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Very Emotional Bayan 😭💔- Hazrat Muhammad ﷺ Ki Bhook Ka Waqia - Maulana Raza Saqib Mustafai

ISO Short Bayan12:55

Transcription

ये इस्लाम का वह दूर है की जब हुजूर मस्जिद नववी से बाहर निकलते हैं तो आगे हजरत ए उमरू आबू बाकर राजी अल्लाह हो ताला अन्हो मां खड़े हैं। चेहरे के ऊपर अजीब उदासी है। कहा उमर अब्बू बकरा इस वक्त क्यों खड़े हो? अर्स की हुजूर भूख ने घर में टिकने नहीं दिया। हमने चाहा हुजूर का चेहरा देख लेने तो कुछ प्यास बुझ जाए, कुछ भूख मिट्टी जाए। हुजूर ने फरमाया मेरा हाल भी यही है। जी चीज ने तुझे गारो से निकाला है वही चीज मुझे घर से निकाल लाई है।

तो हुजूर ने जब देखा के खाना है तो हुजूर ने एक रोटी ली और चंद्रभूषण उठाई और एक आदम को बुलाकर के कहा जो हमारे घर ले आओ मेरी बेटी फातिमा कितने दिनों से भून किया। हमें तो वह कहानी भी इस्लाम की हुरमत की याद आई है की जब ओहद के अंदर 70 शहीदों के लेश पड़े हुए हैं तो हजरत ए सफिया हुजूर की फूफी अपने भाई हमजा के लिए लेकर के कफन की आई है। तो हुजूर अलैहिस्सलाम ने फरमाया की जी कब्र में हमजा को दफन किया जाए इस कब्र में मुसाब बिन उम्र को भी कफन दिया जाए और दफन किया जाए। और कहा मेरे चाचा के लिए उसकी जो बहन मेरी फुफु जो दो चादर ने ले आई है कहा एक चादर हम उसे सब बिन उम्र को देंगे और वो अपने बेटे को इतना खूबसूरत लिबास पहनती है और इतने खूबसूरत खुशबू और आता उसको लगती है की मुसाब बिन मैं जी गलियों से गुजरते थे डर तक वो गलियां महकती रहती थी। लोग कहते थे यहां से मुसाब गुर्जर के गया होगा इसलिए ये गलियां महक रही हैं। अच्छा फिर मुझे नजर पड़ती है मेरे मोहम्मद या अरबी की उमर हुजूर की जुल्फों का असीर हो जाता है मां काफी है। जब पता चला है तो उसका लिबास भी छन लेती है और अशुद्धियां भी वापस ले लेती है। फिर वो वक्त भी आया की मुसाब बिन उम्मीद हाफसा की जान भिजरत कर जाते हैं। मक्के के हालात कुछ थोड़े से खुश गवार नजर आए तो वो हाफसा से वापस मक्के जब पलटे तो उनके बदन पे जो चादर थी वो जगह-जगह से फटी हुई थी। मेरे आका क्रीम मक्के में इससे खूबसूरत लिबास पहने वाला कोई दूसरा शख्स नहीं देखा और आज मेरे मुसाब को पहने के लिए जो चादर मोहिए़सर है वो भी जगह-जगह से फटी हुई है। ये इस्लाम की हुरमत की कहानी है और आज ओहद में यही मुसीबत उमेश शाहिद हो जाते हैं और उनके लिए कफन भी दस्तया नहीं है। हुजूर ने कहा जो मेरे चाचा के लिए दो चादर ने लाई हैं उनमें से एक का कफन मुसाब को दे दो ना और दूसरी चादर से कफन मेरे चाचा को दे दिया जाए। अच्छा हजरत ने मुसाब के लिए बड़ी चादर रख दी गई और हजरत अमीर हमजा के लिए जो चादर थी वो छोटी थी। अगर शायद हम थे तो पाउंड नंगे हो जाते अगर तो सर नंगा हो जाता। हुजूर ने फरमाया मेरे चाचा का श्रद्धम दो और पाओ के ऊपर इस करनामी घास दाल दो। मैं ये इस्लाम की खुर्बत की कहानी तुम्हें सुना रहा हूं जब मेरे रसूल के चाचा के लिए पूरे कफन का टुकड़ा भी दस्त तैयार नहीं था। इस्लाम उसे वक्त भी का गया था। इस्लाम उसे वक्त भी जलील नहीं था। इस्लाम उसे वक्त भी सर बुलंद था और इस्लाम उसे वक्त भी इज्जतों की मस्तक पे था।

ये इस्लाम का वह दूर है की जब हुजूर मस्जिदे नववी से बाहर निकलते हैं तो आगे हजरत ए यूरो आबू बाकर राजी अल्लाह ताला अन्हो मां खड़े हैं। चेहरे के ऊपर अजीब उदासी है। कहा उमर अब्बू बाकर इस वक्त क्यों खड़े हो? अर्स की हुजूर भूख ने घर में टिकने नहीं दिया। हमने चाहा हुजूर का चेहरा देख लेने तो कुछ प्यास बुझ जाए, कुछ भूख मिट्टी जाए। हुजूर ने फरमाया मेरा हाल भी यही है। जी चीज ने तुझे गागरो से निकाला है वही चीज मुझे घर से निकाल आई है। चलते हुए हजरत के करीब से गुजरे हुजूर की खुशबू का के वो बाहर ए गए। अज की बांदा नवाज आज मेरे मेहमान नहीं बनते। हुजूर ने कहा तुम्हारी मदद को बिताया घरवालों को बकरी का बच्चा जब्बार करके दिया कहा जल्दी जल्दी खाना तैयार करो मेरे आका को भूख लगी होगी। यह कहकर वापस आए हुजूर के पास बैठे नजर चेहरे पे पड़ी तो घबरा गए थे की समझ ए रही थी कितने दिनों से हुजूर ने कुछ नहीं खाया। उठ के बैग में चले गए खुजूरों का कोसा टोडा हुजूर के सामने रखा। बांदा नवाज जब तक खाना तैयार नहीं होता यह खजूर तनावल फरमाए। थोड़ी डर के बाद खाना दस्तखन पे ग गया। हुजूर शेयर्स की की हुजूर आए खाना तनावुल करने। हुजूर ने दस्तक खान पर तशरीफ़ फार्मा होकर के हुजूर ने कपड़ा उठाया तो हुजूर ने जब देखा के खाना है तो हुजूर ने एक रोटी ली और चंद्रभूषण उठाई और एक आदम को बुलाकर के कहा जो हमारे घर ले आओ मेरी बेटी फातिमा कितने दिनों से [संगीत] कहां जो हमारे घर ले आओ मेरी फातिमा दो जहां की डीम्ट हैं। उनके खाली हाथ में आपको पता होगा की जब मेरे रसूल का इंतकाल हुआ है हुजूर का विशाल हुआ है तो हुजूर की एक जरा एक यहूदी के घर में गिरवी राखी हुई थी। हुजूर रख करके उससे कर्ज लिया हुआ था। यह इस्लाम की खुर्बत की कहानी है और फिर अल्लाह ने इस्लाम को अमरत के रंग भी दिए।

और तुम्हें कहानी सुनाऊं हजरते अली बिन हैथम रिवायत करते हैं सही बुखारी में रिवायत ये हातिम ताई के बेटे हैं कहते मैं हुजूर की खिदमत में हाजिर हुआ हाल कर दिया है और उसने शिकायत की हरबा की पसंद की और अपनी मौसी बड़ा ली निरीक्षक सैया खाने लगा हुजूर मेरे पास दौलत तो है लेकिन मैंने जी मंजिल पर जाना है तो मेरे लिए क्या हम कैसे रास्ता ते करूं तो यह दो लोगों ने यह बातें की तो हजरते अली कहते हैं की हुजूर ने रहे सुखन मेरी जन्म मोड और मेरी जन्म मुखाते बुके कहा अली तूने हीरा देखा है अभी कहते हैं मैंने अज की हुजूर देखा नहीं सुना है हीरा यह शहर है इराक का तो हुजूर ने फरमाया आदि तूने हीरा देखा है मैंने कहा नहीं हुजूर देखा नहीं उसका टेक सुना है फरमाया आदि अगर अल्लाह तुझे जिंदगी की मोहलत दे तो हीरा से एक खातून चलेगी तू अपनी आंखों से देखेगा और मक्के तक पहुंचेगी और अल्लाह के घर कब का तवाफ करेगी उसको हीरा से लेकर के मक्के तक अल्लाह के अलावा किसी का डर नहीं होगा कहते हैं की मैंने दिल में कहा की फिर बानो ते के डाकू मा गए होंगे जिन्होंने अब के ऊपर रॉक दाल रखा है तो वो तो फिर खत्म हो गए होंगे कहते हैं मैं भी सोच ही रहा था की हुजूर ने मस्जिद मेरी हैरत में इजाफा करते हुए कहा आदि अगर तुझे अल्लाह ने जिंदगी की मोहलत दी तो तू देखेगा के किस्सा के ख़ज़ाने तेरी जोली में होंगे तो उसे दूर की सुपर ताकत थी मैंने कहा हुजूर तीसरा दिन हुर्मास हुजूर ने फरमाया हां किस्सा बिन कहते हैं की हुजूर ने फिर फरमाया दी अगर तू जिंदगी पी तो तू वो दिन भी देखेगा की एक शख्स जकात की रकम लेकर के जकात की चांदी लेकर के जकात का सोना लेकर के निकलेगा और उसको कोई जकात का मस्त हैक ही नहीं मिलेगा। हजरत यदि बिन हाथों कहते हैं की फिर मैंने वह मंजर अपनी आंखों से देखा की हीरा से खातून जाली और मक्के तक पहुंची और अमन ऐसा था की उसको अल्लाह के अलावा किसी का डर नहीं था फिर वह लम्हे भी मैंने देखें की किसराबिन हुर्मास के ख़ज़ाने मस्जिद नववी के बाहर पड़े हुए हैं तो कहते हैं तीसरी चीज में देखना सका और मैंने लोगों को कहा की ये मैं तो नहीं देख सका मेरी शायद जिंदगी वफा ना करें और अगर तुम्हारी जिंदगी वफा करें तो तुम देखना मेरे आका ने जो फरमाया था दो बातें तो पुरी हो गई हैं और तीसरी बात तुम देख लोग।

हजरते यह-यह बिन सैड फॉर्मेट हैं की हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज का जमाना था और उन्होंने मुझे अफ्रीका की जान अब जकात वसूल करने के लिए भेजो। मैं वहां से जकात वसूल की और फिर मैं रकत लेने वाले मुस्तकीम को ढूंढने लगा तो कहते हैं मुझे कोई मुश्तक ना मिला। फिर मैं गुलाम पकड़ता और उसके पैसे दे के उसको आजाद करवाता चला जाता। हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज का जमाना है के गवर्नर है इराक का वो हजरत उमर बिन अब्दल अजीज को लिखना है के इतनी रकम है इसका क्या करना है तो उमर बिन अब्दुल अजीज कहते हैं रकम लेक यहां आना वहां इराक के लोगों में बांट दो जो जकात के मुस्तेक हैं उनको तक्सीम कर दो तो गवर्नर लिखना है जो मस्ती उनको दे दी अब कोई मुस नहीं का नहीं रहा तो मैं क्या करूं। हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज कहते हैं जो मकरुस हैं उनका कर्ज उतार दो तो कहते हैं की हां कर्ज भी मैंने उतार दिया है रकम फिर भी बैक रही है क्या करूं। हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज ने फिर लिखा जो शख्स शादी करना चाहते हैं उनका हक मैहर अदा कर दो। मैंने कहा कि वो भी कर दिया है रकम फिर भी बैक गई अब क्या करूं तो हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज ने मुझे लिखा की जो गैर मुस्लिम है जिन्होंने टैक्स दिया हुआ है जितना टैक्स दिया है उससे दुगने पैसे उनको कर्ज में दे दो और उनको कहो जो इसका कारोबार करो खेती बड़ी करो और साथ उन्हें ये भी का देना कर्ज की फिक्र ना करना और ज्यादा इसमें परेशान ना होना जब दे सकोगे दे देना।

ये दोस्त भी फरीस्लाम ने देखा और ये घड़ियां भी अच्छी जब चीटर पहने हुए थे जब पैड लगे लिबास पहने थे जब पेट में डालने के लोका भी नहीं था। अल्लाह का दिन उस वक्त भी हालात था और जब गलियों के अंदर रेशम बिखरा हुआ होता था कोई उठाने वाला नहीं था। दिन उस वक्त में हालात था। दिन का गालिब होना या ना होना इसका ताल्लुक जो है वो मालूम दौलत से नहीं है। एक बाल कहता है की जबान बांदा ये मन का बजारी से नहीं मन का सवाल दे जारी से नहीं है बल्कि इसका शबाब कोई और है। वो सब अब ढूंढना है कि हम दुनिया में रुसवा हो के क्यों र गए हम जमाने के सामने तमाशा क्यों बैंड करेंगे। आज हमारा तमाशा देखा जा रहा है। आज भूखे कुत्तों को हमारी बेस्ट बहनों के ऊपर छोड़ जा रहा है और उसका तमाशा देखा जा रहा है। क्या हमने ये दिन भी देखने थे। हमने सुहाग लगाना है दौलत की किल्लत और कसरत यह साध्वी चीज़ हैं। हमने तारीख में देखा है हम कभी मलिक तोर पे कमजोर थे जो स्वाद नहीं हुए हैं। माल ज्यादा हो गया शबाब कोई और हैं।