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[संगीत] श्रीमद् भगवत गीता पांचवा अध्याय 14वा श्लोक। न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजते प्रभु। प्रभु भू भू अर्थात वो जो धारण करता है, जिसके ऊपर सब कुछ है। और प्र का उपयोग किया जाता है प्रचुरता, बहुलता, आधिक्य बताने के लिए। जो भी गुण इंगित होता है, उसका उसका संवर्धन करने के लिए प्र लगा दिया जाता है। तो भो माने वो जो अपने ऊपर धारण करता है, और प्रभु मतलब वो जिसने अपने ऊपर सब कुछ ही धारण कर रखा है। तो जब श्री कृष्ण कहते हैं कि अहंकार तो धुएं जैसा है। ऊपर रहता है आग के। जो असली है, नित्य है, सत्य है, उस वस्तु द्वारा धारित रहता है। कह सकते हैं कि आग ने धुएं को अपने ऊपर धारण कर रखा है। आग आधार है। आ धार और अहंकार धार प्रणा है। अग्नि पर आधारित है धूम्र धुआं। सत्य पर आधारित है माया। आत्मा पर आधारित हो गया सारा संसार हम्? समझ में आ रही बातें?
तो, यहां पर हमने धारण का अर्थ लिया ढकने या छुपाने की दिशा से। वस्तु के ऊपर अवस्थित होने की दिशा से। कुछ है और कुछ उसके ऊपर अवस्थित है। स्टेशन है। अब दूसरी दिशा से भी समझते हैं। अहंकार का जो पूरा कामधाम चल रहा होता है। पूरा व्यापार अपनी दृष्टि में। वह जितनी दौड़प कर रहा होता है। जितनी उसकी चेष्टाएं और गतिविधियां होती हैं। वह किस लिए होती हैं? मैं तृप्त हो जाऊं, शांत हो जाऊं। इसीलिए होती है ना। और इस तृप्त शांत दशा को क्या कहते हैं? आत्मा। तो इस अर्थ में आत्मा अहंकार की संचालक है और पालक है। पालक माने वो जो आपको चलाए, जो आपको पाले, जो ना हो तो आप गिर पड़ो। हम वैसे ही यदि आत्मा ना हो तो अहंकार गिर पड़ेगा, क्योंकि आत्मा की खातिर ही अहंकार सब कुछ करता है। तो भू का एक अर्थ पालने वाला भी होता है। एक ही बात है। धारण करने वाला, पालने वाला। आपने एक बच्चे को ऐसे कंधे पर ले रखा है। तो कोई यह भी कह सकता है कि शरीर पर धारण कर रखा है। या मां गर्भ में धारण करती है और वही आगे बात होगी कि आप उसको पालते भी हो। ठीक है? तो अहंकार का आधार है आत्मा। और अहंकार का व्यापार है आत्मा। पहली बात से धारण करने की दिशा हुई और दूसरी बात से पालन करने की दिशा हुई। आत्मा ना हो तो अहम अस्तित्व में ही नहीं आएगा, क्योंकि अहम कभी कहता ही नहीं कि वह अहम हूं। तो कहता है मैं आत्मा हूं। अगर आत्मा ही नहीं है तो अपनी पहचान क्या बताएगा? आत्मा ना हो तो आप मैं क्यों बोलेंगे? मैं थोड़ी ही झूठ है। हम जिसको मैं समझ रहे हैं वह झूठ है। मैं तो अंतिम सत्य है। आत्मा ही परम सत्य है। पर आप जिसको मैं बोल देते हो वह झूठ है। है ना? तो वह जो है जिसको आप मैं बोल देते हो वो बेचारा भी क्या अपना नाम बताएगा अगर आत्मा विशुद्ध मैं हो ही ना। आप बात समझ गए?
एक आदमी है जो गांव वालों को दुखी किया करता है। रामू कांस्टेबल बनके। ऐसे ही है कोई दूरदराज का पिछड़ा गांव। वहां तक बस यह रामू कांस्टेबल ही जाता है। तो एक बहुरूपिया है वह रामू कांस्टेबल बन करके रूप करके गांव वालों को ठगा करता है। एक दिन गांव में ही रामू कांस्टेबल मर गया। है ही नहीं। रामू कांस्टेबल। गांव वालों के सामने मर गया। तो क्या अब ये ठग बचा रह पाएगा? अब ये अपना नाम क्या बताएगा? जो अपना नाम यह बताया करता था वही नहीं रहा तो अब यह कैसे बचेगा? तो आत्मा ना हो तो अहंकार कैसे बचे बताओ? रामू कांस्टेबल नहीं तो ठग भी मर गया, क्योंकि ठग स्वयं को ठग तो कभी बताता ही नहीं था। वो क्या बताता था रामू? और रामू तो मर गया तो ठग भी मर गया। तो आत्मा मर जाए अगर ना हो अगर तो अहंकार भी हो। अब समझ में आ रही है बात? हम कोई पूछे ना क्या प्रमाण है आत्मा का? कहो हम मैं मैं प्रमाण हूं कि आत्मा है। मैं कहते दिखाई नहीं देती ये है वो है कहते हैं कि सोचा भी नहीं सकता उसके बारे में तो ऐसे ही है बस अप्रममेय भी बोल देते हैं उसको तो फालतू ही माने जा रहे हो। अंधविश्वास है आत्मा और अंधविश्वास कुछ नहीं है। हर सांस यह कहती है हम है तो खुदा भी है। हम है ना तो हम ही प्रमाण है। और क्या प्रमाण चाहिए? लो यह खड़े हैं। इंद्रिय प्रमाण पे चलते हो ना तुम? तो अपनी सारी इंद्रियों से परख लो हमको। हम दिखाई भी देते हैं। हमें छू भी सकते हो, सूंघ भी सकते हो। नहाए नहीं है। [संगीत] हम है ना? हम ही प्रमाण हैं। समझे आ रही बात? यह है तो आत्मा से ही अहम है। सत्य ना हो तो झूठ भी टिक नहीं सकता। मजबूरी देखो बेचारे की। झूठ के पास भी नाम, मुखौटा, पहचान किसकी होती है? सच की होती है। और सच जैसी कोई वस्तु हो ही ना तो झूठ कहां से आएगा? तो सच का प्रमाण क्या है? झूठ। सच का प्रमाण क्या है? झूठ। दुनिया में इतना झूठ है। इसी से तो पता चलता है कि सच है। सच ना होता तो झूठ कब का मर गया होता।
तो आत्मा अहम को धारण करती है। इस अर्थ में प्रभु है। और आत्मा अहम का पालन भी करती है। इस अर्थ में भी वह प्रभु है। पालन किस अर्थ में करती है? हमने कहा यह कि अहम की सारी चेष्टाएं, सारी गतिविधियां, आशाएं, कामनाएं, डर, बचना, बचाना, आक्रामक हो जाना सब कुछ जो है उसका वो है क्या पाने के लिए? एक अंतिम विश्राम, कोई शांति, कोई तृप्ति, कोई विगलन। उसी का क्या नाम होता है आत्मा? तो उस अर्थ में भी अहम का पालन आत्मा ही करती। क्या अजीब बात है। अहम तो झूठ है। झूठ को सच पाल रहा है। यह झूठ की मर्जी है कि ऊपर ले जा रहा है। पर झूठ भी कहता तो यही है ना कि सच के लिए जी रहा हूं। तो इस अर्थ में झूठ को भी सच पाल रहा है। दुनिया में जितने लोग लड़ाई करते हैं उदाहरण के लिए वो क्या बोल के लड़ाई करते हैं? सच की तरफ से लड़ रहे हैं। यू आर फाइटिंग फॉर पीस। युद्ध करे बिना शांति नहीं मिलेगी। तो युद्ध को कौन पाल रहा है? शांति। हिंसा को कौन पाल रहा है? अहिंसा। कोई कहता है कि मैं युद्ध इसलिए कर रहा हूं ताकि अनंत काल तक युद्ध चलता रहे। सब क्या बोलते हैं? हिरशिमा नागासाकी। अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा था कि हमने लोग मारे नहीं हमने जाने बचाई है, क्योंकि ये बम गिरे तो युद्ध समाप्त हो गया। हम कभी कोई नहीं मिलेगा जो कह दे कि हम युद्ध के लिए युद्ध करते हैं। मिनिस्ट्री ऑफ वॉर देखने को मिलती है। मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस देखने को मिलती है। रक्षा मंत्री। सब अगर रक्षा ही कर रहे हैं तो आक्रमण कौन कर रहा है? तो आक्रमण को भी कौन पाले हुए हैं? रक्षा। अग्रेशन कर ही नहीं पाते। अगर डिफेंस का सहारा नहीं होता। झूठ है। अग्रेशन को लेकिन पालने के लिए भी डिफेंस चाहिए। किस अर्थ में बात समझ में आ रही है ना? तो इस अर्थ में आत्मा अहंकार के लिए प्रभु है। प्रभु। ठीक है? यह समझना बहुत जरूरी है। क्यों समझा रहा हूं इतना? क्योंकि नहीं समझेंगे तो प्रभु बोलते ही पुराने संस्कार सक्रिय हो जाएंगे और प्रभु का क्या अर्थ हो जाएगा? ईश्वर, व्यक्ति जैसा कोई। हम तो बातचीत करते हैं ना, हम तो प्रार्थना भी शब्दों के माध्यम से करते हैं ना। और जहां शब्द होंगे वहां छवि होगी। कोई आप ऐसा शब्द बता दीजिए जिसके समकक्ष कोई छवि ना हो। बताइए। और कोई ऐसी छवि बता दीजिए, कोई चित्र जिसके लिए कोई शब्द ना हो। बताइए। बोलिए। मैं आपसे कुछ भी कह दूं, कोई ऐसा शब्द बोल दूं जो आपने कभी सुना भी ना हो। फिर मैं कहूं कि इसको जरा सा आप छवि में ढाल दीजिए। आप ढाल देंगे और सब अपने-अपने हिसाब से डाल देंगे। तड़बमखोर बनाओ। हो ही नहीं सकता कि नहीं बनाओगे। हां, थोड़ी सी दुविधा होगी कि दाल के तड़के से शुरू करना है। मम्मा माने मेरा या मम्मा माने मोमोज़। तो तड़के वाला मोमो। अच्छा फ्राइड मोमोज की बात हो रही है। फिर कुछ ना कुछ निकाल लेंगे। अब बन जाएगी छवि। तो जब आप ईश्वर भी कहते हैं ना तो आप किसी सिद्धांत की नहीं बात करते। आप किसी व्यक्ति की बात करते हैं। तो प्रभु माने हमेशा हमारे लिए कोई व्यक्ति होता है। व्यक्ति माने आवश्यक नहीं होमोसेपियंस। व्यक्ति माने एक सगुण रूप। व्यक्ति माने आवश्यक नहीं नर मादाई रूप धारी। हम तो ये हमारे बहुत पुराने संस्कार हैं। हमारे देह भाव ने हमें जरा भी बोध नहीं होने दिया है कि देह से आगे देह से परे भी कुछ हो सकता है। तो गुरुओं ने ग्रंथों ने जब कभी उच्चतम की बात भी करी है तो हमने उसको देही बना दिया है। परम की बात हो, कहीं लिखा हो सत्य, परम, परमात्मा, आत्मा, ब्रह्म, कुछ भी। तो हम जो उच्चतम है उसको तुरंत एक देह दे देते हैं। अब इसको दूसरी दिशा से पढ़ो। उच्चतम ग्रंथ में कोई शब्द आया जो उच्चतम की ओर इशारा कर रहा है और तुरंत हमारे मन में छवि किसकी आती है? व्यक्ति की। माने देह की। तो उच्चतम को हम देह दे देते हैं। अब इसको इधर से पढ़ो, क्योंकि देह को ही हम उच्चतम मानते हैं। उच्चतम बोला गया तुरंत हमने उसको देह दे दी। जो व्यक्ति जितना ज्यादा व्यक्तण करना चाहेगा, परसोनिफिकेशन करना चाहेगा उच्चतम का, समझ लो कि उसमें देह भाव उतना गहरा है। उसके लिए बिल्कुल अचिंत्य है यह बात, कल्पना से परे, इनकंसीवेबल। देह से आगे भी कुछ हो सकता है। उसे खाना है, पीना है, पढ़ के सो जाना है। जवान है तब तक पेट बजाना है। बुड्ढा बजाए तो टाट बजानी है। उसके लिए उससे बोलो कि जन्म हुआ है शुद्ध होने को तो जाके नहा आएगा। उसकी हर चीज देह से संबंधित होगी। समझ आ रही? उसे बोलो कि सत्य परम प्रकाश स्वरूप है। तो इसीलिए तो सूर्योदय के समय उठ जाना चाहिए। उसके लिए हर चीज भौतिक है। हर चीज का रिश्ता देह से, आंखों से है। उससे कहो कि सत्य के सामने झुकना होता है। तो खोपड़ा झुका के कहेगा सतशत नमन। उसके लिए झुकने का मतलब भी देह है। यह देह है। झुकना माने यह झुकाना। डांट झुका दी। ओके। समझ में आ रही है बात? बड़ी जबरदस्त ऊर्जा होती है। उसमें जिस पर प्राणघातक खतरा आ गया हो। आप बिल्कुल मरे हुए, काहिल, आलसी आदमी होंगे। गिरे पड़े होंगे। किसी बात के लिए ना उठ रहे होंगे। अब बढ़िया वाला काला किंग कोबरा फनफनाता आता हुआ आए आपकी ओर। देखिए कैसे भागेंगे। बचपन में कॉमिक्स होती थी तो उसमें लंबू पतलू घसीटाराम डॉक्टर झटका ये सब होते थे। डॉक्टर झटका एकदम प्रौढ़ उम्र के उन्हें दिखाई भी ना दे ऑपरेशन आरा लेके करते थे हथौड़ा कील। तो एक बार उनको को किसी ने दौड़ में खड़ा कर दिया। कि दौड़ो। कुछ हुआ? रहा होगा कुछ प्रसंग। उसमें जो मुझे यादगार है वो यह कि घसीटाराम को आईडिया आया। इन्हें जिताने का एक ही तरीका है। नहीं तो हम जितने दोस्त हैं सबकी इज्जत अब जाती है। और डॉक्टर झड़का की नाक भी हंसी थी पकोड़े जैसी। एक ही तरीका है। हम उधर उसने पिस्तौल से करते हैं ना द स्टार्टिंग गन तो सब चले। डॉक्टर झटका सबसे पीछे पीछे की तरह हिल रहे हैं। तो उनके पीछे एक पागल कुत्ता छोड़ दिया। नंबर एक जो मरने को तैयार हो वो बहुत कुछ कर जाता है। और यह मैं कोई बहुत गरिमा वाले अर्थ में नहीं बोल रहा हूं कि जो आत्मोत्सर्ग करने को तैयार हो। हम उससे कौन सी चीज बची रह सकती है। मैं कह रहा हूं कि जो जान के भय में हो उसकी चेष्टाओं की कोई सीमा नहीं रह जाती। इसी तरीके से देह भाव अगर इतना गहरा हो कि देह ही प्राण लगती हो और देह भाव का मिटना प्राणघातक लगता हो तो फिर इंसान कुछ भी कर जाएगा। और ऐसे लोगों ने बहुत मेहनत करी है। फिर इन्होंने पूरे के पूरे ग्रंथ रच डाले हैं। इन्होंने बड़े-बड़े संस्थान खड़े कर दिए हैं। इन्होंने अपनी ओर से नए-नए दर्शन चला दिए। बस यह सिद्ध और स्थापित करने के लिए कि प्रभु भी कोई व्यक्ति ही है। क्योंकि अगर प्रभु व्यक्ति नहीं है तो तुम्हारा क्या होगा? ये जो तुम्हारी आदत लगी हुई है पेट की सेवा करने की। देह के लिए जीने की तमाम तरह की तुमने जो कामनाएं पाली हुई हैं। तुम्हारी हर कामना का संबंध घूम कर फिर के तुम्हारी देह से है। उसका क्या होगा? तुम्हारी तो जिंदगी पूरी बिखर जाएगी। कुछ नहीं बचेगा। तो देह भाव को, बॉडी आइडेंटिफिकेशन को बचाने के लिए बहुत जरूरी होता है कि परम को भी देह दे डालो। गजब हो गया। परम की सीख देशना पूरी यह है कि बेटा तुम भी देह नहीं हो। ये जो तुम अपने आप को ऐसे एक देह में सीमित करे बैठे हो और शेष प्रकृति को पराया और उसको दुश्मन मानते हो। यह सब गड़बड़ बात है। तुम भी यह देह नहीं हो। देही ने पलट करके बढ़िया वाला वार करा। बोला यह तो तुम छोड़ो कि हम देह नहीं है। अब हमारी सीख सुनो। तुम भी देह हो। वो जिसको हम सत्य बोले, परम सत्य बोले, आत्मा बोले या परमात्मा बोले हमने उसको भी देह चढ़ा दी। बोले आए थे बड़े हम सुना नहीं है कि उत्तर भारत के विकास के लिए जापानियों की मदद ली जापानियों को बुलाया गया कि यहां बड़ा केस रहता है। बड़ी अव्यवस्था रहती है। हमारे यूपी, एमपी, बिहार में तो इनको सबसे पहले तो अनुशासन सिखाइए, काम करने के तौर तरीके बताइए, सफाई बताइए। बोले ठीक है। तो सिखाने आए तो बोले पहली समस्या तो यह है कि इनको बताएं कैसे इनको जापानी नहीं आती। बोले ठीक है। पहले दो महीने इनको जापानी सिखाइए। तो ठीक है। दो महीने जापानी सिखाएंगे। फिर आगे का कार्यक्रम दो महीने बाद दिखाई दिया सारे जापानी किसी तरह से जान बचा के भाग रहे हैं एयरपोर्ट की ओर तो पूछा गया क्या हो गया तो जापानी एक बहुत जोर से चिल्ला के बोलता हमका नहीं सखा पे काहे प्राण दे दे कुछ ना सिखाऊ खाय लेता मार डली। ये ताकत होती है अज्ञान में। तो ग्रंथ हमें सुधारने आए हमने ग्रंथ को बिगाड़ दिया। हमने ग्रंथ को ही बिगाड़ दिया। बड़े आए थे। हमसे पंगे लोगे। हमें बताने आए थे कि तुम देह नहीं हो। हमने तुम्हें ही देह बना दिया। तुम हमें क्या समझाओगे कि हम देह नहीं है। हमने तुम्हें ही देह बना दिया। तुम हमें क्या समझाओगे? कि निराशी निर्ममो कि ममत तो गड़बड़ बात है। हम तुम्हें ही लेकर के ममता भरी कहानियां बना देंगे। चमत्कार देखो तुम। वही ऊपर से नहीं चमत्कार होते। असली चमत्कार अहंकार करता है। जिनका पूरा संदेश यह है कि काटो ममता को यही बंधन है। हमने उन्हीं को लेकर के सबसे मीठी-मीठी कहानियां बनाई है ममता की। यह गजब देख रहे हो? जिनकी कुल बात यह है कि यदि चाहते हो किसी को तो उसको सत्य दो, ज्ञान दो, गीता दो। हमने उनको लेकर के कहानियां बना दी है कि जो उनके सबसे प्रिय लोग थे, मित्र थे, सखा थे, सखियां थी। उनको उन्होंने कभी गीता दी ही नहीं। यह संभव है क्या कि प्रेम हो और गीता ना दी जाए? बोलो। पर वो सब कहानियां बना के हमने यह स्थापित कर लिया है कि बढ़िया है ना। मैं भी यहां बैठ के सत्र सुन रहा हूं और घर में मेरी पत्नी है या पिता हैं। मैं उनको अगर गीता नहीं दे रहा तो इसमें गलत क्या है? क्या समस्या हो गई? कुछ भी नहीं। यह चमत्कार होता है अहंकार का। मैं बहुत छोटा व्यक्ति हूं। अभी हमारा आईआईटी में परसों रात ही तीन दिन का था। मैं आखिरी रात को गया। सिल्वर जुबली रयनियन हुआ तो सब जानने वाले दोस्त यार मैं आधी रात के बाद पहुंचा आपका सत्र लेके इसीलिए 9:00 बजे शुरू हुआ था वो कि कम से कम आधी रात को तो पहुंच जाऊं। वो आखिरी दिन था वो आधी रात भी नहीं पहुंचता तो एकदम ही नहीं देख पाता। उसके बाद सब निकल रहे थे। मैं तो कुछ भी नहीं हूं फिर भी वहां पहुंचता हूं तो उन्होंने मुझे घेर लिया और इधर-उधर की दो चार बातें गले वले मिले पहले सेल्फी व्ल्लफी उसके बाद एक ही बात शुरू हुई तुम बोलो एकदम बेशर्मी के साथ कुछ बोलने कहा मैं अभी बोल के ही आ रहा हूं और आपसे कैसा बोल के गया था उस दिन याद होगा मत बुलवाओ अभी आज कुछ नहीं। ठीक है मामला खैर वो नहीं है मुद्दे की बात। मुद्दे की बात यह है कि मैं कुछ नहीं जानता। मेरी क्या हैसियत। फिर भी यदि मित्रता है थोड़ी तो उन्हें भी पता है और मुझे भी पता है कि वह मुझसे वही लेंगे जो श्रेष्ठतम है। और सचमुच उन्होंने मुझसे बुलवा लिया। सुबह 4 5:00 बजे तक मैं उनके साथ था। उस बीच में जितने तरीके के मुद्दे हो सकते थे उनसे खूब हुई चर्चा। सत्र ही शुरू हो गया। यद्यपि मैं पूरी कोशिश कर रहा था। बहुतों से तो 25 साल बाद मिला था कि ये ना हो। वैसे ही मिले जैसे हॉस्टल में रहते थे साथ। कोशिश भी की मैंने गाली गलौज करने की। एक दो तो थे वो आप करके बात करें। मैंने घूसे मारे। मैंने कहा सारी इज्जत उतार दूंगा। आप करके क्यों बोल रहा है? लेकिन फिर भी वही कि नहीं तुम बोलो तो ठीक है। मुद्दा यह कि मित्रता होगी तो ज्ञान दिया जाएगा ना। ज्ञान दिया जाएगा ना। ऐसा कैसे हो गया कि सुदामा को बस धन दिया? कितने दिनों बाद मित्र पहुंचे ज्ञान कहां है? और वो बहुत मैं कह रहा हूं ऊंचे कद की मित्रता थी। मैं कुछ नहीं पांव की धूल बराबर नहीं। गोपियों के साथ रास है। ठीक है। अच्छी बात है। स है। आपके भी संबंध होंगे जीवन में। आपको नहीं लगता कि ज्ञान का स्थान ऊंचा है। ठीक है। यमुना किनारे क्रीड़ा करने का अपना सौंदर्य है। बिल्कुल है। हां ज्ञान हो, गीता हो, उसके बाद क्रीड़ा हो, प्रास हो तो सौंदर्य और निखर के आता है। आता है ना? यह करते हैं हम प्रभु के साथ। परसोनिफिकेशन उनको अपने जैसा बनाना है। वो कह रहे हैं तुम मेरे जैसे हो जाओ। हम कहते हैं नहीं हम तुझे अपने जैसा बना लेंगे। वो कह रहे हैं तुम मेरे जैसे हो जाओ। हम कह रहे हैं ना ना ना मैं जैसा हूं मैं तो ऐसे ही रहूंगा। पलट के वार यह करूंगा कि तुम्हें अपने जैसा बना लूंगा। उन्हें अपने जैसा मत बनाओ। अपने तौरतरीकों को, अपनी रवायतों को, अपनी भावनाओं को परम सत्ता पर आरोपित सुपरइंपोज मत करो। कभी कोई कहता है कि अच्छा आप कहते हैं कि एक बच्चा ही अच्छा। ऐसा अगर दशरथ ने सोचा होता तो लक्ष्मण कहां से आते? ठीक है। हम मैंने कहा तो फिर तुम्हारे पिताजी भी अगर दशरथ की तरह ही हो जाए तो तुम्हारी माताजी को कैसा लगेगा? [संगीत] पूछ रहे हो ना? कितनी सहेलियां आएंगी? [संगीत] सब कुछ स्वादानुसार। हम जो हमें पसंद है उसी हिसाब से सारे चरित्र गढ़ लेने हैं। सारी छवियां, सारी मूर्तियां बना लेनी है। जो कुछ हमें पसंद आता है। जैसे-जैसे हमारी पसंद बदलती जाती है वैसे वैसे हम छवियां ही बदलते जाएंगे। मैगी से चाउमीन, उससे हक्का नूडल, फिर चिल्ली गार्लिक नूडल। बदल रहा है एवोल्यूशन हो रहा है हमारा। एक तरह है। शरीर है जो इवोल्यूशन से आया है। एक विकास प्रक्रिया है उसकी। हमारा शरीर सांप के शरीर जैसा नहीं है। हालांकि सांप हमसे पुराना है। हम नहीं थे जब आपको पता है ना हमारी प्रजाति बड़ी नईनई है। सांप वगैरह हमसे बहुत पुराने हैं। और सांप से ही पुराना है कछुआ। यह सब बड़े पुराने हैं। और और पीछे चले जाओ तो बहुत सारे कीट पतंग हैं, इंसेक्ट्स। यह तो एकदम ही पुराने हैं। और उनसे भी जो पुराने जीव होते हैं, प्रजातियां होती हैं, मिलती हैं सागर में। क्योंकि जितने भी जलचर हैं वह पुरखे हैं सारे प्राणियों के जो कि जमीन पर रहते हैं या ना बचर हवा में उड़ते हैं। जीवन आकाश में या भूमि पर नहीं पैदा हुआ था। जीवन कहां शुरू हुआ है? तो सारे पुरखे तो वहीं रहते हैं पानी में। यह सब बड़े पुराने पुराने हैं। मछली के भी पांव नहीं होते। मछली के ही पांव नहीं होते। आप नए-नए आए हो। आपके पांव होते हैं तो आप कहते हो प्रभु आपके चरणों में मेरा स्थान है। चरण तो तुम्हारी प्रजाति के होते हैं। ना मछली के होते ना सांप के होते। ज्यादातर जो प्रजातियां हैं पृथ्वी पर उनके चरण नहीं होते। फिर पर हम जैसे हैं, हम स्वयं को ही उच्चतम मानना चाहते हैं। अहंकार स्वयं को क्या बोलता है? आत्मा। तो मैं जैसा हूं, प्रभु को भी ऐसा ही होना पड़ेगा। मेरे चरण हैं तो तुम्हारे भी होने पड़ेंगे। और मछलियां कह रही हैं ऐसे थोड़ी होता है। गिल्स और फिस की बात करो। प्रभु आपके फिनस कहां है? यह वह केंद्रीय भूल है जो जिंदगी में होती है। मैं कह सकता था अध्यात्म के रास्ते पर होती है। लगातार होती है। हर जगह होती है। तो क्यों बोलूं कि किसी एक विशेष रास्ते पर ही होती है। हर जगह होती है। वो ये होती है कि मैं शुरुआत इसी धारणा के साथ इसी नियत से करता हूं। इसी बिंदु से करता हूं कि मैं तो बचा रह जाऊं। जो कुछ हो मेरे लिए हो। मैं अपनी को बीमारी को बचाए बचाए स्वास्थ्य अर्जित कर लूं। बीमारी को बचाना है। स्वास्थ्य कमाकर लाना है। बीमारी की जेब में स्वास्थ्य को रखना है। रहेगी बीमारी ही पर स्वास्थ्य भी पाना है। कैसे कमाना है, अर्जित करना है, अचीव करना है। और उसको बीमारी की जेब में रख देना है। और फिर ताज्जुब करना है कि अभी भी जिंदगी बंटाधार क्यों है? स्वास्थ्य ले तो आए। रख तो दिया बीमारी की जेब में फिर भी अभी जिंदगी बीमार क्यों है? बड़ी हैरत होती है जिंदगी बीमार क्यों है? इतना सारा स्वास्थ्य कमाया है और रखा हुआ है यहां पर सुरक्षित सिक्यर्ड बीमारी की जेब में बहुत सारा स्वास्थ्य समझ में नहीं आ रहा हर समय बीमार बीमार सा क्यों लगता है? इतना स्वास्थ्य तो ले आए। कुछ मिलता है। हमें उसको अपने ऊपर धारण करना होता है। तो सबसे बड़े प्रभु कौन है? फिर प्रभु माने वो जो धारण करे माने वो केंद्र में है। वह कोर है और उसने अपने ऊपर ऐसे धारण करा हुआ है। हम वही रहेंगे जो हम हैं। अभी कल ही एक देवी जी मिली बिल्कुल प्रेम में व्यवहल अहलादित तुम आ गए हो नूर आ गया है बोली तने छोडूंगी नहीं यार आज तो घर चलना पड़ेगा हमारे यही बोले आपके लिए ही तो अखियां तरस रही थी अब मिल गए तो घर चलना पड़ेगा मैं उनको उनको ऐसे देख रहा हूं। हम कहां रहती हैं? यहीं मैंने कहा यहीं तो हम भी रहते हैं। समझे बात? यहां आना तो छोड़ दो। आप गीता प्रतिभागी तक नहीं है। उन्हें दिली सुकून मिल जाता है 30 सेकंड का शॉट देख के। समाधि इन फ्लैट 30 सेकंड्स। तुम यहां नहीं आओगी। और हम तुम्हारे घर चले। नहीं नहीं आइए आज खाना हमारे यहां खाइए काहे को खाएं भूखे मर जाएंगे तुम्हारे यहां नहीं खाएंगे। कुछ हो उसको पैक करा के पार्सल करा के अपने घर मंगा लो। मैं धारण कर लूंगा। सब कुछ मैं ही आत्मा हूं। मैं नहीं बदलूंगा। सब कुछ जो आए मेरे लिए आए मेरी जेब में आए। दिवाली पर मैंने एक बार कहा भाई राम की कोई घर वापसी नहीं होती। राम वो हैं जो घर से कभी डिगे ही नहीं। राम की घर वापसी मत कराओ। तुम अपनी राम वापसी कराओ। तुम राम से बहुत दूर चले गए हो तो दिवाली होती है तुम्हें याद दिलाने के लिए कि तुम्हें राम पर वापस जाना है। पर तुम राम तक नहीं जाते। तुम कहते हो राम आएंगे आएंगे। काहे को आएंगे? जो ना आए ना जाए उसका नाम है राम। हमें मूल बातें ही नहीं पता। जो कूटस्थ है वह कैसे आएगा? कैसे जाएगा? आने के लिए पहले जाना पड़ता है। वह जाएगा तो कहां जाएगा? अनंत कहां समाएगा? समझ में आ रही है बात? बार-बार कह रही है गीता हमसे। आत्मा कुछ नहीं करती। आत्मा कुछ नहीं करती। क्यों कह रहे हैं आत्मा कुछ नहीं करती। आत्मा कुछ है क्या? क्या छोला भटूरा है आत्मा? क्या है आत्मा? कलम है आत्मा? शर्ट है आत्मा? क्या है आत्मा? सिर्फ यह बताने के लिए विधि है ये और शायद ये एकमात्र विधि है जो कारगर हो सकती है सिर्फ यह बताने के लिए कि जो बहुत कुछ करता हो वो आत्मा। ये मैं आपसे शायद 78वीं बार बोल रहा हूं, कम बोला 780 वी बार बोल रहा हूं कम बोला कि इन सूत्रों को नकार में पढ़ना सीखिए। नकार में तो कहीं लिखा हो उदाहरण के लिए कि रमेश बैठा है तो उसको नकार में कैसे पढ़ेंगे? रमेश चल नहीं रहा है। माइनस माइनस मिलकर प्लस हो जाता है ना। वैसे ही तो उसको नकार में पढ़ना सीखिए। कि अगर लिखा है रमेश बैठा है तो उसको पढ़िए रमेश चल नहीं रहा है। तो रमेश चल नहीं रहा है इसका मतलब क्या है कि जो चल रहा है वो रमेश और तुम चल रहे हो तो तुम रमेश नहीं हो। तो आत्मा कुछ नहीं करती आज सूत्र कह रहा है आत्मा के लिए ना कर्म है ना कर्म बंध है ना कर्म फल है ना कर्तव्य है ना कर्म ना कर्तव्य ना कर्म फल। जिसके लिए यह सब नहीं है वो क्या है? इसको कैसे पढ़ना है? जिसके लिए ये सत्य है वो आत्मा नहीं। हां तो माने ये कि तुम आत्मा नहीं हो बेटा। तुम फालतू ही अपने आप को मैं बोलते हो। तुम सत्य नहीं हो। जिसके लिए अभी कर्तव्य है और कर्म फल है वो झूठ है। वो मिथ्या है। तो मिथ्या है तो क्या समस्या क्या हो गई? हम जाड़े चल रहे हैं। मेथी होती है। ऐसे ही मिथ्या का पकोड़ा बना लेंगे। समस्या क्या हो हो गई? सुनने में भी ऐसे ही लगता है कि हां जी मीठी को संस्कृत में मिथ्या बोलते हैं। समस्या यह हो गई कि तुम हो, तुम सच हो। और तुम मिथ्या बने बैठे हो इसलिए तड़पते हो। यह है समस्या। समस्या कोई नामकरण की नहीं है। समस्या कोई सूत्र या सिद्धांत भर की नहीं है। समस्या व्यवहार की है। समस्या तड़प की है। केंद्र में सत्य हो तुम। पर झूठ बनकर बैठे हो और झूठे बने बने बोलते हो। सत्य हूं मैं। तो इसलिए झूठ थोड़ा स्थाई हो जाता है। इसलिए सारा दुख है जीवन का। जिसके लिए अभी कर्म शेष है। कर्म से क्या आशय है यहां पर? कामना। और क्योंकि कामना है कर्म में तो कर्म फल का बड़ा ख्याल करना पड़ेगा। जिसके लिए अभी कर्म है, कर्म फल है और इसलिए कुछ करणीय है माने कर्तव्य है और कुछ अकरणीय है वह आत्मा नहीं है। और क्योंकि वह आत्मा नहीं है तो इसीलिए इन सब चक्करों में कर्म कर्म बंध कर्तव्य वह दुख ही पाएगा। वह दुख ही पाएगा। खेल सत्य को अपने जैसा बनाने का नहीं है। खेल अपने झूठ को उगाड़ने का है। खुद को सही साबित करने की जिसकी बड़ी रुचि हो। यह वह आदमी है जो अध्यात्म में अंतिम होगा। सबसे पीछे कतार में खड़ा होगा। मैं कैसे पहचानूं कि कौन है जो शिष्यत्व के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है? कैसे पहचानू जो आदमी अपने को सही साबित करने पर बहुत तुला रहता हो वह शिष्यत्व के लिए सुधरने के लिए अध्यात्म के लिए अभी बिल्कुल तैयार नहीं है। यह सीधा-सीधा अहम का लक्षण है। मैं ही तो सत्य हूं। मैं ही तो सत्य हूं। यह वह अहम है जो अपनी स्थिति से ही प्यार करता है। यथास्थिति को ही बनाए रखना चाहता है। इसे सच से नहीं खुद से प्यार है। और सच की अपेक्षा खुद से प्यार करना खुद के प्रति सबसे बड़ी हिंसा होती है। स्पष्ट हो रही है बात कुछ?
प्रभु के बाद जो यहां दूसरा शब्द है ध्यान देने का वह है स्वभाव। न कर्म फल संयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते। वो अपने स्वभाव से संचालित होता है। कर्म फल की लालसा से नहीं। और स्वभाव क्या है? पूर्णता। एक ही पूर्णता है जो दोनों जगह पाई जाती है। प्रकृति में भी और आत्मा में भी। प्रकृति विशुद्ध प्रकृति में भी कोई अहम भाव नहीं है। कोई बेचैनी नहीं है। कुछ और हो जाने का कोई आग्रह नहीं है। मनुष्य और उसकी अहंता ही अकेले हैं। जिन्हें कुछ और हो जाना है। नहीं तो यहां जो कुछ है सब जैसा है। ठीक है। झरना नदी को देखकर के ईर्ष्या नहीं करता कि मैं कितना गरीब हूं। करता है। सब अपनी-अपनी जगह ठीक है। प्रकृति में कोई अवसाद में मरा नहीं जा रहा। किसी को और कुछ नहीं बनना है। और यही बात आत्मा की होती है। एक आखिरीपन, एक स्थायित्व जिसको नित्यता कहते हैं। जिसको बदलना नहीं है। जो ठीक है। ठीक है। इसको चैन आ गया है। जल नहीं रहा भीतर से। अभी यह काम भी बाकी है। अभी वह हसरत नहीं हुई। अहम प्रकृति के माध्यम से स्वयं को पूर्ण करना चाहता है और प्रकृति जैसी ही पूर्णता जब अहम पा लेता है तो उसको आत्मा कहते हैं। इसलिए ज्ञानियों को लेकर के कई बार चौंकाने वाले दृष्टांत दे दिए जाते हैं कि वह जड़ हो जाते हैं। पत्थर समान हो जाते हैं। आशय यही है कि वह प्रकृति जैसे हो जाते हैं कि जैसे प्रकृति में किसी को कुछ बनना नहीं है। जंगली किसी पशु को देखो हिरण है। घासवास है। बढ़िया उसको चिंता नहीं करनी है कि खेती करनी है। वह जहां रहता है वहां वह घास जैसा ही है। वहां वह है तो घास होगी। मैं और घास एक है। यहां घास ना होती तो यहां मैं भी ना होता। तो चिंता नहीं करता है। अपना बैठा हुआ है। जो मुक्त है ज्ञानी है वह भी ऐसा ही हो जाता है। ठीक। इसका मतलब यह तो नहीं है कि हिरण गति नहीं करता। हिरण की गति देखी है। यह देखो घोड़ा बना रहा हूं हिरण को। समझ में आ रही है बात? ये प्रकृति से रिश्ता नहीं बनाना है। प्रकृति ही हो जाना है। और जो प्रकृति हो गया वह प्रकृति की धारा में बहने लग जाता है। उसे अब क्योंकि दुनिया के माध्यम से जिंदगी के माध्यम से किसी विशेष जगह पहुंचना नहीं है। तो इसीलिए उसमें हर स्थिति के प्रति एक उदासीनता आ जाती है। लगभग ऐसी जैसे कि आपकी ट्रेन टाइम पर है। हम आपकी ट्रेन 1 घंटा लेट है। आपकी ट्रेन 1 घंटा लेट है। आपको पता है एक घंटा लेट है। आप बैठे हैं। आपको पता है एक घंटे में आ जाएगी। बड़ा स्टेशन है। बहुत सारे प्लेटफार्म हैं। बहुत सारी ट्रेनें हैं जो समय पर चल रही हैं। और बहुत सारी हैं जो 2 घंटे 6 घंटे भी लेट हैं। आपको क्या करना है? कोई फर्क पड़ता है? आप ध्यान भी नहीं देते। कुछ अच्छा हो रहा हो, कुछ बुरा हो रहा हो, उससे मुझे अंतर नहीं पड़ता इधर-उधर। हां। ठीक है। सूचना रहेगी, जानकारी रहेगी, लेकिन उससे मेरी आंतिक शांति बाधित नहीं हो जाएगी। मुझे यह नहीं लगेगा कि उससे मुझ पर कोई व्यक्तिगत असर पड़ जाना है। मैं हूं कौन यह निर्धारित नहीं हो जाना है दुनिया में क्या चल रहा है इससे। तो दुनिया के साथ फिर जब निर्भरता का रिश्ता नहीं रह जाता तो उसको साक्षित्व कहते हैं। यह बहुत मजेदार जगह आ गए हम क्योंकि हमें दिख रहा है कि प्रकृतिस्थ होना और साक्षी होना बिल्कुल एक बात है। नहीं तो हम यह सोचते हैं कि प्रकृति से बिल्कुल दूर हट के खड़े हो जाओ तो साक्षी होते हो। श्री कृष्ण हमें वहां ले आए हैं जहां वह कह रहे हैं दूर हटकर खड़े होने की जरूरत नहीं है। निडर होकर के निष्पक्ष होकर के प्रकृति में घुल जाने को ही साक्षित्व कहते हैं। साक्षी माने वही ना जिसे कुछ लेना देना नहीं किसी से। वही साक्षी है ना। हां। तो जब आपको लेना देना होता है तो तब तो आप भेदभाव करते हो बांटते हो इससे मिलूंगा उससे नहीं मिलूंगा यह घर आ गया तो उत्सव की बात है वह घर आ गया तो परेशानी की बात है। प्रकृतिस्थ होने का अर्थ यह होता है कि यह घर आ जाए तो भी वही बात है और वह घर आ जाए तो भी वही बात है। हां व्यवहार दोनों के प्रति अलग हो सकता है लेकिन मेरी अंदरूनी दशा पर मेरे भीतरी स्वास्थ्य पे कोई अंतर अंतर नहीं पड़ता। तुम आए कि तुम आए कि दोनों में से कोई नहीं आया। मैं अब प्रकृति के प्रति माने दुनियादारी के प्रति दुनिया में जो भी हो रहा है उसके प्रति कैसा हो गया हूं? उदासीन निष्पक्ष और यही साक्षित है। यह बात धीरे-धीरे उतरेगी। कोई हड़बड़ी की बात नहीं है। क्योंकि इसी एक बात को समझाने के लिए अभी दर्जनों श्लोक आ रहे हैं। यह ऐसी होती है कि एक बार में चली जाती। तो बात बहुत पहले निपट गई होती। इसी एक बात को अभी बहुत तरीकों से बताया जाएगा। बात आ रही है देखो समझो। अध्यात्म का मतलब यह नहीं होता है कि स्वयं को अनुभव से काटना है। बहुत उल्टा मतलब होता है। आप जैसी जिंदगी जीते हो ना आप अनुभवों से अपने को वंचित रखते हो। आप डर के जीते हो। तो अध्यात्म का अर्थ होता है किसी अनुभव से पीछे नहीं हटूंगा। कोई जरूरत ही नहीं क्योंकि कोई अनुभव मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता और ना ही कोई अनुभव मुझे कुछ दे सकता है। कुछ भी हो जाए उसमें कोई बहुत खुशी की बात नहीं है। कुछ भी हो जाए उसमें किसी ऐसे दुख की बात नहीं है कि मैं भीतर से तबाह हो जाऊं। सब मेरे लिए सम हो गया। जब सब सम हो गया तो मैं किसी को भी ठुकराऊं कैसे? अब ये बताओ जब सब सम है तो कैसे ठुकराऊं कुछ? क्योंकि फिर एक को ठुकराने का मतलब होगा दूसरे को भी ठुकरा। सब सम है तो एक को ठुकराया दूसरे को ठुकराया। दूसरे को ठुकरा दिया। और यह तो बड़ी विचित्र बात हो जाएगी कि सब सम और फिर कह रहा हूं इसको अपनाना है उसको ठुकराना है। एक को अपनाया तो दूसरे को भी अपना लिया और एक को ठुकराया तो दूसरे को ठुकरा लिया। यह कैसे कर रहे हो कि एक को ठुकराया एक को अपनाया? तो इसलिए आध्यात्मिक व्यक्ति वैसा बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल भी नहीं होता जैसा आप उसको सोचते हो। वो आपको जीवन की धारा से एक मिलेगा। और ठीक वैसे जैसे हमने प्रभु शब्द के साथ खिलवाड़ करा है वैसे ही हमने आध्यात्मिक व्यक्ति की छवियों के साथ भी खिलवाड़ करा है। करेंगे ही आपको क्या लगता है हम कुछ भी छोड़ देंगे? हम इतने अच्छे लोग हैं। हम इतने अच्छे लोग हैं। जहां कामना होती है ना वहां डर भी होता है। क्योंकि कामना हमेशा किसी एक विशिष्ट विषय के लिए होती है। है ना? और एक विशिष्ट विषय के लिए कामना रखना माने बाकी सब के लिए क्या रखना डर, उपेक्षा, नफरत, कुछ भी। जब एक चाहिए तो बाकी सब नहीं चाहिए। जब एक का स्वागत है तो बाकी सबका विरोध है। माने एक की कामना रख के आप जीवन के प्रति कैसे हो जाते हो? विरोध से भर जाते हो। प्रकृतिस्थ होने का मतलब है ना किसी का स्वागत है ना किसी का विरोध है। मैं एक हूं जैसे सागर में बूंद पूरे सागर की है। उसका अपना कोई क्षेत्र नहीं होता। अपना कोई घर नहीं होता। कामना में यह तो दिखाई देता है कि एक को चाहा। यह नहीं दिखाई देता कि बाकियों को पराया बना दिया। कितनी गड़बड़ बात हो गई ना? एक को चाहने का मतलब ही क्या होता है? बाकी सब पराए हैं। ऐसे में दोनों ही संबंध सड़े हुए होते हैं। जिसको चाहते हो उसके साथ भी रिश्ता सड़ा हुआ होगा। और जिनको पराया बना लिया उनके साथ तो सड़ ही गए। हम समझ में आ रही है बात? लाओ भाई सबको चाय पिलाओ। बढ़िया।
चाय अलग लाना, काली और शक्कर अलग लाना। और यह भाई बैठा है, बहुत प्यार में आया है। बिना कॉपी पेन के इसका मन ही नोटबुक बन गया है।
हम्म, सात समुद्र की मसीह करूं, गुडगुन लिखा ना जाए। तो बोले, लिखा तो जा ही नहीं सकता। सब धरती कागज करूं, लेखनी सब मसी माने स्याही, और सात समुद्र की मसीह करूं, गुरु गुरु गुण लिखा ना जाए। तो बोले, कुछ लिखने का सवाल ही नहीं पैदा होता। तो यह भाई मुझे सबसे प्यारा है। तो एक काम करो, जितने लोगों की चाय की जितनी शक्कर है, वह सब इसी के प्याले में डाल। अब सब सड़ जाएगा। सब सड़ जाएगा। यह सड़ेगा डायबिटीज से। हम 100 जनों की शक्कर एक कोई खिला दिया, वो झेल ही नहीं सकता। वो झेल ही नहीं सकता। और बाकी कड़वाहट, वो नहीं झेल सकते। यह अहंकार होता है। यह किसी को विशिष्ट बनाता है। जिसको विशिष्ट बनाता है, उसको मिठास से मार डालता है। जिसको विशिष्ट नहीं बनाता, उसको कड़वाहट से मार डालता है।
प्रकृतिस्थ होने का मतलब है, ना हम किसी के, ना कोई हमारा। हम सभी के, सब हमारे। दोनों बातें एक साथ। अब सोच यार, ना काहू से दोस्ती, और साथ ही साथ मांगे सबकी खैर। यह क्या बात है? जब ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर, तो फिर क्यों मांगे सबकी खैर? यह होता है प्रकृतिस्थ होना। हम किसी के नहीं हैं, कोई हमारा नहीं है। हम सबके हैं, सब हमारे हैं। ये होता है प्रकृतिस्थ होना। ये मुक्त आदमी का जीवन होता है। वह कहीं ना आगे बढ़ता, कहीं ना पीछे हटता। उसे किसी भी विषय से रिश्ता बनाना नहीं है, और जो विषय समक्ष आ गया, उससे कतराना नहीं है। ये संसारी को बड़ी अजीब बात लगी, क्योंकि संसारी के लिए सब कुछ एक डर के माहौल में चलता है, जिसमें उसे चुनना पड़ता है कि कुछ ठीक है, कुछ ठीक नहीं है। कुछ कुछ गलत ना हो जाए। चुनो, चुनो, चुनो, चुनो। तो अपनी चुनाव, चुनाव माने कामना, तो संसारी चुनाव पर कामना पर चलता है, क्योंकि वो डरा हुआ है।
तो बोध कथा है, जन बोध कथा है। एक जैन गुरु, जैन मास्टर चले जा रहे हैं, उनके साथ में उनका शिष्य है। तो वो पूछता है कि हु इज द बुद्धा? बुद्ध कौन है? तो वो चल रहे हैं, वहां कुछ फलों के पेड़ हैं, तो बोलता है, चुप रहते हैं, कुछ बोलते नहीं। पहले पेड़ के नीचे से निकलते हैं, और कुछ नहीं, वहां से निकल निकल जाते हैं। दूसरे पेड़ के नीचे, कुछ नहीं, वहां से भी निकल जाते हैं। और तीसरे पेड़ के नीचे से निकल रहे होते हैं, तो एक फल ऊपर से गिर पड़ता है। कोई फल मान लो अमरूद, जामुन, कुछ भी, तो गिर पड़ते हैं। अब गिर पड़ता है, तो उसको उठा के खा लेते हैं, और चल देते हैं। एंड द डिसाइपल वाज़ इनलाइटेंड एट दैट मोमेंट। वो कथाएं ऐसे ही समाप्त होती हैं। हम कि बस इतने से इशारे से उस शिष्य को बुद्धत्व प्राप्त हो गया। समझ में आ रही है बात? नहीं था, तो नहीं था। पूछिए कि तुमने फल क्यों खाया? तो ऐसा अजीब जवाब आया कि खोपड़े में नहीं समाया। तुमने फल क्यों खाया? क्योंकि सामने आया। यह क्या जवाब है? तुमने फल क्यों खाया? क्योंकि सामने आया, और कोई उत्तर नहीं है इसका। पशुओं जैसी बात है, ना? रोटी रखी थी, तो हमने खा ली। नहीं रखी होती, तो नहीं खाते। तो प्रकृति यह बहाव है। इसमें कोई कर्तृत्व नहीं। और हमने अगर फल खा लिया है, तो इसका मतलब यह नहीं कि इस पेड़ से कोई खास रिश्ता बना लेंगे, और जाके उसे झंझोड़ेंगे, और और फल गिराएंगे, या वहीं पे अड्डा बनाएंगे। कुछ नहीं, चलते जाएंगे। मिल गया, अच्छी बात। नहीं मिला होता, तो कोई बात नहीं। यह होता है प्रकृतिस्थ होना, अविरोध, निर्विकल्पता। हम, यह आएगा, धीरे-धीरे आएगा।
कर्तव्य और कामना का रिश्ता स्पष्ट है। जहां कामना नहीं, वहां सकाम कर्म नहीं। और सकाम कर्म तुम्हें करना चाहिए। अपनी कामना को पूरा करने के लिए। इसी भाव को क्या कहते हैं? कर्तव्य। फलाना कर्म करो, ताकि तुम्हारी कामना पूरी हो सके। यही क्या कहलाता है? कर्तव्य। गीता आपको सब मूर्खता पूर्ण कर्तव्यों से मुक्ति दे देती है। इसलिए संसारियों के लिए इतनी खतरनाक है गीता, और इसलिए उनके लिए इतना जरूरी था गीता के अर्थ को विकृत करना। क्योंकि जहां आपको कर्तव्य सौंप दिया गया ना, वहां आपके श्रम से आपको तो कुछ मिलना नहीं, पर श्रम तो हो रहा है, तो किसी को तो कुछ मिल रहा होगा ना? आपके कर्तव्य पालन से किसी ना किसी को कुछ मिल रहा होता है। अगर गीता आपको बता दे कि सब कर्तव्य तुम्हारे मूर्खताएं हैं, तो किसी के स्वार्थ पर बड़ी चोट पड़ेगी, उनको बड़ा बुरा लगेगा। जब आपको यह पता चलता है कि कर्तव्य का खेल ही झांसे का है।
दान देना तुम्हारा कर्तव्य है। यह यह दिन होते हैं साल के। और जितने बड़े तुम पापी हो, उसी अनुपात में जाकर दान दे आना। वहां पेटी है। दिक्कत ये होती है कि पेटी है। वहां कोई व्यक्ति खड़ा हो, तो थोड़ी सी बात अलग हो जाएगी। या कम से कम बैंक खाता नंबर हो, तो भी बात थोड़ी सी ईमानदारी की हो जाएगी। पेटी है। उस पेटी को कौन खोलता है, वह आपको नहीं दिखाई देता। आपको बस यह दिखाई देता है कि मैंने तो दिया। मैंने अपनी कर्तव्य पूर्ति करी। आगे का हाल आपको नहीं पता चलता। सप्लाई चेन जाती तक कहां तक है, यह दिखता ही नहीं। आप दे तो रहे हो। ले कौन रहा है, यह आपने कभी सोचने की कोशिश नहीं करी। और होश उड़ जाएंगे आपके, जब आपको पता चलेगा कि जो ले रहा है ना, उसी ने आपको सिखाया है कि ऐसे ऐसे ऐसे कर्तव्य आवश्यक होते हैं। जिसको आपके कर्तव्यों से सबसे ज्यादा लाभ हो रहा है, वही आपको कर्तव्य का पाठ पढ़ा रहा है।
तो कृष्ण सखा हैं। और एक बड़ी मदद करते हैं सखा होने के नाते। क्या? कर्तव्यों से बचा देते हैं आपको? तो इसीलिए सामाजिकों के लिए, संसारियों के लिए कृष्ण और गीता थोड़े खतरनाक हो जाते हैं। क्योंकि उनका तो धंधा ही चलना है, आपको कर्तव्यों में बांध करके। फलाना काम करो। क्यों करो? यह तो मेरा कर्तव्य है। यह तो कर्तव्य है।
बैठे हुए थे रूनियन में, तो पुरानी यादें ताजा की जा रही थी। उसमें से एक था, उसने बताया। चलिए बता देता हूं। अब वही है कि वैसे ही बदनाम है। तो यह साहब अपनी गर्लफ्रेंड के पास गए, तो उनसे बड़ा निवेदन करने लगे। अरे यार, लेट्स मेक आउट। तो वो बोली, नहीं नहीं। तो इन्होंने कहा, बट व्हाई नॉट? तो बोली, पहले शादी। बोली कि मैं तो मैं ही हूंगा ना। मैं तो मैं ही हूं। अगर मैं बुरा हूं, तो अभी भी बुरा हूं। बोली, नहीं, तब तुम्हारा हक होगा। यह उसने मुझसे बात आगे करी थी। बड़ी लंबी चौड़ी इस पर चर्चा हुई थी कि ये खेल क्या है? तो बैठे हुए थे, वही सब याद आया। हंस रहे थे इस पर खूब। फिर कुछ और बोला, ऐसे ऐसे। तो इसने और तर्क दिया। उसने कहा, अगर वो जो व्यक्ति होगा, हम, वो गड़बड़ आदमी हो, तो मुझे तो तू पसंद करती है। तो बोलती है, नहीं, तब भी उसका हक होगा। यह किसने बताया? उसका हक होगा, माने तुम्हारा। फिर कुछ कर्तव्य होगा, ठीक है ना? अधिकार और कर्तव्य, ड्यूटीज एंड रिस्पांसिबिलिटीज। ये तो एक साथ चलते हैं ना? हम राइट्स एंड रिस्पांसिबिलिटीज। ड्यूटीज एंड रिस्पांसिबिलिटीज। नहीं, राइट्स एंड रिस्पांसिबिलिटीज। अगर आप कह रहे हो कि किसी की राइट होगी, माने अधिकार होगा, माने हक होगा, तो आप साथ ही साथ ही स्वीकार कर रहे हो कि आपकी रिस्पांसिबिलिटी होगी, माने आपका कर्तव्य होगा। यह कर्तव्य आपको किसने सिखाया कि पति है, तो जैसा भी होगा, तो ठीक है? यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि यह जो व्यक्ति गया था, यह जो कह रहा था, वह करना ठीक है कि गलत है। हम उसकी नहीं चर्चा कर रहे। तो टीनएज की बात, उस समय क्या होता है, जानते ही हैं सब, हार्मोनल होता है, सब कुछ। तो उसकी बात अलग है कि यह जो कर रहे हैं, वह अच्छा है या गलत है, क्या है, हटाओ उसको। पर ये धारणा मन में कहां से आ गई कि पतिदेव, अगर मेरे कपड़े उतारेंगे, तो उनका हक है, और वहां उतरवा लेना मेरा कर्त कर्तव्य है? तो इस पे तब भी बड़ी, सन 97 की बात है, तब भी बड़ी चर्चा चली थी, रात भर बैठकर के खूब खोबड़ा खुजलाया था कि ये कहानी में ये एंगल कहां से आया? और अभी मिले, तो फिर से वो बात ताजा हो गई। सब हंसे खूब इस पर।
आपको क्या लगता है? ये किसने सिखाया हुआ उसको? जो चाहते हैं कि वो शादी करे, शादी नहीं करे। हम कोई बंदूक दिखा करके थोड़ी लूटा जाता है, कर्तव्य बता करके लूटा जाता है। लूटना तुम्हारा कर्तव्य है। लुटना तुम्हारा कर्तव्य, और तुम अपना कर्तव्य यदि निभाओगे, तो बदले में तुम्हारी यह यह और यह कामनाएं पूरी कर दी जाएंगी। तुम अगर कर्तव्य निभाओगे, तो बदले में तुम्हारी यह सब कामनाएं भी पूरी कर दी जाएंगी, और साथ ही साथ तुमको प्रमाण पत्र मिलेगा कि तुम आदमी भी अच्छे हो, कर्तव्य परायण हो। देखो, तुमने अपने कर्तव्य पूरे करे। लगभग वैसा ही कि जैसे मंदिर में जाने पर मनोकामना तो पूरी होगी ही होगी, प्रसाद भी मिलेगा, और अच्छे आदमी भी कहलाओगे।
कृष्ण मुक्ति दे रहे हैं। कह रहे हैं, भीतर देखो अपने, दिखाई देगा बहुत सारा झूठा ज्ञान। उसी झूठे ज्ञान से तुम्हारी कामनाएं आती हैं। उन्हीं कामनाओं को बेट बना के, बेट समझते हो क्या? चारा, जैसे मछली को डाला जाता है। उन्हीं कामनाओं को चारा बना के तुम्हें कर्तव्य में बांधा जाता है। और यह कर्तव्य तुम्हारी गुलामी बनते हैं, बेगारी बनते हैं। करे जाओ, करे जाओ, करे जाओ। कुछ नहीं भी मिल रहा, तो यह भरोसा, यह कल्पना तो मिलती ही है ना कि इतने कर्तव्य निभाए हैं, तो स्वर्ग मिलेगा। कुछ और भी लाभ नहीं हो रहा, तो यह तो मिलता है ना कि कर्तव्य पूर्ति कर रहे हो, तो पुण्य कमाया। अच्छा तरीका है ना किसी को ठगने का। तुम दिन भर काम करो, दिन भर काम करो। तुमसे ईंट उठवाई जाए। खूब ईंट उठवाई गई। और शाम को मैं तुमको बुला करके ऐसे कुछ दे दूं। दिया। तुम पूछो, यह क्या दिया? मैं बोलूं, पुण्य। बोलो, नहीं, यह ज्यादा इनटेंजिबल हो गया। कुछ थोड़ा ऐसा दीजिए जो कम से कम आंशिक रूप से भौतिक हो, तो मैं उसको ऐसे लिख करके दूं। आरबीआई। हम रुपए एक करोड़। पूछे कि यह क्या दिया आपने? हाथ से गोद के दे दिया है आरबीआई। मैं कहूं, यह रिजर्व बैंक ऑफ अध्यात्म, और 1 करोड़ दिए हैं। बोले, दे तो दिया है। इसको कहां जाके भुनाऊं? ये लिए रहना जब मर रहे हो। और वहां जाके इसको एनकैश कराना। यह चल रहा है, और यह आपके साथ भी हो रहा है, और रोज हो रहा है।
धर्म का मतलब होता है, यह रही मिट्टी, यह रही जमीन, और यह रही जिंदगी। बताओ, यहां क्या मिल रहा है? आगे की बात छोड़ दो। हटाओ सब। ये सब मेटाफिजिकल, पराभौतिक चक्कर एकदम हटा दो। कोई इनटेंजिबल, एब्स्ट्रैक्ट बातें नहीं करनी है। मुझ पे आ रही है भाती है। तुम ला करके अपना सारा पैसा यहां रख दो। दिन रात मेहनत करो। मैं तुम्हें क्या दूंगा? मैं तुम्हें प्यार दूंगा। मैं तुम्हें फीलिंग्स दूंगा। और मेरी फीलिंग्स की खातिर तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम दिन रात कमा करके पैसा यहां रखते रहो। ठीक है? मैंने पैसा जैसे यहां रखा है, वैसे तू फीलिंग्स भी यहां रखता है। ये क्या बता रहे हो? क्या धर्म इतना मटेरियल होता है? धर्म मटेरियल पता नहीं होता है कि नहीं? पर वह मटेरियल को मटेरियल जानता है। इतनी बेईमानी नहीं करता कि मटेरियल को ही पैरा मटेरियल बोल दे, कि जो भौतिक है, उसको ही पराभौतिक बना दे। जो जैसा है, उसको वैसा कहने का नाम धर्म है। तथ्यों से खुलता है सत्य का द्वार। धर्म का पहला सीधा सरोकार तथ्यों से है। फैक्ट से है। एब्स्ट्रैक्शन से नहीं है। टेंजिबिलिटी से है।
15 साल पहले भी मैं यही सवाल पूछा करता था, और मैं आगे ही नहीं बढ़ पा रहा हूं इस सवाल से, क्योंकि कोई उत्तर ही नहीं आ रहा। ऐसा तो करना होता है ना। मैं पूछता था, कैसे पता? हाउ डू यू नो? किसने बताया? ना कोई जवाब 15 साल, 20 साल पहले आता था, ना कोई जवाब आज आता है। पता है तुम्हें क्यों नहीं पता? क्योंकि तुम्हें अपना नहीं पता। आत्मज्ञान के अभाव में, तुम्हें यह पता ही नहीं चलता कि तुमने किस बात को आत्मकर्तव्य बना लिया। तुम कौन हो? तुम्हें क्योंकि यह नहीं पता, इसलिए तुम्हें यह भी नहीं पता है कि तुम्हारे यह कर्तव्य सब कहां से टपक पड़े। बस तुम कंधे उचका कर बोल देते हो, ऐसा तो करना होता है ना? नहीं, पर यह तो कॉमन सेंस की बात है ना। यह तो मतलब, हां, उछके ही जा रहे हैं कंधे। मुंह से भी बोल लो। बता दो ना। तुम्हें कैसे पता फलानी चीज तुम्हारा कर्तव्य है। जिनको हम कहते हैं होली कााउज़। समझ रहे हो? होलिकाउस मतलब मुहावरा है अंग्रेजी का, कि जिन चीजों को तुमने सीक्रेड मान रखा है, तुम्हें कैसे पता वह सब सीक्रेड है? और क्योंकि तुमने 50 चीजों को सेक्रेड मान रखा है, इसीलिए जो द सेक्रेड है, उससे बहुत दूर हो। मानसिक बातों को कल्पित विषयों को सीक्रेट बना लिया है। और कितनी ज्यादा सफरिंग है उसकी वजह से। कोई इंतहा नहीं। भूख से नहीं मर रहे हैं। सेहत भी ठीक-ठाक है। ठीक-ठाक कमा भी रहे हैं। लेकिन फिर भी मन ऐसा कर रखा है कि आत्महत्या का ख्याल आता है। क्यों आता है? क्योंकि कुछ बातों को सीक्रेट बना करके बैठे हो, और उन बातों के रास्ते में जब बाधा आती है, तो लगता है, हाय हाय, जिंदगी में ना जाने क्या कमी है। मैं सुसाइड क्यों ना कर लूं। बिल्कुल तथ्यों के तल पर बात करो। भौतिक मटेरियल बताओ, क्या कमी है? नहीं, कमी तो कोई नहीं है। पर फिर भी दिल डूबा डूबा सा रहता है। फीलिंग्स ग्लूमी सी रहती हैं। गाने मत गाओ। तथ्य बताओ कि क्या है डूबा डूबा। तथ्य कोई है ही नहीं। बात बस इतनी सी है कि आपको सीक्रेटनेस की कुछ छवियां दे दी गई हैं। वो छवि जिंदगी में नहीं दिखती। तो डूबा डूबा, हुगा हुगा, कुछ भी गाओ फिर रो। उसमें तथ्यों के तल पर, तो भाई मेरे, पूरे अस्तित्व में किसी को भी बहुत दुख नहीं है। इंसान ने तो बहुत सारी चीजें अपनी सुख सुविधा के लिए बना बना ली है। यह जंगल के जानवर हैं। इनको कभी बहुत दुखी, उदास, रोते हुए देखा है क्या? प्रकृति तथ्यात्मक दुख तो देती ही नहीं है। तो कभी कभार, अब हो गया कि कोई बीमारी लग गई, हाथपांव कट गया, कुछ हो गया, तो उसे पीड़ा आ जाती है। पर जितना दुख मनुष्य झेलता है, वह प्रकृति पद प्रदत्त पीड़ा से तो बहुत आगे का है। तो क्यों आगे का है? क्योंकि हमारे पास झूठी छवियां हैं, सीक्रेट कर्तव्य हैं। ऐसा करना होता है। कर्तव्य माने ऐसा करना होता है। ऐसा अच्छा है, ऐसा बुरा है। हाउ डू यू नो? तुम्हें कैसे पता? मैं जिस दिन मर भी रहा होगा ना, मैं यही पूछ रहाऊंगा। तुम्हें कैसे पता? ऐसा करते हैं, बिन ले आके जला देते हैं। मैं जलने से पहले एक बार जरूर पूछूंगा, तुम्हें कैसे पता? तुम्हें कैसे पता? तुम्हें कुछ नहीं पता। तुम्हें बस अपने कर्तव्य पता है, जो किसी ने तुम्हारे माथे पर रख दिए हैं। और तुम उनको ढो रहे हो।
और कृष्ण का काम है तुम्हें इन कर्तव्यों से मुक्त करना। और कृष्ण का काम है तुम्हें सबसे बड़े कर्तव्य में बांध देना। सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? करुणा। सबसे बड़े कर्तव्य का ही दूसरा नाम क्या है? स्वयं कृष्ण। कृष्ण कहते हैं, छोड़ दो सारे कर्तव्य। मैं एकमात्र कर्तव्य हूं तुम्हारा। छोड़ो। और खुल के इन्हीं शब्दों में कहते हैं, सारे धर्मों को त्याग दो। मात्र मैं तुम्हारा कर्तव्य हूं। बाकी सब जो तुमने अपने ऊपर पकड़ रखा है, यह करना, यह करना, यह ड्यूटी, यह रिस्पांसिबिलिटी, यह जिम्मेदारी, यह वो छ।
तो फिर लोकधर्मी ने कहा, देखो, यह ना महाभारत घर में मत रखना। मेरे घर में क्लेश होता है। अब महाभारत में ही तो गीता है, तो फिर गीता भी मत रखना। कारण समझ में आ रहा है ना? हम जिसको अपना घर कहते हैं, बहुत अफसोस की बात है, लेकिन उसकी बुनियाद में झूठ है। और गीता का काम है सब झूठों को जड़ से हिला देना। इसीलिए हमारे घरों में गीता का स्थान नहीं है। कोई संयोग की बात नहीं है। घर में गीता आएगी, तो घर को नुकसान तो हो जाएगा। बड़ा शुभ नुकसान होगा। परम आदमी इस नुकसान को झेलने को तैयार नहीं होता है।
और एक शब्द है जो कर्तव्यों के साथ चलता है, जिससे कृष्ण आपको आजादी देते हैं। शर्म। कर्तव्यों का खेल अगर चलाए रखना है, तो बहुत जरूरी है कि कर्तव्य के पूरे ना होने पर दंड का प्रावधान हो। एक दंड तो यह हो सकता है कि आपको पुलिस ने पकड़ा, न्याय वालों ने पकड़ा, समाज के ठेकेदारों ने पकड़ा, पंचायतों ने पकड़ा। पर यह सब बाहरी हैं। यह सब बाहरी हैं। तो क्या पता आप पकड़े जाओ ना पकड़े जाओ। बाहर वाला कितनी नजर रखेगा? और अगर उसने नजर रख भी ली, तो आपको पकड़ने में फिर मेहनत करनी पड़ेगी। तो कहीं ज्यादा एक एफिशिएंट तरीका निकाला गया आपको पकड़ने का। वह है शर्म, लज्जा, ग्लानी। कर्तव्य पूरे नहीं हुए। अपनी ही नजरों में गिर जाओ। अज्ञान से मुक्ति माने कामना से मुक्ति। कामना से मुक्ति माने कर्तव्य से मुक्ति। और कर्तव्य से मुक्ति माने लज्जा से मुक्ति। जिसका अज्ञान हट गया, वो बड़ा निर्लज्ज हो जाता है। बेशर्म। हम कर्तव्य है मेरा कि बोलूं, बेशर्म हूं। पर मैं तो निर्लज्ज हूं। तो क्या बोलूंगा? बेशर्म। कृष्ण आपको लज्जा से मुक्ति देते हैं।
बंदों से पर्दा करना क्या? जब प्यार किया तो डरना क्या? दुनिया में किसी को देखा है जो बात पे लजाता हो, शर्माता हो? पूरे अस्तित्व में, कायनात में कोई प्रजाति है ऐसी? मैं तो छुई मुई अब्ला सी, शर्म सी लाल हुई है। कोई तो आपको क्या लगता है, यह आप में जन्मगत है? बात यह डाली गई है। लज्जा डाल दो। लज्जा कर्तव्य साथ है। कर्तव्य कामना साथ है। और जहां कामना है, वहां किसी का स्वार्थ है। आपके भीतर लज्जा को स्थापित करके किसी के स्वार्थों की पूर्ति की जाती है। जिसको दूसरों की स्वार्थ पूर्ति की मशीन बनकर नहीं जीना है, उसे निर्लज्ज होना पड़ेगा। क्या एक बिल्कुल मौलिक जीवन, जिसमें कुछ भी ऐसा नहीं है, जो रटाया पढ़ाया गया हो। बिल्कुल निर्दोष, इनोसेंट आंखें, जो सामने वाले की भाषा समझती ही नहीं है। सामने वाला तुम्हें पढ़ाना चाह रहा है, तुम्हें जताना चाह रहा है कि तुमने कुछ गलत कर दिया है। तुम्हें शर्मिंदा होना चाहिए। तुम उसको ऐसे देख रहे हो, जी आपने क्या कहा? मैंने समझा नहीं। जी, आपकी भाषा मुझे आती नहीं। जी, मैं पढ़ ही नहीं पाया। आपने लिखा क्या? आप मुझे शर्मसार करना चाह रहे हो। मैं हो ही नहीं सकता। मैं आपकी भाषा जानता ही नहीं। जी, आपने कोशिश बहुत की मेरे भीतर कुछ लिख देने की।
गीता का काम है सब लिखे हुए को मिटा देना। जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा। यह गीता का काम है। उन्होंने तुम्हारे भीतर लज्जा के सारे उपन्यास लिख डाले हैं। नहीं भाई, सब मिट गया। समझ में आ रही है बात? ये मेरा विवेक तय करेगा, कहां मुझे सुधार करना है। तुम्हारे नियम कायदे कानून थोड़ी बताएंगे। ग्लानि, लज्जा। मुझे अगर कभी होगी भी, तो इस बात की होगी कि जो मैं सही जानता था, उसे सही जानते हुए भी जी नहीं पाया। इस बात का अपराधी मैं स्वयं को जरूर ठहराऊंगा। जो चीज ठीक है, उसको ठीक जानते हुए भी उस पर चल नहीं पाया। मात्र इसी बात का अपराधी मैं स्वयं को ठहरा सकता हूं। पर इस बात का मुझे कोई कभी अपराध बोध नहीं होगा कि तुम्हारी लिखी हुई पटकथा पर मैं चल नहीं पाया, तो मैं दोषी हो गया, अपराधी हूं, सजा दो ना। अपराधी हूं ना, सजा स्वीकार करूंगा। मैं अपराधी हूं कि नहीं हूं, यह अगर कोई तय करेगा, तो कौन? गीता तय कर देगी। तुम नहीं तय करोगे। और गीता कहती है, अपराध तुम्हारा बस एक हो सकता है कि तुम 100 कर्तव्य पकड़ कर बैठे रहे, और कृष्ण कर्तव्य भुलाए रहे। बस यही अपराध हो सकता है। यह अपराध जब होगा, तो निसंदेह मैं स्वीकार करूंगा और सुधार करूंगा। उसके अलावा कोई अपराध नहीं है।
[संगीत] ओम [संगीत]