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मुक्ति का उपाय तीन पदार्थों का तत्व ज्ञान | स्वामी विवेकानंद जी परिव्राजक #मुक्ति #मोक्ष #तत्वज्ञान

अध्यात्म यात्रा – Adhyatm Yaatra35:25

Transcription

[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]

तिर अ विप्लवा अलवा नो पाया। यह हान का उपाय है। उपाय साधन प्राप्ति का जो प्राप्त कराने वाला साधन है उसको उपाय कहते हैं। हान माने मोक्ष। अभी पिछले सूत्र में बताया था ना जन्म नहीं लेना यह मोक्ष है और यह हान है। जब दुख छूट जाए वह स्थिति है हान। हान माने छूट गया। क्या छूट गया? दुख। दुख छूट गया यह हान है। तो दुख छूट गया कहां छूट गया? मोक्ष में छूटता है पूरी तरह से दुख मोक्ष में छूटता है। इसलिए हा का सीधा शब्दार्थ कर लीजिए मोक्ष।

और यह हान का उपाय है। मोक्ष का उपाय है। मोक्ष तक जाना हो तो यह उपाय करो। क्या उपाय है? विवेक ख्याति। विवेक ख्याति उपाय है मोक्ष। हां दुख प्राप्ति, दुख निवृत्ति और सुख की प्राप्ति। चलो दोनों जोड़ लीजिए। इसका नाम है मोक्ष। तो हान का मतलब मोक्ष। मोक्ष का मतलब दुख भी छूटेगा, सुख भी मिलेगा। इस स्थिति का नाम है हान। तो इस स्थिति में पहुंचने का उपाय क्या? उसका उपाय है विवेक ख्याति। यह उपाय है।

विवेक ख्याति का अर्थ है तीन पदार्थों को अलग-अलग समझना। दोहराए क्या बोला? तीन पदार्थ। नाद, ईश्वर, आत्मा, प्रकृति। ये तीन पदार्थ अलग-अलग हैं। इन तीनों को अलग-अलग करके देखना। यह ईश्वर है, यह आत्मा है, यह प्रकृति। तीनों का अलग-अलग स्वरूप यहां समझना। और वह भी तत्व ज्ञान के लेवल पर। शाब्दिक ज्ञान के लेवल पर नहीं। तत्व ज्ञान के स्तर पर तीन पदार्थों को अलग-अलग समझना। यह है विवेक ख्याति। ख्याति का अर्थ है ज्ञान। विवेक का मतलब पृथक पृथक, अलग-अलग। तीन त्व को अलग अलग जानना।

आप जब किसी मनुष्य को देखते हैं, उस मनुष्य को प्राणी कहते हैं। प्राणी। उस प्राणी में दो चीजें होती हैं। एक शरीर और एक आत्मा। दोनों को मिलाकर प्राणी कहलाता है। तो जब आप मनुष्य को देखते हैं, तब आपको शरीर और आत्मा दो चीजें दिखती हैं या एक दिखता है? एक दिखता है। तो मिथ्या ज्ञान तो अविद्या। एक दिखता है तो अविद्या है। और दो दिखते हैं तो विवेक ख्याती है। तो तत्व ज्ञान है। दो दिखने चाहिए।

जब आपको दो दिखने लगे ना, आपकी नजर बदल जाएगी। आपकी दृष्टि बदल जाएगी। आपको दुनिया अजीब रंग की दिखेगी। यार यह ऐसी होती है दुनिया। अब तक तो हम ऐसी नहीं समझ रहे थे। अब तो कुछ और ही दिखने लग गया। तो इस सारी दुनिया अविद्या में है। यह शरीर को आत्मा मानती है। शरीर और आत्मा एक ही चीज दिखती है। दो कहां दिखती है? महर्षि पतंजलि जी कहते हैं, दो दिखने चाहिए।

जब आप किसी व्यक्ति को देखो तो एक तो आंख से दिखना चाहिए। दूसरा बुद्धि से। दूसरा जो आत्मा है, वह बुद्धि से दिखता है। आंख से कहां दिखता है? आत्मा दिखता है। आंख से आत्मा नहीं दिखता। आत्मा बुद्धि से दिखता है। शरीर आंख से दिखता है। और व्यक्ति शरीर को तो देख लेता है। और बुद्धि को देखता ही नहीं। आत्मा को देखता ही नहीं। बस शरीर को आत्मा मान लेता है। यह अविद्या है। और यह अविद्या ही बंधन का कारण है। यह बंधन का कारण यह मिथ्या ज्ञान। दोनों को एक देखना बंधन का कारण है। दो को दो देखना मुक्ति का कारण है। बस।

तो यह कह रहे मुक्ति का उपाय है। दो चीजों को दो देखो। और साथ में एक तीसरा भी देखो। तीन हैं। तीनों को देखो। ईश्वर है या नहीं है? यहां है या नहीं है? आपके साथ रहता है या नहीं? 24 घंटे दिखता है क्या? यही तो मिथ्या ज्ञान है। ईश्वर 24 घंटे हमारे साथ रहता है। और हम उसको देखते ही नहीं। सोचते ही नहीं। विचार ही नहीं करते। भूल ही जाते हैं। सारा दिन भूले रहते हैं। जब शाम को संध्या का टाइम तब थोड़ा सा याद आता है। चलो भाई थोड़ी संध्या तो कर ले। और हम संध्या नहीं करेंगे तो लोग हमको नास्तिक कहेंगे। तो नास्तिक ना कहे इसलिए लोगों के दिखावे के लिए थोड़ी देर बैठ जाते हैं। ईश्वर में कहां रुचि है? कोई रुचि नहीं।

हां जी, तीन दिखना चाहिए। हां, मैं तो स्टेप बाय स्टेप ला रहा हूं आपको। पहले दो तो देखो। फिर तीसरा दिखाऊंगा। पहले दो तो देखो। तो जब किसी व्यक्ति को देखते हैं, तो हमें एक नहीं दो चीज दिखनी चाहिए। पहले शरीर तो दिखता ही है। दूसरा बुद्धि से आत्मा को भी देखो। और तीसरा ईश्वर को भी देखो। वह भी बुद्धि से दिखता है। दो चीजें तो आंख से नहीं दिखती ना। आत्मा दिखता है ना ईश्वर दिखता है। वह बुद्धि से दिखता है। तो सारे दिन हमको तीन चीजें दिखनी चाहिए। इसका नाम है विवेक ख्याति।

जब आत्म तत्व को हासिल कर लेता है, तो शरीर के साथ आत्मा आत्म तत्व को परमात्मा को देखता ही है। नहीं सकता। ठीक बात। बिल्कुल ठीक बात। तो एक शब्द और है विप्लवा। अ विप्लवा। विवेक ख्याति कैसी? अ विप्लवा। विप्लव कहते हैं हिल जाना, टूट जाना, खो जाना, बिगड़ जाना, बिखर जाना। यह है विप्लव। हिल गई, खत्म हो गई, चली गई, खत्म, नष्ट हो गई। उसका नाम है विप्लव। और अ खत्म नहीं होनी चाहिए। टिकने वाली होनी चाहिए। स्थिर रहनी चाहिए। लगातार विवेक ख्याति बनी रहे। मजबूत हो, पक्की हो। वह मोक्ष तक पहुंचाएगी। थोड़ी देर के लिए आपको तत्व ज्ञान हो गया कि हां ईश्वर भी है, आत्मा भी है, प्रकृति भी है। तीन चीजें। थोड़ी देर के लिए हुआ। पांच-सात मिनट के लिए। उसके बाद खत्म। तो यह इतना कच्चा स्तर का ज्ञान आपको मोक्ष तक नहीं पहुंचाएगा। यह विप्लवा विवे आती है। तो विवा नहीं पहुंचाएगी। अ विप्लवा पहुंचाएगी। वह टिकनी चाहिए, जमनी चाहिए। मतलब सुबह से रात तक हमको तीन पदार्थ अलग-अलग दिखने चाहिए। तो फिर वह अ विप्लव है। वह मोक्ष तक पहुंचा देगी।

जब आपको 24 घंटे पुलिस वाले खड़े हुए दिखाई देंगे चौराहा पर, फिर आप गलती करेंगे। बस। तो 24 घंटे पुलिस वाला दिखना चाहिए। ईश्वर। ईश्वर 24 घंटे आपको पुलिस वाले की तरह डंडा लेकर दिखना चाहिए। तब आप गलती नहीं करेंगे। तब आपका मोक्ष हो जाएगा। तब 100 अच्छे काम करेंगे। जी बोलिए। अलग-अलग ज्ञान नहीं। अलग-अलग ख्याति का अर्थ है ज्ञान। विवेक ख्याति अलग-अलग ज्ञान होना। किसका? तीन तत्त्वों का। तीन तत्त्वों का अलग-अलग ज्ञान होना। यह ईश्वर है, यह आत्मा है, यह प्रकृति है। तो तीनों अलग-अलग दिखने चाहिए। और लोग पढ़े अविद्या में। अद्वैतवाद में कहता अहम ब्रह्मास्मि। मैं ही ब्रह्म हूं। देखो भटके हुए। शास्त्र कह रहा है अलग-अलग देखो। तुम दोनों को एक बना रहे हो। उल्टे काम कर रहे हो। तो तुम्हारा मोक्ष कैसे होगा? नहीं होगा। विवेक। इसका नाम है विवेक। छाति का नाम है विवेक। अर्थात तत्व ज्ञान। हां, यह तत्व ज्ञान। इस ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न होगा। दोनों में कारण कार्य संबंध है। कौन सा कारण कार्य संबंध? कम कर। दोनों में कारण कार्य संबंध है। 29। 29। बस ठीक। हां जी। विवेक ख्याति, तत्व ज्ञान। एक ही बात है। विवेक ख्याति अर्थात तत्व ज्ञान। अर्थात तत्व ज्ञान। वास्तविक ज्ञान। तीनों का पृथक पृथक ज्ञान। ठीक है।

इस ज्ञान, यह ज्ञान है कारण। ज्ञान क्या है? कारण। इस कारण से वैराग्य रूपी कार्य उत्पन्न होगा। क्या बोला? वैराग्य कार्य है। तत्व ज्ञान कारण है। तीनों को जब अलग-अलग देखेंगे, यह तत्व ज्ञान है। इससे वैराग्य हो जाएगा। कैसे हो जाएगा? सुनिए। तीनों का अलग-अलग चिंतन करेंगे। आपको क्या चाहिए? सुख चाहिए। हां या ना? कितने टका? 100। 100 चाहिए। 100 से कम किसको चलता है? नहीं चलता है। 100 प्रतिशत वैरा। सुख चाहिए। यह आपकी इच्छा है। आपका लक्ष्य है। 100 प्रतिशत सुख चाहिए। 100 प्रतिशत दुख छूटना चाहिए। यह दो चीजें आपका लक्ष्य है। हां या ना?

अब हमारे पास तीन पदार्थ हैं। तीन का परीक्षण कर लीजिए। तीनों का विचार कर लीजिए। क्या प्रकृति आपको 100 प्रतिशत सुख दिला सकती है? रोटी, कपड़ा, मकान, मोटर गाड़ी, सोना, चांदी, संपत्ति, बंगला, कार, मान, सम्मान। क्या यह जड़ पदार्थ आपको 100% सुख दे सकते हैं? तो एक का फैसला हो गया। आपका लक्ष्य है 100% सुख प्राप्ति। और यह प्रकृति नहीं दिला सकती। एक का निर्णय हो गया। इसका नाम है तत्व ज्ञान। यह सच्चाई है। यह वास्तविकता है।

अब दूसरा पदार्थ जीवात्मा। उसको देखो। कोई जीवात्मा आपको 100% सुख दे सकता है? नहीं दे सकता। बस। 100 ही तो चाहिए आपको। कितना चाहिए? 100%। और कोई जीवात्मा 100% सुख आपको नहीं दे सकता। यह तत्व ज्ञान। इसको यहां बिठाना है। सर में। यहां बिठाना है। 100% कोई जीवात्मा आपको सुख नहीं दे सकता। 100% कोई भौतिक पदार्थ आपको सुख नहीं दे सकता। ऐसे अलग-अलग समझना तीनों तत्त्वों को। इस अलग-अलग समझने का नाम तत्व ज्ञान है। इसका नाम विवेक ख्याति है।

अब तीसरा बचा ईश्वर। क्या ईश्वर 100% सुख दे सकता है? हां, दे सकता है। दे सकता है ना? बस। ऐसे तीनों को अलग-अलग समझना। तो प्रकृति 100% सुख नहीं दे सकती। जीवात्मा 100% सुख नहीं दे सकता। ईश्वर 100% सुख। तो अब आपकी बुद्धि क्या कहती है? किसके पीछे पड़ना चाहिए? जिसके पीछे आप पड़ेंगे, उसमें आपको रुचि हो जाएगी, आकर्षण हो जाएगा, प्रेम हो जाएगा। क्यों? आपका लक्ष्य वही पूरा कर सकता है। और कोई कर नहीं सकता। जो चीज आपका लक्ष्य पूरा नहीं कर सकती, क्या आप उसकी तरफ बढ़ेंगे? जो वस्तु आपका लक्ष्य पूरा नहीं कर सकती, आपको समझ में आ रहा है? यह वस्तु मेरा लक्ष्य पूरा नहीं कर सकती। क्या आप उसकी तरफ भागेंगे? नहीं भागेंगे। वहां से वापस उल्टे मुड़ जाएंगे। तो वहां से जो उल्टे मुड़ गई, इसका नाम वैराग्य है। क्या बोला? उल्टा मुड़ गए, इसका नाम वैराग्य है।

तो प्रकृति से आपको वैराग्य हो जाएगा। प्रकृति 100% सुख नहीं दे सकती। यू टर्न मारो। प्रकृति की तरफ भागेंगे? जीवात्मा की तरफ भागेंगे? सारी दुनिया भाग रही है। आप भी उन्हीं में। [हंसी] से जब तक अविद्या है, तब तक उस संसार की ओर ही तो भाग रहे हैं ना? बोलिए। किया था कि मान लो जीवात्मा का जो स्वरूप है, उसको अगर परमात्मा कोई सहायता करता है, तो वो देख सकता है, सुन सकता है, जान सकता है। शरीर रूप सहायता। ठीक है। ठीक है। तो जैसे सामान्य जीवात्मा इंस्ट्रूमेंट परमात्मा के द्वारा बने हुए से देख रहा है, सुन रहा है, जान रहा है। तो जो हमको इंस्ट्रूमेंट बना के दे रहा है, उसका सामर्थ्य हमसे न गुना ज्यादा है। बहुत अधिक है। वो तो जैसे हम बिल्कुल लाइव देख रहे हैं, उससे भी ज्यादा लाइव देखता होगा। बिल्कुल देखता है। उससे ज्यादा जानता होगा। क्लियर देखता है। क्लियर जानता है। खुद तो दूसरे के मकान में बैठा है भाड़े पर। और मुझे कहता है मैं बैठा हूं ना। तो फिर दुनिया आपको ऐसी दिखेगी। फिर उसमें रुचि नहीं रहेगी। उसका प्रभाव बिल्कुल फीका हो जाएगा। बिल्कुल कम हो जाएगा। और जैसे-जैसे ईश्वर समझ में आएगा, उसका प्रभाव इतना बढ़ जाएगा, इतना बढ़ जाएगा। जैसे सूर्य का प्रकाश इतना तीव्र है। दिन में एक सूरज चमकता है। सारी दुनिया साफ दिखती है। रात को आप कुछ भी कर लो, कितनी भी लाइटें जला लो। ऐसा लाइट प्रकाश नहीं मिलेगा जैसा सूर्य। एक सूर्य चमकता है। और कितना सुंदर प्रकाश होता है। और हर चीज साफ सुथरी दिखती है। संशय रहित, भ्रांति रहित, बिल्कुल स्पष्ट दिखती है। तो जब ईश्वर समझ में आएगा, तो सूर्य की तरह प्रभावशाली होगा। हर चीज साफ-साफ दिखेगी। जी। समझने का प्रयास कर। उसकी जटिलता इतनी बढ़ जाती है। दिमाग काम नहीं करता। करता तो इसके लिए क्या करना? उसका उपाय सुनिए। आपको प्यास लग गई। आपने सोचा भाई पानी पी ले। प्यास लग रही है। तो पूछा किसी से भाई पानी कहां मिलेगा? उसने कहा सामने नदी बह रही है। जाओ वहां पी लो। तो आप अपना गिलास लेकर चले नदी पर गए। देखा अरे तो बहुत बड़ी नदी है। इतनी चौड़ी नदी। इतना सारा पानी। मैं कैसे पिऊंगा? सारा पानी तो मैं पी नहीं पाऊंगा। नदी में तो बहुत पानी है। सारा तो मैं पी नहीं सकता। तो क्या आप दो गिलास भी नहीं पिएंगे? दो गिलास तो पी लेंगे ना? तो आप क्या करेंगे? एक गिलास भरेंगे, पी लेंगे। फिर कहेंगे, हां, अब अच्छा लग रहा है। अभी प्यास पूरी नहीं बुझी। एक गिलास और पी। एक और भर लिया आपने। दूसरा गिलास पी लिया। अब आपको तृप्ति हो गई। बस बात खत्म हो गई। अब नदी में जितना भी पानी होता रहे, उससे आपको क्या लेना देना है? अगर आपने यह सोच लिया कि सारा पानी कैसे पिऊंगा, तो टेंशन होगी। मेरी बात सुनो, सुनो, ध्यान से सुनो। अगर आपने यह सोचा कि सारा पानी कैसे पिऊंगा, तो टेंशन होगी। और इतना सोचे कि सारा पानी मुझे पीना ही नहीं है। मेरा काम दो गिलास से चल जाता है। मुझे दो गिलास पीना है। बाकी चलने दो। और कोई लोग पी लेंगे। मुझे दो गिलास पानी पीना है। दो गिलास पी लूंगा। बात खत्म हो गई। अब आपको टेंशन नहीं होगी। तो जब आप ईश्वर की व्यवस्थाओं को समझेंगे और उसमें जटिलताएं दिखेंगी, जो आप कह रहे थे, तो सारी जटिलता को मत देखो। सारी जटिलताओं को मत देखो। ईश्वर की तो शक्ति बहुत अधिक है। आपकी समझ में नहीं आएगी। आप तो अपने लायक सीख लो कि हां, ईश्वर की इतनी अच्छी व्यवस्था है। मेरा काम ठीक चल रहा है। बस। ठीक है। धन्यवाद। हो गया। ज्यादा डीप में उतरोगे तो बुद्धि खराब हो जाएगी। ज्यादा डीप में नहीं उतरना। आप यूं सोचने लग जाएं कि भगवान सबका हिसाब कैसे रखता होगा? पागल हो जाएंगे। पागल हो जाएंगे। वो नहीं सोचना। इतना सोचना है कि भगवान मेरा हिसाब ठीक रखता है कि नहीं रखता है? बस इतना सोचो। मेरा तो ठीक रखता है। वो न्याय कारी है। तो फिर मुझे कर्म फल देगा या नहीं देगा? हां, बिल्कुल देगा। ठीक समय पर देगा। न्याय देगा। कहीं भी अन्याय नहीं करेगा। कोई गड़बड़ नहीं करेगा। बस। तो मेरा काम चल गया। बाकी वो क्या करता है, क्या नहीं करता, उसका काम वो जाने। जी। बोलिए। स्तुति करनी चाहिए। करनी चाहिए। करनी चाहिए। तो स्तुति से उन्होंने ये निकाला। इस गुणों का वर्णन। ठीक है। गुणों का वर्णन करना चाहिए। ईश्वर में रुचि उत्पन्न। ठीक है। बिल्कुल ठीक है। तो ईश्वर के गुणों का अगर हम वर्णन करेंगे, थोड़ी जटिलता देखते तो उसकी मानता भी समझ। मानता इतना सावान है और इतना सटीक न्याय करता। जान। ईश्वर की स्तुति करनी चाहिए। गुणों का वर्णन करना चाहिए। मैं भी कह रहा हूं। मैं 100% सहमत हूं इस बात से। जो महर्षि दयानंद जी कह रहे हैं। मैं 100% सहमत हूं। बस मैं यह कह रहा हूं थोड़ी सीमा बना लो। हां, सीमा नहीं बनाई तो पागल हो जाएंगे। फ दिमाग नहीं करेगा। हां, बस सीमा बना ले। जितना हमको अच्छा है, समझ में आ गया। बस आ गया। ठीक है। बहुत खतम।

एक व्यक्ति ने कहा ईश्वर अनंत। मैंने कहा हां, अनंत। यह अनंत पर भी चर्चा चलती है। तो यह भी एक टेढ़ा-मेढ़ा विषय है। समझ में नहीं आता लोगों को कि ईश्वर अनंत है। तो उसने फोन किया मुझे। अच्छा विद्वान था। फोन पर यह शंका उठाई कि जी लोग कहते हैं ईश्वर अनंत है। इसके दो मतलब हो सकते हैं। मैंने कहा बताइए। पहला मतलब तो यह हो सकता है कि ईश्वर का अंत है ही नहीं। अनलिमिटेड। और दूसरा अर्थ यह है कि अंत तो है, पर हम नहीं समझ पाएंगे। हमारी बुद्धि छोटी है। वो बहुत अधिक उस सीमा तक हम सोच नहीं पाएंगे। तो दो में से कौन सा अर्थ ठीक है? ऐसा उसने कहा। मैंने कहा, आप दो में से कुछ भी मान लो। आपकी समझ में तो आएगा नहीं। चाहे अ लिमिटेड मान लो, तो भी समझ में नहीं आएगा। और चाहे लिमिटेड मानो, तो भी आपकी समझ से तो बाहर ही है। तो आप कुछ भी मान लो। क्या फर्क पड़ता है? क्यों खाम खा एक्सरसाइज कर रहे हैं दिमाग की? आपको हर हालत में यही मानना पड़ेगा कि हमारी समझ से बाहर है। तो बस इतना मान लो। टेंशन खत्म हो जाएगी। और वैसे अगर और गहराई में उतरे, तो जो मुझे ठीक लगता है, वो मैं अपना उत्तर बता रहा हूं। पर बात वही है। समझ में आपकी आएगा नहीं। वो बात तो फिर भी रहेगी। आपकी समझ में नहीं आएगा। बोले, अच्छा, आपका विचार बताइए। मैंने कहा, मेरा विचार यह है कि ईश्वर अनलिमिटेड। उसकी सीमा है ही नहीं। बोले, अच्छा, वो दूसरा अर्थ था। उसमें तो सीमा थी। वो मान ले। तो आप इसको क्यों मानना चाहते हैं कि उसकी सीमा है ही नहीं? मैंने कहा, मैं इसलिए मानना चाहता हूं। अगर दूसरा पक्ष माना जाए, सपोज कि चलो कहीं सीमा तो है, पर वो हमारी समझ से बाहर है। ऐसा मान ले, तो एक प्रश्न उठेगा कि जहां ईश्वर खत्म हो जाएगा, जहां ईश्वर की सीमा आ जाएगी, उसके आगे क्या है? उसके आगे क्या चीज है? फिर उसका उत्तर बताओ। कोई उत्तर बनेगा नहीं बनेगा ना? इसलिए पहला अर्थ मानना ज्यादा अच्छा है कि उसका कोई अंत ही नहीं। और वेदों में तो लिखा ही है ईश्वर अनंत। ऋषियों ने भी लिखा ईश्वर अनंत। तो उसको इतना मानकर छोड़ देंगे। ज्यादा दिमाग नहीं लगाएंगे। नहीं तो पागल हो जाएंगे। इसलिए ईश्वर तो बहुत बड़ा है। उसके सारे गुणों को नहीं समझ सकते। एक गुण को भी पूरी तरह नहीं समझ सकते। बस मोटा-मोटा अपने जैसे बताया ना, नदी में से दो गिलास पानी पी लो। अपना काम पूरा हो गया। इतना-इतना चलना है। ईश्वर न्याय कारी है, दयालु है, आनंद का भंडार है, सबका रक्षक है। कैसे रक्षा करता है? मोटा-मोटा समझ लो। बस अपना काम चल जाएगा। ऐसे कर कर। हां जी, बोलिए। प्रकृति सारी है। 24 पदार्थ प्रकृति और प्रकृति का परिवार। यह सारा जड़ पदार्थ है। मूल प्रकृति एक वस्तु। सततम। और उससे उत्पन्न हुए 23 पदार्थ। यह सब जड़ पदार्थ है। प्रकृति और उसका परिवार। इसको विकृति कहते हैं। 23 पदार्थ जो उत्पन्न हुए। इसका नाम है विकृति। भूत, इंद्रिया, आत्म का। 10 भूत और 13 इंद्रिया। यह 23 पदार्थ। यह प्रकृति से बने। तो दार्शनिक भाषा में प्रकृति तो नाम है मूल द्रव्य का। सततम का। और जो 23 पदार्थ उत्पन्न हुए। इसका नाम है विकृति। विकृति का मतलब विशेषण कृति। विशेष रूप से बनाई गई। सोच समझकर बनाई गई। सिस्टमैटिक क्रिएशन। विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाई गई। वह है विकृति। तो यह सारे 24 जड़ पदार्थ। जिसका उल्लेख हमने पिछले सूत्रों में पढ़ा 18 और 19 में। ठीक है। पहले प्रकृति का। क्योंकि प्रकृति स्थूल वस्तु है। मनुष्य के समझने की जो पद्धति है, वह यह है। पहले वह मोटी चीज को समझता है। विषय को पहले समझता है। स्थूल विषय को। बाद में उसकी बुद्धि की क्षमता बढ़ती है। फिर वह सूक्ष्म बातों को भी समझता है। पहले मोटी बात समझता है। फिर गहरी बातें समझता है। हमारा सिस्टम ऐसा है। तो ईश्वर, जीव, प्रकृति। तीन पदार्थ हैं। इन तीनों को समझना है। इसका नाम विवेक ख्याती है। तो समझने का सिस्टम है। पहले स्थूल विषय को समझो। वो जल्दी समझ में आएगा। फिर वो समझ में आने पर फिर उससे सूक्ष्म को समझो। फिर वो समझ में आएगा। फिर बाद में सबसे सूक्ष्म को समझो। यह हमारा समझने का क्रम है। तो तीनों में सबसे स्थूल या सबसे सरल विषय प्रकृति है। इसलिए पहले प्रकृति को जानेंगे। यह प्रकृति है। यह संसार प्रकृति विकृति। मैं दोनों को चालू भाषा में प्रकृति के नाम से बोल रहा हूं। आपको पहले क्लियर कर दिया। यह सारा प्रकृति विकृति एक ही चीज है। यह प्रकृति का ही रूप है जो जगत है। तो अब प्रकृति मूल तो सूक्ष्म है। वो तो दिखती नहीं। तो जो दिखती है, यहीं से हम शुरू करेंगे। जो सामने दिखती है। तो सामने क्या दिखता है? रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श। पांच विषय दिखते हैं। तो इनको जानना सबसे पहले। कल परसों मैंने कहा था खूब हलवा खाओ। खूब खाओ। पेट भर के। खूब एक्सपेरिमेंट करो। यहां से शुरू करना। ठीक है ना? तो आज जाकर खूब पेट भर के खाना खाते ही रहते हैं। कितने सालों से परीक्षण कर रहे? परीक्षण नहीं कर रहे। बस खा रहे हैं। परीक्षण नहीं कर रहे। अब परीक्षण शुरू करें। खूब जम के खाओ। खीर, पूरी, हलवा, मिठाई, पूरी, कचौरी, समोसे। सब खाओ। और खाकर रिजल्ट निकालो। रिजल्ट क्या आया? तृप्ति हुई या नहीं हुई? ऐसे रिजल्ट निकालिए। एक परीक्षण, दो परीक्षण, तीन बार, चार बार, 10 बार परीक्षण करें। और अंत में रिजल्ट निकाले। क्या हुआ? तृप्ति हुई कि नहीं हुई? अगर हुई, तो ठीक है। चालू रखो। चालू रखो। खाते जाओ। सारी जिंदगी खाते रहो। आपको तृप्ति हो रही है। और क्या चाहिए? सुख ही तो चाहिए। सुख तो मिल ही रहा है। फिर चालू रखो। और अगर यह रिजल्ट आए कि तृप्ति तो हो ही नहीं। जिस इच्छा से हमने खाना-पीना भोगना शुरू किया था, वो इच्छा तो पूरी हुई नहीं। अगर यह रिजल्ट आए, तो फिर बुद्धि का इस्तेमाल करो। फिर जो हमारा काम पूरा नहीं हो रहा, उस तरफ भागना पागलपन है। जहां जाने से हमारा उद्देश्य पूरा नहीं होता, वहां जाना तो बुद्धिमत्ता नहीं है ना? तो क्यों भागे? फिर यह सोच करके फिर आप वहां से यूटर्न मारेंगे। प्रकृति समझ में आ गई। देख लिया, खा लिया, पी लिया, घूम लिया, देख लिया, सुन लिया, सूँघ लिया। सब काम कर लिया। इसमें इच्छा तो शांत होती नहीं। तो क्यों जाना इस तरफ? यहां से निकलो। वापस। फिर जीवों के साथ बैठो। गप्पे मारो। अपने भाई-भतीजे के साथ, दोस्तों के साथ, मित्रों के साथ, पति-पत्नी के साथ बैठकर खूब गप्पे मारो। और देखो तृप्ति हुई कि नहीं हुई? दो घंटा गप्पे मारने के बाद देखो कैसा लगता है? बोर हो जाएंगे। आपकी इच्छा खत्म नहीं होगी। बोर हो जाएंगे। बातें कर-कर के बातें खत्म हो जाएंगी। फिर कोई बात ही नहीं बचेगी। क्या बात करें? फिर एक दूसरे की शक्ल देखेंगे। एक घंटा दूसरे की शक्ल देखो। आप तंग आ जाएंगे। जिसकी शक्ल बहुत अच्छी लगती है ना, बहुत पसंद है। एक घंटा लगातार उसके चेहरे पर देखो। अपनी नजर वहां से हटाना नहीं। एक घंटे तक लगातार देखो। जो आपको बहुत फेवरेट दिखता है। आप पागल हो जाएंगे। एक घंटे में। छोड़ यार, तू आंख बंद कर। छोड़। निकाल इस आदमी को। पागल है। तो ऐसा हो जाएगा। जी बोलिए। यही तो है एक्सपेरिमेंट। जी। जब कोई योगी साधना, स्वाध, त ईश्वर प्रधान की सारी कक्षा को पार करता होगा। अप विद्या को करता हु। विद्या में प्र होता है। विद्या है। उस समय जो सूति कही गई। आ स। तब उसमें जब वो ध्यान करता है, तो और जगत में जब भ्रमण करता है, तब उसको दोनों चीज दिखती है। वो उसको आत्मा भी दिखता, शरीर भी दिखता। ये अनुभव का मैं आपको कह रहा हूं। स है नहीं। बिल्कुल सही। अपना सही है। सही है। बहुत अच्छा। हम ठीक बात। ठीक बात है। बहुत अच्छा। तो यह सारी चीजें हैं एक्सपेरिमेंट करने की। ऐसे एक्सपेरिमेंट करने से आपको तत्व ज्ञान होगा। यह सारे प्रयोग इसलिए बताए जा रहे हैं कि इससे आपको वो तत्व ज्ञान हाथ में आ जाएगा। उस तत्व ज्ञान से फिर वैराग्य होगा। फिर कहेंगे, ठीक है भाई, देख तो लिया। गप्पे मार ली, खा लिया, पी लिया। क्या हुआ? कुछ नहीं हुआ। छोड़ो ना। फिर आपका मन ऐसे हो जाएगा, छोड़ो ना। बस। फिर इतना काम करेंगे जितना काम जरूरी है, जितना आवश्यक है। फिर उतनी बात करेंगे। भोजन चाहिए? हां, माता जी, भोजन दे दो। भूख लगी। गए। भोजन खाया। 10-20 मिनट में नमस्ते। बहुत धन्यवाद। फिर अपने चल दिया। अपने एकांत में। फिर काम से काम रखेंगे। तो फिर ऐसे वैराग्य हो जाएगा। और फिर बैठेंगे भगवान के पास। उसके साथ आप बैठे रहो। आप थकते नहीं, बोर नहीं होते। उससे जितनी मर्जी बातें करो। अब लोग भगवान से तो बात करते ही नहीं। दुनिया से सारा दिन बात करते हैं। भगवान से बात ही नहीं करते। उसको तो भूले ही रहते हैं सारा दिन। तो कोई बात नहीं। धीरे-धीरे अभ्यास करेंगे, तो धीरे-धीरे अभ्यास बनेगा। ऐसे एक-एक चीज का परीक्षण करते जाएंगे। पहले प्रकृति से आपका मन उचाट हो जाएगा, थक जाएंगे, बोर हो जाएंगे। तो यहां से वैराग्य हुआ। फिर जीवात्माओं का परीक्षण करेंगे। उनसे भी वैराग्य हो जाएगा। फिर ईश्वर का परीक्षण करेंगे। वहां आपका मन शांति मिलेगी। जितना जितना ईश्वर को समझेंगे, ईश्वर के गुणों को समझेंगे। ईश्वर आनंद स्वरूप है। कैसा बढ़िया आनंद है। कितना आनंद है। तो जैसे-जैसे ईश्वर का आनंद समझ में आएगा ना, हो जाए थोड़ा नस चढ़ गई। पा हो जाएगा। तो जैसे-जैसे ईश्वर समझ में आएगा, उसका आनंद आपको मिलने लगेगा। फिर उसमें जो तृप्ति होगी, वह दुनिया में कहीं भी नहीं होगी। तो यह धीरे-धीरे होगा। समय लगेगा। पढ़ाई करेंगे, चिंतन करेंगे, एकांत में रहेंगे। इन बातों पर जितना अधिक विचार करेंगे, उतना उतना प्रगति होगी। इसलिए कहा था घर में रहकर मुक्ति नहीं मिलती। यह सब करने के लिए एकांत चाहिए, शांति चाहिए, जंगल चाहिए, प्राकृतिक वातावरण चाहिए, जहां बाहर का शोर-शराबा ना हो। ये पोल्यूशन ना हो। दूर धमाका ना हो। नगरों का भागदौड़ ना हो। शांति हो, एकांत हो। वहां पर दिमाग काम करता है। इन बातों में। तो वेदों में कहा उप वरे गिरी नाम संगम च नदी नाम धया विप्रो अजत। पहाड़ों की गुफाओं में जाओ, जंगलों में जाओ, आश्रमों में जाओ, एकांत स्थानों में रहो। वहां बैठकर चिंतन करो। वहां यह सारी चीजें साफ दिखेंगी। इस प्रकार से हमारी प्रगति होगी। और कोई शंका? बोलिए। बुद्धि से आत्मा को देखना। थ समझ। हां, इसको बताता हूं। आंख से तो शरीर दिख रहा है। ठीक है। शरीर साढ़े फीट का है, पौने फीट का है। क्या इसमें आत्मा भी है? है ना? जीवित शरीर में। जब हिलता-डलता है, तो मतलब इसमें आत्मा है। अब डेड बॉडी क्यों नहीं हिलती? उसमें आत्मा नहीं है। ऐसे बुद्धि से देखना। यह शरीर क्यों हिल रहा है? इसमें आत्मा है। इसलिए हिल रहा है। और अच्छा भला हिलता था। अभी बंद हो गया। यह क्यों बंद हो गया भाई? तो बुद्धि बताती है ना, यह क्यों बंद हो गया? आत्मा निकल गई। तो आपने बुद्धि से जाना इस बात को कि इस जीवित व्यक्ति में आत्मा है। ऐसे देखना। तो जब भी किसी जीवित व्यक्ति को देखेंगे और वह चल रहा है, फिर रहा है, बोल रहा है, बात कर रहा है, हंस रहा है, गा रहा है, खेल रहा है, सारे काम कर रहा है, तो बुद्धि से देखो। इसमें एक आत्मा है। उस पर थोड़ा कंसंट्रेट करें। थोड़ा विचार केंद्रित करें कि इसमें एक आत्मा है। जब आपका ध्यान आत्मा पर जाएगा। क्या बोला? तो जितना शरीर का प्रभाव है, वो हल्का पड़ जाएगा। शरीर देखकर जो आपको प्रभाव पड़ता है ना, शरीर का बड़ा सुंदर है, लंबा-चौड़ा है, बलवान है, मजबूत है। यह जो शरीर का प्रभाव पड़ रहा है, यह फीका पड़ जाएगा। जब आपका दिमाग आत्मा के बारे में सोचेगा। मतलब जब आप आत्मा के बारे में सोचेंगे, तो आत्मा का प्रभाव थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगेगा। और शरीर से जितना आप प्रभावित हो रहे हैं, वो कम हो जाएगा। फिर उन दोनों की तुलना करेंगे। शरीर और आत्मा की। अब थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा कि ये दो चीजें हैं, एक नहीं है। एक शरीर है और एक आत्मा है। फिर जब ज्यादा मूल्यवान आत्मा है, तो आप उससे प्रभावित होना शुरू हो जाएंगे। शरीर का प्रभाव कम होता जाएगा, हल्का होता जाएगा। उसमें जो आकर्षण है, वो घटता जाएगा। फिर बुद्धि से और देखेंगे। अगर कितना अच्छा बलवान सुंदर व्यक्ति है। अगर इसमें से आत्मा निकल जाए, फिर क्या बचेगा? फिर शरीर बचेगा। अब बुद्धि से उसको अलग कर देंगे। दोनों को। शरीर अलग, आत्मा अलग। जब बुद्धि से आत्मा को अलग कर देंगे, तब डेड बॉडी बचेगी। अब देखो आप डेड बॉडी से कितने प्रभावित होंगे? कुछ नहीं। क जल्दी निकालो, जल्दी निकालो। ऐसा होगा ना? तो यह तो तब होगा, जब व्यक्ति मरेगा, आत्मा निकल जाएगा। वो तो अभी 10-20-50 साल बाद होगा। जो 50 साल बाद स्थिति होगी, उसको हम आज ही देखेंगे बुद्धि से। अगर आज ही हो जाएगा। यह महर्षि पतंजलि कहना चाहते हैं। आ गया समझ में? तो ऐसे बुद्धि से आत्मा को देखना है। हां जी, बोलो। स्वामी जी, एक बार एक कोकस उल्टा था। हम। और ऐसे बड़ा था। मेरे को ऐसा लगा कि ये मर गया। हां। तो उसकी मरी हुई की थोड़ी अनुभूति अलग लग रही। लेकिन फिर मैं सोचा चलो इसको पैर महला के देखते हैं। ला के देख। और थोड़ी देर पहले उसको देखा तो ऐसा लगा ये डेड बॉडी है। बिल्कुल उल्टा था। तो हलचल नहीं कर रहा। ठीक बात। और जैसे उसको थोड़ा सा ठोकर मारी, तो सीधा हो गया। सीधा हो गया। और सीधा होते थोड़ी हलचल नहीं। भागा नहीं। थोड़ी उसकी हलचल हुई। मुछे हिलाई। तो ऐसा मेरे को अनुभव हुआ कि ये तो जिंदा है। हां। उसको देखने से अंदर एक रोमांच उत्पन्न हुआ। प्रभाव पड़ा ना? ऐसे पड़ता। पता चल गया कि अभी मरा नहीं है। इसमें आत्मा है। यदि आत्मा है, तो आपके ऊपर उसका प्रभाव अलग टाइप का होगा। और डेड बॉडी है, तो अलग टाइप का होगा। बस यही फर्क है। ऐसे बुद्धि से आत्मा दिखता है। फिर यह लंबा चौड़ा काम है। बाकी शाम को बताएंगे। अभी पूरा हो गया। समय हो गया। बाकी चर्चा फिर करेंगे। धन्यवाद। अगली सूचना श्री लाल चंद जी बताएंगे। [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]