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हमारे ब्रेन में इस तरह के फोल्ड्स होते हैं, जिनको बोलते हैं गायरस सल्कस। ये गायरस सल्कस जो आदमी जितना दिमाग काम में लेता है, वो उतने इनक्रीस होते जाते हैं।
न्यूरोप्लास्टिसिटी नाम का एक टर्म है, जिसका मतलब है कि जिस आदमी ने किसी भी ऐज में नए-नए सब्जेक्ट्स को, चीजों को इंटररिलेट करना शुरू कर दिया। ऐसा माना जाता है, उसके ब्रेन की वायरिंग जो है, वो रीोग्राम होना स्टार्ट हो जाती है।
फॉर एग्जांपल, एक डॉक्टर इंजीनियरिंग की बुक्स पढ़ने लग जाए। एक इंजीनियर डॉक्टर्स की बुक पढ़ने लग जाए। एक आदमी ह्यूमैनिटीज, न्यूज़पेपर हर चीज को अच्छे से पढ़ने लग जाए, तो उसके गरस सर्कस नाम के जो फोल्ड्स होते हैं, ये और इनक्रीस हो जाते हैं। और ये जितने इनक्रीस होते जाते हैं, उतना ही सोचने समझने की कैपेसिटी बढ़ती जाती है।
इसके उल्टा, अगर आदमी ऐसी चीजों में दिमाग लगा रहा है, जिसमें दिमाग लगाना ही नहीं पड़ रहा, जिस पे हमने पूरा एपिसोड किया था। पैसिव लर्नर बन रहा है। मतलब ऐसी चीज देख रहा है, जिसमें दिमाग पे कुछ असर ही नहीं हो रहा। कोई इंटेलेक्ट नहीं है, कोई लेवल नहीं है कंटेंट का। उसके अंदर लगा हुआ है आदमी। तो ये फोल्ड वीक होने लग जाते हैं।
इसीलिए कुछ लोग जो स्कूल टाइम में, कॉलेज टाइम में बड़े हाई लेवल के इंटेलेक्ट थे। बहुत अच्छा कंसंट्रेशन हुआ करता था। जब से कोविड आया है, बोलते हैं हमारी मेमोरी कम हो गई है। हमारा फोकस कम हो गया है। ये मेमोरी पे असर कोविड का पड़ा है, या आप जो स्क्रॉल करते रहते हो, ऐसी चीजों को जिसमें सोचना ही नहीं पड़ता, उसका पड़ा है?
जरा याद तो करो, कोविड से पहले कितने टाइम के लिए स्क्रीन पे रहा करते थे, और कोविड के बाद कितने घंटों के लिए स्क्रीन पर रहते हो? जरा याद तो करो, कोविड से पहले कितनी बार रात के 2:00 बजते थे, और कोविड के बाद कितनी बार ऐसा हुआ है कि रात का 1:00 बज गए, 2:00 बज गए आप फोन में ही लगे हुए हो। याद करो, कोविड से पहले कितनी बार सुबह उठने से पहले आपने मोबाइल फोन चेक किया होगा, और अब कोविड के बाद ऐसा तो नहीं कि सुबह की शुरुआत ही मोबाइल से हो रही है। या कहीं रात को आंख खुल रही है। पहले आंख खुला करती थी रात को। उठे सुसु किया, पानी पिया, वापस सो गए। अब कहीं ऐसा तो नहीं कि रात को आंख खुली एक सेकंड के लिए, और मोबाइल हाथ में आया और शुरू हो गए। फिर।