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KHORTHA LITERATURE CLASS -1 BY THE LEGEND OF KHORTHA DR. B.N.OHDAR SIR #JPSC_MAINS

Study MCQ2:37:57

Transcription

ठीक है। देखिए, हम लोग सामान्य से बात करेंगे। बिल्कुल जो आपसे संबंधित होगा, परीक्षा से संबंधित है। तो चूँकि परीक्षा झारखंड की है, विषय भी झारखंड का ही है, आप भी झारखंड के ही हैं। तो कई ऐसी चीजें हैं जो हम झारखंड के होते हुए भी हम कई चीजों को नहीं जानते हैं। तो जो बेसिक चीज है और वह परीक्षा के दरमियान भी, आपको तैयारी के दरमियान भी बराबर आपके रूबरू होता रहेगा, आपसे मुलाकात होती रहेगी उन चीजों की। तो हम यह जानना चाहते हैं, आपको पढ़ना क्या है मुख्य रूप से? देखिए तो अरे, ओके सीक्वेंस में ये उधर जाएगा है ना? भाषा के बाद साहित्य, उसके संस्कृति। ये चार चीजें हैं आपको पढ़नी हैं मुख्य रूप से, जो आपको प्रारंभिक स्तर पर इसको जानना जरूरी है और कायदे से जानना है।

अब मुझे यह बताइए, झारखंड कहने से क्या समझते हैं? सिंपल सा कोई पूछे तो आपसे कुछ दूसरे तरह की उम्मीद करे। लोग सामान्य बोलता है, झाड़-झंखाड़ का प्रदेश है। आपसे ऐसी उम्मीद तो नहीं होगी। क्या कहना चाहेंगे आप? झारखंड सामने कैसे बोलेंगे आप? क्या है झारखंड?

सर, एक भौगोलिक क्षेत्र जिसमें मतलब एक टाइप का एक जैसा संस्कृति और विभिन्न भाषा और विभिन्न साहित्य मौजूद है। यहां पे एक प्रकार का लोक पर्व। आप लोग और कोई? आप बताइए, झारखंड कहने से आपके दिमाग में क्या इमेज बनता है?

विविध संस्कृति। विविध संस्कृति। लगता है संस्कृति का। देखिए, किसी भी चीज को परिभाषित करने से पहले उसके संबंध में कुछ फैक्ट्स को हमको कलेक्ट करना होगा, कुछ जानकारियां जानने प्राप्त करनी होंगी, तब हम इसको डिफाइन कर सकते हैं प्रॉपर्ली। तो देखिए, इसको कई ऐसी चीजें हैं। माली, सिर्फ झारखंड एक भूभाग नहीं है। भूभाग में रहने वाले लोग हैं, यहां की भाषा है, यहां की संस्कृति है, यहां के फ्लोरा-फावना है। यह सारी चीजों मिलकर के उसको एक कंप्लीट वन बनाता है, एक पर्टिकुलर टेरिटरी है। ठीक है? वह बहुत टटी, बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण है कि जैसे मान, झारखंड कहने से तो एक बड़ा व्यापक क्षेत्र है कि भाई, वो जो विस्तार ये में विस्तारित अर्थ में झारखंड चार राज्यों में अभी तक विस्तारित है। ठीक है? झारखंड बिहार का है, जो हमें प्राप्त है, वह बिहार से प्राप्त हुआ है। एक हिस्सा बंगाल में है, एक हिस्सा आपको उड़ीसा में है, एक हिस्सा आपको छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश में है। तो ये सारे चीज इसको ग्रेटर झारखंड बोल सकते हैं। ग्रेटर झारखंड का जो कांसेप्ट था, वह हमें पूरा नहीं हुआ, लेकिन हमें बिहार से प्राप्त हुआ, जो हम इसको झारखंड कहते हैं। क्योंकि, क्यों हम कहते हैं? चारों स्टेट में पटा हुआ है। क्या चीज उसमें कॉमन है? कॉमन है उसका लैंग्वेज और कल्चर। और जो कल्चरल जो फर्क है बिहार के साथ में, वही मेरा सबसे बड़ा आधार रहा झारखंड का अलग होने का। सिर्फ वो टेरिटरी का क्लेम नहीं था, बल्कि हम कल्चरल क्लेम था कि हमारा झारखंडी, क झारखंडी कल्चर जो है, डिफरेंट है बिहारी कल्चर से। एक बड़ा सा आधार हमारा था।

तो देखिएगा, हम लोग इसको समझने से पहले झारखंड को कहेंगे कि इसमें जातियां क्या कौन हैं? इसकी भाषा क्या है? और इसकी संस्कृति क्या है? इतनी चीजों की जानकारी मुख्य रूप से होगी, तभी हम इसको परिभाषित कर सकते हैं। ठीक है? तब हम जानेंगे झारखंड में कितनी जातियां या प्रजातियां हैं। तो झारखंड में मुझे बताइए, पहली प्रजाति है आपको जानते होंगे आप, प्रोटो-एस्टोलाइक। प्रोटो-अलाइक। ठीक है? दूसरा है आपको प्रोटो के अंदर जो जातियां हैं, जनजातियां, वह है मुंडा, संथाल, हो। इसका लिमिटेशन है। खड़िया। ये चार इसमें जनजातियां हैं। और भी छोटी-छोटी जनजातियां हैं, लेकिन इसके अंतर्गत सब वो शामिल हो जाती हैं। मुख्य रूप से मुंडा, संथाल, हो और खड़िया। अब है कि मुंडा की भाषा मुंडारी है, खड़िया की भाषा खड़िया है, संथाल की भाषा संताली है, और हो की भाषा हो है। ठीक है? तो मेरे पास जो है, आपको चार जनजातियां हैं और चार भाषाएं हैं। हमारी चार भाषाएं हो। ठीक है? चार जनजातियां हैं। प्रजाति एक है। इधर जनजातियां चार हैं। ये जनजाति और भी हो सकती है। इसके अंतर्गत, लेकिन वो जो है, आपको प्रोटो के अंदर मुख्य रूप से मुंडा, संथाल और खड़िया जनजातियां हैं। और इसकी जो भाषाएं हैं, वो मुंडारी, संताली, हो, खड़िया हैं।

दूसरी बात है कि यहां अरे बा, दूसरा है आपको द्रविड पर प्रजाति। दूसरी प्रजाति है आपकी द्रविड प्रजाति। द्रविड प्रजाति के अंदर जो जनजाति है, वह है उराव। इसकी और दूसरी है आपको माल पहाड़िया। उराव की भाषा है कुडुख। इसकी भाषा है माल्ट। ये दो भाषाएं हो जाती हैं आपकी। उसमें से आपको एक भाषा मतलब एक ही रिकॉग्नाइज है। यह आपको इसको क्या कह सकते हैं? द्वितीय राजभाषा है। एक एक जो है, उसको रिकॉग्नाइज नहीं है। रिकॉग्नाइज लैंग्वेज नहीं है। हम लोग काउंट सिर्फ इसको करते हैं अभी। ठीक है? हां, सवर्त नहीं लिखा। ठीक है। हम यही बात आगे कर रहे हैं। तो इसमें देखिएगा कि कुल हम अभी रिकॉग्नाइज लैंग्वेज हैफ आपका एक है। उसके बाद देखिए कि आपको तब हो रहा है कि जनजातीय भाषा कितनी हुई? आपको चार जोड़ एक बराबर पांच है।

और तीसरी प्रजा है आपकी, तीसरी प्रजाति है आपकी आर्य। आर जो है, आर्य प्रजाति के जो लोग हैं, वह सदानंदन। सदानंदन हैं और सदानी की के चार सदस्य हैं। खोठा, कुरमाली, आपका ये है आपको नागपुरिया और चौथा है आपको पांच परगनिया। पापरगनिया। ठीक है? तो यहां जो है, आपको चार भाषाएं हैं। तो कुल मिलाकर के आपको झारखंड में कितनी भाषाएं हो रही हैं? पांच प्लस चार बराबर नौ। ठीक है? तो यह जो है, नौझ। इसमें अब देखिएगा कि तीन प्रजाति हुआ और तीन भाषा परिवार। तीन भाषा परिवार के आपके नौ भाषाएं। और दूसरा है तीन संस्कृति। अब मेरे पास जो है, तीन प्रजाति है, तीन भाषा परिवार है, और तीन संस्कृति है। तब हम इसको आराम से खठ इसको डिफाइन कर सकते हैं। झारखंड को कैसे करेंगे? देखिए कि झारखंड एक बहु प्रजाति है। क्या है भाई? बहुभाषिक एवं बहु सांस्कृतिक राज्य है। झारखंड एक बहु प्रजाति है, बहुभाषिक, बहु सांस्कृतिक राज्य है। मतलब है कि मोर देन टू है, तो बहु मल्टी हो ही जाएगा। ठीक है ना? तो इसको कह सकते हैं कि यह हम कह सकते हैं, झारखंड इज मल्टी-एथनिक, मल्टीलिंगुअल एंड मल्टीकल्चरल स्टेट। तीन भाषा, तीन मतलब प्रजातीय समुदाय के लोग रहते हैं झारखंड में। तीन त यली तीन संस्कृति भी होंगी। तो तीन संस्कृति के लोग रहते हैं और तीन भाषा परिवार है। तीन भाषा परिवार के अंदर जो है, आपको नौ लैंग्वेजेस हैं। ये रिकॉग्नाइज लैंग्वेज है और ये नौ भाषाएं जो हैं, आपकी झारखंड की द्वितीय राजभाषा का दर्जा नौ को प्राप्त है। झारखंड के संबंध में इतना कहेंगे तो हमको लगता है सफिशिएंट हो जाएगा। झारखंड एक बहु, बहुभाषिक नहीं, बहु प्रजाति है, बहुभाषिक, बहु सांस्कृतिक राज्य है। यह आपको कहीं जब भी किसी सवाल का मुखड़ा बनाएंगे, तब ये चा ज्यादा मददगार होगा। ठीक है ना? किसी सवाल का भी मुखड़ा बनाएंगे, तो मुखड़ा भी फड़कता हुआ होना चाहिए। इस आप मतलब किसी के यहां तो नहीं घुसते हैं ना? दरवाजा खड़खड़ हैं, पहले खाते हैं, कोई कोई संकेत देते हैं, तब ते हैं। तो आप सवाल का सीधा जवाब, सीधा ड़ आना होगा। इसको आराम से इसको करके आप जवाब दे सकते हैं। किसी भी सवाल में ये फिट हो जाएगा। तो यह जो है, आपको झारखंड के संबंध में, यह हमारी सामान्य समझ है। यह आपको बीच-बीच में आता रहेगा। खंड के संबंध में, यह हमारी सामान्य समझ है कि यह तीन प्रजाति के लोग रहते हैं, तीन भाषा परिवार है और तीन संस्कृति है। यह झारखंड हुआ।

दूसरी बात है कि लिखले सभी अपना। हां। इसमें आपका झारखंड तो हो गया। दूसरा है आपको भाषा। भाषा से क्या समझते हैं? भाषा कहने से क्या समझते हैं?

भाष स सं संचार का माध्यम। उसको तो फंक्शन है ये। बट व्हाट डू यू मीन बाय भाषा? उसका काम है। अभिव्यक्ति का जरि। अभिव्यक्ति का जरिया है। ठीक है? वो भी उसके काम में है। अपना को मतलब किसी को समझाने के लिए जो माध्यम से हम लोग बातचीत करते हैं, फिर मतलब की उसको समझाने का कोशिश करते हैं, तो उसको भाषा बोल सकता है। वो सांकेतिक भी हो सकता है, लिख के भी दे सकते हैं या बोल के अपने मतलब की भावनाओ, विचार को आदान प्रदान करने के लिए माध्यम। कैसा माध्यम? सर, जो ये कर रहे हैं, वो सामने वाले भी उसी माध्यम क रखते हो और अप भाओ को विचारों को।

ठीक है। देखिए, झारखंड की जो मतलब, यह जो परिभाषा भाषा की बता रहे हैं ना, वो परिभाषा तो नहीं है, लेकिन आप थोड़ा टच कर रहे हैं परिभाषा और जा रहे हैं। इसको एक लाइन में देखिए, बहुत सारे लोगों ने इसको परिभाषित किया है, लेकिन इसका एक सबसे बड़ी, बहुत मुकम्मल परिभाषा जो मिलती है, कंप्लीट वन, वह आपको इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में आपका एक परिभाषा दी गई है। वह बिल्कुल कंप्लीट वन परिभाषा है। वह परिभाषा यह है कि भाषा, यह परिभाषा बिल्कुल खय मेरा एंट्री क्लास है, समझा रहे हैं बस। भाषा क्या है? इसको समझिए। ठीक है? भाषा क्या है? इसके बारे में समझ बननी चाहिए। जैसे अभी हमने पूछा, तो आपने फंक्शन बता दिया। ट हमने परिभाषा कैसे करेंगे? आपने कहा कि विचारों के माध्यम, विचारों को प्रेषित करने के माध्यम है। यह भी है। ठीक है? उसका फंक्शन है, बट भाषा क्या है? यह तो आपने नहीं बताया। तो इसको थोड़ा, यह समझने के लिए ऐसा में मेरा कहना समझिए। फिलहाल मा आपको तो देना है, ले ठ में हमको बोलना चाहिए। मैं हिंदी में क्यों बोल रहा हूं? इसलिए कह रहा हूं, अभी आपको समझना है। हमको मैं पूरा का पूरा लेक्चर हिंदी में ही दूंगा। ठीक है? खाऊंगा खोठा में, उदाहरण होंगे खोठा के। मैं खोठा में बोलूंगा, तो शायद हवा हो जाए बात। ठीक है ना? टना होगी। इसलिए, चक वो आपके सुविधा के लिए, इसमें इसको बोल सकते हैं। किसको? इसको लिख लिया? अभी तो अब इसको समझिए।

पहला है कि भाषा एक व्यवस्था है। लैंग्वेज इज सिस्टम। भाषा एक व्यवस्था है। दूसरा है, भा भाषा एक व्यवस्था है। किसकी व्यवस्था है? यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की। तीसरी बात है, जिसके माध्यम से से समाज विशेष के लोग, कच कसे है? समाज विशेष के लोग विचारों का आदान प्रदान करते हैं। ठीक है? तो अब है कि समझ कि भाषा एक व्यवस्था कैसे है? भाषा एक व्यवस्था है कैसे? मान ली कि भाषा एक व्यवस्था है। किसकी व्यवस्था? याद ध्वनि प्रति। अब याद ध्वनि क्या है? याद ध्वनि है, याद जोक इसका मतलब है, पंचायत करना। आर्बिट्रेरी। आर्बिट्रेरी मतलब इसको कई लोगों ने मान लिया इसको कि यह जो माने हुए ध्वनि प्रति, इसको बोल सकते हैं कि हम या द की जगह बोल सकते हैं, माने हुए ध्वनि प्रतीकों की। अब ध्वनि प्रतीक क्या है? मान लीजिए, मैं जो बोल रहा हूं, वह दिखाई पड़ रहा है आपको? सिर्फ सुन रहे हैं। देख तो नहीं पड़ रहा है। मतलब वो विजिबल नहीं है। तब है कि और भाषा इसी स्तर पर सिर्फ मौखिक, वाचिक स्तर पर, भाय मौखिक स्तर पर हजारों सालों तक, लाखों सालों तक चलती रही। भाषा पूरा का पूरा वैदिक साहित्य जो है, आपको मौखिक ही रहा है। वह श्रुति और स्मृति पर रहा है। पूरा का पूरा वैदिक हित। बाद में चूंकि वो जितना भारी होता गया, क्योंकि भाषा के जो स्तर हैं, आपको उच्चारण, श्रवण, अमरण, चौथा संवहन। ये चार ही स्टेप थे और भाषा इसी पर आश्रित थी। उच्चारण करना, सुनना, स्मरण करना, फिर आप मैं जो बोल रहा हूं, आप तक जाना, संवहन। ये चार बिंदु थे, चार। और सब कुछ इसी पर आधारित है। भाषा यहां। इसमें से अगर थोड़ी सी भी गड़बड़ी हो जाए, उच्चारण में अगर थोड़ा सा दोष हो जाए, तो श्रवण आपका सही है, सुन लेंगे, तो भाषा में विकृति हो सकती है। मान ली उच्चारण सही है, आपका श्रवण सही नहीं है, तो भाषा में विकृति हो सकती है। जैसा सुनेंगे, वैसे याद करेंगे, फ दरे को बोलेंगे, भाषा में विकृति होगी। है कि अगर मान ले कि उच्चारण सही है, श्रवण भी सही है, स्मरण अगर गलत है, तो भाषा में विकृति की संभावना थी। और मान ली कि वो तीनों सही है, और हमारे आपके बीच का डिस्टेंस इतना है कि मैं बोलूं, आप सुन नहीं पाए, तो भाषा में वहां भी संभावना की, वहां भी गड़बड़ी होई। और यह परेशान करता रहा लोगों को, क्योंकि स्मरण करने की भी एक क्षमता है, सीमा है। मान ले अकेला वेद में 100 हजार समथिंग आपको बचाए हैं। अब माने कई लोग तो हैं कि द्वेदी हो गए, त्रिवेदी हो गए, चतुर्वेदी हो गए, चारों वेद याद करने वाले लोग हो गए। कितना फास्ट रहा, कितना कठिन काम रहा होगा उसको याद करना। तब है कि वो चकि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। कई लोग प्रयास करते रहे कि हम जो बोलते हैं, उसको सिंबलाइज किया जाए। कैसे सिंबलाइज किया जाए? तो सिंबलाइज किया जाए, तो भाई उसमें क्या हुआ कि कैसे सिंबलाइज करेंगे उसको? तो इसको मान लिया गया। मा सिंबलाइज किया होगा, तो किसी मतलब, जो भी है, दो चार आदमी नहीं किया होगा। आर्बिट्रेशन का मतलब होता है, पंचायत करना। कुछ लोगों को मिलकर के, जो प्रभु लोग मिल गए होंगे, और ध्वनियों का, जैसे मान लीज कि आपका, जैसे मान लीजिए आपको य है, एक अ ध्वनि है। ऐसा हमने कहा। ऐसा क्यों? ऐसा किया? कोई लॉजिक है? कोई लॉजिक नहीं है। और कहने को कोई लॉजिक है? कोई लॉजिक नहीं। यही ध्वनि अ को अंग्रेजों, इंग्लिश में ऐसा लिखा जाता है। यहां भी कोई तर्क नहीं है। उर्दू वालों ने कहा कि मेरा ऐसा रहेगा। यह भी कोई तर्क नहीं है। सो आर्बिट्रेशन मत है, मान लिया गया। इसके पीछे कोई लॉजिक नहीं है। यह मान लिया गया। मतलब ऐसे मान लिए गए ध्वनि के प्रतीकों। याद ध्वनि प्रतीक मतलब, यह ध्वनि है, ना? ध्वनि है, आवाज है, उसका सिंबल। सिंबल है, य य सिंबल है, अ। इनकी जो व्यवस्था है, उनकी जो एक व्यवस्था है, वह भाषा एक व्यवस्था है। भाषा व्यवस्था कैसे होगी? देखिए, व्यवस्था कैसे है? मान लीजिए, मेरे पास एक क, एक सिंबल है। ठीक है? दूसरा सिंबल है म, और तीसरा सिंबल है ल। तीन सिंबल मेरे पास हैं। हमने एक सिस्टम, इसको अरेंज कर दिया, तो क्या हुआ? एक शब्द बनाना। तो भाषा एक व्यवस्था है। हमने सिस्टेट किया, तो एक शब्द बन गया कमल। कमल को कह से समझ स भी तो? क्यों? क्यों समझ रहे हैं? क्योंकि जिसके माध्यम से समाज विशेष के लोग। इसलिए समझ रहे हैं कि एक पर्टिकुलर समाज के सारे लोग हैं। एक खास समाज, समाज विशेष के लोग, मने एक पर्टिकुलर सोसाइटी के आदमी, जिनके यहां कमल नाम का एक फूल का नाम है, इसलिए समझ रहे हैं। ठीक है? एक अंग्रेज बैठा हो, तो समझेगा क्या? नहीं समझेगा। कमल कहने से उसके दिमाग में क्या को इमेज बनेगा? नहीं बनेगा। मान लीजिए, क्यों नहीं बनेगा? क्योंकि आपके सोसाइटी का आदमी वह नहीं है, इसलिए नहीं बना कोई इमज उसके दिमाग में। तो यह है कि अब मान ली क्या, वह हिंदी जानता हो, तब तो समझेगा ना? तब तो समझेगा ना? तो मेरा प्रजातीय दृष्टि से, मेरे कम्युनिटी का आदमी नहीं है, लेकिन भाषिक सदस्य है। वह स्पीच कम्युनिटी के मेंबर है। वह हिंदी जानता है। इसका मतलब भाषिक सदस्य है। दो मतलब मेंबर दो होते हैं। एक स्पीच कम्युनिटी है, दूसरा है एथनिक कम्युनिटी। हम लोग सारे लोग एक एथनिक कम्युनिटी के लोग हैं, इसलिए कमल समझ रहे हैं। अंग्रेज एथनिक कम्युनिटी नहीं है, इस नहीं समझ रहा है। लेकिन अंग्रेज हिंदी समझता है, तो हमारा स्पीच कम्युनिटी मेंबर हो जाता है। इसलिए उस समुदाय के सद सय, जिसके माध्यम समाज विशेष हो जाता है। अब मान लीजिए, थोड़ा सा अरेंजमेंट इसमें करिए। क के बाद ल करिए। थोड़ा सा सिस्टम में चेंज हमने किया। एक नया शब्द बन गया। नही शब्द मेरे पास है। नया शब्द, मने कलम हुआ। थोड़ा हम इसमें और और बद बदली करते हैं। मान ली हम लिखेंगे म ल क, मलक हुआ ना? अब ि यह भी आपको एक उर्दू का शब्द हो सकता है, हिंदी का भी है। यह आपको हिंदी-उर्दू शब्द है। और यह किसका शब्द है? मलक मन क्या होता है? चमकना। क्यों? और कोई लोग जान रहे? मलक ना? अरे कहां मलको है आजकल? है ना? बड़ा बिजल से मकना होता है ना? उसको, यह खोठा का शब्द है, मलक। तो मेरे पास तीन ही आपको जो सिंबल थे, वोकल सिंबल, और तीनों का जो हमने सिस्टमिकली अरेंज किया, तो वो जो है, एक शब्द बन गया। और उस शब्द को कौन लोग समझ रहे हैं? जो इस भाषा विशेष के मेंबर हैं। इसलिए अपने आप में है कि भाषा एक व्यवस्था है। किसकी? तो माने हुए ध्वनि प्रतीकों की। ध्वनि प्रतीकों को मान लिया गया है। ऐसा कोई भगवान ने नहीं दिया। मान लिया गया है। अगर हमारे पुरखों ने कहा होता कि हमारा ल ऐसा, य अ ऐसा होगा, ऐसा होता। ठीक है ना? तो ऐसा हम हमने अपना कहा कि भाई, ये मेरा ओ होगा। इसे में घुसा दिया। उसने अंग्रेज कहा कि हमरा वो ऐसा होगा। माना हुआ है। यह कोई लॉजिक नहीं है। यह जो है, इसलिए कि भाषा एक व्यवस्था है। किसके? तो माने गए ध्वनि प्रतीकों की, जिसके माध्यम से समाज विशेष के लोग विचारों का आदान प्रदान करते हैं। ठीक है? यह भाषा हुआ। ठीक है? तोक भाषा पढ़ना है, तो यह सारे स्टेप, स चीज है आपके बीच में आ। भाषा पढ़ने क्रम में, जो ठ भाषा पढ़ेंगे, वहां भी चीज सवाल रागी आपसे। यह भाषा हुआ।

अब तीसरी बात है हमारा साहित्य। साहित्य कुछ भी हो सकता है। खटा का भी साहित्य हो सकता है, हिंदी का भी सा हो सकता है। लेकिन आपको तो कोठा साहित्य से मतलब है। लेकिन सिर्फ कोटा सा से मतलब नहीं है। आपको हिंदी साहित्य से भी मतलब है, कुरमाली साहित्य से भी मतलब है, और बंगला से भी मतलब है। क्योंकि दो क्वेश्चन आपको ऐसा है। एक जगह पूछेगा कि खोठा भाषा का अन्य भाषाओं से प्रभाव। ठीक है ना? साहित्य के चैप्टर पूछेगा, खोठा साहित्य में भारतीय भाषाओं के साहित्य का प्रभाव। इसलिए सारे भाषाओं को, सारे साहित्य को समझना, इसके सारे स्टेप को समझना होगा। किन-किन स्टेप भाषा रही है? किन-किन स्तरों पर प्रभावित करती रही है? किसको? भाषा के चार स्तर हैं। भाषा के चार स्तर हैं, आपको है क्या की, एक तो है ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य, अर्थ। पांच स्तर मुख्य हैं। ये चार स्तर। इन सारे स्तरों को, स्तर पर प्रभावित करे, दूसरे को। ध्वनि स्तर पर, ठने किसको कितना प्रभ प्रत किया है? या ध्वनि स्तर पर हम कितने प्रभावित हैं? दूसरी भाषाओं से? इन सारे को आपको दिखाना होगा। अगर कंप्लीट दिखा। एक चैप्टर सेकंड चैप्टर आपको पढ़ना है कि खोठा भाषा की विशेषता। ठीक है ना? तो भाषा की विशेषता में इन सारी विशेषताओं को आपको पढ़ना है। यह चारों चीजों को।

तो यह जो है, आपको अब ये साहित्य। साहित्य कहने से क्या समझते हैं? बंधन में बांधना। साहित्य है। को विशेष उसका जो के अर उसको समा कर। और कोई? मैं इसलिए डिटेल से पूछ कर, बहुत सारे लोग नन-लिटरेरी ग्रुप के लोग हैं, अधिकांश लोग। उनको मतलब ही नहीं भाषा क्या, साहित्य क्या है। औरक भाषा के स्टूडेंट होने जा रहे हैं, तो आपको जानना जरूरी है। बोलिए, साहित्य मतलब क्या है?

अरे भाई, हम दवाई की दुकान में जाते हैं, दवा खरीदते हैं, तो अंदर का जो कागज होता है ना, हम कभी-कभी कते, इस लिटरेचर कहां है? कहते हैं ना? तो बिल्कुल साधारण अर्थ में, जो कुछ भी लिखा हुआ, उसको हम लिटरेचर कह देते हैं, दावा करते हैं। तो अंदर कुछ कुछ इंस्ट्रक्शन होते हैं ना, उसको बोते, इसका साहित्य कहां है? इसका लिटरेचर कहां है? तो उतने व्यापक स्तर में साहित्य नहीं होता है। जैसे आपने कहा ना, भाषा को कुछ अरेंज कर दिया, तो हो गया। कुछ भी लिखा जा सकता है, है ना? तो लिखावट तो जियोग्राफी की तोहि बोल सकते हैं। उस अर्थ में नहीं है। एक्चुअली साहित्य को समझिए बढ़िया से क्या है साहित्य? आप बताइए।

हेलो, गोड्डा, एनी बड़, कोई आप लोग? यस सर। भाषा को सही व्यवस्था बनाकर, उसका संकलन कर साहित्य क लिए। उबस भाषा को एक जगह। भाषा को सहि पक्रम बना कर के, उसका लिखित साक्ष बनाना। पूरी तरह। मैं आपकी बात को समझाने। मास्क खोल लीजिए सर। साहित्य उसको कह सकते हैं सर, हमने भाषाओं का एक संकरण बना करके, जिसके माध्यम से हम अपने विचारों को व्यक्त कर सकते हैं। सर, लिखित साक्ष के रूप में उपलब्ध। हमारे पास नहीं। वो तो कुछ भी लिखना तो शहिद नहीं होगा। मतलब व्यापक अर्थ में, मैंने कहा ना कि बैठ जाइए। व्यापक अर्थ में, वो भी है कि हम दवा का पुड़िया जो होता है, इंस्ट्रक्शंस होते हैं, उसको भी हम साहित्य कह देते हैं, लिटरेचर बोलते हैं ना? लेकिन उतने अर्थ में नहीं है। साहित्य का एक पर्टिकुलर जो अर्थ है, इसको ऐसे समझिए। मान लीजिए, आदमी सिर्फ हार्ड मांस का पुतला नहीं है। आदमी में भावनाएं हैं, दया है, क्षमा है, करुणा है, ममता है, प्रेम है, घृणा है। सारी इतनी सारी संवेदनाएं हैं, भावनाएं हैं। और इन्हीं का जो सम टोटल आदमी है। अब है कि मान लीजिए, सपोज कीजिए कि यहां एक तालाब है, पूरा लबालब भरा है। ठीक है? उसी तरह आपका बॉडी है, उसमें भावनाओं का तालाब है। ठीक है? यह

तालाब में अगर मान लीजिए अगर कहीं कोई किस्म की बाहर से छेड़छाड़ नहीं हो रही हो, हवा बह रही हो, चाहे कुछ भी गिरा नहीं हो, तो आप देखते होंगे। तालाब गए होंगे, देखते होंगे बिल्कुल शांत जल है, ठीक है। जब इसमें कोई पत्थर मारते हैं, पत्थर जिसको मारते हैं आप, तो क्या होता है? तरंगें उठती हैं और विलीन हो जाती हैं, ठीक है। क्यों विलीन हो गई? पत्थर छोटा था, तालाब बड़ा था, ठीक है।

मान लीजिए इसकी तुलना में थोड़ा बड़ा पत्थर मारेंगे, तो क्या होगा? तरंगें उठेंगी और वो बाहर तक हलाक-हलाक करना शुरू करेंगी, बाहर तक जाएंगी, ठीक है। अब क्या है, तो यह आपका परिवेश है, बाहर जो है, यह आपका दिल है, अंदर। यह आपका परिवेश है। परिवेश में कोई पत्थर यहां मार रहे हैं, तो कोई घटना जो होती है, यह परिवेश में पत्थर मारना घटना हुई। पत्थर यहां से मारा आपने, तो इसमें तरंगें उठती हैं और तरंगें बाहर तक जाने लगती हैं, ठीक है।

पहले पत्थर मारा था आपने, तरंगें बाहर तक नहीं गईं। सैलाब उठा अंदर में सिमट कर रह गया। बाद में बड़ा पत्थर जब गया, तो तरंगें बाहर तक जाने लगीं। बस सिमिलर घटना होती है आपके साथ में। घटना जब परिवेश में होती है, मान लीजिए एक्सीडेंट हो गया सड़क पर, उसको कई तरह से लोग रिट करते हैं। लोग देख रहे हैं, जैसे एक आदमी देखा, बोला कि भाई, अरे एक्सीडेंट हुआ, अरे अच्छा नहीं हुआ यार। फिर बोला, होता सड़क है, नहीं कॉमन बात है, चल दिया।

दूसरा आदमी देखा, उसी घटना को बोला, अरेरे बहुत बुरा हुआ यार, ये तो कहा का लोग था, कैसे था वो? इतना इंक्वायरी करने के बाद बोलेगा, ये समय हो गया, चलो, वो भी चला गया। तीसरा आदमी देखा, अरे ऐसा बहुत बुरा हुआ यार, उठाने की कोशिश किया, बोला पानी पिलाओ, भा कुछ करो। नहीं कोई सुना, तो भी चला गया। एक आदमी आया, पूरा देखा कि एकदम पूरा तुरत उसको समेटा, ख ब, थोड़ा पचा पचा पानी नहीं पिलाया, एंबुलेंस कोई गाड़ी रोकेगा नहीं रोकेगा। गाड़ी मा, बहुत भीड़ भाड़, तो एक दो थाप लगाएगा ड्राइवर को, गाड़ी देगा, चढ़ के हॉस्पिटल ले जाए। कितने तरह से लोग रेट कर रहे हैं। सिमिलर घटना है, एक ही घटना है। डिपेंड करता है कि आपकी जो भावनाओं के तालाब में कितना पानी है, ठीक है।

भावनाओं के तालाब में इतना पानी है, तब तो उठ कीचड़ है, तो फले कोई घटना नहीं, कोई रिएक्शन नहीं होता। तो वही बात है कि अब है कि पत्थर यहां मारा आपने, तो छोटी घटना, छोटी होगी, तो तरंगें भावना कम लरा। मारे घटना बड़ी होगी, भावना लरा ज्यादा मारेगी और बाहर भी होना चाहेगी। सिमिलरली आपका यहां जो है, कोई घटना आपके बाहर घटती है, आप देखते हैं, तो वो जो है घटना, बड़ी घटना हुई, तो आपके अंदर आंदोलन होगा भावनाओं का। भावनाएं आमतौर पर सुप्त रहती हैं, जब तक छेड़छाड़ नहीं होती बाहर से, भावनाएं शांत रहती हैं। तो भावनाओं में हरकत होगी और वह भावनाएं बाहर होना चाहेगी।

क्या पूछ साहित्य समाज का? हां, ठीक है। मैं और आ रहा हूं। है क्या है अरविंद कुमार कोमाली की क्लास? ये सब ये सब सवाल स सब कुरमाली क्लास हो गछ समय है। यह जो है, देखिएगा, वैसा ही होता है। बाहर में घटना घटती है, जैसे यहां घटना घटी, छोटी घटना थी, ज्यादा प्रभावित नहीं किया। बी बड़ा पत्थर मारा, बाहर होना, उसके तरंग बाहर तक गई। उ कोई बड़ी घटना जब हम देखते हैं, तब हमारे यहां जो भावनाओं में हलचल होती है और भावनाएं बाहर होना चाहती है। उसको माध्यम चाहिए बाहर होने के लिए। बाहर होना चाहती है भावनाएं, तो कैसे बाहर होगी?

अगर मान लीजिए कोई चित्रकार है, तो भावना रंग, कुची से कैनवास में जाएगी। भावनाएं बाहर हो गई उसकी। मान लीजिए कोई मूर्तिकार है, तो छेनी, हथौड़ा से मिट्टी से मूर्ति बना दिया। भावना वहां भी व्यक्त हो गई। मान लीजिए स्थापत्य का है, राज मिस्त्री है, बढ़िया भावनाएं एक भवन निर्माण करके अभिव्यक्त हो सकती हैं। अरे भाई, मुमताज बेगम को की सुंदरता को उकेरा ना ताजमहल में। भावनाएं अगर संगीत माध्यम से बाहर होती है, कोई संगीतकार है, संगीत के माध्यम से भावनाएं बाहर हो सकती हैं। मतलब भावनाएं एक ही है, माध्यम उसके, उसके जो माध्यम है भावनाओं के अभिव्यक्त होने के माध्यम और माध्यम के भेद से साहित्य, इसके जो है, उसके कला के अलग-अलग रूप हो जाते हैं।

मान लीजिए कि कोई आदमी शब्द का है, भाषा में उसकी पकड़ है, तो वो भावनाएं जब शब्द के माध्यम से व्यक्त होती हैं, तो साहित्य होगा। भावनाओं की काव्यात्मक अभिव्यक्ति या भावनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति साहित्य होता है। साहित्य को हम बोल सकते हैं भावनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति। शाब्दिक भावनाओं की, जो शब्दों के द्वारा कलात्मक अभिव्यक्ति होगी, वह साहित्य होगा। इसलिए कला के अनेकानेक भेदों में साहित्य भी एक कला है। कला के अनेका भेद में साद कला है।

तो यह जो है, देखिएगा कि वो भावनाएं जो है, मूल है। ये भावनाएं हैं और यहां आपके जो परिवेश में घटना है, तो बोल सकते हैं कि परिवेश संभूत चेतना, परिवेश की जो घटना, परिवेश संभूत चेतना की शाब्दिक अभिव्यक्ति साहित्य। परिवेश संभूत चेतना या अब चेतना क्या है? चेतना संवेदना है ना? अनुभूति सब एक ही है। चेतना सम वेदना, सम वेदना मतलब समान वेदना। उसको जितनी फड़फड़ा हो रही है, एक्सीडेंट हुआ व्यक्ति को, वही जब महसूस करेंगे आप अपने दिल में, जितना दर्द उसके हो रहा है, उतना ही दर्द इधर महसूस करेंगे, तब हो जा, तब आप कभी हो जाइएगा। और दर्द नहीं हुआ, तो फिर सारे लोग कभी हो जाते हैं, नहीं होते। कुछ उतना ही दर्द, इसलिए सम वेदना है ना? वो जो वेदना आपकी सम होनी चाहिए। अनुभूति, अनुभूति मतलब है कि वैसा ही एहसास।

कोठा में गीत है कि दो बहनें हैं, गोरी और सावरी, दोनों गठ बने जाती हैं। एक के पैर में कांटा चुभता है, दूसरी बेहोश हो जाती है। एक के पैर में कांटा चुभा, दूसरी बेहोश हो गई। काहे भाई? उसकी बहन के पैर में जितनी पीड़ा हो रही थी, वह पीड़ा स्वयं महसूस जब करेगी, तब वही एहसास होगा।

ट सिंपैथी, मने इसको क्या बोल सकते हैं? इसको उसको क्या बोल सकते हैं? सिंपैथी, दया के अर्थ में हो रहा है, लेकिन दया में नहीं होना चाहिए है ना? क्या इसमें, तो हम वही कह रहे हैं कि यह जो है, तो आपको वह आपकी जो है सहानुभूति और सहानुभूति भी कब होगा, वो भी क्या बोल सकते हैं, तीव्र होनी चाहिए। जैसे कहा कि भावना इस नहीं उठ रही है, छोटा पत्थर से छोटी घटना हुई, बड़े पत्थर से तरंगें बाहर तक जा रही हैं। मतलब है कि वह अनुभूति भी तीव्र होनी चाहिए। उसी को वाड्सवर्थ ने कहा है कि पोएट्री इज द स्पोंटेनियस ओवरफ्लो ऑफ द पावरफुल इनर फीलिंग। फीलिंग मस्ट बी पावरफुल। अनलेस आप नहीं कभी हो सकते। फीलिंग पावरफुल। उसी को बोलते हैं कि आपको तीव्र अनुभूत, अनुभूति की तीव्रता। अनुभूति आपकी कितनी तीव्र है?

अनुभूति की तीव्रता पर ही डिपेंड करता है साहित्य का सर्जन और कितना अनुभूति तीव्र है, तो उ उसी जो साहित्य जो सृजन होगा, वह कालजई होगा। कविता की लिख डाली, प्रेमचंद, प्रेमचंद ने लिखा, उनकी रचनाएं कालजई हो गई, तो उनकी जो अनुभूति थी, इतनी स्ट्रॉन्ग थी, इतनी तीव्र थी, उन्होंने लिखा, आज भी प्रासंगिक हो रहा है, ठीक है ना? तो अनुभूति की तीव्रता पर डिपेंड करता है साहित्य का महत्व। अगर हल्के ढंग से कविता, ऐसा नहीं कि चलो कविता कर देते हैं, ऐसा नहीं होता है। जब तक अनुभूति स्तर पर, अनुभूति भी तीव्र होनी चाहिए, अनलेस आपको कोई जो है कालजी रचना नहीं हो पाएगी। इसलिए अनुभूति की तीव्रता पर होता है। अनुभूति की तीव्रता इस पर डिपेंड करता है।

देखिए कि एक बार वाल्मीकि जी, जब वो कभी नहीं थे, वाल्मीकि जी तमसा नदी किनारे बैठे हुए थे और बिल्कुल शांत वातावरण था। कुछ पक्षियों का कलरव कर रही थी, वहां जोड़ा से जोड़ा प्रेम प्रेमालाप कर रहे थे। वहां इसी बीच में एक क्रौंच पक्षी को एक ब्याध ने मारा, तीर लगा और वो उड़ा, चिल्लाया, उड़ करके चिल्लाते हुए उड़ा और ऋषि के थोड़ा साने गिरा और चिल्लाने लगा, चिल्लाने लगा। तो उधर से कौंची आई और उसके गले लग कर के वो भी चिल्लाने लगी और उस सीन को देखकर, उस दृश्य को देख कर के वाल्मीकि का अंदर हिल गया। वो जो उनकी जो अनुभूति थी, उस दृश्य को, ठीक है ना? दृश्य को देखना और अनुभूति के स्तर पर उसको लेना, डिफरेंट थिंग है, ठीक है ना? कांटा तो देख सकते हैं, पर काटे की चुभन को नहीं देख सकते हैं और चुभन शाश्वत है, वेदना शाश्वत है। वो महाभारत काल में वैसे ही रहा होगा और आज भी वैसा ही है। वो इनविजिबल है, उसको अदृश्य है, उसको महसूस किया जा सकता है।

और कितना तीव्रता से महसूस कर? सिनेमा देख रहे हैं, हरिश्चंद्र तारामती, मांगा जा रहा कफन, दो कफन दो और वो रो रही है, हम क से देंगे कफन? पति मांग रहा कफन पत्नी से, बेटा मरा हुआ। उस समय आदमी देखेगा, जो सामंजस्य स्थापित हो जाता है, अनुभूति के स्तर पर जुड़ जाते हैं हरिश्चंद्र के साथ में, तब आप रोने लगते हैं, सिनेमा हॉल में बैठ कर के। क्यों? क्योंकि वो जो सम वेदना, जो वेदना वहां महसूस हो रही है हरिश्चंद्र को या तारामती को, वो वेदना आप महसूस कर रहे हैं, तब आप रोने लगते हैं, क्योंकि आप वो समानीकरण होगा वहां।

तो वही बात होती है कि आपको जो, तो क्या हुआ कि ऋषि जब देखा उन्होंने, तो उनके मुंह से स्वतः निकला, उनके मुंह से स्वतः फूट पड़ा, "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥" उनके मुंह से स्वतः फूट पड़ा। उन्होंने कोशिश नहीं किया, ओवरफ्लो हो गया उसका जो फीलिंग था, जो अनुभूति इतनी गहरी अनुभूति हुई कि वो जो है, उनका जो अंदर से स्ली फ्लो कर गया, उनका जो फीलिंग बाहर हो गया, जैसे ये तरंगें बाहर हो रही हैं। तो उसी तरह तब कवि जी बहुत व्याकुल हो गए और बोले कि अपने चेला को बोले, यावल तुम चलो, ये मेरा मन बहुत अशांत हो रहा है। फिर बाद में उन्होंने कहा कि मैं सृजन करना चाहता हूं। तब वो राम कथा को नारद जी ने उनको बताया। उसी राम कथा पर आधारित उन्होंने रामायण को लिखा और "मा निषाद प्रतिष्ठां" का जो जो वाक्य उनका पहला वाक्य है, उसको पूरे रामायण में उन्होंने उकेरा है। पूरे रामायण को हर अध्याय को देखेंगे, शुरुआत वहीं से होती है, वाल्मीकि रामायण की।

तो यह जो अनुभूति की तीव्रता पर डिपेंड करता है कि साहित्य आपका कैसा होता। तो हम इसको बोल सकते हैं कि परिवेश चेतना की शाब्दिक अभिव्यक्ति साहित्य है और किसी भी समाज का साहित्य जो है, किसी भी भाषा, किसी भी राष्ट्र का साहित्य समग्र चैतन्य बोध का सार तत्व होता है। किस देश का साहित्य कितना स्ट्रांग है, उतना ही सभ्य वो समाज कहलाएगा। आज भी देखिएगा कि यूरोप में चाहे इंग्लैंड में, आपके जो उनका रोज का, इनके नाटकों का मंचन होता है, शेक्सपियर के नाटकों का। हमारे यहां तो बड़े-बड़े साहित्यकार को नाम तक नहीं जानता है और वहां ऐसा नहीं कि सारे वैज्ञानिक लोग भी जानते हों। सारे लोगों को, हमारे अच्छे अच्छे साहित्यकार, हमारा सीधा बोले, हम तो कॉमर्स के स्टूडेंट, हम नहीं पता, हम तो साइंस पढ़ते, हमको नहीं पता।

स यस ने कहा, ने बो हो जाएगा, उसमें ज्यादा हो जाएगा, उसने किया क्या? इसका विरोध किया, स्ट दिया, केवल ता हो, अपने अपना वता उस देखिए, अपनी वयक्तिक तो आती ही है, नहीं आना कैसे? सने कहना कि देखिए, अनुभूति य कॉमन चीज है, उस व्यक्ति सवाल आता है। हम कह रहे हैं कि वो आपकी भावना कितनी तीव्र है, तो सबसे साहित्य हो जाता है, क्यों साकार नहीं है? क्यों खास खास लोग साहित्यकार हो जाते हैं? खंडन मंडन तो होता है, लेकिन शाश्वत यही है। कविता हो जाती है, कविता की नहीं जाती है। वियोगी होगा पहला कवि, आंसुओं से उपजा होगा गान, ढोलक, आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। कविता अनजान में बह गई होगी। कविताओ भावना की चीज है, साहित्य भावनाओं की चीज है, ठीक है ना? भावना की चीज है।

मान लीजिए कभी-कभी क्या होता है कि जुबान जब बंद हो जाती है, तो फिर भी कविता हो जाती है। मान लीजिए कि कर्मा, ये बड़ा बढ़िया त्यौहार है, ख क्षेत्र का। कर्मा में क्या होता है कि लड़कियां ससुराल जाती हैं, ससुराल में रहती हैं, जो बाल बदार होने से पहले कर्म कर्म करती हैं, वो लोग। मान, उसको आमतौर पर क्या होता है, कर्मा से पहले भाई लोग लेने आते हैं उसको बहन को। कर्मा एकदम नजदीक आ रहा है, भाई कोई आया नहीं, और लास्ट में मैंने पहुंचा लेने के लिए। उसका कोई, अब ससुराल वाले कोई उसको जाने के लिए भेजने के तैयार नहीं है, ना उसका पति तैयार है, ना उसका सास तैयार है, ससुर तैयार है। अब कुछ बोल नहीं पा रही, बेचारी क्या करेगी? उसकी भावना निकलेगी ना? बोल भी नहीं पा रही है, तो रोएगी ना? उसकी भावना आंखों से निकल जाएगी, ठीक है। वो उसकी भावना रुकने वाली नहीं है। इसलिए कविता की भाषा आंसू भी है। पहली जो कविता रही होगी, वो आंसू ही रही होगी और वियोगी होना जरूरी है। वियोगी का मतलब क्या है? भावनाओं की तरंगें उठनी चाहिए, ठीक है।

और भावनाओं का पोषण परिवेश होता है। किस परिवेश में आप रहते हैं? दिन रात आप रोटी के तलाश में हैं, भूखे मर रहे हैं, तो आपकी भावनाएं सुखी ना? तो यह है कि की परिवेश तब है, बोल सकते हैं कि क्या हो गया? ट सेक मतलब है कि कौन सा समाज कितना जीवंत होगा, वो उसका साहित्य बताएगा। जितना समृद्ध होगा, किसी समाज का, किसी राष्ट्र का, वह समाज उतना ही समृद्ध और सुसंस्कृत या स्य कहलाएगा। यह है कि क्योंकि ये परिवेश चेतना की जो है, परिवेश से ही आपको और वो जो है, बोल सकते हैं, सको सार तत्व है। यहां अगला है, इसको समझे। एनी क्वेश्चन? आप बताइए, बहुत सीरियस है, सबसे पीछे आप बहुत सीरियस लग रहे हैं। समझे बात को? जी सर। आप सभी, आप बताइए भाई, कोने में है, आप थोड़े लेट। नहीं, नहीं, मैं साहित्य के बारे में पूछ रहा हूं। तब तक लोग थे, समझ में आ गई तो बात तो खोटा साहित्य के बारे में भी आपको लिखना होगा, तो ये सब चीज चक भूमिका बनेगी, तो ये सब चीज सही बनेगी।

अले खोठा समाज का साहित्य कितना समृद्ध है, इस पर डिपेंड करता है आपका, आप कितना आपका समाज कितना समृद्ध है या कितना सभ्य है, ठीक है ना? इसलिए देखिएगा कि वो किसी भी देश का जो साहित्य होता है, जितना समृद्ध होता है, वो देश उतना ही सभ्य कहलाता है। जी, किसी भी समाज, इसमें परिवेश चेतना की शाब्दिक एवं कलात्मक अभिव्यक्ति, शब्दों की कलात्मक अभिव्यक्ति है, ठीक है ना? शाब्दिक एवं कलात्मक अभिव्यक्ति लिख दिया, बेटा, बता है इसमें। अगला है हमारा संस्कृति। संस्कृति कहने से क्या समझते हैं? बताइए भाई, पीछे आप। संस्कृति से क्या समझती हैं? यस, किसी समाज में व्यक्ति का रहन-सहन, पालन-पोषण, अपना, किसी तरह का मतलब, अगर वो बात विचार किस तरह से करता है, एक दूसरे के माध्यम से करता है, वो संस्कृति है। कल्चर को डिफाइन। ठीक है भाई।

देखिए, हम जब जब संस्कृति की बात करते हैं, तो साथ में एक नया शब्द चला आता है। नया नहीं, एक साथ और चला आता है, सभ्यता। सभ्यता और संस्कृति दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, ठीक है। या उ स। यस, समा और उसके माध्यम से जो हम काम करते हैं, वो संस्क। परंपरा को आधार बनाकर समाज के लिए जो भी हम करते हैं, ना, ना, पना, ना भी करते, मतलब जो हमें अनुशासित करता है, ठीक है।

देखिए, है क्या? इसको हम लोग मोटे तौर पर समझ सकते हैं कि हम दो बात करते हैं कि पहले संस्कृति की बात करते हैं, तो सभ्यता शब्द चला आता है और सभ्यता की बात करते हैं, तो संस्कृति शब्द चला है कि इसको बोल सकते हैं कि सभ्यता को मटेरियल कल्चर भी कहते हैं, भौतिक संस्कृति। मतलब इसको सीधे बोल कि मेरे पास जो कुछ है, व्हाटएवर वी हैव, वो सिविलाइजेशन, सभ्यता है। क्या मेरे पास क्या है? मेरे पास मोबाइल है, मेरे पास ली फोन है, मेरे पास बिल्डिंग है, कपड़ा है, मोटर गाड़ी है, जितने साइंटिफिक जो डेवलपमेंट है, आविष्कार है, जो मनुष्य ने अपने सुख के लिए किया है, वह सारे के सारे सभ्यता है।

आयरन और आयरन ओर, आयरन ओर तो आपको मिनरल है। सता में हा, सभ्यता ही हमने नहीं बनाया। हम उसे बनाते क्या? कार का क्या काम है? लोहा बनता है, कौन बनाता है? बनाता है ना? वो सभ्यता हुई। आदमी देखिए, संसाधनों का हम किस तरह से उपयोग करते हैं? संसाधनों को कैसे हम उसको अपने हित में लाते हैं? यह सभ्यता है, ठीक है ना? मान लीजिए घर बनाया, घर बना कर के हमने दरवाजे पर जय श्री राम लिख दिया, वो संस्कृति हो जाती है, है ना? क्रॉस टांग दिया, वो संस्कृति हो जाती है। हनुमान जी को खड़ा कर दिया, वो संस्कृति है। साड़ी आप क्या है? सभ्यता है, क्योंकि हमारा आविष्कार है वो। कपड़ा हमारा है ना? उस साड़ी को पहनना संस्कृति है। गर करता है, सीधा पल्लू उल्टा पल्लू मारना संस्कृति है, सीधा पल्लू मारना संस्कृति है। फिर उसका उसी उसको साड़ी पहनते हैं, तो महाराष्ट्र में कक पहन लगा देता है, वो संस्कृति है। चावल, संस्कृत सभ्यता है, उसका अरसा बनाते हैं लोग और बहुत किस्म के व्यंजन, खीर बनाते हैं लोग, है ना? चाहे वो आपका पीठा बनाते हैं और भी क्या है, ढकन सेरा, वो क्या-क्या बनता है उधर। साउथ में क्या बनाते हैं? उसी का इडली, डोसा बनता है, ठीक है ना? उपमा, क्या नाम है उसको? उपमा, वगैरह बनता है लोग। तो चीज तो एक ही है, बट अपने अपने तरीके से हम उसको यूज करते हैं। तो सभ्यता का प्रयोग संस्कृति है। या दूसरी बात है कि हमने कहा था कि मैं जो कुछ हूं, मेरे पास जो कुछ है, वो सभ्यता है और मैं जो कुछ हूं, वो संस्कृति। मैं क्या हूं? मेरे सोचने का तरीका, मेरा व्यवहार है ना? मेरा जो है सो जीवन के प्रति दृष्टिकोण क्या दृष्टि है? हमारी पूर्व जन्म, यह लोक, परलोक, ये सब क्या है? संस्कृति का पाठ है।

सामूहिक सति, झारखंड की संस्कृति, मान लीजिए क्या? रिवा वही है संस्कृति है। ति रिवाज, आपने बात कही ना आपने कि जो हमें अनुशासित करता है, जिसको हट कर के हम नहीं सोच सकते, वह हम संस्कृति है, ठीक है ना? जो देखिएगा कि जो बहुत सभ्य समाज होता है, संस्कृति ज्यादा उसको ये नहीं करती है। देखिएगा, संस्कृति से ज्यादा प्रभावित जो हमारा लोक समाज है, वो ज्यादा प्रभावित होता है, जो लोक जीवन है। जैसे सपोज कीजिए कि केके सेना बड़े डॉक्टर हुआ करते थे, कोई बीमार पड़ा, केके सेना के यहां दिखाए, 5000 फीस देकर प्रिस्क्रिप्शन लिखवा लिया। गांव में गया, बोलेगा, अरे ठीक होता, बोका, ये तो फल ठीक कर, भूत वाला मामला कर। वो जानते हैं, पुजी छोड़ देगा, फ भूत के चक्कर में चल जाएगा। वो एक पर्टिकुलर कल्चर को जी रहा है, वो और उस पर ज्यादा अनुशासित हो रहा है उसे, है ना? और उसम पूरा का पूरा जो है, लोक समाज है, ज्यादा अनुशासित होता है संस्कृति से। जो ज्यादा स समाज उतना अनुशासित नहीं होता है, कम होता है। उसकी होता है, नपत कम होता है।

तो मेरा कहना, हमारा सोचने का जो तरीका है, देखिएगा कि उसी के साथ एक संस्कृति में एक अंधविश्वास का भी पाठ आ जाता है। कुछ रूढ़ियां हैं, कुछ परंपराएं हैं, कुरीति रिवाज और वो क्या है कि आपको कई ऐसी चीजें हैं जो संस्कृति पिछड़ जाती है। इसको कल्चरल लेक बोलते हैं, संस्कृति का पिछड़ जाना। जैसे मान लीजिए झारखंड की संस्कृति को हम लेते हैं। झारखंड के संस्कृति के जो वाइटल कंपोनेंट्स हैं, वो है देखिएगा, पहला है कि आपको श्रम क्षमता, स अस्तित्व, सहयोगात्मक समरसता, सरलता, उसके बाद है कि प्रकृति की ओर अभिमुख। यह सारे जो है, सो इसके कंपोनेंट्स हैं। एक छूट गया, सामूहिक। यहां छूटा, सति। यहां है, सामूहिक। यह सारी चीजें आपके झारखंडी लोगों के दिन प्रतिदिन के जीवन में दिखाई पड़ेगी। यह तय करता है कि आप क्या, आपके सारे जो एक्टिविटी है, सारी गतिविधियों इसी से आपको य हो। श्रम है, आज नहीं हो रही। अगर देखिएगा कि इसमें कई चीजें पिछड़ गई, पिछड़ गए, वो कल्चरल लेक, मने समाज के अनुसार, जो है, टाइम फैक्टर में फिट नहीं हो पा रहा है। बट हमारा कल्चर है, श्रम है कि झारखंड आदमी बिना काम किए खाने की बात ही नहीं सोचता, मेहनत करेगा। पूरा, एक बार हम थे आपको वहां, उसम झारखंड से पहले एक एडी जॉइंट सेक्रेटरी हुआ करते थे, य म सेक्रेट था, तब तो जलाल मीना करके गुमला के डीसी आए थे, तो उन्होंने कहा कि बता रहे थे, भाई, मैं गुमला का डीसी हूं, मैंने देखा है झारखंड की इतना मेहनत करते हुए, इतने मेहनती हुए, बियॉन्ड इमेजिनेशन। वो ऐसा उनका स्टेटमेंट था। ए ही वाज फ्रॉम राजस्थान, जलाल मीना। तो वो जो है, लेकिन क्या हो रहा है? उसको क्या रिवॉर्ड मिल रहा है? उसको उसका शोषण हो रहा है। झारखंड आदमी बिना, बिना य किए, उसको लगा दीजिएगा, आज की तारीख छोड़ दीजिए, क्योंकि उसके कल्चर में श्रम है, बोलेगा, आ हो, य मिती।

काटे, काट भी काट क रखाना चला गया कहीं गायब हो गया। दिन भर बिना किसी के आराम से काट दिया। 500 की मिटटी काट दिया। शाम को आया पूछ कितना पैसा। भलो दे देना बा। कितना दे न मांग पवा तो मानतो र नि दिया। चल तो हा चल।

यह श्रम है क्योंकि उ कल्चर में श्रम बेचने का नहीं है। झारखंडी कल्चर में श्रम बिकाऊ नहीं है। श्रम के बदले श्रम करना है। आप हमारा धान काट दीजिएगा तो हम आपका धान काट देंगे। आज हमरा हर जोत दीजिएगा तो कल आपका हर जोत देंगे। ठीक है ना? आज हमरा पुवार चढ़ दीजिए मचान में तो हम आपको चढ़ा द। आज हमरा घर की बहु लोग औरत लोग तेरा घर का धान रोगी तो कल ऐसा वो जो हैसा संभव कहां है? होमन सोसाइटी में संभव है ना? एक सम सोसाइटी में जहां ऊंचा नीचा का बहुत ज्यादा अंतर होगा तो नहीं करेगा ना? बड़ा आदमी है कैसे आपके य धन काटने जाएगा? तो वो आज की तारीख में क्या हुआ कि श्रम जो है श्रम होगा हमारा शोषण का एक जरिया माध्यम हो गया। हम इसके द्वारा हमारा शोषण काफी हुआ और हम है कि चुप रहे क्योंकि हमारा कल्चर परमिट नहीं करता है इसका दम मांगने का। श्रम बेचा नहीं जाता है। य लेकिन अब तो जब देखा कि मान ली श्रम जो है सो हम करते हैं दिन रात टते हैं दिन रसातल में चले जा रहे हैं और जो हमसे काम करा रहा है देखते देखते पांच मंजिला खड़ा कर लिया। क्यों? तो सोचा कि साला काम करना बेकार है। अब काम करना बंद कर दिया। बोले साला झारखंड का काम चोर होता है। वो गया इधर से भी और उधर से भी गया। वो उसका कल्चर के कारण उसका शोषण होना शुरू कर दिया।

झारखंड कल्चर इक्वलिटी इतना है। य तो इतना भारी टी हैने तर के समानता। एक तो सोसाइटी में समानता है ही। कोई बहुत बड़ा यह नहीं है ना बड़ा है ना छोटा है। औरत स्त्री पुरुष के बीच में समानता है। अभी हमारे डिपार्टमेंट में ऑक्सफोर्ड से कुछ आए थे रिसर्चर लोग। वो बोला कि दोनों वा था की जो हम लोग लो क्षेत्र में काम कर रहे थे तो जब हम आए शुरू में तो 14 साल बो 14 साल पहले हम आए थे 14 15 साल पहले तो वहां देखा सभी औरत मर्द सभी दारू पी रहे हैं। एक साथ सबको एक साथ दारू पीते हुए देखा। अभी जो गए 14 15 साल के बाद तो खाली पुरुष पीता है। औरत कम पीती है। है भाई पुरुष बोलता है ऑब्जेक्शन करता है तुमको नहीं पना है। तो ये जो इक्वलिटी है उरण हो रहा है। अंग्रेज वा तो प है पिता है भाई औरत म सा साथ पिता हैय ये स अस्तित्व है कोस स अस्तित्व संस्कृति एक निरंतरता चलने वाली प्रक्रिया है। इसका मतलब हा ठीक है हमारा पुख का दिया रिवाज कुछ बोल रहा है। निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हां ठीक है उसको एक बार थो सा रिपीट कर दीजिए पॉइंट को। तो वही लोग बोल र है थर्ड पॉइंट जो कुछ बताए थर्ड पॉइंट सत्व लिखा हुआ है ना? तो लिखा को ब तो सति अभी उस पर आ रहे हैं हम सोरा हमा रहे है।

तो यह जो है समता में स्त्री पुरुष की समानता है। व्यक्ति व्यक्ति की समानता है। यहां मतलब हमारा जो है बहुत ज्यादा अंतर नहीं है सोसाइटी में। स्त्री पुरुष के बीच में बहुत ज्यादा भेद नहीं है। स्त्री भी खती है टता है। दोनों साथ पीते हैं। दोनों साथ जाते हैं। ऐसा कोई पर्दा नहीं है। आप देखिएगा कि दूसरे सोसाइटी में आपको पर्दा सिस्टम है। महिलाएं बाजार नहीं जाएगी। महिलाए काम नहीं करेंगी। महिलाएं घर से बाहर नहीं जाएंगी। पर्दे के अंदर रहेगी और पुरुष नहीं चाहता है कि महिला बाजार सरम जाए किसी से हसे किसी से बोले। कभी परमिट नहीं करेगा तो वहा नहीं सोसायटी में। इस सोसाइटी में इसका होता क्या है? रे लोग का कोई वैल्यू है और के साथ घूमती ममते रहती है। ये तो यह जो है यहां भी आज कल्चरल क्राइसिस में श्रेणी में य भी आ गया। सत्व तो ऐसा है। य अभी सवाल पूछा ने सव क्या है? यहां देखिएगा की कभी झारखंड में सुना कि भाई बिहार का आदमी मार के भगाओ। आज तक कोई घटना ऐसी हुई है? नहीं घटना हुई कारण ऐसा म समझ कमजोर है? कमजोर नहीं उसका कल्चर परमिट नहीं करता है। देखिएगा बोलेगा जानते हैं जा बो सम बरा ना तब नहीं सम कुछ नहीं। आराम से उसको स्वीकार कर लेगा। क व जो है आपको ति और देखिएगा आप हम बता रहे उदाहरण। कई जगह देखिएगा कि यहां झारखंड में कोई कास्ट बेसिस पर कोई टोला मोहल्ला नहीं है। एक ही टोले में सभी लोग मिलेंगे। एक ही गांव में एक ला उनका जो डिस्ट्रीब्यूशन है वो बिल्कुल इसको है। एक साथ जसे मेरे ही गाव में उ लीजिए मेगा एक ही मोहल्ला में इधर एक बेदिया जनजाति है उसके सटले महत्व है उसके ठीक इस साइड में मुसलमान घर लोग है उसके बगल में उंडा जीी है उसके बगल में लोहार है ठीक है ना और उसके बगल में ब्राह्मण भी है। एक ही टोला में सब किस्म के जात है विदाउट एनी कन्फ दे लिविंग फ ह ऑफ य ऐसा ऐसे ऐसा समाज हम आपको बता मेरे बगल में गांव है बगल में हरिजन है और बगल में महतो जी है और दोनों कितने सालों से र रहे ब कोई कफ्ट नहीं दोनों के बीच में ऐसा दूसरा समाज में नहीं देखने को मिलेगा आपको। हरिजन बस्ती गांव से बाहर रहती है बिहार वगैरह में ल ओवर इंडिया देखि ना हरिजन बस्ती गाव से बाहर रहती और इसके कारण भूल हुई है कई बार आप 80 के आसपास है कॉलोनिया बन रही थी उस समय झारखंड में भी हारिजन कॉलोनिया बनी तो गांव से बाहर बना दी गई और कोई आदमी उसम नहीं गया। क्यों नहीं गया भाई उनको समझ में नहीं आया कि य जो सोशल जो स्ट्रक्चर है सामाजिक संरचना के बारे उसको जानकारी नहीं थी बाहर के आदमी को। उनको लगा कि यहां के हरिजन और यहां के आदिवासी भी गांव से बाहर रहते होंगे। उन्होंने गांव से बाहर बना दिया कोई नहीं गया व आने के लिए लास्ट में उसको दिया खाके खत्म हो गया। क्लस्टर्स मिलेंगे आपको बहुत सारे झारखंड के गांव में बाहर इलाके में जो आपके हरिजन कॉलोनी क्लस्टर्स मिलेंगे उनको वहां लोगों ने जाना छोड़ दिया। मैंने गया ही नहीं कभी फिर बाद में उसका रिव्यू हुआ पता चला कि भाई ये लोग तो सब गांव के अंदर रहता है तो यहां कैसे रहेगा लोग जंगल में तब अभी य दूसरे ऐसा ऐसा प्लानिंग फिर से रिव्यू करके ऐसा कहा गया कि यहां जो कॉलोनिया दी जाए उनके जो मकान दि जाए जहां है वही दिया जाए। इसलिए यहां देखिए एक ही टोला में एक ही मोहल्ला में सब जात के लोग रहते हैं। कोई किस्म का झगड़ा नहीं है। तो ऐसा सोसाइटी सोसाइटी शास्ति वाला सोसाइटी कहां मिलेगा कहीं झारखंड से बाहर कहीं नहीं मिलेगा आपको हिंदुस्तान की बात कम सेम कर रहे।

सहयोगा आत्मा सहयोगात्मक मने कोऑपरेटिव जो है सहयोग करता है इसमें। वो कोई भी काम एकदम ऐसे देखिएगा कि आज उसका धान बुनना है तो पूरा मोहल्ला ह ले चल जाएगा। पैसा से कुछ नहीं लेगा। बढ़िया सा फिस्ट खाएगा। बढ़िया से भोजन भजन करेगा। दारू पिएगा। पूरा ट से है ना खाएगा पिएगा काम खत्म। कोई उसको इसको क्या बोलते कोई परिश्रमिक नहीं लगता है। यह सहयोगात्मक है। समरसता तो एकदम होमो जनस सोसाइटी बिल्कुल कहीं कोई ज्यादा नहीं है ऊच नीच नहीं है। सरलता तो इतना है कि जूता मार दीजिए त कुछ नहीं करेगा है ना और सामूहिक कलेक्टिव जो है यहां हर च नाचना भी है तो समूह में गाना भी है तो कोई अ नहीं गाता है। कभी कोई य झारखंड में झारखंड में झारखंड के कोई गाने का अ नहीं है। स्टेज लेगा रहे अब शुरू हो ग बात अलग है तो वह नहीं है जो सम नाचेंगे तो समूह में नाचेंगे। कर्मा पर्व देखिएगा पूरे बिहार में मनाया जाता है। कर्मा पूरे बिहार में है झारखंड समेत बिहार में भी है लेकिन वहा दूसरे अर्थ में है। गा घरे घरे मनाता है लोग मुझपर मनाता है लोमा हम एक बार गए थे बाजार मुजफ्फरपुर में पूछे भाई खीरा लेना था हम खीरा रा तो आज आज क कर्मा धर्मा परना हम कर्मा य मनाता है क पर हा कर्म धर्म परछ हमको तो मेरा कहना है कि वहां घरे घर मनता है जितिया देखिएगा व घरे घर मनता है। हम लोग यहां देखते जितिया भी समूह में मनाता है। य सामूहिक हर चीज। वो य सामूहिक रूप से य है नाचता भी तो कमर हा सटा के ते नाचेगा। वो अकेले नहीं नाचेगा कथा वगर कह के नाचते लोग अकेले अकेले ना ऐसा नहीं है। नाच सब वो आपका हर गतिविधि में आपको सामूहिक दिखाई पड़ेगी। यह जो है सो और प्रकृति वि मुक्ता प्रकृति के तरफ झुका हुआ है इनका आचरण इनका फ्रेंडली बिहेवियर है फली प्रकृति के साथ में। जितनी इसकी जरूरत थी उतना ही लेता रहा है प्रकृति से कभी व जो है लालसी नहीं हुआ। परिणाम स्वरूप जो है आपका प्रकृति के प्रति दोस्ताना स्वभाव होने की वजह से प्रकृति को हानि कभी नहीं पहुंचा। आज जो एक लालच है आज जो चर्म परना लालच है आदमी का लालच ही प्रकृति को नष्ट किया है। य देखिएगा कि अभी शिव जी ने बयान दिया था य की महिलाए काट के ले जाती है लकड़िया ठीक है ना तो बहुत पहले नहीं होता था इस तरह उतना ही लाता था जितना उसको जरूरत था। एक ओनरशिप जो है ना कंफ्यूज कैसे कर गया जो जब देश आजाद हुआ उसके पहले गांव का लोग भी जाता था जितनी जरूरत ी उससे ब लाता नहीं था। एक टा चाहिए तो फटा लाता था उसके बाद जब आजादी हुई देश की तो सारे जंगलों को कु सिस्टम करके ठेकेदारों को देक के कटवा दिया गा का देख गाव का लोग पूछने के बो पैसा लगता बोला हम सबन अपना समझ र पैसा पसा बात बोलता है। उस दिन लगा कि साला जंगल हमारा नहीं है जंगल उसका है तब से एक की जरूरत तो चार को ले आया। एक टा की जरूरत थी तो चारट के ले आया तो लकड़ी चोर हो गया क्योंकि ओनर उसका य कर गया ना अब पहले मालिक था तो नहीं करता था ऐसा तो यह जो प्रकृति की तर अभिमुख था हमारा सोसाइटी यह सारे कंपोनेंट झारखंड कल्चर में दिखाई पड़ेंगे इंक्लूडिंग ठा कल्चर जो है झारखंडी कल्चर ही है ठीक है ना तो यह सार चीज दिखाई पड़ेंगे आपको आप इसी में से देख संस्कृति में से आप पूछता है इंपोर्टेंट है पाठ निबंध में निबंध में पाठ है संस्कृति में कोई भी पव त्यौहार पूछ सकता है है ना चाहे वो सांस्कृतिक संस्कृति से संबंधित एक सवाल कहे गए तो ये जो है आपको झारखंड का हमारा अभी झारखंड के बारे में भाषा साहित्य प्रजा प्रजाति और संस्कृति इन सारी चीजों की समझ हम बना रहे थे।

ठीक है अब हम लोग आगे बढ़ते हैं। इसमें मैंने कहा था कि जो इसमें आर्य प्रजाति जो है जो है आर् प्रजाति जहा झारखंड में है वो कहलाते हैं सदानंदाचा सदस्य भाषाए हैं कोठा कुरमाली पस परर गनिया नागपुरिया। यह आपकी चार भाषाए को इसमें। अब साधान कौन लोग है? सन किनको बोलेंगे? इसको मोटे अर्थ में बोल सकते सदानंदे सीधे बोल सकते हैं सदानंद जाति है बट यह गैर जनजाति सदानम गैर जनजाति तो क्या सभी जितने सारे लोग हैं गैर जनजाति क्या सभी सदानम कहने का मतलब है कि झारखंड का वैसा गैर जनजातीय समुदाय सन कहला जिसका झारखंड में होने का रहने का सैकड़ों हजारों साल का इतिहास हो और झारखंड के निर्माण में जिसकी भूमिका हो। निर्माण का मतलब झारखंड राज अलग बात नहीं हो। झारखंड के निर्माण में मतलब क्या है यहां के जगहों का नामकरण होना सेसे दामोदर नाम हुआ पार्श्वनाथ नाम हुआ है ना तो यह सब मा वो आपको बहुत सारे शब्द है जैसे मैं आपको स्वर्ण रेखा नाम हुआ य सब जनजातीय नाम नहीं है सब आर भाषा के शब्द है तो इन सारे नाम रखा गया आज से तो नहीं है तो य इस प्रमाणित करता है कि इनकी जो स्थिति कितनी पुरानी रही है यह कितने आदिम युग से यहां निवास करते रहे हैं जैसे आपको शरद चंद्र राय ने कहा कि कर्मियो का इतिहास झारखंड में 2000 सालों का है है ना तो यहां जो है सो गैर जनजाति समुदाय में पहला आने वाला कुर्मी लोक था। आज तो कुर्मी लोक बोल रहा है कि हम य के है असूर से भी पुराना है गलत बोल र है बो हम यही मूल है हम आदिवासी है झूठ बोल रहा है अरे आए हो तुम बाहर से सीधी सी बात है तो वो जो है सदा जो ऐसा गैर जनजातीय समुदाय जिसका झारखंड के जिसका हजारों साल का झारखंड में रहने होने का इतिहास हो और जिसकी की जो है सो अपनी एक भाषा हो अपनी एक संस्कृति हो है ना और झारखंड के निर्माण में जिनका योगदान रहा। ऐसा ज इधर पिछले 50 सालों में अगर कोई आया है तो वह साधान नहीं कहलाएगा ठीक है। यहां के कल्चर को नहीं मानता है। यहां के सभ्यता को यहां के जो है सो यहां की भाषा नहीं जानता है। य की भाषा जानता है य के कल्चर से उस मेल है तो कैसे हो जाएगा ठीक है तो ये जो है अब है कि ऐसे लोगों की भाषा है वह सदानी कहलाती है और सदानी की चार सदस्य भाषाए हैं सदस्य भाषा है तो यह हमारा य टारगेट हमारा ठा है। ठा को हमको जानना है ठीक है। ठा भाषा क्या है कहां की भाषा है और कौन लोग जिसको बोलते हैं जैसे बोलते कुड़माली वाले बोल रहे हैं कि कुड़माली कर्मियों की भाषा है तो अब कई लोग बहस करता है कि खोठा कोई भाषा नहीं है यह तो किस जाति की भाषा है तो उसका जवाब हम पूछते हैं कि तू बताओ हिंदी किस जाति की भाषा है? मराठी किस जाति की भाषा है? बांगला किस जाति की भाषा है? यह बेवकूफी बड़ सवाल है। वो बोलते हैं कि खोठा कुरमाली का एक प्रकार है। हम अगर कहे कि खोठा कुरमाली कोठा काही एक प्रकार कुरमाली तो और यही सत्य है। कोठा का बंगला प्रभावित रूप कुरमाली है। कोठा का ही बंगला प्रभावित रूप कुरमाली है जो कुछ साल पहले तक सो क ठा भाष कुरमाली भाषा भाषी लोग कहते रहे हैं। हमरा मावा भाषा ठा 70 के आसपास कहाने एक शाल पत्र पत्रिका निकलती थी झारखंड इसम जमशेदपुर से नहीं धनबाद से में संपादक हुआ करते थे आपको वीर भारत तलवार जो जेएनयू के प्रोफेसर हुआ करते थे तो उस पत्रिका में एक लखी कांत मतो आपको कर्मियों का लीडर है वो लिखा है कि कर्मियों की हमरा माइक भाषा ा अब अभी वकालत कर रहा है कुरमाली का कुरमाली का मतलब है कि कुर्मियां की भाषा कुर्मियां प्र कोठा क ही बंगला प्रभावित रूप कुरमाली है एकदम स्पष्ट बहस कर ले अलग बात है तो ये जो है देखिएगा कि य इस खोठा हमारा टारगेट है।

अब सवाल है कि खोठा हम का क्षेत्र कहां है कहां बोलते हैं खोठा को? बस यहां देखिएगा कि इसमें दक्षि छोटानागपुर प्रमंडल यहां देखिएगा उत्तरी छोटा नागपुर प्रमंडल ठीक है दूसरा संथाल प्रजना प्रमंडल और तीसरा पलामू प्रमंडल ठीक है ना पलामू से ठा को बहिष्कार कर दिया है मैंने इसको क्या बोल सकते हैं कि कई जो सत्ता के में ज्यादा सत्ता के गलियारा में जिनका पहुच बड़ा है सरजू राय हैं गिरिनाथ सिंह है इन लोगों ने कह दिया कि पलामू की भाषा मगही और भोजपुरी है जबकि सत्य नहीं है। क्या है कि वास्तविकता यह है कि वो जो है वहा जो दबंग समुदाय है राजपूत है चाहे ब्राह्मण लोग है बहुत लिमिटेड में है बहुत लेकिन वो आपका जो प्रभावशाली वर्ग है और प्रभावशाली वर्ग जो न्यूली लोग आए हैं हालिया समय में उनकी भाषा नो डाउट मगही है और भोजपुरी है तो जो बड़े लोगों की भाषा अगरवा को अगर वो क्या नाम है इसको प्रभावशाली समुदाय की भाषा या उसके आचरण या उसके संस्कृति को निचला समुदाय स् एक्से करता है भाई अंग्रेजों का अंग्रेज तो हमरे य बहुत कम थे लेकिन पूरा हिंदुस्तान को अंग्रेज बना दिया ना सारे लोग धती कुता छोड़ कर सब पॉइंट में आ गए तो इसलिए वहां देखिएगा कि वहां का जो लोकल समुदाय है वह बिल्कुल खोटा बोलता है। हम लोगों ने सर्वे किया था आपको 2010 में नहीं यस 2010 में वो है पीएलस पीपल लिंग्विस्टिक सर्वे य इसम बड़ोदरा में एक संस्थान है भाषा संस्थान उसके माध्यम से किया था और मैं कोनेट कर रहा था ठा क्षेत्र का और बकायदा गट निकल चुका है आपको उसम से यह भी हुआ है क्या नाम है राष्ट्रपति का सही किताब बुक फम में आ भी गया है उसमें कोठा बिल्कुल य पलाम प्र है। अब वो लोग सत्ता में पकड़ है उनकी इसलिए गिरना सिंह वग प्रभावशाली लोग है सररा प्रभावशाली लोग है उन्होंने कह दिया अभी जो है वहा टीचर की बहाली र की बली नहीं होगी व ठीक है आपको उसे ज्यादा संबंध नहीं है तो यह जो है सो यहां तीन प्रमंडल में यह भाषा बोली जाती है। इसम जिले कितने हैं अरे साला इसके जिले कितने हैं? 16 जिले गिन के देखिए 16 जिले इसके अंदर आते हैं वो है आपको पहले जाइए य से कीजिए रामगढ़ हजारी बाग चतरा डरमा गिडी और तीन पाच उसके बाद हजारी ग पलामू लातेहार गढ़वा फिर है आपको उसके गडा साहिबगंज इसमें छूट गया बोकार बोकारो ना बकारो छूट गया नहीं यहां बकार छूट गया बकार धनबाद छूटा ना हा धनबाद बा पलामू लातेहार गढवा गोड्डा य सब साहिबगंज है जामताड़ा है दुमका देवघर 16 जिले है ठीक है 16 जिले इसके अंतर्गत आते हैं और आबादी कितनी है नो सरा किला नहीं है नो नोनो क्षेत्र है रुमाली क्षेत्र है वो पाकुड़ है मतलब पलामू प्रमंडल के सारे हजारीबाग प्रमंडल के सारे और आपको संताल के सारे 16 जिले आते हैं। थोड़ा सा रांची जिला का भी कुछ पाट पकड़ता है लेकिन उसको लोग नहीं काउंट कर रहे हैं लेकिन 16 जिले। अब आपको देखेगा की आबादी कितनी है आबादी देखिएगा एक के सेंसस में 49 लाख लोगों ने दर्ज कराया था मदर लैंग्वेज के रूप में कोटा को फिर 2011 में मतलब 859 मिलियन मब कितना हुआ 90 लाख के आसपास नहीं 85 नहीं हा तो 8.5 10 लाख होते है 8.5 मिलि तो यह है कि आपको मतलब 85 लाख लोगों ने दर्शाया है आपको ठीक है ना अगला जो 2022 में होगा 21 में होना था नहीं हो पाएगा तो हम लोग टारगेट बनाए कि कम से कम एक करोड़ लोग अपना नाम दर्ज कराए वैसे तो आबादी में लिखते हैं लोग आपको डेढ़ करोड़ लेकिन जो ऑथेंटिक है जो आपको डॉक्यूमेंटेशन हमारे पास है ठीक है तो य पीएलस जो हुआ था 2010 में तो य जो आपका ये है।

अब देखिएगा हम चले आते हैं उद्भव विकास पर। यह पहला चैप्टर आपको है कोठ भाषा का उद्भव विकास। अब है खोटा भाषा के उद्भव विकास को लेकर के इसमें हम दो बात पहले सबसे पहले जो बात आती है बड़ा कंफ्यूजन है देखिएगा कि यहां खोठा एक शब्द है प्लस भाषा है। इस शब्द को लेकर के लोगों में बहस है। मुख्य रूप से अक्सर बोलते हैं एक्चुअली एक समय के बाद तो खठ व रू हो जाता है भाषा के लिए खठ क भाषा लेकिन खोठा शब्द पर जो है विद्वानों में मतभेद है। टा शब्द आया कहां से इसकी उत्पत्ति पर लोगों में मतभेद है। खटा शब्द आया कहा से जैसे इसमें दो तीन मत है। पहला है आपको का मत है हम इस पर बात कर भाषा पर बात नहीं कर रहे। एक के झा और दूसरे हैं कृष्ण चंद्र दास आला आला एक झा और कृष चंदला य दो लोग है जो इस पर ने अपना मत दिया है और एक आदमी और है जो हम बाद एक आदमी और भी है इसमें आपको नरेश नीलकमल तीनों आज इस दुनिया में नहीं है नरेश एक के कृष्ण चंद्र दस आला और नरेश नीलकमल ठीक। अब देखिएगा कि इसमें अक्सर क्या होता है कि लोग हम लोग जब बात करते थे तो लोग कोठा जैसे बोले भाषा पर चलाता था और हम लोग को लक्षर चढ़ाता था। देखिएगा एक जी का कहना है कि खोठा शब्द की वि उत्पत्ति जो है रोस्टी से हुई है। रो सब से कर भारत की प्राचीनतम लिपियों में से लिपि थी और इसका कुछ मिला है संकेत आपको हड़ सिंधु घाटी सभ्यता में इसका कुछ मिला है उसको पढ़ा नहीं जा सका बढ़िया से लेकिन यह जो है सो आपको विदेशी लिपि ही थी ऐसाका मानना है। य विदेशी लिपि थी और दाहिने से बाए लिखी जाती थी उर्दू की तरह और वह वार्क प्रकृति की लिपि थी। वार्क समझते हैं लिपि के दो तरह होते हैं नहीं नहीं वो तो चित्रात्मक लिपि नहीं होती है वो वो तो एक फेज है बनने का जो प्रक्रिया है प्रारंभिक फ लिपि दो तरह की होती है एक वार्क दूसरी अक्षर वार्क लिपि जैसे देखिएगा पहला है कि आपको वार्क और अक्षर य इसको बोल सकते हैं इसको अल्फाबेटिक और इसको बोल सकते हैं सििक यह है कि आपको आरिक और वर्णक में अंतर समझिए कि आरिक में दो वर्ण होते हैं जैसे क है प्लस अ है तब कहीं आपको क बनता है क में अ जुटा हुआ है तब आपको कक दो वर्ण।

लगे और इसमें स वर्णक में एक ही र्ण होता है। इसलिए देवनागरी आपको आरिक लिपि है और रोमन आपको वर्णिक लिपि है। ठीक है ना? देखिएगा कि अगर हम लिखेंगे, अगर मान लेंगे हम क म, देख जितना सब निकल जा रहा है। कमल में, कमल में लिखेंगे तो आपको क में भी अ है, म में भी है, ल में भी है। वो निकल जा रहा है ऑटोमेटिक निकल जाता है। तो ये आपको इनका कहना है कि आपको खरोष्ठी लिपि। अरे बापा, कैसे मिटेगा जी?

इसमें देखिएगा, इनका कहना था ठा का कि रोठी से रोठी, रोठी से करोठा और रोठा से फिर इधर ठा ऐसा बना। क्योंकि भा ध्वनि के परिवर्तन होता है। हम लोग जब वर्ण के शरीर में आएंगे तो ध्वनि में कैसे परिवर्तन होता है हम लोग देखेंगे। ज फोनेटिक हम लोग पढ़ेंगे, खठ पॉलिटिक्स पर तब दिखाई पड़ेगा वो कैसे चेंज होता है। तो वो देखिएगा, खरोष्ठी शब्द था, उससे रोठी, रोठा से फिर खोठा शब्द बना। मतलब इनका कहना है झाजी का कि खरोष्ठी से खरठा भाषा जो वर्तमान में है उसका संबंध किसी न किसी रूप में रहा है। कारण क्या है? इनका कहना है कि चकि वह खरोश लिपि तो बिल्कुल वह आपके पश्चिम प्रांत, पितर प्रांत में थी। व सबप तो वहां जो हड़प सभ्यता में इसका कुछ पाया गया है अवशेष वगैरा।

इनका कहना है कि झारखंड में जो लोग खोठा प्रयोग करते हैं, वह लोग या खोठा भाषा भाषी लोग है, चाहे अनाज भाषी लोग भी है। वोह आरंभ में चक द्रविड लोग की सभ्यता थी, व सिधु सभ्यता, कसी सभ्यता, द्रविड सभ्यता थी। और जब वहां आर का आक्रमण हुआ तो उसमें द्रविड लोग भाग के एक सेक्शन यहां भी चलाया, रकन में चलाया, एक सेक्शन चला गया आपको साउथ में। बाकी एक सेक्शन छोटा य पहुच और कोठा भाषी लोग या फिर झारखंड के जो बोलने वाले लोग वो उनका संबंध द वहां से सिंधु सभ्यता से कुछ न कुछ है। इसका प्रमाण उन्होंने दिया है कि हमारे यहां जो देखेगा जो आपको सॉलिड काट का चक्का का प्रयोग हमारे यहां है, अभी भी स्टील प्रयोग में है। देखे हैं इसको सगड़ गाड़ी बोलते हैं। सॉलिड काट, पूरा काट एक चक्कर बना दिया। देखिएगा कि धर इस तरह से आपको ठीक है। और यहां देखि ऐसे करके ऐसे बैल गाड़ी बना दिया। अभी प्रैक्टिस में है। बड़का गाव जैसा जगह में तो बहुत ज्यादा है। हाल हाल तक हुआ करता। हम गाव में भी था। अब हमरे गाव में प्रैक्टिस में नहीं है। लेकिन पुराना चक्का कहीं को में रखा गा। अभी ब हर घर में मिलेगा आपको। और यही य सॉलिड काट के चक्के का प्रयोग आपको सिंधु घाटी सभ्यता में पाया गया है। इतनी सिमिलरिटी के पीछे क्या क्या है? झाजी का कहना है निश्चित तौर पर वहां से लोग भाग करके आए और व लोग यहां सेटल कर गए हैं और ठा का संबंध कहीं न कहीं वहां से है। चकि खोठा उन्होंने कहा कि जोक सिंधु सभ्यता द्रविड सभ्यता थी, अना सभ्यता थी, इसलिए खोठा को उन्होंने कहा कि खोठा का आधार भाषा है। खठ को उन्होने अनाज भाषा भी कहा। लेकिन आज का जो स्वरूप है, वर्तमान स्वरूप खठ का वह किसी भी तरह अनाज भाषा जैसा दिखता नहीं है। इसलिए हम इसको मान के चलते हैं कि आर् भाषा की श्रेणी में इसको रखा गया है। अभी कुमा लोग अभी बोल रहे कि हमारी भाष द्र भाषा है। कहीं भी आपको स्वरूप नहीं है दड का। इसलिए उनको जबरदस्ती करने से अच्छा है कि स्वीकार करना चाहिए भाषा है तो यह जो है अब ऐसा मानना था।

अब देखिएगा कि क है भैया? चलिए सब मिटा देते हैं। इसमें क्या है? अब आला जी का कहना है। हम लोग अभी उसी पर आ गए। आला जी इस कृष्ण चंद्र आला। इनका कहना है कि करो से कोई लेना देना खटा शब्द का नहीं है। एकदम स्पष्ट इंकार कर देते हैं कि नाई करते हैं कि ये ठा से इसका कोई लेना देना नहीं है। रोती का। ठीक है? उनका कहना है कि र्थी एक शब्द है। ठा में खर ख समझते हैं? ख को है ना? ख पूछते है ना? अरे भाई एस्केप जो होता है, घाव में जो पपड़ी जो पड़ता है, हा ठी है ना? पपड़ी पड़ता है तो उनका कहना है कि खर माने प्रकृति। इन्होने कहा। अब प्रकृति ठा में कोई शब्द नहीं है। लेकिन इनका कहना कि ख मतलब प्रकृति। अलाज का क्यों कहा कि पृथ्वी में आपका पृथ्वी में एक ऊपरी जो परत है, भू परपट जगी पढ़ने जानते होंगे अर्थ कस है ना? जो ठी की तरह बनता रहता है, उतरता रहता है। पृथ्वी में इस आधार पर उन्होने क ख माने प्रकृति। इस आधार पर उन्होने कहा कि ख माने प्रकृति और तब इनको फिर हमने कहा किई तो ख माने प्रकृति बोला कि उन्होंने कहा कि खर से भाषा बनी है, इसलिए इसका नाम हुआ खरठा। नोट खो ख। मैं और जिदा हुए थे यह कि नहीं, यह स ख ही होगा, खठ नहीं होगा। हमने उनको कहा कि आला जीी, अगर कोई बंगाली अगर बोलेगा इसको कैसे बोलेगा? खट्ठा ना बोलके खट्ठा बोलेगा ना? खोठा? य खोठा से खोठा होगा कि नहीं होगा? बो हां हवे तो पारे। इनका कहना था कि हां हवे पारे मगर टा स तो बझे बात को। उनका कहना है कि ऐन हवे पारे जैसे हम बोलते हैं ना भाई दही बंगला में बंगला प्रभाव से दोही होता है तो दोही से फिर दोही हम लोग बोलते नहीं बोलते? दोही? यह जो है आपका दही, दोही, दोही। सिमिलरली ऐसा होगा कि नहीं होगा? बोते हावे पारे। उनका कहना है की थर वाला हिसाब है कि हवे पारे मगर तो कारण क्या है कि झाजी के साथ में उनका परा 86 का क्या रिश्ता था? व वो देखि। इसको कहा जाता है भाषाई कफ्ट जो है ना लैंग्वेज कन्फ इ द कन्फ ऑफ ट एनट झगड़ा। भाषा का झगड़ा जो है ना वोह हैव ए हैव नॉट वाला झगड़ा है। तो इसने है आपको आला जीी, आला जीी हरिजन है और ब्राह्मण है। ब्राह्मण स्वीकार ही नहीं करते हैं कि ब्राह्मण सब चीज ले जाए। र्च को में बड़ा बीमार सही। जाजी बोले हम जो बोल स सही। तो बो हमन बात य बोले की अगर हम हम पूछे की ऐसा होगा ख से ख, ख से ख हो म अगर खो स्वीकार कर लेते हैं तो सारा श्रेय जज ले जाएंगे। इसलिए उन्होंने जितनी किताबें लिखी खोठा कभी नहीं लिखा। उन्होंने खठ भाषा ग्रहण, खोठा भाषा साहित, खठ नोट खोठा। आला जीी की हट धर्मिता है। ठीक है ना?

और तीसरे जो आपके है, आपके तीसरे जो है आप नरेश नीलकमल। उनका कहना है कि अपभ्रंश से संबंध है इसका। अपभ्रंश खोटा शब्द का संबंध अपभ्रंश से है। अपभ्रंश का एक पाट था व है अह अव हठ। ठीक है ना? अव हठ। य उनका कहना है नरल कमल का कि खोठा शब्द का संबंध अह से संभावित है। ठीक है ना? यहां बहस का सवाल यही है। लेकिन यह कह र य है। अब तो शब्द की बात हो रही थी। अभी तक खठ शब्द की बात। अब हम भाषा की बात करते हैं। तो खोठा भाषा। इसको मिटा। अपभ्रंश कही हट कहा जाने लगा था बाद में है ना? देल बना सबन ऐसे करके है तो वह है कि आपको अहट से उनका रिश्ता जोड़ते हैं और कहते भी है कि खोठा भाषा का जन्म अपभ्रंश से हुआ है। मानते हैं उसको। और यह दोनों उसको नहीं मानते हैं। एक केजी और आला जीी कोठा भाषा की उत्पत्ति अपभ्रंश से नहीं मानते हैं। मैं भी उसको फॉलो करता हूं। मैं भी नहीं मानता हूं। और ये जो है नील कमल जी बोलते हैं कि अ उत्पत्ति हुई है। तीनों उत्पति को दिखाना होगा आपको पगा सवाल में ना तो आपको तीनों का देना होगा। तो इसमें मिटाए इसको। आसान वाला।

इसमें इनका देखि। इनका कहना है कि आपको झा जीी और आला जीी। इनका कहना है कि प्रकृति से कोठा भाषा की उत्पत्ति हुई। प्रकृति से। दोनों का शब्द पर मतभेद है। शब्द की उत्पत्ति पर मतभेद है। पर भाषा की उत्पत्ति पर दोनों में मतभेद नहीं है। इनका कहना है कि प्रकृति है। प्रकृति से भाषा की उत्पत्ति हुई। क्योंकि प्रकृति मने र्थ कहते रहे हैं। क्योंकि ठीक है ना? तो प्रकृति में बहुत सारी ध्वनियां मिलती है। बहुत सारी प्राकृतिक घटनाएं होती है। और हर वस्तु, हर घटनाओं के भी कुछ कुछ ध्वनियां निकलती है, कुछ आवाज निकलती है। और हर जो धातु है या हर पदार्थ की भी अलग-अलग ध्वनि होती है। लोहा गिरेगा तो या लाहा बजेगा तो आवाज अलग होगी। लकड़ी बजेगा आवाज अलग होगी। है ना? ढेला गिरेगा, पत्थर गिरेगा, उसकी आवाज अलग होगी। तो इस तरह से प्रकृति में बहुत सारे ध्वनियां हैं। बादलों के गरजने से गड़गड़ाहट, पक्षियों के उड़ने से फड़फड़ा हट, पत्ते के डोलने से है ना? पत्ते के डोलने से आवाज, हवा के चलने से आवाज, पानी के बहने सेर वो हद हद हद हद करने है ना? झरना केने से ररा, पानी के बसने से प टपट पाट। इस तरह बहुत सारी ध्वनियां प्रकृति में है। वह है क्या कि इस तरह की ध्वनियां है आपको जैसे मान लिए सर सर, फर फर, गड़ है ना? रट रट, पटपट। बहुत सारी ध्वनियां हैं। इस तरह टन टन, धन धन। इस तरह की बहुत सारी ध्वनियां प्रकृति में है। और इस तरह के ध्वनि को कहा जाता है द्वित्व। द्वित्व मतलब एक ध्वनि दो बार रिपीट हो जाना है ना? और फिर इसको क्योंकि इसको इसका नाम आपको ध्वन्यात्मक भी है। इसी का नाम ध्वन्यात्मक भी है और अनु रमक भी है। मतलब याय अनुकर आत्मक भी है। जैसे अनुकर आत्मक जैसे देखेगा कि आपको रट रट हुआ, रट रट उसी का अनुक बनाया रट पट। झट झट हुआ तो हुआ झटपट। इसी का अनुकरण पर दूसरी ध्वनि बन गई। इस तरह के जो है प्रतिक लेटर से प्रत्यक अक्षर से ध्वनियां मिलेंगी आपको। कटकट, खटखट, गट गट, गट कटा कर पी गया, खटखटाया, दांत खटखटाने लगा। हर हर लेटर से मिलेंगे। यह सारी ध्वनियां प्रकृति में वर्तमान थी। ठीक है? बहुत ये सारी ध्वनियां प्रकृति में वर्तमान थी। और आदि मनुष्य इन सारी ध्वनियों को सुनता रहा होगा। एक पोसिस है, परिकल्पना है। और पूरी दुनिया के जो भाषा विज्ञानियों ने इस तरह स्वीकारा है भाषा उत्पत्ति को सिद्धांत को लेकर के। एक आरंभिक सिद्धांत क्या था? भाषा मैन मेड नहीं है। इसको ईश्वर ने दिया है। ईश्वरीय जो धारणा थी कि भाषा ईश्वरीय चीज है। अभी भी है। वो कुरान को बोलते हैं आसमानी किताब है। हा तो तो शब्द ब्रह्म अलग चीज है। मा संस्कृत में स्वीकार किया कि शिव जी के डमरू से बहुत सारी ध्वनियां बनी है। बहुत सारे सूत्र बने हैं। उनकी डिम डिम से बहुत स वही बात को स्वीकार कर रहा है। इस तर तो इस तरह जो है आपको देखिएगा कि वो आरंभिक दौर में अ हिब्रू को बोलते हैं, जो जिसम बाइबल है, बोलते इसको गड गिफ्टेड है। भगवान। इसको कुरान को बोलते आसमानी किताब है। वेद को भी बोलते हैं कि य तो अपुष है। इसको आदमी नहीं बनाया है। भगवान। संस्कृत को संस्कृत को कहा है कि आपको देव भाषा है। मने भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत में जो ईश्वरीय सिद्धांत है, वह सिद्धांत खारिज कर दिया गया। आज की तारीख में मतलब है कि एक अनुकरण प्रकृति सिद्धांत है। यह ध्वनि वाला सिद्धांत है। इसको ज्यादा सत इसको मिल रही है। तो यह प्रकृति में जो बहुत सारी ध्वनियां थी तो इन ध्वनियों के अनुकर आत्मक है। इसको बोलते हैं नोमोटो पोक। नमोट प इसको बोलते हैं। तो यह सारे द्वित्व है, अनुकर आत्मक है, त्मक है, ध्वन्यात्मक भी इसको बोलते हैं। ठीक है ना? इस तरह की धनिया होती है।

तो यह जो है स अब देखि प्रकृति में इसमें जो इससे जो आदमी अनुकरण प्रिय जीव रहा है। आदमी की प्रकृति है अनुकरण करने की प्रवृति। और इसी अनुकरण प्रवृति सबसे ज्यादा मनुष्य में पाई जाती है। इसकी वजह से आदमी जो है सो इस विश्व का, इस सृष्टि का सब श्रेष्ठ प्राणी बन चुका है। अनुकरण के चलते पत्थर को लुड़कते देखकर उसने पहिया का निर्माण कर लिया। पक्षियों को उड़क देखते हवाई जहाज बना लिया। तो इस तरह से जो है सो अनुकरण प्रिय जीव रहा है। भाषा का विकास भी ऐसे ही हुआ मान लीजिए कि। तो जो मान लीजिए यहां प्रकृति से के ध्वनियों के अनुकरण से जो भाषा बनी वो भाषा का जो आरंभिक स्वरूप था, प्रकृति की ध्वनियों का अनुकरण किया आदमी। अनुकरण किया। अनुकरण से जो भाषा बनी वो प्राकृत कहला। कक प्रक अ प्राकृत का मतलब भी हो सकता है प्राक जोड़ कत मतलब पहले बनी जो भाषा पहले बनी वह प्राकृत होगी। प्राक जोड़ कृत जो भाषा पहले बनी वह प्राकृत। अब सवाल खड़ा होता है कि धनि अनुकरण से कैसे भाषा विकसित हो सकती है? एक एग्जांपल बहुत मजे एपल है। मान लीजिए कि यहां मान ली इसमें कोई पे कोई पेड़ है। ठीक है? यहां एक पेड़ है। यहां मान कोई ज आपको आदमी बैठा हुआ है। हजारों सालों से घटना होती रही है। पे चे बैठता ही होता। पत्ते भी गिरते ही होंगे। कोई न घटना थोड़। बट पहली बार तो सेव पेड़ से नहीं गिरा था ना? न्यूटन ने देखा तो दिमाग उनका काम कर क्लिक कर गया। यहां मान ली पत्ता यहां से गिरा। मान ली एक पत्ता गिरा। पत्ता गिरने से आप देखेगा कभी आपको अनुभव हुआ होगा बिल्कुल शांत वातावरण में किसी पेड़ के नीचे बैठने का तो देखिएगा कि एकदम कहीं हवा व नहीं चल रही हो। पत्ता अगर तो आवाज कैसे करेगी? कैसी आवाज निकलती है? देखिएगा आवाज निकलती है पत करेगा। इस तरह के धनि पत। बहुत ध्यान से सुनिए। पता गिरेगा तो वह आवाज निकलेगा पत। अब पत जो एक ध्वनि है, आदमी सुनता रहा होगा हजारों साल से। उसके दिमाग में पत। अब पत से चकि पत प तो जो सरा उसका नाम पहले पत ही रहा होगा। पत्ते का नाम उसने पत ही रखा। बाद में वो पत्ता हो गया। अब देखिएगा पत्ता चक थिन था, बहुत पतला था, इसलिए थिन था, इसलिए देखिए ये आपको उसी से बना आपको जितना पतला चीज है, आपको बना पतला या फिर पातर। फिर है कि पत्थर चाहे फिर आपको देखिएगा कि पतरी। भाई पत्ता पत्ता जोड़ दिया तो पतल बना है ना? फिर जो क्योंकि पेपर जो है पतला है तो व भी पत्र हो गया है ना? पत्र हो गया, पतला हो गया। शरबत में चीनी कम गया तो वो पतला हो गया है ना? आदमी अगर ला पतला है तो पतला श से बना है। मने पतला। पत्ती का जो गिरने वाला गिरा, एक छोटी सी घटना हु प्राकृतिक घटना। इससे पत्ता के गिरने से जो ध्वनि पत निकली, पत से पत्ता बना, फिर पतरी बना, पतल बना है ना? फिर पतला हुआ, फिर पात हुआ, फिर पत्र हुआ। इस तर कितने सारे शद बन रहे? और फिर चकि गिरा तो पतति भी बना। गिरना उसके नेचर है। पत्ते का गिरना नेचर। गिरता है इसलिए पतति गिरना है ना? उसी से पतन भी हो गया। विशाखा पतन है ना? पतन उसी से पतन भी तो हुआ ना? विमान पतन चाहे चारित्रिक पतन। यह एक एक फेनोम जल से इतने सारे शब्द बन सकते हैं तो क्यों नहीं बना होगा ऐसा? भाषा बनने की संभावना बहुत प्रबल है। प्राकृतिक जो ध्वनियां थी, उनके अनुकरण से। अभी भी आदमी में अनुकरण करने की प्रवृति बहुत तीव्र है। बच्चा देखेगा कि अगर व खड़ा है, अगर बिल्ली वहा में में कर र तो भी करेगा। कुत्ता भक रहा है तो बोलेगा वो भी भ केगा। व भी भ करेगा। वो अनुकरण के ति अभी बाग अगर कर जाएगा तो य भी करेगा। ल अगर देखिएगा कु कु करते तो कोई बच्चा भी कुआ का का करेगा। अनुकरण के करने की प्रवृति मनुष्य में बहुत तीव्र रही है। और इस अनुकर क्मक प्रवी के कारण ही मनुष्य ने भाषा का विकास किया। ठीक है? तो यह आरंभिक जो भाषा का जो भी स्वरूप रहा होगा तो आरंभिक भाषा जो बनी वो प्राकृत कहलाई। प्राकृत में प्राक जोड़ कृत भी कह सकते हैं, जो भाषा पहले बनी। ठीक?

तो अब है कि इसको मि। अब देखिएगा इसमें आप प्रकृति से बना प्राकृत। अब प्राकृत बना। प्राकृत के भी बहुत सारे क्षेत्र में भेद रहे होंगे। प्राकृत के भी बहुत सारे क्षेत्री। अब की इसका बहुत ज वर्षों के बाद एक संस्कार किया गया। मान य पर प्राकृत है। बहुत सारे भ क्त्र अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग प्रकृत रहे। तो य जो इसका किसी एक भेद का संस्कार किया गया। संस्कार किया गया तो बन गई संस्कृत। ओरिजिन आपका प्राकृत है। प्राकृत से किसी एक रूप का प्राकृत के किसी एक भेद का संस्कार किया गया। संस्कृत हो गया। संस्कार मतलब क्या समझे? आदमी आप लोग कई संस्कार करते हैं। जन संस्कार करते हैं, मुंडन संस्कार करते हैं, विवाह संस्कार करते हैं। उसके कुछ उस संस्कार के साथ में कुछ वर्जना जोड़ दी जाती है, कुछ पड जोड़े जाते हैं। से जन पहन लिया, जन आज के बाबू आज के तारीख से थोड़ा य ना करे खा ना करे खा ना जा जा बोलता है ना? तो शादी विवाह में देखिएगा हम लोग यहां देखते कस्टम। हम लोग यहां है कि शादी यहां शादी होने से पहले बच्चा को किसी के यहां भी खा सकता है। शादी होने से पहले देखिएगा एक रिवाज है गांव के अलग-अलग जात की य खिलाया जाता है दूला दन को पाच छ दिन की जो है ना पूरा खाते रहता है दूसरे तीसरे घर में जाकर या दूसरे घर से खाना आता है। अलग अलग जात के य से मने उसका उसका शादी होने के बाद उसके बजना जोड़ द ग कि आप रा ना फेरा रखना है। से बहुत सारे संस्कार कन संस्कार होता है। बहुत सारे संस्कार के साथ कुछ वर्जना जोड़ दी जाती है। तो संस्कृत का जो संस्कार हुआ मतलब ग्रामर बना दिया गया। य सही है, यह गलत है। मने शास्त्रीय जो है उसको बना दिया। भाषा व्याकरण शास्त्र है है ना? तो यह जो है कुछ शास्त्रीय जो उसमें वर्जना जोड़ दी गई कि भाई यह सही है, वह गलत है। ऐसा प्रयोग उचित नहीं है। ऐसा प्रग अनुचित है। इस तर जो संस्कृत बन गया। ट क्लास की भाषा बन गई। वह एक नागर समुदाय की भाषा बन गई। मतलब ये इसको जो इस सोसाइटी संस्कृत को जो है सारा ि दरवाजा बहरी लोगों के लिए बंद हो गए। सामान्य आदमी इसका प्रयोग नहीं कर सकता है। और जबरदस्ती भी किया गया कि सिर्फ मना ही नहीं है। तुमको जबरदस्ती भी अगर तुम बोलोगे संस्कृत कुटाई पिटाई होगी, मारपीट होता था। संक तुम पढ़ नहीं सकते हो। संस्कृत तुम सुन नहीं सकते हो। कान में अगर तुम संस्कृत का वेद पाठ करोगे सुनोगे तो कान में शीशा ऐसा तो किया जाता था। जीभ काट लेंगे, वो करेंगे। तो यह जो है सो एकदम मनाही था।

अब सवाल यह है कि आम जनता के लिए संस्कृत के दरवाजे बंद हो गए। सारे खिड़की दरवाजे इसके बंद। तब आम जनता क्या बोलेगी? आम जनता के पास क्या था? प्राकृत था ना? आम जनता के प्राकृत आम जनता प्राकृत बोलती रही। ठीक है? संस्कृत दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भाष है। इतनी साइंटिफिक भाषा दुनिया में नहीं है आज तक। और अंग्रेजी दुनिया के सबसे बेकार भाषा है। कहीं कोई आपको य नहीं है। कोनेशन नहीं है ना उच्चारण में ना श्रवण में ना लेखन में ना माने में कहीं कोई को में नहीं है। इसके बावजूद वह विश्व भाषा बनी हुई है। क्यों? कि अंग्रेजी ने अपने खिड़की दरवाजे सारे लोगों के लिए खोल दिए। सर्व ग्रासी भाषा हो गई। एकदम जिस भाषा के शब्द उसको पसंद आया, ज्यादा प्रयोग में उसने रख लिया। इसका नेचर उसका। तो क्या हुआ कि व आज संस्कृत, संस्कृत के दरवाजे बंद हो गए सबके लिए। य गलत है, वह सही है, गलत है, सही है। आज संस्कृत जो है, इतनी वैज्ञानिक भाषा के बावजूद व डेड लैंग्वेज के श्रेणी में आ मृत्य भाषा के श्रेणी में आ गई है। कौन बोलता है उसको? जो प्रयोग में नहीं तो मृत ही है। वो आपको क्या नाम है उसको संग्रहालय की भाषा ल गई। किताबों को जाइए, वेदों को पढ़िए, उसके जानने के लिए पढ़ना पड़ेगा। दनन डे टू डे लाइफ में तो उसका कोई यूज नहीं है। संस्कृत का। इसलिए संस्कृत जो है सबसे श्रेष्ठ भाषा होने के बावजूद वो मृत भाषा हो गई। आज के तारीख में।

वो प्राकृत जो है रही। और यही प्राकृत जो है हमारा खोरठा का आधार है। खोठा का आधार य प्राकृत ही है। ठीक है? यह प्राकृत ही है कोटा का धार। जो यहां से आया। इसलिए देखिएगा कि खोठा भाषा में अभी भी जो अनम जो शब्द है, मने अनुक अनुक शब्द है, बहुत बड़ी संख्या में मिलते हैं। और इसकी जो प्रिमिटिविज्म शब्द है, प्रकृति के अनुकरण से जो शब्द लिए गए हैं, उनके बहुत आयत संख्या में मिलते हैं। कोठा में। इसलिए ये एकदम आदिम भाषा है। बाद के दिनों में इसमें आपके जनजातीय शब्द भी शामिल हो गए। जनजातीय भाषाओं के शब्द भी शामिल हो गए। बहुत सारे खठ में आपको कुक के भी शब्द मिलेंगे। आपके मुंडा भाषाओ के भी शब्द मिलेंगे। कुछ मात्रा में है। चकि इतने सालों से पैरेलल चल रहा है। और मुंडा लोग भी इसको ए कॉमन में क्या कांटेक्ट लैंग्वेज में यूज करते हैं। जन जाति मतलब साधनों के और जनजातियों के बीच में जो कांटेक्ट लैंग्वेज का काम करती स्क उसमें कुछ कुछ जड़ता जाता है। बहुत सार जगहो के नाम देखिएगा कि झारखंड में अनेको गांव के नाम आपको मिलेंगे। कोटा में।

बहुत से शब्द हैं जो आपको जैसे देखे तो गदर गदर इधर श व् है ना। तो बंगला में भी गया गदर। तो वो जो कई से शब्द हैं जो आपको है उस आपको देखिएगा संथाली भाषा ने कुक ने खोठा को आपको ध्वनि स्तर पर भी, शब्द स्तर पर भी प्रभावित किया है। तो वो जो देखेगा कि ये खोठा शब्द है, यह हमारे प्राकृतिक, हमारे आधार भाषा रही है। ये प्राकृत और उब का वो प्राकृत का देखिएगा एक रूप था, ये पाली। ठीक है ना? पाली की ध्वनियां जो है, खोठा के ध्वनि से बहुत मेलती है।

पाली जो है र लिपि में लिखी जाती थी और गौतम बुद्ध की भाषा जो पाली थी। पाली मतलब होता है पल्ली माने गांव। हालाकि पाली शब्द की उत्पत्ति कई तरह की बात है। प्रकृत का एक रूप है वो। प्राकृत से ही पाली। पाली मतलब है कि हम तो उसका अलग कर रहे कि पाली का मतलब होता है पारी अलवा पारी देखते हैं ना, उसमें पटी पटी बना के रखता है उसको पार बोलता है पट्टी में। तो जो ये लिखी जाती होगी आपको मान लिए इसमें क्या नाम है रोटी तो लाइन में लिखते ना, ऐसे पारी से आपको लाइन से पारी पारी। तो जब पाली को लिखा जाता रहा होगा उसमें में ब उसमें कुछ रूपांतर हो गए होंगे और इसी से उसका नाम जो मतलब प्राकृत को जब लिखा जाता होगा में टी में तो लाइन में लिखा जाता इसलिए पाली हो गया। पाली से पार पंक्ति हो गया। इसका मतलब पाली पंक्ति होता है। ठीक है पंक्ति में। तो ये पंक्ति में भी लिखा जाने के कारण से पाली आया होगा।

और यहां जो ये तो आपका इसमें इसमें मानने वाले कौन हैं? तो आपके ए के झा जी इस मान्यता को मानते हैं। आला जी मानते हैं और बाकी जितने सारे लोग हैं, अधिकांश लोग मानते हैं। इसको एक सेक्शन और है देखिए। एक तो एक थ्योरी हुआ कि खोठा की उत्पत्ति प्रकृति प्राकृत सिद्धांत। एक सिद्धांत हुआ आपको प्रकृति प्राकृत सिद्धांत। प्रकृति प्राकृत सिद्धांत। यह सिद्धांत के तहत झाजी हैं और आला जीी हैं। एक सिद्धांत ये हुआ खोठा भाषा की उत्पत्ति को लेकर के।

एक सिद्धांत ये है। दूसरा सिद्धांत यह है कि संस्कृत प्राकृत अपभ्रंश सिद्धांत। यह देखिएगा कि यहां भाषा को जो संस्कृत थी, अब हमने शुरू में बताया था आपको कि भाषा के आधार जो भाषा मौखिक थी। भाषा तो मौखिक थी। ध्वनियों को कोई आकार हीन थी। ध्वनियां कोई लेटर नहीं बना था, कोई वर्ण नहीं बने थे। तो भाषा वाचिक स्तर पर चल रही थी, मौखिक चल रही थी। तो उसके जो सीमाएं थी वो श्रवण, उच्चारण, श्रवण, अमरण और संवहन। इस चारों पर आधारित भाषा और चारों के कारण जो है भाषा में आपको विकृति होने की संभावना ज्यादा थी। ठीक है। ठीक है, चल रहा है ना? तो ज्यादा थी उसके विकृत होने की संभावना।

तब क्या हुआ कि अब सवाल है कि जो संस्कृत बोलते रहे होंगे वो सारे के सारे एकदम साउंड तो हेल्दी एकदम तो नहीं रहे होंगे। सबका एकदम उच्चारण अंग सही रहा होगा, सबका श्रवण अंग भी सही रहा होगा, अमरण शक्ति भी सबकी सही रही होगी। इसमें कुछ ना कुछ तो गड़बड़ियां होती होंगी ना? तो उसके गब और कुछ लोग मना करने पर आदमी की प्रवृत्ति और ज्यादा जिद्दी हो जाता है। तो कुछ बरिया लोग संस्कृत बोलने कर मार तो मार तुम ब बोलते हम भी बोल के देखेंगे। तो बेचारा क बोला नहीं ड़ जाएगा। तो भाषा में विकृति आ गई। यह भी धीरे-धीरे प्राकृत का रूप लेता गया। प्राकृत मतलब क्या अपना पुराना रूप। माने प्राकृत से के संस्कृत बनाए भाई। तो फिर बिना गया बड़ गया रहे है ना बिगड़ गया बिगड़ गया तो क्या हुआ प्राकृत हो गया। माने पुरा। प्राकृत मतलब क्या पुराने दशा में आ जाना। हम लोग बोलते हैं ना जैसे अगर मान ली कोई थका हुआ आया तो बोलते हैं कि बैठिए प्रकृत होइए, प्रकृत स्थ होए। मतलब पुरानी स्थिति में अब चल के आए प्रकृति आपकी थी, बढ़िया महसूस कर रहे थे, चल के थके ना भाई। तो फिर बैठिए प्रकृत होइए। मने पुनः प्रकृति को अपनी प्रकृति को प्राप्त कीजिए।

यह जो बिगड़ गई भाषा तो फिर जिधर से आई थी उस लाइन में चली गई है। ना बना था पहले पतरे से पत्तर से बना था पत्र। अभी भैया लोग पढ़ाते हैं क्या कि पत्र पहले बना, त पत्र बना, पत्र का ही विकृत रूप पत्र है। यह नहीं है। संस्कृत के संस्कृत ग्रुप के लोग क्षमा के लोग भाषा का कन्फ अभी स्टील चल रहा है। पहले संस्कृत बना के पहले प्राकृत बना। इमेजिन करिए। पहले भाषा सरल रही होगी ना? बाद में कठिन बना दिया लोगों ने। संयुक्त पहले नहीं थे, बाद में बने। दीर्घ पहले नहीं रहे होंगे, बाद में बने। अभी हम लोग आगे पढ़ेंगे वर्म देखेंगे तो ये प्राकृत बने। अब प्राकृत भी इसमें भी साहित्य जब लिखने लगा तो यहां भी कुछ पंडितों की भाषा हो गई। तो फिर बाद में ये बिगड़ करके अपभ्रंश हो गई। अपभ्रंश। ठीक है। तो अपभ्रंश भाषा हो गई।

अब अभी विद्वानों का मानना है इस खेमा के लोगों का कि संस्कृत आदि भाषा है और उससे विकृत हुई है प्राकृत। प्राकृत से अंस। और अभी जो मॉडर्न लैंग्वेज जितने हैं आर्य भाषा के वो सब अपभ्रंश से बने हैं। समझ रहे बात को? जो अभी जो वर्तमान में जो भाषाएं हैं वो अपभ्रंश से बने हैं। तब आप देखिएगा कि इसको मिटाए। ओके।

अब देखिएगा अपभ्रंश में भी आप तो देखिएगा अपभ्रंश। अपभ्रंश के भी क्षेत्रीय बहुत सारे भेद थे। सौर सेनी अपभ्रंश, पचट अपभ्रंश, फिर आपको मागी अपभ्रंश, अर्ध मागी अपभ्रंश। अपभ्रंश के भी बहुत सारे भेद थे। तो मगध क्षेत्र के मगध साम्राज्य में जो भ्रंश था उसको तो लोगों ने बांटा है तीन खेमा में। ये है पूर्वी, इसमें पूर्वी, इसमें मध्य और इधर पश्चिमी। अब कि पूर्वी में असमिया, बंगला, उड़िया। यहां मगही, मैथिली और इसमें भोजपुरी। भोजपुरी।

अब देखिए मजे केदार किस्सा है। अब कहां चले गए खोठा वाले? किस क्षेत्र को बाटे है रे भारत को? या नहीं नहीं। माग माग अपभ्रंश है ये। मागी अपभ्रंश। ठीक है ना? ये भ्रंश के बहुत सारे भेद थे ना सर? सौरस भ्रंश से हिंदी बनी है, है ना? इस तरह से बहुत सारे बने हैं। सरनी भ्रंश है, अर्ध माग भ्रंश है, माग भ्रंश है। तो इस बहुत सारे भेद रहे। तो मगध साम्राज्य के क्षेत्र की जो थी अश वो माग कला। माग अंस को तीन खेमा में बाटा लोगों ने। है ना? ये इसमें बाटने वाले में दो तीन लोग हैं। आपको बहुत सारे विद्वान हैं। जैसे आपको ये भी सुनी कुमार चजी वगर है। ओरिजिन डेवलपमेंट ऑफ बंगला लैंग्वेज के जो लेखक है उन्होंने कहा है। तो ये तीन खमा में बाटा है। केशरी कुमार सिंह है, वहां पर संपति हरियानी है, उसके। तो ये जो है इको बाटा। वो नोट्स में सब नाम भी मिल जाएगा। इस समझ लीजिए।

तो ये जो है अब है कि यहां मगही और मैथली। आपको बाकी झारखंड भाषाएं कहां चली गई? नहीं कर। ऐसा नहीं हो पाएगा। हम बैठ के थ लिखेंगे आपको लिखेंगे। मेरे पास नोट्स पुराना है, पूरा टेक्स्ट है। दे सकते हैं। लेटेस्ट मुझे लिखना पड़ेगा ना? लिख रहा हूं मैं एकदम लेटेस्ट। उसके एग्जामिनेशन केडिंग बनेगा। तो इसमें देखिएगा इसमें विद्वानों ने कहा कि खोठा को कहा खोठा और माली। इसको उन्होंने कहा कि यह पूर्वी मगही है। खत्म हो गया। कहा कि खोठा को अलग लैंग्वेज नहीं, कुली अलग लैंग्वेज नहीं। पूर्वी मगही मगही का ही पूर्वी रूप है। और भोजपुरी। इसको कहा भोजपुरी को कहा कि नगपुरिया को कहा कि पठारी भोजपुरी है। नगपुरिया को नागपुरी को उन्होंने कहा कि पठारी भोजपुरी है। और पाच परनिया को कहा कि नागपुरिया का विकृत रूप है। मतलब एक हिसाब से ये भोजपुरी है। अब खत्म हो गए। ठीक है। तो ऐसा लोगों ने कहा।

और तो बाद देखिएगा कि इस बार काफी आंदोलन हुआ। भाषा क्षेत्र में काम शुरू हुआ। एक अमेरिकन लेडी थी मोनिका जॉर्डन। मोनिका जॉर्डन। जो सो मोनिका जॉर्डन। यह जो सो नागपुरी भाषा पर काम कर रही थी आपको इसमें शिकागो यूनिवर्सिटी में। उसने कहा कि नागपुरी जो है एक अलग लैंग्वेज है। वो इसकी भोजपुरी का रूप नहीं है। वो ब शुरू में जब उसको कहा उस एक स्थापना उन्होंने दे। केसरी कुमार सिंह वग बिहार के व उन्होंने स्वीकार मान ग इसको।

अब है कि देखिएगा। अब इसी की तर्ज पर बाद में वह नागपुरिया वाले को कहा कि भाई मगही और मैथिली एक भाषा है। मध्यम की। तो एक नगपुरिया भी भाषा है। ठीक है। मगही रहा, मैथिली रहा, नगपुरिया पास तीसरी बहन। नगपुरिया हो गई। बाद में रिसर्च किया आपके ठ इसमें क्या नाम है? कुरमाली ने कहा कि हम चौथी बहन है। हम किसी का मेरा अलग अस्तित्व है। हम किसी के लघु भगु नहीं है। कि तब आपके पास परनिया लो ने रिसर्च किया। बोला कि हम पांचवी बन है। पंच पर गनिया। अभी जो खोठा के लोग कर रहे हैं बोल रहे हम छठी बन है। कितना काम हो रहा है? बत नहीं हम कह सकते हैं। लेकिन इधर उधर माल करके कर लोग। ये जो छठी बन इसको वो आपको छन ठ कई जो रिसर्चर है वो कह रहे हैं। रिसर्च का तरीका क्या है? बहुत ढंग से काम नहीं हो रहा है। जो फैक्ट है इधर का माल उधर किया, उधर का माल उधर किया। हा फलाने ने कैसा कहा है? तो फलाने ऐसा कहा इसलिए सही होगा। उन्होंने अभी नागपुरिया भाषा का शरवण कुमार गोस्वामी ने जो किया है पीएचडी। नागपुरी भाषा का विकास। उन्होंने लिखा है कि हजारी की भाषा विशुद्ध भोजपुर मगही है। कुमार सिंह ने कहा है, संपति यार ने कहा है। इसलिए सही कहा होगा। ब इन्होंने कोई जरूरत नहीं महसूस की कि सही कहा है, गलत कहा है। उन्होंने स्वीकार कर लिया।

अभी जो रिसर्च होना शुरू हुआ है तो वह जो है अभी कुछ लोग कह रहे हैं कि हम भी इसी के तर्ज पर। तो ये जो अभी जो नील कमल जी बता नील कमल जी बोले की अ मतलब है तो एक अलग एक खेमा खड़ा हो गया। प्रकृति प्राकृत सिद्धांत वाला था। दूसरा खेमा हो गया आपको संस्कृत प्राकृत प्राकृत अपभ्रंश सिद्धांत। है ना? ये ये इसमें जो है सो बहुत सारे लोग हैं। डॉक्टर राम कुमार तिवारी व जियोग्राफी के टीचर है। व वही बोल रहे हैं। डॉक्टर प्रभाकर वगैरह भी बोल रहे हैं। और अभी कुछ मॉडर्न रिसर्चर है। उ भी बोल रहे हैं। रिसर्च व को देखिएगा तो उन्होंने सा गल मटोल है। उनका कोई मौलिक काम नहीं है। उन्होंने कहा है इसलिए स्वीकार कर लिया।

यह जो सिद्धांत है फिर भी आपको जिक्र तो करना है। ये सिद्धांत चल रहा है तो आपको परीक्षा में लिखना ही है कि एक तो है कि प्रकृति प्रकृत सिद्धांत में जीी है, आला जीी है। दूसरा है संस्कृत प्राकृत सिद्धांत में सारे लोग हैं। यह जो है दोनों सिद्धांत अभी काम कर रहा है। और इधर मेरा कहना है जो की एक के झा जी का जो मत है, आला जी का जो मत है मैं इसको स्वीकार करता हूं। और उन्होंने जो खरो से जो सं ने बताया है उसको मैंने आगे बढ़ाया है। क्यों ऐसा है? टी से आपको टी लिपि से खोठा का संबंध रहा है कि नहीं रहा है? इस संबंध में मैंने थोड़ा आगे बढ़ाया है काम को। तो ये जो है देखिए मैंने जो मेरी किताब है खोठा भाषा उभ विकास उसमें मैंने इसका जिक्र बहुत विस्तार से किया है।

तो ये देखिएगा कि ये मूल रूप से खोठा भाषा की उत्पत्ति के स संस्कृत प्र सिद्धांत में राम कुमा राम कुमार तिवारी जी है, डॉक्टर विनोद कुमार है, है ना? और फिर आपके क्या बोल सकते डॉक्टर प्रभाकर है और बाकी लोग है। नीलकमल जी है, है ना? बाकी जितने जो पुराने फॉलोअर्स है, जो जितना पुराना लोग है वो र के साथ में है। सब है। ये सब चीज है आपको देखिएगा दो सिद्धांत है। एक तो यह सिद्धांत है और प्रकृति प्राकृत सिद्धांत। ठीक है। ये जो है सो प्रकृति प्राकृत सिद्धांत। यही दो सिद्धांत काम कर रहा है भाषा की उत्पत्ति को लेकर के।

यह आपका पहला चैप्टर हो जा रहा है। लिखे खोठा में। ठीक है। ये तो हिंदी में बुझना तो नहीं लिख। लेकिन ठा में बहुत मुश्किल नहीं है। आराम से लिखा जा सकता है। है ना? हम शुरू में क्या करेंगे ना कि व आप इजी वे में कैसे लिख सकेंगे उसको। हम कुछ जो मोटे मोटे जो शब्द हैं ठा के जिसे लिखेगा तो खोठा लग जाएगा कि ठे लिखा है। हो ठेट। वैसे बिल्कुल ठेट शब्दों का प्रयोग जो है कौन-कौन शब्द है 50 60 70 80 को शब्द है उसको आप प्रयोग करते चलिए। बीच-बीच में वो ठा होता जाएगा। समझे ना? दूसरी बात कारक को पढ़ ली। कारक हम बता देंगे। फ कारक बता देंगे तो कारक बता देंगे तो कारक का प्रयोग करेंगे तो किसी भी भाषा के शब्द को आराम से उसम खोठा के रूप में कर सकते हैं। बहुत इजी में लिख सकते हैं।

मेरी जो मतलब कोशिश होगी हम लिखेंगे आपको जो क्या नाम है प्रैक्टिस कराएंगे। अवर से जो होगा ना हम जैसे इसको नेक्स्ट आएंगे तो हम इसको लिखा देंगे। ठीक है। हम खा हाक। ये पूरा पूरा ये टेक्स्ट हो गया। अब इससे पूछ सकता है कि खोठा भाषा की उत्पत्ति के लेकर एक झाज के मत बतावा। खोठा भाषा की उत्पत्ति के लेकर के आला प्रकृत अ सिद्धांत बोल सकता है कि कोठा भाषा के जन्म संस्कृत प्राकृत माग प्राकृत से भेल है। इसको साबित करना होगा। चाहे बोलेगा कि आपको एक प्रकृति से पठा भाषा के उत्पन्न भेल है, जन्म भेल है। एक बता ते। तो ये जो है आपको अलग अलग मत है। इसको क्योंकि आपके पास पहले जब 40 नंबर का सवाल था, जब 20 नंबर का सवाल था तब बड़े-बड़े सवाल पूछे जाते थे। पूरा का पूरा कोठ भाषा की उत्पत्ति को लेकर प्रश्न जो है पूरा पूछा जाता था। अब आपके पास 10 नंबर का सवाल पूछता है। 10 नंबर का सवाल पूछता है तो आपको तो पूरे लिखना संभव नहीं है। 10 नबर आपको लिखना लिमिटेशन आपका है ना? व आपको 200 250 शब्द में लिखना है। 300 शब्द में मैक्सिमम 300 शब्द में जाएगा और 300 शब्द कितना? एक पेज से ज्यादा नहीं होता है। है ना? तो वो सारा कुछ करना है आपको।

तो ये जो है आपको दो ही सिद्धांत प्रमुख है। एक प्रकृति प्राकृत सिद्धांत जिसके जीी वगर है, आला जीी है और बाकी धर है आपके संस्कृत प्राकृत सिद्धांत। उसम न उसम ज्यादा असल में है क्या कि उन लोग का जो य है फॉलो कर रहे जो पूरी दुनिया जो जा रही है उस लाइन को फॉलो कर रहे है। लेकिन वो अलग से हट के जो जा दिया सिधांत वो ज्यादा मान्य लग रहा है। क्योंकि कई ऐसे चीज है जो आपको बिल्कुल वहां से जैसे देखिए खोठा एक आकार बहुला भाषा है। अ उकार बहुला भाष है। खबू जबू करबू चलब कहलू पढ़ल। यहां ईवा जई बा पढवा सुनवा चलबा देखबा आकार है। आपको गडी में तो बोलते है य बहुत सारे ता क्यों गब थ बोलते है चल करो है करो है। ऐसा कुछ नहीं है। मेरा कना है कि व जो है ना गडी की जो भाषा है ना व स्टंड के समकक्ष है। है ना? व आपको भाष पनाथ के आसपास की भाषा है चले आती है वो बुकारो गग भाषा सर जैसे बोलते गाव में आ जातारा अरे भाई मेरा कहना व बात नहीं जा हर जगह नहीं ना है। सबको बोलिए ससुर को ससुर प्रयोग अलग है ना ई सबको बोलते बाप को बोलते नहीं बोलते य आदर बो देने के लिए बा है ना जय भा भा चल भा सु आप [संगीत] सुर कोन वाला लिखे बात नहीं है आप तोहे घबरा रहे व तो समय पर आप समझ जाइएगा। ठीक है। अभी अभी पहले क्लास में आप क लिखेंगे व ब बहुत मुश्किल नहीं है। हम आपको बता रहे हैं बहुत मुश्किल का एकदम मुश्किल नहीं है। आराम से लिख सकते हैं। मेरा अपना अनुभव है। अरे भोजपुरी भाषी आदमी जब यहां से 116 ला सकता है तो आप तो ठासी ऐसे कुछ थोड़े है। मुरी भाषा लड़का भी पढ़ा है य ी पढ़ा है 116 नंबर लाया है। क्या बोलिएगा उसको? भले वो नहीं पास कर सका। पास नहीं कैसे किया तो बेचारा उस फेल कर गया कप पेपर में। हा उधर गड़ आ गया उसका तो उस इसका क्या दोष है? बहुत मुश्किल है। हम तो इसको कह रहे कि बहुत आसान है। मार्क ओरिएंटेड पेपर है। आराम से हिंदी वाले तो भुगत चुके हैं एक बार सजा सब लोग है ना हिंदी में जो इतनी सारी व मतलब इसमें उसका जो मूल्यांकन का जो ये है। अब यहां हर्ष द का भेद नहीं है। हष के भेद मगा है ना? और जो साहित्यिक भाषा हम हम लोग जो बोलते हैं ना बिहार झारखंड आदमी अगर जब तक लिटरेचर नहीं पढ़ा होगा हिंदी लिटरेचर व हिंदी में पास नहीं करेगा। हम बता रहे हैं क्योंकि एकदम इतना व संस्कृत हिंदी का जो स्वरूप बन चुका है एकदम संस्कृत निष्ट हो चुका है। तत्सम नि भाषा हो चुकी है और ऐसे ऐसे शब्दावली बने हैं उसका प्रयोग होता है साहित्य साहित्य में आ चकरा जाएगा बोलते ही नहीं है। हम लोग य हिंदी खूब बोलते हैं। हम तो करते थे तुम जान करता है बोलते ी तुम तो तुम तो जान करते हो हम रात भर पढ़ करते हैं ही हम लोग प्रयोग करते हैं। तो हमारी हिंदी अच्छी नहीं है मतलब भी साहित्यिक हिंदी। उसको हिंदी लेकर के एक तो है कि ठा का सेलेब थोड़ा छोटा है। पहले पहले भी पहले छोटा नहीं था काफी बड़ा था अभी छोटा कर दिया है। एक तो सिलेबस हिंदी की तुलना में तो छोटा है। इसलिए हम सोते हैं कि ये बहुत इजी है। बहुत मुश्किल नहीं है। व तो पढ़ चुके हैं सबब जानते ही हो। बहुत भारी नहीं है। इसमें कई लोग पिछली बार था किसी था क्या? हा नहीं था ना? हिंदी कितने लोग काथा ी इसम से आप लोग का हेलो क्या था आपका पहले ब है ओके हा लैंग्वेज में हिंदी थाना वही क हिंदी में हम अभी शिकायत मिली है। बहुत कम नंबर मिला है तो हम लोग आज य य करते हैं। फिर हम लोग ने मिलेंगे ने अगला क्लास तो त कर सटर को होगा व त होगा तो फर बता दिया जाएगा आपको नहीं पहले व्याकरण पढ़ेंगे जी इसके बाद व्याकरण नहीं आएगा।