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8)Fiqh-Miswak Aur Masnoon Fitri Aamal+Wudu kai Masael (Mas’alah 51 - 59)-Class 8-Level 1-Dr. Mahboob

Dr. Mehboob Abu Asim28:42

Transcription

मन साला इला सतरा अम्मा बाद आपने न तो करली होगी सा दर्श की तो हम बरारा अला शुरू करते हैं। टाइम हमा पास थोड़ा है। आगे हमारे पास मौजू है मिस्वाक और मसनून फितर आमाल। मिस्वाक क्या है? इसका क्या फजीलत है इसकी? और मसनून फितर आमाल क्या माना मसनून फी आमाल का? के वह अमल जो इंसान की फितरत में है और जिनका करना सुन्नत है। और सुन्नत होने से मुराद यानी जरी नहीं कि फर्द के मुकाबले में सुन्नत हो। बा कात सुन्नत का लफ जो है वो बोला जाता है कि जो नबी करीम इस्लाम का तरीका है, चाहे वो फर्द भी क्यों ना हो। वैसे तो अन सुन्नत का लज फर्ज के मुकाबले में इस्तेमाल होता है, लेकिन बा कात सुन्नत का लफ जो है वो नबीला के तरीके पर इस्तेमाल किया जाता है, चाहे वह फर्ज भी क्यों ना हो। तो यहां पर यही चीज है। बाज वो चीज है कि जो वाक ही सुन्नत है, फर्द नहीं है। और बाज वो चीज है कि जो वाजिब या फर्ज की हैसियत से है। तो उसी में से एक जो सुन्नत है वह मिस्वाक है, तमाम औकात में। और खुसूस वजू और नमाज के साथ मिस्वाक करना सुन्नत है। वैसे तो आप सलम हर मुख्तलिफ औकात में सोकर उठने के बाद, घर में दाखिल होते हुए और नमाज से पहले, कोई भी नमाज क्यों ना हो, तो मुख्तलिफ औकात में आप ये मिस्वाक किया कर। लेकिन खुसूसी तौर पर वजू और नमाज के वक्त। उसी हवाले से आप का फरमान है, ती मुझे अपनी उम्मत पर मशक्कत का एहसास ना होता तो उन्ह हर वजू के साथ मिस्वाक करने का हुक्म देता। करने वू करने से पहले द करते हुए मिस्वाक करने का हुक्म देता। और एक दूसरी हदीस में है हर नमाज के साथ, सही बुखारी मुस्लिम की रिवायत है हर नमाज के साथ। और यह वो सुन्नत है कि जो आज तकरीबन ना देखने की का देखी नहीं जा रही, बिल्कुल नजर नहीं आती कि मिस्वाक कोई नमाज से पहले, नमाज के वक्त या वजू के वक्त भी कोई मिस्वाक का एहतमाम करता हो। हालांकि आप क्या फरमाते हैं कि अगर मुझे अपनी उम्मत को शकत का एहसास ना होता, क्या मतलब आपने सिर्फ इसका हुक्म नहीं दिया, इसको फर्ज नहीं किया, कहीं लोगों पर मुश्किल ना हो। और इससे अंदाजा होता है कि आपके नजदीक किस कदर अहम तरीन अमल है। अगर लोगों को मुश्किल ना होती तो आप इसको फर्द करार दे देते। लेकिन क्योंकि हर एक को हर वक्त नमा मिस्वाक उसके लिए मुहैया होना मुश्किल होती है इसलिए आपने फर्द करार नहीं दिया। अगर फर्द कह देते तो फिर क्या होता? तो लाजिम होती और जो मिस्वाक ना करता वो गुनाहगार होता। और ये नबी की उम्मत पर रहमत और शफकत है, मेहरबानी है। आप जब देखा के लोगों के लिए मुश्किल होगा हर नमाज के लिए मिस्वाक करना, हर वजू के साथ आपने इसको फर्ज नहीं किया, लेकिन इसकी सुन्नत होना ताकीद फरमा दी। इसलिए इस चीज का एहतमाम करना चाहिए। जेब में मिस्वाक रखी हो तो वजू करते हुए निकाली और थोड़ा दांतो पर फेर ली। इसी तरह नमाज शुरू करते हुए, नमाज शुरू करते हुए तकबीर तहरीमा कहने से पहले। तो यह भी सुन्नत है। कोई भी नमाज क्यों ना हो, फर्ज हो, नफल हो, सुन्नत हो, कोई भी नमाज क्यों ना हो तो हर नमाज से पहले, नमाज के वक्त मिस्वाक करना सुन्नत है। और मिस्वाक में बेहतर है कि ऐसी मिस्वाक हो कि जो सख्त ना हो। नबीला ज्यादातर पीलू की मिस्वाक, जो नजर आ रही है ना यह पीलू की मिस्वाक है जो आमतौर पर नरम होती है और दांत अच्छे से साफ हो जाते हैं। अमूमन आप इसका इस्तेमाल करते थे। और अगर मिस्वाक ना हो तो हल्के से दांतों पर उंगली फेर देना। वजू करते हुए मिस्वाक नहीं है तो दांतों पर उंगली फेरना, यह भी मिस्वाक की जगह पर है। इससे भी मिस्वाक का मकसद पूरा हो जाता है। जी बुखारी मुस्लिम की हदीस है, लावा बहुत इसकी ताकीद है, इसका एहतमाम करना चाहिए। और क्या मुश्किल है? या एक दो रयाल की, एक दो रुपये की मिलती है। जेब में रखें ताकि इस सुन्नत पर अमल हो जाए। और इसकी बड़ी फजीलत है। आप माते हैं मत मिस्वाक क्या है? मुंह की सफाई है और अल्लाह की रजामंदी है, अल्लाह की मंदी है। उसके बाद 52 नंबर मसला में, 52 में फितर आमाल या वो अमल जो इंसान की फितरत पर रखे गए हैं, उसमें उ फरमा है। रसूल ने फरमाया, म के वो काम है के जो फितरत के काम हैं, इंसानी फितरत में से हैं। फितरत में होने का माना कि अल्लाह ने इंसान की पैदाइश के साथ ही उसके अंदर यह चीज रखी है कि यह चीज की जानी चाहिए। क्या क्या है? क शार, मूछे काटना। मूछे तराशना, तो मूछों को तराशना सुन्नत है, मनवाना नहीं। बाज लोग मनवाते हैं। मनवाना जो है सुन्नत नहीं, बल्कि सुन्नत के खिलाफ है। तो सुन्नत जो है मूछों को कतरवाना है। और इसी तरह से मूछों के हवाले से यह कि मूछे बड़ी रखना, इससे आपने मना फरमाया है। बड़ी मूछ रखने से आपने मना फरमाया है और यह बल्कि काफिर मजूस का अमल करार दिया है। इससे बाज लोग बड़ी बड़ी मूछे रखते हैं। ये बिल्कुल इस्लाम के खिलाफ, इस्लाम की तहजीब, उसके कल्चर के खिलाफ है। और कस शार दूसरा क्या है? फाया के दाढ़ी बढ़ाना। दाढ़ी बढ़ाना, फफा के मानी माफ कर देना। और इस मुख्तलिफ हदीस आती है। किसी में दाढ़ी बढ़ाने का माफ कर देने का हुक्म है, किसी में दाढ़ी बढ़ने का हुक्म है और किसी में दाढ़ी छोड़ देने या सभी का माना एक ही है कि दाढ़ी को छोड़ दो, इसको ना कतराओ और ना काटो। और यह भी वो चीज है कि जो आज बहुत ज्यादा इस सुन्नत की खिलाफ वर्जी होती है। और ये क्या सुन्नत है? बल्कि यह वाजिब है, इस्लाम के बल्कि शायर में से है। शायर के माने जो इस्लाम की जाहिरी अलामत हैं कि जिससे जाहिर एक मुसलमान की पहचान होती है। और आपने बड़ी सख्त ताकीद की। इसकी एक हदीस में माते हैं कि मूछे कटवाओ, दाढ़ी बढ़ाओ और मुशरिक को मजूस हों की खिलाफ वर्जी करो। और मुशरिक की खिलाफ वर्जी करना फर्ज है। इसलिए फिर दाढ़ी बढ़ाना भी फर्ज है। लेकिन दाढ़ी कितनी बढ़ाए? हा बाज लोग कहते हैं एक मुठी, एक मुट्ठी। आप सलम की सुन्नत नहीं है, नबी की जनी हदीस मिलती है दाढ़ी बढ़ाने का, उसको बगैर कांड छाट के रोकने, बगैर उसको उस चीज के देना। दाढ़ी बढ़ाना, आपने कभी दाढ़ी की काट छांट करना, आपसे बिल्कुल कोई साबित नहीं है। समझे ना? इसलिए असल के दाढ़ी को बढ़ाया जाए, उसमें एक मुट्ठी होने की होने का कोई दलील नहीं है। व सवाक और तीसरा माते हैं के मिस्वाक करना जिसका जिक्र कर चुके हैं। ल म और कुली करना। कुली जानते हैं पानी में डाल के अच्छी तरह पानी मुंह के अंदर घुमाना ताकि मुंह साफ हो जाए। तो यह भी सुन्नत आमाल में से है। नशाल मा और क्या है? पानी को नाक में चढ़ाना। पानी को नाक में चढ़ाना और इसलिए ये है कि पानी को खूब आगे चढ़ाया जाए। हम पढ़ेंगे आगे। वा फर और नाखून तराशना। नाखून तराशना, सस बराज और जोड़ों का, जोड़ उंगली के जो जोड़ है, जोड़ों का पिछला हिस्सा धोना। ये देखिए आप उंगली है ना, इसके पिछले हिस्से में आप क्या देख रहे हैं कि जहां जॉइंट है वहां पर क्या है? वहां पर चमड़ी थोड़ी इकट्ठी होती है। तो नबी सलम की सुन्नत है कि आप वजू में बहुत कम पानी इस्तेमाल करते थे। सिर्फ इतने से पानी से ये दो हाथों के अंदर जो पानी आता है, इतने से पानी से आप मुकम्मल वजू करते थे। तो फिर क्या करते? कि वजू करते हुए आंगुलियों को अच्छी तरह जो है उसको धोते, उस पर हाथ रगड़ कर। तो इस इस जगह पर अगर आप रगड़ नहीं वैसे थोड़े पानी के साथ मुकम्मल है, पानी अंदर तक ना जाए। इसलिए इन जगहों को धोना, समझे ना? और क्या है? नत और बगलों के बाल नोचना। बगलों के बाल नोचना, मुक लगता है मुश्किल है लेकिन इसके बड़े फायदे हैं। वैसे तो मन सकते हैं, उसको मंड भी सकते हैं, ब्लेड वगैरह से। लेकिन उसका नोचना ज्यादा अल बेहतर है। उसमें काफी फायदे हैं। एक तो बगलों की बाल का स्मेल जो है वह खत्म हो जाती है और यह बाल आहिस्ता आहिस्ता कम हो जाते हैं और सुन्नत भी है। लना और जेरे ना बालों को मूंडना। नाफ के नीचे जो बाल होते हैं उन बालों को मूंडना। तका सुल मा और इस्तंजा करना। इस्तंजा करना, ला हाजत वगैरह के बाद इस्तंजा करना, जि हम पढ़ चुके हैं। और एक रिवायत के अंदर आता है, मजीद वल तान और खतना करना। खतना करना। तो ये 10 आमाल आप माते हैं कि जो सुन्नत आमाल हैं। सुन्नत होने का माना कि अंबिया का तरीका है, आप सलम का तरीका है। इसमें कुछ चीजें वाक ही सुन्नत ही है, वाजिब फर्ज नहीं है और कुछ चीज इसमें से फर्ज है। उसके बाद 53 नंबर मसला में, 53 में मुसलमान मर्दों और औरतों को 40 दिन में बाल नाखून वगैरह काट लेना चाहिए। सदना अनस की हदीस है, फरमाते हैं कि नबी करीम सलाम ने मूछे कतरना, नाखून काटने, बाल के बगल के बाल और जेरे ना बाल साफ करने के लिए हमारे ज्यादा से ज्यादा मुद्दत 40 दिन की रखी। ज्यादा से ज्यादा। लेकिन अगर किसी के नाखून बहुत तेजी से बढ़ जाते हैं तो नाखून ज्यादा बढ़ गए हैं, चाहे दो हफ्ते के अंदर बढ़ गए हो, 20 दिन के अंदर बढ़ गए हो, उसको तराश लेना चाहिए। लेकिन आपने ज्यादा ज्यादा उसकी मुद्दत जो रखी कि 40 दिन, 40 दिन से ज्यादा टाइम नहीं गुजरना चाहिए। अब बा ऐसी चीज है, बगलों के बाल वगैरह वाक वो 40 दिन तक ही ऐसे होते हैं कि जो काटे जाए, उनको मुंडा जाए। लेकिन नाखून जो है उनको बाका जल्दी तराशने की जरूरत होती है। 54 नंबर मसला में रसूल अकरम सलाम दाढ़ी रखने और मूंछे काटने का हुक्म दिया। दाढ़ी रखने और मूंछे काटने का हुक्म दिया। जिस तरह के कई हदीस, उनमें एक हदीस आपके सामने दी गई है। आपका फरमान, खालिफ मुशरिकीन के, मुशरिक की मुखालफत करो। क्योंकि ममन जिस तरह के अपने दीन में, अपने अकीदत है, ऐसे ही अपने कल्चर में काफिरों से उसको अलग होना चाहिए। उसका कल्चर भी काफिरों से अलग होना चाहिए। तो मुशरिक की मुखालफत करते क्या करो? शवा के मूछों को कतरओ और दाढ़ी को बढ़ाओ। दाढ़ी को बढ़ाओ और मूछ को काटो। 55 नंबर मसला में खतना करना मर्दों के लिए वाजिब है। मर्दों पर खतना करना वाजिब है। असल तो बचपन में हो जाना चाहिए। अगर किसी वजह से बचपन में खतना ना हुआ हो तो जैसे ही मुमकिन हो करना चाहिए। खुसूस आदमी जब बल्लूग को पहुंचे तो उसे लाजमा खतना कर लेना चाहिए। तो खतना करना जो है मर्दों के लिए वाजिब है। तो यह थे चंद मसले जिसका ताल्लुक था सुन्नत आमाल में से या फितर फितरत के आमाल में से। उसके बाद हमारे पास वजू का चैप्टर है कि जो काफी लंबा है, उसमें कुछ मसाइल इशा ते आज। तो वजू के मसाइल में सबसे पहले आपके सामने आयत आएगी के जिसम अल्लाह ताला का फरमान वजू करने के हवाले से, सूरत मायदा की आयत नंबर छह है कि जिसम अल्लाह ताला ने तफसील वजू के, मम के, गुसल के सारे का जिक्र किया है। उसमें फता देखिए। हम चाहते हैं कि यहां पर सिर्फ इल्म हासिल ना करें, इल्म हासिल करने के साथ साथ अपनी तरबियत करें। वजू करने को करते हैं, सभी नमाज के टाइम, जो भी नमाज पढ़ता है वजू करता है। लेकिन कभी आपके मध्य नजर होता है कि वजू मैं जो कर रहा हूं यह क्या है? किसका हुक्म है? अल्लाह ने मुझे कहां हुक्म दिया है? मैं वजू जो करने उठा हूं किसके हुक्म पर उठा हूं? देखिए यह वो चीज है जब इंसान अपने दिल दिमाग में लाता है ना, उसकी इबादत के अंदाज बदल जाते हैं। वाकई उसको एहसास होता है कि मैं कोई इबादत कर रहा हूं। वरना हम डेली वजू करते हैं, कई कई कई बार वजू करते हैं लेकिन शायद कभी भी वजू करते हुए इबादत का एहसास ना हुआ हो। ऐसा है ना? नमाज पढ़ते हुए इबादत का एहसास होता है कि अल्लाह के सामने खड़े हैं। वजू करते हुए कभी इबादत का एहसास हुआ है? यही हमारी वो गफलत है कि जो नहीं होनी चाहिए, समझे ना? इसलिए अल्लाह ताला का फरमान हमारे सामने हो, आयत आयत हमारे सामने होनी चाहिए। या लोग जो ईमान लाए हो, इ कुतु सला जब तुम नमाज के लिए खड़े होते हो, तु जब तुम खड़े होते हो ला नमाज के लिए, नमाज का इरादा करते हो, ये नहीं कि नमाज खड़े होने के बाद करेंगे। जब नमाज पढ़ने का इरादा करते हो तो क्या करो? फ अपने चेहरों को धो लो, दिया कुम अपने हाथों बाजुओं को, इ मरा कोयो तक, मस अपने सर के मसे कर लो, न और अपने दोनों टखनों तक जो है पा धोलो। इस आयत में अल्लाह ने चार चीजों का जिक्र किया है, चार आजा दू में जो धोए जाते हैं। इसलिए हम आगे पढ़ेंगे वजू में क्या फराय है, क्या सुनते हैं। 57 नंबर मसला में अल्लाह ताला का फरमा यानी के वजू में नियत करना जरूरी है। क्यों जरूरी है वजू में नियत करना? वजू के लिए नियत करना क्यों जरूरी है? जी हां, क्योंकि इबादत है भाई, वजू इबादत है और इबादत जो है बगैर नियत के नहीं है। न क्या फरमान है? इमाया अलो का दारो मदार नियतो पर है। नियत होगी तो इबादत होगी, वरना इबादत नहीं है। लेकिन वजू की नियत कैसे करेंगे? दिल में, बस। जबान से कुछ नहीं। क जबान से बोलेंगे नहीं कि मैं पानी के साथ वजू करने लगा हूं। नियत होती दिल से है। नियत होते ही दिल का इरादा है, समझे ना? दिल का इरादा ही नियत है आपकी। कोई भी काम करने, चाहे खाना खाते हैं, नियत करते हैं, दिल का इरादा होता है तो वहां पर भी जबान से मे ल कुछ बोलने की जरूरत नहीं पड़ती कि क्या खा रहे हैं। ऐसे ही वजू की भी नियत दिल से है। लेकिन नियत करना जरूरी है और इसलिए मैं आपको पहले कह रहा हूं कि हम बहुत सी चीज अपनी लापरवाही से कर जाते हैं। नहीं होता क्या कर रहे हैं? तो वजू इबादत है, इबादत का एहसास होना चाहिए और नियत होनी चाहिए दिल के अंदर कि अल्लाह ने हुक्म दिया है, मैं अल्लाह का हुक्म अपनाते हुए, पूरा करते हुए वजू के लिए खड़ा होता हूं, वजू करता हूं। समझे ना? इसलिए वजू के लिए नियत जरूरी है क्योंकि इबादत है। 58 नंबर मसला में वजू नमाज के लिए शर्त है। वजू नमाज के लिए शर्त है। हम तरावीह की नमाज में शुरू में पढ़ चुके हैं कि तरावीह की क्यों जरूरत है, क्यों आधा ईमान है? क्योंकि नमाज होती ही वजू के साथ है। तो वजू नमाज के लिए शर्त है। वजू है तो नमाज है, वजू नहीं तो नमाज नहीं होगी। ी का फरमान है कि किसी का वजू टूट जाए तो जब तक वजू करेगा नहीं, उसकी नमाज नहीं होगी। इससे पता चला के वजू की क्या अहमियत है। अगर आदमी नमाज के लिए खड़ा हो गया और फिर उसको याद आया कि मेरा वजू नहीं है, मैंने तो वजू किया ही नहीं, या याद आ गया वजू तो किया था लेकिन वजू टूट गया था तो क्या करेगा? हां, उसी वक्त नमाज छोड़ेगा, जाके वजू करके आएगा, फिर नमाज शुरू करेगा। नमाज पढ़ ली, उसके बाद याद आया कि वजू नहीं था। हां जी, आपने वजू नमाज पढ़ ली, वजू करने के, नमाज पढ़ने के बाद याद आया कि मैंने तो बगैर वजू के नमाज पढ़ ली है। हा, फिर दोबारा जाके वजू करे, फिर दोबारा नमाज को दोहराए। समझे ना? फिर दोबारा नमाज को दोहराए। इमाम ने नमाज पढ़ा दी बगैर वजू के, गलती से। उसके अंदर था कि मेरा वजू है लेकिन नमाज पढ़ाने के बाद उसको याद आया या किसी ने उसको बताया कि आपका वजू नहीं था तो आपकी नमाज का क्या हुक्म होगा? इमाम तो नमाज दोहराए, आपकी नमाज जो आपने पीछे पढ़ी उसकी नमाज हो जाएगी बगैर वजू के। थोड़ी सी यहां पर तफसील है कि जिसको पता है कि इमाम का वजू नहीं है उसकी नहीं होगी, समझे ना? जिसको पता है ना कि इमाम साहब का वजू नहीं है। इमाम को तो याद नहीं था, उसने शुरू कर दी। फर्ज करो आप इमाम के साथ थे और इमाम के साथ रहे थे, आपके इमाम को देखा कि वारूम गए हैं और उसके बाद उन्होंने वजू नहीं किया और आके सीधे नमाज पढ़ाना शुरू कर दी है तो आपको तो पता है कि इमाम का वजू नहीं है। आपके जिसको पता है उसकी नमाज नहीं होगी। उस पर फर्ज भी है कि इमाम को तबीह करे, इमाम को बताए कि आपका वजू नहीं है, वजू कीजिए। समझे ना? लेकिन अगर किसी को नहीं पता, इमाम ने नमाज पढ़ा दी तो इमाम को नमाज दोहराना होगी अपनी, लेकिन पीछे जिनको नहीं पता था कि इमाम का वजू है या नहीं उनकी नमाज हो जाएगी, उनको नमाज दोहराने की जरूरत नहीं है। इससे पता चला कि वजू किस कदर जरूरी है और किन चीजों के लिए वजू जरूरी है। तवाफ करने के लिए, बैतुल्लाह का तवाफ करते हैं, उसके लिए वजू जरूरी है। कुराने करीम को पकड़ने के लिए, आप उ कुराने करीम पकड़ने के लिए भी, जिसको मुसहफ का नाम देते हैं, इसके लिए वजू का होना जरूरी है। अरमा के नजदीक तो वजू होना चाहिए। एक दो मसाइल और लेते हैं, बस अच्छा। उसके बाद 59 में वजू की शर्तें, सिर्फ ये मसला लेते हैं आज। वजू की शर्त क्या है? तो वजू की आपके सामने लिखा हुआ है कितनी? नौ शर्त लिखी हुई है। वजू की नौ शर्त है। सबसे पहले इस्लाम, कि वजू करने वाला मुसलमान हो। काफिर को नहीं होगा। फर्ज करें किसी ना मुस्लिम ने वजू किया, वजू करने के बाद वह इस्लाम में दाखिल हुआ, उसने इस्लाम कबूल कर लिया, कलमा पढ़ लिया। अब हम कहेंगे उसे वजू तो किया हुआ, क्या ख्याल है? दोबारा करेगा? तो जो किया उसका क्या हाल? उसका क्या हुक्म है? नियत उसकी थी वजू करने की [संगीत] आप यह कहिए कि वह काफिर था और काफिर से इबादत नहीं होती। काफिर की इबादत काबिल कबूल नहीं है और वजू इबादत है। हा वजू इबादत ना होता तो फिर हम कहते ठीक है, मुश्किल नहीं। समझे ना? तो वजू चूंकि इबादत है तो उसने वजू किया कुफ्र की हालत में तो जबक उसकी इबादत कबूल नहीं होती। इसलिए उसका वजू नहीं होगा क्योंकि उसने कुफ्र की हालत में किया है। अब इस्लाम लाने के बाद, इस्लाम कबूल करने के बाद उसको दोबारा वजू करना होगा। सवाल आखिर में रखिए इशाला। तो पहली शर्त क्या है? कि मुसलमान हो। दूसरी शर्त ऐ शर्त है कि अकलमंद हो, यानी पागल, मजनून ना हो। अब वो तो हम जानते हैं पागल पागल वजू क्यों नहीं होता? उसकी नियत नहीं है, उसको पता ही नहीं कि वजू क्या होता है। समझे ना? उसको पता नहीं कि वजू क्या है, उसकी नियत नहीं है। आप कहोगे नियत कर लो, उसको क्या पता कि नियत क्या होती है, वजू क्या होता है? इसका मतलब यह हुआ कि अकलमंद होना जरूरी है। अगर फर्ज करो किसी ने किसी के ऊपर ऐसा वक्त आता है कि उसके होशो हवास, उसकी अकल खत्म हो जाती है, उसका दिमाग मौफ हो जाता है। बात को होता है बीमारी की वजह से। किसी ने इस हालत में वजू कर लिया, थोड़ी देर के बाद वो ठीक हो गया, उसका वो किया हुआ वजू काबले कबूल नहीं है क्योंकि उसकी नियत नहीं थी। समझे ना? यानी एक आदमी कभी वजू ठीक हो जाता, उसकी अकल ठीक हो जाती, कभी फिर उसकी अकल जाती रहती है। समझे ना? उसने वजू किया जबक उसकी अकल नहीं थी तो अब जब उसकी अकल आ गई, उसके होश सही हो गए, उसको हम कहेंगे दोबारा वजू करो, तुम्हारा वजू किया हुआ सही नहीं क्योंकि उसकी नियत नहीं थी। तीसरी शर्त है तमीज, या बदतमीज ना हो। तमीज का माना लिहाज। हा जी, क्या माना तमीज का? तमीज का माना इस उम्र का बच्चा हो कि जिसको पता हो कि वजू क्या होता है। समझे ना? चार पांच साल का बच्चा, उसको को नहीं पता। आमतौर पर तमीज कब आती है? बच्चे को सात साल का। सात साल का बच्चा शरीयत तौर पर वो उम्र है कि जब बच्चा जो है उसको इनके समझ बूझ होती है। तमीज माने समझ बूझ। उसको पता हो कि वजू क्या होता है, वजू कैसे करना है, नियत क्या होती है। तो इस तमीज की उम्र में उसकी नमाज भी सही है, उसका वजू भी सही है, उसको रोजा भी सही है, सारी उसकी उसकी बात सही होगी। हा फर्ज नहीं उसके ऊपर लेकिन सही है। नियत हमने जिक्र किया है कि नियत जरूरी है क्योंकि वजू इबादत है। पांचवी शर्त पानी पाक हो, जि वजू से पानी, पानी से वजू कर रहे हो, पानी पाक हो। नापाक पानी से वजू किया तो वजू नहीं होगा। समझे ना? नापाक पानी से वजू नहीं होगा। छठी शर्त क्या है? कि जिस्म से पानी रोकने वाली चीज का इजा करना। क्या मतलब? कि जिस्म पर जो आपने जिस्म के आजाद धोने हैं वजू में, उन पर कोई ऐसी चीज ना लगी हो कि जिस वजह से आपकी स्किन पर, जिस्म तक पानी ना पहुंचे। जिसकी पेंट है, खवातीन नेल पॉलिश लगाती है और भी इस तरह की चीज, यानी ऐसी चीज ना हो जिसकी लेयर हो, जो जिस्म के ऊपर एक लेयर की शक्ल में जमी हो कि जिस वजह से आपकी बॉडी तक, जिस्म तक पानी ना पहुंचे। और यहां पर फर्क करने की जरूरत है। चाहता हूं इस को समझिए क्योंकि अक्सर लोगों को कन्फ्यूजन होती है कि तेल लगा लिया, लगा ली, कोई क्रीम लगा ली और को मरहम लगा ली तो क्या वजू हो जाएगा? नहीं होगा। क्यों? से लेयर बनती है। देखिए तेल से लेयर नहीं बनती। क्रीम से अक्सर औकात लेयर नहीं बनती। क्रीम अगर जो इस्तेमाल करते हैं ना उससे लेयर नहीं बनती। वो आमतौर पर जिस्म के अंदर जजब हो जाता है। लेयर तब बनती है कि जब जिस्म के ऊपर एक तह जमी हो। बा वाकई आप क्रीम बहुत ज्यादा लगा लेते हो, ज बहुत ज्यादा लगाते हो, वाकई जिस्म के ऊपर तह जमी उसकी हां, फिर नहीं होगा। लेकिन अगर तह नहीं जमी हुई, फिर पानी वो यल वगैरह जो भी है वो जिस्म के अंदर जब हो जाते हैं तो से वजू हो जाता, मुश्किल नहीं। लेकिन अगर लेयर, लेयर है, ऊपर तह जमी है, जिस हम बता रहे हैं पेंट है, पेंट वाकई लेयर होती है, नील पॉलिश लेयर है। समझे ना? और आजकल बात मेहंदी आ रही है। जरा गौर से मेहंदी की बात। शक सूरत ऐसी बा ऐसी मेहंदी है कि जो सिर्फ कलर नहीं होता बल्कि वो लेयर की शक्ल में जिस्म पर जमती है और होता क्या है? फिर चंद दिन के बाद, दो चार दिन के बाद उतरना शुरू हो जाती है और जो कलर है आप देखते हो वो लेयर की शक्ल में था, वो जिस्म से उखड़ना शुरू हो जाता है। इसका मतलब क्या था? कि वो लेयर की शक्ल में जिस्म पर जमा हुआ था। इन चीजों की हयात करनी है। तो हर वो चीज जो लेयर की शक्ल में बॉडी पर जम जाती है उससे वजू नहीं होगा, उसको उतारना जरूरी है। लेकिन जो जो चीज जिस्म में जजब हो जाती है, यल वगैरह इस तरह की चीजें, उससे कोई हर्ज नहीं, उसे वजू हो जाएगा। अच्छा आठवीं चीज, बल्कि साथ इस्तंजा या सफाई करना। अगर आदमी ने वारूम गया है, इस्तंजा करने की जरूरत है, जिस्म को पाक होना चाहिए। आठवीं शर्त है, हैद निफास से पाक होना। खवातीन हैं, निफास के उनके मामलात होते हैं। हा, वह तभी पाक होंगी, वजू करके जब निफास नहीं होगा। निफास की हालत में वजू करना चाहे तो कर सकते हैं लेकिन उस से उस वजू से पाक नहीं होंगी। समझे ना? और नौवीं शर्त ये है कि तमाम वाजिब आजा का धोना। वजू के अंदर जो आजा धोने का हुक्म है उन तमाम आजा को धोना, यानी कि कुछ आजा को छोड़ दिए। अभी आगे पढ़ेंगे हम वजू के तरीके का में कि जितने भी वजू के आजा धोने का हुक्म है जो वाजिब है, उन आजा को धोना। अगर उसमें कोई एक आजा भी छोड़ दिया तो वजू नहीं होगा। तो यह थी वजू की शर्तें। मैं चाहता हूं कि इनको अच्छी तरह जरा इंशा याद करने की कोशिश कीजिए। आज इसी पर इफा करते हैं। बारक अल्लाह फीला खैर। जी हां, आपका सवाल नहीं हो।