Transcription
[संगीत] खराब सुनते लोगों को बहुत बार सुनकर ये बात दिल में आई मेरा मन हार गया मैं लिखने को बैठा सच ये है लोग खुद ही खराब हैं, ज़माने को दोष देते हैं मुझे लगता है लोगों में नहीं रहा वो पहले वाला कोई जज़्बा और ना ही रहा कोई जोश। इंसानियत, एहसास, प्यार, भरोसा सब मिटता जा रहा है मनी के लिए। फिर ये इंसान दूसरे इंसान को कुछ भी कर सकता है। जैसे हो ये तो कोई फनी बात उसके लिए सोचा ना था पैसे के लिए गिर जाएगा इतना। ये इंसान भी जान लेकर किसी दूसरे इंसान की बन जाएगा। ये तो हैवान भी ऐसा नहीं करता एक दूसरे के लिए। जैसे इंसानियत के नाम को ही करके बदनाम बनते जाते हैं। ये बच्चे इन्हें ना है अब कोई होश और कर रहे हैं दूसरे लोगों को बेहोश। हँसते हैं चेहरे से, द दिल है अंदर से हुआ बेहोश। खुद बनते हैं मासूम और लोगों के सामने लोगों को दिखाते हैं शराफत। आसमान पे बरसाते रहते हैं गुम के बादल इसी छूटे अमाल और दिखावे से बसाई है इन लोगों पर तूफानी बारिश। नतीजा इन लोगों के अमाल का जो हो चुके हैं पैदा दिल में इनके खुदा नहीं रहा। अच्छे काम भी दिखाने के लिए करते हैं अब ये सब समझ नहीं आती ये बात मेरी क्यों करते हैं वो भी दुनिया को दिखाने ही अब लोगों के सामने अच्छे और नायक हैं। बंदे-बंदे पर जिस अरब की नज़रों में था कुछ साल में इन्हें बनाना आजकल क्यों है ये इंसान खाक बनते जा रहे हैं सबकी नज़रों में। अब इंसानियत का नाम ही मिटा दिया इन लोगों ने। तो कुछ किया भी तो दिखावे के लिए लेकिन देखना होगा आखिर एक दिन ये झूठा दिखावा ही बनेगा धोखा इन लोगों के लिए। इन लोगों के छूटे अमाल बनेंगे फाँसी का फंदा इनके लिए। हाँ सच जानकर भी लोग छुपाते हैं यहाँ पर मैं लिख रहा हूँ कुछ अल्फाज़ यहाँ जो लोगों के दिलों के राज हैं वो पोशीदा फिर नहीं आते उन लोगों के मुँह से बनकर आवाज़। मुझसे ना हो सका सफ़र और लिखकर ख़त्म कर रहा हूँ इंसानियत के नाम पे फैलाई जाने वाली छोटी-छोटी दिखावे के पर्दे को फाड़। [संगीत] को फाड़। को फाड़। [संगीत]