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हम तक पहुँचो। हम तक पहुँच ही नहीं रहे हो वाले। यस। प्रत्युष चौबे का थैंक यू। थैंक यू बोलो। Instagram का सर्च बटन नहीं दिखाऊँगा।
तुम्हारे पड़ोस में एक आए थे, जो आए थे शायद दिल्ली बिल्ली से। तो उनके दो बच्चे थे, तो गोरे भी दोनों। प्रॉब्लम एक थोड़ी है कि गोरे भी हैं, दाँत भी बराबर हैं। यहाँ साला सब मिला हुआ है। हेलो आसिफ। आसिफ हर भाई अंग्रेज़ी में कुछ करेगा। ये कि आदमी का क्या है ऑक्सीजन अंदर ले, मुँह बाहर निकाल। दोनों जन कॉफी पी रहे हैं, और ये कड़वी होती है। कॉफी कड़वी तो यार यहाँ की कड़ी होती है। जयपुर की सही होती थी। एक्चुअली हम दोनों को नहीं पता था कि चीनी मिलाना होता है। बगल में पुड़िया में ये चीनी रख। हम दोनों को सलमान खान है। ये तो ईद पे बच्चों का पैसा चोरी करने आते हैं। अच्छा पैसा जुटा जुटा के रखा हुआ है। एक एक दो तिवारी चाचा दे दीजिए, अम्मा दे दीजिए, बाबू दे दीजिए। है ईद के दिन पिक्चर रिलीज़ करेगा जिसमें कुछ नहीं है। लेट के वही डांस हो गया। बैठ गया वही एक्शन हो गया। लाइन अटक गई। जो आदमी तो बच पैसा चोरी करो और क्या। जो आदमी है ना कोशिश करता है ना कि मैं ऐसी जगह पे अंग्रेज़ी बोले और बहुत कड़ी इंग्लिश बोला कि एक्सक्यूज़ मी, राइट वे। कंफर्टेबल अंग्रेज़ी नहीं। तीख जाए इसको आता है। तुमसे नहीं हुआ क्या? जा रहे हैं। कंटिन्यू नहीं पहुँचे अभी। हो सकता है घुटने में हेडेक। घुटने में हेडेक हो गया। उसकी गलत थोड़ी घुटना ही होगा। फिर हाँ, मेसराइज़िंग बात तो है ये। घुटने में हेडेक वगैरह हो जाए तो एक बार तो हॉस्पिटलाइज़ होके ट्राई करेंगे। नर्चर करेगा वहाँ कोई। दिमाग ना हमारा प्रोग्राम होता है सर्वाइवल के लिए तो दिमाग आपको हमेशा नेगेटिव चीज़ें बताता है। मन आपको यह बताता है कि तू इंप्रूव कर। तो बेटर हो तू मेरे लेवल पे नहीं आ रहा है। कैसे हैं आप? वो बहुत देखो बहुत ताकतवर देश नहीं है। पर ये है कि सुसाइड बमबर वाली अवस्था में जब कोई देश होता है ना तो वो खुद मरने को तैयार होता है। और उसका लीडर एक खुद एक जिहादी है। तो एक बड़ी मुश्किल, बहुत संजोग, बहुत बुरा है। दूध उबालने, दूध फैल गया, गिर गया। बोले ओ दैट एस्केलेटेड।
जब पहली बार किसी आदमी ने आकाश की ओर देखा होगा तो संभव है कि उसके पेट में सन्नाटा बज रहा हो। कोई भूखे दिन की शाम रही होगी। रोटियाँ नहीं मिली होंगी और उसने ऊपर झाँक कर सोचा होगा शायद वहाँ कुछ है, कोई है जो मेरी भूख देख रहा है। वही क्षण होगा जब अपनी तसल्ली के लिए हमारे पूर्वजों ने कुछ पवित्र लिपियों की इज़ात की। उनकी उपयोगिता भी थी। संकट को स्वीकार करने में, संकट को साथ लेकर के चलने में मदद मिलती थी। लेकिन फिर कई लिपियाँ आईं, परस्पर विरोधी और एक दूसरे से श्रेष्ठता के दावे के साथ आईं। पहचान के नए नियामक बने। लोग देखते कि यह हाड़ माँस, दो हाथ और दो पैर का जो व्यक्ति सामने खड़ा है, आस्था उसकी किधर है। श्रेष्ठता की स्थापना के लिए रिवॉर्डिंग सिस्टम का भी ऐलान हुआ। एक ऐसी कड़वी दवा है जो आपको अमर कर सकती है। किंतु आपकी मृत्यु के बाद और ना जाने कितनों की मृत्यु के बाद काश कोई मुर्दा बोल पाता तो कहता कि उधर तो बहुत गड़बड़ है बाबू भैया, क्योंकि उधर शून्य के सिवा कुछ नहीं। कोई चेतना नहीं, कोई जीवन नहीं। कोई नदी, नहर, हीर, पीर, संगीत नहीं। यह श्रेष्ठता की लड़ाई, यह हम बनाम तुम की यह लड़ाई अभी तक जीवित ही इसीलिए है क्योंकि मुर्दे बोलते नहीं हैं।
शुरू करते हैं तीन ताल का 102वाँ एपिसोड। गॉड्स लॉयल अपोजिशन कमलेश ताऊ, डार्लिंग खानचा और कुलदीप सरदार के साथ। जय हो, जय हो, जय हो। बहुत बढ़िया यार। इतनी अब तो मैं पिछले एपिसोड में था नहीं, पर कुछ एक कमेंट्स मैंने पढ़े। मुझे लगता है कि जब से हम तीन ताल कर रहे हैं उस तरह के मतलब उस एक आध कमेंट काफी खराब लगे मुझे। उस तरह के कमेंट शायद पहली बार आए हों। हम तो कोर्स करेक्शन में यकीन करने वाले लोग हैं और हर तरह की आलोचना को स्वीकार करते हैं। लेकिन जब इस समय पूरे देश में जो चर्चा चल रही है ताऊ उसमें व्यक्ति की आइडेंटिटी का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है और कुछ मायनों में वो है कि कौन थे, किस वजह से मारे गए, वो इस धर्म से ताल्लुक रखते थे इसलिए मारे गए, जो मारने वाले थे वे दूसरे धर्म के थे। पर ये कैसे रिफ्लेक्ट होता है और बेसिक कॉमन सेंस भी इतना दुर्लभ है। वो विकास देवी कीर्ति ने एक वीडियो बनाया बहुत उन्होंने सामान्य बात कही है ना, सिंपल बात कही, लेकिन वही इतनी दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि किसी भी चीज़ को इवैलुएट ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए। जब मन करता है कि अभी इस आदमी को मुक्का मार दें या इस देश पर चढ़ बैठे तो थोड़ा सा बैठे और देखें कि मुक्का मारने से मेरा फायदा है या जो चाहता है कि इसको मुक्का मारा जाए उसका फायदा वगैरह वगैरह जो भी। और युद्ध अगर अ टाला नहीं जा सकता है। युद्ध ही अगर अंतिम विकल्प है तो युद्ध ही सही आ जाओ। है ना? वो एक बात है। लेकिन उन्होंने ये बात कही कि हमारे यहाँ अह अह भारत की प्रशंसा में उन्होंने ये बात कही कि उनके शब्द में कह रहा हूँ कि मैं मानता हूँ कि पिछले कुछ समय में थोड़ी बहुत साम्प्रदायिकता हमारे यहाँ बढ़ी है। पर आप किसी ऐसे देश की कल्पना करें जहाँ पर अ माइनॉरिटी के लोगों ने मेजॉरिटी के 25 या 27 या 26 लोगों को मार डाला हो। और उस देश में दंगे नहीं हुए हैं। इसीलिए तो अद्भुत है हमारा देश। है बहुत सारा ज़हन। उसमें छिटपुट इंसिडेंट्स मतलब है उनको छिटपुट भी नहीं कहना चाहिए। वो नहीं छिटपुट ही है। छिटपुट है। पर 150 150 करोड़ हाँ। लोगों के देश में मैं उसको छिटपुट मानता हूँ। बेहद शर्मनाक घटनाएँ हैं। हम है ना? नहीं होना चाहिए एक भी। पर चिटपुट ही है। मैं इस बात पे तो गर्व करता हूँ। हम मैं जिस देश में रहता हूँ वहाँ पर जिस तरह का रिएक्शन बाकी जगहों पे होता हम वैसा नहीं हुआ। हम अमेरिका में 91 हुआ उसने देश के देश उजाड़ दिए। हम और उनके यहाँ भी तरह तरह के कानून आए है ना अपन ने वैसे रिएक्ट नहीं किया है और पब्लिक को वैसे रिएक्ट करना भी नहीं चाहिए क्योंकि अब ये तो स्टेट का काम है। हम और स्टेट डिसाइड कर रही है कि कैसे करना है इसका बदला कैसे लेना है और एक एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज़ होता है वो आप आज करो कल करो नहीं हो सकता मतलब वो आप इस तरह के छोटी मोटी बात चीज़ें हैं। सबसे बड़ा सरप्राइज़ तो यह है कि अटैक ही ना करो वापस। दुश्मन एक्सपेक्ट कर रहा हो डरा के रखो सिर्फ़ कि हम पर अटैक करेगा और ना करो तो भयंकर तकलीफ़ में गुज़रेगा। वो आज तो नहीं हो जाएगा। आप क्या करोगे? आप मिसाइल दाग दोगे। तो आपको फिर यह देखना पड़ेगा कि उसके बाद क्या वो भी मिसाइल दागेगा? वो दो दागेगा तो आप चार दाग दोगे। फिर वो आठ दाग देगा। फिर आप 16 दाग दोगे। फिर एयरफोर्स इन्वॉल्व हो जाएगी। फिर नेवी इन्वॉल्व हो जाएगी। युद्ध शुरू हो जाएगा। क्या होगा? बहुत सारे लोग मरेंगे। उधर भी, इधर भी। आप अभी तो चिल्ला रहे हो जब बॉडी बैग्स आने शुरू होते हैं हाँ। दिल दहल जाता है और कॉफिन गाँव गाँव में पहुँचने लगता है तो फिर तकलीफ़ होने लगती है बहुत। कुछ लोग बेचैन भी हो जाते हैं कि साला ये खत्म क्यों नहीं हो रहा है। आप 100 मिसाइल दागेगा कोई तो आप उसमें से 90 इंटरसेप्ट कर लोगे। 10 गिर जाएगा। 10 में से दो आबादी में गिर जाएगा। फिर बिल्डिंगों से जब लोगों को निकालोगे तो जो टीवी पे देख रहे होंगे वो तो खाली दुख दुखी हो जाएंगे और कहेंगे और मारो और मारो। पर जिनके घर के मरेंगे उनको बड़ी तकलीफ़ होगी। और उनको लगेगा यह सब क्यों हो रहा है। यह सब भी मैं यह नहीं कह रहा हूँ यह सब नहीं होना चाहिए। हम जो होना है वह होना है। हम पर यह बता रहा हूँ कि यह सब होगा। हम और ये सब बहुत अच्छे दृश्य नहीं होते। इसीलिए कुत्ते ने आपको काटा है। आप कुत्ते को मत काटो। रैबिट है। आप पहले दूर से इंजेक्शन लो 14 पेट में ये आजकल जहाँ भी लगता है और कुत्ते के काटने का बदला कुत्ते को काटना नहीं है। कुत्ते को निपटा देना है। वही तो उसके लिए कुत्ते को आपकी रेंज में आना चाहिए। हम आ जाएगा निपटा देना। कह रहे हैं कि कन्वेंशन कन्वेंशनल वॉरफेयर जो वॉरफेयर भी इतना बदल गया ना नए दौर में अब मतलब ये लड़ रहे हैं रूस यूक्रेन उनका हाल पूरी दुनिया देख रही है कि कैसे भैया सबके एलाइज़ हैं और सबको कोई ना कोई मदद पहुँचा रहा है तो आप टैक्टिकल तरीके से कई आर्टिकल्स आप इस दौर में पढ़े। टैक्टिकल हमला कीजिए स्ट्रेटेजिक प्लानिंग के साथ। टारगेटेड स्ट्राइक्स करिए। स्ट्राइक्स ऑन मतलब जो भी हमला हो ज़रूरी नहीं एयर स्ट्राइक्स ही हो। आप उनके पावर ग्रिड पर अटैक करें जिससे उनके जो बड़े शहर हैं उनकी बिजली बाधित होगी। उनका जो सिस्टम ट्रेन और ये है ना जो भी पूरा वॉर का सिस्टम यही होता है। पहले कम्युनिकेशन तोड़ दीजिए वो तोड़ दीजिए। उसके बाद आप हो सके तो रिफाइनरीज़ पे हमला कीजिए ताकि उड़ा दीजिए। हाँ उनको कमी पड़े जो डीजल पेट्रोल और फ्यूल जो जिन चलते उनके शहर ठप पड़ जाए। यू नो ताकि वहाँ मतलब इस इसकी आँच उनके जनमानस के आम दैनिक दिनचर्या में महसूस होने लगे जिससे वहाँ के आर्मी एस्टैब्लिशमेंट और हुक्मरान पर प्रेशर बने है ना और हमें एक एडवांटेज मिले अगर कोई आगे चलकर बातचीत होगी अगर इस पर तो नहीं इसके बहुत उपाय हैं। आप खाली इतना करो कि वॉर के लिए प्रिपयर्ड हो जाओ। बहुत महँगा पड़ता है। वॉर की तैयारी ना बहुत महँगी पड़ती है। और आप तैयार रहो अगले 3 साल के लिए। हम हो गए 1000 दिन। 1000 दिन का खर्चा नहीं उठा पाएगा आपका दुश्मन। हम और उसकी फौज जो है वो बलूचिस्तान छोड़ के आएगी। आप अगर राजस्थान पंजाब गुजरात जम्मू हम सब जगह एकदम खड़े हो जाओ तो फिर उसको भी खड़े होना पड़ेगा। वो बलचिस्तान छोड़ेगा। बलोच ले लेंगे। हम अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान है वो खैबर पख्तून ले लेंगे। हटाना तो बहुत मुश्किल होगा उनके लिए भी ना। वो बहुत देखो बहुत ताकतवर देश नहीं है पर यह है कि सुसाइड बमबर वाली अवस्था में जब कोई देश होता है ना तो वो खुद मरने को तैयार होता है और उसका लीडर एक खुद एक जिहादी है तो एक बड़ी मुश्किल, बहुत संजोग, बहुत बुरा है। सिचुएशन तो अपने को मेरे हिसाब से सरकार में होशियार लोग बैठे हैं वो प्लानिंग कर रहे हैं वो कर रहे हैं कुछ और वो करेंगे और ऐसे तो जाने नहीं देंगे। हाँ वो तो कुछ नहीं हो सकता तो बिल्कुल ही करेंगे। एक दो चीज़ करेंगे जो दिखाने के दाँत होंगे। हम आपको जो पब्लिक यहाँ है जो प्रेशर एक दो चीज़ दिखाने के होंगे पर चबाने के जो दाँत है ना वो चालू हो चुके हैं। हम है ना? जबड़े में आ रहा है। हम और वो पीसा जाएगा इस बार। तो इंतज़ार कीजिए उसका। हम्म। वो जैसे वो भी एक बात है कि कश्मीर को लेके हमारा शुरू से ये रहा है कि हमारा सब बटरल मसला है। हम दोनों आपस में निपटेंगे। पाकिस्तान हमेशा से ये चाहता है कि इसमें एक थर्ड पार्टी इन्वॉल्व हो जाए। चाहे यूनाइटेड नेशंस, अमेरिका जो भी है। नहीं चाहा तो हम ही ने था पहले। हाँ। पहली अर्ज़ हम ही ने डाली थी। फिर हमने लेकिन हम उसके बाद हमारा स्टैंड यही है कि साहब ये हम द्विपक्षीय मसला है। हम नहीं चाहते। हमने उसके लिए शिमला एग्रीमेंट किया था। साइन किया। तो उसमें यह है कि इस उसमें ना बार बार जब वहाँ से यह वाले स्टेटमेंट आते हैं कि उनके रक्षा मंत्री उनके सूचना मंत्री उनके आर्मी चीफ़ ये कहते हैं कि साहब हम तो न्यूक्लियर पावर हैं। हम इतना आसान नहीं है। हम पे सोचना भी मत। है ना? की तो ये उसका मीनिंग ये होता है कि वो बार बार न्यूक्लियर पावर कह करके इस पूरे टकराव को दो न्यूक्लियर पावर के जैसे टकराव के तौर पर पेश करके अंतर्राष्ट्रीय दुनिया से एक इंटरवेंशन की अपील करते हैं जो हम कभी भी नहीं चाहेंगे। हमें ये मेक श्योर करना पड़ेगा, इंश्योर करना पड़ेगा कि साहब ये दो लोगों के दो मुल्कों के बीच का ही टकराव बना रहे। इसलिए वो जो ये वाला है ना वो न्यूक न्यूक न्यूक इंडिया ने एक बार भी नहीं बोला है और पाकिस्तान बार बार बोल रहा है। यही तो था जिसके चलते हम इतने दिनों तक कुछ नहीं करते थे। पर अब हमने कह दिया है वो दिखा दिया है कि उसका डर हमको नहीं है। हम एक बार फौज गई एक बार एयरफोर्स गई। हम तो वो वाला डर खत्म हो चुका है हमारा। न्यूक्लियर पावर है तो हम भी हैं। हम दूसरी बात तुम एक मारोगे। तुम हमें 10 मार दोगे तो मेरा नॉर्थ खत्म हो जाएगा। है ना हम हम चार मार देंगे तो तुम पूरे खत्म हो जाओगे। हम हमारी राजधानी बर शिफ्ट कर लेंगे। हम है ना भारत रहेगा वो नहीं रहेगा। हम ये एहसास पाकिस्तान को भी है। गीदड़ भब की है ये और उनके जो नेता लोग हैं ना इेड टाइप के नहीं है वो दिखते हैं खाली इे हाँ उन लोग तो आर्मी ही वहाँ जो है वो है। कितना रेयर होता है कि वहाँ कोई सरकार चल जाए और ये सब जितने एमपी वपी होते हैं वहाँ पे ना फुडल लोग हैं सब। हाँ वहाँ पे कोई डेमोक्रेसी अपनी जैसी नहीं है कि कोई भी आदमी जीत जाएगा चुनाव में तो उनको सिलेक्टेड लोग हैं वो उनका वैसा व्यवहार रहेगा। बेवकूफ़ भी हैं। सी राजा मोहन है ना सी राजा मोहन ने एक आर्टिकल लिखा है इस पे कि कैसे ये उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान छोड़िए मैं उन्होंने सिर्फ़ एक आर्गुमेंट दिया है कि ये तो आसिम मुनीर का किया धरा है। अगर हम ये मानते हैं आसिम तो आसिम मुनीर बेसिकली पाकिस्तान की मिलिट्री पिछले कुछ समय में इस डोमेस्टिक नज़रिए से कमज़ोर हुई है। तो पाकिस्तान की सेना में अपनी स्थिति और पाकिस्तानी सेना को फिर से रेलेवेंट बनाए रखने के लिए भी संभवत वही बात हमने पिछले तीन साल में तो उसमें वही कह रहे हैं कि साहब आसिम मुनीर को डोमेस्टिकली कमज़ोर करने पे आप काम करो। उसके लिए जो भी यू नो उंगली टेढ़ी करने वाले जो मेज़र्स होते हैं मेक श्योर कि आसिम मुनीर डोमेस्टिक पॉलिटिक्स में उभार ना पाए। उनकी छवि अच्छी ना होने पाए। जो भी तरीके हो सकते हैं आप वो अपनाएँ। यह एक रिस्पांस इस घटना का यह भी है कि आसिम मुनीर को आप डोमेस्टिकली कमज़ोर करें। एंड डोमेस्टिक चेंजेस क्या आप कर सकते हो? उसमें मतलब वो इशारा भर किया उन्होंने। बट उसके मीनिंग यही सारे हैं कि कल को अगर उनकी उनकी सेना का डिप्लॉयमेंट ज्यादातर इधर हो गया है तो क्या बूचिस्तान में अलगाववाद की देखो मांग होगी। जैसे संख्या घटती है ना आर्मी की बलोच टूट पड़ेंगे। हम उसके बाद पाकिस्तान के पास कोई चारा नहीं बचेगा कि वह एयरफोर्स का इस्तेमाल करे अपने ही लोगों पे और एक बार आपने वो शुरू कर दिया हम है ना वो रेड लाइन गई उसके बाद गए आप क्योंकि पीछे तालिबान है। हम हाँ और हम मतलब हमने शुरू में कुछ समय लिया लेकिन एक टेक्निकल हमने चांस लिया है कि तालिबान से हम अच्छे से बातचीत करेंगे और हमारी उच्च स्तरीय यह बातचीत तालिबान से हाल फिलहाल में जल्दी फिर से हुई। नैतिक तौर पे मैं हमेशा विरोध कर करता रहा इस बात का कि तालिबान से कोई भी दुनिया का देश संबंध रखे। हम पर ये रियल वर्ल्ड है। हाँ। यहाँ आपको तो मेरी इस बात पे जो है अमेरिका से भी और भारत से भी एक शिकायत रहती थी कि हम तालिबान जैसी शक्ति को ऐसे ट्रीट कर रहे हैं, इज़्ज़त दे रहे हैं, मिल रहे हैं। उन्होंने हमारे प्लेन को हाईजैक करने में मदद की थी। हम है ना? लेकिन अपन क्या उसको पकड़ के ज़िंदा रहेंगे? नहीं। हमने कहा नहीं अब वो पावर में है वहाँ पे। अपने को ऐसे संबंध रखने हैं कि उसका वेस्टर्न फ्रंट जो है ना कंफर्टेबल ना हो जाए पाकिस्तान के लिए। अमेरिका ने देखो छोड़ के चले गए थे। वापस आ गए काबुल। हम अपनी एंबेसी बना ली। वो एक भाड़े पे शायद सुना है एयरस्ट भी ले लिया है अमेरिका ने। अफ़ग़ानिस्तान में। हम्म। क्योंकि उसको ईरान और अदर चीज़ें भी देखनी पड़ती है ना। आपको रखना पड़ेगा कुछ ना कुछ। तो उस हिसाब से अगर हम देखें तो दूसरी बात यह पब्लिक के डिसाइड करने की चीज़ नहीं है। हम जोश में आके जो बोल दे रहे हैं कि वो आपने बोलो ना सोशल मीडिया पे बोलो। हाँ मतलब वो चलता रहेगा। ये चलता रहे मेंटर तो चलेगा ही उसको आप रोक नहीं सकते। मेंटर नहीं मतलब सीरियसली भी कुछ लोग बोल रहे हैं तो ठीक है आपका अधिकार है इसमें कुछ गलत नहीं है। हम अपने अपनी सेना जो है अभी मतलब हमारी सारी सुरक्षा एजेंसियां उन लोगों को पहले ढूंढ रही हैं जो जंगलों में छुपे हैं। हम जो पीर पंजाल के घने जंगलों में पेड़ों में गुफाओं में वॉक कर रहे हैं चल रहे हैं छुप रहे हैं। पहला तो वो है एक जिम्मेदारी उधर है दूसरी जिम्मेदारी है कि चीन के साथ अभी आपके संबंध नॉर्मलाइज़ नहीं हुए पूरी तरह से तो आप उनके बारे में श्योर नहीं हो। हम तो वहाँ से भी आप कुछ हटा नहीं सकते। आपका सिचुएशन बहुत आइडियल नहीं है अभी। हम और बांग्लादेश के साथ आपके संबंध खराब हैं। हम है ना? तो बहुत आइडियल सिचुएशन में आप नहीं हो। पर मैं यह मानता हूँ कि पूरा देश इस मामले में एक है। पॉलिटिक्स अपनी जगह है। हम पर आंतरिक तौर पर हाईएस्ट लेवल में ये एग्रीमेंट है कि जो भी गवर्नमेंट पावर में है हम वो आइडियल स्टेप्स चुने और एक्ट करें। एक अच्छी चीज़ सर्वदलीय बैठक के बाद देखिए और उसके बाद एक आध इसमें फिसल पट्टी वाले बयान और वो भी हुए जो वो फोटो डाल दिए वगैरह वगैरह। लेकिन सरदली बैठक के बाद जैसे गृह मंत्री से यह कहा गया ना कि आप चूक मानिए साहब और उन्होंने कहा फिर किरण रिज्जू बाहर आए और उन्होंने चूक शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा चूक नहीं हुई थी तो हम यहाँ बैठ के थोड़ी बात कर रहे थे। एक्सेप्ट किया तो जनरली लोग कहते हैं नहीं इस गवर्नमेंट में एक्सेप्टेंस नहीं होता गलती का। चूक को एक्सेप्ट किया। उसके बाद आप उमर अब्दुल्लाह असदुद्दीन ओवैसी विपक्ष के इनसे नेशनलिस्ट बयान तो असदुद्दीन ओवैसी से नेशनलिस्ट बयान तो कोई दे ही नहीं रहा। अरे बीजेपी वाले नहीं दे पा रहे हैं उस तरह का बयान। मैं और ये इतनी मतलब एक बाहरी खतरा कैसे दो ध्रुवों को मैंने देखा कि बिल्कुल अल्ट्रा राइट विंग सोशल मीडिया के हैंडल्स असदुद्दीन ओवैसी के बयान शेयर कर रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने भी अपनी पॉलिटिक्स अपने रेलेवेंस को यही देखो बीजेपी भी फायदा उठा रही है ना रोज कांग्रेस पे अटैक कर रही है। कांग्रेस बीजेपी पे अटैक कर रही है। उसमें ओवैसी ने ये देखा कि नहीं ये वाली पॉलिटिक्स गलत है। हम्म मैं ये वाली नहीं करूँगा। कर पॉलिटिक्स ही रहे हम ऑफ कोर्स पॉलिटिक्स में आपका एक एक स्टेप पॉलिटिक्स तो सब आदमी पॉलिटिक्स कर रहा है व्हिच इज़ अ वेलकम थिंग। करते रहो आपस में बस इस बात पे हमारे यहाँ एग्रीमेंट है हम कि सरकार फैसला लेगी जो लेगी हम उसके साथ हैं। अब फैसला कैसा होगा अल्टीमेटली क्या होगा ये हमें जानने की भी ज़रूरत नहीं है। ये उनका काम है। स्पेकुलेट करने की ज़रूरत नहीं है। रोज जो लोग कह रहे हैं ना कि आज की रात हम अंतिम आज की रात भारी टाइप के यही रात अंतिम यही रात भारी वो सब ठीक है मज़े लो बट जो होगा वो किसी को बोलकर नहीं होगा। हम किसी से पूछ के भी नहीं क्या होगा ये किसी को नहीं बताया जाएगा। कब होगा ये भी किसी को नहीं बताया जाएगा और बताना भी नहीं चाहिए। हम आपके देश में मैं तो अभी पता चला मुझे मतलब ये होने के बाद कि यार कितने लोग पाकिस्तान में शादी कर रहे हैं। हम मतलब हद है। सीआरपीएफ़ का बंदा है। जम्मू कश्मीर में पोस्टेड है। उसकी पत्नी पाकिस्तान से है। हम एक बंदा रावलपिंडी का हम 17 साल से यहाँ रह रहा है। ग्रेजुएशन पढ़ाई कर रहा है। वो वोट भी दे रहा है। हम उसके पास आधार कार्ड है। आधार कार्ड तो हो सकता है। किसी भी विदेशी के पास आधार कार्ड हो सकता है। वोट नहीं दे सकता कोई। पर वो वोट भी दे रहा है। तो यह तो बड़ी संकट की बात है। कि आपके यहाँ महिलाएँ और पुरुष पाकिस्तान से यहाँ रह रहे हैं और कुछ तो कई सालों से रह रहे हैं। एज़ इफ़ एवरीथिंग इज़ नॉर्मल। तो उनके आईएसआई के लिए तो कितना आइडियल सिचुएशन है ये। बिल्कुल। लड़की को बोला भाई ये इरशाद है। ये अलीगढ़ में रहता है। Facebook पे दोस्त बने शादी कर ली। ऑनलाइन निकाह। अब एक औरत कह रही है मैंने तो ऑनलाइन निकाह किया है और वो आ गई यहाँ पे क्या दिक्कत है। अब फिर एक साल डेढ़ साल के बाद जाएगी अपने मम्मी पापा से मिलने के लिए और आईएसआई को बता दे कि भाई यही है ये मैं ले ले आई हूँ। ये बहुत ही खतरनाक सिचुएशन है। ऐसा नहीं होना चाहिए जबकि आपको वो वो मुल्क जाने दुश्मन समझता है। हम तो यार होने कैसे दे रहे हो आप ये सब। ये तो आप अब कहानियाँ सामने आईं। हाँ ये सब कब से हो रहा था। मैं तो सोचता था कि यार पंछी नदियाँ पवन के झोंके के इसको बाकी को रोक देते हैं। इधर तो किसी को कोई नहीं रोक रहा। बंदे वोट दे रहे हैं खुलेआम। और इतने ज़्यादा लोग मुझे तो समझ नहीं आ रहा। दूसरी बात भाई ऐसा होता है ना कि प्यार में यार कोई सीमा नहीं होती। पर आप में प्यार हुआ कैसे भाई? आप गोरखपुर में रहते हो। है ना? वो भावलपुर में रहती है। आप दोनों में हुआ कैसे? हम और शादी कैसे हो गई? बच्चे कैसे हो गए? कि पापा यहाँ है और चार बच्चे यहाँ हैं। और कब से हैं? 16 साल हो गए। बच्चा बच्चों का क्या दोष है? सीमा हैदर तो चलो लेके आई थी। और कितने लोग किस किस रास्ते से आए हैं पता नहीं। मैं तो सोचता था सीमा हैदर यूनिक चीज़ है। उससे भी यूनिक आइटम पड़े हुए हैं यहाँ पे। अरे यहाँ तो हज़ारों में है। बोल रहे हैं कि 60,000 फिर बोलते हैं 9,000। हम ही बैठे हुए थे यहाँ पे। हैं मतलब लेकिन इन सब में जो अच्छा लगा वो ये कि जो माहौल सोच रहे थे हम कि बहुत खराब हो जाएगा। जैसे एक परिवार पे जब मुसीबत आती है तो सारा परिवार एक साथ होता है। वैसा देखने को मिला इस जगह पे। हाँ उस टाइम पे। हाँ उमर अब्दुल्ला सस्पेक्ट्स हैं। वो आपस में गाली गलौज रहते हैं वो तो ऑलरेडी फ़्रेंच एलिमेंट्स ही हैं। वो वैसे वो इस तरह की घटना नहीं होती तब भी यही बदतमीज़ियाँ करते हैं। लेकिन उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में ये कहा कि मैं किस तरह से माफ़ी मांगूँ और ये कहा कि मैं हम लोग फुल स्टेटहुड के लिए लड़े। हमारी मांग में वो रहा और शायद आगे भी रहेगा। पर आज नहीं मांगूँगा मैं फुल स्टेटहुड। मैं मांग नहीं सकता हूँ आज फुल स्टेटहुड ऐसी स्थिति में कि जनरली उनकी पॉलिटिक्स को सूट करता है। वो आज ही कहते हैं कि लॉ एंड ऑर्डर आपके पास है। आप नहीं संभाल पा रहे हमें फुल स्टेटहुड मिलना चाहिए। बट उन्होंने वो मौका चुना कि पहले ना पहले भी बॉम्ब विस्फ़ोट किए उन्होंने पहले भी उन्होंने मुंबई पे अटैक किया उतना बड़ा। पहले भी उन्होंने अटैक कश्मीर में किए हैं। पर छोड़ के नहीं किया। हम अंधाधुंध फ़ायरिंग की। पूछ के नहीं। पूछ के नहीं किया। हम्म। ये वाला मसला जो है ना ये तो डिलीवरेट था ना कि भाई ऐसा कर दूँगा कि तुम लोग आपस में ही मरने लगोगे। हम वो नहीं हुआ। इधर उधर चार लोग तो वो तो अपने यहाँ हो ही जाता है। अपने यहाँ तो यार ट्रक क्रिकेट क्रिकेट में हो जाता है। वहाँ अरे अपने यहाँ कोई दो गाड़ी में लड़ जाता है तो हॉकी स्टिक से मार देते हैं दूसरे को। पूछते भी नहीं कि कौन हो। वो तो अपना चलता रहता है। इट्स अ गुड थिंग। बट वेट करो हम कि यह मौका पाकिस्तान के लिए भी है। हमारे लिए नहीं है। पाकिस्तानियों के लिए भी बहुत बड़ा मौका है। अगर हम थोड़ी सी उनकी मदद करें कोवर्टली इनडायरेक्टली वो अपने आप को मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट की पीछा छुड़ा सकते हैं। हम क्योंकि नंगे हो चुके थे ये। हम पहली बार पाकिस्तान में लोगों ने ब्रिगेडियर्स, जनरल्स इन लोगों के घर में घुस के तबाही मचाई थी। हम 9 तारीख का वाक्या याद करो। हम ठीक है। तो वहाँ पे बेइज़्ज़ती इनकी काफी हो चुकी है। लोग अब सलाम ठोकना बंद कर दिए थे। हम सम्मान नहीं रहा वो तो सम्मान नहीं रहा था क्योंकि ज्यादातर लोग इमरान खान का सपोर्टर हैं। और इमरान खान जेल में है। तो वो लोग आर्मी को बड़ी बुरी नज़र से देखते थे। हम वो रिस्पेक्ट ना आसिम मुनीर ने वापस पाने के लिए हम ये सब कांड किया है। लेकिन वो दर्द तो उनके दिल में है ना। हम बस उसका आप उनको थोड़ा सा मतलब वो मत दो जो आसिम मुनीर चाहता है। हम हाँ मतलब ये कई मोर्चों की लड़ाई है। कई मोर्चों की लड़ाई है। बहुत होशियारी से आपको लड़ना पड़ेगा। आप उनके लिए भी आज़ाद कर दो और अपने लिए भी कश्मीर में मामला सेटल करने की आज़ादी है। हम वही वही ठीक है। क्यों? क्योंकि 14 ही नहीं मुझे तो लगता है 50 60 लोगों को मालूम था यह घटना होने वाली है। 14 तो कोलब कोलबोरेटर्स के नाम जारी किए गए हैं। तो कश्मीर में एक बहुत परसेंटेज में कम है। पर एक्चुअल में बहुत ज़्यादा हो जाता है ना। हम्। उतने सारे लोग जो एक्टिवली इनको सपोर्ट करते हैं। अभी जो सेंटीमेंट है उसका उपयोग उसमें करिए कि उन सारे लोगों को चिन्हित करिए और ठोकिए जो हमेशा कोलैबोरेशन करते हैं हम उधर के लोगों के साथ और यहाँ पे उनको गोलियाँ चलाने, बम विस्फ़ोट करने की आज़ादी देते हैं। एक एग्ज़ांपल सेट करना पड़ेगा। हाँ। पुलवामा पे भी जो याद है उसने जब सीआरपीएफ़ की गाड़ी को उड़ाई थी तो उसने वीडियो बनाया था पहले। हम बाद में वो जारी जारी हुआ। उस वीडियो में उसने बोला था।
गाय के मूत पीने वाले और इत्यादि इत्यादि संकेत देते हुए कि हमारी लड़ाई हिंदुओं से है। हम ताकि यहां पे प्रॉब्लम हो और लेकिन उसको भी तो लोगों ने मदद की ना, गाड़ी और सारा आरडीएक्स जमा करना अकेले के बस की बात नहीं होगी। सब लोगों ने, बिल्कुल बिल्कुल। तो उन सब तत्वों का आइडेंटिफिकेशन इस बार आपके लिए आसान इसलिए होगा कि इस बार आप सेंटीमेंट भी आपके पक्ष में है। हम कश्मीर का भी पब्लिक सेंटीमेंट आपके पास है। तो आपको पिछले कुछ समय में टूरिज्म के बढ़ने से इतना फायदा हुआ है। आप डाटा देखेंगे, 2018 से 2024 तक का टूरिज्म का हर साल जो फुटफॉल है वो कैसे बढ़ा है।
पिछली बार हमने यही कहा था ना कि वो क्या हुआ है कि जब तक भारत के और पाकिस्तान के बीच में एक तुलनात्मक अध्ययन होता था ना, डैश डैश डैश लगा होता था, इंडोपाक, इंडिया पाकिस्तान, वो खत्म हो गया है। भारत बहुत आगे चला गया, पाकिस्तान बहुत पीछे है। तो कश्मीर के लोगों को भी पता है कि यार उधर क्या करने का, अपने को इधर ही रहो। और 370 खत्म होने का एक जो होता है ना, आदमी प्रिविलेज, हमने बोला था ये पहले हम, कि जब आप प्रिविलेज्ड होते हो और आपका प्रिविलेज छीन लिया जाता है, इक्विटी ले आई जाती है, तो आपको लगता है कि ये इनइक्वैलिटी है। आपको आदत है स्पेशल कहलाने की और सडनली आपको लगे, नहीं बराबरी का दर्जा दे दिया गया। आपको लगता है कि मेरा कुछ छीन लिया गया है। तो 370 हटने पे लोगों को लगा कि हमारा कुछ छीन लिया गया है। लेकिन फिर उन्होंने उसके दूसरे इफेक्ट देखे ना, फायदे देखे अपने, तो ठीक ही था माहौल।
पर ऑब्वियसली बहुत सारे युवा वहां रेडिकलाइज्ड हैं, जो उस तरफ के तत्वों के साथ मिलकर यहां पर घटनाओं को अंजाम देते हैं। उनको काफी दिनों से सपोर्ट नहीं कर रहे थे लोकल लोग। हम इनफैक्ट लोकल, मतलब ये इंटेलिजेंस का डाटा है, इस पे कई रिपोर्ट छपी है कि लोकल भर्तियां, रिक्रूटमेंट लोकल होनी बहुत कम हो गई हैं। जो पहले क्रिटिकलाइज हैं करते होंगे, लेकिन अब लोकल भर्तियां नई नहीं हो रही हैं। और पहले जैसे पूरे, मतलब बुरहानवानी तक भी जब अटैक होते थे तो लोग ना बहुत भयंकर भीड़ जुटती थी और वो सेना के खिलाफ, अब उनकी संख्या कम हो गई। और गांव में कोई छुपा कोई ना कोई गांव का जो है, पहले कोई नहीं बताता था और फिर अब कोई ना कोई इंफॉर्मेशन पास करते। आप देखिए कश्मीर में यहां पे मुठभेड़ हो रही है और गोलियां चल रही है और ये सब शुरू हो गया। हम उस सेंटीमेंट को आप आगे बढ़ाइए, यही मौका है। इधर भी सेटल कीजिए, हम उधर भी सेटल कीजिए और डिप्लोमेसी का भी इस्तेमाल कीजिए। मतलब लॉन्ग, वैसे लंबा वॉरफेयर के बजाय, वो टारगेटेड इंटेलिजेंस ड्रिवन ऑपरेशनल, एक कोवर्ट ऑपरेशन भी कीजिए। अगर आसिम मुनीर को भी उड़ा सकते हैं तो उड़ा दीजिए, पर वो पाकिस्तानी उड़ाए, वहां के अंदर के पाप इंतजाम करिए। ₹1 लाख दे दो किसी को भी तो सुसाइड बमबर वहां मिलते हैं भाड़े पे, यहां पे नहीं मिलते। भारत में आप ₹ करोड़ दे दोगे ना तो बोलेगा नहीं मरूंगा, नहीं बेल्ट नहीं बांधूंगा। वहां पे तो बेल्ट वाले बहुत हैं, यहां कितने में ठीक है मैं रेडी है। बारगेनिंग भी चलती है वहां, उस हिसाब से अगर देखो तो आप एक ऐ लो कि डिप्लोमेसी इंटरनेशनल अलग करेगी, एफएटीएफ जो है हम हां है ना, फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स, उस पर प्रेशर अलग बनाएंगे कि ग्रे से ब्लैक में डालो इसको। फिर जो आपके मित्र देश हैं, सऊदी अरेबिया, सऊदी अरेबिया ऑलरेडी पाकिस्तान का क्रैक डाउन कर चुका है, यूएई वो भी क्रैक डाउन कर चुके हैं। जो आपके मित्र देश हैं जहां आपकी चलती है उन पर दबाव बनाइए कि आइसोलेट करें उसको। और क्या चाहिए? हम नॉट मोर देन दैट। एक बड़ा कोलैप्स कर जाएगा।
पिछले कुछ दिनों के मुकाबले, पिछले कुछ सालों के पहले जब टेंशनंस बढ़ा करती थी, एक बड़ा चेंज ये है कि अब क्लियरली ना पाकिस्तान हमारी तरफ, अमेरिका क्लियरली इस मामले में हमारी तरफ इंक्लाइंड है। पहले उसके बहुत इंटरेस्ट थे ना पाकिस्तान में। देखो ट्रंप के यही टाइम है, हम इसका भी यूज़ करना जरूरी है। हम एक साल और है, हम ट्रंप जो है वो फिर मिड टर्म इलेक्शन होंगे वहां सीनेट के और वो मतलब वहां के पार्लियामेंट के। तो फिर ट्रंप कमजोर होगा, अभी ट्रंप मजबूत है, वो कुछ भी कर सकता है। तो इसका भी फायदा आपको अभी उठाना पड़ेगा। रशिया यूक्रेन के वॉर में आपने रशिया के खिलाफ नहीं गए। हम आप उनसे चीजें आप पूरे वेस्ट अमेरिका और वेस्ट के प्रेशर के बावजूद आप रशिया से आपने पूरा प्रेशर जो है ना वो बर्दाश्त किया, लेकिन आपने रशिया को के खिलाफ डायरेक्ट कोई एक्शन नहीं लिया। हम तो ऐसे मौके पर रशिया आपके खिलाफ कोई डायरेक्ट एक्शन नहीं लेगा अगर पार्टिसिपेट नहीं भी करे तो हम। ये बहुत कुछ फेवरेबल चीजें हैं, कुछ अनफेवरेबल चीजें हैं। हम पर अपन ना इधर बैठ के कर सकते हैं हम और जो लोग जिनको जहां Twitter पे या Facebook पे या Instagram, LinkedIn पे जहां पे जो बोलना है बोलो, सरकार वही है वही जो राम रचरा।
हां, तो इस बातचीत के बाद हमें जो आगे बात करनी है उसमें ताऊ थोड़ा सा ब्रेक लेंगे। ताऊ जाएंगे और एक नए मेहमान आएंगे, उनका नाम है देख तो लोगे भाई आप मोंटाज में तो पता तो पहले ही चल जाएगा, यहां बता ही दूंगा। तो तो प्रत्युष चौबे आएंगे और प्रत्युष चौबे से हमें बात करनी है कि जो छोटे शहर से आने की हिचक है, वो छोटे शहर के लड़के और लड़कियां भी जब बड़े शहरों में दाखिल होते हैं नौकरी के सिलसिले में तो वह हिचक कैसे उनके साथ नहीं रहती है जीवन भर, जिसको कुछ लोगों ने इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स कहा या और भी बहुत सारे उसके लिए नाम हैं, तो उस पर बात करेंगे। वो जो ऑकवर्ड फील करना है ना उन मौकों पर तो उस पर उनकी ऑब्जरवेशन मुझे बहुत पसंद है। तो उन्होंने गुड़गांव से आए हैं, उन्होंने समय निकाला। तो इस ब्रेक के बाद सीट का परिवर्तन होगा और चौबे आ जाएंगे तीन ताल पे और उसके बाद ताऊ आएंगे बाद में। तीन ही जगह है। हां। क्या कर सकते? तो भैया तीन ताल में स्वागत कीजिए। हम तक पहुंचो, हम तक पहुंच ही नहीं रहे हो वाले। यस, प्रत्युष चौबे का यस। थैंक यू। थैंक यू। ये ये मैंने ये बुलाने का अंदाज स्टैंड अप कल्चर से ही सीखा है। भाई प्रत्युष चौबे वो एक विलंबित है, उससे थोड़ा फील आती है। ऑडियंस को मौका देता है ना, चीख सके। हां। नहीं चीखा तो अजीब हो जाता है। हां, कोई नहीं चीखा तो फिर अपने माहौल नहीं बन रहा है। लेकिन मैं इमेजिन नहीं कर सकता कि किसी भी स्टैंड अप में बैठा हूं और उसका नाम ले और अब मैं बुलाता हूं। जैसे वो नहीं होता अध्यक्ष महोदय का। अब मैं आवाज देता हूं प्रत्युष चौबे जी को जो आए और दो शब्द, दो शब्द कहे। शुरू में ही एनर्जी डाउन हो जाएगी। प्रत्युष चौबे तीन ताल कैसे चक्कर में पड़ गए? चक्कर में कहां मन था आने का? इस बार तो पूरा हम, हमको कुल्लू बताए। बाकी और भी लोगों से बात की। बहुत सही है, जाओ। सही क्या है? मतलब थोड़ा-थोड़ा जैसा मतलब मन तो पहले भी था, कुछ-कुछ देखे भी तो थे, कुछ देखे भी थे, मतलब मन नहीं, देखे से कॉन्फिडेंस नहीं आया क्योंकि प्रॉब्लम अपने एंड पे था ना कि जाना जाएंगे, बोल नहीं पाएंगे, ये करके चले आएंगे। बट अभी एक-दो किए, थोड़ा कॉन्फिडेंस आया है तो धीरे-धीरे। तो क्या अच्छा लगा तीन ताल में? मैं आपको अपना रूटीन बताऊं, मैं दोपहर में ना 2:00 बजे से 4:00 बजे तक अपनी गाड़ियां एक नंबर पे ऐसे चला के, भूपेंद्र सिंह के गाने और आगे जो सजेशन चला के बैठा रहता हूं। तो मेरे को ऐसा धूप में बैठ के ना, ऐसा वाइब लेने वाली वाइब लग रही थी। हम तो हम बोला जाते हैं एक बार देखते हैं। हम और मेरे लिए सबसे ज्यादा जो मैं एक्साइटेड था वो ये है कि ये सोनभद्र से ही है ना जी। सोन, मतलब रेणुकूट, रेणुकूट के बगल में सोनभद्र में है। पड़ोस में है। पड़ोस में है। बिल्कुल। हम तो यार बुरा मत मानना, कुछ बदमाशी करेंगे। मैंने पहले ही बोला था, फोन है, जमा कर रखवा लिया गया इनको। नहीं-नहीं, कोई बात नहीं। अरे आप बताइए सर, कोई बिना फोन के? अरे आएंगे कुछ जादूगर, उनको हाथ में सिक्का पकड़ाए पहले। अरे दे दो भैया, दे दो। अब इसके पीछे एक लॉजिक है। देखो लॉजिक है, मैं कुछ नहीं करता। खोलो। Instagram का सर्च बटन नहीं दिखाऊंगा। एक्चुअली ये पहले मैं दुद्ही से निकला हूं, फिर ये निकले। तो ये फॉलो करते हैं। एक तरीके से मतलब मैं दिल्ली आया, फिर आप दिल्ली आए। हां, रेणुकूट, मतलब कमाल की खूबसूरत जगह है। दुद्ही से कम हो गया, डिबेटेबल है, बट ठीक है। आप गए, दुद्ही गए तो है ही, वो है ही, सब एक ही एरिया है। वो ऐसे ही बोल रहे हैं, कह रहे हैं वो कुछ किलोमीटर का फासला है, लेकिन रेणुकूट अगर आप कहेंगे तो वो पूरा एक फैक्ट्री वाला इलाका है जहां अच्छे पढ़े-लिखे लोग रहते हैं। ज्यादातर बाहरी लोग, मतलब वाले लोग? क्यों लग रहा है? नहीं, अपने साहब ने पढ़ाई वहां की है और थोड़ा सा शांत, सुमधुर में बैठा हुआ एक हम टाउन है। और रेणुकूट का सबसे फेवरेट जगह कौन सा था आपका? हम तो बिरला मंदिर था एक, वहां वहां पहुंच जाते थे, उसके आसपास क्वालिटी रेस्टोरेंट, मेरठ हाउस, ये सब वहां पर। बाकी तो सर कॉलोनी में मजा ही आता था। साफ-सुथरा जगह, बढ़िया से क्रिकेट ग्राउंड वगैरह अच्छे। हां, स्कूल लाइफ में होता है ना कि जिस लड़की को क्लास में मिले हैं वो पता है कहां रहती है। यस, क्योंकि कॉलोनी सिस्टम छोटा सा तो एरिया है। बिल्कुल। और वहां का बाय द वे वो वैसा है ना जैसे भिलाई, बोकारो, मतलब जो एलुमिनियम, वो काफी बड़ा है। ये उससे थोड़ा छोटा है। हां, मतलब उसी का एक छोटा रूप ही तो है। लेकिन वहां पे हिंडाल्को के अलावा, कनोरिया, आसपास वहां कनोरिया ढेर सारी केमिकल फैक्ट्री, हाईटेक, हाईटेक, ये सारे बड़ा अच्छा लगता था वहां तो बड़ा। अब मुर्धवा के पास से फिर जंगल शुरू हो जाता था। हां, मुर्धवा में मेरा घर था। मेन जो अपना घर था वो मुर्धवा था। क्वार्टर्स थे मैं वहां पे भी हाईटेक की बहुत बड़ी कॉलोनी बन गई है, आपने देखी होगी। और मेरे बड़े पिताजी बाय द वे मुर्धवा में रहते हैं, रहमान खान जिनकी मैंने चर्चा की थी कि हम बहुत ही अ क्या बोलूं मैं, उसूल वाले आदमी हैं और बहुत गुस्सैल हैं वो। मतलब उनकी वाइफ जब नहीं रही, बड़ी अम्मा, तो वो ये देख के कहते हैं इसे मैं माफ कैसे करूं? ये बगैर मुझसे पूछे चली कैसे गई? मतलब इतना उनको गुस्सा था उस बात का। खैर वापस उस पे आते हैं तो कैसा रहा सफ़र आपका? अच्छा, बाय द वे ये भी वहीं बर्बाद हुए हैं जहां हम। हां-हां-हां। अच्छा ओके, बनारस दोनों का ससुराल है। ऐसा मेरा ससुराल बनारस। तो काफी चीजें मिलती-जुलती हैं। दुद्ही से निकल के सीधा-सीधा तो मचा देंगे आप लोग? नहीं, ये देखो, दुद्ही से निकले, रेणुकूट से निकले, प्रयागराज से दिल्ली आ गए। दिल्ली आ गया, ये है पूरा। फिर तीन ताल। लव मैरिज या अरेंज लव मैरिज है सर? ये डबल, डबल मर्डर हुआ है। बगावत करके की है, एकदम इंटरकास्ट लव मैरिज। एक हमारी मुंह बोली बुआ है, अभी भी फोटो भेजती रहती है कि शादी के लिए कि देख लो आके मना कर देना, क्योंकि बहुत सारे रिलेटिव तो मेरे पता नहीं है। अच्छा, कि शादी के लिए कि क्योंकि लव मैरिज में कास्ट है तो कैसे बता दें? तो बहुत दूर-दूर के रिलेटिव, उनको नहीं आईडिया कि गोलू की। नहीं, वैसे छोटा भी हूं ना मैं घर में, खानदान में छोटा हूं। तो उनको आईडिया नहीं कि मेरी हो गई है। गोलू। गोलू, बढ़िया है। बढ़िया है। गोलू, चेहरे से गोलू लगते हो आप। कोई कहेगा तो यकीन कर लेंगे। कोई आशिकी? ये कॉलेज वाला था या कॉलेज से निकल के बाद? स्कूल वाला था? बाप रे बाप! अपने अधूरा रहा है, कुलदीप अपने रह गया है। लेकिन हमेशा मैं कहता हूं, अधूरा प्यार ही पूरा होता है। अब तो आप झेल ही रहे होंगे। अरे यार, देखो लॉजिक है, पॉइंट में। हां, ये प्यार-वार जो होता है ना, मैंने बहुत को देखा है जिनकी शादी हुई, हिरण उड़े रहते हैं। उनके हिरण उड़े रहते हैं, का मतलब क्या होता है वैसे? उड़ गए। मेरा ठीक चल रहा है, सबका खराब नहीं चलता। यही-यही बोल रहा था कि ये अपना कंटेंट घर पे देखा जाता है, कभी-कभी ऐसे नहीं कि क्या? हम कोशिश करते हैं कोई ना देखे। मेरा थोड़ा सा वो ऑकवर्डनेस है घर वालों को लेके क्योंकि देखिए बाहर वाले के सामने क्या है ना, खराब हो गए तो चेहरा याद नहीं है कि किसको खराब लगा होगा। घर में, बाहर वाले, अंदर वाले याद रखेंगे। हां। अरे हम इसके भरोसे बैठे हैं, इससे, इससे हो ही नहीं पा रहा है ठीक से करके। फंबल मार देता तो वो बड़ी-बड़ी अजीब-अजीब। मैं गया था वहां जब इलेक्शन में, उस समय कवर करने में, कुलदीप से मेरी दोस्ती वहीं से हुई है। तो इलेक्शन में तो अखबार पढ़ रहा था वहां तो रेणुकूट के जो अखबार खबरें छपी होती हैं, वो खबरें इस तरह की मुझे बड़ा आकर्षक लगा कि मेहरून्निसा और बबलू जायसवाल ने पेश की मानवता की मिसाल, एक घायल व्यक्ति को समय से पहुंचाया अस्पताल। डिटेल उसमें पढ़ा, दोनों मेहरून्निसा और ये जायसवाल साहब एक दूसरे को जानते नहीं हैं, लेकिन वो दोनों का नाम मिसाल कायम कर। हां, हेडिंग में आता है दोनों का नाम। तो वो मुझे सबसे अच्छा लगा था कि वहां के सीएमओ एक गांव के दौरे पे गए। हम हेडलाइन छपी और उनको एक स्कूटर वाले ने धक्का मार दिया। फेंका गए। उसमें लिखा, सीएमओ थे दौरे, दौरे पे बाइक, बाइक ने टक्कर मारी, खेत में फेंका गए। फेंका गए, मतलब शब्द यही था। बड़े अच्छे-अच्छे शब्द। के ब्याह में 16 बोरा चावल चोरी। लेकिन वो जो वहां की जो भाषा है, वैसे तो आपकी मातृभाषा, कि परिवार आपका आरा से है। आपकी मातृभाषा भोजपुरी है, पर सोनभद्र की भाषा ना भोजपुरी है ना अवधी है, वो एक थोड़ा अलग ही हाइब्रिड लैंग्वेज है। हाइब्रिड लैंग्वेज है। मतलब आप सुनेंगे तो आपको लगेगा हल्का भोजपुरी का टिंच था। हां, और अवधी भी थोड़ा सा आपको देखने को मिल जाएगा। मिलाजुला के। सर, बिना गाली के जो चुभने वाली शब्द है ना वहां पे, वो हम वही देखें। उसके बाद बाहर निकले, गाली ही सुने चुभने के लिए। हम कौन से हैं भैया? ऐसे नहीं, बहुत सारे हैं, मतलब ताना ही जो बोलने का टोन है ना, ऐसा गंदा लग जाएगा आपको कि अरे यार ये तो ही हेट्स मी वाली। इतने बड़े आदमी हो गया, वो थोड़ी ना इनसे लगे रहते हैं। टोन बहुत गंदा मारते हो वहां पे। मतलब गाना, बहुत ज्यादा ऑफिसर बन गए हो क्या तुम? हां, ऑफिसर बन गए। जबरदस्ती मतलब कि आप बहुत बड़े आदमी बनते। अरे तेजू खान बोलते थे हमारे, हमारे फिजिक्स के टीचर। ये तेजू खान बने हैं, इसका ये पॉजिटिव नहीं कि फेल होगा इस साल। इसका ये मतलब, इनका एक बार WhatsApp खुला हुआ था तो एक इनको वहां की खबरें आती रहती हैं। खान को अभी-अभी, हम तो उसमें एक इन्होंने फिर खुद ही पढ़ के बताया है कि मतलब वहां की किस तरह से लोग पाबंद है उसका एक नमूना बता रहे, तो उसमें लिखा हुआ पता है, डेट टाइम के हिसाब से लिखा था। सोनभद्र स्टेशन पर 3:45 पर, शाम 5:15 पर रेणुकूट में, 6:29 पर वेंडमगंज में, 7:29 पर नगर ओटारी में, 7:42 पर मेराल ग्राम में, 8:07 पर गढ़वा में, 8:20 पर डाल्टनगंज में, 10:15 बजे भंडारा होगा। आदमी यहां रह रहा है तब भी जानना चाहता है वो कितने बजे रहा है। सूचनाएं जरूरी हैं। ग्रुप है पत्रकारों का जिसमें मैं एडेड हूं। हम तो कमाल-कमाल की खबरें आती रहती हैं। और जो खबरें, खबरें पहले कभी नहीं आती तब वो भी मर्डर ऑर्डर होने लगा है, अच्छे वाला। और भागने-भागने वाला सीजन भी चल रहा है आजकल तो वो भी मिलने, देखने को मिलता है और लोग जुड़े रहते हैं उसी में खुश हैं। एक बिजली विभाग का है। हमने बताया था हम हर चीज का वहां WhatsApp ग्रुप है। लाइट चली, बिजली विभाग को, कम से कम 300 लोग हैं, लगे पड़े हैं। बिजली कहां है? तो पेड़ गिर गया है। तो कौन गया काटने? वो गया है काटने। बिजली विभाग का नंबर दो। बिजली विभाग का नंबर उसके पास नहीं, हथियार है। बढ़िया। वो लिख रहा है कि अरे यार हमको छोड़ोगे तब तो हम बिजली जोड़ेंगे। मत करो मैसेज, फोन हमको। तो लगे रहते हैं लोग। वो छोटे शहरों के बारे में ना मेरे एक दोस्त ने कही थी ये बात और मेरे शहर के सुल्तानपुर के बारे में कही थी। पता नहीं कई शहरों के बारे में, लेकिन मुझे बहुत फनी लगती है कि वहां लोग एटीएम जब जाते हैं तो ये श्योर नहीं होता कि पैसे निकालने गए हैं या ये चेक करने कि कौन-कौन लाइन में लगा है। है ना? कि समृद्धि तो धीरे-धीरे, देर से आई ना इन शहरों में। तो जमीन के दाम तो अब बढ़ने लगे ना। अरे गुरु आ रहे हो तुम भी एटीएम में? अभी वहां रात को 8:00 बजे बंद कर देते हैं। हम अब शायद खुलता है या नहीं, लेकिन बंद ही रहता है कि 8:00 बजे बाद एटीएम बंद। तो जब नया-नया एटीएम आया था, मैं गया तो एटीएम के अंदर पांच आदमी खड़े हैं। ये क्या है? निकाल लीजिए। एसी चल रहा था, हवा ले रहा है आराम से। पता है। ठीक है। और रेणुकूट में पहला एटीएम आईडीबीआई का आया था। अरे सर आपको तो पूरा ही पता है। अरे बगल का मामला है यार। तो आईडीबीआई का पहले एटीएम होता तो बड़ी खुशी हुई कि यहां पे अब हम पैसे निकाल सकते हैं। एसी एकदम ठंडा मारता था ना, पहली बार तो बड़ा अच्छा लगता था। और वहां का एटीएम बड़ा अजीब सा था। पैसा पता नहीं साइड से कहीं से फेंकता-फेंकता था, कुछ करता था। तो पहली बार मैं भी मैंने कहा यार इसका सिस्टम कुछ अलग सा है। फिर समझा कि नहीं ठीक है। तो सब निकाल के फिर वही बगल में जो पांच लोग कहना गिन रहे होते, कुछ कर लो। फिर यूको बैंक बिल्कुल गेट पे ही है। हां-हां-हां-हां। मेरे पापा एक्चुअली प्रोविडेंट फंड सेक्शन में थे तो सैलरी पहले पापा के हाथ से जाती थी क्योंकि एटीएम नहीं था ना पहले। फिर एटीएम आया तो पिताजी को बहुत बुरा लगा था कि कि मेरा काम ना, कि आदमी आ रहा, थोड़ा मस्का भी मार रहा है वो सब चला गया। पैसे दे रहे तो आप मालिक होते थे, सब लोग नमस्ते सर, नमस्ते सर, नमस्ते जी। उठाई भी ले आते हो जी वाला लड़का दिखा था आपका? तो ये ख्याल कहां से आया गुरु आपको? स्टैंडर्ड कॉमेडी करते। हां, मतलब बढ़िया। आप तो आईटी इंजीनियर नहीं। पापा पोएट्री करते थे, मतलब पापा बाबा बीएचयू में थे। बीएचयू के पास आउट, बीएचयू में भी करते थे और ऐसे करते थे। तो कुछ था, कीड़ा तो कॉलेज, स्कूल में भी हम करते थे कुछ ना कुछ, स्टैंड अप तो पता भी नहीं था तब। तो कुछ उस टाइप का कुछ-कुछ करते थे। माइक पे बोलने का, माइक पे बोलने का एक टेंपरेरी होता है जिसमें दो मिनट पहले टॉपिक मिलता था। उसमें कुछ बकैती करके चले जाते। लाफ मिलता था, उसका नशा। फिर धीरे-धीरे कॉलेज में कुछ-कुछ अपना जब यहां आए तो पता चला कि ये सब तो प्रोफेशन है। बिल्कुल। वैसे कोई बहुत इंटरेस्टिंग जर्नी नहीं है, जैसे सबकी होती है। मेरी बेटी आपको फॉलो करती है। थैंक यू सर। थैंक यू। कल मैंने बताया यार। सर मेरी रिक्वेस्ट है। आपने पहले बोला था कि आप मारने-मारने की बात करते, वो अच्छा लग रहा है। तारीफ ना करें, अनकंफर्टेबल हो जाओ? नहीं, थोड़ा दे रहे हैं अपने। अब रोस्ट करें, इसलिए दे रहे हैं। रोस्ट तक पहुंचो, हम तक पहुंच ही नहीं रहे हो। तो मैंने बताया उसको कि कल पृथ्वीष आ रहे हैं तो उसने कहा अरे वाह, मैं तो उनको फॉलो करती हूं। मैंने कहा, दैट्स गुड यार। मुझे बड़ी मुश्किल से कहने पे फॉलो किया उसने। हम तो आज, हम लोग जिस विषय पे मूल बात करने के लिए जमा, एकत्रित हुए हैं मित्रों। हां, वो विषय है जो हम तीनों की समस्या है और इसके चौथे प्रोड्यूसर की भी क्योंकि हम चारों एक छोटे शहर से आते हैं। इसका तो अब मुख्यमंत्री का शहर हो गया तो अब कह सकते हैं बड़ा शहर हो गया, गोरखपुर। लेकिन सुल्तानपुर और सोनभद्र के दो लोग हैं यहां और छोटे शहर के से बड़े शहरों में आए लड़कों के मन में एक किस्म का हिचक का भाव, जिसको कई लोगों ने सरली कर, सर वो उसका सही रूप नहीं है। बाय द वे उसको सिर्फ इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स कह के खारिज नहीं करना चाहिए। बहुत बड़ी चीज है। वो इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स तो एक छोटा उसका हिस्सा मात्र है। उसमें कई तरह के ऑकवर्ड, हां, चीजें हैं। तो हम आज उस हिचक या उस जिसके लिए सरल शब्द सर इनफीरियोरिटी भावना कहा गया। इंडिया पाकिस्तान मैच के बाद से कुछ लोग उसको शाहीन भावना कहते हैं। तो शाहीन भगत है। तो हम आज उस पे बात करेंगे। भाई साहब, जैसे ऐसा कुछ याद है क्या? फर्स्ट इनफीरियोरिटी भावना का फर्स्ट, जरूरी नहीं कि फर्स्ट हो, बट वन ऑफ दी फर्स्ट में कि पहला एनकाउंटर क्या था जहां हमने कुछ थोड़ा सा इनफीरियर फील किया? वो स्कूल में दूसरों का टिफिन बॉक्स देख के भी हो सकता है। जैसे हमारे यहां स्कूल में छोटे शहर, छोटे कस्बे में पढ़ाई करता था, मुरादाबाद शहर में शाहबाद तहसील है। हम तो वहां पे एक गुप्ता जी की बिटिया आती थी और ऐसे हर कस्बे में एक डॉक्टर की बिटिया आती है जो उस कस्बे के सर, सर्जन होते हैं, मोस्ट लाइकली। उसके बाल हमेशा सिल्क, चमकते हुए होते हैं। जैसे आप जब शैंपू लगा रहे थे अपने बाल में, हम तब वो फियामा डेविल्स लगाती होगी। समझ रहे हैं? वो चमकते हुए, पढ़ने में भी बढ़िया और वो नो नॉनसेंस होती है। किसी से एक शब्द इधर-उधर बात नहीं करना। कस्बे में एक ही होती है। वो तो उसको देख कर के लगता था कि यार यह इसका रहन-सहन बिल्कुल अलग है। है ना? तो बात-वात करने में डर लगता था थोड़ा कि वो नोट्स मांगेगी तो हम दे पाएंगे ना नोट्स जैसा वो चाहती होगी। जस्टिफाई कर पाएंगे ना उसमें। वो मेरिट होगा या नहीं उस नोट्स में जो वो चाह रही है। तब भी तुम पढ़ाई की बात सोचते थे। हां, मतलब। सो इस तरह का कोई फर्स्ट एनकाउंटर इनफीरियोरिटी से याद है? हां, हम लोग, जैसे हम लोग चार भाई हैं ना तो अब चार बच्चे जो मां-बाप पाल रहे हैं तो सैलरी एक ही है तो हिसाब से हमको ना वैसा लगता था कि आसपास वाले में किसी का एक बच्चा है, किसी का दो बच्चा है तो वो लोग थोड़ा सा कपड़ा से लेके खानपान सब कुछ लगता था, किसी रहन-सहन ना, सब हम लोग थोड़ा ज्यादा मैनेज कर रहे हैं कि। तो वो तो था ही दिमाग में। तो हमारे पड़ोस में एक आए थे जो आए थे शायद दिल्ली-विल्ली से तो उनके दो बच्चे थे तो गोरे भी, दोनों। प्रॉब्लम एक थोड़ी है, गोरे भी हैं, दांत भी बराबर हैं, यहां साले मिला हुआ है। तो हमको ना, सम, पता नहीं क्यों दिमाग में था कि ये लोग ना डेली पिज़्ज़ा और ये क्या, पास्ता, ये सब नूडल, डेली यही इन लोग दाल-चावल, दाल-भात, हिण के नहीं खा रहे हमारी तरह से कि एक ही थाली मम्मी दे दी, चारों भाई को भी खाओ, उसी में लड़ाई हो जा रहा है। हां, हमारा था, तुम खा गए तो हमको बड़ा वो परसेप्शन था। फिर उनके बिटिया का बर्थडे हुआ, हम लोग को बुलाया गया, हम गए वहां, वहां देखिए, वहां भी साला छोले-पूरी मिल रहा और जो दिल टूटा था यार तुमसे तो पिज़्ज़ा की उम्मीद थी। वो था बचपन से। हमको ऐसा लगता नहीं कि पता नहीं क्यों था, क्या था बचपन से ही थोड़ा सा ना अमीर-गरीब, अमीरी, हां वही है वो, मतलब बहुत ज्यादा तो आर्थिक लोग भी बोलते थे ना, जैसे उस वजह से भी शायद दिमाग में था कि लोग आएंगे ना कोई घर पे तो बोलेंगे कि अरे तुम्हारे मां-बाप तो बड़ी मुश्किल से पाल रहे होंगे तुम लोग चार-चार हो, तनख्वाह तो इतनी। क्योंकि एक तो कॉलोनी सिस्टम सबको पता होता है, सैलरी सबका एक जैसा ही है, टाइप से पता, टाइप से पता चलता है। पेरेंट्स भी जैसे कोई बाहर से आया ना तो ये कहने में हिचकते, आज के दौर की पेरेंटिंग में है ना कि आप अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में अपने बच्चों को अंदाजा ना लगने दें। लेकिन तब खुल के जैसे कोई पड़ोस की शर्मा आंटियां आई हैं तो उनसे हमारी मम्मी कह रही है अरे आप तो देख ही रहे हैं। अब दुठ बच्चा है, अब उसी में सब करना है। उनके साथ आप भी बैठ के सुन ही रहे हैं तो आपको अंदाजा हो गया। तो इतनी ज्यादा ये बातें सुनी ना, मेरे को लगा शायद शुरुआत वहां से हुई कि इतनी ज्यादा सुनी ना कि हां-हां, सैती होती है। मतलब दिक्कत होती है। ऐसे पालते हैं। सैती कितना सुंदर है। मैंने बहुत समय बाद सुनाई शायद। तो ये सब इतना सुने, शायद वहां से शुरू हुआ तो कि जिसके जैसे मेरा एक जो बेस्ट फ्रेंड था, शायद वो बेस्ट फ्रेंड इसलिए था कि अपने घर इकलौता बच्चा था तो वो ना टीवी में उसके वो आता था क्या नारुतो, कुछ तो बोलते हैं ना जो कार्टून अलग-अलग टाइप में। देखे भी नहीं, बच, देख रहे हैं तो वो सब देखते थे। बड़ा अच्छा लगता था। हमेशा ना क्रीम यूनियन उसके कभी सर सफेद-सफेद नहीं दिखता था, ठंड में प्रॉपर क्रीम यूनियन लगा के। वो सब यहां, हम तो ऐसे खुजा तो नाग में इंसान होते थे। यहां सरप्राइज़ ही रहता है। बाल भी पापा ज्यादा कटवा दिए हैं, मुंह सफेद-सफेद रहता। हां, अलग ही था, मतलब बचपन से था जो। हम अभी तो जैसे Spotify रैप्ड आता है ना साल के एंड में Spotify पे क्या-क्या सुने तो उसमें लोग शेयर करते हैं, लाना डेल रे, कोल्डप्ले। मतलब मुझे लगता है मैं कैसे करूं, मेरा गुड्डी गिलहरी। वो खेसारी लाल तो नहीं सुनता हूं, पर होता है हमारे जैसे छोटे शहरों से आने वाले लोगों का। मैं गुड्डी गिलहरी बहुत सुनता हूं, बट मैं उसको शेयर करूंगा, लोग बहुत जज करेंगे कि आपने सुना है। से पहले हम खुद
ही जज कर लेना। अरे गुड्डी ग्लेरी बहुत बढ़िया है यार। हम कह रहे हैं लोग शायद बाद में जज कर अपना जो प्रज तोड़ने में समय लग जाता है।
तो वो जब प्रत्युष आ रहे थे तो मैंने कहा इनके साथ ये वाली बात इसलिए करेंगे क्योंकि इन्होंने इस मसले पर जैसी ऑब्जरवेशंस अपने स्टैंड अप में दी है इसके पहले और हमने तीन ताल में मुझे पता नहीं वो वाला एपिसोड प्रत्युष ने देखा है या नहीं। एक बार खुद मतलब यह बात भी की है आपकी उसका जिक्र भी किया है हमने कि आदमी वेटर से बात नहीं कर रहा है चेक में। मतलब पत्नी से बोले तुम मर्डर करो ना वेटर से बात करने में हिचक रहा है जिसकी तनख्वाह बहुत कम होगी जो आर्थिक तौर पर शायद आपसे भी इंफीरियर सोसाइटी से आता होगा। बट आपको लग रहा है सिंस ये एंबियंस ये सेटअप फोर स्टार होटल है ये यहां मैं इससे भी आर्डर दूंगा तो पलट के दो सवाल पूछ लेगा कि है ना ये है कि मैं शायद ये जगह डिर्व करता हूं कि नहीं वो डाउट।
हां हम मेरे साथ तो यहां तक होता था कि कुछ मेरी बुआ वगैरह जो है खाला वगैरह वो बॉम्बे रहती हैं। तो वो लोग जब घर आते थे तो मैं घर से भाग जाता था। हां मेरे जो कजिन हो गए क्योंकि वो मुझे लगता है बहुत पढ़े लिखे जैसे इन्होंने कहा गोरे चिट्टे हां वो चॉकलेट अजीब अजीब खा रहे हैं। हम लोग तो लेमन चूस चूसते थे। हां और बात भी कर रहे हैं। मेरे को चाहिए मेरे को देने का मेरे को लेने का टाइप। हम लोग हम वाले लोग भाग जाता था। शर्म का ये हालत था। मतलब शर्म नहीं मतलब अपने अंदर कि यकीन नहीं था कि मैं इनके सामने बात कर पाऊंगा जबकि मेरे कजिन है।
फिर वो चीज जब शहर के लिए निकला आदमी तो और बढ़ी। अब दिल्ली आए हेलो आसिफ आसिफ हरार कि भाई अंग्रेजी में कुछ करेगा ये तो वो डर हमेशा रहता था। मेरा डर एक बार निकला उसके बाद हमेशा के लिए निकल गया। 1998 मेरा बॉस होता था। मेरी फटी पड़ी हुई कहीं मीटिंग के लिए उन्होंने कहा तुम अकेले जाओगे आज और वो नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया एनएचएआई एनएचएआई के सीईओ के साथ फिल्म बना रहे थे हम प्रोडक्शन हाउस था प्रव्यू कराने जाना था। तो वो साहब जो थे बहुत गुस्सैल थे। इसके ये शॉट अच्छे नहीं इसमें ये नहीं अच्छा इसमें। बॉस मेरा होता था ओके सर वी विल डू इट वी विल चेंज इट चेंज दिस ये वो करके चले आए। एक दिन उनको पूछा इमरजेंसी था और प्रीव्यू का टाइम तो उन्होंने कहा तुम अकेले चले जाओ। मेरे तो भाई साहब हाथ तो उड़ गए। मैंने मैं मैं ना जा रहा भाई सर मुझसे नहीं हो पाएगा। वो एक लाइन थी जो मेरी जिंदगी को चेंज किया। उन्होंने कि डर किस बात का है? मैंने कहा बहुत बड़ा आदमी है वो। हम तो मैंने कहा मैंने नहीं जा सकता। देन ही सेड कि सबसे ज्यादा तुम किसको पसंद करते हो? कौन तुम्हारा हीरो है? तो मैंने कहा अमिताभ बच्चन। उसने कहा अमिताभ बच्चन भी सुबह उठ के पॉटी जाता है। तुम भी जाते हो। वो भी खाना खाता है। तुम भी खाना खाते हो। वह भी सांस लेते हो, तुम भी सांस लेते हो। पूरा डर उसी दिन जो निकला है कि कुछ नहीं है सब सेम है। आपके अंदर यकीन होना चाहिए। 2 महीने बाद अपने बॉस को ही छोड़ दिए थे। आगे बढ़ता है। ठीक है?
तो वो चीजें होती जैसे आप पहली बार मेरा जो था बार में जाना हम मोएट डिफेंस कॉलोनी में तो मैं वहां जाके खड़ा हूं और 10 मिनट सोच रहा हूं कि घुसूं कैसे क्योंकि उस पे एक मोटा सा आदमी मूछ वाला खड़ा है दरवान जबकि दरवान सलूट मारने का काम है लेकिन अपनी फटी पड़ी हुई कि बस नहीं जाने देगा ये नहीं जाने देगा पकड़ लेगा कुछ कर देगा। तो तीन राउंड आगे पीछे घूम के भी आ गए कि माहौल देख हटे तो हम घुसे जैसे कि चोरी करने जा रहे हैं साहब। फिर हिम्मत बढ़ा के चार सीढ़ी चढ़े वो हमको देख रहा है। हम उसको देख रहे हैं। फिर चार चढ़ियां और चढ़े। कहां जा रहे हो हम अंदर? क्या कर रहे हैं हम? दम के पानी लेना है। क्योंकि अब तक हम पिक्चर में देखे हैं ऐसे। हकीकत में मैंने देखा ही नहीं था। बाहर कैसे बाहर राइट? तो उसने बड़े उससे देखा। उम्र भी मेरी कमी थी। बट समऊ उसने खोल दिया। जाओ। अंदर गए तो वहां वेटर और मैनेजर बैठे। दोपहर के टाइम यूजुअली खाली था। दो चार लोग बैठे होंगे। अब मेरी और हालत खराब हो रही कि मैं भागूं रुकूं, भागूं रुकूं। पहली मैं एक बंदा यस तो मैंने कहा वह डियर उसने कहा बैठो कहा अच्छा बैठो कौन सी लोगे अब हमें ब्रांड क्या पता है यार हमने कभी देखा ही नहीं है मतलब तो मैंने कहा कोई भी तो उसने कहा लाइट स्ट्रांग कुछ भी उसने ला के रखा हमको अरे बाप रे इतना बड़ा खंभा तो उसने कहा निकाल दे हम निकाल दो उसने निकाला बोला खाने में क्या लोगे? हम खाने में क्या लेंगे? मेन्यू ले आए बड़ा सा सब अंग्रेजी अंग्रेजी में लिखा हुआ है। हम पढ़ रहे हैं ₹300 ₹250 इतने पैसे भी तो नहीं है। तो बोला मूंगफली ले आया। हमने कहा ले आओ। मूंगफली ले आया। मैंने दो शिप मारा होगा और मुझे अच्छा खासा एहसास हो गया। मैं टाइट हूं। दो शिप में मैं उठा बाहर आया। दरबार ने दरवाजा कहा आइंदा कभी मत आना। हम नहीं आएंगे। भाग जाओ वहां से।
तो वो डर डर यहां तक का वो बहुत ये लाइन बहुत खूबसूरत है कि आदमी का क्या है? ऑक्सीजन अंदर ले मुंह बाहर निकाल। यही सभी का है। तो उसने बहुत क्लियर किया मेरे चीजों को कि तुमको किसी से डरने की जरूरत नहीं है। आई थिंक हर आदमी जैसे आप मैं अपने फैमिली वालों को देख के डर जाता था रिलेटिव्स को देख के। आप अपने पड़ोसी को देख के बहुतों को देख के। ठीक है। तो वो चीज सिर्फ इतनी सी है कि उसमें कुछ अलग सा नहीं है। मैं भी वही हूं। जैसे आपको वो चीज समझ आ रही। जैसे इस पे वो वाला नाना पाटकर का नहीं था कि हाथ कुछ दिया उसका भी घुस दिया। बताओ कौन हिंदू कौन? इस पे एक जोक था कि इसमें बंदे को जोश आया जैसे मैंने आपका हाथ पकड़ा कि लाओ मैंने अपना काटा तुम्हारा काटा मिला दिया। बताओ अभी कौन सा हिंदुस्तान हिंदू का कौन कौन सा मुस्लिम बोला मैं क्रिश्चियन हूं। ये कहेंगे वो वाला मेरा लग रहा है। क्रिश्चियन का कौन है? सर आपका मेरा जैसे अभी मैं समझ रहा हूं ना कि आपको समझ में से रेनूकूट जाना। हम वहां पे भी डर रहा होता था हमें कि रेनूकूट वाले बड़े हाई भ्रांत हैं थोड़े। मेरठ स्वीट हाउस वहां पे बहुत बड़ा। वहां पे जब पहली बार का डोसा जब इंट्रोड्यूस हुआ था तो फर्क और वो रखा था छुरी तो यह क्या है कैसे खाएंगे मुंह में गढ़ जाएगा खून निकल जाएगा और लोग ना खाने वाले ट्राई कर रहे हैं हम हम तो इनको इवन लेफ्ट हैंड में कौन सा पकड़ा राइट हैंड से कौन सा पकड़ कांटे पड़े और नहीं आया तो हम दोनों भिड़ा करके और लेके फिर खा लेते।
मेरी एक फ्रेंड है अंशिका अभी तो बहुत ऊंची पोस्ट पे नहीं नई हम दोनों की जॉब लगी थी कॉलेज के बाद हम लोग कॉफी पीने गई कहीं मिले हम बनारस में बनारस में नहीं ये तो जयपुर के बाद दिल्ली दिल्ली हम लोग की दिल्ली की बात कर रहे हैं तो नोएडा में आई थिंक किसी मॉल में मिले लोग कॉफी पी रहे हैं। दोनों जन कॉफी पी रहे हैं। और ये कड़वी होती है कॉफी। कड़वी तो यार यहां की कड़वी होती है यार जयपुर की सही होती थी। एक्चुअली हम दोनों को नहीं पता था कि चीनी मिलाना होता है। बगल में पुड़िया में ये चीनी रह गया। हम दोनों को दोनों पी के हां यार थोड़ी कड़वी तो रहती है यहां। अपना जबरदस्त सही रहता था। मेरे को एक बात बोलनी थी। मैं भूल जाऊंगा नहीं तो सर आपने बोला ना कि आपको आपके बॉस ने समझाया और आप समझ गए। मेरे या मुझे लगता है बहुत जिन लोगों में उनको अभी भी समझ नहीं आया। ऐसे हमें ट्रिक्स आ गया कि अगर कॉफी मांगने में पता है कि आज भी स्टार वर्क जाके कहीं-कहीं होता है तो भारी आवाज़ करके मांगेंगे। थोड़े अच्छे कपड़े पहने ट्रिक्स आ गए। वैसे मेरे को ना स्टैंड अप में ऐसा आते हैं ना थोड़ा सा अमीर टाइप लोग लगते हैं मुझे लगता है। तो जब फोटो के लिए खिचाते हैं ना मैं आंखें धुंधली कर लेता हूं। तो बेसिकली मुझे ट्रिक्स आ गए हैं सर्वाइव करने के। फोटो खींच आंखें। आंखें धुंधली कर सकते हैं ना। जैसे मैं आपको देख रहा हूं मैं धुंधली करूं तो आप लोग क्लियरली दिखोगे नहीं। तो मुझे समय है कि अभी भी आपका आपका ऑकर्डनेस कम हो जाएगा। यस। हां। अच्छा। तो मैं जैसे अभी भी हूं नहीं। तो मुझे लगता है ना स्टैंड बड़ा अमीर लोग आते हैं तो जब फोटो खिंचाने आते हैं ऐसा इंग्लिश में अप्रिशिएट कर रहे हैं तो मैं बिल्कुल ऐसा आंखें धुंधली कर यार अच्छा ट्रिक है मुझे मुझे बहुत सारे ट्रिक्स आ गए तो आंख मिलाकर दोस्त करता है।
जैसे मान लीजिए कमरे में न्यूज़ रूम में या कोई सुंदर लड़की एंट्री करे बाहर से आई या फर्ज करें कोई अंग्रेज एंट्री करे। अब वो एक दोस्त है मेरा तो उसका काम है कि आइडियली उसको बात करनी चाहिए उससे हां बताइए क्या काम देखेगा कि इनमें से दो टाइप के हैं तो वो तुरंत फोन देखने लगेगा। मुझसे ना बात करें बस। तो बिल्कुल और सबसे ज्यादा जो डर होता है हम वो इसका कि आपने किसी को खत लिखा था अब जवाब क्या आएगा? चप्पल आएगा उसकी मम्मी का। आपके घर पे कंप्लेन आएगी या आपकी मम्मी का चप्पल भी हो सकता है। उसका क्या रिएक्शन होगा? तो सबसे बुदबुद्धि वहां पे फटती है। तुम तो क्यों हो ग्रुप? नहीं फंस चुके हो तुम तो। लेकिन ये तो सब है कि यही होगा फाइव फाइव स्टार होटल में जब जाओ तो उसका जो बुफे होता है ना नाश्ते का हम वो ऑक्वर्ड होने की छोटे शहर के लड़कों के लिए और इंफीरियरिटी की दुकान है वो मतलब बिल्कुल बिल्कुल और उसमें क्या है आदमी देख रहा है कि आदमी वो चीजें उठाता है जो कॉम्प्लेक्स नहीं आदमी ब्रेड लिए ले रहा है वो तो उसको दिख रहा है क्रसवा रखा हुआ है ना वो चाहे तो आज ट्राई कर सकता है जीवन में पहली बार पर वो थॉमस को टच भी नहीं कर रहा है क्या तरीके से खाली कोई देख लिया कोई किसी चीज में गलत डाल दिया वापस ले जाएगा तो ब्रेड ले रहा है अच्छा ब्रेड में भी वो देख रहा है पहली बार उसने देखा इतना बड़ा टोस्टर है ना उसके पहले उसने देखा तो ऐसा टोस्टर नहीं उसको पता नहीं किधर से डालना है इसका मुंह किधर है पिछवाड़ा किधर है कहां से आएगा तो वो पहले राउंड मारते हुए देख रहा है कि कोई और यूज़ कर रहा हो तो समझ सीख ले।
ये तो सर हम लिफ्ट में किए हुए हैं हम टीसीएस त्रिवेंद्र में गए थे सर वहां ना कैंपस में लिफ्ट से मेरा थर्ड फ्लोर पे रूम मिला था मुझे टीसीएस का तो लिफ्ट हम देखें खड़े हुए कैसे यूज़ हम बहुत दिन तक सीढ़ी से गए ऊपर है थर्ड फ्लोर कि लिफ्ट जाएंगे फंस गए या नहीं चला पाए कोई लड़कियां भी है उस कैंपस में हंस देंगे देख के दो तीन दिन बस समझ में एक बार में नहीं आया दो तीन लेकिन तुरंत हो जाता है बटन दबा दीजिए घुस गया अच्छा ये है तो जैसे कॉफी मशीन जब आप जो मैं मतलब अभी भी वो होता ही होगा जब कसमों के लड़के एक बड़े कॉरपोरेट संस्थान में नौकरी उनकी लग जाती है और वो आते हैं वहां कॉफी मशीन रहती है तो वो बेचारे शुरू में कॉफी लेने से डरते हैं उनको बहुत मन नींद से मरे जा रहे हैं। कॉफी पी लें। बाहर से ऑर्डर करके मंगा ले रहा है। बहुत कम तनख्वाह। यार ये तो वो चीजें दिखती हैं। कुछ चीजें नहीं दिखती। वो है गरम पानी इधर से आता है। गर्म पानी उधर से आता है। छिला गया तो पीट। अरे भाई गए कैसे चलता है? कैसे चलता है? तो बटन छू-छा करे तो ऊपर की हम हां गरम वाला साइड तो पूरा गिरा तो धीरे-धीरे आदमी सुधर जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि आप कहीं पे भी जाएं। मैं भी मतलब आप हर जगह जाता हूं फाइव स्टार वगैरह में खाना खाने। तो मुझे एक चीज का यकीन रहता है कि मैंने पैसा दिया है। अपन को फूल इज्जत चाहिए। हां वो तो बस वो तो है। मैं खाना हमेशा हाथ से खाता हूं। कहीं पे भी मैं बहुत कम फर्क और ये स्पून वगैरह का इस्तेमाल करता हूं। आराम से खाओ और खाना कंफर्टेबल तरीके खाने से कोई कंप्रोमाइज नहीं।
पर जैसे दो लौंडे तीन लौंडे सरकारी ट्रिप पर बिल्कुल पहली नौकरी दो महीने पहले की नौकरी संस्थान के ट्रिप पे चले गए। फाइव स्टार में रुकना हो गया। वो देख रहे हैं कि वो आलू पराठे का ही ऑर्डर दे रहे हैं क्योंकि उसमें तो एक्स ऑन ऑर्डर लिखा हुआ है। सब अंडा खाते हैं लेकिन मालूम नहीं कि एक्स ऑन ऑर्डर का मीनिंग क्या है? अभी भी अगर पड़ जाए ना मौका कि खाना ही पड़ेगा महंगी जगह तो मैं अभी YouTube चलाता हूं सर कि फग लेफ्ट हैंड होता है कि राइट हैंड होता है। हां तो वो सब वो तो ये सब लफड़ा मैं पालता ही नहीं हूं। अपना हाथ जिंदाबाद। तो वो आपने वो देखा है दोस्त जब ऐसे ऐसी जगह पे जाए जो जहां बहुत समभ्रांत जगह है तो अक्सर वो और ज्यादा करीब आ जाते हैं एक दूसरे के क्योंकि उस उस उस अपमान में दोनों का साझापन है है ना तो वो दूसरे से गले लग के अरे यार जानते हो वो एक दूसरे को कंफर्ट देने की महसूस देने की कोशिश कर रहे हैं कि कुछ और बात कर रहा है अरे कल जानते हो क्या हुआ ताकि वो इस माहौल में स्वयं को भी कंफर्टेबल कर दे और सामने वाले को भी ये वाला लोग ये वाला लो यार है ना तो वो जो एक यहां तक का डर होता था कि जनपद से कपड़े लेते थे जब आप दिल्ली आए थे पैसे होते नहीं थे वहां ₹100 में स्वेटर ₹100 में जैकेट ₹150 की जींस तो उससे भी डर लगता था कि जो ₹100 ₹100 ₹100 हर माल ₹100 उससे भी डर लगता था कि देगा या नहीं देगा घाट तो नहीं देगा क्योंकि अपन छोटे जगह से आए हैं हम तो मुझे याद है मैं गया उसने वो भी अपने मन से ये ले लो तो इतना वो होता था डर कह लो कि उसी को लेने वापस करने की हिम्मत नहीं होती थी। जैसे वो देख ले चेहरे से पचा लेते हैं ना कि ऐसा ही है। हां ये ले लो ये ले लो तो आप अरे नहीं सही ले अरे रख लो हम उस तरीके से हां 250 बोल दिया अब आपको आप नहीं लेते हो उसमें आप डाल दिया 250 250 दे रहा हूं तेरे को दे रहा हूं बस आपको लेना पड़ेगा लेना पड़ेगा लो तो आप डर के आप आधा घंटा सोचते हुए जाएंगे जब तक बस लेंगे और दिल्ली डीटीसी वाली कि यार आज लूट गए लेकिन ये मुझे एक बार लेकिन स्वेटर सर्दियों के दिन था पिंक कलर का घुटने से नीचे तक का जैकेट मोटा वाला ऊपर से झला भी ऐसा लगा हुआ कि जिसको शायद सियाचीन वगैरह में लोग पहनते हैं वो थमा दिया कि लेके जाओ उसको बिका नहीं होगा। मैंने कहा नहीं अच्छा लग रहा है। अरे बहुत अच्छा है। अच्छा लग रहा है। जाओ पहनो। ले आए प्रेशर में। प्रेशर में लेकर के आया मैं उसको और उसको पहने तो नमूना बन गए। ऑफिस में लोग देख क्या पहने होंगे? अच्छा नहीं लग रहा। बोले बिल्कुल घटिया लग रहा है यार। इसको हटाओ। तो ₹100 मेरे लिए बहुत बड़ी चीज होती थी। बट उस कमीने ने मुझे थमाया था। मैंने ला के फिर रखा। फिर किस तरीके से और जाकर के आप जैकेट लेके आए। फिर मुझे मिला वहां पे अंधा कानून वाला जैकेट। अमिताभ बच्चन नहीं पहने अंधा कानून में एक ही जैकेट भैया अंधा कानून गाना गाते दे वो जैकेट मुझे मिला ₹100 का ही जो आज भी मेरे पास है इतना कि हाथ रख दूं तो गल जाए निकल जाए आज दिन वो मैंने आज तक बचा के रखा हुआ है क्योंकि मैं बच्चन साहब के एक जमाने में बहुत बड़ा फैन हुआ करता था अब नहीं अब तो संजय दत्त और मिथुन चक्रवर्ती संजय दत्त वगैरह अभी भी है मिथुन भी अभी भी हैं बच्चन साहब की कुछ शिकायतें हो गई मुझे क्या शिकायत है पब्लिकली नहीं बोलूंगा उनको बुरा लगेगा ठीक है पर्सनल मामला है पर्सनल मामला बहुत बड़ा फैन था आपस का है इनका कुछ हां कुछ ऐसा ही समझ लो।
ये पूछ रहे हैं नए वालों में किसके हैं? नए वालों में नए वालों में हीरो जैसी चीज़ नहीं है। हीरो हीरोइन सब बराबर ही हीरो वो होता तो छाती पे रख के हीरो वगैरह संजय दत्त और इनके टाइम से मिथुन गाने के बाद बंद हो गए हैं। सनी देओल के बाद अब हीरोइन हो गए हैं सर। वैसे ही गाना गाएंगे। हीरो वाला फीलिंग ही नहीं है। बॉडी बना रहे हो। काहे बना रहे हो? कोई नहीं। कोई नहीं। संजय दत्त बाल बड़ा करते थे। संजय द ने बॉडी बनाई थी लेकिन वो उस तरह के नहीं जैसे आजकल वो टाइगर सरफे हवा में ही रहता है। पैर जमीन पे नहीं पड़ते। कोई तो सर कोई तो अच्छा लगता होगा नए में लेकिन नए में कुछ ऐसा है नहीं। मैं जैसे कुछ लोग हैं जो ओटीटी पे आए हैं। उनकी तारीफ करूंगा। राजकुमार राव राजकुमार राव बहुत अच्छे हैं। नवाजुद्दीन नहीं इरफान आपको पसंद होंगे। बाबिल इरफान के जो साहबजादे हैं। क्या मूवी एक आई है लॉग आउट? हम जरूर देखिए। आपके लिए बहुत जरूरी है। पुष्पा प्रोडक्शन की ना नहीं नहीं वो आप ही के लिए है। वो Instagram ही है और कैसे उसको हैक करता है मैं बताऊंगा नहीं पूरी स्टोरी लेकिन आप देखोगे तो आपको भी डर लगेगा। बाबिल ने उसमें भी बहुत अच्छा काम किया था वो गोपाल हां रेलवे मैन में बहुत अच्छा तो ये लोग अच्छे हैं। ओटी पे अच्छे टैलेंट देखने को मिल रहा है। बाकी ये जो सलमान खान है ये तो ईद पे बच्चों का पैसा चोरी करने आते हैं। बच्चा पैसा जुटा जुटा के रखा हुआ है। एक एक दो तिवारी चाचा दे दीजिए अम्मा दे दीजिए बाबू दे दीजिए। हैं ईद के दिन पिक्चर रिलीज़ करेगा जिसमें कुछ नहीं है। लेट के वही डांस हो गया। बैठ गए वो एक्शन हो गया। कब क्या करेंगे अल्लाह जाने इंडस्ट्री में काम नहीं मतलब तो एक्टिंग नहीं रहा हूं इसके बाद नहीं कर पाओगे रिलीज होगा तो इसीलिए करते हैं ईद पे ईद ही लोग जाके देख के आएंगे बच्चे तो लाइन अटक गई थी तो बचपन का पैसा चोरी करो और क्या वही है वो और कुछ नहीं है भाईजान नहीं सबकी जान निकाले पड़े ईद पे भाई साहब जान लगा के बच्चे ईद ही कलेक्ट करते हैं पूरा ले जाते हैं।
पर होटल में आपके आप आपके ऑकवर्ड फील करने का कोई तजुर्बा है ऐसा बहुत है अभी भी हो जाता है मेरा मेरा ठीक हुआ नहीं पता नहीं मैंने देखा है बहुत लोगों का ना विद एज ठीक है एक्सपोज़र विद एक्सपीरियंस ठीक मेरा बस वही मैंने बताया ट्रिक्स आ गया मुझे कि यहां पे मैं कैसे आवाज भारी करूंगा बॉडी लैंग्वेज ठीक करूंगा वैसे तमीज से बात नहीं करूंगा तो ये इज्जत करेंगे मेरी तो एक डर जो है थोड़ा बिगड़ैल दिखने के बाद आपको सम्मान मिलने लगता है तो थोड़ा सा अंदर से तो मुझे बहुत अच्छा लगता है आप बहुत विनम्रता अगर देखिए ना ये भी है बड़ी जगहों पे बहुत अतिरिक्त पोलाइटनेस कई बार जैसे आप जैसे फर्ज करें कि एक वह टेबल है खा पीर बाबा के दमके पानी की या भोजन की कहीं भी जहां आप ऑर्डर दे रहे हैं और बहुत सारे लोग ऑर्डर दे रहे हैं। वहां पे चार लोग ऑलरेडी ऑर्डर दे रहे हैं और पांचवें गए हैं। आप सोच रहे हो कि आप बहुत पोलाइटनेस से अपना काम है और अपना आर्डर निकलवा लेंगे तो नहीं होगा। उसी में एक आदमी आएगा बॉस एक मेरा बना यार। जल्दी कर यार जल्दी। हां। तो नहीं आवाज बनानी पड़ती है। ये ट्रिक अच्छा लगा जो सब कुछ धुंधला करूं। हां बहुत अच्छा है। बहुत अच्छा है।
होटल में वो शू शाइनर क्लॉथ रखा रहता है ना। एक नीचे रखा रहता है। उसप पैक रहता है। उसप लिखा होता है शू शाइनर जो बेसिकली होता तो वो लेदर शूज के लिए है। ब्लैक और ब्राउन लेकिन स्पोर्ट शू मार स्पोर्ट्स शूज और स्नीकर पे रगड़ के आ जाते हैं। वो तो एक्चुअली हम ही लोगों के लिए रखा होता है। यही लोग आएंगे। जो ब्लैक वाला होता है वो अपना इंतजाम करके चलता है। बाय द वे हम ही लोग जाकर के स्नीकर पे रगड़ के उसको और दूसरी चीज़ जब नए-नए मॉल नोएडा में बनने शुरू हुए। हां तो जो सीढ़ियां होती हैं हम कोई आदमी ऐसा नहीं था जो एक बार में उसको चलाओ लेट के ही लोग जाते गिर जाएंगे गिर जाएंगे नहीं लेटे हुए जाते चढ़ते थे लड़बड़ा के गिर गए टंगाते हुए जा रहे हैं लाशें जैसे ऊपर जा रही हो उसमें भी लाश ऐसे पद दिख रहा है कि फसल में कोई आदमी था हां नहीं ऐसा मतलब रहता है अपना तो यहां भी ये वाले मॉल में ऑल्टो की घड़ी सही नहीं होती अंदर पैर आने वाला हां अभी जैसे मैं कुलदीप बताओ हम बाहर गए थे पुणे में तो मेरा फ्लाइट में एक चक्कर है जब वो घड़घड़ गड़ करती है तो मेरा एंजायटी बढ़ता है टर्बुलेंस में ठीक है मेरी हालत खराब हो जाती है एंजाइटटी का प्रॉब्लम तो मैं वही बता रहा था कि एक बार मैं बनारस से बैठा और ए्जायटी बढ़ी हुई थी पहले से ही और बारिश वारिश बिजली खड़ा कर रहा था आज तो और भाई साहब होगा कांड जैसे ही वो टेक ऑफ किया तो अब मेरे साथ कोई था भी नहीं बगल में अंग्रेज थे टॉक टू मी उसने कहा व्हाट टॉक टू मी उसने मैंने कहा बट व्हाई? मैंने कहा आई एम एंजाइटटी टॉक टू मी। हैव यू हैव बीन टू बनारस? या या दिस इज माय सेकंड टाइम। तुम्हें अपने आप को उससे रिलैक्स करो। तब तक वो समतल पे आ गया। चलने लगा। उससे बातचीत छोड़ दी है। तेरा काम चले गड़बगड़ा में आया। फिर गड़गड़ाया। सो व्हाट इज योर प्लान? आई एम गोइंग टू दिल्ली। मैंने कहा ग्रेट। ऑफ कोर्स दिल्ली जा रही है फ्लाइट। तो आप उस तरह की हरकतें करते हैं अपने आपको।
एयरपोर्ट भी एक ऐसी जगह है जहां पे इन इंफीरियरिटी की दुकानें हैं। मतलब जैसे क्या है कि आप देखेंगे कि अमीर लोग घुटन्ना केपरी या क्या बोलेंगे शॉट्स पहन करके आए हैं। और आप यार ये ट्राई करना चाहिए कंफर्टेबल लगता होगा। आप पहन के जाते हैं अगली बार आप बहुत खराब लगते हैं। कह रहे हैं बाल-बाल दिख रहा है। घुटना दिख रहा है कैसे? घुटना काला घुटना दिखा लगता है कि यार नहीं कह रहे हैं पूरा काला हो तो ठीक है बीच में सफेद भी हो जाता है घुटना धो लेना है और नीचे सफेद है यार घुटना धो लेना चाहिए था उसी समय आपको लगता है ये लोग क्यों नहीं लगते यार हमें हम ही लोग क्यों लगते हैं हम भी वही पहने हुए हैं। ये ये सब पता तो इसका एक अच्छा ट्रिक है कि जैसे मैं अब होमटाउन जाता था तो कपड़े मत दो मतलब पहनते थे लोग तो बहुत सारे लोग ऐसे होते थे टैग लगा हो ही बिल्कुल नया पहली बार वही पहनते थे तो मैं ऐसा नहीं करता था लेकिन उसका भी मैंने तोड़ निकाला। मैं अब सिर्फ काला पजामा और काला टीशर्ट जितने टाइम मैं घर रहता हूं वही चाहे कुछ हो जाए। अंटिल अनलेस शादी है कोई फंक्शन है। ठीक है। वरना यही सफर में भी मेरा यही होता है और घर पे भी मेरा यही होता है। तो उसको मैंने शॉर्ट कर दिया। कोई जैसे घर में बोलेंगे मोहरूम मम्मी हमारी जिंदा होती थी कि अच्छे कपड़े पहना करो। तुमको किसको दिखाना है इधर? फिर भी कपड़े पहना करो अच्छे। लोग क्या कहेंगे तुम शहर में रहते हो। उनके शहर में रहने वाला कपड़ा मतलब जरूरी है कि हर समय जींस पहने। हां तो वो दौर था ना अंशा कि जो शहर में बस चुके परिवार थे वो जब ट्रेन से भी फ्लाइट तो छोड़िए किसी भी यात्रा पर जाते थे या ट्रेन से जा रहे मोस्टली ट्रेन से जाते थे। बहुत जो उनके बेस्ट कपड़े होते थे। अरे अभी वो बहुत लोग अभी भी आपको एयरपोर्ट पे प्रॉपर दिखेंगे। जब ऑफिस नहीं जा रहा है। वो जा रहा है बुआ के घर। वेल ड्रेस्ड गया है। हां। देखिए वो मतलब एयरपोर्ट पर एक चीज और है जो एयर होस्टेस हां आपको जो मील देने आती है आय हाय स्पेशली जब वो पता है कि नहीं है कि आपको फ्री है नहीं है आपको नहीं पता था कि एयर इंडिया में फ्री मिलता है आपको पता नहीं है वो कॉर्पोरेट वाला है नहीं नहीं चाहिए नहीं चाहिए लेकिन क्या वाला कह रहा है यार पहली बार भूखा चला जाता है आदमी वो उसको यह है कि मुझे कन्वर्सेशन नहीं करना है तो ये सीखा है कि अगर वो कुछ पूछेगी नो कह दोगे तो दोबारा कुछ नहीं पूछेगी। ठीक है? तो नो कह दे रहा है उसको। जबकि वो ऑफर कर रही है। इसके बदले कैशू ले लो। खाना नहीं लेना। कैशू और ड्रिंक लो। नो लेंगे बात नहीं कर पाएंगे।
और दूसरा फ्लाइट के अंदर टॉयलेट पहली बार। ये एक्सपीरियंस सबको होता होगा। आई एम श्योर सबको रहा होगा जो पहली बार गए होंगे। पढ़े लिखे लोग बात नहीं करते। कि क्या दबाएं? हम हां। कहां जाएगा? कहां दबेगा? कहां गिरेगा? कुछ समझ नहीं आ रहा। तो आप पी मारकर खड़े हैं हम कि ये वाला बटन दबाएं। दरवाजा ना खुल कहीं इस समय हम भड़ाक से नीचे ना निकल लें। तो ये सारे डर बने होते थे जो धीरेधी जो आदमी ना कोशिश करता है ना कि मैं ऐसी जगह पे अंग्रेजी बोले कंफर्ट और बहुत कड़ी इंग्लिश बोला कि एक्सक्यूज मी राइट वे कंफर्टेबल अंग्रेजी नहीं तीख जाए इसको जब आता है दिमाग में एकदम मैं देखा डीजी यात्रा नहीं हो गया डीजी यात्रा मतलब डीजी यात्रा किसी ने डाउनलोड करा दिया सिखा दिया मतलब अभी भी मतलब
ये हिचक थोड़ी रहती है, लेकिन अब डीजी यात्रा लाइन नहीं, बाकी जगह लंबी लाइन है। तो जो खाली है वहां पे भी आदमी डर रहा है कि यार मैं गलत जाऊंगा, मतलब किसी को जाने दो। अब डीजी यात्रा वाले एंट्री पे वेट कर रहा है, कोई एक चला जाए यहां से तो मैं जाऊंगा डीजी यात्रा से। अरे वो लाउंज तो मिल ही जाता है ना आजकल, 9 ₹2 वाला। तो हमारे टाइम बहुत था। तो हमारी वाइफ कहती, जाते हो, चले जाए लाउंज में, जाते क्यों ना? हम कहा, नहीं, सही नहीं लगता, सब ओवर ईटिंग वगैरह हो जाती है। क्या बताएं, लाउंज जाके कहीं गलती से कार्ड नहीं चला, तो ये जो 66 लोग आए हैं केपरी में, बोले बहुत टाइम लॉब जाना शुरू किया, लाउंज में चले जाते हैं। लेकिन बहुत भीड़ने लगी है। अब तो कुत्ते की तरह लोग जाने लगे उसमें। हां, लाइन लगी पड़ी है। खाने के लिए ऐसी मार रहती है। तो हम जैसे लोग कंफर्टेबल हो रहे हैं ना, फिर चले जाते। एक्चुअली वो डांटते भी हैं ना। मैंने देखा है जो एंट्री पे होते हैं वो डांट देते हैं ऐसे। लाइन में लगी है कि अरे नहीं यार, यू कार्ड इज़ नॉट वर्किंग। प्लीज कैन यू गेट बैक। इतना मुंह बनाने की जरूरत नहीं थी। मैं वहां जाता हूं, रिसेप्शन से उनकी कैंडी उठा के चला जाता हूं। चार्छ अंदर नहीं जाता हूं। चार्छ उठा के रख लो, अपना चबाते रहो।
हम लेकिन वो अपनी इनफीरियोरिटी को छिपाने की भी कुछ कोशिश होती है, जब वो पकड़ में आ जाए। तो वो एक बड़ा मशहूर किस्सा है कि एक अमेरिकन, एक जैपनीज और एक इंडियन एक बार में बैठे थे, और ऐसे तीनों बात कर रहे थे। पता नहीं ये क्यों ही होता है। हर चुटकुले का ये प्रीमाइस। तीन अलग-अलग कंट्री के लोगों, उनको बैठा के वो रैंडम क्या बात करते होंगे। आई डोंट नो, मतलब क्या कॉमन इंटरेस्ट है कि आ जाओ ट्रंप के टेरिफ पे बात करते हैं। आई डोंट नो। तो वो बात कर रहे थे, तो अभी अचानक से बीप, नहीं अलग तरह के बीप की आवाज आई। तो अमेरिकन ने ऐसे अपने बाह पर ऐसे हाथ लगाया। वो बीप की आवाज शांत हो गई। बोली, मेरा पेजर है। उसकी चिप जो है मेरे स्किन में इनबिल्ट है। यहां से मैं उठा सकता हूं उसको। और मैंने बोला, यार बहुत बढ़िया है ये तो। है ना? तो बहुत ही अच्छा है। थोड़ी देर में फोन की आवाज एक बजी। तो जैपनीज ने अपना हाथ ऐसे किया, हाथ उठा के और हाथ से फोन पे बात कर। बोल रहा, मेरा फोन इसी हैंड में ही लगवा रखा है। स्पीकर है इसमें, माइक है। बात कर लेता हूं।
अब यार उसको बहुत खराब इंडियन को लगा कि मैं ले यार मेरे पास तो ऐसा कुछ है नहीं, मतलब मैं तो उसको आ गई लाइटरिन। तो चला गया, तो चला गया, तो आया बेचारा वैसे ही, वो थोड़ा सा दाया हुआ है ना वो और इंफीरियर फील भी करने लगा। तो आया वापस, तो वो टॉयलेट रोल की जो एक रोल का कागज था वो पीछे से लटकता हुआ रह गया। तो बोले, व्हाट इज़ दिस? तो उसने देखा ऐसे घूम के, बोले, देखा कागज लाइट टक रहा है। बोले, वो फैक्स आया है अभी तुरंत से, फैक्ट्स आया। कुछ चीज और थी, ये वही लोग होते हैं जिनमें मैं भी था कि थोड़ा सा कॉन्फिडेंस आ जाता है ना, तो अपने से नीचे वालों को ढूंढते हैं कि सर हां, दिखाते हैं इसको कि अपन भी कोई चीज है। मैं इसका एक लाइन बोलूंगा, बस फिर आप बोल देना, उसमें आप कभी गांव से आए अपने कजिन भाई को शहर घुमाए हो? हां। ये वही होता है। देख रहे हो, गुरु कैसे देख रहे हो, कितना सुविधा हो गया है इसमें, तुम नहीं कर पाओगे। हां, यहां बहुत टाइम देख रहे हो, बाइक चला रहे हो, देख रहे हो, दुद्दी में चला पाओगे? ऐसे नहीं यार, यहां देख रहे हो, लैग पे ला आगे उसको कैन जो है डाइट कुक का कैन देखा, वो 180 कैन है, मिठाई मिल जाती है एक किलो इतने में, वहां नहीं नहीं, ये तो बहुत अलग चीज होती थी। मैं क्या करता था, टीजर जब आया था, टीजर नहीं, डिजिटल डायरी, डिजिटल डायरी यूज़ किया, एड्रेस रहते थे इसमें। हां, एड्रेस, फोन नंबर वगैरह। तो हर हर 15 मिनट का अलार्म लगा के सेट करके जेब में रख लेते, बस में टू टू टू टू निकालते थे, देखते थे, बंद करके 15 मिनट की फिर लगा के बैठ जाओ। अगला देखिए क्या है, जब तक वो पूछे नहीं तब तक आपको लगता है, समझ नहीं, डिजिटल इज्जत, इज्जत, इज्जत चाहिए अपने को बस में, जबकि ब्लू लाइन की बस में जिसमें किसी की कोई इज्जत नहीं है, वहां कई लोग नहीं होते जिनका वो होता है कि जो उस जगह है और वो दिखाना चाहते हैं कि मैं यहां से बेहतर डिर्व करता हूं। तो आज मैं फस गया हूं। हां, आज मैं बस में बैठ के जानबूझ के, ये तो मैंने भी किया, हॉस्टल जाता था ना, मेरे गैलरी में जब फ़ोन बंद है, अंग्रेजी बात कर रहा हूं कि हां हां, आई वास हियर, आई वास द रोंग प्लेस हियर, दोस्तों को पता है कहां रहा है साला फ़ हम देखे थे, वो ऑफ ये सब करने में बड़ा मजा आता है। एक शेम है हम, मतलब आप कई चीजों को अपनी आंखें तो धुंधली कर लोगे, अपनी जुबान का क्या करोगे? थोड़ा सा और इसमें डिटेल बोलिए, जैसे हमारा एक्सेंट, हम वो हमारे सामने होता है। अब वो आपके आपके मतलब वो लड़का जो शेरवुड से पढ़ा है, मॉडर्न स्कूल से, डीपीएस से पढ़ा है, वो जिस तरीके से किसी चीज पर व्हाट रिएक्ट करता है, आप हां वो निकलेगा ही नहीं आप, क्योंकि हमारे यहां पढ़ाया भी नहीं जाता ऐसे ना। रिएक्शनंस नहीं है हमारे पास अंग्रेजी के ना। ओह माय गॉड, आप बोल के देखिए, कभी भी रियल नहीं लगेगा। प्रधानमंत्री ने ट्राई किया था, नहीं लगा रियल। आपको याद हो जब वो अमेरिका कहीं गए थे और मीडिया के लोगों से बात किया उन्होंने कि मीडिया के लोग बाहर रह गए थे। ओ माय गॉड, आप लोग अंदर नहीं थे। उसका आज तक लोगों ने मीम बनाया। वो सहज नहीं, प्रधानमंत्री भी उस भाषा में, क्योंकि वो भी एनी लोकल एक्सेंट जो जैसे अंग्रेज हमारी हिंदी नहीं बोल सकते यार, सिंपल सी बात है, हम खाना खाएगा तो हम खाना खाएंगे, उसका मजाक नहीं उड़ाएंगे, मजाक इसका उड़ाएंगे कि इसको इट्स नॉट हैपनिंग, इसका मजाक उड़ाएंगे, वो नहीं बोल पा रहा, उसका नहीं मजाक। हां, तो वो तो भाषा। मैं जयपुर गया था इंजीनियरिंग करने जब ना, तो एक तो हमारी तरफ सर रेनू गुड में हैवी एक्सेंट तो है ही, आप तो वहां लड़के चढ़ाते थे कि क्या गा के काहे बात करते हो, ये सब तो नॉर्मल था, हम एंजॉय करते थे, कैसे गा, तुमसे नहीं हुआ? क्या अच्छा ऊपर है कैंटीन, तो वो लोग बोलते थे थे जो शहरों के लड़के थे, यार तुम लोग गाए क्यों बात, एक बार बोल दो समझ में आ जाएगा। तो वहां तक वी यूज्ड टू एंजॉय किया। एक बार क्या हुआ है, एक बड़े शहर का लड़का था, तो उसके दोस्त आए थे उसी शहर से मिलने, जयपुर में रहता है सर चैनल नहीं देना चाहता मैं कोई भी, तो वो उसके दोस्त आए, सब आए, बाइक को वो सबसे मिलाया, सबसे मिलाया कि ये परविंदर है, ये राजेश है, ये रिक्की है, ये और मैं उसका उसका काफी अच्छा दोस्त है। ऐसा मुझे लगता था। ये साथ में जूस पिए हैं, ये किए हैं, दोस्त हैं बिल्कुल। तो चले गए, तो बोला, अबे तुम हमको नहीं मिला। हम अंदर ही तो बैठे थे। इतना खराब लगा ना वो, आज तक चुभती पता नहीं उस बात को, ऑलमोस्ट सर 22 साल हो गया। 20 साल हो गए। कह रहा है, यार आई वांटेड टू गिव अ बेटर इंप्रेशन ऑफ़ माय कॉलेज टू माय पीपल। इतना चुभा हमको कि हम मतलब मैं कॉलेज का टॉपर हूं। मैं गाली नहीं देता। मैं कुछ नहीं करता। बट मैं ऐसा क्या कर रहा हूं कि इसको ये लग रहा है कि मेरी वजह से जाएगा। तो मैं वहां बफरकेट ही नहीं कर, मतलब मैं बहुत दिन सोच रहा कि मैं गलत क्या कर रहा हूं यार, मैं गलत कपड़े पहन रहा हूं कि मैं गाली नहीं देता, मैं पढ़ने में टॉपर हूं इस कॉलेज में, खेलने में अच्छा, मुझे दिक्कत वो बहुत दिन तक रहा मेरे साथ, तो वो अभी भी मिलेगा तो हम बताएंगे उसको ठीक से, अच्छे से, नाम बताओ तुम अपना, नहीं नाम बताओ, अभी रगड़ देते हैं नाम है, ध्यान दो, हम वो जैसे कुछ शब्द तो अंग्रेजी के बोलने ही पड़ते हैं ना आपको, जैसे सॉरी, हम एक्सक्यूज मी, ये सब तो आप समय के साथ इनके बिना काम नहीं चल सकता, या थैंक यू। तो थैंक में जब छोटे शहर में थे तो वो पूरा था, बड़ा निकलता था। थूक निकल जाता था उसमें। थैंक यू। ठीक है। उसका साला टोन ही नहीं समझ में आया लंबे समय तक कि बोलना कैसे है। उन्होंने थैंक यू ना बोलो, थैंक्स बोलो। थैंक्स। वो थोड़ा कूल है। फिर उसमें था, को आपने बहुत समय के बाद सीखा कि था नहीं है। वो ता और था के बीच। फिर आप थैंक्स। तो फिर उसी में आदमी कोई सीख लिया तो फिर ता ही बोलना है। थैंक यू। प्रोफेसर खान मतलब बोलते हैं ना थैंक यू, गुलामी में। और एक चीज़ और है, जैसे अभी अंग्रेजी हम तुम बात करें और यही अंग्रेज आ जाए तो हम उसी के एक्शन में बात करने की कोशिश करेंगे, नॉर्मल अंग्रेजी, उसको समझ में आ रही है लेकिन नहीं यू नो, अच्छा अंग्रेजी बोलना दुनिया का सबसे इजी लैंग्वेज है बॉस, ये मैंने दिल्ली आके डिस्कवर किया। हम जो अंग्रेजी बोलते हैं ना, बिल्कुल शुद्ध अंग्रेजी बोलते हैं जिसमें ग्रामर वगैरह सब कुछ सही होता है और अंग्रेजी आप किसी से बात करो करो। अ बोलना आपको आना चाहिए। अगर अ से हेल्पिंग वर्ब ले कहीं से कहीं डांक जाओ कि यू नो, आई वाज़ इन लंदन। अब आपको जाना है दिल्ली। सो व्हेन आई वाज़ इन दिल्ली, आप चले गए वहां से वहां। हां, मतलब वो एक अच्छा सीढ़ी है जिससे आप कहीं चढ़ उतर सकते हो। हां। तो अ अगर आपको आता है। वैसे हर लैंग्वेज में है वो। बट इंग्लिश में ये फैक्ट है। इंग्लिश में अगर अ ई आता है तो आप बहुत अच्छी अंग्रेजी बोल सकते हैं। कहीं पे भी सर्वाइव कर जाएंगे। हम्म। पर उसमें क्या है कि जब ये एक टिप मैंने आपसे लिया है। ये मैं यूज करूंगा। जब उसमें क्या हुआ, वे लड़के जो अपनी उस इनफीरियोरिटी से उभरना चाहते थे तो उन्होंने शहरों में आकर के कुछ चीजें की। कुछ उपक्रम किए, कुछ ऐसी चीजें आवरण पहने। उन्होंने स्पाइक बाल कर लिए। जेल लगाने शुरू किए। दाढ़ी वैसी कटानी शुरू कर दी। यार मुंह खोलना है तो बोल, वैसे ही रहे। कंटीन नहीं पहुंचे अभी। ठीक है, लेकिन बाल स्पाई किए हुए हैं वो। अच्छा उसमें क्या है कि फिर एक दो वर्ड समझ में आ गया। एक दो सेंटेंस समझ में आ गया कि ये हमारे हमने हमारी उससे मैच कर रहा है। हमारी जो जुबान का जो भाषा परिवार है उसमें ये फिट हो जाएगा। बट उसका गलत प्रयोग कर रहे हैं। जैसे अब पता चला कहीं से दूध उबालने, दूध फैल गया, गिर गया। बोले, ओ दैट एस्केलेटेड क्विकली। बहुत बढ़िया। ये भी बहुत हुआ है कि गलत जगह गलत प्रयोग कर रहे हैं। हंस रहे हैं उसमें। हमारे टाइम में सर लॉ वेस्ट जींस का जल चुराया था शहरों में, जयपुर में था। लो वेस्ट लेके हम रेनू भी चले गए थे। ओ यार वाला एटीएम का है ना उसके बाहर पार्क था एक, तो वहीं टाइम में था दोस्तों के साथ लो वेस्ट। मेरा भी लो वेस्ट, मेरे दोस्त भी लो वेस्ट। तो एक भैया बुलाया हमको, भैया वो समझ। हग दिए हो क्या? नहीं, कह रहा, कह रहे, इसको पूरा ही उतार लो ना। मुझे बहुत गंदा। छोटा सा दिखा रहे हो, मजा नहीं आ रहा। पूरा दिखाओ। मेरा छोटा भाई पहनता था। पहनता है, तो मैंने बोले क्या है तुम्हारा जो टिका है, जेब जो है, जान के नीचे टिकाते कहां हो, मतलब लटका पड़ा है, तो उतार दो, पूरा ही उतारो, पूरा उतारो उसको खत्म करो, दूसरा ना कई लोग शब्द अंग्रेजी बोलनी है लेकिन आती नहीं है, तो एक हमारे थे, तो पैर में दर्द, हेडेक सुना था उन्होंने, उनको लगा हेडेक का मतलब ही दर्द होता है, घुटने में बहुत हेडेक है यार। और कई लोग, अरे अच्छा, क्योंकि उनको भी नहीं पता था। एक सर वो भी हो सकता है, घुटने में हेडेक, घुटने में हेडेक हो गया, उसकी गलत थोड़ी है। ही होगा फिर, हां, मेसराइजिंग बात तो है, घुटने में हेडेक वगैरह हो जाए तो एक बार तो हॉस्पिटलाइज होके ट्राई करें। नर्चर करेगा वहां कोई। बड़ा मजा आता है। इंडिया तो सब पढ़ रहा है ना लोग, वहां से मार्क कर कर के अंग्रेजी वर्ड सब जो है, हम लोग ना वो होता था स्कूल की तरफ से हम सामाजिक कार्य करने, हम तो गांव में जाके सबको शिक्षित करो और किस बारे में? एड्स के बारे में, एड्स आया था ना 90ज आया था लेट 90ज में, मतलब बहुत चरम पे था, लोगों में डर था, लोएस्ट आया था फिर एड्स आया, तो मेरे साथ ही एक बंदा था, विपिन, तू गांव वालों को समझा रहा है, जानत है बहुत भयानक बीमारीबा एडस, मेरी तरफ देख रहा, भैया जान चली जाए, लाल में एड जो सिखाने गया है उसको खुद नहीं पता है कि एड्स बोलना है, हम एडस बोल के चला आया। हम तो ऐसेसे लोग भी अंग्रेजी में अपना आप उसको पहले सीख लो, समझा लो, लेकिन नहीं, आज भी जैसे मैं, अरे एक दिन ऐसे दो यहीं पे मैंने दो बच्चे यंग देखे बात करें एक दूसरे से, कह रहे हैं उससे कह रहा है, ब्रो तेरी जींस रिब्ड होनी चाहिए या सोल है ना, तो मैंने पूछा कहां का है, बोले मुजफ्फरपुर, तो मैंने ये कहां सीखा, बोले ये तो Instagram पे चलता है आजकल, तो वो मतलब है, मतलब। और मुझे लगता है कि जो आप कह रहे हो ना, प्रेशर जो पीयर प्रेशर है, समाज का प्रेशर है, वो कूल होने का प्रेशर, मैं तो मतलब अपन तो इनफैक्ट मैं एक ऐसे मीडिया ग्रुप में काम करता हूं, हमने लन टॉप जब शुरू किया उसका पूरा आईडिया ही यही था कि भाई देसी है, माथे पे लिखा हुआ है, तुम्हारे सामने है और इसमें ही जैसे जो गर्व है या नहीं है, आई डोंट नो, बट आपके सामने है, उसी में ही बात करेंगे हम। आज भी अपने किसी भी तरह की प्रेजेंटेशन कहीं भी देते हैं, हिंदी में देते हैं, बहुत बढ़िया, वही अपने को आता है, वही अपनी रोजीरोटी है। अंग्रेजी आती है काम भर की, पर वो जो हमारा खाते तो हम अमिताभ बच्चन भी हिंदी का ही खाते हैं, तो वैसा है। लेकिन एक पीयर प्रेशर के तहत कूल होने की एक उत्कंठा ने बहुत नुकसान, अगर आप नेचुरली कूल हैं, हिंदी में भी कूल है और अंग्रेजी में भी कूल है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन जुबान से आप कूल हो जाएंगे। यह बहुत कूल होता क्या है? मेरे को तो आज यही समझ नहीं आया। कूल एक्सक्ट्ली होता क्या है? व्हाट इज़ कूल? वैसे हम तीनों लोग बात कर रहे हैं और आनंद ले रहे हैं। तो मेरे लिए तो ये कूलनेस है। मतलब मेरे को तो समझ नहीं आया कि कभी कोई चीज करना कूल हो जाता है। कभी कोई चीज इतना फ्लूइड है वो ना कि कूल। अच्छा कूल क्या है? मैं भी, सही सवाल है। कूल का मतलब क्या होता है? क्वेश्चन तो हम कर ही रहे हैं 35 साल से। लेकिन हमको पता नहीं हम कर क्या रहे हैं। हम 10 साल और आगे बढ़ चुके हैं। हमें भी नहीं पता है। यार किसी लड़की ने जब अंग्रेजी में कभी पहली बार कॉम्प्लीमेंट दिया, यू आर काइंड अ क्यूट। हां, कैसा फील हुआ? क्या लगा था? अरे कुछ ऐसा लगता है लावा सा अंदर जाता है। अरे बोल, बोलना क्या होता है उसप ये नहीं पता। वो तो नहीं आज भी नहीं पता। लेकिन अरे अजीब लगता है। अभी लड़की कॉम्प्लीमेंट करूं अलग ही फील। तितली सी जाती है अंदर। है ना, थोड़ा दिन आने खुश रहता है। घर पे देख रही हैं, घर पे देखा, उन्हीं की बात कर रहे हैं आप, क्यों नहीं? अरे उनकी क्यों जानते, मेरे को बचपन से जानती हूं, उन्हें पता है कि आपकी 100 एपिसोड से देख रही हैं, उन्होंने कुछ नहीं कहा, तो इनकी भी कुछ नहीं कहेंगी, तो आज तो मैं आपके ऊपर डाल दूंगा ना, भड़का रहे थे, बट आपको याद है ऐसे जैसे लड़की ने अंग्रेजी में कॉम्प्लीमेंट सीन्स, हम लोग मतलब हमारी पृष्ठभूमि और परवरिश में एक यह भी रहा है ना, एक दूसरे जेंडर से कम्युनिकेशन नहीं होना भी हमारी परवरिश का हिस्सा था। इनफैक्ट बहुत सारे, मैं तो खैर कोड में पढ़ा, लेकिन बैठाते अलग-अलग थे। लड़कियां एक तरफ बैठती थी और लड़के क्लास लगते थे। तो हमारे में क्लास तो सेम थी, बट बैठते अलग-अलग थे। कम्युनिकेशन बहुत मतलब ग्रेजुएशन में फर्स्ट ईयर में हम थे। फर्स्ट ईयर, सेकंड ईयर, थर्ड ईयर में तो लड़के एक तरफ, लड़कियां एक तरफ बैठती थी। हां। तो जो बात होती थी वो भ अपनी कॉपी दे दे, अपने नोट्स दे दे वाली आगे ज्यादा जाता था। कॉपी तो बहाना होता था। हां, वो मतलब मैं अपना बता रहा था, लेकिन लेकिन जब वो आमने-सामने वाला है और कॉम्प्लीमेंट दे दिया साहब आपको, यार वही जैसे इन्होंने बताया, लावा, मैं तो जमीन पे रहता ही नहीं था, फिर साइकिल लेके अलग दिखाया जाता, खाना पच रहा है, बढ़िया एकदम, खत्म, खाना पच रहा है, पेट साफ हो रहा है, बढ़िया, दूसरेशन तक बात आई जाती है, एक उम्र के बाद नहीं, उसको सुनने के बाद सच में ऐसा लगता था कि कूल वाला जो तुम कह रहे हो, हम वह सब बहुत छोटा पड़ जाता था उसके, पूरा दिन में ऊपर आसमान, नीचे आसमान, नीचे स्कूटर चला रहे, लेके भिड़ जाते थे। क्या जो शब्द बोला है वो आपके कानों में, आपके दिलों में हम बस रहा है, गूंज रहा है, हम तो आप कुछ भी कर सकते, साथ में सो नहीं रहे हैं, करोड़ बदल रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं, अलग-अलग ये हो तो गया लाइफ शॉट, ऐसे ही तो होती है शायद, ऐसे जिंदगी का था, दोस्तों। ये जो रियलिटी शोज़ आए, तो रियलिटी शोज़ बहुत हिट हुए, छोटे शहरों में भी जब हिमेश ने पहली बार बोल दिया, तब छोटे शहरों पे पहुंचा, फैंटास्टिक, एक शब्द होता है। अच्छा है ना वो, वो गाने वाले बोलता था, बोले, फैंटास्टिक, लोग रैंडम बोलने लगे थे, फैंटास्टिक यार, है ना? कई लोगों ने फैंटास्टिक, फैंटाबुलस भी निकाला, फैबुलस, वो तो फिर रहा वो, फैबुलस और उसका मिक्स करके, लेकिन फैंटास्टिक जैसे शब्द भी आए, मतलब नहीं तो गुडवुड में चल रहे थे, गुड और नाइस में ऑपरेट कर रहे थे, फिर लगा नहीं इसके लिए और सुपरलेटिव डिग्रीज भी हैं और फिर ऐसेसे भाषा बदली। अब तो खैर अभी आप किसी चीज को फैंटास्टिक बोलेंगे तो आपको बूमर कहा जाएगा कि कितनी ओल्ड लैंग्वेज यूज कर रहा है। अभी आप जजी लैंग्वेज से थोड़ा, काला, मेरी बेटी है जैसे, तो उसके उसका राइटिंग स्टाइल अगर मैं बोलूं तो हम सोच भी नहीं सकते वो क्या लिखते हैं। ब्रो, यू एट इट, ब्रो, तो उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी, स्ले, स्ले क्वीन, आप लड़के हैं, बट आपको क्वीन कॉमेडी में हर एज के, इनफ यंग लोग ज्यादा है, तो फिर भी थोड़ा बहुत सुनने मिल जाता है, फैमिली किल्ड इट, ब्रो, किल्ड इट, किल्ड इट, या किल्ड इट, और उनका स्टाइल हाथवात का अजीब सा हो गया, हम लोग जैसे विक्ट्री बना देते थे या ये ऐसे करते थे, वो यो पता नहीं क्या कर रहे हैं वो, खैर अपना-अपना दौर होता है और हमें एक्सेप्ट करना चाहिए कि अरे वो देखा आपने, स्टारbक्स, स्टारbक्स जब जाते हैं पहली बार तो उसमें नाम लिखते हैं ना, अब ठीक है, नाम अच्छा हो तो ठीक है, मनोज शो में नाम पूरा आएगा, बाल्टी में पियो, मनोज नाम के लड़के, ताराचंद नाम का लड़का स्टार बॉक्स ले जाए और वो कह रहा है यार मेरा नाम विवान होना चाहिए, उस दिन उसको लगता है विवान नाम होता तो कितना अच्छा, रिंकू, डेविड नाम के लड़के, हिंदू लड़के डेविड नाम, अवधेश, ताड़केश्वर कैसे लिखा कोई स्टार बॉक्स के ऊपर, ताड़केश्वर। पर ये है कि सच्चिदानंद, zूम कॉल, कोविड के समय ज़ूम कॉल आया है ना, ज़ूम कॉल से सुविधा मिली, आप मीटिंग करनी है घर से, उससे चीट करने की सुविधा आई। हां, मीट मीटिंग में ना आप पहले से प्रिपेयर कर सकते थे, आप प्रिपेयर करके बैठ गए, पॉइंट्स बना लिए आपने, आपने एक स्क्रीन पे लिख के रख लिया आपको क्या बोलना है वगैरह वगैरह, बट एक चीज पे आप कभी उसमें फंसे हो कि अभी भी क्या सही है इस समय, मतलब स्वीकार क्या है? शेड्यूल स्वीकार है कि स्ेड्यूल स्वीकार है? स्ेड्यूल बनाया है मैंने, शेड्यूल ही रहेगा? नहीं, मतलब वो तो अलग-अलग ब्रिटिश और यूके, यूएस, यूके इंग्लिश है, लेकिन उसमें आदमी बदलता रहा हमेशा, यार स्केेड्यूल बोल रहे हैं लेकिन वो बात नहीं आ रही, शेड्यूल पे शिफ्ट कर लेते हैं, नहीं, इस चक्कर में नहीं पाला उतना मेरे, अब तो मेरा आपका शेड्यूल कौन मैनेज करता है? जो लड़के मैनेज कर रहे हैं हमको वो भी आरा के सर सत्तू से बात, ऊपर उठ नहीं रही अभी कुछ दिनों से गर्मी आ गई है। हां, पर ये मतलब बहुत थोड़ा समय लगा है ऐसे सीधे कंधे खड़े करके रख के ये बताने में कि मैं सुल्तानपुर, मैं गोरखपुर, मैं मीठी, मैं प्रयागराज, नहीं नहीं, अभी भी एक मुझे बड़ा अच्छा लगा था, एक रेनू कुटके साहब हैं। अ कहीं बाहर रहते हैं, यूएस, यूके में, तो उनका खत आया था कि अब मैं बहुत चौड़े में बोलता हूं। पहले वो बनारस बोलते थे, तुम भी यही बोलते, देखो आज दुद्दी, वो अपना बताते नहीं, वो बगल में, अभी जैसे को पता चला कि आई आई एम ओके, मतलब मैं इसको जान सकता हूं, ये सेफ है, तब हम बताते हैं, नहीं, अदरवाइज हम भी बनारस चल जाते हैं, बोलते हैं, मैं कहां? मैंने कभी नहीं बोला, मैं दुद्दी बोलता आया, सोनभद्र दुद्दी, तो उसने फिर बोला कि अब मैं बनारस नहीं, अब मैं चौर से बताता हूं, मैं दुद्दी से सटे रेनुकूट का रहने वाला हूं। मेरे ख्याल से अपनी जगह को छुपाने का कोई मतलब नहीं, लेकिन आंशलिकता की स्वीकारिता बढ़ी है, जैसे छोटे शहरों के का मेन स्ट्रीम में जो प्रेजेंस हुआ करता था वो बढ़ा है ना, अभी जैसे मेरे मन जैसे अब आप देखें कि यह वैभव सूर्यवंशी लड़का मुजफ्फरपुर का रहने वाला है ना, ट्रेनिंग कहीं-कहीं से की, उसने 14 साल की उम्र में सेंचुरी लगा दी आईपीएल में, तो वो फोन पे बात कर रहा है, वीडियो कॉल पे, तो प्रणाम पिताजी, प्रणाम पिता, सॉरी पिताजी, उसके कह रहे हैं, बेटा सपना जैसा लग रहा है, समझ रहे हैं आप और ये इस समय स्टार है, मतलब ये आपके इंडियन क्रिकेट का भविष्य है, तो इसमें आगे वाले समय में हजारों करोड़ों शायद निवेश होंगे, होंगे, अगर उसकी फॉर्म जारी रही तो, मतलब वो कई वो शायद उसमें बहुत सारे चेहरों की वजह से भी हुआ, वो जैसे छोटे शहरों के लोग फिल्मों में सफल हुए, नवाज से लेकर के राजकुमार राव और ये सब एक बहुत जैसे ना मैंने ऑफ नोटिस किया है कि जब हम लोग छोटे थे ना कि कई लोग अपने मां-बाप को लेकर शर्माने लगते थे अपने दोस्तों के सामने कि मेरी मम्मी चप्पल पहन के नॉर्मल साड़ी में निकल जाती है, पापा जो है वो यहां तक की बनियान पहन के, तो बताते नहीं थे कि अरे नहीं नहीं, पापा, मम्मी नहीं है इस लेवल पे, मैंने देखा कोणा यह सब बोल जाते हैं। जैसे हम एक दोस्त के घर गए थे तो हमें नहीं पता था कि उसकी मम्मी है। तो मुझे, आंटी कहां है? आंटी कहां है? आंटी कहां है? तो पूछा, आंटी झाड़ा, फिर तो उसको इस बात को लेके इतनी शर्म आ गई। तो बोला कि मैंने मम्मी नहीं है। बुआ आई हुई है गांव से। तो इस लेवल का अब मैं नहीं देखता हूं। या मेबी पाला नहीं पड़ा हो। ये भी हो सकता है। पता नहीं। अब बहुत चेंज, बट इतना इतनी मतलब यह ओनस सिर्फ उस लड़के पे नहीं है। यह ओनस सोसाइटी, सोसाइटी और बहुत ज्यादा शर्म की बात कि मतलब ये कलेक्टिव शर्म की बात है हमारे लिए। बिल्कुल तो कि अगर आपने आपको एक्सेप्ट नहीं कर पा रहे जस्ट बिकॉज़ ऑफ़ एन इमोशन, सोसाइटी प्रेशर। तो आप फिर पता फिर तो ये हम जो सोच रहे हैं ये बहुत हल्की चीज है। बहुत भारी चीज है ये। आपको कितनों को रोक रही होगी जीवन में, खुद मुझे भी रोक रही है। बट बहुतों को और भी रोक रही होगी, बहुत बड़े लेवल पे। तो यह तो कंडीशनिंग है ना, जैसे हम कहते हैं, वो डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाया हुआ है। तो ये मतलब ये प्रत्युष चौबे की गलती नहीं है इसमें या वो इससे नहीं पूरी तरह अभी भी निकल पाते हैं। मैं भी पूरी तरह नहीं निकल पाया हूं। इनफीरियोरिटी रहे थोड़ी-थोड़ी कहीं-कहीं ऐसे मौके पे निकल आती है। तो वो इंजेक्शन की तरह कंडीशन की गई है हमारे ज़हन में। जैसे मैंने ना वो वीडियो डाला था तो लोग ऐसे उसको बिटबिट बोलते थे, इनफिटी कॉम्प्लेक्स। मुझे लगा था यार ये बिट हम सोच के थोड़ी बनाया था। ये मेरी लाइफ की प्रॉब्लम है और मेरी है तो मुझे लगता है इंसान बहुत अलग तो होते नहीं, बहुतों की होगी, तो ये लाइफ में रोकता है यार, जैसे बहुत चीजें और भी रोकती है लाइफ में ना आदमी को आगे बढ़ने से, कई चीजें मेंशन करते थे, कहीं नहीं करते थे, ये बहुत बड़ा रीज़न है। जैसे सर आप बता रहे हैं, आप अगर कोई और होता, शायद मैं होता आपकी जगह, मैं नहीं जा पाता, बॉस की वो बात सुन के भी भी, हां, तो मेरे लिए वो करियर खत्म, और मैं अपने करियर में देख रहा हूं अभी भी कि अगर मेरे अंदर थोड़ा कॉन्फिडेंस ज्यादा होता ना तो मैं शायद बहुत ईजीली बहुत आगे होता। बिल्कुल, और तो ये सिर्फ इस करियर ओनर है। अगर जब मैं टीसीएस में था तब भी अगर मेरे अंदर थोड़ा सा ऐसा ओपन होते ना तो ज्यादा इजी होता। और ऐसे कितने सारे लोग होंगे जिनको रोक रहा होगा ये फीलिंग। ये चीज जैसे कुलदीप भी मैं जानता हूं बहुत बोल्ड हैं। कॉन्फिडेंट रहते हैं। लेकिन ये भी एक छोटी सी जगह से आए हैं। मैंने इनके साथ के लोगों को देखा है। वो वहीं हैं। कुलदीप कहीं और हैं। मैंने अपने दोस्तों के साथ देखा है। आई एम सॉरी, मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैं बहुत ऊंचाई पे
पहुंच गया हूं। बहुत बड़ा आदमी बन गया हूं। लेकिन मैंने अपने दोस्तों को वही है, वो कॉन्फिडेंस जो होता है ना, यकीन, हम वो बहुत जरूरी है। और ये समाज हमें बहुत ज्यादा खींचता है पीछे की तरफ; समाज कभी आपको आगे बढ़ाने के लिए नहीं बढ़ा है, वो आपको डराएगा, आपको नीचा दिखाएगा। उसको तोड़ने के लिए एक ही चीज है कि आपका यकीन, कॉन्फिडेंस जो इतना हाई रखिए, इतने भी हाई नहीं कि आप एकदम सुपर हाईफाई हो जाए, लेकिन इतना जरूर रखो कि यार अगर दुनिया में जैसे ट्रेन कोई किसी ने इज़ाद किया, प्लेन बना सकता है कोई थोड़ा बहुत, तो अपन भी कर सकते हैं लाइफ में हम। और इट्स अ जंगल आउट देयर, जैसा ताऊ कहते हैं।
हां, तो लोग दौड़, आपने आप इसको माने ना माने, उस दौड़ से स्वयं को मुक्त माने। लेकिन जब से हमारे यहां मार्केट खुले और कैपिटलिज्म का वो प्रभाव बढ़ा है, तब से नौकरियां, दौड़ तो हो गई हैं और उस दौड़ में एक सहज कंपटीशन तो है ही। आप मीटिंग में हैं और आपके पास बहुत अच्छी बात बोलने के लिए है, पर आप चुप कर जाते हैं क्योंकि कोई दूसरा व्यक्ति कहता है, "आई आई नीड टू से समथिंग हियर, आई हैव एन इंटरवेंशन हियर।" उसको बहुत सुंदर शब्दों में सजा करके वो एक बहुत हो सकता है आम बात, सामान्य बात कहे, लेकिन पेश करने का तरीका उसका हो सकता है, उससे भी हल्की बात कहे जो जो आप सोच रहे थे। और आपको पता है कि ये जो कह रहा है, इसमें भी फ्लॉ है, बट वो उस समय नंबर ले गया, 10 में से सात है ना, अपोरर्चुनिटी भी ले गया। तो वो वो तो है, वो एक तो इस पे भी मीटिंग वाली बात ना बहुत अच्छी बात है।
जब मीटिंग होती है, खासतौर पे जिसमें आपके सीनियर्स भी बैठे होते हैं और कुछ बहुत स्मार्ट लोग, कुछ बहुत अच्छे बोलने वाले वक्ता जो होते हैं, जिनको दिमाग नहीं होता, बोलना अच्छा जानते हैं सिर्फ, उनके सामने तो आप कुछ सोच रहे हैं, बोले कोई बोलने ही नहीं दे रहा है। आप शुरू भी किया, कोई सलाह उसको बताया, काट देगा, काट देगा कि नहीं मैं बताऊंगा, तो इसका मैंने तोड़ दिया। और जो आप कंप्लीट शुरू कहां की थी, उसका भी एक तरीका है। आप मीटिंग में अगर बैठे हैं, यानी कि आपकी की अहमियत थी। इसीलिए आपको उस जगह पे बुलाया गया है। यह जरूरी नहीं है कि आप कुछ बोल करके वहां पे कुछ अच्छा साबित कर देंगे। हां, आपको लगता है कि आपका एक पॉइंट था जो आपको रखना चाहिए। आप उसको स्वर्ण तरीके से, जब सब कुछ बोल लें तो बोले, "मेरा भी एक छोटा सा सुझाव था कि अगर ऐसा हो सकता तो बेहतर हो सकता।" वो पूरा ले जाता है और जो मीटिंग जो चेयर कर रहे होते हैं ना, वो बहुत समझदार लोग होते हैं। उनको पता होता है कि कौन बकवास कर रहा है, कौन घुग्गी फेंक रहा है और कौन सही बात कर रहा है। हम, बट 90% जगह सर जैसे इन्होंने ना, देयर इज़ अ जंगल आउट देयर, तो वही चीज़ है ना, उनको नहीं फर्क पड़े। ये बोल रहा है क्या, ये ठीक से बोल लेता है क्या? इसको ले लो। जो अटक रहा है वो वैसे ही कमजोर है। जैसे जो अटक रहा था और जिसको सजेशन देने चाह रहा था, अपनी तरह के सेंटेंस फ्रेमिंग में उसकी समस्याएं थी। है ना? हम्, उसने एक इंगेज करने वाले वाक्य से बात शुरू नहीं की। हो सकता है डायरेक्ट कंक्लूजन पे पहुंच गया। अरे ये नहीं करते, ये करते हैं। वो बताने वाला था क्यों करते हैं। बट उसने एक बात और फिर लेकिन दूसरे वाले ने अभी उसकी बात को उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया क्योंकि वो जहां से भी आया है, जो भी उसका बैकग्राउंड है। पर जो वो कह रहा था, अक्सर रहता है कि 20 मिनट बाद उसी मीटिंग में वही बात कंक्लूजन के तौर पर सामने आई। और बस थोड़ी सी पॉलिश लैंग्वेज में निकल कर के आई। बोला था ना, यही तो मैं बोल रहा था। राइट।
इनफैक्ट कई बार जैसे वाइल्ड लाइफ में मैं था तो अंग्रेजों के साथ नाता पड़ा, फिल्म वो अंग्रेज खरीदने वाले थे। ऑलमोस्ट छह मीटिंग हो चुकी थी। आई वाज़ वैरी कॉन्फिडेंट। मतलब मेरे साथ और भी अजय सूरी साहब, चार लोग और होते थे। हर बार जाओ, नेशनल ज्योग्राफी वाले थे। एक्चुअली वी हैव गॉन थ्रू योर फुटेज। बट कैन यू ऐड समथिंग टू दिस यू नो, डॉक्यूमेंट्री टू एनहांस द क्वालिटी। अरे ठीक है, उसको भी कर दिया। एक चीज और, तो तीन-4 मिनट में भन्नाच हो गया था बुरी तरीके से। मैंने कहा, "आज आर या पार खेलते हैं सीधा," क्योंकि हिंदी की इंडिया के भी लोग थे तो उसने फिर शुरू किया, "देख बेसिकली मिस्टर खान, मैंने एक सेकंड, ये फिल्म मेरी है, खरीदना है, हिंदी में बात कर रहा हूं, लेना है लो, नहीं लेना है मत लो।" डील उसी दिन साइन हुई थी। कॉन्फिडेंट था वो कि मैं बेचूंगा या नहीं बेचूंगा, जाएगा या नहीं जाएगा, आज खत्म करते हैं।
मेरे को ऐसा लगता है ना, कॉन्फिडेंस सबसे ज्यादा एक्सप्लोइटेड स्किल सेट है। जो चुनने की पोजीशन पे लोग हैं ना, पावर पे हैं। अगर वो उसके आरपार देखना शुरू नहीं कर पाएंगे ना तो उनका ही लॉस है इवेंचुअली। वो कंपनी में वो लोग भरते जाएंगे जिनको अच्छी शर्ट टक इन करने आती है। अगर आपको कोडिंग करानी है, वो अगर आपको कोडिंग करानी है इवेंचुअली, तो यू डोंट नॉट नीड पीपल जिनको हां जिनको प्रेजेंटेशन अच्छी आती है, यानी उसके आरपार अगर जब तक आदमी देखना नहीं शुरू कर पाएगा ना तो वो अपना कटवाता है। गणित का सवाल बना लेता है ना, उसका तो कटा ही है, आपका उससे ज्यादा कटा है क्योंकि आप पैसे भी दे रहे हो कटवाने के, वो तो फ्री में। और एक चीज और होता है कि जब लोग बोलते हैं, "पावर," हम ये एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है जिसको लोग पावर समझ बैठते हैं और अपने मनमानी तरीके से काम करते हैं, वो उनके लिए भी आगे जाके घातक साबित होता है। दूसरा, एक आदमी को आधे घंटे के इंटरव्यू में आप कैसे जज कर सकते हो कि वह बेस्ट है, एग्जैक्टली या आगे जाके आपके लिए क्या ही कर देगा? झूठ भी बोल रहा होगा अगला कि मैं ये कर दूंगा, मैं आग लगा दूंगा। बेस्ट तरीका होता है कि मैं जब इंटरव्यू लेता हूं किसी का, मैं उसका कॉन्फिडेंस लेवल देखता हूं कितना है, रेस्ट वो वही करेगा जो हम चाहेंगे। अगर और इंटरव्यू देने आया है अगर तो वो क्या करने आया, इतना तो उसको पता होगा ना, बेसिक ही कम से कम पता तो होगा। कॉन्फिडेंस देखो उसका, यकीन अपने ऊपर कितना है। हम बेस्ट जो टैलेंट का होता है मेरा यही होता है।
हां, लेकिन उसमें ना खान एक बात है, कॉन्फिडेंस बहुत सारे ऐसे लोगों ने भी अर्जित कर लिया है जिनमें डेप्थ नहीं है। वही मतलब कहानी ये है कि बहुत सारे छोटे शहर के लड़के वो सिर्फ इसलिए मार खा रहे हैं कि उनके पास कॉन्फिडेंस नहीं है। उनको मालूम सब कुछ है जो आप बताएंगे, पर वो बात करने की स्किल में हिचक जा रहे हैं। वही मैं कॉन्फिडेंस का मतलब यह नहीं कह रहा हूं कि बहुत अच्छा बोलता है। मैं यह देखता हूं कि इसको काम आता है, यह बोल नहीं पा रहा है। मेरी टीम में कई ऐसे लोग हैं जो बेहद अच्छा काम जानते हैं। और अभी मैं बोलता हूं, कुलदीप से बात करूं ना तो हम ऐसे-से मतलब एक है हमारी टीम में जिनको मैं बॉम्बे से लेकर के आया था। हम जब मैं फर्स्ट पोस्ट देखता था बॉम्बे में जाता था ऑफिस में तो फिर दिल्ली लेके आया। बॉम्बे से लाना उसको बहुत मुश्किल काम था। मैंने उसको एक चीज बोली, "तुम बहुत टैलेंटेड हो लेकिन तुम अपनी बात नहीं रख सकते," हम बट तुम्हारा काम बहुत बढ़िया है, ए वन बहुत बढ़िया वो काम करते हैं। तो वो उन लोगों को मैं जरूर देखता हूं कि अच्छा जिसको काम आता है लेकिन बोल नहीं पा रहा, जैसे हिचकिचा रहा है, डर रहा है, कांप रहा है। इंटरव्यू में लोग कांपने लगते हैं कई बार कि और कांपता वही है जो काम जानता है लेकिन अपने आप को रख नहीं पा रहा है। जिसको काम नहीं आता, भाई साहब ऐसा चौड़ देगा आपको कि आपको लगे अपनी कुर्सी इसको ऑफर कर दूं कि तू ही डिर्व करता है, बेटा। खासकर ये छोटे शहर के लोगों को बताया गया ना कि मेहनत ही जरिया होता है। हां तो वो उस चीज़ में मेहनत बहुत करते हैं, बट दिखावा नहीं करना होता है, तो वो उस चीज़ पे काम ही नहीं करते।
कथा मूवी देखी है आप लोगों ने? नसीरुद्दीन शाह और फारुख़ शेख की एक की मूवी, बहुत पुरानी है। वो एक्सैक्ट इसी चीज पे आप बात कर तो उसमें यही है कि सब कुछ उसका सेटअप होता है। मुंबई के चौल में रहता है, एक अच्छी नौकरी करता है। फारुख शेख उसका दोस्त आता है जो कि आठवीं के बाद स्कूल छोड़ के भाग चुका है, फेक आदमी है, बात करने आती है, खूबसूरत दिखता है, पर्सनैलिटी मेंटेन करने आता है लोगों को, तो वो आके उसका सब कुछ लेके चला जाता है। हम ये चीज, ये वो लोग होते हैं जो सेल्फ ब्रांडिंग बहुत जरूरी है। हम क्योंकि मेरा मानना है दुनिया में कोई आदमी आज की डेट में हम आपकी तारीफ नहीं करने वाला है, ये गांड बांध लीजिए, वो झूठी तारीफ है। क्या आसिफ, क्या कुलदीप, कोई आदमी आपको आगे बढ़ाने के लिए नहीं है, आपकी कोई तारीफ करने वाला नहीं है। आपको खुद से अपनी ब्रांडिंग करनी पड़ेगी। यह मान लेना चाहिए कि कोई आप अच्छा काम कर, शाबाश। शाबाश कोई नहीं करता। इनफैक्ट आजकल डर ये लगता है कि अगर आप अच्छा काम कर रहे हैं तो चांसेस हैं कि आपको बहुत जल्दी वहां से काट दिया जाएगा क्योंकि वहां पे जो चार फालतू बैठा है उसको लगेगा फटम बन रहा है इसकी लेते हैं।
तो जो कॉन्फिडेंस वाली बात आप कह रहे थे उसमें हम जब थोड़ी देर पहले सलमान खान का जिक्र कर रहे थे तो जैसे सलमान खान की इस समाज में उपयोगिता, यूटिलिटी क्या है? तो वो यूटिलिटी यही मुझे समझ में आती है कि सलमान खान एक बहुत बड़े तबके को, जो छोटे शहरों, कस्बों, गांवों में रहता है या बड़े शहरों में भी रहता है लेकिन उस तरह के काम करता है, उस तरह के पेशों में लगा हुआ है जिनके पास सम्रांत जगहों पर बैठने का कॉन्फिडेंस हासिल नहीं है, उनको कुछ समय के लिए कॉन्फिडेंस देता है। उनको उनको स्वयं के होने पर ही के साथ ओके होना, कंफर्टेबल होना सिखाता है कि हां यार तू ठीक है, तू बेचता होगा सब्जी, हम्। पर प्यार तो तूने भी किया ना। यह यह शाहरुख के किरदारों ने उतना नहीं सिखाया है जितना सलमान के किरदारों ने सिखाया है। शाहरुख क्लास है। हां, मतलब उन्होंने दूसरी फिल्में भी की हैं, अलग तरह की। स्वदेश और तमाम अन्य तरह की बहुत सारी फिल्में की हैं जिसमें ऐसी भी फिल्में कोयला ओयला बनियान पहन के नाच रहे हैं, उस है ना वो एक अलग है। लेकिन जैसी मूवी, हर हर एक्टर का एक इमेज होता है या एक एक परसोना है जिसको वो कैरी करता है। तो सलमान जिस परसोना को कैरी करते हैं वो एक बहुत बड़े तबके को कुछ समय के लिए कॉन्फिडेंस, स्पेशली रमजान से लेके ईद तक। चलिए, शाहरुख खान अर्बन करैक्टर्स पॉपुलर ज्यादा है उनके, सलमान खान के वो कैरेक्टर ज्यादा पॉपुलर है जिसमें वो राधे भैया बने, ये सब मतलब कसोम तो हम हीरो हैं, उसमें देख पा रहे हैं हम, उसमें नहीं देख पा रहे वो हेलीकॉप्टर से उतर के जो बैग ऐसे आ रहा है कि वही वही तो हम उस अपने को देख नहीं पा रहे। राधे भैया आपने देखा कि राधे भैया फंस गए, बाल बढ़ा लिए। था मतलब वो, अरे जो बजरंगी भाईजान में वो इतना धार्मिक व्यक्ति, एक पाकिस्तान से आई मुस्लिम बच्ची को है ना, तो और वो झूठ नहीं बोलना है, वो भोलापन ही तो है, वो यही तो है और क्या है, उसको भी नहीं जा रहा है।
हां, तो अब जैसे उनके मतलब वही चीज है बेसिकली, जब जिनको वो रिप्रेजेंट कर रहे हैं अपनी फिल्मों में, इसलिए लोग ज्यादा कनेक्ट करते हैं, इसलिए कनेक्ट करते हैं। एक चीज़ मैं पूछना चाह रहा था इस उसमें जो इसका लिंगो है और जब हम यहां आके सीखते हैं। मेरा एक बहुत काबिल दोस्त है, अभी तो बहुत अच्छे पोजीशन पे गैजेटेड ऑफिसर है वो। लेकिन अ वो अवध से हम आधी चौथी पांचवी छठी तक की पढ़ाई करके नोएडा आया। हां, एक स्कूल में उसका एडमिशन हुआ। अब वो चीजें सीख रहा है। उसने कंप्यूटर नहीं आता है उसको या बहुत चीजें। उसकी भाषा में बहुत अवधि है। तो वो हिंदी बोल रहा है बीच-बीच में, लेकिन शब्द एक अवधि का इंसल्ट हो जा रहा है ना। तो कितना अच्छा घाम निकला है देखो। ठीक है। आई वास सेइंग, आई वास सेइंग एथी इधर है। हां हां बहुत बढ़िया। तो वो है लेकिन मतलब धीरे-धीरे वो सीख रहा है यहां के शब्द और आता है। तो जब पहली बार आपने सीखा कि आप किसी से मिलकर के हाय कह के मिलते हैं, हाय या हेलो, हम है ना? यह जब आप स्कूल में पढ़ते थे, स्कूल में कहते थे किसी को हाय हेलो नहीं होता था ना, उसमें क्या ऐसा कुछ होता नहीं था कि हाय हेलो मतलब कुछ सीधे बोलेंगे, "राहुल हां," ग्रीटिंग नहीं, कुछ ग्रीटिंग्स नहीं होती थी या जो फ्रेंड्स के बीच में हाय बहुत ज्यादा, "क्या करूं? हां यार, हां वही इतना ही है।" तो जब पहली बार हाय कहना शुरू किया और हाय में यो की ध्वन्यात्मकता, फोनेटिक्स कहां खत्म होंगे, हाई होगा या है ना, हाय होगा, उसको सीखना और समझ वो उसके तजुर्ब बताओ। लड़की लड़की ने जब पहली बार आपको हाय बोला, बोले यार मुझे भी तो हाय बोलना है। हाय के जवाब में हाय कहूं या हेलो कहूं क्या ज्यादा ठीक लगेगा? अरे मैं तो इसी में बहुत ज्यादा अटका रहता था कि कोई अगर थैंक यू बोल रहा है तो यू आर वेलकम, प्लेजर इज माय क्या बोलते हैं सर, तो थैंक यू इवेंचुअली बोल गया, "थैंक यू, कोई बात नहीं," पूरा सोच के निकल ही रहा है। ठीक है, कोई बात नहीं, दिल बड़ा है हमारा। मैं वैसे कोई थैंक यू बोल, मैं उसको थैंक यू भी बोलता हूं। अरे सेम सेम सेम, "थैंक यू, थैंक यू।"
ऑकवर्डनेस की अगर बात करें ना, बोलना तो नहीं चाहिए, बट हमारे घर में जो बुजुर्ग भी हैं, हमसे मैं रिलेशन नहीं बोलना चाहता, ठीक कर रहे हैं आप, खुल क्यों बोल रहे हो यार, क्यों बोल नहीं नहीं यार आप बोलते हो सर, तो वो अगर उस लेवल का ऑकवर्डनेस है कि अगर लड़के बोल रहे हैं नमस्ते अंकल तो नमस्ते बेटा, हम लड़की बोल रही है नमस्ते अंकल, नमस्ते बेटा करके निकल जा रहे हैं। वो उस लेवल का ऑकवर्डनेस है कि एड्रेस भी नहीं कर पा रहे हैं सामने महिलाएं। हां हां, मतलब देखते भी नहीं है। हां, देखते बस में हुआ है लोग जिन लोगों को का या उसका मतलब कोई एक्सपोज़र नहीं है, आप फीमेल टच, हाथ भी नहीं मिलाया है ना, हाथ भी मिला ले अगर कोई लड़की तो बड़ी बात हो गई। साबुन से हाथ नहीं धोता। हां तो तो आप बस में खड़े हैं और मान लीजिए एक लड़की आ रही है और धक्का लग गया आपको, कंधा लग गया ऐसे, उसने आपको बोला, "सॉरी," अब आप सकपका गए हैं ना पूरा आपका सिस्टम, नर्वस सिस्टम मिला हुआ है, आप बोल दिए, "थैंक यू, थैंक यू," अरे मालूम नहीं कि क्या बोलना है, वो तो सॉरी पे सॉरी बोलेंगे कि "इट्स ओके," आया नहीं दिमाग में। तो यहां नहीं अटक गया, नहीं नहीं ऐसी चीज़ होती थी बहुत। अपन ना बुद्धि वगैरह में हाय होता तो था नहीं। पहली चीज बात ही करने को नहीं मिलता था। खत से ही बात हो जाती थी, तो उसमें भी कि सबसे पहला शब्द जो होता था, "प्रिय, कैसे हो तुम?" प्रिय होता, हां चिट्ठी में प्रिय। प्रिय से शुरू होता था, "कैसे हो तुम?" फिर आगे बात शुरू होती थी। शहर में आके फिर हाय हेलो, तो अभी भी मैं जैसे कुछ शब्दों का इस्तेमाल कर मैं हम बोलता हूं अभी भी कि हम जा रहे थे, हम आ रहे थे। हमारे घर में हम ही बोला जाता है। मैं दफ्तर बोलता हूं हमेशा, हम मुझे पसंद है दफ्तर में, मैं दफ्तर में हूं, दफ्तर हां दफ्तर में हूं। मैं कुछ-कुछ शब्दों को अभी बचा के रखना चाहता हूं, जैसे मेरी बेटी मुझे पिताजी बुलाती है और वो तय हुआ था कि मुझे पिताजी ही बुलाएंगे। अरे इस पे बताएं सर, हम लोग तो जो लड़के डैडी बोलते थे ना पापा को, हम लोग बहुत कूल, अमीर होते हैं, पैसा होगा, "डैडी बोलता है, डैडी बोल रहे हैं, डैडी आ गए बेटा देखो डैडी आए, डैडी आए हैं, डैडी हट," उनके डैडी से हम भी डर रहे हैं जबरदस्ती क्योंकि हमारे वाले पापा हैं, इनके डैडी।
अच्छा एक वो जो एक इनफीरियरिटी दूसरी तरह की ये भी होती थी कि इंटेलेक्चुअल डिस्कशन में कुछ बड़े-बड़े जार्ग्स आते थे, जार्गंस वाले शब्द। फिर एक आध शब्द सीख लिए Google करके, उसका मीनिंग, विनिंग भी जान लिया लौंडो ने बोला कि यार अब वेट कर रहे हैं कि यार कुछ मौका आए तो मैं हैजेनी बोल के एंटर करूंगा, फिल्म थ्रोफी वगैरह थोड़ा सा लगे जानता है। हां, थोड़ा ये वाला भी हुआ है, बहुत छोटे शहर वालों के ज्यादा क्योंकि देखिए अगर उनका है भी ना एक्सपोज़र तो उन्होंने अगर थोड़ा बहुत फिलॉसफीस को पढ़ा भी है दर्शन के रूप में हिंदी माध्यम में तो उसके टर्मिनोलॉजीस इतने डिफरेंट कि वो इन इन बहसों में स्टैंड नहीं करेंगे क्योंकि भाषा ही बहुत डिफरेंट है। हम तो उनको तो एक मतलब जैसे कहते हैं ना कि अ जीरो से शुरू करना है और किसी के पास पहले से अफरमेटिव एक्शन की रिक्वायरमेंट है। ये नहीं कह रहा हूं छोटे शहर वालों को आरक्षण मिलना चाहिए, बट वो इस इस बेसिस पर है ना कि अफरमेटिव एक्शन कि साहब ये अभी भी ज़ीरो से शुरू कर रहे हैं। आपके पास एक बड़ा पायदान था, उनके पास और ऊंचा पायदान था। और इसी बेसिस पे सब पूरी दुनिया में है, हमारे यहां भी है अफमेटिव एक्शन। पर छोटे शहर वालों के लिए वो है थोड़ी सी लड़ाई और नीचे से। ऐसा नहीं उनके पास क्वेश्चन नहीं है, उनको ना सिर्फ इंटेलेक्चुअल बनना है बल्कि प्रूव करना है। हां, वो सबसे बड़ी चीज है। जैसे दिल्ली आप देखें तो उनके जो बच्चे होते हैं, आदमी होते हैं वो हर चीज में कॉन्फिडेंट दिखता है कि वो दिल्ली में रह रहा है। आप बाहर से आए हैं हम तो आप उसके माहौल को पहले से किसी और का पार्ट बनना है जाके कि आप बहू हैं बेसिकली, आपको सीखना है सब कुछ जाके, उनके तौर तरीके वो तो बहुत दूर की चीज तुम करो, वो बहुत बड़ी चीज है। बेसिक चीज में उलझ के आदमी फंस जाता है पहले तो पर ये वाला जो कॉम्प्लेक्स है, हम शाहीन भावना ये अ मतलब ये बॉलीवुड के क्लास फिल्मों के क्लास से भी डिफाइन होती है बहुत ज्यादा जिसप आपका है कि Netflix के सजेशंस और ये अब हमने प्रेम का कहरा सीखा ही यहां से कि छाती तहार नाम लिख लिए और जरूर जरूरत पड़े छाती कटवाई दे, है ना? मतलब हमारे लिए मोहब्बत, लौंडों के लिए, छोटे शहर वालों के लिए अब वहां इश्क वाला लव और अलग तरह के उसके व्याख्याएं हैं जो भी है तो वो रिलेट नहीं होता है उस कंटेंट, बट थोड़ा टाइम लगता है उसको पिक करने में। उस दौर में लोग जब उस म्यूजिक की बात कर रहे हैं जो इस समय ट्रेंडी है, उस तरह की फिल्मों में तो वो थोड़ा फिल्मों के फिल्मों के जरिए आने वाला डिफरेंस जो है, दोनों क्लासेस में बहुत बड़ा गैप है।
हां, जैसे फलक मेरी बेटी है तो उसका जो कंटेंट है वो देखती है, मैं नहीं देखता, हम लेकिन मैं जो देखता हूं वो देख लेती है। हां, जरूरी नहीं कि सारी फिल्में, लेकिन वो जैसे एक क्या देखे थे लास्ट रात में आप लोग? जैसे अभी कल ही हमने वो मूवी देखी, पुरानी मूवी थी। मैं घर जाता हूं तो आधे घंटे उसके साथ बात करना, ये सब करना तो मैं करता हूं। कौन सी मूवी मैंने देखी कल रात में तो वो पुरानी मूवी देखती है, जैसे कभी खुशी कभी गम उसको बहुत पसंद है, दिल तो पागल है उसे बहुत पसंद है, स्पेशली शाहरुख खान उसको बहुत पसंद है। कल भी मैंने पुरानी मूवी लगाई, बोली, "हां, ये तो मैंने देखा है।" कौन सी मूवी थी यार? कोई बात नहीं। तो खैर तो वो ये जनरेशन दोनों चीज को ले पा रहा है, हम हम अटके हुए हैं, नहीं फलक ले पा रही है। सर, हर हर जजी नहीं रेडी है। वही मैं बता रहा हूं। नहीं नहीं, वही मैं यही जजी अलग तरीके हैं। जैसे कल मैं अच्छा दे आर वै ओपन टू टॉक, हम शर्मा जाते थे ना किसी चीज करने में, ये शर्माते नहीं है। जैसे कल मैंने बोला कि सो ब्रो, अच्छा ही वो मुझे ब्रो बुलाती है, और "ब्रो, क्या हाल है, ब्रो?" पिंच करना, सब कुछ करना उसको आता है, 17 साल की हो जाएंगी अगस्त में। तो कल मैंने कहा तो पढ़ाई लिखाई का अपना चल रहा है उसका, तो बोली, "इस साल मैं बर्थडे नहीं मनाऊंगी।" मैंने कहा, "क्यों?" "दोस्तों के साथ जाओ, पार्टी नहीं, इस साल नहीं, अगले साल।" मैंने कहा, "क्यों?" "तब मैं 18 की हो जाऊंगी ना।" मैंने कहा, "अच्छी बात है।" फिर 21 को 21 वाला जो होगा वो मैं अच्छे से बनाऊंगा। ओके, और फिर तो मैंने कहा, "एक काम कर तू जल्दी शादीवादी कर ले, मैं फ्री हो जाना चाहता हूं।" "यार अभी मैं कॉलेज जाऊंगी।" मैंने कहा, "ठीक है, तू शादी नहीं करेगी।" "हां, वहां कोई पसंद आएगा तो शादी कर लूंगी।" मैंने कहा, "कॉलेज वाला प्यार नहीं चलता है, समझ गए ना तुम?" बाप बाप बाप गया। जबकि मैं कॉलेज में ही प्यार करता था। मैंने कहा, "देखो बेटा, वहां बहुत फिलॉसफी होती है कि मैं आगे जाके ये कर दूंगा, कुछ नहीं करेगा वो, तो फिर क्या होगा? तो तुम्हें ये देखना है कि आदमी अच्छा हो, पैसावसा मत देखना, इंसान अच्छा हो इस पे फोकस करना।" तो बहुत क्लियर, हां, इकलौती लड़की हूं तो मुझे दिक्कत भी तो नहीं है, आपको जो है मेरा ही पसंद है। ओ भाई, तो बोलिए, ओके इन दैट केस अगर कॉलेज में कोई पसंद आया तो मैं बताऊंगी और नहीं तो कॉलेज खत्म करने के बाद दो-तीन साल के बाद फिर मैं बताऊंगी लेकिन मैं अफेयर कर सकती हूं। मैंने कहा, "यस, ओवर।" तो ये इस लेवल पे आके बात करते हैं हम और इनका कॉन्फिडेंस लेवल बहुत हाई है, हम ये हमारे और आपकी तरह, हमारे तुम्हारी तरह नहीं है। हम हम ये कहीं भी घुस के कुछ भी कर सकते हैं। हम जो अपने मां-बाप से इतना अगर वो हैं ओल्ड हैं तो फिर हम अपने मां-बाप से बहुत डरते हैं। हमारी जो वो हुई है परवरिश, हम वो शुरू से दबा के ही हुआ है घर में। हम बड़े भैया आ गए हैं, खड़े कैसे हो? हम चाचा हैं तो कुर्सी छोड़ के भाग जाइए, हम पानी लाओ। तो हर चीज में डराया जाता था, पिताजी आ गए, मतलब पापा आ गए हैं, अब्बू आ गए हैं, आपको डर आ गए, मतलब घर है उनका आएंगे ही। क्या थोड़े खत्म कर देंगे घर में, आप ही के बच्चे हैं, कोई भारी भी नहीं है वो जाके नलके चला रहा है कि पहले दो बाल्टी तो गरम आएगा, तीसरे से ठंडा आएगा तो ले जाऊं उनके लिए, किताब खोल के बैठे बचपन से हमें डराया गया है, इतना डरा दिया गया कि हम जब निकलते कि अच्छा डराया किसने, अपनों ने, अपने सगे मां ने, अपने सगे बाप ने आपको दबाया कि बाप आ गए तो अलर्ट हो जाओ।
भाई आज भी हमारे दुधी चले जाइए अगर हम लोग बैठे हैं और बड़े भाई साहब आ जाए, आदिल भाई आए तो सबको खड़ा होना पड़ता है, "आइए आइए भाई बैठिए, आप आज का जी लेटा हुआ है।" अब हम उसको घंटा भर बोले मैं जाके आवाज बेटे जैसे मैं यूजली कुत्ते, "तू आ जाओ," हां पिताजी कोने से आवाज आएगा। वो एक हिंदी में दो शब्द हैं जैसे दो ग्रुप अलग-अलग हैं, दोनों के लिए अलग-अलग शब्दों की नयत होती है ना। तो हमारा जो ग्रुप था अगर चार लड़के पांच लड़के हमारे मिलेनियल्स चले जा रहे हैं तो कहेंगे झुंड जा रहा है, झुंड क्या होता है उसका कोई मकसद नहीं होता, टहल रहा है, झुंड जा रहा है। वो लोग ना दस्ता हैं, दस्ता दस्ते दस्ते जैसे वह दस्ता क्या होता है? एग्जाम में जाता है या तो वह चेक करता है, पर उसको एक टारगेटेड मकसद क्लियर होता है कि यह दस्ता है, यह ग्रुप जा रहा है तो अभी या तो कहीं कॉफी पीने जा रहा है, चिल करने के मकसद से जा रहा है। हम तो पहले चलने लगते थे झुंड बना के तब सोचते थे अब क्या करना है? तो बहुत फर्क, क्या चाहिए उन्हें, उसको लेकर के बहुत क्लेरिटी है, उसमें उनको क्लेरिटी है। और अभी जैसे आपके चार साल के साहबजादे हैं या अभी टुकुर साहब तो ये तो अल्फा निकलेंगे। हां, तो ये कमाल के लोग हैं जो बच्चे हैं। मुझे अच्छा लगता है कि हमारी तरह नहीं होंगे। थोड़ा सा इंटरनेट का भी रीज़न है क्योंकि इंटरनेट से एक नुकसान तो है ही कि ज्यादा एस्पिरेशनल हो गए हैं गलत चीजों को लेके। बड़ी एक फायदा भी है कि चीजें अप्रोचेबल लगती है, हां कि नहीं यार ये हो जाता है। तो वो जो हम म्यूजिक या फिल्मों की बात कर रहे थे, हम तो उसमें रिलेटिबिलिटी और उसकी बात थी। तो हमें तो अभी भी आपका आना दिल धड़काना, अरे मेरा पता नहीं क्या है, उदित नारायण है, उदित नारायण जी की आवाज सुन के ना लोग को ब्लैक कॉफी पी के होता है ना सुबह से फ्रेश। मेरा भी उदित नारायण जब ऊपर ले लेते हैं वो है ना, आवाज उनकी, आवाज का टेक्सचर, नहीं जुदाई करे, लेट जा चांद छुपा, बढ़िया गाना, बहुत बड़ा आता है उदित नारायण की आवाज सुनने में। कुमार स्वामी जी फेवरेट उदित थे, ये दो मतलब बहुत सारे, वैसे मैं पिन पॉइंट में कुमार उदित, पूरा जॉनरा ही फेवरेट है। इनफैक्ट रूप कुमार राठौड़ जी के, अरे भाई साहब क्या गाना है, करिश्मा कपूर की साड़ी हल्की सी ऐसी उड़ रही है और संजय कपूर पीछे खड़े हैं, संजय कपूर को देख के लगता है कि आदमी वो नहीं है जिसने इश्क किया है, इसको लगता है कि मतलब इश्क को हिला डाला है इसने, इश्क के कांसेप्ट खुद खुद ही दिखता है वहां जबकि तो आपके लिए वहां से मतलब...
वो डराइव चीजें वहीं से होती हैं तो वो कौन सा गाना है? उसमें बॉर्डर में ही एक गाना है। जो थोड़ा कम पॉपुलर है, जो शेट्टी जा रहे होते हैं, कितना प्यारा गाना है यार। उतना पॉपुलर नहीं हुआ उस सालों में, और क्या प्यारा गाना है। तो चलूं तो चलूं तो चलूं। कहते हैं ना कि इस देश के बाजार ने मेरा साथ नहीं दिया, पर अनु मलिक ने दिया। अनु मलिक ने दिया। पर उदित नारायण। लव 20-50 गाने कितने अच्छे हैं। पॉपुलर नहीं हुए, बट अनु मलिक मतलब मेरे सरप्राइज़ था। इतना प्यारा गाना है यार, पूरा एल्बम ही अच्छा है। हम लोग यार अभी तक ईमानदारी की बात है, हम लोग अभी तक शरारा शरारा के स्टेप से नहीं उभर पाए हैं यार। अभी तक हमारे लिए बहुत रेवोल्यूशनरी स्टेप थे, शरारा शरारा। मैं उस दिन कह रहा था कि हम, मैं स्पेशली और कुछ और ऐसे मैंने देखे हैं कि हमने सिनेमा को देखा नहीं है, उस उसको जिया है। अरे वो एक्सपीरियंस घुस के जिया है, उसमें घुस करके, नहीं अरे मैम बताएं पहली बार जब अमिताभ बच्चन जी वाले डॉन देखे थे ना, मैं पांच या छह साल का होगा, टीवी पे देखे थे। निकल के मैं थोड़ी देर ऐसे चला होगा। हां हां, मैं हमेशा आज भी ऐसे ही बैठता हूं। जब भी चेयर में देखो, मैं ऐसे। बचपन से ही वो तो पूर्वांचल का हर आदमी थोड़ा सा टेढ़ा बैठता है। वो मेरा है ही ऐसे बैठने का।
तो वो एक दौर था, लेकिन अच्छी बात सिनेमा की ये रहती थी कि तब हमारे पास मोबाइल नहीं होता था। तो कुलदीप और मेरा हमेशा एक हमारे बीच में कि पहले पैदा होना इनका कहना है कि उपलब्धि नहीं है। मैं मानता हूं उपलब्धि है। तो हमारे पास कुछ साधन नहीं होता था एंटरटेनमेंट का। तो कोई मूवी कोई गाना आ गया, आप तो रेणुकूट में थे, पान दुकान पे ही गाने बजते थे। गानों का पता हमें पान दुकान से चलता था कि नया गाना आया है मार्केट में। मनसा चित्र मंदिर में लगती थी पिक्चर, वो एसी वाला नहीं, पंखे वाला मंदिर। मनसा चित्र मंदिर, नीचे और ऊपर क्या बोलते हैं, बालकनी और बोलते हैं ना स्टेज और बालकनी, उसमें लगती थी। पहली बार हम देखे राजा हिंदुस्तानी, आय हाय। उसमें वो वाला देसी, मैं तब मैं दिल्ली आ गया था। अच्छा, तो आप दिल्ली आ गए? राजस्थान में देखे थे सिक्स्थ में बहुत। उसके बाद हम देखे थे कौन प्यारे? जब हम सिक्स्थ में थे भाई, क्या एक्सपीरियंस होता है क्योंकि उनके पर्दे बड़े होते थे। हां, शायद शायद बड़े होते थे। वो एनपी का चुइंगम और क्रीम रोल, क्रीम रोल था, आय हाय, मजा आ जाता था।
पर अब जब हम वैसे उन बहसों में या ऐसे माहौल में, जहां थोड़ा चुप रह जाते थे कि ये अपनी बात कैसे रखें। जब जस्ट फूड की बात हो रही है तो हम दाल भात कैसे लाएं? लेकिन वही वैसे खाते हैं, तो लेकिन लेकिन अब जब कर पाते हैं, जब हम उस विमर्श में अनु मलिक को ले आते हैं। जब हम कहते हैं कि लिंक इन पार्क सुना है हमने, ठीक लगता है। लेकिन अभी भी निगाहें मिलाने को जी जान चाह रहा है, तो उस दिन फिर थोड़ा सा जो लावा ना, उस दिन भी लावा फील होता है। मोहब्बत, ये हमारी परवरिश की पुष्टि है, ये तुम्हारे सामने रख दूं। मेरी नींद गई, मेरे चैन गया, क्या बात है यार। और मोहब्बत था ही नहीं किसी से, तब भी ये गाना सुन के आप मोहब्बत हो गई। फ्रेश फ्रेश फ्रेश सा फील होता है। अभिजीत जी की आवाज कितनी कितनी कैची लगती है। जब आप बहुत, मैं कोई ऐसा गीत गाऊं, पता है छोटे शहर वाले क्यों? उनके पास मतलब मतलब अगर आप बात करने लगे, हमेशा जैसे हम ये बात करने और दो घंटे भी करें तो हो सकती है। क्योंकि इतने एक रिच, वो उसने बहुत कुछ अर्जित किया है क्योंकि वो पहले सीखा, फिर कुछ अनलर्न किया, फिर लर्न किया। उसके लिए इवोल्यूशन एक पूरी प्रक्रिया है। वो नॉम चॉम्स्की पढ़ा है इधर आ के, पर राजा बाबू भूला नहीं है। बगल वेद प्रकाश शर्मा का नॉवेल भी उसके ठीक नीचे रखा हुआ है। ठीक है, तो वो बहुत रिच एक्सपीरियंस है। अपनी-अपनी विमर्श की धुनें हैं उसकी, तो वो बहुत कुछ नहीं समझ आता। मैं शो शो लेगा थीम म्यूजिक चला देता हूं घर में। क्या म्यूजिक, दो डायमेंशन। अभी वो फलाना अख्तर ने डाला भी था। वो गिटार बजाते हुए, क्या बहुत वाइब है उसकी। बहुत ही प्यारा वो थीम है यार, करीब 3 मिनट का है वो, आई थिंक। बहुत बहुत अलग फील आता है। बाला सुब्रमण्यम जी की जो सलमान खान पे बैठी थी। हां हां, वो तो खैर। फेवरेट मूवी कौन सी है वैसे, 90s वाली? बहुत सारी फेवरेट सर। मैं ऐसे एक्चुअली वैसा भी बोलना, मतलब बहुत सारी फेवरेट। जब कोई पूछता है, मैं मेरा भी सेम जवाब नहीं बता सकता। मैं बहुत, मैं कुछ भी देख लेता हूं दोबारा, उस मतलब मैं 2010 तक का दोबारा मैं कुछ भी देख सकता हूं। मैं तेरे नाम हालांकि मेरे घर में नहीं चलने से, बस लोगों को लगता है ये सैड। तेरे नाम अच्छा थोड़ा स्टेशन पे रोक रहा है कि नाम क्या है तुम्हारा? इसका नाम पता करके उसका मतलब पता करके। सर क्या पूरी भाजी खा रहा है? फिर वो, अरे इतना मतलब वो पता नहीं क्यों सही गलत हमको नहीं बड़ा रिलेटेबल सा लगता है। साला ये तो भैया है, इनको जानते हैं यार। ये क्रिकेट खेलते थे ₹10 का मैच, फिर मार खाते थे आंटी से। तुम्हें पता है विवेक मुशान भी रेणुकूट का है? हम जानते हैं उनकी मम्मी हमारे जूनियर स्कूल में प्रिंसिपल थी। देखिए, मतलब तब तो हम नहीं पहुंचे, तब तक वो रिटायर हो गई थी। तो विवेक मुशान जब फिल्म आई सौदागर, हां इलू इलू जिसका गाना था, तो भाई साहब रेणुकूट में उसके घर के आगे भीड़ लगना शुरू हो गया।
हां, अरे अगर आप कंप्लीट कर दें, हम कह रहे हैं इमरान हाशमी का जो वाइब है ना, सॉरी इमरान हाशमी का जो वाइब है ना, वही बड़ा स्मॉल टाउन वाइब है। पता है वो जो स्मॉल टाउन के छोरों वाला वाइब ज्यादा था, इसलिए सक्सेस, सक्सेस भी इसीलिए उनके गाने भी धड़कन धड़कन स्मॉल टाउन वाइब थी। उनकी भी स्मॉल टाउन के एक पर्टिकुलर तबके को बड़ा वो रिप्रेजेंट करते थे। लेकिन वो जो एक जो हिचक है ना, वरिंदर जैसे, एक आपने देखा है कि जैसे आप ड्राइव करते हो है ना, जैसे ड्राइव कर रहे हो आप, तो आपको ना किसी लड़की ने और मार दिया पीछे, आपने ऐसे देख लिया। अरे लड़की चला रही है, अब आपको उसको साइड देनी है, आप अपनी गाड़ी अपने को बचाने के लिए। हां, नहीं, उसलिए नहीं, आप आप एक जैसे आप फॉर फर्ज करें कि आप एटीएम की लाइन में खड़े हैं। एटीएम में आपका नंबर आ गया, आप अब कार्ड डाल रहे हैं अपना, आपने पीछे देखा कि आपके ठीक पीछे एक लड़की वेट कर रही है लाइन में, अगला नंबर उसका है। तो आप जल्दी करो, और वो मतलब बिल्कुल शहर संभालो। अरे आप कैसे निकालूं मैं जल्दी से? आई एम सॉरी, एक बार में अगर वो गलत हो गया तो कार्ड लेके चले जाएंगे, बाद में निकालूंगा। मेरा तो कैश निकल जाएगा। वो ये भी है, तो वो जो है ना हिचक, कि मतलब इसमें क्या है, प्यास लग रही है। बट बगल में ना जो एक वाटर कूलर लगा हुआ दिख तो रहा है, पर वो किसी के ऑफिस का वाटर कूलर है। तो पानी नहीं पी रहे हैं, प्यास प्यासे ही प्यासे ही खड़े हुए हैं। तो जो छोटे शहरों का संकोच है ना, अगर वो एक मेट्रो स्टेशन हो तो उसका आखिरी स्टेशन होगा। नहीं, हमें कुछ नहीं हुआ है, हम ठीक ऐसे ऐसे ही ठीक हैं हम। जैसे कहते हैं आई एम गुड वाली जो बात है, मैं ठीक हूं। वो जो झूठ है, वो संकोच का पहला लक्षण है। बिल्कुल बहुत छोटा था ना, तो एक अंकल थे, वही जो बड़े उस वाले अंकल नहीं बताया मैंने कि आए थे, जिनके गोरे-गोरे बच्चे और सब अमीर लगते थे। तो वो मुझे कहीं ड्रॉप कर रहे थे। मुझे याद नहीं। तो आगे स्कूटर में बिठा लिए वो और वो टमाटर खरीदे थे। तो मैंने पॉलिथीन में टमाटर पकड़ा हुआ था और मैं कंफर्टेबल नहीं हूं। मेरा पैर नीचे जा रहा है। वो तो करते-करते एक-एक करके टमाटर गिर रहे हैं। बट मैं उनको बोल नहीं पा रहा हूं कि मैं कंफर्टेबल नहीं हूं। क्या पता मुझे बैठने नहीं आता है स्कूटर पे आके। तो उन्होंने बोला नहीं भले गिर। जब वो पहुंचे हैं तो दो टमाटर बचे। कहने बेटा टमाटर लिए थे। क्या हो गया? अंकल, गिर गया वो तो, हम पैर टेढ़ा हो गया था। हम बोल नहीं पाए। मतलब मैं बहुत छोटा हूं। तो तो ये ऐसा भी नहीं है कि ये सुसाइड मतलब कहां से आया, भगवान जाने। चार साल की उम्र में कहां से आया। हां मतलब बोलना या जैसे आप ये जो पब्लिक ट्रांसपोर्ट होता है, हम तो उसमें जो छोटे वाले ऑटो चल रहे हैं, टेंपो चल रहे हैं, उसमें आप अरे आदमी को एक नितंब तो रखने की जगह चाहिए ना, आप छोटे हो, आपको वो भी नहीं मिली है, पर आप बैठे ही हुए हो। जैसे जैसे भी टिकाए के, फिर आपको लग रहा है नहीं, ये बैठने नहीं देगा बगल वाला, टांग फैले जा रहा है। तो आप उसी में ऐसे करके खड़े हो गए हो, निहुर करके उसमें अंदर बैठ गए हो। खड़े भी नहीं हो, बैठे भी नहीं, पर चल रहे हो आप। उसको ये नहीं कह पा रहे हो कि तू रोक दे, मैं उतर जाऊं, मैं अगला ले लूंगा। हिचक में सिर्फ हिचक बहुत रोक दिया था। अरे जब दिल्ली आए थे तो ब्लू लाइन वाले जो होते थे बहुत बदमाश होते थे, जो कंडक्टर होते थे। हम तो ज्यादातर स्टॉप पे तो बस रुकती नहीं थी, चलते-चलते कूदना पड़ता था। तो उतरना यहां था, उतरना वहां था, क्योंकि इतनी बदतमीजी से लोगों से वो बात कर रहा है। आप देख रहे हैं कि आपको डर लग रहा है, ये कह रहे हैं भैया आगे रोक दीजिए, हमें उतरना है। हां, तो उस चक्कर में उनका तो खैर आतंक था, आतंक मचा रहता था। तो आदमी कई बार कहीं-कहीं रोकते थे तो खड़े ही रहते थे। आप कुछ भी कर लो, जब तक सवारी थे हम तो आपको धक्का भी मार रहे हैं, गिर सकते हैं आप। तो सरिया रखते थे ब्लू लाइन वाले, आपको पता है बहुत बहुत बदमाश होते थे। फिर एक एक झिझक और होती थी जब आप गाड़ी चलाना सीखते हैं। तो मैंने जब गाड़ी ली पहली बार तो मैंने कहा भाई दो पैर और तीन पैडल कैसे करेंगे? सबसे बड़ा टेंशन कैसे करेंगे? तो हुआ कि जबकि घर में सब गाड़ी चलाते थे, लेकिन अपने पे जब आई तो मेरा अपने आप से सवाल था कि दो पैर और तीन पैडल कैसे करेंगे? तो ये क्लच है, ये ब्रेक है, ये एक्सीलेटर है, ये कैसे करेंगे? फिर धीरे-धीरे हो गया। अभी मैंने नई गाड़ी ली है, तुम्हें पता ही है, मैंने तुमसे भी कई टिप लिया कि कैसे चलाऊं। अभी मंडे की बात है शायद, तो मैं मार्केट में सब्जी लेने गया था। आगे जाने का लगा दिया, पीछे का तो बच गया एक आदमी, वरना चप गया होता। मेरा एक बड़ा अजीब फीलिंग है ड्राइविंग को लेके ना, जैसे मेरे को ना एक डर रहता है हल्का सा। ड्राइव मैं ओवर केयरफुल हो के चलाता हूं क्योंकि मुझे पता नहीं क्या क्यों ये फीलिंग है कि मैं हूं यहां माइग्रेंट। हम, मेरे को 15 साल हो गए हैं, बट सम हाउ आई एम अ माइग्रेंट हियर। तो अगर मेरे से गलती से भी कुछ हो गया ना, हम कोई मदद नहीं करेगा। हम शायद रेणुकूट में मेरे से गलती होगी तो मेरे को बहुत लोग बचा लेंगे, इंक्लूडिंग एडमिनिस्ट्रेशन, प्रशासन, जो लोग पावर में हैं। यहां मैं माइग्रेंट हूं, यहां कोई भी कुछ अजीब सी फीलिंग है, पता नहीं। हालांकि होता नहीं है, ये सच नहीं होगा, बट ये है अंदर कि नहीं, मैं तो यहां वो हूं ना, मैं मेरा जगह थोड़ी है ये। बिल्कुल भी 15 साल हो गए मेरे को शहर में, मैं बिलोंग नहीं करता हूं। नहीं, अब ये डर मेरे अंदर नहीं है। मैं शुरू में लगता था कि यहां पे कोई मेरे साथ नहीं खड़ा होगा। आपको 15 से ज्यादा हो गए ना, 15 इज द बेंचमार्क। 28, 30 सालों में तैयार रहें हैं तो अब लगता है कंफर्टेबल है। आप अपने शहर को जानते हैं, सारे लोग अपने हैं, कुलदीप फोन करेंगे, आ ही जाएंगे। मुझे वो समय, वो फीलिंग अभी तक आई नहीं। ऐसा लगता है कि मैं तो नहीं गुड़गांव में रह रहे हो तो फीलिंग कभी नहीं आएगी। गुड़गांव में अगर है भी तो कोई बचाने वाला। विजेंद्र सिंह परवाज नाम के एक शायर हुए हैं, उनका शेर है कि जब कभी अमीरी में मुझे मुफलिसी के दिन याद आए, हम कार में बैठा-बैठा पैदल सफर करता रहा। क्या बात, क्या बात है, है ना? तो हम सब जब शहर आए हैं तो कितना पैदल चले हैं। मतलब किराया बचाने के लिए, ही यस यस, है ना? तो ये नहीं चले होंगे, इनका प्लेसमेंट हो गया होगा ठीक, बट स्टिल जैसा मेरे को ना रोड, रेणुकूट सर आपने देखा ना कितना सेफ, सिक्यर्ड वैसा तो रोड क्रॉस करना ना मेरे को इतना वो लगा था पहले। मुझे आज भी रोड क्रॉस नहीं कर सकता था। मुझे अब तो मैं कर लेता हूं रोड क्रॉस, तो बड़े अब मैं बेसिकली गरीबों के साथ कंफर्टेबल हो गया हूं। अमीरों के साथ रेणुकूट में सड़कें देख के हो रहा है। रेणुकूट ऐसे साइकिल चलाओगे तो मुंह से खून फेंकोगे। ऐसे पहाड़ी ऊंचा नीचा चढ़ाई बहुत अच्छा है। वो एक हिचक छोटे शहर की लड़कियों की भी है। हम जो बात कर रहे हैं हमारे अनुभव तो लड़कों वाले हैं और हम टच ही कर सकते हैं। उसको हम पूरी तरह से उनके पोल में घुसकर सोच नहीं सकते। उनके लिए और बड़ा है यार। बहुत वो तो ऐसा है कि उनसे आप माँ साहब पूछ रहे हैं कि इसका जवाब बताओ। उनकी समस्या ये नहीं कि उनको आता नहीं। उनकी समस्या आता है पर कहें कैसे? वो एक्सप्रेशन का इतना बड़ा प्रॉब्लम है ना, सिर झुका कर के नीचे खड़े हो जाने का। और ऐसा नहीं कि मतलब वो शहरी लड़कियों से डरती थीं गांव की लड़कियां। जब वो उनसे मिलेंगी तो वो कम बोल रही हैं। दीदी ऑटोमेटिक दीदी बोल रही है। गांव में एकदम है ना खुल के रहती है। उम्र कम है या बराबर है तब भी दीदी कह रहे हैं उसको क्योंकि उसको एक आपने पहली श्रेष्ठता के पायदान पे बैठा दिया है। उनके पास सामान कम, गांव की लड़कियों के पास कॉन्फिडेंस तो कम होता ही था, पर सामान जब मैं इसको रिसोर्सेज के भी कह सकता हूं। बट सरल सरलीकरण करके कह रहा हूं। सामान बहुत कम होता था ना। ये अगर किसी के पास बहुत सारी चीजें हैं ना, वो अपने आप ही इंटिमीडेटिंग हो जाता है। आप यहां पे दो iPhone रख दो, एक अपना iPad निकाल दो, ऐसे अपनी अंगूठी पहने रहो, चैन को एक बार ऐसे कर दो, है ना? Google ऐसे निकाल करके इधर रख दो। तो मैं अगर अभी-अभी गांव से आया हूं तो मैं पहले आतंकित हो जाऊंगा कि आपके पास चीजें बहुत सारी हैं। मेरा एक दोस्त है, 30 से मार्केटिंग में है, अपनी कंपनी अच्छी खासी रन करता है। तो उसकी यही आदत, जब वो बैठे थे अपने दो फोन महंगे वाले सामने रख के और वॉलेट रख के। यस सर, तो मैंने ये क्या है बोला। भाई ये बहुत अच्छी ट्रिक है, हम अगले वाले को बिल्कुल बैकवर्ड पे डालेंगे। यस, जो प्रॉपर्टी डीलिंग में लोग हैं वो उसका बड़ा इस्तेमाल करते हैं। आप जाएंगे वो जो कहते हैं ना कि कोई मोटी चैन पहन लेते हैं, कहते हैं प्रॉपर्टी डीलर हो क्या? उसका लोग मजाक उड़ाते हैं। वो पहनते हैं मोटी चैन, वो दो फोन आपके सामने रखेंगे। इनफैक्ट जो फोल्ड होने वाला अगर आ गया तो वो भी उसी में रखा होगा, है ना? वो अभी चाहे EMI पे उठाया है, अभी मैंने ठीक ठीक उसको मिल नहीं रहा है कमीशन, लेकिन ये उस ये डिस्प्ले प्रोफेशन का हिस्सा है ना कि मैं बहुत तगड़ा हूं, मैं तो रोज बेचता हूं 30-30 लाख के प्लॉट। और फिर मुझे कोई भले अपना घर गिरवी रखा हो, भी नकली ही हो, पानी छुड़ाओ। उसी इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स एक किस्म का ना साइड इफेक्ट पैदा करता है जो यह है कि आदमी कई बार उस जैसे हम तो हंस रहे हैं उस उन चीजों पर लेकिन उसकी कुंठा पाल लेता है, सच मान लेता हूं, है ना? और फिर वो खतरनाक होता है। नहीं, फिर उससे उबरने के लिए बहुत तेजी से हाथ-पांव चलाता है हम और उसमें फिर वो एक किस्म का फेक सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स को डिस्प्ले करने की कोशिश करता है। नहीं, कुंठित लोग जो होते हैं ना जब आगे बढ़ते हैं तो वो बहुत खतरनाक होते हैं। वो अपने से नीचे वालों को वैसे ही ट्रीट करते हैं। फिर क्योंकि डर है अंदर, डर भी है और गुस्सा भरा हुआ है कि मैंने ये, मैं अपना गुस्सा निकालते हो। बहुत सारे लोगों को तुमने देखा होगा, मुझे मिले हैं एक दो लोग जो अपना गुस्सा दिख रहा है कि ये जबरदस्ती मुझे गुस्सा दिखा रहा है या मुझे परेशान कर रहा है। जस्ट कि इसने ये चीज नहीं की है, हम वो दिखने लगता है उसके चेहरे पे। ऐसे लोग देखो जो हम बात कर रहे हैं सिर्फ इतनी सी बातें दी ऑल दिमागी प्रॉब्लम। हम आपको कोई नहीं रोक सकता अगर आपके अंदर यकीन है। मैं सिंपल सी चीज लेता हूं यार कि किसी आदमी ने मोबाइल इजाद कर दिया। कितना दिमाग लगाया, थोड़ा बहुत अपन भी कर लेंगे। बस इतनी सी बात है। कोई भगवान उतर के हवाई जहाज नहीं बनाया, इंसान ही बनाया। हम भी इंसान हैं, मैं भी कर लूंगा यार। इतना गैप इतना नहीं हूं मैं। कुछ ना कुछ अच्छा कर ही लूंगा टाइप से। करके ये सोच के बड़ा लेना चाहिए। पर सबसे अ क्या कहेंगे? फैंसी जगह पे कहां गए हो? याद है यार, यहां तो इस तरह का फैंसी जगह है। तो प्रोफेशन की वजह से हो गया है बहुत कुछ। हम्म। लेकिन अपने पैसे पे तो मैं नहीं जाना। फिर मेरे को कहीं जहां गए हो, मतलब वो क्या था? मतलब मुझे ब्रांड और होटल का नाम नहीं चाहिए, बट माहौल, मंजर, कैसी करो थोड़ा सा? क्या था मतलब वो, मतलब फाइव स्टार होटल में जो रेस्टोरेंट होते हैं ना, ऊपर रूफटॉप वगैरह, वहां सब कोई नॉर्मल दिख ही नहीं रहा है कि यहां तो छुप ही रहना वाली चीज है तो। लेकिन मैं ऑनेस्टली अब मे बी शायद उम्र की वजह से अब वो नहीं इंस्पायर करती हैं, उतनी मजा भी नहीं आता। नहीं मजा आता वहां जा के, बोर ही हो रहे हैं कि क्या ये ना मेरे को ये खाना पसंद है ना ये म्यूजिक पसंद है, ना ये जो दिख रहे हैं मुझे लोग पसंद है। तो कुछ अनरियल है। हां मतलब मैं नहीं, नहीं हो सकता है उनके लिए खान रियल है वो, पर मुझे नहीं चाहिए। हम लोग रिलेट नहीं करते ना, हम लोग कनेक्ट नहीं करते। मेरे पेट में दाल चावल के एंजाइम्स बन चुके हैं, मुझे वही चाहिए। अब मुझे हो सकता है पिज्जा सही हो, मेरे पेट में उसके एंजाइम्स नहीं बने तो मुझे नहीं मजा आएगा। मेरी जो चॉइस है वो दाल चावल ही है, मैं वही खाना पसंद करता हूं। नहीं पर मैं तो ये कहता हूं कि आप पिज्जा खाना पसंद भी कर सकते हैं और फिर भी ये चॉइस रख सकते हैं कि यार ये जगह, मतलब मैं फूड के मामले में तो मैं एक्सप्लोर करने को सब कुछ तैयार हूं। हां मतलब ऐसा कोई मेरा खाना और तेरा खाना की बात नहीं है। लेकिन मैं कहां कनेक्ट करता हूं ये तो मेरा मन ही तय करेगा। मैं भी खाना हर तरीके के खाने की कोशिश करता हूं। स्पेशली आई एम अ फूडी और मैं हर तरीके का खाना खाता हूं। लेकिन आज भी मैं अगर पूछो कि आप ताज में खाना खाओगे, मैं बोलूंगा नहीं यार, मैं नेशनल जो है या काके दा ढाबा, आई विल प्रेफर दैट। स्वाद भी है जो जो मेरे डेवलप हो रखे हैं। फाइव स्टार में जाओ तो अजीब सा होता है। वो आधा कच्चा आधा पक्का। हां हां, उनके चाय कितनी हड्डियां होती हैं? चाय तो किसी होटल की मैंने आज तक अच्छी नहीं पी सर। पास्ता लगता है उबाल के दे दी इसे, चबाना पड़ता है। चाय को तो मेरे को बहुत गुस्सा आता है। बाहर जाऊं मिलती ही नहीं है। हम एक आध बार मजबूरी में करनी पड़ी है। ₹300, ₹400, ₹500 वाली चाय ऑर्डर, बहुत निराशा हुई है। बहुत उससे अच्छा, उससे बेहतर मुझे वो पड़ा रहता है ना होटल के रूम में वो डिप स्टिल बेटर देन हां जो वो बना के लाते हैं। वो अदरक-वदरक का कांसेप्ट ही नहीं है। कुछ नहीं कुछ नहीं। वो बस और या तो इतना खौला देंगे कि एसिड पी रहे हैं सीधे, वो एकदम वो काली हो जाती है कि मृत्यु है इसके पास, मृत्यु। नहीं तो इस बातचीत को तो बहुत लंबा खींचा जा सकता है, पर समय की अपनी सीमाएं हैं। अ प्रत्युष आए हमारे लिए, बताओ गुड़गांव से चले आए? हां हां, नोएडा से गुड़गांव, रेणुकूट से। अरे वो तो, तो आनंद आया और हमने अपने हिचक को बहुत ट्रांसपेरेंसी से शेयर किया है यहां पे। ये मतलब ऐसे बहुत हमारा वनरेबल साइड भी है। हम बट हमने कह दिया है क्योंकि तीन ताल में हम कह देते हैं। तो आप लोग कहिएगा इसमें, जब आप चिट्ठियां लिखेंगे अगले एपिसोड के बाद कि कौन से किस्से से कौन सा किस्सा याद आया, वो आप अपनी चिट्ठियों में बताइएगा। थैंक यू। थैंक यू। थैंक यू सो मच। थैंक यू सो मच। थैंक यू। थैंक यू। अभी हग हग देंगे। अरे बिल्कुल हग वाला वो वाला हग और इस वादे के साथ कि इतना दूर नहीं गुड़गांव, कुछ समय का ब्रेक लेकर के फिर एक बार। मुझे लगा पहले मुझे लगा था कि बहुत इंटेलेक्चुअल बातें होंगी। मेरे पास कुछ नहीं है। मुझे अखबार पढ़े जमाना हो जाता है, तो बट मजा आया, ये कहना चाहता हूं कि यार सब गधे बन नहीं, मतलब मैं कह रहा हूं डायवर्सिटी है। वो वाली भी कर लेते हैं, तारीफ नहीं कर पा रहा आदमी से, एक्सप्रेशन का प्रॉब्लम है ना। वो मेरा एक दोस्त है, तारीफ करना चाह रहे थे। आज मेरा एक दोस्त है वो बताता है वो कि गांव में एक्सप्रेशन इतना बड़ा प्रॉब्लम है, जैसे चाचा हैं शादी हो गई है चाची के। अब वो जो है समोसा लाए हैं और लाए चाची के लिए ही थोड़ा एक्स्ट्रा लाए ताकि सभी को, बच्चे को बुलाते हैं, बच्चे को कि घर में दे देना। ठीक है, तो अब उनमें क्या है कि चाची से लड़ाई हो रही है तो भी और बहुत प्रेम आ गया तो भी ऐसे घुमाया पीठ और एक कोहनी मार दी। प्रेम आया? अरे तुम मानती हो? क्योंकि एक बोल क्या ये नहीं मालूम है ना, डोमेस्टिक वायलेंस एपिसोड बंद करना, थोड़ा स्नेह से ये बातों-बातातों में एक केस दे गए। इसमें भी कमेंट करें कि तो इसके बाद अब आएंगे ताऊ, ताऊ के साथ बिजार खबर हो गई और चिट्ठियां होंगी। देखते रहिए भाई साहब तीन ताल में आपका स्वागत और पुरानी तगड़ी आ गई वापस प्रत्युष भाई के साथ। हमने ताऊ बड़ा आनंद लिया और लेकिन ये मोह हम छोड़ नहीं पा रहे कि आपसे भी थोड़ी सी बात इस पे करें। हमने बहुत है, है ना? एक एक फिलॉसॉफिकल संदर्भ मिलता है उसका कि जैसे इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स का से जूझ रहा व्यक्ति, उसमें बहुत सारा ह्यूमर है। हमने उसकी बात की, लेकिन बहुत सारा आत्मचिंतन भी है। आदमी सोचता रहता है कि यार मुझ में क्या है ऐसा? कई बार वो सेल्फ ब्लेमिंग तक चला जाता है। अपने पेरेंट्स को ब्लेम करने तक चला जाता है कि इन्होंने मुझे अच्छे स्कूल में क्यों नहीं डाला? मैं किसी बड़े, ये लोग बड़े शहर में समय से क्यों नहीं शिफ्ट हुए? उस समय जमीन ही ले लेनी चाहिए थी। कितनी सस्ती थी? वो बहुत सारी चीजें हैं जो आपकी क्लास, आपकी परवरिश, आपका स्ट्राटा को उस समय तय कर सकती थी, पर हुआ नहीं और आप बहुत सब केसेस में नहीं, कुछ केसेस में लोग खुद को क्वेश्चन करने लगते हैं। अपनी अपने अपने पृष्ठभूमि, अपनी परवरिश को क्वेश्चन करने लगते हैं। दूसरा एक चीज और होती है कि उस उससे बाहर निकलने की जल्दबाजी में, अम् अह जो बाहर निकलने की उसकी तैयारी है वो किए बिना बाहर निकलना चाहते हैं, डिस्प्ले करके या शोकेस करके। तो एक छद्म सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स बनाने की, जिसको लोग कहते हैं वार्निंग भी है यार ये वो दिखने लगता है, वो फिर बहुत खराब या बहुत अश्लील और भी दिखता है। सो उन छोटे शहर के लड़कों के लिए जो बड़े-बड़े शहर की संस्कृतियों में स्ट्रगल कर रहे हैं और आप भी ऐसे ही एक छोटे शहर से कई बड़े शहरों में रहे और उनकी बहुत ही डिफरेंट संस्कृतियों से जूझता रहा। हां, अपने ही से अपने आप से जी उसके भागी रहे। बाद में अलग-अलग संस्कृतियों के उनके उनको एक संबोधित करते हुए कुछ आपको कहना है? नहीं, आप लोगों ने चर्चा कर ही ली, पर मेरा इस विषय पे ये है कि देखो हम बायोलॉजिकल भी हैं। हम नॉन नॉन बायोलॉजिकल भी हैं, पर हम बायोलॉजिकल भी हैं। हमारी उत्पत्ति से हमारी उत्पत्ति, हमारी पीढ़ियां इतने पीछे जाती हैं, जब कपड़े नहीं पहनते थे। पेड़ पे रहते थे, अफ्रीका में घास बहुत ऊंचे थे। उसमें शेर भी होता था, सांप भी और इंसान भी। तो जब पत्तियों में सरसराहट की आवाज आती थी तो आदमी दो चीज सोच सकता था। शेर या सांप या हवा। हवा सोच के अगर वो बैठा रहा तो शेर खा जाएगा। और हवा को शेर समझ लिया तो नुकसान नहीं है, भागा ही ना, हंसा होगा फिर। अरे हवा थी यार, फालतू का दौड़े हम। दिमाग ना हमारा प्रोग्राम होता है सर्वाइवल के लिए। हम तो दिमाग आपको हमेशा नेगेटिव चीजें बताता है। नौकरी छोड़ दी, बर्बाद हो जाओगे। बीवी पता नहीं क्या कर रही होगी यार। ऊंचे थर्ड, तीन फ्लोर पर रहता हूं, भूकंप आएगा, गिर जाएगा। हां ये सब आपको, आपको लगता है कि मन इतना बेचैन क्यों रहता है? हमेशा ऐसा क्यों बताता है कि गलत हो जाएगा? सब कुछ गलत हो रहा है? क्योंकि इन वो मन कहता है शेर ही है। हवा मत समझियो, सरसराया शेर है, बाग। मन आपको डिफेंसिव बनाता है और यह आपका हिस्सा है। आप मन नहीं हो। ये ध्यान हमेशा रखना। मन कोई और है, लेकिन आपका हिस्सा है। इट्स लाइक ये मेरा हाथ है, पर मैं ये नहीं हूं। ये मेरा माथा है, पर ये भी मैं नहीं हूं। वैसे ही एक मन है जो सोचता है, पर वो मैं नहीं हूं। मन मुझको डराता है। कॉम्प्लेक्स शब्द ही कॉम्प्लेक्स है। इसीलिए तो बोलते हैं ना सिंपल नहीं है वो। वो
कॉम्प्लेक्स इतना है कि आप किसी महफिल में घुसते हो तो आपको कहता है वो पीली शर्ट वाला देख रहा है। वो तुमको दूसरी तरफ से देख रहा है। या उसने मन में तुम उसने कुछ बुदबुदाया। बगल वाले के कान में बोल रहा था कुछ। हां, मेरे बारे में बात कर रहा होगा। है ना? लोग मेरे शर्ट के बारे में क्या सोच रहे होंगे?
मन आपको यह बताता है कि तू इंप्रूव कर। तू बेटर हो। तू मेरे लेवल पे नहीं आ रहा है। क्योंकि उसका जो पास्ट का एक्सपीरियंस है, जो उसने सीखा है, जो देखा है। गांव में किसी फूफा का ताना सुना था बचपन में। यह सब ग्रंथियां किसी ने आपके पिताजी के बारे में अच्छी बात नहीं कही थी। किसी ने आपके घर के बारे में अच्छी बात नहीं की थी। किसी ने एक तिनका पड़ा हुआ देखा था। कहा था यार, बोहरते नहीं हो गया सुबह में। पानी आपके यहां का थोड़ा सा हर आयरन का आता है इसमें। पानी ठीक नहीं है आपके घर का। आप लोगों ने ग्रंथियां बांटी हैं आपको। और वह सब ग्रंथियां आपके मस्तिष्क में रहती हैं। आप भूले नहीं हो। आपको लगता है आप भूल गए। आप वहां से चले आए हो। पर उसका रिएक्शन इसी में आता है हम कि चम्मच ऐसे पकड़ते हैं, छोड़ो यार, हाथ से खा लेता हूं। क्यों? क्योंकि आपको लगता है कि फिर आप वहां पे एक वो बनाते हो कि हमको बस पाश्चात्य सभ्यता पसंद नहीं है। हमने बोला है अभी चम्मच किस-किस के मुंह में जाता है? उंगली के बारे में हम श्योर हैं। एक ही मुंह में गया है ये और खा लिए। क्यों? क्योंकि आपको लगता है चम्मच छिटक जाएगा तो क्या होगा?
अभी भी फाइव स्टार होटल में आप जाते हैं, कांटा चम्मच लगाते हैं और एक बार यूं फिसलता है नीचे, टन से आवाज करता है। तो आप झुकते हैं और ये देखते हैं कि सब लोग मुझे ही देख रहे हैं। चम्मच सबका गिरता है। चम्मच गिरने वाली वस्तु ही है और स्टील का बना होगा तो टन की आवाज आएगी ही। लेकिन आपको यह लगता है बेइज्जती हो गई। बेइज्जती हो गई मेरी। क्योंकि आपका मन जानता है कि जमाना जालिम है। तू इंप्रूव कर। तू और अच्छा कर। और इस चक्कर में आप दिल्ली आते हो, आपको लोग कहते हैं, अरे काश होता है। काश नहीं होता। तो आप रटते हो। अरे काश नहीं होता। काश होता है। तो आपको कैसे हैं आप? क्योंकि इतना हावी हो गया। सड़क पर जा रहे हो, सड़क पर जा आप इतने मैं कॉन्शियस हो जाते हैं। मैं पहले नुक्ते के बारे में बहुत कॉन्शियस था। फिर मुझे लगा कि मैं जहां से आता हूं, वो पॉइंटलेस जगह है। हम वहां नुक्ता क्यों लगाएंगे? अब मैं बिल्कुल जो आता है बोल दो। हां। अब मैं आजादी के साथ बोलता हूं। पर पहले आजादी के साथ बोलता था। ठीक है। और जहां-जहां जाना हो वहां-वहां जाता था। क्यों? वो क्या कर सकते थे? और बिकॉज़ आपके मन का दबाव आपके ऊपर बहुत रहता है और वही मन आपको सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स में ही बदलता है। जिससे आप एक झूठ को आत्मसात कर लेते हैं कि पाश्चात्य सभ्यता का चम्मच क्यों यूज़ करेंगे हम? हम अपने हाथ का यूज़ करेंगे।
फिर धीरे-धीरे आपको कॉन्फिडेंस देता है कि देखो जींस हो गई है तुम्हारी गीली तो तुम थोड़ा और पानी डाल के स्टाइल मार लो। है ना? इसके पहले कि कोई तुमसे बदतमीजी करे तुम कर डालो। और फिर एक इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स जिसको बोलते हैं वह एक सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स में तब्दील हो जाता है। होता कॉम्प्लेक्स है सिर्फ इनफीरियरिटी और सुपीरियरिटी नहीं होता। हां, आदमी के अंदर एक कॉम्प्लेक्स होता है जो इन दो रूपों में कभी-कभी आता है। अलग-अलग टाइम पे डेवलप, दोनों ही डेविल हैं। हम दोनों ही आर्टिफिशियल हैं। हम ऑप्टिकल इल्ल्युजन हैं। जो आपके दिमाग ने बनाए हैं, जो आप आईने में देखते हैं। तो कहता है तुम बहुत हैंडसम हो यार। तुमको नजर ना लग जाए। लेकिन आप बाहर जाते हैं और एक लड़की सांवली सी जो आपसे सीधे मुंह बात नहीं करती, वो किसी और से बात कर रहा होता है, कर रही होती है तो आपके मन में दो ही ख्याल आते हैं, इसमें क्या है यार जो हम में नहीं है, दूसरा कितना यार हैंडसम, कितना वेल-ड्रेस्ड लड़का है यार, अपने को भी करना है, इसके बाल बहुत अच्छे हैं। वो इनमें से कोई भी सत्य नहीं है। हां, सत्य से इसका कोई लेना-देना नहीं है।
फुटबॉल खेलते हुए जैसे बारिश में जब मैदान में थोड़ा-थोड़ा सा पानी भरा हुआ है ना। कहीं-कहीं चंक्स पानी के, छोटे-छोटे गर्द हैं ना, उसमें पानी है और उसमें लड़के जो हैं अपना पट मोड़ करके या शॉट्स पहने हुए हैं तो फुटबॉल खेल रहे हैं और कोई उसमें एक लड़का फुटबॉल खेलते हुए फिसल कर गिर जाए एक बार। पहली बार, पहला लड़का गिरा, वो गिर गया तो लोग एक बार हंस दिए। उसके बाद वो क्या करेगा? अक्सर मैंने देखा है, उन दिनों में मैं लगातार उन दिनों फुटबॉल खेला करता था। वो लड़का कोशिश करेगा या तो वो खुद बार-बार गिरे, प्रूफ करे या किसी और को भी जबरदस्ती गिरा दे हंसते हुए ताकि एक ऐसी संस्कृति बना दे जहां पे हम बारिश का भी आनंद ले रहे हैं, गिरते-गिरते खेल के साथ-साथ। तो उसको एक प्ले में तब्दील कर दे। तो उस उसी पर जिम्मेदारी ये होती है जो पहली बार गिरता है। वही है। समय करीब है, आका जी जग हंसाई का। हां, झगसाई से आदमी बहुत डरता है। जबकि जमाने को फुर्सत नहीं है आप पर हंसने की। बहुत बढ़िया। जमाना तो बिजी है। बिजी है भाई। मशगूल है। हां। लेकिन आपको ये लगता है बिकॉज़ यू आर द सेंटर ऑफ़ द यूनिवर्स।
आप बस में चढ़ते हो तो आपको लगता है कि पहले जब युवा होते हो तो आपको लगता है सब लड़कियां आपको देख रही हैं। हम है ना? हां। हां, आप इनफैक्ट पीछे जो लोग आपको देख रहे हैं उनके नजरों की चुभन अपनी पीठ पे महसूस करके हिलाते भी हो ऐसे हल्का सा और फिर सडनली घूम जाते हो, कौन देखेगा, कौन देख रहा है ना? लेकिन हकीकत ये होता है कि बस में जब चढ़ते हो आप भी सबको देखते हो, आपको भी सभी देखते हैं, देखने का पैसा नहीं लगता, कुछ नहीं होता। हम पर यही कॉम्प्लेक्स है। प्रत्युष ने एक बड़ी बहुत बढ़िया बात कही कि अजनबियों के सामने अपमान से मैं उतना नहीं डरता। मैं परिवार वाले, जब उनको नहीं बुलाता हूं अपने कहीं कि मैं यू नो, जोक्स मेरे चल नहीं रहे या कुछ ऐसा अगर सीन होता है या कोई नर्वस वाला है तो मुझे थोड़ा उनके सामने अपमान होगा तो वो लोग याद रखेंगे, अरे यही वो है क्योंकि उनसे तो रोज मिलना है ना मुझे, वो मेरा चेहरा पहचानते हैं। मेरी आइडेंटिटीज, मेरी कमजोरियां जानते हैं। अजनबी तो भूल जाएगा। हां, कोई था आदमी जिसकी चम्मच गिरी थी। होता असल जिंदगी में उल्टा है। आदमी अजनबी आपके घर में आपसे चम्मच गिर जाए, आप उठाएंगे और रख लेंगे। लेकिन अजनबियों के सामने जो आपको पहचानते नहीं हैं, आप अतिरिक्त सम्मान के एयरपोर्ट पे, बस स्टैंड पे, रेलवे स्टेशन पे बेइज्जती नहीं हो। हां, वही घर पे हो जाए तो चलेगा। ये नहीं, घर पे आप शॉट पहन के रहते हैं। आप पट चढ़ाने लगते हैं। हां हां, तो वो आपने सुना है ना कि एक अ साहब थे। वो घर में बैठे हुए थे अंडरवियर में। हम ऐसे मशन्नत पे ऐसे वो कोहनी रख के और टोपी उन्होंने लगाई हुई थी। तो उनसे किसी ने कहा कि अरे मौलाना साहब ऐसे इस तरह से क्यों बैठे हैं? बोले हमारे यहां कौन आता है घर में कि कोई हम घर में बैठे हैं अपना बैठे हैं। बोले फिर टोपी क्यों लगा रखी है? बोले मान लो कोई आ ही जाए। वही है। तो ना सम्मान की चिंता, ना अपमान का भय। दैट्स द वे फॉरवर्ड। बहुत बढ़िया। इसी बात पे आगे बढ़ते हैं। आप जमाने के बारे में नहीं सोचेंगे क्योंकि जमाना आपके बारे में नहीं सोचता। नहीं सोचता है। लेकिन वो खाने वाली बात जो आपने कही ना, हाथ से, वो मैं हाथ से ही खाता हूं। इसलिए नहीं कि मुझे चम्मच से खाना नहीं आता या मुझे वो एक भय होता है या शर्म होती है। ऐसा कुछ नहीं है। मैं खाना हाथ से खाना कई मुल्कों में आपको चॉपस्टिक देते हैं। वो तो बहुत ही भयानक है। आंख मुंह घुस जाए। अब मैंने सीख लिया है। पर मैं मास्टर नहीं कर पाया। है ना? तो मुझे ये रहता है कि मैंने मास्टर नहीं किया है तो वही कॉम्प्लेक्स तो मैं उसको टच नहीं करता हूं कि यार मिस्टेक हो जाएगी, चार लोग देख लेंगे तो मैं कहता हूं, फर्क नहीं पड़ता, हम स्पून ले आओ, रेगुलर वाले ले आओ, मैं उसी से खाऊंगा, वो इसलिए कि उससे मेरी प्रैक्टिस है, मैं खा सकता हूं। चॉपस्टिक से मैं एक पीस उठाऊंगा, डिश से गिर जाएगा, कोई नहीं दिखेगा, फिर भी मेरी बेइज्जती हो जाएगी। वही और मैं कंफर्टेबल नहीं हूं उससे, मतलब मुझे एंजॉय नहीं कर पाता हूं अपने मील को। तो यहां पर आपका आपका ज़हन फ़्री होना चाहिए। आपका ज़हन उलझा हुआ है इन चीज़ों में, क्योंकि गिर जाएगा।
बाएं हां वही तो ये मिजार खबर की ओर बढ़ते हैं अपन। दिल्ली हाई कोर्ट में मतलब एक मसला आया है। आईपीएल चल रहा है ना। आईपीएल में एक डॉग है। रोबोट जो एआई इनेबल्ड है ना, कैमरा वो डॉग की तरह बनाया हुआ है। अब हम दफ्तर में भी पिछले दिनों हमारे यहां उसका एक वो आया था। हम देख रहे थे उसको। हमारे इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में भी इस बार थे वो, स्टेज पे आते थे बीच-बीच में। हां तो वो उनका नाम चंपक रखने पर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, BCCI से हाई कोर्ट ने जवाब मांगा है। क्यों? क्योंकि बच्चों की जो वो पत्रिका है, चंपक जो हम सब ने पढ़ी होगी। उन्होंने इस पे अर्जी डाली थी कि साहब ये हमारे नाम का इस्तेमाल किया गया है। तो अब BCCI से पूछा गया है और पत्रिका ने कहा है कि आप ऐसे रोबोट डॉग का नाम चंपक नहीं रख सकते। मतलब उन्होंने आपत्ति जताई है और ट्रेडमार्क के जो रूल्स रेगुलेशंस हैं उसका नियम का उन्होंने उल्लंघन बताया है। जहां तक मुझे याद है, जेठालाल गड़ा के पिताजी का नाम चंपक लाल गड़ा है। हां, चंपक बहुत सारे लोग नाम नहीं, बट मतलब इस केस में तो ये होगा ना कि ब्रांड नेम, ट्रेडमार्क नहीं रख सकते। आप घर में तो नाम कुछ भी रख सकते हैं, घर में तो आप Samsung भी रख सकते हैं अपने बच्चे का। पर वो तो हिंदुस्तान टाइम्स का है ना। चंपक, हां, नजदीक का है। जहां तक मुझे याद है। अब जैसे लियो नाम है आपके पेट का, लियो मूवी आई है, कोई आपको कह के शो कर दे कि आप नहीं रख सकते नाम, यह तो गलत है, नहीं, मतलब मैं तो सोच रहा हूं ये मजे लेने के लिए कुछ लोग करते हैं अपने यहां ना एक और सिस्टम है कि आप फाइल किसी पे भी कर सकते हो, नहीं, उसमें लेकिन ताऊ वो भी है, आजकल बहुत Google पे फर्स्ट सर्च रिजल्ट का भी लड़ाई है ना। अगर मैं इंटरनेट पे जाके चंपक लिखूं तो शायद 3 महीने, 4 महीने पहले तक मैगजीन आती थी, वो मतलब मैगजीन नहीं है, वो क्या बोलेंगे, जो भी है, बच्चों की मैगजीन ही है, मैगजीन है, मैगजीन है। हां तो वो आती थी, लेकिन हो सकता है आप चंपक लिखने पर वो एआई रोबोट के लिंक्स आए तो वो मतलब वो उसका है, लेकिन मैं तो ऐसा सोच रहा था कि ये पर ये तो उन्हीं का है ना जो ट्रेडमार्क के ओनर हैं, हम वही कर सकते हैं ये केस। हां तो चंपक कोई रैंडम आदमी नहीं कर सकता, चंपक के ओनर ने ही किया होगा। हां हां, उन्होंने किया, चंपक की ही ओर से किया गया है। ओके। हां ओके। तो मैं यह सोच रहा था कि कुत्ते का नाम चंपक वैसे रखा, जैसे जनरली हमारे यहां कुत्तों के नाम के खास टाइप होते थे। किस तरह के नाम रखे हैं? पत्रिकाओं के नाम के भी एक खास टाइप रहे हैं हमारे यहां। है ना? चंपक उस समय के दौर से एक थोड़ा डिफरेंट किस्म का नाम था। बहुत हिट था। हां। लेकिन अब हिट है। मैं तो अभी भी मतलब मानता हूं कि उसके नॉस्टैल्जिया जैसे वो शक्ल का बूम बम बम बम बम बम बम बम बम बम बूम का नॉस्टलजिया था, वैसे ही है। चंपक और नंदन दोनों का नॉस्टलजिया। नंदन है हिंदुस्तान टाइम्स का। हां, नंदन होगा, वही नंदन है हिंदुस्तान टाइम्स का। चंपक फिर किसी और का, नंदन कंपेरेटिवली थोड़े से बड़े बच्चों के लिए होती थी, सभी लोग पढ़ सकते थे। हां, उसकी भाषा शैली वो टीनएजर्स, कम से कम चंपक और छोटे बच्चों के लिए थी और उसमें देखो, हंसना देना आता था जिसको मैं देखूं, हंसना देना पड़ता था हमेशा क्योंकि चंद्रबिंदु नहीं लगा होता था उसमें, बिंदी होती थी। तब वो भाषा के मानकीकरण का, अब तो चंद्रबिंदु होता ही नहीं है। हम हां हां, वो चला गया ना भाषा से बहुत सारी चीजें चली गई। लेकिन डॉग्स के नाम के मामले में कोई आपने अजीब नाम सुने हैं? मतलब भाई, अरे ये कैसे डॉग का नाम हो सकता है। ऐसे मैंने एक डॉग का प्यारे नाम तो होते हैं। नहीं, बट अजीब या अलग, डिफरेंट कह लेते हैं। चलें। मैंने एक हमारे परिचित थे। उन्होंने नाम रखा था सेठ जी। तो उनके घर कोई जाता था अचानक और शो ऑफ करते थे। बोलते, अरे सेठ जी, सेठ जी पूंछ हिलाते हुए चले आते थे। वैसे हिंदी नाम तो बहुत रखते थे। है ना? बहुत पहले जब शुरू में बहुत कम लोगों के पास कुत्ते होते थे पालतू, और ब्रीड जो बोलते हैं ना, ब्रीड वाले वो सब नाम अंग्रेजी रखते थे, यू नो, कि टडा कुत्ता, टॉमी, सडा कुत्ता, कुत्ता टाइप अपना, टॉमी, जैकिया जो था जिसकी कहानी तीन ताल में बहुत लोकप्रिय हुई है, उसका नाम जैकी था। टाइगर ने कभी भी ऑब्जेक्शन नहीं किया है उस पर और ऐसे बहुत सारे हैं जो अंग्रेजी, अंग्रेजी नाम वाले होते थे। बिल्कुल। लियो भी अंग्रेजी नाम है। हम पर हिंदी नाम वाले बहुत सारे होने लगे। विनोद मेहता, एडिटर थे आउटलुक के, डेबोनेर के। वो उनका एक देसी कुत्ता था, उसका नाम था एडिटर। एडिटर, उन्होंने उसका नाम एडिटर रखा था। पिंडी था वो, मतलब अपना जो हिंदुस्तानी कुत्ता होता है। तो पर अंग्रेजी नाम था। पर फिर लोगों ने विषयसर, यू नो, कलेसर इस तरह के भी नाम रखने शुरू कर दिए। लड्डू, लड्डू तो बहुत, लड्डू तो बहुत है। शेरू बहुत कॉमन होता था। शेरू, शेरू बहुत कॉमन, सबसे कॉमन शेरू ही था। देसी नामों में शेरू, टॉमी अंग्रेजी में, हिंदी में शेरू ये बहुत कॉमन होता था। हम वाह, लेकिन अगर उल्टा हो जाए, मतलब जैसे एक बहुत पुराना चुटकुला है, हम चंडीगढ़ का, हम चुटकुला नहीं, मतलब पीजे कि एक आदमी जो है तीन डॉग्स रखे थे, उन्होंने रिटायर्ड थे तो वो उसको वॉक कराने ले जा रहे थे तो खुशवंत सिंह साहब जो हमारे संपादक होते थे, हिस्ट्री में उनकी किताब में है, उन्होंने लिखा था तो उन्होंने उनका नाम पूछा कि बड़े अच्छे डॉग हैं आपके। क्या है ये? बोला ये जर्मन शेफर्ड है। और इसका नाम बोले, हरजिंदर। बोला ये, बोला ये बीगल है। इसका नाम बोला, बलविंदर। अच्छा, बोला और ये तीसरा बोला, ये पिटबुल है। इसका नाम सुखविंदर। क्या बोला? वेरी नाइस। आपका नाम और आपका नाम दोनों टॉमी। ये बचपन में यशवंत सिंह जी की किताब में मैंने पढ़ी थी। पर ऐसे ये ये वाली उल्टा अगर कर दें तो बड़ा मतलब ह्यूमर तो वहीं से निकलता है। जैसे बाल हंस पत्रिका का नाम होता था। पर अगर वो आज के दौर में ये बॉल पिक करने वाली रोबोट का नाम हो जाए। एक एक रोबोट है जिसका नाम बाल हंस है। बाल हंस है ना? वो बन सकता है इसमें वर्ल्ड प्ले। या नंदन नाम की पत्रिका है वो बोलिंग प्रैक्टिस करा रही है यंग क्रिकेटर्स, बच्चों को, टीनएजर्स को, उसका नाम नंदन है। साथ में उस सुभाष बच्चे ने बॉल फेंक दी कहीं और तो उसमें नंदन में, नंदन इस चीज के लिए जानी जाती थी कि एक संस्कारवान पत्रिका भी है, वो अच्छी चीजें भी सिखाती थी। चंपक में मोस्टली जंगल की कहानियां और नीलू, हां, नीलू बंदर और जिराफ और ये ज्यादा होता था इसमें, अच्छी बातें, सदाचार की बातें, एक राजा था जो बहुत निर्दयी था तो उसका बुरा अंत होगा या हृदय परिवर्तन होगा। तो ऐसे ही नंद, नंदन नाम का जो रोबोट होगा वो सुभाषितानी मार रहा है। अगर गेंद के साथ बदतमीजी कर दी, उठा के फेंक दी। इस क्रोध में इस तरह से गेंद नहीं फेंकते, पुत्र है ना? तो वो इस तरह का कंट्रास्ट अगर हो तो मजा ही आए। वो रोबोट बड़ा हो के कादंबिनी बनेगी। नंदन और कादंबरी में ये रिश्ता था। हां। एक वो, एक पब्लिकेशन से निकलते थे। नंदन एक ऐज के लिए, उससे बड़े वालों के लिए कादंबरी। नहीं, पर नन्हे सम्राट बहुत हिट था। नन्हे सम्राट, नहीं क्या था? क्रिकेट सम्राट, क्रिकेट सम्राट, क्रिकेट सम्राट। उसमें एक पोस्टर आता था बीच में और वो पोस्टर हम लोग बहुत निकाल करके उसको हमेशा वो होता ही इसीलिए था कि आप निकाल के सके और सर में, स्पोर्ट्स स्टार भी, इंग्लिश में स्पोर्ट्स स्टार था। हिंदी में क्रिकेट स्टार। ये ये ट्रेंड था पहले की मैगजीन में। बीच में ही एक आपको पोस्टर मिलता था जो कि खुल के बड़ा हो जाता था। स्पोर्ट्स स्टार में अभी भी मतलब मैंने बहुत समय से मुझे नहीं पता क्रिकेट सम्राट अभी चल रही है या नहीं, बंद हो गई। पर स्पोर्ट्स स्टार भी चलती है और आती है हमारे यहां तो स्पोर्ट्स स्टार में अभी भी पोस्टर आता है बीच में। हां, अभी भी आ रहा है। उन्होंने लोग अब अपने घरों में इस तरह के पोस्टर्स लगाते नहीं हैं लेकिन जो अपनी एक जनरेशन था हमारा कि मारती नवरात लोवा, स्टेफीग्राफ, ठीक है, गैब्रियला सवातीनी इन सबके पोस्टर जो हैं, हां, बहुत हाई क्वालिटी प्रिंट किए हुए, प्रिंट किए हुए, हाई रेजोल्यूशन वाले वो स्पोर्ट्स स्टार में आते थे, उसको खरीदा इसलिए जाता था, पोस्टर निकाल सकते थे। हां, क्योंकि अंग्रेजी तो उतनी नहीं आती है पर गैब्रियला सवातीनी की फोटो लगेगी अपने कमरे में, हम वो चिपकाते थे आटे से। पर चंपक आपने बचपन में पढ़ी है आपने? नहीं? अरे यार, चंपक हो गया। हम बांकेलाल कॉमिक्स तो हमें हमारे लिए तो चंपक वो था, मतलब उसमें एक प्रिविलेज भी यह था कि एक्चुअली हम लोग की रीडिंग हैबिट बना पाने में उस दौर में इन पत्रिकाओं का बड़ा योगदान रहा था। जैसे एक बात है ना कि उस टाइम में पता दूसरी रीडिंग हैबिट क्या होती? मोबाइल था ही नहीं। हां, कुछ भी नहीं था। हम नहीं, किताबें नहीं पढ़ते थे ना। जैसे बाद में किताबों पे अपग्रेड आप कर पाए। उसका रीज़न ये था कि आप छोटी कहानियां ये पढ़ते थे। और अक्टूबर की जैसे आ गई है तो बेचैनी होती थी कि अक्टूबर आए हुए दो दिन हो गए हैं जब आ जाती है पर हमारे पास अभी नहीं आई है, क्यों नहीं आया, फोन करेंगे, आएगी। आप सेम डे या तो खत्म कर देंगे या अगले दिन, दो दिन लगा करके और उसके बाद किसी को अपनी क्लासमेट को दे देंगे, मैंने पढ़ ली अब तुम्हें पढ़नी है तो उसमें बता भी देते थे, ये वाला तुमने पढ़ ली? हां, बोले पढ़ ली, कोई पन्ना मोड़ दिया, पहेली वाला हम मोड़ वो लगा दिए हैं। एक होता आपको फिल इन करना पड़ता था। हां, वो हम भर दिए हैं जो कि ओनर का अधिकार होता था। हां हां, वो तो है ही, पर एक जो उसके पन्ने भी डिफरेंट थे ना, उसका जैसे उस दौर में बहुत ऐसे चमकीले पन्नों वाली पत्रिकाएं बहुत ज्यादा थी नहीं, छपाई का खर्च और बहुत ज्यादा जिसको बोलते हैं कि बाइंग कैपेसिटी भी उस तरह से नहीं थी पर इसमें इसके पन्ने मोटे, अलग होते थे और मोटे और चमकीले और कभी-कभी आप ध्यान से देखें, मतलब थोड़ी सी एक किसी चुइंगम जैसी एक खुशबू आती थी उसमें, वो कागज की खुशबू, कागज की नहीं, मुझे लगता शायद इंक में वो हल्की सी एक डालते थे जो बच्चों को खासतौर से बहुत आकर्षित करते हैं और जो जानवरों के नाम थे उसमें एक पैटर्न था, अगर जंबो है तो मतलब हाथी का नाम देना है तो वो जंबो ही होगा, बंदर पीलू, नीलू हो सकता है, सियार भी पीलू, नीलू होते थे, है ना? पीलू सियार और चूहे का भी एक खास नाम होता था, वो ज्यादातर बदलते नहीं थे वो ताकि हाथी हमेशा जंबो के रूप में ही आपके पिक्चर में आए, वो मुझे मुझे बहुत कमाल का लगता था। मैं एक्चुअली उस समय पढ़ते हुए चाहता था कि मैं बड़े होकर के चंपक के लिए कहानियां लिखूंगा। अरे वाह, मुझे लगता था कि मैं उस टाइप की एक आध कहानी मैंने लिखी हुई है कि एक गिलहरी है वो मूंगफली ले आई। फिर वो वाला किया है मैंने। मैंने सब बड़े होकर किया वैसे कि मैंने इन छोटी पत्रिकाओं में, मतलब बच्चों वाली पत्रिकाओं में भी अपनी कहानियां भेजी, छपवाने के लिए, वो 50 ₹, 51 ₹, 100 टाइप के उधर से वो आता था। अच्छा, सेलेक्ट हो गई तो, हां, सेलेक्ट हो गई तो वही ₹5, ₹51, ₹100 उसमें लिखा भी होता था कि कहानियां इस यहां भेजें, है ना? और ₹51, पीओ बॉक्स नंबर होता था इसके। तो मैंने एक दो छपवाई हैं वैसे ही। हम पहले हम लोग खत भी लिखा करते थे जो कि मेरा तो कभी लगा नहीं होता था ना आपके खत। हम एंड में मैंने नहीं लिखे हैं, एक्चुअली मैंने पढ़े हैं पर लेटर टू एडिटर हो रहा है ना, वो नहीं लिखा है मैंने, उसके कारण मैं मतलब एक तरह से कहो पत्रकार बन गया, हम क्योंकि मैं बहुत लिखता था लेटर्स टू एडिटर, वो छपते भी बहुत सारे थे तो अपन उसको अब एक मेरे पास फाइल है, हम जिसमें कि चिपकाता था मैं। अच्छा, चिपकाने के बाद काट के उसको, काट के उसको चिपकाया, अभी भी है, मतलब धूल दूसरी है, पीला पड़ गया है पर अभी भी है वो, मैं बहुत प्राइड के साथ मैंने उसको संभाल के रखा। जब तक मैं एक्चुअली मेरे नाम से कुछ चीजें छपने नहीं लगी तब तक ये लगता था कि यार ये बहुत बड़ी चीज है यार, कोई ऐसे तुम समेट के रखे हो, कुछ ऐसा। कटा मेरे पास बाय लाइंस हैं अपनी, अखबारों की जो अखबारों में मेरी बाय लाइंस अभी हैं, अभी हैं मेरे पास लेटर्स हैं सारे, तो अपना अपना मसौदा सबके पास है। ग्रे शोभा बंद हो गई ना? अब अगली नहीं, बंद हुई होगी। अच्छा, रेलवे स्टेशन जाओ, तुम्हें पता चल जाएगा। हां, मतलब ये आपको बुक स्टोर पे नहीं पता चलेगा। रेलवे स्टेशन पहले ना वो घरों तक जाती थी, अब वो स्टॉल्स तक, अब शायद वो रेलवे के स्टॉल्स तक सीमित है। हम चंपक शायद उन्हीं की थी, ऋषभ वालों की। सरिता, सरिता भी बहुत अच्छा था, के मतलब सबकी एक सीरीज होती थी ना बच्चों के लिए, उसके बाद के लिए एक सरस, सलीला, सरस सलीला उन्हीं की थी। उनका अभी कैरेवान मैगज़ीन है, हम पर वो पहले यहां से शुरू किया। पर मैं किसी रोबोट का नाम, देसी रोबोट अगर हो, उसका नाम गुड्डू रखने की वकालत करता हूं। क्यों? बहुत सुंदर नाम है, घर-घर के आदमी रिलेट करता है उससे, मतलब चंपक भी बुरा नाम नहीं है अगर आपको रोबोट का नाम देना है, सुनने में सिर्फ उसके बहुत भारतीय, देसी नाम है चंपक और कूल भी लग रहा है सुनने में। अगर आप किसी मशीन के साथ चंपक शब्द, वो वाई टू और इस तरह का जो न्यूमेरिक्स और अल्फाबेट का इस्तेमाल करके बनाओगे वो उससे तो बेहतर है ना। गुड्डू कितना सुंदर नाम, किसी रोबोट का नाम गुड्डू है, अपनापन लग रहा है, अपनापन है। आप गुड्डू को कुछ कहते हुए आपको हिचक नहीं होगी। गुड्डू उधर जाके शॉट ले लो और गुड्डू में ये होता है ना, उसमें गुड्डू वाला बात है। हां, गुड्डू, गुड फॉर द सोसाइटी या गुड्डू ये अच्छा है। वैसा चुन्नू भी अच्छा नाम, चुन्नू, मैं तो अच्छा नाम चुनू। हां, बट हां, ये नाम अच्छे हैं ये। अगर रोबोट का काम है, आदेश का पालन करना और आपके जो आपने कहा वो काम करके आना तो वो छोटा काम होता है जो भी हो, बट उसमें लास्ट में ऊ की मात्रा रहती है तो हां, लास्ट में ऊ की मात्रा रहती है तो वो थोड़ा सा हमारी जो कंडीशनिंग है, किसी भी तरह की बुलाने में इजी रहता है ना, उसके फ़ोनेटिक्स। यस, छोटू, रामू या जो भी है, पप्पू। हां, गुड्डू, लड्डू, चुनू। पहले छोटे नाम क्यों रखते थे इस पे भी बात हमने कभी की नहीं। छोटे-छोटे नाम बुलाने में बहुत बढ़िया इजी रहता था ना। परमेश्वर उसको बुलाने, उसको डार्क नाम ही बोलते थे हम। आपका एक होता है कि जैसे अंग्रेजी में बोलते हैं, इंडिया में बोला जाता था कि व्हाट इज योर नेम का मतलब है कुछ भी, व्हाट इज योर गुड नेम। हम उसका मतलब होता था आप यह बताइए, आसिफ, श्री आसिफ खान ये आपका गुड नेम हुआ, लेकिन वो आपका नाम नहीं है। बांग्ला में होता है कि डाक नाम एंड भालू नाम। हम एक पुकारने वाला नाम, एक लिखने वाला, एक लिखने वाला, एक प्रॉपर नाम जो है हमारे यहां भी हर आदमी का दो नाम, दो नाम होता है। मेरा भी बर्थडे, हां, दो बर्थडे भी होता है। सर, दो बर्थडे भी शुरू में तो ऐसे ही होते थे, अब नहीं हो रहा है। गांव में जन्मे हैं उनका दो बर्थडे तय रहते हैं। दो बर्थडे होता था तुम्हारा, एक ही है ना? हम नहीं, हॉस्पिटल में नहीं, एक ही बर्थडे है तुम, हॉस्पिटल में जन्म लिया होगा। हां हां, तभी तो, हॉस्पिटल में तो रिकॉर्ड हो जाता है ना। हां, गांव में क्या होता है कि बच्चे का जन्म घर में हुआ है, हम और फिर वो बड़ा हो गया तब ना स्कूल जाएगा, तब याद तो लोग पूछते हैं कि कब बोलते, दिवाली के दो दिन बाद है ना या एकादशी था, फलानवा का, शादी के बाद, चलना, गर्मी तो चै टाइप था, नहीं, बैसाख भी हो सकता है ना, सर्दी पड़ रही थी, वही टाइम रहा होगा इसलिए बहुत सारे लोगों को कहता है कि अरे किस साल, कितना उम्र हो गया तुम्हारा, चार साल अभी क्या चल रहा है, 84 तो 80, 1 80 इसलिए कई लोगों का जन्मदिन जो है वो 1 जनवरी है। ऐसा ही है मेरा भी जैसे दो है, सेकंड मार्च ऑफिशियल अगर कह रहे हैं पेपर पे क्योंकि मैं हॉस्पिटल में पैदा हुआ था बनारस में तो फिर तो एक ही होना चाहिए था। नहीं, तो जब मैं बड़ा हुआ तब मैंने ढूंढा कि मेरा नाम, डेट ऑफ बर्थ है क्या? वैसे 17 अप्रैल है तो मैं मनाता 17, असली 17 है आपका, मतलब असली जो है 17
है और जो छपा है वो 1 मार्च है। हम सेकंड मार्च तो जब मैं बड़ा हुआ मैंने कहा यार क्या है? तो वो ऐसे ही चल रहा था कि ऐसा मौसम था। सन क्लियर था कि कौन से उसमें पैदा हुए थे आप। फिर मैं हॉस्पिटल गया तो 11 महीने पीछे थे मौसम का कैलकुलेशन के हिसाब से। हां वहां जाके मैंने निकलवाया तो वहां निकला कि ओ 19th अप्रैल। इन्वेस्टिगेट किया तब मुझे पता चला। तो मैं अपने भाइयों में मैं तो जितने सीनियर लोग हैं ना उनको देखता हूं सब एक-एक है वन वन। क्योंकि ईयर जो है वो जनरली हो जाता है। कौन कॉम्प्लिकेट करे एक जनवरी तो सीधा रहता है उनका। हम लोगों के टाइम आते-आते वो सुधर गया। अब तो खैर लोग हॉस्पिटल में पैदा होते हैं। मैं घर में पैदा हुआ था तो घर में पैदा होने वाला होगा तो फिर बड़े हो स्कूल जाएगा तो तीन चार साल का होगा। वहां ऐज भी आगे पीछे हो जाता था पहले हम। फिर टीचर जो है वो मतलब मेरे केस में तो मेरे टीचर ने डाल दिया था अपने बेटे का बर्थडे। हम दोनों एक ही क्लास में थे एक ही सेक्शन में थे एक्चुअली तो मैं था नहीं। अरे वो फॉर्म भरा जा रहा था तो उन्होंने कहा अरे उसके घर में रेजडी हो गया है तो यहां है नहीं। तो उसमें टेलीफोन वेलीफोन गांव में नहीं होता था तो उन्होंने कहा कि दोनों एक ही साथ एक ही उम्र का है एक ही क्लास में पड़ता है उसी का डाल दिया। फिर मैं कहां-कहां चेंज करवाऊं। अब एक बार मैट्रिक का जो होता है ना 10वीं का सर्टिफिकेट वो इतना इंपॉर्टेंट चीज है कि आप फिर जाएं बोर्ड के ऑफिस में। फिर में नहीं वो पूछेंगे कि चेंज कर रहे हैं तो किस आधार पे चेंज करें? उसका बर्थ सर्टिफिकेट लाओ। हम अब बर्थ सर्टिफिकेट लाने के लिए तो 10वीं का सर्टिफिकेट चाहिए। नहीं और दूसरी चीज पेपर में छपवाइए पहले गजट करा तो बहुत लोग इसके ना इसके भुगते भी हैं। ये अच्छा भी है और 2 साल उम्र तो आराम से बढ़ा ही देते थे। उनका यह मानना होता नौकरी जल्दी मिल जाएगी। हम बढ़ा कम कर देते थे। बढ़ा देते थे। नहीं नहीं कुछ लोग बढ़ा भी देते हैं। कुछ लोग घटा देते हैं। लड़की का घटा देते थे। लौंडो को बढ़ा देते थे। दूसरा बढ़ा दो नौकरी मिल जाएगा जल्दी। ये भी होता था।
तो अब बारी है भाई साहब तीन ताल में चिट्ठियों की। चिट्ठियों से भी पहले YouTube पे आए कमेंट्स की। शुभम जैन ने लिखा है ताऊ खानचा और सरदार को जय हो। मुझे सरदार से कुछ शिकायतें हैं जिनके लिए मेरा यह कमेंट है। एक तो पिछले एक एपिसोड में वार्तालाप के बीच जब मूवी देखने की बात आई तो सरदार का यह बोलना कि मैं 2x पर देखता हूं। यह मुझे नाइंसाफी नजर आ भरा नजर आया। किसी भी चलचित्र को उसके बनाए गए रूप में ना देखकर उसकी गति को बढ़ाकर या घटाकर देखने से उसका मूल रूप ही बदल जाता है। उदाहरण के तौर पर भरकस हॉरर मूवी को भी अगर स्पीड बढ़ाकर देखा जाए तो एक कॉमेडी मात्र प्रतीत होगी। सरदार अब आप अपनी देखी गई कुल चलचित्र की संख्या में बढ़ोतरी करने की इच्छा से ही देखना चाह रहे हैं तो मत देखिए क्योंकि उन विधाओं का आनंद लेने की बजाय उनके पीछे की मेहनत का अपमान मात्र है। बाकी की शिकायतें कभी और यही कमेंट लिखने में ज्यादा लंबा लग रहा है। पहली बार लिख रहा हूं। कभी पत्र लिखने का प्रयास करूंगा। आप सभी को बहुत धन्यवाद ये शो करने के लिए। शुभम भैया वो मैं एग्री करता हूं फुल्ली। मैं भी एग्री करता हूं। मैं तो फॉरवर्ड भी नहीं करता। एक कोई भी बोरिंग सीन हो या कुछ भी हो मैं फॉरवर्ड नहीं करता। तो वो एक समय के नहीं नहीं एक क्षणिक कुछ दिनों के अंतराल के बीच में मैंने बात की थी। मैं ऐसा करने लगा था। उन दिनों हुआ क्या था कि बालक की वजह से रात में मेरी नींद लगती थी और तुरंत फिर इमीडिएटली मेरे साथ ये है कि अगर नींद एक बार खुल जाए तो दोबारा नींद आने में बहुत समय लगता है। तो उस समय मैं कुछ लगा लेता था जो मेरे बहुत टू वॉच पसंदीदा लिस्ट की चीजें नहीं भी होती। रैंडम चीजें तो तब मैं 1.5x या 2x पर कुछ वेब सीरीज इस तरह की जो बहुत क्लासिक नहीं है बट आई हुई है तो मैंने लगा ली। पर मैं खुद इस बात पे यकीन रखता हूं कि इनफैक्ट मैं तो किसी फिल्म के बारे में समरी भी नहीं पढ़ना पसंद करता हूं क्योंकि फिर वो आपको एक प्रिमाइस बना देती है ना आपके ज़हन में। मैं लाइट भी ऑफ करता हूं। हां फिल्म आपको जहां ले जाना चाहती है वहां जाओ। सीरीज में नहीं फिल्म में मैं पूरी लाइट ऑफ कर देता हूं। फिर वैसे देखना जैसे फिल्मों में देखता हूं। कुछ हल्की फुल्की सीरीज में मैंने किया है उन दिनों में क्योंकि मुझे बालक की वजह से जागना और नींद के व्यवधान और मुझे मालूम था कि मुझे 45-50 मिनट कुछ देखना है ताकि ये हो जाए तो मैं देख लेता था। मुझे मालूम नहीं था कि अगले एपिसोड भी देखूंगा या नहीं। बट यस आई एग्री पॉइंट टेकन। मेरे लिए कहना आसान है क्योंकि मैं देखता ही नहीं कुछ आजकल।
अभिनव मिश्रा का कमेंट है। खानचा डार्लिंग आदमी है। इतना खुलकर वही बोल सकते हैं जिसका मन साफ हो। पुणे में उनकी बात मन को आद्र कर गई थी। यानी नम कर गई थी। मैं सबसे प्रेम करता हूं। जिस मानसिक अवस्था में यह बात कही गई उस अवस्था में इंसान सच ही बोलता है। यदि कोई विश्व प्रेम परिषद बने तो निर्विवाद खानचा उसके अध्यक्ष होंगे। क्या बात है। प्रेसिडेंट वीपीपी नहीं वीपी वाइस प्रेम परिषद वीपी। अगर ये वाइस प्रेसिडेंट वीपीपी के होते तो वीपी वीपीपी ही होता। मजा ही आ जाता यार। नहीं प्रेसिडेंट नहीं है यार। वाइस प्रेसिडेंट थे तो विपिप विश्व हिंदू परिषद के वो विहिप है तो यह विश्व प्रेम परिषद है तो विपिप ऐसा लग रहा है किसी गाड़ी चलाते हुए और बजाया है विपिप। अशोक शर्मा ने लिखा है थका दिए हो तुम ताल टीम। पहले तो हम बाद में डिस्कवर किए फिर यूरोप में है तो टाइम नहीं मैच करता है तो इतने एपिसोड कैचअप के लिए काम में मन नहीं लग रहा है। ताऊ की ताऊ गिरी के गजब कायल हो गए हैं। सरदार तुम हमसे कुछ साल छोटे हो बट जब बोल बोलते हो तो लगता है कि बहुत कुछ सीखना और पढ़ना चाहिए। खानचा को पंचायत के प्रहलाद चाह खानचा और पंचायत के प्रहलाद चा दोनों से मिलने का मन कर जाता है। शानदार टीम शानदार शो जय हो जय भारत। अरे भैया थैंक यू यार। थैंक यू। और जब भी टाइम मिले यार अपना टाइमिंग जो है ना हमारे लिए खराब मत करो। हम अपने टाइम से देखो। उस पे कोई रोक नहीं है। हम एक दिन बाद ही देखेंगे। क्या हां YouTube पे पड़ा हुआ है। आप देखते रहो। अगला कमेंट है सोसन एस ओ एच एस यू एन। डियर तीनताल टीम रिक्वेस्ट यू टु प्लीज इंक्लूड अ टॉपिक ऑफ़ डिस्कशन ऑफ़ हिंदी लैंग्वेज डायलेक्ट फॉर एग्जांपल भोजपुरी ब्रज अवधी बिकॉज़ वी आर फ्रॉम महाराष्ट्र स्टेट समटाइम ने समटाइम्स नेवर डिस्टिंग्विश बिटवीन वी नेवर डिस्टिंग्विश बिटवीन अवधी एंड भोजपुरी। वी कंसीडर दिस एस सेम आल्सो प्लीज मेक अ बॉलीवुड सॉन्ग्स एज प्लीज मेक बॉलीवुड सॉन्ग्स एज अ रेफरेंस पॉइंट सो दैट बाय गिविंग एग्जांपल्स ऑफ सम सॉन्ग्स व्हिच आर इन्फ्लुएंस व्हिच आर इन्फ्लुएंस्ड बाय अवधी और भोजपुरी सो दैट इट विल बी इजी टू अंडरस्टैंड। अस तो बेसिकली अवधी भोजपुरी के कुछ गानों के जरिए उनको कुछ शब्दों की नवायत समझा दी जाए ताकि वो बीच-बीच में आते रहे तो समझे। वो रिकमेंड कर सकता है तो उनको रिप्लाई कर रेलिया बैरन पिया के लिए जाए रे अह और क्या कमेंट है वेद का कमेंट है पहले लखनऊ में विक्रम टेमो चलती है। चारबाग से यूनिवर्सिटी आते समय एक आदमी ड्राइवर के बगल में बैठ गया। कुछ दूर आगे चलकर एक आदमी और बैठ गया। केसर बाग पे दूसरा आदमी उतरा। टेमो वाले ने पैसे मांगे तो उसने कहा स्टाफ है। टेमो ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा पर उसकी भाव भंगिमा से लग रहा था कि वो फ्रस्ट्रेटेड है। बाद में पता चला कि जो उतरा वो पुलिस वाला था। आगे चलकर परिवर्तन चौक पे आगे बैठ बैठा हुआ जो पहला आदमी था वह भी उतर गया। उसने पैसा मांगा तो उसने भी कहा स्टाफ। अब टेमो ड्राइवर झल्लाया और बोला आप कौन सा स्टाफ हो? उतरने वाले आदमी ने जवाब दिया अरे हम भी डिवर हैं। चारबा चारबाग चौक वाले रोड पे चलते हैं। टेमो ड्राइवर झल्ला के बोला कोई स्टाफ विस्टाफ नहीं पैसा दो। दूसरा आदमी बोला अरे बड़े भैया आप फैमिली वालों से पैसा लोगे? टेमो ड्राइवर झल्ला के बोला अं जाओ यार। आगे चलकर मैं यूनिवर्सिटी पे उतरा। उस समय स्टूडेंट्स में पैसा देने का रिवाज नहीं हुआ करता था। पर मैंने उसको पैसे दे दिए। दो हो चुके थे।
अब चिट्ठियों की बारी है ना तो पहली चिट्ठी आई है खरब चटोरा की। खरब चटोरा राम राम है। सारा ने ताऊ कमलेश ने चरण स्पर्श जमा धरती में लौट के कुलदीप सरदार ने कालजे के कालजेन लगा के ताबड़तोड़ लाड और आसिफ खानचा ने ग्लास ते ग्लास भिड़ा के चीयर्स। मेरा सिलेक्शन टीटी स्टाफ फैमिली में बहुत पुराना है। पर या सुसुरी चिट्ठी ननी चिट्ठी नूनी बेरा कितनी बार लिख लिख के ड्राफ्ट में धर के डिलीट कर ली। आखिर पीर बाबा के दमके हुए पानी की सहायता ने लिखवा के भिजवा ही दी। जुकर सारे तीन ताल वाले नाम धर रहे हैं। तो मैंने भी धर लिया चटोरा खरब। क्योंकि हम वो हैं जो जाम में रुकी हुई गाड़ी में साइड में आने वाले गोलगप्पे, टिक्की की रेड़ी के पानी ना चखने को घोर पाप समझते हैं। और ऐसा ना करने वाले को पापी। मीठे का इतना लाडा हूं। बस में बैठ के गोना पहुंच जाऊं जलेबी खाने या हासी के पेड़े हिसार के। मैं पिछले हां मैं पिछले 10 वर्ष से अमेरिका के न्यूयॉर्क की राजधानी अल्बनी में कुबे के साथ रहता हूं। जी परिवार के साथ आज तक 810 किलो मिठाई बिना इस देश के भीतर नहीं आया। ताऊ तने जितनी दुनिया की समझ है मने हिस्सा लागे है। ओशो के बाद सारा ज्ञान तने मिल रहा है। ताऊ लव यू से तने हर समस्या का बेहतरीन समाधान ले रहा है। जमा सुन के ईसा लागे है। जमा हर बात का निचोड़ सा काढ़ रखा है। पहली चिट्ठी है तो लिखना सीख रहा हूं। भूल चूक माफ। सरदार तो मेरी सरदार तो मेरी हाण का है यानी मेरी उम्र का है पर बेरा नहीं इतने सुथरा बोलना कितने सीख रहा है। जमा कालजे के लागे है जब बोले है। गांव में इतने सुथरा बोलने वाले पे छोरी के दहेज के सामान की लिस्ट जरूर पढ़वावे। में मेरे बाबू ने भी कई पढ़ी हैं। खैर दहेज है एक दुर्भाग्य। तीन ताल को मैंने अपने पड़ोस में रहने वाले युद्धवीर जी जिन्हें मैं ददा बुलाता हूं को बताया। 27 साल से अमेरिका में रह रहे हैं। ढेरों अमेरिका के पडकास्ट पी रहे हैं। एक बार तीन ताल सुन लिया बस फेर के था। बाकी सारे पडकास्ट कुण में ला दिए। और तो और मैं और वह अब जब मिलते हैं तो सिर्फ टीटी स्टाफ की बतलावे हैं। ददा आपके गेस्ट में आने का मानस है। गजब आदमी है हमारा ददा। तीन ताल डिप्रेशन वाले मरीजा का फ्री इलाज है। तीन ताल तनाव परामर्श दाता के भविष्य और वर्तमान में करारा चांटा है। तीन ताल सुनो और खुशी-खुशी बिना स्ट्रेस डिप्रेशन फ्री जियो। ददा के बेस्ट हैं। ददा के बेस्ट ताऊ हैं और मेरे खानचा। बाकी सरदार मेस्मराइजिंग मानस है ही। आखिरकार चिट्ठी तो सरदार पर पड़वानी है। ताऊ क सरदार रुस ना जावे। औरत जोकर सरकारी दफ्तर में बिना रिश्वत की फाइल ने सबसेते नीचे रख दे है। न्यू हमारी चिट्ठी रखी जा। वैसे ठीक-ठीक लगा लो। खांचा तो हो गए गॉड फादर के डॉन कोरलियों और हम लुका ब्रासी। जुकर बाछड़ा गाय के दूध की बाट देखे हैं ना। न मैं और ददाई तीन ताल की देखें। वैसे छोटे सरदार ने अब तक तो भाजना भी शुरू कर दिया होगा। उसकी खूब मालिश बिठा के रखो और गुलाब भाटी का आशीर्वाद समय-समय पर दिलवाते रहो। पहली चिट्ठी है तो घनी लंबी नहीं खींचदा। मेरी धर्मपत्नी श्रीमती आरती जो कि सरदार की भाभी और ताऊ और खानचा की बोडिया हरियाणवी में बड़ों की छोटों की बहु छोटों के लिए बहू का शब्द प्रयोग है। बफेलो एनवाई पढ़ती है। अगले महीने मेडिकल फिजिक्स में मास्टर हो जावेगी। हफ्ते में दो दफा पिछले 2 साल से हम 5 घंटे गाड़ी चलाकर एल्बिनी से बफेलो जावे हैं और फिर उसे दिन वापस आवे है। फिर उसी दिन वापस आवे है। ये एक दूसरे की बातों से तो ब्याह से पहले छक लिए थे। तो किसी और की सुनसुना के काम चलावे हैं। अब तक मेरे दिल के सबसे करीब कोई एपिसोड था तो लूज टॉक था। जिसके मैंने और आरती ने इस सफर में सारे एपिसोड खींच रखे थे। कई-कई बार पर इब तीन ताल का चसका ईसा ला गया बस पूछो नहीं। इब इसका खींच रखा है मीटर सा। खानचा की कसम इब टीटी स्टाफ के पाछे पड़ रहे हैं। इसका पेंडा नहीं छोड़े। खानचा आपके जन्मदिन की खुशी में पीर बाबा का दम किया हुआ पानी पीकर रख रहा हूं कि मैं गलती हुई तो माफ करियो। एक ख्वाहिश आरजू है आपसे एक बार जरूर आपके साथ पीर बाबा का दम किए हुए पानी का सेवन करना है। शायद उस दिन मैं मदिरा ग्रहण विश्वविद्यालय से स्नातक तक की उपाधि ले पाऊं। मेरे जीवन के किस्से खांचा जितने हसीन नहीं और आसपास के कुछ किस्से हैं जो अगली चिट्ठियों में साझा करूंगा। सरपंच अमेरिका आए थे। मैंने मेरी मां पे चूरमा भी बनवा लिया था लेके जाने के लिए एनवाईसी। पर कुछ अचानक बिन बुलाए मेहमान के भाग में था वह चूरमा खाना। इब के बोस्टन आए थे तो आरती का पेपर था। इब श्रीमती जी को बफेलो ना ले जाने का दुस्साहस नहीं हो पाया। एक तीन ताल अदर स्टेट के बाद अदर कंट्री में भी होना चाहिए। सही बात है। आपको देखने वालों की यहां भी बड़ी फौज है और तीन ताल सुनकर अपने आप को इंडिया में महसूस कर लेते हैं। कसम खानचा की जब जेएफ को जेएफके पे उतरोगे मैं उसी स्टाइल में चिल्लाऊंगा। आलिया रे आलिया सरदार के स्टाइल में और सरदार के स्टाइल में कहूंगा आइए। क्या बात है। आप सब राजी रहो। सबने न्यू ही राजी रखो। माशा अल्लाह ला कुत इल्ला बिल्लाह। चिट्ठी पढ़ने के लिए सरदार का धन्यवाद। चिट्ठी खत्म करने को जी कोनी परजे घनी बड़ी लिख दी। फेर के बेरा सरदार पढ़ने नाट जावे। पहली चिट्ठी की भूलचूक की माफी। बाकी खानचा आप हम सबके आइडियल हो। लव यू खानचा लव यू ताऊ लव यू सरदार आप सबका लाडला खरब चटोरा।
बहुत खूब यार खरब भाई ऐसा हुआ आज ही मैं ना कुछ देर पहले इनफैक्ट यहां आने से एक आदमी को हां के बारे में बता रहा था। हम हम के एक लेजेंड है के जो काबे का हजरे असद है। ये क्या होता है? काला पत्थर। अच्छा वो उसका एक टुकड़ा हासी में है। हम हां हरियाणा के हासी में है। हां के पेड़े बहुत मशहूर है हासी में। एक तिरंगा चौक है वहां पे एक लाल मार्केट लाल सड़क है। एक धौला कुआं है। मतलब सफेद कुआं, लाल सड़क और काला पत्थर। वो तीनों तिरंगा चौक पर मिलते हैं। ओ ये कोई हां की बात नहीं थी। और उस पत्थर का एक लेजेंड है और आज वो पत्थर जो है शालिग्राम के रूप में पूजा जाता है। अच्छा ऐसा हां। गधा। तो जिस पत्थर को चूमने के लिए डेढ़ अरब लोग मक्का जाते हैं उसका एक टुकड़ा हांसी में है। एक लेजेंड है आज भी है वो पत्थर तो हां के पेड़े और गुहाना की जलेब को हमारा सलाम भाई। बहुत स्वीट 7 8 9 किलो से कम मिठाई लेके इस मुल्क में आया नहीं कभी। वेरी स्वीट यार बहुत ही खूब। और खानचा जो है वो हर आदमी ना दमकिया हुआ पानी जो है पीियर प्रेशर में लेता है। जनरली हम जिसको भी देखो दे रहे हैं हां यंग लोग ना हम एक दोस्त ने बोला अरे अरे नहीं दो ना कुछ नहीं होता है। हां और फिर खांचा अकेले लेने लगे पीर प्रेशर में। हम वो पीर प्रेशर में था। थैंक यू सो मच बहुत अच्छी चिट्ठी। और कुलदीप ने पढ़ा भी बहुत सलीके से। भाई सरदार जब चिट्ठी पढ़ता पढ़ते हो तुम थोड़ी देर में लैंग्वेज बदल जाती है।
अगली चिट्ठी है रात का गोपनीय प्रहरी। सरदार ताऊ और खानचा तीन ताल की टीम को जय हो। मैं लखनऊ पुलिस विभाग की गोपनीय शाखा में कार्यरत एक कर्मचारी। तीन ताल की प्रथा के अनुसार मैंने अपना नाम रात का गोपनीय प्रहरी रखा है। तीन ताल से मेरा संपर्क कैसे बना मुझे स्पष्ट याद नहीं परंतु इतना अवश्य कह सकता हूं कि यह पडकास्ट मेरे लिए सुरक्षित आश्रय बन चुका है। ऐसा लगता है मानो आपकी हर कहानी और चर्चा को अपने से जुड़ा पाता हूं। सरदार भैया आपकी ससुराल कानपुर से मेरा गहरा नाता रहा है। मेरी स्नातक की शिक्षा क्रॉस चर्च कॉलेज कानपुर में हुई जिसका जिक्र आप करते रहते हैं। सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल के भैया होने के नाते आपके विद्यालय की यादें चाहे वह छात्र संघ के चुनाव हो या भोजन वेला की स्तुति मुझे अपनी ही कहानियां लगती हैं। पुलिस विभाग की फील्ड ड्यूटी के दौरान इस विभाग की कठोर वास्तविकताओं ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था। पर तीन ताल के आगमन के बाद मैंने स्वयं को गोपनीय शाखा में स्थानांतरित करवाया। अब मेरा कार्य किसी को अनचाहा दुख ना देने का प्रयास है। शायद यही मेरी छोटी सी सार्थकता है। पिताजी किडनी फेलियर से जूझ रहे थे। तब मैं उनके दर्द को समझ नहीं पा रहा था। परंतु आप लोगों की बातों ने मुझे संवेदनशील बनाया। उनके अंतिम दिनों में मैं उनके साथ खड़ा रहा। आज यही समय मेरे जीवन के सबसे सार्थक पलों में है। पिताजी के जाने के बाद एक पुरुष को चोरी छिपे रोने के लिए जिस कंधे की आवश्यकता थी, वह कंधा तीन ताल ने पूरा किया। आप तीनों के प्रति मेरी कृतज्ञता शब्दों से परे है। ताऊ जी आपका बंदर की तरफ निर्णय लेने का साहस प्रेरित करता है। सरदार भाई आपकी भाषा आपकी कहानियों की मिठास मेरे लिए गंगाजल समान है। खानचा आपकी वो यादें जहां हदें पार होती हैं लाजवाब हैं। आशा है भविष्य में ऐसे ही पत्रों से जुड़ा रहूंगा। जब तक गोपनीयता की वह वर्दी मेरे ऊपर है तब तक जय हो जय हो जय हो। रात का गोपनीय प्रहरी लखनऊ। जागते रहो जागते रहो। और भैया जो आपने पिता के अंतिम क्षणों में मतलब अंतिम दिनों में अंतिम महीनों में या अंतिम सालों में जो आपने जीवन का समय व्यतीत किया वह अभी से आपको एहसास हो गया कि वह सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अच्छे दिन थे। यह बहुत खूबसूरत है। किस्मत वाले होते हैं जो लोग अपने मां-बाप की सेवा कर पाते हैं। हमारी संस्कृति में लाख खामियां हो। एक अच्छी चीज है। यस ट्रू वो वो सुख जो उन दिनों का कष्ट होता है ना हम वो बाद में पता चलता है वो कितना बड़ा सुख था और कितने लोग इससे वंचित रहे। उन्हीं मतलब उन्हीं दिनों की याद में दोस्त जिन मतलब मैंने देखा है कि वो अक्सर उन दिनों की याद करते हैं कि यार सेवा मैं कर पाया। इसका संतोष है किस्मत खुश रहिए भैया और वर्दी जो है चमकती रहे आपके ऊपर गोपनी ही सही। शुक्रिया आपका।
अगली चिट्ठी है बहरूपिया मौन की। चिट्ठी है वो बहरूपिया मन भी पढ़ सकते हैं बट स्पेलिंग एम ओ एन लिखी है उन्होंने। समस्त तीन तालियों को साधुवाद। ये चिट्ठी मैंने दो-तीन बार लिखने की कोशिश की लेकिन साझा ना हो पाई और मुझे लगता है कि अच्छा ही हुआ कि नहीं हुई। हर चीज का एक समय होता है और इसका समय अभी हुआ है। तो चिट्ठी वैसी ही है लेकिन इसमें कुछ एडिट्स या अपडेट किए हैं जो आपको बीच-बीच में समझ आ जाएंगे। इस चिट्ठी का दूसरा संस्करण पुणे में हुए आयोजन के बाद लिख रही हूं। ताऊ को चरण स्पर्श। डार्लिंग खांचा को जोर से कसकर आत्मीयता वाली झप्पी। दिल वाली कमीज में बिल्कुल गोविंदा जैसे जज रहे थे आप। सरदार यार तुमसे अलग से बात करनी है। हम शायद हम उम्र ही हैं। लेकिन एक तरफ तुम्हें देखती हूं जो कला, पॉलिटिक्स, लिटरेचर और स्थानीय जानकारियों से भरपूर है। और दूसरी तरफ खुद को देखती हूं जिसे अभी तक चाय में कितना पानी और कितना दूध होना चाहिए इसका अनुपात ठीक से समझ नहीं आया है। तो थोड़ी सी जलन तो होती है गुरु तुमसे लेकिन सरदार यार आप प्यार हो। आपसे ठहर कर गले लगना है। एडिट गले तो लग लिए बस सहजता के साथ पतियाना बाकी है। पुणे में साक्षात रूप से देखने पर पता चला कि तीन ताल को बनाने में कितने और लोगों की मेहनत लगती है। कितने लोग कैमरा टीम में साउंड टीम में अपना काम बखूबी कर रहे थे। शकील भाई, मानव, नितिन, जमशेद, अतुल तिवारी से मुलाकात हुई। यह सब शायद YouTube पर देखने से मुमकिन नहीं होता। अतुल तिवारी के कुछ लेख और कविताएं पढ़ी और मैं निकल ही नहीं पाई हूं अभी वहां से। आशा करती हूं कि वे यूं ही ब्लश ही आते रहें। मैं मूलत हरियाणा के फरीदाबाद जिले से हूं। तीनताल ने मेरे जीवन में कुछ महीनों पहले ही दस्तक दी। मेरे एक अनुज मित्र जिन्हें मैं आधुनिक जमाने में WhatsApp पर पत्र लिखती हूं और यह कार्यक्रम पिछले एक साल से सफलतापूक चल रहा है। इन पत्रों में शास्त्रीय संगीत, आर्ट, स्टॉक मार्केट, इमोशनल इंटेलिजेंस, थेरेपी, जिओपॉलिटिक्स, किताबें, दर्शन, थिएटर आदि विषयों पर चर्चा होती रहती है। हम लोग एक दूसरे को एक या दो हफ्तों में अलग-अलग टॉपिक्स पर पत्र लिखते हैं। यह पत्र हमेशा अंग्रेजी में रहते थे क्योंकि वह मित्र बेंगलुरु से हैं और जिस जगह पर कन्नड़ भाषा को निवार्य किया गया है वहां के लोग जब अचानक से हिंदी में आपको पत्र लिखें तो आप भी एक बार को सकपका जाते हैं कि सूरज आज कहां से उदय हुआ। उसी पत्र में तीन ताल का जिक्र हुआ और मुझे रेकमेंडेशन मिला कि यह पॉडकास्ट जरूर देखा जाए। इसी के साथ-साथ मेरे सहकर्मी ने यह पॉडकास्ट बहुत पिचिन करने की कोशिश की। बताया कि यहां की बिजार खबरें हमारे लंच टेबल का हिस्सा बनी और फिर उन्हीं सहकर्मी का यह कहना कि अरे तुम तो फरीदाबाद से हो। तुम्हें तो देखना चाहिए। उसके बाद उत्सुकता अवश मैं यहां आई ये जानने के लिए कि फरीदाबाद कब से टेबल टॉपिक्स में आने लगा। मेरे लिए इसे पडकास्ट कहना उचित नहीं होगा। मुझे यह ऐसा लगता है जैसे सर्दी की रातों में अलाव के आगे कुछ सयाने लोग बैठकर दुनियादारी की समझ अपने अनुजों में बांट रहे हो और जैसे ही चिंतन भरे विषयों में हम पहुंच जाते हैं ताऊ कह देते हैं कि चिलम की राख ठंडी हो गई है तनिक दोबारा भर लाओ। पुराणों में इसी को थेरेपटिक बुलट कहा गया है। अब जब अलाव के सहारे अलाव के आगे बैठे ही हैं। तो एक किस्सा जब मैं बहुत छोटी थी तब हमारे गांव में हर रविवार को एक बहरूपिया अलग-अलग भेस में आता था। कभी डाकिया बनकर, कभी रावण, कभी साधु बाबा, कभी सरकारी अफसर। गांव में ही रहता था वह। लेकिन कहां यह नहीं पता। उसकी अदाकारी की कमाल की बात यह थी कि मुझे कभी नहीं पता लग पाता था कि वही बहरूपिया है। उस समय एक रविवार से दूसरे रविवार के बीच इतना लंबा समय हुआ करता था कि आप सब कुछ भूल जाते थे कि अगले रविवार के लिए प्लान क्या है। इसलिए मैं हमेशा ही उसके अभिनय के बहकावे में आ जाती और कभी पहचान नहीं पाती कि ये जो मेरे सामने भाषण दे रहा है वो सुभाष चंद्र बोस नहीं है। मेरा भ्रम तब टूटता था जब वह अपनी अदाकारी के बदले कुछ गेहूं, आटा या चवन्नी ठन्नी मांगता था। मैंने उसे कभी यह कहते नहीं सुना कि उसे कितना चाहिए। वो बस यही बोलता था कि अपने-अपने घरों से जो भी बन पड़े ले आओ। मुझे नहीं पता कि वह 7 दिन में कैसे तो अलग-अलग कॉस्ट्यूम्स जुगाड़ पाता होगा। कैसे वह मेकअप करता होगा। कैसे वो एक दिन बिल्कुल फिट, तंदुरुस्त और अगले ही हफ्ते एकदम लचीला और मरियल सा आदमी बन के आ जाता था। वो पूरे गांव में, गली में चक्कर लगाता। एक कमाल की बात जो मैंने ध्यान दी वो यह कि हमारे मोहल्ले या कुब्बे के पास आकर ही वह गेहूं या अनाज की मांग करता। शायद वहां सभी जमींदार रहते थे इसलिए और जब वो दूसरे मोहल्ले जाता तो वहां फटे पुराने कपड़े शायद उससे अगले में टूटे फूटे बर्तन यह सब उसके किस काम के थे यह तो नहीं पता लेकिन रोजी रोटी उसकी यही थी। उसके अभिनय से मैं इतनी प्रभावित थी कि शायद भूले भट्ट के मैंने कभी कह दिया हो कि मुझे भी सीखना है यह। और वहीं पास खड़े चाचा ने उसी समय फटकारा कि यह नीच जाति का काम है। यह काम इन्हें ही शोभा देता है। खा कमा लेते हैं बेचारे इससे। मुझे लगा शायद अपने मन का काम करने की आजादी बस उसी लेवल पर मिलती होगी और मुझे उसके लायक नहीं समझा भगवान ने। मैंने उस बहरूपिए के लिए बहुत तालियां बजाई और मैंने उनसे कहा कि आप जो करते हैं वह बहुत उम्दा है। मुझे भी बताइए कैसे करते हैं यह। चाचा ने मुझे बीच में रोका और पीछे खींच लिया। वो बहरूपिया ज्यादा तो कुछ नहीं बोला लेकिन आशीर्वाद में बस मुझे यही बता कर गया कि इस कला में रियाज बहुत करना पड़ता है और यह हर किसी के बस की बात नहीं। मुस्कुराया और सामान उठाकर चला गया। यह किस्सा जीवन के हर पड़ाव पर मुझे याद आता रहता है और यही एहसास कराता रहता है कि हम सभी बहरूपिया ही हैं। कभी कुछ तो कभी कुछ बन जाते हैं। इस पत्र को पढ़ने और सुनने के लिए शुक्रिया। जय हो। आपकी नई तीन तालियां बहरूपिया मौन। बहुत धन्यवाद सुनने को मिला बैरुपिया हम तुमने देखे हैं नहीं मैंने देखे और यह सच है कि हमको आधुनिक संस्कृति ने हम या आधुनिक जिसको काम कहते हैं उसमें वो बंधन अब नहीं रहा हम कि जो काम हम कर रहे हैं वो कोई भी कर सकता है। हम पहले ये बंधन था उसके बहुत सारे रीजन थे हम कि काम के आधार पे जाति ियां बन गई। फिर जातियों के काम होने लगे हम और फिर कोई एक दूसरे के काम नहीं करते थे। वो धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे टूट रहा है। अब जो है इस कमरे में हर तरह के लोग हर तरह का काम कर सकते हैं। अब आज के दिनों में उसको थिएटर बोलते हैं। सभी बहू हां आर्टिस्ट।
अगली चिट्ठी है एक इंट्रोवर्ट की चिट्ठी। कोई
तुमसे पूछेगा कि उस साल 2025 में ऐसा क्या हुआ था कि वह साल अलग था। तब तुम उससे यह मत कहना कि ट्रंप के टेरिफ वॉर से दुनिया दहशत में थी। यह भी मत बोलना कि इतिहास की सबसे खराब गर्मी उसी साल पड़ी थी। यह तो बिल्कुल नहीं कि तुमने उस साल नौकरी बदली थी। उनको बस इतना बोल देना कि तीन ताल का एक सम्मेलन पुणे में हुआ था और भारत के अनेकानेक जगहों से लोग शामिल हुए थे। इतना बताकर रुकना मत। उनको यह भी बताना कि सब अपने खर्चे पर आए थे। जिसके लिए उन्होंने पैसे महीनों की जुगत से जुटाए होंगे। एक सिगरेट कम, एक चाय कम, एक घंटे अतिरिक्त काम या नई शर्ट को कुछ महीने का विराम।
और क्या आए थे वो लोग? ऐसे कि जब गले लगते तो लगता कि जैसे इनसे तो वर्षों से मिलते आ रहे हैं। जैसे हम तो अक्सर ही मिलते रहते थे। और उस दिन ताऊ का ऊंचा कद भी उस बच्चे को दूर नहीं रख पाया था। जो बिना मोबाइल, बिना आइसक्रीम या चॉकलेट के लोभ के भी उनके साथ चिपक कर ऐसे फोटो खिंचवा रही थी जैसे वो उनसे हर दिन मिलती रही हो। सरदार उस दिन देर रात तक टुकुर को सुलाने के लिए नहीं जगा था। वो तो ऐसे मुस्कुराए जा रहा था जैसे उसने अपने दोस्तों को कई सालों बाद पाया हो। खानचा की शर्ट पर दिल कम पड़ गए थे। उस बात को जाहिर करने के लिए कि मोहब्बत सिर्फ लोग उनसे नहीं करते बल्कि वह भी सबसे दुगनी करते थे। अतुल के पास जब वह लड़का एक किताब पर कुछ संदेश लिखवाने आया था तो वह लिखते लिखते रुक गया था। भूलना मत कभी इस पल को। मोबाइल से नहीं आंखों में कैद कर लो इस प्रेम को। क्या पता कल हो ना हो।
दूर से निहारता नितिन समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्या पागलपन है जो तीन तालियों को ऐसे मददोश किए हुए है। वो दिन खास था। वह जज्बात खास थे, खास थी उस दिन की रात जो नशे के बावजूद आखिरी पलों तक जवान थी। जब कोई तुमसे पूछेगा कि क्या पाए थे उस साल तो बोल देना कि उस साल मानवता और प्रेम के जिंदा होने पर शक नहीं हुआ था तुम्हें। ऐसा कि हर कोई अपने घर के रास्ते किसी ना किसी अनजान को ऐसे छोड़ने जा रहा था जैसे उसी दिन उसी पल के लिए उसने गाड़ी चलानी सीखी थी। बताना कि पुणे में लड़कियां भी उस रात अनजान लोगों से लिफ्ट मांगते हुए घबराई नहीं थी। प्रेम का ऐसा इजहार किसी नेता किसी अभिनेता के लिए नहीं था। वह एक दूसरे के लिए था। जहां तुम स्टार्टर एक के साथ मेन कोर्स दूसरे के साथ डेजर्ट तीसरे के साथ शेयर कर रहे थे। तुम्हारे लिए पानी वो अनजान व्यक्ति ला रहा था जिससे तुम पहली बार उस दिन मिले थे। क्या तुम बताओगे कि उस दिन तुम्हें एक बहन ने अपने हाथों से बनाए समोसे खिलाने का वादा किया था जिससे तुम पहली बार मिल रहे थे? क्या तुम्हें बताने में संकोच होगा कि वह औरत बेंगलुरु से सिर्फ तुमसे मिलने आई थी। जिसे अभी कुछ दिन पहले ही डॉक्टरों ने कहीं घूमने फिरने से मना किया था। फोटो और मीम के दौर में उस दिन कुछ ऐसा घटित हुआ था जिसे तुमने पहली बार मोबाइल में कैद नहीं किया था। तुम उस दिन दोनों हाथ ऐसे खोलकर घूम रहे थे मानो बटोर लेना चाहते थे तुम उस मोहब्बत को जिसकी नुमाइश लगी थी उस लॉन में। तुम बताना तो बहुत कुछ चाहोगे पर शायद शब्द कम पड़ जाए या फिर तुम स्वार्थी हो चुकेगे शबरी की तरह जो अपने झूठे बेर अपने आंचल में बांधे बाट जो रही थी अपने राम का। तुम नहीं चाहोगे कि तुम बता के बोल के जाहिर कर दो अपने अनुभवों को।
उस साल पुणे में मराठी को ही नहीं हिंदी को भी सेलिब्रेट किया गया था। उस साल तुम सिर्फ अपने परिजनों के लिए नहीं कमाए थे। उस साल तुमने अभिषेक शर्मा की विस्फोटक पारी को सिर्फ इसलिए जाने दिया था कि तुम अनजान लोगों से घिरे उन्हें जानने समझने में लगे थे। उस साल तीन ताल का एक सम्मेलन हुआ था पुणे में जिसे तुमने सफल बनाया था। एक थ्रू वाइट बाप रे सबसे बढ़िया आदमी ये वर्णन एक घटना है हम यस और कितना मैं भी सोच रहा था कि अगर कोई पूछेगा तो मैंने तरह-तरह की चीजें बताई है लोगों को पर ऐसे क्या बात है इंट्रोवर्ट भाई का शिल्प जो है ना बहुत ही बहुत जबरदस्त है यार और उनसे मिलने का मौ मौका मिला अपन को। हां, अपन सिर्फ इंट्रोवर्ट के नाम से जानते थे हम और मैं अभी भी इंट्रोवर्ट के नाम से ही जानता हूं। हम और मैं इस बात से खुश हूं कि मैं उन्हें इंट्रोवर्ट के नाम से जानता हूं। हम वो हैं वैसे उनसे मैं मिला वो बहुत कम बोलते हैं। क्या ही लिख दिया? हम बहुत ही शानदार। ये जो है अब फाइनल डिस्क्रिप्शन है। हम पुणे में क्या हुआ था? हम 2025 में तो बहुत कुछ हुआ था और हो रहा है और होगा पर यह जो हुआ जो कुछ भी हुआ था द फीलिंग इज म्यूचुअल आग बराबर की लगी हुई थी दोनों तरफ से शानदार था यार वो अगली चिट्ठी है भूवी भा की भूवी भा हां मतलब यानी भूवी बहन की नहीं है ना भूवी बहन ही नहीं पता नहीं आई डोंट नो भूवी भा लिखा है ताऊ को पांव छुई सरदार को कान से कान सटाकर पेट से पटाकर वाली झप्पी खानचा को लव यू सभी तीन तालियों को जय हो जी हां मैं वही पानी की टंकी भूवी भा अहमदाबाद से हां दिनांक 13 अप्रैल को मैं तो पुणे से निकल आया लेकिन शायद मन वहीं पुणे में सेकंड लाइन में पहली सीट पर बैठा रह गया।
इतने दिनों बाद काम करते हुए लैपटॉप पर एकाएक वही दृश्य आंखों के सामने आ जाता है जब अतुल भाई स्टेज पर बोल रहे थे और मैं चुपके से ताऊ को देख रहा था और ताऊ दोनों हाथों हाथ जोड़े इत्मीनान से अतुल भाई की बातें सुन रहे हैं। एंड इन दैट मोमेंट ऑफ टाइम यह लगा कि धरती पर आना सुखद है और तीन तालियां होना परम सुखद। कि कैसे एक आदमी जिसका पूरा जीवन डेमोक्रेसी के चौथे स्तंभ से सट कर निकला और डेजिग्नेशन में सबसे ऊपर होने के बावजूद किसी भक्त की तरह अपने से शायद आधी उम्र के नौजवान को इत्मीनान से सुन रहा है। 100वें एपिसोड के लिए दादर से पुणे की ट्रेन के जनरल डिब्बे में चढ़ा तो लगा कि इधर निपट जाएगा अपुन। लेकिन फिर अपनी कुंजी निकाली और सीजन 2 के बैकलग वाले एपिसोड सुनते-सुनते 4 घंटे खड़े रहना पता नहीं चला। हालांकि खड़े-खड़े एक चिट्ठी लिखी वो जब दिल्ली आऊंगा तो आप लोगों को दूंगा। पुणे से आया तो मैनेजर साहब पूछने लगे कि घूम आए पुणे तो उनको कहा कि हां मेरे रिश्तेदार की शादी थी। गया और मजाक किया। तभी ऊपर से भोलेनाथ ने देखा और मुंडी हिलाकर स्माइल पास की क्योंकि उसमें झूठ तो कुछ था भी नहीं। एक पडकास्ट के लिए पूरे भारत और बाहर देश से सभी लोग आए। सुनने या किसी को बताना और उसको समझा पाना बहुत ही मुश्किल है। लेकिन बात यह है कि तीन ताल और उसके लोगों को इतना खास क्या बनाता है? तो जवाब होगा कि तीन ताल का कुछ अलग ना करना ही उसको खास बनाता है। क्योंकि आइडियल जिंदगी विदाउट रिग्रेट्स सिंग ऑन अ स्टूल लिसनिंग टू अजीज मियां इन अ कॉर्नर प्लॉट अलोंग साइड योर बंदर। अंत में जैसे कि मेरी मां कहती है कि ये लोग कितना बोलते हैं थकते नहीं। लेकिन बोलते अच्छा है। चिट्ठी लंबी हुई हो तो माफी। आपका अपना भेड़ू पानी की टंकी भूवी भा। गदर गदर लिखते हैं यार। इमोशनल कर देते हैं। टंकी भरा हुआ था। बहुत-बहुत शुक्रिया। आर्द्र कर दिया आपने। है ना? हां। हां। अगली चिट्ठी है पाइरेटेड गालिब मेरठ वालों की। दिल्ली वाले तो ओरिजिनल है। ताऊ खान सरदार।
गालिब की शराब आती थी मेरठ से। हां हम ब्रांड था। अंजीन पीते थे ना वो तो उस समय कंटेनमेंट वहां था वो रहते थे यहां तो उनके लिए स्पेशल आदि थी आधे मुसलमानों के लिए हमेशा से व्यवस्था रही है ताऊ खान सरदार सभी को नमस्कार वाला एपिसोड बहुत बढ़िया लगा मन खुश हुआ सबका सौहार्द देख के पर कश्मीर वाली जगह हटना ने पिछले कई दिनों से दिमाग में हलचल मचाई हुई है पिछले एपिसोड में खानचा की बात सुनकर के दिल और सहम गया जब उन्होंने बोला कि किसी बच्चे के सामने उसके उसके पिता को बेवजह मार दिया जाए तो क्या उसके दिमाग से यह बात जीवन भर निकल पाएगी? मैंने सुना और सन्न्य रह गया। सो नहीं पाया रात में। जो हथियार उठाकर निर्दोषों का जीवन छीन लेते हैं। नफरत हिंसा के नाम पर अपने आप को किसी धर्म का अनुयाई कहते हैं, वह लोग वास्तव में ना तो धर्म को जानते हैं ना इंसानियत को। उन्होंने अपने पवित्र ग्रंथों की आत्माओं को कभी समझा ही नहीं। किसी भी तरह किसी को चोट पहुंचाना या आहत करना या अपने आप या अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने के लिए वह कम से कम धर्म या पुण्य पथ तो नहीं है। यह केवल एक सोच है जो धर्म के नाम पर चुनिंदा युवकों के दिमाग में शायद उनके भौतिक अभाव को पूरा करने के बदले से भरा गया हो। ऐसे विचार वाले व्यक्तियों को किसी भी धर्म से मैं अलग करता हूं। मैं तीन ताल से अपील करता हूं। उसके माध्यम से अपील करता हूं कि इन आतंकियों का उद्देश्य हमें बांटना है। केवल इसलिए भी हमें यह प्रण लेना होगा कि हम किसी धर्म विशेष को नफरत से नहीं देखेंगे और ना ही किसी धर्म के आधार पर शक करेंगे। अपने परिवार और अपने देश के लिए काम करेंगे। अपनी उन्नति की ओर ध्यान देंगे। बाकी बातें फिर कभी अभी के लिए नमस्कार। पाइरेटेड गालिब मेरठ वाले परेटेड गालिब मैं तो हालांकि मेरे विचार में धर्म मानने वाले नहीं धर्म में प्रॉब्लम है और अपने को थोड़ा सा इंसानों की इज्जत ज्यादा करनी चाहिए धर्मों की इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है उसके बाद फिर धर्मों की कम तो अगली चिट्ठी आई है सोनभद्र की हसीन वादियों से डॉक्टर राकेश शर्मा हिंडालको अस्पताल में चीफ सर्जन के पद पर कार्यरत जिनसे हमारी जो पहले भी चिट्ठी का आदानप्रदान हो चुका है और बात भी हुई थी और इनसे रेगुलर हमारी बात मेरी वैसे भी होती रहती है और बहुत इन्होंने कहा है कि 100वें एपिसोड में नहीं आ पाए उसका उन्हें अफसोस है। इन्होंने यह भी कहा है कि इस प्रोग्राम ने लोगों के दिलों को जोड़ दिया है। इनका एक शौक एकल भ्रमण बाइक राइडिंग भी है। खानचा को उनकी धरती के छाए चित्र भी ये भेजते रहते हैं। दिल्ली आकर के मिलना चाहते हैं। सभी तीन तालियों को जय हो। आइए आइए। आइए। आइए। आइए। थैंक यू सो मच जी।
अगली चिट्ठी है और ये भी एक डॉक्टर साहब की है। उनका नाम है खानाबोश। आदरणीय ताऊ को प्रणाम। सरदार को उसने डार्लिंग खानचा को पप्पी एवं झप्पी पढ़ाई और काम के सिलसिले में घाट घाट का पानी पिया है। इसलिए अपना नाम खानाबदोश रख लिया। पेशे से एक मेडिकलली ट्रेंड कारपेंटर यानी ऑर्थोपेडिक सर्जन हूं। बहुत माफी चाहता हूं। ये मैंने मैंने एक दिन तीन ताल में बोल दिया था। बचपन ताडोबा नेशनल पार्क के पास बीता है। खान साहब जानते होंगे। इन दिनों हरियाणा की रणभूमि में बैठकर रागिनी सुन रहा हूं। किस्सा बचपन का। गांव मेरा चंबल के भेड़ों में है। बात तब की है जब मैं पांचवी कक्षा में था। बुआ की शादी थी। पूरा खानदान एकत्रित हुआ था। सबसे बड़ी समस्या वहां शौच की थी। बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं कब पंव फटने से पहले फट कर आ जाते थे पता नहीं चलता था। भीड़ इतनी थी कि घर के आसपास कहीं भी प्राइवेसी नहीं मिलती। मेरे हम उम्र चचेरे भाई तो यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां-कहां बैठ जाते थे। लेकिन हम तो शहर वाले थे इसलिए सोशल डिग्निटी का ख्याल रखना पड़ता था। कई बार तो दो-दो दिन गुजरे। घर में एक कमरा था जो बीच आंगन के पास था। उसे महिलाओं के लिए टेंपरेरी बाथरूम बना दिया गया था। एक दिन जब महिला संगीत और गारी गाई जा रही थी। अपना प्रेशर काबू से बाहर हो गया। मैंने सोचा क्यों ना बाथरूम में रखे पुराने खाली मटके का इस्तेमाल किया। पॉट और पॉटी का कुछ तो नाता होगा। मेरी नजरें मिली उस मटके से। मटके ने मुझे विरोध भरी नजरों से देखा। नहीं मैंने उससे पूछा हे मटकेश जीवन भर तूने लोगों को दिया बदले में तुझे क्या मिला मैं आज तुझे कुछ देना चाहता हूं मटका मौन रहा मौनम स्वीकृति लक्षणम खैर मटके के कंसेंट के बिना अपन मटकासन पर विराजमान हुए और बाहर से आ रहे संगीत का आनंद लेने लगे संगीत में गाई जा रही गारियों की आवाज गूंजकर मटके मटके से आने लगी। मैं हल्का हो रहा था। मटका भारी बहुत कुंभ राशि में ग्रहण लग रहा था। कहा यार काम निपटाकर मैंने नहा धोकर मासूमियत से बच्चों के साथ में खेलने लगा जैसे कुछ हुआ ही ना हो। अब घर के बड़े बुजुर्गों की आदत होती है कि वे अपने ही घर में 247 खोजी अभियान में लगे रहते हैं और कुछ ना कुछ खोजते रहते हैं। आई नो वेयर इट इज गोइंग। हाथ दादी उसी परंपरा का पालन करते हुए बाथरूम में गई और अचानक एक जोरदार चीख निकली जैसे उन्हें इंद्रधनुष के अंतिम छोर पर सोने से भरा एक घड़ा मिल गया हो। महिलाएं जो गा रही थी चुप हो गई। सन्नाटा पसर गया। दादी मटका उठा के बाहर आ गई। फिर हमारे सबसे छोटे चाचा जो अब तक महिला संगीत का छुपकर आनंद ले रहे थे सामने आए। क्योंकि वे सुरेंद्र मोहन पाठक के बड़े फैन थे। उन्होंने केस अपने हाथ में लिया मटके को नहीं। सारे बच्चों को एक लाइन में खड़ा कर दिया गया। मैं और मेरा बड़ा भाई शहरवासी होने के कारण बाइज्जत बरी हो गए। बाकी चचेरे भाई जो यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां-कहां की कैटेगरी में आते थे उन्हें भी शक के दायरे से बाहर कर दिया। अंत में गाज गिरी मेरी मंझली चाची के चचेरे भाई रिंकू पर जो मेरे हम उम्र होने के साथ रिश्ते में मामा भी हैं। सबूतों के अभाव और बिना किसी गवाह के बयानात रिंकू मामा दोषी ठहराए गए। मजली चाची बहुत नाराज हुई। दृश्यम के विजय सलगांवकर की तरह मैंने सोचा था कि यह राज हमेशा के लिए मेरे साथ चला जाएगा। लेकिन थप्पड़ से डर नहीं लगता। प्यार से लगता है तीन ताल के प्यार ने सब उगलवा लिया। मुद्दे की बात यह है रिंकू मामा इस वक्त मध्य प्रदेश पुलिस में इंस्पेक्टर हैं। और तीन ताल की लोकप्रियता जिस रफ्तार से बढ़ रही है, हो सकता है उनके कानों तक भी पहुंचे। बहुत बढ़िया। और जल्दी ही मुझे एक और पत्र लिखना पड़े। पत्र पढ़ने के लिए सरदार का बहुत-बहुत धन्यवाद। खूब जमेगा रंग जब मिल बैठेंगे चार यार। खांचा मैं पीर बाबा का दम किया हुआ पानी और 90ज के गाने खानाबदोश बहुत ही बढ़िया। आंसू निकाल लिया हंसते-हंसते यार। हमने इतना दिया तुझे जी। समाज ने क्या दिया? बहुत ही बढ़िया था। मैं हल्का हो रहा था और मटका भारी। मटका भारी। ये अभी हमने कुछ देर पहले बोला था कि वो वर्णन नहीं है। है ये तो घंट ये तो मुझे ये डर था किसी ने हाथ तो नहीं डाल दिया अंदर ठीक करने के लिए अक्सर मटों में राशन भी रखे जाते थे घरों में चावल खो जाते लगा बाथरूम के ऊपर हाथ डाल दिए अद्भुत खाना मनोज भाई बहुत खूबसूरत बहुत खूबसूरत वर्णन किया है आपने अब हम लोग जो है खाना नहीं खा पाएंगे नहीं मैं तो खाऊंगा लेकिन अच्छी बात है कि एंड में हम हंसते हुए जा रहे पूरी एनर्जी इन्होंने वापस दे दी बहुत-बहुत शुक्रिया तो आपकी चिट्ठियों का शुक्रिया। बहुत सारी चिट्ठियां और नहीं रह नहीं ले पाए हैं।
पर हम आज की बातचीत लंबी हो गई है। यूं भी जो चिट्ठियां बच गई वो अगले एपिसोड में चिट्ठियां लिखनी है radioj.com पर radioj.com पर और अगर आप छोटी-छोटी चिट्ठियां छोटे-छोटे कमेंट या पिछ इस किसी एपिसोडिक मसले पे आप कोई कमेंट करना चाहते हैं छोटा तो वो बहुत अच्छा तरीका है YouTube पे कमेंट करने का। उससे ये होता है कि एक तो ज्यादा कमेंट होते हैं तो रीच भी बढ़ती है। दूसरी बात ये कि आप हाल तुरंत ही वो हाल लगा तुरंत कर पाते हैं और आजकल इंतजार कौन करता है? इंतहा हो गई है। यहां तो लोग बेचैन है कि पाकिस्तान पे हमला कब कर रहे हैं। इतना देर क्यों करिए? वहीं पर लिख मारिए कुछ ना कुछ। और अपने दोस्तों से, अपने परिवार वालों से और रिंकू मामा से अगर कोई जानते हो तो जरूर शेयर कीजिए ये एपिसोड। हां। है ना? रिंकू मामा मजा आएगा सुन के। पुरानी आदतें ताजा हो जाएंगी। हम और जिन्होंने सब में तो मैं कभी बोला नहीं पर मैं बोल रहा हूं। मतलब बोला हूं एक दो बार सब्सक्राइब क्या बोलते हैं उसको? लाइक सब्सक्राइब लाइक सब्सक्राइब हां जो भी है वो करें एंड शेयर और नोटिफिकेशन का वो बोलते हैं। बेल आइकॉन बेल बेल आइकॉन दबाएं। हां अभी कितना हो गया अपना? दो के ऊपर तो हां ढाई हो गए। तीन चाहिए अब। हम मैं हर बार एक-एक मांग मांग करके खानचा डार्लिंग आदमी है। खानसा को मिल जाएगा। खानचा मांगेंगे तो अभी 2 नंबर भी है ना कोई? 99532303 अच्छा वो तो WhatsApp भी कर सकते हैं। हां 99532303 हां ऑडियो चिट्ठी भैया एक तो ये है कि अतुल भाई थोड़ा देखें कि कई बार लोग ये कहते हैं कि WhatsApp पे कर देते हैं बट शायद फोन आपका बंद हो जाता है बीच-बीच में कभी-कभी बैटरी चार्ज ना होने की वजह से। तो हो सकता है ऑडियो चिट्ठियां आती हो और हम देख ना पाते हो। ऐसा बहुत संभव है। आप बहुत काम रहते हैं तो उसको और थोड़ा अपन ध्यान से देखेंगे। बट मैं तो radio aaj.com पर ही आप ऑडियो वॉइस नोट भी भेज सकते हो। अगर वो अटैच है उसमें मेल पे अटैच कर दो तो वहां सीधे उसमें क्या है कि वो मैं भी देख पाता हूं। मेल पे आता है। वो कई लोगों के पास एक्सेस है। तो तुरंत उसको देख तो एक ही आदमी के पास बस ये है। तो भेजिए और इस एपिसोड में जो बातचीत हुई जो इसके पहले प्रत्युष से बात हुई अ छोटे शहरों के लड़कों की हिचक पर और उसके पहले कश्मीर पाकिस्तान पर और अंत में जो बेजार खबरें और चिट्ठियां हुई जो भी आपके इस जो भी किस्से आपको याद आते हो संक्रमण की तरह उनको लिख डालिए। अगले एपिसोड में फिर मिलते हैं। जय हो जय हो जय हो।