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KhidmatDari Ka Badla Jaroor Milta Hai | Islamic Moral Story | Urdu Moral Story In Hindi |

Mr. MR Voice 41:04

Transcription

पुराने जमाने की बात है जब मशरिक और मगरब के सरहदों पर हुकूमतें अपनी शानो शौकत की बुलंदी पर थी तब अफगानिस्तान की वादियों में एक ऐसी सल्तनत आबाद थी जिसका नाम कौमे सरमस्त था। इस सल्तनत की राजधानी जुनैदाबाद थी जो अपनी बाजार की चहल-पहल, कारीगरों की हुनरमंदी और अपनी जहीन आवाम की वजह से दूर-दूर तक मशहूर था। यहां की हुक्मरानी एक ऐसे खानदान के हाथों में थी जिसकी नेकी और इंसाफ की मिसालें दी जाती थी। मौजूदा सुल्तान का नाम फिरोज शाह आदिल था। आदिल लफ्ज उनकी शख्सियत का जुच बन चुका था। क्योंकि उनके फैसलों में कभी जरा बराबर भी जुल्म या नाइंसाफी का गुमान नहीं होता था। सुल्तान की पूरी हुकूमत उनके वफादार और अक्लमंद वजीरों के दम पर कायम थी। लेकिन सुल्तान का दिल हमेशा अपने आवाम की बेहतरी में लगा रहता था। खुदा ने सुल्तान फिरोज शाह को एक ही बेटा अता किया था। जिसका नाम था शहजादा ज़द बिन फिरोज़। ज़द अपने नाम की तरह ही ज्यादा किस्मत वाला था। लेकिन बचपन से ही उसके मिजाज में एक अजीब सा गुरूर और बेताबी शामिल थी। उसे शाही दरबार की हर शानो शौकत विरासत में मिली थी। मगर उसे यह एहसास कम था कि यह दौलत, यह तख्त और यह इख्तेदार सब मेहनत और नेकी के दम पर कायम है। शहजादा ज़द को लगता था कि हुक्मरानी उसका पैदाइशी हका है और आवाम उसकी खिदमत के लिए पैदा हुए हैं।

जुनैद आबाद शहर से कुछ फासले पर जहां की फिजा शहर के शोर से पाक थी और सब्जे की बहार छाई रहती थी। एक दरिया के किनारे पर एक छोटा सा सादा मगर रोशनी से भरा खानाकाह आबाद था। इस खानाकाह के बाशिंदे को लोग महज दरवेश ए इल्म के नाम से जानते थे। उनका असली नाम अब्दुल बाकी था। मगर वह खुद को सिर्फ खुदा का बंदा कहते थे। अब्दुल बाकी किसी गैब के इल्म या नजूमी नहीं थे। बल्कि उनकी फैजियाबी, उनकी आलिमियत और खिदमत एक खल्क में थी। वह तमाम किस्म के इल्म पर कमाल रखते थे। जिसमें तब, तारीख और रियाजी शामिल थे। लेकिन उनका सबसे बड़ा इल्म था इंसानियत का इल्म। वह बड़ी जहनियत से लोगों के मिजाज और उनके दिल की सच्चाइयों को भांप लेते थे। वह कभी किसी से कोई मुतालबा नहीं करते थे। सिर्फ जरूरतमंदों की बेगरज़ खिदमत करते थे। उनकी एक खासियत यह भी थी कि वह हर शख्स के लिए उनकी तकदीर और इब्तदा से अनजान रहते हुए भी उनके आने वाले अंजाम को भांप लेते थे।

एक मर्तबा शहजादा ज़द अपने कुछ सिपाहियों के साथ शिकार के इरादे से खान अकराह के पास वाले जंगल में गया। शहजादे का घोड़ा तेजी से भागते हुए एक खूबसूरत हिरण का पीछा कर रहा था और ज़द शिकार के जुनून में इतना खो गया कि वह बाकी सिपाहियों से बिछड़ गया। सूरज डूबने को था और ज़द एक अनजान और घने जंगल में भटक गया। वह गुस्से और थकन से चूरचूर था क्योंकि उसने कभी अपनी पूरी जिंदगी में ऐसी तकलीफ नहीं झेली थी। भटकते-भटकते अंधेरे और खौफ के साए में उसे दूर से दरवेश के खानकाह की धीमी सी रोशनी नजर आई। वह किसी तरह लड़खड़ाते हुए उस तरफ पहुंचा। दरवाजे पर एक बूढ़ा मगर रोशन चेहरे वाला दरवेश खड़ा था। यह दरवेश ए इल्म अब्दुल बाकी थे।

"कौन है आप? और यह कैसी जगह है?" शहजादे ने बड़े रूखे अंदाज में पूछा। गुरूर उसके लहजे से अभी नहीं गया था।

दरवेश ने एक हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया। "आदाब मुसाफिर, यह खानकाहे नूर है जो हर थके हुए जिस्म और भटकी हुई रूह को पनाह देती है। मैं अब्दुल बाकी, इस घर का खवादिम हूं। तशरीफ लाइए। रात का खाना तैयार है।"

शहजादे जैद को यह सादा अंदाज और मामूली खिदमत कुछ अजीब लगी। उसे अपनी शाही शान के मुताबिक कोई इज्जत नहीं मिली। मगर भूख और थकन ने उसे मजबूर कर दिया। दरवेश ने बिना किसी सवाल या झिझक के ज़द को बिठाया। उसके कपड़े झाड़े, उसे ठंडा पानी दिया और फिर उसे अपने हाथों से बना हुआ सादा खाना पेश किया। ज़द ने इत्मीनान से खाना खाया। और उस सादा खाने का जायका उसे अपने शाही दस्तरखान से भी बेहतर लगा। ज़द ने अपनी पहचान जाहिर नहीं की। लेकिन दरवेश की गहरी नजरें और खामोशी उसे महसूस हुई कि दरवेश सब कुछ जानते हैं।

खाना खाने के बाद ज़द ने थोड़े इत्मीनान की सांस ली। दरवेश ने उससे कोई सवाल नहीं किया। बस एक दिया जलाकर एक पुरानी तिब्बत की किताब पढ़ने लगे। थोड़ी देर बाद ज़द ने अचकचाते हुए पूछा। "क्या आप जानते हैं कि मैं कौन हूं?"

दरवेश ने किताब बंद की और निगाहें उठाई। उनके चेहरे पर वही गहरी इल्म भरी मुस्कान थी। "हुजूर," दरवेश ने धीमी आवाज में कहा, "मैं नहीं जानता कि आप किस खानदान से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन मैं जानता हूं कि आप एक ऐसे अजीम शख्स के बेटे हैं जिसने अपनी हुक्मरानी में इंसाफ और आवाम की मोहब्बत को ही अपना पहला दीनी फर्ज समझा है। आप शहजादा ज़द हैं।"

शहजादा यह सुनकर बहुत हैरान हुआ। "तो फिर आपने मेरे साथ किसी शहजादे की तरह सुलक क्यों नहीं किया? आपने मेरे लिए कोई खास इंतजाम क्यों नहीं किया?" ज़द ने गुरूर से पूछा।

दरवेश ने नरमी से कहा, "बेटे, यहां इस खानकाह में ना कोई शहजादा होता है, ना कोई फकीर। यहां सिर्फ इंसान होते हैं। शाही इज्जत और खिदमत महल तक महदूद हैं। मैं आपका एहतराम करता हूं। लेकिन मैं सिर्फ इंसान की खिदमत करता हूं।" फिर दरवेश खामोश हो गए और एक गहरी सांस ली। उन्होंने कहा, "लेकिन आप यहां आए हैं तो मैं आपसे एक ऐसी बात कहना चाहता हूं जो शायद आपके तकदीर का आईना हो।"

दरवेश ए इल्म ने आगे बढ़कर जयद के माथे को छुआ और फिर कहा, "शहजादा, आपकी तकदीर में खिदमतगारी का बदला लिखा है। आपका गुरूर और आपकी नियत आपको एक ऐसे इम्तिहान से गुजारेंगे जहां आपको अपनी शाही शान को खोना पड़ेगा। आपका आज का इख्तेदार और आपकी गलतफहमी आपको एक ऐसे मुकाम पर ले जाएगी जहां आप दर-बदर भटकेंगे। ठीक उसी तरह जैसे आज शिकार में भटके थे। और वहां उस मंजिल पर आपको किसी गरीब खादिम की इल्मी मदद की सख्त जरूरत होगी। आपकी जिंदगी उसी खिदमतगार के हाथों में होगी। या तो वह खिदमतगार आपको तख्त वापस दिलवाएगा या फिर आपकी बर्बादी की वजह बनेगा।"

ज़द इस गैब की बात सुनकर पहले तो हंसा। "यह कैसी बेतुकी बात है। मैं सुल्तान फिरोज शाह का वारिस हूं। मेरी तकदीर खुद मेरे हाथों में है।" मगर दरवेश की आंखों में एक ऐसी यकीनियत थी जिससे ज़द के दिल में कहीं ना कहीं खौफ पैदा हो गया।

दरवेश ने कहा, "वजीर आजम इनायत अली खान जो आपके अब्बा जान के सबसे करीबी और वफादार हैं। उन्हें मेरी बात पर यकीन होगा। आप उनसे पूछ सकते हैं।" दरवेश ने इब्राहिम पाशा वाले पात्र की तरह ही एक वजीर का जिक्र किया।

दरवेश ने फिर ज़द को पनाह दी। और अगली सुबह शहजादा अपने सिपाहियों के साथ महल वापस लौट आया। वह दरवेश की बातों को एक बूढ़े आदमी की बकवास कहकर टालना चाहता था। मगर उसके दिल में उस खिदमतगारी के बदले की बात हमेशा के लिए बैठ गई थी।

महल में वापस आकर शहजादे ने अपने अब्बा हुजूर से दरवेश इल्म का जिक्र किया। सुल्तान फिरोज शाह आदिल मुस्कुराए। "हां बेटा," सुल्तान ने कहा, "अब्दुल बाकी एक अजीम इंसान है। उसकी जुबान पर सरस्वती रहती है। उसने कभी किसी को झूठ नहीं कहा।" सुल्तान की इस बात ने ज़द के दिल में डर की आग को और भड़का दिया। वह फौरन वजीर आजम इनायत अली खान के पास गया। जो एक बूढ़े और बहुत ही अक्लमंद शख्स थे।

"जहां अपना शहजादे," वजीर एआम ने हाथ बांधे। ज़द ने दरवेश की कही हर बात दोहराई। वजीर आजम ने गौर से सुना। फिर एक गहरी सांस ली और कहा, "शहजादे, मैं भी दरवेश साहब की इल्मी रसाई को जानता हूं। उनकी बात को महज फजूल मत समझिए। तकदीर के फैसले कभी-कभी गुरूर को खाक में मिला देते हैं। आपको अपनी नियत बदलनी होगी।"

शहजादे ज़द को यह बात नागवार गुजरी। उसे लगा कि उसके अब्बा और वजीर दोनों ही उसे कमजोर समझ रहे हैं। ज़द के दिल में अब दरवेश इल्म के लिए एहतराम के बजाय दुश्मनी का जज्बा पैदा हो गया। उसने सोचा, "यह मामूली दरवेश मेरी तकदीर का फैसला करने वाला कौन होता है? मैं उसे गलत साबित करके रहूंगा।"

आने वाले दिनों में शहजादे ज़द ने अपनी हुक्मरानी की तालीम में और भी ज्यादा लापरवाहियां शुरू कर दी। वह वजीर आजम की नसीहतों को टालता रहा और अपने दोस्तों के साथ शराब और अय्याशी में मशगूल हो गया। उसका गुरूर आसमान छूने लगा। कुदरत का खेल देखिए। अभी दरवेश की बात को एक साल भी पूरा नहीं हुआ था कि एक रोज सुल्तान फिरोज शाह आदिल एक अचानक बीमारी से इस इस दुनिया से चल बसे। पूरी सल्तनत पर मातम छा गया। शहजादा ज़द सुल्तान ज़दशाह के नाम से तख्त नशीन हुआ। वह नया सुल्तान बन गया था। दरवेश की बात अभी तक गलत थी क्योंकि ज़द को अपनी शाही शान हासिल हो चुकी थी।

तख्त पर बैठने के बाद ज़द का गुरूर और भी बढ़ गया। उसे अब लगा कि दरवेश इल्म महज एक झूठा नजूमी था। उसने सबसे पहले दरवेश को झूठा साबित करने का फैसला किया। उसने अपने वफादार सिपाहियों की एक फौज दरवेश एइल के खानकाह की तरफ रवाना की। उसका हुक्म था, "जाओ और उस फकीर को यहां मेरे दरबार में लाओ। मैं उसे सबके सामने जलील करूंगा और अपने इ्तेदार का मजा चखाऊंगा।" सिपाहियों ने खानकाह को घेर लिया। लेकिन जब वे अंदर दाखिल हुए तो उन्हें एक हैरतंगेज मंजर दिखाई दिया। दरवेश्म अब्दुल बाकी वहां मौजूद नहीं थे। सिर्फ एक टूटी हुई चटाई और एक दिया रखा हुआ था। दिए में तेल नहीं था। फिर भी उसकी लौ जल रही थी। ज़दशाह को गुस्सा आया। मगर उसे यह एहसास हुआ कि दरवेश गैब की बातों को भांप चुका था।

"दरवेश एक रहस्य बनकर ज़द के दिमाग में बैठ गया। वह कहां गया? उसे ढूंढो।" सुल्तान ज़द ने हुक्म दिया। लेकिन दरवेश एइल्म हवा की तरह गायब हो चुके थे। यह वाकया सुल्तान जद की हुकूमत की शुरुआत थी। जो आगे चलकर गुरूर और जवाल की कहानी बनने वाली थी। उसे अब भी यकीन था कि वह अपनी ताकत से दरवेश की तकदीर को झूठा साबित कर देगा। मगर वजीर आजम इनायत अली खान सुल्तान ज़द के रूखे और जालिम मिजाज को भांप चुके थे। वह अपनी आवाम और सल्तनत की सलामती के लिए फिक्रमंद हो गए। उन्होंने सुल्तान के सामने चापलूसी की। मगर दिल में उन्होंने खिदमतगारी की कसमें खाई ताकि वह सल्तनत को ज़द के गलत फैसलों से बचा सकें।

सुल्तान ज़द की हुकूमत शुरू हो गई और वजीर आजम इनायत अली खान ने अपने दिल में खिदमतगारी की कसमें खाई ताकि वह सल्तनत को ज़द के गलत फैसलों से बचा सकके। इनायत अली खान एक अकलमंद और सियासी नजर वाले शख्स थे। उन्होंने देख लिया था कि सुल्तान ज़द के रगों में गुरूर का जहर इस कदर फैल चुका है कि उसे अब कोई नसीहत या कोई वफादारी रास नहीं आती। नया सुल्तान ज़दशाह तख्त पर बैठते ही अपनी गलतफहमियों और शाही नशे में चूर हो गया। उसके 40 वजीर थे। जिनमें से ज्यादातर चापलूस और डरपोक थे। वे सब वही करते थे जो ज़दशाह को पसंद आता था। ज़दशाह को सबसे ज्यादा नफरत इनायत अली खान से थी। क्योंकि इनायत अली खान हर फैसले से पहले आवाम की फिक्र और इंसाफ की बात करते थे। जो ज़दशाह के मिजाज के खिलाफ थी। ज़दशाह ने अपने अब्बा के जमाने के सारे नेक और हुनरमंद लोगों को दरबार से दूर कर दिया और उनकी जगह कुछ ऐसे नौजवानों को दी जो सिर्फ उसकी तारीफ में जमीन आसमान के कसीदे पढ़ते थे। उसने सल्तनत का खजाना अपनी अय्याशी और शौक पूरे करने में खर्च करना शुरू कर दिया।

एक रोज सुल्तान जैद शाह को अपने हुजूर में एक बुद्धिमान नजूमी को बुलाने का ख्याल आया। उसे दरवेश इल्म अब्दुल बाकी की बात अब भी बेचैन करती थी। वह चाहता था कि कोई और नजूमी उसकी तकदीर का हाल बताकर उसे दिलासा दे कि उसकी हुकूमत को कभी जवाल नहीं आएगा। दरबार में ईरान से आया एक मशहूर नजूमी हाजिर हुआ जिसका नाम काजी रशीद था। काजी रशीद इल्म जानने वाला था। लेकिन उससे ज्यादा वह इंसानी मिजाज को भांपने वाला था।

सुल्तान ज़द ने उसे तमाम इज्जत बख्शी और तख्त के करीब बिठाया। "ऐ काजी रशीद," ज़दशाह ने हुक्म दिया, "हम तुम्हें अपने खजाने से मालामाल कर देंगे। बस तुम हमें यह बताओ कि मेरी हुकूमत की उम्र कितनी है? क्या मेरा नाम तारीख में हमेशा के लिए अमर रहेगा?"

काजी रशीद कुछ देर खामोश रहे। उन्होंने सुल्तान ज़द की आंखें, उसके मिजाज में छिपी गुरूर की लौ और दरबार में पसरा हुआ खौफ देखा। उन्होंने समझ लिया कि इस सुल्तान को सच नहीं बल्कि सिर्फ झूठी ही तारीफ पसंद है। काजी रशीद ने एक बहुत ही चालाकी भरा जवाब दिया, "जहांपनाह, मेरी इल्म की रसाई आपके तख्त की इतनी गहरी बुनियाद को नहीं भांप सकती। लेकिन मेरे इल्म ने यह बताया है कि जब तक आपके खजाने में मौजूद एक खास हीरा आपके पास है तब तक आपकी शान और आपकी जिंदगी पर कोई आंच नहीं आ सकती।"

सुल्तान जायद शाह यह सुनकर खुश हो गया। उसने हुक्म दिया कि उस खास हीरे को उसके निजी तहखाने में हमेशा महफूज रखा जाए। लेकिन अंदरूनी ट्विस्ट यह था काजी रशीद ने अपने जवाब से सुल्तान के अहंकार को शांत किया। मगर साथ ही उसे हीरे पर मुनहसिर करके कमजोर भी कर दिया। ज़दशाह अब अपनी ताकत से ज्यादा उस बेजान हीरे की हिफाजत पर यकीन करने लगा।

इधर वजीर आजम इनायत अली खान ने यह सारा ड्रामा अपनी तेज निगाहों से देखा। उन्होंने फौरन समझ लिया कि सुल्तान की कमजोरी अब उसका खजाना बन चुका है। इनायत अली खान ने अपनी खिदमतगारी की कसम को पूरा करने के लिए एक खुफिया चाल चली। उन्होंने सुल्तान के सबसे पसंदीदा और अय्याश नौकर फैज़ल से राब्ता कायम किया। फैजल को दौलत का इतना लालच था कि वह अपनी मां को भी बेच सकता था। इनायत अली खान ने उसे एक इनाम का वादा किया। फैजल इनायत अली खान ने धीरे से कहा, "तुम सुल्तान के सबसे करीब हो। अगर तुम उस खास हीरे को किसी भी तरह से उसके तहखाने से निकाल कर मुझे दे दो। तो मैं तुम्हें इतनी दौलत दूंगा कि तुम एक नई जिंदगी शुरू कर सकते हो। यह हीरा सल्तनत के लिए मनहूस है और इसे तबाह करने से सुल्तान की जान बच सकती है क्योंकि दरवेश की पेशीनगोई सच हो रही है।"

फैजल ने उस हीरे को चोरी करने का इरादा कर लिया। उसे जरा भी यह ख्याल नहीं आया कि इनायत अली खान असल में सल्तनत की सलामती की नहीं बल्कि सुल्तान को जमीन पर गिराने की खिदमत कर रहा था ताकि वह खुद को उस जालिम हुकूमत से आजाद कर सके।

एक रात जबकि सुल्तान ज़दशाह अय्याशी की महफिल में मशगूल था। फैजल ने तहखाने में दाखिल होने की हिम्मत की। तहखाने में सात बड़े संदूका थे जो खजाने से भरे हुए थे। फैजल ने संदूका खोला और जब उसकी आंखों ने उस हीरे की चमक को देखा तो उसकी नियत बदल गई। उस पर दौलत का शैतान सवार हो गया। उसने सोचा, "मैं क्यों सिर्फ एक हीरे की चोरी करूं जब मैं पूरा खजाना ले जा सकता हूं।" उसने खजाने के सातों संदूक चोरी करने का इरादा किया। लेकिन यह काम अकेले करना नामुमकिन था। उसने अपने तीन वफादार दोस्तों की मदद ली। अगली सुबह होते-होते फैजल और उसके साथियों ने खजाने के साथ संदूक और वह खास हीरा महल से गायब कर दिए। उन्होंने खजाने को शहर के बाहर एक वीरान मस्जिद के नीचे जमीन में छुपा दिया और फिर फैजल ने इनायत अली खान से मुलाकात की।

"हुजूर ए वजीर आजम," फैजल ने कांपते हुए कहा, "वह हीरा गायब हो चुका है। तहखाना खाली है।"

इनायत अली खान ने यह सुनकर एक ठंडी मुस्कान दी। उन्हें यकीन हो गया कि अब सुल्तान का जवाल करीब है और दरवेश की पेशीनगोई सच होने वाली है। वजीर ने फैजल को तसल्ली दी और कहा कि वह किसी से इस बारे में बात ना करें।

जब सुल्तान ज़दशाह को इस चोरी की खबर मिली तो वह आग बबूला हो गया। खासतौर पर वह हीरा गायब होने की खबर सुनकर वह होश खो बैठा। उसे काजी रशीद की बात याद आई। "जब तक हीरा है तब तक शान है।" उसने फौरन वजीर आजम इनायत अली खान को बुलाया।

"इनायत," ज़दशाह दहाड़ा, "यह कौन जुर्रत करने वाला है? मेरा खजाना गायब है। वह खास हीरा गायब है।"

इनायत अली खान ने अदाकारी का कमाल दिखाया। वह रोने लगे और कहने लगे, "जहांपनाह, यह मेरी नाकामी है। मैं इस चोरी की जिम्मेदारी लेता हूं। मेरी इल्म की रसाई ने मुझे यह बताया था कि यह मनहूस हीरा ही सल्तनत की तबाही का सबब बनेगा और मैं इसे बचाने में नाकाम रहा।"

ज़दशाह ने गुस्से में आकर फैसला किया। उसने सोचा कि इनायत अली खान ही दरवेश के पुराने शागिर्द हैं और शायद उन्होंने ही इस चोरी को अंजाम दिया है। "बकवास बंद करो इनायत," ज़दशाह ने चिल्लाया। "तुम्हें इस जुर्रत की सजा मिलेगी।" सुल्तान ने इनायत अली खान को कैद करने का हुक्म दिया और उनके पद को छीन लिया। सुल्तान के गुस्से से कोई भी शख्स उन्हें रोक नहीं सका। हालांकि इनायत अली खान को सजा मिली लेकिन उनकी बुद्धिमानी यहीं थी। उन्होंने चोरी का इल्जाम अपने सर ले लिया। जिससे वह सुल्तान की नजर में तो बुरे बने लेकिन सल्तनत की भलाई के लिए रास्ता साफ कर दिया। उनका यह कैद ही उनके खिदमतगारी के बदले की शुरुआत थी।

अब सल्तनत में अफरातफरी फैल गई। खजाना गायब था। सुल्तान ज़दशाह की अकल ने काम करना बंद कर दिया। वह अपने गुरूर में इतना चूर था कि उसने सोचा, "अगर मेरे पास खजाना नहीं तो किसी के पास नहीं होना चाहिए।" ज़दशाह ने अपने आवाम पर नए और जालिमाना टैक्स लगाने शुरू कर दिए। वह भूखे आवाम से जबरदस्ती पैसे वसूलने लगा। धीरे-धीरे लोगों के दिल से सुल्तान के लिए मोहब्बत और वफादारी खत्म होने लगी। आवाम में बगावत का जज्बा पैदा हो गया। दरवेश इल्म अब्दुल बाकी की पेशीनगोई सच साबित हो रही थी। ज़दशाह का जवाल शुरू हो चुका था। वह सिर्फ एक ऐसे हुक्मरान की तरह रह गया था जिसकी हुकूमत अब सिर्फ ताकत और जुल्म पर कायम थी। इंसाफ पर नहीं। लेकिन अभी भी ज़दशाह को किसी गरीब खादिम की जरूरत महसूस नहीं हुई थी। वह अब भी अपनी ताकत पर यकीन करता था।

सुल्तान ज़दशाह ने खजाना गायब होने के गसे में अपने जुल्म की इंतहा कर दी थी। शहर के लोगों पर अजीबोगरीब टैक्स लगाए गए। यहां तक कि अगर किसी के घर में शादी होती तो उस पर भी शाही इज्जत महसूल देना पड़ता था। आवाम में रोज-बरोज तकलीफ और तौहीन का एहसास बढ़ता चला गया। सुल्तान ज़द को अब हर उस शख्स से नफरत थी जो इल्म या अकल की बात करता था। उसे डर था कि कहीं कोई नया दरवेश इल्म उसकी तकदीर का हाल ना बता दे। इसीलिए उसने आलिमों और फाजिलों को दरबार से निकाल दिया।

इसी दौरान जुनैदाबाद शहर के एक कोने में जहां गरीब कारीगर और मजदूर रहते थे। एक मासूम और बुद्धिमान लड़का अपनी मां के साथ रहता था। इस लड़के का नाम था हामिद। वह तकरीबन 15 से 16 बरस का था। हामिद की मां बीबी फैजा अपने वक्त के मशहूर मुंशी की बेटी थी जो तारीख और इल्म रियाजी यानी गणित के माहिर थे। हामिद को बचपन से ही तालीम और अकल की विरासत मिली थी। हालांकि वह गरीबी में पला बढ़ा था। मगर उसका दिमाग एक खजाने की तरह था। हामिद की मां अक्सर उसे हिदायत देती थी, "बेटा, हमारे पास दौलत नहीं है पर इल्म है। यह इल्म वह दौलत है जो कोई सुल्तान या चोर तुमसे नहीं छीन सकता। इस इल्म को हमेशा लोगों की मदद में इस्तेमाल करना ना कि अपनी जात के फायदे के लिए।"

हामिद का सबसे बड़ा खजाना था। उसके दादा की लिखी हुई नज्म एहिसाब नाम की एक पुरानी किताब। यह किताब महज रियाजी की नहीं थी। बल्कि इसमें इंसान की नियत और तकदीर का हिसाब लगाने के अजीम फन शामिल थे। जैसा कि दरवेश इल्म अब्दुल बाकी भी करते थे। हामिद इसी किताब को रात दिन पढ़ता था। वह इतना माहिर हो गया था कि वह किसी भी शख्स के दिल की बात और उसके गुजरे हुए वाक्यात का हिसाब लगा सकता था। वह जल्द ही अपने मोहल्ले में हामिद हिसाबदान के नाम से मशहूर हो गया।

तो वहीं दूसरी तरफ शहर में सुल्तान ज़द के जुल्म और नए महसूलों के खिलाफ दंगा और फसाद की आग भड़क रही थी। सबसे ज्यादा तकलीफ बुनकर और कसाई जैसे गरीब कारोबारियों को थी जिनसे जबरदस्ती टैक्स वसूला जा रहा था। एक रोज हामिद ने देखा कि एक कसाई को सुल्तान के सिपाही बुरी तरह पीट रहे हैं। क्योंकि वह नया महसूल नहीं चुका पाया था। उस कसाई ने अपने पड़ोस के सुनार से कर्ज लिया था जो कर्ज के बदले में उससे दोगना वसूल कर रहा था। हामिद ने हिम्मत की और सिपाहियों के सामने आ गया।

"ठहर जाओ," हामिद ने बड़ी जुर्रत से कहा। सिपाहियों ने गुस्से से हामिद को देखा। "ए लड़के, तुम कौन होते हो हुकूमत के काम में दखल करने वाले?" हामिद

ने उस कसाई की तरफ देखा और फिर हिसाब लगाकर बोला, "जुल्म ना करो। यह कसाई तो महसूल जरूर देगा। मगर पहले हिसाब उस सुनार का होना चाहिए जो इस कसाई से कर्ज के बदले में दुगना वसूल कर रहा है। वह सुनार जो कल रात अपनी बीवी से झगड़ा करके सोने के जेवरात छुपा रहा था ताकि उस पर भी टैक्स ना लगे।"

हामिद के मुंह से सुनार की निजी और छुपी हुई बात सुनकर सिपाही और कसाई दोनों ही दंग रह गए। यह बात किसी को मालूम ना थी। कसाई ने फौरन हामिद के कदमों पर गिरकर कहा, "हामिद, तुम सच कहते हो। सुनार मेरा खून चूस रहा है।" सिपाहियों को लगा कि यह लड़का कोई गैब का माहिर है। वे डर गए और कसाई को छोड़कर चले गए।

इस वाक्य के बाद हामिद हिसाबदान की शोहरत आग की तरह जुनैदाबाद में फैल गई। गरीब आवाम उसे अपना नया रहबर समझने लगे जो उनके मसलों को हल कर सकता था।

लेकिन यह खबरें जल्द ही कैद खाने में बंद इनायत अली खान तक भी पहुंची। इनायत अली खान को अब भी सल्तनत की फिक्र थी। उन्होंने समझ लिया कि दरवेश की पेशीन गोई का गरीब खादिम शायद यही लड़का है। इनायत अली खान ने अपनी पुरानी खिदमतगारी की कसमें याद की। उन्होंने जेलर को रिश्वत दी और हामिद तक एक खफिया पैगाम भिजवाया।

पैगाम में लिखा था, "ऐ हिसाबदान, मैं कैद हूं। तुम गैब की बातें जान सकते हो। अगर तुम इंसाफ के असली माहिर हो तो पहले यह हिसाब लगाओ कि जुनैदाबाद का खजाना कहां है और वह खास हीरा कहां गायब हुआ। अगर तुम यह राज खोल सकते हो तो तुम ही सल्तनत के सच्चे खिदमतगार बनोगे और शहजादे के जुल्म का बदला ले सकोगे।"

हामिद ने पैगाम पढ़ा। उसने अपनी किताब खोली और कुछ देर हिसाब लगाया। उसकी आंखें चमक उठीं। उसने खजाने की चोरी और खास हीरे का राज जान लिया। उसे यह भी मालूम हो गया कि इनायत अली खान बेकसूर हैं और उन्होंने सिर्फ सल्तनत की भलाई के लिए चोरी का इल्जाम अपने सर लिया था। हामिद को यह भी एहसास हो गया कि उसका यह इल्म बदले और इंसाफ के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे उसके दादा की नज़्म हिसाब में लिखा था।

इस दौरान सुल्तान ज़द शाह को लगातार अजीब और गरीब ख्वाब आने लगे थे। वह खफदा था क्योंकि उसे दरवेश इल्म की बात याद आ रही थी। एक रात उसने एक ऐसा मुश्किल ख्वाब देखा कि सुबह होते ही वह उसे भूल गया। उसे सिर्फ एक अजीब सा डर और बेचैनी महसूस हो रही थी। ज़द शाह ने अपने दरबार में मौजूद तमाम चापलूस वजीरों को बुलाया। ज़द शाह के वजीरों में से किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह कोई जवाब दे सके। वे सब हैरान और खौफजदा थे।

ठीक इसी वक्त सुल्तान के पास एक सिपाही आया और उसने फुसफुसाकर हामिद हिसाबदान की शोहरत के बारे में बताया कि वह इल्म नज्म में कमाल रखता है और गैब की बातें बता सकता है। सुल्तान ज़द शाह पहले तो गुस्से से भड़क उठा। फिर एक और दरवेश! "मैं इन सबको खत्म कर दूंगा।" मगर फिर अपनी बेचैनी और डर की वजह से वह मजबूर हो गया। उसे लगा कि सिर्फ यही लड़का शायद उसे इस अजीब सी मुसीबत से निकाल सकता है।

उसने सिपाही को हुक्म दिया, "जाओ और उस लड़के हामिद को मेरे दरबार में लेकर आओ। अगर उसने मेरे ख्वाब का राज खोल दिया तो मैं उसे मालामाल कर दूंगा। अगर नहीं तो उसकी और उसकी मां की लाश जुनैद आबाद के चौक में लटकाई जाएगी।"

सुल्तान ज़द शाह का यह हुक्म सुनकर एक सिपाही फौरन हामिद हिसाबदान को दरबार में लाने के लिए रवाना हुआ। हामिद जो अपने घर में अपनी किताब नज़्म ए हिसाब में मग्न था, सिपाही की आमद से जरा भी परेशान नहीं हुआ। उसने पहले ही हिसाब लगा लिया था कि सुल्तान उसे क्यों बुला रहा है। उसे मालूम था कि यह मौका है खिदमतगारी का बदला लेने का, अपने शहर को जुल्म से आजाद कराने का और इनायत अली खान की बेकसूरी साबित करने का। सिपाही ने हामिद को हुक्म सुनाया और उसे शाही सवारी पर सवार होने को कहा।

हामिद की पहली शर्त। हामिद ने सिपाही की तरफ देखा और एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, "मैं सुल्तान का बुलावा जरूर कबूल करता हूं, मगर मेरी एक शर्त है। मैं कोई जानवर की सवारी इस्तेमाल नहीं करूंगा।" सिपाही हैरान हुआ, "तुम कौन होते हो शर्त लगाने वाले? ऐ गरीबजादे, सुल्तान का हुक्म है कि तुम्हें अभी के अभी हाजिर किया जाए।"

हामिद ने जवाब दिया, "जाकर सुल्तान से कहो, मेरा इल्म इतना कीमती है कि मुझे दरबार तक लाने के लिए इस सल्तनत में सिर्फ एक ही सवारी लायक है, और वह है मौजूदा वजीर एआम ख्वाजा जिया की पीठ। अगर वजीर आजम खुद मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर लाएंगे तो ही मैं दरबार में कदम रखूंगा।"

नया वजीर आजम ख्वाजा जिया एक चापलूस और जालिम शख्स था जिसे ज़द शाह ने इनायत अली खान के बाद वजीर बनाया था। ख्वाजा जिया ने अपनी ताकत का नाजायज फायदा उठाकर कई गरीबों की जमीनें छीनी थीं। यह पैगाम सुल्तान तक पहुंचाया गया। सुल्तान ज़द शाह गुस्से से लाल पीला हो गया। "क्या जरूरत है उस मामूली लड़के की? मेरी हुकूमत की तौहीन! यह तो सरासर मेरी शाही शान की बेइज्जती है!" ज़द शाह दहाड़ा।

मगर फिर उसे अपने भूल चुके ख्वाब का ख्याल आया और उसे महसूस हुआ कि इस लड़के के पास वाकई कोई खास इल्म है। उसे मजबूरन ख्वाजा जिया को हुक्म देना पड़ा, "ख्वाजा जिया, हम हुक्म देते हैं कि तुम उस छोटे हिसाबदान को अपनी पीठ पर बैठाकर दरबार में हाजिर करो। हमारी जान इस वक्त उस ख्वाब के राज में फंसी है और हम किसी भी कीमत पर उसे जानना चाहते हैं।"

ख्वाजा जिया जिल्लत से चीख उठा, मगर सुल्तान के गुस्से के आगे उसकी एक ना चली। वजीर आजम ख्वाजा जिया अपनी कमर पर जंजीर कसवाकर शहर की सड़कों से होता हुआ हामिद के घर पहुंचा। यह नजारा जुनैद आबाद के लिए हैरतंगेज था। हजारों लोगों की भीड़ जमा हो गई। गरीब आवाम जिन्हें ख्वाजा जिया ने हमेशा तंग किया था, सब के सब खुशी से झूम उठे।

हामिद ने अपने घर से बाहर आकर वजीर आजम को जिल्लत की हालत में देखा। उसने अपनी मां की तरफ देखा, जिनके चेहरे पर तसल्ली और फक्र का एहसास था। हामिद हाथ में एक छोटी सी छड़ी कूड़ा लेकर ख्वाजा जिया की पीठ पर सवार हो गया। "ऐ लोगों, देखो! आज तुम्हारे जालिम पर गरीबी का इल्म हावी हो रहा है।" हामिद ने बुलंद आवाज में ऐलान किया और फिर उसने वजीर आजम की पीठ पर छड़ी मारी। "चल ऐ जालिम वजीर, अब तुझे हुकूमत नहीं खिदमतगारी करनी पड़ेगी।"

हामिद इसी तरह वजीर एआम को छड़ी मारते हुए सुल्तान के महल तक लाया। यह तौहीन ना सिर्फ ख्वाजा जिया की थी बल्कि सुल्तान ज़द शाह के गुरूर की भी थी। दरबार में पहुंचते ही हामिद ने वजीर आजम की पीठ से उतर कर सुल्तान को अदब से सलाम किया।

सुल्तान ज़द शाह गुस्से और हैरत के दौराहे पर था। उसने अपनी नाराजगी छुपाते हुए हामिद को अपने तख्त के करीब एक ऊंचे आसन पर बिठाया। "ऐ लड़के," सुल्तान ज़द ने कड़क आवाज में कहा, "यह कैसी बेहूदा हरकत थी? तुमने एक वजीर आजम की इस तरह तौहीन क्यों की?"

हामिद ने इत्मीनान से जवाब दिया, "जहांपनाह, यह तौहीन नहीं बल्कि इंसाफ का हिसाब है। ख्वाजा जिया ने जिन गरीब आवाम को अपनी ताकत से जमीन पर गिराया, आज उन्हीं आवाम की तरफ से मैंने उन्हें खिदमतगारी की सजा दी है। अब आप मेरी तरफ देखिए। मुझे आपके ख्वाब का राज खोलना है।"

ज़द शाह को मजबूरी में हामिद की बात माननी पड़ी। हामिद ने अपनी आंखें बंद की और कुछ देर तक नज्म हिसाब से हिसाब लगाया। फिर उसने बुलंद और साफ आवाज में ऐलान किया, "जहांपनाह, आपने ख्वाब में देखा कि आप एक ऊंचे पहाड़ की चोटी पर बैठे हैं। आपके सामने दो खास परिंदे उड़ रहे हैं। एक परिंदा सुनहरी पंखों वाला है जिसकी चोंच में सात चमकते मोती हैं और दूसरा परिंदा काले पंखों वाला है जिसकी चोंच में सिर्फ एक कंकड़ है। सुनहरी पंखों वाला परिंदा आपके करीब आया और उसने वे सात मोती आपके हाथ पर रख दिए। आप उन मोतियों को देखकर बहुत खुश हुए। मगर जैसे ही आप मोतियों को उठाने लगे, काला परिंदा झपट्टा मार कर आया और उन सातों मोतियों को आपके हाथ से छीन लिया और उन्हें जमीन में छुपा दिया और जब आपने उस काले परिंदे को पकड़ने की कोशिश की तो आपको नींद से जागना पड़ा।"

सुल्तान ज़द शाह की आंखें फटी की फटी रह गईं। यह बिल्कुल वही ख्वाब था जिसे वह भूल चुका था। "वाह सुभान अल्लाह! ऐ हिसाबदान, तुम सच कहते हो। यह बिल्कुल वही ख्वाब था। अब हमें इसकी ताबीर बताओ। यह क्या बताता है?" सुल्तान ने अब हामिद पर यकीन कर लिया था।

हामिद ने तख्त की तरफ इशारा किया और कहा, "ताबीर आपके सामने मौजूद है। जहांपनाह, यह ख्वाब आपके जवाल और खिदमतगारी के बदले की कहानी है।" हामिद ने हिम्मत की और अपनी आवाज में सच्चाई का जलाल पैदा किया। "सात चमकते मोती। यह मोती हैं जुनैदाबाद के खजाने के सात संदूक जो बेशुमार दौलत से भरे थे। यह खजाना आपके अब्बा जान फिरोज शाह आदिल की मेहनत का नूर था।"

"और काला परिंदा वह लालच है जिसने आपके वफादार खादिमों को बिगाड़ा। यह वह शख्स है जिसने उन सातों संदूकों को चोरी किया और उन्हें शहर से दूर वीरान मस्जिद के तहखाने में छुपा दिया। एक कंकड़। यह वह मामूली कंकड़ है जो आज आपके पास रह गया है। यह दिखाता है कि खजाना खत्म है और आपकी ताकत अब कमजोर हो गई है। आपकी हुकूमत का जवाल इस चोरी से शुरू हुआ जहांपनाह, और इस चोरी का राज खोलने वाला ही आपका सच्चा खिदमतगार है।"

हामिद ने यह कहकर दरबार में एक जबरदस्त सन्नाटा पैदा कर दिया। सुल्तान ज़द शाह का चेहरा पीला पड़ गया। सुल्तान ज़द शाह ने गुस्से से पूछा, "तो कौन है वह जालिम जिसने मेरे खजाने को चुराया? क्या यह कैदी इनायत अली खान है?"

हामिद ने हिसाब लगाकर जवाब दिया, "नहीं जहांपनाह। इनायत अली खान तो बेकसूर हैं। उन्होंने तो सिर्फ आपके अब्बा के वक्त के अहद को पूरा करने की खिदमत की थी। असल चोर है आपके करीबी नौकरों में से एक जिसका नाम फैजल है। फैजल ने आपके खजाने के सातों संदूक और उस खास हीरे को चोरी करके वीरान मस्जिद में छुपाया है और यह चोरी उसने दौलत के लालच में की ना कि किसी वफादारी की खातिर।"

हामिद ने वह सब बातें बताई जो सिर्फ फैजल, उसके साथियों और इनायत अली खान को मालूम थीं। सुल्तान ज़द शाह को हामिद की बात पर पूरा यकीन हो गया। उसने फौरन फैजल को पकड़ने और खजाने की तलाश करने का हुक्म दिया। फैजल को पकड़ लिया गया और तफ्तीश के बाद खजाना वीरान मस्जिद से बरामद हुआ। सुल्तान ने उसी वक्त इनायत अली खान को रिहा करने और उन्हें पुरानी इज्जत देने का हुक्म दिया।

हामिद के इल्म और जुर्रत ने इनायत अली खान की खिदमतगारी का बदला दिया और सुल्तान ज़द को जबरदस्त सदमा पहुंचाया। ज़द शाह ने देखा कि एक मामूली लड़का उसे अपनी गलतियां बता रहा है। सुल्तान ज़द शाह जो अब गुस्से से ज्यादा शर्मिंदगी और खौफ में था, अपने तख्त से उठ खड़ा हुआ।

"ऐ हामिद हिसाबदार," सुल्तान ने तकरीबन कांपते हुए लहजे में कहा, "तुमने हमारा ख्वाब बताया, हमारा खजाना वापस दिलवाया और हमारे वफादार वजीर को रिहा करवाया। तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे इल्म में कोई शक नहीं है। बताओ तुम्हारी क्या ख्वाहिश है? दौलत, जमीनें या तुम वजीर एआम बनना चाहते हो? तुम जो भी मांगोगे हम तुम्हें अता करेंगे।" सुल्तान को यकीन था कि यह गरीब लड़का दौलत या ताकत मांगेगा।

हामिद ने नजरें उठाईं और सुल्तान की आंखों में देखा। उसकी आवाज में ना कोई लालच था, ना कोई गुरूर बल्कि सिर्फ सच्चाई का वजन था। "जहांपनाह," हामिद ने अदब से कहा, "मुझे ना आपकी दौलत चाहिए ना आपका तख्त। मेरा इल्म खिदमत खलकत के लिए है ना कि खुदग्रजी के लिए।" दरबार में सन्नाटा छा गया। सुल्तान ज़द हैरत से हामिद को देखता रहा।

हामिद ने फिर कहा, "मेरी सिर्फ तीन दरख्वास्तें हैं जो आपकी हुक्मरानी के इंसाफ से जुड़ी हैं। अगर आप इन्हें पूरा कर दें तो मुझे मेरी खिदमतगारी का बदला मिल जाएगा। मेरी पहली दरख्वास्त यह है कि वजीर आजम इनायत अली खान को सिर्फ रिहा ही ना किया जाए बल्कि उन्हें उनके पद और इज्जत के साथ वापस लाया जाए। वह आपके अब्बा जान के सच्चे खादिम थे और आज भी इस सल्तनत के लिए उनसे ज्यादा वफादार कोई नहीं है।" सुल्तान ने फौरन यह दरख्वास्त मंजूर कर ली। वजीर आजम इनायत अली खान को तमाम इज्जत के साथ बहाल कर दिया गया।

"मेरी दूसरी दरख्वास्त यह है कि ख्वाजा जिया जिसने अपने ओहदे का गलत फायदा उठाकर आवाम पर जुल्म किया और वह तमाम वजीर जो आपके हुक्म के बिना आवाम से जबरन टैक्स वसूल करते थे, उन्हें उनके पद से हटाया जाए और उन पर जुल्म का हिसाब लगाया जाए।" सुल्तान ज़द को मजबूरन यह भी मानना पड़ा। उसने फौरन हुक्म जारी किया कि तमाम जालिम वजीरों को उनके ओहदों से हटा दिया जाए।

हामिद कुछ देर खामोश रहा और फिर उसने सुल्तान की तरफ देखकर कहा, "और जहांपनाह, मेरी तीसरी दरख्वास्त आपसे जुड़ी है। दरवेश इल्म अब्दुल बाकी की पेशीनगोई याद कीजिए। उन्होंने कहा था कि आपका गुरूर ही आपके जवाल का सबब बनेगा। आप एक शहजादे थे लेकिन गुरूर के सबब आप एक जालिम बन गए। आपने सिर्फ अपने नफ्स की हुक्मरानी की। इंसाफ का तकाजा है कि आपकी हुक्मरानी आज खत्म होनी चाहिए ताकि जुनैदाबाद को इंसाफ मिल सके।" यह सुनकर दरबार में हंगामा मच गया। वजीर एआम इनायत अली खान भी हैरान रह गए। सुल्तान ज़द शाह का चेहरा इस बेइज्जती से सुन्न पड़ गया।

हामिद ने फौरन दरख्वास्त का दूसरा हिस्सा पेश किया, "मगर क्योंकि आपने आज इंसाफ का दामन थामा है और मेरी दरख्वास्तों को कबूल किया है, इसलिए मैं आपसे एक दूसरा वादा चाहता हूं। आप तख्त छोड़ दीजिए और अपने उस गुरूर की सजा के तौर पर आप जुनैदाबाद के आम खादिम बन जाइए।"

सुल्तान ज़द शाह को अपने गुरूर की सजा मिल चुकी थी। उसके पास दो रास्ते थे: या तो हामिद को कत्ल करवा दे या तख्त छोड़ दे। लेकिन उसे डर था कि अगर उसने हामिद को कत्ल करवाया तो उसके इल्म से कोई और बगावत कर देगा और वह मुकम्मल तौर पर जलील होकर मरेगा। उसने अपने अब्बा फिरोज शाह आदिल के इंसाफ और दरवेश इल्म अब्दुल बाकी की पेशीनगोई को याद किया। सुल्तान ज़द शाह ने अपने सिर का ताज उतारा, उसे तख्त के कदमों में रखा और ऐलान किया, "ऐ जुनैद आबाद के आवाम, आज से मैं शहजादा ज़द बिन फिरोज अपनी सल्तनत और अपनी तकदीर की खिदमतगारी की सजा कबूल करता हूं। मैं तख्त छोड़ता हूं।" सुल्तान ज़द की आंखों में अब गुरूर की जगह पछतावा था।

इनायत अली खान को नया सुल्तान बनने की पेशकश की गई, मगर उन्होंने अदब से इंकार कर दिया। इनायत अली खान ने दरबारियों को जमा किया और हामिद की इल्म और नेकी को देखते हुए उसे जुनैदाबाद का नया सुल्तान बनाने का ऐलान किया। हामिद ने अपने इल्म और खिदमतगारी से एक जालिम हुकूमत को खत्म किया और सल्तनत को सही राह पर लाया। ज़द शाह ने अपनी बची हुई जिंदगी एक आम खादिम के तौर पर गुजारी और इस तरह खिदमतगारी का बदला पूरा हुआ।

तो प्यारे दोस्तों, इस कहानी 'खिदमतगारी का बदला: दरवेश और शहजादा' से हमें यह सबक मिलता है कि गुरूर का पतन होता है, ताकत और दौलत हमेशा की नहीं होती और गुरूर हमेशा जवाल का सबब बनता है। इंसाफ और आवाम की खिदमत ही सच्ची हुक्मरानी है। दौलत से ज्यादा कीमती इल्म होता है। इल्म जब खिदमत खल्क और इंसाफ के लिए इस्तेमाल होता है तो वह बड़े-बड़े तख्तों को झुका सकता है। किसी की खिदमत का बदला हमेशा अच्छा मिलता है, चाहे वह इनायत अली खान की वफादारी हो या हामिद का नेक इल्म।

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