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13) Fiqh - Tayammum ke masail (Masla 115-123) - Class 13 || Dr. Mahboob Abu Asim Hafizahullah

Dr. Mehboob Abu Asim35:39

Transcription

सलाम वालेकुम साथी। मेरा खल सामने आ जाइए। अभी टाइम पास थोड़ा है। बमला रमान रहीम अदला रबल आलमीन ला सलाम अला रसू करीम ला आलीही व हमने साबका दर्स में गुसले जनाब के मसाइल पढ़े थे। तो उस हवाले से गुसल जो है, वह उसका हुक्म क्या है? गुसल करने का क्या हुक्म है? जनाब से गुसल फर्ज है। और उसके अलावा कौन-कौन से फर्ज गुसल है? जनाब से फर्ज है। और हाँ जी, हैद निफास से अगर पाक होती है तो उससे फर्द है। और किस चीज से? हाँ जी जी हाँ, खाव बीवी के मिलाप से और सो जाने से। हाँ, तलाम हो जाए, तलाम हो जाए तब भी गुसल फर्ज है। जुमे के नमाज के लिए हाँ जी, फर्ज है। हाँ जी, इख्तिलाफ तो है, लेकिन सही क्या है? सही क्या है कि वाजिब है। कोई दलील उसकी? भा हम यहां पर दलील सीखने के लिए आए हैं। समझे ना? उस जमाती वाजिब अला कुत आप की हदीस के जुमे का गुसल हर बालिग आदमी पर वाजिब है। अच्छा, उसके बाद इसी तरह हमने अगर नन मुस्लिम कोई इस्लाम कबूल करता है तो उस पर भी बामा कहते हैं, फर्ज है। इसम लाफ है, उसको गुसल कर लेना ज्यादा बेहतर है। और किन चीजों में गुसल करना मुस्ताहब है? बेहतर है किन मौकों पर? धन के मौके पर और एहराम बांधने से पहले। मयत को अगर किसी ने गुसल दिया है तो उसे गुसल कर लेना चाहिए। तो यह चंद चीजें थीं गुसल के हवाले से। तो गुसल का मसनून तरीका क्या है? सुन्न तरीका गुसल का? हाँ जी, सबसे पहले नियत करना। नियत बहुत जरूरी है। अगर बगैर नियत के गुसल कर लिया तो गुसले जनाब नहीं होगा। आदमी की जो नापाकी है वह नापाकी दूर नहीं होगी। तो नियत करना जरूरी है। और उसके बाद गुसले जनाब करते हुए क्या करना है? दोनों हाथ धोने, इस्तंजा करना और ई नजासत संज करना और कुछ वजू करना। जिस नमाज के लिए वजू किया जाता है। आप कहेंगे तो अभी नापाकी की हालत में वजू करने का फायदा होगा? वजू करने का फायदा होगा? यहाँ पर हाँ, इसी नापाकी को दूर करने के लिए वजू है। समझे ना? इसी नापाकी को दूर करने ही के लिए वजू है। तो वजू करना। और वजू के बाद सर पे पानी डालना। अच्छी तरह सर के बालों को गीला करना। उसके बाद हाँ, सभी को पता होना चाहिए, इसमें शर्मा रहे हैं, पता नहीं है। पूरा जिस्म जो है, पानी से गीला करना। हत्ता कि कोई जगह भी खुश्क ना रह जाए। हत्ता कि नाफ के अंदर तक भी पानी डालने की कोशिश करना। जो इस तरह के जिस्म के हिस्से हैं, जहाँ पर अमूमन पानी ना जाता हो तो वहाँ पर भी पानी पहुँचाने की कोशिश करना। तो अच्छा, हमारे बाद कहते हैं कि नाक में ऊपर पानी चढ़ाना और अच्छी तरह गरारा करना। तो यह अलग से फर्ज है या वजू के अंदर शामिल है? वजू में शामिल है। समझे? वजू का ही हिस्सा है। और वजू वैसे हमें हमारे वजू के अंदर ये गलती रहती है। वजू जब भी करें कोशिश करें कि पानी अच्छी तरह मुँह में उसको घुमाएँ। गरारे भी करने की कोशिश करें। गरारे की जरूरत है तो। और नाक में भी ऊपर पानी अच्छी तरह चढ़ाना। जिसे वजू में पढ़ा था, सिर्फ गुसल में नहीं है। जब भी वजू करें कोशिश करें कि नाक में पानी अच्छी तरह ऊपर तक चढ़ाया करें। सवाय के रोदी की हालत में। आपने एहतियात करने का हुक्म दिया है कि रोदी की हालत में एहतियात की जाए ताकि पानी अंदर ना चला जाए। लेकिन फिर भी नाक में पानी डालना है, जहाँ तक मुमकिन हो। तो हमारे अरवे सिर्फ वो पानी नाक के ऊपर लगा के छोड़ देते हैं। ये काफी नहीं है। लाज़मी पानी नाक के अंदर तक जाना चाहिए। और इसके तिब्बी तौर पर, मेडिकल के तौर पर बड़े फायदे हैं। जरासी नाक मरते हैं और जुकाम नज़ला इस तरह की चीजें काफी हद तक इंसान की कंट्रोल हो जाती हैं। अच्छा जी, तो ये था गुसल के हवाले से जो मोटी-मोटी चीजें थीं। उसके बाद अच्छा, ये तो गुसल जनाब का मसनून तरीका है। अच्छा, पानी अच्छी तरह बा लिया, उसके बाद क्या करना? आखिर में? आखिर में पाँव धोने। आखिर में सिर्फ पाँव धोने। आपने शुरू में किया वही आपके लिए काफी है। दोबारा आपको नमाज के लिए वजू करने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर इसके अलावा आपने वैसे गुसल करना हो, इसके अलावा भी कोई तरीका है? यह तो है मसनून गुसल, गुसल का मसनून तरीका। और भी कोई तरीका है गुसल का? कि नियत करके पूरा जिस्म पानी से गीला कर लिया, पूरे पर पानी बहा लिया, नियत नियत के साथ तो यही काफी है। यानी तजा ना करें, वजू ना करें, इस तरह की चीजें ना भी करें। आपकी नियत हो गुसल की और पूरा जिस्म पानी से तर कर लिया तो इससे भी गुसल हो जाता है। से भी गुसल हो जाता है। लेकिन कोई शक नहीं कि जो मसनून तरीका है वह ज्यादा बेहतर और अफ़ज़ल है। उसी को करना चाहिए। उसके बाद हमारे पास तम्मम के मसाइल हैं। सबसे पहले तम्मम का माना क्या है? तम्मम का माना किसी चीज़ का इरादा करना। हम चाहते हैं कि हम जो अल्फ़ाज़ बोलते, सुनते, कहते हैं, उनका माना भी हमको पता हो कि हम क्या बोल रहे हैं। अगर आपसे कोई पूछ ले, तम्मम तम्मम, तम्मम क्या होता है? तम्मम का माना क्या है? तो तम्मम का लफ़्ज़ी माना किसी चीज़ का क़सद करना, इरादा करना। और इस्लाही तौर पर इबादत की नियत से, सुन्नत के मुताबिक़ चेहरे और हाथों पर मिट्टी से मसा करना। इस तरह इबादत की नियत से, सुन्नत के मुताबिक़ चेहरे और हाथों पर मिट्टी से मसा करना। तो यह है इलाही तारीफ़। इसमें भी नियत ज़रूरी है। समझे ना? क्योंकि इबादत है। तो पहले यह पता चला कि तम्मम इबादत है और यह पता चला कि इसके लिए नियत ज़रूरी है और तरीका उसका, कि चेहरे और हाथों पर मिट्टी से मसा करना। आगे उसकी तफ़सील आएगी। और तम्मम क्या है? आपके यहाँ आगे दिया हुआ है। तम्मम जो है रुख़सत है, परमिशन है। आगे चला चलते हैं। तो परमिशन किस चीज़ की है? हाँ जी, असल जो है इंसान को हुक्म है कि वह वजू पानी से दू करे या गुसल करे। लेकिन तम्मम जो है उस पानी से हटकर, पानी को छोड़कर आपको सिर्फ़ मिट्टी से ही अपने आप को पाक करने की एक आपको रुख़सत दी गई है। रुख़सत क्या होती है? आसानी, आसानी इजाज़त। तो असल हुक्म तो पानी से है। लेकिन बाज़ हालात ऐसे होते हैं कि जिसमें पानी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, पानी नहीं मिलता। तो फिर उसमें आपको रुख़सत दी गई है। तो रुख़सत का माना ये होता है कि असल जो हुक्म है उससे हटकर आपको कोई उसमें आसानी दी जाना, सहूलियत दी जाना। तो यह है जो शरियत इस्लामी की ख़ूसूसियत में से, यानी उसके नीयत की खूबियों में से है। और यह भी सिर्फ़ मुसलमानों के लिए है। इस इस्लामी शरियत में बस। साबका यहूदियों के यहाँ, ईसाइयों के यहाँ, किसी और दीन में तम्मम नहीं था। उनके लिए ज़रूरी था कि पानी से ही तट करें, जैसे भी हो। लेकिन हमारे लिए आसानी पैदा कर दी गई है कि हम मिट्टी के साथ भी अपने आप को पाक कर सकते हैं। उस हवाले से नबी का फ़रमान है, बुखारी मुस्लिम की हदीस में कि मेरे लिए रूए ज़मीन को सजदा-गाह और तहा बना दिया गया है। मेरे लिए रूए ज़मीन को सजदा-गाह और तहा बना दिया गया है। क्या माना इसका? कि जहाँ भी वक़्त हो जाए नमाज़ का, नमाज़ पढ़ सकते हो, मस्जिद हो या ना हो। और तहा का माना कि जहाँ भी आप हैं, पानी नहीं मिलता तो मिट्टी ही आपके लिए तहा का ज़रिया है। मिट्टी ही आपके लिए तहा का ज़रिया है। लेकिन यहाँ पर आप पूछ सकते हैं कि मिट्टी तो हाथों को गंदा करती है। क्या ख़्याल है? हाथों पर मिट्टी लगेगी, चेहरे पर मिट्टी लगाएँगे तो क्या और गंदे नहीं होंगे? हाँ जी, मिट्टी सूखी है, फिर और धोना तो है। लेकिन मिट्टी तो लगनी है ना। माशाअल्लाह, सबसे सबसे अहम बात ये है कि चूँकि अल्लाह का हुक्म है। अल्लाह ने इस तम्मम को तहा का ज़रिया बनाया है और हमें इस पर यक़ीन होना चाहिए कि वाक़ई हमारी तह़ारत इससे होती है। एक तो सबसे बड़ी चीज़ हम मुसलमान होने के नाते हमारे सामने ही होनी चाहिए। और वजह मालूम ना हो। सिर्फ़ सबसे बड़ी वजह क्या है? कि अल्लाह का हुक्म है। अल्लाह का हुक्म है, अल्लाह के नबी की सुन्नत है। अच्छा, दूसरी चीज़ इससे आप देखोगे, नफ़्सी तौर पर आप महसूस करोगे तम्मम करने के बाद कि जैसे आप पहली कैफ़ियत में नहीं हो। आप महसूस करोगे कि जैसे वाक़ई अगर फ़र्ज़ करो वुज़ू की ज़रूरत थी, पानी नहीं मिला। आपने तम्मम करके के जैसे कि आपका वुज़ू का मक़सद पूरा हो गया। गुसल के लिए आपको पानी नहीं मिला, तम्मम करके जैसे गुसल करने का जो आपको हुक्म था आपने पूरा कर दिया। यानी उसमें एक नफ़्सी तौर पर भी आप महसूस करोगे, वाक़ई इंसान के अंदर एक एहसास पैदा होता है तह़ारत का। तो जब अल्लाह ने इसको तह़ारत बनाया है तो ये कोई शक नहीं कि हमारे लिए तह़ारत का ज़रिया है। अलबत्ता ज़ाहिर मामूली तौर पर गर्दों-बार मिट्टी लगती है। लेकिन अल्लाह ने इसको तह़ारत का बनाया है। अच्छा, उसके बाद 117 नंबर मसला में तम्मम की शर्त, तम्मम की छह शर्त ज़िक्र की गई है। और यह पहली तीन शर्त, चार शर्त तो तक़रीबन हर इबादत के लिए है। क्या तम्मम करने वाला मुसलमान हो? इसका माना कि अगर किसी ने कुफ़्र की हालत में तम्मम किया, उसके बाद कलमा पढ़ा, तो क्या उस तम्मम से नमाज़ पढ़ सकता है? नहीं। जिस तरह हमने वुज़ू में बयान किया था, आपको याद होगा। एक आदमी ने कुफ़्र की हालत में वुज़ू किया, उसके बाद उसने कलमा पढ़कर मुसलमान हुआ। हम उसको कहेंगे कि दोबारा वुज़ू करो। क्योंकि यह इबादत है और इबादत किससे क़बूल होती है? मुसलमान से। इबादत के लिए ईमान शर्त है। तो काफ़िर जो है, चूँकि उसका ईमान नहीं है, वह अगर तम्मम कर भी लेगा, उसके तम्मम का कोई तबार नहीं होगा। समझे ना? तो अगर कोई तम्मम करके मुसलमान होता है तो हम कहेंगे उसको कहेंगे कि दोबारा तम्मम करो। इसी तरह अकल का होना शर्त है। अगर आदमी कोई फ़र्ज़ करो उसको बाका बीमार है, उसको उसका दिमाग ख़त्म हो जाता है, फिर उसको अकल आ जाती है, होश आ जाता है। तो अगर उसने बेहोशी की हालत में तम्मम किया है तो उसका वह तम्मम काबिल-ए-तबार नहीं, उसका फ़ायदा नहीं। क्यों नहीं? क्योंकि उसकी नियत नहीं थी। बेहोश जो है उसकी नियत नहीं, उसको पता ही नहीं मैं क्या कर रहा हूँ। समझे ना? तो बेहोश जो है ना उसकी नमाज़ है, ना उसका तम्मम है, ना उसका कुछ भी नहीं है। इसलिए अकल का होना शर्त है। तमीज़, तमीज़ का माना क्या? पहले हम ज़िक्र कर चुके हैं। तमीज़ का माना कि बच्चा समझदार हो। बच्चा समझदार हो। कितनी उम्र का बच्चा समझदार होता है? हदीस की रू से सात साल का। क्योंकि सात साल के बच्चे को नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया जाता है। इसका मतलब यह है कि इस्लाम के अंदर तमीज़ की जो उम्र है वह सात साल की है। तो अगर पाँच साल का बच्चा तम्मम करता है तो उसको समझ नहीं तम्मम क्या होता है। और चौथी शर्त है नियत। जिस तरह पहले ज़िक्र किया है कि चूँकि तम्मम इबादत है और इबादत हर इबादत के लिए नियत का होना ज़रूरी है। पाँचवीं शर्त है पानी का ना मिलना या पानी का इस्तेमाल ना कर सकना। दो चीज़ इसमें देखिए, यहाँ पर सिर्फ़ पानी का ना मिलना लिखा हुआ है कि पानी ना मिल सकता हो। पानी ना मिलने की वजह क्या-क्या? इसका माना है कि आप किसी ऐसी जगह पर हो कि जहाँ पर आस-पास कहीं पर पानी नहीं है। आपको पहले से पता है कि यहाँ पानी नहीं होता। आप सफ़र में फ़र्ज़ करो तो कहीं पर रुकते हो नमाज़ पढ़ने के लिए। वैसे तो आजकल अल्लाह की आसानी है, हर जगह पर। लेकिन फिर भी इंसान कभी-कभार ऐसी हालत में होता है कि नमाज़ का वक़्त ख़त्म होने को है या नमाज़ का वक़्त हो गया और उसने नमाज़ पढ़ना है और आस-पास पानी नहीं है। तो अगर तो नई जगह है तो आपको क्या है? पूछना होगा, पानी तलाश करना होगा, पूछना होगा लोगों से। लेकिन अगर आपको पहले से पता है कि यहाँ पर पानी नहीं होता तो आप पूछे बग़ैर भी और पानी तलाश किए बग़ैर भी नमाज़ त कर, तम्मम कर सकते हो, नमाज़ पढ़ सकते हो। समझे ना? लेकिन अगर ऐसी जगह जहाँ पर पता नहीं कि पानी है कि नहीं तो वहाँ पर पानी तलाश करना है, मालूम करना है उसके बारे में। अच्छा, पानी तो है लेकिन पानी सेल हो रहा है, फ़्री नहीं। क्या ख़्याल है? ख़रीदना होगा? ख़रीदना होगा। ज़रूरी है? क्या ख़्याल है? ज़रूरी है। भी क्योंकि नमाज़ ज़रूरी है तो उसके लिए वुज़ू या तम्मम भी ज़रूरी है। समझे ना? तो बात कर रहे थे कि अगर आप पानी सेल हो रहा है और आप ख़रीद सकते हैं, आप ख़रीद सकते हैं तो आपको पानी ख़रीदना होगा। तो एक तो पानी का ना मिलना, इसकी और भी कई हालत होती है। अब बाज़ कात आप पाइपलाइन के ऊपर बैठे हो, पानी की पाइपलाइन है। क्या ख़्याल है पानी है या नहीं है? हाँ जी, बड़ा पाइप है, पाइपलाइन चल रही है। हाँ, मसरूफ़ क्यों नहीं? आप उसको हासिल नहीं कर सकते। आप कुएँ के ऊपर बैठे हुए हो, लेकिन कुएँ से पानी निकालने के लिए आपके पास कोई चीज़ नहीं है। क्या ख़्याल है? हाँ, ये भी पानी का ना मिलना है। समझे? पानी तक ना पहुँच सकना किसी तरीके से भी। तो इसकी मुख़्तलिफ़ कैफ़ियत होती है। एक तो है पानी का ना मिलना, दूसरा है पानी इस्तेमाल ना कर सकना। दो चीज़। एक पानी ना मिलना, दूसरा पानी तो मौजूद है लेकिन पानी इस्तेमाल नहीं कर सकता। आदमी बीमार, आदमी बेड पर पड़ा हुआ है। उसके एक मीटर के फ़ासले पर वाशरूम है, जा सकता है, शायद वाशरूम भी जा सकता है। लेकिन उसके लिए पानी का इस्तेमाल करना मुमकिन नहीं है। पानी इस्तेमाल करता-करता है तो उसकी बीमारी बढ़ती है। समझे ना? तो उसके लिए भी तम्मम करने की इजाज़त है। पानी है, आजकल मौसम ठंडा है ना, तो पानी ठंडा है और शदीद सर्दी है और आदमी को ख़तरा है कि इतने शदीद ठंडे पानी से अगर वह गुसल करेगा, ख़ासतौर पर तो उसकी जान को ख़तरा है। अभी हम पढ़ेंगे आगे चलकर। तो यह भी पानी इस्तेमाल ना कर सकने की एक शक्ल है। पानी इस्तेमाल ना कर सकने की। लेकिन यहाँ पर जरा गौर कीजिए मेरे साथ। अभी दो दिन पहले मेरे पास एक सवाल आया यूके से कि सर्दी बहुत है और पानी बहुत ठंडा था। मुझे गुसल करना था तो मैंने क्या किया? तम्मम करके नमाज़ पढ़ ली। क्या ख़्याल है? सही? गलत है? हाँ, कहता है कि वाटर हीटर ख़राब था, वो काम नहीं कर रहा था। तो इसलिए मैंने तम्मम करके नमाज़ पढ़ ली। तो आप क्या फ़तवा देते हैं? हाँ, करना चाहिए था। मर भी जाए। हाँ जी, देखिए इस तरह के मसाइल में हमें ख़ुद सबसे पहले हम ख़ुद इन चीज़ों को समझने की ज़रूरत है। क्या वाटर हीटर आदम सलाम के ज़माने से चले आ रहे हैं? क्या ख़्याल है? हमने ख़ुद अपनी ज़िंदगी इतनी आसान बना ली है। आज एक चीज़ नहीं है तो बस हर चीज़ हमारे सामने बंद हो जाती है कि जैसे कुछ भी नहीं है। वाटर हीटर अगर नहीं है आपके पास, क्या चूल्हा नहीं है जिस पर पानी गर्म कर सकते हो? फ़र्ज़ करें बिजली भी नहीं है, गैस भी नहीं है, लकड़ियाँ हैं ना? उस पर पानी गर्म करिए। आपके ज़माने में यही कुछ था ना? आपके ज़माने में क्या वाटर हीटर थे? क्या गैस, गैस, बिजली थी? आप लकड़ी पर पानी गर्म करते थे। और मदीना की सर्दी जो है आप जानते होंगे, मदीना में सर्दी शदीद पड़ती है। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने की बात, हदीस हमें मिलती हैं कि शदीद सर्दी होती थी। लेकिन हमें नहीं मालूम कि मदीना में रहते हुए किसी ने तम्मम करके वुज़ू किया हो या तम्मम करके वुज़ू, तम्मम के लिए वुज़ू, कि तम्मम की जगह पर वुज़ू किया हो या गुसल की जगह पर तम्मम किया हो। उससे वुज़ू की जगह पर तम्मम किया हो या गुसल की जगह पर तम्मम किया हो। ऐसा नहीं। मदीना में रहते हुए किसलिए? कि पानी गर्म करने के वसाइल हैं। इसलिए जो चीज़ करना हमें फ़र्ज़ है, उसके लिए वसाइल हासिल करना भी फ़र्ज़ है। तो अगर वाटर हीटर ख़राब है तो और कई वसाइल हैं पानी गर्म करने के। पानी को गर्म करिए और पानी गर्म करके इस्तेमाल करिए। वुज़ू की ज़रूरत है, गुसल की ज़रूरत है तो अल्लाह कुली हाल इन चीज़ों को समझने की ज़रूरत है। पानी अगर किसी भी तरीके से इस्तेमाल करने के काबिल बनाया जा सकता है तो आप पर फ़र्ज़ है कि पानी को इस्तेमाल करिए। फ़र्ज़ करिए आपके पास पानी नहीं, बर्फ है। आप बर्फ को क्या कर सकते हैं? पिघला सकते हैं। आप पिघलाएँगे तो बहुत ठंडी होगी, ठंडा पानी होगा। हाँ, उसको गर्म कर सकते हैं। और हम बाज़ औक़ात ऐसे वुज़ू करते रहे हैं, बर्फ को पिघलाकर भी वुज़ू करते रहे हैं। अल्लाहु अकबर। कहने का मक़सद ये है, चीज़ एक चीज़ करना है तो उसको करने के लिए हमें हर कीमत उसको करने के लिए जो है तरीके का देखना है कि कैसे करना है। तो पानी के इस्तेमाल ना कर सकना, उसकी बहुत सी बहुत सी शक्लें होती हैं। कुछ आएंगी तफ़सीर उसकी। छठी चीज़ है तम्मम पाक मिट्टी से किया जाए। जिस मिट्टी से तम्मम कर रहे हैं, मिट्टी पाक हो। मिट्टी पाक हो। तो यह छह शर्तें हैं तम्मम के हवाले से 117 नंबर मसले में। आपका मसला हल हो गया। दूसरा भी शदीद सर्दी में ठंडे पानी के इस्तेमाल से जान को ख़तरा हो, जैसा कि सदना अब्दुल्लाह बिन अमर, अम्र, अमर अम्रस, सदना अम्रस को एक जंग में एहतिराम हो गया। अम्रस क़द्र सहाबा में से हैं। आपने उनको एक दस्ता, यानी कि कुछ आदमियों को देकर भेजा किसी जंग के लिए। तो सर्दी का वक़्त था। इनको रात को एहतिराम हो गया। अब जहाँ पर थे वहाँ पर पानी था। लेकिन शदीद सर्दी और सहरा की सर्दी शायद आपने नहीं देखी। इनकी बहुत शदीद होती है। बाज़ कात तो शदीद सर्दी थी। पानी बहुत ठंडा था और इनको तलाम की शक्ल में क्या करना है? गुसल करना है। इन्होंने क्या किया? इन्होंने तम्मम किया और लोगों को नमाज़ पढ़ा दी। फिर भी चूँकि अमीर थे तो नमाज़ उनको पढ़नी थी तो तम्मम करके लोगों को नमाज़ पढ़ा दी। जिस पर लोगों ने तराज़ किया कि जब पानी मौजूद है तो आपने वुज़ू, गुसल क्यों नहीं किया? तो वो कहने लगे कि मैं गुसल कर नहीं सकता था। ख़ैर, जब मदीना पहुँचे आपके पास शिकायत की गई। इस तरह इन्होंने पानी होते हुए फिर भी तम्मम करके नमाज़ पढ़ाई। आपने उनसे पूछा, तुमने गुसल क्यों ना किया? तो उन्होंने फ़रमाया कि मुझे अपनी जान का ख़तरा था। मुझे अपनी जान का ख़तरा था। और अल्लाह फ़रमाता है, लाक अपने आप को क़तल ना करो, लाक अपने आप को हलाक में ना डालो। मुझे अपनी जान का ख़तरा था इसलिए मैंने तम्मम करके नमाज़ पढ़ी और पढ़ा दी। तो मालूम क्या हुआ? अगर पानी को इस्तेमाल करने का कोई रास्ता ना हो, पानी तो है, शदीद ठंडा है, बीमारी की वजह से किसी और वजह से इस्तेमाल नहीं कर सकते तो फिर उस हालत में भी तम्मम किया जा सकता है। लेकिन यह नहीं कि मामूली सर्दी हो जाए, मामूली पानी ठंडा हो जाए तो तम्मम करना शुरू कर दें। ऐसा नहीं। पहले तो पानी को इस्तेमाल करने का देखो कि कैसे इस्तेमाल करना है। आपने उसको गर्म करने का जो भी तरीका हो सकता है, करने की कोशिश कीजिए। 118 नंबर मसला में रूए ज़मीन पर मौजूद हर तरह की पाक मिट्टी, रेत, पत्थर वग़ैरह से तम्मम किया जा सकता है। क्या लाज़मी है कि मिट्टी हो? क़ुरआन करीमला सतह, क़ुरआन के अंदर मिट्टी का लफ़्ज़ नहीं आया। क़ुरआन में लफ़्ज़ जो है वह सतह, सतह। क्या चीज़ है? कि जो भी ज़मीन के ऊपर की सतह है, जो भी ज़मीन के ऊपर की सतह है, वह रेत हो, मिट्टी हो, पत्थर हो, कुछ भी हो, जो भी ज़मीनी अज्ज़ा है, समझे? ज़मीन से मुतअल्लिक़, जो भी चीज़ है तो किसी भी ऐसी चीज़ से जो ज़मीन से मुतअल्लिक़ है, मिट्टी, पत्थर वग़ैरह, इन पर हाथ मार के तम्मम किया जा सकता है। तो ज़रूरी नहीं कि मिट्टी हो। लेकिन बशर्ते कि पाक हो। अच्छा, इसमें यह भी है कि अगर मिट्टी नहीं, सिर्फ़ गर्द-ओ-गुबार है, जिस तरह ये टेबल है, मुझे ऊपर गर्द-ओ-गुबार नज़र आ रहा है तो क्या उस पर हाथ मार के तम्मम किया जा सकता है? जी हाँ, यह भी काफी है। दीवार पर आप देखते हैं कि गर्द-ओ-गुबार है, उस पर हाथ मार के तम्मम कर सकते हैं। लेकिन वो दीवार जो पेंट की दीवार हैं और उस पर गर्द-ओ-गुबार नहीं है तो उस पर तम्मम नहीं होगा। क्योंकि यह पेंट जो है यह ज़मीनी अज्ज़ा में से नहीं है। लेकिन फ़र्ज़ करो मिट्टी की दीवार है, मिट्टी की दीवार है, कच्ची दीवार जिसको होती है। हाँ, उस पर हाथ मार के तम्मम कर सकते हैं। हत्ता कि पत्थर की दीवार भी, अगर पत्थर की दीवार है तो उस पर भी हाथ मार के तम्मम कर सकते हैं। जिस तरह के आप देख रहे हैं तस्वीर में पत्थर देख रहे हैं ना, इस पर भी हाथ मार के तम्मम किया जा सकता है। क्योंकि ताहिर ने मिट्टी की शर्त नहीं रखी। शर्त क्या रखी है? कि जो भी ज़मीन के ऊपर की चीज़ है। 119 नंबर मसला में अगर किसी जिस्मानी तकलीफ़, जिस तरह के स्किन होती है, उसकी वजह से पानी इस्तेमाल ना किया जा सके, उस सूरत में जिस्म का जो हिस्सा धोना मुमकिन हो उसे धो लिया जाए और जो हिस्सा धोना मुमकिन ना हो, उसकी तरफ़ से तम्मम कर लिया जाए। अल्लाह ताला का फ़रमान है, अल्लाह से डरो जितनी तुम्हारी ताक़त है, जिस क़दर मुमकिन अल्लाह से डरो। इस मसले को समझे आप। फ़र्ज़ करो वुज़ू कर रहे हो और आपके क्या है? आपके चेहरे पर एलर्जी है और बाज़ लोगों को होता है ऐसा, स्किन, स्किन एलर्जी है कि पानी लगता है तो शरीर में तकलीफ़ होती है। फिर क्या करें? हाँ, बाक़ी आप सब आज़ाद, धो लें, हाथ धोएँ, कुल्ली कर सकते हैं, कुल्ली कर लें। नाक में पानी डाल सकते हैं, नाक में पानी डाल लें। उसके बाद बाज़ू धो लें, सारा कुछ कर लें। अब आपके चेहरा बाक़ी रह गया, वो नहीं धोया। आपने क्या करेंगे? कि चेहरे की तरफ़ से तम्मम करेंगे। यानी आख़िर में वह हम तरीक़ा जो पढ़ेंगे तम्मम का, मिट्टी पर हाथ मार के चेहरे की तरफ़ से, क्योंकि आपने चेहरे का, चेहरे को नहीं धोया। अच्छा, अगर आपके पाँव में कोई ऐसा मामला है कि जिस वजह से आप पाँव नहीं धो सकते। हमने बताया था कि अगर अगर तो आपके बैंडेज लगा है, कोई पट्टी लगी है तो उसके ऊपर मसा कर लेंगे। लेकिन बाज़ जख़्म खुला होता है। आपके पाँव पर जख़्म है, खुला जख़्म है, ऊपर कोई बैंड नहीं लगा हुआ और उसको धो भी नहीं सकते। धोते हैं तो जख़्म ख़राब होगा। समझे ना? फिर क्या करेंगे? पाँव का जितना हिस्सा धोना मुमकिन है, जख़्म तो एक जगह पर है ना, तो बाक़ी हिस्सा जो धो सकते हैं, धोएँ और जहाँ जख़्म है उसको छोड़ दें। जिस-जिस जगह पर जख़्म है, उस हिस्से को छोड़ दें। उसको नहीं धोएँ और बाक़ी वुज़ू अपना मुकम्मल करके क्या करें? पाँव का जो हिस्सा आपने छोड़ दिया है, जो नहीं धोया, उसकी तरफ़ से तम्मम करें। उसकी तरफ़ से तम्मम करने का माना क्या है? कि तम्मम का एक ही तरीक़ा है। जरा गौर से सुनिए। अब आपने किसकी तरफ़ से तम्मम करना है? पाँव की। पाँव की तरफ़ से तम्मम कैसे करेंगे? पाँव पर करेंगे? जिस तरह करते हैं करेंगे। तम्मम का एक ही तरीक़ा है कि मिट्टी पर हाथ मारकर चेहरे पर और हथेलियों को एक-दूसरे पर फेरना। पाँव पर नहीं फेरेंगे। आप कहेंगे, जख़्म तो पाँव पर था, छोड़ा तो पाँव को है। तो आप जो हैं तम्मम कर रहे हैं। तम्मम जिस्म बाक़ी पूरे जिस्म की तरफ़ से हो जाता है। ऐसे ही आपके छोड़े हुए जो पाँव का हिस्सा है, उसकी तरफ़ से भी हो जाता है। पाँव की मिसाल इसलिए दी ताकि और मसला वाज़ेह हो जाए कि तम्मम जो है कोई भी आपके जिस्म का हिस्सा छूट सकता है। किसी भी हिस्से से तो बाक़ी आजा को धो लें, जो धो सकते हैं और जो नहीं धो सकते उसको छोड़ दें और उसकी तरफ़ से तम्मम कर लें। क्या? तम्मम का एक ही तरीक़ा है। तम्मम का एक ही तरीक़ा है। कुछ भी हो, गुसल हो, वुज़ू हो, कुछ भी, किसी भी मक़सद के लिए आप कर रहे हैं, उसका एक ही तरीक़ा जो आगे आ रहा है। समझे? 120 नंबर में अगर कोई शख़्स पानी तक ना पहुँच सकता हो और उसे कोई लाकर देने वाला भी ना हो तो फिर भी वह तम्मम करना जायज़ है। एक बीमार आदमी बेड पर पड़ा है। बेड के ऊपर, बेड से उठकर वाशरूम में नहीं जा सकता। उसके एक मीटर के फ़ासले पर वाशरूम है लेकिन उठ नहीं सकता, जा नहीं सकता। अब नमाज़ का टाइम हो गया। क्या करें? हाँ, उसे भी इजाज़त है कि वो भी तम्मम कर सकता है। अलबत्ता पानी मौजूद है, साफ़-सुथरा है। लेकिन ना वो जा सकता है ना उसको ना उसके पास को लेकर आने वाला है, ना उसके लिए ला सकता है, ना खुद जा सकता है। तो उसे भी इजाज़त है कि वो तम्मम करके नमाज़ पढ़ ले। और आपके इल्म के लिए सऊदिया के बहुत से हॉस्पिटलों में हमने देखा कि वहाँ पर बॉक्स रखे होते थे मिट्टी के। किसके लिए? तम्मम करने के लिए। हर पेशेंट के बेड के साथ, हर पेशेंट के बेड के साथ मिट्टी का बॉक्स होता है। तो जिसमें पेशेंट अगर वाशरूम नहीं जा सकता, बरी नहीं कर सकता तो उस मिट्टी से तम्मम कर ले। तो इसलिए यह भी है कि अगर कोई आदमी पानी तक ख़ुद नहीं पहुँच सकता, ना उसके पास को पानी लाकर देने वाला है तो भी तम्मम कर सकता है। 121 में अगर किसी किसी शख़्स को पानी या मिट्टी कुछ भी ना मिले। किसी को पानी, मिट्टी कुछ भी ना मिले तो क्या करे? हमने ज़िक्र किया था कि उसी हालत में नमाज़ पढ़ेगा। ना पानी मिला है, ना मिट्टी मिली है, तम्मम करने की। समझे ना? तो फिर वो जिस हालत में है, यानी कि उसी पेशेंट की मिसाल लो जो बेड पर पड़ा है। अब बेड पर मिट्टी तो नहीं होगी ना, ना कर दो बर होगी, उठ के जा सकता है। अब...

नमाज का टाइम हो गया और नमाज का टाइम मुकन है। आखर तक जा पहुंचे। अब ना पानी उसके पास है ना वो उसके पास मटी है। तम करे क्या करेगा? उसी हालत में नमाज पढ़ेगा। और यह बहुत अहम मसला है कि जिसे हमें खुद समझना चाहिए और इस तरह के बीमारों को बताना चाहिए। क्योंकि हम बहुत से वाकया देखते हैं कि आदमी बीमार है, कई क दिन की नमाज नहीं पड़ी। क्यों नहीं पढी? भी व नहीं कर सकता, वजू नहीं कर सकते, तेम करो वा खुद नहीं जा सकते। तो को पानी लेकर दे दे स के तरीके। लेकिन सिर्फ लापरवाही के अंदाज से नमाज पढ़ते, नमाज छोड़ देते हैं। इसलिए नमाज को नहीं छोड़ा जाएगा। जिस हालत में भी है उसी हालत में नमाज पढ़ेंगे।

122 में तम का सही तरीका बयान करते हुए नबी करम ने फरमाया। इर यासर की हदीस है। हमारे जानते सभी आप सहाबी है। तो क्या होता है कि आप उनको किसी काम भेजते हैं, कहीं दूर। तो रास्ते में उनको एतराम हो गया और गुसल की जरूरत पड़ गई। अब पानी नहीं था वहां पर। अबने यह तो सुना था कि पानी ना हो तो मट्टी से तम हो जाता है, लेकिन करना कैसे है उनको इसका पता नहीं था। तो सल में क्या किया जाता है? उसल में पूरा जिस्म पानी से धोया जाता है। उन्होने उसी पर कयास करते क्या किया कि पूरा जिस्म मिट्टी में लत पत किया, मट्टी के अंदर खूब पटिया खाकर पूरे जिस्म को ताक मटी लग जाए। पता नहीं था कि हम कैसे करते हैं। तो ज आकर बताया। इस तरह से मुझे ससल की जरूरत पड़ गई थी तो मैंने फिर यह कुछ किया। तो आप तुम्ह सिर्फ इतना ही करना काफी था। इसलिए लिखा शुरू में अपने हाथों से इस तरह कर लेना ही काफी था। फिर आपने अपने दोनों हाथ एक मर्तबा जमीन पर मारे और बाया हाथ दाए हाथ पर, दोनों हथेलियों पर फेरा और मुंह पर मसा किया। समझ? अब इस हदीस में देखिए क्या है? नीचे भी आगे मजीद दिया है। आगे चलिए। वादा आपने एक ही बार जमीन पर हाथ मारे और हाथों को एक दूसरे पर, हथेलियों पर एक दूसरे पर ऐसे देख रहे हैं, हथेलियों को एक दूसरे पर ऐसे और चेहरे पर। लेकिन आप देखेंगे, बताएंगे कि शायद और भी कोई तरीका होता है। ये सही बुखारी मुस्लिम की हदीस। ये है कि जिसमें आप समार बने यासर को यह तरीका बताया कि तम इस तरह से करना है। एक ही बार मट्टी पर हाथ मारकर हाथों को अगर ज्यादा मट्टी है तो उसको झाड़ भी सकते हैं, फूंक मार के भी या वैसे भी हाथों के साथ और हाथों को एक दूसरे पर, हथेलियों को और उसी को फिर चेहरे पर।

एक और तरीका आता है एक जफ हदीस में ताकि आपको य भी बता दे क्योंकि बहुत से साथियों को शायद उसी तरीके का पता हो। दार कतनी की जफ हदीस आती है कि जिसमें क्या है के एक बार हाथ मार के हाथों पर फेरने हैं, फ दूसरी बार हा हाथों पर नहीं बल्कि पूरे बाजू पर फेरने है और दूसरी पर बार करर चेहरे पर फेरने है। य हदीस जो है सही नहीं है, आपसे साबित नहीं है। समझे ना? इसलिए स बुखारी मुस्लिम की हदीस में जो तरीका है वो यह है। एक बार हाथ मारेंगे मट्टी पर और हाथों के एक दूसरे पर और चेहरे पर फेर।

आखरी मसला 123 में। तम्मम उन तमाम चीजों से खत्म हो जाता है जिससे वदू खत्म हो जाता है, जिससे वजू टूटता है उसी से तम भी टूट जाता है, खत्म हो जाता है। और मजीद क्या है? पानी पानी पाया गया। पानी के आने से भी वधु और तम खत्म हो जाता है। पानी के आने से तम खत्म हो जाता है। पानी नहीं था आपने तम कर लिया। अब पानी आ गया। अब आपको पानी से वजू करना होगा, गुसल की जर गुसल करना होगा। लेकिन आप पूछे मैंने तो नमाज शुरू कर दी। नमाज शुरू करने के बाद पानी आया। वो अरबी में फका ने लिखा है। रला कौन समझा कि गधे ने आवाज निकाली और नमाज टूट ग तो ग की आवासवा टूट जाती है क्या? समझे इसे आप कि पुराने जमान में गधे होते हैं लोगों के पास चीजों को लाने के, पानी लाने के लिए। तो गधा पानी लेने के लिए गधा भेजा हुआ था तो गधा आ गया। गद ने आकर आवाज निकाली तो इसका मतलब पानी आ गया है। तो कोई नमाज पढ़ रहा था उसकी नमाज टूट गई। टूटने का माना कि पानी आ गया ना? तो अला को हाल। सही मसला ये है कि अगर नमाज के दौरान भी पानी आ जाए तब भी नमाज को तोड़कर वजू करना होगा और फिर नमाज पढ़ना होगी। समझे ना? इला ये कि अगर आप नमाज पढ़ चुके हैं, नमाज पढ़ ली थमन करके उसके बाद पानी मिला फिर आपको नमाज दोहराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर नमाज से पहले आ गए फिर तो वजू करना ही करना उसमें तो कोई शक की बात नहीं। अगर नमाज के दौरान भी पानी मिल गया, पानी आ गया आपको पता चल गया कि पानी आ गया है आपको चाहिए कि नमाज तोड़े और वजू करके नमाज पढ़े। यह थे आज के हमारे तीम के मसाइल। हम अगर