📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

7) Fiqh -Qazai Hajat kai Masael (Mas’alah 38 - 50 )- Class 7 - Level 1 || Dr. Mahboob Abu Asim

Dr. Mehboob Abu Asim35:59

Transcription

कर हा बस थोड़ा सलाम वालेकुम रला बरका चले तमाम भाई आ जाए अपनी अपनी [संगीत]। अ सलाम वालेकुम रहमतुल्ला बरकात अदला र आलमीन लाम रस करीम न सालारा। इससे पहले कि हम अपने दर्स का आगाज करें, हमारे एक बड़े मोज भाई, हमारे कोर्स के साथी अब्दुल बशीर, जिनका तालुक इंडिया से था और शायद आप भाई अक्सर देखते भी रहते हो उनको, तो वो अल्लाह ताला की कज से इसी हफ्ते फौत हुए हैं। कल उनका जनाजा पढ़ा गया है। तो सभी भाई उनके लिए बिश मरत की दुआ करें। और हकीकत में हम सभी के लिए इस तरह लोगों का जाना बहुत बड़ी इबरत और सबक होता है, के किस तरह इंसान अच्छा भला तंदुरुस्त सेहतमंद जो है, अचानक जो है बता रहे थे साथी कि अचानक हार्ट अटैक हुआ। एक या दो दिन शायद हस्पिटल में रहे, उसके बाद जो है अल्ला ताला को प्यारे हो गए। कहने का मकसद यह, वह हकीकत है जिसका सभी लोगों को सामना करना है। कुनल मत, हर इंसान को, हर जान को मौत का अयका चखना है। तो हमें जरूरत है अपने भाई के लिए भी दुआ करने की और खुद भी इस चीज से सबक बत लेने की और अपनी के आखरत का जो सफर है उसकी तैयारी में रहने की।

बकला, हमने साबका दर्स में नजासत दूर करने के मसाइल पढ़े थे। तो नजासत दूर करने के लिए असल क्या चीज है? असल पानी है। असल पानी ही है। पानी ही से तहर होती है, नजासत दूर होती है। लेकिन अगर पानी पानी की बजाय और भी कुछ चीज है। हाँ, जूता जो है वो मट्टी से पाक हो जाता है, उसको धोने की जरूरत नहीं है। लेकिन कपड़े को धोने की जरूरत है। इसी तरह अगर जमीन पर नापाकी पड़ी हो, कैसे पाक [संगीत] होगी? जमीन पड़ी पड़ी नापाकी जो है वह धूप से खुश्क होकर, हवा से खुश्क होकर वो पाक हो जाती है, उसकी नापाकी खत्म हो जाती है। बशर्ते के वो नापाकी जमीन के अंदर हो। अगर बजते ख सॉलिड नापाकी है, तो जरी बात है वो तो नापाक ही रहेगी। हाँ, यह जरूर है कि अगर वो सॉलिड खुश्क है और आपके किसी चीज को टच कर जाता है, पाँव को टच हो जाता है, तो आपका पाँव नापाक होगा। क्या ख्याल है? फ़र्ज़ करें कोई स्टूल सॉलिड पड़ा हुआ है, खुश्क हुआ हुआ है और आपका पाँव से टच हो गया, तो क्या पाँव का नवाक होगा? नापाक नहीं होगा, क्योंकि वो खुश्क है। अगर तर हो, ऊपर पानी लग जाए, बारिश आ जाए, फिर आपका पाँव लगेगा तो चकि है, तो नापाक ही तो वह आपका पाँव भी फिर नापाक होगा, उसको धोना होगा। लेकिन अगर नापाकी पेशाब की शक्ल में है, मज़मीन में जजब हो गई, मट्टी में, तो पानी या के हवा के साथ, धूप के साथ, खुश्क होने के साथ जो है वो पाक हो जाएगी जमीन, उसको मज़ीद हमें कोई और चीज उसके साथ करने की जरूरत नहीं है।

नापाकी के हवाले से हमने ये पढ़ा था कि नापाकी की तीन किस्में हैं। क्या क्या है? हाँ जी, क्या क्या है? सख्त, मुल, सख्त नापाकी किसकी है? कुत्ते की। सख्त क्यों है? क्योंकि उसको सात मर्तबा धोने का हुक्म है, एक बार मट्टी से। कुत्ते के अलावा और भी कोई चीज है जिसको सात मर्तबा धोया जाता है? नहीं, सही। कल के मुताबिक कुत्ते के अलावा कोई ऐसी चीज नहीं जिसको सात मर्तबा धोया जाए। समझे ना? बाकी नापाकियाँ किस तरह पाक होती हैं? कितनी दफ़ा धोने से? जब नापाकी खत्म हो जाए। यानी कपड़े पर नापाकी लगी है, एक बार धोने से खत्म होगी, दो बार धोने से, तीन बार जब खत्म हो जाएगी तो कपड़ा पाक है। समझे ना? तो बाकी नापाकी को दूर करने के लिए कोई लिमिट नहीं है। आप कितनी बार उसको धोएँ, लेकिन कुत्ते की नापाकी सबसे सख्त है। इसको धोने के लिए सात मर्तबा का हुक्म है, बार मट्टी से। और दूसरी किस्म क्या है? मुत वसत, यानी आम नापाकी, जिस तरह के पेशाब वगैरह इस तरह की चीजों की है। और तीसरी जो खफ है, हल्की नापाकी, वो किसकी है? दूध पीता बच्चा, मेल बच्चा जो दूध पीता है, जिसकी गालिब खोराक दूध हो, उसका पेशाब। उसको कैसे पाक करते हैं? उस पर पानी छिड़क देने से, पानी डाल देने से ही वो पाक हो जाता है। यानी उसको धोने की और कि करने की जरूरत नहीं है। तो यह है नापाकी की तीन किस्म। इसी तरह हमने ये भी किया था कि पाकी और नापाकी, इसमें हमें क्या चाहिए? किस किस चीज की जरूरत है? इसको मालूम करने के लिए हाँ, दलील से मालूम होगी। अगर आप किसी चीज को गंदा समझते हो, अच्छी चीज नहीं लग रही, तो नापाक होगी। क्या ख्याल है? यानी अगर आपकी नज़र में आप किसी चीज को गंदा समझते हो, तो वो आपके गंदा समझ से नापाक नहीं होगी जब तक दलील ना हो उसके नापाक होने की। समझे ना? तो और इसी हम जिक्र किया था कि हलाल जानवर के गोबर, पेशाब, कोई शक नहीं कि वह गंदे हैं, कपड़े को लगे तो उसको धोना चाहिए, लेकिन क्या कपड़ा नापाक होगा? हदीस की रू से, क्योंकि आपने बकरियों के बाड़े में नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दी और बाड़े के अंदर क्या होता है? उनके गोबर, पेशाब होते हैं। तो अगर नापाक होते, तो वहाँ पर नमाज़ पढ़ने की इजाज़त ना होती। और हराम जानवरों के, उनके नापाक हैं। हराम जानवर के गोबर, पेशाब नापाक हैं। हत्त्ता कि बिल्ली का भी। बिल्ली अगरचे घर में रखने की इजाज़त है और किसी चीज में मुँह डाल देती है तो वो चीज पाक है, उसको आप खा पी सकते हैं। लेकिन बिल्ली चूँकि हराम जानवर है, बिल्ली हराम जानवर है, उसका गोबर, पेशाब भी जो है वो नापाक होगा। समझे? तो ये मालूम होना चाहिए। मालूम करे कि बिल्ली अगर पाक है, पाक होने का माना ये नहीं कि बिल्ली बदा हो, उसकी हर चीज पाक हो गई। उसका लोब ब पानी पानी में मुँह डालती है किसी तो वो पाक रहेगा, लेकिन उसको गोबर, पेशाब चक हराम है तो भी नापाक होगा।

अच्छा, हम आगे चलते हैं ताकि मसाइल हमारे पास टाइम थोड़ा होता है। आप जिस तरफ़ देख रहे हैं, आज क़दा हाज़त के मसाइल। क़जा हाज़त का माना क्या है? जी, क़जा हाज़त का माना क्या है? क़जा ए हाज़त माशूम जाना। माशाल्लाह, हम चाहते हैं कि सबसे पहले अपना मौजू समझा करें कि टाइटल क्या हमारा, क्योंकि हमारे पास नौजवानों को शायद इस तरह के अल्फ़ाज़ उनके लिए यानी कि आम मामूल के ना हो। तो क़जा ए हाज़त, क़जा के मानी फ़ार होना, अपनी हाज़त से। इंसानी हाज़त जो है, पेशाब, पखाने की। तो इसमें अच्छा देखिए, यहाँ पर इससे पहले कि हम मसाइल शुरू करें, हमें इस तरह के मसाइल भी कुरान और हदीस की रोशनी में। इसमें तालीमाबाद है कि हत्त्ता के वो मसाइल कि जिसको जिक्र करना भी बाज ओकात आदमी शर्म महसूस करता है। लेकिन इंसान की ज़रूरत है। हर इंसान के साथ ये चीज है, कोई भी क्यों ना हो, बादशाह हो या फ़क़ीर हो। हाँ, क़दा हाज़त बादशाह को नहीं होती। क्या क्या ख्याल है? ये वो चीज है हर इंसान के साथ है। इसलिए जब हर इंसान की ये ज़रूरत है तो लाज़मा इसका इल्म भी होना चाहिए। सलमान फ़ारसी र अल्लाह ताला। उनसे किसी यहूदी ने कहा, क्या तुम्हारा नबी तुमको हर चीज सिखाता है? या नबी करीम सलाम। यहूदी ने कहा सलमान फ़ारसी को कि तुम्हारे नबी तुमको हर चीज बताता है, हर चीज सिखाता है? तो सलमान फ़ारसी ने बड़े फ़ख्र से, ये नहीं कि शर्माते हुए, हाँ, हमारा नबी हमें हर चीज सिखाता है, क़दा हाज़त के मसाइल भी ता है। समझे ना? अब ये वो चीज जिसे मैंने कहा कि बाज़ लोग शर्माते हैं बात करते हुए, इस चीज को घटिया समझते हैं कि कैसी बात कर रहे हैं। सम, लेकिन नबी करीम सलाम, जहानों के इमाम, नबियों के सरदार, अपनी उम्मत को यह तालीम दे रहे हैं। देखिए, आपके सामने आयत है, हदीस है, तालीम है। किस बात की दलील है कि जो इस्लाम जो दीन आपको क़दा हाज़त के, वाश रूम के, इस तरह की चीजों की तालीम दे रहा है वो? क्या इससे बड़ी जो तालीमाबाद? औकात हमारे कई लोग अपनी तरफ़ से ही नेकियाँ बना रहे होते हैं कि यह भी नेकी, ये भी कर लो। और हमारे यहाँ इस इस तरह की बहुत सी नेकियाँ चल रही हैं हमारे मुश में, तो उसकी पर दलील कोई नहीं होती। पूछते हैं भी, कहाँ से अच्छा काम है? ना, अच्छा काम है तो अल्लाह के नबी ने क्यों नहीं बताया? अगर अच्छा ही काम है, नेकी ही है तो नबी ने हमें क्यों नहीं सिखाई? आपको क्या मालूम नहीं थी? अगर मालूम थी आपको, आपको तो आपने उम्मत को बताना थी। बल्कि आप सल्ल का फ़रमान है कि हर नबी पर फ़र्ज़ होता है कि अपनी उम्मत को हर वह चीज सिखाए, बताए जिसमें उनकी ख़ैर हो और हर उस चीज से उनको वार्निंग दे, उसको बचाए कि जिसमें उनके लिए नुकसान हो। हर नबी का फ़र्ज़ है और यह बहुत बड़ा फ़ॉर्मूला है। इसका माना यह हुआ कि हर वो चीज जिसको नेकी समझकर किया जाता है, नबी करीम सलाम ने नहीं की, ना बताई है, वो नेकी नहीं है। वो नेकी नहीं है। नेकी होती तो अल्लाह के खुद भी करते, लोगों को बताते। क्योंकि जो हमें वाश रूम के, टॉयलेट के मसाइल तो बता रहे हैं, लेकिन कोई बड़ा नेकी का काम आप ना बताएँ, ये कैसे हो सकता है? तो ये बहुत बड़ी चीज समझने वाली। ख़ैर, आगे चलते हैं।

तो 38 नंबर मसला में, बैतुल ख़ला, टॉयलेट में कुरान करीम ले जाना हराम है और कुरान के अलावा कोई ऐसी चीज जिसमें अल्लाह का जिक्र हो, उसे ले जाना मकरूह है। आप दो लफ़्ज़ सुन रहे हैं, हराम और मकरूह। ये क्या है? हराम का माना क्या होता है कि जो चीज करना नाज़ायज़ है, उसको करने का क्या है? गुनाह है। हराम चीज़ कि जिसको करना गुनाह है। और दूसरा पढ़ रहे हैं मक़रूह। मक़रूह क्या होता है? मकरूह यानी नापसंद है। मकरूह करात से मैं इस चीज़ से करात करता हूँ, नापसंद करता हूँ। तो नापसंद है। इसका शरई हुक्म क्या है? मक़रूह का। हराम का तो हमने जान लिया कि वह नाज़ायज़ है, करना गुनाह है। और मकरूह का शरई हुक्म उसको छोड़ देना बेहतर है, उसको ना करना बेहतर, लेकिन करने का गुनाह नहीं है। हाँ, करने का गुनाह नहीं है। चलते चलते आपको एक चीज़ सिखाते जाएँ, बताते जाएँ। शरई पाँच अक़ाम हैं, शरीयत के, जो पढ़ रहे हैं। हराम और मकरूह। तीसरा क्या है? जायज़। इसको मुबा भी कहते हैं। जायज़। जायज़ चीज़ का हुक्म क्या होता है कि वो करने की नेकी नहीं है, ना करने का गुनाह नहीं, दोनों तरफ़ बराबर है। समझे ना? हराम करने का गुनाह है। मकरूह करना, ना करना अच्छा है लेकिन करने का गुनाह नहीं है। और जायज़ जिसको करो ना करो, ना करने का गुनाह है, ना छोड़ने के कोई नेकी है। कोई उसमें बराबर चीज़। और चौथा हुक्म क्या है? सुन्नत। इसको मुस्ताहब भी कहते हैं। सुन्नत, मुस्ताहब भी कहते हैं। इसका हुक्म क्या है? बा कहते हैं कि ये काम सुन्नत है। नमाज़ पहले, नमाज़ के बाद सुन्नतें हैं। इनका हुक्म क्या होता है कि जिनको करना अफ़ज़ल है, करना चाहिए, करना बेहतर है लेकिन अगर ना कर सके तो गुनाह नहीं है। सुन्नत या मुस्ताहब जो है, जिसको करना अफ़ज़ल है, करना चाहिए। अगर ना करें, कर सके तो क्या है? गुनाह नहीं है। मिस्वाक करना, मिस्वाक करना नमाज़ से पहले, वुज़ू के वक़्त क्या है? सुन्नत है कि वाजिब है? क्या है? सुन्नत है। कर ले, करना चाहिए, अच्छी बात है, फ़ायदा मिलता है। लेकिन अगर नहीं की तो गुनाह नहीं है। और पाँचवाँ हुक्म क्या है? वाजिब। जिसको फ़र्ज़ भी कहते हैं। फ़र्ज़ या वाजिब। उसका हुक्म क्या है? कि करना ज़रूरी है। करना ज़रूरी है। नहीं करते तो गुनाह है। ये पाँच अक़ाम। हराम, छोड़ना ज़रूरी है, करते हैं तो गुनाह है। और मकरूह जिसको छोड़ना बेहतर है, लेकिन कर ले तो गुनाह नहीं है। जायज़ या मुबा कि जिसको कर ले, छोड़ दे, दोनों एक बराबर हैं। और मुस्ताहब जिसको करना अफ़ज़ल है, बेहतर है, लेकिन ना करें तो गुनाह नहीं है। और वाजिब या फ़र्ज़ जो है उसको करना ज़रूरी है। अभी आपने असर के चार फ़र्ज़ पढ़े हैं, पढ़ना ज़रूरी है, नहीं पढ़ेंगे तो गुनाह है। समझे? तो यह पाँच अक़ाम हमें मालूम होना चाहिए। यहाँ पर आप आपके सामने दो चीज़ आज आ गई कि टॉयलेट में, वाशरूम में कुरान लेकर जाना यह हराम है, क्योंकि कुरान की बरमती है। लेकिन ऐसी चीज़ जिसमें अल्लाह का जिक्र हो, अल्लाह का लफ़्ज़ है, चाहे वो कोई दुआ हो, आपके पास कोई चीज़, आपने अंगूठी पहनी, उसमें कोई ऐसी चीज़ हो। ख़वातीन बाज़ कात लाकड़ पहनती हैं। अभी कल ही मेरे पास मसला आया, दो दिन पहले शायद, के लाकड़ में बाज़ कात अल्लाह का नाम लिखा होता है या कोई आयत लिखी होती है, लाकड़ में, को की चीज़ में, तो इसका हुक्म क्या है? क्या ख्याल है? जायज़ है? देखिए, इसमें देखिए अल्लाह के नाम की अगर बेहुरमती हो रही है तो फिर जायज़ नहीं है। और औरत जाहिरी बात पहनेगी तो ये तो नहीं टॉयलेट जाते हुए उसको उतार देगी, उसके साथ ही होगा, सोएगी तो मुमकिन है उसके नीचे वो लाकर उसके नीचे आया हो, अल्लाह का नाम नीचे है। तो इसलिए हमें इन चीज़ों की एहतियात करने की ज़रूरत है। समझे ना? क्या? हाँ, नापाकी की हालत में भी जाहिरी बात है, वही ना मुख्तलिफ़ हालात होते हैं, मुख्तलिफ़ चीज़ें होती हैं। इसलिए कोई शक नहीं कि अल्लाह का नाम, अल्लाह लल जलाला बहुत अज़ीम चीज़ है। लेकिन इसके अज़म होने का माना कि हमें इसका एहतराम करना चाहिए ना कि उसकी तौहीन हो। अंगूठी में, लाक़ में कोई इस तरह की चीज़ ना डाले कि जिसमें अल्लाह इसकी दलील क्या है? आपके सामने दी गई हदीस कि नबी करीम सला सलम टॉयलेट में जाते हुए अपनी अंगूठी उतार देते थे। आपकी अंगूठी पर लिखा हुआ था मोहम्मद रसूलल्लाह। आप चाँदी की अंगूठी पहनते थे, उसमें लिखा हुआ था मोहम्मद रसूलल्लाह। लेकिन अगर टॉयलट जाते तो उसको उतार दिया करते थे। समझे ना? लेकिन अगर फ़र्ज़ करो आपको याद नहीं रहा, सात अंगूठी आ गई या कोई जेब में आपकी। अच्छा, जेब में कोई इस तरह की चीज़ें हैं, उसका कोई हर्ज़ की बात नहीं। कुरान ना हो, कुरान ना हो। लेकिन अगर और कोई जिक्र है, कोई इस तरह की चीज़ें हैं जेब के अंदर आपके, कोई चीज़ पड़ी है तो वो ले जा सकते हैं। समझे? उसमें हर्ज़ की बात नहीं। किसे के सामने कोई चीज़ ज़ाहिर ना हो। हाँ, मोबाइल। मोबाइल की दो हालत हैं। अगर तो मोबाइल बंद है, उसकी स्क्रीन बंद है तो फिर तो मुश्किल नहीं। लेकिन स्क्रीन पर कुरान खुला हुआ है, ओपन है तो फिर जा बात है, हराम और नाज़ायज़ है। समझे ना? तो मोबाइल जो है और बल्कि आपने अच्छा किया मोबाइल के हवाले से सवाल किया। एक तो है कि स्क्रीन पर कोई चीज़ नज़र आना और बाज़ कात मोबाइल पर हमने टोन लगाया होता है जिसमें अज़ान है, क़ुरान का जिक्र है, कोई दुआ है, कोई तिलावत है, रिंग होती है, रिंग होती है तो तिलावत शुरू हो जाती है। तो क्या ख़्याल है? टॉयलेट में अगर इस तरह की तिलावत शुरू हो जाए। इसलिए उलमा कहते हैं कि रिंग को, तिलावत वगैरह को, इन चीज़ों को रिंग में ना रखो। एक तो इसकी तौहीन है क्योंकि आप रिंग बजती है, रिंग बजने का माना कि तिलावत शुरू होती है, आप फ़ौरन उसको काटते हो, बंद करते हो। इसका माना क्या है कि मुमकिन है ऐसी जगह पर बंद कर रहे हो, माना उल्ट हो रहा है और कुरान की तौहीन है। कोई शक नहीं कि यह चीज़ हमें बा कहते हैं कि लो अच्छी चीज़ है, म्यूज़िक की बजा, म्यूज़िक ना हो, आम सादा टोन रखो। समझे? लेकिन कुरान अकार, ऐसी चीज़ जिसमें अल्लाह का जिक्र हो, इसमें तौहीन है और ख़ुसूस अगर टॉयलेट में इस तरफ़ की चीज़ चल पड़े तो हीन वाज़े है। इन चीज़ों का हमें ख़्याल करने की ज़रूरत है।

39 नंबर मसला में, बैतुल ख़ला में या टॉयलेट में पाँव से दाख़िल होते हैं और दाख़िल होते हुए क्या क्या है? अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिक मिनल खुबुस वल खाबिस। क्या माना? अल्लाह, मैं तुझसे नापाक जिन्नो और शैतानों से पना मांगता हूँ। टॉयलेट जो है यह नापाक जगह, जिन्नो की जगह है। अल्लाह के क़ा फ़रमान है कि यह शैतान, जिन्नो की जगह है। इसलिए हमें यह दुआ सिखाई ताकि हम यह दुआ पढ़कर दाख़िल हों और जिन, शैतान आपका कोई नुकसान ना कर पाएँ। सम और हकीकत भी यही है अगर आदमी अल्लाह के हुक्म से यकीन करता हो, ये दुआ पढ़ के दाख़िल होता है तो उसका कोई चीज़ कभी नुकसान नहीं कर पाती। तो बायाँ पाँव दाख़िल हो। लेफ्ट, लेफ्ट इसको दाख़िल करें पहले और यह दुआ पढ़े। और निकलते हुए, उ फ़रमान, स आख़िर में रखिए ताकि निकलते हुए क्या पढ़ना है? उ फ़रमान। ये दुआ आपको याद होनी चाहिए सभी को। हमारे कोर्स का हिस्सा बदा इस तरह की दुआएँ बाक़ी हदीस माना याद करने काफ़ी है। लेकिन इस तरह की दुआएँ हमको याद करना है। दाख़िल होते हुए दुआ क्या है और निकलते हुए? फ़रमान के माने मैं तेरी बिश चाहता हूँ। तो निकलते हुए तो दुआ कब पढ़नी? आपने दाख़िल होने से पहले। दाख़िल होने से पहले। ये नहीं कि वा में अंदर दाख़िल हो के दुआ पढ़े। दाख़िल लेकिन भूल गए दुआ पढ़ना तो अंदर दाख़िल होकर दिल में पढ़ ले, जबान से कह कर ना पढ़े, दिल में पढ़ ले। और गुफ़रान का भी जब टॉयलट से निकले फिर पढ़े। समझे? ताकि टॉयलेट में जो है कोई ऐसी चीज़ ना हो कि जिसमें अल्लाह ताला की, उसके जिक्र की तौहीन हो।

40 नंबर मसला में, क़दा हाज़त के दौरान खुली जगह पर किबला की तरफ़ मुँह या पीठ करके बैठना मना है। क़दा हाज़त, पेशाब कर रहे हैं, पखाना कर रहे हैं, तो अगर खुली, ओपन जगह है तो वहाँ पर किबला की तरफ़ ना मुँह करिए, ना पीठ करिए। समझे? ओपन जगह पर। और जिस टॉयलेट होते हैं, बंद हैं। यहाँ पर क्या है? यहाँ पर बाँमा इजाज़त देते हैं लेकिन तिया अ यही य भी ही है कि इसमें भी आदमी किबला की ख़ ना करे। तो जहाँ तक खुली जगह की दलील आपके सामने दी गई है, आपका फ़रमान है, इ ज फ़ कि जब तुम तुम में से कोई क़दा हाज़त के लिए बैठे तो ना किबला की तरफ़ मुँह करे और ना किबला की तरफ़ पीठ करे। अच्छा, बंद टॉयलेट में, बंद जगह पर ये इजाज़त कहाँ से आ गई? उसकी दलील भी आपके सामने दी गई। मुस्लिम की हदीस में हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर फ़रमाते हैं कि मैं अपनी बहन, हफ़्फ़ा उनकी बहन थी, आप की बीवी थी, फ़रमाते हैं कि उनके घर के, उनकी छत पर चढ़ा तो अचानक कहते हैं कि मेरी नज़र उनके सैन में पड़ी तो आप सल्ल क़दा हाज़त के लिए बैठे हुए थे और आपकी पीठ जो है वो बैतुल्लाह की तरफ़ थी। आपकी पीठ बैतुल्लाह की तरफ़ थी। इससे उलमा ने किया है कि अगर बंद जगह है, बंद टॉयलेट है तो वहाँ पर अगर पीठ या रुख़ हो जाए किबला की तरफ़ तो जायज़ है। लेकिन अफ़ज़ल और बेहतर ये है कि वो भी उससे आदमी बचने की कोशिश करे। टॉयलेट बनाते हुए इस अंदाज़ से बनाएँ कि किबला की तरफ़ ना हो। समझे ना? तौय की हदीस आती है, फ़रमाते हैं कि हम सीरिया जब फ़तह होता है, वहाँ पर जाते हैं तो वहाँ से पहले से टॉयलेट बने हुए थे जिनका रुख़ किबला की तरफ़ था। तो कहते हम बैठते हुए थोड़ा अपना जिस्म थोड़ा टेढ़ कर लेते ताकि किबला की तरफ़ ना हो और उठते हुए भी फिर अल्लाह से इस्तग़फ़ार करते। इससे मालूम क्या हुआ कि सहाबा किराम इस चीज़ से बचने की कोशिश करते थे, हत्त्ता कि टॉयलेट के अंदर भी। एक खुली जगह पर तो ये हराम है। ओपन जगह पर बैतुल्लाह की रुख़ करना या बैतुल्लाह की तरफ़ पीठ करना यह हराम है। सूरज और चाँद की तरफ़ रुख़ या पीठ करने की कोई मान हदीस नहीं है। बाज़ लोग कहते हैं कि सूरज, मुनि करो, चाँद की तरफ़ मुँह करो और बाज़ वो कुतबी सितारा भी है, कोई उधर भी मुँह ना करो। ये सारी लोगों की बातें हैं, इसकी कोई दलील नहीं। इसलिए असल यह है कि सूरज, चाँद की तरफ़ मुँह कर सकते हैं, कोई ऐसी बात नहीं। किसी तारे का कोई तालुक़ नहीं इस चीज़ से। जो मना किया गया सिर्फ़ किबला है, सिर्फ़ बैतुल्लाह है, उसकी तरफ़ ओपन जगह पर ख़ास तौर पर जो है वो रुख़ ना हो, पीठ ना हो।

41 में, रास्ता और फल या सायादार दरख़्त के नीचे क़दा हाज़त करना मना है। रास्ते में क़दा हाज़त करना, जहाँ से लोगों ने चलना हो, मना है। क्यों? क्योंकि वहाँ पर क़दा हाज़त का माना कि चलने वालों को जो है तकलीफ देना, उनको नापाक करना। और बल्के अल्लाह के क़ा फ़रमान है, इला त डरो, बचो किस चीज़ से? दो ऐसे कामों से जिसके करने पर लानत पड़ती है। यानी अगर कोई रास्ते में क़दा हाज़त कर, पेशाब करता है या फलदार दरख़्त, दरख़्त जिसका फल है और फल लोग खाते हैं, उसके नीचे हाज़त करता है। वो दरख़्त जिसके नीचे लोग बैठते हैं। बाज़ दरख़्त होते हैं कि जिसमें नीचे लोगों के बैठने की जगह बना होती है। तो ऐसी जगह पर क़दा हाज़त करना। मक़सद जो है हर वह जगह जो आम हो लोगों के इस्तेमाल की हो, चाहे वो रास्ता हो, चाहे कोई बैठने की जगह हो, चाहे कोई दरख़्त हो फलदार, बल्कि बाज़ औकात ऐसी जगह होती है जहाँ से लोग पानी लेते हैं, दरिया से, नहर से। समझे ना? ऐसी जगहों पर भी। तो हर वह जगह जहाँ से लोगों को बैठना होता है, गुज़रना होता है, ऐसी जगह पर क़जा हाज़त से मना किया गया है। बल्कि ऐसा करने वालों पर लानत डाली गई है, जिसे पता चलता है कि कबीरा गुनाह है, बड़ा गुनाह है। समझे ना? बड़ा गुनाह है ये। इसी तरह क़ब्रों के दरमियान, क़ब्रिस्तान में, क़ब्रों के दरमियान क़दा हाज़त करना भी मना है। क्योंकि उसमें क़ब्रों की तौहीन है। जिस तरह हमें क़ब्रों की इबादत करने की इजाज़त नहीं, इसी तरह क़ब्रों की तौहीन करने की बजा नहीं। ना क़ब्रों पर बैठे, ना उन पर चलें और ना ही उनके दरमियान क़दा हाज़त करें। इसी तरह 42 में, खड़े पानी में पेशाब करना मना है। वैसे तो पानी में पेशाब नहीं करना चाहिए, लेकिन ख़ुसूसी तौर पर पानी खड़ा है। पानी खड़ा है तो पेशाब कहाँ जाएगा? उसी पाँव के अंदर रहेगा। और अगर पानी थोड़ा है तो वैसे ही पानी नापाक हो जाएगा। समझे ना? अगर पानी बहुत ज़्यादा है यानी तालाब है तो नापाक तो नहीं होगा, लेकिन कोई शक नहीं कि किसी को पता चलेगा कि यहाँ पेशाब किया गया है तो पानी को इस्तेमाल करेगा, नहीं करेगा। इसलिए मक़सद जो है इन सारी चीज़ों को पढ़ने का क्या है कि हमें कोई भी ऐसी चीज़ नहीं करना चाहिए जिसमें लोगों के लिए तकलीफ़ हो, उनकी अज़ीयत हो, उनको किसी चीज़ से महरूम करना हो। हाँ, पानी अगर चलता हो तो उसमें भी पानी में पेशाब करना मना है। लेकिन चलते पानी में फ़र्ज़ करो पेशाब कर दिया तो उसमें एक दूसरी चीज़ है क्योंकि पानी चल रहा है, वो जो हुआ आगे निकल गया और ख़त्म हो गया मामला। लेकिन ख़ुसूस खड़े पानी में। इसी तरह किसी बिल या सुराख़ वगैरह में पेशाब करना मना है। बिल जो चूहे वगैरह जानवरों की बिलें होती हैं, ज़मीन के अंदर खोदते हैं या सुराख़ होता है। आपके सामने दिया गया है तो इसमें भी पेशाब करना मना है। क्यों मना है? इसमें दो नुक़सान हैं। एक तो बाज़ औकात ये बिलें और ये सुराख़ जिन्नो, शैतानों की जगह होती हैं। समझे ना? जिन, शैतान ऐसी जगह पर रहते हैं। तो अगर आदमी वहाँ पर करेगा तो मुमकिन है कोई जिन फिर उसके साथ दोस्ती लगा ले। समझे ना? तो और दूसरा नुक़सान क्या है? कि बिल किस चीज़ की है? जानवरों की। तो मुमकिन है कि अंदर से कोई साँप भी निकल सकता है। साँप ना भी हो तो अंदर जो जानवर है उसको अज़ीयत दी जा रही है, उसको तकलीफ़ दी जा रही है और इस्लाम नहीं चाहता कि किसी भी अल्लाह की मख़लूक़ को तकलीफ़ हो, चाहे इंसान हो या हैवान हो। तो इसलिए बिल, सुराख़ में भी पेशाब करने से मना किया गया है क्योंकि एक तो जिन की जगह है और दूसरा उसके अंदर मुमकिन है कि कोई जानवर हो, कोई चीज़ हो। अच्छा, यहाँ पर ये भी दिया गया है कि क़दा हाज़त के लिए बैठने का कोई मख़सूस तरीक़ा साबित नहीं है। क़दा हाज़त के लिए कैसे बैठना है, वाशरूम में, टॉयलेट में? इस बारे में जफ़्फ़ हदीस आती है, कोई सही हदीस नहीं है। इसका माना यह है कि इसमें आप जैसे भी अपने लिए आसान समझे, मुनासिब समझे बैठ सकते हैं। समझ कमोट हो, वो दूसरी कुर्सी हो, जैसे भी हो और जिस तरह भी आपके देखें आसान है, मेडिकली तौर पर आप बैठ सकते हैं। क्योंकि हदीस की रू से क़दा हाज़त के लिए बैठने का कोई ख़ास तरीक़ा सुन्नत से साबित नहीं है और जो सुन्नत से साबित नहीं है फिर हमें भी उसमें किसी चीज़ की पाबंदी करना ज़रूरी नहीं है।

44 में, सहीन में सही क्या चीज़ है? सहीन का लफ़्ज़ देखिए, क्या माना इसका? के दो सही किताब में? कौन सी दो सही किताब? सही बुख़ारी और सही मुस्लिम। हदीस में ये दो वो किताबें हैं कि जिस पर पूरी उम्मते मुस्लिमा का इत्तेफ़ाक़ है। इनकी हदीस सही हैं। हाँ, बाक़ी हदीस की किताबों के हर को सही भी होती हैं, ग़लत भी होती हैं। लेकिन बुख़ारी और मुस्लिम ये दो किताबें हैं कि जिसकी सारी हदीस पर उम्मते मुस्लिमा इत्तेफ़ाक़ है कि वो सही हैं। इसलिए उनको सहीह कहा जाता है। सहीह में है कि तीन पत्थरों या तीन मिट्टी के ढेले से सफ़ाई की जाए। अब आप क़दा हाज़त के बाद सफ़ाई कैसे करें? उसके लिए क्या कुछ कर सकते हैं? आपके ज़माने में पानी बहुत कम होता था और ख़ुसूस टॉयलेट तो बहुत होते ही नहीं थे, तक़रीबन ना होने के बराबर थे टॉयलेट। अमूमन लोग बाहर, सहरा में, जंगल में जाते थे क़दा हाज़त के लिए। तो बाज़ कातों को अपने साथ पानी ले जाता और नबी बा ले जाते थे पानी। और अक्सर औकात पानी ना ले जाते तो फिर क्या करते? कि वहीं से मिट्टी के ढेले, मिट्टी का ढेला होता है या कोई पत्थर, उसी से अपनी जगह को साफ़ कर लेते। तो उसको साफ़ करने के लिए क्या चाहिए? तीन पत्थर या तीन ढेले। एक पत्थर से साफ़ नहीं होगा, एक ढेले से साफ़ नहीं। किस लिए? ताकि अच्छी तरह सफ़ाई हो जाए। आप पहले से सफ़ाई करेंगे तो आपके वो नापाकी, रग जो उतर जाएगी, दूसरे के साथ मज़ीद अगर कोई चीज़ है वो भी वो

पाक साफ हो जाएगी तो मट्टी के ढेले से आपने जगह साफ कर ली या पत्थर से तो नापाकी खत्म हो गई या नहीं हुई? हां क्या ख्याल है? पानी से इस्तंजा करना जरूरी है? नहीं, जरूरी नहीं है। अगर आपने मट्टी या पत्थर से, और मट्टी और पत्थर की जगह पर आज का टिशू पेपर है। आज का टिश्यू पेपर जो है वो पत्थर मट्टी की जगह पर ही है। लेकिन जिस तरह हमने मट्टी और पत्थर के बारे में जिक्र किया कि तीन पत्थर, तीन इसी तरह टिशू पेपर के हवाले से भी इतना टिशू पेपर इस्तेमाल किया जाए कि जिससे जगह अच्छी तरह साफ हो जाए, किसी तरह का उसका नामो निशान बाकी ना रहे। तो इस तरह से अगर जगह साफ कर लेते हैं आप तो आपकी, आपकी, आपकी तहर हो गई, आप पाक हो गए। अगर पानी से उस जगह को ना भी धोए तब भी जायज है, तब भी आप पाक है, वजू कर सकते हैं। समझे ना? लेकिन अगर पानी इस्तेमाल कर ले तो ज्यादा अच्छा है। टिशू इस्तेमाल करने के बाद या मिट्टी या पत्थर इस्तेमाल करने के बाद पानी भी इस्तेमाल करने की अगर आपके पास गुंजाइश है तो ज्यादा अच्छा, बेहतर है ताकि और अच्छी तरह सफाई हो जाए। लेकिन इस तरह से तीन पत्थरों या तीन ढेलों से अगर सफाई कर लेते हैं तो वही काफी है, आपको पानी इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है। उसी से आप पाक हो चुके हैं, वजू कर सकते हैं। उसके बाद अच्छा, उसकी दलील आपको दी गई है कि आप जब के लिए जाते तो मट्टी, मिट्टी के तीन ढेलों से सफाई करते। उसके बाद 45 नंबर, 45 में खाई जाने वाली और हुरमत की चीजों से सफाई करना मना है। कोई भी चीज जो खाई जाने वाली हो, चाहे इंसानों के खाने वाली हो या जिन्न के खाने वाली हो, सम, कोई भी चीज जो खाई जाने वाली है, रोटी है, फ्रूट है, कोई भी चीज खा जाने वाली, ऐसी चीज को सफाई के लिए इस्तेमाल ना करें। यानी कि हाजत के बाद ऐसी चीज से सफाई ना करें जो खाई जाए। इसी तरह वो चीज जिसका कोई एहतराम हो, लिखी हुई चीज है, चाहे उसमें अल्लाह का नाम ना भी हो, वैसे ही लिखी हुई चीज है तो एहतराम की चीज, ऐसी भी चीजों से सफाई नहीं करना चाहिए क्योंकि नापाकी दूर कर रहे हैं। इसी तरह गोबर और हड्डी, गोबर जो जानवरों का गोबर होता है उससे भी सफाई करने से मना, मना किया गया है। और हड्डी, हड्डी से मना किया, हड्डी से क्यों मना किया गया है? क्योंकि जिन्नो का खाना है। लेकिन जिन क्या हड्डियां खाते हैं? गोश्त आप खा लेते हैं, हड्डी जिन को देते हैं। अल्लाह ताला जो है उस हड्डी पर, उससे बढ़कर गोश्त पैदा करता है जो माली होता है जिन्न के लिए, उससे ज्यादा गोश्त उनको अल्लाह देता है उस हड्डी पर। तो इसलिए हड्डी अगर आप इस्तेमाल करेंगे कदा हाजत के बाद तो नापाक होगी, गंदी हो जाएगी और जिन्नो के लिए तकलीफ देने वाली चीज है। इसलिए आपने हड्डी का इस्तेमाल करने से मना किया। और मालूम होना चाहिए अगर गोबर, हड्डी से कोई आदमी सफाई करता है तो उसकी सफाई होगी भी नहीं, शरीअत तौर पर वो पाक नहीं होगा। समझे ना? मना भी है और अगर किसी ने हड्डी, हड्डी या गोबर से सफाई कर ली तो पाक भी नहीं होगा। हां जी, क्या चीज? पत्ते? हां, पत्तों से कर सकते हैं। पत्ते, इससे अगर आपके पास कोई चीज पत्तों से की जा सकती है, मुश्किल नहीं है। यानी कोई ऐसी चीज ना हो जो खाई जाने वाली हो, पत्ते वगैरह से कर सकते हैं। उसके बाद 46 में, इस्तंजा करते हुए दायां हाथ इस्तेमाल करना मना है। राइट हैंड नहीं करेंगे, लेफ्ट हैंड से करेंगे। ठीक है ना? हमने पहले पढ़ा है अल्लाह के नाम से दायां हाथ अच्छी चीजों के लिए, खाने, पीने, इस तरह की चीजों के इस्तेमाल करते थे और बायां हाथ जो है नजासत दूर करना, इस तरह की चीजों के लिए बायां हाथ इस्तेमाल करते थे। लेकिन अगर फर्ज करो किसी का दायां हाथ काम ना करता हो, दायां हाथ चोट लगी हो, किसी वजह से दायां हाथ इस्तेमाल नहीं कर सकता, बायां हाथ इस्तेमाल नहीं कर सकता, बायां हाथ चोट है तो फिर दायां हाथ इस्तेमाल किया जा सकता है। मजबूरी की कैफियत में, असलियत में नजासत दूर करने में दायां हाथ इस्तेमाल करें बल्कि बायां करें। 47 में, दो रफ हाजत के लिए पर्दे का एहतमाम करना जरूरी है। यानी ऐसी जगह पर ना बैठे जहां लोग देख रहे हों। और ये खास तौर पर होता है जब आदमी खले, किसी खुली जगह पर करता है, किसी खुले मैदान में, सहरा में, जंगल में तो वहां पर बाज औकात, यानी के लोगों के सामने, तो लोगों के सामने ऐसी चीज करना मना है। नबी हाजत के लिए जाते तो दूर जाते, इतनी दूर जाते जहां से आपको कोई देख ना पाता। और अल्लाह के फजल से आज आनियां है, बंद लेट है तो अल्लाह कु हाल ऐसी हाजत जगह पर करें हाजत जहां पर कोई देखता ना हो। और इसी तरह जब आदमी कदा हाजत के लिए बैठे किसी खुली जगह पर तो जब तक बैठ ना जाए, जमीन के करीब ना हो जाए, अपना कपड़ा ना उठाए ताकि उसका सतर जो है ना खुले, उसका सतर नंगा ना हो, खास तौर पर खुली जगह पर। हां, बन टाट के अंदर मामला नहीं है लेकिन खुली जगह पर कदा हाजत के लिए बैठते हैं तो जब जमीन के करीब पहुंचे तो अपना कपड़ा उठाए ताकि सतर नंगा ना हो। इस तरह रफ हाजत के दौरान बिरा जरूरत बातचीत करना, हां जरूरत के तहत बातचीत कर सकते हैं। आप टॉयलेट में हैं, आपसे घर वाले पूछते हैं फलां चीज कहां पर है, साथी पूछता है फलां चीज कहां पर है, बता सकते हैं। लेकिन बाज लोग यहां पर बैठकर भी हां, दूसरों से बात नहीं, मोबाइल पर तो जिस तरह दूसरों से बातें करना मना है, ऐसे मोबाइल पर भी है। समझे? ये बेदगी का अंदाज है। दिल में, दिल में आप करते जो करना है, बात हो रही है जबान से बात करने की। समझे ना? तो ये कोई शक नहीं, गलत चीज और आप फरमाते हैं अल्लाह ताला इस चीज से नाराज होता है। आखरी मसला 50 नंबर, अगर कदा हाजत की जरूरत हो और नमाज से पहले उसे, नमाज से पहले उससे फार होना चाहिए। यानी नमाज का वक्त हो गया और आपको कदा हाजत की जरूरत है, पहले क्या करेंगे? पहले कदा हाजत से फार हो, फिर नमाज पढ़े। किसलिए? अगरचे जमात छूट भी जाए, अगरचे जमात छूटने का खतरा हो, तब भी किसलिए? ताकि नमाज आप खुशूहू के साथ इत्मीनान से पढ़ सकें। और यह सिर्फ एक मिसाल है इस परने की, हर उस चीज को कि जिसमें इंसान का दिल मशगूल हो। खाने का भी जिक्र आता है, खाना मौजूद हो, आपको भूख लगी है, पहले खाना खाओ, उसके बाद नमाज पढ़ो। समझे ना? कोई भी ऐसी चीज है कि जिसमें आप उसमें मशगूल हैं, आपका दिल दिमाग उसमें लगा हुआ है तो पहले अपनी उस चीज को, उससे फार हो लो, उसके बाद नमाज पढ़ो ताकि नमाज जो है तसल्ली से, इत्मीनान से, खुशूहू के साथ पढ़ी जा सके। बकला निकालने से।