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Allah Ki Nemat Aur Sabr Ka Inaam Jisne Taqdeer Badal Di | Islamic Moral Story #hindistory |

Mr. MR Voice 53:30

Transcription

सदियों पुरानी बात है जब हिंदुस्तान की सरज पर बादशाहतों और रियासतों का दौर हुआ करता था। उसी दौर में फिदा नूर नाम की एक सल्तनत हुआ करती थी। जहां का बादशाह सुल्तान आजम अली खान एक ऐसा हुक्मरान था जिसकी तलवार की काट और अक्ल की धाक से बड़े-बड़े दुश्मन थर्राते थे। उसकी सल्तनत में नदियां सोना उगलती थी और खेत खलिहान अनाज से लदे रहते मगर सुल्तान आजम अली खान के मिजाज में एक बहुत बड़ी खामी थी और वह था उसका तकुर यानी घमंड। उसे लगता था कि उसकी रियाया की खुशहाली, उसके मंत्रियों की अक्ल और उसकी बेटी की शानदार जिंदगी सिर्फ और सिर्फ उसकी वजह से है। उसे यह वहम हो गया था कि वह रजाक है। यानी रोजी देने वाला वही है।

सुल्तान की एक ही औलाद थी शहजादी ज़ैनब जो ना सिर्फ खूबसूरती में 14वीं के चांद को शर्मिंदा करती थी बल्कि उसकी रूहानियत और अल्लाह पर उसका तवकुल बेमिसाल था। जहां सुल्तान अपनी ताकत पर नाज़ करता। वहीं ज़ैनब अपनी पेशानी सजदे में झुकाकर हर नेमत का शुक्र अपने परवरदिगार को अदा करती। ज़ैनब के महल में हर वक्त कुरान की तिलावत और अल्लाह के जिक्र की गूंज रहती थी। उसकी सोबत में बैठने वाली कनीज़ें भी बा अदब और दीनदार थी।

एक मर्तबा का जिक्र है कि सल्तनत में मौसम बहार का जश्न मनाया जा रहा था। पूरा शहर दुल्हन की तरह सजाया गया था। महलों की दीवारों पर रेशमी पर्दे लटकाए गए थे और फिजा में इत्र और गुलाब की खुशबू बसी हुई थी। सुल्तान आजम अली खान अपने आलीशान तख्त ताऊस पर बैठा था जिसके पाए सोने के थे और उस पर हीरे जवाहरात जड़े थे। दरबार में बड़े-बड़े वजीर अमीर सिप सालार और पड़ोसी मुल्कों के सफीर मौजूद थे। हर कोई सुल्तान की तारीफ में कसीदे पढ़ रहा था। जिल्ले इलाही की वजह से आज हमारी थालियों में खाना है। एक खुशामदी वजीर ने झुककर कहा, अगर हुजूर ना होते, तो यह सल्तनत बंजर हो जाती।

सुल्तान ने अपनी मूछों पर ताव देते हुए एक मगरूर मुस्कान के साथ दरबार की तरफ देखा और फिर उसकी नजर अपनी बेटी शहजादी ज़ैनब पर पड़ी जो अपने मखमली लिबास में लिपटी। निगाहें नीची किए तस्बीहें पढ़ रही थी। सुल्तान को अचानक अपनी बेटी की आजमाइश करने की सूझी। उसने सोचा कि देखूं तो सही कि मेरी बेटी मेरी कितनी कदरदान है। सुल्तान ने अपना हाथ उठाया और महफिल में सन्नाटा छा गया। उसने भारी और रबीली आवाज में पूछा मेरी प्यारी बेटी ज़ैनब जरा दरबार को बताओ कि तुम्हें यह रेशमी लिबास, यह लजीज खाने, यह महफूज़ महल और यह तमाम खुशियां किसने अता की हैं?

शहजादी ज़ैनब ने अपनी तस्बीह रोकी। सर उठाया और अपनी बड़ी-बड़ी रोशन आंखों से अपने वालिद को देखा। उसकी आंखों में ना तो कोई खौफ था और ना ही कोई दुनियावी लालच। उसने बड़े अदब और धीमे लहजे में जो दरबार के हर कोने में सुनाई दिया जवाब दिया अब्बा हुजूर बेशक आप मेरे वालिद हैं। और आपकी मोहब्बत का कोई मोल नहीं। लेकिन यह तमाम नेमतें, यह इज्जत, यह रिज़्क और यह सांसे सिर्फ और सिर्फ अल्लाह रब्बुल इज्जत की अता है। आप तो महज एक जरिया हैं। देने वाली जात तो ऊपर वाले की है।

यह सुनते ही दरबार में एक अजीब सी खामोशी छा गई। जैसे किसी ने चलती हुई सांसों को रोक दिया हो। सुल्तान का चेहरा जो पल भर पहले फक्र से चमक रहा था। अब गुस्से की वजह से तमतमा उठा। उसे लगा जैसे भरे दरबार में उसकी तौहीन हो गई हो। उसकी अपनी ही बेटी ने उसकी खुदाई के दावे को जो वह अनजाने में कर बैठा था मिट्टी में मिला दिया था। सुल्तान ने अपने गुस्से को दबाते हुए दांत पीसकर दोबारा पूछा। जरा सोच समझ कर जवाब दो जैनब। अगर मैं अपनी तिजोरियां बंद कर दूं। अगर मैं अपने सिपाहियों को हटा लूं तो क्या तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे लिए आसमान से रोटियां बरसाएगा? बताओ यह निवाला जो तुम्हारे हलक से नीचे उतरता है, इसे कौन कमा कर लाता है?

ज़ैनब के चेहरे पर अब भी वही सुकून था जो किसी दरबेश के चेहरे पर होता है। उसने नरमी से कहा, बादशाह सलामत रिज़्क के दरवाजे तिजोरियों की चाबियों से नहीं खुलते। वह अल्लाह की मर्जी से खुलते हैं। अगर वह चाहे तो पत्थर के अंदर मौजूद कीड़े को भी रिज़्क पहुंचाता है। और अगर वह ना चाहे तो बादशाहों के दस्तरखान भी वीरान हो जाते हैं। मेरी अकीदत कहती है कि मेरा और आपका हम सबका पालने वाला सिर्फ अल्लाह है।

अब सुल्तान के सब्र का पैमाना लबालब भर चुका था। उसका गुरूर चकनाचूर हो गया था। वह अपने तख्त से खड़ा हो गया। उसकी आंखों में शोले भड़क रहे थे। उसने गरजते हुए कहा, खामोश बहुत हो गई तुम्हारी यह फलसफियाना बातें। तुम्हें अपने अल्लाह पर बहुत भरोसा है ना? तुम्हें लगता है कि मेरी मेहनत, मेरी अक्ल और मेरी बादशाहत की कोई अहमियत नहीं तो ठीक है। आज मैं देखता हूं कि तुम्हारा तवकुल तुम्हें कैसे बचाता है। पूरा दरबार थरथर कांप रहा था। वजीर आजम ने आगे बढ़कर कुछ कहना चाहा। गुस्ताखी माफ हुजूर शहजादी अभी नादान है। लेकिन सुल्तान ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया।

सुल्तान ने हुक्म दिया अभी और इसी वक्त एक ऐसे शख्स को तलाश किया जाए जो इस पूरी सल्तनत में सबसे ज्यादा बदनसीब, सबसे ज्यादा गरीब और सबसे ज्यादा हिकारत की नजर से देखा जाता हो। मैं अपनी बेटी ज़ैनब का निकाह उस शख्स से करूंगा और इसे इसी वक्त महल से रुखसत करूंगा। मैं भी तो देखूं कि जब सर से बाप का साया और जिस्म से शाही लिबास उतर जाता है तो कौन सा गैबी फरिश्ता इसकी मदद को आता है। पहरेदार और सिपाही फौरन हुक्म की तामील के लिए दौड़ पड़े।

शहजादी ज़ैनब अपनी जगह साकित खड़ी रही। उसकी आंखों में आंसू जरूर थे। मगर यह आंसू खौफ के नहीं बल्कि अपने वालिद की इस हालत पर अफसोस के थे। महल में कोहराम मच गया। ज़ैनब की वालिदा मल्लिका- आलिया दौड़ी दौड़ी आई और सुल्तान के पैरों में गिर पड़ी। दुहाई है महाराज। ऐसा जुल्म ना करें। वो हमारी फूल सी बच्ची है। वो महलों के अलावा कहीं और सांस भी नहीं ले पाएगी। मगर सुल्तान के दिल पर तो जैसे पत्थर रखा हुआ था। उसने मल्लिका की एक ना सुनी।

थोड़ी ही देर बाद सिपाही एक अजीबोगरीब शख्स को दरबार में घसीटते हुए लाए। उस शख्स को देखकर दरबारियों ने अपनी नाक पर रुमाल रख लिए। उसके जिस्म से पसीने और कोयले की बदबू आ रही थी। उसके बाल उलझे हुए थे जैसे बरसों से उनमें कंघी ना की गई हो। कपड़े तार-तार थे और कालिख से सने हुए थे। वह कोई मामूली फकीर नहीं था। बल्कि शहर के किनारे श्मशान और भट्टियों के पास रहने वाला एक कोयला बीनने वाला था। जिसे लोग काला सादिक कहकर चढ़ाते थे। सादिक ना तो ठीक से बोल पाता था और ना ही सीधा खड़ा हो पाता था। उसकी कमर झुकी हुई थी और चेहरे पर एक गहरा जख्म का निशान था जो उसे और भी डरावना बनाता था।

सुल्तान ने उस काले बदसूरत और दुनिया के ठुकराए हुए शख्स को देखा और एक जालिमाना हंसी के साथ कहा हां यह बिल्कुल सही है। ज़ैनब देखो अपने होने वाले शौहर को। आज से तुम्हारी तकदीर इस कोयले वाले के साथ जुड़ गई है। हमारा अल्लाह इस कालिक में से तुम्हारे लिए कौन सा नूर पैदा करता है? काजी को बुलाया गया। काजी के हाथ कांप रहे थे। उसने डरतेडरते निकाह पढ़ा। ज़ैनब ने की कबूल है। कहा तो उसकी आवाज में एक अजीब सी दृढ़ता थी। जैसे उसने अल्लाह के फैसले को दिल से स्वीकार कर लिया हो।

निकाह के फौरन बाद सुल्तान ने हुक्म दिया। ज़ैनब को अभी महल से बाहर निकाल दिया जाए। इसे एक भी जेवर, एक भी अशरफी या एक भी शाही जोड़ा साथ ले जाने की इजाजत नहीं होगी। यह उन्हीं कपड़ों में जाएगी जो इसने पहने हैं। खबरदार अगर किसी ने इसकी मदद करने की कोशिश की तो उसका सर कलम कर दिया जाएगा। ज़ैनब ने आखिरी बार अपने वालिद की तरफ देखा। उसकी नजरों में कोई शिकायत नहीं थी। बस एक खामोश दुआ थी कि अल्लाह उसके वालिद को हिदायत दे। उसने अपनी रोती बिलखती मां को गले लगाया और कहा अम्मी जान सब्र करें अल्लाह अपने बंदों को कभी तन्हा नहीं छोड़ता यह भी एक इम्तिहान है और इंशा्लाह मैं इसमें कामयाब होंगी और फिर फिदा नूर की वो नाजुक कली शहजादी ज़ैनब उस बदहवास और खामोश सादिक के पीछेछे आलीशान महल की देहरी लांघ कर अंधेरी रात और अनजान रास्तों की तरफ चल पड़ी।

महल के भारी दरवाजे उसके पीछे बंद हो गए। एक तरफ रोशनी और कहकहे थे और दूसरी तरफ गुप अंधेरा और वीरानी। ज़ैनब को नहीं पता था कि सादिक उसे कहां ले जा रहा है। शहर की गलियां सुनसान थी और कुत्ते भौंक रहे थे। सादिक लंगड़ाता हुआ आगे चल रहा था और ज़ैनब नंगे पांव कंकरले रास्ते पर उसके पीछे चल रही थी। उसके कोमल पैरों में छाले पड़ने शुरू हो गए थे। मगर उसकी जुबान पर सिर्फ अल्लाह का जिक्र था। शहर की आबादी खत्म हो गई और वे एक बंजर पथरीले इलाके में पहुंचे जिसे लोग बदरूहों की बस्ती कहते थे। वहां दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी। सिर्फ टूटी फूटी पुरानी कब्रें और जलती हुई फट्टियों का धुआं था। सादिक एक टूटी हुई झोपड़ी के सामने रुका जिसकी छत आधी गिरी हुई थी और दीवारें काली पड़ चुकी थी। यह एक ऐसी जगह थी जहां दिन में भी लोग आने से डरते थे। सादिक ने इशारे से ज़ैनब को बताया कि यही उसका घर है।

ज़ैनब ने उस वीरान खंडहर को देखा जहां अब उसे अपनी जिंदगी गुजारनी थी। एक पल के लिए उसका दिल दहल गया। उसे अपने मखमली बिस्तर और कनीज़ों की याद आई। लेकिन फ़ौरन उसने अपने ख्यालों को झटक दिया और दिल में कहा। या अल्लाह अगर तेरी यही मर्जी है तो मैं इस खंडहर को भी जन्नत बना दूंगी शहजादी। ज़ैनब ने अपनी कांपती हुई आवाज में यह अल्फाज कहे और उस टूटी फूटी झोपड़ी की देहरी पर अपना पहला कदम रखा। अंदर घुप अंधेरा था। ऐसा अंधेरा जो इंसान की रूह में उतर जाए। फिजा में बरसों पुरानी सीलन, जलते हुए कोयले की कड़वी गंध और मायूसी की एक अजीब सी बू रची बसी थी। ज़ैनब जो कल तक श्मा दानों की रोशनी और इत्र की खुशबू में सांस लेती थी। उसे लगा जैसे उसका दम घुट जाएगा। उसके पांव किसी सख्त चीज से टकराए। शायद कोई मिट्टी का टूटा हुआ खड़ा था। तभी पीछे से एक हल्की सी रगड़ की आवाज आई। सादिक वो कोयला बीनने वाला अभी भी दरवाजे के बाहर खड़ा था। जैसे उसे अंदर आने में झिझक हो रही हो या शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था कि उसकी बदनसीब कुटिया में एक शहजादी दाखिल हुई है। उसने अपनी फटी हुई जेब से चकमक पत्थर निकाला और बड़ी मुश्किल से एक चिंगारी सुलगाई। एक कोने में पड़े हुए टूटे से दिए में थोड़ा सा तेल बाकी था। जैसे ही बाती जली झोपड़ी की बदहवाली खुलकर सामने आ गई। छत पर मकड़ी के बड़े-बड़े जाले लटक रहे थे जो हवा में किसी मनहूस साए की तरह झूल रहे थे। दीवारों पर कालख की मोटी परत जमी थी और कोने में एक चारपाई थी जिसकी रस्सियां बीच से टूटी हुई थी और उस पर एक मैला कुचैला टाट बिछा था।

ज़ैनब ने चारों तरफ देखा। उसकी आंखों से आंसू गिरने ही वाले थे कि उसने अपनी मां मल्लिका ए आलिया के अल्फाज याद किए। बेटी हालात चाहे जैसे भी हो अपनी खुददारी मत खोना। ज़ैनब ने अपने आंसुओं को पी लिया और सादिक की तरफ मुड़ी जो सर झुकाए अपराधी की तरह दरवाजे पर खड़ा था। उसके चेहरे पर लगे कोयले के दाग और वो गहरा जख्म दिए की मध्यम रोशनी में और भी भयानक लग रहे थे। ज़ैनब ने अपनी मखमली आवाज में जिसमें शाही रोब नहीं बल्कि एक इंसानियत की नरमी थी। कहा आप बाहर क्यों खड़े हैं? अब यह घर जितना मेरा है, उतना ही आपका भी है। सादिक चौंक गया। शायद उसने अपनी जिंदगी में किसी से इतनी इज्जत भरा लहजा नहीं सुना था। वो लंगड़ाता हुआ अंदर आया और एक कोने में पड़ी पुरानी बोरी पर सिकुड़ कर बैठ गया।

ज़ैनब ने उस टूटी चारपाई की तरफ देखा। उस पर बैठने की हिम्मत जुटाना मुश्किल था। लेकिन उसने अपने भारी और कीमती लहंगे को संभाला और चारपाई के एक साफ कोने पर बैठ गई। रात गहरा रही थी और उस वीरान बस्ती से अजीबोगरीब आवाजें आ रही थी। कभी दूर रोते हुए सियार की आवाज तो कभी हवा के झोंकों से खड़खड़ाते हुए टीन के टुकड़े भूख और प्यास से ज़ैनब का बुरा हाल था। महल में इस वक्त शाही दस्तरखान बिछता था। जहां तरह-तरह के पकवान होते थे। लेकिन यहां पीने के लिए पानी का एक कतरा भी नहीं था। सादिक शायद उसकी हालत समझ गया। उसने अपनी कमर से बंधा एक छोटा सा मिट्टी का कुल्हड़ निकाला और कोने में रखे एक घड़े से पानी उंडेला। पानी साफ नहीं था। उसमें मिट्टी के जर्रे तैर रहे थे। सादिक ने कांपते हाथों से कुलहट ज़ैनब की तरफ बढ़ाया। ज़ैनब ने एक पल के लिए उस गंदले पानी को देखा। फिर बिस्मिल्लाह कहकर पी गई। प्यास बुझी तो जान में जान आई। उस रात दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। सादिक जमीन पर उसी बोरी पर लेट गया और ज़ैनब उस सख्त चारपाई पर नींद आंखों से कोसों दूर थी। उसे बार-बार अपने पिता सुल्तान आजम अली खान का वो गुस्सैल चेहरा याद आ रहा था। और वह सोच रही थी कि क्या वाकई अल्लाह उसकी मदद करेगा? क्या यह इम्तिहान उसकी बर्दाश्त से बाहर तो नहीं? इसी उधेड़बन में ना जाने कब उसकी आंख लग गई।

सुबह हुई तो किसी मुर्गे की बांग से नहीं बल्कि भट्टियों के शोर और भारी हथौड़ों की आवाजों से ज़ैनब की नींद खुली। सूरज की किरणें छत के छेदों से छनकर अंदर आ रही थी और धूल के जर्रे हवा में नाच रहे थे। ज़ैनब हड़बड़ा कर उठी। सादिक अपनी जगह पर नहीं था। वो उठकर बाहर आई तो नजारा देखकर उसका दिल दहल गया। रात के अंधेरे ने जिस बदसूरती को छुपा रखा था, दिन के उजाले ने उसे बेनकाब कर दिया था। चारों तरफ काले धुएं के बादल थे। दूर-दूर तक ईंटों के भट्टे और कोयले के पहाड़ नजर आ रहे थे। हवा में राख उड़ रही थी जो सांसों के जरिए सीधे फेफड़ों में उतर रही थी। यह बदरूहों की बस्ती नहीं बल्कि जीते जागते इंसानों का दोज था। जैनब ने देखा कि कुछ औरतें जिनके कपड़े मैले थे और चेहरे वक्त से पहले बूढ़े हो चुके थे। सर पर भारी टोकरा उठाए जा रही थी। बच्चे नंगे बदन कीचड़ और राख में खेल रहे थे।

ज़ैनब को प्यास लगी थी। उसने इधर-उधर देखा तो थोड़ी दूर पर एक पुराना कुआं नजर आया। उसने झोपड़ी में पड़ा वही मिट्टी का घड़ा उठाया और कुएं की तरफ चल पड़ी। उसका लिबास हालांकि अब मैला हो चुका था और जगह-जगह से फट गया था। लेकिन उसका रेशमी कपड़ा और उस पर जड़े मोती अभी भी चमक रहे थे। जब वो कुएं के पास पहुंची तो वहां मौजूद औरतों ने अपना काम रोक दिया और उसे हैरानी से घूरने लगी। एक बूढ़ी औरत जिसकी कमर दोहरी हो चुकी थी और जिसके चेहरे पर झुद्रियों का जब जाल था आगे बढ़ी उसका नाम माईज जूनी था। बस्ती के लोग उसे मनहूस समझते थे। लेकिन वह दुनिया की हकीकत को जानती थी। माई जूनी ने अपनी धुंधली आंखों से ज़ैनब को ऊपर से नीचे तक देखा और तंजिया लहजे में बोली, अरे देखो तो यह कौन सी परी रास्ता भूलकर हमारे नर्क में आ गिरी है। यह रेशम यह नजाकत ए लड़की यह कोयला बस्ती है। यहां फूल नहीं खिलते सिर्फ राख बनती है। तू यहां कहां से आई?

जैनब ने अदब से सर झुकाया और कहा अम्मा मैं अब यहीं रहती हूं उस सामने वाली झोपड़ी में औरतों ने एक दूसरे को देखा और कान्हा फूंसी करने लगी वो तो सादिक की झोपड़ी है क्या यह उस गूंगे और कोढ़ी की जोरू है एक तीखी नाक वाली औरत जिसका नाम बिल्लो था जोर से हंसी सादिक की किस्मत कूड़े के ढेर में हीरा मिल गया लेकिन ए बीवी यह हाथ देखो अपने उसने ज़ैनब के मेहंदी रचे कोमल हाथों की तरफ इशारा किया। यह हाथ पानी खींचने के लिए नहीं शहजादों के लिए पान बनाने के लिए हैं। यहां की रस्सी तेरी खाल उधेड़ देगी।

ज़ैनब को उनकी बातों से तकलीफ हुई। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने डल्टी कुएं में डाला। महल में उसने कभी एक तिनका भी नहीं उठाया था। भरी हुई बाल्टी खींचना उसके लिए पहाड़ तोड़ने जैसा था। रस्सी उसके नाजुक हाथों में चुभने लगी। हथेलियों में जलन होने लगी। लेकिन उसने दांत भी कर पूरी ताकत लगाई और पानी ऊपर खींच ही लिया। उसकी सांस फूल गई थी। माय जूनी यह सब देख रही थी। उसने धीमे से कहा। हौसला तो है छोकरी में। पर देखिए कब तक टिकती है।

ज़ैनब पानी लेकर वापस झोपड़ी में आई। अब असली इम्तिहान शुरू हुआ। उसे घर साफ करना था। उसने अपनी रेशमी ओढ़नी को कमर में बांधा और झाड़ू लगाने लगी। जिस फर्श पर कल तक वह मखमल के जूतों के बिना नहीं चलती थी, आज उसे अपने हाथों से साफ कर रही थी। धूल और गर्द से उसकी खांसी छूट गई। आंखों में पानी आ गया। लेकिन वो रुकी नहीं। उसने दीवारों के जाले साफ किए। बर्तनों को राख से मांजा। दोपहर होते-होते वो पसीने से तर-बतर हो चुकी थी। उसका शाही लिबास अब एक मजदूर के कपड़ों जैसा लग रहा था। और उसका चेहरा जो कल तक गुलाब की तरह था अब कोयले की कालिख से सज चुका था। लेकिन अजीब बात थी। उसे थकान के साथ-साथ एक रूहानी सुकून मिल रहा था। उसे लग रहा था कि आज उसने अपनी जिंदगी की पहली हलाल मेहनत की है।

दोपहर ढलने को थी कि सादिक वापस आया। उसके कंधे पर एक छोटी सी पोटली थी और वह लंगड़ा रहा था। उसने जब झोपड़ी को देखा तो ठिठक गया। वो खंडहर अब एक घर लग रहा था। चीजें सलीके से रखी थी। फर्श साफ था और दरवाजे पर एक पुराना पर्दा लटका था जिसे ज़ैनब ने अपने फटे हुए दुपट्टे से बनाया था। सादिक की आंखों में एक चमक आई। उसने पोटली ज़ैनब के आगे रख दी। उसमें दो सूखी रोटियां और थोड़ी सी प्याज थी। यह उसकी पूरे दिन की मजदूरी थी। ज़ैनब के पेट में चूहे कूद रहे थे। उसने वो सूखी रोटी देखी जो शायद कई दिन पुरानी थी लेकिन उसने नाक नहीं सिकोड़ी। उसने रोटी के दो टुकड़े किए। एक सादिक की तरफ बढ़ाया और एक खुद लिया। सादिक ने इशारे से मना किया। जैसे कह रहा हो कि यह सिर्फ तुम्हारे लिए है। लेकिन ज़ैनब ने जिद करके उसके हाथ में रोटी थमा दी। हम साथ खाएंगे। उसने कहा जैसे ही ज़ैनब ने पहला निवाला मुंह में डाला, सूखी रोटी हलक में अटकने लगी। आंखों से आंसू निकल आए। उसे महल के कोरमे और बिरयानी याद आ गई। लेकिन उसने पानी के साथ निवाला निगला और दिल में अल्लाह का शुक्र अदा किया। ए अल्लाह तेरा शुक्र है कि तूने भूखा नहीं रखा।

खाने के बाद सादिक ने राख पर एक लकड़ी के टुकड़े से कुछ लकीरें खींची और इशारों में समझाने की कोशिश की कि वह कल से और ज्यादा काम करेगा ताकि कुछ बेहतर ला सके। जैनब समझ गई कि सादिक बोल नहीं सकता या शायद बोलता नहीं है। उसने सादिक के हाथों को देखा जो पत्थरों और कोयले से छिल चुके थे। उनमें गहरे घाव थे। ज़ैनब का दिल पसीज गया। उसने सोचा कि मुझे भी कुछ करना होगा। सिर्फ घर की सफाई से पेट नहीं भरेगा।

अगले कुछ दिन ऐसे ही संघर्ष में गुजरे ज़ैनब ने खुद को उस माहौल में ढालना शुरू कर दिया। लेकिन मुसीबतें कम नहीं थी। एक दिन जब ज़ैनब कुएं से लौट रही थी तो बस्ती का एक बदमाश ठेकेदार जिसका नाम शेरा था रास्ते में खड़ा हो गया। शेरा एक भारीभरकम और जालिम इंसान था जिसकी दहशत पूरी बस्ती में थी। उसकी नजर ज़ैनब पर पड़ी और उसकी नियत खराब हो गई। उसने अपना रास्ता रोका और गंदी हंसी के साथ बोला। अरे वाह कोयले की खान में ऐसा सोना। ए बी सादिक जैसा लंगड़ा तेरे लायक नहीं है। मेरे महल में चल रानी बनाकर रखूंगा।

ज़ैनब डर से पीछे हटी। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। आसपास कोई नहीं था। शेरा ने आगे बढ़कर ज़ैनब का हाथ पकड़ने की कोशिश की। ज़ैनब ने चीखना चाहा लेकिन आवाज गले में फंस गई। तभी अचानक एक साए की तरह कोई बीच में आ गया। वो सादिक था। सादिक जो हमेशा झुका रहता था आज शेर की तरह तन कर खड़ा था। उसकी आंखों में एक ऐसा वैशीपन था जिसे देखकर शेरा भी एक पल के लिए घबरा गया। सादिक के हाथ में एक भारी कुदाल थी। उसने कोई आवाज नहीं निकाली। बस शेरा की आंखों में आंखें डालकर खड़ा रहा। जैसे कह रहा हो कि अगर एक कदम भी आगे बढ़ाया तो जान ले लूंगा। शेरा ने सादिक का यह रूप कभी नहीं देखा था। उसने थूकते हुए कहा, पागल कुत्ते आज तो छोड़ रहा हूं, लेकिन याद रखना इस बस्ती का मालिक मैं हूं। तेरा दाना पानी बंद कर दूंगा।

शेरा वहां से चला गया लेकिन ज़ैनब कांप रही थी। सादिक ने कुदाल नीचे फेंकी और ज़ैनब की तरफ देखा। उसकी नजरों में फिक्र थी। उसने अपने मैले कुर्ते से ज़ैनब का गिरा हुआ घड़ा उठाया और घर की तरफ चलने का इशारा किया। उस दिन जैनब को एहसास हुआ कि यह शख्स जिसे दुनिया पागल और कमजोर समझती है, उसके अंदर एक रक्षक छिपा है। एक

एक ऐसा आदमी जो अपनी इज्जत के लिए अपनी जान दांव पर लगा सकता है। घर पहुँचकर ज़ैनब ने सादिक के उन ज़ख्मों पर, जो उसे काम के दौरान लगे थे, गीले कपड़े की पट्टी बांधी। यह पहली बार था जब सादिक ने उसे छूना महसूस किया। उसकी आँखों में नमी आ गई। लेकिन मुसीबतें अभी शुरू ही हुई थीं। शेरा की धमकी खाली नहीं थी। अगले ही दिन से सादिक को काम मिलना बंद हो गया। वह जिस भट्टी पर भी जाता, उसे धक्के मारकर निकाल दिया जाता। लोग कहते, "शेरा भाई का हुक्म है, तुझे काम नहीं मिलेगा।" दो दिन गुज़र गए। घर में खाने को एक दाना भी नहीं था। भूख से दोनों का बुरा हाल था। सादिक मायूस होकर कोने में बैठा रहता। उसे अपनी लाचारी पर गुस्सा आ रहा था।

तीसरी शाम, जब भूख बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो ज़ैनब उठी। उसने अपनी गठरी खोली। उसमें एक छोटी सी, मामूली सी पोटली थी जो उसने अपने कपड़ों में छुपा रखी थी। यह वे ज़ेवर नहीं थे जो बादशाह ने मना किए थे। बल्कि यह एक बहुत पुराना चांदी का सिक्का था जो उसकी दादी ने बचपन में उसे ईदी में दिया था और उसने उसे ताबीज़ की तरह सहेज कर रखा था। ज़ैनब ने वह सिक्का सादिक के हाथ में रखा और कहा, "इसे ले जाइए और कुछ आटा ले आइए।" सादिक ने मना करना चाहा, लेकिन ज़ैनब ने उसकी आँखों में देखा और कहा, "अल्लाह ने चाहा तो यह आखिरी सिक्का हमारी तकदीर की चाबी बनेगा। जाइए।" सादिक सिक्का लेकर गया। और ज़ैनब मुसल्ले पर बैठकर दुआ करने लगी। उसकी आँखें बंद थीं और लबों पर आयत करीमा का विर्द जारी था। झोपड़ी में गहरा सन्नाटा था। मगर बाहर हवाओं की 'साईं-साईं' किसी अनहोनी का पता दे रही थी। ज़ैनब का दिल डूब रहा था। उसे उस चांदी के सिक्के की कीमत की फिक्र नहीं थी, बल्कि इस बात की थी कि वह सिक्का एक शाही निशानी था, जिस पर फिदा नूर की सल्तनत का निशान और उसके परदादा का नाम खुदा हुआ था। अगर किसी ने उसे पहचान लिया तो क्या होगा? क्या लोग सादिक को चोर समझेंगे? ये ख्यालात उसे डस रहे थे। लेकिन पेट की आग और सादिक की लाचारी ने उसे यह खतरा मोल लेने पर मजबूर कर दिया था।

उधर, सादिक अपनी लंगड़ाती चाल और झुकी हुई कमर के साथ शहर के मुख्य बाज़ार, बाज़ार-ए-खास की तरफ बढ़ रहा था। बस्ती का काला धुआँ पीछे छूट गया था। और अब फ़िज़ा में मसालों, इत्र और भुने हुए गोश्त की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी। बाज़ार में चहल-पहल अपने शबाब पर थी। दुकानें ग्राहकों से अटी पड़ी थीं। कहीं रेशम के थान खोले जा रहे थे तो कहीं हलवाई बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में दूध हटा रहे थे। सादिक इस रंगीन दुनिया में एक बदनुमा दाग की तरह लग रहा था। लोग उसे देखकर कतरा कर निकल रहे थे। कोई अपनी नाक बंद कर लेता तो कोई हिकारत से उसे धुतकार देता। "हट जाओ कोयले वाले! मेरे कपड़े काले कर देगा!" एक रईसज़ादे ने उसे धक्का देते हुए कहा। सादिक चुपचाप बिना किसी शिकायत के एक तरफ हो गया। उसकी नज़रें सिर्फ एक किराने की दुकान तलाश रही थीं जहाँ वह उस सिक्के के बदले कुछ आटा और दाल ले सके।

आखिरकार, वह सेठ गिरधारी की दुकान पर पहुँचा। गिरधारी एक कंजूस और चालाक बनिया था, जिसकी नज़र गिद्ध जैसी तेज़ थी। दुकान पर भीड़ थी। सादिक एक कोने में खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार करता रहा। जब भीड़ थोड़ी छँटी तो उसने हिम्मत करके अपनी मुट्ठी खोली और वह पुराना, भारी चांदी का सिक्का काउंटर पर रख दिया। गिरधारी, जो अब तक सादिक को भगाने के मूड में था, सिक्के की खनक सुनकर चौंका। उसने सिक्का उठाया और उसे दीये की रोशनी में परखा। जैसे ही उसकी नज़र शाही मोहर पर पड़ी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। यह कोई मामूली सिक्का नहीं था। यह शाही टकसाल का वह नायाब सिक्का था जो सालों पहले बंद हो चुका था और अब सिर्फ शाही खजाने या रईसों की तिजोरियों में ही मिल सकता था। गिरधारी की आँखों में लालच और शक एक साथ उभर आए। उसने सादिक की फटी हुई कमीज़, उसके कोयले से सने हाथ और चेहरे के ज़ख्म को देखा और फिर उस बेशकीमती सिक्के को। "ओह, तो यह बात है!" गिरधारी ने एक मक्कार मुस्कान के साथ कहा और फिर अचानक ज़ोर से चिल्लाया, "चोर! चोर! पकड़ो इसे!" बाज़ार में सन्नाटा छा गया। लोग जमा होने लगे। "इस भिखारी ने शाही खजाने में सेंध लगाई है!" "देखो, यह शाही सिक्का इसके पास कहाँ से आया?" गिरधारी ने सिक्का हवा में लहराते हुए कहा। "ज़रूर इसने किसी अमीर की जान ली होगी या चोरी की होगी!" सादिक घबरा गया। वह कुछ बोल नहीं सकता था। बस 'ना' में सर हिलाता रहा और इशारों से समझाने की कोशिश करने लगा कि यह उसका है, उसे दिया गया है। लेकिन भीड़ तो तमाशा देखने की आदी होती है। उसे सच से क्या मतलब? दो-तीन हट्टे-कट्टे आदमियों ने सादिक को दबोच लिया। "मारो साले को! कोतवाल के पास ले चलो!" भीड़ में से आवाज़ें आने लगीं। सादिक की आँखों में वही बेबसी थी जो उस वक़्त थी जब सुल्तान ने उसका हाथ ज़ैनब के हाथ में दिया था। उसे अपनी जान की फिक्र नहीं थी। उसे फिक्र थी कि अगर उसे क़ैद हो गई तो ज़ैनब का क्या होगा? वह झोपड़ी में अकेली भूख से मर जाएगी।

तभी भीड़ को चीरती हुई एक भारी और रौबीली आवाज़ आई। "रुको!" सबने मुड़कर देखा। वहाँ एक बुज़ुर्ग शख्सियत खड़ी थी। सफेद लंबी दाढ़ी, आँखों में गज़ब का जलाल और बदन पर एक सादा लेकिन कीमती सफेद चोगा। यह शहर के सबसे मशहूर जौहरी और इज़्ज़तदार इंसान मिर्ज़ा यूसुफ थे। मिर्ज़ा यूसुफ की शहर में इतनी इज़्ज़त थी कि खुद वज़ीर भी उनके आगे सर झुकाते थे। मिर्ज़ा यूसुफ भीड़ के बीच आए और सादिक को उन लोगों की पकड़ से छुड़वाया। उन्होंने गिरधारी के हाथ से वह सिक्का लिया और गौर से देखा। फिर उन्होंने सादिक की आँखों में झाँका। सादिक की आँखों में डर था लेकिन बेईमानी नहीं थी। मिर्ज़ा यूसुफ, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानों और हीरों को परखने में गुज़ारी थी, एक पल में समझ गए कि माजरा क्या है। उन्हें याद आया कि कुछ दिन पहले ही शहर में खबर फैली थी कि शहज़ादी का निकाह एक फकीर से कर दिया गया है। "यह सिक्का चोरी का नहीं है," मिर्ज़ा यूसुफ ने अपनी दमदार आवाज़ में फैसला सुनाया। गिरधारी सकपका गया। "लेकिन हुज़ूर, यह शाही सिक्का और यह कोढ़ी..." "मैंने कहा ना!" मिर्ज़ा ने उसे घूरते हुए कहा, "यह सिक्का पुराना है। मुमकिन है इसे किसी ने खैरात में दिया हो और अगर यह चोर होता तो यह इसे खुलेआम तुम्हारी दुकान पर बेचने नहीं आता बल्कि किसी अंधेरे कोने में सौदा करता।" मिर्ज़ा यूसुफ ने अपनी जेब से चमड़े की एक थैली निकाली और उसमें से सोने की दो अशरफियाँ निकालकर गिरधारी के काउंटर पर पटक दीं। "इस गरीब को इस सिक्के की जो कीमत चाहिए वह मैं दे रहा हूँ और खबरदार जो किसी ने अब इसे तंग किया।" मिर्ज़ा ने सादिक के कंधे पर हाथ रखा जो अब भी काँप रहा था। मिर्ज़ा यूसुफ ने सिक्का अपनी जेब में रख लिया और सादिक को सोने की अशरफियाँ नहीं बल्कि रोज़मर्रा के इस्तेमाल के लिए ढेर सारे चांदी के छोटे सिक्के और एक बड़ी थैली दी। उन्होंने सादिक के कान में झुककर धीमे से कहा, "बेटा, मुझे नहीं पता यह सिक्का तुम्हारे पास कैसे आया। लेकिन इस शहर में भेड़िए बहुत हैं। अगली बार होशियार रहना। जाओ, अपने घर जाओ।" सादिक की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने झुककर मिर्ज़ा के हाथ को चूमने की कोशिश की, लेकिन मिर्ज़ा ने उसे गले लगा लिया।

सादिक ने जल्दी-जल्दी आटा, दाल, तेल, नमक और कुछ सब्ज़ियाँ खरीदीं। उसने ज़ैनब के लिए थोड़ा सा गुड़ भी लिया और फिर लंगड़ाता हुआ, जितनी तेज़ी से हो सके, बस्ती की तरफ भागा। उसे डर था कि कहीं कोई उसका पीछा न कर रहा हो। इधर, झोपड़ी में ज़ैनब का दिल बैठा जा रहा था। काफी वक़्त गुज़र चुका था। "या अल्लाह, उनकी हिफाज़त करना!" वह बार-बार दुआ माँग रही थी। तभी दरवाज़े की आड़ से सादिक अंदर दाखिल हुआ। उसकी साँसें फूल रही थीं और पसीने से वह शराबोर था। लेकिन उसके चेहरे पर एक विजय मुस्कान थी। उसने सामान की गठरी ज़ैनब के सामने रख दी। ज़ैनब ने जब आटा और खाने का सामान देखा तो उसने राहत की साँस ली। उसने सादिक को देखा। उसके फटे हुए कुर्ते की आस्तीन और भी फट गई थी। लेकिन ज़ैनब ने सवाल नहीं किए। वह समझ गई कि कुछ बुरा होते-होते बचा है। उस रात उस खंडहर झोपड़ी में चूल्हा जला। कई दिनों बाद उस घर से ताज़ी रोटी की खुशबू उठी। यह खुशबू महल के छप्पन भोगों से कहीं ज़्यादा कीमती थी। ज़ैनब ने अपने हाथों से रोटी पकाई और सादिक को परोसी। दोनों ने पेट भर खाया।

खाने के बाद, जब रात का सन्नाटा गहरा गया, ज़ैनब चारपाई पर बैठी सोच में डूबी थी। सादिक कोने में बैठकर एक पुराने लोहे के तार को पत्थर पर घिसकर नुकीला बना रहा था। शायद वह उसे सुई की तरह इस्तेमाल करना चाहता था अपने फटे कपड़े सीने के लिए। ज़ैनब ने उसे देखा और एक गहरे ख़्याल ने उसे घेर लिया। "यह पैसा कितने दिन चलेगा?" उसने खुद से पूछा। "दो दिन, चार दिन या एक हफ्ता? फिर क्या होगा? क्या हम फिर से भीख माँगेंगे? क्या फिर कोई शाही निशानी बेचेंगे? नहीं। यह ज़िल्लत की ज़िंदगी हम कब तक जिएँगे?" शहज़ादी ज़ैनब की रगों में बादशाहों का खून था। लेकिन उसकी तरबियत में फकीरों का सब्र और हुनरमंदों की क़द्र भी शामिल थी। उसे याद आया कि बचपन में उसकी एक दाया, जो बहुत बूढ़ी थी, उसे ज़रदोज़ी और कशीदाकारी के वह नायाब टाँके सिखाती थी जो अब लुप्त हो रहे थे। ज़ैनब को वह काम बहुत पसंद था। लेकिन महल की मसरूफियतों में वह उसे भूल गई थी। "हुनर!" ज़ैनब बड़बड़ाई। "इंसान का असली खज़ाना उसका हुनर होता है।" उसने सादिक को बुलाया और इशारे से उसे अपने पास बैठने को कहा। "सुनिए!" ज़ैनब की आवाज़ में एक नई उम्मीद थी। "हम कब तक उस एक सिक्के के सहारे जिएँगे? हमें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। मुझे एक काम आता है, कढ़ाई का। अगर मुझे कपड़ा और धागा मिल जाए तो मैं ऐसे कपड़े तैयार कर सकती हूँ जो बाज़ार में अच्छी कीमत पर बिकेंगे।" सादिक ने अपनी खाली हथेलियाँ दिखाईं जैसे कह रहा हो, "लेकिन सामान खरीदने के लिए पैसे कहाँ हैं? जो पैसे बचे थे वह तो खाने में खर्च हो जाएँगे।" ज़ैनब मुस्कुराई, एक दर्द भरी लेकिन पुरअसर मुस्कान। "हमें नए सामान की ज़रूरत नहीं है," उसने कहा। ज़ैनब उठी और उस कोने में गई जहाँ उसने अपना वह भारी, मैला हो चुका शाही जोड़ा तय करके रखा था, जिसे पहनकर वह महल से निकली थी। यह वह लिबास था जो सुल्तान ने बहुत चाव से बनवाया था। उसमें असली सोने और चांदी के तार इस्तेमाल हुए थे और रेशम भी बेहतरीन था। ज़ैनब ने एक कैंची जैसा लोहे का टुकड़ा उठाया और उस बेशकीमती लिबास का एक किनारा काटना शुरू किया। सादिक की आँखें फैल गईं। वह आगे बढ़ा और उसने इशारे से पूछा, "यह क्या कर रही हो? यह तो तुम्हारी आखिरी शाही निशानी है!" ज़ैनब ने रुककर सादिक की आँखों में देखा और कहा, "माज़ी को ओढ़कर मुस्तकबिल नहीं सँवारा जा सकता। यह लिबास अब मेरे किसी काम का नहीं। लेकिन इसके धागे हमारी ज़िंदगी बदल सकते हैं।" और फिर पूरी रात एक अजीब मंज़र देखने को मिला। शहज़ादी ज़ैनब, जो कभी उस लिबास को पहनकर आईने के सामने इतराती थी, अब एक-एक करके उसके रेशमी धागों को उधेड़ रही थी। उसने सोने के तारों को अलग किया, चांदी के तारों को सीधा किया और रंगीन रेशम के धागों के गोले बनाए। सादिक यह देखकर हैरान था। उसे ज़ैनब में एक ऐसी औरत दिखाई दे रही थी जो हालातों के सामने घुटने टेकने के बजाय हालातों को अपने हिसाब से ढालने का हुनर जानती थी।

अगली सुबह, जब सूरज की किरणें झोपड़ी में दाखिल हुईं तो ज़ैनब के पास सुनहरे, रूपहले और रंग-बिरंगे धागों का ढेर लगा था। लेकिन अब एक और मसला था। कढ़ाई किस पर की जाए? मखमल या रेशम खरीदने की तो औकात नहीं थी। तभी सादिक बाहर गया और थोड़ी देर बाद एक पुरानी लेकिन साफ़-सुथरी टाट की बोरी धोकर लाया। यह वह बोरी थी जिसमें अनाज आता था। सादिक ने उसे पत्थर पर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया था। उसने वह टाट ज़ैनब के सामने रखा, शर्माते हुए। ज़ैनब ने उस खुरदरे टाट को छुआ। "कहाँ वह शाही मखमल और कहाँ यह चुभने वाला टाट?" लेकिन उसने मुस्कुराकर कहा, "यह बेहतरीन है। हम इसी पर शुरुआत करेंगे।" ज़ैनब ने काम शुरू किया। सादिक ने लोहे के तार को घिसकर जो सुई बनाई थी, वह थोड़ी मोटी थी, लेकिन ज़ैनब की उँगलियों में जादू था। उसने टाट के उस टुकड़े पर कोयले से एक डिज़ाइन बनाया। न कोई महल, न कोई मोर, बल्कि एक कमल का फूल जो कीचड़ में खिलता है। दिन गुज़रते गए। ज़ैनब घंटों सर झुकाए अपनी नाज़ुक उँगलियों को उस खुरदरे टाट पर चलाती रही। कई बार सुई चुभी, खून की बूँदें निकलीं लेकिन वह रुकी नहीं। सादिक उसके पास बैठता, कभी उसे पानी पिलाता, कभी हवा करता और कभी सुई की नोक को पत्थर पर घिसकर तेज़ करता। दोनों के बीच खामोशी थी। लेकिन इस खामोशी में मोहब्बत और साथ की एक नई दास्तान लिखी जा रही थी।

चार दिन बाद, वह नमूना तैयार था। यह एक करिश्मा था। उस भद्दे, खुरदरे टाट के टुकड़े पर सुनहरे और रूपहले तारों से बना वह फूल ऐसा चमक रहा था जैसे अंधेरे में जुगनू। ज़ैनब ने टाट की कमियों को ही उसकी खूबी बना दिया था। उसने सोने के तारों का इस्तेमाल ऐसे किया था कि टाट का खुरदरापन एक टेक्सचर बन गया था। यह कला का एक ऐसा नमूना था जो शायद शाही कारिंदों ने भी कभी नहीं देखा था। ज़ैनब ने वह कपड़ा सादिक के हाथों में दिया। "इसे बाज़ार ले जाइए," ज़ैनब ने कहा। "लेकिन इसे किसी कबाड़ी को मत दिखाइएगा। इसे उस दुकान पर ले जाइए जहाँ रईस लोग आते हों। और हाँ, कीमत आप तय नहीं करेंगे। उन्हें बोलने दीजिएगा।" सादिक ने वह कपड़ा एक पुराने सूती कपड़े में लपेटा और सीने से लगा लिया। उसे महसूस हो रहा था कि यह सिर्फ कपड़ा नहीं, ज़ैनब की रूह और मेहनत का निचोड़ है।

सादिक फिर से बाज़ार-ए-खास पहुँचा। इस बार उसके कदमों में झिझक नहीं थी। वह सीधा शहर की सबसे मशहूर कपड़ों की दुकान 'रंग महल' की तरफ गया, जहाँ सिर्फ वज़ीर और अमीर घराने की औरतें खरीदारी करती थीं। दुकान के मालिक सेठ मणिलाल ने जब सादिक को दुकान की सीढ़ियों पर चढ़ते देखा तो नौकरों को इशारा किया कि इसे भगा दो। "ए फकीर! यहाँ खैरात नहीं बँटती। आगे बढ़!" एक नौकर ने डंडा फटकारा। सादिक ने पीछे हटने के बजाय वह कपड़ा निकाला और उसका एक कोना खोलकर सेठ की तरफ कर दिया। सूरज की रोशनी उस सोने के काम पर पड़ी और एक पल के लिए सेठ की आँखें चौंधिया गईं। सेठ मणिलाल, जो कपड़ों का बड़ा पारखी था, अपनी गद्दी से उछल पड़ा। वह नंगे पाँव दौड़ता हुआ बाहर आया। उसने सादिक के हाथ से वह कपड़ा लिया और उसे उलट-पुलट कर देखने लगा। "यह... यह काम!" सेठ बड़बड़ाया। "यह टाट पर ज़रदोज़ी और टाँके इतने बारीक कि सुई की जगह भी न दिखे। यह तो शाही घराने का काम लगता है। 100 साल पहले होता था।" सेठ ने हैरान होकर सादिक को देखा। "यह तुम्हें कहाँ से मिला? सच-सच बताओ!" सेठ ने पूछा। लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पुलिस की धमकी नहीं बल्कि एक अजीब सा आदर और लालच था। सादिक ने अपनी छाती पर हाथ रखा और फिर घर की दिशा में इशारा किया। "मतलब मेरे घर से? तुम्हारे घर से? तुम्हारी बीवी ने बनाया है?" सेठ को यकीन नहीं आ रहा था। तभी दुकान के अंदर बैठी एक बहुत अमीर और मगरूर खातून, जो वज़ीर-ए-खज़ाना की बेगम थी, बाहर आई। उसकी नज़र उस कपड़े पर पड़ी। "आह, मणिलाल! यह क्या चीज़ है?" बेगम ने लपककर वह कपड़ा ले लिया। "इतनी नायाब चीज़! यह डिज़ाइन तो मैंने आज तक नहीं देखा। यह खुरदरापन और यह नज़ाकत। यह तो बिल्कुल नया फैशन बन सकता है। मुझे यह चाहिए, अभी!" बेगम ने बिना दाम पूछे एक भारी-भरकम थैली सेठ की तरफ फेंक दी। सेठ मणिलाल की बाछें खिल गईं। उसने थैली में से अपना मुनाफा रखा और बाकी पैसे, जो सादिक की उम्मीद से 10 गुना ज़्यादा थे, सादिक के हाथ में रख दिए। "सुनो!" सेठ ने सादिक का हाथ पकड़ लिया। "अपनी बीवी से कहना ऐसे और टुकड़े बनाएँ। जितना माल लाओगे उतना पैसा मिलेगा। कल ही दूसरा टुकड़ा चाहिए।"

सादिक जब पैसों की थैली लेकर दुकान से निकला तो उसका दिल खुशी से नाच रहा था। वह दौड़ता हुआ घर जाना चाहता था और ज़ैनब को यह खुशखबरी सुनाना चाहता था। लेकिन उसे खबर नहीं थी कि एक और आफ़त उसके पीछे लग चुकी है। बस्ती का गुंडा शेरा, जो पिछले कुछ दिनों से सादिक पर नज़र रखे हुए था, उसने सादिक को सेठ की दुकान से निकलते और पैसों की थैली छुपाते हुए देख लिया था। शेरा ने अपने साथियों की तरफ देखा और पान की पीक थूकते हुए कहा, "देखा! मैंने कहा था ना, यह लंगड़ा कोई खज़ाना छुपाए बैठा है। पहले शाही सिक्का और अब सेठ मणिलाल के पास से नोटों की गड्डी! आज रात इसकी झोपड़ी की तलाशी ली जाएगी। और अगर उसने ज़ुबान नहीं खोली तो उसकी वह खूबसूरत बीवी तो है ही हिसाब बराबर करने के लिए।" शेरा और उसके गुंडे सादिक के पीछे-पीछे बस्ती की तरफ चल पड़े, जबकि सादिक बेखबर अपनी धुन में मग्न था।

इधर, झोपड़ी में ज़ैनब बेचैनी से टहल रही थी। अचानक उसे लगा जैसे किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी है। उसने सोचा, "सादिक आ गए।" वह लपकी और दरवाज़ा खोला। लेकिन सामने सादिक नहीं था। सामने एक बूढ़ा, कुबड़ा फकीर खड़ा था, जिसकी आँखें सफेद थीं और हाथ में एक अजीब सा कटोरा था। "बेटी," फकीर ने घरघराती आवाज़ में कहा, "अल्लाह के नाम पर कुछ दे दे। बहुत भूखा हूँ।" ज़ैनब के पास देने को कुछ नहीं था। घर में एक भी रोटी नहीं बची थी। उसने अफ़सोस से कहा, "बाबा, अभी घर में कुछ नहीं है। मेरे शौहर आने वाले हैं, तब आइएगा।" फकीर ने एक अजीब सी हँसी हँसी जिससे ज़ैनब के रोंगटे खड़े हो गए। "तेरे शौहर तो आ रहे हैं बेटी, लेकिन उनके साथ मौत भी आ रही है!" फकीर ने कहा और मुड़कर धुएँ में गायब हो गया। ज़ैनब का दिल ज़ोर से धड़का। यह क्या इशारा था? उसे सादिक की बहुत फिक्र होने लगी। वह बाहर निकलकर देखने ही वाली थी कि उसे दूर से सादिक आता दिखाई दिया। लेकिन उसके कुछ ही कदम पीछे अंधेरे में छिपते हुए शेरा और उसके आदमियों की परछाइयाँ भी रेंग रही थीं। शहज़ादी समझ गई कि आज रात क़यामत की रात होने वाली है।

ज़ैनब ने सादिक को अंदर खींचा और झोपड़ी का कमज़ोर दरवाज़ा बंद करके भारी संदूक अड़ा दिया। लेकिन वह जानती थी कि यह लकड़ी का दरवाज़ा शेरा के वहशीपन को नहीं रोक पाएगा। बाहर कदमों की आहट रुकी और फिर एक ज़ोरदार लात दरवाज़े पर पड़ी। "खोलो, वरना आग लगा दूँगा!" शेरा की आवाज़ गूँजी। सादिक ने घबराकर ज़ैनब को पीछे किया और खुद एक ढाल बनकर खड़ा हो गया। उसने पास पड़ा हुआ लोहे का चिमटा उठा लिया। उसकी आँखों में मौत का खौफ नहीं बल्कि अपनी ज़ैनब की हिफाज़त का जुनून था। दरवाज़ा दूसरी ही टक्कर में चरमराकर टूट गया। शेरा और उसके तीन गुंडे अंदर दाखिल हुए। उनकी आँखों में हवस और लालच के शोले थे। "तो यह है वह खज़ाना!" शेरा ने सादिक के हाथ में पकड़ी हुई थैली और ज़ैनब की तरफ इशारा करते हुए कहा, "लंगड़े, यह पैसा और यह छोकरी दोनों अब शेरा के हैं!" सादिक शेर की तरह उन पर झपटा। एक कमज़ोर, भूखा और दिव्यांग जिस्म, लेकिन रूह एक मुहाफ़िज़ की। उसने चिमटा घुमाया और एक गुंडे के सर पर दे मारा। गुंडा चीखकर गिरा। लेकिन शेरा ताकतवर था। उसने सादिक की लाठी पकड़ ली और उसे इतनी ज़ोर से धक्का दिया कि सादिक दीवार से टकराकर गिर पड़ा। उसके माथे से खून बहने लगा। "नहीं!" ज़ैनब चीखी और सादिक की तरफ दौड़ी। शेरा ने ज़ैनब का हाथ पकड़ लिया। "चल मेरे साथ। महलों की रानी को अब मैं अपनी दासी बनाऊँगा।" ज़ैनब ने पूरी ताकत से विरोध किया, लेकिन वह बेबस थी। तभी झोपड़ी के टूटे हुए दरवाज़े से एक जलता हुआ कोयला उड़ता हुआ आया और सीधा शेरा की गर्दन पर लगा। शेरा चीखा और पीछे हटा। वहाँ दरवाज़े पर माई जूनी खड़ी थी और उसके पीछे बस्ती की वे तमाम औरतें थीं जो दिन भर कोयले की खदानों में काम करती थीं। उन सबके हाथों में जलते हुए मशाल, गर्म चिमटे और पत्थर थे। "खबरदार जो हमारी बेटी को हाथ लगाया!" माई जूनी की आवाज़ में शेरनी जैसी दहाड़ थी। "हम कोयले में रहती हैं शेरा। हमें जलाना मत सिखा, वरना राख कर देंगी।" यह वह अनपेक्षित मोड़ था जिसे किसी ने नहीं सोचा था। वे गरीब, दबी-कुचली औरतें जो शेरा के नाम से काँपती थीं, आज ज़ैनब के अख़लाक और सादिक की मोहब्बत ने उन्हें एक फ़ौज बना दिया था। शेरा ने देखा कि पूरा मोहल्ला उसके खिलाफ खड़ा है। औरतों ने पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। शेरा और उसके गुंडे, जो सिर्फ कमज़ोरों को दबाना जानते थे, इस संगठित शक्ति को देखकर दुम दबाकर भाग खड़े हुए। ज़ैनब दौड़कर माई जूनी के गले लग गई और फूट-फूटकर रोने लगी। माई जूनी ने उसके सर पर हाथ फेरा। "रो मत पगली। तूने हमें इज़्ज़त दी, हमें इंसान समझा तो क्या हम तुझे जानवरों के हवाले कर देते? आज से तू इस बस्ती की बेटी है।"

उस रात के बाद, फिदा नूर की उस अंधेरी बस्ती में एक नया सूरज उगा। सादिक और ज़ैनब ने उस हादसे को अपनी ताकत बना लिया। ज़ैनब ने माई जूनी और बस्ती की दूसरी औरतों को टाट पर सोने की कढ़ाई का हुनर सिखाना शुरू किया। वे औरतें जो कल तक सिर्फ कोयला ढोती थीं, अब कलाकार बन गई थीं। सादिक ने एक समझदार ताज़िर की तरह काम संभाला। वक़्त तेज़ी से गुज़रा। 2 साल बीत गए। टाट ज़री का काम इतना मशहूर हुआ कि दूरदराज़ के मुल्कों से लोग उस नायाब कपड़े को खरीदने आने लगे। लोग उसे 'ज़ुल्मत' कहते थे। बस्ती की काया पलट गई। अब वहाँ पक्के मकान थे। बच्चे मदरसे जाते थे और हर घर में खुशहाली थी। सादिक और ज़ैनब अब भी उसी जगह रहते थे। लेकिन अब वह झोपड़ी एक खूबसूरत घर बन चुकी थी। सादिक का इलाज ज़ैनब ने शहर के सबसे बड़े हकीम से करवाया जिससे उसका लंगड़ापन काफी हद तक ठीक हो गया था और अच्छा खाना खाने से उसका चेहरा भी भर गया था। वह अब एक रौबीला और खूबसूरत जवान लगता था।

लेकिन दूसरी तरफ, शाही महल में एक अजीब क़यामत आई हुई थी। सुल्तान आज़म अली खान, जिसने अपनी बेटी को फकीर के हवाले किया था, एक लाइलाज बीमारी का शिकार हो गया था। यह बीमारी जिस्मानी नहीं, रूहानी थी। जिस दिन उसने ज़ैनब को निकाला, उसी दिन से उसे नींद आनी बंद हो गई थी। उसे हर वक़्त अपनी बेटी की मासूम आँखें याद आतीं। उसका गुरूर टूट चुका था। ऊपर से पड़ोसी मुल्क ने हमला करके उसकी आधी सल्तनत छीन ली थी। उसका खज़ाना खाली हो रहा था और वज़ीर उसे छोड़कर भाग गए थे। सुल्तान अब बूढ़ा और लाचार हो चुका था। उसकी आँखों की रोशनी लगभग जा चुकी थी। हकीमों ने जवाब दे दिया था। किसी ने सुल्तान से कहा, "हुज़ूर, सुना है शहर के बाहर काली बस्ती में एक बीबी नूर रहती हैं, जिनके हाथ की बनी चादर ओढ़ने से बेचैन रूह को सुकून मिलता है। वह बहुत नेक खातून हैं। उनकी दुआ में बहुत असर है।" मरता क्या न करता। सुल्तान ने हुक्म दिया कि उसे उस बीबी नूर के पास ले जाया जाए। एक शाही पालकी, जो अब फटे हाल थी, काली बस्ती में पहुँची। सुल्तान ने देखा कि जिस जगह को वह जहन्नुम समझता था, वह जगह आज उसके महल से ज़्यादा साफ़ और खुशहाल थी। सुल्तान को सहारा देकर उस मुख्य घर के आँगन में लाया गया। सादिक, जो अब वहाँ का सरदार था, चबूतरे पर बैठा हिसाब-किताब कर रहा था। सुल्तान उसे पहचान नहीं पाया। लेकिन सादिक ने सुल्तान को फौरन पहचान लिया। सादिक की आँखों में एक पल के लिए पुराना गुस्सा आया, लेकिन फिर ज़ैनब की दी हुई तालीम याद आ गई। ज़ैनब घर के अंदर से बाहर आई। उसने जब अपने बूढ़े, बीमार और लाचार बाप को देखा तो उसके मुँह से बेसाख़्ता निकला, "अब्बा!" सुल्तान चौंक गया। "यह आवाज़, यह लहजा!" उसने अपनी धुँधली आँखों को फाड़कर देखा। सामने ज़ैनब खड़ी थी, लेकिन वह डरी हुई शहज़ादी नहीं बल्कि एक बावकार मल्लिका लग रही थी। "ज़ैनब! मेरी बेटी!" सुल्तान घुटनों के बल गिर पड़ा। "क्या मैं ख्वाब देख रहा हूँ?" ज़ैनब दौड़कर आई और अपने पिता को थाम लिया। सुल्तान फूट-फूटकर रोने लगा। "मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैंने तुझे जहन्नुम में धकेला और तूने उसे ही जन्नत बना दिया। मेरा गुरूर खाक में मिल गया। मैंने कहा था कि मैं रज़्ज़ाक हूँ। लेकिन आज मैं तेरे दर पर भिखारी बनकर आया हूँ।"

तभी सादिक आगे बढ़ा। उसने सुल्तान के कंधे पर हाथ रखा। सुल्तान ने नज़र उठाकर उस शख्स को देखा जिसे उसने 'काला कोढ़ी' कहा था। सादिक ने अपनी जेब से एक शाही मोहर निकाली और सुल्तान के सामने रख दी। सुल्तान ने वह मोहर देखी और सन्न रह गया। यह उसके सबसे वफादार सिपहसालार मंसूर की मोहर थी जो बरसों पहले एक जंग में गायब हो गया था। सुल्तान ने काँपती आवाज़ में पूछा, "यह... यह तुम्हारे पास कहाँ से आई? यह तो मेरे बेटे जैसे सिपहसालार मंसूर की है।" सादिक ने, जो बरसों से खामोश था, पहली बार अपने होंठ खोले। सदमे और जज़्बात ने उसकी आवाज़ वापस लौटा दी थी। उसने भारी और भर्राई हुई आवाज़ में कहा, "मैं ही मंसूर हूँ, सुल्तान!" सब सन्न रह गए। ज़ैनब भी हैरान थी। सादिक ने कहा, "याद कीजिए हुज़ूर, उस जंग में जब बारूद फटा था, मेरा चेहरा जल गया था और आवाज़ चली गई थी। मैं अपनी जान बचाकर आपके पास वापस आया था लेकिन मेरे जले हुए चेहरे और गंदे कपड़ों की वजह से आपके पहरेदारों ने मुझे धक्के मारकर निकाल दिया था। मैंने आपसे मिलने की बहुत कोशिश की लेकिन आपने हुक्म दिया था कि बदसूरत भिखारियों को मेरे शहर से दूर रखा जाए। मैं वही वफादार मंसूर था जिसे आपने अपनी रईसी के नशे में पहचानना तो दूर, जानवर समझकर अपनी बेटी के साथ सज़ा के तौर पर ब्याह दिया।" सुल्तान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे एहसास हुआ कि उसका गुनाह कितना बड़ा था। उसने जिस फकीर को हिकारत से देखा था, वह उसका अपना ही खोया हुआ हीरो था। उसने जिसे मिट्टी समझा, वह सोना था। सुल्तान ने शर्मिंदगी से अपना सर झुका लिया। "या अल्लाह, तूने मुझे मेरे ही किए की क्या खूब सज़ा दी! मैंने हीरे को पत्थर समझा।" सुल्तान ने हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी। ज़ैनब और मंसूर ने उसका हाथ थाम लिया। "माफ़ी माँगने वाला बादशाह ज़ुल्म करने वाले बादशाह से बड़ा होता है," ज़ैनब ने कहा। सुल्तान ने कहा, "चलो, वापस महल चलो। यह सल्तनत अब तुम दोनों की है। तुम ही इसके असली हकदार हो।" लेकिन ज़ैनब और मंसूर ने एक-दूसरे की तरफ देखा और मुस्कुराए। "नहीं अब्बा जान," ज़ैनब ने कहा, "हमें वह पत्थर का महल नहीं चाहिए। हमने अपनी मेहनत से इन गरीब लोगों के बीच जो दुनिया बसाई है, असली सुकून यही है। बादशाहत तख़्त पर बैठने से नहीं, लोगों के दिलों में राज करने से मिलती है।" सुल्तान अपनी बची हुई ज़िंदगी उसी बस्ती में अपनी बेटी और दामाद की खिदमत में गुज़ारने लगा। उसने अपना ताज उतारकर रख दिया और अपनी आखिरी साँस तक वहीं रहा, यह गवाही देते हुए कि अल्लाह ही देने वाला है और इंसान का घमंड बस एक पानी का बुलबुला है।

प्यारे दोस्तों, यह कहानी हमें ज़िंदगी का अनमोल सबक सिखाती है कि इंसान चाहे तो छीन सकता है, लेकिन अगर अल्लाह देना चाहे, तो वह बंजर ज़मीन से भी सोना उगा सकता है। रिज़्क और इज़्ज़त का मालिक सिर्फ वही एक ज़ात है। ज़ैनब ने रोने-धोने के बजाय हालात का सामना किया। सब्र और हलाल मेहनत ही वह चाबी है जो हर बंद दरवाज़े को खोल सकती है। एक औरत अगर ठान ले तो वह खंडहर को भी महल बना सकती है। ज़ैनब ने साबित किया कि असली शहज़ादी वह नहीं जो रेशम पहने बल्कि वह है जिसका किरदार ऊँचा हो। प्यारे दोस्तों, अगर इस कहानी ने आपके दिल के किसी कोने को छुआ है तो वीडियो को लाइक ज़रूर करें और कमेंट में अपनी राय लिखना न भूलें। ऐसी ही बेहतरीन सस्पेंस और जज़्बात से भरी कहानियों के लिए हमारे चैनल को अभी सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन को दबाना बिल्कुल न भूलें ताकि हमारी हर नई कहानी सबसे पहले आप तक पहुँचे। अपने दोस्तों और परिवार के साथ इस वीडियो को शेयर करें। अगली बार फिर मिलेंगे एक नई दास्तान के साथ। तब तक के लिए अपना ख़्याल रखें। अल्लाह हाफ़िज़।