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प्यारे दोस्तों, आज की यह कहानी बहुत ही अनोखी और दिलचस्प है। यह कहानी एक ऐसे बादशाह के बारे में है जिसने अपने कम अक्ल शहजादे की शादी किसी इंसान से नहीं बल्कि कोह-ए-कौफ की एक हसीनो जमील परी से कर दी।
आखिर बादशाह ने ऐसा क्यों किया? और वो कौन सा इंसानी आवाज में बोलने वाला तोता था जिसने बादशाह को आकर क्या कहा कि बादशाह अपने शहजादे बेटे की शादी कोहे-ए-काफ की शहजादी से कराने पर मजबूर हो गए। फिर शादी के बाद कोहे काफ की शहजादी शहजादे को अपनी दुनिया यानी कोहे काफ ले गई। फिर शहजादे के साथ शहजादी ने जो कुछ किया उसे सुनकर आप यकीनन हैरान रह जाएंगे। इसलिए आप कहानी को आखिर तक जरूर पढ़िएगा तभी आपको कहानी पूरी तरह समझ में आएगी। मुझे उम्मीद है कि आपको यह कहानी सुनकर बहुत मजा आएगा। तो चलिए अब शुरू करते हैं।
सैकड़ों साल पहले की बात है। सल्तनत बाबुल पर एक बादशाह हुकूमत करता था जिसका नाम सुल्तान शहरियार था। लेकिन आवाम में वो तोतों वाला बादशाह के नाम से मशहूर था क्योंकि उसे तोतों से बेहद लगाव था। उसके पास सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों अक्साम के तोते थे। उसने तोतों के लिए एक अलग महल बनवाया हुआ था जिसे कसरे तोता कहा जाता था। सुल्तान शहरियार के वजीर और मुलाजिम पूरी दुनिया में घूमते रहते और जहां भी उन्हें कोई नई किस्म का तोता मिलता वो बादशाह के लिए ले आते और बादशाह खुश होकर उन्हें भारी इनाम और इकराम से नवाजता था। बादशाह सलामत अक्सर अपना ज्यादा वक्त कसरे तोता में गुजारता था। लेकिन क्योंकि वह अपनी सल्तनत का भी बेहद ख्याल रखता था। इसलिए लोगों को उससे कोई शिकायत ना थी। बादशाह को जब भी शाही जिम्मेदारियों से फर्सत मिलती वो कसरे तोता में ही वक्त गुजारता था।
आज भी वो कसरे तोता में घूम फिर रहा था और वहां के मुलाजिमों को तोतों की देखभाल और खुराक के बारे में हिदायत दे रहा था कि एक गुलाम ने जल्दी से करीब आकर झुककर सलाम किया। बादशाह ने उसकी तरफ सवालिया नजरों से देखा। गुलाम ने अर्ज किया बादशाह सलामत मुल्क का एक शख्स एक आला नस्ल का तोता लेकर हाजिर हुआ है। यह सुनकर बादशाह का चेहरा खुशी से खिल उठा। बादशाह ने फौरन हुक्म दिया उसे हाजिर किया जाए। गुलाम सलाम करके वापस मुड़ गया और बादशाह सलामत अपने खास कमरे की तरफ बढ़ गए।
थोड़ी देर बाद गुलाम एक बुजुर्ग शख्स को लेकर बादशाह के खास कमरे में पहुंच गया। उस आदमी के हाथ में एक बड़ा सा पिंजरा था जो सुर्ख रंग के कपड़े से ढका हुआ था। उस आदमी ने अंदर दाखिल होते हुए इंतहाई मुअबाना अंदाज में सलाम किया। बादशाह सलामत ने पूछा कहां से आए हो तुम और क्या नाम है तुम्हारा? उस आदमी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, बादशाह सलामत, मैं मुल्क शाम का रहने वाला हूं। मेरा नाम ख्वाजा अब्दुल्लाह है। मैं आपके लिए एक तोहफा लेकर हाजिर हुआ हूं। मुझे यकीन है कि यह तोहफा आपको बेहद पसंद आएगा।
बादशाह सलामत ने कहा, "क्या तोहफा है पेश किया जाए?" तो उस आदमी ने पिंजरे से सुर्ख कपड़ा हटा दिया। बादशाह यह देखकर हैरान रह गया कि पिंजरे में वाकई एक खूबसूरत तोता मौजूद था। उस तोते के परम मोड़ से भी ज्यादा हसीन और सात रंगों के थे। यह वाकई इंतहाई खूबसूरत और नायाब तोता था। बादशाह ने इंतहाई हैरत से पूछा। बहुत खूब। ऐसा तोता तो हमारे पास भी नहीं है। कहां से पकड़ा है इसे?
बादशाह सलामत। यह कोहे काफ का तोता है। इसका नाम जीरक है। बादशाह सलामत यह इंसानों की जुबान में भी बात करता है। और यह इंतहाई समझदार और अक्लमंद तोता है। उस आदमी की बात सुनकर बादशाह की हैरत में मजीद इजाफा हो गया। बादशाह ने हैरत भरे लहजे में कहा अच्छा हैरत है। लेकिन फिर यह बोलता क्यों नहीं?
तोते ने अचानक इंसानी आवाज में कहा बादशाह सलामत आपका रोब मुझ पर इतना छा गया है कि मुझसे बोला ही नहीं जा रहा। आप तो वाकई एक अजीम और बारोब शख्सियत के मालिक हैं। उसकी आवाज दिलकश और सुरीली थी और वह बिल्कुल साफ इंसानी आवाज में बोल रहा था। बादशाह ने कहा, बहुत खूब बहुत खूब। यह वाकई बेहतरीन तोहफा है। जेरक तोता वाकई मेरे लिए एक नायाब तोहफा है।
बादशाह सलामत ने आगे बढ़कर पिंजरा खोला और तोते को निकालकर अपने हाथ पर बैठा लिया। बादशाह सलामत ने उसके परों पर मोहब्बत से हाथ फेरते हुए कहा, जीरक तोते क्या तुम हमारे पास रहोगे? तोते ने जवाब दिया, "आप बहुत अच्छे बादशाह हैं, इसलिए मैं आपके पास ही रहूंगा।" बादशाह यह सुनकर बहुत खुश हुआ और उसने तोता लाने वाले को इतना इनाम दिया कि वो खुशी-खुशी वापस चला गया। बादशाह ने कहा, "मैं तुम्हें कस-ए तोता में रखने के बजाय अपने पास रखूंगा।" इसके बादशाह सलामत तोते को लेकर कस- ए तोता से शाही महल में आ गया।
यहां जब मल्लिका, शहजादी और शहजादों को इस तोते के बारे में मालूम हुआ तो वह उसे देखने और उससे बातें करने लगे। जिरक तोता भी उनसे मीठी-मीठी बातें करने लगा। वो सब उससे बेहद मानूस हो गए। बादशाह ने तोते से पूछा, तुम्हारा नाम जिरक किसने रखा? तोते ने कहा, बादशाह सलामत। मेरा नाम कोहे काफ की शहजादी लैला ने रखा है। मुझे वह बेहद पसंद है। मैं चाहता हूं कि उसकी शादी किसी और से होने के बजाय किसी इंसान से हो जाए। इसलिए मैं कोहे काफ से यहां दुनिया में आया हूं ताकि कोहे काफ की शहजादी के लिए कोई खूबसूरत शहजादा तलाश कर सकूं।
बादशाह ने मुस्कुराते हुए पूछा तोते हमारे चार बेटे हैं और तुमने उन्हें देख लिया है। यह सब इंतहाई अकलमंद और खूबसूरत है। क्या कोहे काफ की शहजादी की शादी इनमें से किसी के साथ हो नहीं सकती? तोते ने कहा बादशाह सलामत गुस्ताखी माफ आपके चार नहीं पांच बेटे हैं लेकिन आप चार बेटे कह रहे हैं। क्या आप अपने पांचव बेटे को अपना बेटा तस्लीम नहीं करते?
तोते की यह बात सुनकर बादशाह चौंक पड़ा और कहने लगा, अरे हां, शहजादा ज़द हमारा ही बेटा है और सबसे छोटा होने की वजह से हमें उससे बेहद प्यार है। लेकिन हमें अफसोस है कि वह बड़ा बुजदिल और डरपोक है। जरा-जरा सी बात पर डर जाता है। और फिर उसमें अकल की भी कमी है। इसलिए हमने उसका जिक्र नहीं किया था। बादशाह सलामत। अगर आप चाहे तो शहजादा ज़द की कोहे काफ की शहजादी से शादी हो सकती है।
तोते की यह बात सुनकर बादशाह बेख्तियार चौंक उठा। बादशाह ने हैरत भरे लहजे में कहा वो कैसे क्या कोहे काफ का बादशाह एक बुजदिल और कम अग्र शहजादे को अपना दामाद बनाने पर तैयार हो जाएगा तोते ने जवाब दिया बादशाह सलामत असल मसला कोहे काफ के बादशाह का नहीं है बल्कि कोहे काफ की शहजादी का है। कोहे काफ में लड़की की अपनी मर्जी से शादी होती है। अगर कोहे काफ की शहजादी रजामंद हो तो बादशाह या कोहे काफ के किसी भी देव या परिजात को कोई ऐतराज नहीं होगा। वहां इस मामले में हर शख्स अपनी मर्जी का मालिक है। तो फिर तुम्हारा क्या ख्याल है? क्या शहजादी रजामंद हो जाएगी?
तोदा बोला बादशाह सलामत आपके पास शहजादा ज़द की कोई तस्वीर होगी? हां है। क्यों? बादशाह ने चौंक कर पूछा आप वो तस्वीर मुझे दें और फिर मुझे कोहे काफ जाने की इजाजत दें। मैं कोहे काफ की शहजादी को आपके शहजादा ज़द की तस्वीर दिखाऊंगा। अगर शहजादी रजामंद हो गई तो फिर मैं आकर आपको इत्तला दूंगा और शहजादी की तस्वीर भी ले आऊंगा। इसके बाद आप शहजादे को मेरे साथ कोहे काफ जाने की इजाजत दे देना। उसके बाद ही शादी हो सकती है।
बादशाह ने हैरानी से पूछा। लेकिन तुम तस्वीर कैसे ले जाओगे? तोता बोला आप तस्वीर को मेरे गले में बांध दें। बादशाह ने कहा लेकिन को ए काफ तो बहुत दूर है। क्या तुम वहां तक पहुंच जाओगे? तोते ने जवाब दिया ऐशा सलामत। अल्लाह ताला ने मेरे परों में बेपनाह ताकत रखी है। मैं आम तोतों से तो क्या बाज से भी ज्यादा हजारों गुना तेज रफ्तार से उड़ सकता हूं। इसलिए मेरे लिए कोहे काफ जाना कोई मुश्किल नहीं।
बादशाह ने कहा अच्छा तुम्हारी वापसी कब तक होगी क्योंकि तुम्हारे बगैर हम उदास हो जाएंगे। तोता बोला आपकी इस मोहब्बत का बेहद शुक्रिया। मैं बहरहाल एक हफ्ते के अंदर वापस आ जाऊंगा। बादशाह ने गुलाम को कहकर शहजादा ज़द की एक छोटी सी तस्वीर मंगवाई और इस तोते के गले में धागे से अच्छी तरह बांध दी। फिर तोता इजाजत लेकर उड़ा और एक लम्हे में नजरों से गायब हो गया।
मगर दोस्तों बादशाह वाकई उसके बगैर उदास हो गया। अब तो उसे आम तोतों से भी इतनी मोहब्बत ना रही थी। लेकिन जाहिर है एक हफ्ता तो उसे गुजारना ही था। फिर एक हफ्ता गुजरने में दो दिन बाकी थे और बादशाह अपने खास कमरे में उदास बैठा हुआ था। अचानक रोशनदान से तोते की सुरीली आवाज सुनाई दी। झीरक तोता हाजिर होने की इजाजत चाहता है। बादशाह बेख्तियार उछल पड़ा। उसने सर उठाकर देखा तो रोशन में तोता बैठा हुआ था और उसके गले में तस्वीर थी। बादशाह ने खुश होते हुए कहा, "आओ आओ झिरक तोते। हम वाकई तुम्हारे लिए उदास हो गए हैं और बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।"
तोता उड़ता हुआ बादशाह के हाथ पर आकर बैठ गया और बादशाह ने प्यार से उसके जिस्म पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। ज़िरक तोते ने खुश होते हुए कहा, बादशाह सलामत मुबारक हो। कोहे काफ की शहजादी आपकी बहू बनने पर रजामंद हो गई है। मैं कोहे काफ की शहजादी की भी तस्वीर ले आया हूं। आप भी उसे देख लें और शहजादे को भी दिखा दें। बादशाह बेहद खुश हुआ। उसने जल्दी से तोते के गले में बंधी हुई तस्वीर उतार ली। यह वाकई इंतहाई खूबसूरत शहजादी की तस्वीर थी।
बादशाह ने हैरत से पूछा, तुम्हारी शहजादी तो बेहद हसीन है। लेकिन क्या यह वाकई बुदिल और कम अकल शहजादे से निकाह की ख्वाहिश रखती है? क्या कोहे काफ की शहजादी मेरे शहजादा ज़द से शादी पर तैयार हो गई? तोते ने कहा हां बादशाह सलामत। हां। कोहे काफ की शहजादी का कहना है कि वह खुद अक्लमंद है। इसलिए अक्ल की कमी को पूरा कर सकती है। और जहां तक शहजादे की बुझदिली का ताल्लुक है, यह सिर्फ बहादुरी में तब्दील की जा सकती है।
तोते की यह बातें सुनकर बादशाह बेहद खुश हुआ और फिर उसने फौरन गुलाम को तलब किया। जाकर शहजादा ज़द को बुलाकर लाओ और गुलाम सलाम करके वापस चला गया। थोड़ी देर बाद शहजादा ज़द अंदर दाखिल हुआ और उसने बादशाह को सलाम किया। शहजादे ने खौफजदा लहजे में कहा आपने मुझे याद फरमाया अब्बा हुजूर क्या मुझसे कोई गलती हो गई है और आप मुझे कोई सजा देना चाहते हैं मैं पहले ही माफी मांग लेता हूं बादशाह बेइख्तियार हंस पड़ा बेटा शहजादे हम तुमसे एक मशवरा करना चाहते हैं बादशाह की बात सुनकर शहजादा हैरान होकर कुर्सी पर बैठ गया शहजादे ने जवाब दिया मुझसे मशवरा मगर बादशाह सलामत मैं तो नादान सा शहजादा हूं मेरे भाई मुझसे ज्यादा अकलमंद है बादशाह ने उसकी बात को नजरअंदाज करते हुए कहा, "यह देखो, यह तस्वीर। यह बताओ, यह शहजादी कैसी है?"
बादशाह ने हाथ में पकड़ी हुई कोहे काफ की शहजादी की तस्वीर शहजादे की तरफ बढ़ाते हुए कहा। शहजादे ने हैरत भरे अंदाज में तस्वीर बादशाह के हाथ से ले ली और उसे गौर से देखने लगा। उसके चेहरे पर संजीदगी की तस्वीर उभर आई। शहजादे ने कहा, बहुत खूबसूरत शहजादी है। अब्बा हुजूर यह शहजादी अकलमंद भी लगती है। बादशाह सलामत ने अपने बेटे से कहा यह कोहे काफ की शहजादी है और जीरक तोता दरअसल इस कोहे काफ की शहजादी का पालतू तोता है। क्या तुम इस शहजादी से शादी करोगे?
यह बात सुनकर शहजादा ज़द बेइख्तियार उछल पड़ा। इससे शादी मैं करूं यह कैसे मुमकिन हो सकता है अब्बा हुजूर? यह खूबसूरत भी है और फिर कोह-ए-काफ की शहजादी है और अकलमंद भी है। इसकी शादी मुझसे कैसे हो सकती है? इससे किसी अकलमंद की शादी हो सकती है यकीनन मेरे किसी भाई की। बादशाह ने मुस्कुराते हुए शहजादे से पूछा अगर इसकी शादी तुमसे की जाए तो क्या तुम्हें शादी मंजूर होगी?
शहजादे ने अचानक दो टूक जवाब दिया। नहीं बादशाह सलामत मैं इससे शादी नहीं करूंगा। बादशाह बेख्तियार उछल पड़ा और उसी लहजे में पूछा वो क्यों? इस इंकार की वजह शहजादा ज़द ने बताई। अब्बा हुजूर कोहे काफ बहुत दूर है और शहजादी जाहिर है वह हमें ज्यादा वक्त अपने मुल्क में रहने को तरजीह देगी और मुझे भी मजबूरी में उसके साथ रहना पड़ेगा और वहां खौफनाक कोहे काफ की परियां भी मौजूद होंगी इसलिए मुझे उनको देखकर ही खौफ आएगा और फिर दूर होने की वजह से मैं भागकर जल्दी वापस भी नहीं आ सकता। शहजादे ने अपनी बात की वजाहत करते हुए कहा इसीलिए मैं इस खूबसूरत कोहे काफ की शहजादी से शादी नहीं कर सकता।
यह सारी बातक तोता भी सुन रहा था। जरक तोता ने शहजादा ज़द से कहा, शहजादा हुजूर, आप तो कोहे काफ के बादशाह के दामाद होंगे। तमाम खौफनाक और ताकतवर लोग आपके गुलाम होंगे। क्या यह सोचकर आपको लुत्फ नहीं आता कि दुनिया के बड़े-बड़े खौफनाक और ताकतवर लोग आपके सामने सर झुकाए खड़े हो। तोते की यह बात सुनकर शहजादा ज़द का चेहरा चमक उठा। अरे हां, यह बात तो ठीक है। फिर तो मैं जरूर शादी करूंगा। क्या कोहेकाफ की शहजादी भी मुझ जैसे अहमक और बुजदिल शहजादे से शादी पर रजामंद हो जाएगी? जबकि दुनिया में मुझसे ज्यादा बहादुर, खूबसूरत और अक्लमंद शहजादे भी मौजूद हैं।
बादशाह सलामत ने कहा, अब तो तुमने भी अकलमंद बातें शुरू कर दी हैं। सुनो शहजादे, ज़रक तोते ने तुम्हारी तस्वीर शहजादी को दिखाई है और तुम्हारे मुतालिक सब कुछ बता दिया है। इसके बावजूद शहजादी तुमसे शादी करने पर रजामंद है। इसलिए अब तुम्हें खौफजदा होने की जरूरत नहीं। तुम तोते के साथ कोहे काफ जाओ। वहां के बादशाह से मिलो। शहजादी से मिलो ताकि फिर तुम्हारी शादी के इंतजाम किए जा सके।
शहजादे ने कहा, नहीं अब्बा जान मैं बगैर शादी के कोहेकाफ नहीं जाऊंगा। मुझे वहां से खौफ आता है। ऐसा ना हो कि वह मुझे खा जाए। इसलिए आप शहजादी को यहां बुला लें। यह सारी बातें सुनकर झीरक तोते ने कहा इसका एक हल हो सकता है। ऐ बादशाह सलामत आप शहजादे समेत बहीरा अहमर सुर्ख समंदर के साहिल पर पहुंच जाए। वहां कोहे काफ का बादशाह भी शहजादी को लेकर दुल्हन बनाकर आ जाएगा और फिर वहीं शादी हो जाएगी। तोते की इस तजवीज को बादशाह ने मान लिया। झिरक तोते ने कहा तो ठीक है मुझे इजाजत दें। मैं जाकर बादशाह और शहजादी को लेकर बहीरा अहमद के साहिल पर पहुंच जाऊंगा। आप भी आज से चौथे रोज वहां पहुंच जाए और उड़ता हुआ रोशनदान से बाहर चला गया।
फिर बादशाह ने पूरे मुल्क में अपने शहजादा जयद और कोहे काफ की शहजादी की शादी का ऐलान कर दिया। इस ऐलान को जिसने भी सुना वह बेहद हैरान हुआ क्योंकि किसी के तसवुर में भी नहीं था कि शहजादा ज़द जैसे बुज़दिल और कम अकल शहजादे की शादी वो भी किसी इंसान से नहीं। बल्कि कोहे काफ की शहजादी से आखिर यह कैसे हो सकती है? बहरहाल चौथे रोज बादशाह सलामत शहजादा और अपने दूसरे बेटों वजीर और हमराहियों के साथ बहीरा अहम के साहिल पर पहुंच गया। वहां कोहे काफ का बादशाह भी अपनी शहजादी बेटी और अपनी दुनिया की मखलूकों के साथ आ गया और उसके बाद उन दोनों की शादी हो गई। दोनों मुल्कों में सात रोज तक जश्न मनाए जाने का ऐलान कर दिया गया। फिर शहजादी शहजादे के साथ सल्तनत बाबुल आ गई। जबकि कोहे काफ का बादशाह अपने वजीर और हमराहियों समेत वापस कोहे काफ चला गया। शहजादा ज़द बेहद खुश था और शहजादी भी बेइंतहा खुश थी और दोनों बादशाह भी और इन सबसे ज्यादा खुशजीरक तोता था।
चंद रोज बाद शहजादी ने अपने मुल्क कोहेगाफ जाने की ख्वाहिश जाहिर की। क्योंकि अब शादी हो चुकी थी इसलिए शहजादे ने भी कोई ऐतराज ना किया और शहजादी को साथ लेकर कोहे काफ चल पड़ा। वो दोनों घोड़ों पर सवार सफर करते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे थे। तीसरे रोज वो एक खूबसूरत और फूलों से भरी वादी में पहुंच गए। जीरक तोता भी उनके साथ था कि खूबसूरत वादी शहजादी को इस कदर पसंद आई कि उसने एक रोज तक वहां रहने पर इसरार किया। शहजादा वहीं रुक गया। वह दोनों रेत पर बैठे हुए थे कि अचानक तोता उड़ता हुआ उनके पास आया। तोते ने कहा शहजादा और शहजादी दोनों यहां से चल पड़ो क्योंकि इस वादी में साहिरा जुबैदा का कब्जा है और वह आने वाली है। यह सुनकर शहजादी और शहजादा दोनों चौंक पड़े। शहजादे के चेहरे पर खौफ की तस्वीर उभर आई।
शहजादी ने हैरत भरे लहजे में पूछा साहरा जुबैदा वो क्या होती है? तोते ने कहा शहजादी हुजूर यह खौफनाक औरत है जो परिंदे के रूप में रहती है। इसकी आंखों में जर है। यह जिसे चाहे अपनी आंखों की मदद से हलाक कर देती है। तोते की बातें सुनकर शहजादा ज़द और भी डर गया। और फिर इससे पहले कि उनके दरमियान मजीद कोई बात होती अचानक आसमान पर साईं साईं की आवाज सुनाई दी और शहजादा और भी डर गया। शहजादी ने उड़ने की कोशिश की लेकिन खौफ के मारे शहजादी से उड़ा भी नहीं जा रहा था। जबकि जिरक तोता जल्दी से एक झाड़ी के पीछे छुप गया।
उसी लम्हे एक औरत जो परिंदे के रूप में थी जिसके बड़े-बड़े पंख थे उड़ती हुई उनके करीब आ गई। उड़ती हुई औरत ने कहखा लगाते हुए कहा हां हां तो शहजादा ज़द और कोहे कौफ की शहजादी यहां मौजूद है। यह कहते हुए वह उनके करीब आकर जमीन पर बैठ गई और उसने अपने बड़े-बड़े पंख समेट लिए। उसकी आंखें बड़ी-बड़ी थी। शहजादे ने और ज्यादा खौफजदा होते हुए पूछा कौन हो तुम? कौन हो? क्या तुम मुझे खा तो नहीं जाओगी?
कोहे काफ की शहजादी ने गुस्से से कहा, "तुम जो कोई भी हो, मैं यह बता दूं कि मैं शहजादे की तरह बुझदिल नहीं हूं। इसलिए तुम खामोशी से चली जाओ वरना मैं तुम्हें हलाक कर दूंगी।" शहजादी ने गरजदार लहजे में कहा। तो उस परिंदेनुमा औरत ने जोरदार कहकहा मारा और दूसरे ही लम्हे वो जमीन पर लौटपोट हो गई। फिर पलक झपकते ही वह औरत परिंदे के बजाय एक सही सालिम औरत मौजूद थी। वो कहने लगी देखो मुझे मैं परिंदा हूं या औरत।
वो औरत कोह ए काफ की शहजादी से कहने लगी क्योंकि आज तक यहां इस वादी में कोई शहजादा नहीं आया था। इसलिए मैंने किसी से शादी नहीं की। अब मैं शहजादे से शादी करूंगी। तुम अगर चाहो तो वापस जा सकती हो। वरना मैं तुम्हें एक लम्हे में हलाक कर दूंगी। अलबत्ता शहजादे को मैं ले जा रही हूं। उस औरत ने यह चिल्लाते हुए कहा और एक बार फिर जमीन पर लोटपोट हुई तो वह दोबारा परिंदा बन चुकी थी। दूसरे लम्हे उसने अपने बड़े-बड़े पंजों में शहजादे को पकड़ा और हवा में उड़ती चली गई। शहजादा चीखता रहा। शहजादी भी उसके पीछे भागती रही। लेकिन वह परिंदा और शहजादे को अपने ताकतवर पंजों में दबाए उड़ती हुई और कहकहे लगाती हुई पहाड़ों के पीछे गायब हो गई।
अब तो शहजादी बेहद परेशान हुई। जिरक तोते ने झाड़ी से निकलकर शहजादी के कंधे पर बैठते हुए कहा परेशान होने की जरूरत नहीं शहजादी हुजूर परिंदा औरत शहजादे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगी अलबत्ता अब आपको शहजादे को बचाने के लिए हिम्मत करना पड़ेगी और उस परिंदेनुमा औरत को हलाक करना होगा शहजादी ने हौसला भरे लहजे में कहा लेकिन कैसे मुझे बताओ मैं जरूर शहजादे को बचा लूंगी तोते ने कहा शहजादी हुजूर यहां थोड़े ही फासले पर एक पहाड़ी घर में एक बुजुर्ग रहते आप उनके पास चलें। वह जरूर आपको कोई ना कोई तरकीब बता देंगे।
तोते की बातें सुनकर शहजादी घोड़े पर सवार हुई और तोते की रहनुमाई में वह घोड़ा दौड़ाती हुई उस पहाड़ी की तरफ बढ़ती चली गई। शहजादी अपने मुल्क से निकलने के बाद उड़ने की ताकत खो देती थी। इसलिए वह घोड़े के सहारे वहां तक जाने लगी जहां वह बुजुर्ग रहते थे। काफी देर बाद वह एक पहाड़ी के दामन में पहुंच गई। जहां वाकई घर में रोशनी हो रही थी। शहजादी घोड़े से उतरी और फिर घर की तरफ बढ़ने लगी। तोता उसके कंधे पर बैठ गया। शहजादी ने उस गार में झांका तो उसने एक बुजुर्ग को वहां इबादत में मशरूफ देखा। शहजादी अंदर दाखिल हुई और बुजुर्ग के करीब जाकर मेहरबान अंदाज में बैठ गई। थोड़ी देर बाद बुजुर्ग ने इबादत खत्म की और फिर शहजादी की तरफ देखने लगे।
शहजादी ने अदब से बुजुर्ग को सलाम किया। बुजुर्ग बड़े गौर से शहजादी और तोते को देख रहे थे। फिर उनके चेहरे पर मुस्कुराहट पैदा हुई। बुजुर्ग ने सलाम का जवाब देते हुए कहा, तुम कोहे काफ की शहजादी हो और यह ज़ीरक तोता। क्या मैं ठीक कह रहा हूं ना? शहजादी ने जवाब देते हुए कहा, हां बाबा, आप दुरुस्त फरमा रहे हैं। बुजुर्ग शेख मंसूर ने कहा, "मुझे मालूम है तुम यहां क्यों आई हो?" तुम चाहती हो कि हम इस परिंदा औरत से तुम्हारे शौहर को आजादी दिला दें।"
शहजादी ने कहा हां बाबा वो मेरा शौहर है। मैं नहीं चाहती कि मेरा शौहर किसी गैर औरत के कब्जे में हो। चाहे वह परिंदा औरत ही क्यों ना हो। शेख मंसूर ने कहा शहजादी वो परिंदा औरत दरअसल एक बहुत बड़ी और ताकतवर जादूगरनी है। वो दरअसल परिंदा नहीं है। बस वो अपने जादू के जोर से परिंदा बन जाती है। वरना वह हर लिहाज से एक मुकम्मल औरत है। उसकी ख्वाहिश थी कि वह किसी शहजादे से शादी करे और शहजादा ज़द एक नेक
शहजादा है। यही वजह थी कि तुम भी उससे शादी करने पर तैयार हो गई थी। और इसीलिए यह परिंदा औरत, जिसका असल नाम साहिरा जुबैदा है, वह भी शहजादे से शादी करना चाहती है। लेकिन शहजादा उस वक़्त तक उससे शादी नहीं करेगा जब तक कि तुम ज़िंदा हो, क्योंकि वह तुमसे मोहब्बत करता है। इसीलिए जब परिंदा औरत यह देखेगी, तो फिर लाज़मी तुम्हें हलाक करने की कोशिश करेगी। लेकिन तुम, क्योंकि एक आम शहज़ादी नहीं हो, बल्कि कोहे कौफ़ की शहज़ादी हो, इसलिए वो आसानी से तुम्हें हलाक नहीं कर सकती।
बुज़ुर्ग बाबा ने मजीद कहा, "अलबत्ता अगर तुम चाहो तो इस साहिरा जुबैदा का ख़ात्मा कर सकती हो, लेकिन इसके लिए तुम्हें बहुत हिम्मत से काम लेना पड़ेगा।" शहज़ादी ने कहा, "मैं हर किस्म का काम करने के लिए तैयार हूँ, बाबा।"
बुज़ुर्ग ने कहा, "तो फिर सुनो, तुम तोते को यहाँ से सल्तनत-ए-रूम ले जाओ। वहाँ एक दर्ज़ी रहता है, जिसका नाम ख़्वाजा महमूद है। उस ख़्वाजा महमूद दर्ज़ी की इकलौती बेटी आँखों से अंधी है। तोते को मालूम है कि उसकी दवा कहाँ मिलती है। तोता तुम्हें वो जड़ी-बूटी ला देगा, जिसका रस उस लड़की की आँखों में डाल दिया जाए, तो फिर से उसे नज़र आना शुरू हो जाएगा। इस तरह दर्ज़ी तुमसे खुश हो जाएगा। उस दर्ज़ी के पास कपड़े की बनी हुई एक गुड़िया है। इस गुड़िया में यह सिफत है कि यह हर सवाल का जवाब देती है, लेकिन उस वक़्त जब वह लड़की तंदुरुस्त होगी, वरना नहीं। तो वह गुड़िया दर्ज़ी से माँग लेना। फिर वह गुड़िया तुम्हें बताएगी कि यह परिंदा औरत किस तरह हलाक हो सकती है।"
बुज़ुर्ग बाबा ने यह सारी बातें कहीं, तो शहज़ादी ने उनका शुक्रिया अदा किया और फिर तोते समेत वह घर से बाहर निकल आई और अपने घोड़े पर सवार होकर वह सल्तनत-ए-रूम की तरफ रवाना हो गई। रास्ते में उसने तोते के मशवरे से मर्दाना रूप इख़्तियार कर लिया, ताकि कोई उसे तंग न करे और फिर मंज़िलें मारती हुई आखिरकार सल्तनत-ए-रूम पहुँच गई। यहाँ पहुँचकर उसने जल्दी ही ख़्वाजा महमूद दर्ज़ी का घर तलाश कर लिया।
ख़्वाजा महमूद दर्ज़ी ने शहज़ादी को मर्दाना रूप में देखकर हैरत भरे लहजे में पूछा, "तुम कौन हो, लड़के?" शहज़ादी बोली, "मैं कोहे काफ़ का हकीम हूँ। मैं यहाँ आया हुआ था कि मुझे मालूम हुआ कि तुम्हारी लड़की अंधी हो गई है। अगर चाहो तो मैं उसका इलाज कर सकता हूँ।" दर्ज़ी बोला, "अगर ऐसा हो जाए, तो मैं और क्या चाहूँगा?" दर्ज़ी ने खुश होते हुए कहा, "अगर ऐसा हो जाए, तो क्या ही अच्छी बात है।"
शहज़ादी बोली, "एक शर्त है। अगर तुम्हारी लड़की ठीक हो जाए, तो मैं जो माँगूंगी, वह तुम दोगे।" ख़्वाजा महमूद दर्ज़ी ने मसरत भरे लहजे में जवाब दिया, "मेरा वादा है, लड़के, जो कुछ मेरे पास होगा, मैं देने से इनकार नहीं करूँगा।" शहज़ादी ने कहा, "है तुम्हारी लड़की? उसे बुलाओ।" तो ख़्वाजा महमूद दर्ज़ी दौड़कर दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गया।
शहज़ादी ने इस दौरान ज़ीरक तोते से कहा, "ज़ीरक तोते, तुम जाकर वो जड़ी-बूटी ले आओ।" तोते ने झट से जवाब दिया, "अभी लाया, शहज़ादी हुज़ूर। मैंने आते हुए जड़ी-बूटी को देख लिया है। यहाँ करीब ही मौजूद है।" तोते ने इतना कहा और उड़ गया। अभी तक ख़्वाजा महमूद दर्ज़ी अपनी बेटी को लेकर वापस भी नहीं आया था कि तोता वापस आ गया। उसकी चोंच में एक बूटी की शाख पकड़ी हुई थी। शहज़ादी ने उससे बूटी ले ली और तोता दोबारा उसके कंधे पर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद दर्ज़ी एक नौजवान लड़की का हाथ पकड़े आहिस्ता-आहिस्ता चलता हुआ कमरे में दाखिल हुआ। दर्ज़ी ने कहा, "यह है मेरी बेटी। यह ग़ुस्ल कर रही थी, इसीलिए मुझे देर हो गई।" दर्ज़ी ने अपनी बेटी को शहज़ादी के बारे में बताया, तो लड़की ने सलाम किया। शहज़ादी ने उसके सलाम का जवाब दिया और फिर उसने दर्ज़ी से कहा कि वह लड़की को बिस्तर पर लिटा दे। लड़की बिस्तर पर लेट गई, तो शहज़ादी ने हाथ में मौजूद बूटी का रस लड़की की दोनों आँखों में डाल दिया। चंद लम्हों बाद लड़की खुशी से चीख उठी, क्योंकि उसे नज़र आना शुरू हो गया था। दर्ज़ी खुशी से अल्लाह का शुक्रिया अदा करने लगा।
थोड़ी देर बाद लड़की तंदुरुस्त हो गई। उसने शहज़ादी के पैर पकड़ लिए और उसका बेहद शुक्रिया अदा किया। शहज़ादी लड़की और उसके बाप की खुशी देखकर खुद भी बेहद खुश हुई। दर्ज़ी ने मुस्कुराते हुए कपकपाते लहजे में पूछा, "तुम वाकई रहमत का फ़रिश्ता हो, लड़के।" क्योंकि शहज़ादी ने मर्दों जैसा भेष बदला हुआ था, जिस वजह से दर्ज़ी को लगा कि यह नौजवान हकीम है। दर्ज़ी ने कहा, "अब बोलो, क्या माँगते हो?"
शहज़ादी ने फौरन कहा, "तुम्हारे पास कपड़े की बनी हुई एक गुड़िया है, वह मुझे दे दो।" शहज़ादी ने यह कहा, तो दर्ज़ी उठा और कमरे से बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद वह वापस आया, तो उसके हाथ में एक छोटी सी गुड़िया थी। यह एक खूबसूरत लड़की की शक्ल की थी। शहज़ादी ने उससे गुड़िया लेकर दर्ज़ी का शुक्रिया अदा किया और वहाँ से उठकर उस मकान से बाहर आ गई। फिर वह वापस सराय में आ गई, जहाँ उसने दर्ज़ी के पास जाने से पहले कमरा लिया हुआ था।
कमरे में पहुँचकर शहज़ादी ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर गुड़िया को हाथ में ले लिया। शहज़ादी ने गुड़िया से मुखातिब होकर पूछा, "गुड़िया, मुझे बताओ, मैं अपने शौहर को इस दरिंदा औरत से कैसे आज़ाद करा सकती हूँ?"
"शहज़ादी, जब तक यह परिंदा औरत हलाक नहीं होगी, उस वक़्त तक तुम्हारा शौहर उसके पंजे से आज़ाद नहीं हो सकता।" गुड़िया का मुँह हरकत में आया और उसके मुँह से एक बारीक सीटी की आवाज़ सुनाई दी। शहज़ादी ने पूछा, "लेकिन किस तरह? यह इंतहाई ताकतवर जादूगरनी है। इसीलिए इसे हलाक करने के लिए तुम्हें और तोते को इंतहाई हिम्मत और हौसले से काम लेना होगा। और फिर यह भी बता दूँ कि इस दौरान तुम दोनों में से किसी एक से भी मामूली ग़लती हुई, तो फिर तुम दोनों हलाक हो सकते हो।" गुड़िया ने सब बताते हुए शहज़ादी को जवाब दिया।
शहज़ादी ने जवाब दिया, "ठीक है, गुड़िया। हम दोनों अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि कोई ग़लती ना हो। फिर आगे क्या करना है?"
वो गुड़िया बताने लगी, "इधर दुनिया का सबसे बड़ा सहारा भी है। इस सहारा के दरमियान एक नख़लिस्तान है। इस नख़लिस्तान की निशानी यह है कि इसमें खजूर के सिर्फ़ चार दरख़्त हैं और दरमियान में एक चश्मा, यानी पानी की नहर है, जिसका पानी सुर्ख रंग का है। खजूर के दरख़्त का रंग भी सुर्ख है, और इन दरख़्तों पर खजूर भी सुर्ख रंग की लगती है। तुम इस नख़लिस्तान में जाओ और तोते से कहो कि वह खजूरों के सबसे ऊँचे दरख़्त में लगी हुई खजूरों में से दो खजूर तोड़कर तुम्हें ला दे, जिन पर रंग के निशान होंगे। इन खजूरों को चश्मे के पानी से धोकर तुम अलग-अलग टीलों पर रख दो। आसमान से दो बड़े परिंदे उतरेंगे और इन खजूरों को खा लेंगे। जैसे ही वो खजूर खाएँगे, दोनों परिंदे बेहोश होकर वहीं गिर पड़ेंगे। तुम इन दोनों परिंदों को उठाकर उन्हें बाँध लेना। और फिर वहीं नख़लिस्तान में ही एक क़ाफ़िले का इंतज़ार करना। यह क़ाफ़िला 70 ऊँटों पर होगा। इस क़ाफ़िले का सरदार बूढ़ा आदमी होगा, जिसका नाम सरदार मूसा है। सरदार मूसा तुमसे यह परिंदे माँगेगा। तुम उसे इस शर्त पर परिंदे देना कि इनके बदले वह तुम्हें एक अंगूठी दे दे, जो उसे शहर में पड़ी मिली थी। यह अंगूठी लेकर तुम अपनी उंगली में पहन लेना। जब तक यह अंगूठी तुम्हारी उंगली में रहेगी, परिंदा औरत का जादू तुम पर कोई असर नहीं करेगा। फिर तुम इस क़ाफ़िले के चले जाने के बाद खुद भी इस सहारा से निकलकर इसके मगरीबी इलाके की सरहद पर एक शहर है, जिसका नाम शहर बसरा है। शहर बसरा में एक बूढ़ा आदमी रहता है। उसका नाम शेख मंसूर है। शेख मंसूर इस परिंदा औरत का सबसे बड़ा दुश्मन है, क्योंकि इस परिंदा औरत ने उसके इकलौते बेटे को किसी ज़माने में हलाक कर दिया था, और शेख मंसूर इस परिंदा औरत से इंतक़ाम, यानी बदला लेना चाहता है। लेकिन क्योंकि वह जादूगरनी भी है और शेख मंसूर जादू नहीं जानता, इसलिए वह इसका मुक़ाबला नहीं कर सकता। लेकिन क्योंकि तुम्हारे पास सुर्ख अंगूठी होगी, इसलिए तुम पर परिंदा औरत का जादू असर नहीं कर सकेगा। शेख मंसूर के पास एक तलवार है, जिसके दस्ते पर दो औरतों की तस्वीरें बनी हुई हैं, जो एक-दूसरे से लड़ रही हैं। यह तलवार तुम शेख मंसूर से हासिल कर लेना। सिर्फ़ इस तलवार ही से तुम इस परिंदा औरत के पैर काट सकोगी। फिर यह तलवार और सुर्ख अंगूठी लेकर तुम वापस इस वादी में आ जाना, जहाँ से तुम्हारे शौहर को परिंदा औरत उठाकर ले गई थी। जब तुम यहाँ पहुँचोगी, तो परिंदा औरत तुम्हारे मुक़ाबले पर आएगी। जब वह आए, तो तुम तलवार की मदद से उसके पंख काट देना। परिंदा औरत के पंख कटते ही वह चीख़ती हुई ग़ायब हो जाएगी। अब तोते का काम शुरू हो जाएगा। इस परिंदा औरत के कटे हुए एक पंख को उठाकर क़रीबी समंदर में मौजूद एक जज़ीरे पर ले जाएगा। वहाँ एक ग़ैर मुल्की क़बीला रहता है। इस क़बीले के सरदार का बेटा सख़्त बीमार है। तोता कटा हुआ पंख सरदार को दे देगा और उससे कहेगा कि इस पंख को जलाकर इसकी राख अपने बेटे को खिला दे। जैसे ही सरदार अपने बेटे को इसकी राख खिलाएगा, सरदार का बेटा तंदुरुस्त हो जाएगा। फिर तोता इस सरदार को कहेगा कि उसे वह सुर्ख मोती दिया जाए, जिसमें सुनहरा रंग झलकता है। यह मोती तुम इस वादी में मौजूद एक चश्मे में, जिसके पानी का रंग सुनहरा है, उसमें जाकर डाल देना। इस चश्मे से एक सुनहरे रंग का कछुआ निकलेगा, जो इस मोती को खा जाएगा। फिर वह तुमसे इंसानी आवाज़ में बात करेगा। तुम उससे पूछना कि परिंदा औरत कहाँ मौजूद है? वह तुम्हें उस जादूगरनी औरत के घर का पता देगा, जिसके मुँह पर सुनहरी मकड़ी का जाला लगा हुआ है। तुम इस गार के दहाने पर पहुँच जाना। तोता अपनी चोंच से इस जाले को हटाएगा। तुम इस जाले को हाथ नहीं लगाना, वरना तुम हलाक हो जाओगी। जैसे ही जाला हटेगा, परिंदा औरत बाहर आ जाएगी। अब तुमने इस तलवार से उस पर हमला करना है, जबकि परिंदा औरत के हाथ में भी तलवार होगी। इसके बाद जो दूसरे को ज़ख़्म लगाने में कामयाब हो जाएगा, वह जीत जाएगा। अगर परिंदा औरत ने तुम्हें अपनी तलवार से ज़ख़्म लगा दिया, तो तुम हलाक हो जाओगी। अगर तुमने उसे ज़ख़्मी कर दिया, तो परिंदा औरत हलाक हो जाएगी। उसके हलाक होते ही तुम इस घर में चली जाना। वहाँ तुम्हारा शौहर बेहोश पड़ा हुआ होगा। तुम उसके मुँह में पानी डाल देना, तो वह होश में आ जाएगा।"
गुड़िया ने यह मुकम्मल तफ़सील बताई और इसके साथ ही उसकी आवाज़ बंद हो गई। शहज़ादी ने एक तवील साँस लेते हुए उसे अपने अब्बाया की जेब में डाल लिया। शहज़ादी ने तोते से मुखातिब होकर पूछा, "हाँ तो तोते, क्या ख़्याल है?" तोते ने जवाब दिया, "हिम्मत करो, शहज़ादी। जो हिम्मत करते हैं, वही कामयाब होते हैं।" शहज़ादी तोते के इस जवाब पर बेहद खुश हुई और फिर दूसरे रोज़ वह सराय छोड़कर घोड़े पर सवार होकर दुनिया के सबसे बड़े सहारा की तरफ रवाना हो गई।
तकरीबन सात रोज़ के सफ़र के बाद वह सहारा के किनारे पर मौजूद एक गाँव में पहुँच गई और गाँव के सरदार के पास जाकर ठहर गई। सरदार ने शहज़ादी को मर्दाना लिबास में देखकर कहा, "तुम कहाँ से आए हो, लड़के, और कहाँ जा रहे हो?" शहज़ादी ने जवाब दिया, "मैं इस सहारा में नख़लिस्तान में जाना चाहता हूँ, जहाँ खजूर के चार दरख़्त हैं। क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?"
"वो बहुत दूर है। लेकिन तुम वहाँ क्यों जाना चाहते हो?" सरदार ने यह बात हैरान होकर पूछी। तो शहज़ादी ने कहा, "मुझे वहाँ एक क़ाफ़िले का इंतज़ार करना है। इस क़ाफ़िले के सरदार से मुझे बहुत ज़रूरी काम है।"
सरदार ने कहा, "मैं तुम्हारी ज़रूर मदद करूँगा, क्योंकि तुम शक्ल-सूरत से अच्छे लड़के दिखाई दे रहे हो। मैं तुम्हें एक ऊँट देता हूँ, जो इंतहाई तेज़ रफ़्तार है। यह ऊँट तुम्हें ख़ुद-ब-ख़ुद नख़लिस्तान पहुँचा देगा, क्योंकि मेरे ऊँट इस जगह को जानते हैं।" सरदार ने यह बात कही, तो शहज़ादी ने उसका शुक्रिया अदा किया।
दूसरे रोज़ सरदार ने उसे एक अच्छा ऊँट दिया और साथ ही पानी की एक छागल भी दे दी। यह छागल पानी से भरी हुई है। तुम इसमें से जितना पानी पियोगे, उतना ही इसमें ख़ुद-ब-ख़ुद भर जाएगा, और इस तरह यह छागल पानी से भरी रहेगी और रास्ते में पानी की कमी नहीं होगी। सरदार ने कहा। तो शहज़ादी ने उसका शुक्रिया अदा किया और ऊँट पर बैठकर वह सहारा में दाखिल हो गई। तोता उसके कंधे पर बैठा हुआ था। ऊँट वाकई तेज़ रफ़्तार से रेत पर चल रहा था और फिर तीन दिन और तीन रातों के बाद आखिरकार शहज़ादी उस नख़लिस्तान में पहुँच गई। रास्ते में वह छागल से पानी पीती रही और उसने तोते को भी पानी पिलाया। तोता चाहता तो उड़कर शहज़ादी से पहले नख़लिस्तान पहुँच सकता था, लेकिन तोता शहज़ादी को सहारा में अकेला छोड़ना नहीं चाहता था, इसलिए वह उसके साथ-साथ रहा।
नख़लिस्तान पहुँचकर शहज़ादी आराम करने के लिए लेट गई, जबकि ऊँट भी चश्मे से पानी पीकर एक तरफ़ बैठ गया। अलबत्ता तोता उड़ता हुआ खजूर के सबसे ऊँचे दरख़्त की चोटी पर पहुँचा और फिर उसने थोड़ी देर बाद दो खजूरें तोड़कर नीचे फेंक दीं। यह सुर्ख रंग की खजूरें थीं, जिन पर सब्ज़ रंग के धब्बे थे। शहज़ादी उठी। उसने खजूरों को उठाया और फिर चश्मे के पानी से उन्हें ख़ूब अच्छी तरह धोकर उसे नख़लिस्तान के क़रीब ही रेत के टीलों की चोटियों पर अलाहिदा-अलाहिदा रख दिया और ख़ुद नख़लिस्तान में आकर बैठ गई।
कुछ देर बाद आसमान से दो सब्ज़ और सुर्ख रंग की धारियों वाले परिंदे नीचे उतरे। उन्होंने खजूरों को खा लिया। जैसे इन परिंदों ने खजूरों को खाया, वो दोनों बेहोश होकर वहीं गिर गए और शहज़ादी ने जाकर उन दोनों को पकड़ लिया और नख़लिस्तान ले आई। और फिर रस्सी की मदद से उन्हें बाँध दिया। अब उसे क़ाफ़िले का इंतज़ार था।
दूसरे रोज़ 70 ऊँटों पर मुश्तमिल एक बड़ा क़ाफ़िला वहाँ पहुँच गया। शहज़ादी इस क़ाफ़िले के सरदार से मिली, तो सरदार उसे वहाँ देखकर बेहद हैरान हुआ। "तुम कौन हो, लड़के, और यहां कैसे पहुँच गए हो? कहाँ से आए हो और कहाँ जा रहे हो?" बूढ़े सरदार ने यह सब शहज़ादी से हैरान होकर पूछा।
शहज़ादी ने बूढ़े के सवाल का जवाब देने के बजाय उल्टा उससे सवाल कर दिया। "पहले तुम बताओ, तुम्हारा नाम क्या है?" वह जानना चाहती थी कि वाकई यह वही क़ाफ़िला है, जिसका उसे इंतज़ार था या कोई और है? बूढ़े ने कहा, "मेरा नाम सरदार मूसा है। मैं इस क़ाफ़िले का सरदार हूँ।"
शहज़ादी ने उसे परिंदे दिखाते हुए कहा, "मैं शिकारी हूँ। इन परिंदों के शिकार के लिए यहाँ आया था। मैंने शिकार कर लिया है।" सरदार मूसा ने कहा, "ओह, लागोस परिंदे। यह तो नायाब परिंदे हैं। इनका गोश्त खाने से बूढ़ा भी जवान हो जाता है।" सरदार मूसा ने कहा, "क्या तुम यह परिंदे मुझे दे सकती हो? तुम और शिकार कर लेना।"
शहज़ादी ने कहा, "हाँ, दे सकती हूँ। लेकिन तुम इनके बदले में मुझे क्या दोगे?" शहज़ादी ने सरदार से पूछा। सरदार बोला, "तुम जो भी माँगो, दौलत माँगो, जो भी माँग लो।" शहज़ादी बोली, "तुम्हें शहर से गुज़रते हुए एक सुर्ख रंग की अंगूठी मिली होगी। अगर तुम वह अंगूठी मुझे दे दो, तो मैं यह दोनों परिंदे तुम्हें दे दूँगी।"
शहज़ादी की यह बात सुनकर बूढ़ा सरदार बेहद खुश हुआ। उसे तो मालूम ही न था कि उसकी अंगूठी में क्या ख़ासियत है, इसलिए उसने अंगूठी शहज़ादी को दे दी और शहज़ादी ने दोनों परिंदे उसके हवाले कर दिए। बूढ़े सरदार ने फौरन ज़बा किया और फिर उनका गोश्त पका कर खा गया। सरदार ने कहा, "अब मैं जब सहारा पार करूँगा, तो मैं जवान हो चुका हूँगा। शुक्रिया। तुम्हारा बहुत शुक्रिया।" फिर उसने अपने क़ाफ़िले को कूच करने का हुक्म दिया और क़ाफ़िला आगे बढ़ गया। शहज़ादी ने अंगूठी अपनी उंगली में पहन ली। उसकी मुहिम का एक बड़ा मरहला तय हो गया।
फिर वह ऊँट पर बैठी और दो रोज़ के सफ़र के बाद उस गाँव में पहुँच गई, जहाँ शेखा मंसूर मौजूद था। ऊँट उसे वहाँ छोड़कर वापस चला गया। शहज़ादी पूछते-पूछते शेखा मंसूर के पास पहुँच गई। शेखा मंसूर ने शहज़ादी से पूछा, "तुम कौन हो, लड़के, और कहाँ से आए हो?"
शहज़ादी ने कहा, "मैं मर्द नहीं, औरत हूँ और कोहे काफ़ की शहज़ादी हूँ। यह मेरा पालतू तोता है।" फिर शहज़ादी ने सारी बात शेख मंसूर को बता दी। शेख मंसूर ने कहा, "तो तुम इस नामुराद परिंदा औरत को हलाक करना चाहती हो, जिसने मेरे इकलौते बेटे को हलाक कर दिया था। लेकिन वो तो इंतहाई ताकतवर जादूगरनी है। वो तो तुम्हें जादू की मदद से हलाक कर देगी।"
तो शहज़ादी ने उसे बताया कि उसने वह अंगूठी हासिल कर ली है, जिसकी वजह से परिंदा औरत का जादू उस पर असर न करेगा। बूढ़ा बोला, "तो फिर मुझसे क्या चाहती हो? मैं तुम्हारी ज़रूर मदद करूँगा, ताकि तुम इस नामुराद परिंदे को हलाक करके इसके क़ब्ज़े से अपने शौहर को बचा सको।" शेख मंसूर ने खुश होते हुए कहा, "इस तरह मेरे बेटे का इंतक़ाम, यानी बदला भी पूरा हो जाएगा।"
शहज़ादी ने कहा, "तुम्हारे पास एक तलवार है, जिसके दस्ते पर दो लड़ती हुई औरतों की तस्वीर बनी है। वो तलवार मुझे दे दो। इस तलवार से ही वह परिंदा औरत हलाक हो सकती है।" शहज़ादी ने कहा। तो शेख मंसूर ने वह तलवार शहज़ादी को दे दी। शहज़ादी खुश हुई। उसकी मुहिम का दूसरा मरहला भी तय हो गया।
फिर शेख मंसूर से इजाज़त लेकर शहज़ादी इस गाँव के ताजिर के पास पहुँची। यह घोड़ों का ताजिर था, क्योंकि उसके पास काफ़ी दौलत थी, जो उसने छुपा कर रखी हुई थी। उसने ताजिर से एक सेहतमंद और ताक़तवर घोड़ा ख़रीदा। फिर उस घोड़े पर सवार होकर वह मंज़िलें मारती हुई तकरीबन 10 रोज़ के बाद दोबारा उस वादी में पहुँच गई, जहाँ उसके शौहर को परिंदा-नुमा औरत उठाकर ले गई थी।
अभी शहज़ादी वहाँ पहुँची ही थी कि वही परिंदा औरत उड़ती हुई उसके पास पहुँच गई। "तुम फिर आ गई हो। अब तुम्हें हलाक करके ही छोडूंगी।" परिंदा औरत ने हवा में उड़ते हुए चीख़ कर कहा।
"मेरे शौहर का क्या हाल है? मुझे उसके मुताल्लिक बताओ।" शहज़ादी ने मन में मौजूद तलवार के दस्ते को मज़बूती से पकड़ा, क्योंकि वह शहज़ादी थी, इसलिए तलवार से लड़ने का फ़न वह अच्छी तरह जानती थी।
परिंदा औरत ने जवाब दिया, "तुम्हारा शौहर मेरी बात नहीं मान रहा था और सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम ले रहा था, इसलिए मैंने उसे बेहोश कर दिया। अब मैं तुम्हें हलाक करके जब तुम्हारी लाश उसके सामने लेकर जाऊँगी, तो मुझे यक़ीन है कि फिर वह मुझसे शादी करने पर तैयार हो जाएगा।"
शहज़ादी ने कहा, "आख़िर तुम उससे शादी करना क्यों चाहती हो? वह तो अहमक़ का और बुज़दिल शहज़ादा है।" वह उसे मुसलसल बातों में लगाए रखना चाहती थी, ताकि उसे उसके पंख काटने का मौक़ा मिल सके। फिर मैंने पहले भी तुम्हें बताया था कि उसमें हर वो सिफ़ात हैं, जिनकी वजह से मैं उससे शादी करना चाहती हूँ। ऐसे लोग अपनी बीवी के बेहद वफ़ादार होते हैं। तुमने भी तो इसीलिए उससे शादी की थी ना? इसी वजह से वह अब भी तुम्हारे नाम की माला जपता है।"
शहज़ादी ने कहा, "तुम्हारी यह ख़्वाहिश कभी पूरी नहीं होगी।" परिंदा औरत ने हैरान होते हुए शहज़ादी से पूछा, "नामुराद, मेरी समझ में नहीं आ रहा कि तुम पर मेरे जादू का असर क्यों नहीं हो रहा? वरना अब तक तो तुम्हें हलाक हो जाना चाहिए था, लेकिन तुम वैसी की वैसी हो।"
शहज़ादी ने कहा, "इसीलिए कि मैं मजलूम हूँ और तुम ज़ालिम हो, और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मजलूम की मदद हमेशा अल्लाह ताला करता है।" शहज़ादी ने जवाब दिया। और फिर उसी लम्हे उसे तलवार चलाने का मौक़ा मिल गया, क्योंकि परिंदा औरत पुकारती हुई उसके क़रीब आ गई। शहज़ादी ने बिजली की तेज़ी से तलवार निकाली और एक ही वार में उसने परिंदा औरत का एक पंख काट डाला। परिंदा औरत चीख़ती हुई नीचे गिरी ही थी कि शहज़ादी ने दूसरा वार किया और इस बार उसने परिंदा औरत का दूसरा पंख काट दिया। जैसे ही परिंदा औरत का दूसरा पंख कटा, वह चीख़ती हुई ज़मीन पर लोटपोट हुई और उसके साथ ही अचानक ग़ायब हो गई। अलबत्ता उसके कटे हुए पंख दोनों वहीं ज़मीन पर पड़े हुए थे।
उसी लम्हे झाड़ियों की ओट से तोता निकला और उसने वो पंख अपनी चोंच में दबा लिए। शहज़ादी ने तोते से कहा, "ख़्याल रखना, तोते, तुमने कामयाब लौटना है। ऐसा न हो कि तुमसे कोई ग़लती हो जाए।" तोते ने कहा, "आप बेफ़िक्र रहें, शहज़ादी, मैं इंशाअल्लाह कामयाब लौटूंगा।" तोते ने पैर को पंजे में पकड़ते हुए कहा और फिर उड़ता हुआ शहज़ादी की नज़रों से ग़ायब हो गया।
शहज़ादी जानती थी कि अब वह समंदर के अंदर जज़ीरे पर जाएगा और वैसे ही क़बीले के सरदार के बीमार बेटे को सेहतयाब करेगा और फिर वह सरदार से मोती लेकर वापस आएगा और तब तक उसे इंतज़ार करना होगा। चुनांचे शहज़ादी इस वादी में वाक़िअ एक छोटी सी पहाड़ी में बने हुए घर में जाकर ठहर गई।
दूसरे रोज़ तोता वापस आ गया, तो उसकी चोंच में वह मोती मौजूद था। उसने घर में ही शहज़ादी के सामने मोती डाल दिया। "क्या हुआ? किस तरह मिला यह मोती?" शहज़ादी ने मोती अपने पास रख लिया। फिर उसने सुनहरे पानी का...
चश्मा तलाश करना शुरू कर दिया। जब वह चश्मा उसे मिल गया तो उसने मोती को चश्मे में डाल दिया। दूसरे लम्हे सुनहरे रंग का एक बड़ा सा कछुआ पानी में से निकला। उसने मोती खा लिया।
"बहुत शुक्रिया शहजादी। तुमने मुझे यह मोती लाकर दिया। अब मेरी जिंदगी लाखों साल की हो जाएगी। बोलो मैं तुम्हारी क्या खिदमत कर सकता हूं?" सुनहरे कछुए ने इंसानी आवाज में कहा।
"तुम मुझे इस घर का पता बता दो जहां परिंदा औरत छुपी हुई है," शहजादी ने कहा। तो कछुए ने उसे तफसील के साथ उस घर का पता बता दिया और फिर वह चश्मे में गौता लगाकर शहजादी और उसके कंधे पर बैठे हुए तोते की नजरों से गायब हो गया।
शहजादी वापस मुड़ी और फिर उसने घर की तलाश शुरू कर दी। फिर वाकई कछुए की बताई हुई तफसील की वजह से वो उस घर तक पहुंचने में कामयाब हो गई। घर के दहाने पर सुनहरी रंग की मकड़ी का जाला लगा हुआ था।
"शहजादी तुम तलवार लेकर यहां करीब ही चट्टान की ओठ में छुप जाओ और जैसे ही वह परिंदा औरत बाहर निकले तुमने उसके संभलने से पहले उस पर तलवार का वार कर देना," तोते ने कहा। तो शहजादी ने इस बात में सर हिला दिया और घर के करीब ही एक चट्टान की ओठ में छुप कर खड़ी हो गई। तलवार उसने हाथ में पकड़ी हुई थी।
फिर तोते ने अपनी चोंच की मदद से सुनहरी जाले को काटना शुरू कर दिया। जैसे ही झाला कटा घर के अंदर से परिंदा औरत हाथ में तलवार लिए चीखती हुई आ गई। शहजादी तो पहले ही उसके इंतजार में थी। उसने चट्टान की ओड से निकलकर तेजी से उस पर हमला कर दिया। फिर इससे पहले कि परिंदा औरत संभलती शहजादी ने तलवार का वार उसकी गर्दन पर कर दिया। जैसे ही परिंदा औरत की गर्दन पर जख्म हुआ, वो चीखती हुई नीचे गिरी और चंद लम्हे तड़पने के बाद हलाक हो गई।
उसके हलाक होते ही एक धमाका हुआ। हर तरफ सुर्ख रंग का धुआं छा गया। कुछ देर के बाद शहजादी ने देखा जहां पहले परिंदा औरत की लाश पड़ी हुई थी। अब वहां राख का ढेर पड़ा हुआ था। शहजादी बेहद खुश हुई। उसने करीब ही चश्मे पर से अपनी छागल पानी से भरी और घर में दाखिल हो गई। वहां वाकई शहजादा बेहोशी के आलम में पड़ा हुआ था। शहजादी ने उसके मुंह में पानी डाला तो वह होश में आ गया।
शहजादे ने होश में आते हुए हैरत भरी नजरों से इधर-उधर देखते हुए कहा, "मैं कहां हूं? मैं कहां आ गया हूं? वो नामुराद परिंदा औरत कहां है? और शहजादी तुम यहां कैसे आ गई? तोता भी यहां मौजूद है।"
शहजादी ने उसे अपनी मुहिम के बारे में सारी तफसील बता दी।
"शहजादी तुम कितनी बहादुर और अकलमंद हो। तुमने मुझे बचाने के लिए बहुत हिम्मत से काम लिया। मैं हमेशा तुम्हारा एहसानमंद रहूंगा," शहजादे ने खुश होते हुए यह सब कहा।
शहजादी ने अपने शौहर से कहा, "यह मेरा फर्ज था शहजादे कि मैं अपने शौहर को बचाऊं। मैंने यह काम करके तुम पर कोई एहसान नहीं किया। वैसे भी मुझे मालूम है कि तुमने भी मेरी खातिर इस दरिंदा औरत से शादी करने से साफ इंकार कर दिया था। मुझे यह मालूम करके बेहद खुशी हुई।"
"तुम खुद ही बताओ, यह भला कैसे हो सकता था कि मैं तुम जैसी खूबसूरत बहादुर और अक्लमंद शहजादी को छोड़कर इस बदसूरत नामुराद औरत से शादी कर लेता," शहजादे ने जवाब देते हुए कहा।
शहजादे ने बड़े मासूम लहजे में कहा तो शहजादी और तोता दोनों उसकी मासूमियत पर बेइख्तियार हंस पड़े। फिर वह घर से बाहर आ गए।
अभी घर से बाहर आए थे कि अचानक आसमान से एक चार सींगों वाला देव शहजादी पर झपटा और चीखती हुई शहजादी को उठाकर देखते ही देखते आसमान की बुलंदी में जाकर नजरों से गायब हो गया।
"यह क्या हुआ?" शहजादे ने चीखते हुए कहा।
तोता उस चार सींगों वाले के पीछे गया। लेकिन थोड़ी देर बाद ही वापस आ गया। "वह मेरी नजरों से गायब हो गया है," तोते ने कहा।
"शहजादे अब क्या करें? ना जाने यह कौन था। मैं अपनी बीवी को बचाऊंगा, लेकिन कैसे बचाऊं। मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा," शहजादे ने इंतहाई परेशान लहजे में कहा।
"तुम अच्छे शहजादे हो इसलिए मैं तुम्हारी मदद करूं।" अचानक उन्हें बारीक सी आवाज सुनाई दी। तो शहजादा और उसके कंधे पर बैठा हुआ तोता तेजी से चट्टान की तरफ मुड़े। उन्होंने देखा कि चट्टान पर एक सुनहरे रंग का बौना खड़ा था। उसके जिस्म पर लिबास भी सुनहरी था। उसने सुनहरी रंग की नोकदार टोपी पहनी हुई थी।
"सुनहरी बौने? तुम कौन हो?" शहजादे ने हैरान होकर पूछा।
"शहजादे तुम कौन हो? मैं इस वादी में रहता हूं। मैं सुनहरे बौनों का शहजादा हूं। मेरा नाम अलकासिम है। मैं तुम्हारी मदद करने आया हूं। लेकिन तुम्हें बहादुरी, अक्ल और हौसले से काम लेना पड़ेगा," सुनहरी बौने ने कहा।
"शहजादा बोला लेकिन मैं तो अहमक और बुजदिल हूं अलकासिम मैं क्या करूं?" शहजादे ने मुंह मोड़ते हुए कहा।
तो सुनहरी बौना देखकर हंस पड़ा। "यहां से कुछ फासले पर दरख्तों का एक झुंड है। इस झुंड के दरमियान एक दरख्त है जिस पर आम जैसा एक फल लगा हुआ है। इस फल को बहादुरी का फल कहते हैं। जो इस फल को खा ले वो इंतहाई बहादुर हो जाता है। इस झुंड में एक चश्मा है। जो इस चश्मे का पानी पी ले वो इंतहाई अकलमंद हो जाता है। इसलिए तुम पी लो। इस तरह तुम बहादुर और हौसलामंद हो जाओगे और अकलमंद भी। जाओ और यह दोनों काम कर लो फिर यहां वापस आ जाना। फिर मैं तुम्हें बताऊंगा कि तुम अपनी बीवी कोहे काफ की शहजादी को किस तरह बचा सकते हो," सुनहरी बौने ने कहा।
तो शहजादा उसकी बात सुनकर बेहद खुश हुआ। वो तोते को साथ लेकर उस झुंड की तलाश में आगे बढ़ा और फिर थोड़ी देर बाद उस जगह को तलाश करने में कामयाब हो गया। तोते ने दरख्त से फल तोड़कर शहजादे को दिया और शहजादे ने इस फल को खा लिया। जैसे ही उसने फल खाया तो उसे महसूस होने लगा कि उसके अंदर बहादुरी और हौसला आ गया है। फिर उसने चश्मे का पानी पिया तो उसे महसूस हुआ कि उसमें अकगल भी आ गई है।
"बहुत खूब। अब मैं बहादुर भी हूं और अकलमंद भी," शहजादे ने खुश होते हुए कहा। तो तोता खुश हो गया। फिर वो दोनों वापस चट्टान के पास आ गए जहां सुनहरी बौना मौजूद था।
"तुम्हारा बेहद शुक्रिया अलकासिम तुमने मुझे बहादुर और अकलमंद बना दिया है। मैं तुम्हारा यह एहसान हमेशा याद रखूंगा," शहजादे ने कहा।
"ऐसी कोई बात नहीं शहजादे दरअसल तुम बहादुर भी थे और अकलमंद भी। लेकिन लोगों ने ख्वाह मख्वाह तुम्हें बुजदिल और अहमक मशहूर कर दिया था। इस फल को खाने और चश्मे का पानी पीने से तुम्हारी यह सलाहियत तुम पर जाहिर हो गई है। फिर भी तुम्हारा शुक्रिया। अब तुम मुझे बताओ कि वह चार सींगों वाला देव उसे कहां ले गया है?" बौने ने कहा।
"यहां से शुमाल की जानिब 1000 मील के फासले पर एक वादी है जिसे वादी सिया कहा जाता है। इस वादी की निशानी यह है कि इसके अंदर एक महल बना हुआ है। इस महल का कोई दरवाजा नहीं है। यह महल एक जादूगर का है जिसका नाम जाफर जादूगर है। जाफर जादूगर दरअसल इस परिंदा औरत का भाई है। उसे जब मालूम हुआ कि शहजादी ने उसकी बहन को हलाक कर दिया है तो उसे गुस्सा आ गया। उसने अपने जादू के जोर से शहजादी को अपने महल में उठवा लिया है और उसे कैद कर दिया है। अब वह शहजादी से जबरदस्ती शादी करना चाहता है। चुनांचे अब जादूगर तुम्हें हलाक करना चाहता है। लेकिन जब तक तोता तुम्हारे साथ है, जादूगर का कोई जादू तुम पर असर नहीं कर सकता। तुम ऐसा करो कि इस महल के पास चले जाओ। फिर तोता उड़ता हुआ इस महल के अंदर जाएगा और शहजादी से वह सुर्ख रंग की अंगूठी ले आएगा जो उसने सरदार मूसा से नखलिस्तान में दो परिंदे देकर ली थी। फिर तुम इस अंगूठी को पहन लेना। इस तरह जादूगर का जादू तुम पर असर नहीं करेगा। इसके बाद तुम इस अंगूठी को महल की दीवार से लगा देना तो महल में दाखिल होने का रास्ता नमूदार हो जाएगा। तुम अंदर चले जाना। वहीं चार सींगों वाला आदमी तुम्हारा मुकाबला करेगा। तुम किसी तरह मौका पाकर अपनी तलवार से उसका सींग काट देना। वो हलाक हो जाएगा तो फिर जादूगर तुम्हारे मुकाबले पर आ जाएगा। इसीलिए तोता अपने पंजे मारकर इस जादूगर की दाई आंख झाया कर देगा। इस तरह तुम्हें मौका मिल जाएगा और तुम इस जादूगर की दाई टांग काट देना। जैसे ही जादूगर की दाई टांग कटेगी वो जादूगर गायब हो जाएगा। फिर तुम इस महल के अंदर बने हुए तालाब के पास पहुंच जाना। वहां तालाब के अंदर सुनहरी रंग का एक फूल है। जिसकी हिफाजत दो खौफनाक दस्ते करते हैं। तुम इन दोनों दस्तों को हल्लाक करके यह फूल तोड़ लेना। जैसे ही तुम फूल तोड़ोगे, एक भूखा शेर तुम्हारे मुकाबले पर आ जाएगा। तुम उसे हलाक कर देना। जैसे यह शेर हलाक होगा, जादूगर एक बार फिर तुम्हारे मुकाबले पर आ जाएगा। लेकिन अब वो लंगड़ा होगा। इस बार तुम उसकी बाई टांग काट देना। जैसे ही उसकी बाई टांग कटेगी, वो जादूगर हलाक हो जाएगा और शहजादी तुम्हें मिल जाएगी। फिर तुम कोहे काफ चले जाना और तुम्हारी बाकी जिंदगी इंतहाई खुशी से गुजरेगी," सुनहरी बौने ने यह सब कहा और इसके साथ ही वह चट्टान से छलांग लगाकर गायब हो गया।
"मैं यह सब कुछ करूंगा," शहजादे ने कहा और वाकई वह बहादुर हो गया था। फिर शहजादे ने तोते को कंधे पर बैठाकर उस वादी-ए- सियाह की तरफ बढ़ गया। शहजादी जिस घोड़े पर आई थी, वह घोड़ा उसने पकड़ लिया और फिर उस घोड़े पर सफर करते हुए वो चार रोज तक सफर करने के बाद उस वादी में पहुंच गए। जहां एक स्याह रंग के पत्थरों से बना हुआ एक महल मौजूद था। इसमें वाकई कोई दरवाजा नहीं था।
"जाओ तोते जाकर शहजादी से वह अंगूठी ले आओ," शहजादे ने तोते से कहा।
"हां, मैं ले आता हूं," तोते ने कहा और उड़ता हुआ महल के अंदर चला गया। काफी देर बाद वह वापस आया तो उसके पंजे में अंगूठी मौजूद थी। शहजादे ने उससे अंगूठी ली और उंगली में पहन ली। फिर आगे बढ़कर उसने अंगूठी को महल की दीवार से लगाया। एक जोरदार धमाका हुआ। उसके साथ ही महल की दीवार दरमियान से गायब हो गई और अंदर जाने का रास्ता बन गया। शहजादा अंदर दाखिल हो गया। उसने तलवार हाथ में पकड़ ली।
अभी वह अंदर पहुंचा ही था कि दूर से चार सींगों वाला देव हाथ में गर्ज पकड़े दौड़ता हुआ उसकी तरफ बढ़ा। "तुम यहां कैसे आ गए? मैं तुम्हें हलाक कर दूंगा," चार सींगों वाले आदमी ने चीखते हुए कहा। लेकिन उसे मालूम नहीं था कि अब शहजादा बहादुर बन चुका है। फिर थोड़ी देर बाद शहजादे ने वाकई इंतहाई बहादुरी और अकलमंदी से काम लेते हुए इस आदमी की टांग पर वार किया क्योंकि वह आदमी शहजादे के कद से बहुत ऊंचा था। शहजादे का हाथ उसके सींगों तक नहीं जा सकता था। चुनांचे उसने टांग पर वार किया ताकि वह नीचे गिर पड़े तो उसके सींग काटने का मौका मिल जाए। शहजादा अपनी इस अकलमंदी की वजह से अपने मकसद में कामयाब हो गया। वह आदमी टांग पर जख्म खाकर जैसे ही नीचे गिरा, शहजादे ने तेजी से उसके सींगों पर तलवार का भरपूर वार किया और उस आदमी के चारों सींग कट कर दूर जा गिरे। उसके साथ ही वह एक चीख मारकर हलाक हो गया।
उसके हलाक होते ही एक लहीम शहीम आदमी चीखता हुआ उसकी तरफ आया। उसके दोनों हाथों में तलवारें थी और उसने सियाह रंग का लिबास पहना हुआ था। शहजादा समझ गया कि यही जाफर जादूगर है परिंदा औरत का भाई। फिर वो जादूगर जैसे ही चीखता और गुस्से से दहाड़ता हुआ करीब आया तोते ने झपट्टा मारा और अपने पंजे से उसने जादूगर की दाई आंख जख्मी कर दी। आंख के जख्मी होते ही जादूगर के हाथ से तलवारें गिर गई और वह तकलीफ से चीखता हुआ दोहरा हो गया। शहजादे को मौका मिल गया। उसने तेजी से तलवार का वार करके जादूगर की दाई टांग काट डाली। जैसे ही जादूगर की टांग कटी, जादूगर ने जोर से चीख मारी, उसके साथ ही वह गायब हो गया।
शहजादे ने इत्मीनान का सांस लिया और फिर वो तालाब के करीब पहुंच गया। वहां वाकई तालाब के दरमियान एक सुनहरा फूल मौजूद था। लेकिन दो खौफनाक दस्ते उसकी हिफाजत कर रहे थे। शहजादे ने इंतहाई बहादुरी और हौसले के साथ इंतहाई अक्लमंदी से काम लेते हुए एक-एक करके दोनों मसलों को हल कर दिया। और फिर हाथ बढ़ाकर उसने सुनहरी फूल तोड़ लिया। जैसे ही शहजादे ने फूल तोड़ा, एक तरफ से एक खौफनाक शेर दौड़ता हुआ आया और शहजादे पर हमला आवर हो गया। शहजादा उस भूखे शेर पर टूट पड़ा। वो उस भूखे शेर से इंतहाई बहादुरी से लड़ा और आखिरकार उसने शेर को हलाक कर दिया। जैसे ही शेर हलाक हुआ, लंगड़ा जादूगर लंगड़ाता हुआ अचानक नमूदार हुआ। उसने एक बार फिर शहजादे पर हमला कर दिया। शहजादा इंतहाई बहादुरी से लड़ने लगा क्योंकि उसकी उंगली में सुर्ख अंगूठी मौजूद थी। इसलिए जादूगर का कोई जादू उस पर नहीं चला। उधर तोता भी शहजादे की पूरी मदद कर रहा था। वो बार-बार झपट कर उसकी बाई आंख पर हमला कर रहा था। जिसकी वजह से जादूगर को शहजादे पर हमला करने का मौका नहीं मिल रहा था। फिर शहजादे का दांव चल गया। उसने जादूगर की बाई टांग पर तलवार का वार किया और जादूगर की बाई टांग भी कट गई। इसके साथ ही एक खौफनाक धमाका हुआ। हर तरफ स्याह रंग का धुआं छा गया और जब धुआं छटा तो शहजादी उसके पास मौजूद थी। उन दोनों ने एक दूसरे को मुबारकबाद दी। तोता भी बेहद खुश था।
शहजादी ने शहजादे की बहादुरी और अकलमंदी की बेहद तारीफ की। "वो वाकई बेहद खुश थी। शहजादे मुझे हकीकत में बेहद खुशी हो रही है कि तुम बहादुर और अक्लमंद शहजादे हो। तुमने मेरी जान बचाई। अब मैं हमेशा तुम्हारी खिदमत किया करूंगी," शहजादी ने कहा।
"शहजादा ज़द ने कहा तुम मेरी बीवी हो तुमने मेरी जान बचाई आओ अब चले," और फिर वो एक ही घोड़े पर बैठकर कोहेकाफ रवाना हो गए। कोहेकाफ की सरहद के बाहर बादशाह ने अपने अमीरों और अफसरों के साथ उनका इस्तकबाल किया और जब बादशाह को हालात का इल्म हुआ तो वह भी शहजादे की बहादुरी और अकलमंदी पर खुश हुआ। बादशाह ने पूरे कोहे काफ में सात रोज तक जश्न मनाने का ऐलान किया।
जब शहजादा अपनी बीवी को लेकर वापस अपने मुल्क में आया तो वहां भी दोनों की बहादुरी और अकलमंदी की इत्तला पहुंच चुकी थी। बादशाह बेहद खुश हुआ और वहां भी उसकी खुशी में जश्न मनाया गया और फिर वो सब लोग खुश होकर जिंदगी गुजारने लगे।
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