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Mind Blowing Lecture of Dr NK Sharma Left Doctors Speechless #conference #medical

Reiki Healing Foundation45:22

Transcription

सो, नेक्स्ट अप, वी हैव अ वेरी इंटरेस्टिंग सेशन. नाउ, वी हैव डॉ. एन. के. शर्मा. ही इज़ द चेयरमैन, रेकी हीलिंग फाउंडेशन. ही इज़ गोइंग टू टच अ वेरी इंटरेस्टिंग टॉपिक, "नेचुरल व्यक्ति पूर्व सोल लाइफ स्टाइल एंड इंप्रेशन."

डॉ. एते शर्मा, डॉक्टर सचिन, डॉक्टर सुता जी, बता दी एनएसएस, जो पदार्थ वास्तव में एक बहुत बड़ा प्लेटफार्म दिया है, एक ऐसा नॉलेज आपके सामने लाने के लिए कि जो नॉर्मली, अह, इतना आसान नहीं है. बिल्ला और तीन दिनों में ऐसा-ऐसा ज्ञान आपको दिया गया रहे कि हर एक ज्ञान अपने आप में यूनिक है. लकी, ये जितने भी ज्ञान कभी हम दो-तीन दिन में जो लिख रहे थे, वह सारे ज्ञान ही फाउंडेशन, मेरी ऑ्गेनाइजेशन है, उसके अंदर यह सारे ज्ञान का उपयोग होता है.

डॉक्टर श्वेता ने सोल प्रेगनेंसी के बारे में बताया. मैं आपको बताना चाहता हूं कि हम लोग कई सालों से प्रोग्राम चला रहे हैं कि डिजाइन और तो मेरे घर में जब मेरी भी संतान आई तो शादी हो गई, इसलिए ही टपक पड़े. डिसाइड करके, डिजाइन करके लाया गया. और मेरा पोता जो है, उसका नाम निर्वाण है. वो निर्वाण इसलिए है कि हमने उसको दो क्वालिटी के साथ अंदर लेकर आए. उसको डिजाइन किया गया. जब मेरी बहू प्रेग्नेंट थी, तो उसको डिजाइन किया गया. और उसके साथ में उसको मैंने कहा कि बेटा, खाली भगवान बुद्ध, महावीर, नानक के बारे में मत सोचना. थोड़ा टाटा, बिरला के बारे में भी सोच लेना. क्योंकि पैदा होते हुए वो वैरागी पैदा हो गया, तो मां-बाप परेशान हो जाएंगे कि कमबख्त ये कैसा पैदा हो गया घर में. अब क्या करेगा ये? तो इसलिए हमें दुनिया, दुनिया ब्रह्म भी चाहिए, सत्य जगत भी चाहिए, दोनों चीज चाहिए.

और हमारे रेकी हीलिंग फाउंडेशन में, हम लोग एनर्जी हीलिंग, रेखी का तो उपयोग करते ही हैं. जो कल प्राणिक हीलिंग के बारे में बताया गया, वो भी हमारे एनर्जी साइंस का उपयोग करते हैं. साथ ही साथ टेलीपैथी, इंटशंस, पास्ट लाइफ रिग्रेशन, जियोपैथिक स्ट्रेस, वगैरह कई चीजों पर हम लोग काम करते हैं. तो ऑलमोस्ट, जो यहां पर बातें की गई है, वो हम सब ऑलमोस्ट इस्तेमाल कर रहे हैं.

आज का मेरा विषय, जो मैं आप लोगों के सामने प्रेजेंट करना चाहूंगा, उसका शीर्षक है न्यूट्रिशन तो है, पर उसका शीर्षक मैं कहना चाहूंगा, "डिजीज इंपॉसिबल." डिजीज वाकई में इंपॉसिबल है. दिस इज व्हाट आई हैव प्रूव्ड टू मायसेल्फ एंड माय फैमिली. मेरी तीन, मेरी बचपन से यह खोज शुरुआत हुई, यह तीन चीजों को लेकर कि इस दुनिया में क्यों बीमारी? व्हाई डिजीज? बीमारी क्यों संसार में? क्या ऐसा कोई जीवन नहीं है कि जहां हम बिल्कुल बीमार ना पड़ें? और दूसरी खोज, क्यों हर आदमी संसार में रिच नहीं बन सकता? और कौन डिसाइड करता है कि यह गरीब रहेगा और यह रिच हो जाएगा? हु डिसाइड दिस? क्या प्रॉब्लम है? किसको पड़ी है हमारा भाग्य लिखने की? इसकी खोज. और क्यों हर आदमी बुद्ध नहीं बन सकता? दुख क्यों है संसार में? अगर पैदा किया है, तो दिया ही क्यों कि हम सारी जिंदगी रोग से, दुख से और गरीबी से लड़ने में समाप्त कर दें? ये क्या मतलब है?

लेकिन जब यूनिवर्स के लॉ को अध्ययन किया गया, क्योंकि जब हम किसी चीज को खोजते हैं, तो वो चीज हमें भी खोज रही होती है. पर खोज सिंसियर होनी चाहिए. तो जब मैंने खोजना शुरू किया, तो पता चला कि यार, परमात्मा ने तो शरीर ऐसा बनाया, जो मरते दम तक परफेक्टली फंक्शन करने के लिए डिजाइन है. एक-एक सेल ऐसा डिजाइन किया उसने कि वो अपनी पूरी एफिशिएंसी को डेमोंस्ट्रेट करना चाहता है. आप चाहो ना चाहो, तो भी आप चाहो ना चाहो, आंखें तो बढ़िया देख ही रही है ना? आप चाहो ना चाहो, किडनी फिल्टर कर ही रही ना? तो हमारा शरीर ऐसा बना कि जो फल की तरह अपनी पूरी एफिशिएंसी को डेमोंस्ट्रेट करने के बाद, फल की तरह पककर संसार से जाने के लिए डिज़ है. यानी कि हेल्थ इनहेरेंट नेचर है. डिज़ है, गिफ्टेड है. बीमार पड़ने के लिए आपको काफी लंबी चौड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. आपको यह जानना बहुत जरूरी है कि शरीर को बीमार पड़ने का कोई शौक नहीं है. आप चाहो तो भी बीमार नहीं पड़ेगा. आपको बीमार पड़ने के लिए काफी लंबी चौड़ी तगड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और कई सालों तक करनी पड़ेगी, तब जाकर शरीर बड़ी मुश्किल से बीमार पड़ता है.

आसान है हार्ट ब्लॉकेजेस पैदा करना. आसान है डायबिटीज पैदा करना. बहुत साल चाहिए भाई साहब. ब्लड प्रेशर हमारा 120/80 होता है. आसान है ब्लड प्रेशर चढ़ जाए हमारा. कई सालों तक स्ट्रेस लेनी पड़ती है. कोई महीना, दो महीना लोगे, तो भी ब्लड प्रेशर चढ़ने वाला नहीं है आपका. कई सालों तक घटिया खाना खाना पड़ता है आपको, तब जाकर शरीर अच्छा. फिर भी, फिर भी शरीर, आप, आप उसको घसीट कर बीमार करने की कोशिश करते रहते हो और शरीर की सारी स्ट्रगल इस बात के लिए चलती है कि आपको खींच कर वापस नॉर्मल कर दूं. बस ये लड़ाई चलती है. और शरीर बीमार पड़ता कब है? ब्लड प्रेशर चढ़ता कब है? जब बॉडी एग्जॉस्ट हो जाती है, उस चीज को नहीं टोलरेट कर सकती, तभी बॉडी जो है, अपने ब्लड प्रेशर को रेस करती है. पर यह रेस करना भी बॉडी का एक रेमडीियल एक्शन है. हमें यह समझना बहुत जरूरी है कि एव्री एक्शन ऑफ द बॉडी इज ए रेमडीियल एक्शन. शरीर कभी भी आपको मारने के लिए काम नहीं करता. शरीर हर पल आपको बैलेंस में रखने के लिए, नॉर्मल रखने के लिए, हर इकोनॉमिकली, हर हालत में, कम से कम ऑक्सीजन, कम से कम न्यूट्रिशन में आपको सर्वाइव करने के लिए कोशिश करता रहता है. आप चाहो ना चाहो, वो 24 घंटे नव निर्माण में लगा रहता है, रिजनरेशन में लगा रहता है. आप रोज हड्डियां तोड़ो, आप रोज अपनी उंगलियां काटो, वो फिर जोड़ेगा. क्यों? शरीर जीवित रहने के लिए डिज़ है. मरने के लिए डिज़ नहीं है. आपको सुसाइड करनी पड़ेगी. गलत खाना पीना, खाना पीना करके. वरना शरीर तो 100 साल से ज्यादा जीना चाहता है.

तो ये नियम मैंने जाना. तो मुझे समझ में आया कि यार, बीमार पड़ना तो बड़ा मुश्किल काम है. तो आज से कोई 40-45 साल पहले, मुझे खाने-पीने का बड़ा शौक था. तो मेरी किडनी खराब हो गई. नेफ्राइटिक सिंड्रोम हो गया. चार अल्ब्यूमिन प्लस जाता था मेरे अंदर से. डायबिटिक बॉर्डर लाइन पे आ गया. और एक्सोराइिस, एक्सिमा, साइनस, बड़ी-बड़ी बीमारियां, बहुत भुगता. तो मेरे अंदर से आवाज आई, हालांकि उस समय मैंने काफी नेचुरल चीजों का इस्तेमाल भी किया, लेकिन रूट कॉज को समझ नहीं पाया, इसलिए डिजीज मेंटेन रही मेरी. लेकिन बाद में जब किडनी पे प्रॉब्लम आई, तो मैं थोड़ा और सीरियस हो गया. और मैंने इसका इलाज कहां ढूंढा? मेरे अंदर से एक आवाज आई कि नथिंग शुड कम फ्रॉम आउटसाइड, एवरीथिंग शुड कम फ्रॉम विद इन. अगर मुझे कोई भी ठीक कर सकता है दुनिया में, तो कौन ठीक करेगा? तो मेरे अंदर से आवाज आई, तुझे वो ठीक करेगा जिसने इतने छोटे से कोषाणु से, सूर्य शुक्राणु से, जिसने तुम्हें छ फीट का आदमी बना दिया, जो तुम्हारे अंदर रोटी को ब्लड में ट्रांसफॉर्म कर रहा है, वो वही तुझे ठीक कर सकता है. बस ये मेरे अंदर की आवाज थी.

तो मैंने कोई बाहर की ना हर्ब्स खाई, ना कोई दवा खाई, ना किसी डॉक्टर के पास गया. एक प्राकृतिक चिकित्सा के साथ मेरा संबंध था. उनके साथ जुड़ा. मैंने खानपान ठीक किया, कारण ठीक किए, उपवास किया, फलाहार किया, रेस्ट किया, ध्यान किया, योग किया और तीन महीना मुझे उसको लड़ने में, सारा लड़ने में लगा और मैं रिवाइव हो गया. मैं रीजनरेट हो गया वापस. और उसके बाद फिर मैंने कसम खाई. आज के बाद बीमार नहीं पडूंगा. बस ये कसम मैंने खाई. क्योंकि बीमार आदमी किसी को पसंद नहीं आता और बीमारी बहुत दुख देती है. तो आज मैं अब 70 साल का हूं और मैं छाती ठोक के कहता हूं, दुनिया की कोई ताकत मेरी मर्जी के बिना मुझे बीमार नहीं कर सकती. मेरी मर्जी के बिना मुझे कोई बीमार नहीं कर सकता. क्यों? किसको पड़ी है? प्रकृति से पूछता हूं. आर यू इंटरेस्टेड? प्रकृति कहती है, नहीं भैया, मैं तो बिल्कुल इंटरेस्टेड नहीं हूं बीमार करने में. भगवान से पूछता हूं. आर यू इंटरेस्टेड? वो कहता है, नहीं भैया, मैं भी इंटरेस्टेड नहीं हूं. शरीर से पूछता हूं. आर यू इंटरेस्टेड? वो कहता है, नहीं भैया, मैं भी इंटरेस्टेड नहीं हूं. तो जब प्रकृति, परमात्मा, शरीर तीनों तुम्हें बीमार करने में इंटरेस्टेड नहीं है, तो तुम्हारे पीछे कौन हाथ धो के पड़ा हुआ है? सिर्फ तुम.

तो और ऐसा नहीं है. एक खुजली भी मुझे पूछे बिना नहीं आ सकती. ध्यान रखना. शरीर कहता है, भाई साहब, मुझे खुजली करने का कोई शौक नहीं है. आपको शौक है, तो सामान सप्लाई कर दो. और अगर आप सामान सप्लाई नहीं करोगे, तो मैं जिंदगी भर खुजली नहीं करूंगा. मैं शरीर से कहता हूं, मैं ही दूंगा सामान. जाओ. तो शरीर कहता है, मैं भी खुजली नहीं करूंगा. जाओ. क्या पड़ी है शरीर को? शरीर को बोलने की क्या जरूरत है? जरा सोचो. शरीर को टूटने के लिए, फूटने के लिए नहीं बना. स्वस्थ रहने के लिए डिज़ है, भाई. और ऐसा नहीं कि मैं कोई, मैं कल, कल मैं उम्र में चला जाऊंगा. 80-90 साल का हो जाऊंगा, तो मुझे मोतिया हो जाएगा. कैसे हो जाएगा? फिल्म बनाने के सामान तो मुझे ही सप्लाई करने पड़ेंगे ना? कोई बॉडी में अपने आप तो ऐसा मैकेनिज्म नहीं है कि फिल्में अपने आप बन जाएगी. प्रोस्टेट एनलार्ज हो जाएगा. कैसे हो जाएगा? उसका ओवर यूज तो मुझे ही करना पड़ेगा ना? हम, हम चाहते हैं कि हम मर्जी आए वैसा बिहेवियर करें और बीमार में ना पड़ें. ऐसा संभव नहीं है.

तो और मेरे जीवन में बीमारी और थकावट, ये दो शब्द नहीं है. क्यों? क्योंकि शरीर का स्वभाव है, नेचुरली गिफ्टेड है. और ऐसा नहीं कि मैंने खुद को हेल्दी रखा है. मेरा पूरा परिवार, मेरी वाइफ, मेरे दोनों बच्चे, मेरे पोते. हमारे घर में बचपन से लेकर आज, वो बच्चे मेरे 37-38 इयर्स के हैं. आपको जान के हैरानी होगी कि पैदा होने के दिन से लेकर आज तक, उन्होंने एक दिन नाक में सर्दी का कतरा नहीं देखा. एक दिन डायरिया नहीं देखा. एक दिन बुखार नहीं देखा. आज तक डॉक्टर नहीं देखा. आज तक दवा नहीं देखी. और मेरे दोनों बच्चे विदाउट वैक्सीनेशन के हैं. बिकॉज़ आई डोंट बिलीव इन डिजीज एट ऑल. आई डोंट बिलीव इन डिजीज. क्यों? मैंने बच्चों को बीमार पड़ने के कारण दिए ही नहीं. हम करते क्या है मालूम है? हम कारण सप्लाई करते हैं. फिर वह बीमार पड़ता है. फिर उसके लिए वैक्सीनेशन, दवाएं, ट्रीटमेंट, ये सब खोज जारी रहती है. जब मैंने कारण नहीं दिया, इफेक्ट आएगा कहां से?

हमारे बच्चे जब पैदा हुए, सिंपल कॉमन सेंस. मां का दूध पिलाए. गाय-भैंस का दूध नहीं पिलाया. क्यों नहीं पिलाया गाय-भैंस का दूध? गाय-भैंस का दूध उस बछड़े के लिए बना, जो दो साल में 2000 पौंड का बनेगा. आदमी का बच्चा 8-10 पौंड का पैदा होता है और 20 साल में जाकर सवा सौ, 150 पौंड का बनता है. वो इतना हाई हार्मोनल कंपोजिशन वाला दूध कैसे मेरे बच्चे को सूट करेगा? और फिर वह कोई मामूली दूध तो नहीं है. बलगम, एलर्जी कंपाउंड्स, गैस फॉरमेशन, सो मेनी थिंग्स. गाय के बड़े-बड़े के चार पेट होते हैं. हमारा तो एक पेट होता है. और तुम समझते हो कि जानवरों का जो भी दूध होने दो, हमारे लिए भी सूटेबल है. बस मैंने दिया नहीं. इसलिए बच्चों को कभी जुकाम हुआ नहीं, कभी पेट में गैस बनी नहीं. और आपको जानकर के हैरानी होगी, रात को दो मिनट भी मेरे बच्चे कभी नहीं रोए आज तक. क्यों? मेरा मानना यह है कि बच्चे को रोने का अपने आप का कोई शौक नहीं है. बच्चों को रुलाने की व्यवस्थाएं पैदा की जाती है. आप पॉज देते हो, मत दो ना. क्यों रोएगा बच्चा? कोई शौक है रोने का उसको? जरा सोचिए कितना आनंद है जीवन में. और दांत, दांत नहीं आए तब तक हमने अन्न नहीं दिया. कॉमन सेंस है हमारी. अरे, दांत नहीं का मतलब देयर विल बी नो डाइजेस्टिव एंजाइम्स टू डाइजेस्ट ए कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट. तो इसलिए हमने दो साल तक, जब तक दांत नहीं आए, अन्न नहीं दिया. खाली फल और दूध, मां का दूध और फलों पर रखा. और मां का दूध इतना आया. आप जानते हैं, एक औरत 10 बच्चों को दूध पिला सकती है. इतना आता है. जब गाय-भैंस को आता है, बकरियों को आता है, कुतिया को आता है. आपको नहीं आ सकता. लेकिन हमने लॉस कर दिया सब चीजों को. हमने नेचुरल चीजों को फॉलो किया. कोई बहुत बड़ी अकल नहीं लड़ाई हमने. हमने शास्त्र नहीं पढ़े न्यूट्रिशन के. और आज तक मेरा परिवार में एक चूर्ण तक भी नहीं आया. चूर्ण तक भी मेरे घर में आज तक. एक सोडा भी नहीं पिया हमारी जिंदगी में आज तक हम लोगों ने. क्यों? क्योंकि हमें बीमार पड़ने का शौक नहीं है.

और आप लोग भी अगर बीमार पड़ गए, तो आपके अंदर ठीक होने का शौक नहीं है. मैं ऐसा मानता हूं. क्यों? अगर शौक होता, आपकी चॉइस भी नहीं है. तो आप बीमार नहीं पड़ते. सबको मालूम है. देखिए, आज हम सब बड़ी-बड़ी बीमारियों में उलझ के, उलझ के चल रहे हैं. सबको मालूम है, इधर पूरब है, इधर पश्चिम है. सबको मालूम है कि योग अच्छा है, ध्यान अच्छा है. सब अच्छा है ना? कहते हैं ना सब अच्छा है? यस और नो? है ना? हवा अच्छी है, धूप अच्छी है, हंसना अच्छा है, नाचना अच्छा है, फल-सब्जियां खाना अच्छा है, रेस्ट करना अच्छा है. सब जानते हैं. प्यार करना अच्छा है. सब जानते हैं. लेकिन आप ठीक क्यों नहीं होते मालूम है? क्योंकि आपकी असली प्यास, प्यास उस तरफ जाने की नहीं है. आप क्या कहते हो मालूम है उसको देख के? भाई साहब, मुझे मालूम है, बहुत अच्छी चीज है. मैं आज नहीं तो कल जाऊंगा जरूर. आपने बताया वो, मैं जरूर उसके ऊपर मैं सोच तो रहा हूं. लेकिन अभी कहां जा रहे हो? नहीं, अभी तो मैं बाद में जाऊंगा. अभी तो, अभी तो मैं ऐसा सोच रहा हूं कि मुझे रोग का कारण निकाले बिना और स्वास्थ्य के नियम पालन किए बिना, मुझे कैसे कोई दवा में टोटका मिल जाए, ऐसा होम्योपैथी में, एलोपैथी में, एक्यूपंक्चर में, इसमें, उसमें, कोई भी यूनानी में, जिससे कि मुझे आराम मिल जाए.

जी, दवाएं गलत नहीं है. ध्यान रखना. कोई भी दुनिया की दवाएं गलत नहीं है. आदमी की खोज है. दे आर ऑल रेस्पेक्टेबल साइंसेस. बट आपका कांसेप्ट गलत है कि मैं दवा खाकर ठीक हो जाऊंगा ना. यह तुम्हारा कांसेप्ट गलत है. तो इसीलिए दवा ठीक है. दो दिन, चार दिन के लिए रिलीफ ले लिया. कोई बात नहीं. लेकिन भाई, यू-टर्न तो करो तो सही. शरीर क्या कहता है मालूम है? भाई साहब, एक भी कारण ठीक तो देता नहीं है. एक भी कॉज स्वास्थ्य का देता नहीं है. और फिर मुझसे पूछता है कि तू ठीक, ठीक क्यों नहीं हो रहा है? क्यों हो जाएगा? कैसे हो जाएगा? तो इसीलिए यह शरीर बड़ा नियम से चलता है. नियम से यह पूरा ब्रह्मांड नियम से चल रहा है. सब जानते हैं ना? और नियम का मतलब क्या मालूम है? डेफिनेट, डेफिनेट, डेफिनेट. अगर गलत कारणों से बीमार पड़ना डेफिनेट है, तो सही कारणों से ठीक होना भी उतना ही डेफिनेट है.

मैंने कैंसर पर कई सालों से काम किया. प्राकृतिक चिकित्सा में जब मैंने हॉस्पिटल चलाया, तो एक ही, एक ही सिद्धांत पर काम किया. "इन ए हेल्दी बॉडी, कैंसर सेल कैन नॉट सर्वाइव." सिंपल सा लॉ. अगर हम एक किसी बॉडी में से एक हेल्दी, एक कैंसर का सेल निकाल दे और किसी हेल्दी बॉडी में डाल दे, ना, कुछ घंटों में बॉडी सैकड़ों ल्यूकोसाइट्स कंड, उसके चारों तरफ लगाकर उसको धक्का मार के बाहर फेंक देगी. आज जरा सोचिए, कैंसर का अगर सबसे बड़ा कोई दुश्मन है, तो आपका शरीर. लेकिन हम अपने शरीर की मदद नहीं करते. हम अपने मकान मालिक को मजबूत नहीं करते. बस हम केवल दवाएं, इलाज खोजते रहते हैं. और मजेदार बात ये, बीमारी के कारण तो 10 और उसके ट्रीटमेंट 1000. 10 कारण हैं और ट्रीटमेंट 1000 हैं. जरा सोचिए.

और हम कर क्या रहे हैं मालूम है? यह हाथ है. यह हाथ यहां पर रखा. इसको टेढ़ा किया. थोड़ा दबाया. प्रेशर दिया. दर्द होने लग गया. अब इसका नाम है बीमारियां, दुख. अब आप क्या कर रहे हो? अब सारी दुनिया, आप ही नहीं, सारी दुनिया. यह दर्द हो रहा है भाई साहब. यहां प्रॉब्लम हो गई है. क्या करना चाहिए? भाई साहब, यह फलाना हर्ब लगाओ, मालिश करो, एक्यूपंक्चर करो, एलोपैथिक पेन किलर लो. यानी तो और भी 500 तरह के उपचार हैं दुनिया में. उसका अप्लाई करो और सब अपनी तारीफ करते रहते हैं. देखो, थोड़ा-थोड़ा लाभ मिल गया. देखा ना आपने? मैं कहता हूं, बीमारी ठीक नहीं करनी पड़ती. भाई, शरीर लगा हुआ है ठीक करने में. वो कहता है कि भैया, जो हाथ है ना, इसको हटाओ तो सही. मैं तो सीधा रहने के लिए बना हूं. तो एक्चुअल में बीमारी ठीक नहीं करनी पड़ती, भाई. रोग का कारण निकालना होता है. तंबाकू वातावरण में फैला देते हो. छींक मारते रहते हो. फिर आप कहते हो, डॉक्टर साहब, जरा छींक बहुत हो गई मेरे को. डॉक्टर कहता है, यह दवा खा ले. आप तंबाकू नहीं निकालते वातावरण से. क्या करोगे? लड़ाई जारी रहती है.

तो दोस्तों, मेरा कहने का मतलब है, नियम बड़े ठोस हैं. और प्रॉब्लम क्या मालूम है? सारा संसार रिसर्च कर रहा है. किसकी मालूम है? कि आदमी का रोग का कारण एज इट इज रहे. स्वास्थ्य का नियम भी कोई ज्यादा पालन करना ना पड़े. और फिर ऐसा कोई रास्ता निकल जाए, जिससे आदमी ठीक हो जाए. आप क्या सोचते हो? आदमी सफल होगा उसमें. आज आप अपने घर में ही देख लो. तुम्हारे घर में, तुम्हारे अपने किचन में जाओ. किसी को पूछो, क्या खाते-पीते हो? भाई साहब, क्या कहेगा? कुछ नहीं. जी. सुबह एक चाय पीता हूं और साथ में दो टोस्ट ले लेता हूं. नहीं तो एक-दो बिस्किट खा लेता हूं. बड़ा हेल्दी फूड है. चाय हेल्दी फूड है? नहीं, नहीं, वो तो पॉइजन तो है, लेकिन आदत है ना भाई साहब. क्या करें? ब्रेड खा रहे हो. खोखला खाना शरीर को दे रहे हो और सोचते हो इससे हेल्थ तो मिल ही जाएगा ना, भाई साहब. बिस्किट तला हुआ आहार है. मैदा, चीनी, डालडा, घी और ऊपर से तल गया, ऊपर से पक गया. और तुम उसको कहते हो, हल्का खाना है. जी, बिस्किट तो हल्का होता है ना, भाई साहब. तुम ऐसा तो घटिया तो माल देते हो शरीर को. फिर कहते हो, पराठा खाता हूं. और तुम्हारे घर के खाने कैसे हैं? आटा चना हुआ. दाल पीली, चावल सफेद, चीनी, नमक, मसाले, ऊपर से तला हुआ तेल, घी. और ऊपर से अगर शराब मिल गई, तो और सोने में सुहागा. और दिन भर आप, आपके घर में यह खाना पेट में जाता है. आप इन खोखले खानों से आप कैसे आशा करते हो कि मेरा शरीर बढ़िया चले? जी. हाउ यू कैन एक्सपेक्ट लाइक दिस?

शरीर क्या बोलता है मालूम है? भाई साहब, जैसा माल, वैसी बिल्डिंग बना दी मैंने आपकी. ऐसे तो करेगा ना? तो मैं उन रूट कॉज पे चर्चा करने जा रहा हूं आज मैं. क्योंकि खाली बातें करने का कोई मकसद नहीं है. आप लोग भी सब ज्ञानी हैं. सब जानते हैं. मैं रूट कॉज को, अगर तुमने निकाल दिया ना, तो मैंने आपको क्या कहा? शरीर को बीमार पड़ना बहुत मुश्किल है. वही, वही बता रहा हूं. इसीलिए तो पहला कारण है, हंगरलेस ईटिंग. भूख के बगैर खाना खाना. भूख शरीर की एक सिंपल सी फिजियोलॉजिकल लैंग्वेज है, जो कहता है, लाओ, मैं खाना पचाने को तैयार हूं. और नहीं, भूख का मतलब, डालना मत. मैं तैयार नहीं हूं. मैं कहीं इंगेज्ड हूं. लेकिन हम लोग खाना कैसे खाते हैं? टाइमली, साइकोलॉजिकली. हम लोग क्या कहते हैं, सुबह 9:00 बज गई, ऑफिस जाना है, इसे खा लो. 2:00 बज गए, इसे खा लो. अभी डॉक्टर सचिन ने छोड़ दिया, इसे खा लो. शाम हो गई, इससे खा लो. घर में आ गया, इसे खा लो. आज मैंने खाया नहीं, इसे खा लो. बेकार में जाएगा, इससे खा लो. ज्यादा बन गया, इससे खा लो. मुफ्त में मिल रहा है, इससे खा लो. तो आपका जो खाना है, वो वास्तव में शारीरिक मांग से ना होकर, साइकोलॉजिकल, टाइमली मांग से होता है.

शरीर कहता है, भाई साहब, मैं आपकी मजबूरियों को नहीं जानता. मैं मांगू और दोगे, तो खाना पचा दूंगा. और अगर मैंने नहीं मांगा और दे दिया, तो सड़ा के छोड़ दूंगा. क्यों? नो हंगर मींस नो जूस सीक्रेशंस. और अगर आपने डाल दिया, नहीं, सब लोग खा रहे हैं, मैं ही खा ही लेता हूं. टाइम, टाइम, टाइम, टाइम, कैसे निकालूं? डाल दिया, तो शरीर क्या करता है मालूम है? शरीर बड़ी लिमिटेड रिजर्व एनर्जी है, वो नीचे ऑलरेडी डाइजेशन में लगी हुई है. वो वहां से ना, इमरजेंसी की तरह डील करता है, जो खाना आ गया फालतू में. और फिर वो वहां से वो एनर्जी विड्रॉ करके, आधी इधर लगाता है, तो आधी उधर ही, आधी मिलती है सिर्फ उधर. तो क्या होता है? कॉन्स्टिपेशन क्रिएट होती है. भूख का असली कारण यह नहीं है कि तुम फाइबर नहीं खा रहे हो. भूख का असली कारण है एनर्जी लो है इंटेस्टाइन में. क्यों? तुम सारे दिन ऊपर ही खींच के रखते हो बगैर भूख के भी. तो जिस दिन तुमने भूख से खाना सीख लिया, खाना घटिया था, खाना भारी था, पचने की 100% गारंटी. और जिसका खाना पच गया, उसको कभी कॉन्स्टिपेशन नहीं हो सकती. क्यों? आते तो डिजाइन की गई उसी.

पर्पस के लिए। भाई आते कहती है, भैया मुझे सिखाने की जरूरत नहीं कि कब करूं ना कब कब ना करूं। आई नो मैं जॉब वेरी वेल। आप कृपया मेरे रास्ते में बाधा मत पैदा करो, प्लीज। आप जानते हो, पेशाब करने को 50-60 सेकंड लगते हैं। स्टूल पास करने को सिर्फ 10 सेकंड। आप चाहो तो फोन होल्ड करके जाकर आ सकते हो। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि आपने क्या कर दिया।

हम लोग सुबह घूमने निकलते हैं। पतिप जब तक मेरी एक पार्टनर जूता निकाल के फीता बांधता है ना, तब तक दूसरा पार्टनर आ जाता है बाहर। पता है आपको? इतना फास्ट बता रहा हूं। और इसमें कोई आश्चर्यचकित बात होने की जरूरत भी नहीं है। आपने कभी जानवर को देखा? हाथी, घोड़े, कुत्ते, बिली रास्ते में चलते हैं। अचानक खड़े होते हैं। टक टक टक टक टक टक टक पास करते हैं। निकल पड़ते हैं। कितनी टाइम लगती है। आदमी को पता नहीं क्या प्रॉब्लम हो गई। लाइब्रेरी बना के बैठ गए अंदर। अरे भाई, इतनी समस्या नहीं है। मोशन में। और कितने हंगामे करता है। कितनी लड़ाई लड़ रहा है। रात को दूध पी रहा है। इस गोल खा रहा है। कायम चूर्ण खा रहा है। और सुबह उठ के बीड़ी फूंक रहा है। गर्म पानी पी रहा है। कपालभाति कर रहा है। अच्छा हुआ भगवान ने किडनी अंदर कर दी। वरना पता नहीं पेशाब कैसे करता। लड़े जा रहा है शरीर से।

तो दोस्तों, जीवन फाइट नहीं है। फ्लो है। फ्लो। लड़ो मत जीवन से। इसे कानून के साथ जुड़ो। तो हम लोग शरीर के भी नियम बना के चलते हैं। अपने नियम। मेरे जीवन में कोई डिसिप्लिन नहीं है खाने पीने का और कोई नियम नहीं है। ना कोई साइंटिस्ट को मानता हूं, ना किसी डॉक्टर को जानता हूं और ना किसी वेद शास्त्र को ऊपर से उसको दिमाग में रखता हूं। मेरा शरीर ही वेद शास्त्र है। मेरा शरीर ही साइंटिस्ट है। मेरा शरीर ही डॉक्टर है। जो मुझे हर पल अपनी भाषा के द्वारा मुझे गाइड कर रहा होता है कि कब खाऊं, कितना पीऊं, ना कब जाऊं। और तुम लोग इसके लिए जाके किताबें पढ़ते हो। लाखों हजारों और डॉक्टरों से जाके पूछते हो। मैंने इसके बारे में अरे मैडम, मेरा लेक्चर पूरा नहीं हुआ। अभी तक तो एक 15-20 दिन चाहिए मुझे कम से कम। हां, रुकिए। हां।

और हम जाकर डॉक्टरों से पूछते हैं के मैंने एक कविता लिखी इसके बारे में: सदियां बीत गई मानव फिर भी पूछ रहा है ये क्या खाऊं, कैसे खाऊं, खाना ढूंढ रहा है ये। जो ना खाना था ना पीना था वो भी निगल गया सारा। बुद्धि मिली थी ज्यादा जिसको, वो भी भटक गया बेचारा। ईश्वर ने, ईश्वर ने इस सृष्टि का सुंदर जब निर्माण किया, हर प्राणी को अपना अपना जीने का सामान दिया। पूरे प्राणी जगत में अब तक ऐसा नहीं सवाल हुआ, सिर्फ पूछ रहा है मानव सदियों से परेशान हुआ।

तो खाने पीने के कोई नियम होते हैं? मेरे घर में एक डॉगी है। एक दो चिड़िया भी रखी थी हमने। कई बार हम दिन भर गायब हो जाते थे, खाना नहीं मिलता था। रात को 11-12 बजे आते थे और 12:00 बजे भी वो वेट करता था और जब खाना देते थे, बड़े आराम आराम से खाता था। वो यूं नहीं कहता था, भाई साहब, अब तो 12:00 बज गए। अब कैसे खाऊं? शास्त्रों में लिखा है कि शाम के बाद नहीं खाना चाहिए। तुमको रात को अगर पेशाब लगे और मोशन लगे तो ऐसा कहोगे नहीं, अभी सुबह 6:00 बजने दो। बाकी नेचर के सारी भाषाओं के लिए तुम्हारे नियम है। और खाने पीने के तुम नियम जाके डॉक्टरों से पूछते हो। अरे भाई, सिंपल सी लॉ है। भूख लगे तो खाओ ना। एक बार लगे कि दो दिन में एक बार लगे कि चार दिन में एक दिन में चार बार लगे, तुम्हारी बॉडी बोलेगी। और प्यास लगे तो पानी पियो ना। क्यों की तरफ जाएं और दूसरा कहा तो इसलिए भूख से खाना सीखें, आदत के मारे ना खाएं।

और दूसरा पेट भगवान ने क्यों बनाया? परफेक्ट डाइजेशन करने के लिए। सही कॉम्बिनेशन करें आहार का। जैसे अभी हमारे डॉक्टर नागपुर के डॉक्टर ने बताया कि आहार का सही मेल। पेट इनडाइजेशन, गैस फॉरमेशन और अपच जैसे शब्दों के लिए बना ही नहीं। तुम्हारी इग्नोरेंस से तुम उसके उस मशीन को गड़बड़ कर देते हो। हमारे पाचन का एक सिंपल सा लॉ है कि एक बार में एक प्रकार का सॉलिड स्टार्च या सॉलिड प्रोटीन आप अपने बॉडी को दो अलोंग वि द सेलेड्स एंड वेजिटेबल्स। सिंपल से ना। बॉडी में कोई ऐसा मैकेनिज्म नहीं है कि एक साथ वैरायटीज ऑफ़ आहार जाएं और सबको एक साथ जूस निकाल के डाइजेस्ट कर लें। जैसे कि आप नॉर्थ इंडियन खाना देख लो। रोटी, दाल, पनीर, दही, आलू, बेसन, राजमा सब साथ में। बॉडी में ऐसा कोई मैकेनिज्म नहीं है कि छोले यह तेरा जूस, पनीर यह तेरा जूस, आलू यह तेरा जूस। ऐसा कोई नियम है बॉडी में? तो शरीर को सिंपल खाना दो।

और जो वेजिटेरियन लोग हैं, जरा उनके लिए बताना चाहता हूं कि अपस शब्द से परमानेंटली और गैस शब्द से मुक्त होना चाहते हो तो तीन चीजें खाने में कभी रखना मत, तो गैस नहीं बनेगी। क्या है? एक तो दूध, दही, पनीर, अन्न, दालों के साथ हमेशा पेट में सड़ता है। यहां पे एक बात ध्यान में रखना। डोंट बिलीव मी। मेरी बात नहीं मानना। आठ दिन छोड़ के देखना। आठ दिन फिर अपना के देख लेना। बस समझ में आ जाएगा अपने आप। तो दूध, दही, पनीर खाना है। अलग से खाली पेट खाओ। लस्सी पीने अलग से पी लो। खाने के साथ कभी ऐड मत करो। जहां तक हो सके। ऐसा नहीं है कि शरीर हमारा शादी ब्याह में गए। एक-द दिन खा गए तो बीमार पड़ जाओगे। शरीर बड़ा अकोमोडेटिव है। नहीं। ऐसा डर मत रखो। फनेटिक मत बनो। अवेयरनेस रखो कि दूध की चीजें अन्न दालों के साथ में अच्छी नहीं है और दालों के साथ तो बिल्कुल अच्छी नहीं है। बहुत प्रॉब्लम क्रिएटर है। इसीलिए तो आहार में दूध जो है खाने के साथ हटा दो।

दूसरा खाने के साथ कभी फल और जूस मत पियो। बड़ी डेंजरस चीज है वो। उससे खाना पेट पर सड़ता है क्योंकि फल सीधा निकल के आंतों में जाकर पचता है और हम देर से पचने वाले खाने खाकर बाद में फल खाते हैं। यानी आगे बैलगाड़ी को भेजते हैं। पीछे से हवाई जहाज को भेज रहे होते हैं।

और तीसरा खाने में खटाई खाने की कभी खटाई ज्यादा ना डालें। नींबू, इमली, अमचूर, टमाटर क्योंकि स्टार्च का पाचन हमेशा अल्कलाइन जूसेस में होता है। सब जानते हैं। और स्टार्च जो सिट्रिक एसिड्स होती हैं, वह अल्कलाइन जूस को डिस्ट्रॉय कर देती है। इवन आपने देखा ना टूथपेस्ट टूथपेस्ट से भी खराब हो जाता है हमारा अजीब का जो टेस्ट है। तो इसीलिए और गैस बनती है ना आपके केमिकल रिएक्शन से। तो गैस इतनी खतरनाक होती है कि ओरिजिनल हार्ट डिस्क से कभी कोई नहीं मरता। गैस के कारण हेल्दी हार्ट वाले अटैक से मर जाते हैं। गैस के कारण मिर्गी के दौरे आते हैं। गैस के कारण जॉइंट्स पेन बढ़ जाते हैं। गैस के कारण सर दर्द होता है और गैस के कारण रात भर आपको अच्छी नींद नहीं आती। अजीबोगरीब तरह सपने आते हैं। क्यों? जिनका मध्य प्रदेश ठीक नहीं रहता, उसका उत्तर प्रदेश भी ठीक नहीं रहता। आप जानते हो नींद कैसे आती है? सु रात को सो और सुबह उठो ना तो आपको ऐसा लगेगा 5 मिनट हुए सो। और यह नींद मैं सोता हूं इसलिए बता सकता हूं। हमें ना डाउट आता है। सुबह उठते हैं ना जब 5-6 बजे आंख खुलती है ना डाउट आता है यार सोए भी कि नहीं सोए अभी तक। ऐसा डाउट आता है। क्यों? इतनी गहरी नींद।

और पता कैसे चलेगा आपका खाना डाइजेस्ट हो रहा है? अपने स्टूल को रेगुलरली वॉच करो। अपने स्टूल को देखो क्योंकि तुम्हारी फैक्ट्री है। माल बन रहा है कि नहीं बन रहा है, तुम्हें पता चल जाएगा। अपने स्टूल को वॉच करोगे अगर वो अगर तुम्हें भूख से खाया और खाना सिंपल कॉम्बिनेशन है, आपका स्टूल बंधा हुआ होगा, पार्ट पर चिपकेगा नहीं, बदबू नहीं होगी। अगर तुम्हें लगता है कि नहीं से सॉलिड है, बार-बार जाना पड़ता है, बदबू भी होती है तो समझ लेना तुमने मशीन में धागा तो डाला, कपड़ा तो बना नहीं, गुच्छा बन के निकल गया। और तुम किस बात से खुश होते हो कि कंबक निकल तो गया। निकल जाने को मोशन नहीं बोलते। भाई फैक्ट्री में माल बराबर बनना चाहिए। और तो इस तरह से आपकी फैक्ट्री रोज बता रही होती है कि फैक्ट्री में माल नहीं बन रहा है। आपको रोज मालूम पड़ता है पर आप उसको करेक्शन नहीं कर पाते हो। और करेक्शन कहां पर है? कॉम्बिनेशन ठीक करो। बस गरीब की तरह खाओ, अमीर की तरह जियो। सिंपल खाना।

और तीसरा लास्ट अगर हमारा हमारा जो न्यूट्रिशन है, हम हेल्थ फूड जो कहते हैं, क्या है हेल्थ फूड? आप नॉर्मल जो खाना खा रहे हो इसको हेल्थ फूड कहते हैं या मीट, अंडे, मछली को हेल्थ फूड कहते हो? हेल्थ का मतलब क्या? जो खाना 100% बॉडी की केमिस्ट्री के अनुसार डिजाइन किया गया। जैसे गाय के लिए घास डिजाइन है। है ना? चिड़ियों के लिए दाना डिजाइन। जो भी। तो अगर नॉनवेज खाने से हेल्थ मिलता तो देख लो सारी दुनिया में नॉनवेज खाया जा रहा है। और जितनी बड़ी-बड़ी बीमारियां वेजिटेरियन से ज्यादा है, यह तो सब जानते हैं। स्टिक्स मुझे कहने की जरूरत नहीं है। और अगर रोटी दाल ठीक है तो देख लो सारे शाकाहारी आदमी तो छोड़ो, बड़े-बड़े महात्मा भी बड़ी-बड़ी बीमारियों से होकर जा रहे हैं संसार से। तो कहां है उसका उसका लाभ कहां पर है? और यही मेरी खोज कि आखिरकार मेरा भोजन क्या है? बस इसकी मुझे खोज थी। तो मैंने देखा कि मांसाहार, दूध और अन्न खाकर हम जिंद तो रह सकते हैं लेकिन स्वस्थ कभी नहीं, बड़ी-बड़ी बीमारियों के साथ। तो फिर क्या है हमारा भोजन? हमारा भोजन है फ्रूट्स एंड नट्स। क्यों भाई? कैसे विश्वास कर ले फ्रूट्स एंड नट्स है? चलिए बताता हूं। पांच मिनट में।

देखिए पहली बात। दूध और अन्न। दूध और अन्न जो है, मैं नॉनवेज की चर्चा नहीं करूंगा यहां पे। दूध दांत नहीं आने तक परमात्मा की व्यवस्था। दांत आए, दूध गाए। फिर संसार का कोई प्राणी प्रण के दूध नहीं पीता सिवाय आदमी के। देयर आर 4500 मैमल्स। 4500 दुधारू प्राणी है। सबके दूध पीने का पीरियड समाप्त होता है। आदमी का पीरियड कभी समाप्त नहीं होता। और गाय का बछड़ा महीना भर के बाद अपनी मां का दूध छोड़ देता है। विनिंग पीरियड के बाद और हम लोग परेशान होते हैं, अब मेरा बच्चा कैसे बड़ा होगा? गाय खुद नहीं पीती अपने कैल्शियम के लिए जो 2000 पाउंड की हो गई और हम क्या कहते हैं, हमारा कैल्शियम कहां से आएगा भाई साहब? अरे जब उसकी जात को संतान को अपने ग्रोथ और कैल्शियम के लिए दूध की जरूरत नहीं है तो तुम्हारी जात को ज्यादा जरूरत पड़ गई? और ये क्या सिस्टम है भैया कि बोन बाय ह्यूमंस एंड नरिश बाय एनिमल्स? जानवरों से पैदा होते हो और पशुओं से पलते हो तुम? तुम्हारा वो तुम्हारे तुम्हारे मां-बाप है। तुम रिश्ता बना लेते हो। आंटी ने, मां-बाप ने सब बना लेते हो उनके साथ में।

और हर जानवर के दूध में कौन से तत्व होते हैं? जैसे उसके बच्चे का डेवलपमेंट। जैसे बकरी के सॉरी खरगोश का दूध में खरगोश के 8 दिन में डेवलपमेंट होता है। 14% प्रोटीन होता है। बकरी का बकरी का। भैंस के भैंस के हिसाब से। सो भैंस के दूध में कौन से तत्व होते हैं? बड़े-बड़े कोर्स हेयर, बड़े नाखून, बड़े सींग, बड़ा हड्डी का ढांचा, लो ब्रेन। उसके अनुसार वह दूध बना हुआ है। तो इसलिए भैंस आदमी को देख के गाना गाती रहती है कि तूने मेरा दूध पिया है। तू बिल्कुल मेरे जैसा है। तो क्या आप ऐसा कह सकते हो क्या? शेरनी का दूध बकरी के लिए बड़ा हेल्दी होता है। बकरी का दूध ऊंटनी के लिए बड़ा हेल्दी होता है। ऊंटने का दूध गधी के लिए बड़ा हेल्दी होता है। कैन यू से लाइक दैट? जब जानवर का जानवर के लिए हेल्दी नहीं होता भाई, तुम्हारे लिए क्या क्या हेल्दी होगा? और भगवान ने तुम्हारे खाने में ऐसी क्या कमी रखी भाई कि जो तुम्हें जानवरों के पीछे भागना पड़ रहा है और उनसे रिश्ता बनाना पड़ रहा है? तो तुम्हारा जो खाना है वो भगवान ने फ्रूट्स, नट्स में बनाया। बादाम, अखरोट, तिल, मूंगफली, काजू, चिलगोजा। अरे इतने नट्स, सीड्स दिए हैं। इनको एंजॉय करो ना। वो तुम्हारा भोजन है। छाती ठोक के खाओ। तो इसीलिए के दूध जो है ऑकेशनली इस्तेमाल करो। जोर मत दो, नहीं तो बड़ी-बड़ी बीमारियों में उलझ जाओगे। मुझे कहने की जरूरत नहीं है। पूरा विश्व कह रहा है आजकल। मेरी किताब मैंने 40 साल पहले लिखी थी, मिल्के साइलेंट किलर। जरा सोचिए। तो कहने का मतलब है कि नर्स को प्रेफरेंस दो। अपने बच्चों को भी वही दीजिए।

और तीसरा लास्ट एक पांच मिनट बस। हां। सॉरी। एक्चुअली वो मेरा सब्जेक्ट खत्म नहीं हुआ। हां, पांच मिनट सिर्फ। तो लास्ट जो है वो है सीरियल्स। देखिए ग्रेंस जो है। अब अगर मैं आपके सामने एक थाली के अंदर कच्चा मांस लाकर रखूं, क्या आपकी आत्मा देखकर उसको लात टपकाती है? कच्चे अंडे देखकर क्या मुंह में बड़ी लात टपकती है? आपके सामने गेहूं का ढेर, बाजरे का ढेर, ज्वार का ढेर, रागी का ढेर लगा दूं? क्या उनको देख के आपकी आत्मा बड़ी गदगद होती है? ला टपकती है मुंह में। लेकिन जैसे ही आप केला, चीकू, पपीता, आम, अखरोट, बादाम देखते हो, देखते तुमको नहीं लगता हम बने, तुम बने एक दूजे के लिए। एक एक स्वाभाविक आकर्षण आपकी नेचुरल इंस्टिंट कहती है कि या दिस इज माय फूड। ऐसा बोलते हैं ना? आप जानते हो परमात्मा ने दुनिया में किसी खाने में ये ये चीजें नहीं भरी है। वो क्या है? सुंदरता, सुगंध और स्वाद। सुंदरता, सुगंध और स्वाद सिर्फ हमारे भोजन में है। बाकी दुनिया में किसी के भोजन में नहीं है।

और चलो अन्न तो हम कच्चा नहीं खा सकते। नहीं खा सकते ना कच्चा? यस या नो? नहीं खा सकते? चलो मैं उभा के देता हूं। उबला हुआ गेहूं, उबला हुआ ज्वार, उबला हुआ बाजरा। मैं कहता हूं खाओ इसको। लेकिन नमक, चीनी कुछ नहीं मिलेगा। खाओ इसको एस इट इज। खा सकते हो फीका। जिस अन्न को तुम कच्चा भी नहीं खा सकते, जिसको तुम उबाल के भी नहीं खा सकते और तुम कहते हो वह मेरा भोजन है। एक रोटी खाने के लिए आपको समुद्र से जाकर नमक सुखा के लाना पड़ेगा। गाय पैदा करके घी निकालना पड़ेगा। सरसों पैदा करके सरसों का तेल निकालना पड़ेगा। 10 तरह की सब्जियां पैदा करनी पड़ेगी। 10 तरह के मसाले पैदा करने पड़ेंगे। आग पैदा करनी पड़ेगी। तब जाके तुम्हारे मुंह में एक रोटी खुसकी है। और तुम लोग क्या कहते हो? मैं तो रोज नॉर्मल खाना खाता हूं। यह नॉर्मल खाना है। इतना डिपेंडेंसी वाला। और जब तुम बीमार पड़ते हो डॉक्टर निकालता क्या है? भैया जो जोड़ा सब वापस निकाल। अब नमक, चीनी, घी, तेल। आपने कभी ऐसे सोचा भाई साहब, मैं केला कैसे खाऊं? घर में तेल नहीं है छोंकने के लिए। भाई साहब, मैं आम कैसे खाऊं? एक हरी मिर्च मिल जाएगी जिसके थ्रू आम खा लूं। चलो आपने नहीं कहा। गाय ने कहा हो भाई साहब, ये घास क्या दे दी? क्या थोड़ी काली मिर्च या कोई मेयोनीज़ नहीं है क्या? बोला कभी ऐसे है किसी का आहार कभी डिपेंडेंट किसी के ऊपर? और हम लोग इतना डिपेंडेंट वाला आहार खा के हम बीमार पड़ रहे हैं और ये आधी बीमारियां तो नमक, चीनी, घी, तेल, मसालों की है भाई। तो कहने का मतलब है कि आप आहार को बेसवाद बनाते क्यों हो? कि इतने मसाले डालने पड़े आपको? तो अना तो इसका मतलब क्या है? अनाज को कम करो। आप जानते हैं अनाज खाकर हम क्या कर रहे हैं? शरीर को जड़ और स्टिप बनाए जा रहे हैं। और उसको तोड़ने के लिए 500 तरह के योगासन कर रहे हैं हम लोग। आदमी के सिवा दुनिया में कोई इतनी एक्सरसाइज नहीं करता जितना आदमी करता है। इतना बारीक उसे जड़ बना दिया कि वो उसको तोड़ने के लिए हमारे योगियों को 500 आसन निकालने पड़े कि भैया यह तोड़ना है तो ऐसे बैंड कर, यह तोड़ना है तो ऐसे बैंड कर और जिंदगी भर तोड़ता रहे। आप जानते हो अंगड़ाई के सिवा आदमी को कोई योगासन की वास्तव में जरूरत नहीं पड़ती है। अगर तुम्हारा आहार सही हो, तुम्हारा आहार नेचुरल फ्लैक्सिबल बना। तुम्हारी बॉडी नेचुरल फ्लैक्सिबल बनी हुई है। तो इसलिए दोस्तों कहने का मतलब है अनाज को कम करो। हमारे ऋषि मुनि जानते थे अनाज ठीक नहीं है। इसलिए उपवास के नियम बनाए गए कि अनाज से मुक्ति पाएं। तो अनाज कितना कम करना है? 50% कम करो। 50% कम करके एक बार तो फल तो जोड़ो भाई कम से कम जो तुम्हारा खाना है। और जो बाकी जो खाना खाते हो तो सलाड खाए बिना खाना मत खाओ। और जैसे अनाज कम करोगे जानते हो क्या होगा? आपके जितने अन ऑथराइज्ड कंस्ट्रक्शन बॉडी में जो आ गए ये जो ये सारी बिल्डिंग जो फ्लोर निकल गए ये सारे डेमोलिश होकर अपने आप नॉर्मल शेप में आ जाएंगे। रियल में बता रहा हूं। यह मेरे देखिए हमारे स्टूडेंट है। एग्जांपल बैठे हुए हैं। 135 किलो से 75 किलो में आए। 135 किलो से जिस तरह उसने वजन बढ़ाने में कोई मेहनत नहीं की, ना उसने घटाने में भी कोई मेहनत नहीं की। उसने ऐसा खाया एक दिन वेट बढ़ गया। अब ऐसा खाया एक दिन घट गया। इतना सिंपल है और आप लोग वीएलसीसी भाग जाते हो। तो इसीलिए दोस्तों अनाज कम करो और अनाज कम करते ही क्या होगा? जितने हमारे नेचुरल बेनिफिट्स हैं आप जानते हैं स्किन आपकी कभी खराब नहीं होगी। सर्दी में कभी तंग नहीं करेगी। गर्मी नहीं लगेगी। पानी की प्यास ज्यादा नहीं लगती। एनर्जी इतनी रहती है कि आपको थकना मुश्किल हो जाएगा। इतना जबरदस्त फायदा है। तो दोस्तों आप धीरे-धीरे मैं ऐसा नहीं कहता अपने लिए अपनाओ। इस नेचुरल फूड को अपनाओ। अनाज कम करो। दूध से मुक्ति पाओ। भगवान ने आपके लिए सब कुछ रचा है। उसका पूरा मजा लो। और लास्ट में मैं यह कहना चाहूंगा कि आदमी ने 100 साल का खाना 25 साल में खा लिया। दाना पानी खत्म हुआ। कुदरत ने जल्दी उठा लिया। चलिए नमस्कार।