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बौद्ध और जैन धर्म Full Revision -Buddha & Mahavir | UPSSSC Lower PCS | RO ARO | PCS 2026 | PET | SSC

Quick Revision Classes29:35

Transcription

नमस्कार, जय हिंद, वंदे मातरम!

प्यारे बच्चों, आज के इस विशेष सेशन में आपका स्वागत है। आज हम कंप्लीट करने वाले हैं बौद्ध धर्म और जैन धर्म। आज का जो कंटेंट है, आपका यूपीपीसीएस लेवल का है। इसके द्वारा आपका लोअर पीसीएस भी तैयार होगा, आरओ एआरओ भी तैयार होगा, यूपीपीसीएस का प्री भी तैयार होगा। इसके अलावा, जो पीईटी में आपका ये सिलेबस का हिस्सा है और हर परीक्षा में लगभग एक से दो प्रश्न आपको इन दोनों धर्म से जुड़े हुए देखने को मिलते हैं। तो इनकी तैयारी आज कंप्लीट हो जाएगी।

वीडियो को लाइक कर लीजिएगा। चैनल पर नए हैं, चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिएगा, क्योंकि प्रश्न यहीं से आएगा। पढ़ते रहेंगे आप मेरे साथ, तो आपको यकीन आएगा। रही बात आज के इस सेशन की पीडीएफ की, तो जितने भी संबंधित बैच हैं, वहां पर ये पीडीएफ उपलब्ध करवा दी जाएगी। अगर आप भी हमारे साथ जुड़ना चाहते हैं, तो स्क्रीन पर आपको WhatsApp नंबर दिख रहा होगा। वहां पर मैसेज करिए और आपको हम पूरा कंटेंट उपलब्ध कराएंगे, बहुत ही विधिवत तरीके से।

आपका टॉपिक स्टार्ट करने से पहले, हम बात करने वाले हैं यूपी ट्रिपल एससी पीईटी एग्जाम की बेस्ट बुक के बारे में, जो चच्चू प्रकाशन की है। इस बुक का टाइटल है "संपूर्ण गाइड" और यहां पर आपको 2200 से अधिक एमसीक्यूस मिलने वाले हैं। सभी टॉपिक्स का सिलेबस के अनुसार कंटेंट मिलने वाला है और चार साल्व पेपर भी मिलने वाले हैं पीटी के। यहां पर सबसे पहले आपको पूरा सिलेबस दिया गया है और फिर सिलेबस के अनुसार पूरा कंटेंट दिया गया है। आप देख सकते हैं, भारतीय इतिहास के कंटेंट में सिंधु सभ्यता के प्रथम स्थल, उत्खननकर्ता, खोजकर्ता, वर्ष, नदी। इसी प्रकार बौद्ध धर्म की सारी जानकारी, बौद्ध सभाओं के बारे में, सभा, समय, स्थान, अध्यक्ष, राजा जैसे प्रश्न परीक्षा में पूछे जाते हैं, उसी प्रकार से आपको टेबल बनाकर पॉइंट वाइज तरीके से सुव्यवस्थित नोट्स उपलब्ध कराए गए हैं। चक्षु प्रकाशन की "संपूर्ण गाइड" के अलावा, यूपी ट्रिपल एससी पीईटी के लिए प्रैक्टिस सेट भी आते हैं। अगर आप इन किताबों को लेना चाहते हैं, तो डिस्क्रिप्शन बॉक्स में आपको लिंक मिल जाएगा, या फिर आप नजदीकी बुक स्टॉल से जाकर भी यह किताबें ले सकते हैं।

तो, अभी हम बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म को कंप्लीट करेंगे। शुरुआत करते हैं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल जो था, वो धार्मिक और सामाजिक सुधारों का युग था, जिसे श्रवण परंपरा, तपस्वी संप्रदाय का उदय काल माना जाता है। उत्तर वैदिक काल में लौह तकनीकी के विकास से कृषि में क्रांति ला दी, जिससे अधिशेष उत्पादन हुआ, यानी कि सरप्लस प्रोडक्शन हुआ। जितनी आवश्यकता थी, उससे अधिक कृषि उत्पादन हुआ। कृषि अधिशेष और व्यापारिक प्रगति के परिणाम स्वरूप, भारत में द्वितीय नगरीकरण की शुरुआत हुई। प्रथम हड़प्पा सभ्यता थी। इस समय 16 महाजनपदों का उदय हुआ, जिसकी जानकारी बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र से मिलती है।

समाज में वैदिक कर्मकांडों, पशुबलि और जाति व्यवस्था की जटिलता के कारण, आम जनता में असंतोष व्याप्त था। वैदिक कर्मकांडों में बड़े पैमाने पर पशुबलि दी जाने लगी थी, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा था। अतः नए धर्मों ने अहिंसा पर बल दिया। वैदिक धर्म की भाषा संस्कृत थी, जो आम जन की समझ से बाहर थी, जबकि नए धर्मों ने प्राकृत और पाली लोक भाषा को अपनाया। नए धर्मों के उदय का मुख्य आर्थिक कारण सिक्कों का प्रचलन और वैश्य वर्ग का समाज में सम्मान पाना था, यानी कि व्यापारियों का समाज में सम्मान पाना। जैन और बौद्ध धर्म के अलावा, इस समय आजीवक संप्रदाय भी लोकप्रिय हुआ, जिसके संस्थापक मक्खली गोशाल थे। यह नियतिवाद पर आधारित था। छठी सदी ईसा पूर्व में कुल 62 धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ, जिनमें बौद्ध और जैन धर्म सबसे प्रमुख बनकर उभरे। बुद्ध काल के प्रमुख गणराज्यों की संख्या 10 थी, जिनमें वैशाली के लक्ष्मी सबसे शक्तिशाली थे। प्राचीन भारत में नास्तिक संप्रदाय वे थे, जो वेदों की प्रमाणिकता को नहीं मानते थे। बौद्ध, जैन, चारवाक आदि इनमें प्रमुख थे।

अब हम बात करेंगे बौद्ध धर्म की और शुरुआत करते हैं गौतम बुद्ध के जीवन परिचय से।

गौतम [नाक से की जाने वाली आवाज़] बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में हुआ था। वर्तमान नाम जो है, इसका रोमन देई है और यह नेपाल में स्थित है। इनके पिता का नाम शुद्धोधन था, जो शाक्य गणराज्य के प्रधान थे। इसलिए बुद्ध को शाक्य मुनि कहा जाता है। इनकी माता महामाया कोलिय वंश का निधन बुद्ध के जन्म के सातवें दिन हो गया। अतः पालन पोषण मौसमी प्रजापति गौतमी ने किया। बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। 16 वर्ष की आयु में इनका विवाह यशोधरा बिमबा गोपा से हुआ। बुद्ध के पुत्र का नाम राहुल था, जिसका अर्थ है एक और बंधन।

सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु की सैर के दौरान चार दृश्य देखे: एक बूढ़ा व्यक्ति, दूसरा बीमार व्यक्ति, तीसरा सब (यानी कि अर्थी) और चौथा प्रसन्न सन्यासी। 29 वर्ष की आयु में सत्य की खोज में गृह त्याग किया और बौद्ध ग्रंथों में इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा गया। तो महात्मा बुद्ध ने क्या किया कि 29 वर्ष की आयु में सत्य की खोज के लिए गृह त्याग दिया और बौद्ध ग्रंथों में इसे महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। बुद्ध के सारथी का नाम चन्ना और उनके प्रिय घोड़े का नाम कंथक था। गृह त्याग के बाद उनके पहले गुरु आलार कलाम बने, सांख्य दर्शन के आचार्य थे और दूसरे गुरु रुद्रक राम पुत्र बने।

छह वर्ष की कठिन तपस्या के बाद, 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति का स्थान बोधगया, बिहार है। नदी निरंजना (फलगू नदी जिसको कहते हैं) और वृक्ष था पीपल (जिसे बोधी वृक्ष कहा गया)। ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध प्रकाशवान, जागृत और तथागत कहलाए।

बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषि पत्तनम, मृगदाव) में पांच ब्राह्मण सन्यासियों को दिया। इसे धर्म चक्र प्रवर्तन कहा गया। बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी श्रावस्ती में दिए थे। अक्सर परीक्षा में पूछा जाता है। 483 ईसा पूर्व, 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर (मलों की राजधानी) में बुद्ध का निधन हुआ, जिसे महापरिनिर्वाण कहते हैं।

बुद्ध को एशिया का ज्योतिर्पुंज कहा जाता है, एडविन अर्नोल्ड की पुस्तक के आधार पर। और परीक्षाओं में अक्सर यह पूछ लिया जाता है कि एशिया का ज्योतिरपुंज किसे कहा जाता है? तो महात्मा बुद्ध को बुद्ध को कहा जाता है और एडविन अर्नोल्ड की पुस्तक के आधार पर यह कहा जाता है।

बुद्ध के जीवन के प्रतीकों की ट्रिक की अगर बात करें, तो कमल-सांड (जन्म), घोड़ा (गृहत्याग), पीपल (ज्ञान), पद चिन्ह (निर्वाण), और स्तूप (मृत्यु)।

बौद्ध दर्शन एवं सिद्धांत की अगर बात करें, तो बौद्ध धर्म का मूल आधार चार आर्य सत्य हैं (Four Noble Truths)। चार आर्य सत्यों में दुख, दुख समुदाय (यानी कि दुख का कारण है), दुख निरोध और दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा (यानी कि दुख निर्वाण का मार्ग है, दुख निवारण का मार्ग है)। ठीक है? तो, यानी कि कारण दुख है, उसका दुख समुदाय (यानी कि दुख का कारण है), और दुख निरोध और दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा (यानी कि दुख निवारण का मार्ग है)।

दुख के कारण तृष्णा को समाप्त करने के लिए, बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया। अष्टांगिक मार्ग के अंतर्गत सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि आते हैं। बुद्ध ने अत्यधिक विलासिता और अत्यधिक तपस्या दोनों का विरोध किया और मध्यम मार्ग अपनाने की सलाह दी।

बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं: बुद्ध, धम्म और संघ। बौद्ध दर्शन में प्रत्यित समुत्पाद (कार्य-कारण सिद्धांत) बहुत महत्वपूर्ण है। अर्थ है: इसके होने से वह होता है। बौद्ध धर्म अनात्मवादी था, अर्थात यह आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता, लेकिन यह पुनर्जन्म में विश्वास करता है। पुनर्जन्म आत्मा का नहीं, बल्कि अहंकार, चेतना, कर्म फल का होता है। कर्म सिद्धांत की बात करें, तो बौद्ध धर्म कर्म प्रधान है। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही फल भोगता है।

बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना है। निर्माण का अर्थ है दीपक का बुझ जाना, अर्थात जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना। नैतिक जीवन व्यतीत करने के लिए, बुद्ध ने दशील (यानी कि 10 आचरण) का उपदेश दिया। गृहस्थ बौद्धों के लिए केवल पंचशील (हिंसा ना करना, चोरी ना करना, व्यभिचार ना करना, झूठ ना बोलना, नशा ना करना) का पालन अनिवार्य था। बौद्ध धर्म में क्षणिकवाद का सिद्धांत है, अर्थात संसार में सब कुछ परिवर्तनशील और नश्वर है। बौद्ध दर्शन के प्रमुख मानवीय मूल्य: करुणा, मैत्री और अहिंसा हैं।

अब हम बात कर लेते हैं बौद्ध संघ एवं साहित्य की।

बौद्ध भिक्षुओं के संगठन को संघ कहा जाता था। संघ की कार्यप्रणाली गणतांत्रिक प्रणाली पर आधारित थी। संघ में प्रवेश करने को उपसंपदा कहा जाता था और प्रवेश की न्यूनतम आयु 15 वर्ष थी। बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर, महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमति वैशाली में दी गई। संघ में शामिल होने वाली प्रथम भिक्षुणी प्रजापति गौतमी थी, जो बुद्ध की मौसी थी और बुद्ध की सौतेली मां भी थी। ठीक है? ये इंपॉर्टेंट है, याद रखिएगा। संघ में शामिल होने वाली प्रथम भिक्षुणी प्रजापति गौतमी थी।

प्रारंभिक बौद्ध साहित्य पाली भाषा में लिखे गए, जिन्हें त्रिपिटक कहा जाता है। पिटक यानी कि टोकरी।

* **विनय पिटक:** इसमें बौद्ध संघ के नियम और अनुशासन का वर्णन है। उपाली द्वारा यह संकलित है।

* **सुत्त पिटक:** इसमें बुद्ध के धार्मिक उपदेशों का संग्रह है और यह आनंद द्वारा संकलित है। इसे बौद्ध धर्म का एनसाइक्लोपीडिया कहते हैं।

* **अभिधम्म पिटक:** इसमें बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों की व्याख्या है। मोगलीपुत्र तिस द्वारा यह संकलित है।

जातक कथाएं बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियों का संग्रह है। इनकी संख्या 550 से अधिक है। सुत्त पिटक का यह भाग है। धम्मपद की बात करें, तो इसे बौद्ध धर्म की गीता कहा जाता है। यह भी सुत्त पिटक का अंग है। मिलिंद पन्नो: इसमें हिंद यवन शासक मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद है। दीप वंश और महावंश: ये श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथ हैं, जिनसे अशोक के समय के बौद्ध धर्म की जानकारी मिलती है।

अब बात करते हैं बौद्ध संगीतियों की। बहुत इंपॉर्टेंट है।

| संगीति | स्थान | राजा | अध्यक्ष |

| :----- | :------------ | :----------- | :------------ |

| प्रथम | राजगृह | आजाद शत्रु | महाकश्यप |

| द्वितीय | वैशाली | कालाशोक | सभाकामी |

| तृतीय | पाटलिपुत्र | अशोक | मोगली पुत्र तिस |

| चतुर्थ | कुंडलवन कश्मीर | कनिष्क | वशुमित्र |

प्रथम बौद्ध संगीति 483 बीसी में राजगृह (शब्दपर्णी गुफा) में हुई। अजात शत्रु हर्यक वंश का शासक था। अध्यक्ष उस समय महाकश्यप था। द्वितीय बौद्ध संगीति 383 बीसी में वैशाली में होती है। कालाशोक शासन करता है और यह शिशुनाग वंश का होता है। सबाकामी इसका अध्यक्ष होता है। तृतीय बौद्ध संगीति 250 बीसी में होती है, पाटलिपुत्र में और अशोक मौर्य वंश का शासक होता है। मुगली पुत्र तिस इसकी अध्यक्षता करता है। चतुर्थ बौद्ध संगीति जो फर्स्ट सेंचुरी एडी में होती है, कुंडलवन कश्मीर में। कनिष्क कुषाण वंश का शासक होता है और वशुमित्र उपाध्यक्ष होते हैं। वशुमित्र इसके अध्यक्ष होते हैं और उपाध्यक्ष अश्वघोष को नियुक्त किया जाता है।

* **प्रथम संगीति का निर्णय:** बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन विनय पिटक और सुत्त पिटक में किया गया।

* **द्वितीय संगीति का निर्णय:** मतभेदों के कारण बौद्ध संघ दो भागों में स्थिर और महासांगिक में बट गया।

* **तृतीय संगीत का निर्णय:** तीसरे पिटक अभिधम्म्य पिटक का संकलन हुआ और संघ भेद रोकने के कड़े नियम बने।

* **चतुर्थ संगीति का निर्णय:** बौद्ध धर्म स्पष्ट रूप से हीनयान और महायान नामक दो संप्रदायों में विभाजित हो गया। चतुर्थ बौद्ध संगीति में ही संस्कृत भाषा को बौद्ध धर्म की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया गया। अश्वघोष ने प्रसिद्ध पुस्तक "बुद्ध चरित" (बौद्धों की रामायण) की रचना संस्कृत में की थी। चतुर्थ संगीति में बौद्ध ग्रंथों पर भाष्य लिखे गए, जिन्हें विभाषा शास्त्र (बौद्ध धर्म के विश्वकोष) कहा जाता है।

अशोक के समय पाटलिपुत्र में आयोजित तृतीय संगीति के बाद विदेशों (श्रीलंका) में धर्म प्रचारक भेजे गए।

**बौद्ध संप्रदाय की अगर बात करें:**

* **हीनयान:** यह रूढ़वादी प्राचीन संप्रदाय है, जो बुद्ध को एक महापुरुष मानता है, भगवान नहीं मानता। हीनयान मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता है। वे बुद्ध की पूजा प्रतीकों के रूप में करते हैं (चरण चिन्ह, स्तूप)। इनका आदर्श अह पद प्राप्त करना है।

* **महायान:** इसका अर्थ है बड़ा मार्ग। इन्होंने बुद्ध को ईश्वर का अवतार माना और मूर्ति पूजा प्रारंभ की। महायान संप्रदाय का मुख्य आदर्श बोधिसत्व है। बोधिसत्व वे व्यक्ति हैं, जो दूसरों के कल्याण के लिए अपना निर्वाण विलंबित करते हैं। पीवाईक्यू फैक्ट की अगर बात करें, तो अवलोक अवलोकतेश्वर, पद्मपाणी, मंजुश्री, खड़कधारी और मैत्रेय (भविष्य के बुद्ध) प्रमुख बोधी सतत्व हैं। हीनयान का साहित्य पाली भाषा में है, जबकि महायान का साहित्य संस्कृत भाषा में है।

* **वज्रयान:** आठवीं शताब्दी में विकसित यह संप्रदाय जादू टोना, तंत्र मंत्र और कर्मकांडों पर आधारित था। यह पतन का मुख्य कारण बना। वज्रयान संप्रदाय में तारा देवी की पूजा प्रमुख थी। नालंदा और विक्रमशिला इसके प्रमुख केंद्र बने।

देखिए, आप सारे धर्मों में देख लीजिए। वो अंत में, जो एक मेन चीज है, अस्तित्व है धर्म का, वो किसी ना किसी प्रकार की मूर्ति पूजा पर ही है। ठीक है? आप किसी ना किसी को तो आधार बनाएंगे, किसके समक्ष झुकेंगे? तो झुकना आपको पड़ेगा। अगर आप धर्म को मानते हैं, तो किसी ना किसी चीज के आगे आप झुकेंगे। आप उसे मूर्ति कह लीजिए, मस्जिद कह लीजिए, काबा कह लीजिए, गुरु ग्रंथ साहिब कह लीजिए, शिवलिंग कह लीजिए, कुछ भी कह लीजिए। आपको झुकना है किसी के आगे। तो एक आधार तो बनाएंगे। आप किसके आगे आप झुकेंगे? तो जो अंतिम सत्य है धर्मों का, वो मूर्ति पूजा ही है।

**प्रसार एवं संरक्षण की अगर बात करें:**

सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद उपगुप्त से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और इसे राजकीय संरक्षण दिया। अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा था। ये इंपॉर्टेंट है, अक्सर परीक्षाओं में पूछ लिया जाता है। तो याद रखिएगा। महायान शाखा का प्रसार मुख्य रूप से कनिष्क के समय चीन, जापान, कोरिया और मध्य एशिया में हुआ। वज्रयान शाखा का सर्वाधिक प्रभाव तिब्बत और बंगाल और बिहार में पाल शासकों के समय था और वज्रयान शाखा जो थी, वो सबसे कमजोर बनी और इनका लगभग सभी जगह से पतन हो गया।

**पतन के कारण:**

1. बौद्ध संघों में भ्रष्टाचार, महिलाओं का प्रवेश, बुद्ध की भविष्यवाणी सच हुई और वज्रयान का उदय।

2. संस्कृत भाषा को अपनाना, ब्राह्मण धर्म (हिंदू धर्म) में सुधार और राजपूत, हूड़ राजाओं के आक्रमण।

3. बख्तियार खिलजी द्वारा 12वीं सदी में नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को नष्ट करना बौद्ध धर्म के पतन का अंतिम प्रहार था। इससे क्या हुआ? जितना भी साहित्य था, जितना भी धार्मिक लेखन था, वह सब नष्ट हो गया।

अब बात करेंगे जैन धर्म की।

**परिचय एवं तीर्थंकर:**

जैन शब्द संस्कृत के जिन से बना है, जिसका अर्थ है विजेता, जिसने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली हो। जैन धर्म के संस्थापकों और महात्माओं को तीर्थंकर, भवसागर पार कराने वाला कहा जाता है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं।

* **प्रथम तीर्थंकर:** ऋषभदेव (जिन्हें आदिनाथ कहा गया)। इनका प्रतीक चिन्ह जो है, वह सांड है (यानी कि वृषभ) है। इनका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है।

* **22वें तीर्थंकर:** अरिष्ट नेमी। इनका संबंध भगवान कृष्ण से जोड़ा जाता है और इनका प्रतीक शंख है।

* **23वें तीर्थंकर:** पार्श्वनाथ। यह काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इन्हें सम्मेद शिखर, झारखंड पर ज्ञान प्राप्त हुआ। पार्श्वनाथ का प्रतीक चिन्ह सर्प फण है। इन्होंने चार महाव्रत (सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह) दिए थे।

* **24वें तीर्थ और अंतिम तीर्थंकर:** महावीर स्वामी। इन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। महावीर स्वामी का प्रतीक चिन्ह सिंह या शेर है।

जैन धर्म सृष्टिवाद को नहीं मानता। इनके अनुसार, यह संसार शाश्वत है। इसे ईश्वर नहीं बनाया, ईश्वर ने नहीं बनाया है। ठीक है? तो, यह जितने भी आपको मैंने तीर्थंकर के नाम बताए हैं, यह बहुत ज्यादा परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। प्रतीक इनके पूछे जाते हैं। तो, इनको याद रखिएगा।

**अब हम महावीर स्वामी के जीवन की बात कर लेते हैं। इनके जीवन से भी बहुत सारे प्रश्न बनते हैं।**

महावीर का जन्म 540 ईसा पूर्व या 599 ईसा पूर्व, ये दोनों तारीखें मानी जाती हैं। देखो, एनसीईआरटी में आपको 540 ईसा पूर्व मिल जाएगा और जैन परंपराओं में और कई आधुनिक इतिहास में यह 599 ईसा पूर्व मिलता है। वैशाली के निकट कुंडग्राम, बिहार में हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ (यात्रिक क्षत्रिय कुल के प्रधान) था। माता का नाम त्रिशला था, जो लिच्छवी शासक चेटक की बहन थी। महावीर का विवाह यशोदा से हुआ और इनकी पुत्री का नाम प्रियदर्शनी (या अड़ोजा) था। इनके दामाद जामिल या जबाली इनके प्रथम शिष्य बने।

30 वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई नंदीिवर्धन से आज्ञा लेकर इन्होंने गृह त्याग किया। 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद, 42 वर्ष की आयु में जंभिक ग्राम के समीप रिजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्य (यानी कि पूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के बाद यह केवल, जिन (विजेता), अहत (पूज्य) और निरग्रंथ (बंधन रहित) कहलाए।

महावीर ने अपना प्रथम उपदेश राजगृह में विपुलाचल पहाड़ी पर अर्धमागदी प्राकृत भाषा में दिया था। तो, 468 ईसा पूर्व में, 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (राजगीर, बिहार) में राजा हस्तिपाल के यहां उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। अगर 540 ईसा पूर्व आप एनसीईआरटी के अनुसार चलेंगे, तो एनसीईआरटी के अनुसार 468 ईसा पूर्व में इनकी निर्वाण प्राप्त हुआ। अगर आप 599 के हिसाब से चलें, तो आपका 527 ईसा पूर्व में निर्माण हुआ।

**जैन दर्शन एवं सिद्धांत की अगर बात करें:**

जैन धर्म के त्रिरत्न हैं: सम्यक दर्शन (सही विश्वास), सम्यक ज्ञान (सही ज्ञान), सम्यक चरित्र (सही आचरण)। जैन धर्म में पंच महाव्रत का पालन आवश्यक है और यह परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। त्रिरत्न बहुत ज्यादा पूछे गए हैं और पंच महाव्रत से जुड़ा हुआ प्रश्न भी अक्सर देखने को मिल जाता है।

1. **अहिंसा**

2. **सत्य**

3. **अस्तेय** (चोरी ना करना)

4. **अपरिग्रह** (संपत्ति ना रखना)

5. **ब्रह्मचर्य**

यहां पर अस्तेय है, ठीक है? क्या है? अस्तेय है। इसका अर्थ होता है चोरी ना करना। पांचवा महाव्रत जो है, वह महावीर स्वामी ने जोड़ा था, जो ब्रह्मचर्य है। बाकी चार पार्श्वनाथ ने दिए थे। गृहस्थों के लिए इन व्रतों में थोड़ी कठोरता कम की गई है, जिन्हें अणुव्रत कहा जाता है। अहिंसा पर अत्यधिक बल जैन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है। यही कारण है कि जैन कृषि कार्य से भी बचते हैं।

**अनेकांतवाद** की बात करें, तो यह जैन धर्म का महत्वपूर्ण दार्शनिक सिद्धांत है। इसका अर्थ है सत्य के कई पहलू होते हैं। बहुलतावाद। **स्यादवाद** या सप्तभंगी ज्ञान: यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है। हर कथन के आगे स्याद या स्यात लगाना, शायद या स्यात लगाना। ठीक है? तो, यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है कि शायद ऐसा हो। स्यादवाद और अनेकांतवाद जैन धर्म की मूल सिद्धांत है। परीक्षा में सबसे ज्यादा पूछा जाता है।

जैन धर्म आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है। बौद्ध धर्म नहीं करता था। यह कण-कण में जीव मानते हैं। जैन धर्म पुनर्जन्म और कर्मवाद में दृढ़ विश्वास रखता है। कर्म ही जैन जन्म-मृत्यु का कारण है। संसार दो तत्वों से मिलकर बना है: एक तो जीव (जो चेतन है) और दूसरा अजीव (जो जड़ है, पदार्थ है)। कर्मों को जीव की ओर प्रभावित होना आश्रव कहलाता है और इसे रोकना संवर कहलाता है। पहले से मौजूद कर्मों का नष्ट होना निर्जरा कहलाता है। जैन धर्म में संलेखना या संथारा प्रथा है, जिसमें व्यक्ति अन्न-जल त्याग का त्याग कर प्राण त्यागता है। चंद्रगुप्त मौर्य ने श्रवण बेलगोला में इसी विधि से प्राण त्यागे थे।

अगला टॉपिक साहित्य, संप्रदाय एवं जैन संगीतियों से संबंधित है।

जैन साहित्य को आगम कहा जाता है। इनकी रचना मुख्यता प्राकृत, अर्धमागधी भाषा में हुई है।

* **कल्पसूत्र:** भद्रबाहु द्वारा संस्कृत में रचित इस ग्रंथ में जैन तीर्थंकरों का जीवन चरित्र है।

* **भगवती सूत्र:** इसमें महावीर के जीवन और 16 महाजनपदों का उल्लेख है।

**प्रथम जैन संगीति:** 300 ईसा पूर्व होती है, पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में हुई। इसमें जैन धर्म श्वेतांबर और दिगंबर में बट गया।

**द्वितीय जैन संगीति:** 512 ईवी में होती है, वल्लभी, गुजरात में क्षमाश्रमण देवर्धि गढ़ की अध्यक्षता में हुई और इसमें जैन ग्रंथों में आगमों को अंतिम रूप से संकलित कर लिपिबद्ध किया गया।

* **श्वेतांबर संप्रदाय:** स्थूलभद्र के अनुयाई, जो श्वेत वस्त्र धारण करते थे। यह मानते हैं कि स्त्रियां मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।

* **दिगंबर संप्रदाय:** भद्रबाहु के अनुयाई, जो पूरी तरह नग्न रहते थे। दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं। दिग धन अंबर। तो दिगंबर का अर्थ है दिक धन अंबर। दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं। ये कठोर नियमों का पालन करते थे।

मौर्य काल में मगध में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ा। तब भद्रबाहु अपने शिष्यों को लेकर दक्षिण कर्नाटक चले गए। यही दिगंबर कहलाए। खारवेल, कलिंग का राजा, जैन धर्म का महान संरक्षक था। हाथीगुमफा अभिलेख से प्रमाणित है। राष्ट्रकूट शासक अमोग वर्ष भी जैन धर्म दिगंबर का अनुयाई था। राजस्थान का माउंट आबू, दिलवाड़ा जैन मंदिर चालुक्य (सोलंकी) शासकों भीम प्रथम के मंत्री विमल शाह द्वारा बनवाया गया।

**अब बात कर लेते हैं बौद्ध एवं जैन धर्म का तुलनात्मक अध्ययन।**

| विशेषता | बौद्ध धर्म 16 वर्ष की आयु में इनका विवाह यशोध A

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