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*INDIA's BIGGEST* Mysterious CASE | (2001) Haryana [4K]

BADMASH icON37:36

Transcription

वह साल 2001 था, हिसार, हरियाणा में बरवाड़ा नाम का एक गाँव था जहाँ इलाके के पूर्व एमएलए रेलू राम पूनिया की कोठी थी। घर इतना आलीशान था कि रेलू राम जी की गाड़ी घर की दूसरी मंजिल तक जाती थी, वो भी सीधा बेडरूम के अंदर। पूरे हरियाणा में इस घर के चर्चे थे और लोग दूर-दूर से इस घर को देखने आया करते थे। करके मैं भी हार शिकार दे।

अब इस कहानी में मैं आगे बढूं उससे पहले मैं बता दूं, जब मैं इस घटना पर रिसर्च कर रहा था, पता नहीं कैसे पर इस घटना की असल तस्वीरें मेरे सामने आ गईं। दो-तीन दिन तक मुझसे खाना भी नहीं खाया गया, मेरा मन ही नहीं किया खाना खाने का। सर पकड़ लिया था मैंने अपना और आंसू आते-आते ही रह गए। पहले तो मुझे लगा शायद यह स्टोरी फेक हो सकती है, पर नहीं, काश यह फेक होती, लेकिन इस स्टोरी ने दिमाग घुमा दिया। अगर आप इस केस को डिटेल में स्टडी करना चाहते हो तो यह 300-400 पन्नों की पीडीएफ फाइल है, जाकर इसे पढ़ लेना, दिमाग के फ्यूज उड़ जाएंगे।

23 अगस्त सन 2001। उस दिन रेलूराम की बेटी प्रियंका का बर्थडे था। हिसार के उस घर में, उस कोठी में फुल रौनकें शौनकें, प्रियंका के बर्थडे की तैयारी फुल ज़ोरों-शोरों से होती है। रेलू राम पूनिया रईस आदमी थे, विधायक रह चुके थे, शानो-शौकत और पूरा दबदबा। पार्टी का खाना-वाना घर पर ही बनता है, म्यूजिक का इंतजाम होता है और केक-वेक मंगवाया जाता है। वो म्यूजिक सिस्टम फुल आवाज़ पर चलता है। उस पार्टी में रेलूराम पूनिया जी के फैमिली के सारे लोग मौजूद थे, पर बाहर के किसी को भी नहीं बुलाया था, सिर्फ फैमिली-फैमिली वाले थे। रेलूराम पूनिया, उनकी सेकंड वाइफ, बेटा सुनील और सुनील की वाइफ शकुंतला और उनके तीन बच्चे, खुद प्रियंका और प्रियंका की बहन सोनिया। देखिए, कुल मिलाकर नौ लोग उस घर में मौजूद थे। रात को हवेली की फर्स्ट फ्लोर पर नाच-गाना चल रहा था, म्यूजिक बज रहा है, सब लोग खुश हो रहे हैं, कुछ झूम रहे हैं। इसी बीच खाना-वाना खाने के बाद जब रात के करीब 10-11:00 बजते हैं तो सभी लोग सोने के लिए अपने-अपने रूम्स में चले गए। सुन ले। लेकिन म्यूजिक बंद नहीं हुआ, म्यूजिक सारी रात फुल वॉल्यूम पर बजता रहा और सुबह होने से पहले म्यूजिक भी अपने आप बंद हो गया।

फिर सुबह होती है। देखिए, सुबह का वहाँ का रूटीन था, जो काम करने वाली होती हैं, कोई नौकर-चाकर, ड्राइवर उनका आना-जाना शुरू हो जाता है। घर का दरवाजा खुला हुआ था। जब वो अंदर गए तो अंदर का मंजर ही कुछ इस तरह का था, इतना खौफनाक, पूरा फर्स्ट और सेकंड फ्लोर खून से सना हुआ था, ब्लड ही ब्लड चिपका हुआ था। हर किसी के सर से खून बहकर जमीन के रास्ते दीवार पे, फर्श पे, बेड पे, कोई जगह नहीं थी। पहला विटनेस जो उस घर में घुसा था, वो घर के अंदर से चीखता हुआ बाहर निकला। उसके बाद पूरा गाँव इकट्ठा हो गया। पुलिस को खबर दी जाती है। रेलूराम पूनिया की पूरी फैमिली को किसी ने मौत के घाट उतार दिया, वो भी बहुत ही बेरहमी के साथ। पूर्व विधायक थे, इलाके में उनका असर था, पूरा दबदबा था। थोड़ी ही देर में पूरे जिले के आला पुलिस अफसर भागे-भागे रेलू राम पूनिया के घर पहुंचे। जिस पुलिस अफसर ने भी घर के अंदर जाने की गलती की, वो कांपता हुआ बाहर निकला। ऐसा दृश्य देखने के लिए कोई भी पुलिस वाला तैयार नहीं था, क्योंकि ना तो ऐसा कुछ 2001 में कभी किसी ने देखा था, या पहली बार था। जो अंदर गया उसकी रूह कांप गई। पुलिस ने लाशों को गिनना शुरू किया तो वो देखते हैं, करीब नौ लोगों की लाशें वहाँ पड़ी हुई थीं। शुरू में पुलिस ने यही सोचा कि बड़े नेता हैं, बहुत सी दुश्मनियां होती हैं या किसी बड़ी गैंग ने चोरी के इरादे से घर के हर सदस्य को मार डाला। एंबुलेंस भी तब तक आ चुकी थी। फिर सारी लाशों को उठाने का काम शुरू किया गया।

अब सभी लाशों को धीरे-धीरे उठाकर एंबुलेंस में लादा जा रहा था। जब बारी रेलूराम पूनिया जी की छोटी बेटी सोनिया की आई, सोनिया को पुलिस ने उठाना शुरू किया तो अचानक उन्हें लगा इसकी साँस चल रही है। उसकी बॉडी भी गर्म थी और नब्ज़ भी चल रही थी। तो फौरन उसे हॉस्पिटल लेकर भागा जाता है। तो पुलिस वालों की कोशिश रहती है इसे जल्द से जल्द बचा लिया जाए। उनके मन में था, चलो रेलूराम जी का कोई एक जना तो बचा। हॉस्पिटल में उसका इलाज शुरू हुआ, जख्म उस पर भी बहुत गहरे थे। उधर डेड बॉडीज भी हॉस्पिटल में पहुँच गईं। पुलिस अब अंदाज़ा लगाने में लगी हुई थी कि ये कर कौन सकता है? इतना बड़ा कांड आखिर किया किसने? इसके बाद जांच शुरू हुई। वहाँ से केक और रात का खाना, बर्थडे पार्टी, नौकरों से पूछताछ, सब कुछ होता है। सब बताते हैं कि रात को बहुत ही खुशगवार माहौल था, सब अच्छे से हंस-खेलकर बात कर रहे थे, प्रियंका मैडम का बर्थडे था। फिर पुलिस दुश्मनों की लिस्ट निकालती है, कहीं कोई पॉलिटिकल दुश्मन तो नहीं? कोई ज़मीन, जायदाद, प्रॉपर्टी का, फैक्ट्रियों का या बिज़नेस से रिलेटेड। पूरा दिन ऐसे ही निकल जाता है। उधर सोनिया हॉस्पिटल में है, कोई पूछताछ नहीं क्योंकि वो अभी भी बेहोश थी।

फिर अगले दिन 25 अगस्त को पुलिस की पूरी टीम और फॉरेंसिक यूनिट उस घर में पहुँचती है। उधर हॉस्पिटल में सोनिया जब थोड़ा बहुत होश में आती है तो पुलिस उससे पूछने की कोशिश करती है, आखिर हुआ क्या? क्या हुआ रात को? सोनिया ने कहा, "मुझे नहीं पता। मुझे किसी ने सर पर ज़ोर से मारा और मैं बेहोश हो गई। और उसके बाद मैंने कुछ नहीं देखा। यह भी नहीं पता कितने लोग थे, कौन थे, क्यों किया।" फिर पुलिस ने सोचा, जब बाद में ठीक हो जाएगी, तब ढंग से बात करेंगे। उधर पुलिस और फॉरेंसिक की टीम हवेली पर थी, इन्वेस्टिगेशन चालू थी। हर एक चीज़, हर एक डिटेल को छानबीन करती है, एक-एक दस्तावेज़ को चेक किया जाता है और फिर इसी दौरान पुलिस को एक डायरी में से एक लेटर मिलता है। जैसे ही पुलिस वाले वो लेटर पढ़ते हैं, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर के नौकरों ने बताया कि यह डायरी हमारी सोनिया मैडम की है। उसके बाद वो डायरी और वो लेटर पुलिस अपनी जेब में डाल के सीधा हॉस्पिटल पहुँचती है।

अब 24 घंटे बीत चुके थे और सोनिया ठीक-ठाक बात करना चालू हो चुकी थी। पुलिस ने सोनिया से सिर्फ एक सवाल पूछा, क्या यह डायरी तुम्हारी है? वो बोलती है, हाँ, यह डायरी मेरी है। इस डायरी में नॉर्मल चीजें लिखी हुई हैं। फिर पुलिस सोनिया से पूछती है कि क्या यह हैंडराइटिंग भी तुम्हारी है? वो बोली, हाँ। उसके बाद पुलिस ने उस लेटर को उठाकर सोनिया के सामने कर दिया। इसका मतलब यह लेटर भी तुमने ही लिखा है। अब सोनिया की हवा टाइट हो गई। उस डायरी में जो लेटर लिखा हुआ था, वो लेटर सोनिया ने संजीव को लिखा हुआ था, अपने ही पति को और उस लेटर में यह लिखा हुआ था, ध्यान से सुनना: "मैं अपने घर वालों से इतनी नफरत करती हूँ। अब इनमें से मैं किसी को भी जिंदा नहीं छोडूंगी और इन सबको मार दूंगी। तुम साथ दो या ना दो, मैं ये अकेले करूंगी।"

अब जब पुलिस ने यह लेटर पढ़ा तो उन्हें लगा, भाई कातिल तो घर का ही है। हम पागलों की तरह बाहर झक मार रहे थे। पुलिस इस दौरान सोनिया से पूछती रही लेकिन वो मानने को तैयार ही नहीं थी। फिर सोनिया के पति संजीव को ढूंढा गया। वो दिल्ली में था, पता नहीं छिप कर बैठा हुआ था। पुलिस ने उसे दबोच लिया और फिर उसकी ऐसी रेल बनाई कि उस संजीव ने सारी कहानी उगल दी। फिर सोनिया और संजीव का आमना-सामना करवाया गया तो सोनिया यहाँ टूट गई। उसके बाद जो उन दोनों ने कहानी सुनाई और 23 अगस्त की रात आखिर हुआ क्या था, उस रात की वो मिस्ट्री अब धीरे-धीरे पुलिस वालों को समझ आने लगी। पहले तो आप अपने दिमाग को इसके लिए तैयार कर लो, क्या पता शायद आप भी अपने सर को पकड़ लो, क्योंकि अगर एक बार आपने सुन लिया तो आप चाहकर भी इस कहानी को अपने दिमाग से नहीं निकाल पाओगे। थोड़ा तो रहम किया होता हम पे। और खाना-वाना पहले ही खा लो, बाद में मन नहीं करेगा, ऐसे पछताते फिरोगे।

खैर, आज की वीडियो लंबी होने वाली है और मैं पूरी कोशिश करूँगा इसमें ज़्यादा एडिटिंग, साउंड इफेक्ट्स और विज़ुअल्स ना लगाने की ताकि आपका पूरा फोकस इस कहानी को समझने में लगे। चाहो तो आप अपनी आँखें बंद करके भी इस स्टोरी को सुन सकते हो। मेरा स्टोरी सुनाने का तरीका ही कुछ इस तरह का होगा कि सारे विज़ुअल्स आपका दिमाग खुद बनाने लग जाएगा, अपने आप आपके दिमाग में तस्वीरें बनती जाएंगी। तो खुद को आज की मिस्टीरियस स्टोरी के लिए रेडी कर लो। तब तक एक शॉर्ट ब्रेक लेते हैं आज के स्पॉन्सर के लिए।

आगे बढ़ने से पहले चिकन रोड पर पायरेट एडिशन गेम के बारे में सुनो। फेवरेट गेम है। इसमें चिकन को शार्क से बचाना है। यू आर ऑलवेज वन सेकंड अवे फ्रॉम अ मैसिव वेन। एंड दिस टेंशन मेक्स इट सो एडिक्टिव। यह इंडिया के सबसे पॉपुलर गेमिंग प्लेटफार्म पर मिल जाएगा। ट्रस्टेड बाय मिलियंस ऑफ प्लेयर्स एवरीडे। यहाँ न्यू वायरल गेम्स आते रहते हैं। आप भी ट्राई करना चाहते हो तो कमेंट में लिंक है। ओपन द फाइल, रजिस्टर करो एंड एंजॉय द गेम।

कहानी उस ज़माने की है जिस वक्त शायद आप में से कुछ लोगों का जन्म भी नहीं हुआ होगा। कहानी है रेलूराम पूनिया जी की जो 1996 में हरियाणा में एमएलए रह चुके थे और हरियाणा के हिसार इलाके के कई रहिस्सों में इनका नाम शामिल था। हालाँकि रेलूराम पूनिया मिडिल क्लास फैमिली से थे। शुरुआती दिनों में रेलूराम जी ने एक ट्रक क्लीनर के तौर पर अपना करियर शुरू किया। फिर काले तेल के धंधे में ऐसी छलांग मारी कि देखते ही देखते नोटों की गड्डियाँ जमा होने लगीं, करोड़ों कमाए। हिसार में बड़ी-बड़ी ज़मीनें, हरियाणा के अलग-अलग दूसरे शहरों में, फैक्ट्रियाँ, दिल्ली में मकान, दुकानें, फरीदाबाद में भी इनकी बहुत सारी ज़मीनें थीं। मतलब करोड़ों की संपत्ति और हिसार के जिस घर में, जिस कोठी में ये वारदात हुई, वो घर ही ऐसा था कि लोग दूर-दूर से उसे देखने आते थे और देखते ही रह जाते थे। क्योंकि उस ज़माने में ये हिसार तो क्या, पूरे हरियाणा में इकलौता ऐसा घर था, जिसकी दूसरी मंजिल के बेडरूम तक सीधा कार जाती। इसके अलावा पूरे हरियाणा में उस वक्त ऐसी कोई भी कोठी नहीं थी जिसमें जो है वो गाड़ी सीधे बेडरूम तक जाती हो। शौक की कोई कीमत नहीं, और ऊपर से जाट।

देखिए, रेलू राम जी की दो शादियाँ हुईं। पहली ओमी देवी से जिनसे उनका एक बेटा हुआ सुनील और दूसरी शादी कृष्णा देवी से जिनसे दो बेटियाँ हुईं, प्रियंका और सबसे छोटी बेटी सोनिया। जो उनका बेटा सुनील था, उसकी शादी शकुंतला से हुई। आगे उनके तीन छोटे-छोटे मासूम से बच्चे: 4 साल का लोकेश, 2 साल की शिवानी और कुछ 30 से 40 दिनों की नन्ही प्रीति हुई। एक खुशहाल, संपन्न परिवार, ऊपर से सब कुछ परफेक्ट, लेकिन अंदर ही अंदर कुछ सड़ रहा था।

देखिए, रेलू राम की बेटी प्रियंका का बर्थडे पड़ता था 24 अगस्त को। तो हर साल 24 अगस्त के दिन ही पार्टी होती थी। लेकिन इस बार एक दिन पहले 23 अगस्त को ही उसका बर्थडे मनाने का फैसला लिया गया। और यह फैसला लिया रेलू राम जी की सबसे छोटी बेटी सोनिया ने, क्योंकि 24 अगस्त को उसे कोई काम था। देखिए, सोनिया दिल्ली में अपने पति संजीव के साथ रहती थी। 21 और 22 अगस्त के दौरान सोनिया अपने पति के साथ टाटा सुमो में बैठकर हिसार पहुँची। संजीव ने सोनिया से कहा, "अब यहाँ आए ही हैं तो तुम्हारी बड़ी बहन प्रियंका को भी साथ ले चलते हैं।" फिर सोनिया अपनी सिस्टर को लेने विद्या देवी जिंदल स्कूल में चली गई। अब तीनों जब अपनी Tata Sumo से घर पर पहुँचे तो सोनिया घर वालों से बात करती है कि हम प्रियंका का बर्थडे 23 अगस्त को ही मनाएंगे, 24 को मुझे काम है। घर वालों ने कहा, "चलो कोई बड़ी बात नहीं है, 23 को मना लेते हैं।" तो घर में ही खाना-वाना बनता है, म्यूजिक का इंतज़ाम किया जाता है, म्यूजिक फुल वॉल्यूम पर, फिर केक-वेक मंगवाया जाता है। और उस दिन हवेली में परिवार के सारे लोग मौजूद थे। टोटल नौ लोग थे: रेलू राम पूनिया, उसकी वाइफ, उनका बेटा सुनील, बहू शकुंतला, तीनों बच्चे (चार साल का लोकेश, दो साल की शिवानी और एक डेढ़ महीने की नन्ही प्रीति), फिर खुद प्रियंका, सोनिया और उसका हस्बैंड संजीव। अब जाके होते हैं कुल 10 लोग। देखिए, सोनिया का तो सभी नौकरों को पता था कि घर आई है, लेकिन संजीव का नहीं पता था कि वो भी घर आया है, क्योंकि रास्ते में उसकी तबीयत खराब हो गई थी तो वो पिछली सीट पर लेट कर सो गया। तो कुल मिलाकर 23 अगस्त की उस रात को कुल 10 लोग वहाँ मौजूद थे।

अब सूरज ढल चुका था और अंधेरे ने अपने पैर जमा लिए। बर्थडे पार्टी अपने शबाब पर, जश्न एंड म्यूजिक बज रहा था, सब खुश थे क्योंकि बहुत ही लंबे वक्त के बाद पूरी फैमिली इकट्ठा हुई थी। म्यूजिक पर कुछ झूम रहे थे तो कुछ लोग खाना-वाना बना रहे थे। देखिए, रेलू राम जी को सोने से पहले खीर खाना बहुत अच्छा लगता था और हर रोज़ की तरह उस रात भी खीर बननी थी। इसी बीच खाना-वाना खाने के बाद रात के करीब 10-11:00 बजते हैं तो आज सोनिया किचन में जाकर सबके लिए खीर बनाती है। लेकिन वो उस खीर में धीरे से नींद की दवा मिला देती है। सोनिया के दिमाग में आखिर चल क्या रहा था? बेहोशी की दवा मिलाने के बाद वो सबको खीर बाँटती है। यहाँ तक कि वो एक डेढ़ महीने की जो नन्ही सी बच्ची थी, उसकी प्यारी भतीजी, उसको भी वो छिप-छुपाते हुए खीर खिला देती है। खीर खाने के बाद अब धीरे-धीरे सबको नींद आने लगती है। म्यूजिक चल रहा था, सब लोग नाच रहे थे। फिर एक-एक कर सभी अपने रूम्स में जाने लगे। पूरा घर बेहोश हो जाता है, सिर्फ दो लोगों को छोड़कर: एक सोनिया और दूसरा उसका पति संजीव। सोनिया थोड़ा देर इंतज़ार करती है क्योंकि अभी भी कुछ लोग जाग रहे थे। टटोलती है। देखिए, पूनिया फैमिली दो फ्लोर पर रहती थी, कुछ लोग ऊपर फर्स्ट फ्लोर पर और कुछ लोग उससे भी ऊपर सेकंड फ्लोर पे और कुछ लोग फर्स्ट फ्लोर पे अभी भी अपनी बाकी बची हुई खीर खा रहे थे। देखिए, खीर खाने के करीब 25 से 30 मिनट बाद सोनिया और संजीव एक-एक कर सभी सदस्यों को जाकर टटोलने लगे, चेक करने लगे कौन होश में है कौन नहीं। उन्हें लगा शायद अब सभी बेहोश हो चुके हैं। इसके बाद सोनिया संजीव को कहती है, "तुम अपना रिवॉल्वर निकालो और इन सबको गोली मार दो।" संजीव ने कहा, "बावली, रिवॉल्वर में सिर्फ छह गोली हैं और बंदे आठ हैं और बाकी बचे दो को कैसे मारोगे? गोली की आवाज़ सुनकर अगर कोई जाग गया तो और गोली से वो पक्का मर जाएँगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। सब इंजर्ड भी हो सकते हैं। और ये लोग तो ऑलरेडी बेहोश हैं, तो पता कैसे चलेगा कि ये मरे हैं या नहीं।" सोनिया इतना ज़्यादा डेस्पिरेट थी अपने सभी घर वालों को मारने के लिए तो फिर वो अपने ही पति पर गुस्सा निकालने लग जाती है, "तुम किसी काम के नहीं हो ना मर्दों।"

सोनिया को इतना ज़्यादा गुस्सा आया कि वो तुरंत बाहर गई और म्यूजिक की वॉल्यूम की नोब को घुमाकर फुल वॉल्यूम पर कर दिया। जिसके बाद वो भाग कर नीचे गई और फिर सीधा संजीव के पास। संजीव सोनिया का यह रूप देखकर पहले तो डर गया। वो दरवाज़े पर खड़ी थी और उसके हाथ में एक लोहे की रॉड थी। संजीव पहले तो घबरा गया कि ये कहीं मुझे ही ना मार दे। फिर वो गुस्से से संजीव को बोलती है, "यह रिवाल्वर साइड पर रखो और यह रॉड पकड़ो। अब घर के हर मेंबर के सर पर दो-चार बार ज़ोर-ज़ोर से मारो। सबकी खोपड़ी खोल दो, फोड़ डालो। फिर इनके बचने की कोई गुंजाइश नहीं।" देखिए, जो यह संजीव था, यह जूडो का चैंपियन था। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत तो यह थी कि जो सोनिया का भाई सुनील था, वो कुछ ज़्यादा ही हट्टा-कट्टा और लंबा-चौड़ा था, ऊपर से जाट। तो वो अकेले इन दोनों से मुकाबला भी कर सकता था। सोनिया को पता था अगर यह देसी खून, यह सांड उठ गया तो जूडो-वुडो की चैंपियनशिप धरी रह जाएगी, पर वो उस वक्त बेहोश था। तो सोनिया ने संजीव को कहा, "रुको, रुको, इसे सबसे लास्ट में मारेंगे। अगर वो नहीं मरा, वो बीच में जाग गया तो सारा का सारा प्लान चौपट हो जाएगा।"

अब वक्त हो चला था 11 सवा के बीच का। सबसे पहले सोनिया अपने पिता के रूम में जाती है। रेलू राम जी अपने रूम में बेहोश पड़े हुए थे। वो संजीव को लोहे की रॉड थमा देती है। फिर अपने पति को कहती है, "मारो सर पे।" लेकिन संजीव के हाथ-पैर काँपने लगे, उसकी हिम्मत नहीं पड़ती। उसने पहले कभी मर्डर नहीं किया था और अब वो अपने ससुर को मारने जा रहा था तो वो मार नहीं पा रहा था। सोनिया उसको पीछे से उकसा रही थी, "मारो, तुम्हें क्या हुआ? तुम बुज़दिल हो, यह हो, वो हो, नामर्द हो। तुमसे एक छोटा सा काम नहीं होता। अगर आज हमने इन्हें नहीं मारा तो कल ये हमें मार देंगे।" एक बेटी अपने ही पिता के खून की प्यासी थी। खैर, सोनिया उसको इतना उकसाती है। फिर लास्ट में संजीव अपना आपा खो देता है। उसने रॉड उठाई और रेलूराम पूनिया के सर पर एक के बाद एक तीन से चार बार पूरा ज़ोर लगाकर वार किया। जब वो यह वार कर रहा होता है तो वो सोनिया अपने पिता के सरहाने खड़ी हुई है और वो खुश हो रही है। उसने कहा, "अभी रुको मत और मारो।" फिर रेलू राम जी का सर फट जाता है और एक पैर बिस्तर से नीचे गिर जाता है। लेकिन अभी भी सोनिया को चैन नहीं मिला। वो अपने पिता की नब्ज़ टटोलने लग जाती है खुद अपने ही हाथों से और फिर उसे यकीन हो जाता है कि हाँ, ये मर चुका है। फिर वो अपने पति को बधाई देती है, "चलो, पहला काम पूरा हुआ।" एक बेटी अपने बाप का मर्डर करने के बाद बधाई दे रही है, वो भी अपने ही पति को। आई डोंट नो, यह मोटिवेशन कहाँ से आया।

इसके बाद ये दोनों दूसरे रूम में घुसते हैं, जहाँ सोनिया की अपनी सगी माँ बेहोश पड़ी हुई थी। उसने संजीव को कहा, "अब इसे भी रॉड मारो।" संजीव फिर घबरा जाता है, लेकिन वो उसे फिर से उकसाती रहती है, उसे फिर से गुस्सा दिलाती है। उसके बाद जब तक वो अपनी सास को रॉड नहीं मारता, तब तक सोनिया खुद अपनी माँ के मुँह पर तकिया रखकर एक-एक मिनट तक गला घोंटने की कोशिश करती है। अब उसे यह नहीं पता चल रहा था कि माँ मर चुकी है या जिंदा है। फिर थोड़ी देर बाद, कुछ मिनट और तकिया मुँह पर रखकर फिर तकिया हटाती है। फिर संजीव को कहती है, "अब तो मार दो।" अब वो रॉड उठाता है और सोनिया की माँ के सर पर देह मारता है जिससे खोपड़ी का चूरा बन गया। 2 साल की शिवानी जो अपनी दादी के साथ ही सोई हुई थी, यानी सोनिया की अपनी खुद की भतीजी, गलती से उसके भी रॉड लग जाती है, जिससे वो उठकर रोने लगती है। वो रो रही है। लेकिन सोनिया ने उसके हाथ पकड़े और संजीव ने अब उस रॉड से उस नन्ही परी का भी सर कुचल दिया। अब सोनिया फिर से संजीव को बधाई देती है। सोनिया का दिल अब दिल नहीं रहा था, वो पत्थर बन चुका था।

अब यह सिलसिला यहाँ खत्म नहीं हुआ था। इसके बाद ये दोनों नर पिशाच बच्चों के कमरे में घुस गए। आज उस रूम में सोनिया की सिस्टर प्रियंका और सोनिया का 4 साल का भतीजा लोकेश सोया हुआ था। सबसे पहले उन्होंने रॉड से प्रियंका पर वार किए और फिर 4 साल के लोकेश को, सोचो, उसकी खुद की मौसी उसे एक दिन इतनी बेरहमी से, इतनी बेरहमी से रॉड, सोच कर ही रूह कांप जाती है। संजीव मारता रहा और सोनिया बकायदा खड़ी हुई है, इंश्योर करने के लिए कि ये मरे हैं या नहीं। तो इन सबका मर्डर हो चुका है। अब तीन बचे थे: उसका भाई सुनील, उसकी भाभी शकुंतला और अब सोनिया और उसका पति। सेकंड फ्लोर पर पहुँचे क्योंकि अब सबसे मुश्किल काम करना बाकी था। सुनील के कमरे में घुसना। दोनों धीरे-धीरे दबे पैर सुनील के कमरे में एंटर किए। उन्होंने देखा सुनील बेहोश पड़ा हुआ था। सोनिया ने धीरे से चुपके से वहाँ सो रही 1 1/2 महीने की प्रीति को अपनी गोद में उठाया। देखिए, वो नन्ही सी प्रीति अभी 30 से 40 दिनों की थी, उसने तो अभी दुनिया भी नहीं देखी थी। खैर, सोनिया ने उसे उठाकर थोड़ा दूर साइड पर रख दिया ताकि उसके रोने की आवाज़ ना पहुँचे।

सुनील हट्टा-कट्टा था। उसने कहा, "कहीं ये जाग ना जाए। सबसे पहले हम इसके हाथ-पैर बाँध देते हैं। फिर उसके बाद मारेंगे।" धीरे-धीरे दोनों सुनील के हाथ-पैर बाँधने में कामयाब रहे। फिर सोनिया संजीव को कहती है, "सुनील को ज़्यादा मारना और जोर-जोर से मारना, क्योंकि ये हट्टा-कट्टा है तो इसके बचने की कोई भी गुंजाइश नहीं बचनी चाहिए।" अब दोनों को डर भी लग रहा था कि मारेंगे तो ये जाग ना जाए। देखिए, ये जो संजीव है, इसका बाद में इंटरव्यू भी हुआ था जिसमें उसने कहा, "इतने जनों को मारने के बाद उसका दिमाग काम करना भी बंद कर गया था। उसे लगा अब जो करना था, जो हो गया, वो हो गया। अब पीछे नहीं हट सकते। अब हमने अगर किसी को भी छोड़ा तो हम फँसेंगे। ऐसे करते हैं, हम लोग रिस्क लेते हैं और या तो वो हमें मार देंगे या हम उन्हें मार देंगे।" यह सोचते हुए वो सुनील के सर पर ज़ोर-ज़ोर से वार करने लगा और पागलों की तरह बस मारे जा रहा था। सुनील का सर फट चुका था। उसके बाद सोनिया ने उस डेढ़ मंथ की नन्ही प्रीति को अपनी गोद में उठाया। फिर उसे उसकी टाँगों से पकड़ कर झुला-झुलाकर उसे ज़ोर-ज़ोर से दीवार में पटक-पटक कर, दीवार में भिड़ा-भिड़ा कर, आगे आप खुद समझदार हो।

इसके बाद दोनों सुनील की वाइफ, यानी सोनिया अपनी भाभी शकुंतला, जो कि उसी बेड पर बेहोश पड़ी हुई थी, तो शकुंतला को उसके हस्बैंड सुनील की मौजूदगी में मारा। अब सोनिया अपनी भाभी के सर पर सेम रॉड से वार करती है और फिर संजीव। अब यह था उस घर का आठवां और आखिरी कत्ल। इस कत्लेआम को करने में दोनों ने 2 घंटे का वक्त लिया। इन्हें 2 घंटे लगे पूरा वंश खत्म करने में। 11:00 बजे से यह सिलसिला शुरू हुआ था और अब 2:00 बज चुके थे। पर कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। असल कहानी तो अब शुरू होने वाली है। खैर, अभी तो आपको यह भी पता नहीं चला होगा कि सोनिया ने आखिर अपने परिवार वालों के साथ ऐसा किया क्यों? उसकी नफरत का कोई तो कारण होगा। इसकी हम आगे बात करेंगे।

खैर, रात के 2:00 बज चुके थे। म्यूजिक अभी भी चालू था, जिसके बाद सोनिया ने छत पर चढ़कर पटाखे चलाए। अब यह उसने अपनी खुशी में चलाए या प्लान का ही एक उनका एक पार्ट था ताकि दुनिया को लगे कि सभी अभी भी पार्टी कर रहे हैं ताकि किसी को शक ना हो, आई डोंट नो। लेकिन दोनों को अभी भी कोई चैन नहीं मिला क्योंकि इसके बाद वो बारी-बारी से फिर हर लाश के पास जाते और बार-बार से उन लाशों को चेक करते रहे क्योंकि यह भी अब एक डर था कि कहीं कोई बेहोशी में कोई चीख ना पड़े। तो म्यूजिक सिस्टम पूरी साजिश के तहत लाई गई थी, उसका वॉल्यूम बहुत तेज़ था ताकि घर के बाहर किसी को चीख तक की आवाज़ ना सुनाई दे। गाने बजते रहे और उस म्यूजिक की वॉल्यूम के साथ एक-एक कर घर के आठ लोगों को उसी घर की बेटी अपने पति के हाथों मारती जा रही थी और हर कत्ल के बाद वो अपने पति से हाथ मिलाती, उसे बधाइयाँ देती, उसे मुबारकबाद देती और दोनों खुश हो जाते। हालाँकि संजीव थोड़ा सा डरा-सहमा हुआ था। लेकिन वो उस वक्त जो सिचुएशन था, संजीव के हिसाब से उसने अपने इंटरव्यू में बताया, "उसे ऐसा लग रहा था जैसे कि उस वक्त सोनिया अपने आपे में ही नहीं थी। वो कोई और ही इंसान बन चुकी थी। उसमें अपने घर वालों को लेकर इतनी नफरत थी कि उसकी आँखें बड़ी-बड़ी हो चुकी थीं, खुली हुई और वो हर रॉड जब लोहे का सर पर पड़ता था तो वो अपने उन फैमिली मेंबर्स को ऐसे घूर रही थी कि जैसे कि ये फौरन मर जाए, मानो जैसे वो खा जाएगी।" तो संजीव ने कहा कि एक-दो बार तो सोनिया की आँखें देखकर वो खुद भी डर गया था, "ये पता नहीं कैसी औरत है।"

अब उस घर में आठ लाशें थीं और दो जिंदा लोग, संजीव और सोनिया। फिर उन्हें याद आया, "अब दुनिया को क्या बताएंगे कि यह कैसे हुआ? किसने किया? पकड़े जाएँगे।" तो बचने के लिए सोनिया ने संजीव से कहा कि वो उसको रॉड मारे, पर ऐसा मारे कि वो इंजर्ड हो जाए, ना कि मर जाए। एक तो प्लानिंग और दूसरी हिम्मत। फिर संजीव ने उसी सेम रॉड से जिससे उसने आठ कत्ल किए, वो सोनिया के ऊपर दे मारी। सोनिया इंजर्ड हो गई और नीचे गिर गई या गिरने का नाटक करने लगी। उसके बाद उसी रात को छिपते-छिपाते संजीव उस घर से निकल गया, बिना नौकरों की नज़र में आए और उधर सोनिया वहाँ लेट कर मरने की एक्टिंग करने लगी। फिर सुबह होती है। उसके बाद जो हुआ, घर के नौकर, ड्राइवर और बाद में पुलिस भी पहुँचती है। यह सारी स्टोरी आप शुरू में सुन चुके हो। पुलिस को सोनिया की डायरी मिली और लेटर। संजीव दिल्ली से पकड़ा गया। फिर सोनिया भी टूट गई और तोते की तरह सब कुछ बोल दिया।

लेकिन यह सब स्टोरी एक तरफ। लेकिन उसने यह सब किया क्यों? पहले इसके बारे में सुनो। इसके बाद कोर्ट रूम में क्या हुआ? अगर आपने वो सुन लिया तो आपका कलेजा मुँह को आ जाएगा, क्योंकि असली किस्सा तो अब शुरू होने वाला है। स्टे ट्यून।

2001 की यह तस्वीर। पुलिस सोनिया को पुलिस स्टेशन से बाहर लाती हुई। चेहरे पर कोई पछतावा नहीं। तब तक संजीव को भी पुलिस ने कैप्चर कर लिया। सोनिया ने यह एक्सेप्ट कर लिया कि यह घिनौना काम उन्होंने ही किया है। और फिर उसने जो अपनी रहस्यमय कहानी सुनाई, उसे सुन सबके मुँह खुले रह गए। देखिए, सोनिया ताई कमांडो की खिलाड़ी थी और संजीव जूडो का चैंपियन। तो वहीं खेल-खेल के दौरान दोनों की मुलाकात होती थी। दोनों में प्यार हुआ, फिर उन दोनों ने शादी कर ली। लेकिन रेलूराम पूनिया और उसकी फैमिली इस शादी से नाखुश थी, क्योंकि हैसियत में संजीव कमतर था। उधर रेलूराम करोड़पति लोग और संजीव एक नॉर्मल फैमिली से। लेकिन फिर भी बेटी की मोहब्बत में आकर रेलूराम का परिवार तैयार हो गया और फिर उन्होंने इस शादी को मान्यता दे दी। उसके बाद सोनिया को एक बेटा भी हुआ। जब 23 अगस्त 2001 को जिस दिन कत्लेआम हुआ था, तब उसका बेटा डेढ़ साल का था। उस दिन वो अपने बेटे को अपने साथ नहीं लाई थी।

उसकी शादी होने के बाद, पहले तो उसे यह था कि उसके मायके वाले उसके पति की ज़्यादा इज़्ज़त नहीं करते या उसे ऐसा लगता था। एक तो वहाँ से उसके दिल में यह चीज़ आई और दूसरा उसे शादी के बाद समझ आई कि प्यार-व्यार अपनी जगह, ज़िंदगी प्यार से नहीं पैसों से चलती है। पेट भी तो भरा होना चाहिए, लेकिन बंदे के पास तो पैसा ही नहीं था। खैर, बेचारे रेलू राम जी ने फिर भी अपने दामाद की हैसियत बढ़ाने के लिए बहुत सारी मदद की। वो खुले दिल के थे। लेकिन सोनिया चाहती थी संजीव नया बिज़नेस शुरू करे, उसके लिए उसे और ज़्यादा पैसों की ज़रूरत थी। तो सोनिया ने अपने पिता रेलू राम से कहा कि "आपके पास तो कई 100 एकड़ ज़मीनें हैं। अगर आप इसमें से 50 एकड़ बेचकर हमें पैसे दे दें तो हम अपना बिज़नेस शुरू कर सकते हैं।" रेलू राम जी इस बात के लिए तैयार थे कि चलो बेटी की मदद कर देंगे। लेकिन रेलूराम जी का बेटा सुनील, वो अड़ गया। उसने कहा, "नहीं, हम ज़मीन बेच के मदद नहीं करेंगे। हाँ, कोई पैसा-वैसा चाहिए, आप कैश दे दीजिए, आप बाकी चीजें वगैरह कर दीजिए। लेकिन बहुत मुश्किल से प्रॉपर्टी बनाई है, ये नहीं बेचेंगे।" बात तो सुनील की बिल्कुल सही थी। अब कुछ पैसों के लिए ज़मीनें थोड़ा बेची जाती हैं? हाँ भाई, पैसे कितने चाहिए? ज़मीन तो नहीं बेचेंगे।

जब यह बात सुनील सोनिया के घर पर कहने गया, तो सोनिया को बहुत ज़्यादा गुस्सा आया। उसने अपने भाई सुनील के सर पर रिवॉल्वर तान दी। सोनिया ने संजीव से कहा, "यह लोग मुझे प्रॉपर्टी में से कोई हिस्सा नहीं देने वाले।" खैर, भारत में रह रही हर एक बेटी का अधिकार है, वो चाहे तो कभी भी किसी भी वक्त अपना हक़ मांग सकती है अपने पिता से। लेकिन बहुत सी बेटियाँ बड़े दिल की भी होती हैं। अगर उसके फैमिली वाले बहुत अच्छे हैं तो कोई दिक्कत नहीं। नहीं तो वो लेकर छोड़ती हैं। सोनिया को अपने भाई की बात इतनी ज़्यादा बुरी लगी तो उसने सोचा, "मैं इन सबको मार के सारी प्रॉपर्टी पर कब्ज़ा कर लूँगा। और जितने भी करोड़ों रुपए, जितनी भी ज़मीन, फैक्ट्रियाँ, दुकानें हैं, ये सब हमारा हो जाएगा।" और उसने इसके लिए बकायदा संजीव को भी तैयार कर लिया। सोनिया संजीव को, वो कहते हैं ना, जुनून भरा इश्क करती थी और संजीव भी उससे उतना ही प्यार करता था। तो उसने कहा कि चलो, अब इसकी बात मानने में भलाई है। पता नहीं ये क्या करेंगी और इसलिए वो तैयार हो गया और फिर एक-एक करके जो हुआ, आठ लोगों का कत्ल कर दिया। फिर संजीव और सोनिया दोनों ने बकायदा कैमरे पर बाद में कन्फेस भी किया।

अब हम कहानी के उस पॉइंट पर पहुँच चुके हैं जहाँ से आपका खून उबलने लगेगा, आपका दिमाग घूम जाएगा। देखिए, अब इस सारी घटना के बाद मामला कोर्ट में पहुँचा। सोनिया अपने बयान से बदल गई। उसने कहा, "नहीं, यह मुझे फँसा रहे हैं। मैंने कोई मर्डर नहीं किया, मैंने कोई कत्ल नहीं किया। उस वक्त जो उन्होंने बयान लिखे थे कागज़ों पे, बस मुझसे आख़िरी में सिग्नेचर ज़बरदस्ती करवाए गए थे। मुझे नहीं पता था उस वक्त कागज़ों में क्या है, क्या नहीं है।" लेकिन सारे सबूत मैजिस्ट्रेट के सामने का बयान, इन कैमरा बयान, यह सारी चीज़ें उनके ख़िलाफ़ थीं। उसके बाद इस केस की सुनवाई शुरू होती है और लोअर कोर्ट में मामला चलता है। लेकिन यह मामला इतना ज़्यादा वो था कि एक ही फैमिली के आठ लोगों को उनकी ही बेटी और दामाद ने मिलकर मार दिया। तो इसको लेकर लोगों में बहुत गुस्सा था। मीडिया पर भी खबरें चल रही थीं, प्रेशर भी ज़्यादा था। इस वजह से कोर्ट पर भी बहुत ज़्यादा दबाव था। 23 अगस्त 2001 को ये मर्डर हुए थे। फिर 31 मई 2004 को जाकर, मतलब करीब 3 साल बाद जाकर, सेशन कोर्ट ने सोनिया और संजीव को फाँसी की सज़ा सुनाई। लेकिन इन्होंने चैलेंज किया। उसके बाद 12 अप्रैल 2005 को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने उस फाँसी की सज़ा को बदलकर उम्रकैद में बदल दिया। तो यहाँ से सोनिया और संजीव को राहत मिली।

इसके बाद 2007 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और फिर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बदलकर फाँसी की सज़ा को बरकरार कर दिया कि सोनिया और संजीव को तो फाँसी मिलनी ही चाहिए। उसके बाद इन्होंने इस फैसले के ख़िलाफ़ अपील लगाई। लेकिन उस याचिका को भी रद्द कर दिया गया कि नहीं, आपको तो फाँसी होके रहेगी। तो 1 अगस्त 2007 को हिसार के सेशन जज ने, जिसने पहली बार फाँसी की सज़ा सुनाई थी, उसने बकायदा इन दोनों की फाँसी की तारीख भी फिक्स कर दी और कहा कि इन लोगों को 26 नवंबर 2007 को फाँसी दे दी जाए। दोनों अंबाला जेल में बंद थे। अब इनके पास कोई कानूनी रास्ता नहीं बचा था। लेकिन आगे सुनते जाइए।

तो अब फाँसी की तारीख तय थी। अंबाला जेल को इन्फॉर्म किया गया। लेकिन फिर, लेकिन फिर सोनिया ने अब ये दलील देनी शुरू कर दी कि "भाई, मेरा तो छोटा सा बच्चा है, वो तो मेरे बिना रह ही नहीं पाएगा। वो हमारे बिना अनाथ हो जाएगा। हम ही उसके माँ-बाप हैं, उसका पालन-पोषण करने वाला और है ही कोई नहीं। मेरे बच्चे का ध्यान कौन रखेगा? इतनी बड़ी सज़ा, मतलब थोड़ा तो रहम किया होता हम पे। थोड़ा तो रहम किया जाए।" यह वो बेटी कह रही है जिसने अपने पूरे खानदान को निपटा दिया, साथ में उन छोटे-छोटे मासूमों को भी। और अब अपने बच्चे की आड़ में रहम की भीख माँग रही थी। यही नहीं, इसने यह भी कहा, "अगर हमें फाँसी पर चढ़ाना है तो मेरे बेटे को भी साथ में फाँसी पर चढ़ा दो। थोड़ा तो रहम किया होता हम पे। थोड़ा तो रहम किया जाए।" तो इतना नहीं कर सकते तो हमारे बच्चे को भी हमारे साथ हैंग कर दो। और इसी चीज़ को ग्राउंड बनाकर उसने फिर से याचिका दी। जब सुप्रीम कोर्ट ने इसे फिर से खारिज कर दिया तो उसने इंडिया के प्रेसिडेंट के पास मर्स पिटीशन (दया याचिका) की अपील भेजी। तब प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति हुआ करते थे। लेकिन अप्रैल 2013 में राष्ट्रपति जी ने भी इनकी याचिका खारिज कर दी। देखिए, 12-13 साल की ज़िंदगी तो इन्होंने याचिका-याचिका डाल-डाल कर ही खरीद ली। कांड 2001 को हुआ था और अब 2013 आ गया था। लेकिन अभी भी ये फाँसी पर नहीं चढ़े। खुद को बचाते आ रहे थे। कानून का क्या लूपहोल निकाला इन्होंने, वाह! आठ-आठ कत्ल कर दिए लेकिन अपनी ज़िंदगी प्यारी है।

लेकिन अब उनके लिए ज़िंदगी के सारे रास्ते बंद हो चुके और अब सिर्फ यह था कि मौत मिलनी है और हर हिंदुस्तानी भी यह चाहता था। लेकिन उसी दौरान संजीव कुछ बांग्लादेशी टेररिस्ट के साथ मिलकर जेल से बाहर भागने की प्लानिंग बनाने लगा। उन्होंने जेल में सुरंग खोद डाली। वो तो शुक्र है ये बाद में पकड़े गए। उसके बाद फिर से डिस्कशन शुरू हुई कि अब नई डेट क्या होगी? कि कब इन्हें फाँसी पर लटकाना है। देखिए, अगर उस वक्त सोनिया को अगर फाँसी हो जाती तो तो हिंदुस्तान की यह पहली एक ऐसी औरत होती जिसे पहली बार फाँसी की सज़ा होती। तब तक हिंदुस्तान में किसी भी महिला को फाँसी की सज़ा नहीं दी गई थी। तो अब यह बिल्कुल तय हो चुका था, सोनिया को फाँसी होगी। बस तारीख का थोड़ा हेरफेर था क्योंकि उसके नाम डेथ वारंट साइन हो चुका था। जल्लाद तैयार बैठा था, बस एक डेट फिक्स होना था। 2013 में कभी भी इनको फाँसी हो सकती थी। अब इनकी मौत एकदम नज़दीक थी और तय था, अब इनकी मौत पर कोई भी रोक नहीं लगा सकता क्योंकि सारे कानूनी दरवाज़े बंद हो चुके थे। आख़िरी दरवाज़ा राष्ट्रपति का, वो भी बंद। लेकिन इसके बावजूद इन दोनों को फाँसी नहीं दी जाती। क्या किस्मत है? 2014 आ गया। लेकिन आठ-आठ कत्ल करने वालों की साँसें अभी भी चल रही थीं। पता है क्यों? क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में कुछ लोगों ने एक याचिका दायर कर रखी थी कि जिनकी फाँसी की सज़ा दिए हुए 5-10 साल हो चुके हैं, उनकी फाँसी की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया जाए। दलील यह दी गई कि इतने लंबे वक्त तक अगर एक फाँसी की सज़ा पाया हुआ शख्स मौत का इंतज़ार कर रहा है तो इसका मतलब वो हर दिन मर रहा है, वो हर दिन उस मौत के इंतज़ार में मर रहा है तो यह तो उसके साथ कानूनी नाइंसाफ़ी है। अगर आपने फाँसी की सज़ा सुनाई है तो उसे तुरंत दीजिए, इंतज़ार ना करवाएं। जिस इंसान को यह कहा गया था कि तुम्हें फाँसी होने वाली है और उसे पता है कि हाँ, मुझे फाँसी पर चढ़ना ही होगा तो वो इंतज़ार उसे हर दिन मारता है।

21 जनवरी 2014 को यह फैसला आया। उस फैसले में इस दलील को माना गया कि हाँ, जिन्हें फाँसी की सज़ा दी जा चुकी है और उनको लंबे वक्त तक कोर्ट के आदेश के बावजूद दया याचिका खारिज होने के बावजूद फाँसी पर नहीं चढ़ाया गया तो यह उनके साथ नाइंसाफ़ी है। तो ऐसे 15 मामले सुप्रीम कोर्ट ने सूचीबद्ध किए। फाँसी की सज़ा से बदलकर उम्रकैद में बदल दिया। तो 15 ऐसे मामले थे जो 5 साल से ज़्यादा पुराने थे और उनको उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया। और किस्मत देखिए, उन 15 मामलों में से दो मामले सोनिया और संजीव के थे। हर तरफ से मौत तय थी, लिखी हुई थी, यकीन था कि होगी ही होगी, मरना ही था। लेकिन एक याचिका आती है, उधर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आता है और वो फैसला इनके लिए मौत नहीं, ज़िंदगी लेकर आया।

खैर, कोर्ट ने तो इन दोनों को फाँसी की सज़ा सुना दी थी। लेकिन इन दोनों ने याचिका-याचिका, दया याचिका का खेल खेल कर 12-13 साल बिना फाँसी के बचते रहे। खैर, कोर्ट का फैसला है, हम कौन होते हैं बोलने वाले। अब वो दोनों उम्रकैद की सज़ा काटने वाले हैं। कहानी अभी यहाँ खत्म नहीं हुई है। सन 2018, संजीव कुछ फर्जी डॉक्यूमेंट्स बनाकर पेरोल लेकर जेल से बाहर आ गया। अभी तो और सुनो। वो सीधा गुजरात भाग गया और वहाँ बाबा संत बनकर रहने लगा। और कोई ऐसा-वैसा बाबा नहीं, फुल टाइम बाबा। यह पोस्टर देखो, बड़े-बड़े आयोजनों में इसे बुलाया जाता था। हज़ारों लोग भक्त बन बैठे इस फर्जी बाबा के। संगत इस भाई साहब के प्रवचन सुनने आती थी। लेकिन फरवरी 2021 में ये मेरठ में गया। किसी ने वहाँ इसे पहचान लिया और उसने पुलिस को खबर कर दी और ये पकड़ा गया।

खैर, कहानी अभी भी खत्म नहीं हुई है। आपको क्या लगता है? ये दोनों अभी भी जेल के अंदर उम्रकैद काट रहे होंगे? क्या मैंने कुछ गलत कहा? ऑफ कोर्स, ये दोनों अभी भी जेल के। आप तस्वीरों में देख सकते हैं कि सोनिया जो है, जेल से बाहर आ चुकी है और अपनी गाड़ी में बैठकर जाती हुई इस वक्त नज़र आ रही है। ये हिंदुस्तान है। कोर्ट ने 16 दिसंबर 2025 में इनको ज़मानत दे दी। दोनों को तब तक ज़मानत मिल चुकी थी। इनक्रेडिबल इंडिया।

देखिए, अब एक ज़रूरी बात सुनो। शायद यह सवाल आपके भी मन में आया होगा और मुझे पता है, नीचे नहीं तो लोग कमेंट कर देते। सोनिया के पिता रेलू राम की करोड़ों-अरबों की प्रॉपर्टी आखिर किसे मिली? क्योंकि रेलू राम जी का तो पूरा वंश खत्म हो गया था और उधर सोनिया तो उस प्रॉपर्टी का हक़दार हो चुकी थी। तो वो सारी प्रॉपर्टी आखिर मिली किसे? देखिए, अब यहाँ एक बहुत ज़रूरी बात समझ लीजिए। तो इसका सीधा जवाब है, वो सारी संपत्ति, वो सारी करोड़ों की संपत्ति रेलू राम जी के भाइयों और उनके भतीजों को मिली। मैं जब इस टॉपिक पर रिसर्च कर रहा था तो कुछ वीडियोज़ मेरे सामने आईं, जहाँ लोग कमेंट्स कर रहे थे कि "देखो भाई, इन्हें तो फ्री में करोड़ों की संपत्ति मिल गई, ये तो मौज काट रहे हैं। अब जब सोनिया जेल से बाहर आ गई है तो अब इन्हें डर लग रहा है कि कहीं ये संपत्ति हाथ से ना निकल जाए, इसलिए वो बौखलाए हुए हैं।" तो ऐसे लोगों के लिए मेरा स्पष्ट जवाब है: देखिए, वो प्रॉपर्टी उन्हें उनके कानूनी अधिकार के आधार पर मिली। उन्होंने कोई मनमानी या चोरी नहीं की थी। कोर्ट के ऑर्डर के बाद यह बंटवारा हुआ था और उन्हें वो प्रॉपर्टी मिल गई। किस्मत थी उनकी। नंबर दो, जब अदालत ने फैसला दिया और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें संपत्ति दी गई तो इसका मतलब तो यही है कि वो हक़दार थे, इस वजह से उन्हें मिली। तो कमेंट्स में लोग क्यों जल रहे हैं? इसमें जलने या ईर्ष्या करने वाली क्या बात है? उनका हक़ था, उन्हें मिल गई। जब सीधा पीछे कोई वारिस बचा ही नहीं तो ऑब्वियसली यह सारी प्रॉपर्टी परिवार की अगली कैटेगरी यानी भाइयों और भतीजों को ही मिलनी थी। हाँ, अगर रेलूराम जी के भाई ना होते तो फिर मामला थोड़ा सा अलग दिशा में चला जाता। इसमें अनावश्यक गिला-शिकवा नहीं होना चाहिए।

खैर, आई एम सॉरी। शायद यह बात करना तो मैं भूल ही गया था। सोनिया का एक बेटा भी है जो उस वक्त जब घटना हुई थी तो वो डेढ़ साल का था। अब शायद वो 22-23 साल का होगा। कानूनी वह रेलू राम जी का पोता है और इस नाते वह प्रथम श्रेणी का उत्तराधिकारी (फर्स्ट क्लास हियर) माना जाता है, जबकि रेलू राम जी के भाई और उनके आगे के बेटे सेकंड क्लास हियर में आते हैं। अगर सोनिया का बेटा चाहे तो कभी भी अदालत में जाकर अपना हक़ मांग सकता है। अकॉर्डिंग टू हिंदू सक्सेशन एक्ट, अगर कोई नाबालिक प्रथम श्रेणी का वारिस मौजूद हो और उसका अपराध से कोई संबंध ना हो तो उसका अधिकार समाप्त नहीं होता। इसलिए टेक्निकली सोनिया का बेटा प्रॉपर्टी पर अपना क्लेम कर सकता है। लेकिन यहाँ भी कई फैक्टर हो सकते हैं। जब उस वक्त 2001 से 5 के दौरान जब कोर्ट रेलू राम जी की प्रॉपर्टी का बंटवारा कर रही थी और उनके भाइयों के नाम चढ़ा रही थी, तो क्या उस प्रोसेस में इस बच्चे के अधिकारों पर विचार किया गया था? या उसे इग्नोर कर दिया गया था? क्या अदालत ने उस वक्त इस बच्चे का नहीं सोचा कि सोनिया का तो बच्चा भी है तो फर्स्ट क्लास हियर तो वो है, या उस समय कोर्ट से कोई कानूनी चूक हो गई थी? खैर, यह फैसला तो अब ना आप कर सकते हैं ना मैं, यह तो अदालत तय करेगी क्योंकि स्थिति अब यह है कि वो प्रॉपर्टी पहले ही सेकंड क्लास हियर के नाम चढ़ चुकी है, उनके नाम हो चुकी है, यानी रेलू राम जी के भाइयों के। हाँ, अगर सोनिया का बेटा अभी भी क्लेम करता है तो कोर्ट पूरी फैमिली ट्री को दोबारा से देखेगा। शायद इसमें कुछ साल भी लग सकते हैं, तारीख पर तारीख जाना भी पड़ सकता है। ज़्यादा पॉसिबिलिटी तो यह है कि हाँ, वो चाहे, वो लड़का चाहे तो क्लेम कर सकता है अपने नाना जी की प्रॉपर्टी पर क्योंकि वो फर्स्ट क्लास ईयर में आता है और बाकी सेकंड में। अब सोनिया या उसका बेटा फिर से कुछ कोर्ट रूम में जा सकते हैं, दरवाज़ा खटखटा सकते हैं। क्योंकि जिसने, यानी सोनिया ने अपनी ज़िंदगी में इतना बड़ा कदम उठा दिया, आठ-आठ लोगों को मार दिया, प्रॉपर्टी के पीछे वो प्रॉपर्टी छोड़ेगी? यह तो अब एक सवाल है जो कोर्ट डिसाइड करेगा। सोनिया का बेटा कोर्ट में केस जीत भी सकता है और दूसरी पार्टी को हवेली और प्रॉपर्टी छोड़नी पड़ेगी। लेकिन चाहे यह चीज़ें हो भी जाएँ तो जीत तो सोनिया की ही हुई। इससे एक गलत मैसेज भी हमारे समाज में जाएगा। फिर कल को कोई भी अपने माँ-बाप को या परिवार को निपटा देगा और उसे पता है प्रॉपर्टी तो हमारे बच्चों को तो मिल ही जानी है। तो यह एक गलत मैसेज है। तो इस बात का भी कोर्ट ध्यान में रखेगा। तो आई एम ओके।

देखिए, मुझे जहाँ तक लगता है, यह मेरा ओपिनियन है। सोनिया-संजीव के केस के रिलेटेड मेरा कानून से विश्वास बहुत कम हो चुका है। यह मेरा ओपिनियन है। उन दोनों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी। अब उन्हें एक मौका देने के चक्कर में ज़मानत भी मिल गई। उसने आठ कत्ल किए। कल को अगर सोनिया रेलू राम के भाई और उनके भतीजों पर कोई एक्शन ले ले, मैं लीगली की बात नहीं कर रहा हूँ, इल्लीगल एक्शन। उनकी जान भी खतरे में पड़ सकती है। यहाँ दो काम हो सकते हैं: नंबर एक, तो उस फैमिली की सिक्योरिटी बढ़ाएँ। नंबर दो, इन्हें वापस जेल में डालें। या नंबर तीन, कोर्ट खुद डिसाइड करेगी, हम कौन होते हैं बोलने वाले, क्योंकि अंत में भावनाएं नहीं, कानून फैसला करता है। ओवर एंड आउट।

सिर्फ प्रॉपर्टी दिखी उन लोगों को। मेरे घरवाले, मेरे चाचा-ताऊ, उनके बच्चे, क्या मैं बहन नहीं थी उनकी? बेटी नहीं थी? किसी ने आके मेरे सर पे हाथ रख के ये नहीं पूछा, बेटा तेरे साथ हुआ क्या? सिर्फ उन्होंने सोचा, ओ हो हो, सोनिया बच गई, इसको कैसे ना कैसे मारो, फाँसी पे चढ़ा दो की सारी प्रॉपर्टी हम सके।