमिकल से तो अच्छा ही है वो ऑफर्स। लेकिन इसके अंदर क्या होता है कि जो ये अप्लाई हो गया, गौ कृपा अमृतम और ये गोबर का सही देशी का कॉमिनेशन, 10 दिन के अंदर देशी कचवे की काफी वैरायटी पैदा होती है। कोई कोई वैरायटी ऊपर से लेकर 20 फुट नीचे जाने वाली पैदा होती है, कोई कोई मिट्टी खाने वाली पैदा होती है। तो नीचे की समृद्ध मिट्टी खाके अवेलेबल फॉर्म में ऊपर विष के स्वरूप में छोड़ेगा। दूसरा, पहले बाल जितना पतला आएगा, फिर मोटा मोटा, अच्छे इतने एक्सलेंट परिणाम होते। तो 1000 केच को अच्छा वातावरण मिलता है ना राहुल जी, एक साल में वो 8वा लाख बनते हैं। ओ बाप रे! और ऊपर नीचे, ऊपर नीचे एक छेद किया, दूसरी बार छेद नहीं उपयोग होगा तो पूरी जमीन बैक्टीरिया और केचुआ एक ही साल में पोरस बना देगी। तो ये वाटर लेवल क्यों नीचे जा रहा है पूरी दुनिया में? क्योंकि जमीन कठिन हो गई केमिकल से। बारिश का पानी आ के टिप के चला गया। तो ये एक ही साल में आपकी जमीन को ऐसा बना देगा कि बारिश का एक-एक बूंद जमीन के नीचे उतर जाएगा। तो हमने देखा 22 राज्यों में जहां-जहां ये उपयोग हुआ, बारिश का पूरा पानी नीचे जा रहा है। तो वाटर लेवल अपने आप समाधान होगा। बाप रे बाप! फिर समंदर किनारे जो खारा पानी नीचे आ रहा है क्योंकि ऊपर का पानी नीचे नहीं जा रहा है, तो कोस्टल एरिया में सब जगह पे नीचे खारा पानी चालू हो गया और कुर्शी बर्बाद हो रही है। तो वहां पर भी यही समाधान हो गया, पोरस हो गया। कैसे? तो पोरस होने से तो बारिश का पानी नीचे आया तो वो बह जाएगा। केच सरवाइव करते हैं अगर ऑलरेडी खारा पानी हो तो सरवाइव कैसे करते हैं? जैसे ये हमने कोई भी जमीन में जिस किसान ने कहीं देखा ही नहीं केचुआ, वहां पे केचुआ एक्टिव होता है। तीसरे माले पे, गमले में पैदा हो रहे हैं। अरे बाप रे! वो तो मतलब किसी तरह मिट्टी में ही रहते हैं, कुछ हो रहा है, कुछ हो रहा है। ऐसे ही ये बड़ा इंटरेस्टिंग है हमारे ना जो मैंने बताया नेपियर जो हमारे को देवघर में जो हेल्प कर रहे हैं, रवि सिंह चौधरी है, बहुत बड़े भया एग्रीकल्चरिस्ट है, फॉरेस्टर, एग्रो फॉरेस्टर। उन्होंने बताया कि कचुए ना जब ऊपर एनवायरमेंट नहीं मिलता वो जाके हाइबरनेट कर लेते हैं, पता नहीं 20, 25, 50 फीट। तो मेरे लिए बड़ी हैरानी की बात थी कि सीरियसली मेरे को लगा मर जाते हैं। उन्होंने कहा मरते नहीं है, जब लैंड री जुविनेट होता है वो अपने आप आने शुरू हो जाते हैं। बड़ी इंटरेस्टिंग बात थी। तो आपने भी यही बात रिपीट करी। उसके बाद में ये जहां पर भी अप्लाई किया ना, तो मधुमक्खी बढ़ जाती है। मधुमक्खी तो पोलिनेशन का काम होता है। तो भारत में 800 प्रकार की मक्खियाँ पोलिनेशन का करती हैं। तो केमिकल से वो मरती है और इसमें डेवलप होती है। फिर चिड़िया बढ़ जाती है। तो चिड़िया छोटी मोटी इली को वही खा के आएगी। तो हमारा जो गौशाला का कैंपस है वो 5जी नेटवर्क के बीच में अहमदाबाद में है, फिर भी जो गांव में रर हो गई, गुरैया, हमारे देसी भाषा में चका और चकी बोलते हैं, वो 1000 से ज्यादा है हमारे कैंपस में। चका चकी, होला, मोर, किंग फिशर, हरा कलर का वाइल्ड कबूतर आता है। हां जी, ग्रीन वो भी है। तो वो सारे चीज नेचरली डेवलप हो। तो गांव विश्व से मात्र जो हमने सुना था गौ में वस्ते लक्ष्मी सुना था, वो हमारी गौशाला और किसानों के घर पर देखना चालू हो गया। बा तो गौ माता क्या आ गई, केचवे आ गए, माइक्रोब्स बढ़ गए। एक ग्राम मिट्टी में पहले दो करोड़ बैक्टीरिया थे 50 साल पहले भारत में। एक ने काम के कीड़े को मारने के लिए दवाई मारी, काम के कीड़े अब जो मर गए, यह वापस माइक्रोब्स बढ़ रहे हैं, मधुमक्खी बढ़ी, चिड़िया बढ़ गई, पूरी प्रकृति वापस एक्टिव हो रही है। तो हमें बहुत आनंद होता है ये नजर के सामने देखते किसानों के घर में। और इसमें बहुत बढ़िया और एक चीज मैं जोड़ना चाहूंगा कि कृषि के अंदर हम लोग के प्रोटोकॉल में हमने बोला कि सब लोग वीडीसाइड बहुत मारते हैं जी, तो वीडीसाइड जो निंदा को मारने के लिए, तो हम बोलते हैं कि उसको मारने के लिए स्प्रे करने के लिए चलना तो पड़ता है। हां जी, उसकी जगह पे हम बोलते हैं कि छोटे साधन से आप पलटी लगा दो, तो अपने आप बैक्टीरिया उसको खा के कंपोस्ट कर लेगा। मतलब जैसे ये दो फसल है जी, उसके बीच में वीड उगा है, तो वहां पे पलटी लगा दो। ठीक है, तो ये बैक्टीरिया जमीन में उसको खा के खाद बना देगा। अच्छा, तो आफत को अवसर में बदल देगा। वो वीड में बहुत ताकत होती है। अच्छा, दूसरा पहले परंपरा थी बेल चलाने की। हमारे बाप दादा वीड को बेल से मैनेज करते थे, तो उसमें दो साइंटिफिक चीजें होती थीं भाई साहब कि एक वीड को खत्म हो गया, साथ में नीचे कोई फसल के मूल का प्रूनिंग हो गया। तो जैसे ऊपर प्रूनिंग करेंगे उत्पादन बढ़ेगा, वैसे ही प्रूनिंग होगा तो नीचे तंतु मूल फूर के वाइट फूड के और उत्पादन बढ़ता है और रिएशन बढ़ता है। और दुर्भाग्य है देश का कि कुछ लोग समझ नहीं पाए, बड़ा महंगा ट्रैक्टर, बड़ा सब्सिडी खर्चा, महंगा ट्रैक्टर, डीजल महंगा, इम्पोर्ट करना, वो ट्रैक्टर डीजल खाके धुआं निकालता है और बैल घास खाके गोबर निकालता है। अब किसके ऊपर सब्सिडी होना चाहिए था? बिल्कुल अपना बेल के ऊपर सब्सिडी। तो यह देश का दुर्भाग्य रहा कि एक बेल की जगह पे यह ट्रैक्टर को सब्सिडी देकर के पूरे देश के 99 पर बैल को इनडायरेक्टली कतल खाने भेज दिया। बिल्कुल बिल्कुल, 100% हुआ है। जो बैल देश का डीजल बचाता था, पैसा बचाता था। बात करेंगे एफिशिएंसी की, बात करेंगे कहेंगे कौन चलाएगा जी? यहां पर ट्रैक्टर से हम कितनी बड़ी जमीन को जोत सकते हैं, बैल से तो नहीं कर सकते, तो फिर इसका क्या आर्गुमेंट रहेगा? जैसे पहले तो सबके घर में बैल था ही, ये तो नॉर्मल प्रैक्टिस था। ये है ना कि छोटा खेत में चलेगा, मगर बड़े खेत में तो ट्रैक्टर ही चलाना पड़ेगा, ऐसा कहेंगे। लेकिन 80% तो दो एकड़ से छोटे ही हैं। 80? हां ये भी सही बात है। तो आज भी हम बोलते हैं कि जहां आदिवासी क्षेत्र में बैल है उनको ट्रैक्टर से ज्यादा सब्सिडी मिलेगी तो टिक जाएंगे, सब्सिडी बैल रखने के लिए, नंदी रखने के लिए। यस, ट्रैक्टर को दे सकते हैं तो इसको क्यों नहीं दे सकते? सही बात है, है ना? वो खाद अच्छा बचाता है। तो इस प्रकार हम जाते हैं, लेकिन मैं आपको ऐसा ही कहना चाहूंगा कि हमारे एक कुछ एग्जांपल है जो उसको आप शो कर सकते हैं कि निवृत्ति पाटिल जी करके साइंटिस्ट है, हॉर्टिकल्चर कृषि विज्ञान केंद्र, वाशिम में वो काम करते हैं और उन्होंने हल्दी के अंदर पहली सीजन में प्रयोग करवाया तो केमिकल से हल्दी आई 800-900 ग्राम, वो पहली सीजन में 1 किलो 900 ग्राम हो गई। अच्छा, हल्दी के अंदर करक्यूमिन आता है, मेन एंटी कैंसरस कंपाउंड, करेक्ट? वो तीन से सात आता था, गवर्नमेंट की रिसर्च करी हुई वैरायटी थी, पहली सीजन में चला गया 55 प्लस। तो क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों बढ़ गया। बिल्कुल, उनको दिल पे आ गया, नहीं? उन्होंने एक ही खेत में छह पद्धति के प्रयोग किए थे। एक में हमारा पद्धति, एक में दूसरा गाय आधारित, इसमें तीसरा एक में डिबिया वाला, एक में ऐसा। बोले अतुलनीय परिणाम है। क्या करना है? हम बोलते हैं कि आपको परिणाम मिला, आप 100 लोगों को सिखाए और ज्यादा आपकी क्षमता तो 1000 से ज्यादा किसान के डाटा है उनके पास और 10000 से ज्यादा लोगों को बांट चुके हैं। तो वो दिल से इतना कार्य कर रहे हैं कि अपने पगार का एक लाख रुपये वो हर साल किसान को ये ट्रेनिंग में एक्स्ट्रा देने में लगाते हैं। तो हम किसान को फ्री सिखाते हैं ना, साथ में किसान को रिक्वेस्ट करते हैं 100 लोगों को कम से कम सिखाना और पहला उसको देना कि जो आपको सबसे नहीं पसंद है, उसपे। तो किसान मदद कर रहा है, यह पूरा मोमेंटम किसान चला रहा है। वाह! बहुत ही इंस्पायरिंग। आई होप आपकी इस माध्यम से संगम टॉक्स के माध्यम से टॉक और फैले। और एक चीज मैं आपको विनती करता हूं कि जनरली एक बैक्टीरिया बनाने जाएंगे ना कोई लैब में और खरीदने किसान जाएगा। नाइट्रोजन फिक्सेशन तो 00 लीटर आता है लैब में, मतलब सिंथेटिकली बैल अर ग्रो ग्रो करते हैं तो वो मार्केट में मिलता है। तो एक बैक्टीरिया 00 लीटर आता है नाइट्रोजन फिक्स और घड़ी-घड़ी खरीदने पड़ेगा, घर पे नहीं बनेगा। पांच बैक्टीरिया एक विदेशी कंपनी 4500 लीटर बेचती है, घर पे नहीं बनेगा। यह किसान के घर पे बनेगा। 110 वैराइटी है, ऐसा वर्ल्ड में कोई प्रोडक्ट ही नहीं है। तो हम भी बेच सकते थे करोड़ों रुपये का, हजारों करोड़ का। बिल्कुल। लेकिन हमारे गुरुदेव जी के शब्द याद आए और हमने पूरा इवोल्यूशन किया कि देश का खर्चा कितना है? तो यूरिया, डीआईपी, पेस्टिसाइड सब मिलके 15 लाख करोड़ से ज्यादा खर्चा है। अरे बाप रे! और वह सरकार और किसान की जेब में से कंपनियों में जाता है और 70% पैसा विदेश जाता है। तो यह सारा पैसा बच सकता है इससे। दूसरा, गाय बचेगी क्योंकि गोबर के लिए चाहिए गाय। तीसरा, स्वास्थ्य बचेगा। बिल्कुल। चौथा, हॉस्पिटल्स, अभी तो दवा दवा के हॉस्पिटल्स ही बने जा रहे हैं। हॉस्पिटल, बिल्कुल। स्वास्थ्य बचेगा, माइक्रोब्स बचेंगे, केचुए बचेंगे, चिड़िया बचेगी, यह सारी चीजें बचेंगी। तो हमने और छोटे भाई और सब लोग ने, परिवार ने मिलकर एक बिल बना दिया कि हमारी अगली पीढ़ी का भी अधिकार है। यह पूरी दुनिया के सभी किसान, धरती माता और गौ माता को समर्पित निशुल्क ही सिखाएंगे, निशुल्क देंगे और उसको ही पूरी पैरामीटर्स के हिसाब से हम लोगों ने तय कर दिया और किसानों को बोलते हैं कि आप 100 लोगों को और सिखाना और किसान मदद कर रहा है। आपके माध्यम से भी काफी लोगों को प्रेरणा मिलेगी। मिलेगी, पक्का मिलेगी। इसको और फैलाएंगे, जोर से। थोड़ा सा हेल्थ बेनिफिट्स पे आते हैं। ये जो गाय के अराउंड क्या हेल्थ बेनिफिट्स रहते हैं? रो को घी से या आपने आप घी को बेचने का जो सिस्टम है, आजकल बहुत बिलौना घी बहुत फैल रहा है सब शहरों में। यह अच्छा सिस्टम है। बिल्कुल। देखिए, हमेशा और दूध की भी बात करते हैं कि और क्या हेल्थ बेनिफिट रहते हैं ऐसी जो गाय इस एनवायरमेंट में, उसका दूध से क्या बेनिफिट रहते हैं? जैसे हर महीने में दो किलो घी खाता हूं। अच्छा। हर रोज एक लीटर दूध पीता हूं, हर रोज पौना लीटर छाज पीता हूं, हर रोज मिठाई खाता हूं। आपको लैक्टोज इनटोलरेंस, वो सब आपके सामने हूं। हां। एक बहुत बड़ा प्रचार करने की सारी सिस्टम चली है। अलग-अलग वेगन लोग भी ऐसा अलग करते हैं। कोई बोलेंगे यही मिलेसी खाओ, दूध खाएंगे तो बीमार पड़ जाएंगे। मैं सामने हूं, यही आपके सामने ये भगत सिंह भाई है, वो सात-आठवां साल चल रहा है, अनाज ग्रहण नहीं करते, ज्यादातर कच्चा दूध ही पीते हैं। अरे बाप रे! ठीक है, जय हो भाई साहब! तो ऐसे एक मेरे मित्र हैं, साल से दूध पे हैं। ऐसे एक दूसरे थे, वो 30 साल दूध पे। एक्चुअली दूध को सही पीने की परंपरा ही भूल चुके हैं। दूध को दोष देना गलत है, उनके ज्ञान का कमी है। जैसे आयुर्वेद में बोला है कि कच्चा दूध पीना चाहिए। जैसे ही दूध आप ले रहे हो तो कोई फल उसके साथ नहीं लेना, विरोध। एक ही फल जमेगा आम, वो भी मीठा है तो अच्छा। एक ही सब्जी जमेगा परवल, वो भी घी में बना है, खटास नहीं डली। तो बाकी कोई भी सब्जी के साथ विरोध है, और रोटी भी अगर सदा नमक वाली है तो ही उसके साथ जमेगी। अब बताइए कितने लोग इसको फॉलो करते हैं? तो फॉलो करना नहीं है और दूध को दोष देना है तो कहां ठीक है? तो 5000 साल से पुराने आयुर्वेद ने बोला है कि आवला कौन से भी स्वरूप में गुण नहीं छोड़ता है। अच्छा। तो आज भी साइंटिफिकली प्रूव हो रहा है कि गर्म करो, लिक्विड करो, कुछ भी करो, विटामिन सी मेंटेन है, फ्रूट छोड़ देगा, आवला नहीं छोड़ता है। तो ऐसे ही दूध को सही खाने की परंपरा ही भूल गए। दूध को जैसे ही गर्म करेंगे 99% पे प्रोटीन के मॉलिक्यूल बदल जाएंगे, अवेलेबल फॉर्म में नहीं रहेंगे, पाचन। विटामिन बी12 की स्थिति बदल जाएगी। तो सारा भारत अभी तो विटामिन बी12 की कमी से रहता है। दैट्स व्हाई, मतलब कुछ ऐसा नंबर है कि 60-70% इंडियंस की बी12 कम है। फिर लैक्टोफेरिन नाम का कंपाउंड बहुत इम्पोर्टेंट है कि जो बड़ी-बड़ी कंपनी उसको आइसोलेट, अलग करके सेपरेट करके हजारों रुपये किलो बेचती है, वो नेचरली लैक्टोफेरिन कंपाउंड अवेलेबल फॉर्म में दूध में रहता है। ये क्या करता है? लैक्टोज डाइजेशन। लैक्टोफेरिन जो बहुत इम्पोर्टेंट है हमारे बॉडी के लिए। फिर लैक्टो बेसलेस की पूरी रेंज होती है जो हमारे शरीर के लिए बहुत इम्पोर्टेंट है। फिर इसके अंदर कितने एंजाइम्स हैं जो बॉडी को बहुत इम्पोर्टेंट हैं। ऐसे ही सेरेब्रोसाइड है जो ब्रेन के लिए बहुत इम्पोर्टेंट है। ये सारा कच्चे दूध के अंदर अवेलेबल फॉर्म में होता है। तो पाश्चराइज करना इज डैमेजिंग फॉर द मिल्क इटसेल्फ एंड फॉर द ह्यूमन बॉडी। यस। पाश्चराइज नहीं, गर्म किया तो भी ये सब, गर्म किया और पाश्चराइज किया, दोनों में। तो मैं तो वही बोलूंगा कि गांव के लोग तंदुरुस्त गाय का कच्चा दूध पिएं, हजारों साल से हम पी रहे थे। ठीक है ना? धारो सण निकला और तुरंत पिया। ऐसा दुनिया में कुछ भी नहीं है। दो प्रहर तक कच्चा दूध पी सकते हैं। तो पीने की सही विधि समझना है और यह कर लिया तो 80 करोड़ लोग जो भी विटामिंस की डेफिशिएंसी हैं। गाय का दूध, आयुर्वेद में बोला है और किसी को भी नहीं बोला है, ना किसी अनाज को बोला है, ना फल को बोला है, ना सब्जी को। और उसका एक और प्रमाण दे देता हूं आपके साथ में। जैसे सब लोग आज मिलेट्स का बहुत प्रचार हो रहा है जी, तो मिलेट्स अच्छा है, मैं मानता हूं, लेकिन मैं गुजरात के आदिवासी बेल्ट हैं और उसके बेल्ट के मैं एक एग्जांपल, बनी हुई घटनाएं मैं बताता हूं। रूटीन क्या है उसका, इवोल्यूशन। वो मिलेट्स खाते हैं, हवा शुद्ध है, जंगल है, पानी है, काम करते हैं, धूप मिलती है, लेकिन सबसे ज्यादा सिकल सेल का इशू कहां है? वहां सबसे ज्यादा माल न्यूट्रिशन की दिक्कत कहां है? गुजरात में। वहां है। लाइफ साइकिल सबसे कम किसकी है? उनकी है। ऐसा क्यों? मिलेट्स खा रहे हैं फिर भी ऐसा क्यों है? क्योंकि वह दूध नहीं खाते। दूध से के उनके बच्चे दूर भागते हैं तो धीरे-धीरे डीएनए डेफिशिएंसी होना है। अ उसी के सामने गुजरात की एक कम्युनिटी का एग्जांपल दे दूंगा कि रबार और भरवाड़ समाज है, वो क्या करता है? दूध कच्चा ही खाता है और रोटी। दो ही चीज खाता है। उनकी आप शादियों में जाएंगे ना तो 90% लड़के छह फुट मिलेंगे। मैं हाइट से खाली नहीं मापूंगा, बल्कि उन्होंने आयुर्वेद को पालन कर दिया। क्या कर रहे हैं? वो कच्चा दूध खाते हैं, गाय का और रोटी खाते हैं। दो ही चीज। उस उन कम्युनिटी ने पूरी दुनिया के सब न्यूट्रिशनिस्ट को फेल कर दिए। तंदुरुस्त जीवन जी के दिखाया। ना कोई गोली खाई है, विटामिंस की, ना सब्जी खाया है, ना फ्रूट्स खाया है। कहां से हुआ? उन्होंने आयुर्वेद को अनजाने में प्रमाणित कर दिया। तो मैं विनती करूंगा गाय को शोषण ना करना, गाय को सुख पूर्वक रखना। फिर जो दूध मिला बच्चे को संतुष्टि देना, फिर जो दूध मिला वो प्रसाद है, उससे दूर मत जाना। मिलेट्स खाओ, उसकी खाने की पद्धति अलग है, घी खाने की पद्धति अलग, दूध खाने की। तो दूध खाना ही चाहिए। ऐसे ही घी है। तो आपने तो आधे घंटे में, 40 मिनट में पूरी वीगन वर्ल्ड की मूवमेंट को कोलैप्स कर दिया। हम कहते हैं कि हमारे यहां पर गौशाला में जो काम करते हैं, मैं आपके माध्यम से यही उनको वेगन बंधुओं को भी, बहनों को भी वही कहना चाहूंगा कि भारत के अंदर ऐसी परंपरा थी कि आधा दूध बच्चे को और आधा हमारा था और हमने ये फॉलो कर रहे हैं। हां, अभी कुछ श्रृंखलाएं टूट रही हैं तो उसको भी वापस आप डिमांड करो, वैसे होगा कि जब ये बच्चा देती है गाय तो जंगल में अगर होगी और यही गाय को जंगल में छोड़े तो उसके बच्चे को कुत्ते और सब लोग आके डिस्टर्ब करेंगे। तो हम गाय को सेफ्टी देते थे घर में। तो गाय और मनुष्य का मां और बेटे का व्यवहार। दूसरा कि बच्चा जब घर पर आता है, मां को अच्छे से हम भोजन देते हैं, दूध डबल आता है। तो आधा दूध बच्चा पीता और आधा हम पीते थे, तो उसका शोषण बच्चे का नहीं था भारत में और आज भी हम नहीं करते। आके आप गौशाला में देख सकते हैं बच्चों का विकास। तीसरा, उसी गाय का किसी भी प्रकार का शोषण। ये अगर गाय जंगल में होती तो दो-तीन बच्चे के बाद इतना नहीं होता था, यहां 15-16 बच्चे दे रही है। तो मां और बच्चे वाला संबंध है गौ माता के संग। तो वेगन वाले बंधुओं को मैं उतना ही बोलूंगा, कोई एक्सप्लोइटेशन नहीं है गौ माता का भारत में था ही नहीं। यह धीरे-धीरे परंपरा विदेश से आई है, उसको ठीक करने की जरूरत है, उसको टोटली गाय को रखना बंद करने की जरूरत नहीं है। तो बच्चा खुश है, मां खुश है, मनुष्य खुश है। गोपाल भाई धन्य हैं आप जो यह सब बताया हमारे को और होपफुली सारे ऑडियंस ने सुना। इसको प्लीज फैलाइए। अगर आपके पास छोटे खेत हैं, आपके घर में, आपके जानकारी में लोग हैं जो खेत रखते हैं, उनको इनकरेज करिए, गोपाल भाई से यह सारी जानकारी लेकर इसको इस इस परंपरा को आगे बढ़ाए और अपने-अपने धरती मां, गौ माता और अपने खुद घर परिवार के स्वास्थ्य को आगे बढ़ाए। गोपाल भाई, मैं आपके माध्यम से बस एक ही मैसेज देना चाहता हूं कि धर्म आचरण में आ जाना चाहिए। कोई बोलेंगे मैं शहर में बैठा हूं, मैं कैसे गाय की सेवा कर सकता हूं? मेरी बालकनी में क्या करूं? तो मैं कहता हूं कि हर कोई गाय की सेवा कर सकता है, हर कोई धर्म को आचरण में रख सकता है। आप कल से तय करो कि मैं धूप-बत्ती करूंगा तो गाय की करूंगा, गाय को सपोर्ट हो जाएगा। मैं दीपक जलाऊंगा तो देसी गाय के घी का ही जलाऊंगा, तो गौ माता को सपोर्ट हो जाएगा। मंदिर वाले तय करें कि मंदिर में गाय का ही दूध चढ़ेगा, घी दीपक का गाय का ही होगा, काम हो जाएगा। तो पुजारी लोग भी काम कर सकते हैं। प्रसाद चढ़ेगा तो गाय आधारित अनाज किया है, वही अन्न का प्रसाद चढ़ेगा। सात्विक भगवान को भोग, सपोर्ट हो जाएगा। कृष्ण भगवान ज्यादा खुश होंगे, शिवजी ज्यादा खुश होंगे क्योंकि उन्होंने शिवजी ने मंदिर में ही नंदी जी को मूर्ति को स्थापित किया है, कृष्ण भगवान ने गौ माता को स्थापित किया। ऐसे सभी देवी-देवताओं ने माना है गौ माता सर्वोपरि। ऐसे ही आप तय करेंगे कि गाय के घी का हमें शोषण नहीं करना है। पैसे में आप डेरी का घी लीजिए, घटा बकरा भैंस का दूध का मिक्स आएगा, छह लीटर दूध आएगा, आप बिलौना करिए घर पे जरा तो 0 रुपये वाला दूध 35 लीटर पे एक लीटर घी बनेगा, तो घर पे 25-3000 पड़ेगा। तो आप किसी से 500 रुपये में शुद्ध कैसे अपेक्षा रख सकते हैं? तो मैं नहीं कहता हूं कि मेरा ही घी खरीदो, मेरा तो 5-6000 रुपये पे बिकता है, लेकिन मैं आपको बोलता हूं कि आपके गांव में जो भी गाय रखता है उसको बोलो कि तुम तुम्हारे बच्चे को गाय को ज्यादा दूध पिलाओ और फिर हमको बिलौना करके घी दो, हम 4000 में खरीदेंगे। वो गाय रखेगा कि नहीं? किसान आंदोलन करने नहीं आएगा कि मैं गाय नहीं रखूंगा, वो कतल खाने जाएगी और शहर वाले उतने ही भागीदार बन जाएंगे। तो आप डिमांड एंड सप्लाई का थर्म रूल अपना सकते हैं कि जो किसान गाय रखता है उसकी गाय अडॉप्ट कर लो। ज्यादा पैसा है तो दो-तीन गाय अडॉप्ट कर लो, 10 गाय करो और हर हफ्ते फोटो मंगवा लो गाय के। तो घी अच्छा खरीद के खाओ। अच्छा अन्न आपके घर पर जो पकाए, सब्जी वो हम सोचे कि गाय आधारित खाएंगे तो काम हो जाएगा कि नहीं? ऐसे ही बड़े-बड़े संगठन देश में हैं जो गाय की बातें 70 साल से कर रहे हैं, उसके सभी संगठनों को मैं बोलना चाहता हूं, सभी धर्म के लोगों को बोलना चाहता हूं कि आपके कार्यालयों में देसी गाय का दूध ही आना चाहिए, आपके कार्यालयों में फिनाइल जो गौ आधारित है वही होना चाहिए। अलग-अलग संगठन है, किसी-किसी के 10 करोड़ फॉलोअर्स हैं, वो कल से तय करे कि मैं गाय का देसी दूध खाऊंगा, कतल खाने जाएगी भाई साहब। वह कल से तय करे कि मैं गाय आधारित ही दीपक जलाऊंगा, वही उपयोग करूंगा तो नहीं जाएगी। तो सभी धर्म वाले, मंदिर वाले, संगठन वाले, जो भी गाय को अपने हृदय में स्थान मानते हैं वो तय कर दे कि हमारे सभी फॉलोअर्स गाय आधारित करेंगे, गाय कहीं नहीं जाएगी। पहले हमारा दोष हम ठीक करें और साथ-साथ में फिर प्रचार करेंगे ना, गजब का प्रचार हो जाएगा। तो हमारे बच्चे तो बचपन से गाय आधारित अभी खेलते हैं। मेरा बड़ा बेटा भी 15 गाय धो लेता है, तो भाई की बेटी भी सात गाय धोती है। तो गोबर का काम करना, खेती का काम करना गर्व का विषय है, शर्म का नहीं है। यह वास्तविकता है। उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, कनिष्ठ नौकरी है। यह किसान उत्तम क्यों है? कच्चा प्रोडक्ट वही करता है, कोई लोखंड और कागज थोड़ी खाएंगे। तो मेरी विनती है शहर वाले सभी बंधुओं को, जहां किसान मिले उसको रिस्पेक्ट दीजिए, आर्थिक तरह से, क्षमता से खड़ा कीजिए, गौ माता को खड़ा कीजिए, अपने आप वो टिक जाएगा, नहीं तो बड़े दुखी हैं किसान। तो इस धर्म को निभाएंगे तो ईश्वर खुश होंगे, दंभ में खुश नहीं होंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद राहुल जी, मुझे मौका दिया। जय हो!