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एक दौर की बात है जब पहाड़ों की गोद में एक छोटा सा गांव बसा हुआ था। जहां हवाएं गाते हुए बताती थी कि यहां की मिट्टी में ईमानदारी की खुशबू अभी तक बाकी है।
लेकिन एक रात जब चांद आसमान पर लटका हुआ था, जैसे कोई चोर की आंखें, गांव के किनारे एक पुरानी हवेली से एक अजीब सी आवाज गूंजी। "चोर, चोर, मेरा खजाना लूट लिया।" वह आवाज इतनी खौफनाक थी कि कुत्ते भौंक उठे, बकरियां भागने लगीं और गांव वालों की नींद टूट गई। सब ने सोचा शायद कोई डाकू आया हो।
मगर जब सुबह हुई तो पता चला कि यह तो हवेली के मालिक, अमीर ताजिर रहीम बख्श की आवाज थी। वह अपने गुस्से में पागल हो रहा था, क्योंकि उसकी हवेली का सबसे कीमती खजाना, एक पुरानी सोने की महफूज़ गायब हो चुका था। रहीम बख्श एक ऐसा आदमी था जिसकी आंखों में लालच की चमक थी और जुबान पर झूठ की महारत। वह गांव के गरीबों से धोखा देता, उनकी मेहनत को हड़प लेता और फिर हंसता। लेकिन उस रात का सन्हा उसे और भी बेचैन कर गया।
इस गांव में ही रहता था एक सादा सा किसान मोहम्मद अशरफ, जिसे सब प्यार से अशरफ चाचा कहते। उसके पास थोड़ी सी जमीन थी जहां वह गेहूं और चावल उगाता और जो कुछ बचता वह गांव के बाजार में बेचता। उसकी बीवी फातिमा एक मेहनती औरत थी जो घर संभालती और कपड़े सिलाई करके कुछ पैसे कमाती। उनका बेटा आदिल अभी तो 16 साल का हुआ था, मगर उसकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जो इस उम्र के लड़कों में कम ही देखने को मिलती है। आदिल पढ़ने लिखने में होशियार था और उसे किताबें पढ़ने का शौक था। खासतौर पर वह पुरानी कहानियां जिनमें गरीब हीरा होते और अमीरों को सबक मिलता।
अशरफ चाचा हमेशा आदिल को समझाते, "बेटा, दुनिया में ईमानदारी ही सबसे बड़ी दौलत है। धोखा देने वाले का अंजाम बुरा होता है।"
सर्दियों का मौसम था। बर्फबारी की वजह से फसलें देर से पक रही थीं और अशरफ चाचा की माली हालत पहले से ही डगमगा रही थी। एक दिन अशरफ चाचा ने अपनी थोड़ी सी गेहूं पिसवाई, जो पुरानी आबादी में एक छोटी सी चक्की पर मिली। वह गेहूं का आटा पीक किया और एक बड़ी टोकरी में भरा। सोचा कि बाजार जाऊंगा, आटा बेचूंगा और कुछ पैसे कमा लूंगा ताकि घर का खर्चा चले।
आदिल ने कहा, "अब्बा, मैं साथ चलूं।" मगर अशरफ चाचा ने मुस्कुरा कर इंकार कर दिया। "नहीं बेटा, तू अभी छोटा है। बाजार के सूदियों और ताजिरों की चालाकी से बचना पड़ता है। मैं खुद जाऊंगा।"
अशरफ चाचा अपनी पुरानी गड्ढे वाली गाड़ी लेकर बाजार रवाना हुए। बाजार पहुंचे, तो एक कोने में गाड़ी खड़ी की, और आटे की टोकरियां सामने रख दीं। कुछ देर इंतजार किया मगर कोई ग्राहक ना आया। बर्फ पड़ रही थी और सर्दी की लहर जिस्म को कांपने पर मजबूर कर रही थी।
तभी दूर से एक खूबसूरत घोड़े पर सवार आदमी आया। यही रहीम बख्श था। उसकी दाढ़ी साफ सुथरी, लिबासू महंगा और आंखों में वह लालची चमक जो अशरफ चाचा जैसे सादा लोगों को दूर से पहचान लेती थी। रहीम बख्श की नजर आटे की टोकरियों पर पड़ी। उसे याद आया कि उसकी बीवी ने कहा था, "आज ताजा आटे की रोटी बनाऊंगी मगर घर का आटा खत्म हो गया है।"
वह अशरफ चाचा के पास आया और मीठी आवाज में बोला, "अरे भाई, क्या बेच रहे हो? यह आटा तो बहुत साफ नजर आ रहा है।" अशरफ चाचा खुश हो गए। "जी साहब, यह तो आज ही पिसा हुआ ताजा आटा है। गेहूं गांव की बेहतरीन थी। आप चाहे तो सस्ते दामों दे दूंगा।"
रहीम बख्श ने अशरफ चाचा को घूर से देखा। सादा लिबास, थके हुए चेहरे पर ईमानदारी की चमक। उसने दिल में सोचा, "यह तो बिल्कुल भोला भाला है। आज इसे हाथ लगा लूं।" वह बोला, "भाई, यह पूरी गाड़ी का आटा कितने में दे दोगे?" अशरफ चाचा को लगा कि पूरा माल एक ही दफे बिक जाएगा। तो जल्दी से बोले, "सिर्फ ₹500 दे दें। सारा ले जाइए।"
रहीम बख्श ने फौरन ₹500 निकाले और बोला, "ठीक है, मगर यह आटा मेरे घर तक पहुंचा दो। घर करीब ही है।" अशरफ चाचा ने रहीम बख्श को भी गाड़ी पर बिठाया और उसकी हवेली की तरफ चल पड़े। हवेली पहुंचे तो अशरफ चाचा ने कहा, "साहब, जल्दी से आटा उतारवा दें। मुझे घर वापस जाना है।"
रहीम बख्श मुस्कुराया। मगर उसकी मुस्कुराहट में जहर था। "कौन सी गाड़ी? मैंने तो पूरी गाड़ी के 500 दे दिए हैं। अब यह सब मेरा माल है।" अशरफ चाचा हैरान। "साहब, मैंने आटे के दाम बताए थे। गाड़ी तो मेरी है।"
रहीम बख्श ने सख्त लहजे में कहा, "मैंने पूछा था पूरी गाड़ी का दाम? तूने खुद 500 कहा। अब जुबान से फिर रहे हो। तुम जैसे लोग वादों के पाबंद नहीं होते।" फिर उसने नौकरों को बुलाया। जिन्होंने अशरफ चाचा के कपड़े उतार दिए, उसे मारा पीटा और हवेली से बाहर धकेल दिया। अशरफ चाचा नंगा, शर्मिंदा, बर्फ में कांपता हुआ जंगल की तरफ भाग गया। वह दिन भर वहां छिपा रहा और रात के अंधेरे में घर पहुंचा।
घर पहुंचते ही फातिमा और आदिल ने उसकी हालत देखी तो दिल फट गया। चादर ओढ़ाई, गर्म दूध पिलाया और वजह पूछी। अशरफ चाचा की आंखों से आंसू बहते रहे, जबकि उसने सारा वाकया सुनाया। कैसे रहीम बख्श ने उसकी सादगी का फायदा उठाया। ना सिर्फ आटा छीन लिया बल्कि उसकी इज्जत भी मिट्टी में मिला दी।
आदिल का खून खौल उठा। उसने गुस्से से कहा, "अब्बा जी, कल बाजार में मैं जाऊंगा। उस ताजिर से आपकी बेइज्जती का हिसाब लूंगा और हमारी गधे वाली गाड़ी भी वापस ले आऊंगा।" अशरफ चाचा ने बेटे के जज्बात देखे मगर नरमी से समझाया, "नहीं बेटा, ताजिर बहुत चालाक और जालिम है। कहीं तू भी किसी मुसीबत में ना पड़ जाए।"
मगर आदिल ने जज्बे भरे लहजे में कहा, "अब्बा जी, बस आप मुझे उसका हुलिया बता दें। फिर देखें आपका बेटा कैसे आपकी इज्जत वापस लाता है।" अशरफ चाचा ने रहीम बख्श का मुकम्मल हुलिया बता दिया। लंबी दाढ़ी, बाएं आंख का काजल और वह खास मुस्कुराहट जो सांप की तरह झड़ होती।
अगले दिन सुबह सवेरा आदिल ने पड़ोसी से एक गधे वाली गाड़ी मांगी। उसमें ताजा आटा भरा और बाजार का रुख किया। वह बिल्कुल उसी जगह खड़ा हुआ जहां उसके अब्बा को धोखा दिया गया था। कुछ देर गुजरी तो वहीं रहीम बख्श अपने भरम भरे अंदाज में आ गया। आदिल को देखा तो रुक गया। आदिल का मासूम चेहरा और नरम लहजा सुनकर रहीम बख्श ने दिल में सोचा, "कल बाप को बेवकूफ बनाया, आज बेटे की बारी है। यह तो और भी सादा लग रहा है। अबकी बार पूरा आटा और गाड़ी दोनों हाथ लग जाएंगे।"
रहीम बख्श आदिल के पास आया। "भाई, इस गाड़ी में क्या है?" आदिल ने नरमी से जवाब दिया, "साहब, ताजा आटा है। ऐसा खालिस आटा आपने कभी ना छका होगा।" रहीम बख्श बोला, "तू बता, पूरी गाड़ी का क्या दाम लगाया है?" आदिल मुस्कुराया, "बस साहब, एक मुट्ठी भर रुपए दे दे, सौदा आपका।"
रहीम बख्श के चेहरे पर खबीस मुस्कुराहट फैल गई। दिल में सोचा, "वाह, यह तो बाप से भी ज्यादा नादान है। एक मुट्ठी में 10-10 के नोट रख दूंगा ₹100 और पूरी गाड़ी मेरी।" वह बोला, "ठीक है भाई, सौदा मंजूर है। मगर पैसे मैं घर जाकर दूंगा। तू बस गाड़ी मेरे घर पहुंचा दे।" हल खामोशी से तैयार हो गया।
जब हवेली पहुंचे तो रहीम बख्श ने गाड़ी अंदर खड़ी करवाई। फिर जेब से 10-10 के नोट निकाले। मुट्ठी में दबाकर आदिल की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "ले लो मुट्ठी भर दाम और गाड़ी यहीं छोड़कर वापस जाओ। यही तय हुआ था ना।"
आदिल ने संजीदगी से कहा, "साहब, दाम तो आटे के लगे थे। गाड़ी मेरे अब्बा की है, मेरी है। आप मेहरबानी फरमा कर सिर्फ आटा उतारवा दें।" रहीम बख्श गुस्से से दांत पीसा। "क्या बकवास कर रहे हो? तूने खुद कहा था एक मुट्ठी में पूरी गाड़ी दे दोगे। अब जबान से फिर रहे हो?"
आदिल ने कहा, "नहीं साहब, जो कहा था वही मानक रहा हूं। आटा बेचा है, गाड़ी नहीं। यह मेरा रोजगार का जरिया है।" रहीम बख्श गुस्से में बोला, "अब अगर ज्यादा बातें कीं तो तेरे अब्बा की तरह तुझे भी जिल्लत करके बाहर निकाल दूंगा।"
आदिल ने खामोशी से सुना। फिर बोला, "अच्छा साहब, अगर बात ऐसी है तो लाओ व मुट्ठी भरदा।" रहीम बख्श जैसे ही मुट्ठी आगे बढ़ाने लगा। आदिल ने उसका हाथ मजबूती से पकड़ लिया और जेब से चाकू निकाल कर कहा, "सुनो साहब, मैं अपनी गाड़ी तुम्हारे पास छोड़ रहा हूं मगर बदले में तुम्हारी अंगूठी साथ ले जा रहा हूं।"
रहीम बख्श कांप उठा। "यह क्या बदखलकी है? हाथ छोड़ो मेरा।" आदिल बोला, "तुमने मेरी पूरी गाड़ी एक मुठी के बदले हड़प की थी ना, अब यह मुट्ठी मेरी है।" चाकू तेज था और आदिल का इरादा पक्का। जैसे ही उसने हाथ पर दबाव डाला, रहीम बख्श चीख उठा, "खुदा का वास्ता है बेटा, जो चाहे ले लो, बस मुझे छोड़ दो।"
आदिल बोला, "पहले वह गाड़ी खाली करो जो कल मेरे अब्बा मोहम्मद अशरफ से छीन ली थी। वह भी वापस दो और हां, अब तुम्हें मुझे ₹1000 महाना पर अपने घर में नौकरी भी देनी होगी।" रहीम बख्श के पास कोई चारा ना था। जान बचाने के लिए हाथ जोड़े, "ठीक है, जैसे तू कहेगा वैसे ही होगा।"
आदिल ने चाकू वापस किया और कहा, "अगर तुम अपनी जुबान से फिरो या नौकरी से निकालने की कोशिश की या तनख्वाह में टालमटोल की तो याद रखना, मैं तुम्हारी नाक और कान दोनों काट दूंगा।" रहीम बख्श कांपते हुए सिर हिलाया और वादा कर लिया। उसने अशरफ चाचा की गाड़ी खाली करवाई, ₹1000 रुपए आटे के भी दिए और नौकरी की हामी भर ली।
आदिल दो गधों वाली गाड़ियां लेकर गांव वापस लौटा। दूर से अशरफ चाचा ने बेटे को आते देखा तो खुशी से बेकाबू हो गए। दौड़ कर गले लगा लिया। आदिल ने सारी कहानी सुनाई और नौकरी की बात भी बताई। अशरफ चाचा फिक्रमंद हुए। "बेटा, वह ताजिर बदला लेने वाला है। खबरदार, हमेशा होशियार रहना।"
आदिल मुस्कुराया। "अब्बा जी, अगर वह सांप है तो मैं सांप का हंटा हूं। अब आप फिक्र ना करें।"
अगले दिन आदिल रहीम बख्श की हवेली पहुंच गया। रहीम बख्श ने दिल में सोचा, "इसे इतना थका दूंगा कि खुद भाग जाएगा।" वह बोला, "आदिल, दो खेत जोत, फिर शाम को लकड़ियां भी लाना चूल्हे के लिए।" आदिल खामोशी से निकल गया। खेत की तरफ गया और दिन भर एक दरख्त के नीचे सोता रहा। शाम को हल्के-फुल्के तीन-चार टुकड़े किए। उन्हें कांटा, गट्ठा बनाया, सिर पर रखा और वापस आ गया। हवेली पहुंचा, लकड़ी का गट्ठा फेंका और खामोशी से खाने बैठ गया।
रहीम बख्श ने नौकर से कहा, "इसे एक मुट्ठी चावल दे दो और एक चम्मच दाल। यही यहां की तनख्वाह है।" आदिल ने सुना, "यहां रहना है तो एक मुठी चावल पर रहो, वरना निकल जाओ।" आदिल ने खामोशी से वह चावल खाए, पानी पिया और अपने कमरे में चला गया। मगर रात को भूख ने सोने ना दिया। पेट में चूहों की दौड़ थी। कुछ देर करवटें बदलता रहा। फिर उठा और बाहर सहन में गाय के बाड़े की तरफ चला गया।
वहां देखा कि एक छोटा सा बछड़ा रस्सी से बंधा है। आदिल ने चुपके से रस्सी खोली। बछड़ा फौरन मां के नीचे जाकर दूध पीने लगा। जैसे ही बछड़े ने मुंह लगाया, गाय के थन में दूध आ गया। आदिल ने मौका गनीमत जाना। बछड़े को दोबारा बांधा और सारा दूध खुद पी गया। पेट भरने के बाद सुकून की नींद सोई।
अगली सुबह जब रहीम बख्श दूध निकलवाने गया तो थन बिल्कुल खाली थे। वो हैरान। अभी झका ही था कि गाय ने जोर की लात मारी और वह पीछे जा गिरा। यह रोज का रिवाज बन गया। आदिल हर रात बछड़ा छोड़ता। गाय दूध देती, वह पीता और दिन भर काम करता रहता। मगर वह जिस्मानी तौर पर कमजोर होने के बजाय पहले से ज्यादा तंदुरुस्त और मजबूत दिखाई देता। रहीम बख्श हैरान। "यह लड़का एक मुठी चावल खाता है। सारा दिन काम करता है। और फिर भी ऐसा फिट कैसे है?" उसे क्या खबर थी कि उसकी गाय का सारा दूध आदिल के पेट में जा रहा है।
कुछ दिन बाद रहीम बख्श की बीवी गुलजार भी अपने मां-बाप के पास चली गई। पूरा महीना गुजर गया। वह वापस ना आई। रहीम बख्श अकेला होकर उदास रहने लगा। आखिरकार उसने फैसला किया कि खुद जाकर बीवी को वापस लाएगा। उसने आदिल से कहा, "आदिल, मेरे साथ चल। बीवी को लेने जाना है।" सिर्फ एक घोड़ा था। उस पर रहीम बख्श खुद बैठा और आदिल को पैदल साथ चलने को कहा।
आदिल दिल में मुस्कुराया। "अच्छा तरीका निकाला है मुझसे जान छुड़ाने का। सोचा होगा मैं रास्ते में मर जाऊंगा और यह साहब घोड़े पर आराम से ससुराल पहुंच जाएंगे। अगर तुझे होश ना दिलाया तो मेरा नाम आदिल नहीं।"
कुछ फासले पर रहीम बख्श थक गया। एक दरख्त के नीचे लेट कर आराम करने लगा और आदिल से कहा, "घोड़े का ख्याल रखना। मैं धर्रा आंख लगा रहा हूं।" थोड़ी देर बाद कुछ ताजीरों का काफिला वहां से गुजरा। आदिल ने घोड़े की दुम का थोड़ा सा हिस्सा काटा और अपने पास रख लिया। फिर पूरा घोड़ा उन ताजीरों को बेच दिया। सौदे के बाद आदिल एक झाड़ी के करीब बैठ गया और दुम का कांटा हुआ टुकड़ा एक चूहे के सुराख पर रख दिया। जैसे चूहे को पकड़ने बैठा हो।
थोड़ी देर बाद रहीम बख्श की आंख खुली। उसने इधर-उधर निगाहें दौड़ाईं। घोड़ा गायब। आदिल झाड़ी के पास बैठा था। हाथ में दुम का टुकड़ा। रहीम बख्श गुस्से से बोला, "आदिल, मेरा घोड़ा कहां गया?" आदिल ने बेहद मासूम लहजे में कहा, "साह, घोड़ा तो चूहे के बल में घुस गया। मैंने बड़ी मुश्किल से इसकी दुम पकड़ रखी है। अकेला खींच नहीं पा रहा। धर्रा आप भी जोर लगाएं।"
रहीम बख्श गुस्से में आया और जैसे ही दुम खींची, दुम उसके हाथ में रह गई। "यह क्या मजाक है?" वह चीखा। आदिल ने संजीदगी से कहा, "साहब, आपने खुद कहा था कि अगर जाना है तो मेरी नाक कान काट कर जाओ। तो आप ही बताएं, तुम तो मेरे साथ रह गई। अब घोड़ा नहीं रहा।"
रहीम बख्श कुछ ना कह सका। मजबूरी में आदिल को साथ लेकर आगे बढ़ना पड़ा। रास्ते में एक और बाजार आया। रहीम बख्श ने वहां से दूसरा घोड़ा खरीदा। इस बार काला घोड़ा। दोनों आगे बढ़ने लगे। रास्ते में पड़ाव डाला गया। रहीम बख्श ने पेट भरकर खाना खाया और आदिल से कहा, "यह घोड़ा खास है। इसे खूब रगड़ कर नहलाओ। सारी मैल छोड़नी चाहिए।"
आदिल ने बाजार जाकर वह घोड़ा भी बेच दिया और इस बार एक खूबसूरत सफेद खरगोश ले आया। जब रहीम बख्श की आंख खुली तो आदिल खरगोश लेकर बैठा था। "आदिल, घोड़ा कहां है?" आदिल ने बड़ी सादगी से कहा, "साहब, आपने कहा था रगड़गड़ के नहलाओ। मैंने इतना रगड़ा कि घोड़े का काला रंग उतर गया। अब देखें, यह बिल्कुल सफेद हो गया और इतना रगड़ा कि वह सिकुड़ कर यह खरगोश रह गया।"
रहीम बख्श ने दांत पीसे। मगर अब वह कुछ कर भी ना सका। अब दोनों पैदल चलने पर मजबूर हो गए। ससुराल करीब आ गया था। मगर रहीम बख्श भूख से नढाल हो चुका था। सारी रकम घोड़ों पर खर्च हो चुकी थी और खानेपीने का सामान भी खत्म। वह एक दरख्त के नीचे बैठ गया और आदिल से कहा, "आदिल, जा मेरे ससुराल पहुंच जा, कह दे दामाद आ रहा है। वह लोग खुश होकर मेरे लिए खाने का इंतजाम करेंगे।"
आदिल रवाना हुआ और जैसे ही ससुराल पहुंचा, रहीम बख्श की सास ने फिक्रमंदी से पूछा, "बेटा, हमारा दामाद खैरियत से तो है?" आदिल ने संजीदगी से जवाब दिया, "नहीं माई जी, वक्त ठीक नहीं है। दामाद साहब को सख्त पेट की खराबी हो गई है। वह रास्ते में ही बैठ गए हैं। कुछ भी खाने को ना दें तो बेहतर, वरना और खराब हो जाएंगे।"
सास जी घबरा गई और फौरन खानदान को बुलाया। सब ने सोचा दामाद बीमार है तो हल्कीफुल्की खाने की चीज बनाएं। आदिल ने मौका देखा और कहा, "माई जी, दामाद साहब को खिचड़ी मिल जाए तो अच्छा होगा। मगर मुझे तो भूख लग रही है। कुछ फल, दही और रोटी दे दें।" सास जी ने खिचड़ी दामाद के लिए और आदिल के लिए फल, दही, रोटी और यहां तक कि मीठी भी तैयार करवाई। आदिल ने मजों से खाया और फिर बाहर जाकर रहीम बख्श को बुलाया।
रहीम बख्श पहुंचा तो देखा कि सिर्फ खिचड़ी है। गुस्सा तो आया मगर बोल ना सका क्योंकि अपने किए का करा है। रात को दोनों की चारपाइयां छत पर लग गई। आदिल मजों से खर्राटे लेकर सो गया। रहीम बख्श भूखा करवटें बदलता रहा। आखिरकार उसने आदिल को झिंझोड़ा, "यार, तूने तो फल दही खाकर खर्राटे ले लिए। मैं यहां भूखा मर रहा हूं।"
आदिल ने चुपके से एक चाल सोची। छत में पुराना धमला था। एक सुराख जो पहले जमाने में अनाज नीचे गिरने के लिए होता था। आदिल ने रहीम बख्श की कमर में रस्सी बांधी और कहा, "साहब, नीचे रसोई में खाना पड़ा है। आप जाइए खा लीजिए। जब पेट भर जाए तो रस्सी हिलाइए। मैं आपको ऊपर खींच लूंगा।"
रहीम बख्श बहुत खुश हुआ। फौरन नीचे उतर गया और फलों दही रोटी पर टूट पड़ा जैसे बरसों से भूखा हो। खा पीकर जब पेट भरा तो रहीम बख्श ने रस्सी हिलाई और आहिस्ता आवाज दी, "आदिल, अब मुझे ऊपर खींच लो।" मगर आदिल खर्राटे ले रहा था। रहीम बख्श की सांस पानी पी रही थी। वह बार-बार पुकारता, "खींच, खींच, जल्दी खींच।"
नीचे रसोई के दरवाजे के पास सास जी आई तो अंदर से आवाजें सुनीं। "खींच, खींच।" वह घबरा गई। भागकर खाविंद को जगाया। "अरे जी, रसोई में कोई जिन या भूत आ गया है जो बार-बार कह रहा है, खींच खींच।" बूढ़े ससुर ने फौरन बेटे, दामाद (जो अभी तो ऊपर था) और हंसायों को जमा किया। सब रसोई के दरवाजे पर कान लगाकर खड़े हो गए। अंदर से आवाजें आ रही थीं।
तब तक आदिल जाग गया। जल्दी से रस्सी खींच कर रहीम बख्श को ऊपर खींच लिया। जब दरवाजा खोला गया तो रसोई खाली थी। सब हैरान होकर वापस चले गए। मगर किस्मत तो कुछ और लिख चुकी थी। रात के आखिरी पहर रहीम बख्श के पेट में दर्द शुरू हो गया। शायद भूख और खाने की वजह से। उसने आदिल को झिंझोड़ा, "उठ, मेरे साथ खेतों तक चल। बहुत जोर का पेट खराब है।"
आदिल आधी नींद में बोला, "साहब, बाहर जाने की क्या जरूरत? यहां पास एक मिट्टी की हांडी रखी है। उसमें ही काम निपटा लीजिए। सुबह में चुपके से ले जाकर फेंक आऊंगा।" रहीम बख्श मजबूर। हांडी में ही फारग हो गया। सुबह जल्दी आंख खुली तो उसने आदिल को जगाया, "उठ, जल्दी हांडी बाहर फेंका वरना लोग देख लेंगे तो मेरी इज्जत खाक में मिल जाएगी।" मगर आदिल खर्राटे मार रहा था। रहीम बख्श ने खूब झिंझोड़ा, कोई फायदा ना हुआ।
अब क्या करें? रहीम बख्श ने चादर ओढ़ी, हांडी सिर पर रखी और दबे कदम सीढ़ियां उतरने लगा। जैसे ही सोहन में पहुंचा, क्या देखता है, ससुर भैंसों को चारा डाल रहे हैं। रहीम बख्श निगाहें चुराता हुआ जल्दी से दरवाजे की तरफ बढ़ा। मगर आदिल की आखिरी चाल। यह सब आदिल छत से देख रहा था। मौका गनीमत जाना। जल्दी से करीब रखी एक मोटी लाठी उठाई। तबे पांव नीचे उतरा और पीछे से हमला अबोर होने को तैयार हो गया।
जैसे ही रहीम बख्श चादर ओढ़े, सिर पर हांडी रखे जंगल की तरफ जा रहा था। आदिल ने पूरे गांव में शोर मचा दिया। "चोर, चोर! अरे देखो, सिर पर हांडी लेकर चादर ओढ़े जा रहा है चोर।" कुछ देहाती जो सुबह सवेरा भैंसों को चारा देने जाग चुके थे। फौरन डंडे और लाठियों लेकर दौड़ पड़े। उन्होंने दूर से रहीम बख्श को देखा। चादर ओढ़े, हांडी उठाए। बस यही है चोर। और फिर ढंग ढंग लाठियों की बारिश शुरू हो गई। कोई हाथ मार रहा, कोई टांग, कोई आवाज निकाल रहा। रहीम बख्श बेहोशी में चीख रहा, "अरे, मैं चोर नहीं हूं। मैं मैं रहीम बख्श हूं। कन सी चिमरसा।" मगर किसी ने ना सुना।
इसी शोरशराबे में ससुराल वाले भी पहुंच गए। सबके हाथों में लाठी थी। आदिल ने आखिरी बात कहकर तमाशा मुकम्मल कर दिया। "अरे, सब लोग तो यहां हैं। पर हमारे साहब जी कहां गए?" सब चौंक गए। "हां, वाकई दामाद जी तो शोर सुनते ही गायब हो गए। आखिर कहां है?" जब उन्होंने चादर खींची तो सामने खुद उनका दामाद। चेहरा शर्मिंदगी से झका, जिस्म नीला पड़ा और सिर पर हांडी। पूरे महफिल में हंसी का तूफान उठ गया। रहीम बख्श शर्म से पानीपानी हो गया। इज्जत, घमंड, फक्र सब मिट्टी में मिल गया।
घर के अंदर ले जाकर दूसरे कपड़े पहनाने दिए गए। गुलजार बी को भी साथ किया गया और सब ने तंजिया मुस्कुराहटों के साथ रुखसत किया। जब गांव वापस पहुंचे तो आदिल ने आहिस्ता से कहा, "साहब जी, जो आपकी हांडी पर पहली लाठी पड़ी थी, वह मैंने मारी थी। और जो चोर-चोर चिल्लाया था, वह भी मैं ही था।"
रहीम बख्श के कदम जैसे जमीन में ढंस गए। आंखों में आंसू आ गए। उसने डरी हुई आवाज में कहा, "आदिल, यह तूने क्यों किया? तुझे इससे क्या मिला?" आदिल ने नरमी और एज्म से जवाब दिया, "मुझे वही मिला जो आपने मेरे बूढ़े वालिद मोहम्मद अशरफ को नंगा करके जंगल में छोड़कर हासिल किया था। यह उस जिल्लत का बदला था।"
रहीम बख्श की गर्दन झुक गई। "आदिल, मुझे माफ कर दे। खुदा के लिए, अब तो मेरा पीछा छोड़ दे।" आदिल ने संजीदगी से कहा, "इतनी आसानी से पीछा नहीं छूटेगा साहब जी। मेरा आपसे वादा था कि जब आप मुझे नौकरी से निकालेंगे तो अपनी नाक कान काट कर मेरे हाथ में रखेंगे।"
रहीम बख्श हाथ जोड़कर गड़गड़ाता रोने लगा। "आदिल, नाक कान छोड़, जो मांगेगा दूंगा। बस मेरी इज्जत बख्श दे।" आदिल ने आखिरी शर्त रखी। "वादा करो कि आज के बाद किसी गरीब को धोखा ना दोगे। किसी का मजाक ना उड़ाओगे। और अभी के अभी मेरे हाथ पर ₹500 रख दो।"
रहीम बख्श ने फौरन वादा किया। ₹500 आदिल के हाथ पर रखे और अपने किए पर पछतावे के साथ सिर झुकाए खामोश बैठ गया। आखिर में आदिल वापस अपने घर चला गया। रहीम बख्श ने सच में जिंदगी भर का सबक सीख लिया। अब वह ना किसी को धोखा देता ना गरीब का मजाक उड़ाता। दिल से तौबा की और मोहम्मद अशरफ से माफी मांगी। गुलजार बी वापस आई और रहीम बख्श की जिंदगी बदल गई। अब वह गरीबों की मदद करता और हवेली का खजाना खैरात पर खर्च करता।
सबक यह है कि जो मां-बाप का दिल दुखाए, वह जिंदगी में कभी सुकून ना पा सके। जो गरीब को जिल्लत दे, अल्लाह उसे दुनिया में ही रुसवा कर देता है। और जो सब्र करे, अल्लाह उसे इज्जत, अक्ल और मौका दोनों अता फरमाता है। आदिल की चालाकी ने ना सिर्फ बाप की इज्जत वापस की बल्कि एक जालिम को इंसान बना दिया। गांव में आज भी यह कहानी सुनाई जाती है। जब कोई बच्चा पूछता है, "गरीब कैसे अमीर होता है?" तो बूढ़े मुस्कुरा कर कहते, "अक्ल और सब्र से बेटा, अक्ल और सब्र से।"