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Lalach Se Taqdeer Nahi Badalti | Taqdeer Sirf Allah Badalta Hai | Heart Touching Islamic Story |

Mr. MR Voice 49:52

Transcription

सदियों पुरानी बात है जब बगदाद की सरज पर एक मशहूर सौदागर रहता था जिसका नाम मलिक जफर था। मलिक जफर के पास बेशुमार दौलत थी और उसका कारोबार इतना फैला हुआ था कि लोग कहते थे कि शहर का हर दूसरा सिक्का मलिक जफर की तिजोरी में जाकर गिरता है। वह रेशम और मखमली कपड़ों का सबसे बड़ा व्यापारी था। जिसकी दुकान पर हमेशा अमीर रईसों और बादशाह के दरबारियों की भीड़ लगी रहती।

मगर जितनी उसकी दौलत बढ़ रही थी, उतना ही उसका दिल तंग और काला होता जा रहा था। तकब्बुर उसके सर पर सवार था और वह अपनी दौलत के नशे में इस कदर चूर था कि उसे अपने सामने खड़ा इंसान इंसान नहीं बल्कि कीड़ा मकोड़ा नजर आता था। मलिक जफर का मानना था कि गरीबी एक बीमारी है और गरीबों से दूर रहना ही सेहतमंद जिंदगी की निशानी है। जब भी कोई फकीर या जरूरतमंद उसकी दुकान चबूतरे के पास भी भटकता तो वह अपने नौकरों से कहकर उसे धक्के मरवा कर निकलवा देता और फिर अपनी महंगी पोशाक झाड़ते हुए कहता कि इन मनहूसों की परछाई भी मेरे रेशम को मैला कर देती है।

उसी शहर के दूसरे कोने पर एक वीरान और खस्ताहल बस्ती थी। जहां एक बूढ़ा मोची रहता था, जिसका नाम चाचा करीम था। चाचा करीम की पूरी जिंदगी दूसरों के फटे हुए जूते सीधे-सीधे गुजर गई थी। उसके हाथों की लकीरें मेहनत की गवाही देती थी और उसका चेहरा गरीबी की धूप में झुलसा हुआ था। मगर उसकी आंखों में एक अजीब सा नूर और संतोष था।

चाचा करीम के घर में सिवाय एक बीमार पोती के और कोई नहीं था। जिसकी दवा और खाने का इंतजाम करने के लिए वह दिन रात सुई धागा चलाता रहता था। मगर कभी-कभी हालात इतने बदतर हो जाते थे कि दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी किसी जंग लड़ने से कम नहीं होता था।

एक बार शहर में जबरदस्त कहद पड़ा यानी सूखा पड़ गया और खानेपीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगे। लोग दानेदाने को मोहताज हो गए। मगर मलिक जफर की तिजोरियां और उसके गोदाम अनाज और दौलत से भरे हुए थे। उसने इस मुसीबत के वक्त में भी गरीबों की मदद करने के बजाय चीजों के दाम और बढ़ा दिए ताकि वह लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर और ज्यादा मुनाफा कमा सके। यह वह वक्त था जब इंसानियत सिसक रही थी और लालच अपने पूरे उफान पर था।

इसी दौरान एक दिन दोपहर की तपती हुई गर्मी में जब सूरज आग बरसा रहा था। मलिक जफर अपनी दुकान पर बैठा ठंडी हवा का लुत्फ उठा रहा था और अपने मुनीम के साथ मुनाफे का हिसाब लगा रहा था। तभी वहां एक अजीब हुलिए वाला बुजुर्ग शख्स आया। उस बुजुर्ग के कपड़े बहुत पुराने थे जिन पर कई जगहों पर पैबंद लगे हुए थे। उसके चेहरे पर सफेद दाढ़ी थी जो धूल से अटी हुई थी और आंखों में एक ऐसी चमक थी जो किसी आम इंसान की आंखों में नहीं होती। वह बुजुर्ग कोई मामूली भिखारी नहीं बल्कि एक पहुंचे हुए दरवेश थे जो इंसान की नियत परखने के लिए भेष बदल कर आए थे।

दरवेश ने मलिक जफर की दुकान के सामने रुक कर अपनी सूखी हुई जुबान लबों पर फेरी और बहुत ही धीमी आवाज में कहा ए दौलत के मालिक अल्लाह के नाम पर इस मुसाफिर को थोड़ा पानी और कुछ खाने को दे दे। तीन दिन से मेरे हलक से एक दाना नहीं उतरा है। मुझे थोड़ा सा आसरा दे दे। तेरा रुतबा और बढ़ जाएगा।

मलिक जफर ने जब उस मैले कुचैले फकीर को अपनी चमचमाती दुकान के सामने खड़ा देखा तो उसका खून खौल उठा। उसने अपनी नाक पर रुमाल रखते हुए हिकारत से कहा, अरे ओ बदबूदार इंसान तुझे हिम्मत कैसे हुई? मेरी दुकान की सीढ़ियों पर कदम रखने की देख नहीं रहा। यहां कितनी कीमती चीजें रखी हैं। तेरी गंदी सांसों से मेरा सारा माल खराब हो जाएगा। निकल जा यहां से वरना खाल उधरवा दूंगा।

दरवेश ने मलिक जफर की कड़वी बातें सुनकर भी सब्र का दामन नहीं छोड़ा और बहुत नरमी से बोले बेटा दौलत तो आती जाती छाया है। आज तेरे पास है। कल किसी और के पास होगी। मगर किसी भूखे को खाना खिलाना ऐसी दौलत है जो कभी कम नहीं होती। मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस अपनी दुकान के कोने में पड़ा कोई सूखा टुकड़ा ही दे दे ताकि मेरी जान में जान आ जाए।

मलिक जफर को लगा कि यह फकीर उसका वक्त बर्बाद कर रहा है और उसकी शान में गुस्ताखी कर रहा है। उसके दिमाग में एक शैतानी ख्याल आया। उसने सोचा कि इस फकीर को ऐसा सबक सिखाना चाहिए कि यह दोबारा इधर का रुख ना करे और बाकी भिखारियों के लिए भी यह एक मिसाल बन जाए। मलिक जफर ने एक झूठी मुस्कुराहट अपने चेहरे पर सजाई और अपने नौकर को इशारा करते हुए बोला। अरे रुको रुको यह बुजुर्ग बहुत भूखे लगते हैं। इन्हें खाली हाथ भेजना हमारी शान के खिलाफ होगा। जाओ अंदर से वह खास पोटली लेकर आओ जो हमने ऐसे खास मेहमानों के लिए रखी है।

नौकर समझ गया कि मालिक कुछ शरारत करने वाले हैं। वह अंदर गया और थोड़ी देर बाद एक मखमली थैली लेकर आया जो बाहर से देखने में बहुत खूबसूरत और कीमती लग रही थी। मलिक जफर ने वह थैली अपने हाथों में ली और बड़े एहतराम का नाटक करते हुए दरवेश के हाथों में थमा दी और बोला बाबा यह मेरी तरफ से आपके लिए एक कीमती तोहफा है। इसे अभी मत खोलना। जब आप अपनी बस्ती में पहुंच जाओ तब इसे खोलना और अपनी भूख मिटाना। इसमें वह चीज है जो आप जैसे लोगों की किस्मत में बहुत कम लिखी होती है।

दरवेश ने उस थैली को लिया तो उन्हें महसूस हुआ कि इसमें कुछ भारी सा है। उन्होंने मलिक जफर की आंखों में झांका जहां मक्कारी और तकब्बुर साफ झलक रहा था। मगर दरवेश ने कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी सांस ली और बोले अल्लाह तेरी नियत का फल तुझे दे। अगर तूने इसमें नेकी भरी है तो तुझे नेकी मिलेगी। और अगर तूने इसमें कुछ और भरा है तो तुझे वही वापस मिलेगा। इतना कहकर दरवेश वहां से मुड़ गए।

मलिक जफर और उसके नौकर पीछे खड़े होकर जोर-जोर से हंसने लगे क्योंकि उस मखमली थैली में कोई खाना या दौलत नहीं थी बल्कि दुकान का निकला हुआ कूड़ा कर्कट और मरे हुए कीड़े मकोड़े और राख भरी हुई थी। मलिक जफर ने हंसते हुए कहा अब जब यह बुड्ढा उस थैली को खोलेगा तो उसका चेहरा देखने लायक होगा। मुफ्त में खाना मांगते हैं। कामचोर कहीं के।

दरवेश वहां से चलते हुए बस्ती के उस हिस्से में पहुंचे जहां मोची चाचा करीम अपनी छोटी सी झोपड़ी के बाहर बैठा एक पुराने जूते को टांग रहा था। चाचा करीम की नजर जब उस थके हारे बुजुर्ग पर पड़ी तो वह अपना काम छोड़कर फौरन खड़ा हो गया। उसने देखा कि बुजुर्ग के पैर नंगे हैं और धूप से जल रहे हैं। चाचा करीम ने आगे बढ़कर दरवेश का हाथ थामा और बड़े अदब से बोला बाबा आप बहुत थके हुए लग रहे हैं। आइए मेरी गरीब की कुटिया में थोड़ी देर सुस्ता लीजिए। मेरे पास ज्यादा तो कुछ नहीं है मगर जो भी है हाजिर है।

दरवेश ने चाचा करीम के चेहरे पर लिखी हुई सच्चाई और दर्द को पढ़ लिया। वह चुपचाप उसके साथ झोपड़ी के अंदर चले गए। झोपड़ी के अंदर गरीबी का आलम यह था कि छत से धूप छन कर आ रही थी और कोने में एक पुरानी चारपाई पर चाचा करीम की बीमार पोती लेटी हुई थी। चाचा करीम ने अपनी पोती के लिए रखा हुआ बचा कुचा आधा रोटी का टुकड़ा और मिट्टी के प्याले में पानी लाकर दरवेश के सामने रख दिया और शर्मिंदगीगी से सर झुका कर बोला बाबा आज मेरी कमाई नहीं हुई इसलिए बस यही रूखासखा है। आप इसे कबूल करें। मुझे खुशी होगी कि मेरे घर आए मेहमान ने भूखे पेट वापस नहीं जाना पड़ा।

दरवेश ने उस रोटी के टुकड़े को देखा और फिर चाचा करीम की तरफ देखा जिसकी खुद की आंखें भूख से धंसी हुई थी। दरवेश ने पूछा बेटा अगर यह रोटी मैं खा लूंगा तो तुम और तुम्हारी यह बच्ची क्या खाएगी? चाचा करीम ने मुस्कुराते हुए अपनी नम आंखों खाया और कहा बाबा हम तो आदत के पक्के हैं। भूख बर्दाश्त कर लेंगे। मगर आप मुसाफिर हैं और मेहमान अल्लाह की रहमत होता है। आप इसे खाइए। आपकी दुआओं से शायद मेरी बच्ची की बीमारी दूर हो जाए और मेरे घर के हालात बदल जाए।

दरवेश ने वह रोटी का टुकड़ा खाया और पानी पिया तो उनके चेहरे पर एक रूहानी सुकून आ गया। उन्होंने अपने पास मौजूद वह मखमली थैली जो मलिक जफर ने दी थी निकाली और चाचा करीम के हाथों में रख दी और बोले बेटा तूने अपनी जरूरत को मारकर मेरी भूख मिटाई है। तूने एक अनजान मुसाफिर को अपने हिस्से का निवाला दिया है। यह थैली मुझे एक अमीर सौदागर ने दी है। उसने कहा था कि इसमें बहुत कीमती चीज है। मगर मुझे लगता है कि इस कीमती तोहफे का असली हकदार तू है। इसे रख ले। शायद इसमें तेरी मुसीबतों का हल हो।

चाचा करीम ने झिझकते हुए वह थैली थाम ली और बोला, नहीं बाबा, मैं यह कैसे ले सकता हूं? मगर दरवेश ने उसके सर पर हाथ फेरा और कहा रख ले बेटा जिस नियत से यह दी गई है उसी नियत से इसका असर जाहिर होगा। यह कहकर दरवेश ने आसमान की तरफ देखा और एक अजीब से भारी आवाज में दुआ दी कि या अल्लाह जिसका जो असल है उसे वही लौटा दे और जिसकी जो नियत है उसे वैसा ही फल दे। इस फकीर की झोली में जो था वह यहां पहुंच गया। अब जो वहां बचा है उसे बढ़ने दे। दरवेश यह कहकर झोपड़ी से बाहर निकल गए और देखते ही देखते भीड़ में कहीं ओझल हो गए।

चाचा करीम ने हैरान होकर उस भारी और खूबसूरत मखमली थैली को देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इसमें क्या है। उसने कांपते हाथों से थैली की डोरी खोली। जैसे ही उसने थैली खोली, उसके अंदर का मंजर देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं आया कि यह क्या है। थैली के अंदर कोई कूड़ा या राख नहीं थी बल्कि वह पूरी थैली बेशकीमती हीरों और सोने के सिक्कों से भरी हुई थी। उन हीरों की चमक से उसकी अंधेरी झोपड़ी रोशन हो गई थी। चाचा करीम घबरा गया कि कहीं यह कोई सपना तो नहीं। उसने सिक्कों को छू कर देखा। वह असली थे।

उधर शहर के बीचोंबीच मलिक जफर की हवेली में शाम का जश्न शुरू हो चुका था। वह अपने दोस्तों और चाटुकारों के साथ बैठकर अपनी चालाकी का किस्सा सुना रहा था कि कैसे उसने एक बूढ़े फकीर को बेवकूफ बनाया और उसे कूड़े से भरी थैली थमा दी। सब लोग उसकी वाहवाही कर रहे थे और ठहाके लगा रहे थे कि तभी अचानक हवेली के अंदर से एक नौकरानी की चीख सुनाई दी। चीख इतनी तेज और खौफनाक थी कि महफिल में सन्नाटा छा गया। मलिक जफर गुस्से में अपनी जगह से उठा और चिल्लाया। क्या बदतमीजी है? यह कौन है जो मेरी महफिल में इस तरह चीख रहा है?

अब भी वह यह बोल ही रहा था कि दूसरा नौकर दौड़ता हुआ आया। उसका चेहरा खौफ से सफेद पड़ा हुआ था और वह बुरी तरह कांप रहा था। उसने लड़खड़ाती जुबान में कहा। मालिक गजब हो गया। आप जल्दी अंदर चलिए गोदाम में। और तिजोरी वाले कमरे में कुछ बहुत भयानक हो गया है।

मलिक जफर का दिल जोर से धड़का। वह भागता हुआ अपनी तिजोरी वाले कमरे की तरफ गया। जैसे ही उसने दरवाजा खोला तो वहां का मंजर देखकर उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि यह उसका वही खजाना है जिस पर उसे इतना नाज था। उसकी तिजोरियों में जहां सोने चांदी के सिक्के और रेशम के थान रखे हुए थे। वहां अब सिर्फ राख कोयला और बदबूदार कीड़े मकोड़े बिलबिला रहे थे। उसकी बेशकीमती दौलत मिट्टी और गंदगी में बदल चुकी थी।

अभी उसने मुड़कर देखा भी नहीं था कि उसे अपने जिस्म पर एक अजीब सी जलन महसूस होने लगी जैसे हजारों अदृश्य सुइयां एक साथ चुभोई जा रही हो। उसने घबराकर अपनी रेशमी आस्तीन ऊपर की तो देखा कि उसकी त्वचा पर काले निशान उभरने लगे हैं। वही निशान जो उस राख और गंदगी के थे जिसे उसने उस फकीर को दिया था। दरवेश के अल्फाज फिजा में गूंज रहे थे कि जो तूने इसमें भरा है तुझे वही वापस मिलेगा।

मलिक जफर दर्द और दहशत से चिल्लाया मगर उसकी आवाज उसके अपने ही आलीशान और अब वीरान होते हुए घर में गूंज कर रह गई। यह कहर सिर्फ तिजोरी तक सीमित नहीं था। बल्कि उसकी दुकान, उसके गोदाम हर जगह जहांजहां उसने अपनी काली कमाई और लालच का जहर छुपा रखा था। वहां अब सिर्फ बदबूदार कीचड़ और काले धुएं का राज था। मलिक जफर पागलों की तरह अपनी तिजोरी के अंदर हाथ मार रहा था। मगर उसके हाथ में सोने के सिक्कों की जगह सिर्फ काली राख और रेंगते हुए बिच्छू आ रहे थे। वह चीख रहा था, चिल्ला रहा था और अपने नौकरों को हुक्म दे रहा था कि इस गंदगी को साफ करो। मगर जो भी नौकर उस गंदगी को साफ करने आगे बढ़ता, वह खुद भी उसी बदबू का शिकार हो जाता और उल्टियां करते हुए बाहर भाग जाता। हवेली जो कभी इत्र और फूलों की खुशबू से महकती थी। अब वहां ऐसी सड़ा फैल गई थी कि सांस लेना दुभ हो गया था।

मलिक जफर के जिस्म पर जो काले निशान उभरे थे उनमें अब बेतहाशा जलन होने लगी थी। वह अपने ही नाखूनों से अपनी खाल नोच रहा था और जितना वह खरोचता वहां से खून के बजाय काली रथों पर रिसने लगती जैसे उसका पूरा वजूद अंदर से सड़ रहा हो। यह मंजर देखकर उसके बीवी बच्चे खौफ के मारे दूसरे कमरे में दुबक गए थे। कोई उसके करीब जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

उधर शहर के दूसरे कोने पर चाचा करीम की झोपड़ी में एक अलग ही करिश्मा हो रहा था। चाचा करीम ने जब यकीन कर लिया कि यह दौलत हकीकत एफबत है तो उसने सबसे पहले अल्लाह के हुजूर सजदा किया और अपनी बूढ़ी आंखों से आंसुओं का नजराना पेश किया। उसने उस थैली में से सिर्फ एक सोने का सिक्का निकाला और बाकी थैली को बहुत हिफाजत से एक पुराने संदूक में छुपा दिया। उसने सोचा कि यह दौलत मेरी नहीं है। यह उस फकीर की अमानत है या अल्लाह का कोई खास इम्तिहान है। मुझे इसे बहुत सोच समझ कर खर्च करना होगा। वह फौरन बाजार गया और वहां से अपनी बीमार पोती के लिए दूध फल और दवाइयां खरीदी और घर लौट आया। जब उसने अपनी पोती को अपने हाथों से दूध पिलाया और उसके चेहरे पर सुकून देखा तो चाचा करीम का कलेजा ठंडा हो गया। उसने मन ही मन कहा कि असली दौलत यह सोना चांदी नहीं है बल्कि मेरी बच्ची की यह मुस्कुराहट है। उसने फैसला किया कि वह इस दौलत का तमाशा नहीं बनाएगा। बल्कि इसे उन लोगों की मदद में खर्च करेगा जो उसकी तरह दानेदाने को मोहताज है।

रात गहरी होती गई और मलिक जफर की हवेली में कोहराम मचता गया। उसने शहर के सबसे बड़े हकीम को बुलवाया। हकीम ने आकर जब मलिक जफर की नब्ज़ टटोली और उसके जिस्म पर उभरे हुए काले निशानों को देखा तो वह पीछे हट गया। हकीम ने डरते हुए कहा। सेठ जी यह कोई मामूली बीमारी नहीं है। यह किसी दवा से ठीक नहीं होगी। यह तो किसी रूहानी कहर का असर लगता है। आपके जिस्म का यह हाल बता रहा है कि आपने किसी बहुत ही पाक रूह को तकलीफ दी है या किसी मजलूम की बद्दुआ ली है।

मलिक जफर ने दर्द से करहाते हुए हकीम को धक्का दिया और गुर्राया कि बकवास बंद करो और दवा दो। मुझे यह ज्ञान नहीं चाहिए। मगर हकीम अपना सामान समेट कर वहां से चला गया क्योंकि वह जानता था कि आसमानी आफत का इलाज जमीनी दवाओं में नहीं होता। जैसे-जैसे रात बीत रही थी, मलिक जफर का दर्द बढ़ता जा रहा था। उसे अपनी ही दौलत से घिन आने लगी थी। वह रेशमी बिस्तर जिस पर उसे कभी नींद नहीं आती थी। अब कांटों की सेज बन चुका था उसकी बीवी जो अब तक डरी सहमी बैठी थी। हिम्मत करके उसके पास आई और बोली ताजदार ए दौलत जरा सोचिए आज दिन में क्या हुआ था कहीं यह सब उस फकीर की वजह से तो नहीं जिसे आपने मजाक में कूड़े की थैली दी थी मुझे याद है उस फकीर ने जाते हुए कुछ कहा था कि जो तूने इसमें भरा है तुझे वही वापस मिलेगा।

मलिक जफर के दिमाग में जैसे बिजली कौंधी उसे वह मंजर याद आया जब उसने अपनी तिजोरी का कचरा उस बुजुर्ग को दिया था और हंसते हुए उसका मजाक उड़ाया था। एक पल के लिए उसका घमंड डगमगाया मगर फिर उसकी फितरत का अहंकार आड़े आ गया। उसने झुंझुलाते हुए कहा, वह दो कौड़ी का भिखारी मेरा क्या बिगाड़ सकता है? यह सब इत्तेफाक है। कल तक सब ठीक हो जाएगा। मैं सुबह होते ही मजदूरों को बुलाकर यह सारी गंदगी साफ करवा दूंगा और फिर से सोना भर दूंगा। मलिक जफर अब भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। वह समझ नहीं पा रहा था कि कुदरत की लाठी बेआज होती है और जब वह पड़ती है तो इंसान को संभलने का मौका नहीं मिलता।

अगली सुबह जब सूरज निकला तो शहर में एक अजीब खबर आग की तरह फैल गई। लोग बातें कर रहे थे कि गरीब मोची करीम की किस्मत रातोंरात बदल गई है। उसके घर के बाहर जरूरतमंदों की लाइन लगी है और वह हर किसी की मदद कर रहा है। यह खबर उड़ते-उड़ते मलिक जफर के कानों तक भी पहुंची। वह जो रात भर दर्द से तड़प रहा था, यह सुनकर और भी जल भुन गया कि एक तरफ मैं बर्बाद हो रहा हूं और दूसरी तरफ वह दो टके का मोची अमीर हो गया है। उसने अपने मुनीम को बुलाया और हुक्म दिया कि पता लगाओ। उस मोची के पास इतना पैसा कहां से आया? कहीं उसने मेरी तिजोरी तो नहीं चुराई।

मुनीम ने डरतेडरते कहा, मालिक, वह तो बहुत शरीफ आदमी है। चोरी नहीं कर सकता। मगर लोग कह रहे हैं कि कल शाम एक बुजुर्ग फकीर उसकी झोपड़ी में गया था और उसके बाद से ही उसके घर में यह बरकत आई है। बुजुर्ग फकीर का नाम सुनते ही मलिक जफर का माथा ठनका। उसे यकीन हो गया कि यह वही फकीर है जो उसकी दुकान पर आया था। उसका शक अब यकीन में बदल गया कि उस फकीर ने कोई जादू टोना किया है। जिसकी वजह से उसकी दौलत उस मोची के पास चली गई और उसके पास सिर्फ गंदगी रह गई।

गुस्से और जलन की आग में मलिक जफर ने अपनी तकलीफ को नजरअंदाज किया और अपने लठैतों को जमा किया। उसने फैसला किया कि वह अब भी उस मोची के घर जाएगा और अपनी दौलत वापस छीन लाएगा। वह यह भूल गया कि यह दौलत अब उसकी नहीं रही थी बल्कि उसकी नियत का फैसला हो चुका था। मलिक जफर अपने आदमियों के साथ गिरतेपड़ते चाचा करीम की बस्ती की तरफ चल पड़ा। उसका हाल बेहाल था। कपड़े अस्त-व्यस्त थे और जिस्म से बदबू आ रही थी। मगर लालच ने उसे अंधा कर रखा था।

जब वह बस्ती में पहुंचा तो देखा कि चाचा करीम अपनी झोपड़ी के बाहर एक चटाई बिछाए बैठा है और उसके आसपास यतीम और बेसहारा लोग बैठे हैं जिन्हें वह खाना खिला रहा है। चाचा करीम के चेहरे पर एक रूहानी नूर था जो मलिक जफर के काले पड़ते चेहरे से बिल्कुल उलट था। मलिक जफर ने भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़कर चीर कर कहा। ओ पाखंडी मोची यह दौलत मेरी है। तूने उस जादूगर फकीर के साथ मिलकर मुझे लूटा है। यह जो कुछ भी तू बांट रहा है यह मेरा है। अभी के अभी सब कुछ मेरे हवाले कर दे। वरना मैं तेरी बस्तियां जला दूंगा।

करीम ने बहुत सुकून से मलिक जफर की तरफ देखा। वह पहचान गया कि यह वही अमीर सौदागर है। मगर उसकी हालत देखकर उसे बहुत तरस आया। चाचा करीम अपनी जगह से खड़ा हुआ और बहुत नरमी से बोला। सेठ जी यह दौलत ना मेरी है और ना आपकी। यह तो ऊपर वाले की देन है। उस फकीर बाबा ने मुझे एक थैली दी थी और कहा था कि यह तुम्हारी नियत का फल है। अगर आपकी नियत में सोना था तो यह सोना आपका है। लेकिन अगर आपकी नियत में कुछ और था तो फिर आपके पास वही है जो आपने बोया था।

मलिक जफर ने आप देखा ना ताऊ और अपने आदमियों को इशारा किया कि झोपड़ी की तलाशी लो और जो कुछ मिले उठा लाओ। उसके लठैत झोपड़ी में घुस गए और वह संदूक उठा लाए जिसमें चाचा करीम ने बची हुई थैली और सिक्के रखे थे। संदूक देखकर मलिक जफर की आंखों में चमक आ गई। वह पागलों की तरह हंसा और बोला देखा मैंने कहा था ना यह मेरा है। अब मैं देखता हूं कौन इसे मुझसे छीनता है। उसने झपट कर संदूक खोला। उसे उम्मीद थी कि इसमें वही हीरे जवाहरात होंगे जिनकी बातें पूरे शहर में हो रही हैं। मगर जैसे ही संदूक का ढक्कन खुला एक बार फिर कुदरत ने अपना खेल दिखाया। संदूक के अंदर हीरे जवाहरात तो थे। मगर जैसे ही मलिक जफर ने उन्हें छूने के लिए हाथ बढ़ाया, वह सब के सब जलते हुए अंगारों में बदल गए। मलिक

जफर ने चीख मारकर हाथ पीछे खींच लिया। उसकी उंगलियां जल गई थी। वह अंगारे इतनी तेज तपिश दे रहे थे कि वहां खड़े लोगों को भी गर्मी महसूस होने लगी।

मलिक जफर की आंखों में अब खौफ का सैलाब उमड़ आया था। वह समझ नहीं पा रहा था कि जो चीज मोची के लिए सोना है, वह उसके लिए आग कैसे बन गई। उसने देखा कि संदूक के अंदर रखे हुए बेशकीमती हार और अशरफियां लाल सुर्ख अंगारों की तरह धक रही हैं और उनमें से निकलती हुई लपटें उसके चेहरे को झुलसा रही हैं। जबकि उसी संदूक के पास खड़ा चाचा करीम बहुत सुकून और इत्मीनान से उस मंजर को देख रहा था।

मलिक जफर ने दर्द से बिलबिलाते हुए अपने जले हुए हाथों को अपनी छाती से लगा लिया और वहशी दरिंदे की तरह चीखने लगा कि यह धोखेबाजी है। यह काला जादू है। तूने मेरी दौलत पर कोई ऐसा मंत्र फूंका है कि मैं उसे छू ना सकूं।

मगर चाचा करीम ने बहुत धीरज के साथ कदम आगे बढ़ाया और मलिक जफर की आंखों में आंखें डालकर कहा, सेठ जी, यह कोई जादू नहीं है और ना ही यह कोई मंत्र है। यह तो बस हलाल और हराम की तासीर है जो आपके सामने जाहिर हो रही है। यह दौलत नेकी के रास्ते से मेरे पास आई थी। इसलिए मेरे लिए रहमत बन गई। मगर आपकी नियत में खोट और हसद की आग थी। इसलिए यह आपके हाथों में पहुंचकर आग बन गई। अगर आपको यकीन नहीं आता तो देखिए।

यह कहकर चाचा करीम ने उसी संदूक के अंदर हाथ डाला जहां मलिक जफर को अंगारे नजर आ रहे थे। वहां मौजूद लोगों की सांसे थम गई कि अभी इस बूढ़े मोची का हाथ झलकर राख हो जाएगा। मगर जैसे ही चाचा करीम का हाथ संदूक के अंदर गया, वह सुर्ख अंगारे फौरन ठंडे पड़ गए और दोबारा चमचमाते हुए सोने और हीरों में तब्दील हो गए। चाचा करीम ने मुट्ठी भर सिक्के उठाए और उन्हें मलिक जफर के सामने करके दिखाया कि देखिए सेठ जी यह मेरे लिए अब भी सोना ही है।

यह मंजर देखकर वहां खड़ी भीड़ पर सन्नाटा छा गया और फिर अचानक अल्लाह की बढ़ाई किनारे गूंजने लगे। लोगों को अपनी आंखों पर यकीन आ गया कि यह बंदा अल्लाह का खास है और मलिक जफर पर कुदरत का कहर टूट पड़ा है।

मलिक जफर अपनी यह तौहीन बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। एक मामूली मोची भरी भीड़ में उसे सबक सिखा रहा था और लोग उसका मजाक उड़ा रहे थे। उसके अंदर का शैतान और ज्यादा भड़क उठा। उसने गुस्से में अपने लठैतों को हुक्म दिया कि क्या देख रहे हो? जला डालो इस झोपड़ी को और छीन लो। इससे यह संदूक अगर यह दौलत मेरी नहीं हो सकती तो मैं इसे किसी और की भी नहीं होने दूंगा।

उसके नौकर जैसे ही मशालें लेकर झोपड़ी की तरफ लपके अचानक आसमान में काले बादल घेर आए और तेज हवाओं का ऐसा बवंडर उठा कि नौकरों के हाथों से मशालें छूट कर उन्हीं के कपड़ों पर जा गिरी। भगदड़ मच गई और धूल के गुबार में मलिक जफर को सांस लेना भारी पड़ गया। उसकी आंखों में धूल भर गई और उसके जिस्म पर उभरे हुए जख्मों में हवा के झोंकों से ऐसा दर्द उठा जैसे किसी ने नमक छिड़क दिया हो। वह समझ गया कि आज कुदरत पूरी तरह से इस मोची की हिफाजत में खड़ी है और अगर वह यहां एक पल भी और रुका तो शायद जिंदा वापस नहीं जाएगा। अपनी जान बचाने के लिए। मलिक जफर वहां से अपने जलते हुए हाथों को लेकर भागा और उसके नौकर भी उसके पीछे दुम दबाकर भाग खड़े हुए।

बस्ती के लोगों ने जब देखा कि इतना बड़ा जालिम सेठ अपनी जान बचाकर भाग रहा है तो उन्होंने चाचा करीम के हाथ चूम लिए और कहा कि चाचा आज आपने साबित कर दिया कि सच्चाई की ताकत दौलत से कहीं ज्यादा बड़ी होती है।

उधर मलिक जफर जब अपनी हवेली वापस पहुंचा तो उसका हाल किसी पागल जैसा हो चुका था। उसके कपड़े फटे हुए थे और हाथों की खाल जल चुकी थी। वह सीधा अपने कमरे में गया और पागलों की तरह पानी के मटके में अपने हाथ डाल दिए ताकि जलन कुछ कम हो। मगर पानी भी जैसे उसे सुकून देने से इंकार कर रहा था। पानी छूते ही उसे और ज्यादा तकलीफ होने लगी। जैसे वह पानी नहीं तेजाब हो। वह दर्द से कराता हुआ जमीन पर लेट गया और अपनी किस्मत को कोसने लगा।

हवेली का माहौल अब और भी ज्यादा डरावना हो चुका था। जिस घर में कल तक नौकरों की फौज खड़ी रहती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा था। क्योंकि बदबू और मलिक जफर के भयानक रूप को देखकर आधे से ज्यादा नौकर नौकरी छोड़कर भाग चुके थे। उसकी बीवी और बच्चे भी खौफजदा होकर अपने कमरों में बंद थे। उन्हें डर था कि कहीं यह अज़ाब उन पर भी ना आ जाए।

मलिक जफर अकेला अपने आलीशान कमरे के फर्श पर पड़ा तड़प रहा था। तभी उसकी नजर सामने दीवार पर लगे आदम कद आईने पर पड़ी। उसने मुश्किल से सर उठाकर खुद को देखा और अपनी चीख रोक ना सका। आईने में उसे अपना चेहरा इंसान का नहीं बल्कि किसी भयानक मखलूक का नजर आ रहा था। उसका रंग स्याह पड़ चुका था। आंखें अंगारों की तरह लाल थी और चेहरे की खाल जगह-जगह से गल रही थी। यह वही चेहरा था जिस पर उसे कल तक इतना गुरूर था जो खुद को शहर का सबसे खूबसूरत और रूपदार शख्स समझता था। आज वह अपनी शक्ल देखकर खुद ही डर गया। उसने गुस्से में पास रखा हुआ एक गुलदान उठाकर आईने पर दे मारा और आईना चकनाचूर हो गया। कांच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए। मगर हकीकत नहीं बदली।

वह जानता था कि दौलत अब उसका इलाज नहीं कर सकती। उसने शहर के बड़े-बड़े वैद्यों और तांत्रिकों को बुलवाने का सोचा। मगर फिर उसे याद आया कि मोची ने क्या कहा था। उसने कहा था कि यह नियत का फल है। इसका मतलब है कि इस बीमारी का इलाज दवा में नहीं है।

मलिक जफर के दिमाग में बार-बार उस फकीर का चेहरा घूम रहा था जिसने उसे यह बदद्दुआ दी थी। उसे लगा कि जरूर उस फकीर ने कोई काला इल्म किया है और अगर वह उस फकीर को ढूंढकर उसे मजबूर कर दे या उसे डराधमका कर यह जादू वापस लेने को कहे तो शायद वह ठीक हो सकता है। उसका घमंड अभी भी नहीं टूटा था। वह अब भी यही सोच रहा था कि वह अपनी ताकत से सब ठीक कर लेगा। उसने अपने सबसे वफादार और जालिम मुनीम को बुलाया जो अभी तक लालच की वजह से उसके साथ रुका हुआ था। मुनीम ने नाक पर कपड़ा रखकर कमरे में कदम रखा और दूर से ही बोला हुक्म करें मालिक मलिक जफर ने कहा सुनो मुझे उस फकीर का पता चाहिए वह पाखंडी जरूर कहीं आसपास ही छिपा होगा जाओ शहर का कोना कोना छान मारो और उसे घसीटते हुए मेरे पास लाओ। मैं उसे ऐसी मौत दूंगा कि उसकी रूह भी कांप जाएगी और जब तक वह मेरा यह हाल ठीक नहीं करता उसे छोड़ना मत। मुनीम ने सर झुकाया और वहां से निकल गया।

मलिक जफर ने अपनी तिजोरी की तरफ देखा जो अब राख के ढेर में तब्दील हो चुकी थी। उसे अपनी बर्बादी पर रोना आ रहा था। लेकिन यह आंसू पछतावे के नहीं थे बल्कि अपनी छीन गई ताकत के थे।

रात और गहरी होती गई और मलिक जफर के जख्मों से अब पी पिरिसने लगी थी। उसे महसूस हो रहा था कि जैसे उसके जिस्म के अंदर कीड़े चल रहे हो। यह वही कीड़े थे जो उसने उस थैली में भरकर फकीर को दिए थे। कुदरत का इंसाफ इतना बारीक और सटीक होता है। यह उसे अब समझ आ रहा था। वह दर्द से बचने के लिए कभी बिस्तर पर लेटता तो कभी ठंडे फर्श पर। मगर उसे कहीं चैन नहीं था।

उधर चाचा करीम की झोपड़ी में वह रात एक त्यौहार की तरह थी। हालांकि चाचा करीम ने उस दौलत का कोई गलत इस्तेमाल नहीं किया था। मगर उनके दिल का बोझ हल्का हो गया था कि अब उनकी पोती का इलाज हो सकेगा और वह भूखे नहीं सोएंगे। उन्होंने अपनी पोती को सुला दिया और खुद बाहर आसमान के नीचे बैठ गए। वह उस फकीर के बारे में सोच रहे थे कि वह कौन था, कहां से आया था और अब कहां होगा। चाचा करीम के दिल में उस फकीर के लिए बेपनाह एतराम और मोहब्बत थी। वह चाहते थे कि एक बार फिर वह फकीर उन्हें मिले ताकि वह उनका शुक्रिया अदा कर सकें और यह अमानत उन्हें वापस सौंप सकें। क्योंकि चाचा करीम को लग रहा था कि इतनी बड़ी दौलत रखना उनके बस की बात नहीं है। यह किसी और बड़े मकसद के लिए है।

दूसरी तरफ मुनीम और उसके आदमी पूरी रात शहर की खाक छानते रहे। उन्होंने सराए मस्जिदों और बाजारों में हर किसी से उस फकीर का हुलिया बयान करके पूछा। मगर कोई भी उस बुजुर्ग के बारे में नहीं जानता था। ऐसा लगता था जैसे वह फकीर जमीन निगल गई हो या आसमान खा गया हो।

सुबह होते-होते मुनीम खाली हाथ और मायूस होकर हवेली लौटा। मलिक जफर जो पूरी रात एक पल के लिए भी नहीं सो पाया था। मुनीम को खाली हाथ देखकर आग बबूला हो गया। उसने मुनीम पर एक भारी पीतल का लोटा फेंक कर मारा और चिल्लाया कि तुम सब निकम्मे हो। एक बूढ़े फकीर को नहीं ढूंढ सके। मुनीम ने गिड़गिड़ाते हुए कहा मालिक हमने पूरा शहर छान मारा मगर वह इंसान कहीं नहीं मिला। लोगों का कहना है कि वह कोई फरिश्ता था जो अब वापस आसमान में चला गया है।

मलिक जफर ने दौड़ते हुए कहा बकवास बंद करो। कोई फरिश्ता नहीं था। वह एक जादूगर था और मुझे उसे ढूंढना ही होगा। अगर तुम लोग नहीं ढूंढ सकते, तो मैं खुद जाऊंगा। चाहे मेरी जान ही क्यों ना निकल जाए। मैं उसे पाताल से भी ढूंढ निकालूंगा।

मलिक जफर ने फैसला किया कि वह अब इस हालत में घर में नहीं बैठ सकता। उसे अपनी जान बचाने के लिए उस फकीर के पैरों में गिरना पड़े या उसका गला काटना पड़े। वह कुछ भी करेगा। उसने एक बड़ा सा लबादा ओढ़ा ताकि लोग उसका भयानक चेहरा और गला हुआ जिस्म ना देख सकें और अपने घोड़े पर सवार होकर हवेली से निकल पड़ा। उसका घोड़ा भी उसकी हालत देखकर बिधक रहा था। मगर उसने चाबुक मारकर उसे काबू किया और शहर से बाहर जंगल की तरफ चल पड़ा। क्योंकि किसी ने उसे बताया था कि अक्सर ऐसे दरवेश जंगलों या पहाड़ों की गुफाओं में ही अपना डेरा जमाते हैं।

मलिक जफर जंगल के रास्ते पर आगे बढ़ता जा रहा था। सूरज सर पर आ चुका था और गर्मी से उसके जख्म और ज्यादा पक रहे थे। उसे प्यास लग रही थी मगर उसके पास पानी का एक कतरा नहीं था। वह जिस रास्ते से गुजरता वहां के परिंदे और जानवर भी उससे दूर भागते क्योंकि उसके वजूद से मौत की ब आ रही थी। चलते-चलते वह एक पुराने कुएं के पास पहुंचा। उसने सोचा कि यहां पानी पीकर अपनी प्यास बुझाएगा। वह घोड़े से उतरा और कुएं में झांका। कुआं पानी से भरा हुआ था। उसने राहत की सांस ली और पानी निकालने के लिए वहां रखी बाल्टी कुएं में डाली। मगर जैसे ही उसने रस्सी खींची और बाल्टी ऊपर आई तो देखा कि बाल्टी में साफ पानी के बजाय कीचड़ और मरे हुए मेंढक भरे हुए हैं।

मलिक जफर ने गुस्से में बाल्टी पटक दी और जोर से चिल्लाया कि या खुदा यह क्या माजरा है क्या? पानी भी मेरा दुश्मन हो गया है। तभी उसे अपने पीछे से किसी के हंसने की आवाज सुनाई दी। एक बहुत ही डरावनी और भारी हंसी जो जंगल के सन्नाटे को चीरती हुई आ रही थी। मलिक जफर ने पलट कर देखा तो वहां एक पेड़ की डाल पर एक काला कौवा बैठा था जो अजीब तरीके से उसे घूर रहा था और इंसान की बोली में बोला कि पानी तो साफ है ए सौदागर मगर तेरा अक्स इसमें पड़ते ही यह जहर बन गया है जब तक तू अपने अंदर की गंदगी साफ नहीं करेगा दुनिया का हर चश्मा तेरे लिए जहर ही उगलेगा मलिक जफर की रूह कांप गई कि एक परिंदा उसे ताना दे रहा है। वह समझ गया कि यह जंगल भी कोई आम जंगल नहीं है। वह यहां शिकार करने नहीं आया बल्कि खुद शिकार बनने आया है।

उस काले कौवे की बात ने मलिक जफर के दिल में दहशत भर दी थी। उसने घबराकर अपने घोड़े की लगाम खींची और वहां से भागने की कोशिश की। मगर उसका घोड़ा जो बरसों से उसका वफादार था, अचानक बिधक गया। जैसे उसने अपनी पीठ पर किसी इंसान को नहीं बल्कि किसी शैतान को बैठे हुए महसूस कर लिया हो। घोड़े ने एक जोरदार हिनहिनाहट के साथ अपने अगले दोनों पैर हवा में उठाए और मलिक जफर को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया। मलिक जफर धड़ाम से एक कटीली झाड़ी के ऊपर जा गिरा और उसका घोड़ा सरपट दौड़ता हुआ जंगल की गहराइयों में गायब हो गया।

अब मलिक जफर उस वीरान और खौफनाक जंगल में बिल्कुल अकेला रह गया था। उसके जिस्म पर कांटों की खरोचे थी और कपड़ों में मिट्टी और खून लगा हुआ था। वह दर्द से करहता हुआ खड़ा हुआ और उसने देखा कि जिस रेशमी पोशाक पर उसे इतना घमंड था, वह अब चिथड़े बनकर उसके जिस्म पर लटक रही थी। उसने गुस्से और बेबसी में चिल्लाकर अपने घोड़े को आवाज दी। मगर वहां खामोशी के सिवा कोई जवाब देने वाला नहीं था। उसने लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ना शुरू किया। सूरज ढल रहा था और जंगल में शाम का अंधेरा फैलने लगा था। पेड़ों की लंबी परछाइयां उसे डरावने सायों की तरह लग रही थी जो उसे निगलने के लिए आगे बढ़ रही हो।

मलिक जफर को भूख और प्यास बुरी तरह सता रही थी। उसका गला सूख कर कांटा हो गया था। उसने देखा कि पास ही एक पेड़ पर कुछ लाल रंग के फल लटके हुए हैं। उसने सोचा कि चलो पानी ना सही फल खाकर ही जान बचाई जाए। वह लपक कर पेड़ के पास पहुंचा और एक फल तोड़कर जैसे ही उसने मुंह में रखा, उसका मुंह कड़वाहट से भर गया। वह फल बाहर से जितना खूबसूरत था, अंदर से उतना ही सड़ा हुआ और कसला था। उसने थूकते हुए फल को फेंक दिया और रोने लगा। उसे अब शिद्दत से एहसास हो रहा था कि जब कोई भूखा उसके पास आता था और वह उसे दुत्कारता था तो उस गरीब के दिल पर क्या गुजरती होगी। आज कुदरत उसे उसी भूख का पाठ पढ़ा रही थी। वह गिरता पड़ता आगे बढ़ता रहा। उसके पैरों के महंगे जूते फट चुके थे और तलवों में छाले पड़ गए थे। हर कदम पर उसे लगता था कि वह अब मर जाएगा। मगर मौत भी जैसे उससे रूठ गई थी। उसे तड़पाने के लिए जिंदा रखा जा रहा था।

रात का अंधेरा गहरा होते ही जंगल की आवाजें बदल गई। झींगुरों की आवाजें और दूर कहीं जानवरों की गुर्राहट ने उसके दिल को मुट्ठी में जकड़ लिया था। वह डर के मारे एक बड़े दरख्त के नीचे दुबक कर बैठ गया। उसे अपनी हवेली का नरम बिस्तर याद आ रहा था जहां वह सुकून की नींद नहीं सो पाता था। मगर आज वह इस पथरीली जमीन पर सोने के लिए तरस रहा था। तभी उसे लगा कि अंधेरे में कुछ आंखें उसे देख रही हैं। उसने गौर से देखा तो पाया कि कुछ जंगली कुत्ते उसे घेर कर खड़े हैं। उनकी आंखों में भूख थी। वही भूख जो कभी उन फकीरों की आंखों में होती थी जिन्हें मलिक जफर ने धक्के मारकर भगाया था। मलिक जफर की सांसे अटक गई। उसने जमीन से पत्थर उठाने की कोशिश की मगर उसके हाथों में इतनी जान नहीं थी। कुत्ते धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रहे थे। मलिक जफर ने अपनी आंखें बंद कर ली और पहली बार उसके दिल से एक सच्ची चीख निकली कि या अल्लाह मुझ पर रहम कर। मुझे इन जानवरों का निवाला मत बनने दे। मैंने गलती की है मुझे माफ कर दे। वह मौत के इंतजार में कांप रहा था।

मगर तभी एक अजीब वाकया हुआ। जंगल की झाड़ियों में से एक रोशनी उभरी और किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। उन जंगली कुत्तों ने जैसे ही वह आहट सुनी, वह दुम दबाकर वहां से भाग गए। मलिक जफर ने धीरे से आंखें खोली तो देखा कि कुत्तों की जगह वहां सन्नाटा है और दूर एक लालटेन की रोशनी हिलती हुई नजर आ रही है। उसे लगा कि शायद यह कोई सपना है या मौत का फरिश्ता उसे लेने आया है। मगर जीने की चाहत ने उसे हिम्मत दी। वह घिसटता हुआ उस रोशनी की तरफ बढ़ा। उसका पूरा शरीर जख्मों से भरा था और उसमें चलने की ताकत नहीं थी। मगर वह रेंगता रहा। कांटों और पत्थरों पर अपना जिस्म घसीटता रहा। उस वक्त मलिक जफर कोई अमीर सौदागर नहीं लग रहा था। बल्कि वह खुद एक बहुत बड़ा और लाचार भिखारी बन चुका था।

रेंगते रेंगते वह उस रोशनी के करीब पहुंचा तो देखा कि जंगल के बीचोंबीच एक पुरानी सी कुटिया बनी हुई है। जिसके बाहर एक लालटेन टंगी है। कुटिया बहुत ही साधारण थी। मगर उसमें से एक अजीब सा सुकून और खुशबू आ रही थी। वही खुशबू जो उसे उस दिन दरवेश के पास से आई थी। मलिक जफर की उम्मीद बंध गई कि शायद वह सही जगह पहुंच गया है। उसने अपनी पूरी ताकत जमा की और कुटिया के दरवाजे तक पहुंचा। उसने दरवाजे पर दस्तक देने के लिए हाथ उठाया। मगर उसका हाथ हवा में ही रह गया। उसे याद आया कि इसी हाथ से उसने फकीर को गंदगी दी थी। क्या यह हाथ अब मदद मांगने के लायक है? शर्मिंदगीगी और पछतावे ने उसे घेर लिया। मगर दर्द इतना ज्यादा था कि उसने दरवाजे पर अपना सिर पटक दिया और वहीं चौखट पर गिर पड़ा।

कुछ ही पलों बाद दरवाजा चरचराहट के साथ खुला और अंदर से एक नूरानी चेहरे वाला शख्स बाहर आया। यह वही दरवेश नहीं था बल्कि एक दूसरा ही बुजुर्ग था जिसकी सफेद दाढ़ी थी और हाथ में तस्बीह थी। उस बुजुर्ग ने जमीन पर पड़े हुए मलिक जफर को देखा जिसकी हालत किसी मरे हुए जानवर से भी बदतर हो चुकी थी। बुजुर्ग की आंखों में नफरत या गुस्सा नहीं था बल्कि एक गहरा तरस था। उन्होंने झुककर मलिक जफर के सिर पर हाथ रखा और बहुत नरमी से बोले ए भटकते हुए मुसाफिर तू किस बोझ को लेकर यहां तक आया है। तेरे जिस्म की यह हालत बता रही है कि तेरी रूह बहुत गहरे जख्मों से चूर है।

मलिक जफर ने मुश्किल से अपनी आंखें खोली और उस बुजुर्ग के पैरों को पकड़ लिया। उसकी आवाज गले में फंस रही थी। उसने रोते हुए कहा, बाबा मुझे बचा लीजिए। मैं बहुत गुनहगार हूं। मैंने दौलत के नशे में अंधा होकर बहुत पाप किए हैं। अब यह आग मुझे जला रही है। मुझे उस फकीर से मिलवा दीजिए जिसने मुझे यह श्राप दिया है। वरना मैं तड़प-तड़प कर मर जाऊंगा।

उस बुजुर्ग ने मलिक जफर को सहारा देकर उठाया और उसे कुटिया के अंदर ले गए। कुटिया के अंदर का माहौल बहुत शांत था। वहां जड़ी बूटियों की भी महक थी। बुजुर्ग ने मलिक जफर को एक चटाई पर लेटाया और एक मिट्टी के प्याले में कुछ जड़ी बूटियों का काढ़ा बनाकर उसके होठों से लगाया। काढ़ा हलक से नीचे उतरते ही मलिक जफर को थोड़ी राहत महसूस हुई। मगर उसके जिस्म के काले दाग अभी भी वैसे ही जल रहे थे। बुजुर्ग ने उसके जख्मों को गौर से देखा और फिर एक गहरी सांस लेकर बोले बेटा यह जख्म जिस्म के नहीं है। यह तेरे गुनाहों का जहर है जो बाहर निकल रहा है। तू उस फकीर को ढूंढ रहा है। मगर वह फकीर तो हवा का झोंका था जो अपना काम करके चला गया। अब उसे ढूंढना नामुमकिन है। मगर एक रास्ता है जिससे तू इस आग से बच सकता है।

मलिक जफर ने तड़प कर पूछा। बताइए बाबा वह रास्ता क्या है? मैं अपनी सारी दौलत देने को तैयार हूं। मैं अपनी पूरी जायदाद लुटा दूंगा। बस मुझे ठीक कर दीजिए। बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा, बेटा तू अब भी सौदा कर रहा है। तू अब भी समझता है कि दौलत से हर चीज खरीदी जा सकती है। यह दौलत ही तो तेरी बीमारी की जड़ है। जब तक तू अपने अंदर के इस सौदागर को नहीं मारेगा, तब तक तुझे शिफा नहीं मिलेगी। तेरा इलाज किसी फकीर के पास नहीं बल्कि तेरे अपने ही उन आमाल में छिपा है जिन्हें तूने हिकारत से ठुकरा दिया था। बुजुर्ग ने एक पुराने संदूक की तरफ इशारा किया और बोले इस जंगल के उस पार एक बस्ती है जहां लोग पीने के पानी को तरसते हैं। वहां एक कुआं है जो बरसों से सूखा पड़ा है। अगर तू अपने इन हाथों से जिन हाथों से तूने गंदगी बांटी थी मेहनत करके उस कुएं को दोबारा जिंदा कर दे और जब तक उसमें पानी ना आए तब तक तू वहां से ना हटे तो शायद तेरी तौबा कबूल हो जाए। याद रखना यह काम तुझे अपनी दौलत से नहीं बल्कि अपने पसीने और अपनी मेहनत से करना होगा।

मलिक जफर ने सुना तो उसका दिल बैठ गया। वह जो कभी एक गिलास पानी खुद लेकर नहीं पीता था। आज उसे कुआं खोदने को कहा जा रहा था। वह भी इस टूटे हुए और गले हुए शरीर के साथ यह सजा उसे मौत से भी बदतर लगी। उसने कांपते हुए कहा, बाबा मुझ में तो खड़े होने की भी ताकत नहीं है। मैं कुआं कैसे खोद सकता हूं? बुजुर्ग ने सख्त लहजे में कहा, "अगर जिंदा रहना है तो यह करना होगा। वरना यह जंगल तेरा कब्रिस्तान बनेगा और तेरी दौलत यहीं पड़ी रह जाएगी। फैसला तेरा है। मलिक जफर ने अपनी जली हुई खाल और रिसते हुए जख्मों को देखा। उसे मौत सामने खड़ी नजर आ रही थी। उसने हार मान ली और सर झुका कर कहा, "मैं तैयार हूं बाबा। मैं कुछ भी करूंगा। बस मुझे इस अज़ाब से निकालिए।"

अगली सुबह बुजुर्ग ने उसे एक पुरानी कुदाल और एक टोकरी थमाई और जंगल के उस पार का रास्ता दिखा दिया। मलिक जफर जब कुटिया से निकला तो उसके पैर भारी थे। मगर जीने की उम्मीद ने उसे आगे बढ़ाया। वह गिरता पड़ता उस बस्ती की तरफ चल पड़ा। दोपहर होते-होते वह उस सूखी हुई बस्ती में पहुंचा। वहां की हालत देखकर उसका दिल दहल गया। जमीन फटी हुई थी। जानवर प्यास से मर रहे थे और बच्चे धूल में पड़े थे। किसी के जिस्म पर ढंग के कपड़े नहीं थे। यह वही लोग थे जिन्हें वह अपनी दुकान के आगे से भगा दिया करता था। बस्ती के लोगों ने जब इस भयानक दिखने वाले शख्स को देखा तो वह डर गए। मगर मलिक जफर ने किसी से कुछ नहीं कहा। वह सीधा उस सूखे हुए कुएं के पास गया जो कांटों और पत्थरों से भरा पड़ा था। उसने कांपते हाथों से कुदाल उठाई और पहला वार जमीन पर किया। जमीन सख्त थी और उसके हाथ नाजुक जैसे ही कुदाल जमीन पर लगी उसके हाथों से खून रिसने लगा। दर्द की एक लहर उसके पूरे बदन में दौड़ गई मगर उसने रुकने का नाम नहीं लिया। वह जानता था कि यह पसीना और यह खून ही अब उसकी दवा है। वह पागलों की तरह खुदाई करने लगा। धूप उसकी पीठ को जला रही थी। मगर वह अपनी ही धुन में था। उसे अपनी आंखों के सामने वह मंजर बार-बार याद आ रहा था जब उसने प्यासे फकीर को भगाया था। हर चोट के साथ उसकी आंखों से आंसू टपक रहे थे और मिट्टी में मिल रहे थे। बस्ती के लोग दूर खड़े होकर हैरत से देख रहे थे। आई यह अजीब सा आदमी कौन है जो अपनी जान की परवाह किए बिना हमारे लिए कुआं खोद रहा है। शाम हो गई, रात हो गई मगर मलिक जफर नहीं रुका। वह भूख प्यास भूल चुका था। उसे बस एक ही धुन सवार थी कि उसे पानी निकालना है।

दिन गुजरते गए और हफ्ते महीनों में बदल गए। मलिक जफर के हाथों के छाले फूट कर अब सख्त खाल में बदल चुके थे। उसका वह नाजुक बदन जो कभी मखमल पर भी करवटें बदलता था। अब मिट्टी और धूल में अटा रहने लगा था। उसे अब भूख सताती तो वह बस्ती वालों की दी हुई सूखी रोटी को भी अमृत समझकर खा लेता था। धीरे-धीरे उसके अंदर का वह जालिम सौदागर मर रहा था और एक इंसान जन्म ले रहा था। उसे अब समझ आ रहा था कि एक घूंट पानी की कीमत क्या होती है और मेहनत की कमाई का स्वाद कैसा होता है।

एक दिन जब सूरज ठीक सर पर था और मलिक जफर पूरी ताकत से जमीन पर कुदाल चला रहा था। तभी अचानक जमीन के अंदर से एक गीली आवाज आई। उसकी कुदाल किसी पत्थर से टकराई और वहां से पानी की एक बारीक धार फूट पड़ी। देखते ही देखते वह धार तेज हो गई और बरसों से प्यासी उस जमीन का सीना चीर कर मीठा और ठंडा पानी बाहर उबलने लगा। पानी को देखकर मलिक जफर वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा और पागलों की तरह हंसने और रोने लगा। बस्ती के लोग दौड़ कर आए और खुशी से झूम उठे। बच्चे पानी में कूदने लगे और औरतें दुआएं देने लगी। मलिक जफर ने कांपते हाथों से उस पानी को अपने चेहरे पर मारा और अपनी प्यास बुझाई। जैसे ही उस कुएं का पानी उसके जख्मों पर लगा, एक करिश्मा हुआ। उसे महसूस हुआ कि उसके जिस्म की जलन खत्म हो रही है। उसने देखा कि जिन काले निशानों ने उसे नरक बना दिया था, वह पानी पड़ते ही धुल रहे थे। उसकी खाल दोबारा साफ और चमकदार होने लगी थी। मगर इस बार उस चमक में गुरूर नहीं बल्कि मेहनत का नूर था। बुजुर्ग बाबा की बात सच साबित हुई थी। उसके पसीने और आंसू ने मिलकर उसके गुनाहों को धो दिया था। मलिक जफर ने आसमान की तरफ हाथ उठाकर सच्चे दिल से तौबा की और कहा, या अल्लाह तेरा लाख-लाख शुक्र है कि तूने मुझे बर्बाद करके आबाद कर दिया। अगर मेरी दौलत ना लूटती तो शायद मेरी रूह हमेशा के लिए मर जाती।

अब वह पूरी तरह ठीक हो चुका था। मगर अब वह अपनी हवेली वापस जाने के लिए नहीं बल्कि अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए तैयार था। वह वापस शहर लौटा मगर इस बार वह घोड़े पर नहीं बल्कि पैदल था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। जब वह अपनी हवेली पहुंचा तो देखा कि वहां से बदबू और गंदगी गायब हो चुकी। सब कुछ साफ था मगर उसने हवेली में कदम नहीं रखा। वह सीधा चाचा करीम की झोपड़ी पर गया। चाचा करीम आज भी उसी टाट पर बैठे जूते सी रहे थे। मलिक जफर को देखकर वह खड़े हो गए और बड़े प्यार से गले लगाया। मलिक जफर ने चाचा करीम के पैरों में गिरकर माफी मांगी और रोते हुए कहा, चाचा मुझे माफ कर दो। मैं अंधा था। मगर आपकी दुआ और उस फकीर की फटकार ने मुझे देखने वाली आंखें दे दी हैं।

चाचा करीम ने उसे उठाया और वह संदूक लाकर उसके सामने रख दिया और बोले, सेठ जी, यह आपकी अमानत है। इसे ले जाइए। यह अब आपके लिए आग नहीं बनेगी क्योंकि अब आपकी नियत खालिस हो चुकी है। मलिक जफर ने संदूक को हाथ लगाया तो वह वाकई सोना ही था। मगर मलिक जफर ने संदूक को वापस चाचा करीम की तरफ सरका दिया और मुस्कुराते हुए बोला नहीं चाचा अब मुझे इस सोने की जरूरत नहीं है। मुझे जिस खजाने की तलाश थी वह मुझे उस कुएं की मिट्टी में मिल गया है। यह सोना आप रखिए और गरीबों की मदद कीजिए। मैं अब अपने हाथों की कमाई खाऊंगा और बाकी जिंदगी अपने गुनाहों का कफारा अदा करूंगा।

यह कहकर मलिक जफर वहां से चला गया। उसने अपनी सारी जायदाद और दौलत शहर के यतीमों और बेवाओं के नाम कर दी और खुद एक मामूली इंसान की तरह जिंदगी गुजारने लगा। वह अब अपनी दुकान पर नहीं बैठता था बल्कि लोगों की खिदमत में लगा रहता था। जो भी मुसाफिर शहर में आता वह सबसे पहले मलिक जफर के लंगर में खाना खाता। लोग अब उसे मलिक जफर नहीं बल्कि बाबा जफर कहने लगे थे। उसकी रूहानी बदलाव की कहानी पूरे मुल्क में मशहूर हो गई और लोग दूर-दूर से उसे देखने आते थे। वह सबको बस एक ही सबक सिखाता था कि दौलत जेब में हो तो फकीरी है। मगर दौलत दिल में उतर जाए तो वह बीमारी है और नियत साफ हो तो धूल भोना बन जाती है और नियत में खोट हो तो सोना भी राख बन जाता है। इस तरह एक घमंडी सौदागर को कुदरत ने ठोकर मारकर सही रास्ता दिखाया और यह साबित कर दिया कि अल्लाह के घर में देर है मगर अंधेर नहीं और असल अमीरी दिल की अमीरी होती है।

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