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Qissa Lakadhara Or Uski Beti Ka Qismat || Moral Stories in Urdu & Hindi

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Transcription

वह गरीबों की बस्ती थी। कच्ची गलियां, कच्चे मकान और हर तरफ कीचड़, कूड़ा, कर्कट और गंदगी।

इस बस्ती में पहला मकान एक दर्जी का था। दूसरा एक गरीब लकड़हारे का और तीसरा एक तेली का। इसके बराबर एक बुनकर की दुकान थी। फिर और बहुत से मकान और दुकानें थी।

दर्जी भी कमाता था, तेली भी कमाता था। मगर लकड़हारे के हाथ पैर जवाब दे चुके थे। वो बहुत बूढ़ा और कमजोर भी तो हो गया था। उसकी बीवी पहले घर में गेहूं, मिर्च और धनिया पीस लेती थी और रुपए ₹1.5 की मजदूरी हो जाती थी। मगर जब से उसे खांसी की शिकायत हुई थी, हकीम साहब ने चक्की पीसने से मना कर दिया था। अगर वह पीसती तो उसे सांस की तकलीफ हो जाती। बेटा अल्लाह ने दिया नहीं था। सिर्फ दो बेटियां थी। आयशा और लैला। उन्होंने अपनी मां से कहा कि हम चक्की में मिर्च, धनिया और गेहूं पीस लेंगी। बड़ी बीवी ने कहकर मना कर दिया कि नहीं तुम्हारी तो अभी उम्र ही क्या है? तुम बहुत छोटी हो। अगर तुम्हें खांसी हो गई तो फिर क्या होगा? यह बड़ी बुरी बीमारी है।

उनकी गरीबी का हाल सबको मालूम था। मगर यह बात सिर्फ दर्जी को मालूम थी कि वह बेरोजगारी की वजह से एक वक्त ही रूखी सूखी खाकर गुजारा करते हैं। एक रोज उसने लकड़हारे को बुलाकर उससे कहा मेरे पास सिलाई का काम बहुत आता है। बाज वक्त मैं काम लेने से इंकार कर देता हूं क्योंकि मैं इतना काम नहीं कर सकता। अगर आप नाराज ना हो तो मैं थोड़ा बहुत काम आपके घर भेज दिया करूं और आपकी बेटियां उन्हें सिलकर मेरे पास पहुंचा दिया करें। इस तरह मेरे ग्राहक भी नाराज नहीं होंगे और आपको भी कुछ आमदनी होने लगेगी।

लकड़हारे ने जवाब दिया भाई तुमने मेरी भलाई का अच्छा रास्ता निकाला है। मैं तुम्हारा एहसान कभी ना भूलूंगा।

दर्जी बोला मुझे अपनी बीवी की जुबान से मालूम हुआ था कि दोनों लड़कियों को कपड़ा सिलने और दबाने का बहुत शौक है। इसलिए मैंने सोचा कि उनका शौक भी पूरा होता रहेगा और आमदनी का जरिया भी पैदा हो जाएगा। अब आप यह दो कमीज का कपड़ा ले जाओ। जब सिलाई कर लो तो उसे मेरे पास भेज दो।

लकड़हारा कपड़ा लेकर खुशी-खुशी घर गया और दोनों बेटियों को देते हुए बोला तरजी एक अच्छा पड़ोसी है। खुदा ने उसके दिल में नेकी डाल दी है और उसने दो कमीज सिलने के लिए कपड़ा दिया है। तुम इसे सिलकर वापस करोगी तो वो और भी कपड़ा देगा। आयशा और लैला दोनों बहुत खुश हुई और दोनों एक-एक कमीज लेकर बैठ गई। बाजार का यह पहला काम था। उन्हें सिलाई का ऐसा शौक पैदा हुआ कि आधी रात तक वो सिलाई करती रही। फिर सुबह होते ही ले बैठी और कमीज दोपहर से पहले सिलकर तैयार कर दी।

लकड़हारा दोनों कमीज लेकर दर्जी के पास गया तो वह देखकर बहुत खुश हुआ और उसने फौरन ही मजदूरी ₹4 उसे दे दी और दो कमीज और एक सलवार का कपड़ा भी दिया। इस तरह दोनों बहनें हर वक्त मशगूल रहने लगी। मगर जहां उनकी परेशानी खत्म हुई वहीं मां-बाप को भी आराम मिल गया।

एक रात बारिश हुई तो गली कच्ची में कीचड़ कीचड़ हो गई। सुबह सूरज निकला तो तेज धूप में बहुत सा पानी सूख गया। मगर फिर भी कहीं-कहीं कीचड़ था। दोपहर के वक्त दरवाजे पर आकर एक फकीर ने सदा लगाई। भूखे फकीर को अल्लाह की राह में कुछ मिल जाए। लगहारे ने दरवाजा खोलकर फकीर से कहा, बाबा जरा ठहरो। घर में पर्दा हो जाए तो मैं तुम्हें बिठाकर खाना खिला देता हूं।

फकीर बोला, खुदा तुम्हारा भला करे। पर्दे की तकलीफें क्यों करते हो? मैं यहां दरवाजे में ही बैठकर खा लूंगा।

लकड़हारे ने कहा, नहीं, खुदा का दिया रिज़कर है। उसे इज्जत के साथ खाना चाहिए। उसी वक्त आयशा ने आवाज दी अब्बा जान हमने पर्दा कर लिया है बाबा को अंदर बुला लीजिए।

लकड़हारा फकीर को अपने घर के आंगन में ले गया और चारपाई पर बिठाते हुए बोला बाबा तुम्हारे तो जूते और पांव कीचड़ में लथपथ हो रहे हैं।

फकीर ने कहा बारिश की वजह से कीचड़ बहुत हो गई है। और इस तरफ तो मैं यूं भी पहली मर्तबा आया हूं। यहां रहने वाले कैसे रहते होंगे?

लकड़हारा बोला बाबा यह गरीबों की बस्ती है। यहां हर तरफ गंदगी और कूड़ा कर्कट फैला रहता है। मगर कोई उठाने वाला नहीं है। पक्के रास्ते तो कौन बनाएगा? बस यूं कहो कि हम गरीब लोग इसी कूड़े कर्कट, गंदगी और कीचड़ में आंख खोलते हैं। पलते हैं और बढ़ते हैं। इसीलिए यह सब कुछ बुरा नजर नहीं आता।

आयशा ने पर्दे के पीछे से कहा, "अब्बा जान, अगर बाबा पांव धोना चाहें, तो पानी गर्म है।"

लकड़हारे ने जवाब दिया, "हां हां, एक लोटे में पानी ले आओ।" पांव धोकर बाबा चारपाई पर बैठ जाएंगे। फिर खाना अच्छे से खा सकेंगे।

फकीर ने कहा, खुदा तुम पर अपना फजल करे। बड़े ही नेक दिल हो। आयशा खद्दर की मोटी चादर में लिपटी हुई हाथ में पानी का लोटा ले आई और फकीर से कहने लगी बाबा जूते उतार दीजिए। मैं आपके पांव धो देती हूं।

फकीर ने जूते उतार कर कहा, लोटा मुझे दे दो। मैं खुद ही धो लूंगा।

आयशा बोली, नहीं बाबा, यह काम लड़कियों का है। और उसने एक कपड़ा पानी में भिगोकर फकीर के दोनों पांव धो दिए। फिर उसके हाथ धुलाए और जूते उठाकर ले गई।

फकीर चारपाई पर बैठ गया तो लैला ने खाना लाकर उसके सामने रख दिया। फकीर बोला, सुभान अल्लाह, कढ़ी और मक्की की रोटी। खुदा तुम सबको मालामाल करे। फिर उसने अल्लाह का नाम लेकर खाना शुरू किया। इधर आयशा ने उसके जूते धोकर धूप में रख दिए। वो खाना खा चुका तो आयशा ने गर्म पानी से उसके हाथ धुलाए और वह कहने लगा सच है गरीब की कदर गरीब ही करता है। मेरे तो ख्याल में भी ना था कि मेरी इस तरह इज्जत की जाएगी।

आयशा बोली बाबा जिन्हें पेट से ज्यादा मयस्सर है वो इस रोटी की कद्र नहीं जानते। हमने एक-एक वक्त रोटी और रूखी सूखी रोटी खाकर गुजारा किया है। फिर हम इसकी कद्र क्यों ना करें और किसी को खिलाएं तो इज्जत के साथ क्यों ना खिलाएं।

फकीर ने कहा अब इजाजत चाहता हूं।

लकड़हारा बोला बाबा धूप में आराम करो। तुम्हारे जूते अभी गीले हैं। पहनने से तो नजला हो जाएगा। थोड़ी देर में सूख जाए तो फिर चले जाना।

फकीर यह सुनकर चारपाई पर लेट गया और दोनों बहनें अंदर दालान में बैठकर कपड़े सिलने लगी।

इधर दर्जी का एक बेटा था। अमीर वो अच्छा आदमी ना था। दर्जी और उसकी बीवी ने बहुत कोशिश की मगर उसने कपड़ा सिलना ना सीखा। लिखने पढ़ने से भी उसे नफरत थी। पहले वो गली कूचों में खेलता था। पतंग उड़ाता था। फिर उसे कबूतरों और बटेर का शौक हो गया। अब वो जुआ भी खेलने लगा था। जुए में तो वह ऐसा माहिर हो गया था कि जुारी उसे उस्ताद कहकर पुकारते थे। कई जुारी तो उसे खलीफा भी कहते थे। वो शायद ही कभी हारता हो वरना हर रोज कुछ ना कुछ रुपए पैसे जीत कर ही घर लौटता था। बस उसमें खूबी थी। तो यह कि वह जुए में जीते हुए रुपए घर में कदम रखते ही अपनी मां को दे देता था।

दर्जी उसे बुरा भला कहता तो उसकी मां उसकी हिमायत करते हुए कहती जुआ खेलता है तो क्या हुआ कुछ चोरी कर तो नहीं आता दो चार 10 पांच लेकर ही घर आता है अगर तुम्हारी कमाई को आग लगाए तो उसकी चमड़ी उधेड़ कर रख देना फिर मैं बोलूं तो जो चोर का हाल सो मेरा बनाना बीवी के सामने दर्जी खामोश हो जाता और अगर भूल से कभी उसके सामने बोलता तो वह हाथ धोकर पीछे पड़ जाती और उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता।

दर्जी की बीवी ने एक रोज कहा तुम्हें कुछ ख्याल भी है भाई बेटा स्या हो गया है उसका कहीं रिश्ता तय करना चाहिए अगर घर में बहू आ जाएगी तो मुझे भी कुछ आराम मिल जाएगा और बेटा भी संभल जाएगा।

दर्जी बोला तुम ही कहीं रिश्ता देख लो मैंने तो एक रोज बातोंब बातों में उमर तेली से कहा था कि भाई अमीर को अपना बेटा बना लो तो उसने झट से कह दिया म्याम ज्वारी को बेटा बनाकर अपनी बेटी को कुएं में क्यों गिराऊं मेरा तो ख्याल है कि मैं जिससे भी कहूंगा वो वो ऐसा ही जवाब देगा।

यह सुनकर उसकी बीवी बोली, उमर तेली भी कोई आदमी है? उसकी भी एक ही कच्ची। अरे तुम भूल गए। पिछले दिनों वो अफीम बेचा करता था और खूब चांदी में खेल रहा था। फिर पकड़ा गया और जेल की हवा खाई। हाथ चला है। मेरे बेटे को बदनाम करने। मैं तो कम वक्त के दरवाजे पर थूकती भी नहीं।

दर्जी ने कहा, फिर कोई और घर देख लो। मेरा भी यही ख्याल है कि जब तक उसका ब्याह ना होगा वो जुआ ना छोड़ेगा।

उसकी बीवी कहने लगी मेरे ख्याल में तो तुम लकड़हारे से बात करो। उसकी दोनों बेटियां खूबसूरत भी हैं और सगड़ भी। तुम देखते नहीं कैसे अच्छे कपड़े सिलाई देती हैं। उनमें से एक मेरे घर में आ जाए तो जो पैसे उनके घर जाते हैं वो अपने ही काम आएंगे।

दर्जी ने कहा, "ख्याल तो बड़ा नेक है। मैं कल ही लकड़हारे से बात करूंगा और मुझे यकीन है कि वो राजी हो जाएगा।"

उसकी बीवी बोली, "क्यों राजी ना होगा। वो तो इसे अपनी खुशकिस्मती समझेगा। अरे वरना भूखे नंगे की बेटी को कौन मांगता है?"

दर्जी ने कहा कल मैं उसे जरूर कहूंगा। और दूसरे दिन जब बूढ़ा लकड़हारा उसके पास आया और उसने रिश्ते की बात की तो लकड़हारा कहने लगा भाई युसुफ किसी की औलाद के बारे में कुछ कहना अच्छी बात नहीं है। मगर कहे बिना रहा भी नहीं जाता। अमीर ज्वारियों का उस्ताद और खलीफा कहलाता है। कम उम्र में ही इतना बड़ा ज्वारी हो जाना कुछ कम बात नहीं होती। और ज्वारियों का हाल तो तुम जानते हो कि क्या होता है। जायदाद हार बैठते हैं। बीवी बच्चों को भी दांव पर लगा देते हैं। अगर तुम उसकी यह आदत छुड़ा दो तो मुझे मंजूर है। वरना भाई मैं अपनी बेटी को भाड़ में नहीं झोंक सकता।

दर्जी तो चुप बैठा रहा। मगर उसकी बीवी जो पर्दे के पीछे खड़ी सारी बातें सुन रही थी। कहने लगी बड़े मियां क्यों मेरे बेटे को बदनाम करते हो? वो जुए में हार कर तो नहीं आता। तुम तो एक हफ्ते में भी इतना कमा कर नहीं लाते जितना वह एक दिन में कमा कर ले आता है। हमने तो सोचा था कि रिश्ता हो जाएगा तो तुम्हारी बेटी की जिंदगी बन जाएगी। रानी बनकर रहेगी। हमेशा ऐश करेगी। मगर तुम तो जैसे उसके दुश्मन हो। साफ-साफ इंकार कर रहे हो। भला अपनी बेटी का भी कोई बुरा चाहता है?

लंगड़हारे ने जवाब दिया। बेटी का तो कोई बुरा नहीं चाहता। इसीलिए मैं उसका हाथ एक जुरी के हाथ में नहीं देना चाहता।

दर्जी की बीवी गुस्से से बोली, बस तो अपने घर खुश रहो। अब हम सिलाई का काम तुम्हारी बेटियों को नहीं देंगे। हमें तो तुम्हारी गरीबी पर तरस आ गया था। मगर तुम तो जमीन पर पांव ही नहीं रखते।

लकड़हारे ने उठते हुए कहा, खुदा तुम्हें नेक राह पर चलने की तौफीक अता करें। हमारा रिज़्क खुदा है। वो हमारे लिए कोई और असबाब पैदा कर देगा।

लकड़हारा उसकी दुकान से उठकर चला आया। उस रोज सिदर्जी ने उसे सिलाई के लिए कपड़ा नहीं दिया और उनके फिर बुरे दिन आ गए। थोड़े बहुत रुपए जो कपड़ा सिलाई करके बचाए थे उनमें ही रोटी चटनी खाकर अल्लाह का शुक्र अदा करने लगे।

एक रोज फिर वही फकीर आया और उसने दरवाजे पर सदा लगाई। हायशा और लैला दोनों उसकी आवाज पहचान गई और उन्होंने लकड़हारे से कहा अब्बा जान उस रोज वाला बाबा आया है। उसे बिठाकर खाना खिलाइए।

लकड़हारा बोला बेटी उस रोज तो खड़ी और मकई की रोटी थी। आज तो रूखी रोटी है। वो क्या कहेगा? आज उसे जाने दो।

लैला ने कहा अब्बा वो भी तो हमारी तरह गरीब है कुछ नहीं कहेगा। दरवाजे पर जो साहिल आ जाए उसे ना उम्मीद नहीं लौटाना चाहिए।

लकड़हारा कहने लगा ठीक कहती हो बेटी। फिर उसने फकीर को अंदर बुला लिया और साहन में चारपाई पर बिठा दिया। उसकी सूरत गौर से देखते हुए उसे याद आया कि यह फकीर अभी थोड़े दिन पहले आया था तो उसकी दाढ़ी के सारे बाल स्याह थे। मगर आज उसकी दाढ़ी का एक भी बाल काला नहीं है। यह उसे क्या हुआ?

फकीर बोला क्या सोच रहे हो?

वो कहने लगा उस रोज जब तुम आए थे तो तुम्हारी दाढ़ी में एक भी सफेद बाल ना था। मगर आज सारी दाढ़ी सफेद हो गई।

फकीर ने यह सुनकर कहा बाबा खुदा की कौदत है। इसमें हमें और तुम्हें दखल नहीं देना चाहिए। यह तो रंग है। लोगों के तो दिल बदल जाते हैं।

आयशा ने आवाज दी। अब्बा खाना ले जाइए।

लकड़हारे ने कहा, हां बेटी मैं तो भूल ही गया था। फिर वह जाकर लौटे में पानी और दूसरे हाथ में चंगड़ी ले आया। फकीर के हाथ धुलाए और उससे कहा बिस्मिल्लाह करो।

फकीर ने देखा कि चंगड़ी में पुरानी और सूखी एक रोटी और थोड़ी सी चटनी रखी है। उसने अल्लाह का नाम लेकर एक लकमा लिया। वो हल्के में कुछ फंसा तो पानी का एक घूंट पिया।

लकड़हारा बोला बाबा तुमसे यह रोटी नहीं खाई जा सकेगी। उसने पूछा क्या आज ताजा रोटी नहीं पकाई?

लड़हारे की बूढ़ी आंखों में पानी भर आया और उसने सारा वाकया उसे कह सुनाया।

फकीर ने यह सुनकर कहा, जमाना बहुत मसल्लत परस्त है। तुमने बहुत अच्छा किया जो दर्जी को बेटी देने से इंकार कर दिया। लड़का गरीब हो मगर नेक हो जो खेलना जुर्म है। उसे हुकूमत गिरफ्तार कर सकती है और सजा भी दे सकती है।

लकड़हारा बोला हां बाबा ऐसे बुरे आदमी को बेटी देना बहुत बुरा है। हमारे बराबर में उमर तेल प्रेसर रहता है। उससे भी बेटी का सवाल किया गया था। मगर उसने भी इंकार कर दिया। आंखों देखी भला मक्खी कौन खाता है।

फकीर ने अपने फटे पुराने और मैले कुचले कोट की जेब में हाथ डालकर चांदी के 101 सिक्के निकाले और लकड़हारे से कहने लगा यह सिक्के तुम्हारे काम आएंगे।

लकड़हारा बोला नहीं बाबा घर आए मेहमान से रुपए लेना ठीक नहीं।

फकीर ने कहा तुम इंकार ना करो बाबा मेरी बीवी है ना बच्चे। यह सिक्के मेरे लिए बेकार हैं। तुम्हारे काम आएंगे। क्या तुम भूल गए? गरीब ही गरीब के काम आता है। मेरा तुम पर कोई एहसान नहीं होगा। कुदरत ने मेरे दिल में यह बात पैदा की है कि मैं अपनी जेब के सिक्के तुमको दे दूं और उसने जबरदस्ती सारे रुपए उसे दे दिए और यह कहकर चल दिया बाबा बुरा ना मानना और इन रुपयों को बिल्कुल अपना समझकर खर्च करना।

आयशा ने लकड़हारे से कहा अब्बा जान फकीर ने तो बहुत सारे रुपए दे दिए।

लैला बोली अब्बा उसके पास अपने रुपए थे। मगर यह फिर भी मांग कर खाता है। यह क्या बात है?

लकड़हारे ने कहा बेटी किसी के बारे में कोई बात कहना अच्छा नहीं होता।

लकड़हारे की बीवी उसी में खांस हुई अंदर से आई और कहने लगी क्या बातें हो रही हैं? मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मैं घर में ही नहीं हूं।

लकड़हारे ने उसे फकीर का सारा हाल सुनाया और रुपए उसे दे दिए।

लैला ने मां के गले में बाजू डालते हुए कहा, "अम्मा, मुझे दूध पीने बहुत दिन हो गए हैं। आज तो मैं दूध जरूर पऊंगी।" देखो ना कितने सारे रुपए हैं।

आयशा बोली अम्मा मैं दूध में जलेबियां भी डालूंगी।

लकड़हारा कहने लगा मेरे लिए तो आज थोड़ा सा हलवा बना देना।

उसकी बीवी ने कहा हां हां सब कुछ हो जाएगा। दम तो लो बाजार जाकर सब चीजें ले आना फिर खा लेना।

लैला बोली और अम्मा तुम भी तो कहो तुम क्या खाओगी?

वो कहने लगी मैं क्या खाऊंगी बेटी? मेरी खांसी के लिए तो हकीम साहब से दवा मंगवा दो। कांसी जाती रहेगी तो मेरे लिए सब कुछ है।

लकड़हारे ने कहा हां हां क्यों नहीं सबसे पहले तुम्हारे लिए दवा लाऊंगा।

लकड़हारा थोड़ी देर के बाद घर से निकला और एक डेढ़ घंटे में हकीम साहब से खांसी की दवा बाजार से सूजी, घी, किशमिश, शक्कर और जलेबियां लेकर वापस आ गया। उसकी बीवी बोली, बहुत देर में आए कहां रहे थे? उसने जवाब दिया, "यह सारी चीजें दूर से ले आया हूं। अपनी बस्ती की दुकानों से खरीदता तो लोग तरह-तरह की बातें बनाते। अब उन्हें खबर भी ना होगी कि हम क्या लाए और क्या खा रहे हैं।" फिर वह बर्तन उठाकर दूध लेने चला गया। दूध वाले की दुकान तो करीब ही थी मगर उस पर लकड़हारे को भरोसा ना था क्योंकि वह दूध में पानी मिलाकर बेचता था। इसलिए वह करीबी बाजार में गया और वहां से दूध खरीदा।

जब वो वापस आया तो उसने देखा कि दर्जी के मकान के सामने भीड़ लगी है और सारा मोहल्ला जमा है। वो जल्दी-जल्दी करीब पहुंचा और एक आदमी से पूछने लगा। खैर तो है यह सब लोग क्यों जमा हो रहे हैं? उसने जवाब दिया बड़े मियां अमीर जुआ खेलता है ना आज हुकूमत के सिपाही और कोतवाल आए हैं और अमीर को गिरफ्तार किया जा रहा है।

उमर तेल प्रेसर अपनी मूछें छूते हुए बोला अमीर घर में कहीं छिप गया है। सिपाही उसे तलाश कर रहे हैं। हम पहले ही कहते थे कि यह जुआ खेलना बहुत बुरा है।

लंगड़हारा वहां ना ठहरा और अपने घर चला गया।

लैला बोली अब्बा यह कैसा शोर है?

वो कहने लगा कोतवाल सिपाहियों के साथ अमीर को गिरफ्तार करने आया है। वो घर में छिप गया है तो उसे तलाश किया जा रहा है।

लैला बोली अल्लाह वो फकीर तो बड़ा पहुंचा हुआ मालूम होता है। उसी ने कहा था कि जुआ खेलना बड़ा जुर्म है। हुकूमत उसे गिरफ्तार करके सजा दे सकती है। और आज ही कोतवाल आ गया। अब्बा अमीर को हुकूमत क्या सजा देगी?

आयशा ने कहा सारे फकीर भीख मांगने वाले ही तो नहीं होते। उनमें अल्लाह के नेक बंदे भी होते हैं। यह भी कोई नेक इंसान था। उसकी जुबान से निकली बात पूरी हो गई।

लकड़हारे की बीवी बोली, बाहर जाकर तो देखो क्या हो रहा है।

लकड़हारा फौरन ही बाहर आ गया। देखा तो सिपाही अमीर के बाजुओं को रस्सी से जकड़े खड़े थे और दर्जी हाथ जोड़-जोड़ कर कोतवाल से कह रहा था, यह अब कभी जुआ ना खेलेगा। उसे माफ कर दीजिए। यह मेरा अकेला बेटा है। इसके पीछे मैं दीवाना हो जाऊंगा।

कोतवाल ने अपनी बड़ी-बड़ी मूछे पर हाथ फेरते हुए कहा, कोई बात नहीं, दीवाने हो जाओगे तो तुमको पागलखाने पहुंचा दिया जाएगा। इस बात का पहले ही ख्याल ना हुआ। फिर उसने सिपाहियों को हुक्म दिया। ले चलो इस ज्वारी लड़के को।

दर्जी की बीवी ढेर मार मार कर रोने लगी। और दर्जी लोगों की मुन्नत समझाते लगा। मगर उसकी हिमायत में कौन बोलता? सब उसके बेटे को बुरी नजर से देखते थे।

मगरिब की नमाज अदा करने के बाद लैला और उसकी मां ने लकड़हारे के लिए हलवा तैयार किया। फिर दूध गर्म करके एक प्याला में आयशा के लिए जलेबियां डाल दी। और एक प्याला में लैला अपने लिए दूध डालकर कमरे में ले गई। दालान में चारपाई पर बैठकर लकड़हारा हलवा खा रहा था। उसकी बीवी पास ही बैठी थी और आयशा दूध जलेबियां खा रही थी कि दरवाजा खुला और दर्जी की बीवी अंदर आई। उसने जो हलवा और दूध जलेबियां देखी तो रो-रो कर कहने लगी हाय पड़ोस में मातम हो रहा है और तुम मजे उड़ा रहे हो क्या तुम्हें यही दिन का इंतजार था तुम्हें कैसी खुशी है हाय रे जमाने।

लकड़हारे ने कहा नहीं बहन खुदा ना करे जो पड़ोस में मातम हो वो ज्वारी ही तो है छूट जाएगा कोई खूनी तो नहीं है जो फांसी के तख्ते पर चढ़े आओ तुम भी हलवा खाओ।

दर्जी की बीवी बोली, हां तुम तो फांसी के तख्ते पर चढ़ाने की दुआ मांगो हो।

लकड़हारे की बीवी ने कहा, बहन, तुम कोई बात करने आई हो या लड़ने झगड़ने? हमारा तुमसे क्या ताल्लुक है जो यहां आकर शोर मचा रही हो? अपने बेटे के करतूत ना देखे।

दर्जे की बीवी ने कहा, हां हां, देखे हैं मगर बहन, मुसीबत में पास पड़ोस वाले ही काम आते हैं। काजी की अदालत में अगर तुम लोग यह कह दो कि लड़का बहुत नेक है, शरीफ है, तो शायद वह सजा से बच जाए।

लकड़हारा बोला इस झूठ के लिए कोई और घर देखो। हमारी मुसीबत में तुम लोग हमेशा काम आते रहे हो। इसका शुक्रिया।

दर्जी की बीवी ने कहा हमें से बेवकूफी हुई। हम सिलाई का बहुत सा काम तुम्हें देंगे। तुम फिक्र ना करो।

आयशा बोली हमें तुम्हारे काम की तमन्ना नहीं है। झूठी ही गवाही से तो हम गरीबों को माफ रखो।

इधर लैला कमरे में बैठी थी। दूध ज्यादा गर्म था इसलिए फूंक मार मार कर ठंडा कर रही थी कि सामने वाले कोने से पुराने संदूक के पीछे से एक नाग रेंगता हुआ उसके सामने आ गया और कंडली मारकर फन उठाकर बैठ गया। लैला डरी और सहमी तो सही। मगर नाग उसके इतना करीब था कि वो उठकर भाग ना सकती थी। उसने हिम्मत करके दूध का प्याला हाथ में उठाया और नाग की तरफ ले गई। नाग ने फौरन ही उसमें मुंह डाल दिया और सारा दूध पी गया। फिर उसी तरह फन उठाए बैठा रहा। लैला ने दिल में कहा, बेचारा भूखा है उसे थोड़ा सा दूध और पिला दो। फिर वह प्याला हाथ में लिए उठी और कमरे से आकर बावर्ची खाने में दूध की दर्ज से

निकाला। उस वक्त उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था। वो सोच रही थी कि ना कहीं उसे डस ना ले।

फिर उसे ख्याल आया कि अगर डसना होता तो उस वक्त डस लेता जब मैं प्याला हाथ में लिए उठी थी और वह दूध में शक्कर मिलाकर वापस कमरे में गई। फिर बैठकर पहले की तरह सारा दूध उस नाग को पिला दिया। मगर नाग दूध पीकर गया ना वैसे ही बैठा रहा। लैला ने दिल में कहा हाय अल्लाह यह तो अब भी भूखा है।

फिर वो बावर्ची खाने में गई और जो दूध बच रहा गया था प्याले में भर कर ले आई और नाग को पिला दिया। नाग फिर भी ना गया और उसकी तरफ देखता रहा। उसने कहा दूध अब नहीं है। मैंने सारा दूध तुमको पिला दिया। अब तुम जाओ। उस वक्त वह बोल रही थी मगर सर से पांव तक पसीने में नहा रही थी और दिल धड़क रहा था।

नाग जैसे उसकी बात समझ गया था वो रेंगा और संदूक के पीछे छिप गया। लैला सोचने लगी कि उसे संदूक के पीछे से निकालना चाहिए। कहीं रात को सोते हुए किसी को डस ना ले। यह सोचकर वह संदूक के पास गई और डरतेडरते उसने संदूक हटाया। मगर नाग वहां मौजूद ना था। जमीन में कोई बिल या सुराख भी ना था। यह देखकर वह और भी सहम गई कि या अल्लाह यह क्या माजरा है? यह कोई जिन था या बला थी। अगर नाक होता तो यहीं रहता।

डरी डरी सहमीसहमी कमरे से बाहर आई। इधर दर्जे की बीवी सबको बुरा भला कहती दरवाजे से बाहर निकल गई। आयशा बोली देखो दूध ठंडा हो जाएगा। थोड़ा सा अम्मा को भी दे दो। लैला ने असल बात छुपाते हुए कहा दूध तो मैं पी गई। अम्मा के लिए कल अब्बा और ले आएंगे। आयशा बोली तुमने दूध से पेट ही भर लिया। उसकी मां ने टोकते हुए कहा बेटी क्यों ना कहो बेचारी ने ना जाने कितने अरसे बाद दूध पिया है। अगर सारा पी लिया तो क्या हुआ। लैला ने और कुछ ना कहा।

वो दिल में यह सोचती रही कि अगर मैंने सबको यह बता दिया कि संदूक के पीछे एक नाक है तो सब डर जाएंगे और कमरे में एक भी ना सोएगा। अगर मैं खामोश रहूं तो कहीं ना किसी को दस ना ले। मगर वह डसेगा तो नहीं। मैंने उसे बहुत सारा दूध पिला दिया है। वो तो खूब गहरी नींद सोएगा। मगर कल क्या होगा? वो फिर दूध पीने आ गया तो उसे कहां से पिलाऊंगी? घर में हर रोज तो दूध नहीं आता। खैर कल की फिक्र आज क्यों करूं? अल्लाह निगाहवान है।

वो सब मामूल के मुताबिक रात को उसी कमरे में सो गए। लैला की कई बार आंख खुली और वह हर बार कभी फर्श को देखती और कभी सबको। सुबह भी सबसे पहले उसकी आंख खुली। हालांकि हर रोज वह देर में बेदार होती थी। वो बिस्तर से उठने लगी तो उसकी पसलियों से कोई सख्त चीज लगी। वो घबरा कर बैठ गई और फिर उसने देखा कि बिस्तर में चमकती अशरफियां बिखरी पड़ी हैं। उन्हें देखकर उसकी आंखें भी चमकने लगी। उसने देखा कि आयशा अम्मा मुर अब्बा बेखबर सो रहे हैं। तो उसने सारी अशरफियां उठाकर अपने कपड़ों की गठरी में बांध दी और दिल में कहने लगी। वो नाग असल में कोई और है और उसके बारे में किसी को बताना ना चाहिए।

सुबह को उसने एक अशरफी अपने अब्बा को देते हुए कहा, अब्बा इसके तो चांदी के बहुत से सिक्के आ जाएंगे। आप इसे अपने पास रख लीजिए और मुझे एक शेर दूध हर रोज ले दिया कीजिए। अब्बा ने गौर से अशरफी देखते हुए कहा बेटी यह कहां से मिली तुम्हें? लैला बोली अल्लाह ने घर बैठे ही दी है। कमरे में से मिली थी। लकड़हारा कहने लगा अगर कमरे में से मिली है तो जरूर खुदा ने अपना करम किया है और यह उस फकीर की दुआ का असर मालूम होता है।

इधर अमीर और उसके दूसरे साथियों को काजी ने छ महीने की कैद का हुक्म सुनाया और सबको जेल भेज दिया। दर्जी और उसके अजीज रिश्तेदार इस हुक्म को सुनकर अपने आंसू ना रोक सके। इन सब ने काजी की मुन्नत समझाई। उसके सामने हाथ जोड़े और कसमें खाकर कहा कि अमीर आजिंदर जुआ खेलेगा। मगर काजी का फैसला अटल होता है। उसने उनकी एक ना सुनी और उनसे कहा अगर तुम लोग फौरन अदालत के कमरे से ना जाओगे तो हम अमीर की सजा में और इजाफा कर देंगे। आखिर वो सब मजबूर होकर अदालत से बाहर निकले और रोतेपीटते बस्ती की जानिब चल दिए।

अपने इलाके में दाखिल होते ही दर्जी ने दूर से देखा कि उसके मकान के करीब बादशाह के चार पांच चौबदार टहल रहे थे और एक तरफ उनके घोड़े खड़े हैं। पास ही एक खूबसूरत पालकी रखी है और उसके आठ कहार उजली वर्दियां पहने खड़े हैं। दर्जी ठहर गया और अपने साथियों से कहने लगा काजी ने अमीर को तो जेल भेज दिया है और यह चौपदार जरूर मुझे गिरफ्तार करने आए हैं। इसलिए मैं तो आगे ना जाऊंगा। एक शख्स ने कहा जुआ खेलना हकीकत में बहुत बुरा है। तुमको चाहिए था कि बेटे की रोकथाम करते। अगर वह ना मानता तो उसे घर से निकाल देते। आज जो बदनामी हुई है और दिल को जो सदमा पहुंचा है उससे बचते। अब वापस चलो और कहीं छिप रहो। जब यह लोग चले जाएंगे तब अपने घर जाना।

दर्जी और उसके साथी करीब एक अस्तबल में छिप गए और चोपदार की वापसी का इंतजार करने लगे। करीब आधा घंटा के बाद लकड़हारे के घर का दरवाजा खुला और लकड़हारा जरा बरकी लिबास पहने घर से बाहर आया। चोपदार और कहारों ने अदब से झुककर सलाम किया। फिर उसे पालकी में बिठाया और कहारों ने आहिस्ता से पालकी उठाई। फिर एक-एक चोपदार घोड़े पर सवार होकर पालकी के दाई और बाई एक चोपदार आगे और दो पालकी के पीछे हुए और बड़ी शान से लकड़हारे को लेकर वहां से चल पड़े।

दर्जी और उसके साथी बहुत हैरान हुए कि आखिर लकड़हारे ने ऐसा कौन सा कारनामा अंजाम दिया है जो बादशाह ने उसे इतनी इज्जत के साथ तलब किया है। मगर वो क्या समझते? बातें बनाते अस्तबल से निकल कर बाहर आ गए। दर्जी ने घर पहुंचकर बीवी से पूछा, तुझे कुछ मालूम भी है कि उस बूढ़े को चोपदार क्यों ले गए हैं? उसने जवाब दिया। वो कहने लगी, नहीं बस यह मालूम हुआ है कि बादशाह ने एक जोड़ा कपड़ों का भेजा है और कहा है कि इसे पहनकर मेरे पास आओ। वो चला गया है। उसकी बीवी और बेटियां बहुत परेशान है और सर पकड़े बैठी हैं।

दर्जी ने कहा, खाक डालो। हो गई होगी कोई बात। फिर उसने बैठकर उसे सुनाया कि काजी ने अमीर को 6 महीने के लिए जेल भेज दिया है और उसके सारे साथियों को भी ऐसी ही सजा मिली है। दर्जी की बीवी रोने और सीन्हा पीटने लगी। दर्जी ने कहा, अब यह रोने पीटना फाजिल है। अगर उसकी हिमायत में ना बोलती, तो मैं उसकी आदत छुड़ा देता और आज वह जेल ना जाता। उसकी बीवी बोली, अरे तुम क्या उसकी आदत छुड़ाते? जेल जाने से तो बचा ना सकते। अगर तुम्हारी जगह में होती तो देख लेती कि वो नामर्द काजी उसे कैसे सजा देता।

इधर चोपदार गरीब लकड़हारे को महल में ले गए। वहां बादशाह उसका इंतजार कर रहा था। उसे देखते ही बादशाह मुस्कुराया और उसे सलाम करके खूबसूरत तख्त पर बिठाया। फिर खादिमगारों को इशारा किया कि वो नाश्ता का सामान ले आए। लकड़हारे ने डरते डरते कहा हुजूर की उम्र दराज हो। क्या मैं पूछ सकता हूं कि आखिर मुझे यह इज्जत क्यों बखश दी गई है? मैं तो बेहद गरीब और मफलस और बेरोजगार आदमी हूं।

नमरो बादशाह ने मुस्कुराते हुए कहा, "मेरे नजदीक आपका रुतबा बहुत बड़ा है। आप फिक्र ना कीजिए। मैं अभी अर्ज करता हूं। खादिमगार सोने के कई थालों में किस्म के हलवे, फल और रस ले आए और लकड़हारे के सामने सलीके से सजा दी। बादशाह ने कहा बिस्मिल्लाह कीजिए। वो बोला मैं इसके लायक कहां हूं? बादशाह सलामत। वो कहने लगा आप कुछ ना सोचिए यह सब कुछ आपका है। लकड़हारे ने थोड़ा सा हलवा उठाकर मुंह में रखा और दिल ही दिल में खुदा का शुक्र अदा करने लगा कि ए मेरे मौला हकीकत में तो बड़ी शान वाला है। तू चाहे तो जर्रा को आफताब बना दे।

नाश्ता करने के बादशाह कहने लगा आपने मुझे नहीं पहचाना। मैं अक्सर भेष बदलकर अपनी राय का हाल मालूम करने जाता हूं। आपके दरवाजे पर दो मर्तबा जा चुका हूं। एक मामूली फकीर के भेष में। एक मर्तबा स्याह दाढ़ी लगाकर गया था और दूसरी मर्तबा सफेद दाढ़ी वाला। देखकर मुझसे कहा भी था कि पहले तो आपकी दाढ़ी के सारे बाल स्याह थे। मगर अब आप सफेद हैं। लकड़हारे की आंखें चमकने लगी। मगर उसने जुबान से कुछ ना कहा।

फिर बादशाह से कहने लगा। मुझे उस रोज यह देखकर बहुत खुशी हासिल हुई थी कि आपकी साहिबजादी ने पानी गर्म करके मेरे पांव धोए मगर पर्दा ना उठाया। हालांकि फकीरों से तो कोई भी पर्दा नहीं करता। लकड़हारा बोला फकीर और बादशाह की तो कोई बात नहीं। हर गैरमर्द से पर्दा करना लाजमी है। बादशाह ने कहा अगर मैं यह कहूं कि आपकी साहिबजादी इस महल को उसने इतना ही कहा था कि लकड़हारा बोला। मैं आपका मतलब समझ गया हूं। मगर अर्ज यह है कि वह एक गरीब की बेटी है। वो महल के आदाब से वाकिफ नहीं है। वो यहां आकर आपको कैसे खुश रख सकेगी? बादशाह बोला, "यह कोई खास बात नहीं है। यहां रहकर सब कुछ समझ में आ जाएगा।" लकड़हारे ने थोड़ी देर सोचने के बाद उसे जबान दे दी।

बादशाह बहुत खुश हुआ और उसने 40 थाल तहफे 40 गुलामों के सर पर रखवाकर लकड़हारे के हमराह कर दिए। लकड़हारे की बीवी आयशा और लैला तीनों दरवाजे में खड़ी उसकी वापसी का इंतजार कर रही थी। उन्होंने जैसे ही उसे शानो शौकत के साथ आता देखा तो उनकी खुशियों का ठिकाना ना रहा। मगर उमर, दर्जी और मोहल्ले के दूसरे लोग हैरान थे कि यह आखिर क्या माजरा है। बादशाह इस गरीब पर क्यों मेहरबान हुआ है और उसकी किस खिदमत के सिले में उसे इतनी इज्जत बखश दी है।

शहर से बाहर कारवा सराय में एक साहूकार ठहरा हुआ था। वो बहुत खूबसूरत और खुश लिबास था। उसने शहर के मगरिब में जमीन खरीदी थी और उस पर आलीशान मकान बनवा रहा था। वो कारवा सराय में रहने से खुश ना था। वो चाहता था कि उसका मकान बहुत जल्द तामीर हो जाए। इसीलिए उसने सैकड़ों मजदूर मुकर्रर कर रखे थे। जो दिन और रात मकान बनाने में मशगूल थे। मकान का नक्शा ऐसा उम्दा था कि जब मकान बनकर तैयार हुआ तो लोगों ने बादशाह से कहा मेहर साहूकार के आलीशान मकान के मुकाबले में इस शहर की कोई भी इमारत खूबसूरत नहीं है।

बादशाह को भी देखने का शौक हुआ और उसने एक वजीर को मेहर साहूकार के पास यह पेशकश लेकर भेजा कि हम आपके खूबसूरत मकान को देखने वाले खुशनसीब में शामिल होने की ख्वाहिश रखते हैं। मेहर साहूकार ने वजीर को जवाब दिया हमसे इजाजत तलब करके हमें शाह ने शर्मिंदा किया है। यह मुल्क यह मकान और यह गुलाम सब कुछ बादशाह का है। वो जब चाहे अपने कदमों से इसको इज्जत बखश सकते हैं। बादशाह इस जवाब से बहुत खुश हुआ और वो दूसरे दिन एक सोने के संदूक में हार और कुछ हीरे लेकर उसका मकान देखने गया। उसने बादशाह का इस्तकबाल किया और सारे मकान की सैर कराने के बाद नजर आने के तौर पर हाथी दांत की एक संदूक पेश की जिसमें पांच ऐसे जोहरात थे जो बादशाह के लिए बिल्कुल नए थे। वो इसे लेकर बहुत खुश हुआ और उसे कहा आप कभी कभार मेरे पास तशरीफन लाया करें।

मेहर साहूकार दूसरे तीसरा दिन बादशाह के पास जाने लगा। बातोंबातों में बादशाह ने मालूम कर लिया कि मेहर कुनवारा है और एक ऐसी लड़की की तलाश में है जो गरीब घराने की हो, पर्दे वाली हो और उसमें गुरूर ना हो। बादशाह को फौरन ही ख्याल आया कि गरीब लकड़हारे की दो बेटियां हैं। उनमें से बड़ी बेटी का रिश्ता मुझसे मंजूर कर लिया है। छोटी लड़की का ब्याह इस साहूकार से क्यों ना कर दिया जाए। इस ख्याल के आने ही बादशाह ने मेहर से गरीब लकड़हारे और उसकी बेटियों के बारे में जिक्र किया तो वह फौरन ही राजी हो गया और कहने लगा मैं आपकी तजवीज से बहुत खुश हूं। फिर बादशाह ने लकड़हारे को बताया कि छोटी लड़की का रिश्ता मेहर साहूकार से बहुत अच्छा रहेगा। वो कहने लगा हमारी तो गुजर चूकी है। ना जाने कब हमारी आंखें बंद हो जाए। लकड़हारे को फिक्र थी तो दोनों बेटियों की थी। सो वह भी खुदा के करम से दूर हो गई। कहने लगा मेरी तो यह दुआ है कि यह दोनों खुश रह और इज्जत के साथ रहें।

गज्ता थोड़े दिनों के बाद आयशा और लैला दोनों बहनों का ब्याह बड़ी धूमधाम से हो गया। आयशा महल में चली गई और लैला मेहर साहूकार के आलीशान मकान में लकड़हारे और उसकी बीवी की खिदमत के लिए दो गुलाम और दो बंदिया बादशाह ने मुकर्रर कर दी और वजीफा भी बांध दिया। इस तरह उनकी मुसीबत के दिन फिर गए और बस्ती की सारी औरतें और मर्द उनकी इज्जत करने लगे।

दर्जी तो जैसे गुलाम हो गया था। वो एक रोज अपने बेटे अमीर के बारे में लकड़हारे से कहने लगा, आपके एक इशारे पर वो रिहा हो जाएगा। मैं आपसे वादा करता हूं कि वह कभी जो आना खेलेगा और अगर आप उसकी शिकायत सुने तो उसे फांसी के तख्ते पर चढ़ दीजिएगा। लकड़हारे को उसके हाल पर तरस आ गया और उसने बादशाह से कहकर अमीर को आजाद करवा दिया। अमीर के आजाद होते ही दर्जी के घर में घी के चिराग जलने इधर बादशाह की पहली बीवी मल्लिका जरा बहुत उदास हो गई थी। पहले उसे कभी ख्याल भी ना आया था कि बादशाह दूसरा ब्याह करेगा। वो तो समझती थी कि बादशाह को मेरे सिवा किसी से मोहब्बत नहीं है। और वो तो यूं भी इंसाफ पसंद है। वो दूसरा ब्याह करके मेरे दिल को क्यों सदमा पहुंचाएगा। मगर जब अचानक उसने दूसरा ब्याह कर लिया तो वह खुद को एक कनीज से भी ज्यादा हकीर समझने लगी। उसने उम्दा पोशाक पहनना और बनाव संवार करना छोड़ दिया और सारा सारा दिन अपने कमरे में खामोश बैठी रहती। पर तल्खानों की जगह सादा गजा इस्तेमाल में लाने लगी।

बादशाह अग्रच पहले की तरह उसका ख्याल रखता था। मगर फिर भी उसके चेहरे पर उदासी छाई रहती। आखिर एक दिन उसने अपने आप से कहा, मैं इस तरह कब तक गुस्सा खाकर अपना खून पीती रहूंगी? बादशाह पर तो कोई असर ना होगा। मैं ऐसी तदबीर क्यों ना करूं जो बादशाह को आयशा से नफरत हो जाए और वो उसे महल से निकालकर फिर उसी गंदी और कंघी की बस्ती में फेंक दे। उसने दो कनीजों को अपना हमराह बना लिया और उन्हें सिखाकर आयशा के पास भेजने लगी। वो दोनों कनी आयशा को ऐसे सबक पढ़ाती कि वो बादशाह की नजर से गिर जाए। मगर वो बहुत अक्लमंद थी। वो उनकी बातें सुनकर सोचती कि इन बातों की ख्वाहिश बादशाह ने तो कभी ना की। फिर मुझे क्या जरूरत है जो मैं ऐसी बातें करूं। वह कनीजों से सुनी हुई बातें अनसुनी कर देती।

मलिका जारा ने जब देखा कि यह तदबीर कामयाब ना हुई तो उसने एक रोज एक गुलाम को 100 अशरफियों से भरी थैली दी और उसके कान में कुछ कहकर उसे रुखसत कर दिया। गुलाम थैली बगल में छुपाए उस वक्त महल से निकलने लगा जबकि बादशाह महल में दाखिल हो रहा था। उसने गुलाम को थैली छुपाए देख लिया और उससे कहने लगा यह थैली किसने दी है और इसे कहां ले जा रहे हो? गुलाम ने अर्ज की जहां अपना यह थैली छोटी मलिका ने दी है यानी आयशा ने और हुक्म फरमाया है कि मैं उनके वालिद साहब को दे आऊं। बादशाह ने उसके हाथ से थैली छीन ली और आयशा के कमरे में जाकर उससे बोला आयशा तुम एक गुलाम के हाथ ये थैली अपने अब्बा जान के पास भेज रही हो। कैसी बुरी बात है। उनके पास तो इज्जत के साथ हर चीज भेजनी चाहिए।

आयशा ने चौंक कर उसकी तरफ देखा और कहने लगी यह बिल्कुल गलत बात है। मैंने किसी गुलाम को कुछ नहीं दिया। बादशाह ने फौरन ही गुलाम को तलब किया और उससे कहा सच सच कहो यह थैली तुमको किसने दी है? अगर तुम झूठ बोले तो तुम्हारी गर्दन उड़ा दी जाएगी। गुलाम डर गया और उसी वक्त बादशाह के कदमों में गिर पड़ा और कहने लगा जहां अपना यह थैली छोटी मल्लिका ने दी थी। मैं झूठ हरगिज़ ना बोलता। बादशाह ने गुस्से में थैली एक तरफ फेंक दी और गुलाम से कहा तुम बाहर जाओ। गुलाम के जाते ही आयशा बोली, "यह बात मेरे ख्वाबो ख्याल में भी ना थी। कि शाही महल के अदना गुलाम भी झूठ बोलते हैं। बादशाह ने उसकी किसी बात का जवाब ना दिया और बिस्तर में लेट गया। वो हैरान था और सोच रहा था कि असल बात क्या है मगर कुछ समझ में ना आता था।

मेहर साहूकार के पास दौलत की कमी ना थी। हीरे जहरात ऐसे थे कि बादशाह को भी नसीब ना थे। इसलिए लैला भी किसी मल्लिका से कम दर्जे की जिंदगी बसर ना कर रही थी। वो बहुत आराम में थी और खुश थी। वो कभी कबभार अपनी बड़ी बहन से मिलने महल चली जाती थी और हर मर्तबा एक ना एक अनोखी और कीमती चीज तहफे में देकर आती थी। बादशाह इन चीजों को देखकर हैरान रह जाता अगर चाहे वो भी अनमोल हार जवर और हीरे उसे देता था मगर उसके तहफे के सामने उनकी कोई हकीकत ना थी। आखिर उसने मजबूर होकर पांच छह आदमी दूसरे मुल्कों में भेजे और वहां से अजीबोगरीब चीजें मंगवा कर रख दी। उसने आयशा और जरा से उनका जिक्र ना किया मगर जरा को कनीज की। जबान से इल्म हो गया कि यह सारी चीजें दूसरे मुल्कों से मंगवाई गई है और वो समझ गई कि यह सामान लैला को खुश करने के लिए किया गया है।

उसने मौका पाकर जल्द रंग की संदूक जी कमरे से निकाल ली। उसमें खूबसूरत गुड़िया रखी थी। उसकी तारीफ यह थी कि जैसे ही संदूक जी खोली जाती। गुड़िया का वो हाथ जिसमें सोने की नाजुक और खूबसूरत अंगूठी थी। उस तरह आगे बढ़ाती जैसे वह संदूक जी खोलने वाले को पेश कर रही है। चारा ने वह खूबसूरत और कीमती अंगूठी तो अपने पास रख ली और उसकी जगह सोने की एक मामूली सी अंगूठी रख दी। फिर एक कनीज को यह संदूक जी देकर लैला के पास भेज दिया। कनीज ने लैला से कहा आपकी हमराह साहिबा ने संदूक जी इस पेशकश के साथ भेजी है कि आप जब तशरीफ लाए तो बादशाह सलामत के सामने मुझे यह संदूक जी तहफे में पेश करें और वह थोड़ी देर बैठकर वापस चली गई।

लैला ने वह संदूक जी मेहर साहूकार को दिखाई और कनीज की कही हुई बात दोहराई तो वह कहने लगा मुझे यकीन ना आता कि तुम्हारी हमरा यह संदूक जी भेजकर हमारी बेइज्जती भी कर सकती है। यह उन्होंने हरगिज़ ना भेजी होगी। अमांग सोच लैला बोली मैं कल ही उनके पास जाऊंगी और उनसे पूछूंगी और सारी रात परेशान रही क्योंकि उसे भी आयशा से ऐसी उम्मीद ना थी। सुबह के बाद वो बिना तहफा लिए संदूक जी उठाकर महल में जा पहुंची। उस वक्त बादशाह भी आयशा के कमरे में मौजूद था। लैला ने सलाम करके आयशा से कहा, आप जान आपने कल यह संदूक जी कनीज के हाथ क्यों भेजी थी? आयशा बोली, नहीं बहन, मैंने यह संदूक जी हरगिज़ ना भेजी। बिल्कुल मैंने तो इसे कभी देखा भी ना है।

बादशाह ने फौरन ही संदूक हाथ में लेकर उसे देखा। फिर खोला। अंगूठी बदल चुकी थी। उसे बहुत गुस्सा आया। और उसने फौरन ही सारी कनीजों को तलब कर लिया और लैला से कहा, "तुम इनमें से पहचानो कि कौन तुम्हारे पास गई लैला ने फौरन ही उसे पहचान लिया और कहने लगी हां यह वो कनीज है। बादशाह ने नरगिस कनीज को करीब बुलाया और कहा सच-सच कहो तुमको यह संदूक किसने दी थी? अगर तुमने झूठ बोला तो याद रखो जिंदगी भर कैद में रहोगी। नरगिस ने हाथ बांधकर अर्ज की जहां पनाह मुझे अपनी जिंदगी अजीज है। मैं हरगिज़ झूठ ना बोलूंगी। यह संदूक जी मुझे छोटी मल्लिका ने दी यानी आयशा ने और फरमाया था कि मैं उनकी बहन को पहुंचा दूं और पेशकश दूं कि जब तुम आओ तो बादशाह सलामत के सामने मुझे यह संदूक जी तहफे में पेश करना।

बादशाह ने गुस्सा भरी नजरों से आयशा की तरफ देखा तो वो बोली यह झूठ बोलती है। मैंने उसकी शक्ल भी ना देखी। बादशाह ने कनीज को रुखसत कर दिया और कहने लगा मैं हैरान हूं कि दो दमड़ी की कनीज मेरे सामने झूठ बोलने की कैसे जुर्रत कर सकती है? आयशा बोली इसका मतलब है कि मैंने आपसे झूठ बोला है। अब इंसाफ सिवाय खुदा के तो कोई नहीं कर सकता। हम दोनों बहनों ने झूठ मकर और फरेब से हमेशा दूर रहने की कोशिश की है। उसी वक्त दो कनी दौड़ती आई और हाथ बांधकर कहने लगी बादशाह सलामत एक बहुत बड़ा नाग नरगिस को लपट गया है। खुदा का वास्ता उसे बचाइए। लैला बोली खुदा ने उसे झूठ बोलने की सजा दी है।

बादशाह लैला और आयशा उठकर दालान में आए। वहां सारी कनीज़ें गुलाम और वजीर खड़े थे और नरगिस फर्श पर आंखें फाड़े पड़ी थी और सांप ने उसकी कमर को जकड़ रखा था। बादशाह ने वजीर आदम से कहा, "इसे कौन छुड़ा सकता है?" उसने जवाब दिया, "यह बहुत मुश्किल काम है।" नरगिस जिंदा ना बचेगी। फिर लैला ने कनीज की तरफ देखते हुए कहा, "अभी सच बोलो। किसने संदूक जी दी थी? वो सूखे हल्के से आवाजें निकालते हुए बोली, वो संदूक जी बड़ी मलिका ने दी थी। नाग ने उसी वक्त बिल खोल दिए और उसे छोड़कर फर्श पर आ गया। लोगों ने उसके जाने के लिए रास्ता छोड़ दिया। मगर वो उस गुलाम की जानिब रेंगने लगा जो अशरफियों से भरी थैली लेकर चला था। गुलाम ने जब देखा कि उसकी बारी आ गई है तो वो चिल्लाने लगा। बादशाह सलामत छोटी मल्लिका यानी आयशा यह बिल्कुल बेकसूर है। वो थैली मुझे बड़ी मल्लिका ने दी थी।

नाग ने फौरन ही रुख बदल लिया और बड़ी तेजी से मल्लिका झरा के कमरे में दाखिल हो गया। सब लोग उसकी तरफ दौड़े मगर उनके पहुंचने से पहले ही नाग मल्लिका को डस कर गायब हो गया। मल्लिका फर्श पर पड़ी पड़ी तड़प रही थी। वो चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगी मैंने हसद और जलन में यह सब कुछ किया था। हाय कितनी जल्दी मुझे अपने अमल की सजा मिल गई। आयशा मुझे माफ कर दो ताकि खुदा भी मुझे माफ कर दे। आयशा ने कहा बहन मुझे कोई शिकायत नहीं। मैंने सब कुछ माफ कर दिया। और मलिका कुछ लम्हों के बाद वह सब कुछ छोड़कर दूसरे जहान की तरफ चली गई। उस वक्त हर शख्स का दिल धड़क रहा था और हर एक तौबा कर रहा था कि मैं मरते दम तक झूठ ना बोलूंगा। किसी के बहकावे में ना आऊंगा और सच की खातिर हर कीमती चीज को ठुकरा दूंगा।

लैला ने घर वापस जाकर अपने शौहर मेहर साहूकार को सारा वाकया सुनाया तो वह हंसने लगा। लैला बोली इसमें हंसने की कौन सी बात है? वह कहने लगा एक नाग तो तुमको भी तो अशरफियाओं देता था और तुम उसे हर शाम दूध पिलाती थी। लैला चौंक कर बोली आपको कैसे मालूम हुआ? यह बात तो मेरे घर में किसी को मालूम ना थी। वो मुस्कुराते हुए कहने लगा वो असल में एक जिन है और मेरा मेहरबान दोस्त है। मैंने उससे जिक्र किया कि मैंने दौलत तो बहुत कमाई है। अब ब्याह करने की फिक्र है। अगर तुम कोई खूबसूरत और नेक सिरत लड़की तलाश कर दो तो तुम्हारा यह सुलूक कभी ना भूलूंगा। उसने कुछ रोज के बाद तुम्हें पसंद किया। और मुझे बता दिया। मैंने ही उससे कहा था कि अशरफिया उस तक पहुंचा दो। उस वक्त भी तुम्हारे पीछेछे मैंने उसी को महल में भेजा था। वो यह बात सुनकर दंग रह गई। दूसरे दिन उसने महल में जाकर आयशा को चुपके से यह राज की बात बताई तो हैरत से उसका मुंह खुला का खुला रह गया।

इस वाक्य के बाद दोनों बहनें सुकून और इज्जत की जिंदगी बसर करने लगी। हम्म [संगीत]