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Zaalim BadShah Aur Ghareeb Larki Ka Anokha Qissa || Moral Stories in Urdu || Hindi Moral Stories

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सदियों पुरानी बात है कि सल्तनत बगदाद में एक बादशाह था जो निहायत नेक सीरत और खुशहाल था। उसके दरबार में हर किस्म के आलिम व फाजिल मौजूद थे। उसकी सल्तनत की सरहद समंदर से मिलती थी। उसने बड़े शौक से समंदर के किनारे एक आलीशान महल तामीर करवा रखा था। और अक्सर मौसम एक गरमा और बरसात में बादशाह सलामत उस महल में रौनक अफरोज हुआ करते थे। और समंदर की सैर से अपना दिल खुश किया करते थे।

एक रोज का जिक्र है कि बादशाह अपने अराकीने सल्तनत के हमराह बरादरी की शाह नशीन पर बैठा हुआ था और दरियाई जानवरों का तमाशा मुलाहिजा फरमा रहा था कि उसको दूर समंदर में सामने से एक कश्ती नजर आई जिस पर एक मर्द नौजवान और एक हसीन कमसिन औरत बैठी हुई थी। बादशाह को उनकी सूरत इतनी हसीन और दिलकश मालूम हुई कि उसका दिल बे इख्तियार चाहा कि उनको अपने पास बुलाकर उनका हाल दरियाफ्त करें। उसने फौरन अपने मुलाजिमों को हुक्म दिया कि कश्ती में सवार होकर उनके पास जाओ और उनको मेरे रूबरू फौरन ले आओ। चुनांचे हुक्म पाकर मुलाजमीन कश्ती में सवार होकर उनके पास गए और उन्हें अपने हमराह ले आए।

जब वह दोनों हुजूर में पेश हुए तो बादशाह के तख्त को अदब से बोसा दिया। बादशाह ने दुआए खैर के बाद उनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो और तन्हा कश्ती में सवार होकर किस तरफ को जाते हो? उस नौजवान ने अदब से जवाब दिया बादशाह सलामत हमारा कस्सा बहुत लंबा है। इसे सुनने में आपको कोई खास दिलचस्पी मालूम ना होगी और आपका वक्त जाया होगा। बादशाह ने कहा तुम इस बात का कुछ ख्याल ना करो। मैं तुम्हारा हाल सुनने का निहायत मुस्ताकन हूं। मुझको कोई तकलीफ नहीं होगी। तुम इस नेक बखत औरत को जो तुम्हारे हमराह है हमारे महल में बेगमात के पास भेज दो और अपना तमाम हाल तफसील के साथ मेरे रूबरू बयान करो। मुझको तुम्हारी सूरत से मालूम होता है कि तुम शरीफजादे हो और हौसला रखो। दिल जमाई रखो कि मैं तुम्हारे साथ बेहतर सुलक करूंगा और अच्छे हुस् अखलाका से पेश आऊंगा। बस उस औरत को जनानखाना में भिजवा दिया गया और उस नौजवान ने अपना किस्सा बादशाह के हुजूर इस तरह बयान करना शुरू किया।

कै बादशाह सलामत मैं बसरा के रईस का बेटा हूं। जब मैं पैदा हुआ तो मेरे बाप ने मेरा नाम यासिर रखा और बड़ी उल्फत से मेरी परवरिश की और तमाम इल्म व हुनर मुझको सिखलाए। मेरी उम्र अभी 15 साल की भी नहीं हुई थी कि मेरे वालिद वफात पा गए और विरासत में मुझे बहुत सी दौलत मिली और मैं अपने दोस्तों और हमजोलियों के साथ खुश व खुर्रम अपनी जिंदगी गुजारने लगा। एक रात मैंने ख्वाब में देखा कि एक बहुत बड़ा अजदहा अजगर अपना मुंह खोलकर मेरी तरफ दौड़ने लगा। वह मेरे पीछे था और मुझको अपने मुंह में लेकर आसमान पर उड़ गया और एक ऐसे मुकाम पर ले गया जहां पर आग रोशन थी और मुझे उस आग में डालने का उसने इरादा किया। उसी दौरान इंतहाई तेज आंधी चलनी शुरू हो गई और मुझको हवा का गुब्बारा उड़ाकर एक बुलंद पहाड़ पर ले गया। वहां जाकर मैंने देखा कि एक सुराख से काला सांप निकला और उसने मुझे काटने का इरादा किया। मैं उससे डर कर भागा तो अजदहा दौड़ कर मेरे पास आया और मुझसे लिपट गया। उसी दौरान मैंने देखा कि एक शेर जंगल से निकला और मुझे सांप समेत घसीट कर पहाड़ से नीचे लेकर आया।

इस कबाब के बाद जब मेरी आंख खुली तो मेरा तमाम बदन खौफ से कांप रहा था और बाकी रात बिल्कुल नींद ना आई। जब दिन निकला तो मैंने एक मौतबर नजूमी को बुलाकर उससे इस ख्वाब की ताबीरर पूछी तो उसने कहा ख्वाबाब आखिर ख्वाब है। आपको जल्द इस बला को दूर करने की तदबीरर करनी चाहिए वरना बड़ी आफत आ जाएगी। मैंने उस मोतबर से कहा तुम मेरे बुजुर्ग हो और मुझे जानते हो तुम जिस तरह फरमाओगे मैं उसी के मुताबिक अमल करूंगा। उस नजूमी ने कहा इस ख्वाब के असर को दूर करने के लिए सिवाय इसके और कोई सूरत नहीं कि तुम कुछ रोज आदमियों से अलदा किसी मकाम पर तन्हा रहो। मुझे अपने उस नजूमी के कहने से बड़ा अंदेशा पैदा हुआ और उसकी हिदायत के मुताबिक मैं दूसरे ही रोज अकेला शहर के बाहर एक बाग में चला गया। मगर क्योंकि मुझको हमेशा अपने दोस्तों के साथ रहने की आदत थी और सारा दिन हंसीखुशी काटने की आदत पड़ी हुई थी। तन्हाई मुझे बड़ी नागवार गुजर रही थी। थोड़ी देर के बाद मैंने सोचा कि किसी सूरत अपना दिल बहलाने की सबील निकालनी चाहिए। चुनांचे इस इरादे से मैं एक मुर्गजार में जो बाग से मिला हुआ था चला गया। वहां पर तरह-तरह के जानवर और चरंद परिंद मौजूद थे। मैं एक दरख्त के सामने खड़ा हो गया और उनकी तरफ देखने लगा। इत्तेफाकन वहां एक परिंदा जिसका कद बड़ा लंबा था नजर आया। उसके पर इतने खूबसूरत और कुशादा थे कि मुझे बेख्तियार उस पर प्यार आ गया और मेरा दिल चाहा कि उसे किसी तरह जिंदा गिरफ्तार कर लूं।

इस ख्याल से मैं वापस बाग में आया और एक बड़ा मजबूत रस्सा लेकर अपने हमराह फौरन उस मौके पर पहुंचा जहां वो परिंदा फिर रहा था। मैंने रस्से के एक सिरे का फंदा बनाया और दूसरे को अपनी कमर से बांधा और रस्से को फैलाकर फंदे के करीब थोड़ा सा दाना रख दिया और अपने दिल में ख्याल करने लगा कि इस तरीके से यह परिंदा मेरे दाम में गिरफ्तार हो जाएगा। जब परिंदा फिरता फिराता फंदे के करीब पहुंचा तो दाने को देखकर उसका दिल ललचाया और फौरन दाने पर गिरा और उसका पांव उस फंदे में फंस गया। उसने बहुत कोशिश की कि किसी तरह फंदे से अपने पांव को निकाल ले मगर उसके पांव आजाद ना हुए। परिंदा यह सुरते हाल देखकर घबरा गया और इसी घबराहट में उसने आसमान की तरफ परवाज शुरू कर दी। परिंदे की परवाज में इतनी ताकत थी कि मैं भी उसकी परवाज के साथ ही उड़ने लगा। और ऐसी बुलंदी पर वह परिंदा मुझे लेकर पहुंच गया कि मुझे जमीन की तरफ देखने से बड़ी दहशत मालूम होती थी। मैं अपने आप पर लानत मलामत करने लगा कि क्यों बैठे-बठाए खुद ऐसी मुसीबत में घिर गया और ऐसी बला को अपने गले में डाल लिया कि इससे निजात पाने की कोई सूरत नजर नहीं आती थी। अलकसा काफी देर तक परिंदा अपनी जिंदगी से मायूस होकर खुदा को याद करता हुआ ऊपर उड़ता चला गया। कुछ देर के बाद परिंदे ने आसमान से नीचे की तरफ उतरना शुरू कर दिया और एक जजीरे में लबे दरिया एक बड़ा दरख्त था जिस पर उस परिंदे का आशियाना था। वहां आकर उसने कयाम किया। इत्तेफाकन मेरे हाथ में भी दरख्त की शाख आ गई। मैं शाख पर बैठकर अपनी रस्सी खोली और दरख्त से नीचे उतरा। मैंने देखा वो बड़ा पुरफजा और खूबसूरत जजीरा था। हर तरफ बेशुमार चश्मे पानी के रवाओं थे और सैकड़ों दरख्त मेवादार मौजूद थे जिन पर किस्मकिस्म के फल लटक रहे थे। मुझे बड़ी जोरों की शिद्दत से भूख लग रही थी। मैंने दरख्तों से मेवे तोड़कर अपना पेट भरा और शाम के पहर तक जजीरे की सैर करता रहा। जब रात हुई तो दरिया से हजारों जानवर बड़ी भयानक शक्लों के निकलकर जजीरे में फैलने लगे। मैं उन्हें देखकर खौफ से एक दरख्त पर चढ़ गया और रात भर खौफ के मारे मुझे नींद नहीं आई।

जब सुबह हुई तो मैं दरख्त से नीचे उतरा और जजीरे में इधर-उधर गश्त करने लगा। अचानक मेरी निगाह जो दरिया पर पड़ी तो मुझे कश्तियां कतार में नजर आई जो जजीरे की तरफ चली आ रही थी। जब कश्तियां दरिया के किनारे करीब आकर लगी तो मैंने देखा कि सैकड़ों आदमी जिनकी शक्ल व सूरत बिल्कुल हमारे मुल्क के आदमियों से नहीं मिलती जुलती थी और ना ही उनका लिबास हमारे जैसा था। कश्तियों से उतर कर जजीरे में आए। मैं उनको देखकर डर गया और डर कर एक दरख्त पर चढ़ गया। वह सब आदमी जब कश्ती से उतर चुके और तमाम सामान जो कश्ती में रखा था वह उतार चुके तब वहां से एक नौजवान जो बहुत हसीन था और छोटी उम्र का था उसको अपने साथ उस मकाम के करीब आए जहां मैं दरख्त पर चढ़ा छुपा बैठा था। मेरे करीब ही एक और बहुत बड़ा सायादार दरख्त था। उन्होंने उसके नीचे एक तख्त बिछाया और उस तख्त पर उस कम उम्र खूबसूरत नौजवान को बिठाया और उसके पास तमाम खानेपीने का सामान रखा और उसे फिर खैराबाद कहकर वहां से रुखसत हो गए और कश्तियों में सवार होकर थोड़ी ही देर में नजरों से गायब हो गए। तब मैं दरख्त से उतरा और उस खूबसूरत नौजवान के पास जाकर उसे अदब से सलाम किया। मेरी सूरत देखते ही उस नौजवान के चेहरे का रंग हो गया और एक चीख मारकर वो बेहोश होकर तख्त से नीचे गिर पड़ा। मैं अपने दिल में बड़ा हैरान हुआ कि आखिर माजरा क्या है? और उस नौजवान का सर जमीन से उठाकर अपने जानू घुटनों पर रखा और पानी का छींटा उसके मुंह पर मारा। पानी के छींटे पड़ते ही उसने अपनी आंखें खोल दी। वो होश में आ गया। मगर मेरी सूरत देखकर रोने लगा और उसका बदन बेद की मानिंद कांपने लगा। मैंने उसकी दिलजोई की। उसे हौसला दिया और उससे पूछा कि तुम मुझसे क्यों खौफजदा हो? क्यों डरते हो मुझसे? मैं तुम्हारा ताबेदार हूं। तुम्हारा दोस्त हूं। मेरी जानिब से किसी किस्म का गम ना करो। मुझसे डरो मत और अंदेशा ना करो। और खुदाारा मुझे अपने हाल से आगाह करो। मेरे इस तरह कहने से उसको थोड़ी तसल्ली हुई और बोला ए शख्स मेरी दास्तान सुन लीजिए। इससे आपको मालूम हो जाएगा कि मैं बेजा खौफ नहीं कर रहा। मैं आपसे यूं ही नहीं डर रहा। इसकी कोई वजह है। मैंने कहा बयान कीजिए।

अब उस नौजवान ने कहा साहब मेरी दास्तान यह है कि इस जजीरे से दो रोज की राह पर एक जजीरा वाक है। मेरा बाप वहां का सुल्तान है। जब मैं पैदा हुआ था जैसा कि दस्तूर होता है। मेरे वालिद ए बुजुर्गवार ने नजूमियों को तलब किया और उनसे मेरी किस्मत का हाल पूछा। उन्होंने बताया कि तुम्हारे बेटे की किस्मत बहुत अच्छी है। मगर एक गिरह इसकी किस्मत में पड़ी है। एक ऐसी नूसत है जिसके सबब 14 साल की उम्र में शहजादे की जिंदगी को खतरा है। अगर किसी तरह यह 14 साल का अरसा गुजर जाएगा तो आपके बेटे की तमाम उम्र बड़े ऐश आराम से गुजरेगी। और यह बड़ा नामी गिरामी नामवर और जबरदस्त बादशाह बनेगा। अपने वक्त का मशहूर व मारूफ बादशाह होगा। मेरा बाप क्योंकि यह बात सुनकर बड़ा परेशान हुआ और उनसे पूछा कि इस गिरह को इस नूसत को किस तरह दूर किया जा सकता है। तमाम नजूमी यह बात सुनकर अपनी किताबें खोलकर काफी देर उनका मुतालिया करते रहे। उन्हें खोलकर पढ़ते रहे। फिर बड़े गौर व सोच विचार के बाद उन्होंने जवाब दिया कि बादशाह ए अलीजाह सिर्फ एक बात हमको किताबों से पता चली है। वो यह कि शहजादा जब 14 साल को पहुंचेगा तो आप इसको 10 रोज तक की तरह किसी ऐसे मुकाम पर भेज दें जहां कोई इंसान इसके आसपास ना आ सके। अगर यह 10 रोज इसके सही सलामत गुजर गए और किसी इंसान का इसके पास से गुजर ना हुआ तो आइंदा जिंदगी में इसे कोई मुश्किल पेश नहीं आएगी। इसे कोई खतरा लाह करना होगा।

अब मेरी जो उम्र 14 साल की हुई तो मेरे बाप ने नजूमियों के कहने पर अमल किया और मुझे तन्हाई में इस सुनसान जजीरे में छोड़ दिया। मैंने जो तुम्हारी सूरत देखी तो मुझे यकीन हो गया कि मेरी मौत आ पहुंची है क्योंकि मेरा बचना इसी बात पर मुनहसिर था कि 10 रोज तक कोई इंसान मुझ तक ना पहुंचे। यही वजह है कि तुम्हें देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए और मैं डर गया। मैंने शहजादे का नाम शहजादा हमजा जाना। और यह हाल सुनकर उसको बहुत तसल्ली और तशवी दी और कहा कि मुझसे किसी किस्म का अंदेशा ना करो डरो मत बल्कि इस तनहाई के आलम में मैं आपकी हर तरह खिदमत बजा लाऊंगा और जब तक मेरे तन में दम है कोई आफत आपके ऊपर नहीं आने दूंगा मेरे इस तरह कहने से उसको मेरी तरफ से दिलजमाई हो गई उसे हौसला हुआ और मैं बड़ी मोहब्बत से दिन रात उसकी खिदमत करने लगा दो-तीन रोज में मुझको शहजादे से ऐसी उल्फत और मोहब्बत हो गई कि मैं हरदम उसकी आसाइश और आराम की फिक्र में लगा रहता। उसकी खिदमत बजा लाता और उसकी तबीयत को हर तरह खुश रखने की कोशिश करता।

कस्सा मुखतसर इस तरह बाहमी खुशी और खुरर्मी में नौ रोज गुजर गए। जब दवां दिन हुआ तो शहजादा हमजा ने कमाल खुश होकर मुझे कहा लो साहब अगर आज का दिन बगैर आफत गुजर गया तो खुदा के फजलल से मेरे पास कोई रंज और गम ना आ सकेगा और मेरी तमाम उम्र ऐशोइत में गुजरेगी और मुझसे कहने लगा कि मैं तुम्हारी खिदमत और तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगा और ए मेरे दोस्त मैं तुमसे यह दरख्वास्त करता हूं कि तुम हमेशा मेरे पास रहना कभी मुझसे जुदा ना होना मैंने जवाब दिया कि आपके कहने की जरूरत नहीं है। मेरा दिल खुद कभी आपकी जुदाई को गवारा ना करेगा। शहजादा सलामत आप इत्मीनान रखें। मैं हमेशा आपकी खिदमत में हाजिर रहूंगा। तेरी बातों में दोपहर दिन चढ़ गया। तब मैंने और शहजादे ने गुसल करके पोशाक बदली और दस्तरखान बिछाकर खाना शुरू किया। जब खाने से फॉरग हुए तो शहजादा तख्त पर लेट रहा और मुझसे बातें करने लगा। इसी गुफ्तगू के दौरान में एक दरख्त से जो हमारे बिल्कुल करीब था। एक निहायत नफीस और खुश रंग सेब गिरा। शहजादे ने मुझसे कहा इस सेब को उठाकर लाओ और तराश कर मुझे खिला दो। शहजादे के हुक्म के मुताबिक मैं उठकर उसके पास गया और सेब उठा लाया और संदूक से एक बड़ा चाकू निकालकर उस सेब को काटने लगा। तराशने लगा। शहजादे ने कहा, जरा इस सेब को मेरे पास लाना। यह मुझको निहायत खुश रंग मालूम होता है। मैं सेब को छीलकर उसके मुंह के सामने लेकर आ गया। शहजादे ने अपनी गर्दन को तकिए से उठाकर सेब को बहुत नजदीक से देखना चाहा। मैंने उसका इरादा देखकर अपना हाथ आगे बढ़ाया कि अचानक शहजादे के सर की टक्कर मेरे हाथ को लगी और चाकू मेरे हाथ से छूट कर बड़े जोर से शहजादे के हलक पर जा गिरा और ऐसा देखा कि शहजादे का टेटवा कट गया। मैं यह हाल देखकर घबरा गया और जल्दी से हाथ बढ़ाकर चाकू शहजादे के हलके से निकाला। मगर चाकू ऐसे जोर से लगा था कि कई उंगलियों तक हलका में घुस गया था और तमाम रगों को उसने काट डाला था। चाकू निकालते ही शहजादे के हलक से खून का फव्वारा जारी हो गया और वह बेहोश होकर तख्त से नीचे गिर पड़ा और एक लम्हे में उसका दम निकल गया। वो मर चुका था।

यह हाल देखकर मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मेरे दिल को ऐसा सदमा हुआ कि मेरे होश व हवास सब जाते रहे। बार-बार शहजादे की सूरत देखकर और उसकी भोलीभाली बातें याद करके दिल खून के आंसू रोता रहा और आंसू आंखों से जारी थे। दिन भर मुझको आझारी में गुजर गया। रात भी इसी गम वलम में गुजरी और आंख बिल्कुल ना लगी। दूसरे रोज सुबह सवेरे हमें वही कश्तियां जिनमें शहजादा अपने दीगर मुलाजमीन के हमराह इस जजीरे में आया था। किनारे पर नमूदार हुई और लोग कश्तियों से उतर कर गाते बजाते उस मकाम पर पहुंचे जहां शहजादा मुर्दा पड़ा हुआ था और मैं बैठा हुआ था। इस गिरोह में शहजादे का बाप भी था। जब वह करीब पहुंचे और शहजादे को जमीन पर मुर्दा पड़ा हुआ देखा तो शोर मचाने लगे। आह ओझारी करने लगे और बड़े अफसोस और रंज से रोने लगे। शहजादे के बाप ने मुझको देखकर कहा कमबख्त तूने यह क्या किया? मेरे बेगुनाह बच्चे को हलाक कर दिया और मुझको जान से खो दिया। मैंने तेरा क्या नुकसान किया था कि जिसके एवज तूने यह सदमा मुझे पहुंचाया है। मैंने रोकर कहा ए बादशाह ए आली मेरा इसमें जरा भी कसूर नहीं है। तकदीर में इसी तरह लिखा था कि जो जहूर में आया जो हादसा होना था वह हो चुका है। मैं इससे इंकार नहीं कर सकता। मेरे दिल से यह रंज तमाम उम्र ना मिटेगा। बादशाह ने कहा तू बड़ा बेगैरत है कि तूने मेरे लखते जिगर को हल्लाक किया और अफसोस जाहिर करता है और मुझे तसल्ली और तशफी देना चाहता है। यह कहकर उसने अपने मुलाजिमों को मुझे गिरफ्तार करने का हुक्म दिया और शहजादे की लाश कश्ती में रखकर सब आदमी कश्ती में सवार होकर रोते हुए वापस रवाना हुए।

दो रोज के बाद जब इस जजीरे के किनारे पर कश्तियां जा लगी जहां से बादशाह और उसके साथी आए थे। वहां पहुंचकर देखा कि किनारे पर हजारों आदमी मौजूद थे जो शहजादे को देखने के लिए रंगीन पोशाकें पहने हुए उसके इंतजार में खड़े थे और बहुत सामान ए ऐश व निशात उनके हमराह था। जब कश्तियां किनारे लगी और लोगों को शहजादे की हलाकत का हाल मालूम हुआ तो हर तरफ शोर बरपा हो गया। हर शख्स बड़ी आह ओझारी के साथ रोने पीटने लगा। जब उन्होंने मुझे कश्ती से उतारा और लोगों को मालूम पड़ा कि मैं कातिल हूं तो उन्होंने मुझे पत्थर मारने शुरू कर दिए जिससे मेरा हाल निहायत बुरा हो गया। अल किस्सा वो मुझे लेकर जब बादशाह के महल में पहुंचे तो बादशाह ने हुक्म दिया कि मुझे कैदाखाने में डाल दिया जाए और खुद बादशाह और उसके तमाम बाशिंदों ने स्याह पोशाक पहन ली और 10 रोज तक शहजादे का मातम मनाया जाने लगा। इन मातमी दिनों के गुजर जाने के बादशाह ने मुझे अपने रूबरू तलब किया और कहने लगा कमबख्त जालिम तूने मुझे ऐसा सदमा पहुंचाया कि मैं बयान नहीं कर सकता। अब बता कि इसके ऊपर तुझे क्या सजा दूं। अगर तू मुझे वजह बता दे कि तूने किस वास्ते शहजादे को कत्ल किया तो मैं अभी तुझे माफ कर दूंगा। मगर मेरे सामने सच बोलना। मैंने अबदीदा होकर बयान किया कि झांना। मैं हर तरह से सजावार हूं। जो आपका दिल चाहे मुझे सजा दें। मैं खुद अपनी जिंदगी से परेशान हूं कि मेरे हाथ से एक ऐसा सितम हो गया जो मैंने जानबूझकर हरगिज़ नहीं किया था। शहजादे की जान लेने का मेरा कोई इरादा नहीं था।

बादशाह ने अपने अराकीन सल्तनत और अपने तमाम मुशीरों से पूछा कि इसको क्या सजा देनी चाहिए? सब ने यक जबान होकर गुजारिश की कि जहां अपना इसके बदन की एक-एक बोटी जुदा करके परिंदों और चीलों को खिला दी जाए तभी हमको कुछ करार आएगा। बादशाह ने फरमाया कि जरूर इसे ऐसी नाकाम सजा दूंगा कि इसकी सजा यही है। लेकिन यह सजा भी इसके लिए कम है। मगर मैं बादशाह हूं और मुझको इंसाफ के मामले में यह हका नहीं कि मैं खुद इसको सजा दूं। बेहतर यह है कि मामला सजा ए अदल पर मबनी कर दिया जाए। इसको सजा ए अदलगाह पर ले जाकर खड़ा किया जाए। वहां इसकी गुनाहगारी और बेगुनाही का सबूत मालूम पड़ेगा। खराकी सल्तनत ने कहा हुजूर बजा फरमाते हैं ऐसा ही करना चाहिए। चुनांचे दूसरे रोज बादशाह अपने तमाम अराकीन इस सल्तनत के समेत मुझको अपने हमराह लेकर दरिया के किनारे पर जा पहुंचा। जहां पर वो सजा-ए अदलगाह बना रखी थी। वो सजा-ए अदलगाह जिसका नाम उन्होंने रख छोड़ा था। वह एक बड़ा सा पत्थर था कि उसकी बुलंदी हजार गज से भी ज्यादा थी और उसके ऊपर एक सुतून सा बना हुआ था और उसमें एक आनी जंजीर आवेजा थी और उस जंजीर का एक सिरा दरिया में पड़ा हुआ था और चार छोटी-छोटी जंजीरें उसमें से निकल कर लटक रही थी और उसमें बड़े-बड़े पलड़े एक तराजू के मानिंद बंधे हुए थे। गोया जंजीर का सिरा तराजू की डंडी बना हुआ था और रस्से में मजबूत रस्सा बंधा हुआ था और उसे एक चर्ख की तरफ से बांध रखा था। बादशाह ने मेरी तरफ गजबनाक आंखों से देखकर कहा बदबख्त अभी मुझे सारा हाल सच बयान कर दे कि तूने मेरे अजीज बेटे को क्यों कर कत्ल किया? क्यों उसे मार डाला? क्यों इतना बेरहम हो गया? तो मैंने अर्ज किया ए बादशाह सलामत। मैं खुदा पाक की कसम खाकर कहता हूं कि शहजादे के कत्ल में मेरा कुछ कसूर नहीं है।

फिर बादशाह ने मेरे सामने एक हाथी को पलड़े में बांधकर खड़ा कराया और रस्से का सिरा चरख से खोल दिया। वो पलड़ा फौरन दरिया में डूब गया और थोड़ी देर बाद जब पलड़ा वापस आया तो हाथी के बगैर था। हाथी दरिया में डूब चुका था। बादशाह ने कहा तू सच हाल नहीं बयान करता। लाचार मुझे तेरा भी यही हाल करना पड़ेगा। जा देख जैसा कि उस हाथी का हश्र हुआ। मैंने कहा बादशाह सलामत मैं सच्चा हूं। अगर खुदा की मर्जी यही है और मेरी मौत इसी तरह लिखी है तो इसका कोई इलाज नहीं। तकदीर मेरी मौत को नहीं टाल सकती। मैं हाजिर हूं। जो आपका दिल चाहे मेरे साथ सुलूक कीजिए और जो मर्जी हुक्म फरमा दीजिए। तब बादशाह ने मुझको भी उसी तरह के पलड़े में बिठाकर रस्सा खोल दिया और रस्सा खुलने के साथ ही पलड़ा दरिया में डूबना शुरू हो गया। मैंने अपनी आंखें बंद कर ली और अपनी इस

तरह मौत पर अपने खुदा को याद करने लगा। जब मैं पानी की तह में पहुंचा तो पानी ने एक बार फिर मुझे ऊपर की तरफ उछाल दिया। अब मेरा हाथ किसी सख्त चीज पर जाकर लगा था। मैंने आंखें खोल दी और देखा कि एक जहाज पानी में रवाऊ है। और मेरा हाथ उसके तख्ते पर लगा है। मैं उचक कर जहाज में चढ़ गया क्योंकि जहाज बड़ा आरास्ता था और उसमें बहुत से कमरे बने हुए थे। मैं कमरों के बीच में गया तो वहां पर एक पुरतकल्लुफ और निहायत शानदार पलंग देखा। उस पलंग पर कोई शख्स सो रहा था और बहुत सी कनीजें उसके गिर्द सो रही थी। मैंने चादर को सरका कर देखा तो एक नाजनीन गुलंदाम माहलका का चेहरा देखा जो बेइंतहा खूबसूरत थी। मैंने कभी ऐसी हसीन औरत अपनी जिंदगी में नहीं देखी थी। बेइख्तियार मैंने एक बोसा आहिस्ता से उसके गाल पर दे दिया। बोसा के लेने से वो नाजनीन चौंक कर उठ बैठी और मेरी तरफ मुखातिब होकर पूछा कि तुम कौन हो? और जहाज में कैसे पहुंचे? मैंने अपना तमाम हाल शुरू से लेकर आखिर तक उसको बयान कर दिया और फिर उससे कहा कि तुम भी मुझे अपना हाल बताओ कि तुम यहां इस जहाज में कैसे।

उस नाजनीन ने बयान किया मेरा यह हाल है कि मैं एक बादशाह की बेटी हूं जिसकी हुकूमत में बहुत से उम्दा जजीरे हैं। सिवाय मेरे मेरे बाप की कोई और औलाद ना थी। इसी सबब उसने निहायत लाड प्यार और नाजो नेमत से मेरी परवरिश की और मुझसे कमाल उल्फत और मोहब्बत रखता था। एक रोज का जिक्र है कि मेरा बाप शिकार खेलने के वास्ते जंगल में गया। जंगल में उसने एक बहुत खुश रंग बारह सिंघा देखा जो बादशाह के रूबरू होकर निकल पड़ा। बादशाह ने चाहा कि इसको जिंदा गिरफ्तार कर ले और घोड़ा उसके पीछे डाल दिया। बादशाह को बारह सिंघा बहुत पसंद आया था। बादशाह ने जब उस 12 सिंहे का पीछा किया तो वह फरार हो गया। हरचंद बादशाह ने उसके पीछे घोड़ा बहुत दूर तक दौड़ाया मगर हाथ ना आया और अंजामकार झाड़ियों में छुपकर नजरों से गायब हो गया। बादशाह भरपूर घोड़ा दौड़ाते दौड़ाते थक गया था और शाम का वक्त हो चुका था। थकन से बादशाह का बुरा हाल था। बादशाह एक दरख्त के नीचे घोड़े पर से उतर कर बैठ गया और सुस्ताना चाहता था।

जब रात पड़ गई तो बादशाह को थोड़ी दूर एक आग रोशन मालूम हुई। वह उस आग की तरफ चल पड़ा। करीब पहुंच कर देखा कि एक हबशी निहायत दृष्ट और करीह शक्ल वाला उसी के पास बैठा हुआ किसी जानवर को भून कर खा रहा था और एक प्याला शराब का उसके आगे रखा हुआ था। और उसमें से थोड़ी-थोड़ी देर के बाद वह शराब पीता जाता और उसके बराबर एक औरत जो जवान थी और बहुत खूबसूरत थी और जिसके हाथ रस्सी से बंधे हुए थे और उसकी गोद में एक दो बरस का बच्चा था बैठी थी। बादशाह उनके करीब जाकर इस ख्याल से पोशीदा यानी छुप कर खड़ा हो गया कि उनका तमाशा देखे कि यह क्या करते हैं। थोड़ी देर के बाद जब वो हबशीने से फरग हुआ तो औरत की तरफ देखकर मुखातिब होकर बोला कमबख्त तूने क्यों मुझे परेशान कर रखा है और खुद इस मुसीबत में पड़ी है। सख्ती और जहालत छोड़ दे और मेरे साथ मोहब्बत और वफादारी का रवैया इख्तियार कर। वरना तुझको बड़े अज़ाब से मैं हलाक कर डालूंगा। बड़ी तकलीफ मैं तुझे दूंगा। औरत ने कहा, ए बदबख्त स्याहम तूने मुझको तंग कर रखा है। मगर खुदा ने इस वक्त भी मुझे अपने फजललो करम से मेरी इज्जत महफूज़ रखी है। मेरी सांस में थोड़ी बहुत दमखम है। याद रख अगर तू 10 बरस तक भी मुझे इस अज़ाब में मुब्तला रखेगा तो मैं हरगिज़ तेरी सूरत देखने तक पर राजी ना हगी। और जो तू मुझे मार डालने की धमकी देता है तो मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है। मैं खुद अपनी जान से बेजार हूं और मरना चाहती हूं। यह जवाब सुनकर उस हबशी को तैश आ गया। गुस्सा चढ़ गया और उसने उस औरत के बाल पकड़ कर उसे अपनी तरफ घसीटा और तलवार उसके मारने के इरादे से म्यान से निकाली। मेरे बाप ने जब यह देखा तो दिल में सोचा कि बड़े अफसोस की बात है कि ऐसी हसीन और नेक औरत इस बदजात हबशी के हाथों मारी जाए और मैं एक खामोश तमाशाई बनकर खड़ा तमाशा देखता रहूं। जिस वक्त हबशी ने तलवार मारने का इरादा किया था तो बादशाह ने एक तीर अपनी कमान में चढ़ाकर उस वैशी हबशी का निशाना लेकर मार दिया कि ज से तीर उस हबशी की पीठ में घुस गया और हबशी फौरन गिरकर हलाक हो गया। क्योंकि हबशी के धमकाने से औरत पर मौत का खौफ छा गया था। तो उसने जब हबशी को मुर्दा होकर जमीन पर गिरते देखा तो उसके दम में दम आया। उसकी जान में जान आई और वह इधर-उधर हैरान होकर देखने लगी कि यह तीर कहां से उसकी मदद को आ गया। उसी वक्त बादशाह अपनी कमी से निकल कर उस औरत के पास आया। वो बादशाह को देखकर उसके कदमों में गिर पड़ी और हाथ बांधकर कहने लगी अगर मेरी हजार जानने भी हो तो मैं आपका शुक्रिया अदा नहीं कर सकती कि आपने मेरी जान ऐन मौके पर पहुंचकर बचा ली। अगर जरा सी भी देर हो जाती तो शक नहीं था कि मैं हलाक हो चुकी होती। आपने मेरे साथ जो सुलक किया है उसका मुआवजा मैं किसी तरह अदा नहीं कर सकती। बादशाह ने उसे तसल्ली और तशवी दी और उससे कहा कि तुम बैठकर जरा दम लो। सांस लो और फिर मुझे अपना सारा अहवाल बयान करो कि तुम कौन हो और इस हबशी नाबकार के जाल में किस तरह गिरफ्तार हो गई।

वो नाजनीन औरत बादशाह के कहने के मुताबिक बैठ गई और कहने लगी कि मेरा हाल यह है कि मैं कौमे जंज हबशियों से ताल्लुक रखती हूं और इस कौम के एक रईस की बीवी हूं। इस हबशी ने जो कि हमारी कौम का सरदार है मुझे एक रोज देखा तो मुझ पर आशिक हो गया। मेरी खूबसूरती कई कसीदे पढ़ने लगा और तरह-तरह के हीले बहाने और फरेब देकर चाहा कि मैं किसी तरह इसके साथ उल्फत करूं। मगर मुझको अपने शौहर से कमाल मोहब्बत थी। मैंने इसकी बात पर कान ना धरा और साफ इंकार कर दिया। इस वजह से यह और भी ज्यादा नाराज हो गया और फिर मेरे पीछे पड़ गया और एक रोज इसका दांव चल गया और मुझे इसने काबू करके इस वीरान जंगल में गिरफ्तार करके लाकर यहां छोड़ दिया और अरसा तक मुझे निहायत अज़यत दे देकर तंग करता रहा। इस कदर अजयत और तकलीफ देने के बावजूद मैं इसके साथ किसी तौर राजी ना हुई और इससे मुतफिर रही। आज इसने मुझे मार डालने का इरादा कर लिया था और मेरी जान के बचने की कोई उम्मीद बाकी ना रही थी कि खुदा ने आपको मसीहा बनाकर मुझे भेज दिया और इस जालिम व जाबिर के जुल्म व सितम से निजात दी। बादशाह को औरत का हाल सुनकर उस पर बड़ा रहम आया। वह उसे अपने साथ अपने महल में ले गया और क्योंकि उसका कोई बेटा ना था इसलिए उसने उस औरत को और उसके बेटे की परवरिश करना शुरू कर दी। मैं भी अपने बाप की खातिर उनकी बहुत खातिरदारी करती थी। मगर दिल में मुझे उनके साथ बादशाह की मोहब्बत बहुत नागवार गुजरती थी। क्योंकि जब से वह औरत और उसका बेटा आए थे। बादशाह की शफकत और मोहब्बत जो मुझ पर हमेशा रहती थी उसमें कुछ बदलाव आ गया था। अलकसा लड़का परवरिश पाकर जवान हो गया और मेरे बाप को ऐसा प्यारा हो गया कि बादशाह ने सारी बादशाहत उसको दे दी और खुद गोशा आफियत में जाकर बैठ गया।

जब वह लड़का जिसका नाम नादिर था बादशाह बन गया तो लोगों ने उसको बहकाना शुरू कर दिया और अपना असर्व रसूखा पैदा करने की वजह से उसको यह पट्टी बढ़ानी शुरू कर दी कि मेरे बाप का जिंदा रहना उसकी हुकूमत के लिए खतरनाक है क्योंकि मेरा बाप उसकी बादशाही में खलल डालेगा और अंजाम इस बात का यह निकला कि उस बदकार एहसान फरामोश ने मेरे बाप को कत्ल कर दिया और उसको को फिर यह सुझाया गया कि मुझको भी मार डाले। मगर मेरे बाप के पुराने और वफादार मुलाजिम वजीर हमीद ने जिसको मुझसे और मेरे बाप से बेहद मोहब्बत थी और वह इस लड़के से दिल्ली तौर पर बेजार था और चाहता था कि किसी तरह वक सल्तनत का मुझको मिल जाए और मुझे तख्त पर बिठा दे। उसने मुझे इस इरादे से आगाह किया और कहने लगा कि यह एहसान फरामोश तुझे भी मार डालना चाहता है। मैं चाहता हूं कि तुम यहां से कहीं और चली जाओ और फिर उसने मेरे लिए यह जहाज का बंदोबस्त किया और खुफिया तौर पर एक रात मुझे कनीजों के साथ इस जहाज पर सवार कराया और मुझे कहने लगा कि फिलहाल तुम यहां से चली जाओ। जब हम इस लड़के से तख्तो ताज छीन लेंगे और उस पर काबू पा लेंगे तो फिर तुम्हें वापस बुला लेंगे। और अब मुझे वहां से निकले हुए 10 रोज हो चुके हैं। मुझे वहां की कुछ खबर नहीं और मुझको तनहाई और बेकशी महसूस होती है। अक्सर औकात ऐसा रंज होता है कि दिन भर रोती रहती हूं। आज अल्लाह ने मुझ पर रहम कर दिया और गैब से तुम्हें मेरे पास भेज दिया। अपनी दास्तान सुनाओ कि तुम कौन हो और क्यों कर तुम्हारा इस जहाज पर आना हुआ।

मैंने इस महबूब दिलरुबा शहजादी लैला से अपना तमाम किस्सा बयान करने लगा और कहा कि मेरे हाल पर रहम खा और मुझको अपनी गुलामी में कबूल कर। इस नाजनीन का दिल भी मेरी तरफ माइल हो गया। और मेरी मोहब्बत आेज बातों से मुतासिर होकर वो मुझसे बहुत हंसी। और मेरे कहने पर उसने मेरी तजवीज मंजूर करके मेरे साथ निकाह कर लिया। इसके बाद हम 101 रोज तक इसी तरह दरिया में रवा रहे और चाहते थे कि कहीं कोई आबादी नजर आ जाए तो वहां जहाज से उतर कर कयाम करें मगर कहीं किनारा मालूम नहीं पड़ रहा था। 12वें रोज सुबह हमें दरिया का किनारा नजर आया और एक बहुत बड़ा शहर नजर आया। हमने जहाज का रुख उस तरफ को फेर दिया। जब करीब पहुंचे तो हमको जहाज के करीब कश्तियां नजर आई। मालूम हुआ कि उसमें सैकड़ों हबशी मुसल्लाह सवार थे। हमें उनका इरादा हमारे बारे में खराब मालूम होता था। वो हमें मार डालना चाहते थे। मैंने यह बात अपनी जजा लैला से बयान की तो उसने कहा कि मुनासिब यह है कि हम सब औरतें मर्दाना पोशाक पहनकर उनके साथ जंग करें। क्योंकि अगर उनको यह मालूम पड़ गया कि जहाज पर सब औरतें हैं और सिर्फ तुम एक अकेले मर्द हो तो उनको और ज्यादा जुर्रत और हिम्मत हो जाएगी। सब कनीजों, गुलामों और मेरी बीवी ने लिबास मर्दाना पहना और मेरे हमरा तीरंदाजी शुरू कर दी। फिर हम उन्हीं हबशियों के साथ लड़ते रहे और बहुत से हबशी हमारे हाथों कत्ल हो गए। ताम वो हजारों थे और हम उनके मुकाबले में बहुत कम थे। हमारी हकीकत ही क्या थी और हमारी जानिब से तमाम कनी और मुलाजमीन लड़ते लड़ते शहीद हो गई। सिर्फ मैं और मेरी बीवी बाकी बच गए और अंजामकार हम उनके हाथों गिरफ्तार हो गए और हमें पकड़ कर किनारे पर लेकर गए।

जब किनारे पर पहुंचे तो वहां देखा कि हजारों हबशी अपने बादशाह मलिक उस सूडान के साथ वहां मौजूद हैं। और एक नौजवान हबशी की लाश उनके सामने पड़ी है जो उनके बादशाह का बेटा था। और हमारे हाथों इस जंग में वह मारा गया था। वो बादशाह के बेटे की लाश पर बैठे आह ओझारी कर रहे थे। जब हमें बादशाह के रूबरू ले जाया गया तो उसने बड़ी कहर और गजब की निगाहों से हमको देखा और एक हौसला बुलंद आवाज से पुकारा। बदबख्तों तुमने मेरे प्यारे बेटे की जान ले ली है। देखो इसके बदले में मैं क्या हश्र करता हूं। क्या हाल करता हूं तुम्हारा। फिर बादशाह हमको अपने हमराह किले में लेकर आ गया और हमसे पूछा कि तुम कौन हो? हमने कुछ जवाब ना दिया। इतने में वह शहजादा जो कत्ल हो गया था। उसकी बीवी नंगे सर चीखती चिल्लाती हुई आई वहां। और बादशाह से हमारी तरफ इशारा करके कहा। यह वही है मूजी लोग। जिन्होंने मेरे जवान शौहर को कत्ल किया है। बादशाह ने कहा, "हां यह वही बदकिरदार है। मैं इनकी हराम जिंदगी का ऐसा मजा चखाऊंगा, कि सारा आलम याद रखेगा।" शहजादे के कत्ल करने का नतीजा यह होता है। मगर उस औरत ने जब हम दोनों को इतना हसीन और दिलरुबा देखा तो उसका हमारे ऊपर दिल आ गया। क्योंकि मुझे उसकी नजरों में कुछ अजीब सी चमक दिखाई दी। वो फौरन बादशाह से कहने लगी हुजूर उन्होंने मेरे शौहर को मार डाला है और मुझे तमाम उम्र के वास्ते गमजदा कर दिया है। मैं चाहती हूं कि इनको मेरे सुपुर्द कर दिया जाए ताकि मैं हर रोज इनको अपने हाथ से अज़यत पहुंचाकर अपने गमगीन दिल को तस्कीन दूं। बादशाह ने उस औरत की बात मान ली और हमें उस बदसूरत स्याह फम औरत मलिका जंगबार के साथ भेज दिया गया। उसके हवाले कर दिया गया।

हबशी मलिका हमको अपने मकान पर ले गई जो आबादी शहर से अलहदा दरिया के किनारे एक छोटे से कले की सूरत में उसकी रिहाइश बनी हुई थी। वहां जाकर उसने हमारे वास्ते खाना जो निहायत उम्दा था और नफीस खाना तैयार करवाया और हमसे मोहब्बत और खुशामद की बातें करने लगी। मैं दिल ही दिल में हैरान था कि अपने शौहर की मौत को भूल गई। जब रात हुई तो मालिका ने कहा मैं तुम्हारी सूरत देखकर तुम्हारे जज्बा इश्क की वजह से अपने शौहर की वफात का रंज आज ही भूल गई हूं। बिल्कुल भूल चुकी हूं और तुमको मौत के मुंह से निकाल कर इस घर से यहां लाई हूं कि तुम मेरे साथ इस कायले में ऐशो तरब से अपनी जिंदगी बसर करो। मैं अपने दिल में यह समझूंगी कि खुदा ने मुझको एक शौहर के बदले दो हसीन और जमील शौहर दिए। यह बातें सुनकर मेरी बीवी बहुत घबराई। निहायत परेशान हो गई और मुझसे कान में कहने लगी कि बड़ा गजब हो गया। मैं तो मर्दों के हुलिए में हूं। और अगर इसको मेरे औरत होने का पता चल जाएगा तो मुझे अपनी सौकन समझकर बिना सोचे समझे यह हल्लाक कर डालेगी। मैंने अपनी बीवी शहजादी लैला से कहा। तुम घबराओ ना। खामोश बैठी रहो। मैं सब संभाल लूंगा।

फिर मैंने उस हबशियों की मल्लिका को अलग ले जाकर कहा कि मैं और मेरा साथी हम दोनों सगे भाई हैं और हमारे मजहब में यह अम्र निहायत कबीह और हराम समझा जाता है कि एक औरत दो भाइयों के पास रहे क्योंकि मेरा भाई बनिस्बत मेरे छोटा है। लिहाजा बेहतर है कि तुम सिर्फ मेरी बीवी बन जाओ और इसको इस मामले से अलग रखो। मलिका यह सुनकर मेरी बात को तस्लीम कर लिया और कहा ए शौहर तुम अकेले ही मेरे लिए बहुत हो। तुम अकेले मेरी मुराद को पहुंचाओगे। मैंने मलिका की बात सुनकर कहा कि तुम्हारी मोहब्बत तो बिल्कुल खुदग्रजी पर मबनी है। तुम्हें असल हाल मालूम नहीं। तुम्हें मेरे साथ कोई मुरव्वत नहीं। भला ख्याल तो करो कि दिन भर तो हमारे साथ तुम जंग करती रही। हजारों हबशियों को साथ लेकर हमारे साथ मुकाबला करती रही। और फिर अपनी जान का खौफ। अब इन बातों को तो थोड़ी देर भी नहीं गुजरी। और हमारे तो होश व हवास भी दुरुस्त नहीं हुए और तुमको अपने मतलब की सूझ गई। मैं जानता था कि वह मेरे साथ क्या चाहती है। वह मेरे साथ हमबिस्तरी की ख्वाहिशमंद थी। यह सुनकर मल्लिका बोली कि मुझे मालूम था कि तुम ऐसे शरीफ और दिल के भोले हो। और फिर हंसकर कहने लगी खैर तुम थोड़ी देर अपना दम दुरुस्त कर लो। तो मैंने कहा मलिका तुम बड़ी चालबाज हो। जरा गौर तो करो कि हमको अभी हबशियों की तरफ से क्या अमान मिली है। अपनी जान का डर है हमारा दिल ठिकाने नहीं। हमको हरदम यह है कि वह हबशी बादशाह अभी आकर हमें कत्ल कर डालेगा। ऐसी हालत में हमें सुकून कैसे मिल सकता है और मैं किस तरह ऐशोइशरत की जानिब माइल हो सकता हूं। यह सुनकर मल्लिका लाचार होकर उस रात खामोश हो गई। उस रात उसने सब्र कर लिया।

लेकिन उस नापकार औरत ने दूसरे दिन सुबह-सुबह बादशाह का सर काट डाला और सर काट कर लेकर मेरे पास आई और कहने लगी लो अब तो कोई डर तुमको बाकी नहीं रहा कि बादशाह तुम्हें मार डालेगा आज रात को मैं तुम्हारा कोई उज्र नहीं सुनूंगी मुझको मजबूर होकर कहना पड़ा बहुत अच्छा रात होने दो देखा जाएगा मगर अपने दिल में मैं सख्त हैरान और परेशान था कि क्या तदबीर करूं जो इस बला से मेरी जान छूट जाए। इस बला से निजात मिले। इत्तेफाका की तकदीर से हबशियों को जो हाल मालूम हुआ कि मलिका ने बादशाह को मार डाला है। तो उनका एक गिरोह मुसल्ला होकर मलिका के मकान पर चढ़ दौड़ा। मकान का मुहासरा कर लिया। हमने दरवाजा मकान के अंदर से बंद कर लिया और शाम तक उनके साथ लड़ते रहे। जब शाम हो गई तो वह लोग अपने घरों को चले गए। हमने मल्लिका से कहा, अब यहां रहना ठीक नहीं है क्योंकि वह लोग फिर हमला करेंगे और हम किसी तरह उनसे लड़ नहीं सकेंगे। मलिका ने कहा तुम ठीक कहते हो। यह कहकर वह हमें दरिया के किनारे ले गई और बहुत सा झरो जवाहर और खानेपीने का सामान कश्ती पर रखकर उसमें बैठ गई और कश्ती को दरिया में डाल दिया। जब कश्ती थोड़ी दूर चलने लगी तो मलिका ने फिर अपनी दास्ताने इश्तियाका यानी अपना हमबिस्तरी का शौक फरमाना शुरू कर दिया। हरचंद मैंने इसको टाला लेकिन वो नहीं मानी और निहायत इसरार करने लगी। तब मैंने लाचार होकर देखा कि सिवाय इसके कुछ तदबीर नहीं कि इसको दरिया में बहा दिया जाए और इस बदकार से जान छुड़ाई जाए। यह सोचकर मैंने ही से मल्लिका का हाथ पकड़ा और एकदम बातें करता हुआ उसको कश्ती के किनारे लेकर आ गया और मौका देखकर उसको दरिया में धक्का दे दिया और इस बदकिरदार के गर्क होने पर खुदा का शुक्र अदा किया।

फिर हम चंद रोज तक दरिया में चलते रहे और अंजाम एक रोज हमारी कश्ती एक जजीरा के किनारे जा लगी। हम उतर कर जजीरे में आए। इन परेशानियों की वजह से कई रोज तक बेफिक्री के साथ सोना नसीब ना हुआ था। एक सायादार दरख्त देखकर लेट रहे और हमारी आंख लग गई। हमको इस हालत में ज्यादा देर ना गुजरी थी कि हमारे कान में आदमियों की बोलचाल की आवाज पहुंची। जब आंख खोल कर देखा तो बहुत से आदमी हमारे गिर्द खड़े हैं और उनके साथ एक जवान 16 17 साल की उम्र का सर पर ताज पहने और शाहना पोशाक पहने खड़ा है। शहजादी लैला की जो निगाह उस पर पड़ी तो शहजादी का रंग भक हो गया और उसे लजा आने लगा। उन लोगों ने मुझसे पूछा कि तुम कौन हो और किस तरह हमारे जजीरे पर आए हो? मैंने जब यह देखा कि शहजादी को उस नौजवान की सूरत देखकर लड़जा पड़ गया है। ख्याल किया कि इसमें कुछ राज है। इन लोगों से अपना असली हाल कहना ठीक नहीं है। बस मैंने कहा कि साहब हम दोनों भाई हैं और हमारा बाप सौदागर था और हमको अपने साथ सफर में लेकर चल पड़ा। लेकिन किस्मत हमारी रूठ गई। वो दीगर अपने साथियों के हमराह बहुत से माल असबाब के साथ दरिया में डूब गया और हम बहुत ही तकलीफें उठाकर आज इस मुकाम तक पहुंचे हैं। उस नौजवान ने जब हमारा यह हाल सुना तो बहुत अफसोस करने लगा और मुझसे कहा तुम अपना दिल खुश रखो। अब तुमको किसी तरह की तकलीफ ना होगी। यह कहकर उसने अपने साथियों को हुक्म दिया कि इन्हें अपने साथ शहर में इज्जत से ले जाओ। यह कहकर वह नौजवान अपने चंद साथियों के हमराह शहर की तरफ चल पड़ा। थोड़े आदमी अपनी सवारियों के साथ हमारे वास्ते छोड़ गया।

जब वो जवान चला गया तो मैंने शहजादी के चेहरे पर पानी छिड़का और उसे होश में लाया और उससे पूछा कि तुम इस नौजवान की सूरत देखकर तुम्हें लड़जा क्यों गया? तुम बेहोश क्यों हो गई? उसने सर्द आह भर कर कहा कि अफसोस हम एक बार फिर दुश्मन के भंवर में फंस गए हैं। यह जवान वो लड़का नादिर है जिसको मेरे बाप ने सल्तनत दी थी और इस नालायक एहसान फरामोश ने मेरे बेगुनाह बाप को मार डाला और हमारे साथ यह सुलक किया और इसी सबब हमको जिला वतन होकर यह सब मुसीबतें और परेशानियां बर्दाश्त करनी पड़ रही हैं। मुझको इसकी सूरत देखकर अपनी जान के जाने में कोई शक बाकी ना रहा और इसी गम से मुझको घसी आने लगा। मालूम होता है कि मर्दाना लिबास के सबब मुझको पहचान नहीं पाया। अब कोई तदबीर ऐसी निकालनी चाहिए कि हम इनके हाथों से बच सकें। शहजादी से मैंने कहा तुम कुछ फिक्र ना करो। मर्दाना लिबास में वो तुमको हरगिज़ नहीं पहचान सकता। फिर हम उन नौजवानों के हमराह शहर की तरफ चल पड़े जिनको बादशाह हमारे पास छोड़ गया था। जब हम वहां पहुंचे तो बादशाह ने हमको बुलाकर हमारी बहुत ही तारीफ की और हमको एक अलग मकान जो अपने महल से जुड़ा हुआ था रहने के वास्ते दे दिया और अपने मुलाजमीन को यह ताकीद की कि हमको किसी बात की तकलीफ ना हो। गरज हम आसाइश और सहूलत के साथ वहां रहने लगे।

वहां के रईसों और अराकीने सल्तनत के साथ मेरी मोहब्बत और रस्मो राह बढ़ती गई। और बादशाह को मेरे साथ ऐसा उन्स और मोहब्बत हो गई कि अगर एक रोज भी मैं उसके पास ना जाता तो वह बेहद बेकरार हो जाता और बेतलुफ मेरे मकान पर चला आता। किस्मत हमारी थी कि एक रोज मेरा उसकी खिदमत में किसी वजह से जाना ना हो सका और वो मेरे मकान पर मुझसे मिलने खुद चला आया और मैं उस वक्त किसी और दोस्त के पास गया हुआ था और मेरी बीवी दरीचे में अपना जनाना लिबास पहने खड़ी थी। बादशाह ने जो उसको देखा तो फौरन पहचान गया कि यह तो पहले बादशाह की बेटी लैला है जिसको मैंने कत्ल कर डाला है। उसने वजीर को बुलाकर यह हाल बयान किया। वजीर ने बजाहिर उसे कहा कि अगर यह बात सच है तो फौरन इसकी कोई तदबीर करनी चाहिए। मगर यह वही वजीर हमीद था जो असल में बादशाह और उसकी बेटी से मोहब्बत रखता था। वो वजीर दिल ही दिल में बहुत खुश हुआ क्योंकि वह पहले बादशाह और उसकी बेटी का दिल से फिदाई और दोस्त था और उसने शहजादी को जहाज पर सवार कराकर कत्ल से बचाया था। उसने बादशाह से कहा कि मुझे इजाजत दीजिए। मैं इस नौद शख्स के पास जाकर तमाम हाल पता करता हूं कि यह लड़की तुम्हारे पास कैसे आई और फिर इस लड़के के कत्ल की कोई तदबीर निकालते हैं। बादशाह ने कहा जरूर यह बात मुनासिब है। तुम फौरन इसकी तदबीर अमल में लाओ। फजीर बादशाह से रुखसत होकर मेरे पास आया और तमाम माजरा बयान किया। मैंने उसे कहा मोहतरम तुम शहजादी के बुजुर्ग और वजीर हो और आओ मुझको बताओ कि इस हाल में क्या करना मुनासिब है। उसने कहा कि आप मत घबराइए मैं आज रात इसका बंदोबस्त कर देता हूं। यह कहकर वजीर मुझसे रुखसत हुआ और शहर में जिस कदर रईस और अराकीने सल्तनत को जो साबिका बादशाह और उसकी बेटी के तरफदार थे उन सबको शहजादी और मेरे हक में यकजा किया और उस अपने मंसूबे के तहत उस गासब बादशाह नादिर को उसी रात कत्ल कर डाला।

फज़र ने शहजादी को तख्त पर बिठाना चाहा। मगर शहजादी ने मुझसे कहा कि मैं एक औरत हूं। मुझको सल्तनत की बादशाहत झेब नहीं देती। तुम मेरे शौहर हो। जिस तरह मुनासिब समझो उसे बादशाह बना दो। मुझे कोई उज्र नहीं। चुनांचे मैंने अरसा तक सल्तनत के उमूर संभाले और सब लोग मुझसे निहायत खुश और राजी रहे। एक रोज मुझे अपने वतन और अपने दोस्तों की बेइंतहा याद आई और मैंने अपनी बीवी शहजादी से जाकर कहा तो शहजादी कहने लगी कि मैं तुम्हारी फरमाबरदार हूं और जो तुम चाहते हो कि इस बायस हो बस वही बात मुझको मंजूर है। मैं तुम्हारे साथ हूं। बस हमने वजीर हमीद को तलब किया और कहा कि हम एक काम के वास्ते एक दूसरे मकाम पर जा रहे हैं। तुम उमूर सल्तनत बहुत मेहनत और होशियारी से अंजाम देना। और तमाम अराकीन ने सल्तनत को जमा करके कहा कि हम एक साल के बाद आएंगे और हमारे आने तक वजीर हमारा कायम मकाम बनकर बादशाहत करेगा। तुम सब लोग इसके मुती और फरमाबरदार रहना। सब मुलाजमीन ने मेरी जुबान से यह सुना तो कहा कि वजीर साहब निहायत बुजुर्ग और अकलमंद इंसान हैं। और आप जिस शख्स को हम पर बादशाह मुकरर करके जाएंगे। हम आपके हुक्म के मुताबिक उसके ताबेदार और इतात गुजार रहेंगे।

इसके बाद हमने सामान सफर बांधा और 1000 मुसल्लाह जवान लेकर अपने साथ सफर पर निकल पड़े और जवाहर और जकद असबाब ए खुर्द ओनोश यानी खानेपीने की चीजें अपने साथ रखकर जहाज में सवार हुए। एक हफ्ता तक हमारा जहाज रवाओं। छठे रोज ऐसा हुआ कि आंधी चलनी शुरू हो गई। और मेरी बीवी हर वक्त अल्लाह ताला की हमदो सना में मशरूफ रही और दुआ मांगती रही कि या रब हमें इस बला से बचा। चार रोज गुजरने के बाद हवा साकिन हो गई। अचानक हम एक जजीरे के किनारे लगे और हमने दरिया के किनारे अपना खमा लगा दिया और हमारी फौज ने अलदा खमों में कयाम किया और अपने वर्दी और हथियार पहने। जब मैंने अपने खमे से शहर की जानिब गौर करके देखा तो शहर का कैला निहायत वजनी और खूबसूरत हमें दिखाई दिया। रफ्तार रफ्ता हमारे वहां रुकने की खबर उस शहर के बादशाह तक पहुंची तो उसके हवारियों ने उसको भड़काया कि कोई दुश्मन आपके ऊपर चढ़ाई करने के लिए दरिया के किनारे आकर रुक गया है। आप बराए खौफो हिरास क्यों बैठे हैं? बादशाह ने इस बात को सुनकर मुझ पर लश्कर कशी शुरू कर दी। तीन रोज तक वह हमसे बराबर लड़ाई करते रहे और बहुत से सिपाही मारे गए। बहुत सी जाने गई मगर मेरे सिपाही बहुत कम मारे गए। तीसरे दिन की रात को बादशाह मुझ पर हजार सिपाही लेकर चढ़ दौड़ा और तमाम फौज मेरी मारी गई। जब मैंने देखा कि तमाम फौज तहतेग हो गई है और अब कोई सूरत रिहाई की नहीं रही थी। तब लाचार होकर मैं और मेरी बीवी उसी रातोंरात भाग निकले। दो रोज तक दिन में किसी गार के अंदर छुपे रहते और रात को फिर रवाना हो जाते। तीसरे रोज हमने एक दरख्त की मोटी लकड़ियां काटकर और उनको यकजा बांधकर कश्ती बनाई और दरिया में रवाना कर दिया और हमारी किस्मत ने ऐसी यावरी की कि हम हुजूर आपकी सेवा में हाजिर हो गए।

सुल्तान बगदाद ने जब तमाम दास्तान यासिर की जबानी सुनी तो कहा कि तुम वो आदमी हो। तुमसे मिलकर मुझे बेहद खुशी हुई और अब मुझको बताओ कि तुम्हारा क्या इरादा है। यासिर ने कहा कि मैं एक बार फिर अपने वतन को देखना चाहता हूं और मेरा वतन हुजूर ही की सल्तनत के बहुत करीब है। यहां से ज्यादा फासले पर नहीं। अगर हुजूर बखुशी इजाजत देंगे तो वहां आऊंगा और फिर तमाम उम्र हुजूर की खिदमत व बंदगी में हाजिर रहूंगा। सुल्तान बगदाद ने उसी वक यह सुनकर फरमाने हुकूमत शहर बसरा के नाम पर लिखकर उसकी हुकूमत अता फरमा दी। यासिर अपनी बीवी के हमराह अपने मुल्क में आया और अपनी वालिदा और दीगर अजीजों और दोस्तों से मिलकर जुदाई के रंज को उनके दिल से मिटाया और अपनी तमाम बाकी जिंदगी ऐशोइरत में बसर कर दी।