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अस्सलाम वालेकुम। मेरा नाम है जिशान उस्मानी। आज की इस वीडियो का टॉपिक है अल्लाह से बातें करें। यह बहुत इंपॉर्टेंट स्किल है और यकीन जानिए, अगर आपको आ गई तो आपकी जिंदगी में इसका बहुत ज्यादा फायदा होगा।
हमारे माशे में एंजाइटी और डिप्रेशन बहुत ज्यादा बढ़ गई है। इस डिप्रेशन का वाहिद हल जो है, वो यह है कि अल्लाह सुभान ताला से बात करना शुरू कर दें। इंसान है ना, इंसान थक जाता है, परेशान हो जाता है। कभी-कभी उसे गम ऐसे लोगों से मिलते हैं जो उसके अपने होते हैं। देखिए, जिससे आप मोहब्बत नहीं करते ना, वो आपको तकलीफ भी नहीं दे सकता। आपको परवाह ही नहीं। कोई बंदा जो चाहे बोलता रहे, आपका उससे कोई लग्गा नहीं है, कोई वास्ता नहीं है, कोई रिश्तेदारी नहीं है, तो आपको फील क्यों होगा? दुख, गम जभी मिलता है जब वो कोई अपना हो। अब ऐसी सूरत में बंदा कुछ कर भी नहीं पाता। कभी-कभी वो रिश्ते इतने करीब के होते हैं कि बंदा उनको बददुआ भी नहीं दे सकता। तो आपको ये तमाम फ्रस्ट्रेशन, ये तमाम गम, ये तमाम चीजें वेंट आउट करनी पड़ती हैं। किसी ना किसी को तो सुनानी है ना। और दुनिया में पहली बात तो सुनने का टाइम किसी के पास नहीं है। और अगर सुन भी लिया, तो उसको मदाबा व नहीं कर सकता। कोई कितना कोई रिसोर्सफुल क्यों ना हो जाए।
अल्लाह सुभान ताला से बातें करना शुरू करें। आपको इंशाल्लाह ताला डिप्रेशन की और एंजाइटी की बीमारी नहीं रहेगी। अच्छा, उसमें कोई फॉर्मेलिटी नहीं है, कोई रुकावट नहीं है, कोई प्रोटोकॉल नहीं है, कोई रेड टेप नहीं है। जब चाहे, जैसे चाहे, जो चाहे कह सकते हैं। जैसे चाहे मांगे। आपका और आपके रब के बीच में दूसरा बंदा कोई क्या बोल सकता है?
काफी अरसे पहले एक उर्दू की व नजम सुनी थी, वो दिमाग पर जिसे सप्त हो गई थी। वो कुछ इस तरह थी कि एक चरवाहा किसी जंगल में था या माहे कामिल किसी बादल में था। याद-ए-मौला में हमेशा मस्त था। आसमां उसकी ज़मी पर बस था। याद करते-करते थक जाता था, जब चीख उठता दर्द से, पाता सरता। तू मेरी कुटिया में क्यों आता नहीं? तू मेरी कुटिया में क्यों आता नहीं? क्या मेरा जंगल तुझे भा नहीं? आ उतरा अर्श से घर पर मेरे, पांव धो धोक पिऊंगा मैं तेरे। रात दिन झूला झुलाऊंगा तेरा, सुबह उठकर मुंह धुला हूंगा तेरा। भीख दर-दर मांग कर मैं लाऊंगा, पहले तुझे खिलाऊ खिलाकर फिर खाऊंगा। कर रहा था वो यूं ही शोर-ओ-फुगा। हजरत मूसा भी आ निकले वहां। डांट कर बोले, "अबे बगता है क्या? नूर मुतलू नादान है क्या? खुदा तेरी तरह इंसान है?" कर चुके मूसा जब उसको दिल हजी, हजरत हक से वही आई। वही, "क्या किया मूसा तूने? क्या किया? कर दिया बंदे को मौला से जुदा। तुझको भेजा जोड़ने के वास्ते, तू नहीं था तोड़ने के वास्ते।"
होशियार का तरीका और है, दिलजलों के और ही कुछ तौर है। आपको पता है दिलजला किसे कहते हैं? दिल जला उसे कहते हैं, जिससे उसका महबूब बिछड़ जाए, जो अपने चाहने वाले से, अपने यार से दूर हो, उसे दिल जला कहते हैं। क्या आपको देख के ऐसा लगता है कि आप अल्लाह से दूर हैं? क्या आप अल्लाह से बिछड़ गए हैं? क्या अल्लाह को आपने खो दिया है? क्या अल्लाह को पाने की जुस्तजू है?
एक बच्चा अपनी मां से बिगड़ जाए ना, तो कुछ बताना नहीं पड़ता। मां के चेहरे पर नजर आ जाता है कि उसका बच्चा कहीं खो गया है और परेशान है। बच्चे को बताना नहीं पड़ता, वो रो-रो के दुनिया सर पर उठा लेता है कि मां से बिछड़ गया है। अल्लाह को अपने पास ही रखना चाहिए। अल्लाह को समझे, अल्लाह को समझाएं, अल्लाह से आजारी करें, अल्लाह से लाट करें, अल्लाह से जिद करें। अल्लाह से मांगे। नहीं मांगना आता, उससे पूछ लीजिए ना। जो शख्स अल्लाह से मिलना चाहता है, अल्लाह सुभान ताला उस शख्स से मिलना चाहता है। जो शक् अल्लाह साई से मांगता है, अल्लाह उसको देना चाहता है।
बुखारी शरीफ में आता है ना, अल्लाह कहते हैं तहज्जुद के वक्त, पहले आसमान पर होते हैं। कहते हैं, "कोई है शख्स मांगने वाला कि मैं उसकी पुकार को सुनूं? कोई है माफी का तलबगार कि मैं उसको माफ कर दूं? कोई है जिसे कुछ चाहिए तो मैं उसको दे सकूं?" अगर आपको कोई चीज शिद्दत से चाहिए और बहुत ज्यादा तलब है उस चीज की और आप तहज्जुद नहीं पढ़ते ना, तो यकीन जानिए, वो चीज आपको नहीं चाहिए। एक कैसे हो सकता है कि आपको बहुत चीज चाहिए भी, आपको तलब भी हो, आपको मांग भी हो, चा भी रहे और फिर भी अल्लाह से ना मांगे? हम में से कौन है ऐसा शख्स जिसको अल्लाह से कुछ ना कुछ ना चाहिए हो? और दुनिया में कौन सी ऐसी चीज है जो अल्लाह देने पर कादिर ना हो? उसके बावजूद भी उससे बात नहीं करते आप।
सूरह मसना की आखरी आयत देखिए, मायला से जो शुरू होती है, पांचवे पारे की। तो अल्लाह कहता है, "अल्लाह को क्या पढ़ है कि अल्लाह तुम्हें अजाब दे, अगर तुम शुक्र अदा करते रहो और ईमान ले आओ।" अबता ये तौबा की भी कोई बात नहीं है, माफी की कोई बात नहीं है, गुनाह की सवाब की कोई बात नहीं है। अल्लाह बोलते हैं, "शुक्र अदा करते रहो। शुक्र ईमान का मुकदमा है। शुक्र अदा करते रहो, ईमान मिल जाएगा।" अल्लाह खुद कहता है, "मुझे क्या पढ़ है, मैं तुम्हें अजाब दूंगा।" अल्लाह का कोई लग्गा थोड़ी है। तो अल्लाह से बातें किया करें। जो चाहे करें, जैसे चाहे करें, बस बोलते रहा करें। रात को सोने के लिए लेट हैं, चादर ओढ़ लिया करें, बोले, "अस्सलाम वालेकुम, यू नो व्हाट, व्हाट हैपेंड? आई वेक अप इन द मॉर्निंग, फिर मैंने नाश्ता किया, फिर यह हो गया, फिर मैं ऑफिस गया, वहां पे ये सही हुआ, ये गलत हुआ, बैंक काम फंस गया था।" पूरी रदात सुना दिया करें और सुझाया करें। आप देखें, आपकी जिंदगी पर इसका बड़ा मजबूत असर पड़ेगा।
मेरा एक दोस्त है अब्दुल्लाह। वो घर ढूंढ रहा था, घर लेने के लिए। तो वो इसी तरह बातें करता था चलते-फिरते। मैं तो लगता था कोई गल ही हो गया है। के, "अल्लाह मियां, तू जन्नत में घर देगा, उसमें नहर होगी, तो यहां तो कम से कम ऐसा घर दे दे जिसके बैक यार्ड के अंदर, पिछवाड़े में कम से कम स्विमिंग पूल तो हो। और मेरी तो औकात नहीं है अल्लाह सुभान ताला कि मैं कोई भी घर ले सकूं। तू तू करीम है, तू मौला है। को-साइनर चाहिए होता अमेरिका के अंदर, तो तू को-साइनर बन जा।" इस्लामिक फाइनेंस की इससे अच्छी सूरत क्या होगी कि वो फाइनेंस तेरे पास से आ जाए, तेरे पास से आएगा तो इस्लामिक भी होगा। फाइनेंस, तू पैसा देगा, तेरे से ही ले लेता हूं लोन। अब वो सारा बातें करता रहता है, करता रहता है।
एक वाकया और उसने मुझे अच्छा सुनाया। कहने लगा कि मैं गया किसी जगह के ऊपर, तो एक दोस्त ने अपने घर पर तरावीह के लिए मधु किया। वो हाफिज था, उसके भाई भी हाफिज थे और आलिम थे। और जब वहां पर गया, तो वो सारे मोहल्ले के बच्चे आए हुए थे और सारे के सारे हाफिज-ए-कुरान थे, आलिम थे। उनके मां-बाप भी बड़े अच्छे माशाल्लाह, जत पढ़े लिखे थे, बड़े नेक लोग थे। जब दुआ का वक्त आया, तो वो बड़ा खुश हुआ अब्दुल्लाह। तो कह रहा, "मैंने तो बड़ी रज की दुआ मांगी।" कहने लगा, "अल्लाह मियां, अल्लाह साई, ये सारे बेवकूफ तेरे पास जमा हो गए। रमजान की रातें, तरावीह का वक्त, और सारे के सारे खाली हाथ आपके पास आ गए। यहां ये आलिम है, यहां ये हाफिज है, या इनके मां-बाप आलिम हाफिज हैं, या इनके बच्चे आलिम हाफिज हैं, या इनके बहन-भाई आलिम हाफिज हैं। तो सारे के सारे नेक लोग हैं, गुनाह गुना कोई नहीं है, सब खाली हाथ तेरे पास आ गए।"
कोई शख्स डॉक्टर के पास जाए और उसको कोई बीमारी ना हो, तो डॉक्टर उसको चलता करेगा, बोलेगा, "भाई, आप बिल्कुल ठीक हैं, आप घर चले जाएं।" हां, कोई डॉक्टर के पास जाए, गोली लगी हुई हो, खून उबल के बाहर आ रहा हो, तो सारे लोग आगे-पीछे फिरेंगे उसके। कोई गोली निकालेगा, कोई खून बंद करेगा, कोई पेपर वगैरह साइन करेगा, कोई ऑक्सीजन लगाएगा। तो कहने लगा, "अल्लाह, मैं आया हूं। सबसे ज्यादा गुनाह मेरे पास है। थाल भर-भर के गुनाह मैं लेकर आया हूं। तू रहमान है, तू रहमत करेगा किसके ऊपर? तू सत्तार है, सत्तार किसकी करेगा? गफ्फार है, गफ्फार होगी कब? तो ये गुनाहों के लिए, गुनाहगारों के लिए तेरी मखसूस रहमत है ना, मैं वो लेने के लिए तेरे पास आया हूं। ये थाल भर-भर के जो मैं लेकर आया हूं गुनाह, इन सबको माफ कर दे। और देख, हमारे गांव के अंदर एक रविश है कि किसी को कोई चीज भेजा जाए, तो घर से बर्तन खाली वापस नहीं भेजते, कुछ ना कुछ डाल के भेजते हैं। अब मुझे इतने सारे थाल और ट्रक भर के लेकर आया हूं गुनाहों के, उनको माफी कर दे। अब खाली ले जाता तो अच्छा नहीं लगूंगा। तो ऐसा कर, उन सबको नेकियों से भर दे। ये सारे बेवकूफ आ गए खाली तेरे पास, मैं पूरा लदा-भंदा तेरे पास आया हूं और तुझसे उम्मीद करता हूं कि तू उसको भर के भेजेगा।"
कोशिश किया करें कि अल्लाह से मांगे, अल्लाह से बात करें, अल्लाह से लाट करें, अल्लाह से जिद करें। जो भी फ्रस्ट्रेशन है ना जिंदगी की, वो अल्लाह को बता देनी चाहिए। उससे पहली बात तो यह, आपको डिप्रेशन और एंजाइटी नहीं होगी। जब अल्लाह से मुसलसल मांगते रहे ना, तो अल्लाह आपके कल्ब के ऊपर सकीना नाजिल करते हैं। बड़ा दिल इत्मीनान मुतमइन हो जाता है कि ठीक है यार, किसी बड़े को कह के सुन लिया, अब सुकून में आ गया हूं। छोटी सी मिसाल दूं आपको, कोई बंदा तंग कर रहा हो मोहल्ले का, आप जाके एसएचओ से, डिप्टी कमिश्नर से शिकायत कर दें और बोले, "तुम फिक्र ना करो, मैं देख लूंगा उसको।" तो अब कितने आराम की नींद सोते हैं कि कुछ भी होगा तो मैं उसको।
WhatsApp से फील होना चाहिए। आप बोल दीजिए, आपके गम अपने आप खत्म हो जाएंगे। जो होगा, अल्लाह उसको खुद ही देख लेगा। आप कम से कम अर्जी तो डाल कर आ जाएं ना। दुनिया के किसी भी मामले में मुद्दई बन जाया करें, अर्जी पहले डाल दिया करें, पहले आप चले आया करें, पहले बोल दिया करें। अल्लाह बहुत आसानी करेगा। ये अल्लाह से बातें करने का बहुत आसान नुस्खा है। ना इसके लिए आपको कोई मुश्किल दुआएं याद करनी हैं, ना इसके लिए आपको कुछ और जतन करने हैं, ना इसके लिए कोई फॉर्मेलिटी प काम करना है। दुआएं जो सुन्नत में आती हैं, बहुत अच्छी हैं। उन्होंने कबूलियत के रास्ते देखे हुए होते हैं। याद हो जानी चाहिए। लेकिन हमारी क्योंकि अरबी जुबान नहीं है, तो हम अपना माफ़्-ए-ज़मीर सही तरह बयान नहीं कर पाते। वो दुआएं रट लेते हैं, उनका मतलब भी नहीं आता, वो भी पढ़ लेनी चाहिए। सुन्नत में आई है, बिल्कुल सही बात है। लेकिन जब दिल भरा हुआ हो ना, तो अपने अल्फाज में, अपनी जुबान में, सिंधी में, पंजाबी में, पश्तो में, उर्दू में, जो कुछ समझ में आए, सब अल्लाह से बोलते और मुसलसल बोलते रहें। किसने मना किया? किसी ने कहा तो नहीं ना कि रात ही बोलना है, सुबह नहीं बोलना? सुबह, शाम, रात, चलते-फिरते।
आपको कोई शख्स देखे ना, तो उसको बोलना चाहिए कि "ये शख्स अल्लाह से बिछड़ा हुआ है। ये ये शख्स कम से कम अल्लाह का मतम नहीं है, अल्लाह के पास जाना चाहता है, उससे बात करना चाहता है।"
देखिए, आज रमजान की बड़ी रात है, 27वीं शब है। सबके लिए दुआ कीजिएगा। पाकिस्तान के लिए भी दुआ कीजिएगा। मेरे वास्ते भी दुआ कीजिएगा। मुझे आपकी दुआओं की बहुत शदीद जरूरत है। मेरी बातें सुनने का शुक्रिया। मैं हूं आप सबका जिशान उस्मानी।