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Dhobi Ki Beti Aur Rajkumar Ki Ajeeb Kahani || Moral Stories in Urdu & Hindi

VibeElevate24:06

Transcription

बगदाद शहर की बहुत पुरानी बात है। जहां एक सुल्तान रहता था जो बहुत रहम दिल और इंसाफ पसंद था। उसके सल्तनत में लोग बहुत खुश थे। शेर और बकरी एक साथ पानी पीते थे। हर तरफ सुकून था।

सुल्तान का एक ही बेटा था जिसका नाम शहजादा था। वह बहुत अक्लमंद, नेक और हर काम में माहिर था। मगर बहुत ज्यादा लाड प्यार ने उसे जिद्दी बना दिया था। जिस चीज को पाने की ठान लेता, उसे पाकर ही दम लेता।

एक दिन शहजादा शिकार से लौट रहा था। सिपाही और दूसरे शिकारी पीछे रह गए थे। शहजादा घोड़े पर सवार होकर बहुत आगे निकल आया। उसे बहुत प्यास लगी थी। उसने चारों तरफ देखा तो पता चला कि यह धोबियों का मोहल्ला था। हर जगह कपड़े धोए और सुखाए जा रहे थे।

अचानक शहजादा की नजर एक घर पर पड़ी। छत पर एक लड़की अपने बाल सुखा रही थी। शहजादा उसे देखता ही रह गया। उसने इतनी खूबसूरत लड़की पहले कभी ना देखी थी। ऐसा लग रहा था मानो उसके काले लंबे बालों के बीच चांद जैसा चेहरा चमक रहा हो। लड़की की नजर भी शहजादा पर पड़ी और वह फौरन दुपट्टे से खुद को ढांप कर नीचे उतर गई।

शहजादा जैसे होश में आया। उसी वक्त उसके साथी और नौकर भी वहां आ गए और शहजादा को मजबूरन महल वापस आना पड़ा। उसकी आंखों से वह सुंदर सूरत हट ना रही थी। उसने अपने खास नौकरों को भेजकर पता करवाया तो मालूम हुआ कि वह हसन धोबी का घर था और वह हसन धोबी की लड़की थी। शहजादा जिद और गुस्से से बिस्तर पर पड़ गया कि वह उसी लड़की से शादी करेगा वरना अपनी जान दे देगा।

तीन हफ्ते बीत गए। सुल्तान को यह बात पता चली तो वह सोच में पड़ गया। वह शहजादा की ज़िद से वाकिफ था। उसने गरीब के मुअज्जिन उमर शेख को बुलाकर मशवरा लिया। मुअजिन बहुत अक्लमंद, वफादार और तजुर्बेकार आदमी था।

उसने मशवरा दिया, "इस वक्त उसे रोकना ठीक नहीं। आप शहजादा को मनमानी करने दीजिए। जवानी की जिद है। दो दिन हसन धोबी की बेटी के साथ रहेगा तो अकल ठीक ठिकाने आ जाएगी। फिर आप शौक से किसी शहजादी से शादी करवा देंगे। वैसे भी सुल्तानों की तो कई रानियां होती हैं। यह भी एक कोने में पड़ी रहेगी।"

सुल्तान को यह बात समझ आ गई। उसने शहजादा को बुलाया और कहा, "हम तुम्हारी जिद और ख्वाहिश को देखते हुए तुम्हें इजाजत देते हैं। तुम इस लड़की से शादी कर सकते हो।"

सुल्तान ने हसन धोबी और उसकी बीवी को बुलाया। वह डरते कांपते आए। सोच रहे थे कि ना जाने क्या गलती हो गई है कि शहजादा ने उन्हें बुलाया है। शहजादा ने उनसे कहा, "हम तुम्हारी बेटी से शादी करना चाहते हैं। फौरन तैयारी करो।"

शहजादा ने सोचा था कि धोबी और धोबिन खुशी से समा ना पाएंगे और शहजादा के पांव पकड़ लेंगे कि उन्होंने उन्हें इतना इज्जत दिया। मगर ऐसा कुछ ना हुआ। इसके बावजूद वह दोनों सोच में पड़ गए। फिर बोले, "शहजादा यह तो हमारी खुशनसीबी है कि आपने ऐसा इरादा किया। मगर हम अपनी बेटी से पूछकर जवाब देंगे।"

शहजादा ने यह सुना तो उसे बड़ा गुस्सा आया कि एक तो वह इस धोबी का इज्जत कर रहा है। इस गरीब की बेटी से शादी कर रहा है और यह उसकी सल्तनत का मामूली धोबी कह रहा है कि बेटी से पूछ कर बताएंगे। मगर उसके दिल का मसला था। उसे इस लड़की से प्यार हो गया था। इसलिए धोबी की बात बर्दाश्त कर गया। उसने धोबी से साफ कह दिया, "हमें इनकार सुनने की आदत नहीं। इनकार करने पर मैं तुम्हारे पूरे खानदान को जेल में डाल दूंगा।"

वह दोनों धोबी और उसकी बीवी जैसे डरते कांपते आए थे वैसे ही चले गए। घर पहुंचकर उन्होंने अपनी लड़की से कहा, "शहजादा तुमसे शादी करना चाहते हैं। अगर तुमने मना किया तो हम जान से हाथ धो बैठेंगे।" लड़की कहने लगी, "ठीक है, मैं राजी हूं। मगर शहजादा से कहिएगा कि मेरी चार शर्तें हैं। खुद आकर सुन लें। अगर मंजूर हो तो बारात लेकर आ जाइए।"

अगले दिन हसन धोबी शहजादा के महल गया और लड़की का पैगाम पहुंचा दिया। उसके मन में डर था कि कहीं शहजादा गुस्से में आकर उसका सिर धड़ से अलग ना कर दे। धोबी की बेटी और इतनी हिम्मत कि शहजादा के सामने शर्तें रखे। शहजादा पहले तो यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। उसका दिल चाहा कि तलवार से धोबी को खत्म कर दे। मगर फिर एक तो उसे प्यार था। दूसरा उसे तजुर्बा हुआ कि देखें यह धोबी की लड़की क्या-क्या शर्तें रखती है।

शहजादा वहीं धोबी के साथ उसके घर पहुंचा। दो कमरों का मकान था। नीचे धोबी और उसकी मां और बीवी रहते थे और ऊपर की मंजिल पर लड़की रहती थी। शहजादा पहुंचे तो नीचे कमरे में एक तरफ पर्दा डालकर लड़की बैठ गई और कहने लगी, "मेरी चारों शर्तें अगर आपको मंजूर है तो मैं आपसे शादी करने को तैयार हूं।"

"पहली शर्त यह है कि मैं आपके महल में रात ना गुजारूंगी। सुबह जाऊंगी और शाम को वापस अपने घर आ जाऊंगी।" शहजादा ने सोचा, "यह क्या बात हुई? यह कैसी अजीब शर्त है?" मगर फिर ख्याल आया कि यह सब कहने की बातें हैं। एक बार शादी हो गई तो महल छोड़कर झोपड़ी में वापस कौन आता है? शहजादा कहने लगा, "मंजूर है। तुम दूसरी शर्त बताओ।"

लड़की ने कहा, "दूसरी शर्त यह कि आप मुझे छूने या बात करने की कोशिश ना करेंगे।" शहजादा को यह सुनकर हंसी आ गई। "शादी है या मजाक?" उसने सोचा, "सब कुछ हो जाए बाद में देख लूंगा।" कहने लगा, "चलो यह भी मंजूर है।"

लड़की ने कहा, "मैं आपके महल का पानी तक ना पऊंगी।" शहजादा ने सोचा, "यह भी बकवास है। जब दिन भर रहेगी तो कैसे मुमकिन है कि खाए और ना पिए।" उसने जवाब दिया, "मुझे यह भी मंजूर है।"

लड़की फिर कहने लगी, "मेरी चौथी। अगर आपने मुझे उंगली से भी छूने की कोशिश की तो हमारा रिश्ता खत्म। फिर मैं कभी वापस ना आऊंगी।" शहजादा ने सोचा, "यह बड़ी अजीब लड़की है। कैसी बदतमीज है। एक बार शादी हो जाए तो सारी शर्तें धरी की धरी रह जाएंगी।" उसने कहा, "मुझे तुम्हारी सारी शर्तें मंजूर हैं।" लड़की ने कहा, "अगर आपको शर्तें मंजूर हैं, तो फिर आप बारात ले आइए।"

लड़की नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से धोबी किसी मुसीबत में पड़े। शहजादा दो-चार दोस्तों को साथ लेकर उसे बहाने चला गया और फेरे पड़वाकर दुल्हन को महल में ले आया। बहू ने साड़ी पहन रखी थी और बड़ा सा घूंघट निकाल रखा था जिसमें उसका चेहरा बिल्कुल छुप गया था। पता ही ना चल रहा था कि नई बहू बनकर महल में आई है।

सुल्तान और सुल्ताना तो वैसे भी शामिल ना हुए थे। बस एक शहजादा की खास दासी थी। वही हाथ बांधे खड़ी रही कि कोई हुक्म हो तो पूरा कर दे। शाम हुई तो दासी ने आकर बताया कि गाड़ी लग गई है। बहू उठी और सीधी गाड़ी में जाकर बैठ गई। अगले दिन सुबह उन्हीं कपड़ों में इसी तरह लिपटी हुई आई और उसी कुर्सी पर बैठ गई। दिन भर ना कुछ खाया ना पिया ना हलचल पत्थर की मूर्ति की तरह बैठी रही और शाम को वापस चली गई।

एक दिन, दो दिन, तीन दिन, पूरे छ महीने हो गए। उसके रोज के काम में कोई फर्क ना आया। जैसा शहजादा ने सोचा था ऐसा कुछ भी ना हुआ और शहजादा अपनी शर्तों से बंधा हुआ था। जिस चेहरे को देखकर उसने अपनी नींद और चैन त्याग दिया था उस चेहरे की एक झलक तक देखने को ना मिली। दरबार में लोग अलग-अलग बातें बनाने लगे। सुल्तान सुल्ताना सब परेशान हो गए।

एक दिन उसने हसन धोबी को बुलाया और कहा, "तुम अपनी बेटी को समझाते क्यों नहीं? अब वह हमारी रानी है। उसे महल में रहना चाहिए। इस तरह रोज रात को चले जाना अच्छा ना लगता। लोग बातें बनाते हैं।" धोबी हाथ जोड़कर बोला, "शहजादा की जीत सच्ची बात यह है कि वह हमारी बेटी है ही नहीं। एक दिन हमारे घर पर आई और बोली, 'इस दुनिया में मेरा कोई नहीं।' मुझे अपनी बेटी बनाकर अपने घर में रख लो। हमारी कोई औलाद ना थी। मेरी बीवी को उसकी सुंदर सूरत भाई, हमने उसे घर में रखा। हमारे घर में ऊपर रहने लगी। हमसे उसने उसके बाद कोई वास्ता ही ना रखा। कहां खाती पीती है, क्या करती है, हम कुछ ना जानते। कभी कभार मेरी बीवी के पास आकर बैठ जाती है। उसे मां कहती है, वह बेचारी उसी में खुश रहती है। उसने हमें कसम दे रखी थी, तो हम चुप रह गए। जैसा उसने कहा, वैसा ही हमने किया। शहजादा, उस पर हमारा कोई जोर नहीं। आप हमारी जान बखश दें।"

धोबी चला गया और शहजादा अजीब सोच विचार में पड़ गया। करें तो क्या करें? उसका मन हर तरफ से उचट चुका था। आखिर एक दिन किसी को ना बताए महल से निकल पड़ा। बस अपनी विश्वास पात्र दासी को बताया कि वह जा रहा है। "पता ना कहां और पता ना कब वापस आऊंगा। मेरे वालिद या मेरे बारे में कोई पूछे तो कह देना कि सफर पर गए हैं और ठीक है।"

दासी का दिल शहजादा की हालत देखकर बहुत दुखता था। उसने भी सोचा, "चलो अच्छा है। कुछ दिनों इस झंझट से तो मुक्ति मिलेगी।" शहजादा का मन दुनिया से ही उठ चुका था। वह मालिया पहाड़ की तरफ निकल गया। महीनों इधर-उधर भटकता रहा। एक रात बर्फ से ढकी पहाड़ी पर रात गुजारने के लिए एक गुफा तलाश कर रहा था कि एक गुफा में कुछ रोशनी दिखाई दी।

डरते-डरते अंदर पहुंचा तो देखा एक बहुत बूढ़ा आदमी इबादत कर रहा है। उसकी आंखें बंद हैं। दाढ़ी और सिर के बाल बहुत ज्यादा बढ़े हुए हैं। पूरे जिस्म और पलकों तक पर खाक जमी है। एक चिराग जल रहा है जिसमें एक गज लंबी बत्ती जल चुकी है और एक गज अभी बाकी है। उन्हें देखकर शहजादा के दिल को बड़ा सुकून मिला। वह भी उनके कदमों के पास बैठ गया। मगर उन्होंने आंखें ना खोली। उन्होंने समाधि लगा रखी थी। उन्हें कुछ खबर ना थी। वह अल्लाह के जिक्र में डूबे हुए थे।

शहजादा वहीं रहने लगा। रोज सुबह उठकर झरने से पानी लाता। शेख जैन के हाथ-पांव धोता, बाल धोता, बालों में कंघी करता, गुफा की सफाई करता, नीचे वादी से जंगली पहल फूल तोड़कर लाता और उनसे अपना पेट भर लेता।

एक महीने के बाद शेख जैन ने आंखें खोली, तो शहजादा को सामने हाथ जोड़े बैठा पाया। शहजादा ने उन्हें पानी पिलाया। जंगली पहल फूल खिलाए। उनके हाथ-पांव दबाए। शेख जैन बोले, "बेटा तू शहजादा है। इस सूफी की कुटिया में तेरा क्या काम है?"

शहजादा यह सुनकर बोला, "मौलाना आप जानते हैं कि मैं सुल्तान का बेटा हूं। तो यह भी जानते होंगे कि मैं क्यों और किस लिए मारामारा फिर रहा हूं। मेरे मां-बाप मेरे लिए परेशान होंगे। मगर मेरा वापस जाने का मन ना चाहता।"

वह मौलाना बोले, "बेटा सूफियों से कुछ छुपा नहीं। तूने बड़ी गलती की जो इस लड़की से शादी की। मगर तूने हमारी इतनी दिनों खिदमत की है तो हम तुझे खाली हाथ ना भेजेंगे। ले यह रख ले। तू सबको देख सकेगा मगर तुझे कोई ना देख पाएगा। घर जा। घर जाए तो तू यह राख माथे पर लगाकर उसके साथ चले जाना। तुझे यह पता चल जाएगा कि वह कौन है और उसकी क्या मजबूरी है। हमारी दुआएं तेरे साथ हैं। तेरे मन की मुराद जरूर पूरी होगी।"

शेख जैन ने अपने चिराग की जली हुई बत्ती की राख उसे दी। जिसे शहजादा ने संभालकर कपड़े में बांध कर रख लिया और शेख को अलविदा कहकर चल दिया। कई दिन का सफर तय करने के बाद वापस महल में पहुंचा तो इस हाल में कि कपड़े फट गए थे। पांव में छाले पड़ गए थे और बहुत दुबला और कमजोर हो गया था।

कमरे में हसन धोबी की लड़की उसी तरह उन्हीं कपड़ों में कुर्सी पर बैठी थी। दासी शहजादा को देखकर बहुत खुश हुई। कहने लगी, "शहजादा कहां चले गए थे और यह क्या हाल बना लिया है? सुल्तान और सुल्ताना भी लगातार आपके बारे में पूछते रहते हैं। मैं यही कह देती कि आप सफर पर गए हैं और ठीक है।"

आज शहजादा बहुत खुश था। उसने गर्म पानी से गुस्सल किया। बाल कटवाए और पेट भरकर खाना खाया। उसने दासी से पूछा, "क्या यह मेरे पीछे भी रोज उसी तरह आती थी?" दासी ने बताया कि उसके रिवाज में कोई फर्क ना आया था। वह रोज उसी तरह आती थी। शहजादा ने कहा, "मैं बहुत थका हुआ हूं। अब सोऊंगा। मगर शाम को जब यह घर जाने लगे, तो मुझे जगा देना।"

शाम को जब हसन धोबी की लड़की के जाने का वक्त हुआ, तो उस दासी ने शहजादा को जगा दिया। शहजादा ने झट माथे पर सूफी मौलाना की दी हुई राख लगा ली और उसके साथ हो लिया।

अगले दिन सुबह-सुबह शहजादा वापस आए और दासी से बोला, "आज मैं उसी कमरे में सोऊंगा। जब वह हसन धोबी की लड़की आकर बैठ जाए तो तुम आकर मुझे जगाना और मुंह से पूछना कि दिन चढ़ गया है। मैं उठता क्यों ना हूं। मैं जो ना बताना चाहूं उसे भी जिद करके पूछना।" दासी समझदार थी। समझ गई कि शहजादा का क्या मतलब है।

जब हसन धोबी की लड़की आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गई तो दासी ने आकर शहजादा को जगाना शुरू किया। शहजादा पहले तो जागा ना। जब जागा तो दासी को डांटने लगा, "क्या मुसीबत आ गई है? ने क्यों जगा दिया मुझे? मैं इतना अच्छा ख्वाब देख रहा था। मेरा ख्वाब तोड़ दिया तूने।" दासी खुशामद करने लगी, "शहजादा बताइए।"

पहले तो शहजादा उसे टालता रहा। फिर बोला, "अच्छा अब तू इतनी जिद कर रही है तो बता दूं। मैंने ख्वाब में देखा कि कल रात जब यह हसन धोबी की लड़की उठकर यहां से गई तो मैं भी उसके साथ-साथ चला। यह गाड़ी में बैठी तो मैं भी साथ बैठ गया।" "सच थोड़ी। ख्वाब में मैं तो ख्वाब में उसके साथ गया था।" दासी ने फिर पूछा, "अच्छा तो फिर क्या हुआ?"

शहजादा कहने लगा, "फिर क्या हुआ? मैं जोर-जोर से घोड़ा गाड़ी हिला रहा था और यह गाड़ीवान को डांट रही थी कि आज यह कैसे गाड़ी चला रहे हो?" गाड़ीवान बेचारा बोला, "शहजादी, मैं तो रोज उसी तरह चलाता हूं।" "खैर, जैसे हसन धोबी का घर आ गया। यह हसन धोबी और धोबिन के पास तो ना सीधी छड़कर ऊपर पहुंच गई। मैं उसके साथ कमरे में आ गया। क्या साफा हुआ कमरा था। लगता ही ना था कि यह हसन धोबी का घर है। सोने चांदी का कालीन बिछा हुआ था। सोने चांदी की कुर्सी रखी थी। सुल्तान के महल से भी ज्यादा खूबसूरती से सजा वह कमरा था। मैं भी कुर्सी पर बैठ गया।"

दासी पूछने लगी, "आप और उसके कमरे में बैठकर कैसी बातें करते हैं?" शहजादा बोला, "अरे सच थोड़ी यह तो ख्वाब में था।" दासी ने फिर पूछा, "अच्छा बताइए। फिर क्या हुआ आपके ख्वाब में?"

शहजादा बोला, "होना क्या था? इस हसन धोबी की लड़की ने यह साड़ी जो साल भर से पहन कर आ रही है, ऐसे उतार कर फेंक दी जैसे किसी भिखारी की साड़ी हो। और अपनी नौकरानी को देने लगी कि हम्माम तैयार है।" दासी ने जवाब दिया, "हां शहजादी, गर्म पानी तैयार है।" "यह हम्माम में घुस गई तो मैं भी उसके साथ ही।" उसकी दासी फिर बोली, "आप शहजादा। आप उसके साथ हम्माम में घुस गए। क्यों बेवकूफ बनाते हैं?"

शहजादा बोला, "ऐसा कहां हो सकता है? तू तो सब कुछ सच समझ जाती है। मैं तो ख्वाब की बात कर रहा था। चल अब ना सुनाता तुझे ख्वाब।" शहजादा रुक जाने लगा तो दासी ने कान पकड़े और बोली, "शहजादा सुनाइए अब ना बोलूंगी बीच में।"

शहजादा ने कहना शुरू किया, "बस फिर क्या था? उसने नहाना शुरू किया। मैंने सोचा चलो बहुत दिनों से अच्छा घसल ना किया। मैं भी नहा लूं। यह एक कटोरा भरकर पानी डालती। मैं चार कटोरे डाल लेता। उसके जिस्म का साबुन भी ना छूटा था कि पानी खत्म हो गया। उसने अपनी नौकरानी को आवाज लगाई, 'आज पानी इतना कम क्यों रखा है?' नौकरानी ने कहा, 'शहजादी, मैंने इतना ही पानी रखा है जितना रोज रखती हूं। कम हो तो आप और ले लीजिए।' वह एक और बाल्टी ले आई। वह भी मैंने खत्म कर डाली। फिर तीसरी बार उसने पानी मंगवाया। जैसे तैसे यह हम्माम से निकली। उसी वक्त नौकरानी को आवाज लगाई, 'फौरन खाना लगाओ। बहुत भूख लगी है। सारा दिन भूखा प्यासा बैठना पड़ता है।'"

"नौकरानी छत पर गई और आसमान की तरफ हाथ करके खड़ी हो गई। आसमान से एक थाल उतरा जिसमें सोने चांदी के बर्तनों में दुनिया भर के मजेदार पकवान रखे थे। नौकरानी ने अपने लिए थोड़ा खाना निकाला और बाकी थाल लाकर उसके सामने रख दिया। मैंने सोचा लाओ आज मैं भी उसके साथ खाना खा लूं। कथने दिनों से जंगल जंगल घूमते अच्छा खाना ना मिला था। ऐसा मजेदार खाना कि क्या बताऊं। एक निवाला यह खाती और चार निवाले में खा जाता। उसका पेट भी ना भरा और खाना खत्म हो गया। उसने फिर नौकरानी को डांट पिलाई कि दासी क्या बात है? आज तो क्या कर रही है? इतना सारा खाना रखा है। मैं भूखी रह गई।"

नौकरानी बेचारी हैरान थी। बोली, "शहजादी मैंने इतना ही खाना आपके लिए निकाला था जितना रोज निकालती हूं। लीजिए आप मेरे हिस्से का भी ले लें। मगर आज कुछ गड़बड़ जरूर लगती है। क्या शहजादा ने आपसे बातचीत तो ना की?" इस पर यह हसन धोबी की लड़की अपनी नौकरानी को डांटने लगी कि तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसी बात कहने की? "वह तो मुझे कभी छू भी ना सकता। सुनो तूने इस हसन धोबी की लड़की ने मेरे बारे में ऐसा कहा। मुझे भी गुस्सा आ गया। बाकी खाना भी यह थोड़ा सा ही खा पाई और मैं सब खा गया। यह भूखी रह गई। मगर मन ही मन हैरान हो रही थी कि मसला क्या है?"

"फिर आसमान से उसके लिए कपड़े आए। उसने कपड़े बदले। नौकरानी ने उसका मेकअप किया। बालों में मोती गूंथे। बस क्या था? क्या लग रही थी? यह हसन धोबी की लड़की जो यहां इस गंदी मैली साड़ी में आकर बैठ जाती है। स्वर कर यह आकर छत पर खड़ी हो गई। रात के करीब आसमान से तख्ताकार उड़ने वाला सिंहासन उतरा और यह उस पर बैठ गई। मैंने सोचा यह तो कुछ भी ना हुआ। मैं भी तख्त का पाया पकड़ कर लटक गया।"

इतना कहकर शहजादा रुक गया। दासी ने इशारा किया कि हसन धोबी की लड़की ने थोड़ा सा मुंह उनकी तरफ फेर लिया। दासी पूछने लगी, "शहजादा फिर क्या हुआ?" शहजादा बोला, "बस ख्वाब खत्म हो गया।" दासी जिद करने लगी, "शहजादा सुनाइए ऐसा अधूरा ख्वाब थोड़ी हो सकता है। बताइए फिर क्या हुआ?"

शहजादा पहले तो टालमटोल करता रहा। फिर बोला, "फिर वह तख्त ऊपर ही ऊपर उठता हुआ चांद तारों से भी ऊपर उड़ते-उड़ते परियों की दुनिया में पहुंच गया। वहां सुल्तान अल जिन्नात का दरबार सजा हुआ था। एक से बढ़कर एक खूबसूरत परी बैठी थी। यह पहुंची तो सब ने उठकर जैसे यह कहा कि शहजादी हो। यह हसन धोबी की लड़की वहां परियों की रानी। सबसे आखिर में उसके नाचने की बारी आई। यह नाचने खड़ी हुई तो मैंने सोचा अगर आज मैंने उसके नाच पर थाप ना दी तो कुछ ना किया। मैंने तबला वादक से कहा लाओ भैया तुम थक गएगे। थोड़ा आराम कर लो मैं तबला बजाता हूं।"

तबला बजाने वाले बेचारे को कोई नजर ना आया। मगर वह वाकई थक गया था। तबला छोड़कर बैठकर घूमने लगा। मैंने वह तबला बजाया और मेरी थाप पर यह ऐसा नाचा कि समा बंध गया। सुल्तान अल जिन्नात ने खुश होकर अपना रेशमी रुमाल उसे इनाम में दिया। उसने झुककर रुमाल लिया। सबको दिखाया और तबला बजाने वाले की तरफ चल दी। मैंने जल्दी से उठाकर जेब में रख लिया।

इतना कहकर शहजादा रुक गया। हसन धोबी की लड़की अब बिल्कुल उसकी तरफ घूम चुकी थी। शहजादा जी हम भी तो देखें वह रुमाल कैसा है? शहजादा बोला, "यह तो ख्वाब था। ख्वाब की चीज भी कहां दिखाई जा सकती है।" मगर दासी ने जबरदस्ती शहजादा की जेब से हाथ डालकर एक रेशमी रुमाल निकाला। "कहीं यही तो रुमाल ना है।" शहजादा बनावटी गुस्से से बोला, "तू बहुत जिद्दी है मानती ना। हां, यही तो था। पता ना मेरी जेब में कहां से आ गया।" हसन धोबी की लड़की का दुपट्टा छोटा हो गया। वह बिल्कुल उनकी तरफ मुड़ चुकी थी।

दासी ने फिर कहा, "सुनाइए शहजादा, फिर क्या हुआ?" शहजादा कहने लगा, "होना क्या था? सुल्तान अलजिन्नाथ ने उससे दोबारा नाच करने की फरमाइश की। मैंने फिर ढोल संभाला। जितना अच्छा मैंने ढोल बजाया यह उतना ही अच्छा नाचती रही। सुल्तान अलजिन्नाथ ने खुश होकर अपनी अंगूठी इनाम में दी। उसने झुक कर उनके पांव छुए। सबको अंगूठी दिखाई और फिर तबला बजाने वाले के पास डाल दी। वह भी मैंने उठाकर जेब में रख ली।"

फिर जिद करने लगी, "दिखाइए शहजादा हमें भी दिखाइए। वह कैसी अंगूठी थी।" शहजादा दासी तो बेवकूफ है। अब एक चीज सही हो गई तो इसका यह मतलब ना कि सब बातें निकल ही ली और पूछने लगी, "शहजादा क्या यही अंगूठी है?" शहजादा बोला, "अरे हां यही तो थी। मगर मेरी जेब में कहां से आ गई?" दासी ने इशारा किया। हसन धोबी की लड़की का घूंघट ऊपर उठ चुका था। मगर शहजादा और दासी ऐसा दिखा रहे थे जैसे उन्होंने देखा ही ना।

दासी ने पूछा, "फिर क्या हुआ शहजादा?" शहजादा, "मैंने भी ऐसा तबला बजाया कि जान लड़ा दी और यह भी ऐसा नाचा कि जिसका जवाब पूरी परियों की दुनिया में ना था। नाच खत्म हुआ। तो सुल्तान अलजिन्नाथ उठ खड़े हुए। सुल्तान अलजिन्नाथ दरबार से उठकर गए और यह भी भागकर उड़ान खटोली पर बैठी। जल्दी में अपना ही इनाम तबला बजाने वाले से ना सोचा होगा कि कल ले लेगी। उसे क्या पता था कि वह सब तो मेरे पास था। उसका तख्त उड़ा और मैं फिर उसके पर से लटक कर नीचे आ गया। बस यहीं तक देखा था कि तूने आकर जगा दिया।"

दासी कहने लगी, "शहजादा अब वह हार भी दिखाइए।" शहजादा ने कहा, "अरे दासी वह ख्वाब था। हार मेरे पास कहां से आई?" मगर दासी ना मानी। और शहजादा की दूसरी जेब से मोतियों का हार निकालते हुए पूछा, "क्या यही हार था?"

अब तो हसन धोबी की लड़की कुर्सी से उठकर शहजादा के पास आ गई और बोली, "शहजादा अब तो आप जान ही गए होंगे कि मैं हसन धोबी की लड़की ना हूं। मैं परियों की दुनिया की एक परी हूं। अब मेरी कहानी भी सुन लीजिए। परियों की दुनिया में मुझसे ज्यादा अच्छी नाचने वाली और कोई ना थी। सुल्तान अल जिन्नात रोज मेरा नाच देखकर ही दरबार करते थे। एक रात मेरी तबीयत खराब थी। सिर में बहुत दर्द था। दरबार से बुलावा आया तो मैंने मना कर दिया। मगर सुल्तान को मेरे बगैर चैन ना आया। दोबारा बुलावा आया तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कह दिया सुल्तान से कहना इस नाम की भी कोई चीज है उनके पास या नहीं। यहां मैं दर्द से तड़प रही हूं और उनको अपने नाच की पड़ी है।"

"पैगाम लाने वाले ने जाकर उसी तरह सुल्तान से कहा। सुल्तान अलजिन्नाथ तो गुस्से में आग बबूला हो गए। फौरन मुझे बुलाया। मैं डरते कांपते पहुंची तो उन्होंने कहा, 'बड़ा नखरा हो गया है तुझे। अपने आप पर आ। मैं तुझे बद्दुआ देता हूं। तुझे साल भर धरती पर लड़की बनकर रहना पड़ेगा और अपनी पहचान छुपानी होगी। अगर किसी को पता चल गया कि तू परी है या किसी मर्द ने तुझे छू लिया तो कभी परियों की दुनिया में वापस ना आ सकेगी।' मैं बहुत रोई। गिड़गिड़ाई, माफी मांगी। सुल्तान ने कहा, 'मैं अपनी बद्दुआ वापस तो ना ले सकता। हां, इतना जरूर है। तुझे रोज रात को तख्त भेजकर परियों की दुनिया में वापस बुला लिया करूंगा। मगर साल तुझे धरती पर ही काटना पड़ेगा। मेरे पर नोच लिए गए और मुझे धरती पर फेंक दिया गया। मेरे साथ मेरी दासी को भी धरती पर आना पड़ा। मैंने अपने लिए हसन धोबी का घर पसंद किया और हसन धोबी की लड़की बनकर रहने लगी ताकि किसी को मुझ पर शक ना हो। मगर मेरी किस्मत में आपकी खिदमत करना लिखा था। कल मेरी सजा का एक साल पूरा होने वाला था। मुझे मेरे पर वापस मिल जाते और मैं वापस परियों की दुनिया में चली जाती। आपको मेरी असलियत कभी पता ना चलती। आप यही समझते कि मैंने बेवफाई की और भाग गई। मगर सब खत्म हो गया। अब आप ही मेरे मालिक हैं और मैं आपकी नौकरानी।"

शहजादा ने उस लड़की की यह हैरान करने वाली कहानी सुनी। और फिर अपनी दुल्हन को लेकर सुल्तान और सुल्ताना के पास गया और सारी कहानी सुना दी। सुल्तान को जब पता चला कि उनकी बहू हसन धोबी की लड़की ना बल्कि जिन्नात की दुनिया की अप्सरा है तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना ना रहा। उन्होंने धूमधाम से बेटे की शादी फिर से की और खूब खुशियां मनाई।