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सलाम वालेकुम रहमतुल्लाह बरकातह। अल हमदुलिल्लाहिरब्बिल आलमीन। अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातूह।
अल्लाहु अकबर। अल्लाहुमा सल्ली अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मद।
अल्लाह के फज़्ल व तौफ़ीक से हम उलूम शरिया कोर्स के फ़र्स्ट लेवल का आज से इंशाअल्लाह तालीमी तौर पर आगाज़ कर रहे हैं। जिसमें हमारी पहली क्लास होगी आज। और इसमें हम अपने तमाम भाइयों और बहनों को खुशामदीद कहते हैं जो यहां पर मौजूद हैं और जो ऑनलाइन भी सुन रहे हैं।
और सबसे पहले अल्लाह ताला से तौफ़ीक माँगते हैं। अल्लाह हमें इस इल्म के रास्ते पर साबित्कदमी से चलने की तौफ़ीक अता फ़रमाए। और पूरे इखलास और ला हिआत के साथ अल्लाह ताला हमें इस इल्म का अज़ीम जो काम है, अज़ीम जो मन्सब है, और अज़ीम बल्कि फ़रीदा है, इसको अल्लाह ताला हमें अदा करने की तौफ़ीक अता फ़रमाए।
मैं सिर्फ़ इतना ही चाहूँगा कि हमारी इस महफ़िल मजलिस की क्या अज़मत है, क्या फ़ज़ीलत है, ताकि उसका भी हमें अंदाज़ा हो कि हम जहाँ बैठे हैं और जिस मक़सद के लिए बैठे हैं, इसमें हमको क्या हासिल हो रहा है। नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फ़रमान है: भी कुछ लोग अल्लाह के किसी घर यानी मस्जिद में बैठते हैं अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए। और अल्लाह का ज़िक्र हमारे यहाँ आम कांसेप्ट यह है कि वह सुभान अल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह कहना है। अल्लाह का सबसे बड़ा ज़िक्र क्या है? वह कुरआन है। और कुरआन को सीखना है, उसका इल्म हासिल करना है। अल्लाह के दीन को सीखना, दीन का इल्म हासिल करना। अल्लाह फ़रमाता है: "बे शक हमने ही ज़िक्र नाज़िल किया और हम ही इसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं।" वो ज़िक्र कौन सा है? कुरआने करीम है, आसमानी वही जो है। यह है सबसे बड़ा ज़िक्र। और बाकी तस्बीहात भी सभी उसी अकार का हिस्सा हैं।
तो आप समझते हैं कि जब भी कुछ लोग अल्लाह के किसी घर, मस्जिद में, कुरआने करीम को, अल्लाह के ज़िक्र को, वही को सीखने-सिखाने के लिए बैठते हैं, तो उनको पाँच बड़े नवाब मिलते हैं। क्या नवाब हैं?
पहला: इलाह नज़ल सकीना। उनके ऊपर अल्लाह की तरफ़ से सुकून, इत्मीनान नाज़िल होता है। आज अक्सर बहुत से लोगों को डिप्रेशन, तरह-तरह की मुश्किलात, तरह-तरह की बीमारियाँ, उसका सबसे बड़ा हल जो है वह यह सकीना है जो अल्लाह की तरफ़ से नाज़िल होती है। और इंशाअल्लाह अल्लाह के लिए ख़ालिस होकर बैठें और आपके दिलों को देखिए कैसे नूर हासिल होता है।
दूसरा बड़ा इनाम क्या है? नज़्ज़लत रहमत। अल्लाह ताला की रहमत उन पर छा जाती है। रहमत अल्लाह की रहमत उनको मिलती है। अल्लाह की रहमत का मिल जाना इंसान के लिए अल्लाह का बहुत बड़ा इनाम है। जब अल्लाह की रहमत मिल जाती है, अल्लाह की तरफ़ से हर तरह की मदद, हर तरह की नुसरत, हर तरह की वो चीज़ जो बंदे को चाहिए है, वह हासिल हो जाती है, दुनिया में भी, आख़िरत में भी।
तीसरा इनाम क्या है? मलाइका। अल्लाह के रहमत के फ़ज़ल से कि जिनका काम ही इस तरह की महफ़िलों, मजलिसों की तलाश होता है, वो इस तरह की महफ़िल, मजलिस का घेरा कर लेते हैं। इस तरह की महफ़िल, मजलिस का घेरा कर लेते हैं रहमत के फ़रिश्ते। और इस क़दर जमा होते हैं, हत्ता कि आसमान तक जा पहुँचते हैं। तो रहमतों के फ़रिश्ते इस तरह की महफ़िलों की तलाश में हों और हमारा घेरा किए हों, सिर्फ़ इस वजह से कि यहाँ पर अल्लाह के दीन को सीखा-सिखाया जा रहा है। इंसान के लिए कितना बड़ा इनाम है, कितना बड़ा एज़ाज़ है।
चौथा इनाम क्या है? ज़िक्रुल फी अर्श। हम गुनाहगार ज़मीन पर बैठे हैं, लेकिन इस वक़्त हमें नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के फ़रमान में कुछ शक नहीं है, और ना होना चाहिए। आपके फ़रमान के मुताबिक़ अल्लाह ताला आपका ज़िक्र अर्श पर कर रहा है। अल्लाह ताला आपका ज़िक्र अर्श पर कर रहा है। और ज़िक्र कौन सा ज़िक्र होते हैं? बादशाह भी किसी का नाम लेता है, किसी अच्छाई से, उसके किसी कारनामे से, उसके लिए बहुत बड़ी एक शरफ़ और एज़ाज़ होता है कि बादशाह ने मेरे अपने दरबार में मेरी तारीफ़ की। और बाज़ औक़ात बादशाह ही किसी का नाम लेता है किसका? किसी मुजरिम का, समझें ना। अल्लाह ताला भी अपने बंदों के नाम लेता है, लेकिन यहाँ पर नाम लेने का अंदाज़ क्या है? वो अंदाज़ तारीफ़ों का, बड़ाई का, बल्कि अल्लाह ताला फ़ख़्र करता है अपने इन बंदों पर। तो इसलिए हमें यक़ीन है कि इस वक़्त अल्लाह ताला अर्श पर अपने मुक़र्रर फ़रिश्तों के सामने आपका ज़िक्र ख़ैर कर रहा है, आपकी तारीफ़ें कर रहा है। और कायनात के मालिक का अपने बंदे की तारीफ़ करना, उसका नाम ही ले लेना किसी ख़ैर के साथ, भाइयों, इतनी बड़ी बात है कि हम उसका अंदाज़ा नहीं कर सकते।
एक हदीस में आता है, नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: एक सहाबी हैं, उबै बिन काब, उलमाए सहाबा में से हैं, कुरआन के बहुत बड़े आलिम थे, हाफ़िज़ थे। तो आप फ़रमाते हैं कि मुझे अल्लाह ने हुक्म दिया है कि मैं सूरत अल-बकरा, तीसरे पारें की सूरत है, कि मैं यह सूरत तुमको पढ़कर सुनाऊँ। अब यह कोई ताज्जुब की बात नहीं थी कि नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम कोई अल्लाह की वही, अल्लाह की तरफ़ से आने वाली सूरत लोगों को सुनाएँ। आपका हमेशा यही काम था, जो भी वही नाज़िल होती, आप लोगों को सुनाते। लेकिन यहाँ पर जो ख़ास चीज़ क्या है? तो उबै पूछते हैं: आसमानी आवाज़ से अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल कि अल्लाह ने मेरा नाम लेकर आपको हुक्म दिया है। ज़रा गौर से सुनिए, ये कितना बड़ा इनाम है, कितनी बड़ी इज़्ज़त, अफ़ज़ाई है इस महफ़िल में बैठने वालों के लिए। आप फ़रमाते हैं: आप पूछते हैं, अल्लाह ने मेरा नाम लेकर आपको हुक्म दिया है, आप मुझे ये सूरत सुनाएँ। आप कहते हैं: हाँ, अल्लाह ने आपका नाम लिया। तो उबै बिन काब ख़ुशी से रोते हैं कि मैं कौन होता हूँ कि रब्बे कायनात मेरा नाम ले? भाइयों, हम गुनाहगार कौन होते हैं कि रब्बे कायनात अर्श पर हमारी तारीफ़ें करे? हमारे नाम लेकर। इस मुक़ाम को, और इस इज़्ज़त को देखने की, समझने की, और जानने की ज़रूरत है।
चौथा इनाम ये। और पाँचवाँ और सबसे बड़ा इनाम क्या है? कि जब ये महफ़िल मजलिस ख़त्म होती है, अल्लाह ताला फ़रिश्तों को गवाह बनाकर कहता है कि गवाह हो जाओ कि मैंने उनको बख़्श दिया है, इन बैठने वालों को माफ़ कर दिया है। और बाद में आता है कि ये फ़रिश्ते जो महफ़िल मजलिस का घेरा किए होते हैं, वही अल्लाह के पास पहुँचते हैं। अल्लाह उनसे पूछता है: कहाँ से आए हो? तो बताते हैं: इस तरह से फ़लाँ महफ़िल मजलिस में तेरा ज़िक्र होता था, तेरे कुरआन को सीखा-सिखाया जाता था, तेरे दीन को पढ़ा-पढ़ाया जाता था। अल्लाह फ़रमाता है: कि गवाह हो जाओ कि मैंने उनको बख़्श दिया है।
अच्छा, आगे एक मज़े की बात क्या है? कि फ़रिश्ते कहते हैं कि वहाँ पर कोई ऐसा आदमी भी आ गया था कि जिसका मक़सद वो महफ़िल मजलिस नहीं था। आप यहाँ पर दर्स के लिए आए हो, आपका कोई दोस्त आपको मिलने आ गया, उसको पता चला कि आप फ़लाँ मस्जिद में, वो भी यहाँ पर आ गया। उसका यहाँ पर आने का मक़सद इल्म हासिल करना नहीं था, आपको मिलने आया है। तो फ़रिश्ते कहते हैं: वो भी आदमी था, उसका क्या है? अल्लाह फ़रमाता है: उलै ला जलीस, ये ऐसे नेक़-बख़्त लोग हैं कि जिनके साथ बैठने वाला भी बदबख़्त नहीं होता। मैंने उसको भी बख़्श दिया। ये पाँच बड़े इनाम सिर्फ़ आपको बैठने से ही मिल जाएँगे। आपको कुछ भी समझ ना आए, ऐसे तो इंशाअल्लाह समझेंगे, बहुत कुछ। कोई भी आपको इल्म हासिल ना हो, लेकिन इंशाअल्लाह हम इल्म हासिल करेंगे। लेकिन सिर्फ़ बैठने का ही।
इसी तरह आपको एक मज़े की बात सुनाते चलें। हमारे शेख़ मोहम्मद बिन सालेह उस्मानी का नाम तो आपने सुना होगा। इस जमाने के बहुत बड़े फ़कीह गुज़रे हैं। तो उनकी महफ़िल मजलिस में जो आप बैठे हैं, इस तरह तालीम बैठे होते थे। तो बा-बूढ़े, इस तरह के आम किस्म के लोग आकर बैठ जाते। अब वो शेख़ साहब के इल्म, उनके दर्स, बड़े इल्मी दर्स होते, उनको समझने के लिए सही एक ताम चाहिए। अच्छा, बात बैठ जाते और बैठे-बैठे सो जाते। और शेख़ साहब का अंदाज़ था कि जब किसी को देखते सो रहा है, उससे सवाल कर लेते। और हम भी इंशाअल्लाह आपसे सवाल किया करेंगे। एक बूढ़े को देखा कि वो उग रहा था, सो रहा था, तो उससे पूछा कि तुम यहाँ पर आए हो? बल्कि पूछा: हमने क्या बताया? उसको नहीं पता था, क्या बोला है? तो सो रहा था। शेख़ कहने लगे: तुम यहाँ पर आए हो, बैठे सो रहे हो? कहते: मैं इसलिए बैठा हूँ ताकि मुझे ये नवाब मिल जाएँ। इल्म मुझे हासिल नहीं होगा, आपका इल्म जिस ऊँचे-बुलन्द मेयार का है, मुझे समझ नहीं आने वाला, लेकिन इसलिए बैठा हूँ कि ताकि मैं, मैं भी इस मज़लिस महफ़िल में बैठने के साथ ये नवाब पा सकूँ। शेख़ साहब रोने लगे कि हमने इसको सिखाना चाहा था, लेकिन इसने हमें सिखा दिया। कहने का मक़सद भाइयों, ये महफ़िल बड़ी अज़ीम है। हमें इसके लिए आते हुए भी इसी तरह की कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए। बल्कि आपका आना ही बहुत बड़ा इनाम है। इस मजलिस में आने का ही आपको मुकम्मल अल्लाह के यहाँ मक़बूल हज्ज का सवाब मिल जाएगा। और फ़रिश्ते आपके लिए दरुद बिछाने वाले होंगे। और क्या-क्या नवाब हैं और यहाँ पर बैठकर जो आपको हासिल होगा।
इंशाअल्लाह हम अल्लाह से दुआ करते हैं, अल्लाह ताला हमें इस मैदान में, इस रास्ते पर जो है, पूरे साबित्कदमी से चलने की तौफ़ीक दे और अज़ीम हिम्मत के साथ इल्म हासिल करने की तौफ़ीक दे।
तो आज हम जो आपका सा सब्जेक्ट शुरू करने वाले हैं, आपने शायद शेड्यूल देखा होगा, हमारे मज़ामीन क्या रहेंगे? एक तो हमारे पास तफ़्सीर की क्लास रहेगी। छोटी सूरतों की तफ़्सीर इंशाअल्लाह पढ़ाई जाएगी। इसी तरह अक़ीदा, तौहीद, उसके बारे में जो बुनियादी मसाइल एक मुसलमान को जिनकी ज़रूरत होती है, वो इंशाअल्लाह लिए जाएँगे। इसी तरह नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की सीरत, जिसको हम थोड़ा अगले सेमेस्टर तक इंशाअल्लाह डिले करेंगे। और दावत इला अल्लाह, अल्लाह के दीन की दावत देने की ज़िम्मेदारी मुसलमान कैसे पूरी कर सकता है? और एक चौथा सब्जेक्ट मैं आपसे इंशाअल्लाह आपके साथ चलूँगा, वो किस चीज़ का है? वो फ़िक़ह इबादात के तहत और नमाज़, जो हमारी रोज़मर्रा के मसाइल में से, बल्कि हमें कम से कम पाँच मर्तबा तो इसकी ज़रूरत पड़ती है। पाँच मर्तबा कम से कम हमें इसकी ज़रूरत पड़ती है। इस अज़ीम तारीन जो इबादत है, उसमें हमारे यहाँ क्या-क्या कमियाँ, क़ुतरियाँ हैं, क्या-क्या ख़राबीयाँ, कमज़ोरियाँ हैं, उसको सही करने के लिए और नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का मसनून तरीक़ा, इन चीज़ों को मालूम करने के लिए इंशाअल्लाह हमारी आपके साथ मजलिस रहेगी।
तो यह है। तो हम पहले इंशाअल्लाह तह़रीरी मसाइल लेंगे। तह़रीरी से मुराद यानी जो भी कुरआन और सुन्नत में, इससे पाकीज़ा से, इन चीज़ों से मुताल्लिक़ चीज़ें हैं, इंशाअल्लाह हम वो लेंगे। उसके बाद इंशाअल्लाह अल्लाह के फ़ज़्ल व तौफ़ीक से नमाज़ के मसाइल शुरू करेंगे। इसमें हमारा तरीक़ा जो रहेगा, सबसे पहले और बुनियादी चीज़, अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फ़रमान क्या है? हर मसले में मेरी राय क्या है? फ़लाँ क्या कहता है? इससे-इससे दूर हटकर, अल्लाह का फ़रमान क्या है? नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फ़रमान क्या है? कि इन चीज़ों को करते हुए, अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की तरफ़ से हमारे लिए क्या तालीमात हैं, उसकी कोशिश की जाएगी। जिसमें किताबी कलाम और हमारे फ़िक़्ह मसाइल और तरह-तरह के ख़िलाफ़ात उनसे दूर रहकर। इसी तरह हमारे इस प्रोग्राम के अंदर जो ख़ास तौर पर जिस चीज़ का एहतमाम किया जाएगा, कि कोशिश होगी कि मसाइल को आसान से आसान तरीक़े से पेश किया जाए ताकि हर सुनने वाला उसको समझ सके। लेकिन फिर भी बाज़ औक़ात क्योंकि सभी का लेवल एक जैसा तो नहीं है, माशाअल्लाह उम्र के लिहाज़ से भी, इल्मी लिहाज़ से भी सभी लोग बैठने वाले एक जैसे नहीं हैं। तो मुमकिन है कि बाज़ औक़ात किसी के लिए वो मालूमात उसको मुश्किल लगे या उसको किसी बात की समझ ना आए। उस हवाले से आपके लिए इंशाअल्लाह भी थोड़ी देर के बाद, आज ही इंशाअल्लाह ग्रुपिंग की जाएगी। हर ग्रुप के ऊपर एक लीडर होगा कि जिस लीडर के ज़रिए से आप उन चीज़ों को मज़ीद समझने में आप आसानी होगी। और अगर वो भी ना समझा सका, फ़र्ज़ करो, तो बड़े सीनियर लोग भी मौजूद हैं और हम भी आपके साथ हैं। मक़सद यह है कि हम यहाँ पर अल्लाह के दीन को सीखें और समझें। इसी अज़ीम इरादे के साथ यहाँ पर आए और बैठे और इसी इरादे के मक़सद को लेकर हमारी कोशिश होगी कि मसाइल को, इन चीज़ों को समझने की। तो ये बुनियादी चीज़ है कि जो हम आपके सामने गोश गुज़ार करना चाहते थे।
तो हमारा जो सब्जेक्ट है, जिस बताया है, फ़िक़ह इबादात, इबादत की फ़िक़ह, तो उसमें फ़िक़ह का माना क्या है? फ़िक़ह का लफ़्ज़ सुनते रहते हो, वैसे उर्दू में हमारे आमतौर पर फ़िक़ह का नाम, फ़िक़ह का केफ़र जबर पढ़ते हैं, लेकिन जो सही फ़िक़ह है, काफ़ के ऊपर जज़्म है। तो फ़िक़ह का माना होता है: समझ-बूझ, किसी चीज़ को गहरे अंदाज़ से समझना, किसी चीज़ को गहरे तौर पर उसको समझना। यह होता है फ़िक़ह। आगे और शरई तौर पर, इलाही तौर पर फ़िक़ह का माना देखिए। लुग़वी तौर पर हमने बताया है: बारीक़ अशिया को समझना, उन पर ग़ौर नज़र डालना, एक है। वैसे आदमी को मोटे-मोटे अंदाज़ से समझ के चल पड़े, लेकिन एक गहरे अंदाज़ से किसी बात को समझना, डीटेल में किसी चीज़ को समझने की कोशिश करना, ये है फ़िक़ह का लुग़वी माना। और शरई तौर पर फ़िक़ह किसको कहते हैं? हमारे यहाँ हदीस है, तफ़्सीर है, सीरत है, फ़िक़ह है। अरे, ये पता चला मुख़्तलिफ़ चीज़ है, है ना? तो इस मुख़्तलिफ़ तारीफ़ के लिहाज़ से इसकी तारीफ़ क्या है? कि शरईयत के अमली अक़ाम को तफ़्सील, दलीलों से मालूम करना। शरईयत के काम को, शरईयत के, इसका मतलब कि मेडिकल नहीं है, साइंस नहीं है, ये शरई मसाइल है जिसका मुताल्लिक़ हमारे दीन से, शरईयत से है। और दूसरा लफ़्ज़ आप पढ़ रहे हैं, अमली अक़ाम। अमली अक़ाम का माना, कुछ वो चीज़ है जिसका ताल्लुक़ ईमान से, अक़ीदत से, अक़ीदे से। लेकिन यहाँ पर अमली अक़ाम से मुराद यानी हमारे प्रैक्टिकल काम: नमाज़, वज़ू, रोज़ा, इस तरह की चीज़, अमली काम। इनको तफ़सील, दलीलों के साथ, यानी इन मसाइल को जानना है, दलील के साथ।
अच्छा, बहुत सी वो चीज़ें हैं जो अभी भी आपको मालूम होंगी, बग़ैर पढ़े भी, बग़ैर आपके पढ़े भी, बग़ैर सीखे भी आपको मालूम है, वज़ू के हवाले से। वज़ू का फ़र्ज़ कर लीजिए, मुझे नहीं यक़ीन कि बैठने वालों को किसी को वज़ू ना आता हो। सभी को वज़ू का तरीक़ा आता होगा, समझें ना? लेकिन अगर किसी से पूछ लिया जाए कि वज़ू का ये तरीक़ा, इसकी दलील क्या है? और यहाँ पर आकर सभी रुक जाएँगे, है ना? ऐसा आप वज़ू में कुल्ली करते हो, नाक में पानी डालते हो, क्या दलील है इसकी? वज़ू में आप चेहरा धोते हो, चेहरा कहाँ से कहाँ तक है? क्या दलील उसकी? तो कहने का मक़सद बहुत सी वो चीज़ें हैं कि जो आप पहले से ही जानते होंगे। नमाज़ के मसाइल में भी इसी तरह से। और कई ऐसी भी चीज़ें होंगी जो मुमकिन है आपके इल्म में ना हों। तो हम इंशाअल्लाह यहाँ पर वो भी चीज़ें लेंगे जो आपके इल्म में नहीं हैं और वो भी जो आपके इल्म में हैं, लेकिन इल्म में जो हैं उनको लेने का मक़सद एक तो मक़सद उसकी दलीलों को जानना कि ताकि हमें पता चले कि हम जो कर रहे हैं, कुरआन और सुन्नत में इसके बारे में हमें क्या तालीम दी गई है। बहुत बड़ा फ़र्क़ है भाइयों, एक आदमी नमाज़ पढ़ता है, नमाज़ कैसे पढ़ रहा है? जैसे लोगों को देखा था, कुछ पता नहीं, मैं जो कर रहा हूँ सही है या ग़लत है, समझें? दुनियावी तौर पर मिसाल लीजिए, एक आदमी जा रहा है, लोगों के पीछे जा रहा है, किधर जा रहा है? कुछ-कुछ पता नहीं, कुछ लोग जा रहे हैं, मैं भी जा रहा हूँ। हमारे बहुत से दुनिया के काम इस तरह के होते हैं। अफ़सोस है कि दीन के अंदर भी हमारी कई चीज़ें इसी तरह से चल रही हैं कि लोगों को देखा, कुछ करते हैं, हम भी कर रहे हैं। वो चीज़ कहाँ तक सही है, कहाँ तक ग़लत है, वाक़ई सुन्नत के मुताबिक़ है या नहीं है, हमें उसका पता नहीं होता। एक तरफ़ ये आदमी के जो करने को तो कर रहा है, कोई नेकी, लेकिन उसको अपनी हुई नेकी का, की जाने वाली नेकी का पता नहीं कि वो क्या है। लेकिन एक आदमी कुरआने करीम की आयत पढ़ता है, फ़र्ज़ करो वज़ू के हवाले से ही, सूरत माईदा की आयत में अल्लाह फ़रमाता है: "लोगों, जो ईमान लाए हो, जब तुम नमाज़ के लिए खड़े हो तो ये करो, वो करो।" सारे अल्लाह ने अक़ाम बयान किए हैं। कुरआने करीम की आयत उसके सामने है, उसकी नज़र में है। अल्लाह ने मुझे वज़ू करने का हुक्म कैसे दिया है? मज़ीद नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के प्रैक्टिकल वज़ू करने का तरीक़ा उसके सामने है कि नबी करीम वज़ू कैसे करते थे। तो दोनों के वज़ू में बहुत बड़ा फ़र्क़ होगा। एक आदमी जो देख दिखाकर जिसने वज़ू कर किया है और दूसरा जिसने कुरआन और हदीस की दलीलों को समझकर किया है। तो ये है बहुत बड़ा फ़र्क़। इसलिए हम इंशाअल्लाह यहाँ पर वो मसाइल भी बयान करेंगे जिसका आपको पहले से इल्म है लेकिन उसकी दलील क्या है? ताकि हमको पता चले कि हम वाक़ई कुरआन और सुन्नत को फ़ॉलो कर रहे हैं। और बहुत सी ऐसी भी चीज़ें आएंगी कि जिसका शायद आपको इल्म ना हो। और तीसरी एक चीज़ ये भी बात, वो चीज़ जिसका इल्म तो है और करने को कर भी रहे होते हैं लेकिन मुमकिन है उसको करने का अंदाज़ सही ना हो, उसमें कोई ग़लती हो। और होता है ऐसा। वो आपके हदीस कई बार सुनाते रहते हैं। पहले भी सही बुख़ारी की हदीस है कि नबी के सामने एक आदमी ने नमाज़ पढ़ी। आपने उसको क्या फ़रमाया? कि लौट के नमाज़ पढ़ो, तुमने नमाज़ नहीं पढ़ी। ये नहीं फ़रमाया: तुम्हारी नमाज़ हुई नहीं, तुम्हारी नमाज़ सही नहीं, आप: तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं। उसने क़याम किया, रुकूँ किया, सजदा सजदा कुछ किया, लेकिन आप क्या फ़रमाते हैं? तुमने नमाज़ पढ़ी नहीं। उसने फिर उसी तरह से पढ़ ली, तीसरी बार फिर उसी तरह से पढ़ ली। और बार-बार आपको कहते हैं, उसको फ़रमाते हैं: लौट के नमाज़ पढ़ो, तुमने नमाज़ नहीं पढ़ी। इससे मालूम क्या हुआ? बाज़ औक़ात आदमी अपने तौर पर कोई नेकी कर रहा होता है, लेकिन उसमें कोई ग़लती होती है कि जिस वजह से वो नेकी होती ही नहीं। वो नेकी समझी नहीं जाती, क़बूल होना तो बाद की बातें। और ये भाइयों, बहुत अहम चीज़ है। हमने साबिक़ा जो हमारी मुलाक़ात हुई थी, उसमें फ़िक़ह की फ़ज़ीलत के बारे में, उस पर इस मसअले पर हमारे यहाँ कई इस तरह की चीज़ें हम कर रहे होते हैं कि जिसको देख दिखाकर कर रहे हैं, लेकिन उसमें अंदाज़ ग़लत होता है और अल्लाह के यहाँ वो इबादत समझी नहीं जाती, इबादत क़बूल नहीं होती। इससे हमें, तो हम फ़िक़ह की तारीफ़ बयान कर रहे थे, कि शरईयत के अमली अक़ाम को जो है, तफ़सील, दलीलों से मालूम करना, दलील के साथ मालूम करना। ये चीज़ कैसे है? ये तफ़सील दलील कौन सी है? वो कुरआन है और सुन्नत है। और क्या है? इजमा है और क़ियास है। चार चीज़ें हैं: कुरआन, हदीस, इजमा। इजमा क्या होता है? कुरआन, हदीस को सभी जानते हैं कि कुरआन से दलील हो या हदीस, आपका फ़रमान हो या आपका फ़ैसला हो। और इजमा क्या होता है? इजमा होता है कि उम्मत के, पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा के उलमा किसी एक मसले पर सभी का इत्तेफ़ाक़ हो जाए, ये मसला इस तरह से है। और ख़सूसन सहाबाए कराम, ताबईन, उस दौर में तो ये इजमा है। और बाज़ औक़ात ना कुरआन से हदीस दलील मिलती है ना हदीस से मिलती है और ना उलमा का इजमा होता है, वहाँ पर क्या है? कि नया मसला आ गया। आज के दौर में बहुत से मसले नए आ रहे हैं। हर चीज़ में आपके कानून में तरह-तरह की नई चीज़ आ रही है और भी बहुत सी उसमें नई चीज़ आ गई। अब उसको फिर क्या किया जाता है? क़ियास कहते हैं क्या? सराई करना, क्या सराई? क्या सराई क्या होता है? एक तो हमारे यहाँ आम लोगों की क्या सराई है? ये एक इल्मी, केम के मेन्स वो क्या है कि कुरआन और हदीस की रोशनी में उस मसले का हुक्म लेना। आपके जमाने में शराब होती थी, शराब को हराम किया गया, क्यों हराम किया गया? क्योंकि पीने वाले के अकल पर पर्दा पड़ता है, लफ़्ज़ बोलता है, बकता है और उल्टे ग़लत काम करता है, समझें ना? अच्छा, आज के जमाने में शराब की जगह पर और बहुत सी चीज़ें आ गईं, मसलन अफ़ीम, ये ड्रग्स, सभी आपके जमाने में नहीं थीं, आज के दौर में हैं। अब कोई कहे कि क्या दलील है कि हीरोइन हराम है? क्या कुरआन में कहीं लिखा है हीरोइन हराम है? हदीस है आपके पास? यहाँ पर फिर हम क्या करते हैं? कि देखते हैं इस हीरोइन के नुक़्सान क्या हैं, इसकी क्या तासीर है, इसका क्या असर है? तो जब देखते हैं कि वही असर जो शराब का है, उससे बढ़कर इसका असर हमें मालूम होता है, तो क्या मालूम हुआ? जिस तरह शराब हराम है, ऐसे ही हीरोइन भी हराम है, ऐसे ही ड्रग्स भी हराम हैं। कहने का मक़सद कि बाज़ मसाइल ऐसे होते हैं कि जो हर जमाने में नए-नए पैदा होते रहते हैं, लेकिन चूँकि दीन इस्लाम क़यामत तक के लिए है, तो कुरआन और सुन्नत में उसके सभी के रूल्स मौजूद हैं। मसला तो नया है लेकिन उसका रूल मौजूद है कि जिससे उलमा उसका हुक्म मालूम कर लेते हैं कि इसका हुक्म क्या होना चाहिए। तो ये हैं चार दलीलें। दलील कौन-कौन सी है? कुरआन से, हदीस से, और उलमा के इजमा, और चौथी चीज़ क़ियास से। तो ये है फ़िक़ह। लुग़वी तौर पर किसी बातचीत को गहराई से समझना और इस्लाही या शरई तौर पर उसको, किसी मसले को, किसी शरई हुक्म को, किसी शरई हुक्म को उसकी दलील के साथ मालूम करना, जो दलील कुरआन, सुन्नत से। तो ये है फ़िक़ह की तारीफ़।
उसके बाद हम थोड़ा सा आगे मुकम्मल कर लें। टाइम तो हमारा मुकम्मल हो गया है आज का। हमने ज़िक्र किया है कि हमारा सब्जेक्ट जो है, फ़िक़ह इबादात है। फ़िक़ह इबादात, इबादत की समझ-बूझ। इबादत काम, इबादत क्या है? इसमें आपके यहाँ लिखा हुआ है दो चीज़ें: इबादात या वो मसाइल, अक़ाम जिसका ताल्लुक़ इबादात से है। और इबादत जब ज़िक्र होता है तो उसमें तह़रीरी मसाइल हैं: नमाज़ है, रोज़ा है, ज़कात है, हज्ज है और छठी चीज़, जिहाद। तो ये वो सारी चीज़ें हैं कि जो महज़ इबादत हैं, जो हैं ही इबादत। वैसे तो आप खाना भी खाते हो, बाज़ औक़ात वो इबादत बन जाता है जब आपकी नियत कोई दीन का काम करना हो, समझें ना? आप सोते हो, आपकी वो भी सोना भी इबादत बन सकता है आपकी अगर नियत अच्छी हो। लेकिन वो बजाते हुए खुद इबादत नहीं है। तो बजाते हुए खुद जो चीज़ इबादत है, क्या है? वज़ू, नमाज़, रोज़ा, हज्ज, ज़कात और जिहाद। तो ये हमारा यही सब्जेक्ट रहेगा। इंशाअल्लाह फ़र्स्ट सेमेस्टर में हम ये दो चीज़ें लेंगे, सिर्फ़ वज़ू और नमाज़, फ़र्स्ट लेवल में और दूसरे लेवल में बाक़ी चीज़ों को हम मुकम्मल करेंगे।
फ़िक़ह मामलात, एक बात के साथ दूसरी चीज़ होती है, फ़िक़ह मामलात। मामलात के माने, हमारे जो आम दुनिया के मामलात हैं: आपका बिज़नेस है, समझें ना? आपकी घर के मामलात हैं, शादी-ब्याह है, निकाह-तलाक़ के मसाइल हैं, समझें ना? ये क्या हैं? हमारे मामलात, क्या हलाल है, क्या हराम है? इसका ताल्लुक़ किससे है? खाने-पीने से, पहनने से, इन चीज़ों के इस्तेमाल से, उसमें क्या हलाल, क्या हराम है? ये मामलात के अंदर आता है। तो ये फ़िक़ह मामलात एक दूसरा चैप्टर है, बहुत बड़ा, लेकिन हमें इल्म होना चाहिए। अल्लाह के फ़ज़्ल से दीन इस्लाम वो पूरे के पूरे दीन का, पूरे के पूरी ज़िन्दगी पर हावी है। जिस तरह नमाज़ में एक मुसलमान की रहनुमाई करता है कि नमाज़ कैसे पढ़ना है, ऐसे ही बिज़नेसमैन की भी गाइड करता है कि तुमने अपना बिज़नेस कैसे करना है, समझें ना? ऐसे ही सियासत के मैदान में कि हमारी लोगों के साथ डीलिंग कैसी हो, हमारे फ़ॉरेन अफ़ेयर्स में, हमारे इंटरनल त