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गुड इवनिंग भाई लोग कैसे हैं आप सभी मैं भवानी सिंह आप सभी का स्वागत करता हूं क्विक ट्रिक्स बाय साहिल सर चैनल पर। और दोस्तों अब शुरू करते हैं हमारी मैराथन जो सुबह अधूरी रह गई थी। तो बेटा सुबह तो हो गया था ग्लिच आप सब जानते हैं, बफरिंग ज्यादा हो रही थी। और अब उम्मीद करूंगा कि सेशन बढ़िया चले और हमारी मैराथन पूरी हो। और लास्ट सब्जेक्ट है हमारा इकोनॉमिक्स। जैसे आप सब जानते हैं कि हम लोग बाकी सारे सब्जेक्ट्स की मैराथन कर चुके हैं। बाकी ये जो मैराथन है, देखते हैं 3 घंटे तो चलेगी। तो आप लोग भी थोड़ा सा मैं पहले ही आपको इन्फॉर्म कर रहा हूं ताकि आप मेंटली प्रिपयर्ड रहें। और लास्ट में आपका दिमाग वैसे ही काम करें कि भाई नींद ना आए। और अगर नींद आ जाए तो भैया सेशन जरूर देख लेना वरना ऐसी तैसी हो जाएगी क्योंकि इंपॉर्टेंट क्वेश्चन जो बार-बार आए हैं वही क्वेश्चन छांट के लाया हूं। और आप सब जानते हैं हम लोगों ने करीबन सात आठ क्वेश्चन या आठ नौ क्वेश्चन पहले कर भी लिए थे, उन्हीं से शुरुआत करूंगा। एक बार फिर से तेजी से शुरुआत करेंगे, समझते हुए आगे बढ़ते जाएंगे। ठीक है भाई? चलिए।
बाकी पीडीएफ आपको कहां मिलने वाली है आप सब जानते हैं। पीडीएफ आपको मिलने वाली है मैथ्स बाय साहिल सर टेलीग्राम चैनल पे। अभी तक ज्वाइन नहीं किया तो ज्वाइन कर लो बेटा, ठीक है? और इसके साथ-साथ पीडीएफ जो हमारे हमारी एप्लीकेशन है, क्विक ट्रिक्स बाय साइंस सर एप्लीकेशन। उस एप्लीकेशन में जो पेड कोर्सेर्सेस का सेक्शन है, वहां पर ऑपरेशन सिलेक्शन का फोल्डर है। वहां पे जाओ, फ्री ऑफ कॉस्ट अपने को एनरोल कर लो और वहां पे आपको पीडीएफ जो है सिस्टेटिक वे में मिल जाएंगी। और बाकी जैसे मैंने आपको पिछली बार भी बताया था कि भाई मैराथन जो है, मैराथन हमारी देखो ज्योग्राफी हो चुकी है। एंशिएंट और मेडिवल हिस्ट्री हो गई। मॉडर्न हिस्ट्री हो गई है। स्टैटिक जीके पार्ट वन, पार्ट टू हो गया। पॉलिटी की हो गई थी। और अब हमारे पास है दोस्तों इकोनॉमिक्स। तो इकोनॉमिक्स की मैराथन चलाते हैं। शुरू करते हैं और टाइमली खत्म करके अपने सारे सब्जेक्ट्स को वाइंड अप कर लेते हैं। ठीक है भाई? चलिए सेशन की शुरुआत करते हैं। ऑपरेशन सिलेक्शन इकोनॉमिक्स 4 घंटे लगातार मैराथन पर स्ट्राइक। कोशिश करूंगा इससे कम ही रहे। इससे कम ही रहे टाइम। ठीक है? चलो।
तो हम लोगों ने हम लोगों ने पहला क्वेश्चन पढ़ा था। हम लोगों ने पहला क्वेश्चन पढ़ा था और मैं उसी के साथ शुरुआत कर रहा हूं। सभी को समझ में आएगा। जो जुड़ भी रहे हैं, नए भी जुड़ रहे हैं उनको समझ में आ जाएगा। ये पिछली बार हम कर चुके थे। तो मैंने सोचा कि क्यों स्लाइड्स को खराब करना, लिखने में और टाइम वेस्ट होगा। तो इसीलिए यहीं से समझा देते हैं। तो हु इज़ रिगार्डेड एस द फादर ऑफ़ मॉडर्न इकोनॉमिक्स? हु इज़ रिगार्डेड एज़ द फादर ऑफ़ मॉडर्न इकोनॉमिक्स? आधुनिक अर्थशास्त्र का जनक किसे माना जाता है? ये हमने पहला क्वेश्चन पढ़ा। तो मैंने आपको बताया। मैंने आपको बताया दोस्तों कि एडम स्मिथ। एडम स्मिथ हमारा सही आंसर है। एडम स्मिथ हमारा सही आंसर है। इसी को कहा जाता है आधुनिक अर्थव्यवस्था का या आधुनिक अर्थशास्त्र का। फादर या जनक। तो आधुनिक अर्थशास्त्र का जनक यानी मॉडर्न इकोनॉमिक्स का जनक कौन है भैया? एडम स्मिथ। और एडम स्मिथ कौन है? ये स्कॉटलैंड का एक इकोनॉमिस्ट हुआ करता था। अर्थशास्त्री हुआ करता था 1723 से 1790 के बीच में। ठीक है? स्कॉटिश स्कॉटिश इकोनॉमिस्ट था 1723 से 1790 के बीच में। और इसे सिर्फ फादर ऑफ़ मॉडर्न इकोनॉमिक्स नहीं बोलते। इसे अलग-अलग नाम से भी जानते हैं। फादर ऑफ इकोनॉमिक्स भी बोलते हैं। तो ये मत सोचना कि सर ने तो हमें फादर ऑफ मॉडर्न इककोनॉमिक्स बताया था। ये तो फादर ऑफ इकोनॉमिक्स पूछ लिया तो कोई और होगा। नहीं फादर ऑफ इकोनॉमिक्स या फादर ऑफ मॉडर्न इकोनॉमिक्स एक ही बात है। और साथ ही साथ फादर ऑफ कैपिटलिज्म। फादर ऑफ कैपिटलिज्म। पूंजीवाद का जनक भी बोलते हैं। पूंजीवाद या कैपिटलिज्म क्या है? मैंने आपको बताया था कि भाई एक ऐसी एक ऐसी अर्थव्यवस्था पूंजीवाद पूंजीवाद क्या है? एक ऐसी अर्थव्यवस्था या एक ऐसा सिस्टम अर्थव्यवस्था का जिसमें उत्पादन के साधनों पर यानी जो जो प्रोडक्शन के जो मींस हैं जो उत्पादन के साधन हैं जिनसे आप प्रोडक्ट बना रहे हो वो सारे साधनों पर प्राइवेट इंडिविजुअल्स का अधिकार होता है और वो उससे सिर्फ और सिर्फ प्रॉफिट कमा रहे होते हैं। तो याद रखना उत्पादन के साधनों पर जब प्राइवेट इंडिविजुअल्स का कंट्रोल हो ताकि वो प्रॉफिट कमा सके तो उसे बोल देते हैं पूंजीवाद। यानी जो बड़े-बड़े बिजनेसमैन होते हैं, जो बड़े-बड़े जो सेठ लोग हैं जिनके पास बहुत पैसा है। ठीक है? जैसे अपने यहां पे जैसे अडानी है, अंबानी है, टाटा है, बिरला है, जिंदल है, मित्तल है। समझ रहे हो भाई? इस तरह के लोग। तो इस तरह के लोग जब प्रोडक्शन के सभी मींस को उत्पादन के सभी साधनों को कंट्रोल करने लगे। इन्हीं के पास है सब कुछ। तो भैया फिर हम क्या कहेंगे कि ये तो जबरदस्त प्रॉफिट कमा रहे हैं अपना। ये तो जबरदस्त प्रॉफिट कमा रहे हैं। ये तो सारा का सारा इन्होंने पूरी इंडस्ट्रीज कंट्रोल की हुई है। तो उसे बोल देंगे पूंजीवाद। जब पूरे देश में सभी उद्योग जब देश में सभी उद्योग मान लो कि सभी प्राइवेट इंडिविजुअल्स के हाथ में आ जाए। सरकार के पास कोई इंडस्ट्री ही ना बचे तो समझ जाना कि भाई हमारी जो हमारी जो इकॉनमी है हमारी जो अर्थव्यवस्था है वो पूंजीवादी हो चुकी है। ठीक है?
चलिए बाकी बाकी मैंने आपको बताया था कि ये जो जॉन मेनार्ड कीन्स है, जॉन मेनार्ड कीन्स बहुत इंपॉर्टेंट है। ये एक ब्रिटिश इकोनॉमिस्ट था यानी अंग्रेज अर्थशास्त्री था जॉन मेनार्ड कीन्स। इसे फादर ऑफ मैक्रोइकोनॉमिक्स बोलते हैं। क्या बोलते हैं? फादर ऑफ मैक्रोइकोनॉमिक्स। ध्यान से देखो सभी लोग। फादर ऑफ़ मैक्रोइकोनॉमिक्स। फादर ऑफ़ मैक्रोइकोनॉमिक्स देखो अर्थशास्त्र की इकोनॉमिक्स की दो ब्रांचज़ होती हैं। माइक्रोइकोनॉमिक्स और मैक्रोइकोनॉमिक्स। माइक्रोइकोनॉमिक्स में आप अर्थव्यवस्था के यानी इकोनमी के जो छोटे-छोटे एलिमेंट्स होते हैं उनको अलग से पढ़ते हो। ठीक है? जैसे मान लो आपने डिमांड का कांसेप्ट पढ़ा। आपने आपने सप्लाई का कांसेप्ट पढ़ा। आपने मार्केट के टाइप्स को पढ़ा। तो मतलब ये क्या हुआ? आप इकोनॉमिक में अर्थव्यवस्था में छोटे-छोटे एलिमेंट्स को पढ़ रहे हो। ठीक है? स्टडी कर रहे हो। इंडिविजुअली स्टडी कर रहे हो उनकी तो उसे हम बोल देते हैं माइक्रोइकोनॉमिक्स। पर जब आप एक पूरी अर्थव्यवस्था को एज अ होल यानी पूरी तरह से समग्र रूप से जब आप उसको स्टडी करते हो पूरी अर्थव्यवस्था को एक मान के आप उसकी स्टडी करते हो तो उसे बोल देते हैं मैक्रो इकोनॉमिक्स। तो फादर ऑफ मैक्रो इकोनॉमिक्स ये कौन है ब्रिटिश इकोनॉमिस्ट कौन जॉन मेनार्ड कीन्स। बाकी मनमोहन सिंह जी के बारे में मैंने आपको पहले ही बताया था कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री हैं, हमारे पूर्व वित्त मंत्री, फाइनेंस मिनिस्टर रह चुके हैं 1991 के पास क्योंकि उस टाइम पे उस टाइम पे नरसिम्हा राव जी की सरकार थी। वो प्राइम मिनिस्टर थे और उस टाइम पे हमारे इन्हीं प्रधानमंत्री ने यानी उस टाइम के वित्त मंत्री ने एलपीजी रिफॉर्म्स मैंने बताया था ना लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन ये सुधार किए थे। यानी हमारी अर्थव्यवस्था को एक तरीके से ओपन कर दिया था वर्ल्ड के लिए कि आप आओ भारत में इन्वेस्ट करो। भारत में इन्वेस्ट करके आप प्रॉफिट कमाओ। आपको भी फायदा होगा और हमारे भारत की अर्थव्यवस्था को भी फायदा होगा। तो ये हमने कर दिए थे। तो मनमोहन सिंह जी तो यह हैं। बाकी अमर्त्य सेन के बारे में मैंने आपको बताया था। अमर्त्य सेन देखो अमर्त्य सेन यह 1998 में नोबेल प्राइज मिल चुका है। हमारे भारतीय अर्थशास्त्री हैं। ठीक है? भारतीय अर्थशास्त्री हैं। नोबेल प्राइज मिल चुका है 1998 में। वेलफेयर इकोनॉमिक्स में कल्याणकारी अर्थशास्त्र में। कल्याणकारी अर्थशास्त्र में। चलिए नेक्स्ट।
व्हिच मल्टीप्लायर थ्योरी स्टेट्स दैट द इकॉनमी विल फ्लोरिश द मोर द गवर्नमेंट स्पेंड्स? कौन सा गुणक सिद्धांत कहता है कि सरकार जितना अधिक खर्च करेगी अर्थव्यवस्था उतनी ही अधिक समृद्ध होगी? ये देखो भाई ये कांसेप्ट मैंने उस टाइम पे भी समझाया था आप लोगों को। सभी लोग बेटा सेशन को लाइक कर दो, शेयर कर दो बढ़िया तरीके से। ठीक है भाई? चलो बहुत बढ़िया। सभी लोग ध्यान से देखो। हां। मैं मैं आपको जो सुबह हो चुका था, मैं उन क्वेश्चंस को फिर से करवा रहा हूं। चिंता मत करो। वैसे ही करवा रहा हूं जैसे सुबह करवाया था। कुछ छूटेगा नहीं। बढ़िया रिवीजन भी हो जाएगा। ठीक है? अब देखो बस अपना पेशेंस बनाए रखो यार। ध्यान से देखो। विच मल्टीप्लायर थ्योरी स्टेट्स दैट द इकॉनमी विल फ्लोरिश द मोर द गवर्नमेंट स्पेंड्स? कौन सा गुणक सिद्धांत कहता है कि सरकार जितना अधिक खर्च करेगी अर्थव्यवस्था उतनी ही अधिक समृद्ध होगी? तो भाई देखो ये मल्टी ये मल्टीप्लायर थ्योरी है। केनेशियन देखो ध्यान से केनेशियन जॉन मेनार्ड कीन्स याद है ना? जॉन मेनार्ड कीन्स मैंने बताया था ब्रिटिश इकोनॉमिस्ट फादर ऑफ़ मैक्रोइकोनॉमिक्स लिखा भी है मैंने देखो। फादर ऑफ़ मैक्रोइकोनॉमिक्स। इसी बंदे ने ये थ्योरी दी। ठीक है? किनेशियन मल्टीप्लायर थ्योरी। और इसने बोला इसने बोला ये एक बात। इसने बोली ये बात कि भाई सरकार जितना खर्च करेगी ना देश की अर्थव्यवस्था उतनी ही बढ़ेगी। मतलब सीधी बात यह है कि जितना हम खर्चा करेंगे उतना हमारा पैसा बनेगा। जैसे मैं आपको सुबह भी बता रहा था कि भैया सीधी बात यह है। सीधी बात यह है कि भैया आपको अगर पैसा बनाना है तो पैसा आपको इन्वेस्ट करना होगा सही जगह पर। आप पैसे को अपने पास रख के या किसी ऐसी जगह रख के जहां पे आपको लग रहा है ये सेफ है तो आप पैसा नहीं बना पाओगे। ठीक है? आपको पैसा ज्यादा बनाने के लिए पैसा खर्च भी करना पड़ेगा। आप सोचो कि बैठे-बैठे मेरा पैसा डबल होता रहे, ट्रिपल होता रहे। ठीक है? 10 गुना बढ़ जाए वो नहीं हो सकता। यू विल हैव टू इन्वेस्ट दैट मनी समवेयर एल्स। आपको कहीं और उसको इन्वेस्ट करना ही पड़ेगा ताकि पैसा बने। पैसे से पैसा बनता है। तो यहां पर भी यही बोल रहा है कि सरकार जितना ज्यादा खर्च करेगी किसी सेक्टर में, किसी क्षेत्र में, किसी फील्ड में, वो सेक्टर उतना ही ज्यादा ग्रो करेगा, उतना ही ज्यादा उसका विकास होगा। और इसने ये भी बात बोली। बोला जब एक बार सरकार खर्च करना शुरू कर देती है ना जब एक बार सरकार खर्च करना शुरू कर देती है तो जो प्राइवेट इंडिविजुअल्स हैं जो बाहर जो बिजनेसमैन वगैरह बैठे हुए हैं प्राइवेट लोग वो भी देखते हैं कि यार सरकार इस सेक्टर में ज्यादा पैसा खर्च कर रही है मतलब ये सेक्टर जो है ज्यादा रिटर्न देने वाला है। चलो हम भी इसी में खर्च करते हैं। तो सरकार के उस खर्चे ने प्राइवेट इंडिविजुअल्स को भी मोटिवेट कर दिया कि भैया तुम भी खर्चा करो और जब सरकार का भी पैसा लग रहा है प्राइवेट इंडिविजुअल्स का भी पैसा लगेगा तो भाई फिर तो विकास होना ही है। फिर तो ग्रोथ होनी ही है। ठीक है? तो जॉन मेनार्ड कीन्स ने जो कि फादर ऑफ़ मैक्रोइकोनॉमिक्स है इसने बोला कि सरकार जितना ज्यादा खर्च करेगी उतनी ज्यादा इकॉनमी ग्रो करेगी। क्योंकि जहां सरकार खर्च करती है उस क्षेत्र में प्राइवेट इंडिविजुअल्स भी मोटिवेट होते हैं इन्वेस्ट करने के लिए। तो यही बात मैंने तुम्हें अभी बताई। ठीक है? चलो नेक्स्ट।
द इनपुट्स यूज्ड इन द प्रोडक्शन ऑफ गुड्स और सर्विज टू मेक एन इकोनॉमिक प्रॉफिट आर नोन एज वह इनपुट्स जो वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन में आर्थिक लाभ कमाने के लिए उपयोग किए जाते हैं उन्हें क्या कहा जाता है? तो जैसे यहां पे है देखो मैंने यहां पे क्वेश्चन क्या पूछा है कि भाई जिन चीजों का जिन चीजों का आप इस्तेमाल कर रहे हो प्रोडक्ट्स बनाने में आप किसी चीज को उत्पादित करने में जिन चीजों का इस्तेमाल कर रहे हो वो आपके उत्पादन के साधन है। अब भाई देखो भाई मैं ये कंटेंट तुम्हें दे रहा हूं। मैं ये कंटेंट तुम्हें दे रहा हूं। ठीक है? मैं ये कंटेंट किसके थ्रू दे रहा हूं? इस डिजिटल पैनल के द्वारा दे रहा हूं। इस डिजिटल पैनल के द्वारा दे रहा हूं तुम्हें कंटेंट। तो भाई मेरे लिए इस कंटेंट का उत्पादन ठीक है इस कंटेंट का उत्पादन जो है कहीं ना कहीं इस डिजिटल पैनल के द्वारा भी हो रहा है। ठीक है? मान लो स्लाइड्स मैंने लैपटॉप से बनाई वो मेरा उत्पादन का साधन है। ठीक है? उसके बाद इंटरनेट मेरा लगा इसमें वो मेरा उत्पादन का साधन है। बिजली मेरी लग रही है कि मैं आपको कंटेंट दे पा रहा हूं। तो ये उत्पादन का साधन है। ये सामने डेस्कटॉप रखा हुआ है। जहां से क्लास चल रही है। ये उत्पादन का साधन है। तो जब आप कोई चीज बनाते हो और उसमें जो चीजें लग रही हैं यूज़ हो रही हैं वो उत्पादन के साधन है। समझ में आ रही है भाई बात? अब मान लो मान लो मान लो तुम्हें किसी को तुम्हें किसी को कपड़े बनाने की फैक्ट्री खोलनी है। तो फैक्ट्री खोलने के लिए पहले तुम्हें जमीन चाहिए। तो लैंड क्या हुआ तुम्हारा? लैंड क्या हुआ? वो तुम्हारा क्या है? वो तुम्हारा फैक्टर है प्रोडक्शन का उत्पादन का साधन है। फिर तुम्हें बिल्डिंग बनानी होगी। ठीक है? तो तुम बिल्डिंग बनाओगे। वो बिल्डिंग क्या है तुम्हारी? वो बिल्डिंग क्या है तुम्हारी? वो बिल्डिंग क्या है? वो तुम्हारा कारक है। भाई बिल्डिंग में ही बिल्डिंग में ही तुम मशीन लगाओगे। मशीन से कपड़े बनेंगे। बाहर थोड़ी लगानी नहीं पड़ेगी मशीन। बाहर थोड़ी लगानी पड़ेगी। आपको बिल्डिंग में लगानी पड़ेगी, तो बिल्डिंग भी आपके उत्पादन का साधन है। बिल्डिंग नहीं होगी तो कपड़े कैसे बनेंगे भाई। ठीक है? फैक्ट्री कहां लगेगी? यानी मशींस कहां लगी? तो लैंड आपके लिए जरूरी है। अगर आप कपड़ा बनाने की फैक्ट्री खोल रहे हो, बिल्डिंग आपके लिए जरूरी है। फिर आपको कपड़ा बनाने के लिए मशीन चाहिए, तो मशीनंस आपके लिए उत्पादन का साधन है। मशीनों को चलाने के लिए लेबर चाहिए यानी मजदूर चाहिए। वो आपका उत्पादन का साधन है। तो जो भी चीजें फाइनल गुड बनाने में आखिरी वस्तु बनाने में जो आप बेचना चाह रहे हो वो वस्तु बनाने में जो भी चीजें बीच में लग रही हैं वो सब दोस्तों क्या है? वो उत्पादन का साधन है। ठीक है? चलो नेक्स्ट।
व्हिच इकोनॉमिस्ट हैज़ रिटेन द बुक द जनरल थ्योरी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी 1936? भाई किस अर्थशास्त्री ने द जनरल थ्योरी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी 1936 पुस्तक लिखी है? बताओ भाई अभी देखो यहां पे हम लोगों ने अभी पढ़ा वही फादर ऑफ़ मैक्रोइकोनॉमिक्स इतनी बार आ जाएगा ना बीच में तुम्हें रट जाएगा। फादर ऑफ़ मैक्रोइकोनॉमिक्स कौन है? जॉन मेनार्ड कीन्स। इसी बंदे ने ये किताब लिखी है। इसी बंदे ने ये किताब लिखी है। और ये क्या बोल रहा है इस किताब में? पता है क्या बोल रहा है? यह बोल रहा है कि जितनी ज्यादा हम जनता के पास पैसा पहुंचाएंगे, जितना ज्यादा हम मनी पहुंचाएंगे जनता के पास भाई सीधी बात है। सीधी बात है। जनता के पास जितनी ज्यादा मनी पहुंचेगी, जनता उतना ज्यादा खर्च करेगी। भाई अब मेरे पास मेरे पास मान लो एकदम से ₹50 लाख आ जाए। ठीक है? एकदम से ₹50 लाख आ जाए और अब मैं क्या सोचूंगा? मैं ये सोचूंगा कि यार चलो ठीक है जो जो मेरी जरूरतें हैं जो मुझे लग रहा है कि अभी तक पूरी नहीं हुई है इतने पैसे ना होने की वजह से मैं उन्हें पूरा कर लूंगा। सही बात है। तो यानी अगर मेरे पास पैसा आएगा मेरे पास मनी सप्लाई होगी। ठीक है? मनी सप्लाई हो के मेरे पास आएगी तो ऑब्वियस सी बात है। मैं डिमांड करूंगा चीजों की। अरे यार चलो ऐसा करते हैं। एक एसी या दूसरा एसी लगवाते हैं घर में। अरे यार दो ही है। ऐसा करते हैं। चारों रूम्स में लगवा दो। कोई दिक्कत नहीं है। अरे यार ऐसा करो हॉल में भी लगवा दो। हॉल बड़ा है तो क्या हुआ? दो एसी और हॉल में लगवा दो। मतलब अगर मेरे पास पैसा आ रहा है तो मैं डिमांड कर रहा हूं। मेरी डिमांड बढ़ गई भाई। मेरी डिमांड बढ़ गई है। तो यहां पर ये क्या बोल रहा है? ये बोल रहा है कि अगर मनी सप्लाई होगी। अगर मनी सप्लाई बढ़ेगी अगर जनता के पास पैसा जाएगा। लोगों के पास मनी आती है। अगर लोगों के पास पैसा आएगा तो उनकी डिमांड बढ़ जाती है भाई चीजों की। अब मैं मेरे पास मान लो ₹1 करोड़ आ गए। ठीक है? ठीक है। ₹1 करोड़ आ गए और मैंने जो है मैंने जो है सोचा कि ₹1 करोड़ का ऐसा करो। पूरे घर में एसी लगवाओ जगह-जगह। गर्मी बहुत ज्यादा हो रखी है। अब मैं गया मैंने एकदम से जाके दुकान वाले को बोल दिया मुझे 15 एसी चाहिए। अब 15 एसी उसके पास है ही नहीं। उसके पास टोटली 10 एसी है। मान लो। तो अब हुआ क्या? अब हुआ क्या? अब वो बोल रहा है सर मार्केट में कहीं पर भी जाओगे आप किसी भी दुकान में इतने एसी एक साथ नहीं है। वो ये बोल रहा है। मतलब कि मेरी डिमांड ज्यादा है। सप्लाई कम है एसी की। तो जब मैं डिमांड ज्यादा कर रहा हूं जब मैं डिमांड ज्यादा कर रहा हूं और सप्लाई कम है तो मैं क्या करूंगा मैं सोचूंगा यार कहीं से भी करके मुझे आज ही एसी लेने हैं यार 15 एसी लेने हैं तो चाहे चाहे वो 2000 फालतू मिल जाए 2000 2000 एक्स्ट्रा मुझे पे करना पड़े कोई दिक्कत नहीं मतलब मैं रेडी हो चुका हूं कि मैं एक्स्ट्रा पेमेंट करूं यानी मैं महंगा सामान लेने को तैयार हो चुका हूं क्योंकि मेरी डिमांड हाई है और सप्लाई कम है तो जब भी मनी सप्लाई ज्यादा होगी लोगों के पास ज्यादा पैसा आएगा वो डिमांड बढ़ाएंगे और जब वो डिमांड बढ़ाएंगे तो जितनी वो डिमांड बढ़ाते हैं उतनी सप्लाई होती नहीं है। सप्लाई तो कम होती है। तो डिमांड बढ़ती है। ऐसी सिचुएशन में जब लोगों के पास पैसा आ जाता है सप्लाई कम होती है। और जब भाई जब डिमांड ज्यादा है और पीछे से सप्लाई ही नहीं है तो ऑब्वियस सी बात है वो चीज जो आप डिमांड कर रहे हो उसकी महंगी होगी वो चीज। अब वो महंगी होगी। तो भाई इनफ्लेशन बढ़ेगा ना। जब कोई चीज महंगी होगी तो उसे क्या बोलते हैं कि महंगाई हो गई यार। इनफ्लेशन हो गया यार। ठीक है? महंगाई बढ़ गई। तो डिमांड ज्यादा, सप्लाई कम, इनफ्लेशन, महंगाई हो गई। ठीक है? समझ में आया बेटा? तो ये थ्योरी इसने दी थी। ठीक है? ये थ्योरी इसने याद रखना। अब एक चीज देखो ध्यान से सुनो मेरी बात। तो जॉन मेनार्ड कीन्स ने तो जॉन मेनार्ड किंस ने तो ये पूरा का पूरा यहां पर ये पूरा का पूरा यहां पर इसने अ ये अपनी पूरी की पूरी थ्योरी दे दी है। ठीक है? पूरी-पूरी किताब लिख दी है। और एक चीज याद रखना एडम स्मिथ को तुम क्या बोलते हो? एडम स्मिथ को क्या बोलते हो? फादर ऑफ इकोनॉमिक्स या कैपिटलिज्म। ठीक है? उसके बाद विंसेंट क्रोफोर्ड। विंसेंट क्रोफोर्ड क्या बोल रहा है? कि लोग इकॉनमी में किस तरह से इंटैक्ट करते हैं। विंसेंट क्रोफोर्ड भी क्या है? इकोनॉमिस्ट है। इसने इसने जनरली इस बात पे रिसर्च की है कि एक अर्थव्यवस्था में लोग स्ट्रेटेजिकली स्ट्रेटेजिकली रणनीतिक तरीके से बातचीत करते हैं। एक अर्थव्यवस्था में जो थोड़े ऐसे लोग हैं बिजनेसमैन टाइप के हैं वो क्या करते हैं? भाई अगर तुम जैसे अब तुम अपने दोस्त के साथ बैठे हुए हो। दोस्त के साथ तो दोस्तों जैसी बातें होंगी। ठीक है? गाली गलौज होगा, सब कुछ होगा, मस्तीमजाक होगा। पेरेंट्स के साथ थोड़ा सा रिस्पेक्ट रहेंगे हम। ठीक है? पर पर मान लो तुम्हारा कहीं ऑफिशियल काम है। तुम बिज़नेसमैन हो। अब तुम कहीं किसी डील के लिए जा रहे हो तो तुम कैसे बात करोगे वहां पर? तुम इकॉनमी में इकॉनमी का हिस्सा हो तुम। तुम बिज़नेसमैन हो। तुम किसी बिज़नेस डील के लिए जा रहे हो। तो वहां पर जाके तुम कैसे बिहेव करोगे कि भ इस काम को ऐसे कर लिया जाए तो हमें लगता है कि प्रॉफिट थोड़ा ज्यादा हो सकता है। आपका भी फायदा होगा। हमारा भी फायदा होगा। या फिर इसको इस तरह से हम स्ट्रेटजाइज करें तो शायद हमारा मुनाफा ज्यादा बढ़ सकता है। मतलब वहां पे जाके आप इकॉनमी में किस तरह से इंटरेक्ट कर रहे हो लोगों के साथ। ठीक है? इस पर स्टडी की है किसने? विंसेंट क्रोफोर्ड ने। बाकी बाकी एक चीज ध्यान से सुनना मेरी बात। ध्यान से सुनो बेटा। यहां पर यहां पर एक चीज ध्यान से सुनो कि ये जो मिल्टन फ्रीडमैन है ना मिल्टन फ्रीडमैन इसने तो सीधे-सीधे ये मनी सप्लाई वाली बात बता दी है कि भाई मनी सप्लाई ज्यादा होगी लोगों के पास लोगों के पास जो है पैसा आएगा लोग जो है डिमांड बढ़ाएंगे और सप्लाई कम कर देंगे अब सप्लाई कम मतलब हम नहीं करेंगे सप्लाई ऑटोमेटिकली कम हो जाएगी डिमांड बढ़ेगी सप्लाई ऑटोमेटिकली कम हो जाएगी और फिर जब सप्लाई ही कम है जब चीज ही नहीं आएगी तो उसकी कीमत बढ़ेगी क्योंकि उसकी कमी हो रखी है तो उसकी कीमत बढ़ जाएगी इनफ्लेशन हो जाएगा, महंगाई बढ़ जाएगी। समझ में आया कि नहीं? क्लियर है? तो ये हम पहले भी पढ़ चुके हैं। ये तो हम पहले भी पढ़ चुके हैं भैया। बिल्कुल बिल्कुल। अब देखो ये जो ये जो जॉन मेनार्ड कीन्स था जिसने ये पूरी की पूरी किताब लिखी। ये क्या बोल रहा है? ये क्या बोल रहा है भाई? मिल्टन फ्रीड ने मिल्टन फ्रीडमैन ने क्या बोला? ये मैंने बता दिया आपको। ठीक है? विंसेंट क्रॉफोर्ड ने क्या कर रखा है अपनी लाइफ में? वो मैंने तुम्हें बता दिया। एडम स्मिथ तो हम पढ़ चुके हैं पहले ही। यह जो किताब इसने लिखी है, इस किताब में लिखा क्या है? इसने इसने बंदे ने लिखा क्या है? देखो जॉन मेनार्ड कीन्स ने लिखा क्या है? इसने बोला कि लेवल ऑफ एंप्लॉयमेंट लेवल ऑफ़ एंप्लॉयमेंट। अब ये देखो जॉन मेनार्ड कीन्स ने जो लिखा है वो ये है। ठीक है? मिल्टन फ्रीडमैन एक अलग बंदा है। उसने यह थ्योरी दे रखी है। यह कांसेप्ट बता रखा है। अब यह चीज जो है इस किताब में एक्सप्लेन है। यह बोल रहा है किताब में कि रोजगार का जो स्तर है ना नौकरी का जो स्तर है लेवल ऑफ़ एंप्लॉयमेंट लोगों को लोगों को रोजगार चाहिए, नौकरी चाहिए। तो रोजगार का जो स्तर है रोजगार का जो लेवल है या तो ज्यादा होता है या तो नौकरियां बहुत ज्यादा होती है या कम होती हैं। पर नौकरियों का ज्यादा होना और कम होना इस बात पे डिपेंड करता है कि टोटल डिमांड कितनी है भाई? टोटल डिमांड कितनी है? मुझे एक बात बताओ। अगर बहुत ज्यादा लोग जैसे भारत में बहुत ज्यादा लोग नौकरियों की डिमांड करते हैं। हम
लोग सरकारी नौकरी, सरकारी नौकरी, सरकारी नौकरी के पीछे पड़े रहते हैं। सरकार वैकेंसी चाहे कितनी ही निकाल रही हो, हमें वो भी कम लगती है क्योंकि हमारे यहां डिमांड ज्यादा है। तो हम क्या बोलते हैं? अरे यार, नौकरियों का जो स्तर है ना भारत में, वो कम है यार। नौकरियों का जो लेवल है, देखो ध्यान से, रोजगार का जो स्तर है ना यार, वो कम है यार। क्यों? क्योंकि भाई हमने डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ा रखी है।
अब तुम सोचो अगर अगर नौकरियों की डिमांड ही ना हो। सरकारी नौकरी की डिमांड ही ना हो। सरकारी नौकरी की डिमांड ही ना हो। सब लोग अपना काम धंधा करना चाहते हैं। अपना बिज़नेस करना चाहते हैं। वही वही वही वैकेंसीज हमें लगेगा। अरे सरकार कितनी नौकरियां निकाल रही है यार? नहीं करनी हमें तुम्हारी नौकरी। हमें अपना बिज़नेस करना है। बंद करो वैकेंसीज। समझ रहे हो? जब डिमांड है, तो हमें क्या लग रहा है? रोजगार का लेवल जो है भाई, कम है। जब डिमांड नहीं है, हमें जब नौकरी नहीं चाहिए, और तो वही वैकेंसीज जो सरकार निकाल रही है, हमें लग अरे भाई साहब, 10,000 वैकेंसी निकाल दी, 10,000 और अभी जब करोड़ों लोग फॉर्म भरे हैं, तो हम लोग क्या बोलते हैं, डिमांड ज्यादा है? हम लोग बोलते हैं, अरे यार, सिर्फ 10,000 वैकेंसी निकाली है। तो भाई किसका फर्क पड़ता है? टोटल डिमांड का। इसके हिसाब से हमें फील होता है कि रोजगार का लेवल हाई है या लो है। तो यही इस किताब में लिखा हुआ है। चलो नेक्स्ट।
व्हाट इज द एक्सप्लसिट कॉस्ट? स्पष्ट लागत क्या है? अब मैंने तुम्हें उस टाइम पर भी बताया था स्पष्ट लागत क्या है? इट इज़ अ डायरेक्ट पेमेंट। इट इज़ अ डायरेक्ट पेमेंट मेड टू अदर्स इन द कोर्स ऑफ़ रनिंग अ बिज़नेस, सच एज वेज, रेंट, मटेरियल्स। यानी जब आप कोई व्यवसाय चलाते हो, जब कोई आप बिज़नेस चला रहे हो, तो व्यवसाय चलाने के दौरान दूसरों को किया जाने वाला प्रत्यक्ष भुगतान। डायरेक्ट पेमेंट जैसे कि आपने किसी को आपने लेबर के तौर पे यूज़ किया। आपने उसकी मजदूरी दे दी। ठीक है? आपने मान लो आपने कोई मटेरियल लाने के लिए, मटेरियल लाने के लिए आपने कोई ट्रैक्टर ट्रॉली किराए पे ली, तो उसका आपने किराया दे दिया, भाई ये ले तेरा ₹3000, ठीक है? फिर आप उस ट्रैक्टर ट्रॉली में जो सामान लेके आए, मान लो आप पत्थर, मिट्टी ये सब लेके आए हो, तो वो सामग्री, वो जो आपने खरीदा है, उसका भी पैसा लग गया। यानी मान लो आपका बिजनेस है, आपका बिजनेस है, कुछ कंस्ट्रक्शन का बिज़नेस है मान लो, तो कंस्ट्रक्शन के बिजनेस में मजदूरी भी लग रही है आपकी, तो आप पैसा दे रहे हो उसको, मजदूर। आपका किराया भी लग रहा है। मान लो ट्रैक्टर, ट्रॉली में सामान भर के ला रहे हो, तो उसका किराया लग रहा है। वो किराया भी दे रहे हो। जो मटेरियल खरीद के ला रहे हो, पत्थर, ईंट, मिट्टी, बजरी जो भी, उस सामग्री का भी पैसा लग रहा है। तो जब आप कोई बिजनेस कर रहे होते हो, जब कोई आप अपना काम धंधा कर रहे होते हो, उसमें जो पैसा लगता है, उसको चलाने के लिए, उस बिनेस को रन करने के लिए जो पैसा लगता है, तो वो क्या है भैया? वो क्या है? वो एक्सप्लसिट कॉस्ट है। वो स्पष्ट लागत है। ठीक है? चलो नेक्स्ट।
कंज्यूमर्स लूज सेटिस्फेक्शन इन अ प्रोडक्ट द मोर दे कंज्यूम इट। दिस इज नोन एज देखो भाई ध्यान से। उपभोक्ता जब किसी उत्पाद का बहुत ज्यादा उपभोग कर ले। जब उपभोक्ता यानी कोई कंज्यूमर जब किसी प्रोडक्ट को बहुत ज्यादा इस्तेमाल कर ले, तो उसकी जो संतुष्टि है, यानी उस प्रोडक्ट से मिलने वाली जो संतुष्टि है, वो धीरे-धीरे कम होती जाती है। इसे क्या बोलते हैं? इसे बोलते हैं डिक्रीजिंग मार्जिनल यूटिलिटी या डिमिनिशिंग मार्जिनल यूटिलिटी। मैंने बताया था उस टाइम पर भी, घटती सीमांत उपयोगिता। इसका मैंने तुम्हें एग्जांपल दिया था कि अगर मान लो मान लो मैंने एक दिन कहीं से पेस्ट्री खाई। किसी बेकरी पे जाके मैंने एक पेस्ट्री खाई और वो चॉकलेट पेस्ट्री मुझे बहुत ज्यादा अच्छी लगी। तो मुझे लगा यार चलो ठीक है, आज मैंने दो खा ली। अब इतना मन कर रहा है। अगले दिन मैंने, अगले दिन मैं जैसे ही, अगले दिन मैं जैसे ही रेडी हुआ मार्केट जाने के लिए, मुझे लग रहा है यार वो पेस्ट्री खा के आऊंगा यार। कल बहुत, कल बहुत बढ़िया लगी थी। मैं फिर चला गया उस दुकान पे। ऐसे कर कर के मुझे 10 दिन हो गए। मैं हर दिन दो-दो खा रहा हूं। पर 10 दिन के बाद, 10 दिन के बाद मुझे बोरियत फील होने लगी कि यार बस ठीक है, बस हो गया। मैंने खा लिया बहुत। अब मेरा मन नहीं है। ठीक है? मतलब 10 दिन के बाद मेरा मन नहीं है। पर फिर मैं मार्केट निकला। मुझे लगा यार आ ही गए हो। ठीक है, दो तो नहीं खाऊंगा। मैं चलो एक खा लेता हूं। ठीक है? एक खा ली मैंने। 11वें दिन मैंने एक खाई। 12वें दिन जब अगले दिन गया मार्केट फिर तो मुझे लग रहा है कि यार चलो मैं आज पूरी नहीं खाऊंगा। मैं आधी खाऊंगा। ठीक है? तो मैं मैं और मेरा दोस्त गए। आधी उसने खाई। आधी मैंने खाई क्योंकि मेरा मन नहीं था। मैं पक चुका हूं उसको खा के। 13वें दिन, 13वें दिन मेरा कोई मन नहीं है। मैं बिल्कुल नहीं खरीदने वाला हूं। पर 13वें दिन क्या हुआ? ऑफर आ गया उस पे। अब मैं खरीदूंगा, तभी मेरे मन से तो उतर चुकी है वो। मैं टेस्ट की वजह से नहीं खरीदूंगा उसे। पर उसकी कीमत हमेशा ₹100 थी। मैं दो-दो खाता था, ₹200 रोज के गायब। ठीक है? पर अब मुझे ऐसा लग रहा है कि यार ₹200 की जो पेस्ट्री मैं खाता था। उन्होंने बोला उसकी दुकानदार ने कि भाई ऑफर चल रहा है अभी। ऑफर चल रहा है। 50% ऑफ है। ₹100 की पेस्ट्री आपको ₹50 में मिल रही है। मैं ये सोच रहा हूं कि यार मन तो नहीं है, पर यार ₹100 की यार 50 में मिल रही है। तो ले लेते हैं। चलो। तो क्योंकि क्योंकि मेरा टेस्ट नहीं बन रहा। देखो मैंने इतनी ज्यादा कंज्यूम कर ली कि मेरा जो सेटिस्फेक्शन लेवल है वो नीचे गिर चुका है मुझसे। पर फिर भी अगर मैं खरीद रहा हूं। देखो ध्यान से। अगर मैं अगर मैंने इतनी ज्यादा कंज्यूम कर ली है कि मेरा सेटिस्फैक्शन लेवल नीचे गिर चुका है। तो ऑब्वियस सी बात है मेरे मन में इच्छा नहीं है कि मैं उसे खाऊं। मैंने डिमांड को, उस चॉकलेट पेस्ट्री की डिमांड को मैंने कम कर दिया है। पर फिर भी अगर मैं खरीद रहा हूं, तो तब खरीद रहा हूं जब उसका प्राइस गिर गया है। तब मैंने डिमांड बढ़ाई है। अदरवाइज अगर प्राइस उतना ही रहता ना, तो मैं नहीं खाता। फिर एक तो मन नहीं था, ऊपर से प्राइस ज्यादा था। पर प्राइस क्योंकि कम हो गया, तो मुझे थोड़ा सा एक पुश मिला कि यार चलो ठीक है, खा लेते। ठीक है? समझ में आया? तो भाई ये देखो, ये है अपना डिमिनिशिंग मार्जिनल यूटिलिटी। यानी जैसे-जैसे आप चीज का इस्तेमाल ज्यादा करते हो, वैसे-वैसे उससे मिलने वाली संतुष्टि कम हो जाती है, सेटिस्फेक्शन कम हो जाता है और हम डिमांड कम कर देते हैं उस चीज की। इस सिस्टम को, इस पूरे प्रोसेस को बोलते हैं डिमिनिशिंग मार्जिनल यूटिलिटी यानी घटती सीमांत उपयोगिता। चलो देखो इधर।
व्हिच ऑफ द फॉलोविंग इज़ नॉट अ वेरिएबल कॉस्ट फॉर अ फर्म? निम्नलिखित में से कौन सी एक फर्म के लिए परिवर्तनीय लागत नहीं है? फर्म का मतलब है कंपनी। तो एक कंपनी है, कोई कंपनी है, उसके लिए यहां पर, एक कंपनी है, उसके लिए यहां पर कौन सी चीज जो है वेरिएबल कॉस्ट नहीं है, मतलब फिक्स्ड कॉस्ट है, वेरिएबल नहीं है, वेरिएबल मतलब परिवर्तनीय नहीं है, मतलब वो चेंज नहीं होती, वो कॉस्ट, वो लागत चेंज नहीं होती। तो मान लो जैसे मैंने आपको बोला, मान लो कि आप जो है, मान लो कि आप जो है कपड़े बेचते हो, आपकी एक शॉप है, आपकी एक शॉप है, आपकी एक शॉप है कि आप कपड़े बेच रहे हो उस दुकान से, आपकी उस शॉप पर। अब और बड़ी शॉप है, अच्छी खासी शॉप है, ऐसा लग रहा है जैसे कोई मिनी मॉल है। ठीक है? आपने बढ़िया शॉप बना रखी है। बड़ा स्पेस है, अच्छा खासा। अब आप क्या कर रहे हो? आपने जिस जमीन पर वो शॉप बनाई है या जिस जमीन पर वो शॉप है, तो पूरी शॉप और पूरी जमीन की कीमत लगेगी और उस शॉप का आपको देना पड़ता है प्रॉपर्टी टैक्स। क्योंकि वो आपकी संपत्ति है, तो आपको संपत्ति कर देना पड़ता है, एक फिक्स्ड परसेंट, आपको फिक्स्ड परसेंट कि भाई मान लो सरकार ने एक रेंज सेट कर रखी है कि भ इस रेंज, इतने रुपए से लेके इतने रुपए तक की अगर कोई प्रॉपर्टी है, तो उसको मान लो 10% जो है या 5% ये है या 12% जो है ये इनको प्रॉपर्टी टैक्स देना पड़ेगा। उस उस वैल्यू का 10%, 2%, 3%, 5%, जो भी सरकार ने तय कर रखा है, उतना आपको प्रॉपर्टी टैक्स देना पड़ेगा। ठीक है? तो प्रॉपर्टी टैक्स तो यार फिक्स होता है। बाकी अगर मान लो आप कपड़े बेच रहे हो, तो कपड़े की पैकिंग, अगर आपको लग रहा है कि यार धंधा जो है थोड़ा मंदा चल रहा है। थोड़ा कम चल रहा है, तो ऐसा करता हूं जो हाई क्वालिटी पैकिंग है उसको थोड़ा लोकल कर देता हूं। थोड़ा लो क्वालिटी पैकिंग करता हूं, ताकि पैक पैकेजिंग में तो पैसा बचे मेरा। ठीक है? हाई क्वालिटी पैकिंग कर रहा हूं। फिर सामान भी नहीं बिक रहा है। तो मैं सोच रहा हूं चलो ठीक है यार, पैसा यहां तो बचे कम से कम। तो मैंने लो पैकिंग, ठीक है? लो पैकिंग मटेरियल यूज़ करना शुरू कर दिया। जब मैं हाई पैकिंग कर रहा था, तो पैसा मेरा ज्यादा खर्च हो रहा था। अब क्या हुआ? जैसे ही मैंने लो क्वालिटी की पैकिंग करनी शुरू की, तो पैसा कम खर्च हो रहा है। यानी पैकिंग में जो पैसा लग रहा है वो पहले ज्यादा लग रहा था, अब कम हो रहा है। तो चेंज तो हो गया। पैकिंग वाला जो कॉस्ट है वो तो चेंज हो गया। तो ये तो वेरिएबल कॉस्ट है। ठीक है? कमीशन, मान लो बीच में कोई डीलर व्हीलर है। ठीक है? मान लो बीच में कोई डीलर है। जैसे मान लो मैंने किसी एक बंदे को बोला हुआ है कि यार मैं शॉप चला रहा हूं कपड़े की। तू ऐसा कर मेरे को थोक में सामान लाके दे। ठीक है? और तू ऐसा करना जो भी जो भी जो भी जो भी वहां पे तू खर्चा करेगा, मेरे एंड से, मतलब मेरी तरफ से तू मेरा मेरे लिए सामान लेके आ, मतलब मान ले मेरे लिए 100 जोड़ी कपड़े लेके आ, तू मेरे को बेचने हैं अपनी दुकान पे, वो 100 जोड़ी थोक में लेके ले आया, वो बोल रहा है भाई मैं तेरे लिए देख कपड़े सस्ते करवा के लाया हूं, मेरे को मेरे को तू ऐसा कर मेरे को एक, मेरे को जितना कीमत का ये सामान आया है ना, उसका तू मेरे को 5% दे दे, कीमत, कमीशन दे दे मेरे को, जितना मैं तेरे लिए लेकर आया हूं उसका 5% मेरे को कमीशन दे दे। मैंने बोला ठीक है यार, मेहनत करके लाया है, कपड़े छांट के लाया है। फिर मेरे पास पहुंचा भी रहा है। चल तू ये जो कितना खर्चा हुआ है? बोला 10,000, तो बोला ये ले चल 5%, 10,000 का 5%, या मान लो वो बोल रहा है कि मैं 100 जोड़ी कपड़े लाया हूं। ₹1 लाख, ये ले ₹1 लाख, ₹1 लाख का 5% कितना हुआ? 5,000, बोला ये ले 5,000, मैंने उसको बोल दिया ले ₹5,000। समझ में आ रही है मेरी बात? तो मतलब सीधी बात ये है कि कमीशन जो है वो बदल सकता है। वो बोले नहीं यार 5% यार कम से कम 7% तो दे। चल 7% ले। ठीक है? अगली बार लेके आएगा। मैं बोलूंगा यार तूने पिछली बार 7% लिया था। अब तू मेरे से 5% ही ले। 5% मतलब कमीशन तो बढ़ता घटता रहेगा। डिपेंड करता है कि मैं और जो मीडिएटर है उसके बीच में क्या बातचीत हो रही है। पैकिंग अच्छी हो जाएगी तो कीमत बढ़ जाएगी। पैकिंग थोड़ी लो क्वालिटी की रखूंगा तो कीमत कम हो जाएगी। लेबर, कोई मजदूर है वो बोल रहा है, मान लो मेरी दुकान पे, मेरी कपड़े वाली दुकान पे, मान लो कोई बंदा है वो बोल रहा है सर मैं तो ₹15,000 लूंगा और मैं यहां पे सेल्समैन की नौकरी कर लूंगा। कोई दिक्कत नहीं है। मैंने उसको ₹15,000 पे रख लिया। अब वो अब वो बोल रहा है 6 महीने बाद सर मेरा थोड़ा इंक्रीमेंट कर दो। मेरे घर में जो है मेरी बहन की शादी है। मैंने बोला ठीक है यार, बिल्कुल। तो वो इंक्रीमेंट ले, 6 महीने में कोई दिक्कत नहीं। मैंने उसको 20-25%, उसकी जो सैलरी है वो बढ़ा के दे दी। अब उसकी सैलरी वेरिएबल ही तो रही फिर भाई, लेबर जो उसकी मैं मजदूरी दे रहा था पहले 15,000, अब मैंने उसको 15, 20% बढ़ा के दे दिया। मतलब वो तो वेरिएबल है। फिर बदल गई। नॉट वेरिएबल क्या है? नॉन वेरिएबल क्या है? जो बदल नहीं रही है वो क्या है? प्रॉपर्टी टैक्स। ये नहीं बदल रहा, ये फिक्स है। तो a जो है ये हमारे पास फिक्स है। तो यहां पे पूछा है कौन सा ठीक है? कौन सा वेरिएबल कॉस्ट नहीं है? तो वेरिएबल कॉस्ट ये नहीं है। ये फिक्स है। ठीक है? चलो नेक्स्ट।
इन इकोनॉमिक्स द स्लोप ऑफ द डिमांड कर्व इज़ टिपिकली डैश। अर्थशास्त्र में मांग वक्र का ढलान आमतौर पर कैसा होता है? भाई डिमांड वाला चैप्टर जिन्होंने पढ़ा है वो जानते हैं। ठीक है? फाउंडेशन में भी हमने पढ़ा है। तो मैंने आपको उस टाइम सुबह भी एक्सप्लेन किया था। मैं दोबारा एक्सप्लेन कर रहा हूं। सभी लोग ध्यान से देखेंगे बेटा। देखो मैंने आपको बताया था, देखो मांग वक्र को बनाने से पहले, मांग वक्र को समझने से पहले, उसके स्लोप को समझने से पहले मांग का नियम समझना होता है। तो मांग का नियम क्या बोलता है? मांग का नियम जनरली ये बोलता है। ठीक है? आप बाकी सारे फैक्टर्स को तो रखो कांस्टेंट। ठीक है? बाकी सारे फैक्टर्स को रखो कांस्टेंट। आप सिर्फ इस पे फोकस करो जो मैं बोल रहा हूं। मांग का नियम यह कहता है कि अगर अगर किसी चीज का प्राइस बढ़ता है, अगर किसी चीज की प्राइस बढ़ती है, कीमत बढ़ती है, तो हम लोग जनरली क्या करते हैं? हम लोग अपने लोअर मिडिल क्लास लोग हैं। मिडिल क्लास लोग हैं। तो अगर कोई चीज महंगी हो रही है, तो हम क्या उसको ज्यादा खरीदेंगे? क्या? हम तो कम खरीदते हैं ना। फिर कोई चीज अगर महंगी हो रही है, कोई चीज अगर महंगी हो रही है, तो हम क्या कर देंगे? हम बोल देंगे यार हम अब उस सामान को ज्यादा नहीं खरीदेंगे। हम क्वांटिटी डिमांडेड कम कर देंगे। हम उस प्रोडक्ट की क्वांटिटी डिमांडेड, जैसे मान लो प्राइस बढ़ गया। ठीक है? मान लो मेरे को एक, मैं आज लेने आया था दो जोड़ी कपड़े। महीने भर पहले मैं देख के गया था कि यार ये दो जोड़ी कपड़े बड़े सस्ते आ रहे हैं यार, मैं ले लेता हूं। ठीक है? उस टाइम मान लो मेरे पास पैसे नहीं थे। तो अब मुझे ऐसा लग रहा है मैं दोबारा आया उस दुकान पे। वो बोल रहा है कि भाई साहब। मैंने बोला वो दो जोड़ी वो कपड़े दिखाना यार। मैं पिछली बार छोड़ गया था। मेरे पास उस टाइम पैसे नहीं थे। मैं आज लेने आया हूं। बोला ठीक है। मैंने देखा कि यार उसका तो प्राइस बढ़ गया। उन दो जोड़ी कपड़ों का तो प्राइस बढ़ गया। तो अब मुझे लग रहा है यार प्राइस बढ़ गया, तो अब मैं दो जोड़ी तो नहीं लूंगा यार। प्राइस बढ़ा हुआ है तो मैं ऐसा करता हूं, मैं एक ही जोड़ी लूंगा। मैंने एक कम कर दिया। यानी पहले तो प्राइस कम था तो मैंने डिमांड बढ़ा रखी थी। जैसे ही मुझे पता चला प्राइस बढ़ गया, मैंने डिमांड कम कर दी। तो अगर किसी प्रोडक्ट का प्राइस बढ़ता है तो मैं डिमांड कम कर दूंगा। अगर उसका प्राइस कम होता है तो मैं डिमांड बढ़ा दूंगा। एकदम से वो वो मजाक, वो मेरे को बोला एकदम से, अरे मैं तो मजाक कर रहा था। वही प्राइस ले लो। अब मुझे क्या पता चला कि यार प्राइस तो कम ही है, तो मैं क्या करूंगा? डिमांड बढ़ा दूंगा। तो जब भी कोई चीज महंगी होती है हम उसे कम खरीदते हैं। कोई चीज जब सस्ती होती है तो हम उसे ज्यादा खरीदते हैं। ठीक है? तो ये है लॉ ऑफ़ डिमांड। यानी इनवर्स रिलेशन है। प्राइस बढ़ रहा है, डिमांड कम हो रही है। प्राइस कम हो रहा है, डिमांड बढ़ रही है। तो प्राइस और डिमांड के बीच में, कीमत और मांग के बीच में इनवर्स रिलेशन है। और जब ये इनवर्स रिलेशन होता है तो फिर हमें मांग वक्र कैसा बनता है वो देखना है। अब देखो इसी कांसेप्ट के दम पे मैंने तुम्हें बताया कि चलो एक टेबल बनाते हैं और उस टेबल के दम पे हम डिमांड कर्व बनाते हैं। कैसा बनेगा देखते हैं। तो मैंने आपको बताया, मैंने यही वाला कांसेप्ट यूज़ किया कि मान लो एक कमोडिटी, एक वस्तु है उसकी कीमत ₹10 है। जब उसकी कीमत ₹10 है तो मैंने उसकी 100 यूनिट खरीद ली। समझ रहे हो? जैसे मान लो कोई चॉकलेट है, कोई चॉकलेट है जिसकी कीमत ₹10 है। तो मैंने वो 100 खरीद ली। वो चॉकलेट 100 खरीद ली मैंने। ठीक है? वो चॉकलेट कितनी खरीद ली? 100। ₹1000 मैंने खर्च कर दिए। पर जैसे ही उसकी कीमत मान लो ₹20 होगी, तो मैं फिर 100 नहीं खरीद पाऊंगा यार। फिर तो क्योंकि 100 अब यार ₹20 की चीज अगर मैं 100 खरीदूंगा तो 2000 की पड़ेगी। मेरे पास तो 2000 है ही नहीं। मेरे पास तो 1000 ही है। तो मैं क्या करूंगा? मैं सोचूंगा यार ये ₹20 की है। चलो मैं 50 ही ले लेता हूं। मेरे पास तो उतने ही रुपए हैं वैसे भी। तो भाई बात ये है कि अगर अगर अगर अगर कीमत बढ़ रही है तो हम डिमांड को कम कर देते हैं। कीमत कम थी तो मैं 100 चॉकलेट खा रहा था। जब जैसी बढ़ी तो मैंने बोला नहीं भाई रहने दो यार, बहुत ज्यादा खर्चा हो जाएगा। 50 यूनिट ही, 50 यूनिट ही लेता हूं। 50 चॉकलेट ही लेता हूं। तो कीमत बढ़ी, डिमांड कम हुई। अब इसी को हमें इस पे दिखाना है ग्राफ पर। तो मैंने देखो यहां पे देखो x एक्सिस पे ली मैंने डिमांड। ठीक है? x एक्सिस पे ये डिमांड ले ली मैंने। x एक्सिस पे ये डिमांड ले ली और y एक्सिस पे मैंने प्राइस ले लिया। प्राइस कितना है? 10 और 20, 10 20 है ना भाई? 10 20, डिमांड कितनी? 50 और 100, तो मैंने देखा कि जब ₹10 कीमत हो रखी है तो मैं 100 यूनिट खरीद रहा हूं चॉकलेट की। जब ₹10 कीमत हो रही है तो मैंने कितनी यूनिट खरीदी? 100 यूनिट। तो ये मेरे पास एक पॉइंट आ गया a, 10 पर 100 है ना भाई, ये लिखा है ना 100, 10 पर 100, तो मेरे पास एक पॉइंट आ गया। फिर जैसे ही कीमत बढ़ी, जैसे ही कीमत बढ़ी दोस्तों, जैसे ही कीमत बढ़ी तो क्या हुआ, कीमत जो बढ़ी तो भैया ये जो है ₹20 हुई और यहां पे देखो तुम, यहां पर ये देखो मेरे पास ₹20, ₹20 जैसे हुई तो मैं 50 यूनिट खाने लगा। पहले 100, 10 पे 100 खाना खा रहा था। अब मैं 20 पर 50, क्योंकि कीमत बढ़ गई तो मैंने डिमांड कम कर दी। तो भाई अब जो मेरे पास पॉइंट आया वो आया B. तो A और B जब मैं इन दोनों को जॉइ करूंगा, ये मेरे पास दो पॉइंट आए, तो मेरा जो कर्व बना, जो मेरा ये कर्व बना वो डाउनवर्ड बना है। अगर ये ऐसा बनता तो मैं बोलता अपवर्ड है यार ये तो, ये तो अपवर्ड बन गया। पर ये कैसा बना है? ये तो डाउनवर्ड बन गया। तो भाई डाउनवर्ड बन रहा है और ऊपर से कर्व जो है, कर्व जो है वो लेफ्ट टू राइट जा रहा है। लेफ्ट टू राइट। डाउनवर्ड है किधर से किधर को? लेफ्ट से राइट की तरफ। भाई देखो लेफ्ट ये है, राइट ये है। तो लेफ्ट से राइट की तरफ डाउनवर्ड है। डाउनवर्ड फ्रॉम लेफ्ट टू राइट। लेफ्ट से राइट की तरफ डाउनवर्ड है। तो ये मांग वक्र है। इस तरह से हमें ये समझना था। नेक्स्ट,
मैकोनॉमिक्स कैन बी डिफाइंड एज मैकोनॉमिक्स को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है। मैंने अभी बताया था कि इकोनॉमिक्स की दो ब्रांचेस होती हैं। एक होती है अपने पास माइक्रोइकोनॉमिक्स, एक होती है अपने पास मैकोनॉमिक्स। माइक्रोइकोनॉमिक्स में हम जो छोटे-छोटे एलिमेंट्स हैं, इंडिविजुअल जो एलिमेंट्स हैं, उनकी स्टडी करते हैं। ठीक है? जैसे मैंने क्या बताया कि माइक्रोइकोनॉमिक्स में मैं पहले डिमांड पढूंगा, फिर मैं मनी अपना सप्लाई पढूंगा, फिर मैं मार्केट का टॉपिक पढूंगा। मतलब मैं उन पे स्टडी करूंगा। पर जब मैं माइक्रोइकोनॉमिक्स पढ़ता हूं, तो मैं इकोनमी को एज अ होल, पूरी इकॉनमी को एक साथ पढ़ता हूं। ना कि उसके एलिमेंट्स को पढ़ रहा हूं। जब मैं एलिमेंट्स को पढ़ रहा हूं तो माइक्रोइकोनॉमिक्स। जब मैं पूरी अर्थव्यवस्था को एक साथ पढ़ रहा हूं तो भाई वो है मैकोनॉमिक्स और फादर ऑफ मैक्रोइनिक्स कौन है? जॉन मेनार्ड कीस, जो कि मैंने बताया ब्रिटिश इकोनॉमिस्ट है। समझ में आ रही है मेरी बात? क्लियर? तो भाई अर्थशास्त्र की, अर्थशास्त्र की वो शाखा जो समग्र रूप से अर्थव्यवस्था के व्यवहार और प्रदर्शन का अध्ययन करती है। इट इज़ अ ब्रांच ऑफ़ इकोनॉमिक्स दैट स्टडीज द बिहेवियर एंड परफॉर्मेंस ऑफ एन इकॉनमी एज अ होल। एक साथ। ठीक है? चलो भैया। अब हमारा इतना तो हो गया। इतना हमने सुबह भी कर लिया था। अब हम आगे बढ़ाते हैं अपनी मैराथन को। ठीक है भाई? चलो बहुत बढ़िया। सभी लोग सेशन को लाइक कर दो, शेयर कर दो बेटा। अब आगे बढ़ते हैं। चलो आगे बढ़ते हैं। अब देखो भाई, ये एक क्वेश्चन है तुम्हारे सामने।
हु सेड द फॉलोविंग? नो सोसाइटी कैन शोरली बी फ्लोरिशिंग एंड हैप्पी ऑफ वि द फार ग्रेटर पार्ट ऑफ द मेंबर्स आर पुअर एंड मिज़रेबल। निम्नलिखित कथन किसने कहा? कोई भी समाज निश्चित रूप से समृद्ध और खुशहाल नहीं हो सकता, अगर उसके अधिकांश सदस्य गरीब और दुखी हो। भाई एक बात बताओ कैसे हो सकता है? आप गरीबी में, गरीबी में समृद्धि कैसे आती है भाई? प्रोस्पेरिटी तो समझ रहे हो? प्रोस्पेरिटी तो इससे कनेक्टेड है। जब आदमी गरीब है और दुखी है। गरीब और दुखी आदमी पैसा बनाता है क्या? कैसे
आएगी समृद्धि? भाई पैसे से आएगी समृद्धि। विकास होगा, ग्रोथ होगी, उससे आएगी समृद्धि। अब गरीब और दुखी आदमी कैसे ये कैसे पॉसिबल है कि वो गरीब भी है और बहुत ज्यादा दुखी भी है और बहुत तगड़ी तरक्की कर रहा है? दैट इज़ नॉट पॉसिबल। प्रैक्टिकली नहीं है ये तो चीज़। तो ये तो बात सही है कि कोई भी समाज निश्चित रूप से समृद्ध और खुशहाल नहीं हो सकता, अगर वहां पे ज्यादातर लोग गरीब हैं या दुखी हैं। भाई सही बात है। विकास करने के लिए, ग्रोथ करने के लिए यू मस्ट बी अ हैप्पी पर्सन। आप एक खुशनुमा दिल के इंसान होने चाहिए। आपका माइंड एकदम फ्रेश रहे। आप पॉजिटिव सोचें और आप दुखी नहीं हैं। आप आप जो हैं चलो गरीब चलो एक-एक बात तो देखो। अगर एक बार वो गरीब है वो पैसे बना लेगा, पर जो दुखी है ना ससुरा वो दुखी रहेगा। वो कुछ नहीं कर सकता। तो ये जो दोनों का कॉम्बिनेशन है ना गरीब और दुखी, ये डेडली कॉम्बिनेशन है। ये ऐसी तैसी कर देता है। ठीक है? तो ये बात कही किसने है? ये बात कही किसने है? सभी लोग बताएंगे भाई जल्दी। एडम स्मिथ ने कही है ना? एडम स्मिथ ने कही है। किसने कही है? एडम स्मिथ ने। और एडम स्मिथ कौन है? फादर ऑफ़ फादर ऑफ़ इकोनॉमिक्स या मॉडर्न इकोनॉमिक्स है ना? फादर ऑफ इकोनॉमिक्स या मॉडर्न इकोनॉमिक्स या फिर फादर ऑफ कैपिटलिज्म यानी पूंजीवाद का जनक। और पूंजीवाद मतलब जब सारे मींस ऑफ प्रोडक्शन उत्पादन के साधनों पर प्राइवेट इंडिविजुअल्स का अधिकार हो। ठीक है? प्राइवेट इंडिविजुअल्स का अधिकार हो और भाई साहब प्रॉफिट कमा रहे हैं दबा के। सरकार के पास कुछ नहीं है। बस जो कुछ 8-10 लोग हैं वही ऐसी तैसी कर रहे हैं पूरी उद्योग सेक्टर की। ठीक है भाई?
चलो बाकी ये देखो अमर्त्य सेन तो तुम सब जानते हो यार अमर्त्य सेन तो बार-बार बताने की जरूरत भी नहीं है। अमर्त्य सेन तुम जानते हो 1998 में नोबेल प्राइज मिला इकोनॉमिक्स में, वेलफेयर इकोनॉमिक्स में और भारतीय अर्थशास्त्री रहे। पर यार ये जगदीश भगवती और जियान ब्रेस, ठीक है जियान ब्रेस और जगदीश भगवती ये कौन है? इन्होंने क्या किया है? इनके बारे में थोड़ा सा जानते हैं। ये इंपॉर्टेंट है अपने लिए। है ना भाई? बिल्कुल। तो ये देखो ये जगदीश भगवती ये तो अपने इंडियन अर्थशास्त्री हैं। है ना भाई? इंडियन इकोनॉमिस्ट हैं। अब देखो भैया अब प्रॉपर मैराथन चालू हो गई है। अभी तक तो रिवीज़ सा चल रहा था एक तरीके से। जो नए जुड़े हैं उनका तो खैर समझ में आ गया होगा। इंडियन इकोनॉमिस्ट इंडियन इकोनॉमिस्ट पर इन्होंने क्या किया है? इन्होंने स्टडी की है जबरदस्त तरीके से इंटरनेशनल ट्रेड पर। इंटरनेशनल ट्रेड पर। किस पे बच्चों? इंटरनेशनल ट्रेड पर इन्होंने रिसर्च की है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर रिसर्च की इन्होंने। काफी जबरदस्त। अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर रिसर्च की इन्होंने। अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अनुसंधान किया। रिसर्च की है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर रिसर्च की है। अनुसंधान किया। अभी क्लियर बाकी फिर ये जियान ड्रीज़ कौन है सर? ये कौन है बेटा? यह बेल्जियम का बेल्जियम है ना यूरोप में बेल्जियम देश है तो बेल्जियम का अर्थशास्त्री है। बेल्जियम का अर्थशास्त्री है और देखो जहां पर मुझे लगेगा ना कि चारों ऑप्शन एक्सप्लेन करने की जरूरत है मैं खुद कर दूंगा जहां मुझे मालूम है कि यहां करने का कोई मतलब नहीं है यहां से सवाल नहीं बनेगा तो मैं नहीं करूंगा तो चिंता मत करना तुम। ठीक है तो बेल्जियम का अर्थशास्त्री जियान रेस इसने क्या किया भाई कोई जानता है क्या इसने क्या किया बताओ भाई इसने दो चीजों पे काम किया। बिल्कुल देखो दो चीजों पर काम किया। एक तो इसने पॉवर्टी रिड्यूस कैसे की जा सकती है? है ना? गरीबी को कम कैसे किया जा सकता है? गरीबी को पॉवर्टी को कम कैसे किया जा सकता है? इस पर स्टडी की। है ना भाई? पॉवर्टी कम कैसे की जा सकती है? दूसरा जेंडर इनकलिटी इस पर इसने काम किया। भाई जेंडर इनकलिटी को सुधारने पर। यानी लिंग के आधार पर भेदभाव। है ना भाई? पुरुष की तुलना में महिला के एफर्ट्स को कमतर आंकना जेंडर इनकलिटी है। है ना भाई? हम बोल दें अरे जैसे मान लो हमारी कोई बहन है या हमारी पार्टनर है या या जो है हमारी माता है वो बोले कि भाई हमें तो घर में नहीं रहना। हमें तो काम करना है। बाहर जॉब-वॉप करनी है, नौकरी करनी है, सरकारी नौकरी करनी है, प्राइवेट नौकरी करनी है। और कोई हमारे घर में ऐसा है। होता ही है जो थोड़ा सा पिछड़ी सोच का है या ऑर्थोडॉक्स मेंटालिटी का है। क्या काम करना है? घर की महिलाएं कहीं नहीं जाएंगी। घर की महिलाएं चूल्हा चौका करने के लिए बनी है। काम कीजिए घर पे आराम से। बेटा तेरे को जितना पढ़ना है पढ़ ले। 21 साल के बाद तेरी शादी कर दूंगा। समझ में आ रही है मेरी बात? ऐसे लोग भी हैं। तो यहां पे यहां पर सीधी बात ये है कि जेंडर इनकिटी पर इन्होंने काम किया है। ठीक है? जेंडर इनकलिटी को कैसे कम किया जा सकता है? उस पे काम किया है इन्होंने। तो यहां याद रखना भाई पुरुष और महिला को बराबर समझा है। जहां जरूरत है उन्हें समझने की बराबर। ठीक है? ऑब्वियस सी बात है वो बराबर नहीं होते। पर वो कुछ ही चीजें जहां पर बराबर नहीं होते बाकी ऐसी चीजों में जहां पैसा कमाना है करना है तो वहां तो सब बराबर से ही हो जाते हैं। ठीक है? तो भैया ये हमें पता चल गया। बाकी आंसर तो हमारा एडम स्मिथ है।
चलो नेक्स्ट। द डिफरेंस बिटवीन वॉलंटरी पेमेंट एंड रियल प्राइस पेमेंट फॉर एनी गुड्स बाय कंज्यूमर्स कॉल्ड उपभोक्ताओं द्वारा किसी भी वस्तु के लिए स्वैक्षिक भुगतान और वास्तविक मूल्य भुगतान के बीच के अंतर को क्या कहते हैं? कोई अगर मुझे बता दे तो मजा आ जाएगा। वरना मैं समझाऊंगा तुम्हें मजा आ जाएगा समझ के। बताओ भाई जल्दी से। सभी लोग क्लियर नहीं दिख रहा। क्या बात कर रहे हो? अरे बृजमोहन परमार तू साला सब जगह जाके यही पूछता है। रिकॉर्डेड क्लास है क्या ये? ससुरा चटका दूंगा तेरे को मैं। रिकॉर्डेड क्लास। मैं जब तुमसे बात कर रहा हूं। दिख नहीं रहा है कि रिकॉर्डेड है कि क्या है? ऐसी बातें करते हो यार। चलो भाई जवाब दो तुम लोग। हां। तो डिफरेंस बिटवीन वॉलंटरी पेमेंट एंड रियल प्राइस पेमेंट उपभोक्ताओं द्वारा किसी भी वस्तु के लिए स्वैक्षिक भुगतान और वास्तविक मूल्य भुगतान के बीच के अंतर को क्या कहते हैं? सभी लोग बताएंगे। चलो। हां शाबाश शाबाश बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया कुछ तो कुछ तो भेड़चाल में चले गए कुछ तो भेड़चाल में चले गए मैं बताता हूं मैं बताता हूं ठीक है ठीक है देखो अब ध्यान से देखो मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं सभी लोग ध्यान से देखो देखो यह है कंज्यूमर सरप्लस। उपभोक्ता अधिशेष। इसे क्या बोलते हैं? कंज्यूमर सरप्लस। अब यह क्या होता है? अभी बताता हूं। यह क्या होता है? मैं अभी बताता हूं और सिंपलीफाई कर देता हूं। अभी समझ में आ जाएगा। पहली बात तो इस कांसेप्ट को ये जो कंज्यूमर सरप्लस का कांसेप्ट है, ये उपभोक्ता अधिशेष का जो कांसेप्ट है, इस कांसेप्ट को इस कांसेप्ट को किसने दिया है? कोई जानता है? बताओ। किसने दिया है? तुम कहां जानते होगे? जूल्स डपोइट जूल्स डुपोइट किसने दिया भाई ये कांसेप्ट सभी लोग बताएंगे जूल्स हां डपोइट बिल्कुल ये बंदा 1804 से लेके 1866 तक जीवित था। इस बंदे ने ये थ्योरी दी। इस बंदे ने ये कांसेप्ट दिया कंज्यूमर सरप्लस। इसने क्या बोला इसने ये बोला देखो इसका मतलब क्या है यहां पे वॉल वॉलंटरी पेमेंट का मतलब है वॉलंटरी पेमेंट का मतलब है यहां पे स्वैक्षिक भुगतान का मतलब है जैसे मान लो मैं मार्केट गया। मैं मार्केट गया। मैं जाके वहां पर एक रिस्ट वॉच देख रहा हूं कि यार ये वाली तो बढ़िया लग रही है। अच्छा उस पे प्राइस टैग नहीं है। उस पे प्राइस टैग नहीं है। और अगर है तो मेरा ध्यान नहीं गया। तो मैं सोच रहा हूं यार इस घड़ी के तो यार इतनी बढ़िया घड़ी है। इसके तो मैं सोच रहा हूं कि 30,000 तो मैं दे दूंगा। ₹30,000 तक तो मैं दे दूंगा इस घड़ी का। बाकी इसकी कीमत क्या है वो तो पूछने पे पता चलेगा दुकानदार से। पर मुझे ऐसी घड़ी जो है मस्त लग रही है यार। ₹30,000 तो मैं दे दूंगा इस घड़ी के। मैंने सोच लिया। ठीक है? अब मैंने ये सोच लिया कि मैं कितने दे दूंगा? ₹30,000। ये मेरी वॉलंटरी पेमेंट है। ये मेरी क्या है? वॉलंटरी पेमेंट। मैंने एक प्रोडक्ट देखा और मुझे लगा कि यार इसकी इतनी कीमत होगी और मैं इतना पे कर सकता हूं। अगर ये ₹30,000 बोलेगा तो ₹30,000 पे करने में मुझे दिक्कत नहीं है। बहुत बढ़िया प्रोडक्ट है। जब मैंने उससे पूछा कि भैया इसकी कीमत क्या है इस घड़ी की? वो बोल रहा है कि सर यह ₹18,000 की है। भाई साहब मजा आ गया मेरे को सुनते ही। मेरे को सुनते ही मजा आ गया। मैं तो कितना तैयार था देने को? ₹30,000 ये क्या बोल रहा है? ये बोल रहा है सर कीमत तो वैसे 28,000 है पर डिस्काउंट वगैरह करके अभी ऑफर-वफर चल रहा है तो आपको 18,000 की पड़ेगी। मतलब मुझे पे कितना करना है? वास्तविक वास्तविक मूल्य भुगतान कितना है मेरा? 18,000 भाई स्वैक्षिक भुगतान मेरा 30,000 ठीक है जो मैं कर रहा था मैं बावला आदमी मैं क्या बोल रहा था ₹30,000 भी दे मांगेगा तो दे दूंगा इसको क्योंकि घड़ी इतनी बढ़िया है। ठीक है और ये क्या बोल रहा है सर आपको 18,000 पे करना है। भाई मेरा जो संतुष्टि का लेवल है मेरा जो सुकून वाला लेवल है वो एकदम से बढ़ गया। मजा आ गया एकदम डोपामाइन रिलीज़ हो गया भाई मेरा। ठीक है अब ध्यान से देखो यहां पर यहां पर मेरे कितने बच गए 12,000 बच गए वो 12,000 को मैं क्या बोलूंगा उपभोक्ता अधिशेष। क्या बोलूंगा? उपभोक्ता अधिशेष। समझ में आया ये सरप्लस क्लियर है भाई बिल्कुल क्यूट क्रेजी दोनों दोनों लैंग्वेज में आएगा। समझ में आया सब लोगों को? हां तो अब मुझे बताओ अब मुझे बताओ यार ये क्लियर क्लियर है कि नहीं कांसेप्ट कंज्यूमर सरप्लस क्या होता है कि जितना आप पे करने का चाह रहे हो कि यार मैं इतना तो पे कर दूंगा और फिर जितना आप पे कर रहे हो उसमें जो डिफरेंस है वो क्या है 12,000 का डिफरेंस आ गया यार मेरे मजे हो गए तो ये क्या है मेरे लिए? ये मेरा कंज्यूमर सरप्लस है। ठीक है चलो बेटा क्लास चलेगी क्लास चलेगी 11:30 तक तो चलेगी 11:30 तक चलेगी क्लास। ठीक है चलो बहुत बढ़िया ठीक है हां हां चलो बहुत बढ़िया।
आगे बढ़ते हैं नेक्स्ट। मार्केट वेयर लेस नंबर ऑफ कंपनीज़ एकिस्टेड एंड टुगेदर कंट्रोल द मेजॉरिटीज कॉल्ड। भाई देखो अब एक सवाल आया मार्केट से। मार्केट से एक सवाल आया और बहुत बढ़िया सवाल है। ठीक है? सभी लोग ध्यान से देखेंगे। वह बाजार जहां कम संख्या में कंपनियां होती हैं और मिलकर बहुमत को नियंत्रित करती हैं। ठीक है? बहुमत का मतलब यहां पे क्या है? मैं आपको बताता हूं। सब कुछ कंट्रोल करती है। बहुमत का मतलब है यहां पर सब कुछ। ठीक है? यह ट्रांसलेशन इन्होंने पॉलिटी वाला कर दिया है। ठीक है? जहां वह बाजार जहां कम संख्या में कंपनियां होती है और मिलकर पूरे बाजार को नियंत्रित करती हैं। ठीक है? पूरे मिलकर मिलकर बाजार को नियंत्रित करती हैं। ठीक है? वह बाजार जहां कम संख्या में कंपनियां होती हैं और मिलकर बाजार को नियंत्रित करती है उसे क्या कहते हैं? कोई जानता है क्या भाई? सभी लोग बताएंगे जल्दी। अरे ऐसे मत बोलो। बफरिंग वफरिंग कुछ नहीं हो रही है। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। तो जो तुम बोल रहे हो उसको समझना भी पड़ेगा बढ़िया से। ठीक है? ये समझा देता हूं यार। ये समझाना जरूरी है। ये समझाए बिना मन नहीं मानेगा। है ना? यह समझाए बिना मन नहीं मानेगा यार। ठीक है? मैं एक बार बता देता हूं। है ना? बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल देखो ध्यान से देखो देखो भाई मैं यहां पर तुम्हें थोड़ा सा समझाता हूं मार्केट क्या होता है पहले तो मार्केट क्या होता है वो समझ लो। मार्केट क्या है भाई? मार्केट का मतलब क्या हुआ? मार्केट का मतलब हुआ मार्केट का मतलब हुआ ऐसी जगह एक ऐसी जगह जहां पे बहुत सारे सेलर्स यानी बहुत सारे विक्रेता और बहुत सारे खरीदार ठीक है बहुत सारे बयरर्स एक ऐसा क्षेत्र, एक ऐसी जगह जहां पर बहुत सारे सेलर्स यानी विक्रेता जहां पर बहुत सारे बयरर्स एक दूसरे के कांटेक्ट में है वस्तुओं के वस्तुओं की बिक्री को और खरीद को प्रभावित करने के लिए। सही बात है भाई। मार्केट तो एक ऐसी जगह है जहां पे विक्रेता भी है, सामान को बेचने वाला भी है और खरीदार भी है। और दोनों वहां पर इसलिए हैं दोनों वहां पर इसलिए कांटेक्ट में है। आपस में इंटरेक्ट कर रहे हैं आपस में ताकि खरीददार तो सामान खरीद सके। तो उससे जो खरीद है वो अफेक्ट होगी और जो विक्रेता है वो सामान को बेच सके तो उससे उसकी सेल अफेक्ट होगी। सही बात है? तो भैया एक ऐसी जगह जहां पर बहुत सारे विक्रेता हैं, बहुत सारे खरीदार हैं और वो वस्तुओं की खरीद और बिक्री को प्रभावित करने के लिए वहां पर आपस में इंटरेक्ट कर रहे हैं। सही बात है। चलो ठीक है। मार्केट ये है। अच्छा मार्केट होता है बेटा दो तरह का। मार्केट जो है दो दो तरह का होता है। ध्यान से देखो। मार्केट जनरली दो तरह का होता है। बाजार जनरली दो तरह का होता है। सभी लोग ध्यान से देखेंगे। एक होता है परफेक्ट कंपटीशन। एक होता है परफेक्ट कंपटीशन। ठीक है? कैसा मार्केट होता है बेटा? परफेक्ट कंपटीशन। ठीक है? पूर्ण प्रतियोगिता। पूर्ण प्रतियोगिता। ठीक है? पूर्ण प्रतियोगिता बाजार। पूर्ण प्रतियोगिता बाजार। परफेक्ट कंपटीशन मार्केट। ठीक है? और एक होता है इंपपरफेक्ट इंपरफेक्ट कंपटीशन। ठीक है भाई? अपूर्ण प्रतियोगिता बाजार। अपूर्ण प्रतियोगिता बाजार। अब सभी लोग ध्यान से देखना बेटा। बस यही एक टॉपिक है। यही एक क्वेश्चन है जो थोड़ा सा टाइम लेता है। यही एक क्वेश्चन है जो थोड़ा टाइम लेता है। इसलिए अब मैं इसको पहले ही समझा देना चाहता हूं ताकि आगे तो फिर हम तेजी से बढ़ेंगे। आगे दिक्कत नहीं आएगी तुम्हें। बस ये टॉपिक में थोड़ा टाइम लगेगा। ठीक है? ध्यान से देखो क्योंकि अच्छा टॉपिक है। इंपॉर्टेंट टॉपिक है। जरूरी है। देखो, अपूर्ण प्रतियोगिता में तीन तरह के मार्केट्स होते हैं। अपूर्ण प्रतियोगिता में यानी इनपरफेक्ट कंपटीशन में तीन तरह के मार्केट होते हैं। यानी एक तो परफेक्ट कंपटीशन तो अलग हो गया। फिर एक होता है इमपरफेक्ट कंपटीशन मार्केट जिसके तीन पार्ट होते हैं। तीन पार्ट होते हैं। कौन-कौन से? एक होता है मोनोपोली। मोनोपोली। मोनोपोली मार्केट यानी एकाधिकार मार्केट। एकाधिकार मार्केट। ठीक है? एकाधिकार मार्केट। एक होता है मोनोपोलिस्टिक। मोनोपोलिस्टिक। मोनोपोलिस्टिक। जिस तरह के बाजारों में हम जाते हैं ना, जिस तरह के बाजारों से हम लोग सामान खरीदते हैं, वो मोनोपोलिस्टिक होता है। उसे हम क्या बोलते हैं? उसे हम बोलते हैं एकाधिकार। एकाधिकारवादी। एकाधिकारवादी। ठीक है? एक और नाम है वो मुझे याद नहीं आ रहा इसका। उसके बाद तीसरा होता है दोस्तों ओलिगोपॉली। ठीक है? क्या होता है? ओलिगोपॉली। अल्प अधिकार। ओलिगोपॉली। ठीक है? ओलिगोपॉली। पहले एक बार ये टॉपिक समझ लो। ठीक है? और उसके बाद तुम क्वेश्चन अटेम्प्ट करना। तुम्हें मजा आ जाएगा। तुम्हें लगेगा यार कॉन्सेप्ट क्लियर हो गया। अब चाहे साला कैसा भी क्वेश्चन आ जाए तुम कर जाओगे। अब मैं ये चार मार्केट है। परफेक्ट कंपटीशन और इंपपरफेक्ट में ये तीन। मैं चारों को फटाफट से बता देता हूं। ठीक है? ये खाली स्लाइड है अपने पास। हमें क्या करना है? हमें पांच चीजों के पांच या छह चीजों के आधार पर चारों मार्केट को समझ लेना है। ठीक है? देखो ध्यान से। क्योंकि अभी एक अभी तो सवाल एक से आया है। कल को दूसरे सवाल सवाल सवाल आ जाएगा। फिर क्या करोगे? यह थोड़ी हो सकता है कि जो हमने पढ़ा है वही आ जाए। आ सकता है। पर चांसेस थोड़ी इतने हैं। तो हम चारों पढ़ के जाएंगे। देखो। तो चारों में डिफरेंस देखेंगे। पहले मैं यहां पे लिख लेता हूं कि किसके आधार पर डिफरेंस होगा। एक तो नंबर ऑफ सेलर्स। जब भी आपको मार्केट पढ़ना है हमेशा आपको देखना है नंबर ऑफ सेलर्स कितने हैं? ज्यादा है कम है। नंबर ऑफ सेलर्स। दूसरा आपको देखना है जिस मार्केट में आप जा रहे हो वहां पर प्रोडक्ट्स का जो सामान रखा है, जो सामान रखा है वहां पे, तो नेचर ऑफ़ प्रोडक्ट कैसा है? ठीक है? यानी प्रोडक्ट कैसा है? एक जैसा सामान है, अलग-अलग सामान है, मिलताजुलता सामान है, कैसा सामान है, वह देखना है हमें। नेचर ऑफ प्रोडक्ट। फिर हमें देखना है, फिर हमें देखना है दोस्तों, फिर हमें देखना है नेचर ऑफ़ प्रोडक्ट के बाद कि भाई फ्री एंट्री और एग्जिट है उस मार्केट में कि नहीं है? फ्री एंट्री और एग्जिट। फ्री एंट्री और एग्जिट है कि नहीं? फ्री एंट्री और एग्जिट है कि नहीं? फ्री एंट्री। फ्री एंट्री और एग्जिट है कि नहीं? फ्री एंट्री और एग्जिट है कि नहीं? मतलब फ्री एंट्री एग्जिट का मतलब यह नहीं कि मार्केट में कभी भी मैं चला गया 2:00 बजे 4:00 बजे और उसके बाद कभी भी आ गया। ये एंट्री एग्जिट नहीं। आप एज अ सेलर वहां पे जाके दुकान खोल सकते हो। आप जब चाहो वहां से अपनी दुकान हटा सकते हो। आपका मन किया इस मार्केट में दुकान खोलूंगा मैं। आपने दो चार महीने परचूने की दुकान लगाई। आपको लगा साला धंधा बन नहीं रहा इधर से। दुकान बंद की दुकान बेची किसी को निकल गए। तो ये है फ्री एंट्री। फ्री एग्जिट। मतलब आपसे आपसे किसी को कोई मतलब नहीं ना कोई फॉर्मेलिटी करनी है। आपने दुकान खरीदी खरीदी। आपने दुकान चलाई चलाई। नहीं चली आप दुकान बंद करके चले गए। फ्री एंट्री एग्जिट है। ठीक है? तो मतलब कोई भी आ सकता है उस बाजार में। कोई भी आ सकता है कभी भी कोई भी जा सकता है कभी भी। तो फ्री एंट्री एग्जिट। समझ में आया तुम लोगों को? इतना क्लियर है? बिल्कुल। उसके बाद देखना है हमें प्राइस। यानी उस मार्केट में जो सामान है उसका प्राइस कैसा है? प्राइस फिक्स है या फ्लक्चुएट हो रहा है? है कैसा है? कम ज्यादा कर सकते हैं कि नहीं? उसके बाद सेलिंग कॉस्ट। उस मार्केट में जो सामान रखा हुआ है, जो भी सामान है, वस्तुएं हैं, क्या उनको बेचने के ऊपर कीमत लग रही है क्या? क्या उनको बेचने के लिए भी कीमत लग रही है? सेलिंग कॉस्ट लग रही है क्या? सेलिंग कॉस्ट लग रही है क्या? ठीक है? और उसके बाद उसके बाद अ कितने पॉइंट हो गए? 1 2 3 4 5 हां, ठीक है? पांच पॉइंट्स में हमें कवर करना है। पांच पॉइंट्स में कवर करना है हमें। ठीक है? पांच पॉइंट्स को कवर करना है। वैसे तो छह पॉइंट्स हैं। मैं छठवां लिखवा देता हूं। जो उतना इंपॉर्टेंट नहीं है पर ठीक है। चलो लिख देते हैं। नॉलेज ऑफ़ मार्केट यानी उस मार्केट की आपको नॉलेज है कि नहीं? जिस मार्केट में आप जा रहे हो क्या उस पूरे मार्केट की आपको नॉलेज है कि कहां पर क्या बिकता है, कितने में बिकता है। ठीक है? वो सारी चीजें। चलो भाई, अब मैं लिख लेता हूं यहां पे एक तरफ लिख लेते हैं परफेक्ट कंपटीशन। ठीक है? परफेक्ट कंपटीशन। यह एक अपने पास मार्केट है। परफेक्ट कंपटीशन एक फिर अपने पास आ जाता है मोनोपोली। मोनोपोली फिर आ जाता है अपने पास जो अपने बाजार होते हैं जिसमें हम लोग जाते हैं तो मोनोपोलिस्टिक मोनोपोलिस्टिक मोनोपोलिस्टिक और फिर ओलिगोपॉली। ओलिगोपॉली। और हिंदी में नहीं लिख रहा हूं मैं। आपको मालूम है उधर क्या है? पूर्ण प्रतियोगिता ये मोनोपोली एकाधिकार ये एकाधिकारवादी और वो अल्पाधिकार ठीक है देखो बेटा सभी लोग ध्यान से आगे बढ़े आगे बढ़े ना समझ में आ रहा है चलो बहुत बढ़िया सभी लोग सेशन को लाइक कर देना शेयर कर देना बेटा चलो देखो भाई ध्यान से देखो सभी लोग भाई एंड तक टिके रहना है तुम लोगों को हां जो जो सीरियस है वो तो टिका रहेगा बाकी बाकी तो देखो लपड़ झंडेस भी बहुत सारे होंगे। अब बस तुम्हें साबित करना है कि तुम लपड़ झंडेस नहीं हो। देखो इधर पे परफेक्ट कंपटीशन। परफेक्ट कंपटीशन का मतलब है कि एकदम पूर्ण प्रतियोगिता। बिल्कुल बराबरी की प्रतियोगिता। बिल्कुल बिल्कुल परफेक्ट कंपटीशन। भाई परफेक्ट कंपटीशन का मतलब देखो क्या होता है। परफेक्ट कंपटीशन हो। जैसे तुम लोग सोचते हो। एग्जाम में भी सोचते हो तुम लोग कि यार कंपटीशन होना चाहिए। फेयर होना चाहिए। परफेक्ट कंपटीशन होना चाहिए। एक ही दिन पेपर हो। एक ही पेपर हो सबका। ठीक है? एक ही पेपर हो सबका कोई रिजर्वेशन ना हो और फिर वो है परफेक्ट कंपटीशन मतलब एक पेपर एक ही तारीख में ठीक है और कोई रिजर्वेशन नहीं सब जनरल कैटेगरी में ये है भाई परफेक्ट कंपटीशन ये है परफेक्ट कंपटीशन ठीक है हम जैसे मान लो ऐसे चलते हैं समझ रहे हो भाई मान लिया हमने ये परफेक्ट कंपटीशन होता है तो यहां पर भी देखो परफेक्ट कंपटीशन का मतलब है कि सब कुछ एकदम ऐसा होना चाहिए परफेक्ट अब जैसे मुझे एक बात बताओ तुम बाजार के बारे में तुम जो सोचते हो कि यार बाजार ये चीज बाजार जो तुम सोचते हो बाजार मार्केट जो तुम सोचते हो या जिस बाजार में तुम जाते हो ठीक है तो मुझे एक बात बताओ परफेक्ट कंपटीशन यानी परफेक्ट बाजार क्या होगा परफेक्ट बाजार क्या होगा नंबर ऑफ सेलर्स वहां पे क्या होंगे ज्यादा होंगे भाई बाजार सोच के ऐसा लगता है ना यार बहुत सारे सेलर्स हैं बहुत सारी दुकानें हैं तो नंबर ऑफ सेलर्स कैसे होने चाहिए दोस्तों नंबर ऑफ सेलर्स होने चाहिए ज्यादा ज्यादा होने चाहिए लार्ज होने चाहिए नंबर ऑफ़ सेलर्स लार्ज होना चाहिए ठीक है लार्ज नंबर ऑफ़ सेलर्स ज्यादा होने चाहिए तभी लगेगा बाहर जा रहा है अब यार तुम एक बात बताओ। तीन दुकानें खुली हुई हैं। तीन दुकानदार है। तुम उसको ये बोलोगे अरे यार बाजार हो के आते हैं। अरे भाई वो तीन दुकानें हैं। बाजार नहीं है वो। बाजार तब है जब 50 100 70 80 दुकानें हैं। ठीक है? और सब लोग जो है सामान बेच रहे हैं। आवाें आ रही हैं। ठीक है भाई देखो तो ये है परफेक्ट कंपटीशन। यानी जहां पे नंबर ऑफ सेलर्स ज्यादा हो, विक्रेता ज्यादा हो। अच्छा मुझे एक बात बताओ परफेक्ट कंपटीशन तो मैं तब कहूंगा इस मार्केट को जब सभी के सभी भाई परफेक्ट कंपटीशन तो तब है मार्केट में जब सभी के सभी सेम प्रोडक्ट बेच रहे होंगे। होमोजनियस होमोजनियस प्रोडक्ट बेच रहे होंगे। होमोजेनियस मतलब सेम सेम प्रोडक्ट बेच रहे होंगे। प्रोडक्ट कैसा होना चाहिए? सेम। भाई कंपटीशन तो तभी है ना। अब मान लो मैं मैं जो है मैं जो है किताबें बेच रहा हूं। मेरे बगल वाला कपड़े बेच रहा है। उसके
बगल वाला सब्जी बेच रहा है। ठीक है? उसके बगल वाला जो है आइसक्रीम बेच रहा है। तो अब तुम सोचो क्या सब पे बराबर भीड़ रहेगी? समझ रहे हो? मान लो मैं पेन बेच रहा हूं। मैं पेन बेच रहा हूं। मेरे बगल वाला कुछ और बेच रहा है। सब पे अलग-अलग क्राउड रहेगा ना। मैं ऐसे थोड़ी एक्सपेक्ट कर सकता हूं कि यार आइसक्रीम वाले पे देखो कितनी भीड़ है। और साला मैं पेन बेच रहा हूं। मेरे पास कोई भीड़ ही नहीं है। कपड़े वाला सोच रहा है भाई मेरे पास तो एक भी बंदा नहीं है। तेरे पास तो एक दो तो है। तो ऐसे थोड़ी होता है। ऐसे नहीं होता भाई परफेक्ट कंपटीशन तब है जब मैं पेन बेच रहा हूं और मेरे बगल में जो 10 दुकानदार हैं वो भी सेम पेन बेच रहे हैं। कंपटीशन तो ये है। जब 10 के 10 सेम चीज बेच रहे हैं। अब तुम बेच के दिखाओ अपना सामान। परफेक्ट कंपटीशन तो ये है। सेम चीज सेम प्राइस पर बेच के दिखाओ। दिस इज़ परफेक्ट कंपटीशन।
तो भाई होमोजनियस यानी सेम प्रोडक्ट। होमोजेनियस मतलब सेम प्रोडक्ट। मतलब परफेक्ट कंपटीशन मार्केट में तो सारे के सारे प्रोडक्ट पूरे मार्केट में मान लो 60 दुकानें हैं। 60 हो गई 60 दुकान। ये पेन बेच रहे हैं। अब बेच के दिखाओ ये है साला परफेक्ट कंपटीशन। तो ठीक है? तो होमोजेनियस या सेम प्रोडक्ट। उसके बाद ऐसे मार्केट में फ्री एंट्री फ्री एग्जिट। भाई परफेक्ट कंपटीशन क्या है? कोई भी कभी भी आए दुकान खोले, चलाए, नहीं चले निकल जाए। परफेक्ट कंपटीशन मार्केट यही है भाई। परफेक्ट होना चाहिए। मतलब कोई भी आ सकता है, कोई भी जा सकता है कभी भी। तो मतलब फ्री एंट्री एग्जिट बिल्कुल यस ये होना चाहिए। तभी परफेक्ट कंपटीशन है।
प्राइस भाई जब सेम चीज बेच रहे हैं, 60 दुकानदार हैं। 60 दुकानदार हैं। सेम पेन बेच रहे हैं तो प्राइस तो अलग कर ही नहीं सकते ना भाई। जो प्राइस अलग करेगा देखो जो प्राइस अलग करेगा फिर वहां परफेक्ट कंपटीशन रहेगा ही नहीं। भाई मान लो मैं इसको 50 का बेच रहा हूं। मेरे बगल वाला 30 का बेच रहा है। ऑब्वियस सी बात है बंदे वहीं जाएंगे। तो परफेक्ट कंपटीशन क्या हुआ? परफेक्ट कंपटीशन तो यह है कि 50 में मैं बेच रहा हूं। 50 में तू बेच रहा है। दो बंदे सामने से आ रहे हैं। अब वो मेरे से लेके जाए पेन या तेरे से लेके जाए। यहां होगा कंपटीशन परफेक्ट। ठीक है? क्योंकि सेम प्राइस सेम प्रोडक्ट। तो अब तुम देखो तो प्राइस कैसा होना चाहिए? प्राइस जो है प्राइस कैसा होना चाहिए? बताओ। सभी लोग बताएंगे। प्राइस कैसा होना चाहिए? यूनिफॉर्म। सेम सेम प्राइस। यूनिफॉर्म प्राइस। सेम प्राइस। ठीक है? प्राइस सेम होना चाहिए। सभी का प्राइस उस मार्केट में सभी दुकानदारों का सेम होना चाहिए।
सेलिंग कॉस्ट और मुझे एक बात बताओ जब पूरे मार्केट में साला 60 दुकानों में 60 दुकानों में जब यही एक यही एक पेन बिक रहा है तो क्या सेलिंग कॉस्ट यानी इसको बेचने के ऊपर लागत आनी चाहिए? क्या मैं भाई 60 दुकानें हैं। 60 दुकानों पे 60ों बंदे ये पेन बेच रहे हैं। सेम सेम प्राइस पे। क्या हमें ऐड करने की जरूरत है इस पेन का कि 10 10 जो है वो अपने कस्टमर्स आए और मैं जाकर वहां पर जाकर बता रहा हूं मेरे से पेन लीजिए मेरे से। देखिए ये पेन देखो ये काला कलर का है। ये इधर से थोड़ा मोटा है। इधर से थोड़ा पतला है। इस पे लिखा हुआ है सर मैक्स लिखा हुआ है सर। ये देखिए बहुत शाइन कर रहा है। इससे इससे आप लिख भी सकते हैं। इससे अपने कान भी खुजा सकते हैं। भाई ये तो फिर तो सेलिंग कॉस्ट हो जाएगी। यह सारी चीजें अगर मान लो मैं ऐड के द्वारा बताऊं तो सेलिंग कॉस्ट लगेगी यार। ऐड बनवाने का तो पैसा लगेगा। पर जब 60 दुकानों में सेम चीज बेच रहे हैं लोग। भाई ऐड करने की जरूरत नहीं है। जो बंदा यहां पे आ रहा है इस मार्केट में उसे मालूम है कि तुम साला बेच क्या रहे हो? सेम पेन बेच रहे हो। सेम प्राइस में बेच रहे हो। तो ऐड करने की जरूरत नहीं है। जब सेम ही चीज है तो। वो तो जब अलग-अलग चीजें होती हैं, अलग-अलग खास बातें होती है। उन खास बातों को बताने के लिए ऐड करने की जरूरत है। सेलिंग कॉस्ट। बेचने की लागत लगाने की जरूरत है। समझ में आ रही है मेरी बात? हां। तो सेलिंग कॉस्ट तो भाई यहां पे बिल्कुल है ही नहीं। सेलिंग कॉस्ट तो यहां पे बिल्कुल मान लो जीरो है। हां। नो सेलिंग कॉस्ट। नो सेलिंग कॉस्ट। ठीक है भाई? नो सेलिंग कॉस्ट।
नॉलेज ऑफ़ मार्केट। अब मुझे एक बात बताओ। 60 बंदे इसी तरह के पेन को यही पेन को सेम पेन को बेच रहे हैं। सेम प्राइस पे। क्या तुम्हें उस मार्केट की पूरी नॉलेज है? पूरी नॉलेज है भाई। हमें मालूम है कि भाई ये पेन जो है यहां से थोड़ा सा अलग इसका टेक्सचर है। ये अलग टेक्सचर है। ये निब थोड़ी अलग टेक्सचर की है। यहां से इसकी थिकनेस मोटी है। यहां पे थिकनेस कम है। सब कुछ मालूम है। ठीक है? 60 दुकानदार हैं। 60 दुकानदार जो हैं उस इस प्राइस पर ये बेच रहे हैं। सब कुछ तो नॉलेज हमें इस मार्केट की। परफेक्ट कंपटीशन मार्केट में नॉलेज ऑफ़ मार्केट होती है। ठीक है? फुल नॉलेज होती है। कैसी नॉलेज होती है दोस्तों? बिल्कुल परफेक्ट नॉलेज होती है।
अब मुझे एक बात बताओ। कभी तुम लोगों ने ऐसा मार्केट देखा है क्या? सब लोग कमेंट सेक्शन में बताएंगे। मैं कमेंट सेक्शन पे ध्यान दे रहा हूं। सभी लोग बताएंगे। बताओ कभी ऐसा मार्केट देखा है जहां पे एक ही जैसी चीजें बिक रही हो। एक ही प्राइस पर बिक रही हो। कोई ऐड नहीं कर रहा है। कोई खास बात नहीं बता रहा। कोई चिल्ला नहीं रहा है। तुम्हें पूरे मार्केट की नॉलेज है। कभी ऐसा मार्केट देखा है तुमने? जिंदगी में देखा है कभी? यस और नो में जवाब दो बस। यस और नो में जवाब दो बेटा सभी लोग बस। बताओ यस और नो में जवाब दोगे यार। देखो आपस में बातचीत मत करो। इससे अच्छा तो तुम क्लास लीव कर दो। मैराथन खराब मत करो। ठीक है? इससे अच्छा तो तुम क्लास लीव कर दो। बिल्कुल। ऐसा मार्केट होता ही नहीं है। परफेक्ट कंपटीशन नाम का कोई मार्केट एग्ज़िस्ट ही नहीं करता है इस धरती पर। ठीक है? पर अगर कभी होगा तो ऐसा होगा।
अब जो रियल में एक्सिस्ट करते हैं वो ये तीन हैं। रियल में जो एक्सिस्ट करते हैं वो ये तीन है। अब देखते हैं मोनोपोली, मोनोपोलिस्टिक और ओलगोपोली फटाफट से समझ लेते हैं। ठीक है भाई? चलो अब देखो भैया आगे बढ़े। हां। चलो भैया। अब देखो। अब मोनोपोली का मतलब होता है एकाधिकार। एकाधिकार मतलब एक छत्र अधिकार। मोनोपोली का मतलब मतलब क्या होता है? मोनोपोली बाजार क्या होता है? एकाधिकार बाजार क्या होता है? कि नंबर ऑफ सेलर्स अब भाई एक छत्र अधिकार एक छत्र अधिकार में नंबर ऑफ सेलर तो ज्यादा नहीं हो सकते। एक ही होगा। सिंगल सेलर होगा भाई। सिंगल सेलर यानी उस प्रोडक्ट का वो अकेला सेलर होगा। उसके अलावा उसे पूरे दुनिया में या ये कहो कि उस पूरे इलाके में कोई नहीं बेच रहा। अब मैं एग्जांपल देता हूं आपको। रेलवे रेलवे भारत सरकार का प्रोडक्ट है। तो सिंगल सेलर कौन है? भारत सरकार है। ठीक है? रेलवे का सिंगल सेलर कौन भैया? भारत सरकार। मुझे एक बात बताओ प्रोडक्ट कैसा है? क्या उस प्रोडक्ट के जैसा? रेलवे का प्रोडक्ट है रेल। ट्रेंस। क्या रेलवे के अलावा? क्या रेलवे के अलावा कोई और ये सुविधा दे रहा है? मिनिस्ट्री ऑफ रेलवे के अलावा या इंडियन रेलवेेज के अलावा क्या आपको कोई और दूसरी पैरेलल रेल सेवा मिल रही है भारत में? तुम बोलोगे मेट्रो तो बेटा मेट्रो जो है वो एक पर्टिकुलर सिटी में होता है। साला तुम दिल्ली मेट्रो से तुम बंगाल जा सकते हो क्या? या मुंबई मेट्रो से तुम बेंगलुरु जा सकते हो क्या? मेट्रो मत बोल देना। मेट्रो पर्टिकुलर सिटी के अंदर है। रेल की बात कर रहा हूं मैं। ट्रेन की बात कर रहा हूं जो स्टेट्स को जोड़ रही है। तो रेलवे जो है रेलवे जैसी सुविधा तो और भारत में कोई है ही नहीं। और रेलवे की सुविधा या रेलवे जो प्रोडक्ट है वह भारत सरकार बना रही है। तो सिंगल सेलर है भारत सरकार रेलवे प्रोडक्ट की। ठीक है? अच्छा रेलवे के जैसा कोई दूसरा प्रोडक्ट ही नहीं है। नो क्लोज सब्सीट्यूट रेलवे का कोई रिप्लेसमेंट ही नहीं है। रेलवे का कोई दूसरा जो है अल्टरनेटिव ही नहीं है। मतलब तुम्हें लग रहा है आज रेलवे यार इंडियन रेलवे में जाने का मन नहीं है। आज ऐसा करते हैं। इंडियन रेलवे में नहीं जाऊंगा। आज जाऊंगा मैं किसी दूसरी जो रेलवे चल रही है भारत में वो। अभी दूसरी चल ही नहीं रही। साला जाएगा किस में? ठीक है? तो इंडियन रेलवे के अलावा दूसरा कोई अल्टरनेटिव भी नहीं है आपके पास। भाई अगर आपको ट्रेन के थ्रू जाना है तो इंडियन रेलवे की ट्रेन के थ्रू ही जाना पड़ेगा। भारत में वही चल रही है। ठीक है? तो भाई नो क्लोज सब्स्टट्यूट मतलब नो क्लोज सब्स्टट्यूट मतलब कोई दूसरा प्रोडक्ट आसपास तक नहीं है इस प्रोडक्ट के। नो क्लोज सब्स्टट्यूट। ठीक है? यहां तो सेम प्रोडक्ट था। यहां पे तो प्रोडक्ट ही नहीं है वैसा कोई दूसरा। ठीक है? कि आपको लगे कि भाई रेल से काम नहीं चला। चलो दूसरे किसी प्रोडक्ट से चला लेंगे वैसे ही सिमिलर से। तो सिमिलर प्रोडक्ट है ही नहीं।
अच्छा ऐसे मार्केट में क्या कोई भी आके अपनी दुकान खोल सकता है? क्या कोई भी रेलवे के बिज़नेस में घुस सकता है? क्या बताना जरा? क्या कोई भी रेलवे के बिज़नेस में घुस सकता है? क्या भारत सरकार किसी को भी इनवाइट कर देगी? हां चलो ठीक है। तुम भी रेलवे चला लो। तुम भी रेलवे चला लो। ऐसा तो नहीं है। सिर्फ भारत सरकार ही चला रही है रेलवे। तो मतलब यहां पे फ्री एंट्री एग्जिट नहीं है। रिस्ट्रिक्टेड है। प्रतिबंधित है। रिस्ट्रिक्टेड है। प्रतिबंधित है। रिस्ट्रिक्टेड एंट्री एग्जिट है। ना आओगे ना जाओगे। ठीक है? जब आओगे ही नहीं तो जाओगे कैसे? प्राइस भाई प्राइस तो फिर यार अकेला। अब तुम सोचो। तुम सोचो पूरे पूरे YouTube पर मान लो कोई एक ही टीचर है। पूरे YouTube पर मान लो कोई एक ही टीचर है जो सारे सब्जेक्ट पढ़ा रहा है। सभी एग्जाम्स के लिए कोई और दूसरा टीचर है ही नहीं। तो भाई जब वह पूरा अकेला बंदा है तो वह प्राइस तो फिर अपने कोर्स का कुछ भी रखेगा भाई वो प्राइस अपने कोर्स का कुछ भी रखेगा और जो भी लोग हैं जो उससे तैयारी कर रहे होंगे उस वो उस प्राइस पे भले ही वो रख दे 10,000 जिसको कोचिंग करनी हो 10,000 भी देगा क्योंकि उसे पता है कि यही कोचिंग करवा रहा है और तो पूरे इलाके में कोई है ही नहीं है। पूरे डी YouTube पे कोई है ही नहीं। तो प्राइस तो फिर वो बंदा ही तय करेगा। तो यानी यहां पर रेलवे रेलवे जो है रेलवे जो है भारत सरकार के अंडर है। तो भाई रेलवे का जो प्राइस है टिकट का तुम किसी और से तुलना कर सकते हो। रेलवे की जो प्राइसिंग है रेलवे का जो टिकट है उसकी तुलना किसी और से कर सकते हो। कोई दूसरी रेलवे तो है ही नहीं कि तुम्हें बोल दे तुम्हें लगे अरे यार ये भारतीय रेलवे जो है ये तो महंगी है यार। भारतीय रेलवे तो महंगी है। अरे किससे कंपेयर करोगे भाई तुम? किससे कंपेयर करोगे? कोई कंपेयर करने को है ही नहीं। तो याद रखो याद रखो यहां पर यहां पर प्राइस का फ्लक्चुएशन प्राइस का फ्लक्चुएशन बहुत ज्यादा होगा। ठीक है? तो यहां पे प्राइस डिस्क्रिमिनेशन हो जाता है। ठीक है? प्राइस जो है प्राइस डिस्क्रिमिनेट होता है। प्राइस डिस्क्रिमिनेशन यानी कभी बढ़ेगा कभी घटेगा। अब मान लो मान लो मुझे 300 कि.मी. ट्रेवल करना है रेल से। 300 300 कि.मी. मुझे ट्रेवल करना है रेल से और एसी टिकट एसी एसी कोच का टिकट है मेरा ₹500 का। अब मैं कैसे बताऊं कि यार ये महंगा है कि सस्ता है? क्योंकि कंपेयर करने के लिए मेरे पास कोई इंडियन रेलवे का कोई अल्टरनेटिव ही नहीं है। अब अगर रेलवे उस उस एसी कोच का मुझसे अगर 2000 भी लेगा तो मैं क्या सोचूंगा यार 2000 मतलब एसी वाले का है साला रेट तो बढ़ेगा ही यार। रेट तो ज्यादा ही होगा। अब कोई दूसरी रेलवे सर्विस चल रही होती तो मैं कंपेयर कर लेता यार उधर कितना है? अरे यार ये तो ज्यादा ले रहे हैं यार। समझ रहे हो? ऐसे सोच सकता हूं मैं अगर दूसरा है मेरे पास कोई अल्टरनेटिव तो पर जब रेलवे ही है अपनी जैसी सुविधा देने वाली तो तुम कंपेयर किससे करोगे? तो प्राइस तो फिर वो कितनी भी रखे 2000 भी रखेगी तो भी अगर तुम्हें इसी से जाना है तो तुम उसी से जाओगे 2000 खर्च करके। ठीक है? समझ में आ रही है मेरी बात? तो प्राइस डिस्क्रिमेशन तो होता है यार। प्राइस तो भाई ऊपर नीचे सब जो है अपने हिसाब से होता है। फिर आप कुछ नहीं कर सकते इसमें।
उसके बाद सेलिंग कॉस्ट। मुझे एक बात बताओ जब पूरे देश में एक ही प्रोडक्ट है इंडियन रेलवेेज। क्या कभी तुमने इंडियन रेलवेेज का ऐड देखा है? क्या? कोई ऐड देखा है? कोई सेलिंग कॉस्ट खर्च होती है उनकी? भाई अपने प्रोडक्ट को भारत सरकार अपने इंडियन रेलवेेज को प्रोडक्ट को प्रमोट करने के लिए कभी ऐसे बोलती है? ये देखिए। ये है भारत की ट्रेन। आप अब जा सकते हैं अहमद अहमदाबाद से भोपाल के लिए मात्र 2 घंटे में। अब आप जा सकते हैं भोपाल से लखनऊ मात्र 1 घंटे में। ये है भारतीय रेल। आप एक बार इसे ट्राई तो कीजिए। ये ट्रेन है। यहां से सुपरफास्ट ट्रेन है। एक बार ट्राई तो कीजिए। आपकी जिंदगी बदल। अबे ऐसा कोई ऐड देखा है तुमने? जब साला प्रोडक्ट ही एक है और पता है कि दुनिया सबको यही इस्तेमाल करना है। सब यहीं आएंगे। तो ऐड करने की जरूरत ही क्या है? जिसके पास कस्टमर खुद ही आ रहा है उसे ऐड करने की जरूरत ही नहीं है। तो सेलिंग कॉस्ट तो है ही नहीं। पर हां एक चीज है यार यहां पे। एक चीज है यहां पर इंफॉर्मेटिव इनफेटिव सेलिंग कॉस्ट है। अब तुम बोलोगे सर सेलिंग कॉस्ट तो नहीं है पर ये इनफेटिव सेलिंग कॉस्ट क्या होती है? अगर रेलवे को अपनी कोई सुविधा बतानी हो तो भाई वो फिर ऐड दे सकता है रेलवे उस पे थोड़ा खर्चा हो जाता है। जैसे मान लो रेलवे ने बोला कि भाई रेलवे ने बोला कि हमने रेलवे के हमने रेलवे में ये सुविधा दी है। हमने ट्रेन में ये सुविधा दी है कि ठीक है कि जैसे मान लो अब जैसे आप सब जानते हो अगर आप थोड़ा ढंग की ट्रेन में ट्रेवल करते हो तो आपको हर सीट पे वो अ चार्जिंग प्लग मिलता है। चार्जिंग चार्जिंग सॉकेट मिलता है। मोबाइल को, लैपटॉप को चार्ज करने के लिए सॉकेट मिलता है पर्सनल। फिर वो आपको फिर थोड़ा एक लैंप भी मिलता है। अगर आप रात को पढ़ रहे हो, कुछ मोबाइल वगैरह यूज़ कर रहे हो तो आपको लाइट भी मिलती है वहीं पर। ठीक है? आपकी पर्सनल लाइट है उस पर्टिकुलर सीट की। तो अगर रेलवे बताना चाहेगी देखो हमने इन ट्रेंस में इस तरह की सुविधा कर दी। अब आपके लिए थोड़ा सा आसान रहेगी चीजें। तो जब वो कोई इंफॉर्मेशन देना चाह रही है रेलवे जब कोई इंफॉर्मेशन देना चाह रही है तो उस पर थोड़ा सा इंफॉर्मेशन पे थोड़ी सी सेलिंग कॉस्ट आएगी। वो इंफॉर्मेशन दिलवाने की जो कॉस्ट है उसे हम बोल सकते हैं कि यार हां थोड़ी इंफॉर्मेटिव सेलिंग कॉस्ट तो आई है। अदरवाइज रेलवे को अपने प्रोडक्ट का प्रमोशन करने की जरूरत नहीं है। बस अपने कोई अगर वो नई चीज इंट्रोड्यूस कर रहा है रेलवे तो वो उसके बारे में बता सकता है। तो इनेटिव सेलिंग कॉस्ट। ठीक है? तो इनफॉर्म करने के लिए सेलिंग कॉस्ट जो है यहां पे हो सकती है।
चलो मोनोपोलिस्टिक अच्छा ये एक और चीज एक और चीज मोनोपोली में मोनोपोली में दोस्तों नॉलेज ऑफ मार्केट नॉलेज ऑफ मार्केट भाई क्या रेलवे के बारे में तुम सब कुछ जानते हो क्या? क्या भारत सरकार के बारे में सब कुछ जानते हो क्या? तुम्हें तुम्हें क्या इस मोनोपोली मार्केट की क्या इंडियन रेलवेेज की पूरी जानकारी है? नहीं है। तो भैया नो परफेक्ट नॉलेज। नो परफेक्ट नॉलेज। ठीक है? नो परफेक्ट नॉलेज। अब हम आ जाते हैं। अब हम आ जाते हैं अपने बाजार पर। जिन बाजारों में हम जाते हैं। जिन बाजारों में हम जाते हैं। सभी लोग देखो ध्यान से। हां। अभी समझ में आ जाएगा मस्त। ये तो क्यों इसके साथ तो तुम रिलेट कर जाओगे अच्छे से। क्योंकि इन्हीं बाजारों में हम जाते हैं और इन्हीं के फीचर्स तुम्हें मालूम है। इन्हीं की विशेषता तुम्हें मालूम है। है ना भाई? शुरू करें? हां। चलो बढ़िया देखो इधर पे भाई जिन बाजारों में हम जाते हैं जिन मार्केट्स में हम जाते हैं वहां पे नंबर ऑफ सेलर्स ज्यादा तो होते हैं। है ना यार? कई सारे दुकानें होती हैं जिन बाजारों में हम जाते हैं। तो नंबर ऑफ सेलर्स जो हैं लार्ज है। चलो यह तो मान लिया। सामान कैसा है? प्रोडक्ट कैसा है? प्रोडक्ट कैसा है? क्या सभी दुकानों में सेम सामान मिल रहा है? सर सेम तो नहीं मिल रहा। मतलब सर सेम भी मिल रहा है थोड़ा-थोड़ा। मतलब जैसे मान लीजिए सर वो जो अपना आलमंड का जो ऑइल है, हेयर ऑइल है वो सर वो उस दुकान पे भी है। वो उस दुकान पे भी है। है सर कुछ-कुछ चीजें सेम है सर कुछ-कुछ नहीं है। तो मतलब हमें यह पता चला यह हमें पता चला कि क्लोजली रिलेटेड चीजें हैं। आपस में रिलेटेड चीजें हैं। क्लोजली रिलेटेड है। जैसे मान लो एक दुकानदार है वो पेप्सुडेंट बेच रहा है। एक दुकानदार है पेप्सूडेंट बेच रहा है। वो भी दांत के मंजन के लिए ही है। ठीक है? वो भी दांत मांझने के लिए है। एक जो है वो कोलगेट बेच रहा है। एक पेप्सूडेंट बेच रहा है। एक कोलगेट बेच रहा है। ठीक है? एक जो है वो रामदेव जी का जो है दंतकांत बेच रहा है। ठीक है? तो चीज तो एक ही है दांत मांझने की पर थोड़ी अलग भी है। ब्रांड अलग है। है ना? ब्रांड अलग है। चीज तो एक ही है पर ब्रांड अलग है। यानी क्लोजली रिलेटेड तो है पर थोड़ी सी डिफरेंट भी है। लिटिल डिफरेंट भी है। तो क्लोजली रिलेटेड बट लिटिल डिफरेंट। ठीक है? लिटिल डिफरेंट। थोड़ा सा फर्क भी है। यानी ब्रांड के ब्रांड की फर्क है ना भाई? ब्रांडिंग की फर्क है। समझ में आ रही है बात? हेयर ऑयल इसने इस दुकानदार ने भी रखा है। हेयर ऑइल इसने भी रखा है। हेयर ऑइल इसने भी रखा है। इसने कुछ और अलग ब्रांड्स रखे हैं। इसने कुछ और अलग ब्रांड्स रखे हैं। इसने कुछ और अलग ब्रांड्स रखे हैं। चीज वही है अलग कहां यूज़ होगी? अपने हेयर में यूज़ होगी। समझ में आ रही है मेरी बात? तो लार्ज भाई जिन बाजारों में हम जाते हैं तो लार्ज नंबर ऑफ सेलर्स तो हैं और सामान जो है वहां पर आपस में रिलेटेड तो है। आपस में रिलेटेड तो है पर थोड़ा डिफरेंट भी है क्योंकि ब्रांड अलग है। ठीक है?
अच्छा इन बाजारों में फ्री एंट्री एग्जिट होती है क्या? जिन बाजारों में तुम जाते हो क्या तुम भी दुकान खोल सकते हो और धंधा नहीं चला तो कभी भी निकल सकते हो। बिल्कुल सही बात है। ठीक है? तो यहां पे तो यहां पर तो यस। फ्री एंट्री एग्जिट। फ्री एंट्री एग्जिट। तो फ्री एंट्री एग्जिट तो है। यस। ठीक है। उसके बाद इन बाजारों में इन बाजार जिस बाजार में हम लोग जाते हैं क्या वहां पर प्राइस सेम रहता है या प्राइस बहुत ज्यादा फ्लक्चुएट करता है? नहीं यार ऐसा तो नहीं है। प्राइस प्राइस जो है यहां पे पार्शियली पार्शियल फ्लक्चुएशन है। प्राइस में पार्शियल मतलब थोड़ा बहुत थोड़ा बहुत फ्लक्चुएशन है। है ना? पार्शियल कंट्रोल है। बिल्कुल पार्शियल कंट्रोल है। यानी मुझे एक बात बताओ। जैसे मान लो मान लो यहां पे क्या होता है? हमारे वाले बाजारों में थोड़ा क्या करते हैं? दुकानदार जो है अपने सामान को बेचने के चक्कर में ₹2 चार कम ज्यादा कर देते हैं। जैसे मान लो तुम गए तुम जो है एक दुकान पे गए कि भैया वो आलमंड का हेयर ऑइल देना। आलमंड का हेयर ऑइल दे दो। वो बोल रहा है भैया ₹270 का है। बोला यार थोड़ा कम कर लो इसे। 250 दे दो। 250 में दे दो मतलब। वो बोला नहीं भैया 250 में तो नहीं हो पाएगा। आप ₹5 कम दे दो। 265 का दे दो। 265 दे दो। मैं आपको यह ऑइल दे दूंगा। तुम्हें लग रहा है अरे यार बोला ठीक है मैं एक बार दूसरी जगह ट्राई करके आता हूं। तुम दूसरी जगह पे गए वहां पे बोल रहे हैं भैया वो आलमंड का वो हेयर ऑइल कितने का है? बोला भैया 250 का। तुम्हें लगा अरे साला वो 265 मांग रहा है। फाइनली डिस्काउंट करके। ये 250 में दे रहा है। बोला ये ले भाई 250 मेरे को तेल दे दे। समझ में आ रही है मेरी बात? तो मतलब एक दुकानदार कम करके बेच रहा है। एक जो है थोड़ा कम करके बेच रहा है। तो जहां तुम्हें लगेगा कि भाई जहां पे थोड़ा ज्यादा फायदा है तुम वहां से जाके खरीद लोगे। यानी एक बात बताओ क्या प्राइस फिक्स है? नहीं। प्राइस को कंट्रोल कर रहे हैं दुकानदार। अगर उन्हें लग रहा है कि यार इतने में बेच सकते हैं तो बेच दिया। नहीं बेच सकते तो नहीं बेच रहे। तो प्राइस तो कंट्रोल यहां पे पूरी तरीके से नहीं हल्का-फुल्का कंट्रोल है प्राइस के ऊपर। यानी अच्छा एमआरपी से ज्यादा बेच नहीं सकते। ठीक है? जो एमआरपी है मैक्सिमम रिटेल प्राइस है उससे ज्यादा बेच नहीं सकते। उससे 2 4 ₹10 ₹15 कमी पे ही बेच सकते हैं। अब मान लो एक दुकानदार एमआरपी से बेच रहा है ₹5 कम में। एक दुकानदार एमआरपी से ₹10 कम में बेच रहा है तो इसके पास जाएंगे बंदे। ₹10 जिससे कम जो ₹10 कम बेच रहा है। एमआरपी से ₹10 में कम बेच रहा है। इसके पास जाएंगे लोग। इसके पास जाएंगे नहीं तो ₹5 कम पे बेच रहा है। वो ₹10 कम पे बेच रहा है। समझ रहे हो? तो आप जो है प्राइस को कंट्रोल कर सकते। ऊपर नहीं बढ़ा सकते। एमआरपी से ऊपर नहीं बढ़ा सकते। एमआरपी के नीचे कितना भी फ्लक्चुएट कर लो। ठीक है? ना आपका नुकसान हो और ना कस्टमर का। तो प्राइस कंट्रोल थोड़ा बहुत है। अच्छा सेलिंग कॉस्ट भाई सेलिंग
कॉस्ट तो बहुत हाई है क्योंकि सबके पास अपनी-अपनी ब्रांडिंग है। सबके पास अपनी-अपनी ब्रांडिंग है। हाई हाई सेलिंग कॉस्ट है भाई। हाई सेलिंग कॉस्ट। अब मुझे एक बात बताओ। तुम आलमंड हेयर ऑयल जो है उसका ऐड देखोगे। clinic प्लस का देखोगे। क्लीन एंड क्लियर का देखोगे। समझ रहे हो भाई? अलग-अलग कोकोनट ऑयल है। ठीक है? कोकोनट ऑयल है। हर हेयर ऑयल का तुम ऐड देख रहे हो टीवी में। क्यों? क्योंकि चीज तो लगभग सेम ही है पर ब्रांडिंग अलग है। सब चाहते हैं कि उनका ब्रांड का सामान ज्यादा बिके। तो वो टीवी में ऐड दे रहे हैं आपको प्रभावित करने के लिए कि देखो अलग-अलग बढ़िया-बढ़िया सोच-समझ के ऐड दे रहे हैं वो लोग। समझ रहे हो मेरी बात? तो हाई सेलिंग कॉस्ट है भाई।
जब जब सामान क्लोजली रिलेटेड है यानी पेप्सोडेंट है और कोलगेट है। ठीक है? क्लोजली रिलेटेड है तो हाई सेलिंग कॉस्ट होगी क्योंकि अब यहां पे असली खेल शुरू होगा कि उस बंदे को कंविंस करना है कि तू Colgate ले या पेप्सिडेंट ले। जैसे जैसे जैसे तुम लोगों ने ट्राई मारा होगा रजनीगंधा। ठीक है? फिर ये अपना अजय देवगन आता है। है ना भाई? ऐसे-ऐसे करता है। विमल समझ रहे हो मेरी बात? यह सारी घटिया चीजें मतलब एक बंदा रजनीगंधा पान मसाला का ऐड कर रहा है। एक जो है यह ठीक है यह कर रहे हैं अपना विमल का। समझ रहे हो मेरी बात? अब जो जिसका ज्यादा ऐड बढ़िया होगा जिसका ऐड ज्यादा बढ़िया होगा उसकी बिक्री होगी। ठीक है? दोनों है तो वो तंबाकू, पान मसाला, गुटखा, वटका ये दोनों चीज़ पर जो बढ़िया ऐड कर जाएगा उसका सामान बिक जाएगा। जैसे अक्षय कुमार करता है उड़ता उड़ता आता है। कोल्ड ड्रिंक की बोतल निकाली और पी गया। कट कट कट कट उछल कूद करके आया। सलमान खान आया, बाइक से आया और एकदम जैकेट-वैकेट पहन के आया और वो मुंह से ही उसको खोल दिया ढक्कन को और उसके बाद कोल्ड ड्रिंक पी रहा है। तो जिसका ज्यादा ऐड तगड़ा होगा उसका सामान बिकेगा। समझ में आ रही है मेरी बात? तो मतलब क्लोजली रिलेटेड जो चीजें हैं, क्लोजली रिलेटेड जो चीजें हैं वो ऐड से ही बिकेंगी। भाई मतलब आपको कुछ खास बताना पड़ेगा ना कि भाई हम इस प्रोडक्ट से बेहतर क्यों हैं? ठीक है?
चलो तो हाई सेलिंग कॉस्ट और बाकी जिस बाजार में तुम जाते हो जिस बाजार में हम लोग जाते हैं क्या हमें पूरी मार्केट की नॉलेज है उसकी एक-एक चीज की नॉलेज है उस मार्केट की? नहीं है। नो परफेक्ट नॉलेज तो बस बेटा ये खत्म होने वाला है एक लास्ट देख लो नो परफेक्ट नॉलेज पूरा टॉपिक ही हो गया अब इस टॉपिक से कोई भी सवाल आएगा तुम कर जाओगे आराम से। ओलिगोपॉली ओलिगोपॉली ओलिगोपॉली अब देखो ओलिगोपॉली में क्या होता है कि बहुत कम सेलर होते हैं ना तो एक एक सेलर होता ना बहुत ज्यादा सेलर होते दो चार पांच सेलर होते हैं बस। ठीक है? इसका मैं आपको परफेक्ट एग्जांपल देता हूं। ऐसा मार्केट जहां पे दो या तीन सेलर हो चार सेलर हो बस वही पूरा मार्केट संभाले हुए हैं। तो जैसे कोल्ड ड्रिंक्स अब तुम ज्यादातर कोल्ड ड्रिंक्स को देखोगे ज्यादातर कोल्ड ड्रिंक्स को देखोगे बेटा सॉफ्ट ड्रिंक्स को देखोगे या तो कोका कोला की है या फिर पेप्सी की है या तो कोका कोला की है या फिर पेप्सी की है ज्यादातर कोल्ड ड्रिंक्स। ठीक ठीक है? मतलब दो ही कंपनी तगड़ी Coca-Cola और पेप्सी। तो मतलब जब ओलिगोपॉली मार्केट होता है ना अल्पविक्रय तो इसमें नंबर ऑफ सेलर्स होते हैं फ्यू। फ्यू सेलर्स होते हैं। कम होते हैं। दो तीन चार।
फिर सर सामान कैसा होता है? सामान बेटा इनके पास है। अब जैसे कोल्ड ड्रिंक है यार। कोका कोला, थम्स अप, पेप्सी। ठीक है? ये तीनों लगभग एक जैसी दिखती हैं। हल्का-हल्का टेस्ट में फर्क है। हल्का-हल्का माइनर सा। मुझे एक बात बताओ। अगर तुम्हें पेप्सी नहीं मिलेगी तो तुम क्या अपना थम्स अप नहीं पी सकते हो? या थम्स अप नहीं मिलेगी तो तुम क्या कोक नहीं पी सकते हो? Coca-Cola नहीं पी सकते हो। समझ रहे हो? या कोका कोला नहीं मिलेगी तुम पेप्सी नहीं पी सकते हो। तुम्हें लगेगा यार लगभग सेम साइज तो है। ठीक है। कोक नहीं है तो चलो ठीक है यार थम्स अप पी लो। थम्स अप नहीं है। चलो ठीक है यार पेप्सी पी लेते हैं। कोई दिक्कत नहीं। क्योंकि ज्यादा फर्क ही नहीं है। तो लगभग लगभग यहां पर प्रोडक्ट जो है वह कैसा होता है? होमोजेनियस यानी सेम होता है। होमोजेनियस विद लिटिल डिफरेंट विद लिटिल डिफरेंस। बिल्कुल हल्का सा डिफरेंस होगा। बिल्कुल हल्का सा डिफरेंस। तो होमोजेनियस ऑलमोस्ट होमोजेनियस विद लिटिल डिफरेंस। ठीक है? ऑलमोस्ट होमोजेनियस। ऑलमोस्ट होमोजेनियस या फिर कह सकते हो होमोजेनियस विद लिटिल डिफरेंस। थोड़ा सा तो डिफरेंट होता है। टेस्ट में हल्का सा डिफरेंस होगा। मैं कोल्ड ड्रिंक की बात कर रहा हूं उसको लेकर। ठीक है?
फिर देखो ऐसे मार्केट में क्या आप फ्री में आ सकते हो? फ्री एंट्री फ्री एग्जिट। कभी भी आके आपने दूध आप भी आए। आपने भी कोल्ड ड्रिंक का एक ब्रांड लॉन्च कर दिया। आप बेच बेचने लगे और उसके बाद नहीं बिका तो वापस चले गए। ऐसा हो सकता है? नहीं। ये जो कोल्ड ड्रिंक वाला मार्केट है मैं आपको तो इसके एग्जांपल से समझा रहा हूं। इसमें आपको देखो केमिकल्स वगैरह का यूज़ करना पड़ता है। ठीक है? जो कोल्ड ड्रिंक वगैरह हम पीते हैं इसमें केमिकल्स वगैरह भी होते हैं। ठीक है? तो बहुत ज्यादा पीना भी सही नहीं है। अब बात ये है कि केमिकल्स का जहां पे यूज़ आ गया तो वहां पे आपको मतलब ये मान के चलो कि पेटेंट पेटेंट वगैरह करवाना। ठीक है? उसके अलावा आपको लाइसेंस प्राप्त करना क्योंकि केमिकल वाली चीज़ हैं। तो लाइसेंस भी सरकार से लेना पड़ेगा कि भाई मैं ये चीज़ बना रहा हूं। ये चीज़ बना रही हूं। कल को ये सामान किसी को नुकसान पहुंचाएगा तो उसके लिए मैं जिम्मेदार हूंगा। ठीक है? तो इस तरह से आपको क्या है? पूरा प्रॉपर लाइसेंस वगैरह चाहिए होता है ऐसी चीजें बेचने के लिए। आपको लगेगा अरे मैं सोच रहा था कोल्ड ड्रिंक का धंधा आसान होता है। जाके बस अपने हिसाब की कोई कोल्ड ड्रिंक बनवा लो और उसको बेचना शुरू कर दूं। मुझे तो लग रहा था ऐसा ये तो साला लाइसेंस, पेटेंट और ये वो फलाना-ढीमका था। बोला यार छोड़ो परचूने की दुकान खोलूंगा साला। ऐ चल भाई मैं 10 बोरी कट्टा लेके आओ। 10 बोरी लेके आटे का कट्टा लेके आ साला। कोई दिक्कत नहीं। ओए तू 5 केजी राशन लेके आना चावल लेके आ वहां से। ओए तू 5 केजी गेहूं लेके आ। ओए तू धनिया पाउडर लेके आ। समझ रहे हो भाई? इसका धंधा खोलेंगे अपन। कोई झंझट ही नहीं है। थोक में लाओ बेच दो। ये कौन घुसेगा कि सेटअप करो फैक्ट्री। फिर वो केमिकल से वो सारा कुछ बनेगा। कोई दिक्कत हो गई। साला अपनी ऐसी तैसी हो जाएगी। छोड़ो झंझट बहुत है। तो क्योंकि लाइसेंसिंग की दिक्कत है। फॉर्मेलिटीज बहुत ज्यादा है। ठीक है? तो इसलिए हर कोई इसमें काम में पचड़े में पड़ता भी नहीं है। इसलिए सेलर्स कम ही रहते हैं। ठीक है? ठीक है? हर कोई फंसता भी नहीं है। तो यहां पे लाइसेंसिंग वगैरह या फॉर्मेलिटीज बहुत है। ठीक है भाई? तो यहां पे यहां पर फ्री एंट्री फ्री एग्जिट है। फ्री एंट्री फ्री एग्जिट नहीं है। थोड़ा सा रिस्ट्रिक्टेड है। आपको लाइसेंस वगैरह ये सब बनवाने में तो टाइम लगेगा। तो रेस्ट्रिक्टेड तो है। ठीक है? रेस्ट्रिक्टेड तो है या हल्का सा ये कह सकते हैं कि थोड़ा सा टाइम टेकिंग प्रोसेस है। टाइम टेकिंग प्रोसेस है। टाइम टेकिंग प्रोसेस है। अगर आपके अंदर पेशेंस है तब तो आप कर सकते हो।
उसके बाद प्राइस का क्या सीन है भाई? अब एक बात बताओ यार पेप्सी, कोका कोला या ड्यू या स्प्राइट। ठीक है? या थम्स अप ये जो 750 ml वाली बोतल आती है सबका प्राइस ₹40 होता है। या जो कैन वगैरह में हम लेते हैं कैन वगैरह जो लेते हैं कोल्ड ड्रिंक्स की उनका भी प्राइस सेम रहता है। तो फिर भाई ये इनका सामान बिक कैसे रहा है? जब इनके प्राइस में ही डिफरेंस नहीं है तो सामान बेच कैसे रहा है ये? इनका सामान फिर कोई ले क्यों? एक 40 में बेच रहा है, दूसरा भी 40 में बेच रहा है, तीसरा भी 40 में बेच रहा। तो फर्क क्या है? फर्क क्या है? तो भाई यहां पे देखो प्राइस प्राइस रिजिडिटी होती है। यहां पे प्राइस रिजिड होता है भाई। प्राइस को लेकर यह कम देखो ओलिगोपॉली मार्केट की सबसे खास बात यह है कि प्राइस ये तीनों चारों कंपनियां दो तीन कंपनी जो भी हैं ये आपस में डिसाइड कर लेती है कि भाई देख प्राइस को लेकर नहीं खेलेंगे यार क्योंकि तू बेच रहा है 40 का मैं कल को 35 का बेचूंगा तो मेरी सेल बढ़ जाएगी फिर तू आ जाएगा 34 पे तेरी सेल बढ़ जाएगी फिर मैं आ जाऊंगा 32 पे मेरी सेल बढ़ जाएगी फिर तू आ जाएगा 30 पे तेरी सेल बढ़ जाएगी। बोला इससे तो फिर हमारे प्रोडक्ट की वैल्यू गिरेगी और हमें मुनाफा कुछ होने वाला नहीं है तो प्राइस पे नहीं खेलेंगे भाई प्राइस सबका सेम रहेगा। तो कंपनीज़ ने डिसाइड कर रखा है कि भाई प्राइस सेम रहेगा। हम कहां खर्चा करेंगे? कहां से हमारा सामान बिकेगा? सेलिंग कॉस्ट से। हम ऐसे तगड़े-तगड़े ऐड करेंगे कि जनता मजबूर हो जाए उन ऐड को देख के। अरे यार मन कर गया यार कोल्ड ड्रिंक पीने का। चलो मंगवाते हैं। समझ रहे हो भाई? तो ह्यूज सेलिंग कॉस्ट भाई। जितना ज्यादा वही मैं बोल रहा था सलमान खान का ऐड हो रहा है। अक्षय कुमार का ऐड हो रहा है। अजय देवगन ऐड कर रहा है। ठीक है? तो ह्यूज सेलिंग कॉस्ट बहुत तगड़ा पैसा लगता है भाई। जब ओलिगोपॉली मार्केट होता है उसमें बहुत तगड़ा पैसा लगता है। ठीक है? खर्चा बहुत तगड़ा आता है क्योंकि प्राइस तो फिक्स है। प्राइस कम करके ज्यादा करके तो आसानी से निकल जाता है सामान। पर प्राइस फिक्स है। चीज भी लगभग सेम सी है। हल्का सा डिफरेंस है। उसमें तो फिर आपको ऐड से ही कमाना है। ऐड पे जितना खर्चा करोगे उतनी सेल बढ़ेगी। ठीक है? और बाकी क्या हमें नॉलेज होती है क्या ये सब? क्या आपको एज अ कस्टमर ओलिगोपॉली मार्केट की या इन कोल्ड ड्रिंक्स वगैरह की क्या पूरी नॉलेज है? नहीं है। नो परफेक्ट नॉलेज। तो भाई यह हो गया।
अब तुम मुझे एक बात बताओ क्वेश्चन क्या था हमारा? अब क्वेश्चन अटेम्प्ट करते हैं। अब क्वेश्चन अटेम्प्ट करो। मार्केट वेयर लेस नंबर ऑफ कंपनीज़ एग्ज़िस्टेड जहां पे कम संख्या में कंपनियां होती है और मिलकर बाजार को नियंत्रित करती हैं। पूरे कोल्ड ड्रिंक बाजार को नियंत्रित किया हुआ है कुछ ही सेलर्स ने। तो भाई ये क्या हुआ? ये हुआ ओलिगोपॉली। ये क्या हुआ? ओलिगोपॉली। चलो भाई, यह अपना खत्म हो गया यहां पर। ठीक है? मार्केट वाला टॉपिक। चलो, नेक्स्ट। एमआरपी मींस ऑन द पैकेज ऑफ एनी गुड्स। एमआरपी का मतलब किसी भी सामान के पैकेज पर होता है क्या? बताओ सभी लोग। एमआरपी का मतलब क्या होता है? फुल फॉर्म बता दो जल्दी से। एमआरपी का फुल फॉर्म क्या है? मार्जिनल रिटेल प्राइस, मोनोपोली रिटेल प्राइस, मैक्सिमम रिटेल प्राइस, मैक्सिमम रिसाइक्ल्ड प्रोडक्ट। सभी लोग बताएंगे जल्दी। एमआरपी बताओ बेटा। सेशन को सभी लोग लाइक कर दो, शेयर कर दो बढ़िया तरीके से। चलो अह करण बेटा पूछ सकते हो पर कमेंट मैं देख नहीं पाऊंगा। थोड़ा बहुत कमेंट देख पा रहा हूं। तो उसमें अभी जो दिख गया तेरा तो पता नहीं कब दिखेगा। ठीक है? एमआरपी का मतलब मैक्सिमम रिटेल प्राइस। तुम सब जानते हो हर चीज का हर प्रोडक्ट का एक मैक्सिमम रिटेल प्राइस होता है। मतलब एक मैक्सिमम प्राइस होता है। दुकानदार उससे ज्यादा कीमत पे आपको सामान बेच ही नहीं सकता। अगर वो ऐसा करता है तो वो पनिशेबल ऑफेंस है। वो क्राइम कर रहा है। फिर उसको सजा मिलेगी। आप कंप्लेंट कर सकते हो। फिर आप कंप्लेंट कर सकते हो। अगर कोई आपको एमआरपी से ज्यादा पे सामान बेच रहा है ना एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस। क्योंकि एमआरपी का मतलब है कि उस प्रोडक्ट को बनने में जहां-जहां जितना खर्चा आया वो सब खर्चा उसमें ऐड करके और पूरा टैक्स वगैरह इंक्लूड करके उस उस प्रोडक्ट में जितना प्रॉफिट कमाया जा सकता है वो प्रॉफिट ऐड करके वो सब ऐड करके आपके पास फाइनल प्राइस आ रहा है। एमआरपी। कोई आपको एमआरपी पे बेचे कोई दिक्कत नहीं पर एमआरपी से ज्यादा अगर कोई दे रहा है ससुरे को वहीं निपटा दो, मुंडी मरोड़ दो उसकी वहीं पे। बोला पढ़ा है तूने इकोनॉमिक्स कभी? ससुरे दुकानदारी कर रहा है तू एमआरपी से ज्यादा कैसे बेच रहा है? रुक तेरे को बताता हूं तेरी ऐसी की तैसी। ठीक है भाई? तो एमआरपी से ज्यादा कोई बेचे तो समझ जाओ साला मनबुद्धि आदमी है। ठीक है? और उसको डोज चाहिए। उसको टॉनिक चाहिए। ठीक है भाई? बिल्कुल।
चलो बहुत बढ़िया। करण बोल रहा है सर मेरी। अरे यार कैसे बातें कर रहा है? सर मेरी गर्लफ्रेंड कॉल करके परेशान कर रही है। व्हाट कैन आई डू? यह कैसा सवाल है भाई? गर्लफ्रेंड कॉल करके परेशान कर रही है। फिर गर्लफ्रेंड कहां हुई वो? अगर वो परेशान कर रही है तो भाई वो गर्लफ्रेंड नहीं है। वो कोई बला है। दूर रह उससे ब्लॉक कर दे। देखो भाई एमआरपी का मतलब समझ में आ गया? तो अधिकतम खुदरा मूल्य इसमें सारे टैक्सेस हर चरण पे जहां वो प्रोडक्ट बना उस पे जो कॉस्टिंग आई सब लगा दी। प्रॉफिट भी लगा दिया दुकानदार का और उसके बाद उसके बाद जो है सामान का प्राइस निकल के आया ये। ठीक है भाई? बिल्कुल। चलो आगे बढ़ते हैं। व्हिच ऑफ़ द फॉलोविंग इज़ द परफेक्ट एग्जांपल ऑफ़ फ्री मार्केट? अरे सदा जुबान ततला रही है। व्हिच ऑफ़ द फॉलोविंग इज़ द परफेक्ट एग्जांपल ऑफ़ फ्री मार्केट? निम्नलिखित में से कौन मुक्त बाजार का आदर्श उदाहरण है? मुक्त बाजार क्या होता है? फ्री मार्केट क्या होता है? जरा जल्दी से जवाब दो। उसके बाद मैं बताता हूं। आर्यन राज सर सुबह 5 या 6:00 बजे क्लास लिया करो ना सर। बेटा लास्ट मैराथन है आज, इंटरनेट नहीं चल रहा था सुबह। बस खत्म है आज की ये क्लास के बाद। अपने मैराथन जल्दी। बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया शाबाश। फ्री मार्केट ठीक है ठीक है ठीक है ठीक है बहुत बढ़िया। चलो देखो फ्री मार्केट का मतलब क्या होता है मैं बताता हूं देखो तुमने दे दिया जवाब ठीक है। फ्री मार्केट का मतलब देखो क्या होता है ऐसा बाजार ऐसा बाजार जहां पर सामान का जो प्राइस है वो उसकी सप्लाई और डिमांड पर डिपेंड करता है। ठीक है? ऐसा बाजार, ऐसा मार्केट जहां पर सामान का जो प्राइस है, कमोडिटीज का जो प्राइस है, गुड्स का जो प्राइस है, वो डिपेंड करता है सप्लाई और डिमांड पर। मुझे एक बात बताओ, तुम खुद सोचो यार। तुम खुद सोचो कि अगर सप्लाई ज्यादा है किसी प्रोडक्ट की। कोई प्रोडक्ट है जो मार्केट में बहुत ज्यादा आ रहा है। सप्लाई बहुत ज्यादा है। पर उसकी डिमांड नहीं है। मान लो मान लो मान लेते हैं कि उस प्रोडक्ट की सप्लाई तो बहुत ज्यादा है पर उसकी डिमांड जो है उसकी जो डिमांड है इकोनॉमिक्स में डिमांड को ऐसे लिखते हैं। क्वांटिटी डिमांडेड है। पर उसकी डिमांड कम है। अगर सप्लाई ज्यादा है और लोग उसे खरीद नहीं रहे। मार्केट में भर-भर के पड़ा हुआ है वो सामान। पर कोई उसे खरीद नहीं रहा। उसकी डिमांड कम है तो उसका प्राइस ज्यादा होगा कि कम होगा? सभी लोग बताएंगे। भाई सप्लाई भर-भर के आ रही है। खरीद कोई रहा नहीं उसे। डिमांड कम है। तो फिर क्या होगा भाई? अगर सप्लाई ज्यादा है तो दुकानदारों के पास तो एक्स्ट्रा है सामान। कोई खरीद रहा नहीं। तो दुकानदार सोचेगा यार ऐसा करता हूं। मैं साला प्राइस कम करके बेच देता हूं। निकालूं इस इस प्रोडक्ट को निकालता हूं मैं। ये साला मेरे पास पड़ा हुआ है। ठीक है? कोई खरीद ही नहीं रहा। तो अगर सप्लाई बढ़ी हुई है और डिमांड कम है तो प्राइस क्या हो जाएगा दोस्तों? कम हो जाएगा। प्राइस कम हो जाएगा। सप्लाई ज्यादा है। ठीक है? सामान बेचने को बहुत है पर खरीदने वाला कोई नहीं है। तो फिर बेचने वाला क्या करेगा? सोचेगा थोड़ा कम में ही बेच दूं। निकाल दूं बस इस प्रोडक्ट को दुकान से। ठीक है? तो प्राइस कम करके वो निकाल देगा। पर अगर मान लो सप्लाई कम है। सप्लाई कम है और डिमांड बहुत ज्यादा है। सप्लाई कम है और डिमांड बहुत ज्यादा है। सप्लाई कम है और डिमांड बहुत ज्यादा है। तो बेटा ध्यान से सुनो सभी लोग। सप्लाई कम डिमांड बहुत ज्यादा। तो इसका मतलब क्या होगा? सामान पीछे से आ नहीं रहा। और लोग हाहाकार कर रहे हैं कि हमें वो सामान चाहिए। हमें वो सामान चाहिए। लोग कुछ भी कीमत देने को तैयार है। तो ऑटोमेटिकली प्राइस क्या होगा? बढ़ जाएगा। जब सप्लाई पीछे से कम आ रही है और लोग पागल हो रखे हैं उस चीज के पीछे तो प्राइस बढ़ेगा भाई। तो याद रखो जब सप्लाई और डिमांड के आधार पर प्राइस तय हो तो उसे फ्री मार्केट बोल देते हैं। ठीक है? उसे क्या बोल देते हैं? फ्री मार्केट।
चलो व्हिच ऑफ द फॉलोइंग इकोनमिक एक्टिविटीज फॉल्स अंडर द प्राइमरी सेक्टर? निम्नलिखित में से कौन सी आर्थिक गतिविधि प्राथमिक क्षेत्र के अंतर्गत आती है? सभी लोग बताएंगे। बहुत बेसिक क्वेश्चन है। जल्दी बताओ। बताओ जल्दी से। बहुत बढ़िया से पढ़ाई करो बेटा। देखो आज लास्ट मैराथन है। ठीक है? मैच-वैच जो है सब तुम हाईलाइट-वाइलाइट देख लोगे। पर अभी जो पेस बना हुआ है। ठीक है? उस पे फोकस करो। और अगर तुम्हें लग रहा है कि तुम्हें मैच भी देखना है तो फिर मैच ही देखो। एक चीज एंजॉय करो। साला दो नाव पे क्यों तैर रहे हो तुम लोग? बहुत बढ़िया। तुम बोल रहे हो माइनिंग। माइनिंग जो है खनन जो है यानी खदान से मिनरल्स निकालना खनिज निकालना वह प्राइमरी सेक्टर है। भाई मैं सीधे-सीधे तुमको कुछ चीजें बता देना चाहता हूं। देखो प्राइमरी सेक्टर प्राइमरी सेक्टर की आर्थिक गतिविधियां क्या होती हैं? ठीक है? इकोनॉमिक एक्टिविटीज प्राइमरी सेक्टर की प्राथमिक क्षेत्र की जब कोई वस्तु जब कोई वस्तु सीधे तौर पर सीधे तौर पर प्रकृति या प्रकृति या अर्थ यानी पृथ्वी से पृथ्वी से प्राप्त होती है। जब कोई वस्तु सीधे तौर पर प्रकृति या अर्थ यानी पृथ्वी से प्राप्त होती है तो हम कहते हैं कि ये ये प्राइमरी एक्टिविटी का नतीजा है। ये प्रोडक्ट प्राइमरी एक्टिविटी का नतीजा है। ठीक है? जब कोई वस्तु आपको सीधे तौर पर प्रकृति या अर्थ से प्राप्त होती है या कोई आप ऐसा काम कर रहे हो जो सीधे प्रकृति या अर्थ से रिलेटेड है। कोई ऐसी इकोनॉमिक गतिविधि, कोई ऐसी आर्थिक गतिविधि जो सीधे तौर पर प्रकृति या अर्थ से रिलेटेड है तो भैया वो कैसी हो जाएगी? प्राइमरी सेक्टर का गतिविधि हो जाएगी। जैसे मान लो माइनिंग तो चलो एक हो गई। आपने क्या किया? पृथ्वी को खोदा। पृथ्वी के अंदर से खनिज निकाल लिए। मिनरल्स निकाल लिए। ठीक है? प्राइमरी एक्टिविटी है। प्राइमरी अब देखो माइनिंग के अलावा माइनिंग के अलावा जैसे एग्रीकल्चर। माइनिंग के अलावा एग्रीकल्चर यानी कृषि। यह भी क्या है? फिर यह जमीन पर ही तो हो रही है। जमीन पर ही हो रही है। पृथ्वी पर ही हो रही है सीधे। तो ये भी क्या हो गई? ये भी आपकी प्राइमरी सेक्टर हो गई। उसके बाद फिशिंग मत्स्य पालन। फिशिंग मछली पालन। एक तो आप कृषि कर रहे हो। ठीक है? एक यहां पे आप मत्स्य पालन कर रहे हो। मत्स्य पालन कहां कर रहे हो? आपके घर के पीछे तालाब है। अब वो तालाब कहां है? धरती पर है, पृथ्वी पर है। उस तालाब में से आप मछली निकाल रहे हो। प्रकृति से सीधे-सीधे आप रिसोर्स ले रहे हो। ठीक है? मतलब मछली पालन कर रखा है आपने। वहां से मछली ले रहे हो। बास्केट में भरी और मछली मार्केट में जाके बेच के आ गए। तो भाई ये इकोनॉमिक एक्टिविटी हुई जो आपको सीधे प्रकृति से मिल रही है। तो ये भी फिशिंग भी इसी में आ गई। उसके अलावा देखो माइनिंग, एग्रीकल्चर और मत्स्य पालन और क्या हो सकता है? फॉरेस्ट्री। फॉरेस्ट्री मतलब आप जो है एक तरीके से जैसे बागान वगैरह लगा रखे हैं आपने। फॉरेस्ट्री कर रहे हो वन वगैरह लगा रखे हैं फिर उन लकड़ियों को आप उस जंगल की उस लकड़ी को आप बेच रहे हो पैसा कमा रहे हो लाखों रुपए कमा रहे हो तो वो क्या है मतलब जंगल की लकड़ियां काट के बेचकर पैसा कमा रहे हो मतलब क्या है सीधे-सीधे ऐसी एक्टिविटी है जो आपकी प्रकृति पर डिपेंडेंट है अर्थ पर डिपेंडेंट है तो फॉरेस्ट्री यानी वानिकी वाणिकी ये भी कैसे हो गई? ये भी कैसी हो गई बेटा? ये भी प्राथमिक हो गई। समझ में आया कि नहीं? सभी लोग बताएंगे। क्लियर है? बहुत बढ़िया। तो ये एग्जांपल्स हैं। ये एग्जांपल्स हैं प्राथमिक सेक्टर के। बाकी तुम देखो अगर कोई चीज आप बनाते हो। ठीक है? विनिर्माण से संबंधित देखो विनिर्माण से संबंधित मैन्युफैक्चरिंग से रिलेटेड जो भी एक्टिविटी है मैन्युफैक्चरिंग विनिर्माण से संबंधित मैन्युफैक्चरिंग से रिलेटेड प्रोडक्ट विनिर्माण या विनिर्माण या मैन्युफैक्चरिंग से रिलेटेड एक्टिविटी प्रोडक्ट नहीं एक्टिविटी विनिर्माण या मैन्युफैक्चरिंग से रिलेटेड इकोनॉमिक एक्टिविटी। इसे हम क्या बोल देंगे? सेकेंडरी सेक्टर। सेकेंडरी सेक्टर। यानी इसमें आप क्या कर रहे हो? इसमें आप क्या कर रहे हो कि जो जो प्राथमिक सेक्टर से जो आपको रॉ मटेरियल मिला उसको आप फैक्ट्री में ले गए और वहां से आपने कुछ और तैयार किया। जैसे मान लो आपने कृषि की कॉटन की। कपास की खेती की। कपास आपने यहां से लिया। आप अपनी फैक्ट्री में ले गए और वहां पे आपने कपास के कॉटन के कपड़े बना दिए। तो ये तो मैन्युफैक्चरिंग हो गई। ये तो क्या किया आपने? विनिर्माण हो गया। है ना भाई? आपने रॉ मटेरियल यहां से लिया कपास यहां पे आपने उसको कपड़े में कन्वर्ट कर दिया। तो ये जो विनिर्माण वाला क्षेत्र है जो बनाने वाली चीज है। जहां पे आप कोई चीज बना रहे हो। है ना भाई? जहां पे आप कोई चीज बना रहे हो, मैन्युफैक्चर कर रहे हो, प्रोड्यूस कर रहे हो। इसका मतलब ये किस में हो जाएगा? ये द्वितीयक सेक्टर में। ये सेकेंडरी सेक्टर है। विनिर्माण वाली जो एक्टिविटीज हैं ये सेकेंडरी सेक्टर का पार्ट है। सेकेंडरी सेक्टर। प्राइमरी सेक्टर नहीं सेकेंडरी सेक्टर। सेकेंडरी सेक्टर। द्वितीयक क्षेत्र। ठीक है? द्वितीयक क्षेत्र और टर्शरी में क्या होगा? टर्शरी। टर्शरी सेक्टर। टर्शरी सेक्टर दोस्तों टर्शरी सेक्टर में क्या होगा? तृतीयक क्षेत्र में क्या होगा कि आप जो है सेवा दे रहे हो। आप सर्विस प्रोवाइड कर रहे हो। आप सर्विस प्रोवाइड कर रहे हो। तृतीयक क्षेत्र में क्या कर रहे हो आप? सर्विस प्रोवाइड कर रहे हो। सेवा प्रोवाइड कर रहे हो भाई। सर्विस दे रहे हो। सेवा
प्रोवाइड कर रहे हो। सर्विस सेवा सेवा प्रोवाइड कर रहे हो आप। सर्विस दे रहे हो आप। अब जैसे मान लो मैं आपको पढ़ा रहा हूं। मैं आपको पढ़ा रहा हूं ऑनलाइन। आपने आपने आपने क्या किया? आपने यहां पर YouTube चैनल पे आप आए और अब आप यहां पे पढ़ रहे हो। मैं आपको सर्विस दे रहा हूं। मैं आपको एजुकेट कर रहा हूं। मैं आपको सर्विस दे रहा हूं।
कल को कल को मान लो आप अपना कहीं एक जगह से दूसरी जगह जाते हो। आप बस से जाते हो, मेट्रो से जाते हो। वो ट्रांसपोर्टेशन सर्विस है। ठीक है? कल को कल को आप व्यापार कर रहे हो। ठीक है? वो सर्विस है। ठीक है भाई? कल को आप बारबर के पास जा रहे हो कि भाई मेरा हेयर कट कर दे। वो सर्विस है। डॉक्टर के पास जा रहे हो मेरा इलाज करते हो। वो सर्विस है। इंजीनियर को बुलाया आपने कि साहब मेरा फ्रिज का जो डोर है वो नहीं खुल रहा है। आप आ जाओ। ठीक है? देख लो। वो सर्विस है। समझ में आ रही है बात? जब आपकी सेवा की जा रही है। आपको ये सेवा प्रोवाइड की जा रही है। वो टर्शरी सेक्टर में आ जाता है।
अब जैसे ये एजुकेशन है। ये क्या है? ये सर्विस है भाई। टर्शरी सेक्टर का पार्ट है। ये क्या है? सर्विस है। टर्शरी सेक्टर का पार्ट है। बैंकिंग सर्विस है। फाइनेंसियल सर्विज आपको दे रही है। वित्तीय सेवाएं आपको मिल रही हैं। सर्विस है। थर्ड अपना तृतीयक सेक्टर है। मैन्युफैक्चरिंग कुछ बना रहे हो आप तो ये सेकेंडरी सेक्टर है। ये मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है। सेकेंडरी सेक्टर है। समझ में आया बेटा? उम्मीद करता हूं कि आपको समझ में आ गया होगा। आंसर है ए। चलो नेक्स्ट।
देखो भाई, मिश्रित अर्थव्यवस्था के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है? सभी लोग बताएंगे। व्हिच ऑफ़ द फॉलोइंग स्टेटमेंट्स इज़ ट्रू अबाउट द मिक्स्ड इकॉनमी? सभी लोग जवाब देंगे जल्दी से कमेंट सेक्शन में। पूरी नजर है भैया यहां पर। अच्छे से सेशन को अटेंड करो। मजा आ जाएगा लास्ट में। सभी लोग बताएं। सभी लोग बताओ। करण कुमार बिल्कुल है बेटा बिल्कुल सब जगह रोल है इकोनॉमिक्स का अच्छा रोल है ग्रुप डी में सी को लॉक किया है अच्छा चलो ठीक है सी बोल रहे हो तुम लोग
मिश्रित अर्थव्यवस्था वह है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र यानी सरकारी उद्यमों से मिलकर और निजी क्षेत्र यानी निजी उद्यमों से मिलकर एक दूसरे के साथ सहस्तित्व होता है। शाबाश बहुत बढ़िया। मतलब ये है मिक्स्ड इकॉनमी का मतलब ये है मिश्रित अर्थव्यवस्था का मतलब ये है कि भैया सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम यानी सरकारी जो क्षेत्र के सरकारी यानी पब्लिक सेक्टर के जो इंडस्ट्रीज हैं और जो प्राइवेट सेक्टर की जो इंडस्ट्रीज हैं, प्राइवेट सेक्टर की जो इंडस्ट्रीज हैं, वो सब मिलके एक साथ काम करती हैं। सही बात है भाई? देखो ध्यान से। तो मिश्रित अर्थव्यवस्था वह है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम और निजी क्षेत्र के उद्यम एक साथ को एक्जिस्ट करते हैं। ठीक है भाई? यानी भारत तो मिक्स्ड इकॉनमी है। भारत में क्या सारे उद्योगों पर सरकार का कब्जा है? नहीं। क्या सारे उद्योगों पर प्राइवेट लोगों का कब्जा है? नहीं। कुछ कुछ कंपनियां सरकारी है जैसे बीएचएल भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड ऑयल इंडिया लिमिटेड स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड अपना एनटीपीसी अपना उसके अलावा अपना एमटीnl समझ रहे हो वहीं फिर कुछ प्राइवेट भी है टाटा अडानी अंबानी infoss समझ रहे हो भाई तो प्राइवेट भी है और हमारे यहां सरकारी भी है तो हमारे यहां मिक्स्ड इकॉनमी है चलो बहुत बढ़िया नेक्स्ट
व्हिच ऑफ द फॉलोइंग इज एन एग्जांपल ऑफ द टर्शरी सेक्टर ऑफ एंप्लॉयमेंट। अब इनमें से बताओ सेवा क्षेत्र से कौन सा बिलोंग करता है? यहां पे निम्नलिखित में से कौन सा रोजगार के तृतीयक क्षेत्र का उदाहरण है? सर्विस सेक्टर से कौन सा बिलोंग करता है? सभी लोग बताएंगे। सर्विस सेक्टर जल्दी से बताओ। सर्विस सेक्टर से कौन सा है? बताओ बताओ। शाबाश क्या बात है क्या बात है तो सर देखो प्रोडक्शन ऑफ कॉटन क्लॉथ ये तो हो गया सेकेंडरी सेक्टर से द्वितीयक क्षेत्र से है ना भाई सेकेंडरी तो ये तो हो गया द्वितीयक क्षेत्र से है ना मैन्युफैक्चर किया जा रहा है यहां पे तो बनाया जा रहा है फॉरेस्ट्री यह तो भैया प्राथमिक वाली है तो प्राइमरी सेक्टर से है यह प्राइमरी सेक्टर से है उसके बाद टीचिंग यह है भाई सर्विस यह है सर्विस टर्शरी सेक्टर ये है सेवा क्षेत्र सेवा क्षेत्र से यानी कि टर्शरी ठीक है टर्शरी सेक्टर और फार्मिंग यह तो प्राइमरी आ जाएगी खेतीबाड़ी एग्रीकल्चर प्राइमरी समझ में आ गया ना भाई? अब सिंपल लगेगा तुम्हें। हां। चलो। तो हमारे पास हो गया शिक्षण। यह भाई सर्विस सेक्टर है।
इंडियन इकॉनमी ऑन द ईव ऑफ इंडिपेंडेंस वाज़ स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था डैश थी। बताओ। जब हमें आजादी मिली 15 अगस्त 1947 को उस दिन भारत की अर्थव्यवस्था का क्या स्टेटस था? भारत की अर्थव्यवस्था कैसी थी बच्चों? सभी लोग बताएंगे। उस दिन भारत की अर्थव्यवस्था कैसी थी? बताओ सभी लोग बताएंगे दोस्तों सभी लोग बताएंगे भारत की अर्थव्यवस्था कैसी थी करन यहीं से हो जाएगा बेटा कोई बुक रेफर करने की जरूरत नहीं है। ठीक है चलो सी और डी सी और डी बोल रहे हो तुम सी थी भाई सी देखो मैं आपको बता रहा हूं। ध्यान से सुनना मेरी बात। इंडिपेंडेंस हमें मिली 15 अगस्त 1947 को। हम सब जानते हैं। ठीक है? भाई अंग्रेजों ने हमारी बैंड बजा दी थी इकॉनमी की। यहां से ससुर गए हैं ना तो हमें बर्बाद करके गए हैं। बहुत ज्यादा तगड़ा झटका देके गए हमें। मैं देखो नेहरू जी ने जिस तरीके से जिन हालातों में भारत को संभाला। ठीक है? ध्यान से सुनना मेरी बात। सभी प्रधानमंत्रींत्रियों का अपना-अपना रोल रहा है भारत को बनाने में। हम कंपेयर कर ही नहीं सकते किसी को किसी के साथ कि भाई नेहरू जी अच्छे नहीं थे, मोदी जी अच्छे हैं या मोदी जी अच्छे नहीं है अटल बिहारी वाजपेयी जी अच्छे हैं। नहीं मनमोहन सिंह जी ज्यादा अच्छे थे। आप किसी को कंपेयर नहीं कर सकते किसी के साथ। सबने अपने-अपने टाइम पर अपने-अपने हालातों के साथ डील किया। और भाई ये बात सच्चाई है कि नेहरू जी ने नेहरू जी ने देश को उस टाइम पर संभाला जब वाकई देश जो है बहुत ज्यादा पिछड़ा हुआ था। हम लोग अंडर डेवलप्ड थे यार अविकसित थे और साथ ही साथ हमारा विकास जो है रुका पड़ा था। स्टैग्नेंट था, स्थिर था। अविकसित है और अविकसित ही थे। मतलब बढ़ भी नहीं रहे थे। ऊपर नीचे कुछ हो नहीं हिल ही नहीं रहे हम लोग। तो यहां पर यहां पर यहां पर नेहरू जी ने हमारी चीजों को संभाला है। ठीक है? और उसके बाद चीजें धीरे धीरे धीरे-धीरे आगे बढ़ी और फिर धीरे-धीरे सारे हमारे जो प्राइम मिनिस्टर्स हैं वो अपने-अपने कार्यकाल में कुछ ना कुछ वैल्यू ऐड करते चले गए हमारी इकॉनमी में। ठीक है भाई? बिल्कुल बिल्कुल। तो याद रखना भैया अंडर डेवलप्ड थे और स्टिग्नेंट थे। यानी अविकसित तो थे ही और अविकसित से इधर-उधर टस से मस भी नहीं हो रहे हैं। अविकसित ही पड़े हुए हैं। स्थिर हैं। अविकसित में भी। ठीक है? अविकसित में भी स्थिर है। समझ में आया सब लोगों को? क्लियर है? बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। चलो आगे बढ़े। हां।
गुड्स दैट आर ब्रॉट नॉट फॉर मीटिंग द इमीडिएट नीड ऑफ द कंज्यूमर बट फॉर प्रोड्यूसिंग अदर गुड्स आर कॉल्ड। वे वस्तुएं जो उपभोक्ता की तत्काल आवश्यकता को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि अन्य वस्तुओं के उत्पादन के लिए लाई जाती है उन्हें कहा जाता है बताओ गुड्स दैट आर ब्रॉट नॉट फॉर मीटिंग द इंटरमीडिएट नीड ऑफ द कंज्यूमर बट फॉर प्रोड्यूसिंग अदर गुड्स आर कॉल्ड वे वस्तुएं जो उपभोक्ता की तत्काल आवश्यकता को पूरा करने के लिए नहीं है बल्कि अन्य वस्तुओं के उत्पादन के लिए लाई जाती है उन्हें कहा जाता है बताओ सभी लोग बताएंगे बहुत सिंपल है बहुत सिंपल है भाई बहुत सिंपल है बताओ सभी लोग बताएंगे। हां। अच्छा एक बच्चे का सवाल है। एक बच्चे का सवाल है। रुक जाओ। मैं इस सवाल पे आ रहा हूं। इस सवाल पे आ रहा हूं। पहले ये वाला जो सवाल बोला बच्चे ने कि सर कितने परसेंट लोग जो है खेतीबाड़ी वगैरह करते थे उस टाइम पे। है ना? बिल्कुल मैं बता रहा हूं। देखो भारत जो है उस टाइम पे अविकसित था और हमारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था थी। कृषि आधारित एग्रो बेस्ड इकॉनमी थी। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था थी। हमारी जो अर्थव्यवस्था थी वो बहुत ज्यादा डिपेंडेंट थी खेतीबाड़ी पर। तो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था एग्रो बेस्ड इकॉनमी थी हमारी। और ये मान के चलो भाई 75% पॉपुलेशन खेतीबाड़ी में लगी हुई थी उस टाइम पे। सीधे या मतलब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दे वर इनवॉल्वड। 75% पॉपुलेशन वाज़ इन्वॉल्वड इन एग्रीकल्चर और रिलेटेड एक्टिविटीज़। एग्रीकल्चर से रिलेटेड एक्टिविटीज़। ठीक है भाई बिल्कुल तो यह बच्चे ने सवाल अच्छा पूछा तो ठीक है सबको बता दिया मैंने एग्रीकल्चर या उससे रिलेटेड दूसरी एक्टिविटी या उससे रिलेटेड दूसरी एक्टिविटीज से और मतलब थी प्राथमिक सेक्टर की ठीक है और आज के टाइम में आज के टाइम में आज के टाइम में ये मान के चलो कृषि का कृषि का हमारी हमारी जीडीपी में ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट यानी हमारी अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद में क्योंकि देखो हमारी हमारी इकॉनमी को हम जीडीपी में नापते हैं। ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट ये क्या है? आगे पता चल जाएगा। मैं क्वेश्चन लेके आया हूं। तो हमारी जीडीपी का 16% खेतीबाड़ी से आ रहा है। एग्रीकल्चर से आ रहा है। आज के टाइम में 2025 की बात कर रहा हूं मैं। ठीक है? हमारी जीडीपी का 16% एग्रीकल्चर से आ रहा है। 2025 की बात कर रहा हूं। और लगभग आज के टाइम में उस टाइम तो 75% पापुलेशन थी। आज के टाइम में 46% अप्रोक्समेटली अप्रोक्समेटली 46% जो हमारी पापुलेशन है वो खेतीबाड़ी पर डिपेंडेंट है। 46% आज के टाइम में कम हो रखी है। क्योंकि जो इंडस्ट्री वाला सेक्टर है विनिर्माण क्षेत्र और दूसरा सर्विस सेक्टर वो बढ़ गया है। ठीक है? चलो अब इस पे आ जाते हैं। तो मैंने अभी तुम लोगों को बोला कि गुड्स दैट आर ब्रॉट नॉट फॉर मीटिंग द इमीडिएट नीड ऑफ द कंज्यूमर बट फॉर द प्रोड्यूसिंग अदर गुड्स आर कॉल्ड अब एक बात बताओ भाई तुमने जवाब दिया क्या इसका? तुमने जवाब दिया कैपिटल गुड्स बोल रहे हो तुम लोग। हां, ठीक है। कुछ बच्चों का कैपिटल गुड्स जवाब आया। ठीक है। वेरी गुड। वेरी गुड। वेरी गुड। पूंजीगत वस्तु है। अब मैं एग्जांपल देता हूं आपको। मैं एग्जांपल देता हूं। मैं तुम्हें एग्जांपल दे रहा हूं कि भाई मेरी जूता बनाने की फैक्ट्री है। मेरी जूता बनाने की फैक्ट्री है। मेरा एंड प्रोडक्ट है जूता। ठीक है? उस जूते को बेचता हूं मैं। मेरा एंड प्रोडक्ट क्या है? अल्टीमेटली क्या बनना है? जूता बनना है। अब उस जूते को बनाने के लिए मान लो मैं लेके आ रहा हूं मशीन। मैं लेके आ रहा हूं लेदर। मैं लेदर के जूते बना रहा हूं। तो मैं खरीद के ला रहा हूं चमड़ा। मैं लेके आ रहा हूं एक नई मशीन। मैं मैं मशीन लेके आ रहा हूं। मैं लेदर लेके आ रहा हूं। ठीक है? तो ये लेदर और मशीन क्या है मेरी? कैपिटल गुड्स है। क्या मैं लेदर को इमीडिएट यूज़ कर लूंगा? कि लेदर आया मेरे पास। ये लो जूता। ऐसे थोड़ी है या मैं मशीन लेके आया। ये लो जूता। अरे मशीन चलेगी। वो लेदर उसमें जाएगा। वो उसको पूरा शेप मिलेगा। उसकी सिलाई होगी। सब कुछ होगा। ठीक है? तब जाके एंड प्रोडक्ट निकलेगा। तो मतलब जो मशीन में लेके आया उससे एकदम से मेरे को कोई फायदा नहीं होगा। जो मैं लेदर ले आया उसका एकदम से मेरा कोई फायदा नहीं है। पर हां वो वो चीजें हैं जिनसे मेरी अल्टीमेट चीज बनेगी। तो जिनसे मेरी अल्टीमेट चीज बनेगी वो क्या है? वो कौन सी गुड्स हैं? कैपिटल गुड्स है। क्या मैं लेदर को इमीडिएट यूज़ कर लूंगा? कि लेदर आया मेरे पास। ये लो जूता। ऐसे थोड़ी है या मैं मशीन लेके आया। ये लो जूता। अरे मशीन चलेगी। वो लेदर उसमें जाएगा। वो उसको पूरा शेप मिलेगा। उसकी सिलाई होगी। सब कुछ होगा। ठीक है? तब जाके एंड प्रोडक्ट निकलेगा। तो मतलब जो मशीन में लेके आया उससे एकदम से मेरे को कोई फायदा नहीं होगा। जो मैं लेदर ले आया उसका एकदम से मेरा कोई फायदा नहीं है। पर हां वो वो चीजें हैं जिनसे मेरी अल्टीमेट चीज बनेगी। तो जिनसे मेरी अल्टीमेट चीज बनेगी वो क्या है? वो कौन सी गुड्स हैं? कैपिटल गुड्स हैं। पूंजीगत वस्तुएं हैं। वो कैपिटल गुड्स हैं। वो ऐसी वस्तुएं हैं जो मेरे एंड प्रोडक्ट को बनवाने में हेल्प कर रही हैं। इनके बिना वो नहीं बन सकता। तो ऐसी वस्तु को हम क्या बोल देंगे? कैपिटल गुड्स।
अब जैसे अब जैसे आप देखो मैं तुम्हें पढ़ा रहा हूं। मैं तुम्हें पढ़ा रहा हूं। ठीक है? मैं तुम्हें पढ़ा रहा हूं। पहले जब मैंने हमारे इस परिवार पर शुरू किया था पढ़ाना तो मैं पेन टैब से पढ़ाता था। अगर कोई बच्चा उस टाइम से जुड़ा हुआ है एक डेढ़ साल पहले से जब मैंने यहां पे शुरू किया था। तो आप सबने देखा होगा मेरे सबसे पहले लेक्चर जो थे पिटी वगैरह वाले मैं पेन टैब से पढ़ाता था। है ना? पेन टैब से पढ़ाता था। अब बात ये है कि फिर मैंने ये डिजिटल पैनल लिया। फिर मैंने ये डिजिटल पैनल लिया। तो आपको पढ़ाने के लिए मैंने जो ये डिजिटल पैनल लिया है, यह मेरे लिए क्या है? भाई अल्टीमेट प्रोडक्ट मेरा है कंटेंट जो मैं आपको पढ़ा रहा हूं। पर उसको डिलीवर करने के लिए मेरे पास है पैनल। मेरे पास है माइक, मेरे पास है मेरा डेस्कटॉप जिस सिस्टम से क्लास चल रही है। मेरे पास है मोबाइल जहां पे कमेंट्स चल रहे हैं। समझ में आ रही है मेरी बात? ये सब क्या है? ये सब ये सब कैपिटल गुड्स है भाई। ये सब कैपिटल गुड्स हैं। और एंड प्रोडक्ट क्या है? जो मैं आपको दिख रहा हूं जो मैं आपको बोल रहा हूं आपको सुनाई दे रहा है। हमारा कंटेंट एंड प्रोडक्ट है। ठीक है भाई? चलो। क्लियर है? बहुत बढ़िया। तो याद रखना इससे एकदम से मेरे को कुछ नहीं मिलेगा। पर इससे इससे मैं आपको क्लास डिलीवर कर पा रहा हूं। तो भैया याद रखना वे वस्तुएं जो उपभोक्ता की तत्काल आवश्यकता को पूरा नहीं करती। एकदम से पूरा नहीं करेंगी। पर हां अन्य वस्तुओं के उत्पादन के लिए लाई जाती हैं। तो मैं कंटेंट के लिए लाया हूं भाई इस चीज को। चलो आगे बढ़ते हैं। और तो कुछ नहीं था ना? हां। ठीक है। ठीक है। फाइनल गुड्स क्या होती है? फाइनल अच्छा कंज्यूमर गुड्स मतलब सारी की सारी गुड्स जो है कंज्यूमर गुड्स ही होती है। जो भी मैं चीज इस्तेमाल कर रहा हूं कंज्यूमर गुड है। ठीक है? फाइनल गुड। फाइनल गुड मतलब जैसे मान लो फाइनल गुड क्या है? मैं लेदर लेके आया। फाइनल गुड है जूता। मैं लेदर लेके आया। फाइनल गुड है बैग। मैं लेदर लेके आया। फाइनल गुड है पर्स। लेदर से बन रही है चीज़। तो मतलब फाइनल गुड क्या है? जो चीज़ बन रही है। ठीक है? चलो।
इन वि वन ऑफ द फॉलोइंग टाइप्स ऑफ इकॉनमी आर द फैक्टर्स ऑफ प्रोडक्शन ओड इंडिविजुअली। निम्नलिखित में से किस प्रकार की अर्थव्यवस्था में उत्पादन के कारक व्यक्तिगत रूप से स्वामित्व में होते हैं? व्यक्तिगत रूप से स्वामित्व में होते हैं? मतलब एक पर्सन जो है एक पर्सन जो है एक व्यक्ति जो है उन फैक्टर्स ऑफ प्रोडक्शन यानी उन उत्पादन के साधनों या उत्पादन के कारकों का मालिक होता है। कौन सी ऐसी अर्थव्यवस्था होती है जिसमें एक व्यक्ति जो है पूरे उत्पादन के साधनों का कारकों का मालिक होता है बताओ। सभी लोग बताएंगे। ओए कोई बफरिंग नहीं हो रही है सजरा। कोई बफरिंग नहीं है। सभी लोग बताएंगे। क्लियर है कि नहीं? बताओ बताओ। ठीक है। ठीक है। चलो बहुत बढ़िया। बिल्कुल देखो भैया ध्यान से। तो तो हमें यहां पे पता चल गया। पता चल गया ना यहां पे? देखो मैं आपको बताता हूं। आंसर होगा कैपिटलिस्ट। कैपिटलिस्ट। पूंजीवादी। भाई पूंजीवादी व्यवस्था। ऐसी व्यवस्था आप ध्यान से देखो। मैं सारे लिख देता हूं यहां पे ऐसी व्यवस्था जिसमें प्राइवेट इंडिविजुअल ठीक है भाई प्राइवेट इंडिविजुअल सभी उत्पादन के सभी साधनों उत्पादन के सभी साधनों या कारकों पर कंट्रोल करता है तो उसे हम बोलते हैं कैपिटलिस्ट। ठीक है भाई? तो ऐसी व्यवस्था जिसमें प्राइवेट इंडिविजुअल उत्पादन के सभी साधनों या कारकों पर कंट्रोल करता है। तो ये तो कैपिटलिस्ट है। क्यों कंट्रोल करता है? क्योंकि ससुरे को प्रॉफिट कमाना है। भाई पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में तो यही होता है। सब लोग जो हैं मालिकाना हक जताते हैं चीजों पर। सारे सारे रिसोर्सेज उनके पास होते हैं और उनका पर्पस ये है कि इन रिसोर्सेज का इस्तेमाल करके हमें ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना है। ठीक है? बाकी अब तुम बोलोगे सर कम्युनिस्ट। कम्युनिस्ट में क्या होता है कि ऐसी व्यवस्था या ये कहो कि प्रोडक्शन के जो मींस हैं उत्पादन के साधन जो हैं उत्पादन के साधन पर उत्पादन के कारकों पर है ना मींस ऑफ प्रोडक्शन पर उत्पादन के कारकों पर उत्पादन के कारकों पर समुदाय यानी कम्युनिटी समुदाय या सरकार का अधिकार होता है। सरकार का अधिकार होता है। कम्युनिटी या फिर सरकार का अधिकार होता है। कम्युनिटी या फिर सरकार का अधिकार होता है। ठीक है? तो ये है कम्युनिस्ट। जैसे जैसे चाइना में चाइना में क्या है? कम्युनिटी या तो कम्युनिटी के पास हो गया। सरकार के पास। चाइना में सब कुछ सरकार के पास है भाई। चाहे एग्रीकल्चरल लैंड हो, खेतीबाड़ी वाली जमीन हो, चाहे फैक्ट्रीज हो, इंडस्ट्रीज हो, चाहे फिर सर्विस सेक्टर हो, सब कुछ सरकार का है। सब कुछ के ऊपर अधिकार सरकार का है। मतलब जैसे हम तो क्या है इंडिया में तो हम लोग जैसे जमीन के मालिक खुद बन सकते हैं। है ना? हम जमीन के मालिक होते हैं। मैंने जमीन खरीदी, मैं जमीन का मालिक। मैंने जमीन बेच दी, मैं जमीन का मालिक नहीं हूं। भाई चाइना में वहां पे कम्युनिस्ट कम्युनिस्ट सोच है। वहां पर क्या है? वहां पे सब कुछ सारी चीजों पे सरकार का कंट्रोल है। सरकार ने बस यूज़ करने के लिए दी हुई है जनता को। अल्टीमेट हेड जो है उन चीजों की सरकार ही है। ठीक है? तो वो कम्युनिस्ट हो गया। तो उत्पादन के कारकों पर समुदाय यानी पूरे कम्युनिटी का या फिर सरकार का अधिकार होता है। ये हो गया कम्युनिस्ट। सोशलिस्ट का मतलब क्या है? सोशलिस्ट का मतलब सोशलिस्ट का मतलब है सोशलिस्ट का मतलब है जहां पे समाज के लोगों का समाज के लोगों का समाज के लोगों का सभी समाज के लोगों का उत्पादन के उत्पादन के साधनों पर या उत्पादन के कारकों पर मींस ऑफ प्रोडक्शन पर। अब ध्यान से देखो। हमारे भारत में ये सिस्टम है। समाज के समाज के लोगों का उत्पादन के कारकों पर कंट्रोल। ठीक है? कि हमारे यहां पे पूरी तरह से समाजवाद नहीं है। पूरी तरह से सोशलिज्म नहीं है। पर हां कुछ हद तक तो है। भाई हम लोग जमीन एक्वायर कर सकते हैं। हम जमीन पर हमारा अधिकार है। हमारी इंडस्ट्रीज पे हमारा अधिकार है। है ना भाई? मैं प्राइवेटली अपनी इंडस्ट्री खड़ा कर सकता हूं। प्राइवेटली अपनी जमीन जो है एक्वायर कर सकता हूं। प्राइवेटली मैं तुम्हें देखो मैं तुम्हें सर्विस दे रहा हूं। साहिल सर के साथ जुड़कर मैं तुम्हें अपनी टीचिंग की सर्विस दे रहा हूं। सही बात है कि नहीं? क्लियर है? तो ध्यान से देखो। समाज के लोगों का उत्पादन के कारकों पर कंट्रोल होता है तो उसे बोलते हैं सोशलिस्ट। जब सरकार का होता है तो उसे बोलते हैं कम्युनिस्ट। जब प्राइवेट लोगों का होता है उसे बोलते हैं कैपिटलिस्ट। और जब सरकार जब सरकार और प्राइवेट लोगों का होता है तो उसे बोलते हैं मिक्स्ड। उत्पादन के कारकों पर जब सरकार और प्राइवेट लोगों का होता है। है ना भाई? उत्पादन उत्पादन के साधनों पर उत्पादन के साधनों पर उत्पादन के साधनों पर उत्पादन के साधनों पर जब सरकार और प्राइवेट इंडिविजुअल्स प्राइवेट इंडिविजुअल्स दोनों का अधिकार हो दोनों का अधिकार हो दोनों का अधिकार हो तो क्या बोलते हैं भाई? तो मिश्रित मिश्रित इकॉनमी बोलते हैं। है ना भाई? चलो उम्मीद करता हूं आपको समझ में आया होगा बेटा। ठीक है? देखो मैं अपना बेस्ट देने की कोशिश कर रहा हूं कि लास्ट मैराथन है हमारी एनटीपीसी के एग्जाम से पहले मैराथनस तो और भी आएंगी पर ये एनटीपीसी के एग्जाम से पहले लास्ट है तो इसलिए अच्छे से अब तक हमने सारी मैराथन बहुत बढ़िया से कवर की है। इसमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। ठीक है? उम्मीद करता हूं कि आपको चारों वर्ड समझ में आए हैं। चलो
व्हेन वी डिवाइड बताओ भाई। व्हेन वी डिवाइड एनएपी नेट नेशनल प्रोडक्ट बाय द टोटल पापुलेशन ऑफ नेशन वी गेट बताओ भाई जब हम एनएपी शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद को किसी राष्ट्र की कुल जनसंख्या से विभाजित करते हैं तो हमें मिलता है सभी लोग बताएंगे कोई जानता है क्या ये वाला बताओ सभी लोग बताओ बताओ बताओ शाबाश शाबाश सभी लोग ये बता दो कि मजा आ जाएगा यार बढ़िया है ये एकदम कमेंट्स में देख रहा हूं चिंता मत करो डी बोल रहे हो तुम पर कैपिटा इनकम हां पक्का सोच लो सही बोल रहे हो भाई थोड़ा सा बढ़िया क्वेश्चन लाए भाई वाला हां ठीक है ठीक है ठीक है बहुत बढ़िया देखो अब मैं आपको बताता हूं आपने जो बोला मैंने देख लिया सारा देखो इधर व्हेन वी डिवाइड एनएपी नेट नेशनल प्रोडक्ट बाय द टोटल पॉपुलेशन ऑफ़ नेशन वी गेट वी गेट पर कैपिटा इनकम तुम्हारा बिल्कुल ठीक है ये तुम्हारा बिल्कुल ठीक है पर अब जिसको बिल्कुल नहीं समझ में आया ये क्या था भाई ये कैसा सवाल था तो उसको तो समझाना पड़ेगा देखो भाई अब मैं आपको बताता हूं सीन क्या है ये नेट नेशनल प्रोडक्ट क्या होता है इसको समझो जब हम एनएपी निकालते हैं ना नेट नेशनल प्रोडक्ट क्या होता है अभी समझ में आएगा तुम्हें अभी तुम्हें समझ में आ जाएगा कोई कोई धुरंधर चीज नहीं है ये बहुत सिंपल चीज है नेट नेशनल प्रोडक्ट यानी कि शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद क्या होता है? मैं बताता हूं। जब आप जीएनपी से ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट से माइनस करते हो डेप्रिसिएशन को। डेप्रिसिएशन को। अब मैं सब कुछ बताऊंगा। चिंता मत करो बिल्कुल कि सर क्या-क्या शब्द बोल रहे हो यार? हमें तो समझ में नहीं आ रहा। सब आएगा समझ में। ठीक है? नेट नेशनल प्रोडक्ट क्या होता है? वो अभी पता चल जाएगा। और फिर जब नेट नेशनल प्रोडक्ट पता चल गया तो फिर आगे की चीज समझ में आ जाएगी। नेट नेशनल प्रोडक्ट निकलता है। शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद निकलता है। जब हम कुल राष्ट्रीय उत्पाद से डेप्रिसिएशन को यानी मूल्य ह्रास को हटा देते हैं। यानी जीएनपी का मतलब है ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट। इसको हिंदी में बोलते हैं सकल। ठीक है? सकल राष्ट्रीय उत्पाद सकल का मतलब होता है टोटल ठीक है सकल मतलब टोटल नेशनल मतलब राष्ट्रीय स्तर पे और उत्पाद मतलब प्रोडक्ट डेप्रिसिएशन का मतलब है मूल्य ह्रास यानी मूल्य में गिरावट अब देखो ध्यान से जीएनपी का मतलब क्या होता है जीएनपी ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट यानी सकल राष्ट्रीय उत्पाद का मतलब क्या होता है एक देश के एक देश के नागरिकों के द्वारा ध्यान से देखना मैं क्या बोल रहा हूं। एक देश के नागरिकों के द्वारा एक देश के नागरिकों के द्वारा एक वित्तीय वर्ष में यानी एक पूरे साल में वित्तीय वर्ष शुरू होता है 1 अप्रैल से। जैसे अभी 1 अप्रैल 2025 से वित्तीय वर्ष चालू हो
चुका है।
31 मार्च 2026 तक यह वित्तीय वर्ष चल रहा है। 1 जनवरी से नहीं होता, 31 दिसंबर तक। 1 अप्रैल से शुरू होता है फाइनेंसियल ईयर और 31 मार्च तक चलता है। तो एक देश के नागरिकों के द्वारा एक देश के नागरिकों के द्वारा एक वित्तीय वर्ष में एक वित्तीय वर्ष में एक वित्तीय वर्ष में एक देश के नागरिकों के द्वारा एक वित्तीय वर्ष में एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित उत्पादित प्रोड्यूस की गई। ठीक है? उत्पादित वस्तुएं उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य देखो भाई यह है सकल राष्ट्रीय उत्पाद। एक देश के जितने भी नागरिक हैं उन्होंने जो भी सामान बनाया, एक साल के अंदर जो भी सेवाएं दी हैं, उन सब की टोटल वैल्यू। एक देश के नागरिकों द्वारा एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य। इस देश में जितने भी प्रोडक्ट्स बने हैं, एक साल के अंदर उन सबकी वैल्यू। इस देश में जितनी भी सेवा दी गई है, उन सबकी वैल्यू। और देश के अंदर नहीं, देश के लोगों द्वारा। आप चाहे वो बाहर ही है, भारत का नागरिक है पर दुबई में काम कर रहा है, उसने वो जो पैसा कमाया वो भी शामिल होगा इसमें। कोई कनाडा में है, उसने जो पैसा कमाया और उसने फिर भारत भेजा वो भी शामिल होगा इसमें। समझ रहे हो मेरी बात? तो भारत का नागरिक, अब चाहे वो भारत के अंदर या भारत के कहीं बाहर, भारत का अगर नागरिक है और वह भारत में है, भारत के बाहर है, कहीं भी है, वो जो भी वह प्रोड्यूस कर रहा है, जो भी वह प्रोडक्ट, जो भी वो सेवा दे रहा है, उसका जो टोटल मूल्य है दोस्तों, उसे बोल देते हैं ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट। तो हमें फर्क नहीं पड़ता कि भारत का नागरिक कहां पर है। पर वो भारत का नागरिक है। इंडियन सिटीजनशिप उसने नहीं छोड़ी। तो, भारत का नागरिक एक वित्तीय वर्ष में, भारत के जितने भी नागरिक है, जितने भी सिटीज़ंस हैं, एक वित्तीय वर्ष में, एक फाइनेंसियल ईयर में जितने प्रोडक्ट्स बना रहे हैं, जितनी सेवाएं दे रहे हैं, उन सबका टोटल मूल्य ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट।
और डेप्रिसिएशन क्या है? डेप्रिसिएशन मूल्य हरास, मतलब इन सारे प्रोडक्ट्स और सेवाओं को बनाने में जो चीजें इस्तेमाल हो रही है, जैसे मशीनंस। अब एक बात बताओ। जैसे मैं तुम्हें कंटेंट दे रहा हूं। मैं सेवा दे रहा हूं अपनी। मैं तुम्हें सेवा दे, मैं अपनी सेवा दे रहा हूं तुम्हें। मैं तुम्हें पढ़ा रहा हूं। तो भाई एक बात बताओ, पढ़ाते-पढ़ाते अगर मैं जोर-जोर से इस पैनल पे कुछ इस तरह से कट कट कट करने लग जाऊं और पैनल की स्क्रीन चटक जाए, पैनल की स्क्रीन खत्म हो जाए, तो क्या हुआ? जो कंटेंट, जो सेवा मैं आपको दे रहा था, उस सेवा को देते, ठीक है, उस सेवा को देते-देते जो मैं जिस प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर रहा था उसमें मेरा क्या हुआ? मूल्य ह्रास हो गया। समझ रहे हो भाई? जो सेवा मैं दे रहा हूं, उस सेवा को देने के दौरान जो मेरा मेरा नुकसान हो रहा है, मैं उसे माइनस कर दूंगा। तो जो भी प्रोडक्ट पूरे साल भर में बना है देश में, ध्यान से सुनना, भारत के नागरिकों ने जो भी प्रोडक्ट्स बनाए, जो भी सेवा बनाई, उनका टोटल मूल्य और उसको बनाने में, उस मूल्य को बनाने में जो नुकसान हुआ है उसे हटा दो। जो नुकसान हुआ उसे हटा दो। किसी ने मान लो अपनी गाड़ी ठोक दी। ठीक है? कोई काम कर रहा था, वो सेवा कर रहा था ट्रांसपोर्टेशन का। कोई गाड़ी ठोक दी, गाड़ी खत्म हो गई तो उसको हटाना पड़ेगा। मैं तुम्हें पढ़ा रहा हूं, पैनल टूट गया, मैं इसे हटा दूंगा। इसकी कॉस्ट को हटा दूंगा। फिर भाई जो नुकसान हुआ वो भी तो हटाना पड़ेगा। तो जो भी प्रोडक्ट बना, उस प्रोडक्ट के बनने के दौरान जो नुकसान हुआ उसे जो हटा के जो चीज आएगी वो है नेशनल नेट नेशनल प्रोडक्ट। ठीक है भाई? समझ में आ गया? तो याद रखना, क्लियर है भाई सबको? भाई अगर अगर मुझे अपना प्रॉफिट देखना है। मान लो मैं दो जूता बनाने वाली फैक्ट्री का मालिक हूं। तो मुझे अगर मेरा प्रॉफिट देखना है तो मैं क्या करूंगा? मैंने जितने साल भर में जूते बनाए और उससे उसको मैंने बेचा। साल भर में जो जूते बनाए उनको बेचा, उससे जो पैसा आया क्या वो मेरा पूरा प्रॉफिट है क्या? नहीं। पूरा प्रॉफिट नहीं है। मैंने जो साल भर जूते बना के बेचे, उससे जो मेरे पास पैसा आया उसमें से पहले मैं निकालूंगा कि साल भर मैंने मजदूरों को कितना सैलरी दी। मैंने बिजली पे कितना पे किया। मैंने मैंने मशीनों पर कितना खर्चा किया। मशीनें कितनी बार रिपेयर हुई। भाई ये सब मेरा नुकसान ही तो हुआ है। तो मैं जितना मैंने जितना मैंने बेचकर कमाया, टोटल मूल्य उसमें से पहले मैं नुकसान को हटाऊंगा, तब निकल के आएगा मेरा नेट प्रॉफिट। तो वही है यहां पर कि पूरे देश के नागरिकों ने जहां पर भी थे, वो देश में थे, देश के बाहर थे। जितना प्रोडक्ट बना, जितनी सेवा हुई, उसका टोटल मूल्य और उनको उन प्रोडक्ट, उन सेवाओं को देते वक्त जो नुकसान हुआ उसे माइनस कर दो। फिर निकल के आएगा नेट नेशनल प्रोडक्ट। अब मुझे समझ में आ गया है कि तुम्हें समझ में आ गया होगा। ठीक है? तो यहां पर लिख देते हैं मूल्य ह्रास क्या है? प्रोडक्ट बनाते वक्त, प्रोडक्ट या सेवा, प्रोडक्ट या सेवा, प्रोडक्ट या सेवा बनाते वक्त, बनाते वक्त या बनाते समय हुआ नुकसान। ठीक है? उस टाइम पे जो नुकसान हुआ है उसको मैं माइनस कर दूंगा। तो जितना कमाया, जितना बना, जितनी मूल्य आई, उससे नुकसान को हटा दिया। फिर मेरे पास आया नेट नेशनल प्रोडक्ट। अब नेट नेशनल प्रोडक्ट को अब देखो ध्यान से। व्हेन वी डिवाइड एनएपी बाय द टोटल पापुलेशन, बाय द टोटल पॉपुलेशन। टोटल पापुलेशन से आप इसको डिवाइड कर दोगे देश की, टोटल पापुलेशन से जब इसको डिवाइड कर दोगे, ठीक है? जितना भी मूल्य निकल के आया, उसको जब टोटल पापुलेशन से डिवाइड कर दोगे तो पर कैपिटा इनकम निकल के आएगी। प्रति व्यक्ति आय निकल के आएगी कि भारत में प्रति व्यक्ति आय कितनी है? भारत में एवरेज इनकम कितनी है हर व्यक्ति की, वो प्रति व्यक्ति आय निकल के आएगी। तो भारत में जो टोटल चीजों, जो टोटल चीजें बनी है उसकी कीमत, उसको टोटल पापुलेशन से डिवाइड कर दो, समझ में आ जाएगा कि ऑन एन एवरेज किसके पास प्रति व्यक्ति आय कितनी है। ठीक है? तो प्रति व्यक्ति आय निकालने का तरीका है नेट नेशनल प्रोडक्ट माइनस टोटल, डिवाइडेड बाय टोटल पापुलेशन। और एनएपी कैसे निकलेगा? जीएनपी से डेप्रिसिएशन को माइनस कर दो। उम्मीद करता हूं बेटा समझ में आया होगा। चलो आगे बढ़ते हैं।
अब देखो यार अब मैं क्या बोलूं, बच्चे हो तुम। एक गुप्ता जी करके हैं, सर्विस देते हो क्या आप? है ना, तगड़ी सर्विस दे दूंगा मैं। हम मजाक तब करना जब मजाक ले पाओ। हां, मास्टर मास्टर हम बाद में हैं, दोस्त पहले ही बता रहा हूं, मास्टर बाद में है। ये तो क्लास, ये असली चेहरा नहीं है हमारा। तुम कहीं सोचते हो कि हमारा असली चेहरा हम ऐसे ही हैं। ये तो एक्टिंग चल रही है। ये तो पढ़ाने वाला जो सिस्टम चल रहा है ना, दिस इज़ एक्टिंग। ये तो मैं एक्ट कर रहा हूं। बेटा देखो समझ में आ रहा है कि नहीं। बेटा देखो, बेटा क्लियर है नहीं। दिस इज़ ऑल एक्टिंग। रियलिटी में झेल नहीं पाओगे। तो इसलिए हां, तमीज से रहो। अभी मेहनत चल रही है। बढ़िया। ठीक है। ये सब एक्टिंग है भाई। हां। चलो आगे देखो।
फर्स्ट एस्टीमेट्स ऑफ़ नेशनल इनकम इन 1876 वाज़ प्रिपयर्ड बाय, वो 1876 में राष्ट्रीय आय का पहला अनुमान किसके द्वारा तैयार किया गया था? सभी लोग बताओ। हां। जल्दी जल्दी। बताओ बताओ, शाबाश शाबाश, बहुत बढ़िया। तो पता ही है तुम्हें, नेशनल इनकम को, हां, पहली बार काउंट करने की कोशिश किसने की थी? वेरी गुड, वेरी गुड, शाबाश। ठीक है, बहुत बढ़िया। तो तुम्हारा आंसर ठीक है भाई, दादा भाई नौरोजी। दादा भाई नौरोजी, ठीक है। सभी लोग ध्यान से देखेंगे, बिल्कुल। हां, मैं बता रहा हूं, मैं बता रहा हूं। दादा भाई नौरोजी ने 1876, दादा भाई नौरोजी को देखो, दादा भाई नौरोजी को सब जानते हो, ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ कहते हैं ना, ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडिया। ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडिया, ठीक है। तो ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडिया, ठीक है भाई, दादा भाई नौरोजी। इन्होंने फर्स्ट टाइम, पहली बार, पहली बार, पहली बार नेशनल इनकम, राष्ट्रीय आय को, हमारे देश की जो टोटल नेशनल इनकम है, उसको काउंट करने की कोशिश की कि भाई जैसे एक व्यक्ति की आय होती है, जैसे मेरी एक पर्टिकुलर इनकम है। ठीक है? आप आप जब नौकरी लगोगे तो आपकी एक पर्टिकुलर इनकम होगी। ठीक है? तो देश की भी तो एक आय होगी। देश में इतने लोग रह रहे हैं, उसकी टोटल आय मिला के हम क्या बोल सकते हैं? खैर वो कैलकुलेशन अलग है। वो कैलकुलेशन अलग है। मैं आपको सिंपली बता रहा हूं कि देश की जो आय है, नेशनल इनकम जो है, वो काउंट करने की कोशिश, वो कैलकुलेट करने की कोशिश की किसने? दादा भाई नौरोजी ने 1876 में। तो ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडिया, पहली बार नेशनल इनकम को, नेशनल इनकम को, नेशनल इनकम को कैलकुलेट करने की कोशिश की। कैलकुलेट करने की, ठीक है भाई। पहली बार नेशनल इनकम को कैलकुलेट करने की कोशिश की। अच्छा इन्होंने किया क्या? मतलब कैसे यह कैलकुलेट कर रहे थे? इन्होंने किया क्या? इन्होंने देश का, इन्होंने इन्होंने इन्होंने कंट्री का, इन्होंने कंट्री का टोटल एग्रीकल्चरल यानी कृषि, टोटल एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन जो कुल कृषि उत्पादन था। ध्यान से देखो। ध्यान से देखेंगे सभी लोग। मैं क्या बोल रहा हूं? हां, बिल्कुल बिल्कुल। इन्होंने क्या किया? इन्होंने कंट्री का टोटल एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन को, जो नॉन एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन है। ठीक है भाई, देखो उस जमाने में 1876 की बात हो रही है। उस जमाने में तो और भी ज्यादा लोग खेतीबाड़ी में लगे हुए थे। जब आजादी के टाइम पर ये 75% थे, तो उस टाइम पे तो और भी ज्यादा लोग, 1876 में देखो, 1876 में तो और भी ज्यादा लोग खेतीबाड़ी में लगे हुए थे। तो इन्होंने खेतीबाड़ी में जो भी इनकम हो रही थी, इन्होंने कंट्री का जो टोटल एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन है, उसको एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन को नॉन एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन के साथ जोड़ दिया। खेती के अलावा जो चीजें चल रही थी, थोड़े बहुत एक आधे उद्योग चल रहे थे, कुटीर उद्योग, छोटे-मोटे उद्योग चल रहे थे। ठीक है? ट्रेड चल रहा था, व्यापार चल रहा था, वो सब भी इन्होंने जोड़ दिया, एक सर्टेन परसेंटेज जोड़ दिया उसका। तो इन्होंने कंट्री का टोटल एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन यानी कुल कृषि उत्पादन को नॉन एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन के साथ जोड़ दिया। नॉन एग्रीकल्चरल मतलब जो कृषि से संबंधित नहीं है, उन एक्टिविटीज के प्रोडक्शन को भी जोड़ दिया। भाई सीधी बात है, खेतीबाड़ी से जो हो रहा है वो उत्पादन और जो खेतीबाड़ी से नहीं हो रहा, खेतीबाड़ी के अलावा जो उत्पादन हो रहा है उनको आपस में जोड़ दिया। तो इन्होंने एक एक रफ फिगर निकालने की कोशिश की। तो इन्होंने कंट्री का टोटल एग्रीकल्चर प्रोडक्शन को नॉन एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन के साथ जोड़ दिया। तो एक रफ सा इन्होंने एक आईडिया निकाला। ठीक है? नॉन एग्रीकल्चर प्रोडक्शन के सर्टेन परसेंट के साथ, सर्टेन परसेंट के साथ जोड़ दिया। मतलब ज्यादा परसेंट ले लिया एग्रीकल्चर प्रोडक्शन का, इसका तो निकल ही आया होगा क्योंकि तो करते थे लोग, उस टाइम पर लोग ज्यादा लोग एग्रीकल्चर ही करते थे, तो एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन तो उन्हें मालूम था, बाकी उन्हें नहीं मालूम था तो उन्होंने एक सर्टेन अमाउंट ले लिया, एक सर्टेन परसेंट ले लिया और उसको ऐड कर दिया। तो टोटल एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन और नॉन एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन का सर्टेन परसेंट के साथ जोड़ दिया। इससे इनके पास कोई रफ फिगर आया, उससे इनको आईडिया हुआ। ठीक है? तो भाई दादा भाई नौरोजी ने ये ट्राई किया भैया 1876 में। बाकी बाकी प्रशांत चंद्र महालनोबिस, इनके बारे में जानते हो क्या तुम लोग? प्रशांत चंद्र महालनोबिस, बहुत ही बढ़िया आदमी। और मैं आपको बताऊं, प्रशांत चंद्र महालनोबिस, पीसी महालनोबिस, पहली बात तो जो सेकंड फाइव ईयर प्लान है, सेकंड फाइव ईयर प्लान है ना, 1956 से 1961 का, सेकंड फाइव ईयर प्लान, वो इन्हीं की इन्हीं की इन्हीं की थ्योरी पर आधारित है, महालनोबिस मॉडल पर आधारित है। सेकंड फाइव ईयर प्लान 1956 से 1961, इनके मॉडल पर आधारित है। महालनोबिस मॉडल, इनके मॉडल पर आधारित है। ठीक है बेटा? इनके मॉडल पर आधारित है। दूसरी चीज यह भारत के बहुत तगड़े, जैसे बोलते हैं ना, स्टैटिस्टिशियन, यानी कि एक तरीके से सांख्यिकी के जानकार, सांख्यिकी के वैज्ञानिक रहे हैं। सांख्यिकी, सांख्यिकी वैज्ञानिक रहे हैं। तो इंडियन स्टैटिस्टिशियन, इंडियन स्टैटिस्टिशियन, भारतीय सांख्यिकी के ज्ञाता, इंडियन स्टैटिस्टिशियन रहे हैं। ठीक है? इन्होंने 1931 में, 1931 में कोलकाता में, 1931, 1931 में कोलकाता में, 1931 में कोलकाता में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ या इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट की स्थापना की। इंडियन स्टैटिस्टिकल, इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट की स्थापना की। ठीक है दोस्तों? तो इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट की स्थापना की इन्होंने 1931 में। क्लियर है भैया? ये बहुत इंपॉर्टेंट बता रहा हूं मैं चीजें तुम लोगों को। बिल्कुल। और इन्हें इन्हें फादर ऑफ़ इंडियन स्टैटिस्टिक्स भी बोलते हैं। भारतीय सांख्यिकी का जनक भी बोलते हैं। फादर ऑफ़ इंडियन स्टैटिस्टिक्स, भाई भारतीय सांख्यिकी के जनक भी कहे जाते हैं। समझ में आ रहा है दोस्तों सभी को? बिल्कुल बिल्कुल, बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया। शाबाश। चलो तो ये हमारे पास ये हो गए। बाकी वी के आरवी राव और विलियम दिग भी पढ़ने की जरूरत नहीं है। इतने इंपॉर्टेंट नहीं है ये। चलो तो दो चीजें पढ़ ली हमने। बाकी आंसर तुम्हें मालूम है, दादा भाई नौरोजी।
नेक्स्ट, व्हिच ऑफ़ द फॉलोइंग डिपार्टमेंट कैलकुलेट्स द जीडीपी ऑफ़ इंडिया? निम्नलिखित में से कौन सा विभाग भारत की जीडीपी की गणना करता है? बताओ सभी लोग, भारत की जीडीपी की गणना कौन करता है? बताओ जल्दी से। और जीडीपी मतलब हम भारत की अर्थव्यवस्था को जीडीपी में नापते हैं। ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट में नापते हैं। और मैं ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट क्या होता है? वो मैं बता ही देता हूं तुम्हें ताकि तुम्हें दिक्कत ना हो समझने में। भाई ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट यानी सकल घरेलू उत्पाद। सकल घरेलू उत्पाद। ठीक है? सकल घरेलू उत्पाद। सभी लोग सभी लोग मैराथन से जुड़े रहना भैया। मैं पहले ही बता रहा हूं। जो सीरियस बच्चे हैं, नॉन सीरियस के तो कुछ कहनी ही नहीं है। ठीक है? जो सीरियस हैं वो अपनी मैराथन आज खत्म करो और पूरा झंझट खत्म करो। ठीक है? उसके बाद ही सोना है भाई। तुम्हें भी और मुझे भी। हां। ठीक है? बिल्कुल बिल्कुल। तो सकल घरेलू उत्पाद का मतलब है कि एक देश की सीमा के अंदर, देखो जब मैं तुम्हें ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट बता रहा था, जीएनपी, तो मैं बोल रहा था, मैंने नहीं बोला कि देश की सीमा के भीतर, देश की बाउंड्री के अंदर, मैंने बोला देश का हर नागरिक जो चाहे बाहर भी है उसकी आय को भी हम शामिल कर रहे थे। पर मैं यहां बोल रहा हूं एक देश की सीमा के भीतर, एक देश की सीमा के भीतर, यानी एक देश की बाउंड्री के भीतर, इसमें मैं उस व्यक्ति को काउंट नहीं करूंगा जो देश के बाहर काम कर रहा है। है भले भारत का नागरिक पर बाहर काम कर रहा है। मैं उसको काउंट नहीं करूंगा। एक देश की सीमा के भीतर, एक देश की सीमा के भीतर, एक वित्तीय वर्ष में, एक वित्तीय वर्ष में, एक वित्तीय वर्ष में, एक देश की सीमा के भीतर, एक वित्तीय वर्ष में बनने वाले, बनने वाले या फिर एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित, उत्पादित वस्तुएं या वस्तुओं, उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का, एक देश की सीमा के भीतर एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित वस्तु और सेवाओं का कुल मूल्य है। ठीक है? यानी भारत की बाउंड्री के अंदर जितने भी लोग हैं, भारत की बाउंड्री के अंदर जितने भी लोग हैं, उन सबके द्वारा एक वित्तीय वर्ष में, एक फाइनेंसियल ईयर में जितने भी प्रोडक्ट्स बनाए गए, जितनी भी सेवाएं क्रिएट की गई, उनका टोटल मूल्य। उनका टोटल मूल्य क्या है दोस्तों? जीडीपी। ठीक है? तो हमारी जीडीपी, हमारी इकॉनमी कैसे नापते हैं हम? जीडीपी में। तो साल भर में हमारे देश में जो भी प्रोडक्ट्स बने हैं, जो भी सेवाएं क्रिएट हुई हैं, उन सबका टोटल मूल्य, उन सबका फाइनल मूल्य। समझ में आया दोस्तों? बिल्कुल। चलो बहुत बढ़िया। बेटा देखो जिसके साथ दिक्कत हो रही हो वो प्लीज क्लास लीव कर सकता है। कोई दिक्कत वाली बात नहीं। ठीक है? मैं तो ऐसे ही बोल रहा था। कोई दिक्कत नहीं। भाई देखो रात का टाइम है। जिसको नींद आ रही है वो अपना नींद पूरी करें। कोई दिक्कत नहीं। सेशन तुम देख लेना। बस तुम्हारे लिए देखना जरूरी है बस। ठीक है? कोई दिक्कत नहीं। क्योंकि देखो मैं तो आखिर तक पढ़ाऊंगा। मैं तो अपना पूरे मैराथन खत्म करूंगा। चाहे बच जाए 12, मेरे को फर्क नहीं पड़ता। ठीक है? हां, समझ में आ गया भाई? तो टोटल, हां तो टोटल मार्केट वैल्यू, टोटल टोटल बाजार मूल्य, टोटल मूल्य, एक देश की सीमा के भीतर एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का। क्लियर है? बिल्कुल। अब बात यह है कि कौन कौन कैलकुलेट करता है जीडीपी? सवाल तो यह था ना? बताओ बताओ। बिल्कुल, सेंट्रल देखो, सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑर्गेनाइजेशन ये करती थी पहले और अभी भी यही करती है। बस इसका नाम चेंज हो गया है। पहले नाम ये था। ये पुराना नाम है। ये पुराना नाम है दोस्तों। ये क्या है? ये पुराना नाम है। ओल्ड नेम है ये। नया नाम क्या है? न्यू नेम क्या है? सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस। ठीक है भाई। सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस, बिल्कुल। अभी इसका ये नाम है। और ये ये एक मिनिस्ट्री के अंडर है। मिनिस्ट्री, मिनिस्ट्री ऑफ़, कौन सी मिनिस्ट्री के अंडर है? कौन से मंत्रालय के अंडर आता है डिपार्टमेंट? मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स। स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन। प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन। ठीक है बेटा? सभी लोग ध्यान से देखो। तो मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन के अंडर आता है यह डिपार्टमेंट और यही हमारे देश की जीडीपी कैलकुलेट करता है। और जीडीपी क्या होती है? एक वित्तीय वर्ष में एक देश की सीमा के भीतर बनने वाली प्रोडक्ट्स और वस्तु सेवाओं का टोटल मूल्य। ठीक है? टोटल मूल्य। ठीक है भाई? चलो, तो ये हो गया हमारा यहां पर। आगे बढ़ते हैं।
अब देखो, ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट इज़ द टोटल वैल्यू ऑफ़ व्हिच ऑफ़ द फॉलोइंग? सकल घरेलू उत्पाद निम्नलिखित में से किसका कुल मूल्य है? सकल घरेलू उत्पाद निम्नलिखित में से किसका कुल मूल्य है? सभी लोग बताएंगे। बताओ जल्दी से, बताओ बेटा, बताओ। बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल, सभी लोग बेटा बताओ बताओ, अभी पढ़ा है हम लोगों ने, अभी पढ़ा है हम लोगों ने। किसी विशेष वर्ष के दौरान उत्पादित सभी उत्पाद, नहीं। किसी विशेष वर्ष के दौरान उत्पादित सभी मध्यवर्ती उत्पाद और अंतिम उत्पाद और सेवाएं, नहीं। किसी विशेष वर्ष के दौरान उत्पादित सभी मध्यवर्ती उत्पाद और सेवाएं, बताओ भाई। किसी विशेष वर्ष के दौरान उत्पादित सभी अंतिम सेवाएं। अब तुम बताओ, सभी लोग बताएंगे भाई। बी और सी तो नहीं होंगे, इंटरमीडिएट प्रोडक्ट थोड़ी होते हैं। ठीक है? बताओ, इसका आंसर हो जाएगा। इसका आंसर हो जाएगा अंतिम सेवाएं। अंतिम प्रोडक्ट, अंतिम सेवाएं। आंसर हो जाएगा दोस्तों डी। इसका आंसर हो जाएगा डी। क्लियर है? चलो बिल्कुल। नेक्स्ट।
द गार्डगिल फार्मूला, विज़ नेम आफ्टर सोशल साइंटिस्ट एंड द फर्स्ट क्रिटिक ऑफ़ इंडियन प्लानिंग, वाज़ अप्रूव्ड इन विच ईयर फॉर डिटरमाइनिंग द एलोकेशन ऑफ़ सेंट्रल असिस्टेंस फॉर स्टेट प्लांस इन इंडिया? बताओ बेटा, गार्डकिल फार्मूला, जिसका नाम समाज जिसका नाम समाज विज्ञानी और भारतीय नियोजन के पहले आलोचक के नाम पर रखा गया है, को भारत में राज्य योजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता के आवंटन का निर्धारण करने के लिए किस वर्ष में अनुमोदित किया गया था? इस क्वेश्चन को ध्यान से पढ़ लो और इसका जवाब दो। नहीं दे पाओगे तो कोई बात नहीं। मैं तो बताऊंगा ही। ठीक है? तो गार्डगिल फार्मूला, जिसका नाम समाज विज्ञानी, यानी इस फार्मूला का नाम एक समाज विज्ञानी और एक भारतीय नियोजन के पहले, इंडियन प्लानिंग के पहले क्रिटिक, आलोचक के नाम पर रखा गया है, को भारत में राज्य योजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता के आवंटन का निर्धारण करने के लिए किस वर्ष अनुमोदित किया गया था? बताओ भैया। समझ में आ गया है तो बता दो। क्लियर है? समझ में तो आया है। ठीक है। ठीक है। नहीं नहीं, 1967 नहीं बेटा, 1969 होगा। 1969, 1969, 1969। मैं बताता हूं। मैं बताता हूं। देखो मैं बताता हूं। चिंता ना करो। चिंता ना करो भाई। मैं बताता हूं। यह जो गार्डगिल फार्मूला है, यह 1969 में आया। ठीक है? पहली बात तो गार्डर फार्मूला, जिसका नाम समाज वैज्ञानिक और भारतीय नियोजन के पहले आलोचक के नाम पर रखा गया। तो कौन है भाई वो इंडियन प्लानिंग का क्रिटिक, इंडियन प्लानिंग की ऐसी तैसी करने वाला, इंडियन प्लानिंग के बारे में आलोचना करने वाला कौन व्यक्ति है वो? कौन है ये गार्डगिल साहब? कौन है ये गार्डगिल साहब? कोई बता सकता है? नहीं बता सकता। कोई बात नहीं, हम बताते हैं। धनंजय धनंजय रामचंद्र गाडगिल। धनंजय रामचंद्र गाडगिल। ठीक है? तो धनंजय रामचंद्र गाडगिल जो है, एक अर्थशास्त्री तो थे ही, समाज विज्ञानी भी थे और इंडियन प्लानिंग, जिस तरह की प्लानिंग उस भारत में हो रही थी, उस जमाने में हो रही थी, तो उसको लेकर वो खासे चिंतित थे। उनको लगता था जरा घटिया प्लानिंग हो रही है। भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ये प्लानिंग सही नहीं है। ठीक है? तो धनंजय रामचंद्र गाडगिल के अनुसार जो प्लानिंग उस टाइम पर हो रही थी, उसकी कई बार उन्होंने आलोचना की। ठीक है? ठीक है? आलोचना की। तो इन्होंने ही, धनंजय रामचंद्र गार्डगिल ने ही 1969 में दोस्तों ये गार्डगिल फार्मूला निकाला। गॉडगिल फार्मूला निकाला। अब ये गार्डगिल फार्मूला क्या है? वो भी मैं आपको बता देता हूं। गार्डगिल फार्मूला क्या है दोस्तों? वो भी मैं आपको बता देता हूं। कोई जानता है क्या गार्डिकल फार्मूला? बताओ। कोई जानता है? बताओ बताओ। ठीक है? यहीं पे लिखा हुआ है। देखो क्वेश्चन में लिखा हुआ है। भारत में राज्य योजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता के आवंटन का निर्धारण करने के लिए। ठीक है? गार्डगिल फार्मूला तरीका है दोस्तों। एक तरीका है। एक तरीका है। तरीका है। ठीक है? यह निर्धारित करने का, यह निर्धारित करने का है। यह डिटरमाइन करने का या निर्धारित करने का यह तरीका है। यह निर्धारित करने का कि, ध्यान से सुनना, कि भारत में, भारत में जो राज्य स्तर पर योजनाएं बनाई जा रही हैं। भारत में जो स्टेट लेवल पर, राज्य स्तर पर, भारत में राज्य स्तर पर जो प्लानिंग की जा रही है। राज्य स्तर पर जो प्लानिंग की जा रही है, भाई राज्य स्तर पर देखो एक तो होता है देश के स्तर पर प्लानिंग कर रहे हो आप, अर्थव्यवस्था को सुधारने की। एक आप करते हो राज्य के स्तर पर कि राज्य ऐसे ऐसे ग्रो करेंगे। राज्य
ऐसेसे विकसित होंगे तो देश भी ऑटोमेटिकली विकसित हो जाएगा। ठीक है? तो ये निर्धारित करने का कि भारत में राज्य स्तर पर प्लानिंग की। ठीक है? ये निर्धारित करने का तरीका है कि भारत में राज्य स्तर पर प्लानिंग। प्लानिंग ध्यान से देखो इसको। पूरा सेंटेंस करते सही। भारत में राज्य स्तर पर प्लानिंग के लिए यह निर्धारित करने के निर्धारित करने का तरीका है कि भारत में राज्य स्तर पर प्लानिंग में प्लानिंग में केंद्र सरकार का केंद्र सरकार का केंद्र सरकार का कैसा और कितना रोल हो? कैसा और कितना रोल हो?
भाई सीधी बात यह है कि राज्यों के स्तर पर जब प्लानिंग हो रही है। ठीक है? राज्यों के स्तर पर प्लानिंग हो रही है तो राज्यों के स्तर पर प्लानिंग होते वक्त केंद्र सरकार किस तरीके से मदद करे? केंद्र सरकार जो मदद करना चाह रही है वो राज्यों की प्लानिंग पर किस तरीके से इंप्लीमेंट हो? मतलब राज्य अगर कोई भी प्लान बना के बैठी है, राज्य सरकार कोई भी प्लान बना के बैठी है तो सेंट्रल गवर्नमेंट की तरफ से कितनी सहायता मिलनी चाहिए उस प्लान को ये कौन डिसाइड कर रहा है? गार्डगिल फार्मूला। तो गार्डगिल फार्मूला ये तरीका है जिससे ये निर्धारित हो जाता है कि भारत में राज्य के स्तर पर जो भी प्लानिंग चल रही है, उस प्लानिंग में केंद्र सरकार किस तरह से सहायता कर सकती है राज्यों की। ठीक है भाई? अगर राज्य बोल रहे हैं कि हमारा एक प्लान है जी। हम अपने राज्य में ये वाली स्कीम लांच करेंगे तो हमें पैसा चाहिए। हमारे पास पैसा नहीं है। तो भाई राज्य सरकार अब जो केंद्र सरकार है वो पैसा देगी फिर। अब केंद्र सरकार कैसे पैसा दे, कितना पैसा दे? तो वो सारी चीजें गार्डगिल फार्मूला बताता है। ठीक है भाई? तो ये 1969 में है।
चलो नेक्स्ट। व्हिच फाइव ईयर प्लान वाज़ सस्पेंडेड वन ईयर बिफोर द टाइम शेड्यूल्ड बाय जनता पार्टी? जनता पार्टी द्वारा कौन सी पंचवर्षीय योजना को समय से 1 वर्ष पहले स्थगित कर दिया गया था? बताओ भाई सभी लोग बताएंगे। बड़ा बड़ा बड़ा फेमस यह फैक्ट है और बड़ा फेमस वो फाइव ईयर प्लान है। सभी लोग बताएंगे बेटा बताओ कौन सा है वो बताओ सभी लोग 1 वर्ष पहले ही स्थगित कर दिया। बताओ जल्दी से फिफ्थ फाइव ईयर प्लान। कौन सा दोस्तों? फिफ्थ फाइव ईयर प्लान। तो पांचवी पंचवर्षीय योजना आप सब जानते हो ना कि पहली पंचवर्षीय योजना 1951 से 1956 में आई थी। भाई पंचवर्षीय योजना का काम क्या है कि 5 साल के लिए किसी एक क्षेत्र पर फोकस करेंगे। उस क्षेत्र को इंप्रूव करेंगे। फिर अगले 5 साल में किसी और क्षेत्र को इकॉनमी के किसी और क्षेत्र को अर्थव्यवस्था के किसी और क्षेत्र को फोकस करेंगे। उसको इंप्रूव करेंगे। फिर अगले साल किसी मतलब अगले 5 साल में फिर किसी और क्षेत्र को तो इस तरह से पंचवर्षीय योजना का जो कांसेप्ट है हमने लिया था रशिया से यूएसएसआर से। सोवियत संघ से कि हर 5 साल में अर्थव्यवस्था के एक-एक सेक्टर को इंप्रूव करते हुए आगे बढ़ जाएंगे। बड़ा सिंपल सा ये प्लान बनाया। तो पहली पंचवर्षीय योजना 1951 से 1951 से 1956 एग्रीकल्चर पे फोकस किया हम लोगों ने। फिर 1956 से 61 इंडस्ट्रीज पर फोकस किया हमने। उद्योगों पर फोकस किया। फिर आया हमारा 1961 से 1961 से 1966। इसमें हमने कोशिश की कि हम सेल्फ रिलायंट बन जाए, आत्मनिर्भर बन जाए। ठीक है? हालांकि यह बहुत बुरी तरीके से फेल हुआ हमारा तीसरी पंचवर्षीय योजना। क्योंकि उस टाइम पे चाइना के साथ युद्ध हुआ 1962 में। पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ 1965 में। फेमिन वगैरह भूख अकाल वकेला अकाल वगैरह भी पड़ गए बीच में। तो काफी हालत हमारी टाइट हो रखी थी। ठीक है? तो यहां पर यहां पर मैं आपको ये बताना चाह रहा हूं। ध्यान से सुनना बेटा कि जनता पार्टी द्वारा कौन सी पंचवर्षीय योजना को समय से 1 वर्ष पहले स्थगित कर दिया गया। तो मैंने तीसरी बताई आपको 1961 से 1966 फिर 3 साल के लिए पंचवर्षीय योजना नहीं आई। एनुअल प्लांस आए 67 68 66 67 68 में। ठीक है? फिर 69 से फिर से शुरू हुई पंचवर्षीय योजना। 69 से लेकर 69 से लेकर 74 तक। और फिर 74 से ले 79 तक थी पांचवी पर 79 तक पहुंचने ही नहीं दी क्योंकि 78 में जनता सरकार बनी। जनता पार्टी की सरकार बनी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। उन्होंने उस योजना को वहीं खत्म कर दिया। 1979 में पूरी होती पर 1978 में हटा दिया उसने। ठीक है? तो अब देखो पांचवी पंचवर्षीय योजना का टेन्योर एक्चुअल में होना चाहिए। 1974 से 5 साल का 1979 पर पर रियलिटी में पर रियलिटी में ये कब तक चली? रियलिटी में 1974 से 1978 तक चली। ठीक है? मोरारजी देसाई की सरकार ने इसे एक साल पहले ही स्थगित कर दिया। हटा दिया।
अब बात ये है कि सर ये फिफ्थ फाइव ईयर प्लान में फायदा क्या हुआ? क्या नुकसान? कुछ बताओ तो सही इसके बारे में। तो बेटा फिफ्थ फाइव ईयर प्लान में जैसे मैंने बताया कि ईयर तो आपको पता चल गया पर इसमें फिफ्थ फाइव ईयर प्लान में उद्देश्य क्या था हमारा? फिफ्थ फाइव ईयर प्लान में उद्देश्य क्या था? बताओ भाई पॉवर्टी और महंगाई। बिल्कुल बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। तो यहां पर हमारा हमारा उद्देश्य था। हमारा ऐ था हमारा ऐ था पॉवर्टी को पॉवर्टी को हटाना। पॉवर्टी को यानी एक तरीके से गरीबी को कम करना। ठीक है? महंगाई को भी यानी इनफ्लेशन को भी महंगाई को भी इनफ्लेशन को भी कम करना। तो पॉवर्टी को कम करना, महंगाई को कम करना। ठीक है? पॉवर्टी को कम करना, महंगाई को कम करना। ये हमारा उद्देश्य था। उसके अलावा यहीं पर इंदिरा गांधी जी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। ऐसी टाइम पे इंदिरा गांधी जी ने इंदिरा गांधी जी ने इंदिरा गांधी जी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। गरीबी हटाओ का नारा दिया। ठीक है दोस्तों? गरीबी हटाओ का नारा। तो ये तुमसे पूछा जाता है भाई सवाल। गरीबी हटाओ का नारा इंदिरा गांधी जी ने कौन सी पंचवर्षीय योजना में दिया? पांचवी पंचवर्षीय योजना में। ठीक है? सबको समझ में आ रहा है बेटा? क्लियर है? बिल्कुल। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया।
दूसरी बात ये वही पंचवर्षीय योजना है जिसमें पहली बार फर्स्ट रूरल बैंक स्थापित हुआ। फर्स्ट ग्रामीण बैंक स्थापित हुआ। फर्स्ट रूरल बैंक देश में पहला ग्रामीण बैंक स्थापित हुआ। फर्स्ट रूरल बैंक स्थापित हुआ। ठीक है? तो ये बड़ी खुशी की बात थी। ठीक है? फर्स्ट फर्स्ट रूरल बैंक। समझ में आया दोस्तों? बिल्कुल बहुत बढ़िया। वेरी गुड वेरी गुड। तो पहला रूरल बैंक स्थापित हुआ और यह हुआ था सेकंड अक्टूबर 1975 में। सेकंड अक्टूबर 1975 सेकंड अक्टूबर 1975 में। ठीक है? और फिर 1975 में इसी पंचवर्षीय योजना के टाइम पर दोस्तों इमरजेंसी भी लगी। इसी इसी इसी 5 ईयर प्लान में इसी फाइव ईयर प्लान में नेशनल इमरजेंसी भी लग गई। नेशनल इमरजेंसी। ठीक है? इसी फाइव ईयर प्लान में नेशनल इमरजेंसी यानी आर्टिकल 352 के तहत लगा दी गई है। इंदिरा गांधी जी ने लगाई थी ना? इंदिरा गांधी जी ने लगाई थी। ठीक है? 1975 में तो नेशनल इमरजेंसी भी लग गई। और इसी इसी पंचवर्षीय योजना में इसी पंचवर्षीय योजना में इसी पंचवर्षीय योजना में एक काम यह हुआ कि पहली बार पहली बार देश में पहली बार देश में क्योंकि इंदिरा गांधी जी उस टाइम पे बैकफुट पे थी क्योंकि इन्होंने गड़बड़ की हुई थी इलेक्शन जीतने के दौरान। ठीक है? इनको छ साल की इलाहाबाद कोर्ट ने ये सजा दी थी कि भाई आप चुनाव नहीं लड़ पाओगी। तब जाके इन्होंने इमरजेंसी लगाई थी अपनी सत्ता बचाने के लिए। ठीक है? और फिर जनता की नजरों में तो चढ़ ही गई थी। तो तुरंत से जब जब 1970 जब 1977 में सरकार बनी जब 1977 में सरकार बनी किसकी? जनता पार्टी की। जनता दल की जब सरकार बनी पहली बार नॉन कांग्रेसी गवर्नमेंट बनी। पहली बार जनता दल की सरकार बनी। पहली बार जनता दल की सरकार बनी। 19778 में और प्रधानमंत्री बने प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई। ठीक है? प्राइम मिनिस्टर कौन बने? इसी पंचवर्षीय योजना की बात बता रहा हूं। प्राइम मिनिस्टर बने मोरारजी देसाई। तो मोरारजी देसाई ने पंचवर्षीय योजना को खत्म करने का डिसीजन लिया। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इसे खत्म कर दिया। इसे खत्म कर दिया। खत्म कर दिया फाइव ईयर प्लान। और इन्होंने अपनी योजना निकाली जिसे बोलते हैं रोलिंग प्लान। फाइव ईयर प्लान को खत्म कर दिया और रोलिंग प्लान इंट्रोड्यूस किया। रोलिंग प्लान। ठीक है? लुढ़कती हुई योजना। रोलिंग प्लान। रोलिंग प्लान इंट्रोड्यूस किया।
अब रोलिंग प्लान में क्या है? इन्होंने बोला कि कोई पांचप साल के लिए आपको किसी एक क्षेत्र पर पूरा फोकस करने की जरूरत नहीं है। हर साल हर साल अलग-अलग क्षेत्रों पर फोकस करो। हर साल एनालिसिस करो और फिर उसे 5 साल के लिए अपडेट करो। मतलब सीधी बात ये है कि ये जो रोलिंग प्लान है हर साल अपडेट होगा। हर साल इसका एनालिसिस होगा कि हमने कितना अचीव किया, कितना अचीव नहीं किया। नहीं किया तो इंप्रूव करना है। तो मतलब अच्छे इरादे के साथ, अच्छे तरीके के साथ ये लेकर आए रोलिंग प्लान। तो रोलिंग प्लान में क्या है? हर साल हर साल एनालिसिस हर साल एनालिसिस और हर साल अपडेट। यानी हर साल एनालिसिस करो कि क्या कमी है और उसे अगले साल के लिए अपडेट कर दो कि भाई ये कमी नहीं होनी चाहिए। तो हर साल हर साल हर साल एनालिसिस। वैसे दो ही साल टिके ये पर सोचो टिक जाते तो हर साल एनालिसिस होता। हर साल एनालिसिस और हर साल अपडेट। ठीक है? तो हर साल एनालिसिस और हर साल अपडेट करके उसे आगे के लिए तैयार करते जाते हैं। ये रोलिंग प्लान था। पर ये रोलिंग प्लान सक्सेसफुल होता है। उससे पहले सरकार गिर गई। 1900 1979 में 1979 में सरकार गिर गई। और फिर चौधरी चरण सिंह की सरकार आ गई। वह प्रधानमंत्री बन गए। फिर 1980 में 1980 में फिर अपने इंदिरा गांधी जी की फिर से सरकार आ गई। और इंदिरा गांधी जी ने वैसी जैसी सरकार बनी। 1980 से उन्होंने फिर से अपना दूसरा जो पंचवर्षीय योजना है वो चालू कर दी। फिफ्थ पे तो खत्म हुई थी। छठवीं पंचवर्षीय योजना उन्होंने वहां पर शुरू कर दी। समझ में आया बेटा? समझ में आया कि नहीं? सभी लोग बताएंगे। क्लियर है? क्लियर है ना? देखो ये थी अपनी पंचवर्षीय योजना। हां। पहली पंचवर्षीय योजना। बिल्कुल। ठीक है? मतलब पहली मतलब पहली तो यहां पहली मतलब पहली जो हमने डिस्कस की है। यह है पांच पांचवी पंचवर्षीय योजना है। पर मतलब हमने हमारी पहली है जो हमने डिस्कस की है। बाकी मैं फर्स्ट, सेवंथ और फोर्थ को भी डिस्कस कर रहा हूं अभी। अभी यहीं कर लेंगे सब कुछ। चिंता मत करो। ठीक है? हां। मैं बता रहा हूं ना। मैं बता रहा हूं। चिंता क्यों करते हो?
चलो देखो। हां बिल्कुल बिल्कुल मैं बताता हूं। टारगेट रेट कितना था? अचीव कितना किया वो भी बताता हूं। टारगेट रेट कितना था इस पंचवर्षीय योजना में और अचीव कितना किया? अचीव्ड रेट कितना है? टारगेट रेट कितना था और अचीव्ड रेट कितना? कोई बताएगा जल्दी से बताओ कितना हमने टारगेट किया था कि भ हमारी जो जीडीपी है इतनी परसेंट बढ़नी चाहिए और कितना हुआ फिर? बताओ। देखो 4.4% था। हमने सोचा था 4.4% बनेगी पर ये 4.5% बनी। तो ज्यादा इंप्रूवमेंट नहीं है यार। कोई ड्रास्टिक चेंज नहीं है। कोई ज्यादा कुछ उखाड़ नहीं लिया हमने यहां पे। एक पॉइंट एक पॉइंट आगे बढ़ा है। 1% भी नहीं एक पॉइंट आगे बढ़ा है। ठीक है? 4.4 से 4.5 हुआ है। ठीक है?
चलो अब आ जाते हैं फर्स्ट फाइव ईयर प्लान पे। फर्स्ट फाइव ईयर प्लान 1951 से 56 के बीच में। ठीक है? और ये कृषि और सिंचाई पर आधारित यानी कृषि कृषि पर फोकस। इसमें एग्रीकल्चर पर फोकस किया गया। इसमें एग्रीकल्चर पर फोकस किया गया। दोस्तों कृषि पर फोकस किया गया। ठीक है? एग्रीकल्चर पर फोकस किया गया। बिल्कुल बिल्कुल मैं बताता हूं। उसके अलावा उसके अलावा यहां पर उसके अलावा यहां पर ये हेरोड डोमर मॉडल पर आधारित था। हेरोड एच ए डबल आर ओ डी डोमर हेरोड डोमर मॉडल। हेरोड डोमर मॉडल। ठीक है? हेरोड डोमर मॉडल पे आधारित था। और हेरोड डोमर मॉडल ये बोलता था कि भाई इस मॉडल के हिसाब से पता है क्या बोलते ये बोलते थे सेविंग्स करो। पैसा कमा रहे हो ना? अर्थव्यवस्था पे अर्थव्यवस्था में पैसा आ रहा है। सेविंग्स करो। सेविंग्स करने के बाद सेविंग्स के बाद इन्वेस्ट करो। सेविंग्स करो पहले फिर इन्वेस्ट करो। अर्थव्यवस्था बढ़ेगी। तो हेरोड डोमर मॉडल पे आधारित था कि सेविंग्स करके इन्वेस्ट करना है। जैसे हम लोग अभी भी कर सकते हैं। जैसे मान लो मेरी सैलरी है। मान लो मेरी सैलरी है। मेरी सैलरी से जो भी जो भी सैलरी मेरी बनती है उस हिसाब से मैं जो है मान लो मैं 20% 30% जो है पैसा जो है सेव कर लेता हूं। फिर उस पैसे को मैं 10 साल बाद जो है जो जब बहुत बड़ा अमाउंट बन जाएगा तो मैं उसको कहीं इन्वेस्ट कर दूं। ये तरीका अर्थव्यवस्था में इंप्लीमेंट कर रहा है डोमर मॉडल। ये बोल रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को भारतीय अर्थव्यवस्था को ये मॉडल के अनुसार ये कहा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले सेविंग्स करनी चाहिए। पैसा कमाना चाहिए। फिर जो सेविंग्स बचाई जाएगी जो सेविंग्स बचेगी उसको फिर इन्वेस्ट करना है भारतीय अर्थव्यवस्था में। तो बहुत लंबा प्रोसेस हो जाता है भाई। ठीक है? पर हां अपनाया हम लोगों ने कि भाई सेविंग्स करके इन्वेस्ट करेंगे। तो हेरोड डोमर मॉडल पर आधारित। ठीक है? हेरोड डोमर मॉडल पर आधारित। उसके अलावा यहां पे इस टाइम पे 195156 के बीच में हमारा एसबीआई स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का गठन हुआ। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का गठन हुआ 1 जुलाई 1955 को। भारत का आज के टाइम में सबसे बड़ा बैंक है। है ना? 1 जुलाई 1955 सबसे बड़ा बैंक। भारत का सबसे बड़ा सरकारी बैंक। भारत का सबसे बड़ा सरकारी बैंक। भारत का सबसे बड़ा सरकारी बैंक बाकी तुम बोलोगे सर टारगेट रेट बेटा टारगेट रेट यहां पर 2.1% था और जो अचीव्ड रेट है वो 3.6 है तो यहां पे तो भाई झंडे गाड़ दिया हमने यहां तो लठ गाड़ दिया यहां लठ गाड़ दिया भाई हमने 2.1% और अचीव कितना किया [संगीत] बताओ इतना ही किया क्या कुछ और है हां हां 2.1 से 3.6% पहुंच गए सीधे। ठीक है? बिल्कुल। और यहां पर एक चीज और यहां पर हम लोगों ने अपने जो डैम्स वगैरह वो काफी बनाए। जैसे भाखड़ा नांगल। ठीक है? भाखड़ा नांगल बनाया। यहां पर हीराकुंड डैम बनाया। दामोदर नदी घाटी परियोजना शुरू की हम लोगों ने यहां पर। तो ये ये सारे काम यहां पर हुए हैं। ठीक है?
बाकी बाकी अब सेवंथ फाइव ईयर प्लान पे आता हूं। सेवंथ फाइव ईयर प्लान। सेवंथ फाइव ईयर प्लान। सेवंथ फाइव ईयर प्लान देखो फिफ्थ तो चला 1974 से 78 तक चला एक्चुअल में तो फिर 1980 से 85 आ गया अपना छठवां सातवां कब से कब तो 1985 से 1990 तक सही बात है भाई 1985 से 1990 क्लियर हां मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं चिंता क्यों कर रहे हो बिल्कुल देखो इन्होंने इन्होंने फोकस किया। इन्होंने फोकस किया 1985 से 1990 के बीच में। यहां पे मेन फोकस था यहां पे मेन फोकस था दोस्तों। यहां मेन फोकस था भोजन यानी फूड। लोगों को काम देना यानी रोजगार और उत्पादकता को बढ़ाना। प्रोडक्टिविटी को बढ़ाना। यानी जो हम काम कर रहे हैं उसका फायदा हो। फ़ूड वर्क प्रोडक्टिविटी इस पर फोकस किया। प्लस इन्होंने फोकस किया कि यार जो असमानताएं हैं जो इनकलिटीज हैं ठीक है उनको कम करना है इनकलिटीज असमानताओं को कम करना है स्त्री पुरुष में असमानता है गरीब अमीर में असमानता है उसको कम करना है ठीक है भाई बिल्कुल क्षेत्रीय असमानता बिल्कुल क्षेत्रीय असमानता को क्षेत्रीय असमानता को कम करना है मेन था क्षेत्रीय असमानता मतलब हर क्षेत्र जो है एक दूसरे से असमान है उनको समान बनाना है तो क्षेत्रीय असमानता क्षेत्रीय असमानता को दूर करना यह उद्देश्य था। ठीक है? बाकी तुम बोलोगे सर यहां पे टारगेट रेट कितना था और अचीव्ड रेट कितना था? टारगेट रेट और अचीव्ड रेट तो 5% तो टारगेट रेट था। 6% हमने अचीव कर लिया। कुछ ज्यादा झंडा नहीं गाड़ा यहां पर हम लोगों ने। ठीक है? सेवंथ फाइव ईयर प्लान। समझ में आ रहा है सबको? हां बिल्कुल बिल्कुल। क्लियर है ना? हां। शाबाश। तो ये हो गया हमारा सेवंथ फाइव ईयर। अब फोर्थ फाइव ईयर प्लान पे आता हूं।
अब फोर्थ फाइव ईयर प्लान और देख लेते हैं। फोर्थ फाइव ईयर प्लान और देख लेते हैं और फिर ये क्वेश्चन खत्म हो जाएगा। मैं सारे करवा चुका हूं। देखो फोर्थ फाइव ईयर प्लान। फोर्थ कब से कब तक? 1969 से 1974 तक। ये फोर्थ फाइव ईयर प्लान। देखो भाई मैंने चारों करवा दिए तुम्हें इसी क्वेश्चन में तो चार पंचवर्षीय योजनाएं तो हमारी यहीं पर हो गई हैं। अब देखो चौथा 1969 से 1974 ठीक है भाई सभी लोग ध्यान से देखेंगे कमेंट सेक्शन में पूरी नजर है जिसको जिसको नींद आ रही है वो प्लीज सो जाना भैया ऐसे परेशान मत होना यार ठीक है कोई दिक्कत नहीं चलो बहुत बढ़िया सेल्फ रिलायंस वेरी गुड वेरी गुड बेटा सेल्फ रिलायंस आत्मनिर्भरता पे वेरी गुड ये बात सही है बोलिए भाई हां ठीक है ठीक ठीक है। ठीक है। ठीक है। अब मैं बताता हूं। मैं बताता हूं। दो-तीन पॉइंट्स हैं। देखो। तो यहां पे यहां पर मेन फोकस था। यहां पर मेन फोकस था दोस्तों। एक तो एक तो स्थिरता के साथ विकास। ग्रोथ विद स्टेबिलिटी। स्थिरता के साथ स्थिरता के साथ विकास। यानी ग्रोथ तो करनी है यार। विकास तो करना है पर स्टेबिलिटी के साथ। स्थिरता के साथ। फ्लक्चुएट नहीं करना ज्यादा। स्थिरता के साथ विकास। यानी विकास हो पर धीरे-धीरे हो। ऐसा ना हो कि एकदम से विकास हो गया। फिर एकदम से धड़ाम से नीचे आए। नहीं, स्थिरता के साथ विकास करना है। धीरे-धीरे ही सही। दूसरी बात सेल्फ रिलायंस यानी कि यानी कि आत्मनिर्भरता। यानी साला हम लोग गेहूं तक के लिए अमेरिका पे निर्भर होते थे। हम बोल रहे हैं नहीं भाई हमें हमें खुद ही अपनी सारी चीजें मैनेज करनी है। तभी तो हम ग्रीन रेवोल्यूशन वगैरह भी लेकर आए। ग्रीन रेवोल्यूशन वगैरह उसी का फेस चल रहा है ये। ठीक है? समझ में आ रही है बात? तो स्थिरता के साथ विकास सेल्फ रिलायंस तो आत्मनिर्भरता किसी और देश पर निर्भर रहने की हमें जरूरत नहीं। हमें इस तरह से काम करना होगा। आत्मनिर्भरता ठीक है। दूसरी बात सर टारगेट रेट कितना था सर? और अचीव कितना किया? कोई बता सकता है टारगेट रेट कितना था और अचीव कितना किया? फोर्थ फोर्थ फाइव ईयर प्लान। देखो यहां यहां चीजें ना थोड़ी पिटी हैं यार। 5.7% टारगेट रेट था। 3.4% हमने अचीव किया। यहां लग गए भाई अपने। हां, यहां तो अपन बर्बाद से हो गए। बिल्कुल। मैं बताता हूं ना यहां पे बर्बादी क्यों हुई? भाई युद्ध हुआ यहां पे यार। 196 1971 में युद्ध नहीं हुआ अपना। देखो 1971 में वो बांग्लादेश को आजाद करवाने को लेकर पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ अपना। तो उसके चक्कर में तो ध्यान से देखो बेटा फोकस फोकस जो है जो हमारा था स्थिरता के साथ विकास सेल्फ रिलायंस ये सब हिल गया भाई फोकस हिल गया क्लियर है हां पर यहां पे एक चीज मैं बता दूं आपको एक तो यहां पे युद्ध हुआ इस टाइम पे क्या हुआ दोस्तों युद्ध हुआ 1971 का युद्ध 1971 और दूसरी बात दूसरी बात यहां पर क्या होता है मैं आपको बताऊं यहां पर एक चीज और 14 नेशनल देखो 14 14 बैंक्स को 14 बैंक्स को नेशनलाइज किया गया। 14 बैंक्स को राष्ट्रीयकृत किया गया। यानी 14 बैंक्स को सरकारी बैंक में कन्वर्ट कर दिया गया। सरकार ने खरीद लिया। 14 बैंक्स। ठीक है? बिल्कुल। 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण उनको सरकारी बना दिया गया। ठीक है? 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ है। क्लियर? चलो, नेशनलाइजेशन ऑफ 14 बैंक्स। तो, यह हमारा हो गया। आंसर क्या है हमारा? आंसर तो हमें पता चल गया। फिफ्थ है।
चलो, नेक्स्ट। व्हिच फाइव ईयर प्लान एम्ड एट एक्सलरेटिंग फूड ग्रेन प्रोडक्शन, इंक्रीजिंग एंप्लॉयमेंट अपॉर्चुनिटीज़ एंड रेजिंग प्रोडक्टिविटी विद फोकस ऑन फूड, वर्क एंड प्रोडक्टिविटी? बताओ। सभी लोग बताएं। किस पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य? खाद्यान्न उत्पादन में तेजी लाना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, भोजन कार्य और उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करते हुए उत्पादकता बढ़ाना था। ये देखना जरा ये बोल रहे हैं फूड वर्क और प्रोडक्टिविटी। है ना? यही बोला ना फ़ूड, वर्क और प्रोडक्टिविटी। देखना इधर पे कहां पर है? इधर पे हम लोगों ने कहां देखा? फ़ूड, वर्क और प्रोडक्टिविटी। ये देखो मेन फोकस फ़ूड, वर्क और प्रोडक्टिविटी। ये तो सातवीं पंचवर्षीय योजना की बात कर रहे हैं। ये तो सातवीं पंचवर्षीय योजना की बात कर रहे हैं दोस्तों। समझो कि नहीं? ठीक है? तो आंसर तो है सेवंथ फाइव ईयर प्लान जो हम ऑलरेडी डिस्कस कर चुके हैं। ये ऑलरेडी पढ़ चुके हैं हम। ठीक है? पर पर हमारे लिए यहां पे नया है सिक्स्थ फाइव ईयर प्लान। सिक्स्थ फाइव ईयर प्लान। तो सिक्स्थ फाइव ईयर प्लान कैसा भाई? सिक्स्थ फाइव ईयर प्लान कब से ले कब तक? भाई फिफ्थ चला तुम्हारा 1974 से 1978। ठीक है? तो सिक्स्थ चला 1980 से 85 1980 से 85 जब इंदिरा गांधी की सरकार आई 1980 में तो उन्होंने फिर से चालू कर दिया पंचवर्षीय योजना सही बात है भाई बिल्कुल और यहां पर इन्होंने फोकस किया बिल्कुल यहां पे इन्होंने फोकस किया आधुनिकीकरण और मॉडर्न हां आधुनिकीकरण यानी मॉडर्नाइजेशन और टेक्नोलॉजी पर आधुनिकीकरण आधुनिकीकरण और आधुनिकीकरण और टेक्नोलॉजी यानी प्रौद्योगिकी पर प्रौद्योगिकी प्रौद्योगिकी ठीक है। आधुनिकीकरण आधुनिकीकरण और प्रौद्योगिकी पर 1980 से 85 ठीक है भाई। आधुनिकीकरण और प्रौद्योगिकी पर ठीक है। इन्होंने फोकस किया यानी मॉडर्नाइजेशन और टेक्नोलॉजी पर। तो अब देश को थोड़ा सा मॉडर्नाइज करने की जरूरत थी। तो मॉडर्नाइजेशन, मॉडर्नाइजेशन और देश को टेक्नोलॉजी से लेस करने की थी। ठीक है? मॉडर्नाइजेशन और टेक्नोलॉजी इस पर ज्यादा फोकस किया गया। भाई इस पर ज्यादा फोकस किया गया। टारगेट रेट क्या रखा हमने यहां पर? और अचीव क्या किया? टारगेट रेट और अचीव्ड रेट क्या थी? कोई बताएगा? मालूम किसी को बताओ बताओ हम बिल्कुल देखो टारगेट रेट था 5.2% और अचीव हमने किया 5.7% झंडू अचीव किया है भाई हमने क्या अचीव किया है ये 5.2 5.7 वाला लल्लू लल्लू विकास चल रहा है यार लल्लू टारगेट अचीव कर रहे हैं हम लोग हां और करने पड़ गए हमें भाई बैंक बैंक क्या नेशनलाइज़ करने पड़ गए और छह बैंक्स और नेशनलाइज़ किए हम लोगों ने छह बैंक्स और नेशनलाइज़ किए सिक्स बैंक्स को नेशनलाइज किया गया यहां पर। ठीक है? सिक्स बैंक्स को नेशनलाइज किया गया। राष्ट्रीयकृत किया गया। इधर इधर किस में किया था हम लोगों ने? राष्ट्रकृत। देखो हमने यहां पे किया है चौथी में। चौथी में नहीं चौथी में नहीं किया हमने। हां चौथी में किया 14 बैंक्स को और उसके बाद यहां सिक्स्थ में
हमने और छह बैंकों को राष्ट्रगित किया। 14 + 6 = 20 हो गए टोटल। समझ में आ रहा है बेटा?
हां बिल्कुल। और इसी टाइम पे इसी टाइम पे क्या होता है? इंदिरा गांधी जी ने वो ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था। खाली आतंकवादियों को मारने के लिए गोल्डन टेंपल अमृतसर में। याद है? उसके चक्कर में फिर वो हिंदू सिख दंगे हुए थे। तो याद रखना है 1984 में वो ऑपरेशन ब्लू स्टार वो भी इस टाइम पे चला। पूछ सकते हैं आपसे ऑपरेशन ब्लू स्टार कौन सी पंचवर्षीय योजना के दौरान था? तो ऑपरेशन ब्लू स्टार ठीक है भाई।
उसके अलावा उसके अलावा उसके अलावा यहां पर देखो, उसके अलावा यहां पर और था क्या? यहां पर नाबार्ड नाबार्ड की स्थापना हुई, नेशनल बैंक नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट, नाबार्ड की स्थापना हुई 1982 में। नाबार्ड की स्थापना नाबार्ड की स्थापना 1982 में। यानी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों के लिए एक संस्था बनाई गई। ग्रामीण क्षेत्रों के जो बैंक हैं उनको कंट्रोल करने के लिए एक संस्था बनाई गई, नाबार्ड, नेशनल बैंक फॉर रूरल डेवलपमेंट एंड एग्रीकल्चर है ना या फिर नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट, नाबार्ड 1982 में। तो भाई यह छठवीं पंचवर्षीय योजना थी।
ठीक है? चलो। द प्लानिंग कमीशन वास सेट अप ऑन वि डेट एंड द प्लान स्टार्टेड फ्रॉम 1 अप्रैल 1951 विद द लॉन्चिंग ऑफ फर्स्ट फाइव ईयर प्लान 1951 टू 56। योजना आयोग की स्थापना किस डेट को की गई थी और योजना युग की शुरुआत 1 अप्रैल 1951 से पहली पंचवर्षीय योजना के शुभारंभ के साथ हुई थी। तो मुझे बताओ योजना आयोग, प्लानिंग कमीशन, प्लानिंग कमीशन कब बना था? सभी लोग बताएंगे दोस्तों, प्लानिंग कमीशन कब बना सर और कितने क्वेश्चन हैं?
आ शाबाश शाबाश। और कितने क्वेश्चन? मुझे नहीं मालूम दोस्त, मुझे नहीं मालूम। 12:00 बजेंगे तुम्हारे।
ठीक है? 12:00 बजेंगे पक्का, 12:00 बजेंगे। मतलब ये मान के चलो भाई तुम्हारे पास 10, 10, 12 क्वेश्चंस और हैं। 10 12 क्वेश्चंस और हैं।
ठीक है? चलो बताओ, जल्दी से बताओ। भाई योजना आयोग देखो ना भाई, योजना आयोग की स्थापना हुई है 15 मार्च 1950 को, नेहरू जी ने। देखो भाई पंडित जवाहरलाल नेहरू, पंडित जवाहरलाल नेहरू, पंडित जवाहरलाल नेहरू यानी उस टाइम पे हमारे प्राइम मिनिस्टर ने योजना आयोग की योजना आयोग की स्थापना 15th मार्च, 15th मार्च 1950 को की। ठीक है? और दूसरी चीज देखो, इसके इसका ऐ क्या था? योजना आयोग का ऐ क्या था? उद्देश्य क्या था? योजना आयोग को क्यों बनाया गया? योजना आयोग के दो उद्देश्य थे। एक तो फाइव ईयर प्लांस को बनाने के लिए, पंचवर्षीय योजनाओं को बनाना, फाइव ईयर प्लांस को बनाना। एक तो यह उद्देश्य था और दूसरा मिनिस्ट्रीज के बीच में, मंत्रालयों के बीच में बजट का एलोकेशन। मंत्रालयों के बीच में कि किस मिनिस्ट्री को कितना पैसा जाना चाहिए ताकि वो पूरे देश में उस अपने क्षेत्र में विकास कर सके। तो फाइव ईयर प्लांस को बनाना और मंत्रालयों के बीच बजट का आवंटन। बजट का एलोकेशन। बजट का आवंटन कि किस राज्य को कितना पैसा देना है या किस देखिए किस राज्य को नहीं, किस मिनिस्ट्री को, किस मिनिस्ट्री को कितना पैसा देना है कि वो मिनिस्ट्री अपने पोर्टफोलियो, यानी जिस जिस मिनिस्ट्री है वो जो भी मिनिस्ट्री जैसे फाइनेंस मिनिस्ट्री है तो फाइनेंस मिनिस्ट्री को कितना बजट दे कि वो फाइनेंस के लिए काम करे, एग्रीकल्चरल मिनिस्ट्री को कितना बजट दें कि वो एग्रीकल्चर के क्षेत्र में काम करे पूरे देश में। तो इस तरह से मिनिस्ट्रीज को बजट का एलोकेशन यहां पे यही करता था, फाइव ईयर प्लान। आज के टाइम में, आज के टाइम में भाई मैं बोल रहा हूं योजना आयोग, आज के टाइम में योजना आयोग को रिप्लेस किया जा चुका है नीति आयोग के द्वारा। आज के टाइम में रिप्लेस किया जा चुका है दोस्तों योजना आयोग को नीति आयोग के द्वारा।
ठीक है? तो अब 2015 में, फर्स्ट जनवरी, फर्स्ट जनवरी 2015 से नीति आयोग आ चुका है। ठीक है? और एक चीज याद रखना बेटा, एक चीज सभी लोग याद रखेंगे कि जैसे नीति आयोग के हेड प्रधानमंत्री होते हैं ऑटोमेटिकली, जो भी देश का प्रधानमंत्री बनेगा वो वो ऑटोमेटिकली नीति आयोग का हेड बन जाएगा। वैसे ही योजना आयोग के हेड भी देश के प्रधानमंत्री ही होते थे।
ठीक है? याद रखना जो भी देश का प्रधानमंत्री बनता था वो ऑटोमेटिकली प्लानिंग कमीशन या योजना आयोग का हेड बन जाता था। पर 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग को गठित किया गया। नीति आयोग को बनाया गया। और याद रखना इसे थिंक टैंक ऑफ इंडियन गवर्नमेंट बोला जाता है। तो भारत सरकार के लिए सोचने का काम करता है। पॉलिसी वगैरह नीतियां वगैरह बनाने का काम करता है। थिंक टैंक ऑफ, थिंक टैंक ऑफ इंडिया। थिंक टैंक ऑफ इंडियन गवर्नमेंट। इनफैक्ट भारत सरकार की भारत सरकार की थिंक टैंक है। तो 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग की स्थापना हुई। इसका इसका याद रखना यह ना तो कॉन्स्टिट्यूशनल है।
ठीक है? नॉन कॉन्स्टिट्यूशनल है। कॉन्स्टिट्यूशन तो है नहीं। संविधान में तो कोई जिक्र नहीं है।
ठीक है? नॉन कॉन्स्टिट्यूशनल, नॉन कॉन्स्टिट्यूशनल एंड नॉन स्टटरी। ना तो इसे संसद में बनाया गया कोई कानून के द्वारा, तो स्टटरी भी नहीं है। कानूनी भी नहीं है। ना ही ये संवैधानिक है क्योंकि संविधान में भी नहीं बनाया गया। तो नॉन कॉन्स्टिट्यूशनल, नॉन स्टेटरी बॉडी है ये।
ठीक है? गैर संवैधानिक, गैर कानूनी। कानूनी मतलब कि एक तरीके से मतलब संसद द्वारा नहीं बनाई गई। गैर कानानूनी बोलना तो यह हो जाएगा गलत है।
ठीक है? तो नॉन कॉन्स्टिट्यूशनल और नॉन स्टेटरी बॉडी। बेसिकली, बेसिकली, बेसिकली इसका हेड क्वार्टर है। इसका हेड क्वार्टर है नई दिल्ली। और इसके हेड हैं, इसके हेड हैं पीएम। इसके हेड हैं पीएम। और बेटा देखो ध्यान से सभी लोग। इसके हेड पीएम है। उसके अलावा इसमें जो वाइस हेड हैं यानी जो वाइस चेयरमैन है, चेयरमैन तो पीएम हो गए। वाइस चेयरमैन हैं सुमन बेरी जो कि इकोनॉमिस्ट हैं।
ठीक है? सुमन बेरी और एक इसके जो सीईओ हैं, चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, सीईओ। भाई हेड तो पीएम हो गए। वाइस चेयरमैन सुमन बेरी हो गए। सीईओ हैं बीवीआर सुब्रमण्यम। बी वी आर सुब्रमण्यम।
ठीक है भाई चलो। तो याद रखना योजना आयोग को रिप्लेस कर चुका है कौन? नीति आयोग। और नीति आयोग का फुल फॉर्म याद रखना यार, नीति आयोग का फुल फॉर्म याद रखना। नीति का फुल फॉर्म नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया। नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया है। ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया नहीं है। फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया। तो नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया।
ठीक है? चलो। व्हिच ऑफ़ द फॉलोविंग मेजर्स इज़ आर लाइक लाइकली टू बी अडॉप्टेड बाय आरबीआई टू कॉम्बैट इनफ्लेशन? मुद्रास्फीति से निपटने के लिए आरबीआई द्वारा निम्नलिखित में से कौन सा उपाय अपनाए जाने की संभावना है? जिन्होंने फाउंडेशन बैच पढ़ा है, वह जानते हैं कि आरबीआई किस तरह से मुद्रास्फीति यानी महंगाई को रोकने का काम करता है और अगर तुम इसका जवाब दे पाते हो, तो मैं फटाफट से एक्सप्लेन कर देता हूं। जल्दी से बताओ, जल्दी से। जल्दी से बताओ। आरबीआई क्या करेगा भाई? बताओ। इनफ्लेशन यानी महंगाई से निपटने के लिए। इनफ्लेशन यानी महंगाई से निपटने के लिए आरबीआई क्या उपाय करेगा? ए इनक्रीज सीआरआर, बी इंक्रीज रेपो रेट। बताओ। ए और बी दोनों। बोथ। वेरी गुड। ए और बी दोनों। वेरी गुड। ए और बी दोनों। अब मैं आपको यहां पे समझा देता हूं। फटाफट से देखो भाई। देखो आरबीआई, आप सब जानते हो, आरबीआई सब जानते हो कि सबसे बड़ा बैंक है हमारे देश का। पूरे बैंकिंग सिस्टम को ही वो मैनेज करता है। पूरे देश में जो बैंकिंग सिस्टम चल रहा है, जो पूरा बैंकिंग सिस्टम चल रहा है उसे कंट्रोल कौन करता है? आरबीआई। ठीक है? तो बैंकों का बैंक है, सरकार का बैंक है आरबीआई। देखो ध्यान से अब सब लोग। जैसे सपोज़ करो भाई यह है पब्लिक इधर पे। सपोज करो यह पब्लिक है यहां पर। यहां पर पब्लिक के साथ डील करते हैं कमर्शियल बैंक्स जैसे SBI, ठीक है? PNB, पंजाब नेशनल बैंक या फिर अपना अपना अपना Axis Bank मान लो। ठीक है? Axis Bank। तो ये अपने कमर्शियल बैंक्स हैं। कमर्शियल बैंक्स का मतलब होता है दोस्तों वाणिज्यिक बैंक्स का मतलब होता है जो ऐसे बैंक्स हैं जो हमें सुविधाएं तो दे रहे हैं पर सिर्फ और सिर्फ प्रॉफिट कमाने के लिए। सिर्फ और सिर्फ प्रॉफिट कमाने के लिए। और इधर ये हो जाता है आरबीआई। अब ध्यान से सुनना बेटा, सभी लोग ध्यान से देखना, मजा आएगा। में अभी समझ में आ जाएगा। दो दो चार मिनट की बात है भाई। जिस तरह से हम पब्लिक के लिए हमारे बैंक यह हैं, है ना भाई? जैसे हम पब्लिक हैं। तो हमारे लिए हमारे बैंक्स क्या हैं? SBI है, PNB है, Axis है, HDFC है, ICICI है। है ना? देना बैंक, Yes Bank, Can Bank। तो यह सारे बैंक्स जो हैं, यह हमारे साथ डील करते हैं। पब्लिक के साथ डील करते हैं। और जब जब इन बैंक्स को कोई जरूरत पड़ती है तो ये आरबीआई की मदद लेते हैं। जैसे हमें जब लोन चाहिए तो हम किससे लेते हैं? SBI, PNB, Axis वगैरह से। जब इनको लोन चाहिए तो किससे लेते हैं? आरबीआई से। समझ रहे हो? तो देखो जिस तरह का संबंध हमारे बीच और हमारे बैंकों के बीच है उसी तरह का संबंध इन बैंकों के बीच और आरबीआई के बीच है। अब कैसे समझ में आएगा? मुझे एक बात बताओ। मुझे एक बात बताओ सभी लोग बताएंगे। अगर जनता के पास जनता के पास मनी सप्लाई बहुत ज्यादा है। मान लो जनता के पास मनी सप्लाई बहुत ज्यादा है। जनता के पास बहुत पैसा आ रहा है तो जनता क्या करेगी? जनता के पास अगर पैसा आ रहा है तो जनता क्या करेगी? डिमांड करेगी बहुत ज्यादा। जनता के पास अगर मनी सप्लाई आ रही है, जनता के पास बहुत पैसा है, तो जनता के पास अगर बहुत पैसा है तो जनता बहुत ज्यादा डिमांड करेगी। बहुत ज्यादा डिमांड करेगी तो ऑब्वियस सी बात है सप्लाई कम पड़ेगी। और जब सप्लाई कम होगी, डिमांड ज्यादा है तो दोस्तों प्राइस तो चीजों का बढ़ेगा ही। और इसी को हम बोल देते हैं इनफ्लेशन यानी महंगाई। इसी को बोल देते हैं इनफ्लेशन यानी महंगाई। अब ध्यान से देखना सभी लोग। भाई महंगाई क्यों बढ़ रही है? महंगाई क्यों बढ़ रही है? कि लोगों के पास है पैसा। मार्केट इकॉनमी में अर्थव्यवस्था में पैसा ज्यादा है। तो ज्यादा पैसा है तो लोगों के सबके पास पैसा है। तो सब लोगों के पास जब पैसा आ गया तो सब लोगों ने डिमांड कर दी बहुत ज्यादा कि भाई हमें ये भी चाहिए वो भी चाहिए। अब जो चीज चाहिए इतने सारे लोगों ने डिमांड कर दी कि सप्लाई कम हो रखी है उनकी। पूर्ति नहीं हो पा रही है। अब जब चीजें लिमिटेड हैं और उसकी डिमांड बहुत ज्यादा है तो भाई उस चीज की कीमत बढ़ जाती है। उस चीज की कीमत बढ़ जाती है। अब तुम देखो ना लोहा और सोना। लोहा और सोना। लोहा तो भर-भर के पड़ा हुआ है अपने पास। सोना उतना नहीं है। तो सोने की कीमत है भाई। तो याद रखो जब चीज की सप्लाई कम होती है और डिमांड ज्यादा होती है तो प्राइस तो बढ़ेगा ही।
ठीक है? अब बात यह है कि तुम बोलोगे सर तो मतलब हम महंगाई को कम कैसे करें? तुम बताओ महंगाई को कम कैसे किया जाए? भाई जनता के पास पैसा होना बड़ी दिक्कत है। ये है जड़। जड़ क्या है? महंगाई की मनी सप्लाई का ज्यादा होना। जनता के पास पब्लिक के पास मनी सप्लाई का होना। अगर हम मनी सप्लाई कम कर देंगे। यानी जनता के पास पैसा कम करेंगे। जनता के पास पैसा कम होगा तो क्या होगा? वो डिमांड भी कम कर देंगे। डिमांड कम कर देंगे तो सप्लाई बढ़ जाएगी चीजों की।
ठीक है? यही जो सप्लाई हमें दिख रही है, यही बढ़ी हुई नजर आएगी क्योंकि हम डिमांड कम कर चुके होंगे। तो जब डिमांड कम होगी, सप्लाई ज्यादा होगी, तो ऑटोमेटिकली प्राइस क्या हो जाएगा? ड्रॉप हो जाएगा, गिर जाएगा। यानी मेन चीज हमें क्या करनी है दोस्तों? हमें मनी सप्लाई कम करनी है। जनता के पास पैसा पहुंचने नहीं देना है। तो आरबीआई का यही तरीका है। आरबीआई का यही तरीका है कि जनता के पास ज्यादा पैसा नहीं पहुंचेगा तो भैया महंगाई कंट्रोल हो जाएगी। तो जनता के पास पैसा नहीं पहुंचना चाहिए। अब उसका तरीका क्या है? मैं आपको बता देता हूं।
ठीक है? तो मनी सप्लाई ज्यादा हुई तो डिमांड बढ़ेगी। डिमांड बढ़ेगी तो सप्लाई कम होगी और सप्लाई कम होगी तो फिर प्राइस बढ़ेगा उसका। यहां अगर हम मनी सप्लाई कम कर देंगे तो लोग जो है पैसा उनके पास होगा नहीं उतना तो डिमांड कम करेंगे। डिमांड कम करेंगे तो जो सप्लाई अभी कम दिख रही है वो ज्यादा दिखेगी और ज्यादा सप्लाई है, डिमांड कम है तो भाई प्राइस जो है कम हो जाएगा। अब तुम देखो ध्यान से, मैं आपको बताता हूं। मुझे एक बात बताओ, हमने यहां पे देखा। हमने यहां पे देखा कि एक तो सीआरआर बढ़ा के, एक तो सीआरआर बढ़ा के और दूसरा रेपो रेट बढ़ा के आरबीआई मनी सप्लाई को या ये कहो कि जो मुद्रास्फीति है, महंगाई है, इनफ्लेशन है उसे कम कर सकती है। पहले मैं बताता हूं रेपो रेट को बढ़ा के कैसे वह कम कर सकती है। सभी लोग देखो। भाई रेपो रेट क्या होता है? पहले वो समझ लेना। फिर समझ में आएगा। देखो। जैसे मान लो मैं पब्लिक से, देखो मैं पब्लिक हूं। मैं पब्लिक हूं। मैं पब्लिक हूं। मैं पब्लिक हूं। मुझे एसबीआई से लोन लेना है। ठीक है? मुझे एसबीआई से लोन लेना है। तो एसबीआई ने मुझे लोन दिया। एसबीआई ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने मुझे लोन दे दिया। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने मुझे लोन दे दिया। अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया चाहता है कि मैं जो अमाउंट मैंने लोन लिया है वो प्रिंसिपल अमाउंट तो उन्हें लौटाऊं ही। साथ ही साथ जितने टाइम के लिए मैंने लोन लिया है उसका मुझे इंटरेस्ट भी पे करना पड़ेगा। मुझे क्या करना पड़ेगा दोस्तों? इंटरेस्ट पे करना पड़ेगा। इंटरेस्ट रेट है मेरा उस इंटरेस्ट रेट पर मुझे इंटरेस्ट पे करना पड़ेगा। तो मैंने SBI से लोन लिया और SBI उसके बदले मुझसे मेरा वो प्रिंसिपल अमाउंट तो लेगा ही। साथ ही साथ मुझसे इंटरेस्ट रेट भी चार्ज कर रहा है। भाई बैंक है ना उसको भी तो चलना है। यही तो प्रॉफिट एंड का, यही प्रॉफिट एंड का कि यह हमें लोन देते हैं फिर हमसे इंटरेस्ट लेते हैं।
ठीक है? ठीक है? मतलब मेन अमाउंट तो लेंगे ही उसके ऊपर इंटरेस्ट भी लेंगे। पर जब सोचो, अब सोचो, अब सोचो जैसे मान लो पब्लिक के पास बहुत लोन हो गया। पब्लिक ने बहुत लोन ले लिया। बहुत पैसा ले लिया बैंक से। बहुत पैसा हो गया। बहुत पैसा हो गया। डिमांड बढ़ गई। डिमांड बढ़ गई। सप्लाई कम हो गई। सप्लाई कम हो गई तो प्राइस बढ़ गया। तो अब क्या है? ध्यान से देखो। तो जैसे हम लोग लोन लेते हैं फिर इंटरेस्ट रेट पे करते हैं बैंक को तो कई बार इन बैंकों के पास भी खत्म हो जाता है। इन बैंकों के पास भी खत्म हो जाता है पैसा। तो ये किससे लेते हैं? ये आरबीआई से लेते हैं। आरबीआई से लोन लेते हैं। आरबीआई इनको फ्री में थोड़ी दे देगा। आरबीआई जैसे यह हमसे इंटरेस्ट ले रहे हैं वैसे आरबीआई भी इनसे इंटरेस्ट लेता है। यह आरबीआई भी इनसे इंटरेस्ट लेता है। पर ये इंटरेस्ट रेट दो तरह की होती है। आरबीआई इनसे जो इंटरेस्ट रेट लेता है वो दो तरह की होती है। एक तो होती है बैंक रेट। एक तो होती है बैंक रेट। एक क्या होती है दोस्तों? बैंक रेट। एक होती है रेपो रेट। रेपो रेट समझ में आया तुम लोगों को? कि जब जब कमर्शियल बैंक्स आरबीआई से लोन लेते हैं तो आरबीआई को जब वह इंटरेस्ट पे करते हैं ना उस इंटरेस्ट रेट को बोलते हैं रेपो रेट और बैंक रेट। ठीक है? जैसे मान लो मैंने SBI से लोन लिया। SBI ने मुझे 13% पर लोन दे दिया। 13% इंटरेस्ट पर। तो मैं मेन अमाउंट तो दूंगा ही। उस मेन अमाउंट में जो 13% है वो भी चुकाऊंगा। ठीक है? वो मेरा इंटरेस्ट रेट है। 13% इंटरेस्ट रेट। आरबीआई ने लोन दिया मान लो एसबीआई को या पीएनबी को। अब PNB या SBI जो मेन अमाउंट के साथ इंटरेस्ट चुकाएंगे या तो वो बैंक रेट होगा या फिर उसे हम रेपो रेट बोलेंगे। या तो उसे बैंक रेट बोलेंगे या रेपो रेट। अगर अगर PNB ने या SBI ने लॉन्ग टर्म के लिए लोन लिया है 15 20 साल के लिए 30 साल 40 साल के लिए तो लॉन्ग टर्म लोन लिया है तो उसे मिला है बैंक रेट पर। यानी यानी अगर आरबीआई से लोन लिया है 30 40 साल के लिए या 10 साल के लिए 20 साल के 15 साल के लिए तो लंबा लोन है ये तो तो इस पर जो इंटरेस्ट रेट जाएगा आरबीआई के पास PNB की तरफ से वो होगा बैंक रेट पर। अगर अगर कमर्शियल बैंक्स छोटे टेन्योर के लिए, स्मॉल टेन्योर के लिए, शॉर्ट टेन्योर के लिए अगर लोन लेते हैं 2 साल 4 साल 5 साल के लिए तो शॉर्ट टेन्योर के लिए जो आरबीआई चार्ज करेगा कमर्शियल बैंक से उसे बोलते हैं रेपो रेट, रेपो रेट। अब मुझे एक बात बताओ। अगर अगर अगर देखो पब्लिक को लोन बांटते बांटते एसबीआई, पीएनबी ये सब जो है पब्लिक को लोन बांटते बांटते इनका पैसा खत्म हो गया। अब इनका पैसा अगर खत्म हो गया तो उन्होंने आरबीआई से और लोन उठा लिया। फिर बांटने लग गए पैसा और इंटरेस्ट आएगा। तो मतलब अगर जनता तक हमें पैसा रोकने, अगर हमें जनता तक पैसा पहुंचने से रोकना है तो मतलब यह पैसा पब्लिक तक पहुंचना नहीं चाहिए। तो कैसे करेंगे? मुझे एक बात बताओ। अगर आरबीआई बोले, आरबीआई बोले इनका पैसा खत्म हो गया। इनको लग रहा है अरे यार हमारे सामने इतनी पब्लिक है लोन लेने वाली और हमारा पैसा खत्म हो गया। चलो आरबीआई से पैसा लेते हैं। इन्होंने आरबीआई को बोला कि आरबीआई जी वो हमें लोन चाहिए। बोला कितना चाहिए? बोला 10,000 करोड़ का चाहिए। ठीक है? या या फिर हमें 500 करोड़ का चाहिए या हमें 100 करोड़ का लोन चाहिए। तो आरबीआई बोलेगा ठीक है। आप लोग लोन लेना चाहते हो? कोई दिक्कत नहीं है। ले लो। पर हमने रेपो रेट इनक्रीज कर दी है। अब मुझे एक बात बताओ, रेपो रेट है क्या? रेपो रेट इनक्रीस कर दी है। भाई अगर मैं एसबीआई के पास लोन लेने जाऊं और पहले एसबीआई दे रहा था 13% पे। अब मैं बोलूं एसबीआई जी मुझे वो लोन दे दो। बोला लोन तो ले लो पर वो 20% हो गया है। अब बताओ मैं डीमोटिवेट होऊंगा या मोटिवेट होऊंगा लोन लेने के लिए? मैं तो डीमोटिवेट हो जाऊंगा ना यार। मैं जब पिछली बार आया था 13% पे दे रहे थे आप। अब आप 20% इंटरेस्ट बोल रहे हो भाई मेरे को नहीं लेना आपसे। खत्म। मैं डीमोटिवेट हो गया। मैंने नहीं लिया लोन। यहां पर भी क्या होगा? अगर आरबीआई बोले पीएनबी को कि भाई आपको चलो ठीक है लोन चाहिए? कितने साल के लिए? बोलो 5 साल के लिए। बोला ठीक है ले लो। पर हमने रेपो रेट बढ़ा दिए। यानी हमने इंटरेस्ट रेट बढ़ा दिया है शॉर्ट टर्म लोन के लिए। भाई रेपो रेट मतलब शॉर्ट टेन्योर के लिए जब लोन लेते हैं तो शॉर्ट टर्म लोन के लिए हमने रेपो रेट बढ़ा दिया है। तो आपको लोन चाहिए तो बताओ। ये बोलेंगे अरे यार रेपो रेट बढ़ गया। छोड़ो यार नहीं लेते। अब मुझे एक बात बताओ। आरबीआई ने रेपो रेट बढ़ाया। आरबीआई ने रेपो रेट बढ़ाया तो इन्होंने इन्होंने इन्होंने पैसा लेने से मना कर दिया। बोला हमें नहीं चाहिए क्योंकि बहुत महंगा दे रहे हो आप। तो भाई साहब फिर जब इनके पास पैसा नहीं आया आरबीआई की तरफ से तो अब आगे भी नहीं जाएगा। पब्लिक के पास नहीं जाएगा। और जब पब्लिक के पास नहीं जाएगा मनी सप्लाई कम होगी पब्लिक के पास तो क्वांटिटी कम डिमांड करेंगे। सप्लाई बढ़ जाएगी। प्राइस कम हो जाएगा। खत्म है इनफ्लेशन। तो रेपो रेट बढ़ाकर आरबीआई, रेपो रेट बढ़ाकर इनको लोन नहीं देने की बात करता है। इतनी रेपो रेट बढ़ा देता है कि ये डीमोटिवेट हो जाते कि नहीं चाहिए लोन और जब ये लोन इनके पास नहीं होता तो फिर ये पब्लिक को नहीं बांट पाते। पब्लिक के पास लोन नहीं पहुंच पाता, पैसा नहीं पहुंच पाता तो फिर वो डिमांड नहीं करेंगे। डिमांड नहीं करेंगे तो सप्लाई बढ़ जाएगी। सप्लाई बढ़ गई और डिमांड कम हो गई तो प्राइस भी कम हो जाएगा। तो रेपो रेट से तो ये फर्क पड़ता है भाई। रेपो रेट बढ़ेगा यानी कि शॉर्ट टेन्योर के लिए जो इंटरेस्ट रेट है अगर वो बढ़ेगा तो ये डीमोटिवेट हो जाएंगे, नहीं लेंगे।
ठीक है? अब तुम बोलोगे सर एक बार सीआरआर और बता दो। सीआरआर क्या होता है? देखो जैसे मान लो सीआरआर क्या होता है? देखो सपोज़ करो, सपोज़ करो जैसे मैं हूं। मैंने मैंने बैंक में, मैंने बैंक में अपने बैंक में मैंने मान लो SBI में मैंने ₹100 जमा करवाए। मैंने ₹100 जमा करवाए बैंक में। अब बैंक जो है मेरा जो बैंक है SBI वह ₹100 का क्या करेगा? उस ₹100 को वह बांट देगा लोगों में लोन के लिए ताकि वहां से उसको इंटरेस्ट मिले। यही तरीका है इनका। जो भी हम पैसा डिपॉजिट करते हैं वो लोन में जा रखा होता है इधर-उधर। ठीक है? चलो देखो अब मैं आपको बताऊं। जैसे मैंने, पब्लिक ने, पब्लिक ने यानी मैंने ₹100 जमा करवाए एसबीआई के पास। अब होता क्या है? दो रेट्स होते हैं। दो रेट्स होते हैं। एसएलआर, एसएलआर, एसएलआर, स्टटरी लिक्विडिटी रेशियो, स्टटरी, स्टटरी लिक्विडिटी रेशियो। एक तो एसएलआर होता है और एक होता है सीआरआर, कैश रिजर्व रेशियो। भाई आरबीआई की गाइडेंस है इन कमर्शियल बैंक्स को कि भाई जितना भी डिपॉजिट तुम्हारे पास आता है, जितना भी डिपॉजिट तुम्हारे पास है, जितना भी डिपॉजिट तुम्हारे पास है बैंक में तुम ऐसा करो उसका कुछ परसेंट अपने पास बैकअप के तौर पर रखो, उसको आप लोन नहीं दोगे किसी को, वो अमाउंट लोन नहीं जाएगा किसी के पास। यानी आपके पास ₹100 आए तो इन्होंने बोला कि 18% तुम अपने पास एसएलआर रखो, स्टटरी लिक्विडिटी रेशियो रखो, कल को साला जरूरत पड़, ठीक है? सारा का सारा लोन में बांट दोगे और किसी को एकदम से जरूरत पड़ गई कि हमारे मुझे 50 लाख की जरूरत है। कहां से दोगे? तो इसीलिए बैकअप के तौर पे रखो। 18% अपने पास रखो और ऐसा करो 4.5% हमें दे दो या 4% हमें दे दो आरबीआई में जमा करवाओ। मतलब वो पैसा है इसी बैंक का। पर इन्होंने बैकअप के तौर पे कि कभी बैंक की ऐसी तैसी हो जाए तो बैकअप के तौर पे
पैसा है। संभल जाएगी सिचुएशन। तो आरबीआई ने गाइड कर रखा है। गाइडलाइन दे रखी है सभी बैंकों को। सभी बैंकों को कि सभी बैंक अपने पास 18% एसएलआर रखेंगे। यानी 18% जितना भी तुम्हारे पास डिपॉजिट है उसका 18% आप एसएलआर रखोगे और 4% आप सीआरआर कैश रिजर्व रेशियो वो हमें दोगे।
तो आरबीआई के पास जमा करवाना होता है कुछ परसेंट अमाउंट जो कि मान लो आज के टाइम में 4% है और खुद के पास रखना होता है बैकअप के तौर पे वो 18% है। तो ₹100 में से, ₹100 में से अगर 18% यानी कि ₹18, ₹18 तो ₹18 तो यहां पे रख लिए, ₹18 तो यहां पे रख लिए बैंक के पास। ठीक है? ₹18 तो वैसे ही कम हो गए। इनके लोन के, यह लोन बांटते हैं ना, तो ₹100 किसी ने जमा करवाए, ₹100 जमा करवाए, ₹18 तो इन्होंने रख लिए बैकअप के तौर पे, ₹4 इधर पहुंचा दिए, 100 का 4% मतलब ₹4। ₹4 यहां पहुंचा दिए। तो अब बचे कितने? बचे कितने? बचे कितने अब? 18 और 4, 22 तो कितने बच गए भाई? 68, 68 हुए कितने हो गए? या 78 हो गए। 78 हो गए ना? हां 78 हो गए। तो ₹78 जो है यह लोन में बांट देंगे। ₹78 लोन में बांट देंगे। यह लोन में बांट देंगे। ₹78। ठीक है? 78 कहां बांट देंगे बच्चों? लोन में बांट देंगे। तो ये सीन है।
अब मुझे एक बात बताओ। अब तुम बोलोगे सर लोन में तो बांट दिया। अब ये सीआरआर से कैसे आरबीआई कंट्रोल कर सकता है? अगर आरबीआई बोल दे कि भाई ऐसा है, आरबीआई को लग रहा है कि यार ये लोन बहुत बांट रहे हैं। तो आरबीआई क्या बोलेगा? बोलेगा भाई ऐसा है, हमने एसएलआर, एसएलआर और सीआरआर का रेट बढ़ा दिया है। कितना कर दिया सर जी? कितना कर दिया? अब से तुम जो है अपने पास 25% रखोगे एसएलआर और हमें दोगे 10% सीआरआर। ठीक है? 10% सीआरआर दोगे हमें। अब तुम सोचो 100 का 25% यानी ₹25। ठीक है? बढ़ा दिया ना? अब ये इधर ₹10, तो यानी 25, 10, 35 तो गए। अब जो है इसके पास कम पैसे रह गए। मतलब बात ये है आरबीआई ये सब करके ना सीआरआर वगैरह बढ़ा के इनके पास पैसा कम कर देता है। इनके पास पैसा कम होगा तो ये आगे लोन देने में कतराएंगे। तो जब लोन नहीं पहुंचेगा पब्लिक के पास तो पब्लिक के पास मनी नहीं पहुंचेगी। मनी नहीं पहुंचेगी तो डिमांड कम हो जाएगी। सप्लाई बढ़ जाएगी। प्राइस कम हो जाएगा। हो गया इनफ्लेशन कंट्रोल। तो याद रखना बेटा ये एसएलआर और सीआरआर बढ़ा के आरबीआई इनके पैसे कम करता है ताकि ये आगे लोन ना दे पब्लिक को। ठीक है? चलो तो यह हो गया। आगे बढ़ते हैं।
हू अमंग द फॉलोइंग इज नोन एज द आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन प्लानिंग? सभी लोग बताएंगे। निम्नलिखित में से किसे भारतीय योजना के वास्तुकार के रूप में जाना जाता है? बताओ बेटा सभी लोग। बताओ बेटा क्लियर। बिल्कुल विशाल, बिल्कुल बेटा। चलो इसका जवाब क्या है? मैंने अभी तुम्हें बताया था। देखो, हू अमोंग द फॉलोइंग इज़ नोन एज द आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन प्लानिंग? भारतीय योजना के वास्तुकार हैं दोस्तों प्रशांत चंद्र महालनोबिस। जैसे मैंने अभी इनके बारे में आपको सब कुछ बताया। वो आपको दिमाग में रखना है बेटा। तो पीसी महालनोबिस, इन्हें शॉर्ट में क्या बोलते हैं? पीसी महालनोबिस। पीसी महालनोबिस। ठीक है? इनके बारे में मैंने तुम्हें सब कुछ बता दिया है। इनके बारे में मैंने सब कुछ बता दिया है। क्या बता दिया कि ये फादर ऑफ इंडियन स्टैटिस्टिक्स कहे जाते हैं। इन्हें हम ऑलरेडी पीछे पढ़ चुके हैं। इसलिए मैं यहां पे वर्बली बता रहा हूं। पीसी महालोनस को हम क्या बोलते हैं? एक तो फादर ऑफ इंडियन स्टैटिस्टिक्स बोलते हैं। इसके बाद इन्होंने इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट एस्टैब्लिश किया कोलकाता में जिसे आज हम कोलकाता बोलते हैं। उसके बाद इन्होंने क्या किया? इन्होंने अपने, इनके मॉडल पर सेकंड फाइव ईयर प्लान आया। अच्छा इनका मॉडल क्या है? इनका मॉडल क्या है? महालोनोबिस मॉडल है क्या? इनका मॉडल ये कहता है कि हैवी इंडस्ट्रीज में आपको इन्वेस्ट करना चाहिए। भारी भरकम उद्योगों में इन्वेस्ट करना चाहिए। उसमें पैसा बनता है। तो ये इनका सेकंड मॉडल यही तो था। सेकंड फाइव ईयर प्लान में आपने देखा सारा का सारा इंडस्ट्रीज पर फोकस किया गया है। इन्हीं के मॉडल पे आधारित तो है वो। सेकंड फाइव ईयर प्लान में हमने इंडस्ट्रीज पर फोकस किया है। किस पर फोकस किया है? इंडस्ट्रीज पर, उद्योगों पर, मैन्युफैक्चरिंग पर। तो इन्होंने कहा हैवी इंडस्ट्रीज पे फोकस करो। तो सेकंड फाइव ईयर प्लान में हमने इन्हीं की बात मानी। तो याद रखना फादर ऑफ इंडियन स्टैटिस्टिक्स, 1931 में इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट, उसके बाद इन्हें हम कहते हैं, इन्हें हम कहते हैं कि इनके, इनके, इनके, इनके मॉडल पर ही आधारित हमारा सेकंड फाइव ईयर प्लान था और महालनोबिस जो हैं ये हमारा जो पहला प्लानिंग कमीशन था ना जब नेहरू जी ने बनाया 15 मार्च 1950 को, उसके मेंबर भी थे ये, तो उसके मेंबर भी थे। क्लियर बेटा? तो ये प्रशांत चंद्र महालनोबिस। उम्मीद करता हूं कि आपको समझ में आया होगा। क्लियर? सभी लोग बताएंगे। बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया। है ना? तो हमने पढ़ लिया ये तो। बिल्कुल, बिल्कुल। हां, मैं बताता हूं, मैं बताता हूं। अरे 1893 से, 1893 से 1972 तक थे ये, 1972 में इनकी डेथ हो गई थी। इस टाइम पर थे ये पीसी महान। ठीक है?
बाकी दत्तात्रेय गोपाल करवे, इनके बारे में कुछ जानते हो? दत्तात्रेय गोपाल करवे आरबीआई के डेपुटी गवर्नर रहे हैं। भाई ये आरबीआई के डेपुटी गवर्नर रहे हैं। आरबीआई में चार डेपुटी गवर्नर होते हैं। तो उनमें से एक रहे हैं ये आरबीआई के डिप्टी गवर्नर। ठीक है? कब से ले कब तक कोई जानता है? 1960 में रहे हैं। तुम क्या जानोगे? नहीं बता पाओगे। हां। तो 1962 से 1964 के बीच में जब नेहरू जी थे ना प्राइम मिनिस्टर, तब तभी आरबीआई के डेपुटी गवर्नर दत्तात्रेय गोपाल करवे। बाकी धनंजय रामचंद्र गाडगिल, ये तो फर्स्ट क्रिटिक हैं। फर्स्ट क्रिटिक हैं। इंडियन प्लानिंग के, फर्स्ट क्रिटिक ऑफ इंडियन प्लानिंग। फर्स्ट क्रिटिक ऑफ इंडियन प्लानिंग। ठीक है। बाकी, बाकी कक्कदन नंदनाथ राजन। कदन नंदनाथ राजन, इनको जानते हो क्या? के एन राजन को? के एन राजन, बताओ, बताओ सभी लोग। अरे बिल्कुल, देखो फर्स्ट फाइव ईयर प्लान जो पहली पंचवर्षीय योजना आई थी ना, फर्स्ट फाइव ईयर प्लान, उसका फ्रेमवर्क इन्होंने ही तैयार किया, उसको तैयार, फर्स्ट फाइव ईयर प्लान को, उसको तैयार इन्होंने किया, फर्स्ट फाइव ईयर प्लान, यानी उसको तैयार इन्होंने किया, उसका फ्रेमवर्क। यह फर्स्ट फाइव ईयर प्लान में क्या-क्या होना चाहिए? तो फर्स्ट फाइव ईयर प्लान में क्या-क्या होना चाहिए? तो उसका फ्रेमवर्क इन्होंने ही तैयार किया। फर्स्ट फाइव ईयर प्लान का फ्रेमवर्क तैयार किया था इन्होंने। ठीक है दोस्तों? चलो आगे बढ़ते हैं।
व्हाट इज द कैश रिजर्व रेशियो? अब तुम बता सकते हो यार। नकद आरक्षित अनुपात क्या है? बताओ। नकद आरक्षित अनुपात क्या है? सभी लोग बता देंगे। अब तो बताओ। व्हाट इज द कैश रिजर्व रेशियो? व्हाट इज द कैश रिजर्व रेशियो? सभी लोग बताएंगे। इस सेशन को लाइक कर दो, शेयर कर दो बेटा सभी लोग बढ़िया से। हां, अवधेश कुमार किस-किस से कनेक्ट करेगा दोस्त? पढ़ ले भाई। पढ़ ले। रात को कनेक्ट ही कर रहा है तू। बताओ बेटा। शाबाश डी, क्या बात है। अब समझ में आ गया ना तुम्हें? अब समझ में आ गया? देखो, वह न्यूनतम जमा राशि जो वाणिज्यिक बैंकों को आरबीआई के पास आरक्षित के रूप में रखनी होती है। बहुत बढ़िया। वेरी गुड। तो आंसर है द मिनिमम अमाउंट ऑफ़ डिपॉजिट दैट द कमर्शियल बैंक्स हैव टू होल्ड एज रिजर्व्स विद द आरबीआई। ठीक है? आंसर तो हमारा डी है। चलो, गुड हो गया।
द रोल ऑफ़ डैश इज़ टू रेडी टू लैंड टू बैंक्स एट ऑल टाइम्स एंड सो इट इज़ सेड टू बी द लेंडर ऑफ़ लास्ट रिसोर्ट। डैश की भूमि का हर समय बैंकों को उधार देने के लिए तैयार रहना है और इसलिए इसे अंतिम उपाय का ऋणदाता कहा जाता है। बताओ भाई, अंतिम उपाय का ऋणदाता, लेंडर ऑफ़ द लास्ट रिसोर्ट, सभी लोग बताएंगे। किसकी बात हो रही है? किसकी बात हो रही है दोस्तों? यह बात हो रही है आरबीआई की। तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को बोलते हैं लेंडर ऑफ़ द लास्ट रिसोर्ट। अंतिम उपाय का ऋण दाता। अंतिम उपाय का ऋण दाता। एक बात बताओ भाई, सभी लोग बताओ। मुझे एक बात बताओ। सब लोग कमेंट सेक्शन में जवाब देंगे इसका। ठीक है? सब लोग कमेंट सेक्शन में जवाब देंगे बेटा इसका। मुझे ये बताओ 12:30 खत्म हो जाएगा अपना सेशन। ठीक है? मैं अब तुम्हें बोल रहा हूं 12:30 सेशन खत्म हो जाएगा। ठीक है? बस शांति बनाए रखो। मुझे एक जवाब दो। तुम्हें ₹10,000 की जरूरत है। पर किसी ऐसे काम के लिए जरूरत है जो तुम जो है नहीं चाहते कि परिवार वालों को बताओ। मतलब वो तुम्हें लगेगा यार वो दुखी हो जाएंगे। मतलब कोई बुरा काम नहीं है। पर ऐसा काम है जो तुम्हें लग रहा है कि यार मम्मी पापा से मांगने की हिम्मत नहीं हो रही। उनके पास तो बेचारों के पास वैसे ही ऑलरेडी नहीं है। ठीक है? उनके पास वैसे ही कम रहता है। पता नहीं कहां से मैनेज करेंगे। कर तो देंगे वो। मालूम है तुम्हें। कर तो देंगे वो। पर तुम्हें लग रहा है क्यों माता-पिता को दुखी करना? तो तुम दोस्त से मांग रहे हो पैसा। तुम दोस्तों से मांग रहे हो भाई ₹10,000 हो सकते हैं क्या यार बहुत जरूरी है यार ₹10, हो सकते हैं क्या बहुत जरूरी है। तुम्हें लग रहा है चलो मान लो तुम्हें कोचिंग लेनी है कोई, ठीक है? तुम्हें कोई कोचिंग लेनी है। तुम्हें लग रहा है यार वो ₹10 चाहिए, ठीक है? हमें कोई कोचिंग लेनी है ऑफलाइन में, कोई कोचिंग लेनी है। तो अब तुम दोस्तों से मांग रहे हो कि यार मैं तुम लोग मेरी हेल्प कर दो, अभी जब मेरी नौकरी लग जाएगी तो मैं तुम्हें पैसा दे दूंगा। मां-बाप से नहीं मांग सकता क्योंकि उनके पास तो बेचारों के पास वैसे ही पता नहीं कैसे जुगाड़ कर रहे हैं वो। तुमने 10, 15, 20 जो भी तुम्हारे दोस्त हैं उनसे तुमने पूछ लिया दिया कि भाई पैसे दे दो, पैसे दे दो, पैसे दो। तुमने ₹2000 करके भी मांगने की कोशिश की कि तू 20,000 दे दे, तू 2000 दो, मेरे 10,000 हो जाएंगे। मैं कोचिंग बढ़िया कर लूंगा। कोई दिक्कत नहीं है। पर किसी ने पैसे नहीं दिए या ये मान लो उनके पास हुए नहीं जुगाड़। तुम मुझे एक बात बताओ जब दुनिया भर जहां तुमने एक तरीके से पूरी झांक ली है। पैसा तुम्हें मिला नहीं। अल्टीमेटली तुम किसके पास जाओगे? अल्टीमेटली तुम किसके पास जाओगे? अल्टीमेटली तुम्हें मालूम है कि यार इनसे मांगूंगा तो ये तो मदद करेंगे ही। ये तो कहीं से भी जुगाड़ करके करेंगे। किससे पैसा मांगोगे? पापा से। पेरेंट्स से ही तो मांगोगे, पापा मम्मी से। तुम्हें मालूम है कि देखो यार पढ़ाई के लिए ये कभी मना करेंगे नहीं। और कहीं से भी जुगाड़ कर देंगे। अगर मैं इन्हें समझाऊंगा मेरी ये सिचुएशन है। मुझे ये पढ़ाई करनी है। पिताजी तो करते हैं। पिताजी का तो काम ही यही है। बेचारे बचपन से लेके हमारे बड़े होने तक भी हमारी इसी तरह की जरूरतों को पूरा करते हैं। तो तुम्हें पता है कि ये एक इंसान है जिससे मैं नहीं मांगना चाहता। पर अब लास्ट में मेरे पास यही ऑप्शन है। यही मेरी कुछ मदद कर सकते हैं। तुमने पिताजी को बोला। पिताजी ने बोला ठीक है मैं करता हूं जुगाड़ चिंता मत कर तू पढ़ाई कर आराम से और उन्होंने जुगाड़ कर दिया। सेम चीज है भैया यहां पर, सेम चीज है जब कमर्शियल बैंक्स को जब पैसे की जरूरत होती है, ठीक है? जब मैं कमर्शियल बैंक्स के पास भी तो पैसा खत्म होता होगा तो जैसे SBI, PNB, Axis इनके पास भी तो पैसा खत्म होता होगा। तो जब इनके पास पैसा खत्म होता है तो ये दूसरे बैंक से कभी इस बैंक से कभी उस बैंक से पैसा मांगते हैं ताकि इनका बैलेंस हो जाए। पर जब सब बैंक्स की तरफ से मना हो जाती है तो ये किसके पास जाते हैं? फिर ये सारे बैंक्स, कमर्शियल बैंक फिर किसके पास जाएगा आखिर में? आरबीआई के पास। पापा जी पैसे चाहिए तो आरबीआई बोलता है ठीक है, पर ये जो पापा जी है ये इंटरेस्ट लेते हैं। ठीक है? या आरबीआई जो है वो क्या लेता है? इंटरेस्ट लेता है कमर्शियल बैंक से। समझ में आ रही है मेरी बात? तो यहां पे हमें यह समझ में आ गया कि बैंकों को अगर कहीं और पैसा नहीं मिल रहा है, नहीं जुगाड़ कर पा रहे तो एक जगह मिल जाएगा आरबीआई में। वो तो लेंडर ऑफ़ द लास्ट रिसोर्ट है ही। अंत देखो यहां पे क्या लिखा हुआ है? अंतिम उपाय है ऋणदाता का। ठीक है? मतलब लोन देने के लिए अंतिम जगह कहां है? लोन लेने के लिए अंतिम जगह कहां है? लोन लेने के लिए अंतिम जगह है आरबीआई। इन बैंकों के पास। मतलब कहीं और से जुगाड़ कर ले तो ठीक है। वरना यहां से तो मिल ही जाएगा। लेंडर ऑफ़ द लास्ट रिसोर्ट तो है ही। अंतिम उपाय का ऋणदाता है वो। अंतिम उपाय का ऋणदाता है। ठीक है? तो आरबीआई की बात हो रही थी दोस्तों। आरबीआई की बात सबको समझ में आया? क्लियर है? चलो तो मैं यहां पे लिख देता हूं फटाफट से। देखो एसबीआई तो तुम सब जानते हो। SBI की स्थापना 1 जुलाई 1955 को हुई है। लार्जेस्ट बैंक है भारत का, लार्जेस्ट सरकारी बैंक। लार्जेस्ट सरकारी बैंक। और 1921 में इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया के नाम से स्थापित हुआ। इंपीरियल, इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया के नाम से स्थापित हुआ था। ठीक है? हेड क्वार्टर इसका सब तुम सब जानते हो। हेड क्वार्टर एसबीआई का कहां पर है? मुंबई में है। मुंबई में हेड क्वार्टर है। और इसके चेयरमैन भी न्यूज़ में रहे हैं। चेयरमैन भी न्यूज़ में रहे, करंट अफेयर्स में। तो आपको याद रखना है, चला श्रीनिवासलु शेट्टी। श्रीनिवासलु शेट्टी। ठीक है?
बाकी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की अगर हम बात करें तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जो है, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया 1935 में एस्टैब्लिश हुआ था, 1 अप्रैल 1935 में, आरबीआई एक्ट 1934 के तहत, आरबीआई एक्ट 1934 के तहत और आरबीआई, आरबीआई का इनिशियली जो हेड क्वार्टर था 1935 से 1937 तक वो, वो कोलकाता में था। कोलकाता में था। फिर 1937 से हेड क्वार्टर हो गया मुंबई। ठीक है? 1937 से हो गया मुंबई। ठीक है भाई? और उसके अलावा आरबीआई जो है ये बैंकों का बैंक है। बैंक ऑफ बैंक्स है ये। बैंक ऑफ गवर्नमेंट है। यह बैंक ऑफ गवर्नमेंट है ये। ठीक है? सरकार का बैंक है, बैंकों का बैंक है। ठीक है? रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया। बाकी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अभी जो करंट गवर्नर हैं वो कौन है बेटा? कौन है? संजय मल्होत्रा। संजय मल्होत्रा। गवर्नर कौन दोस्तों? संजय मल्होत्रा। ठीक है? तो 26वें गवर्नर संजय मल्होत्रा। बाकी, बाकी ये देखो कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया, आर्टिकल हमारे संविधान के आर्टिकल 266 में है, आर्टिकल 266 में है संविधान के और कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया का मतलब है भारत सरकार का ऐसा फंड, भारत सरकार का ऐसा फंड, भारत की संचित निधि बोलते हैं ना, समेकित निधि, संचित निधि, तो भारत सरकार का वह फंड जिसमें सभी प्रकार के टैक्सेस कलेक्ट किए जाते हैं। सभी प्रकार के टैक्सेस, सभी प्रकार के टैक्सेस कलेक्ट किए जाते हैं। ठीक है दोस्तों? तो भारत सरकार का वह फंड जिसमें सभी प्रकार के टैक्सेस कलेक्ट किए जाते हैं, आर्टिकल 26 में और विश्व बैंक तो तुम जानते हो 1944 में बना था। हेड क्वार्टर वाशिंगटन डीसी में है। वाशिंगटन डीसी में है। और वर्ल्ड बैंक का काम क्या है? जो भी लो इनकम वाली कंट्रीज हैं उनको लोन देना। है ना भाई? वर्ल्ड बैंक का काम क्या है? लो इनकम वाली कंट्रीज को, लो इनकम देशों को, लो इनकम देशों को लोन, लो इनकम देशों को लोन देना यह वर्ल्ड बैंक का काम है। ठीक है भाई? तो आंसर तो हमारा हो गया आरबीआई। चलो नेक्स्ट।
द सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ द रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया कैन हैव अ मैक्सिमम ऑफ़ हाउ मेनी फुल टाइम डेपुटी गवर्नर्स एट एनी गिवन टाइम? भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में किसी भी समय अधिकतम पूर्णकालिक उपगवर्नर कितने हो सकते हैं? भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में किसी भी समय अधिकतम पूर्णकालिक उपगवनर कितने हो सकते हैं? तो बेटा इसका आंसर है, इसका आंसर है चार। कितने हो सकते हैं बेटा? चार। भाई सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया में, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया में, ध्यान से सुनना मेरी बात। इसका पूरा नाम है सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ऑफ़ द रिजर्व बैंक। ध्यान से देखो। सेंट्रल बोर्ड, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ द रिजर्व बैंक, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ दी, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ऑफ़ रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया। इसमें टोटल ही इस सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ऑफ़ आरबीआई में टोटल मेंबर्स होते हैं दोस्तों 21। टोटल मेंबर्स होते हैं 21। अभी भी मैं आऊंगा डेपुटी गवर्नर्स पे, कितने होते हैं वो। टोटल, टोटल मेंबर्स होते हैं 21। अब ये 21 कौन-कौन है? ये आज देखते हैं। 21 मेंबर देखो आरबीआई के पास, आरबीआई के पास, रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पास क्या है? सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स। तो इसमें टोटल 21 मेंबर्स होते हैं। इसी का पार्ट है सब लोग। गवर्नर भी इसी का पार्ट है। तो एक तो यहां पर होते हैं गवर्नर। एक तो दोस्तों होते हैं गवर्नर। चार होते हैं डेपुटी गवर्नर। तो आंसर तो हमें मिल ही गया। कितने होते हैं? चार। चार होते हैं डेपुटी गवर्नर। ठीक है? चार डेपुटी गवर्नर्स होते हैं। समझ में आया सब लोगों को? क्लियर? हां बिल्कुल, बिल्कुल, बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। बिल्कुल। देखो फिर ये यहां पे, यहां पे चार डेपुटी गवर्नर्स होने के बाद ना, चार। दो फाइनेंस मिनिस्ट्री के प्रतिनिधि होंगे। दो रिप्रेजेंटेटिव्स होंगे। प्रतिनिधि होंगे। रिप्रेजेंटेटिव्स होंगे। दो रिप्रेजेंटेटिव्स होंगे। दो रिप्रेजेंटेटिव्स होंगे फाइनेंस मिनिस्ट्री से। वित्त मंत्रालय से। फाइनेंस मिनिस्ट्री से। फाइनेंस मिनिस्ट्री से। फिर, फिर देखो 10, 10 नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स होंगे। सरकार के द्वारा 10 नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स, नामित निदेशक, मनोनीत निदेशक, 10 नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स। समझ में आ रहा है बेटा सबको? हां, तो 10 नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स बाय गवर्नमेंट, सरकार के द्वारा 10 डायरेक्टर्स होंगे। इसमें कितने हो गए? चार और एक, 5, 2, 7 और 17 हो गए। और यहां पे क्या होगा और बताओ? चार मेंबर्स और होंगे अभी। हां, चार, चार, चार लोकल बोर्ड से होंगे। चार डायरेक्टर्स और होंगे। चार निदेशक और होंगे। चार डायरेक्टर्स ऑफ़ लोकल बोर्ड्स ऑफ़, ध्यान से देखो। चार डायरेक्टर्स ऑफ़ लोकल बोर्ड्स ऑफ़, कहां के लोकल बोर्ड्स? हां। डायरेक्टर्स ऑफ़ लोकल बोर्ड्स ऑफ़ दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई एंड कोलकाता। तो ये टोटल हो गए 21। तो याद रखना आरबीआई के अंदर यह संरचना है। आरबीआई के अंदर यह संरचना है कि आरबीआई के अंदर एक सेंट्रल बोर्ड है डायरेक्टर्स का। उस डायरेक्टर्स के सेंट्रल बोर्ड में गवर्नर भी है, डेपुटी गवर्नर्स भी हैं चार। दो फाइनेंस मिनिस्ट्री से रिप्रेजेंटेटिव्स हैं। 10 सरकार के द्वारा नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स हैं। चार डायरेक्टर्स लोकल बोर्ड्स के हैं। जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता के। तो ये भैया चार। अब बात ये कि आपको ये चारों डायरेक्टर्स के अगर नाम भी पता हो ना तो बेटा फिर तो मजा आ जाएगा। फिर मजा आ जाएगा। ये अगर पता कर लो ना तो मजा आ जाए। जैसे एक तो पूनम गुप्ता जी है। पूनम गुप्ता। एक तो पूनम गुप्ता है। एक है टी रविशंकर। यह दोनों ही न्यूज़ में थे और हमने करंट अफेयर्स में कवर किया इन्हें। टी रवि शंकर। ठीक है? अब दो थोड़े से साउथ इंडियन नाम है। कैसे नाम है बेटा? साउथ इंडियन नाम है। याद कर लोगे? मतलब ज्यादा टफ नहीं है। हां, ज्यादा टफ नहीं है। बताओ। बिल्कुल। एम राजेश्वर राव। पहले नाम हो जाएगा एम राजेश्वर राव। एम राजेश्वर राव। और फिर हो जाएगा। अब यहां पे, यहां पे थोड़ा सा तुम्हें नाम थोड़ा लंबा है यार। ठीक है? नाम थोड़ा सा यहां पे लंबा है। तो ये तुम थोड़ा सा अब रटना मारना पड़ेगा। यहां पे रटना मारना पड़ेगा। हां। ठीक है? यहां पे रटना करना पड़ेगा। एकदम यहां तो रटना करना पड़ेगा। बिल्कुल। क्या नाम हो सकता है? कभी देखो। स्वामीनाथन, स्वामीनाथन जानकी रमन, स्वामीनाथन जानकी रमन। ठीक है? चलो तो ये हो गया भाई। नेक्स्ट।
व्हिच वन ऑफ़ द फॉलोइंग इज़ नॉट अ बेसिक प्रिंसिपल ऑफ़ माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशन्स इन इंडिया? निम्नलिखित में से कौन सा भारत में सूक्ष्म वित्त संस्थानों का मूल सिद्धांत नहीं है भाई। माइक्रो फाइनेंस इंस्टिट्यूट्स क्या होते हैं? मैं आपको बता दूं एक चीज। ठीक है? माइक्रो मतलब छोटे। फाइनेंशियल इंस्टिट्यूट का मतलब है जो वित्तीय सेवाएं देते हो। ठीक है? ऐसे छोटे, ऐसे छोटे वित्तीय संस्थान, ऐसे छोटे वित्तीय संस्थान जो वित्तीय सेवाएं, फाइनेंशियल सर्विसेज प्रोवाइड करते हैं। पर किसको? बताओ भाई सभी लोग बताएंगे। बिल्कुल भाई। ऐसे छोटे वित्तीय संस्थान जो वित्तीय सेवा प्रोवाइड करते हैं, जैसे लोन वगैरह देना, जैसे लोनस वगैरह देना, ठीक है? लो इनकम पापुलेशन को। हमारे देश में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनकी पापुलेशन बहुत, जिनकी इनकम जो है वो बहुत कम है। हमारे देश में ऐसे लोग बहुत ज्यादा हैं जिनकी लो इनकम है और इतनी लो इनकम है कि उन्हें, उन्हें क्या होता है कि उनके खर्चे चलने भी मुश्किल हो जाते हैं। अपने परिवार का पेट भी नहीं पाल पाते वो। ठीक है? पेट भी नहीं पाल पाते अपने परिवार का। तो अब उनके लिए जरूरी है कि यार उनको कई बार कर्जा लेना पड़ता है, लोन लेना पड़ता है और उनके पास ऐसे भी कोई काम धंधे नहीं है जिसमें उनको फॉर्मल सैलरी स्लिप वगैरह सब दी जा रही है। उनका काम भी ऐसा होता है नॉर्मल कि भाई बैंक तो कागज मांगेगा लोन के लिए। तो इनके पास पूरे कागज भी नहीं होते। अब कागज भी नहीं है। ठीक है? लोन भी चाहिए तो फिर ये जाते हैं छोटे, ये जो माइक्रो फाइनेंसियल इंस्टिट्यूट्स हैं ना इनके पास जाते हैं। ये इनको फिर लो इनकम पापुलेशन को लोन देते हैं। हालांकि थोड़ा इंटरेस्ट ज्यादा चार्ज करते हैं। बैंकों के कंपैरिजन में 2, 4% एक्स्ट्रा चार्ज करते हैं। पर हां बिना ज्यादा तामझाम के, बिना ज्यादा कागज वगैरह के ये लोन पकड़ा देते हैं। तो ऐसे छोटे वित्तीय संस्थान जो वित्तीय सेवाएं प्रोवाइड करते हैं, जो लोनस देते हैं। ठीक है? जो लोनस देते हैं। जैसे लोंस वगैरह देना किसको? लो इनकम पापुलेशन को। लो इनकम पापुलेशन को। ठीक है? अब देखो, अब ये वित्तीय संस्थान क्या काम करते हैं? एक तो फोकस ऑन वुमेन बोरोअर्स। तो जो जो महिलाएं इनसे उधार लेती हैं उन पर थोड़ा ये नजर रखते हैं। ठीक है? जो जो महिलाएं इनसे उधार, मतलब उधार लेती हैं इनसे लोन वगैरह लेती हैं तो उन पर इनका फोकस रहता है कि भाई महिलाओं को
कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। कोई महिला अगर अपना काम धंधा शुरू करना चाह रही है। कोई ठेला, कोई रेहड़ी, या कोई और बिज़नेस सेटअप करना चाह रही है, तो उसको अगर पैसे की जरूरत है, तो भाई पैसे दो। मतलब कुछ गलत नहीं है। इसमें कुछ गलत तरीका नहीं है। कुछ गलत नहीं है। बस हां, महिला जो बोरोअर्स हैं, महिला उधार जो लेती हैं, ठीक है? तो बिजनेस वगैरह के लिए जैसे भी, तो उन पर यहां पर ट्रस्ट करके उनको लोन दिया जाता है। इनफैक्ट सभी को ट्रस्ट करके लोन दिया जाता है। अच्छा, लेस डॉक्यूमेंटेशन मैंने जैसे बताया, कागज की ज्यादा कारवाई है ही नहीं। तो एक तो महिलाओं पे फोकस करते हैं। ठीक है? ताकि उनको, उनको क्योंकि समाज में उठने की जरूरत उनको भी है। तो वो सही कर पाएं, बढ़िया कर पाएं। उनको गाइड करना बीच-बीच में जरूरी है। लेस डॉक्यूमेंटेशन आपको फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशन से, माइक्रो फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशन से बिना ज्यादा तामझाम, बिना ज्यादा कागज कारवाई के ही लोन मिल जाता है। तो लेस डॉक्यूमेंटेशन ये तो खास बात है इसकी। फोकस करते हैं वुमेन बोरोअर्स पे। ये भी सही बात है। ठीक है? फिर लार्ज अमाउंट ऑफ़ लोन देते हैं क्या? ये मुझे एक बात बताओ। अगर कोई गरीब जो है, जो गरीब है, वो माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशन के पास जाते हैं। पहली बात तो माइक्रो फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशन के पास अमीर जाता ही नहीं। गरीब ही जाएगा, और गरीब जाएगा तो गरीब कोई 40 लाख, 30 लाख, 20 लाख का लोन तो लेगा नहीं। 1-2 लाख का, 2-3 लाख का लोन लेगा। ठीक है? जिसको वो चुका सके। तो भाई माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशन देखो, माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशन जो है वो लार्ज अमाउंट ऑफ़ लोन नहीं देते। ठीक है? और एक चीज़ और, बैंकों की तरह कुछ गिरवी भी नहीं रखते। अगर आप लोन लेने गए हो, आप गरीब आदमी हो, आप लोन लेने गए हो, ना कागज आपसे मांग रहे हैं ज्यादा, ना आपसे कोई ये बोल रहा है कि भाई आपको कोई चीज गिरवी रखनी पड़ेगी अगर आप लोन ना चुका पाए तो, तो वो भी नहीं बोल रहे हैं। लार्ज अमाउंट ऑफ़ लोन नहीं दे पाते, बाकी ये सारी सुविधा दे रहे हैं। ठीक है भाई, चलो। तो बड़ी मात्रा में ऋण नहीं दे पाते।
व्हिच ऑफ़ द फॉलोविंग इज़ नॉट एन एग्ज़ांपल ऑफ़ फिएट मनी? फिएट मनी इन इंडिया देखो, फिएट मनी इन इंडिया, इनमें से फिएट मनी का एग्जांपल कौन सा नहीं है? फिएट मनी का मतलब है भारत सरकार के आदेश पर जारी की गई करेंसी। भारत सरकार के आदेश पर जारी की गई करेंसी। भारत सरकार के आदेश पर जारी की गई करेंसी। समझ में आया कि नहीं? सभी लोग बताएंगे भाई। बिल्कुल देखो। तो भारत सरकार के आदेश पर, भारत सरकार के आदेश पर जारी की गई करेंसी। इसमें करेंसी में क्या आ जाएगा? इसमें कॉइंस भी आ जाएंगे और इसमें नोट्स भी आ जाएंगे, है ना? अब ये तो सब जानते हो, भारत सरकार के आदेश पर ही आरबीआई ₹1 से ज्यादा के जो भी नोट वाली करेंसी है, जो नोट वाली करेंसी है, नोट वाले जितनी भी करेंसी है, वो सब आरबीआई छाप रही है। सिर्फ ₹1 का जो नोट है ना, मैं आपको यहां पे एक बार नोट डाल के लिख भी देता हूं ऐसे ताकि आप सबको पता रहे। ठीक है बेटा? देखो, सारे कॉइंस, सारे कॉइंस प्लस ₹1 का नोट, ₹1 का नोट, यह तो वित्त मंत्रालय छापता है। यह तो वित्त मंत्रालय के अंडर है। यानी सरकार के अंडर है। यह भारत सरकार छापती है। वित्त मंत्रालय छापता है। पर ₹1 से ज्यादा के सभी नोट्स, ₹1 से ज्यादा के सभी नोट आरबीआई छापता है, भारत सरकार के आदेश पर। आरबीआई जारी करता है। आरबीआई जारी करता है। ठीक है भाई? तो कॉइंस और ₹1 का नोट तो वित्त मंत्रालय, और ₹1 से ज्यादा के सभी नोट, चाहे वो पांच का है, चाहे वो 10 का है, चाहे 20 का है, चाहे 50 का है, चाहे 100 का है, चाहे 200 का है, चाहे 500 का है, वो सब आरबीआई जारी करता है। ठीक है? तो भारत सरकार के आदेश पर जारी की गई करेंसी, कॉइंस और नोट्स, जिनको जिनको सोने, जिनको गोल्ड या सिल्वर से बैकअप नहीं किया जाता। जिन्हें गोल्ड, पूरा डेफिनेशन लिख रहा हूं यहां पे, देखो भारत सरकार के आदेश पर जारी की गई करेंसी, जिनके, जिन्हें गोल्ड या फिर सिल्वर, जिन्हें गोल्ड या सिल्वर से बैकअप नहीं दिया जाता। बैकअप नहीं दिया जाता। ठीक है भाई? डायरेक्ट करेंसी है। डायरेक्ट करेंसी आपके पास आती है। तो भारत सरकार के आदेश पर जारी की गई करेंसी। तो ऊपर की वह जितनी भी करेंसी हमने देखी है ना, वो सारी करेंसी फिएट मनी है। अब ₹1 का सिक्का है, ₹2 का सिक्का है, पांच का सिक्का है, 10 का सिक्का है, 20 का सिक्का है, 50 का सिक्का है। ठीक है? या जितने भी नोट हैं, एक का नोट है, दो का नोट है, पांच का, 10 का, 20 का, 50 का, 100 का, 200 का, 500 का, जितने भी नोट्स हैं, ये सारी की सारी, ये सारी की सारी फिएट मनी है। यानी सरकार के द्वारा जारी की गई करेंसी को फिएट मनी भी बोलते हैं। क्या बोलते हैं दोस्तों? फिएट मनी। क्लियर? चलो, बहुत बढ़िया। समझ में आ गया ना? पर इसमें कौन सी? देखो। देखो ₹500 का नोट फिएट मनी है। ₹100 का नोट फिएट मनी है। ₹1 का सिक्का फिएट मनी है। ₹1000 का चेक, बैंक का चेक, क्या फिएट मनी है? क्या सरकार के आदेश पर छपता है चेक? चेक तो भाई ट्रस्ट पर चल रहा है। ट्रस्ट, देखो ट्रस्ट पे चलता है चेक। अगर मैं, अगर मान लो आप में से किसी को जरूरत हो। आप में से किसी को जरूरत हो। आपने अपने दोस्त से बोला, भाई मेरे को ₹5 लाख का चेक दे दे यार। ₹5 लाख दे दे। और मेरे को एकदम से जरूरत है। तो तुम्हारे दोस्त ने बोला, यार ₹5 लाख एक साथ तो इतना बड़ा अमाउंट वैसे नहीं दे पाऊंगा। मैं चेक देता हूं। तू चेक को डाल दे। तेरे पास तेरे पास आ जाएंगे। ठीक है? तेरे पास आ जाएंगे पैसे। तो उसने चेक दे दिया। तुमने वो चेक डाल दिया। तुम्हारे पास पैसे आ गए। ठीक है? समझ में आ रही है मेरी बात? पर अगर मान लो तुम किसी, तुम अपने दोस्त से तो चलो तुमने चेक ले लिया। क्या किसी अनजान आदमी से चेक लोगे कि आप अभी मुझे ₹2 लाख दे दो। तुमने ₹2 लाख दे भी दिए। फिर वो तुम्हें बोल रहा है कि आप ये चेक ले लो और 20 दिन बाद इसको डालना, क्योंकि चेक की वैलिडिटी होती है 3 महीने की। उसने आपको बोला, आप 20 दिन बाद डालना, आपके अकाउंट में पैसे आ जाएंगे। 20 दिन के अंदर वो भाई साहब उड़न छू गया यहां से, और जब आप 20 दिन बाद जो चेक डाल रहे हो ना, तो चेक जो है वो बाउंस हो रहा है। बाउंस हो रहा है। मतलब उसके उस अकाउंट में पैसे ही नहीं है। हालांकि फंसेगा वो, पर वो चला गया, वो तो यहां रुकना ही नहीं है। वो रुका ही नहीं। क्या करेंगे? अब बैंक वाले भी क्या करेंगे? आपका चूना लग गया। बैंक का भी चूना लग गया। समझ रहे हो भाई? तो याद रखो, याद रखो चेक जो है अनजान आदमी से आप ले ही नहीं सकते। चेक तो भरोसे वालों से लिया जाता है कि भाई इसने चेक दिया, मतलब इसके खाते में पैसे होंगे। मैं इसको डालूंगा अपने अकाउंट में चेक को, तो मेरे पास पैसे आ जाएंगे। तो ये तो चेक ट्रस्ट वाली बात है। ₹1000 का चेक। ये फिएट मनी थोड़ी है। सरकारी मनी थोड़ी है। तो आंसर होगा डी। ठीक है? चलो नेक्स्ट।
व्हाट इज़ द फुल फॉर्म ऑफ़ एनबीएफसी? एनबीएफसी का पूरा नाम क्या है? एनबीएफसी का पूरा नाम क्या है? एनबीएफसी का पूरा नाम क्या है? बस आधे घंटे और चलेगा सेशन। आधे घंटे और चलेगा, फिर सेशन खत्म हो जाएगा। जल्दी बताओ बेटा सभी लोग, सेशन को लाइक कर दो, शेयर कर दो बढ़िया तरीके से। सभी लोग सेशन को लाइक कर दो, शेयर कर दो। बिल्कुल देखो, बहुत अच्छा लग रहा है। जितने लोग यहां पर टिक गए ना भाई। हां, जितने लोग टिक गए, बहुत बढ़िया लग रहा है दोस्तों। यही डेडिकेशन तुम्हें तुम्हारी नैया पार करवाएगा। सच बोल रहा हूं। अच्छा लग रहा है वाकई, जितने भी लोग टिके हुए हैं। तो व्हाट इज़ द फुल फॉर्म ऑफ़ एनबीएफसी? नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी। नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी। ठीक है? नॉन बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनी। समझ में आ रही है मेरी बात? चलो। अब ये एनबीएफसी क्या होती है? ये भी तो पता होना चाहिए। हां भाई। एनबीएफसी भी तो पता होनी चाहिए। एनबीएफसी क्या होती है? बताओ। एनबीएफसी क्या होती है? बताओ। नॉन बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनी। हां, बस मैं बताता हूं। देखो, ये बैंक जैसी कुछ सुविधाएं देती है। पर फुल फ्लेज तरीके से बैंक नहीं है। ठीक है? तो याद रखना, ऐसी वित्तीय कंपनी, ऐसी वित्तीय कंपनी जो बैंक जैसी, जो बैंक जैसी कुछ सुविधाएं उपलब्ध करवाती है, जो बैंक जैसी कुछ सुविधाएं उपलब्ध करवाती है। अब तुम बोलोगे सर, जैसे सर, कैसे? क्या यह हमारा पैसा डिपॉजिट करती है? नहीं, बैंक हमारा पैसा डिपॉजिट करते हैं भाई। जैसे हम जाएं अपने बैंक में पैसा जमा करवा सकते हैं। एनबीएफसी ऐसा नहीं करती। लिखा भी तो है नॉन बैंकिंग है भाई। तो ये आपको लोन दे देगी। ये आपको लोन दे देगी। आपके इंश्योरेंस वगैरह कर देगी। पर ये आपका पैसा डिपॉजिट नहीं कर सकती। जैसे बैंक में डिपॉजिट करते हैं। तो ऐसी, ऐसी, ऐसी वित्तीय कंपनी जो बैंक जैसी कुछ सुविधाएं उपलब्ध करवाती है। जैसे लोन वगैरह देना। जैसे लोनस वगैरह देना। जैसे लोनस देना। समझ में आया कि नहीं? ये फुल फ्लेज, फुल फ्लेज तरीके से या फुल फ्लेज बैंक नहीं होते। बस बैंक जैसी सुविधाएं देती हैं। कंपनियां फुल फ्लेज बैंक नहीं है। ठीक है? फुल फ्लेज बैंक तो तब होता है जब यह पैसा भी डिपॉजिट करते हो। उस पर फिर इंटरेस्ट फी देते हो। सही बात है कि नहीं? बैंक तो ये काम करता है। बिल्कुल। तो याद रखना, फुल फ्लेज बैंक नहीं होते क्योंकि इनके पास लाइसेंस ही नहीं है बैंक होने का। क्लियर है? बिल्कुल। चलो आगे बढ़ते हैं।
विच फार्मूला इज़ यूज़्ड टू कैलकुलेट M3 मेज़र ऑफ़ मनी सप्लाई? M3 यानी मुद्रा आपूर्ति की माप की गणना करने के लिए किस सूत्र का उपयोग किया जाता है? ये बता दो। मजा आ जाएगा। सभी लोग बता दो। बढ़िया सा सवाल लेके आए हैं तुम्हारे लिए। जल्दी से बता दो। फिर मैं इसको एक्सप्लेन कर देता हूं। बताओ बताओ। सभी लोग इसका इसका जवाब दो भाई। यह क्या है? हां, सभी लोग बताएंगे भाई। हां, M3, M3, M3 पूछा गया है आपसे। M3 देखो पूरा देखो। M3 पूछा हुआ है। हां, बताओ। चलो ठीक है। आगे बढ़ते हैं। मैं बताता हूं। देखो भाई, मुद्रा आपूर्ति का माप है। मनी सप्लाई का माप है। फॉर्म है M3। मैं आपको पहले तो ये चीज़ बताता हूं। ध्यान से देखो। मनी सप्लाई होती क्या है? ठीक है? मनी सप्लाई क्या होती है? वैसे तो हम अभी तक पढ़ते आ रहे हैं। मनी सप्लाई मतलब जनता के पास पैसा। है ना? है ना? मनी सप्लाई मतलब जनता के पास पैसा। तो एक अर्थव्यवस्था में, एक इकॉनमी में, एक इकॉनमी में, एक अर्थव्यवस्था में जनता के पास, पब्लिक के पास, जनता के पास जितना या जितनी मनी है, एक इकॉनमी में जनता के पास एक पर्टिकुलर पॉइंट ऑफ़ टाइम पर, एक पर्टिकुलर पॉइंट ऑफ़ टाइम पर, देखो एक इकॉनमी में एक निश्चित समय बिंदु पर, एक निश्चित, एक निश्चित समय बिंदु पर, एक सर्टेन पॉइंट ऑफ़ टाइम पर, एक निश्चित समय बिंदु पर, एक इकॉनमी में एक निश्चित समय बिंदु पर जनता के पास, जनता के पास जितनी मनी होती है, जितनी मनी, मनी, जितनी मनी होती है, उसे मनी सप्लाई कहते हैं। उसे मनी सप्लाई कहते हैं। अब जैसे मान लो अभी टाइम हो रहा है एग्जैक्ट 12:5, मान लो 12:05, इस समय बिंदु पर, 12:05 बोल रहा हूं मैं। 12:06 भी नहीं बोल रहा हूं। 12:04 भी नहीं बोल रहा हूं। 12:05 पर हिंदुस्तान की जनता के पास जितनी भी मनी है, चाहे वो उनके पर्स में है, चाहे वॉलेट में है, चाहे उनके बैंक में है, जहां पर भी है, ठीक है? हिंदुस्तान की जनता के पास जितनी भी मनी है, ठीक है? 12:05 पे। उसे हम बोलते हैं मनी सप्लाई। उसे क्या बोलते हैं दोस्तों? मनी सप्लाई। तो एक समय बिंदु पर, एक समय बिंदु पर, ठीक है? उस देश के सभी लोगों के पास जितना भी पैसा है, ठीक है? जितना भी पैसा है, जितनी भी मनी है, वो सब मनी सप्लाई कहलाती है। उस देश की अर्थव्यवस्था की मनी सप्लाई। ठीक है? अब सीन ये है। अब सीन ये है। हमें ये तो पता चल गया कि एक इकॉनमी में एक निश्चित समय बिंदु पर जनता के पास जितनी मनी होती है, उसे मनी सप्लाई कहते हैं। तो मनी सप्लाई जो है, मुद्रा आपूर्ति जो है दोस्तों, उसके चार रूप होते हैं। मुद्रा आपूर्ति के चार रूप होते हैं। एक होता है M1, एक होता है M2। फिर एक होता है M3, और फिर एक होता है M4। ठीक है? एक होता है M4। एक होता है M4। तो चार रूप होते हैं मुद्रा आपूर्ति के, मनी सप्लाई के। चार रूप होते हैं। अब मैं आपको बताता हूं M1 में क्या-क्या होता है। M1 में क्या होता है? देखो, M1 में जितनी भी करेंसी और कॉइंस, जितने भी करेंसी नोट्स हैं आपके पास, करेंसी और कॉइंस, करेंसी और कॉइंस हमारे पास जितने भी, हमारे पास जितने भी करेंसी और कॉइंस हैं, जितने भी हमारे पास नोट्स हैं, ठीक है? जितने भी हमारे पास नोट्स हैं और जितने भी हमारे पास सिक्के हैं, वो सब जो है M1 का पार्ट है। करेंसी और कॉइंस, इन्हें आप, इन्हें आप CC बोल सकते हो, इन्हें शॉर्ट में, इसे क्या बोल सकते हो आप? शॉर्ट है CC। ठीक है, करेंसी एंड कॉइंस। तो CC लिख सकते हो, CU लिख सकते हो, कोई दिक्कत नहीं है, CU। ठीक है, करेंसी एंड कॉइंस। ठीक है? तो मैं यहां पे इसको CC भी लिख सकता हूं और CU भी लिख सकता हूं, करेंसी एंड कॉइंस, और करेंसी कुछ भी लिख सकते हो, कोई दिक्कत नहीं। ठीक है? उसके बाद, इसके अलावा और क्या है यहां पर? उसके अलावा और क्या है M1 में? तो देश की जनता के पास जितना भी, देश की जनता के पास जितना भी करेंसी और कॉइंस है। अब करेंसी, सी करेंसी जो है, यह वो वाली है, जैसे मेरे घर में, जैसे मान लो मेरे पर्स में अभी मान लो, अह मान लो मेरे पर्स में अभी ₹1100 मान लो, ठीक है? नोट्स हैं, नोट्स हैं, करेंसी वाले नोट्स हैं, वो फिर कुछ होंगे ₹120, वो सिक्के भी होंगे। ठीक है? तो सिक्के और वो जो नोट है मिला के वो क्या हुआ? वो हुआ मेरा करेंसी एंड कॉइंस। तो देश में सभी के पास ऐसा होगा। ठीक है? उन सबको मिला के बोल दिया करेंसी एंड कॉइंस, M1 का पार्ट हो गया। M1 में और क्या होता है? DD, DD, PD, डिमांड डिपॉजिट्स, डिमांड डिपॉजिट्स विद कमर्शियल बैंक्स, डिमांड डिपॉजिट्स, डिमांड डिपॉजिट्स विद कमर्शियल बैंक्स। मतलब जो वाणिज्यिक बैंक है, जैसे मेरा SBI है, आपका PNB हो गया या कोई भी, ठीक है? तो मैंने अपने बैंक में जो पैसे जमा कर रखे हैं, मैंने अपने बैंक में जो पैसे जमा कर रखे हैं दोस्तों, ठीक है? वो क्या-क्या है? मेरे डिमांड डिपॉजिट है। मतलब ऐसा डिपॉजिट अमाउंट है जिसको मैं ऑन डिमांड कभी भी निकाल सकता हूं। जैसे मान लो मेरे को डिमांड है पैसे की, तो मैं जाऊंगा एटीएम से पैसे निकाल लूंगा। ठीक है? अगर मुझे मान लो ज्यादा की जरूरत है, मैं चेक से निकाल लूंगा। ठीक है? समझ रहे हो? मुझे कैश निकालना है, तो मैं चेक से निकाल लूंगा या एटीएम से निकाल लूंगा। ऑन डिमांड, मेरी डिमांड हुई। मुझे पैसे चाहिए, तो मैंने ऑन डिमांड निकाल लिए। तो डिमांड डिपॉजिट विद कमर्शियल बैंक्स। कमर्शियल बैंक्स में आपने जो डिपॉजिट कर रखी है, जिन्हें आप ऑन डिमांड वापस निकाल सकते हो, तो डिमांड डिपॉजिट्स। तो करेंसी प्लस कॉइन और डिमांड डिपॉजिट, DD, CC प्लस DD, CC, दीदी, CC, दीदी, याद रखो। तो M1 में CC और दीदी, M1 में CC, दीदी, M1 में CC, दीदी। चलो ठीक है। अब M2 में क्या है? फिर M2 में क्या है? आपसे M3 पूछा है ना, हम चारों कर देते हैं ताकि कोई भी चुप, जब आपसे पूछेगा दोबारा तो आप जवाब दे पाओगे। M2, M2 में क्या है? मैं बताता हूं। देखो, M2 में है। M2 में है दोस्तों, एक तो M1 पूरा है। M2 में M1 पूरा आ गया। यानी ये पूरा आ गया। M2 में M1 तो पूरा आ गया। M2 में M1 है। M1 का मतलब करेंसी एंड कॉइंस इसमें आ गई और डिमांड डिपॉजिट भी इसमें आ गए। उन दोनों के अलावा, M1 में तो ये दो हैं। तो करेंसी एंड कॉइंस और डिमांड डिपॉजिट के अलावा, प्लस सेविंग डिपॉजिट्स विद पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स। पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स, भाई कई सारे लोगों ने अपना खाता पोस्ट ऑफिस के जो सेविंग बैंक्स होते हैं, उनमें भी खुलवाया होता है। है ना? ना, पोस्ट ऑफिस के जो सेविंग बैंक्स होते हैं, उनमें भी खुलवाया होता है। तो मान लो मैंने, मैंने मान लो मेरे पास मेरे घर में मेरे पर्स में कुछ पैसे हैं, तो वो तो हो गए करेंसी एंड कॉइंस, मेरे डिमांड डिपॉजिट कमर्शियल बैंक में, कमर्शियल बैंक में मेरा कुछ अमाउंट है। कुछ मैंने अमाउंट जो है पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स में भी डाला हुआ है। तो M2 में मेरा देखो, मेरे घर में जो कैश पड़ा हुआ है वो हो गया। ठीक है? मेरे अकाउंट में जो पैसा है, डिमांड डिपॉजिट, वो हो गया है यहां पे M2 में। और फिर जो अगर मैंने पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स में भी अगर कुछ डाला हुआ है थोड़ा बहुत, तो वो भी आ गया M2 में। तो M1 प्लस सेविंग डिपॉजिट्स विद पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स, पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स। चलो ये हो गया। अब M3 देखते हैं। M3 में क्या हुआ? मतलब M2 देखो, इससे M1 से बड़ा है। M1 में तो दो ही चीजें थीं, M2 में ये दोनों तो यहीं आ गईं, ये दोनों तो M1 में आ गईं, और एक तीसरी चीज ऐड हो गई है। ठीक है? अब M3 में क्या होता है? M3 में M1 पूरा आ जाएगा, तो यानी, यानी M1 में, मतलब कि M1 आ गया। मतलब पूरा करेंसी एंड कॉइंस आ गई। डिमांड डिपॉजिट विद कमर्शियल बैंक्स आ गए। प्लस नेट टाइम डिपॉजिट्स, नेट टाइम डिपॉजिट्स विद कमर्शियल बैंक्स। अब तुम बोलोगे सर, ये नेट टाइम डिपॉजिट्स क्या होते हैं? नेट टाइम डिपॉजिट्स विद कमर्शियल बैंक्स। नेट टाइम डिपॉजिट का मतलब है दोस्तों, एफडी। फिक्स्ड डिपॉजिट्स करवाते हैं ना हम, एफडीज़ करवाते हैं, फिक्स्ड डिपॉज़िट्स करवाते हैं। आज के टाइम में भारत में ज्यादातर लोग पता है पैसे कैसे रखते हैं? या तो उनके पास घर में होगा कैश, या फिर उन्होंने अपने बैंक में जमा करवा रखा है डिमांड डिपॉजिट। ठीक है? या फिर उन्होंने एफडी वगैरह करवा रखी है ज्यादा, फिक्स्ड डिपॉजिट वगैरह। ठीक है? तो जो मोस्ट कॉमन मनी सप्लाई है भारत में, जो मोस्ट कॉमन मनी सप्लाई है भारत में, वो इस रूप में है M3 के रूप में। लोगों के पास कैश भी है, लोगों के पास बैंकों में भी है, और लोगों के पास एफडीज़ भी हो रखी है, फिक्स्ड डिपॉजिट, नेट टाइम डिपॉजिट्स, मतलब फिक्स्ड डिपॉजिट कि भाई 10-1 साल की मैंने एफडी करवा रखी है। 15 साल के बाद जो है इस एफडी को तुड़वाऊंगा मैं, और 15 साल तक आराम से बैंक मुझे जो है वो एफडी पर इंटरेस्ट देगा। समझ में आ रही है मेरी बात? क्लियर? हां, क्लियर है बेटा? तो M3, M1 + नेट टाइम डिपॉजिट। तो M1 का मतलब CC और DD प्लस नेट टाइम डिपॉजिट। फिर M4, M4, अब तुम्हें आंसर तो पता चल गया होगा ना M3 का। M3 का आंसर तो पता चल ही गया होगा। आंसर तो क्या है अपने पास? यही है। M3 देखो, सी आंसर हो गया। तो करेंसी भी हो गई यहां पे M1 में। DD भी हो गया M1 में। और नेट टाइम डिपॉज़िट विद कमर्शियल बैंक्स। कमर्शियल बैंक्स में, कमर्शियल बैंक्स में, वाणिज्यिक बैंकों में नेट टाइम डिपॉजिट, यानी एफडीज़। और बाकी M4 क्या होता है? M4 में क्या होता है? देखो, M4 में आ जाएगा M3 पूरा, M3 आ गया। M4 में M3 आ गया पूरा। देख रहे हो बेटा? हां। M3 तो, M3 का मतलब क्या हुआ? M3 का मतलब है कि करेंसी एंड कॉइंस, डिमांड एंड डिपॉज़िट्स कमर्शियल बैंक्स के साथ, और फिर सारी एफडीज़। तो M4 में आ गई। प्लस, प्लस, प्लस, इसमें और भी एक चीज ऐड हो जाती है। टोटल, टोटल, टोटल, टोटल डिपॉजिट्स ऑफ़, टोटल डिपॉजिट्स, टोटल डिपॉजिट्स, है ना? हां। ठीक है। ठीक है। टोटल सेविंग डिपॉजिट्स। टोटल सेविंग डिपॉजिट्स, टोटल सेविंग डिपॉजिट्स विद पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स। ठीक है भाई? तो M4 में M3 तो आ ही गया पूरा का पूरा। एक चीज और ऐड हो गई। टोटल सेविंग डिपॉजिट्स ऑफ़ पोस्ट ऑफिस सेविंग बैंक्स। तो भाई सबसे ज्यादा भारतीय इस्तेमाल करते हैं इसको M3 को। इसलिए आपसे पूछा भी M3 ही गया है एग्जाम में। ठीक है? तो M3 में हमें पता चल गया, एक तो सारे के सारे जो हमारे घर में कैश करेंसी पड़ी हुई है, वो, हमारे बैंकों में जो पैसा, प्लस हमारी जो एफडीज़ हैं, वो, वो M3। ठीक है भाई? सबको समझ में आ गया? क्लियर है? तो मोस्ट, हां, मोस्ट कॉमन कौन सा, कौन सा है? मोस्ट वाइडली यूज्ड, तो मोस्ट वाइडली यूज्ड M3। ठीक है? मोस्ट वाइडली यूज्ड कौन सा है दोस्तों? मोस्ट वाइडली यूज्ड, यानी सबसे ज्यादा कौन सा यूज होता है? M3। मोस्ट वाइडली यूज्ड फॉर्म ऑफ़ मनी सप्लाई, फॉर्म ऑफ़ मनी सप्लाई, मोस्ट वाइडली यूज्ड ऑफ़, मोस्ट वाइडली यूज्ड, मोस्ट वाइडली यूज्ड फॉर्म ऑफ़ मनी सप्लाई, M3। मोस्ट वाइडली यूज्ड फॉर्म ऑफ़ मनी सप्लाई, M3। चलो नेक्स्ट।
द सिचुएशन इज़ एन इकॉनमी व्हेन इनफ्लेशन एंड अनइम्प्लॉयमेंट बोथ आर एट हाई लेवल्स इज़ नोन एज़, अर्थव्यवस्था में वह स्थिति जब मुद्रास्फीति और बेरोजगारी दोनों उच्च स्तर पर हो, उसे डैश के रूप में जाना जाता है। कोई बताएगा जल्दी से उस सिचुएशन को क्या बोलते हैं एक देश में? उस सिचुएशन को क्या बोलते हैं? जब महंगाई भी चरम पे हो और साला बेरोजगारी भी चरम पर है। मतलब ना तो हमारे पास पैसा है, ऊपर से महंगाई और हो रखी है। मतलब गरीबी में आटा जो है वो गीला हो रखा है। एक तो वैसे ही गरीबी, ऊपर से ससुरा आटा और पूरा गीला हो गया। खाने को भी नहीं मिल रहा कुछ। बताओ।
शाबाश। सब लोग जवाब दे रहे हैं। बहुत बढ़िया। वेरी गुड। तो ये हो जाएगा बी। स्टगफ्लेशन मुद्रास्फीति जनित मंदी। भाई अगर अगर महंगाई भी बढ़ रखी है, अगर महंगाई भी बढ़ रखी है, ऊपर से ससुरी बेरोजगारी भी है, तो भाई हम तो धरती पर जिंदा ही क्यों हैं? ठीक है? महंगाई बढ़ रखी है, बेरोजगारी भी है। इसी को बोलते हैं स्टकफ्लेशन। इसी को बोलते हैं स्टेकफ्लेशन। है ना भाई? जब साला महंगाई भी है, नौकरी अपने पास है नहीं, महंगाई हो रखी है, बेरोजगारी हो रखी है, भाई तो फिर तो सही बात है, जैसे वो बोलते हैं ना कि फिर तो अपना जन्म जो है वो दो-तीन बार वो जनगणना में काउंट होने के लिए हुआ है। ठीक है? दो-तीन बार जनगणना में काउंट हो गया, अपना निकलो भाई, इस धरती को छोड़ो, ये गोला छोड़ो, दूसरे गोला पे जाओ। ठीक है? तो महंगाई प्लस बेरोजगारी इक्वल टू स्टेफ्लेशन। अच्छा ये क्या है भाई? रीइफ्लेशन। रीइफ्लेशन क्या है? कोई जानता है? रीइफ्लेशन पुनः मुद्रास्फीति। रीइफ्लेशन मतलब दोबारा से महंगाई। दोबारा से महंगाई, है ना? बताओ सर कब तक चलेगी क्लास? बेटा बस मुझे ऐसा लग रहा है, मुझे ऐसा लग रहा है 2025 मिनट और चलेगी। ठीक है? 202 मिनट, हार्डली हार्डली हाफ एन आवर, हार्डली हाफ एन आवर। बस उसके बाद क्लास खत्म कर रहे हैं। अबे ससुरु तुमसे ज्यादा तो तुमसे ज्यादा तो मेरे को चिंता होनी चाहिए, क्योंकि मेरे को सुबह उठके क्लास लेनी है 8:00 बजे, तुम्हारा पेपर लेना है, फिर से एनटीपीसी का एक्सपेक्टेड पेपर है तुम्हारा, वो भी तो करवाना है मुझे 8:00 बजे, तो मैं भी सोचूंगा ना टाइम पे सो जाऊं, चिंता क्यों कर रहे हो? बहुत बढ़िया मयंक बाबू, बहुत बढ़िया। चलो समझ में आया इतना? हां। रीइफ्लेशन क्लियर। देखो रीइफ्लेशन का मतलब क्या होता है? दोबारा से महंगाई आना। मतलब दोबारा महंगाई आना। मतलब बीच में एक बार क्या सब कुछ सस्ता होगा क्या? देखो भाई जैसे मान लो रीइफ्लेशन का मतलब है कि एक बार महंगाई आ रखी थी। एक बार एक बार महंगाई आ रखी थी। महंगाई आ रखी थी। एक बार बीच में फिर जो है डिफ्लेशन आया। इनफ्लेशन के बाद क्या आया? डिफ्लेशन यानी सस्ता हो गया सब कुछ। डिफ्लेशन आ गया। सस्ता हो गया सब कुछ। सस्ता हो गया भाई। दोबारा महंगाई का मतलब क्या है? दोबारा महंगाई मतलब अरे यार दोबारा महंगाई आ गई। मतलब बीच में एक बार सब कुछ सस्ता हुआ है। तो इनफ्लेशन इनफ्लेशन से आएगा डिफ्लेशन। अब देखो एक बार महंगाई आ रखी थी। फिर जो है डिफ्लेशन आ गया। सस्ती हो गई चीजें। ठीक है? सस्ती हो गई। फिर वापस से इनफ्लेशन आ गया। तो इसको बोलते हैं रीइफ्लेशन। यह जो दूसरी बार आया ना, वापस से जो महंगाई हुई, वापस से जो महंगाई हुई है अभी, यह देखो पहले इनफ्लेशन था, महंगाई थी, फिर एकदम से सस्ती हो गई चीजें, फिर वापस से इनफ्लेशन आ गया, तो इसको ये जो दूसरी बार जो आया इसे बोलते हैं रीइफ्लेशन, रीइफ्लेशन। ठीक है? दोबारा महंगाई आना मतलब रीइफ्लेशन। इनफ्लेशन गैप क्या होता है? कोई जानता है क्या? इनफ्लेशन गैप। हां बताओ बताओ। बिल्कुल। देखो इनफ्लेशन गैप क्या होता है? महंगाई मुद्रास्फीति अंतराल क्या होता है? देखो इसका मतलब क्या होता है? इनफ्लेशन गैप। मान लो मान लो हमारे मान लो हमारी जीडीपी जो है, हमारी जीडीपी जो है, हमारी जीडीपी का पोटेंशियल है इतना। हमारी पोटेंशियल जीडीपी, मतलब हमारी जीडीपी में ग्रोथ की जो गुंजाइश है वो इतनी है। मान लो हमारी पोटेंशियल जीडीपी है इतनी। मैं आपको एरो से दिखाता हूं। हमारी पोटेंशियल जीडीपी है इतनी। यानी अभी मान लो हमारी जीडीपी यहां पे चल रही है। हमारी जीडीपी मान लो अभी यहां पे है। मान लेते हैं हमारी जीडीपी यहां पे है। और हम ये सोचते हैं कि यार हमारी जीडीपी बस इतनी और जाएगी ऊपर। उसके बाद ये अपना पीक है जीडीपी का। इतनी इतनी पहुंच जाए हमारी जीडीपी। तो यह पीक है। अभी हम लोग यहां पर हैं। ठीक है? अभी यहां पर हैं। अभी यहां पर हैं जीडीपी में। अभी यहां पर हैं। अभी ऊपर जाना पड़ेगा हमें और ग्रोथ करनी पड़ेगी जीडीपी में। ठीक है? यानी हमारी अर्थव्यवस्था को और ग्रोथ करनी पड़ेगी। अभी हम यहां पर हैं। अभी यहां पर हैं। तो पोटेंशियल जीडीपी है हमारी ये। और अभी जो जीडीपी है वो है ये। तो अगर हम धीरे-धीरे बढ़ते जाए, बढ़ते जाए, हमारी ग्रोथ होती जाएगी। हमारा देश विकसित होता जाएगा। तो यह तो हो गई हमारी पोटेंशियल जीडीपी कि भाई हमारी क्षमता है कितना, यहां तक पहुंच पाना, हमारी क्षमता है यहां तक पहुंच पाना। पर अगर जो कभी ऐसा हो, ध्यान से सुनना मेरी बात, मैं क्या बोल रहा हूं, ध्यान से सुनो सभी लोग, ध्यान से देखेंगे। अगर अगर अगर कभी ऐसा हो कि पोटेंशियल जीडीपी, आपको आईडिया है, देश के सभी इकोनॉमिस्ट्स को या आईडिया है कि अभी हम यहां पर हैं और ये है हमारी, ये है हमारी पोटेंशियल जीडीपी, यानी इससे ज्यादा तो हम जा ही नहीं सकते किसी हालत में, ये माना हुआ है हमने, पर अगर कभी ऐसा हुआ कि एक्चुअल जीडीपी, एक्चुअल जीडीपी, एक्चुअल जीडीपी ये ऐसे चली गई। हमने क्या सोचा हुआ था कि इससे ज्यादा जा ही नहीं पाएगी और क्या हुआ? हमारी जीडीपी को आने वाले सालों में एकदम ही पूरी निकल गई, पोटेंशियल जीडीपी की लिमिट को क्रॉस कर गई। भाई जितना हम सोचते थे कि इससे ज्यादा तो जा ही नहीं सकती जीडीपी, उससे ज्यादा निकल गई, उससे ज्यादा विक ज्यादा विकास हो गया, ज्यादा विकसित हो गई अर्थव्यवस्था, तेजी से बढ़ गई हमारी, तो भाई जो ये गैप है, यहां से लेके, ठीक है? यहां से लेके, यानी ये बराबर का है, तो इतना जो ये गैप है ना, ये जो गैप है यहां तक, ये जो गैप है, इतना जो गैप है, इसे बोलते हैं इनफ्लेशन गैप। क्या बोलते हैं? इनफ्लेशन गैप को इनफ्लेशन गैप। अब इससे तुम्हें ये समझ में आएगा कि जब आप एक्चुअल, जब हमारी एक्चुअल जीडीपी एक्सीड कर जाए पोटेंशियल जीडीपी के कंपैरिजन में, पोटेंशियल जीडीपी हमने यहां माना हुआ है और साला एक्चुअल जीडीपी हमारी बूस्ट कर गई, तो एक्चुअल जीडीपी और पोटेंशियल जीडीपी के बीच का जो गैप है, उसे बोलते हैं इनफ्लेशन जीडीपी, इनफ्लेशन गैप, इनफ्लेशन गैप। समझ में आया सब लोगों को? ये है इनफ्लेशन गैप। क्लियर? हां, समझ में आ गया भाई? बहुत बढ़िया। अब देखो आगे बढ़ो। नेम द रीजन वेयर द ग्रेट डिप्रेशन ऑफ़ 1929 स्टार्टेड। उस क्षेत्र का नाम बताइए जहां 1929 की महामंदी शुरू हुई थी। बेटा सात आठ क्वेश्चन और रह गए। फटाफट से इधर फोकस कर लो। फिर क्लास खत्म करेंगे। ठीक है? जल्दी बताओ ग्रेट डिप्रेशन 1929 का कहां हुआ था? एशिया में, साउथ अमेरिका में, यूरोप में या नॉर्थ अमेरिका में? ग्रेट डिप्रेशन यानी बहुत तगड़ी महामंदी आई थी। बहुत तगड़ी महंगाई हो गई थी। ठीक है? सभी लोग बताएंगे। बहुत मतलब इकॉनमी की बैंड बज गई थी भाई साहब इकॉनमी की। बताओ सभी लोग बताएंगे। और यह बहुत इंपॉर्टेंट क्वेश्चन है। बार-बार पूछा गया है। सभी लोग बताएंगे। देखो भाई यह यह जो हुआ है ना यह कहां हुआ है, मैं बताता हूं। 29th अक्टूबर, 29th अक्टूबर, ठीक है? 29th अक्टूबर, 29 अक्टूबर 1929 को उत्तरी अमेरिका में, नॉर्थ अमेरिका में, उत्तरी अमेरिका में, यूएसए में। भाई उत्तरी अमेरिका में कनाडा भी है, यूएसए भी है, मेक्सिको भी है, तो एग्जैक्टली कहां पर? उत्तरी अमेरिका में, यूएसए में, उत्तरी अमेरिका में, यूएसए में है। हुआ क्या था? हुआ क्या? वहां पर इकॉनमी एकदम धराशाई कैसे हो गई? 29 अक्टूबर 1929 को उत्तरी अमेरिका में, यूएसए में स्टॉक मार्केट क्रैश कर गया। भाई स्टॉक मार्केट जो है पूरा का पूरा क्रैश कर गया। जो इन्वेस्टर्स थे जिन्होंने पैसे लगा रखे थे वो सब डूब गए। अर्थव्यवस्था एकदम से चरमरा गई। पूरा स्टॉक मार्केट डूब गया। भाई क्रैश हो गया। बिल्कुल लोगों का जबरदस्त, जिन्होंने भी स्टॉक मार्केट में पैसा लगा रखा था ना, सबका जबरदस्त नुकसान हुआ। भाई सबका जबरदस्त नुकसान, बिल्कुल बहुत ही तगड़ा नुकसान। भाई बहुत ही तगड़ा। अरे इसे इसे पता है क्या बोलते हैं? इस चक्कर में, इस चक्कर में द ग्रेट डिप्रेशन, ये तो बोलते ही है, उसके अलावा बोलते हैं डिफाइनिंग मूवमेंट। बोलो यार ये तो डिफाइनिंग मूवमेंट है भाई, यूएसए की अर्थव्यवस्था का डिफाइनिंग मूवमेंट था ये, डिफाइनिंग मूवमेंट। इसे डिफाइनिंग मूवमेंट बोला गया। इसे ब्लैक ट्यूसडे भी बोला गया। ब्लैक ट्यूसडे भी बोला गया, क्योंकि ट्यूसडे वाले दिन हुआ था। तो ब्लैक ट्यूसडे, काला मंगलवार, भाई काला मंगलवार, बैंड बजा दी यूएसए की। ठीक है? समझ में आ रहा है बेटा सभी को? हां। शाबाश शाबाश। हां। तो मतलब मैं कह सकता हूं, बिल्कुल। देखो यह तो कह ही सकते हो आप कि वस्ट वस्ट वर्स्ट इकोनॉमिक फेस था। वर्स्ट इकोनॉमिक फेस था यूएसए की, यूएसए की हिस्ट्री में। यूएसए के इतिहास में, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के इतिहास में सबसे बुरा दौर था वो। ठीक है? यूएसए के इतिहास में वर्स्ट इकोनॉमिक फेस। इससे बुरा फज़ नहीं आया आज तक यूएसए की अर्थव्यवस्था में। क्लियर है बेटा? हां। अरे इसका असर, इसका असर 1929 से मैं बता रहा हूं, 19 से 29 से ऐसा थोड़ी कि मतलब एक साल के लिए रहा हो, डेढ़ साल के लिए, अगले चारप साल इसका असर रहा यूएसए पे, 1933 तक असर रहा, इंपैक्ट रहा 1933 तक, असर रहा यानी इंपैक्ट रहा भाई, इंपैक्ट रहा 1933 तक, 1933 तक इंपैक्ट रहा। इतना खतरनाक, बिल्कुल। मैं देखो मैं अगर तुम्हें बताऊं कि जीडीपी कितनी गिर गई, तो भाई जीडीपी, जीडीपी गिर गई, जीडीपी यूएसए की जीडीपी 30% गिर गई, भाई 30% डाउन, एकदम से 30% डाउन गिर गई जीडीपी यूएसए की, उस टाइम पे जो जीडीपी थी वो 30% नीचे और इंडस्ट्रियल, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन, जो उद्योगों में जो उत्पादन हो रहा था, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन 47, 47% नीचे गिर गया। डिक्लाइन कर गया। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन 47% डिक्लाइन कर गया। 30% तो जीडीपी चली गई नीचे। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन चला गया 47%। तो ये कहां हुआ दोस्तों? नॉर्थ अमेरिका में। कहां पर? नॉर्थ अमेरिका में। यूएसए में। तो स्टॉक मार्केट गिर गया भाई साहब। स्टॉक मार्केट क्रैश हो गया। गिरा भी क्या? समझ में आई भाई बात? चलो बहुत बढ़िया। आगे बढ़ते हैं। नेक्स्ट। फुल फॉर्म ऑफ़ एफडीआई। एफडीआई का पूर्ण रूप क्या है? सभी लोग जल्दी से बताएं। एफडीआई का फुल फॉर्म बता दो जल्दी से। एफडीआई का फुल फॉर्म। बस बस बस। ठीक है? पांच पांच क्वेश्चन और रह गए बस। पांच क्वेश्चन और रह गए और हां 20, 202 मिनट और रह गए बस। पांच क्वेश्चन और 20 मिनट मान लो। बताओ जल्दी से। फुल फॉर्म बताओ यार। एफडीआई का जल्दी से। टाइम बहुत लगाते हो तुम लोग। सेशन को लाइक कर दो सभी लोग। सेशन को लाइक कर दो। सेशन को लाइक कर दो। जितने भी लोग देख रहे हैं बेटा सेशन को लाइक कर दो। हां। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश। देखो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश। फॉरेस्ट फॉरेन फॉरेन फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट। फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट। अब फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट का मतलब है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश। इसका मतलब यह है कि विदेशी कंपनियों को हम भारत में इनवाइट कर रहे हैं कि आप आओ और हमारे यहां खर्चा करो। हमारे यहां अपनी कंपनी सेटअप करो। यानी हम विदेशी कंपनियों को इनवाइट कर रहे हैं कि आप हमारे भारत में आके अपना इन्वेस्टमेंट करो। अपनी कंपनी की कोई ब्रांच इस्टैब्लिश करो और यहां पे बढ़िया पैसा छापो। क्या दिक्कत है? हम आपको जितनी सुविधा दे सकते हैं। आपको लाइसेंसिंग का काम हम आसान करके दे देंगे। आपको लाइसेंसिंग के लिए ज्यादा मतलब चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। आपको जमीन हम दे देंगे एक्वायर करके। आप अपनी लेबर हम आपको सस्ता दे देंगे। सब कुछ आपके लिए बढ़िया कर देंगे। और आपके टेरिफ वगैरह जो है वो कम कर देंगे। आप आओ और हमारे देश में अपना अपना अपनी कंपनी को सेटअप करो और हमारे देश को फायदा ये होगा कि आपकी कंपनी को एक तो आपकी कंपनी को मार्केट मिल जाएगा भारत का। ठीक है? आपकी कंपनी को अपने प्रोडक्ट के लिए भारत का मार्केट मिल जाएगा। दूसरा हमारे लोगों को आपकी कंपनी में रोजगार मिल जाएगा। हमारी अर्थव्यवस्था में भी थोड़ा बूस्ट आ जाएगा आपकी क्योंकि आपकी कंपनी जो कमाएगी उसका कहीं ना कहीं हमारी अर्थव्यवस्था में रोल तो होगा। ठीक है? तो फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट का मतलब है या तो जैसे हम हम किसी दूसरे देश में जाके इन्वेस्ट करें या कोई दूसरे देश की कंपनी आके हमारे देश में इन्वेस्ट करें। ठीक है? तो उसे बोलते हैं फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट। चलो नेक्स्ट। एसबीआई, एसबीआई बोर्ड, सॉरी सेबी। सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया, सिचुएटेड इन? सेबी यानी भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड कहां स्थित है? सेबी। बेटा सेबी एक ऐसी संस्था है जो पूरे भारतीय स्टॉक मार्केट या शेयर मार्केट को रेगुलेट करती है। ऐसी ऐसी स्टचटरी बॉडी, ऐसी कानूनी बॉडी, ऐसी स्टचटरी बॉडी जो भारतीय शेयर बाजार को, भारतीय शेयर बाजार को रेगुलेट करती है। बाजार को रेगुलेट करती है, संचालित करती है। ठीक है दोस्तों? तो ऐसी इस ऐसी स्टचटरी बॉडी, ऐसी कानूनी बॉडी जो शेयर बाजार को रेगुलेट करती है। इसकी स्थापना 1988 में हुई थी। 1988 में स्थापना हुई। पर एज एन एग्जीक्यूटिव बॉडी, सरकारी निकाय के तौर पर और बाद में से संसद में सेबी एक्ट 1992 के तहत, ठीक है? सेबी एक्ट, सेबी एक्ट 1992 के तहत, ठीक है? सेबी एक्ट 1992 के तहत, कानूनी निकाय बना दिया गया। स्टचटरी बॉडी बना दिया गया। कानूनी निकाय। तो स्थापना तो 1988 में हुई थी। पर कानूनी निकाय कब से है दोस्तों? 1992 से। बाकी इसका हेड क्वार्टर, सेबी का हेड क्वार्टर है मुंबई में। सेबी का हेड क्वार्टर दोस्तों कहां पर है? मुंबई में। और सेबी के जो प्रेसिडेंट हैं, जो हेड हैं वो हैं तोहिन कांता पांडे। एग्जाम में आने वाला है। लिख के ले लो ये सवाल। आने वाला है। आने वाला है यह सवाल, गारंटीड आएगा। ठीक है? तोहिनकांता पांडे, सेबी के नए हेड हैं। तोहिनकांता, तोहिनकांता पांडे। ठीक है दोस्तों? आएगा ही आएगा यह सवाल। तो बिल्कुल भी छोड़ना नहीं है। तोहिनकांता पांडे प्रेसिडेंट हैं सेबी के। क्लियर? हां, बिल्कुल बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। चलो वेरी गुड। इतना सबको समझ में आ गया। ठीक है। बहुत बढ़िया। तो हमें पता है ना ये मिनिस्ट्री ऑफ़ फाइनेंस के अंडर है। बिल्कुल। मिनिस्ट्री ऑफ़ फाइनेंस, वित्त मंत्रालय के अंडर है। मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस के अंडर आता है ये। वित्त मंत्रालय के अंडर। ठीक है? तो हेड क्वार्टर कहां पर है दोस्तों? हेड क्वार्टर है मुंबई में। हेड क्वार्टर कहां पर? मुंबई। चलो नेक्स्ट। इन इकोनॉमिक्स व्हाट डस बजट सरप्लस मीन? अर्थशास्त्र में बजट अधिशेष का क्या अर्थ है? सभी लोग बताएं बजट अधिशेष का क्या अर्थ है? सभी लोग बताएंगे बजट अधिशेष का क्या अर्थ है? ठीक है भाई? देखो एक होता है, देखो बजट जब होता है, जब मैं बोलता हूं बजट, तो बजट में दो चीजें होती हैं। एक तो रेवेन्यू यानी जो आपकी आय है, जो आपकी इनकम है, प्राप्ति है जो आपकी, और बजट में एक चीज होती है व्यय, यानी एक्सपेंडिचर। एक्सपेंडिचर क्या होता है बच्चों? एक्सपेंडिचर, एक्सपेंडिचर। तो एक तो होता है, एक तो होता है रेवेन्यू यानी प्राप्ति और दूसरा होता है व्यय। ठीक है? तो अब जैसे मान लो, मान लो, मान लो मेरी कोई सैलरी आई, पर्टिकुलर सैलरी आई और मैंने सोचा हुआ है कि वो पैसा कहां-कहां जाना है। अगर अगर अगर, ध्यान से सुनना सभी लोग, अगर ऐसा हुआ, अगर ऐसा हुआ कि मेरा जो बजट है, मेरा जो बजट है, मान लो मान लो मेरी जो इनकम है वो आई ज्यादा और मेरा जो बजट है वो है, मतलब मेरा जो एक्सपेंडिचर है वो है कम। जैसे मान लो मैंने, मान लो मेरे पास पैसा आया और मैंने सोचा अरे यार इस बार तो ज्यादा खर्चा होगा, पर वो सैलरी इतनी आई कि खर्चा भी हो गया और कोई दिक्कत भी नहीं आई। मतलब जहां खर्च करना था वह खर्च भी कर दिया और बच भी गया। मतलब पैसा आपके पास इतना आ गया, रेवेन्यू आपके पास इतना आ गया कि आपके व्यय से ज्यादा आपका रेवेन्यू है। मतलब आप जितना x, आप जितना स्पेंड करने वाले हो उससे ज्यादा आपके पास आ गया है। ठीक है? मैं सोच रहा था कि जैसे मान लो मैं एक एक एक अमाउंट ले लेता हूं। एक फिगर ले लेता हूं कि यार मेरे पास x फिगर आना है सैलरी का। ठीक है? और और मैं मैं जो खर्चा करूंगा वो y फिगर है। ठीक है? यानी ये मेरे x से थोड़ा सा ज्यादा है यार y फिगर। जितनी सैलरी आएगी उससे थोड़ा सा ज्यादा है यार y फिगर। ठीक है? समझ में आ रही है मेरी बात? अब s से ज्यादा है y, सॉरी x से ज्यादा है y। x फिगर आया। अब मुझे लग रहा है, मुझे लग रहा है x फिगर आया। अब मुझे लग रहा है यार मेरा जो खर्चा है वो ज्यादा है। पर जब मैंने x फिगर देखा तो भाई वो जो x फिगर है वो z फिगर था मेरा। एक्चुअली में x फिगर मेरा z फिगर है, वो मेरा मैं एक्सपेक्ट कर रहा था x आएगा और मेरा y जो है, यानी a खर्चा थोड़ा ज्यादा है x के बाद आता है ना y, तो y खर्चा है मेरा ज्यादा है, पता चला साला फिगर ही z आया है, तो जब फिगर z आया तो y तो फिर मेरा क्या हो गया? खर्चा कम हो गया। ठीक है? तो याद रखना जब रेवेन्यू ज्यादा है आपके पास, जब रेवेन्यू, जब रेवेन्यू ज्यादा है और एक्सपेंडिचर कम है, तो उसे बोल देते हैं बजट सरप्लस। क्या बोल देते हैं दोस्तों? बजट सरप्लस। मतलब मजा आ गया ना भाई? रेवेन्यू ज्यादा है, खर्चा कम है, पैसा बच गया। तो इसे बोल देते हैं बजट सरप्लस। बजट सरप्लस। तो अर्थशास्त्र में बजट अधिशेष का मतलब है कि जब एकत्रित राजस्व आवश्यक व्यय से अधिक हो। यानी जब प्राप्तियां ज्यादा हो। जब प्राप्ति ज्यादा हो और एक्सपेंडिचर कम हो। याद रखना रेवेन्यू ज्यादा, एक्सपेंडिचर कम, बजट सरप्लस। पर इसका उल्टा भी तो हो सकता है। इसका उल्टा भी हो सकता है। इसका उल्टा भी हो सकता है। अगर रेवेन्यू कम है और एक्सपेंडिचर ज्यादा है तो इसे बोल देंगे बजट डेफिसिट। इसे क्या बोल देंगे दोस्तों? बजट डेफिसिट। बजट डेफिसिट। बजट डेफिसिट बोल देंगे फिर। यह भी याद रखना। यह भी याद रखना। जब व्यय की गई राशि एकत्रित राजस्व के बराबर हो। ठीक है? या जब व्यय आय से अधिक हो। जब व्यय आय से अधिक हो। जब व्यय आय से अधिक हो तो इसको बोल देते हैं ये सी वाला जो है ना, इसको बोल देंगे बजट डेफिसिट। इसे क्या बोल देंगे? बजट डेफिसिट। यानी घाटा हो गया यहां तो। है ना? यहां घाटा हो गया। तो दो चीज़ हैं। बजट सरप्लस और बजट डेफिसिट। ठीक है भाई? चलो नेक्स्ट। आंसर तो हमें पता चल ही गया। चलो नेक्स्ट। व्हाट इज द डेफिनेशन ऑफ फिस्कल डेफिसिट? राजकोषीय घाटे की परिभाषा क्या है? फिस्कल डेफिसिट बताओ। सभी लोग बताएंगे। फिस्कल डेफिसिट बता दो जल्दी से। सभी लोग बताओ बताओ बताओ। फिस्कल डेफिसिट क्या होता है? हां सभी लोग बताएंगे। हां बताओ। बस बस बस होने वाला है, होने वाला है क्वेश्चन, चिंता मत करो, होने वाला है। राजकोशीय घाटे की परिभाषा क्या है? राजको राजकोशीय घाटा मतलब देखो ध्यान से देखो, इसका आंसर होगा डी, एक्सेस ऑफ द टोटल एक्सपेंडिचर ओवर द टोटल रिसीप्ट्स एक्सक्लूडिंग बोरोइंग्स। देखो भाई जैसे मान लो गवर्नमेंट के पास, गवर्नमेंट के पास एक तो गवर्नमेंट की आय है। गवर्नमेंट की आय है। रिसीट्स हैं। यानी रेवेन्यू है। ठीक है? ध्यान से देखो। गवर्नमेंट के पास मान लो रेवेन्यू आ रहा है। गवर्नमेंट के पास रेवेन्यू है। ठीक है? गवर्नमेंट के पास एक्सपेंडिचर भी है। भाई बजट का हिस्सा। अब देखो होता क्या है मैं बताता हूं। सरकार के पास रेवेन्यू से पैसा आया। मतलब सरकार के पास रेवेन्यू जो आया यानी सरकार के पास जो टैक्सेस वगैरह जो भी पैसा आया, इनकम आई सरकार की, तो सरकार की इनकम को मैंने बोल दिया रेवेन्यू। पर सरकार ने एक लोन भी ले रखा है। सरकार ने एक लोन भी ले रखा है। वो सरकार का क्या है? बोरोइंग है। सरकार का उधार है। सरकार ने एक लोन भी ले रखा है। मान लो वर्ल्ड बैंक से लोन ले रखा है। ठीक है? तो अब देखो, मान लो मान लो रेवेन्यू है ₹100। मान लो रेवेन्यू है ₹100 और ये भी ₹100। यह भी ₹100। बोरोइंग भी ₹100। ठीक है? ध्यान से देखो बेटा। मैं आपको समझा रहा हूं। ध्यान से देखो। रेवेन्यू ₹100 और बोरोइंग भी ₹100। टोटल कितना है अभी सरकार के पास? टोटल पैसा कितना है? रेवेन्यू ₹100, सरकार की जो अपनी इनकम है वह ₹100 और जो सरकार ने उधार ले रखा है वो भी ₹100, तो टोटल अपने पास हो गए 200। सरकार की जो टोटल अभी जो प्राप्तियां हैं वो कितनी है? 200। पर सरकार का खर्चा हो रखा है 150। सरकार का खर्चा हो रखा है 150। एक्सपेंडिचर 150 है। तो मुझे एक बात बताओ ₹100 तो ये उधार ले रखे हैं ना सरकार ने। इसको उसकी आय थोड़ी कंसीडर करेंगे। भाई अगर मैं आज अगर मैं आज बैंक से ₹5 लाख लोन ले लूं तो मैं उसे यह बोलूंगा कि मेरी इनकम है ₹5 लाख की? तो भाई जो मेरी इनकम आ रही है वो अलग है। ये मेरा लोन है। ये मुझे रीपे करना है वो भी इंटरेस्ट के साथ। तो मैं उस लोन को थोड़ी बोल दूंगा ये मेरा रेवेन्यू है। ये मेरी आय है। तो सरकार भी नहीं बोल सकती। सरकार के लिए फिर आय कितनी हुई? सरकार के लिए आय हुई 100। इस 100 को तो यह तो उधार ही है। इसको तो हम हटा देंगे। देखो उधार को छोड़कर, उधार को छोड़कर ये है रेवेन्यू प्राप्ति और यह है सरकार का खर्चा। तो अगर सरकार की आय कम है और खर्चा ज्यादा है तो इसे बोल देंगे फिस्कल फिस्कल डेफिसिट। फिस्कल डेफिसिट। घाटा ही तो है ये। राजकोशीय घाटा हो गया कि जितनी आय आई उससे ज्यादा खर्चा हो गया। ठीक है भाई? तो याद रखना रेवेन्यू से ज्यादा, रेवेन्यू से ज्यादा खर्चा हो गया यहां पर सरकार का, तो ये फिस्कल डेफिसिट है। राजकोशीय घाटा है। उधार हमने हटा दिया वहां से। जीएसटी इज़ एन इनडायरेक्ट टैक्स इंपोज्ड इन इंडिया। व्हाट इज द फुल फॉर्म? व्हाट इज इट्स फुल फॉर्म? जीएसटी भारत में लगाया जाने वाला एक अप्रत्यक्ष कर है। इसका पूरा नाम क्या है? गुड्स एंड सर्विस टैक्स। गुड्स एंड सर्विस टैक्स। है ना भाई? गुड्स एंड सर्विज टैक्स। वस्तु एवं सेवा कर। माल या सेवा कर। माल मतलब यहां पर वस्तु। ठीक है? गुड्स एंड सर्विस टैक्स। अब मुझे एक बात बताओ यह गुड्स एंड सर्विस टैक्स जो है, पहली बात तो जितने भी इनडायरेक्ट टैक्सेस हुआ करते थे, एक्साइज टैक्स, वैल्यू एडेड टैक्स, वीएटी, वट जिसे बोलते हैं वैल्यू एडेड टैक्स। ठीक है? उसके अलावा सर्विस टैक्स, उन सबको हटा के एक टैक्स लाया गया जीएसटी। ठीक है?
तो याद रखो जीएसटी जो है, जीएसटी रिप्लेस्ड कई सारे इनडायरेक्ट टैक्सेस को। इसने रिप्लेस किया। जीएसटी रिप्लेस्ड एक्साइज टैक्स, एक्साइज टैक्स, उसके बाद वीएटी, वैल्यू एडेड टैक्स और सर्विस चार्ज या सर्विस टैक्स। ठीक है? सर्विस टैक्स। तो बेसिक बात यह है कि जीएसटी ने एक्साइज टैक्स, वीएटी, सर्विस टैक्स इन सबको रिप्लेस कर दिया। और जीएसटी आया कब? जीएसटी आया 1 जुलाई 2017 को। इंप्लीमेंट हुआ है ये। 1 जुलाई 2017 को। ईयर तो 2017 है। डेट, ठीक है? 1 जुलाई। बताओ भाई सभी लोग। हां। 1 जुलाई 2017, बिल्कुल।
और कौन से अमेंडमेंट के द्वारा? 101वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 101वां संवैधानिक संशोधन, संवैधानिक संशोधन अधिनियम। ठीक है भाई? तो देखो ध्यान से, 1 जुलाई 2017 को, 1 जुलाई 2017 को, 101वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम आया। ठीक है? और ये कब आया? 2016 में। और ये जीएसटी इंप्लीमेंट हुआ 2017 में। तो अमेंडमेंट आया 101, 2016 में। इस अमेंडमेंट के द्वारा जीएसटी लाया गया। ठीक है? जीएसटी लाया गया। याद रखना बेटा जीएसटी। और जीएसटी आज के टाइम में पांच रेट्स में अवेलेबल है। पांच स्लैब्स हैं इसके। पांच अलग-अलग रेट्स हैं बच्चों। जानते हो क्या? हां। मैं बताता हूं। मैं बताता हूं। देखो।
अच्छा जैसे यह फर्स्ट जुलाई को लाया गया ना, तो इसे जीएसटी डे भी सेलिब्रेट करते हैं। फर्स्ट, फर्स्ट जुलाई को जीएसटी डे सेलिब्रेट किया जाता है। जीएसटी डे, जुलाई को। बाकी स्लैब्स क्या हैं इसके? स्लैब्स हैं 0%, 5%, 12%, 18% और 28%। तो यह पांच स्लैब हैं। पांच स्लैब हैं जीएसटी के। 0, 5, 12, 18, 28। आप जीरो को काउंट ना करना चाहो तो कोई दिक्कत नहीं है। पर 0% भी है, ऑफिशियली तो। ठीक है? क्लियर है? हां। मैं बताता हूं। मैं बताता हूं। देखो एक तो 0% किस-किस पर है? 0% तीन चीजों पर है। पेट्रोलियम से रिलेटेड जो भी प्रोडक्ट्स हैं, पेट्रोल वगैरह जो है, पेट्रोल, डीजल ये सब पे तो पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर जीएसटी नहीं लगता। ठीक है? इलेक्ट्रिसिटी पर जीएसटी नहीं लगता। इलेक्ट्रिसिटी पर जीएसटी नहीं लगता। और अल्कोहल भी शामिल नहीं है। अल्कोहल पर भी जीएसटी नहीं है। तो नो जीएसटी यानी जीरो जीएसटी। नो जीएसटी यानी जीरो जीएसटी इन तीन चीजों पर। याद रखोगे भाई? बिल्कुल। समझ में आया सब लोगों को? तो याद रखना अल्कोहल, इलेक्ट्रिसिटी और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पे कोई जीएसटी नहीं है भाई। कुछ नहीं देना तुम्हें। जीएसटी जो कीमत है वो देनी है बस। क्लियर? बिल्कुल।
और एक चीज मैं बताता हूं यहां पे, एक लास्ट चीज बताते हैं फिर अगले क्वेश्चन पे चलते हैं। देखो ध्यान से, जीएसटी के इशूज़ से निपटने के लिए एक गवर्निंग बॉडी बना दी है। जीएसटी के इशूज़ के साथ डील करने के लिए जीएसटी काउंसिल बना रखी है। जीएसटी के इश्यूज के साथ डील करने के लिए, जीएसटी के इश्यूज के साथ डील करने के लिए, जीएसटी के इशूज़ के साथ डील करने के लिए दोस्तों जीएसटी काउंसिल बना रखी है। जीएसटी काउंसिल। और क्योंकि यह संविधान में है तो आर्टिकल 279 ए में है। 279 ए याद रखना। जीएसटी काउंसिल कौन से आर्टिकल में है? 279 ए में। और जीएसटी काउंसिल की हेड होती है हमारी फाइनेंस मिनिस्टर। हेड कौन है? फाइनेंस मिनिस्टर, निर्मला सीतारमण जी। फाइनेंशियल मिनिस्टर जो भी होते हैं वो जीएसटी काउंसिल के हेड होते हैं। ठीक है? समझ में आया बेटा? चलो तो यह हो गया यहां पर जीएसटी वाला क्वेश्चन पूरा। कोई दिक्कत ही नहीं। ठीक है? चलो नेक्स्ट।
व्हिच ऑफ द फॉलोइंग इज एन इकोनमिक सिचुएशन इन व्हिच ऑल अवेलेबल लेबर रिसोर्सेज आर बीइंग यूज्ड इन द मोस्ट एफिशिएंट वे पॉसिबल? निम्नलिखित में से कौन सी आर्थिक स्थिति है जिसमें सभी उपलब्ध श्रम संसाधनों का उपयोग सबसे कुशल तरीके से किया जा रहा है? बताओ कौन सा ऐसा रोजगार का तरीका है जिसमें जितने भी, जितने भी लेबर रिसोर्सेज हैं, जितने भी लोग अवेलेबल हैं, ठीक है, उनका बढ़िया तरीके से उपलब्ध किया जा रहा है, उनको बढ़िया तरीके से यूज़ किया जा रहा है? तो बताओ सभी लोग बताएंगे जल्दी। सेशन अब खत्म होने वाला है, जल्दी। डी, फुल एंप्लॉयमेंट। बहुत बढ़िया। फुल एंप्लॉयमेंट का मतलब है कि आपने नौकरी जो दे रखी है वो, वो व्यक्ति पूरी तरह से, वो वो व्यक्ति का पूरी तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है उस नौकरी में। जो उसकी स्किल जरूरी है नौकरी के लिए, वो पूरा उसको फुल, मतलब टू द फुलनेस्ट उसे यूज़ किया जा रहा है। ठीक है? फुल एंप्लॉयमेंट, मतलब समझ में आ रही है मेरी बात? पूर्ण रोजगार। तो याद रखना जिसमें सभी उपलब्ध श्रम संसाधनों का उपयोग सबसे कुशल तरीके से किया जा रहा है। मतलब उनको मैक्सिमम पोटेंशियल तक उनका यूज़ किया जा रहा है। तो फुल एंप्लॉयमेंट। तो जितना जरूरी है और जितना उनको यूज़ किया जा सकता है उनको हम यूज़ कर रहे हैं। नल एंप्लॉयमेंट का मतलब है, नल एंप्लॉयमेंट का मतलब बेरोजगारी है भाई। नल एंप्लॉयमेंट का मतलब क्या होता है? बेरोजगारी। कोई रोजगार ही नहीं है। ओवरफुल एंप्लॉयमेंट का मतलब क्या होता है? कोई अच्छा, अंडर एंप्लॉयमेंट बताओगे? अंडर एंप्लॉयमेंट बताओगे? जरूरत से, जरूरत से कम काम लेना। जरूरत से कम काम लेना, मतलब या मैक्सिमम पोटेंशियल, मैक्सिमम पोटेंशियल का इस्तेमाल ना करना। मैक्सिमम पोटेंशियल का यूज ना करना। अब जैसे, जैसे मान लो, जैसे मान, मान लो मेरी क्षमता है कि मैं हर दिन अब ये मुझे खुद भी पता चला कि यार मैं हर दिन मैराथन ले सकता हूं। 4, 5, 6 घंटे की हर दिन मैराथन ले सकता हूं। ये मुझे नहीं मालूम था अपने बारे में। ठीक है? मैराथन से थोड़ा सा ऐसा लगता नहीं कि यार 5, 6 घंटे पता नहीं कैसे खड़े-खड़े। पर अब पता चल गया कि कैपेसिटी है। तो ये कैसे किया? साहिल सर ने किया ये। समझ रहे हो मेरी बात? साहिल सर ने पुश किया कि सर आप मैराथन ले सकते हो। आप एक बार लेके ट्राई करो। एक दिन लेके देखो, नहीं हो पाएगा तो फिर उसका कुछ और इलाज करेंगे। ठीक है? बच्चों को जो कंटेंट है फिर पार्ट्स में देंगे। एक बार आप ले देखो, अगर एक ही सेशन में चला जाता है तो उन्होंने मेरी लिमिट्स को पुश करवा दिया। ठीक है? और मैंने ले ली और मुझे पता चल गया भाई ये तो ले लिया जा सकता है आराम से। अब तुम देखो कितनी मैराथनंस हो गई हैं। ठीक है? समझ में आ रही है मेरी बात? इसका मतलब है कि साहिल सर ने जो मेरा मैक्सिमम पोटेंशियल है उसका सही इस्तेमाल कर लिया। उससे पहले तक उन्होंने शायद नहीं किया था तो मैं अंडर एंप्लॉयमेंट में था। पर अब मैं फुल एंप्लॉयमेंट में आ रखा हूं। ठीक है भाई? समझ में आ गया? तो जरूरत से कम काम लेना। जरूरत के कंपैरिजन में कम काम लेना। अंडर एंप्लॉयमेंट यानी मैक्सिमम पोटेंशियल का यूज़ ना करना। ओवरफुल एंप्लॉयमेंट का मतलब क्या है? बताओ। ओवरफुल एंप्लॉयमेंट। हां बताओ। जल्दी सभी लोग बताएंगे। बताओ भाई जल्दी बताओ। ओवरफुल एंप्लॉयमेंट क्या होता है? यह बता दो मेरे को बस। पता है कि नहीं पता है? ओवरफुल एंप्लॉयमेंट। नहीं पता। देखो भाई ओवरफुल एंप्लॉयमेंट तुम ऐसा करोगे मेरे को कमेंट सेक्शन में बताओगे। बहुत बढ़िया। आपको एक चीज पता चलेगी। इसको, इसको पढ़ोगे तो ओवरफुल एंप्लॉयमेंट। आप बताओगे इसको। ठीक है? मैं आपके ऊपर छोड़ रहा हूं। फुल एंप्लॉयमेंट से रिलेटेड थोड़ा कमी है। ये थोड़ा ध्यान से देख के बताना। ओवरफुल एंप्लॉयमेंट तुम बताओगे मेरे को। कमेंट सेक्शन में बताना। चलो बाकी, बाकी यहीं पे, यहीं पे एक चीज डिस्कस कर लेते हैं। यहीं पर एक चीज डिस्कस कर लेते हैं। यहां पर वो जो अनइंप्लॉयमेंट है ना, बेरोजगारी अलग-अलग तरह की होती है। वो डिस्कस कर लेते हैं। एक बार अनइंप्लॉयमेंट डिस्कस कर लेते हैं। चारप तरह की अनइंप्लॉयमेंट है। बेरोजगारी, वो यहीं पे मैं तुरंत बता देता हूं। अनइंप्लॉयमेंट, बेरोजगारी के टाइप। ठीक है? ताकि वह अलग से कोई क्वेश्चन नहीं है उसके ऊपर तो यह यहीं पर कवर हो जाएगा। अनइंप्लॉयमेंट, बेरोजगारी। ठीक है? मैं बताता हूं, मतलब देखो एक तो होती है डिसगाइज्ड। डिसगाइज्ड बेरोजगारी। डिसगाइज्ड यानी प्रक्षन्न बेरोजगारी। प्रक्षन्न, छुपी हुई है ना? हिडन। प्रक्षन्न बेरोजगारी। एक होती है। एक होती है सीजनल बेरोजगारी। मौसमी बेरोजगारी। मौसमी बेरोजगारी। एक होती है बच्चों, एक होती है स्ट्रक्चरल, संरचनात्मक। स्ट्रक्चरल बेरोजगारी। स्ट्रक्चरल अनइंप्लॉयमेंट यानी संरचनात्मक, संरचनात्मक बेरोजगारी। तो डिसगाइज़्ड यानी प्रचन्न, सीजनल यानी मौसमी, स्ट्रक्चरल यानी संरचनात्मक। है ना? बिलकुल। फिर बताता हूं, फिर बताता, फिर फ्रिक्शनल यानी घर्षण बेरोजगारी। फ्रिक्शनल, फ्रिक्शनल यानी घर्षण बेरोजगारी। घर्षण बेरोजगारी। फिर एक है साइक्लिक बेरोजगारी। यानी चक्रीय बेरोजगारी। तो ये पांच तरह की बेरोजगारी है दोस्तों। अब मैं आपको बताता हूं एक-एक करके। देखो ज्यादा वो नहीं है, बड़ा नहीं है कुछ। डिसगाइस्ड, प्रचन्न मतलब छुपी हुई। मतलब जरूरत से ज्यादा लोगों से काम लेना। जरूरत से ज्यादा लोगों का इस्तेमाल करना। जरूरत से ज्यादा लोगों को काम देना। यह कर देते हैं। जरूरत से ज्यादा लोगों को काम देना। यानी काम पांच लोगों का है। साला लगा 10 रखे हैं। काम पांच लोगों का है। लगा 10 लोग रखे हैं। तो मतलब वो जो पांच एक्स्ट्रा लगे हैं वो तो भाई उनकी तो हिडन बेरोजगारी है। सोच रहा पैसा मिल रहा है उनको, अलग बात है। पर वो प्रोडक्टिव नहीं है वो। ठीक है? वो प्रोडक्टिव नहीं है। तो जरूरत से ज्यादा लोगों को काम पर रखना। काम वाला पांच लोगों का है। 10 लोगों को रखा हुआ है। है ना? तो यह तो हो गया भाई प्रक्ष। सीजनल का मतलब है कि जब सीजन ऑफ होता है। ऑफ सीजन, ऑफ सीजन बेरोजगारी रहती है। ऑफ सीजन बेरोजगारी। जैसे मान लो टूरिस्ट प्लेसेस में जाओगे तुम अभी। टूरिस्ट प्लेसेस पे, टूरिस्ट प्लेसेस पर अभी मसून का टाइम है। जैसे ये पहाड़ों वगैरह जो है, उत्तराखंड और अपना शिमला वगैरह ये जो है, उत्तराखंड में हिमाच, उत्तराखंड हो गया, हिमाचल हो गया। इनमें जब टूरिस्ट प्लेसेस में जाओगे, डे अपना हिल स्टेशन पे जाओगे तो मसून के टाइम में ज्यादा लोग जाते नहीं क्योंकि लैंडस्लाइड वगैरह होता रहता है। बारिश वगैरह, बाढ़ वगैरह आ रखी होती है। तो इस टाइम पे ऑफ सीजन रहेगा वहां पर। तो ऑफ सीजन में वहां के जो टूरिस्ट गाइड वगैरह हैं वो सब जो है, बेचारे अब उनका दो-तीन महीने जो है बेरोजगारी है उनकी। तो सीजनल बेरोजगारी बोलते हैं। जब एक तो होता है पीक सीजन आता है। उस टाइम पे रोजगार मिला हुआ है। गर्मियों के दिनों में सब लोग जाते हैं घूमने फिरने। फिर एक आता है ये मानसून वाला ऑफ सीजन। तो इसमें इस टाइम पे जो बेरोजगारी हो रखी है उसे बोलते हैं सीजनल बेरोजगारी। क्योंकि वो सीजन के हिसाब से है। जैसे ही मानसून खत्म हो जाएगा वापस से पीक पकड़ लेंगे ये। ठीक है? स्ट्रक्चरल, संरचनात्मक बेरोजगारी क्या होती है बेटा? कोई बता सकता है? संरचनात्मक, बताओ। हां। संरचनात्मक यानी कि स्ट्रक्चरल का मतलब है कि जॉब में, जॉब में स्किल अलग चाहिए। जॉब में स्किल अलग। जॉब में स्किल अलग और खुद की स्किल अलग। अब मुझे एक बात बताओ। मुझे पढ़ाना आता है। ठीक है? मुझे पढ़ाना आता है। पर मैं जॉब क्या कर रहा हूं कि मैं, मैं जो है कंटेंट लिख रहा हूं। कंटेंट लिख रहा हूं। मैं कंटेंट बना रहा हूं। जबकि मैं कंटेंट को डिलीवर करना ज्यादा अच्छे से जानता हूं। मैं कंटेंट बनाना उतने अच्छे से नहीं जानता। समझ रहे हो मेरी बात? तो मैं, मैं एक इंस्टिट्यूट में गया। मान लो मैं एक कोचिंग इंस्टिट्यूट में गया। मैंने बोला कि सर मैं पढ़ा लेता हूं। बोला नहीं नहीं, अभी पढ़ाना तो आपको नहीं है। आप ऐसा करो आप हमारे कंटेंट पे काम करो। पढ़ा सकते हो तो मतलब आपको नॉलेज तो है ही कंटेंट की तो आप ऐसा करो आप कंटेंट पर काम करो। हमारे लिए कंटेंट लिखो। अब मजबूरी में मान लो मैं वो नौकरी ले लूं। अब मेरी स्किल क्या है? पढ़ाना। और वहां जॉब की स्किल क्या है? जॉब की स्किल क्या है? कंटेंट बनाना, लिखना। अब साला मेरी स्किल और जॉब की स्किल मैच ही नहीं कर रही है। हैं? जॉब में स्किल अलग, खुद की स्किल अलग। तो ये होती है स्ट्रक्चरल बेरोजगारी। संरचनात्मक बेरोजगारी। मतलब वो बेरोजगारी है। भले ही अगर मैं वहां पर कमा रहा हूं पैसा तो भी वो बेरोजगारी ही है। कैसी बेरोजगारी है? स्ट्रक्चरल। फ्रिक्शनल कौन सी होती है भाई? फ्रिक्शनल। फ्रिक्शनल कौन सी होती है? घर्षण। बताओ। हां, मैं बताता हूं फ्रिक्शनल कौन सी होती है? फ्रिक्शनल होती है जब हम जॉब स्विच करते हैं ना। जब हम जॉब स्विच करते हैं। जब हम जॉब स्विच करते हैं तो एकदम से तो दूसरी जॉब मिलती नहीं है। 10, 15, 20 दिन, 40, मतलब 10, 15, 20 दिन, 30 दिन, महीने भर का टाइम लग जाता है। जैसे मान लो, मान लो कोई व्यक्ति है यहां से जॉब, मान लो कोई व्यक्ति कोई कंपनी से जॉब छोड़ के गया। अब वो दूसरी जॉब ढूंढेगा उस दिन उस, उस दौरान 20, 30 दिन निकल जाएंगे। तो वो जो 20, 30 दिन की जो बेरोजगारी है उसकी उसे क्या बोलेंगे? घर्षण बेरोजगारी। ठीक है? जॉब स्विच करने पर, जॉब स्विच करने के दौरान, जॉब स्विच करने के दौरान जो बेरोजगारी होती है उसे क्या बोलते हैं? घर्षण। और चक्रीय कहां आती है? ये बिजनेस में आती है। ये बिजनेस में आती है। बिजनेस ऊपर नीचे होता है ना? कभी बिज़नेस अच्छा चलता है, कभी एकदम महीने डाउन चली जाती है सेल। तो बिजनेस के दौरान। तो बिज़नेस के दौरान चक्रीय है। तो भैया हो गया ये अपना। चलो आगे बढ़ते हैं।
द फर्स्ट ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट वाज पब्लिश्ड बाय यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम इन द ईयर डैश? संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा पहली मानव विकास रिपोर्ट वर्ष कौन से वर्ष में प्रकाशित की गई थी? सभी लोग बताएंगे। बस 10 मिनट का और रह गया सेशन। खत्म फिर, ठीक है। 10 मिनट का और रह गया सेशन। उसके बाद खत्म। है ना भाई? जल्दी बताओ। सभी लोग। बहुत बढ़िया, उन एस, ससुर इतना मारूंगा ना तुम लोगों को पहले। अबे भाई साहब, तुम अभी ऑफलाइन होते ना मैं तुम्हारे साथ अभी, साला रात को 1:00 बज रहा है चिकाचिक हो जाता तुम्हारे साथ। 1990 में आई है फर्स्ट रिपोर्ट, 1990 में फर्स्ट रिपोर्ट भाई। हां, कैसी बातें करते हो? ससुरे पगले कहीं के। तो फर्स्ट ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट कब आई है? 1990 में। और याद रखो भाई ये ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की जो ये रिपोर्ट आई है। ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की जो रिपोर्ट आती है ये। तो याद रखना ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स को किसने, मतलब किसने बनाया था? ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स को बनाया था डॉक्टर महबूब उल हक ने। पाकिस्तानी अर्थशास्त्री थे महबूब उल हक। महबूब उल हक एंड अमृत्यसेन, अमृत्य सेन, अमृत्य सेन। तो डॉ महबूब उल हक, पाकिस्तानी अर्थशास्त्री और इधर इंडियन अर्थशास्त्री। तो 1990 में ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स बनाया था महबूब हक और अमृत्यसेन ने। और इसी इंडेक्स के दम पर रिपोर्ट बनती है ह्यूमन डेवलपमेंट की, मानव विकास की। तो ये जो मानव विकास सूचकांक है दोस्तों, सभी लोग ध्यान से देखेंगे। ये जो मानव विकास सूचकांक है, मानव विकास सूचकांक है भाइयों। मानव विकास सूचकांक, यह देश के सामाजिक और आर्थिक विकास को बताता है। देश के सामाजिक और आर्थिक विकास को बताता है या दर्शाता है। देश के सामाजिक और आर्थिक विकास को दर्शाता है। ठीक है? ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में तीन चीजों को ध्यान रखा जाता है। एक तो लाइफ एक्सपेक्टेंसी। ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की जो रिपोर्ट बनती है, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स बनता है वो लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी जीवन प्रत्याशा। यानी किसी देश में लोगों की जो उम्र है, जीने की जो उम्र है, वो कितनी है? जैसे भारत में पुरुषों की जो है 62 वर्ष है। महिलाओं की 65 वर्ष है। एवरेज जीने की जो उम्र है। तो लाइफ एक्सपेक्टेंसी मतलब जीवन प्रत्याशा। तो किसी देश के अगर मानव विकास सूचकांक को आपको नापना है तो आपको तीन, तीन आधारों पे नापना होगा। लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी जीवन प्रत्याशा यानी जीवन जीने की जो एवरेज ऐज है। उसके अलावा एजुकेशन यानी शिक्षा। यानी कितने बच्चे स्कूलिंग कर चुके हैं। स्कूल में एनरोल्ड हैं। ठीक है? तो शिक्षा। उसके अलावा, उसके अलावा आपकी लिविंग स्टैंडर्ड या स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग यानी कि आपकी पर कैपिटा इनकम, प्रति व्यक्ति आय। स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग, जीवन जीने का स्टैंडर्ड। तो यानी, यानी कि, यानी कि आपका जीवन जीने का स्तर, जीवन जीने का स्तर। यह आपकी पर कैपिटा इनकम से पता चलता है। प्रति व्यक्ति आय से पता चलता है। प्रति व्यक्ति आय, प्रति व्यक्ति आय, पर कैपिटा इनकम। ठीक है दोस्तों? और अभी-अभी हाल ही में 2023 वाली रिपोर्ट आई है। याद है? 2023 वाली रिपोर्ट आई है। अभी हाल ही में 2023 की मानव विकास सूचकांक की रिपोर्ट आई है। उसमें हमारे भारत की रैंक आई है 130, 130। याद रखना। 2022 वाली जो रिपोर्ट थी उसमें 133 थी हमारी रैंक। तो 133 से अब हमारी 130 हो गई है 2023 वाले में। तो थोड़ा इंप्रूव किया है हम लोगों ने। ठीक है? चलो आगे बढ़ते हैं। अब भैया देखो अब हमारी ये तीन-चार स्कीम्स बची हैं। उसके बाद ये चैप्टर खत्म है। तीन-चार स्कीम्स बची हैं। ये कर लो फटाफट से, हो जाएगा।
व्हेन वाज वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना लॉन्च्ड? वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना कब शुरू की गई थी? सभी लोग बताएंगे। वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना, दिसंबर 2001 में। बिल्कुल, दिसंबर 2001 में। और वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना क्यों, क्यों, क्यों ये लांच की गई है? सभी लोग बताएंगे जल्दी से। सभी लोग बताएंगे। बताओ। बिल्कुल। देखो अर्बन इलाकों में, यानी शहरी इलाकों में, अर्बन क्षेत्रों में रह रहे, रह रहे झुग्गी-झोपड़ी में लोगों को, ठीक है? अर्बन क्षेत्रों, अर्बन क्षेत्रों में स्लम्स में रह रहे, स्लम्स यानी झुग्गी-झोपड़ी में, स्लम्स में रह रहे, ठीक है भाई? अर्बन क्षेत्रों में स्लम्स में रह रहे गरीब लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए, जीवन स्तर को सुधारने के लिए यह योजना लांच की गई थी। तो एएम क्या था भाई? एएम क्या है? इसको लांच करने का एएम क्या है? अर्बन क्षेत्रों में, शहरी क्षेत्रों में जो झुग्गी-झोपड़ियों में जो लोग रह रहे हैं, गरीब लोग रह रहे हैं, उनके जीवन स्तर को सुधारना। उनके जीवन स्तर को सुधारना। समझ में आया सब लोगों को? हां। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। चलो, ठीक है। यह समझ में आ गया? नेक्स्ट।
व्हिच ऑफ़ द फॉलोइंग इज़ वन ऑफ़ द सेंट्रल गवर्नमेंट्स स्कीम्स ऑफ़ इंटरेस्ट सब्सिडी ऑन एजुकेशनल लोनस फॉर ओवरसीज़ स्टडीज़ फॉर स्टूडेंट्स बिलोंगिंग टू द माइनॉरिटी कम्युनिटीज़? भाई देखो ये बहुत, ये बहुत, देखो सीधा-सीधा पूरी जानकारी तो आपको यहीं पे दे दी। निम्नलिखित में से कौन सी अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के लिए विदेश में अध्ययन के लिए शैक्षिक ऋण पर ब्याज सब्सिडी की केंद्र सरकार की योजनाओं में से एक है? यानी एक ऐसी योजना है जो हमारे माइनॉरिटी ग्रुप्स हैं ना, जैसे हमारे सिख हैं, हमारे मुस्लिम्स हैं, हमारे क्रिश्चियंस हैं, हमारे पारसी हैं, हमारे बुद्धिस्ट हैं, हमारे जैन हैं। जितने भी हमारे ये दूसरे धर्म के लोग हैं, हमारे स्टूडेंट्स हैं। इनको भारत से बाहर अगर जाना है, ठीक है? भारत से बाहर विदेश में अध्ययन करना है। अध्ययन क्या करना है? एमफिल करनी है। या फिर इनको पीएचडी करनी है। ठीक है? या फिर इन्हें क्या करनी है दोस्तों? पीएचडी करनी है। ठीक है? समझ में आ रहा है कि नहीं? सभी लोग बताएंगे। क्लियर है? हां। पीएचडी करनी है तो उन्हें एमफिल करनी है, पीएचडी करनी है। तो उनको क्या है? पैसे की जरूरत है। ठीक है? तो कोई भी, कोई भी हमारे ऐसे छात्र जो हमारे माइनॉरिटी को बिलोंग करते हैं, अल्पसंख्यक समुदाय को बिलोंग करते हैं। उनके पास पैसा नहीं है पर वो मेरिटोरियस हैं। पढ़ाई में अच्छे हैं। उनको बाहर विदेश में जाकर पढ़ना है, अच्छा पढ़ना है तो उनको, उनको सरकार लोन देगी। पर लोन ऐसे देगी कि उनको लोन पर क्या मिलेगा? ब्याज सब्सिडी। यानी वो जो इंटरेस्ट पे करेंगे उस लोन पर वो उनका बहुत कम हो जाएगा। ठीक है? उनको, उनसे बहुत ज्यादा इंटरेस्ट नहीं लेगी सरकार। उनसे कम इंटरेस्ट लेगी। ठीक है? कम ब्याज देगी। ब्याज सब्सिडी दी जा रही है उनको। यानी ब्याज पर सब्सिडी। ब्याज पर कमी। ठीक है? तो याद रखना ये कौन सी स्कीम थी? ये कौन सी स्कीम थी? कोई बता सकता है? सभी लोग बताएंगे। बताओ। पढ़ो प्रदेश। पढ़ो प्रदेश। पढ़ो प्रदेश। तो अगर आप प्रदेश में जाके पढ़ते हो तो आपके, स्कीम क्या थी? कि अल्पसंख्यक समुदाय से आप होने चाहिए। दूसरी बात आप मेरिटोरियस बच्चे यानी पढ़ाई-लिखाई में अच्छे होने चाहिए। उसके बाद अगर आपका मन है एमफिल या पीएचडी वगैरह करने का तो आप लोन ले लो सरकार से। सरकार लोन पे जो इंटरेस्ट है उस पे थोड़ी कमी कर देगी। सब्सिडी दे देगी आपको। तो पढ़ो प्रदेश। समझ में आया बेटा सबको? क्लियर? सब लोग बताएंगे? पढ़ो प्रदेश। बिल्कुल, बिल्कुल। बहुत बढ़िया। चलो वेरी गुड। वेरी गुड। ठीक है। ठीक है। ठीक है। चलो आगे बढ़े। नेक्स्ट।
निम्नलिखित में से किस योजना का उद्देश्य देश के सभी परिवारों को बैंकिंग सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करके व्यापक वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करना है? जिसमें हर परिवार को कम से कम एक बुनियादी बैंकिंग खाता मिले, वित्तीय साक्षरता मिले, उनको मतलब थोड़ा लिटरेट किया जाए, पढ़ाया जाए, फाइनेंस कैसे मैनेज करना है, क्या करना है, उनको लोन वगैरह दिया जाए, ऋण तक पहुंच हो उनको, बीमा यानी इंश्योरेंस दिया जाए, उनकी पेंशन सुविधा शामिल हो तो वो कौन सी योजना है जिसमें ये सारी चीजें मिल रही हैं? मोदी जी ने लांच की थी। याद है? 28 अगस्त को, 2014 में। प्रधानमंत्री जनधन योजना। प्रधानमंत्री जनधन योजना दोस्तों। तो प्रधानमंत्री जनधन योजना, प्रधानमंत्री जनधन योजना जो है वो ये योजना है जिसमें सारी चीजें मिल रही है। बैंकिंग खाता मिल रहा है। जो भी सरकार मदद करना चाहेगी सीधे उस बैंक खाते में पहुंचेगा। ठीक है? आपको इंश्योरेंस मिलेगा। आपको लोन मिल जाएगा। आपको पेंशन की सुविधा मिल जाएगी। सब मिल जाएगा। समझ रहे हो? इस तरह की यह स्कीम है। 28 अगस्त 2014 को लांच की है। क्लियर? बिल्कुल। फिर ये क्या है? प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना। इसका मतलब यह है कि अगर दुर्घटना में आपकी मृत्यु हो जाए। कोई एक्सीडेंट हो, दुर्घटना में, दुर्घटना में मृत्यु हो जाए। दुर्घटना में मृत्यु या फिर स्थाई विकलांगता, या हाथ-पैर कट जाए आपके। है ना? स्थाई विकलांगता आ जाए। भाई दुर्घटना हो और उसमें या तो आपकी जान चली गई या फिर आप स्थाई रूप से विकलांग हो गए। या तो दुर्घटना में मृत्यु या फिर स्थाई विकलांगता। ठीक है? दुर्घटना में मृत्यु या स्थाई विकलांगता के, केस में, केस में ₹1 लाख का बीमा मिलेगा आपको। केस में, केस में ₹1 लाख तक का बीमा है। ₹1 लाख मिल जाएंगे आपको। ₹1 लाख तक का बीमा। तो यह है प्रधानमंत्री बीमा सुरक्षा योजना या प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना। तो दुर्घटना में या मृत, देखो दुर्घटना में या तो मृत्यु हो रही है या स्थाई विकलांगता आ रही है आपके अंदर। मतलब जिंदगी भर के लिए आप विकलांग हो गए हो। तो ऐसी सिचुएशन में आपको ₹1 लाख का बीमा
मिल जाता है। ₹ लाख की राशि आपको मिल जाएगी। क्लियर बच्चों? समझ में आया तो रिसोंड करो। हां। क्लियर है ना? ठीक है। ठीक है। ठीक है। ठीक है।
अच्छा उसके बाद और और कोई स्कीम देखो। प्रधानमंत्री वय वंदना योजना, ये पेंशन योजना थी। ये पेंशन योजना है बुजुर्गों के लिए। पेंशन योजना 60 वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों के लिए। 60 वर्ष से ज्यादा आयु के नागरिकों के लिए, ठीक है भाई। और यह वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना, ये भी बुजुर्गों के लिए पेंशन योजना है। बस LIC के द्वारा शुरू हो रखी है। LIC के द्वारा शुरू की गई। समझ में आया कि नहीं? सभी लोग बताएंगे। क्लियर है? हां। हां ये तो ये ये वाली तो 2017 से 2017 से 2020 तक ही थी। बंद हो गई ये। 2017 से 2020 तक थी। ये बंद हो गई। ये 2003 में चालू हुई थी LIC वाली। ये जो है ना ये वाली 2003 में चालू हुई थी। ये 2003 में चालू हुई थी। क्लियर? हां। और ये सुरक्षा बीमा योजना 2015 में। ये 2015 में ये 2015 में। ठीक है? और प्रधानमंत्री जनधन योजना ये 2014 में। क्लियर बेटा? चलो आगे देखो।
मनरेगा का पूरा नाम क्या है? जो वयस्क स्वयंसेवकों को कम से कम 100 दिनों के लिए अकुशल मैनुअल काम करने के लिए गारंटीकृत मजदूरी रोजगार प्रदान करता है। पूरा नाम क्या है? मनरेगा। मनरेगा महात्मा गांधी नरेगा यानी मनरेगा का पूरा नाम क्या है? जल्दी बताओ। मनरेगा बताओ। यह एक्ट आया था 2005 में। एक्ट आया था। अधिनियम आया था 2005 में। इंप्लीमेंट हुआ 2006 में। ये इंप्लीमेंट हुआ 2006 में। लागू हुआ कब हुआ दोस्तों? 2006 में। इंप्लीमेंट तो हुआ 2006 में। और आया कब? ये लाया गया एक्ट 2005 में। इंप्लीमेंट हुआ 2006 में। इसका पूरा नाम क्या है? जल्दी बताएंगे सभी लोग। जल्दी बताएंगे सभी लोग। जल्दी से। सेशन खत्म होने वाला है, बस 5 मिनट में। बिल्कुल। महात्मा गांधी महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम। इसमें इसमें गांव में इसमें गांव में हर परिवार के कितने भी मेंबर्स, हर परिवार के जितने भी एडल्ट मेंबर्स हैं, परिवार के जितने भी एडल्ट मेंबर्स हैं, ध्यान से देखो। परिवार में कितने भी एडल्ट मेंबर्स यानी 18 वर्ष से ऊपर के एडल्ट मेंबर्स, ठीक है। एलिजिबल है मैनुअल वर्क के लिए। मैनुअल अनस्किल्ड मैनुअल अनस्किल्ड कोई कोई आपकी कोई स्किल की जरूरत नहीं है। यहां पे आपको फावड़ा चलाना है। बस मिट्टी खोदनी है। मैनुअल अनस्किल्ड वर्क के लिए आपको यहां पे रखा गया है। तो भाई याद रखना एक परिवार में अगर मान लो पांच लोग हैं, 18 वर्ष से ऊपर तो वो पांचों लोग जाके अपना 100 दिन का साल में 100 दिन का काम ले सकते हैं। ठीक है? और जो दिहाड़ी मिलेगी उनको मिल जाएगी। कोई दिक्कत वाली बात नहीं। हां। और अगर अगर अगर 15 दिन के अंदर-अंदर आपने जैसे अप्लाई किया कि भाई मुझे भी काम करना है मनरेगा में। मुझे भी 100 दिन का रोजगार चाहिए। अगर आपने अप्लाई किया और 15 दिन के अंदर आपको रोजगार नहीं मिला तो आपको कंपनसेेट किया जाएगा। आपको बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। ठीक है? 15 दिन के अंदर-अंदर या तो आपको नौकरी मिल जाएगी, नहीं मिलेगी तो आपको बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। ठीक है? तो परिवार में कितने भी एडल्ट मेंबर्स एलिजिबल हैं जो एल देखो परिवार में कितने भी एडल्ट मेंबर्स हैं वो एलिजिबल हैं। कितने भी एडल्ट मेंबर्स एलिजिबल हैं मैनुअल अनस्किल्ड वर्क के लिए। ठीक है? पहावड़ा चलाना है, कुदाली चलानी है, बस मिट्टी खोदनी है। समझ में आ रही है मेरी बात? चलो, आगे बढ़ते हैं।
व्हाट इज लास्ट क्वेश्चन? व्हाट इज द नेम ऑफ द गंगा क्लीन अप प्रोग्राम लॉन्चड इन 2014? बताओ कौन सा कौन सा वो प्रोजेक्ट है जो गंगा को साफ करने को लेकर और गंगा के आसपास के इलाके को एक तरीके से पुनर्जीवित करने को लेकर रिलेटेड है, गंगा नदी के प्रदूषण को साफ करने से रिलेटेड कौन सा है, नमामिंगे। तो गंगा का गंगा का प्रदूषण गंगा का प्रदूषण साफ करना, गंगा को पुनर्जीवित करना, ठीक है? गंगा को पुनर्जीवित करना। ठीक है? ये नमामिंगे का उद्देश्य है। 2014 में इसको शुरू किया गया है। नमामिंगे।
तो बेटा इस तरीके से हमारा कंटेंट हो जाता है खत्म। उम्मीद करता हूं आपको समझ में आया होगा। और इसी तरीके से इसी तरीके से आप हमारे साथ जुड़कर आगे भी तैयारी कर सकते हो। अगर आपको सीरियस वाली तैयारी करनी है तो पेड बैच आर एमबी बैच चल रहा है आपका लाइव चल रहा है, कंबाइंड बैच है ये। कंबाइंड बैच में जीके, रीजनिंग, मैथ्स, साइंस सब कुछ आपकी हो रही है बढ़िया तरीके से ये सारे फीचर्स के साथ, ठीक है एक ही बैच है बढ़िया। बाकी अगर आपको लगता है कि आपको जीके भी जीके ही पढ़नी है, बाकी तो आपके लगभग हो रखे हैं, जीके ज्यादा दिक्कत दे रही है तो आप 499 में जीके के बैच से जुड़ सकते हो जहां पे सारे टॉपिक्स कवर हो रहे हैं, डेली लाइव क्लास के द्वारा, लेटेस्ट पैटर्न और लेटेस्ट अपडेट अपडेटेड डाटा के साथ, रेगुलर वीकली टेस्ट और रिवीज़ क्लासेस, लेटेस्ट पीवाईक्यूज़ आपके ऐड होंगे। 2025-26 के जितने भी वैकेंसीज हैं सबके लिए सबके लिए आप यहां पर जुड़ सकते हो और बढ़िया तैयारी कर सकते हो बेटा। ठीक है? बढ़िया तैयारी कर सकते हो। और जो भी हमारे ग्रुप डी के एस्पिरेंट्स हैं वो इस बैच को लेकर तैयारी शुरू कर दें। वीओडी बैच है। अपने टाइम से खत्म कर दोगे। बढ़िया तैयारी हो जाएगी। एग्जाम कभी भी हो जाएगा। और एनटीपीसी के जो अंडर ग्रेजुएट वाले बच्चे हैं वो भी अगर कांसेप्ट क्लेरिटी करना चाहते हैं, कुछ टॉपिक्स क्लियर नहीं है तो ये बैच लें और तैयारी शुरू करें क्योंकि 299 में अभी नाइन मंथ्स के लिए मिल रहा है। बढ़िया ऑफर है। शानदार ऑफर है। पिक कर लो भाई इसे। ठीक है? बाकी अगर आपको सीजीएल वगैरह की तैयारी कर रहे हो, एसएससी वगैरह की तैयारी कर रहे हो तो एसएससी के लिए ये बैच है। बिल्कुल फाउंडेशन है। प्री और मेंस को टारगेट करते हुए मजा आ जाएगा पढ़ के। बिल्कुल बढ़िया है। सीजीएल के लिए है तो सीएचएसएल, सीपीओ, एमटीएस वगैरह ये सारे आराम से निकल जाएंगे। बाकी एटीएम बैच के साथ जुड़ के आप सब्जेक्ट वाइज़ टॉपिक वाइज़ जीके की प्रैक्टिस कर सकते हो। और अगर आप फाउंडेशन और प्रैक्टिस एक साथ लेते हो भाई तो जीके की तो समस्या ही खत्म हो जाती है। ये गारंटी है। ठीक है? चलो ये सारे कोर्सर्सेस आपको हमारी एप्लीकेशन क्विक ट्रिक्स बाय साहिल सर पर मिलेंगे। पेड कोर्सर्सेस वाले सेक्शन में। पेड कोर्सर्सेस वाले सेक्शन में। और याद रखना दोस्तों, याद रखना कि ये दो नंबर्स हैं, मंडे टू सैटरडे आप कांटेक्ट कर सकते हैं हमारे साथ और मंडे टू सैटरडे सुबह 10 से शाम 6:00 बजे के बीच में। ठीक है? बाकी सेशन अगर अच्छा लगा है तो प्लीज सब लोग लाइक करके जाना, कमेंट कर देना कि भाई कैसा लगा? मजा आया कि नहीं आया? और समझ में आई चीजें, इकोनॉमिक्स क्लियर हुई कि नहीं और शेयर जरूर कर देना और सब्सक्राइब कर लेना चैनल को। कल सुबह तुम्हारे पास आएगा 8:00 बजे भैया एक्सपेक्टेड पेपर। और वहां कोई एक्सप्लेनेशन नहीं मिलेगा आपको। हम सिर्फ क्वेश्चंस देखेंगे और और सीधे-सीधे टिक मार्क करते हुए चलेंगे क्योंकि पेपर करना है हमें। ठीक है? आपको पता चलना चाहिए कैसा पेपर आने वाला है। चलो भाई तो आज के सेशन को यहीं खत्म करते हैं। थैंक यू सो मच। टेक केयर। बाय-ब गुड नाइट।