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[प्रशंसा] [संगीत] कलयुग में मनुष्य की कैचिंग पावर इतनी वीक हो जाती है, इतनी कमजोर हो जाती है कि एक शास्त्र में पारंगत होना भी बड़ा कठिन है। अरे व्याकरण तक का ज्ञान नहीं होता। व्याकरण यानी भाषा ज्ञान। फिर शास्त्र ज्ञान होना कितना कठिन। फिर भी वेदभ्यास कहते हैं मान लो ऐसा हो जाए। ट शास्त्र वेदता कोई छहों शास्त्रों को जान ले। आगम निगम व्याकरण सब में प्रवीण हो जाए और ऐसी किसी की मेमोरी हो और इस ग्रंथ में इस पन्ने पर यहां ये लिखा है इस श्लोक में ये लिखा है इस पुराण में ये लिखा है और शंकराचार्य ये कहते हैं वल्लभाचार्य ये कहते हैं निब्बारकाचार्य सब घोट के पी गया लेकिन एक लेकिन लगा याद तो सब कर लिया लेकिन जब तक बिना हरे भागवत प्रसादम जाो भागवतार्थम वो भगवान की कृपा को जब तक प्राप्त नहीं करेगा तब तक वेदों शास्त्रों के मर्म को नहीं समझेगा। उसके सेंस को नहीं समझेगा।
चलिए और आगे आइए। सबसे सरल ग्रंथ गीता भाषा बिल्कुल सरल है। गीता आप लोग पढ़ते होंगे। चलिए गीता अरे लगभग 700 श्लोक हैं। भागवत में तो 18,000 श्लोक हैं। डेली का एक श्लोक याद करो तो दो साल में गीता याद हो जाए। क्या कठिन है। एक श्लोक याद करो तो गीता से समझिए। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से पूछा तुम्हारा ऐ क्या है? लक्ष्य क्या है? तो अर्जुन ने कहा महाराज वही तो सब जीवों का है। परमधाम, परम शांति, परमानंद, परम सुख। हां अर्जुन लक्ष्य तो तुम जानते हो। ये तुम्हारा जो परम चरम लक्ष्य है ये कैसे प्राप्त होगा? ये तुम जानते हो? महाराज ये तो मैं नहीं जानता। हां तो सुन तत प्रसाद पराम शांति स्थानम प्राप्तस शाश्वतम अर्जुन तत प्रसादात उसकी कृपा से तू परम शांति को प्राप्त होगा।
अर्जुन ने कहा महाराज उसकी कृपा वो कौन अरे वही परम तत्व ईश्वर भगवान बड़ा चतुर था अर्जुन उसने कहा देखिए महाराज ये आप जो बता रहे हैं ना उसकी कृपा से मैं उसको उसको नहीं जानता मैं आपको जानता हूं क्या आप भी कुछ कृपा वगैरह कर सकते हैं? आप भगवान जब अवतार लेते हैं तो दो प्रकार की भाषा बोलते हैं। एक तो सामान्य लोगों के सामने भाषा बोलते हैं। तो उस भाषा में वह अपनी पर्सनालिटी को छुपाते हैं। जैसे भगवान राम ने जब अयोध्या वासियों को प्रवचन दिया तो क्या बोले जो अनीति कछु भाो भाई तो मोहि बरजहु भय बिराई अयोध्या वासियों यदि मैं कोई गलत बात बोल जाऊं तो आप लोग डरना नहीं कि मैं राजा हूं। यदि कुछ गलत बोल जाऊं तो खड़े होकर टोक देना कि महाराज आप गलत बोल रहे हैं। यानी मैं भी आप लोगों की तरह एक साधारण मनुष्य हूं। एक भाषा भगवान की बोलने की यह होती है। और एक भाषा भगवान बोलते हैं जब अर्जुन जैसा अधिकारी खड़ा होता है। तो उसमें अपनी वास्तविक पर्सनालिटी को प्रकट करते हैं। तो जब अर्जुन ने कहा मैं भगवान भगवान को नहीं जानता ये बताओ आप कौन है? तो भगवान श्री कृष्ण ने कहा अरे हां अरे भाई वो मैं ही हूं मैं ही हूं। मत प्रसाद शाश्वतम पदम अरे मेरी कृपा से तू परम पद को प्राप्त होगा मैं भगवान हूं 18 अध्याय का प्रवचन हुआ हां और भगवान ने कृपा की अर्जुन पर हां उसको भगवत दर्शन वास्तविक स्वरूप का बोध हुआ हां हां तो 18 अध्याय का प्रवचन समाप्त करने के बाद भगवान श्री कृष्ण ने फिर अर्जुन को पूछा अर्जुन अब तेरा क्या हाल है? अज्ञान गया कि नहीं? ज्ञान हुआ कि नहीं? तो अर्जुन कहता है हां महाराज नष्टो मोह स्मृति लप मेरा अज्ञान चला गया और ज्ञान आ गया।
देखिए दो बातें कही गई है। अज्ञान गया। अज्ञान आ गया। क्यों जी? एक ही बात कह देते। अरे अज्ञान गया। माने ज्ञान आ गया। या ज्ञान हो गया। माने अज्ञान गया। प्रकाश हो गया। तो अंडरस्टुड है ना अंधकार चला गया या अंधकार चला गया तो अंडरस्टुड है प्रकाश हो गया लेकिन आप ऐसा नहीं बोलते ना सवेरा हो गया है रात चली गई है तो ये दोनों बातें क्यों अज्ञान चला गया ज्ञान आ गया क्यों कहा पक्का करने के लिए हम लोग तर्क वितर्क कुतर्क अतितर्क करने में टॉप करते हैं। यदि अर्जुन केवल कहता अज्ञान चला गया तो हम लोग क्वेश्चन कर देते। ये लिखा है अज्ञान गया। ये कहां लिखा है? ज्ञान हो गया। और यदि अर्जुन केवल ये कहता ज्ञान हो गया। तब भी हम लोग एक क्वेश्चन खड़ा कर देते। ज्ञान हो गया। हो गया होगा। लेकिन अज्ञान भी होगा कहीं कोने में वापस आएगा। इसलिए दोनों बातें कह दी अज्ञान गया ज्ञान आ गया। तो भगवान श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन सब संसार वालों को बता। तेरा अज्ञान कैसे गया और ज्ञान कैसे आया। सबको बता ताकि कोई गलत मार्ग पर ना जाए। सही मार्ग पर चले महाराज बता दूं सही बात बता दूं ये मेरा ज्ञान कैसे गया और ज्ञान कैसे आया बताऊं आप बुरा तो नहीं मानेंगे नहीं मैं कोई बुरा बुरा नहीं मानता अरे मैं तो सबके हृदय में बैठा रहता हूं दिन भर लोगों की गालियां खाता हूं उसका बुरा नहीं मानता तेरा क्या बुरा मानूंगा हां तो महाराज ऐसा है कि मेरा अज्ञान गया और ज्ञान हुआ लेकिन आपके प्रवचन से नहीं। आपने बड़ी मेहनत किया। 18 अध्याय का प्रवचन दिया लेकिन आपके प्रवचन से मेरा अज्ञान नहीं गया और ज्ञान नहीं हुआ। तो तत्प प्रसादा आपकी कृपा से मेरा अज्ञान गया और ज्ञान हुआ। प्रवचन से नहीं।
अरे वो प्रवचन 18 अध्याय का जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया था ना। वह प्रवचन तो हम रोज पढ़ते हैं। वो गीता तो हम रोज पढ़ते हैं। कोई गीता ज्ञानी अर्जुन दिखाई नहीं पड़ा। और हमारे देश में बहुत सारे पढ़े लिखे भोलेभाले लोग। क्या करते हैं? रिटायर हो गए। हां। और जरा ईश्वर ये विषय में जिज्ञासा भी है। हां हां और टाइम भी देते हैं। दो घंटे, तीन घंटे, चार घंटे कई लोग तो कई बार हमको भी ऐसे लोग मिलते हैं। मैं स्वामी जी रोज चार घंटे बस कमरा बंद करके बस बैठ जाता हूं। क्या करते हो? चार घंटे में करते क्या हो? पाठ पाठ करता हूं। मैंने अपने वो कमरे में सब किताबें रख रखी है। यह लिया गीता गीता का पाठ कर लिया। फिर लिया भागवत पांच अध्याय का पाठ कर लिया। फिर लिया दुर्गा सप्तशती उसका पाठ कर लिया। फिर लिया हनुमान चालीसा उसका पाठ कर लिया। रामचरितमानस उसका पाठ कर लिया। पाठ करता हूं। बड़े भोले हो। अरे ये पाठ करने से क्या मिलेगा? तुम शब्दों को पढ़ रहे हो। शब्दों को अक्षरों को जल्दी जल्दी पाठ। हमारे यहां होता है ना अखंड रामायण का पाठ रखते हैं लोग। तो कुछ लोग इकट्ठे हो जाते हैं। पाठ 8:00 बजे शुरू हुआ है। हां सवेरे 8:00 बजे तक खत्म करना है। तो मंगल भवना मंगल हारी ध्रुव दशरथ अजर बिहारी जल्दी जल्दी और पाठ करने वाले वो महानुभाव जो आए तो 10 11 बजे तक तो ठीक-ठाक चला। फिर जब सब चले गए तो वो सुपरफास्ट चलाया पाठ को सवेरे 8:00 बजे के बजाय 7 ही बजे खत्म हो गया और बड़े खुश हो गए हो गया आ जाओ दाल बाटी चूरमा खा ले पाठ खत्म तो रामायण गीता भागवत इनको पढ़ना ये गलत है ना गलत नहीं है। तुम्हारा तरीका गलत है। कोई भी कार्य सांसारिक भी यदि आप गलत तरीके से करेंगे तो बात नहीं बनेगी ना। आपको भूख लगी है? हां। भूख लगी है। कहां लगी है? भूख कहां लगती है? पेट में। तो एक काम करो ना दाल, रोटी, चावल, रसगुल्ला सब पेट को बांध लो। भूख तो यहां है ना तो बांध लो ना पेट के इससे भूख मिटेगी। अरे साहब यहां भूख लगी है। यहां दाल रोटी चावल बांध रखा है। ये भूख मिट क्यों नहीं रही है? ऐसे भूख नहीं मिटती है। पेट के बांधने से नहीं मिटती है। मुंह में डालो। और ठीक ढंग से डालना। उसका भी तरीका है। यह नहीं कि मुंह ऊपर किया उसमें आटा, घी, तेल और गरम गरम पानी डाल लिया। इससे भी हॉस्पिटल पहुंच जाओगे। और यह भी नहीं कि खाना बना हुआ उसको ठूस लिया पूरा और गटक रहे हो। इससे भी मुसीबत हो जाएगी। उसका तरीका है। जो आपने भोजन तैयार किया है उसका टुकड़ा तोड़ो। ग्रास मुंह में डालो और धीरे-धीरे उसको चबाओ। फिर वो भीतर जाएगा। तब भूख मिटेगी। अजी साहब गजब है। भूख यहां खाना यहां ये कैसे होता है? ऐसे ही होता है। ऐसे ही होता है। तो गीता भागवत रामायण पढ़ना ये गलत नहीं है। तुम्हारा तरीका गलत है। तुम गीता पढ़ रहे हो? हां। और गीता का पाठ कर रहे हो। हां। अब क्या बोल रहे हो? सर्व धर्म परितज माकम शरणम ब्रज। ये तो भगवान श्री कृष्ण ने कहा था अर्जुन से कि तू सब धर्मों को छोड़कर मेरी ही शरण में आ जा। आप किसको कह रहे हो? मेरी शरण में आजा। क्या भगवान बनकर बोल रहे हो? और जब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सब धर्मों को छोड़कर मेरी ही शरण में आ जाओ तो अर्जुन ने जो किया था वो तुमको करना है कि ये पाठ करना है क्या भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से ये कहा था जो मैं बोल रहा हूं वो तू भी बोल लेना ऐसा तो नहीं है तो ये जो हम अक्षरों को पढ़ते इससे क्या मिलेगा? जीरो बटे 100 अरे ना ना जीरो बटे 100 तो बहुत होता है तो माइनस में नंबर मिलेंगे माइनस में क्या मतलब मतलब ये कि जो बिल्कुल गीता भागवत रामायण नहीं पढ़ता है कभी नहीं पढ़ा है बेचारा उसके उसके हृदय में एक दीनता रहेगी, नम्रता रहेगी। जब वो भगवान के मंदिर में जाएगा, हाथ जोड़कर खड़ा होगा तो दो आंसू बहा देगा। हे प्रभु मैं कुछ नहीं जानता। मैं अज्ञानी हूं। गीता भागवत रामायण में क्या लिखा है? मुझे कुछ ज्ञान नहीं है। उसमें नम्रता है, विनम्रता है। प्रार्थना के स्वर हैं। एक तड़प है, एक पुकार है। और जिसने चार छह श्लोक गीता के याद कर लिए। दो चार 10 मंत्र वेद के याद कर लिए दो चार कल्याण के अंक पढ़ लिए 10 20 रामायण की चौपाइयां याद कर ली वो जब मंदिर में जाएगा और भगवान के समक्ष खड़ा होगा तो पहले तो चारों तरफ देखेगा कितने लोग खड़े हैं खड़े हैं अब कैसे बोलेगा शताकारम भुजग शयनम पद्मना म सुरेशम विश्वाधारम गगन सदशम मेघवरम शुभांगम सहसखा पुरखा सहस्र पात यानी अगल बगल में जो खड़े हैं वे लोग सब समझ ले मुझे भी संस्कृत आती है यानी ज्ञान का अभिमान ज्ञान का अहंकार और ऐसे बोल रहा है वो वेद मंत्र को जैसे भगवान से युद्ध कर रहा हो कहीं प्रेम का विनम्रता का नाम नहीं तो तुमने गीता भागवत रामायण के श्लोक याद कर करके चौपाइयां याद करके क्या किया तुमने अहंकार कमा लिया ज्ञान अभिमान कमा लिया तो जो दो आंसू आते थे भगवान के सामने वो भी समाप्त हो गए। तो अर्जुन कहता है कि महाराज मेरा अज्ञान गया और ज्ञान हुआ लेकिन आपके प्रवचन से नहीं आपकी कृपा से तो गीता भी यही कह रही है और रामायण भी यही कह रही है कौन जान सकता है भगवान को सोई जान देहु जनाई और जानत तुम भजाई जिसको वो जना दे फिर कहा राम कृपा बिनु सुनु खगराई जानी न जाई राम प्रभु ताई फिर कहा तुमरी ही कृपा तुम रघुनंदन जानत भगत भगत उर चंदन राम को राम की कृपा से जाना जाएगा। यस प्रसादम कुरते सचम दृष्ट मरहति अध्यात्म रामायण भी कहती है ईश्वरा अनुग्रह स्वात्म बोधो यथा भवेत सुरेश्वराचार्य कहते हैं ईश्वरा अनुग्रह पुसा वासना भगवान दत्त कहते हैं य कृपा ले मात्रण पुरुषार्थ चतुष्टयम प्राप्त्यते तमहम वंदे गोविंदम भक्त व्सलम मीमांसा दर्शन कहता है अरे कहां तक कहे अद्वैत ब्रह्म के प्रचारक जो स्वयं को ही ब्रह्म कहते रहे अहम ब्रह्मास्मि वे ढाई हजार वर्ष पहले जो हुए आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी महाराज वे शंकराचार्य कहते हैं धन्योह कृतकृत्योहम विमुक्तोहम भवग्रहात नित्यानंद स्वरूपोहम पूर्ण तदनुग्रहात कितना सुंदर मैं धन्य हो गया कृत कृत हो और क्या हो गए विमुक्त हो गया और क्या हो गए आनंद स्वरूप हो गया और क्या हो गए पूर्ण हो गया विमुक्त हो गया शंकराचार्य जी महाराज ये सब आप कैसे हो गए तत्व मसी का जप करके कि अह हम ब्रह्मास्म का जप करके नहीं नहीं नहीं तद अनुग्रह उसकी कृपा से यह सब मैं हो गया। ये शंकराचार्य कह रहे हैं वेदांत का एक सूत्र है परा तते इस वेदांत सूत्र के भाष्य में शंकराचार्य ने स्पष्ट लिखा तदनुग्रह हेतु के नच विज्ञानन मोक्ष सिद्ध भित मरहति ऐ ज्ञानियों कान खोलकर कर सुन लो भगवान श्री कृष्ण के अनुग्रह के बिना मोक्ष रूपी सिद्धि नहीं मिल सकती। आगे हम आपको डिटेल में बताएंगे। तो शंकराचार्य कह रहे हैं अरे केवल हिंदू धर्म ही नहीं और धर्मों का भी यदि विवेचन करें समय नहीं है। संक्षेप में समझ लीजिए। सिख धर्म गुरु ग्रंथ साहब में 661 नंबर का पेज खोलना जो मूल ग्रंथ है उसका 661 नंबर का पेज जैसी नदरी करे तैसा होई बिनु नदरी नानक नहीं कोई फिर 356 नंबर का पेज खोलना नदरी करे ताहु मोह जाई नानक हरि शिव रही समाई नदर नदर माने कृपा उसकी कृपा के बिना साधक का काम नहीं चल सकता। जैसी उसकी कृपा वैसा उसका परिणाम और ईसाइयों का जो धर्म ग्रंथ बाइबल है उसके तो पन्ने पन्ने पर कृपा शब्द लिखा है। पन्ने पन्ने पर गॉड हु इज रिच इन मर्स फॉर ह ग्रेट लव। फॉर बाय ग्रेस आर यू सेव थ्रू फथ एंड नॉट दैट ऑफ योरसेल्फ इट इज द गिफ्ट ऑफ गॉड ग्रेस मर्सी एंड पीस फ्रॉम गॉड द फादर एंड ऑल माय होप इज नोवेयर बट इन द ग्रेट मर्स इस प्रकार वेद से लेकर के रामायण तक सब हिंदू धर्म ग्रंथों में भी और अन्य धर्मों में भी बार-बार यह कहा गया है भगवान को भगवान की कृपा से ही जाना जाएगा।
एक [प्रशंसा] सिद्धांत अच्छा स्वामी जी तो भगवान को भगवान की कृपा से ही जाना जाएगा। हां यह पक्का सिद्धांत है। हां बिल्कुल अकाट सिद्धांत तो फिर भगवान हम पर कृपा करता क्यों नहीं? कृपा क्यों नहीं करता? और अनादि काल से अब तक हम पर भगवान ने कृपा की क्यों नहीं? और जब उसकी कृपा से ही उसको जाना जाएगा तो कृपा कर दे हम लोगों पर हम जान ले लेकिन उसने हम पर कृपा अभी तक नहीं की। हां नहीं की। और सूर मीरा कबीर नानक तुकाराम इन महापुरुषों पर भगवान की कृपा हुई। हां हुई। क्यों? अरे वो भी भगवान के बच्चे। हम भी भगवान के बच्चे। फिर भगवान ने कुछ जीवों पर महापुरुषों पर कृपा कर दी। हम पर कृपा नहीं की। क्यों नहीं की? क्या हम लोगों ने भगवान का खेत काटा है? हां? तो हम पर भगवान की कृपा अभी तक क्यों नहीं हुई? कब होगी? कैसे होगी? बताया जाएगा। लेकिन पहले आपको अपने ऊपर एक कृपा करनी पड़ेगी। क्या? ठीक 7:00 बजे कल यहां आना होगा और लगातार आना होगा। तब आपको पता चलेगा कृपा कैसे होती है। बोलिए इस वृंदावन बिहारी लाल की जय।