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Zaalim Badshah Aur Zulm Ka Anjaam Part 1 Or Part 2 || Moral Stories in Urdu & Hindi

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Transcription

शहंशाह फिरोज शाह [संगीत] ने आज अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग लड़ी थी। उसने दारुल हुकूमत पर कब्ज़ा कर लिया था और यह खबर पूरे दक्कन में फैल चुकी थी। आज वह एक रियासत के राजा [संगीत] से शहंशाह बन गया था। उसने अपना लकब फिरोजशाह मुजाहिद रख लिया। वह एक बहादुर और [संगीत] जंगजू नौजवान था। अफ़गान बिरादरी से ताल्लुक रखता था। ज़िद का पक्का, क़ौल का सच्चा और पठान मिज़ाज रखने वाला, जो बात उसके दिमाग में बैठ जाती उसे कोई निकाल [संगीत] नहीं सकता था।

फ़तह और कामयाबी के जश्न में हर किस्म की महफ़िलें मुनक़्क़द [संगीत] हुईं। सरकारी खज़ाने से खूब खर्च किया गया और हर किसी ने दिल खोलकर खुशियाँ मनाईं। आज खुद शहंशाह भी गुरूर की हालत में था। ऐसे में एक कनीज़ ने आकर सरगोशी की कि मल्लिका [संगीत] की तबीयत नासाज़ है। शहंशाह पहले अपने कामों से फ़ारिग़ हुआ, फिर मल्लिका के पास गया। मल्लिका ने डरते-डरते खुशखबरी सुनाई कि [संगीत] वह एक बेटी का बाप बन गया है। उनके घर अल्लाह की ख़ास रहमत आई है। बेटी का सुनकर शहंशाह [संगीत] का सारा नशा हैरान हो गया। चाहे वह नशा ताक़त का था, दौलत का, फ़तह का या सल्तनत [संगीत] के इज़ाफ़े का। वह गुस्से से भड़क गया और कहने लगा, "मल्लिका, मुझे बेटी नहीं [संगीत] बेटा चाहिए। इतनी बड़ी सल्तनत, जायदाद और रियासत का वारिस मैं बेटी को नहीं [संगीत] बना सकता। वह हुकूमत को कमज़ोर करेगी और मुझे दुनिया का ताक़तवर बादशाह नहीं बनने देगी।" गुस्से में पाँव [संगीत] ठोकते हुए वह जाने लगा। लेकिन मल्लिका ने उसे रोका और कहा, "बादशाह सलामत, बेटी खुदा की रहमत होती है। खुदा की दी हुई रहमत से मुँह ना मोड़ें। वरना अल्लाह [संगीत] की नाराज़गी मोल लेंगे। औलाद खुदा की देन है। वह चाहे बेटा दे या बेटी। याद रखें, दौलत औरत के नसीब से मिलती है, [संगीत] जबकि औलाद मर्द के नसीब पर होती है। यह बेटी भी आपके नसीब से हुई है। अब यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि इसे अपनाएँ, [संगीत] इसकी परवरिश करें और इसे तालीम व तरबियत से आरास्ता [संगीत] करें।"

मल्लिका की बातों ने बादशाह के गुस्से को और भड़का दिया। वह कहने लगा, "अगर तुम्हें खुदा की रहमत इतनी अज़ीज़ है तो [संगीत] अपनी बेटी समेत यह रहमत अपने पास रखो। मैं दूसरी शादी कर लूँगा ऐसी औरत से जिसकी [संगीत] किस्मत में बेटे हों। निकल जाओ यहाँ से। यह बेटी तुम्हें मुबारक हो। मैं इसकी शक्ल [संगीत] भी नहीं देखना चाहता।" यह कहकर शहंशाह ने फ़ैसला सुनाया और मल्लिका के कमरे [संगीत] से बाहर निकल गया।

कई दिन गुज़र गए और मल्लिका ने महसूस किया कि बादशाह [संगीत] वाकई बेटी की पैदाइश से नाराज़ है। बादशाह के दिल में अब उसकी कोई इज़्ज़त बाक़ी नहीं [संगीत] रही थी। कई दिन बीत चुके थे, मगर ना तो बादशाह ने खुद इसे देखने की तकलीफ़ की और ना ही किसी को इसकी ख़बरगीरी के [संगीत] लिए भेजा। मल्लिका ज़ाहिर व बातिन खुल रही थी। मगर उसके आँसू [संगीत] पोंछने वाला कोई ना था। उसने कुछ दिन और इंतज़ार किया कि शायद बादशाह के दिल में [संगीत] ख़ौफ़-ए-खुदा पैदा हो और वह अपनी बेटी को क़बूल कर ले।

इसी दौरान तातारों ने ज़बरदस्त हमला [संगीत] कर दिया। नतीजतन, दक्कन की काफ़ी जायदाद तातारों के क़ब्ज़े में चली गई और लाखों सिपाही मारे जाने की इत्तला मिली। बादशाह इस नुक़सान से बौखलाया। मगर अपनी नाकामी [संगीत] का ज़िम्मेदार किसी और को ठहराने के बजाय एक बार फिर मल्लिका पर बरस पड़ा। वह गुस्से से कहने लगा, "देखा तुमने, बेटी के पैदा होते ही मेरी बदक़िस्मती शुरू हो गई है। कितनी बड़ी फ़तह हासिल की थी इसके [संगीत] पैदा होने से पहले। लेकिन आज इसकी मौजूदगी की नज़दीकी के सबब आधी सल्तनत और जायदाद से हाथ धोना पड़ा। तुम इसे लेकर फ़ौरन दफ़ा हो जाओ, वरना धक्के देकर महल से निकलवाना [संगीत] पड़ेगा।"

बादशाह की दिल आज़ार बातें सुनकर मल्लिका का दिल टूट कर रह गया। उसे महल और दौलत से कोई सरोकार ना था। [संगीत] वह सिर्फ़ इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी गुज़ारना चाहती थी। उसने अपनी इज़्ज़त [संगीत] अपने हाथ में समझी और रात की तारीकी में नन्ही सी शहज़ादी शाहनाज़ [संगीत] को लेकर नामा'लूम मंज़िल की तरफ़ रवाना हो गई। जाते हुए उसने शाही लिबास भी उतार फेंक दिया था। पुराने कपड़ों में मल्लिका [संगीत] बैलगाड़ी पर सवार होकर महल छोड़ गई।

जब बादशाह को यक़ीन हो गया कि मल्लिका महल से दूर [संगीत] जा चुकी है। शायद उसकी सल्तनत की हुदूद से भी निकल गई हो और उसके साथ बेटी [संगीत] भी। तब बादशाह ने तातारों से बदला लेने की ठानी। उसने एक कसीर [संगीत] फ़ौज तैयार की और जंग की तैयारी शुरू कर दी। जल्द ही एक बड़ी जंग हुई जिसमें शहंशाह दक्कन [संगीत] ने तातारों की लाशों के अंबार लगा दिए। इस जंग में लाखों इंसान मारे गए। खून की नदियाँ बह गईं। लेकिन बेहद जंग [संगीत] का सामान, असलहा और हथियार हाथ लगे। इसके अलावा माल-ए-ग़नीमत [संगीत] के तौर पर हाथी, बकरियाँ और घोड़े भी हासिल हुए, जबकि हज़ारों क़ैदी [संगीत] पकड़े गए। इन क़ैदियों में मर्दों की तादाद कम थी क्योंकि ज़्यादातर मर्द जंग में मारे [संगीत] गए थे और औरतों की तादाद ज़्यादा थी।

जेल के रखवाले [संगीत] ने मौक़ा पाकर बादशाह के कान में सरगोशी की। "बादशाह सलामत, [संगीत] इससे पहले कि कोई और इन पर नज़र डाले, आप इन क़ैदी औरतों को अपना लें।" बादशाह ने पूछा, "किस औरतों [संगीत] की बात कर रहे हो?" जेल के रखवाले ने जवाब दिया, "बादशाह [संगीत] हुज़ूर, क़ैदियों में दो लड़कियाँ ऐसी हैं जो हुस्न, जवानी और ख़ूबसूरती में बेनज़ीर हैं। [संगीत] इनमें मल्लिका बनने की तमाम सलाहियतें मौजूद हैं।" यह सुनकर बादशाह के कान खड़े हो गए। उसने हुक्म दिया कि इन लड़कियों को एक-एक [संगीत] करके उसके सामने पेश किया जाए।

पहली क़ैदी लड़की को हल्के-फुल्के लिबास में सजाकर बादशाह के सामने [संगीत] लाया गया। बादशाह की आँखें खुली की खुली रह गईं। शायद उसने अपनी ज़िंदगी में इतनी हसीन लड़की कभी [संगीत] ना देखी थी। वह बहुत कम उम्र की थी। शायद किसी तातरी राजा की बेटी हो। बहरहाल, दूसरी लड़की [संगीत] को पेश किया गया तो बादशाह इस पर निगाहें हटाना ही भूल गया। जेल के रखवाले ने कहा, "बादशाह सलामत, इन माहे-पैकर सूरतों [संगीत] को देखकर दिल को सुकून और आँखों को ठंडक मिलती है, बल्कि [संगीत] इनसे महल को भी ज़ेवर बख़्शा जा सकता है। अगर आप इन्हें मल्लिका का दर्जा [संगीत] दे दें तो बेहतर होगा। मैंने सुना है कि तातरी औरतों की औलाद में ज़्यादातर बेटे पैदा होते हैं।"

बादशाह को यह बात दिल में लग गई और उसने दोनों लड़कियों से निकाह [संगीत] करने की तैयारी का हुक्म दे दिया। एक ही दिन दोनों लड़कियों से निकाह हो गया। यूँ बादशाह ने एक [संगीत] तीर से दो शिकार किए। फ़तह का जश्न और शादी का जश्न एक साथ मनाया गया।

दूसरी तरफ़ बैलगाड़ी वाला मल्लिका को [संगीत] लेकर चल रहा था। रास्ते में उसने पूछा, "बहन, आप कहाँ जाना चाहती हैं?" मल्लिका ने नम आँखों वाली आवाज़ में जवाब दिया, [संगीत] "भाई, जहाँ क़िस्मत ले जाएगी। फ़िलहाल अगर मुमकिन हो तो मुझे दक्कन की सरहद से बाहर पहुँचा दो।" बैलगाड़ी वाले ने मल्लिका की रोई हुई आवाज़ सुनकर उस पर तरस खाया। जब उसकी गोद में नन्ही शहज़ादी को खेलते देखा [संगीत] तो कहा, "बहन, फ़िलहाल मेरे घर चलो। तुम आराम करो, अपना ग़म हल्का करो, खाओ-पियो। जब कोई क़ाफ़िला दक्कन से बाहर जाने वाला होगा तो मैं तुम्हें तुम्हारी ख़्वाहिश के मुताबिक़ दक्कन की सरहद से बाहर पहुँचा दूँगा।"

मल्लिका अपनी नन्ही शाहनाज़ को लेकर बैलगाड़ी वाले के घर आ गई। लेकिन हर रोज़ वह सल्तनत से बाहर जाने की दरख़्वास्त करती रही। एक दिन सौदागरों का एक क़ाफ़िला बल्ख़ [संगीत] जा रहा था। बैलगाड़ी वाले ने उसकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ मल्लिका और नौ-मौलूद [संगीत] शाहनाज़ को इस क़ाफ़िले के साथ काबुल भेज दिया। इस क़ाफ़िले में बल्ख़ के बादशाह का एक रिश्तेदार भी मौजूद था, जो सितारा-शनास और नजूमी था। उसने मल्लिका से हमदर्दी [संगीत] का इज़हार किया और चेहरे की लकीरें पढ़ीं। साथ ही बहाने से नन्ही शाहनाज़ के [संगीत] हाथों की लकीरें भी देखीं। नजूमी का वहम यक़ीन में बदल गया कि यह माँ और बेटी [संगीत] ग़ैर-मामूली क़िस्मत की मालिक हैं। नजूमी का ख़्याल था कि मल्लिका जल्द ही शोहरत की बुलंदियों [संगीत] को छू लेगी, जबकि नन्ही शाहनाज़ के हाथों की लकीरों से ज़ाहिर होता था कि वह मुस्तक़बिल में तख़्त-ओ-ताज की मालिक [संगीत] बनेगी।

नजूमी ने बल्ख़ के बादशाह को इन बातों से आगाह किया। जिस पर बादशाह [संगीत] को भी मल्लिका और नन्ही शाहनाज़ से मिलने का शौक़ पैदा हुआ। जब बादशाह ने [संगीत] मल्लिका को देखा तो उसे उसके चेहरे पर जलाल और माथे पर तारे [संगीत] चमकते दिखाई दिए। नन्ही शाहनाज़ की सूरत भी इससे मुख़्तलिफ़ ना थी। लेकिन इनके चेहरों से बदनसीबी [संगीत] झलक रही थी। बल्ख़ के बादशाह ने इन दोनों को अपने महल में जगह दे दी और नन्ही शाहनाज़ की परवरिश का ज़िम्मा ले लिया। वक़्त अपनी रफ़्तार से गुज़रता रहा और इनकी ज़िंदगी नई राहों पर [संगीत] चलने लगी।

बादशाह दक्कन की दोनों बीवियों से चार-चार बेटे पैदा हुए। शायद खुदा [संगीत] उसे बेटी को ठुकराने की सज़ा दे रहा था। लेकिन इस बार उसकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ अल्लाह ताला ने [संगीत] उसे बेटों से नवाज़ा। चार साल में आठ जायदाद के वारिस पाकर बादशाह ख़ुशी से फूला ना समाता [संगीत] था। शहज़ादे नाज़ व ने'मत में पल रहे थे और उनकी हर ख़्वाहिश, चाहे वह जायज़ हो या नाजायज़, पूरी की जा रही थी। [संगीत] महल के शाही क़वानीन के मुताबिक़ उनकी तालीम व तरबियत पर ख़ास तवज्जो दी गई। उलूम व फ़ुनून सिखाए गए और शाही आदाब से [संगीत] आरास्ता किया गया। शमशीर-ज़नी पर सबसे ज़्यादा तवज्जो दी गई। हर शहज़ादे के लिए [संगीत] अलग-अलग उस्ताद मुक़र्रर किए गए ताकि वह जंगी महारत में माहिर हो सके।

बादशाह [संगीत] चाहता था कि उसके शहज़ादे इतने क़ाबिल बन जाएँ कि वह मुकम्मल दक्कन और उसके आसपास जैसे अफ़गानिस्तान, [संगीत] तुर्की और ईरान पर हमला करके उन्हें ज़ेर कर सके। बेटों की पैदाइश के बाद बादशाह का गुरूर आसमान को छूने लगा था। वह खुद को [संगीत] पूरी दुनिया पर हुक्मरान समझने लगा था। लगभग 14 साल गुज़र चुके थे और उसके दो बड़े शहज़ादे अब 18 साल के हो चुके थे।

एक रोज़ एक वज़ीर ने बादशाह को [संगीत] इत्तला दी। "बादशाह सलामत, दाएँ बाज़ू वाली रियासत के गवर्नर [संगीत] ने बग़ावत कर दी है और जंग के लिए तैयार है। हमने सलामती की बातचीत [संगीत] की थी कि वह खिराज देने पर राज़ी हो जाए या फ़रमाबरदारी क़बूल कर ले ताकि उसकी बग़ावत को ख़त्म कर दिया जाए। लेकिन वह किसी [संगीत] बात पर राज़ी नहीं हुआ।" वज़ीर ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "मगर वह गवर्नर बहुत सरकश [संगीत] पर उतर आया है। ना वह खिराज देने पर राज़ी है और ना ही आपकी फ़रमाबरदारी क़बूल करता है। इसलिए अब सिर्फ़ तीसरा रास्ता बाक़ी है।"

वज़ीर की बात सुनकर बादशाह गुस्से से आग बबूला हो गया और [संगीत] बोला, "नमक हराम! हमारे टुकड़ों पर पलने वाला हमारा मुक़ाबला करेगा? इस घिसट्टे के लिए तो मेरा बेटा शहज़ादा जलालुद्दीन ही काफ़ी है। जाओ, जंग की तैयारी करो और शहज़ादा जलालुद्दीन को मेरे हुज़ूर पेश करो।" जंग की तैयारियाँ शुरू हो गईं। 25,000 सिपाहियों का लश्कर तैयार [संगीत] किया गया जिसमें घुड़सवार, हाथी-सवार, ऊँट-सवार, तोपची और पैदल दस्ते [संगीत] शामिल थे। तमाम सिपाहियों को नए असलहे से लैस कर दिया गया। दो महीने का [संगीत] राशन गधों पर लाद लिया गया ताकि लश्कर को हर तरह से मुस्तैद [संगीत] रखा जा सके।

शहज़ादा जलालुद्दीन अपने वालिद का हुक्म पाकर दरबार में हाज़िर हुआ। उसने झुककर अदब से सलाम किया [संगीत] और मुदब्बनत से अर्ज़ की, "जी अब्बा हुज़ूर, क्या हुक्म है?" बादशाह ने कहा, "शहज़ादा जलालुद्दीन, तुम्हारे लिए आज़माइश का वक़्त आ गया है। अब वक़्त है तुम्हारी ताक़त व महारत [संगीत] को आज़माने का। हमारे दाएँ बाज़ू की रियासत के गवर्नर ने नाफ़रमानी करते हुए खिराज देने से [संगीत] इनकार कर दिया है और खुद को रियासत का बादशाह क़रार दे दिया है। उसने अपने नाम के साथ 'करीम अल्लाह शाह अकबर' का लकब [संगीत] इख़्तियार कर लिया है। लिहाज़ा तुम्हें इस नाफ़रमान करीम अल्लाह को ऐसा सबक़ सिखाना होगा कि आगे चलकर कोई भी बग़ावत [संगीत] करने से पहले काँप उठे। तुम्हें अपनी धाक बिठानी है ताकि लोग तुम्हारा और तुम्हारे भाइयों का राज हमेशा के लिए दिलों में बिठा लें क्योंकि आगे से मैदान-ए-जंग में तुम्हें और तुम्हारे भाइयों [संगीत] को ही उतरना होगा।"

बादशाह ने हुक्म देते हुए मज़ीद कहा, "और अपनी फ़तह व नुसरत के झंडे गाड़ने हैं। [संगीत] जाओ, फ़ौजी लश्कर तैयार है। और हाँ, सिपाही सालार अज़ीम को साथ ले जाना क्योंकि वह निहायत तजुर्बेकार और हमारा वफ़ादार है। याद रखो, अपने रास्ते में आने वाली हर रुकावट को दूर करते रहना, चाहे वह [संगीत] कोई भी हो और कैसी भी हो।" बादशाह का हुक्म सुनते ही शहज़ादा जलालुद्दीन तेज़ी से दरबार से निकला। [संगीत] एक तेज़ रफ़्तार घोड़े पर सवार हुआ और अपने जंगी लश्कर को लेकर कूच कर गया। उसकी ख़्वाहिश थी कि वह जल्द-अज़-जल्द [संगीत] बागी गवर्नर के सर पर पहुँच जाए।

लश्कर मुसलसल सफ़र करता रहा और रात के क़रीब इस बागी [संगीत] रियासत की सरहद पर पहुँच गया। बागी गवर्नर को शाही लश्कर की आमद की इत्तला मिल चुकी थी। दक्कन में जंगों की रिवायत [संगीत] के मुताबिक़ रात को जंग का आग़ाज़ नहीं किया जाता था और अगर जंग जारी हो तो उसे रोक दिया जाता था। यह जलालुद्दीन की फ़ौज के लिए अच्छा मौक़ा था कि [संगीत] वह सफ़र की थकान दूर कर सकें। आधा लश्कर आधी रात तक आराम करता रहा, जबकि बाक़ी पहरा देते रहे। [संगीत] जब एक ग्रुप जागता तो दूसरा सो जाता और यूँ सारा लश्कर सुबह तक ताज़ा दम हो गया।

सुबह होते ही दोनों फ़ौजें आमने-सामने सफ़-आरा हो गईं और घमासान की जंग शुरू हो गई। बागी लश्कर [संगीत] 300 सिपाहियों पर मुश्तमिल था, जबकि शाही लश्कर तादाद में कम होने [संगीत] के बावजूद अपनी दहशत से काफ़ी था। बागी फ़ौज के पास इल्म [संगीत] कम होने की वजह से कोई मददगार मौजूद ना था। दो से तीन दिन की खूनी [संगीत] जंग के बाद बागी लश्कर ने हथियार डाल दिए, जब उनका गवर्नर जो बागी बादशाह बन बैठा था, मारा गया। यूँ बागी गवर्नर के ज़ेर-ए-इंतज़ाम [संगीत] रियासत पर शहज़ादा जलालुद्दीन ने अपनी फ़तह का परचम गाड़ दिया।

शहज़ादा जलालुद्दीन के साथ भेजा गया सिपाही सालार अज़ीम निहायत बहादुर, ज़हीन [संगीत] और तजुर्बेकार शख़्स था। वह दिल ही दिल में सोचने लगा कि क्यों ना शहज़ादे को मशवरा दिया [संगीत] जाए कि वह इस रियासत में कुछ वक़्त क़याम करें क्योंकि वह नौजवान और दुनिया की रंगीनियों में दिलचस्पी रखने वाला था। यह मौक़ा उसे मज़ीद तजुर्बा फ़राहम कर सकता था। [संगीत] सिपाही सालार अज़ीम ने मौक़ा देखकर शहज़ादा जलालुद्दीन से गुफ़्तगू शुरू की। "शहज़ादे हुज़ूर, यह सूबा बहुत भरपूर है। जंग के मैदान [संगीत] के लिए आपके भाई काफ़ी हैं। आप इसे यूँ समझें कि यह सूबा आपको विरासत में मिला है। गोया यह आपके [संगीत] वालिद की जागीर का हिस्सा है।"

सिपाही सालार अज़ीम की बातें शहज़ादे [संगीत] के दिल पर असर करती गईं। शहज़ादा बोला, "तुम ठीक कहते हो सिपाही सालार, वाकई इस जंगी [संगीत] ज़िंदगी में क्या रखा है? इंसान को फ़ितरत और उसकी ख़ूबसूरती से मोहब्बत करनी चाहिए।" लेकिन वह बात अधूरी छोड़कर ख़ामोश हो गया। सिपाही सालार [संगीत] ने बात आगे बढ़ाई, "शहज़ादे साहब, आपके अब्बा हुज़ूर को मैं अच्छी तरह जानता हूँ। वह बहुत रहमदिल इंसान हैं और औलाद के मामले में वह सबर रखते हैं। एक बेटे के ना होने से उन्हें कुछ फ़र्क ना पड़ेगा और फिर आप इनसे हमेशा के लिए ताल्लुक़ [संगीत] तोड़ नहीं रहे, बस अलग रहकर अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी गुज़ारना चाहते हैं।"

सिपाही सालार ने मज़ीद कहा, "हमारे पास [संगीत] 20,000 सिपाहियों पर मुश्तमिल एक मज़बूत फ़ौज भी है जो हमारी हिफ़ाज़त [संगीत] के लिए काफ़ी है। जब फ़ौजी अफ़सरान और सिपाहियों को यह ख़बर होगी कि इन्हें मुराद तो सरकारी [संगीत] मिलेगी लेकिन काम सिर्फ़ मुहाफ़िज़ वाला लिया जाएगा तो वह भी खुश हो जाएँगे। यूँ सबकी ज़िंदगी ऐश-ओ-आराम में गुज़र सकती है और हमेशा के लिए हमारे [संगीत] वफ़ादार बनकर ज़िंदगी गुज़ारेंगे। किसी के दिल में बग़ावत का ख़्याल भी ना आएगा।"

सिपाही सालार अज़ीम की चिकनी [संगीत] चुपड़ी बातों ने शहज़ादे को मुकम्मल तौर पर मुतमइन कर दिया। दरअसल, सिपाही सालार अज़ीम अपने मक़सद के लिए [संगीत] शहज़ादे का इस्तेमाल करना चाहता था। मगर वह शहज़ादे को ज़िंदा और सामने रखना चाहता था ताकि बादशाह [संगीत] दक्कन कभी भी अपने सगे बेटे पर लश्कर-कशी ना करे। बादशाह जितना हो सकेगा इख़्तियार [संगीत] करेगा और इसका फ़ायदा उठाकर सिपाही सालार अज़ीम अपने आप को असरी [संगीत] तौर पर मुस्तहकम कर लेगा और साथ ही साथ इस सूबे की आमदनी से ख़ज़ाना भी भर लेगा जो बाद में उसके तसल्लुत में शामिल करता रहेगा।

दरअसल, [संगीत] सिपाही सालार अज़ीम ने शहज़ादे को नफ़्सियाती तौर पर महल में क़ैद कर लिया था। वह उसे दीन [संगीत] व दुनिया के मामलात में मशगूल रखता और बादशाह दक्कन से राब्ते में रहता था। उसने शहज़ादे को ख़ुतूत के ज़रिए अपने ख़्यालात व मालूमात भी भेजे, जिनमें फ़तह [संगीत] की ख़बरें और सूबे के सियासी, माली, समाजी और तिजारती हालात पर तफ़सील से रोशनी डाली गई। [संगीत] इन ख़ुतूत में तमाम इंतेज़ामियात को नाक़िस क़रार देकर इस्लाह की बात की गई थी।

बादशाह दक्कन, जो कि शहज़ादा जलालुद्दीन की फ़लाह व बेहबूद से मुतमइन हो चुका था, को अचानक इत्तला मिली कि मुल्तान के गवर्नर ने बग़ावत शुरू कर दी है और वह तातारों [संगीत] से मिलकर फ़तह के साथ दारुल हुकूमत तक पहुँचना चाहता है। लिहाज़ा बादशाह सलामत ने इस बग़ावत को [संगीत] सख़्ती से कुचलने के लिए एक बहुत बड़ा लश्कर तैयार किया, जिसमें 500 घुड़सवार [संगीत] और इतने ही पैदल दस्ते शामिल थे। इस बार बादशाह ने शहज़ादा जलालुद्दीन के हम-उम्र दूसरे बेटे [संगीत] नज़रउद्दीन को हुक्म दिया कि वह मुल्तान की तरफ़ 1 लाख फ़ौज ले जाए। इस लश्कर की सालारी निज़ामुद्दीन को सौंपी गई जो जंग में अपनी ज़िंदगी गुज़ार चुका था।

निज़ामुद्दीन फ़ौज को लेकर रवाना हुआ और मुल्तान से 200 मील दूर दोनों लश्कर का टकराव हुआ, जिसके नतीजे में शदीद लड़ाई हुई और लाशों के ढेर लग गए। निज़ामुद्दीन [संगीत] ने शहज़ादा नज़रउद्दीन को पीछे रखा और फ़ौजी दस्तों को जंग में शरीक किया। 10 दिन की लड़ाई के बाद [संगीत] फ़ैसलाकुन मरहला आया जिसमें तातारों को भारी जानी नुक़सान उठाना पड़ा क्योंकि गवर्नर [संगीत] मुल्तान ने इसी शक पर तातारों को बग़ावत में शामिल किया था कि वह अगले मोर्चों [संगीत] पर लड़ेंगे, जिसका नतीजा उनकी हलाकत की सूरत में निकला। गवर्नर को [संगीत] गिरफ़्तार कर लिया गया और बाक़ी फ़ौज के हौसले झुक गए, जबकि तातरी अपनी जान बचाकर भाग गए।

इस मोर्चे के नतीजे [संगीत] में एक बड़ा सूबा शहज़ादा नज़रउद्दीन के क़ब्ज़े में आ गया। यह भी वही चाल [संगीत] थी जो शहज़ादा जलालुद्दीन के साथ सालार निज़ामुद्दीन ने खेली थी। निज़ामुद्दीन ने शहज़ादा नज़रउद्दीन को [संगीत] बाप की तरफ़ से बाक़ायदा कर दिया कि वह नौजवान है और अभी लड़ाई-झगड़ों के लिए तैयार [संगीत] नहीं, बल्कि दुनिया की रंगीनियों में मशगूल होना चाहता है। निज़ामुद्दीन ने [संगीत] बज़ाहिर शहज़ादा नज़रउद्दीन को गवर्नर बनने का ऐलान किया, लेकिन हक़ीक़त [संगीत] में वह खुद ही बादशाह और गवर्नर था। उसने शहज़ादा नज़रउद्दीन की ख़ूफ़िया शादी करवा दी और वह शबाब, हुस्न और इश्क़ के चक्कर [संगीत] में पड़ गया।

निज़ामुद्दीन ने एक और चालाकी यह की कि अपनी बेटी को शहज़ादे के क़रीब जाने का इशारा दिया। उसकी बेटी अपने हुस्न व शबाब में बेनज़ीर थी, [संगीत] जिसका फ़ायदा उठाते हुए निज़ामुद्दीन ने शहज़ादे को अपने क़ाबू में कर लिया। शहज़ादा बहुत जल्द निज़ामुद्दीन की चालाकियों के दाम में आ गया और अपनी मोहब्बत की वजह से उसे अपनी मल्लिका बना बैठा। इस तरह वह अपने वालिद बादशाह दक्कन की जायदाद से [संगीत] अपना हिस्सा लेकर अलग हो गया।

18 साल बाद शाहनाज़ ना सिर्फ़ जवान हो चुकी थी बल्कि फ़ुनून-ए-हर्ब में भी शोहरत [संगीत] हासिल कर चुकी थी। उसमें जंगी ख़सलतें सरायत कर गई थीं और उसमें इसी बादशाह का खून भी गर्दिश कर रहा था। बल्ख़ के बादशाह ने उसे [संगीत] इतनी ताक़तवर और बेनज़ीर जंगजू बना दिया था कि वह शमशीर-ज़नी में अपना सानी ना रखती थी। बल्ख़ के बादशाह को खुद हैरानी थी कि उसकी नाज़ुक [संगीत] कलाइयाँ कैसे इतनी भारी तलवार का बोझ उठा लेती हैं और फिर सिर्फ़ बोझ नहीं उठाती बल्कि निहायत माहिर से तलवार [संगीत] चलाती भी थी।

18 साल की उम्र में बल्ख़ के बादशाह के हुक्म पर बड़े-बड़े सालार अज़ीम ने उसे घुड़सवारी, शमशीर-ज़नी, तीरंदाज़ी और जंग के फ़ुनून सिखाए। बादशाह ने अपना भेष बदल रखा था, इसलिए किसी ने उसके इरादों को ना रोका। मगर जब दुश्मन [संगीत] लश्कर ने अचानक हमला कर दिया तो दारुल हुकूमत में कोई जंग ना हुई और वह आसानी से क़ब्ज़ा कर बैठा। जब खुरासानियों को पता चला कि बादशाह जान बचाकर अफ़गानिस्तान की [संगीत] तरफ़ भाग रहा है तो खुरासानी सालार अज़ीम ने एक ज़ुर्रतमंद दस्ते को बादशाह के पीछे रवाना किया।

बादशाह भूखा-प्यासा मुसलसल कई दिनों तक सफ़र [संगीत] करता रहा और आख़िरकार अफ़गानिस्तान पहुँच गया। वहाँ की फ़ौज ने उसे अजनबी [संगीत] समझकर गिरफ़्तार कर लिया और बल्ख़ के बादशाह के सामने पेश कर दिया। जब शाह दक्कन बल्ख़ [संगीत] के बादशाह के सामने आया तो मल्लिका और शाहनाज़ पर्दे के पीछे से उसे देख रही थीं। मल्लिका ने शाहनाज़ के कान में सरगोशी [संगीत] की, "यह दक्कन का ज़ालिम बादशाह है। औरत बदनसीब का बाप जिसने हमें तेरे पैदा होने की सज़ा में अपने महल से निकाल दिया था। 20 साल गुज़रने के बावजूद कभी हमें याद तक ना किया। बेटी, यह वही शख़्स है जिसके [संगीत] बारे में मैं तुझे हमेशा बताती रही हूँ।"

शाहनाज़ के दिल में पहली बार बाप की शफ़क़त जाग उठी, लेकिन उसने खुद को ज़ब्त किया। फिर वह पर्दे से [संगीत] बाहर निकल आई और कहा, "तो आप शहंशाह फिरोज शाह हैं? शाह दक्कन, आपने ताज [संगीत] व तख़्त क्यों छोड़ा?" शाह दक्कन ने उसकी बात सुनी और कहा, "बेटी, यह सब क़िस्मत [संगीत] की सितम-ज़रीफ़ी है।" 'बेटी' का लफ़्ज़ सुनते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। शाहनाज़ ने तल्ख़ लहजे में कहा, "शहंशाह फिरोज शाह, आप तो बेटी को ज़हमत [संगीत] समझते हैं। फिर आपके मुँह से 'बेटी' का लफ़्ज़ अच्छा नहीं लगता। बहरहाल, मैं तुम्हें अपनी [संगीत] पनाह में लेती हूँ। आप जब तक चाहें यहाँ रह सकते हैं।"

शाह दक्कन ने हैरानी से पूछा, "यह बात तुम्हें कैसे पता चल गई कि मैं बेटी [संगीत] को ज़हमत समझता हूँ? यह बात तो सिर्फ़ मेरी बीवी मल्लिका के अलावा किसी को ना मालूम।" मल्लिका का नाम सुनते [संगीत] ही वह पर्दे के पीछे से नुमूदार हो गई और अब वह बहुत बूढ़ी हो चुकी थी। उसने कहा, "हाँ सरताज, मैं तुम्हारी मल्लिका [संगीत] हूँ और यह वही बदनसीब लड़की है जिसकी पैदाइश की सज़ा हम आज तक भुगत रहे हैं।" "मुझे माफ़ कर [संगीत] दो सरताज। मैं तुम्हारा और तुम्हारी बेटी का मुजरिम हूँ।" मल्लिका ने शाह के [संगीत] हाथ अपने पाँव से छुए और शाह दक्कन को माफ़ कर दिया। शाहनाज़ भी बाप के गले से लिपट कर [संगीत] बेतहाशा रोने लगी।

अचानक तातारों की बग़ावत की आवाज़ सुनकर शाहनाज़ बाहर निकल गई और कहा, "शाह दक्कन को हमारे हवाले कर दो। यह हमारा पुराना दुश्मन है।" एक हुजूम बला-ख़ेज़ था। सब हथियारों से लैस थे। शाहनाज़ ने ऐलान किया, "मैं तुम्हारी सालार-ए-अज़ीम हूँ। मैंने शाह दक्कन को पनाह दी है। तुम्हें राजपाट चाहिए? आज मेरा साथ दो। हम [संगीत] मिलकर दक्कन पर हमला करते हैं। मैं वादा करती हूँ कि फ़तह की सूरत में आधा दक्कन तुम्हारा होगा।" [संगीत] तातरी जंगजू क़ौम थी और कीड़े-भूखी थी। सालार अज़ीम ने शाहनाज़ की सरबराही [संगीत] में नाकाबंदी की। खुरासानियों के क़दम जम ना पाए थे कि शाहनाज़ की ताक़त ने उन्हें उखाड़ फेंक दिया और फिर दिल्ली के दरबार [संगीत] पर उसके बाप शहंशाह फिरोज शाह की बादशाही क़ायम हो गई।

मौत को ज़िंदगी में और हार को जीत में तब्दील [संगीत] होते देखकर शाह दक्कन ने खुदा के हुज़ूर अपना सर झुका दिया और दुआ-गो हो गया, "खुदा, वाकई बेटी [संगीत] तेरी रहमत है। आज अगर तेरी रहमत मेरे साथ ना होती तो कुछ भी मुमकिन ना था।"

दोस्तों, आज का वाक़या निहायत ही ख़ास [संगीत] है और इससे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। इसलिए आपसे दरख़्वास्त है कि इसे [संगीत] आख़िर तक ज़रूर सुनें। यह कहानी बहुत पुराने वक़्त की है जब एक गाँव में ग़ुलाम नाम का एक किसान रहता था। ग़ुलाम बहुत ग़रीब था और दो वक़्त का खाना भी बड़ी मुश्किल से मिलता था। इसी ग़ुरबत के आलम [संगीत] में कई सालों बाद ग़ुलाम के घर में एक बच्चे की पैदाइश हुई। ग़ुलाम और उसकी बीवी की ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा।

जब गाँव वालों को मालूम हुआ कि ग़ुलाम के [संगीत] घर बेटा पैदा हुआ है तो सब लोग मुबारकबाद देने उसके घर आने लगे। क्योंकि बहुत सालों के बाद ग़ुलाम और उसकी [संगीत] बीवी के घर औलाद हुई थी। लोग दूर-दूर से उनकी खुशियों में शरीक होने आए। इसी दौरान बाहर से एक फ़क़ीर भीख माँगने के लिए आवाज़ लगा रहा था। ग़ुलाम ने ख़ुशी के इस दिन फ़क़ीर को अंदर बुला लिया। उसे चारपाई पर [संगीत] बैठने को कहा, चाय पिलाई और घर का खाना पेश किया।

ग़ुलाम ने फ़क़ीर से कहा, "बाबा जी, हमारे घर में कई दिनों बाद खुशियाँ आई हैं। आज हमारे बेटे की पैदाइश हुई है। बराय करम आप इसका [संगीत] कोई अच्छा सा नाम रख दें।" फ़क़ीर ने जब बच्चे को अपनी गोद में लिया तो देखा कि उसकी बाज़ू पर एक ख़ास निशान था। निशान देखकर फ़क़ीर हैरान रह गया क्योंकि यह निशान बादशाह बनने की अलामत थी। फ़क़ीर की हैरानी देखकर [संगीत] ग़ुलाम ने पूछा, "बाबा जी, आप इतना परेशान क्यों नज़र आ रहे हैं?" फ़क़ीर ने [संगीत] जवाब दिया, "बेटा, मैं परेशान नहीं बल्कि खुश हूँ क्योंकि तुम्हारा बेटा क़िस्मत का धनी है। शायद उसकी तक़दीर [संगीत] में बादशाहत लिखी हुई है।"

ग़ुलाम ने हैरानी से पूछा, "बाबा जी, आपकी बात [संगीत] का मतलब क्या है?" फ़क़ीर ने जवाब दिया, "तुम्हारा बेटा 14 साल की उम्र में इस सल्तनत [संगीत] की शहज़ादी से शादी करेगा और फिर इस रियासत का बादशाह बनेगा।" फ़क़ीर की बात सुनकर ग़ुलाम ख़ुशी से निहाल हो गया। जब गाँव के लोगों को यह बात मालूम हुई तो हर तरफ़ चर्चा होने लगा। लोग दूर-दराज़ से ग़ुलाम के बेटे [संगीत] को देखने आने लगे।

एक दिन की बात है। इस मुल्क का बादशाह शिकार [संगीत] के दौरान हिरण के पीछे भागते-भागते बहुत दूर निकल गया। लेकिन हिरण हाथ ना आया और बादशाह को शदीद [संगीत] प्यास लग गई। आस-पास कोई तालाब, झरना या नदी ना मिली जहाँ वह अपनी प्यास बुझा सके। पानी की तलाश में वह भटकता [संगीत] हुआ इसी गाँव में पहुँच गया, जहाँ ग़ुलाम नाम का किसान रहता था। वहीं बादशाह [संगीत] की नज़र एक फ़क़ीर की झोपड़ी पर पड़ी। बादशाह ने फ़क़ीर बाबा से पानी माँगा। फ़क़ीर ने बादशाह को ठहरने को कहा और झोपड़ी के अंदर जाकर [संगीत] एक गिलास पानी ले आया।

बादशाह ने पानी पिया। लेकिन इसी दौरान उसकी नज़र लोगों के एक हुजूम पर पड़ी जो ग़ुलाम के घर की तरफ़ [संगीत] जा रहे थे। बादशाह ने फ़क़ीर से पूछा, "बाबा, यह लोग कौन हैं और कहाँ जा रहे हैं?" फ़क़ीर ने जवाब दिया, "यह सब ग़ुलाम किसान के घर जा रहे हैं। उसके पास कई सालों बाद एक बच्चा पैदा हुआ है और वह बड़ा ही नसीब [संगीत] वाला है। एक दरवेश ने उसके बारे में बताया है।" बादशाह ने हैरत से पूछा, "ऐसा क्या बताया है जिसकी वजह से सब वहाँ जा रहे हैं?" फ़क़ीर ने जवाब दिया, "दरवेश ने [संगीत] कहा है कि जब ग़ुलाम का बेटा 14 साल का होगा तो उसकी शादी बादशाह की बेटी से होगी और वह इस मुल्क का बादशाह बनेगा।"

फ़क़ीर की [संगीत] बात सुनकर बादशाह को सख़्त गुस्सा आया। उसने कहा, "यह कैसे मुमकिन है कि एक मामूली किसान का बेटा बादशाह [संगीत] बने और मेरी बेटी से शादी करे? मैं यहाँ का बादशाह हूँ और यह बात कभी नहीं होने दूँगा।" फ़क़ीर ने जवाब दिया, "बादशाह सलामत, जो इस बच्चे की [संगीत] क़िस्मत में लिखा है, उसे कोई नहीं मिटा सकता।" बादशाह को अपनी ताक़त पर बड़ा गुरूर था। उसने कहा, "बाबा, मैं तुम्हें यह सब ग़लत साबित करके दिखाऊँगा। मैं इन बातों पर यक़ीन नहीं रखता कि जो [संगीत] लिखा है वही होता है।" फ़क़ीर ने मुस्कुराते हुए कहा, "महाराज, अगर ज़िंदगी रही [संगीत] तो देखेंगे क़िस्मत का फ़ैसला क्या होता है। आप भी यहीं होंगे और मैं भी। वक़्त खुद सब कुछ बता देगा।"

बादशाह ने फ़क़ीर को सलाम किया और वापस महल चला गया। अगले दिन उसने अपना भेष बदला और ग़ुलाम किसान के गाँव पहुँच गया। वहाँ लोगों से पूछते-पूछते वह ग़ुलाम के घर जा पहुँचा। घर के बाहर पहुँचकर उसने आवाज़ लगाई। ग़ुलाम बाहर आया और पूछा, "आप कौन हैं और यहाँ क्यों आए हैं?" बादशाह ने जवाब [संगीत] दिया, "मेरा नाम अख़्तर सेठ है। मैं पास के गाँव में रहता हूँ। मैंने सुना है कि तुम्हारे घर में एक बड़ा नसीब वाला बच्चा पैदा हुआ है जिसकी क़िस्मत में बादशाह बनना लिखा है।" ग़ुलाम ने कहा, "हाँ सर जी, आपने सही सुना है।" बादशाह ने कहा, "अगर तुम बुरा ना मानो तो मैं एक बात कहना चाहता हूँ।" [संगीत] ग़ुलाम ने कहा, "कहिए सर जी, क्या बात है?"

बादशाह ने कहा, "यह बच्चा जो बड़ा ही नसीब वाला है, इसे मुझे दे दो। बदले में तुम [संगीत] मुझसे माँगी दौलत ले लो। मैं तुम्हारे बच्चे की परवरिश बहुत अच्छी से करूँगा।" ग़ुलाम की बीवी फ़ौरन बोली, "नहीं सेठ जी, मैं अपना बच्चा किसी क़ीमत पर आपको नहीं दे सकती।" बादशाह ने कहा, "तुम एक मामूली [संगीत] किसान हो, तुम इसकी अच्छी परवरिश कैसे कर सकते हो?" ग़ुलाम ने कहा, "सेठ जी, [संगीत] आप ठीक कहते हैं, हम इस बच्चे का अच्छा ख़्याल ना रख सकेंगे।" यह सुनकर ग़ुलाम की बीवी ने [संगीत] भी कहा, "ठीक है सर जी, मैं अपना बच्चा आपको देने को तैयार हूँ। लेकिन एक शर्त है, जब मेरा बेटा 14 साल का हो जाए तो आपको इसे वापस [संगीत] करना होगा।" बादशाह ने कहा, "ठीक है। तुम्हारा बेटा 14 साल का होगा तो मैं इसे तुम्हें [संगीत] वापस कर दूँगा।" यह कहकर बादशाह ने बच्चा लिया और वहाँ से रवाना [संगीत] हो गया।

बादशाह बच्चे को लेकर नदी के किनारे पहुँच गया। उसने सोचा कि बच्चे को गला दबाकर मार दे और लाश को नदी में [संगीत] बहा दे। लेकिन जब उसने बच्चे का मासूम चेहरा देखा तो ऐसा करने की हिम्मत ना हुई। काफ़ी देर सोचने के बाद उसने एक लकड़ी का संदूक बनवाया। बच्चे को इसमें बंद किया और पानी में [संगीत] फेंक दिया। बादशाह ने दिल में कहा, "यह संदूक नदी की गहराई में चला जाएगा और बच्चा खुद ही ख़त्म हो जाएगा।" और सोच रहा था कि [संगीत] "अब यह बच्चा अपने आप ही डूब जाएगा और मर जाएगा। जब यह बच्चा ही ना रहेगा तो मेरी बेटी के साथ इसकी शादी का [संगीत] सवाल ही पैदा ना होगा।" यह सोचकर बादशाह बेफ़िक्र होकर अपने शाही महल में वापस आ गया और मुतमइन था कि अब वह बच्चा कभी वापस ना आएगा और उसकी बेटी की शादी का ख़तरा भी टल गया है।

उधर वह संदूक बहता हुआ नदी के किनारे जा पहुँचा जहाँ एक दौलतमंद [संगीत] सेठ को नज़र आया। सेठ ने जब संदूक खोला तो अंदर बच्चे को देखकर हैरान रह गया। वह सोचने लगा, "कितना बेरहम [संगीत] इंसान होगा जिसने इस मासूम बच्चे को संदूक में बंद करके छोड़ दिया।" सेठ की अपनी [संगीत] कोई औलाद ना थी। उसने बच्चे को अपने घर ले जाने का फ़ैसला किया। घर पहुँचकर सेठ ने अपनी बीवी को सारी बात बताई। सेठ की बीवी बच्चे को देखकर [संगीत] बहुत खुश हुई और इन दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा। सेठ और उसकी बीवी ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए कहा, "ऐ रब, आपका लाख-लाख शुक्र है। हम इस बच्चे को अपने बेटे की तरह पाल लेंगे और उससे बेपनाह मोहब्बत करेंगे।" बच्चा अब सेठ के घर रहने लगा और वक़्त गुज़रता गया। सेठ और उसकी बीवी [संगीत] ने उसका नाम ज़फ़र रखा।

धीरे-धीरे 14 साल गुज़र गए। ज़फ़र एक बहुत ही समझदार और अक्लमंद लड़का बन गया था। एक दिन ज़फ़र अपने [संगीत] उस्ताद के साथ पढ़ रहा था। उस्ताद ने उससे सवालात पूछे और ज़फ़र ने फ़ौरन हर सवाल का सही जवाब दे दिया। [संगीत] उस्ताद यह देखकर हैरान हुआ और बोला, "ज़फ़र, तुम बहुत समझदार और अक्लमंद हो। तुम आगे चलकर एक बहुत बड़े इंसान बनोगे।" उस्ताद की बातें सुनकर सेठ और उसकी बीवी भी [संगीत] बहुत खुश थे। उन्होंने दिल से दुआ की कि ज़फ़र का मुस्तक़बिल रोशन हो।

तभी वहाँ से वही बादशाह गुज़र रहा था जो किसी ज़रूरी काम से जा रहा था। जब बादशाह [संगीत] की नज़र ज़फ़र पर पड़ी तो वह रुक गया। बादशाह ने ज़फ़र से पूछा, "तुम कौन हो? कहाँ रहते हो? और तुम्हारे वालिद का क्या नाम है?" ज़फ़र ने अदब से [संगीत] जवाब दिया, "मैं सेठ अब्दुल क़ादिर का बेटा हूँ और इसी शहर में रहता हूँ।" यह सुनकर बादशाह वहाँ से अपने गाँव [संगीत] के लिए रवाना हो गया।

वापसी पर बादशाह सीधा सेठ अब्दुल क़ादिर के घर पहुँचा और कहा, "यह जो तुम्हारा बेटा है, बहुत होशियार और समझदार लगता है। यह बड़ा ही अक्लमंद मालूम होता है।" सेठ अब्दुल क़ादिर ने बादशाह [संगीत] की बात सुनकर अदब से जवाब दिया, "बादशाह सलामत, यह मेरा हक़ीक़ी [संगीत] बेटा नहीं है। मैंने तो सिर्फ़ इसकी परवरिश की है, लेकिन यह मेरे लिए बेटे [संगीत] से भी बढ़कर है।" बादशाह ने हैरानी से पूछा, "फिर यह लड़का तुम्हें कहाँ और कैसे मिला?" सेठ ने बादशाह को पूरी कहानी [संगीत] सुनाई, "एक दिन नदी में बहता हुआ एक संदूक मिला था। जब मैंने उसे खोला तो इसमें यह बच्चा था।"

यह सुनकर बादशाह हैरान रह गया। वह फ़ौरन समझ गया कि यह [संगीत] वही बच्चा है जिसे 14 साल पहले उसने नदी में बहा दिया था। बादशाह और सेठ अब्दुल [संगीत] क़ादिर यह बातें कर ही रहे थे कि ज़फ़र वहाँ आ गया। बादशाह ने ज़फ़र [संगीत] को देखते हुए कहा, "अच्छा, मुझे एक ज़रूरी काम से जाना है, लेकिन एक छोटा सा काम तुम्हारे हाथों कराना चाहता हूँ। यह एक चिट्ठी है जो तुम्हें मल्लिका [संगीत] तक पहुँचानी होगी। बदले में तुम्हें 500 सोने के सिक्के दूँगा।" ज़फ़र ने अदब [संगीत] से कहा, "बादशाह सलामत, यह मेरा फ़र्ज़ है। मैं आपकी चिट्ठी ज़रूर पहुँचाऊँगा।" बादशाह ने चिट्ठी लिखकर [संगीत] उस पर अपनी मुहर लगा दी।

ज़फ़र चिट्ठी लेकर महल की तरफ़ रवाना हुआ। रास्ते में [संगीत] उसे एक घने जंगल से गुज़रना पड़ा। तभी ज़फ़र रास्ता भटक गया और उसे रास्ता तलाश करते-करते रात हो गई। वह रात गुज़ारने के लिए कोई महफ़ूज़ जगह ढूँढने लगा। अचानक उसकी नज़र एक झोपड़ी पर पड़ी। [संगीत] ज़फ़र ने सोचा, "चलो रात यहीं गुज़ार लेता हूँ।" यह ख़्याल करते हुए वह घोड़े से नीचे उतरा और झोपड़ी के अंदर चला गया। झोपड़ी के अंदर उसने एक बूढ़ी औरत को खाना बनाते हुए देखा। बूढ़ी औरत ने ज़फ़र को देखकर हैरानी से पूछा, "तुम कौन हो? कहाँ से आए हो? और बग़ैर इजाज़त अंदर कैसे आए?"

ज़फ़र ने मुदब्बनत अंदाज़ में जवाब दिया, "माँ जी, मैं बादशाह के महल जा रहा हूँ ताकि बादशाह की चिट्ठी मल्लिका तक पहुँचा सकूँ। लेकिन रास्ता भटक गया हूँ। इसलिए रात गुज़ारने के लिए आपके पास आ गया हूँ।" बूढ़ी औरत को ज़फ़र की हालत पर तरस [संगीत] आ गया। मगर उसने फ़िक्रमंद होकर कहा, "बेटा, यहाँ रुकना महफ़ूज़ नहीं है। यह जगह ख़तरनाक डाकुओं का अड्डा है। वह किसी भी वक़्त आ सकते हैं और अगर तुम्हें यहाँ देख लिया तो जान से मार देंगे।" ज़फ़र ने बेबसी से कहा, "माँ जी, लेकिन इतनी रात को मैं कहाँ जाऊँगा? रास्ता भी मालूम नहीं और अगर जंगल में गया तो जंगली जानवर मुझे मार डालेंगे।"

बूढ़ी औरत ने कहा, "ठीक है, तुम झोपड़ी के एक कोने [संगीत] में जाकर लेट जाओ और चुपचाप रहो।" ज़फ़र ने हाँ में सर हिलाया और कोने में जाकर [संगीत] लेट गया। कुछ देर बाद डाकू झोपड़ी में वापस आ गए। उन्होंने कोने में एक अजनबी शख़्स को लेटा हुआ देखा तो बूढ़ी औरत से पूछा, "यह कौन है और यहाँ क्या कर रहा है?" बूढ़ी औरत ने जवाब दिया, [संगीत] "इसका नाम ज़फ़र है। यह बहुत नेक और शरीफ़ लड़का है। यह बादशाह के महल जा रहा है, इसलिए यहाँ रात गुज़ारने के लिए रुक गया है।"

डाकुओं को शक हुआ क्योंकि वह बादशाह की चालाकियों से वाक़िफ़ थे। उन्होंने फ़ौरन ज़फ़र की जेब से चिट्ठी निकाली और उसे पढ़ना शुरू किया। बूढ़ी औरत ने तजस्सुस से पूछा, "चिट्ठी में क्या लिखा है?" एक डाकू ने जवाब दिया, "चिट्ठी में लिखा है कि जैसे ही यह लड़का तुम्हारे पास पहुँचे, [संगीत] इसे फ़ौरन मारकर कहीं दूर फेंक देना। यह काम बादशाह के महल वापस आने से पहले हो जाना चाहिए।" बूढ़ी ने जब यह सुना तो कहा कि बादशाह वाकई बड़ा गद्दार और खुदग़र्ज़ है। जिसके हाथों से चिट्ठी भेजी जा रही है, [संगीत] वही इस मासूम को मारना चाहता है।

यह सुनकर बूढ़ी ने फ़ैसला किया कि वह इस बेगुनाह [संगीत] बच्चे को हर क़ीमत पर बचाएगी। उसने डाकुओं से कहा कि चिट्ठी बदल दो। डाकुओं ने फ़ौरन [संगीत] एक नई चिट्ठी लिखकर ज़फ़र की जेब में रख दी और फिर वहाँ से चले गए। सुबह होने पर [संगीत] ज़फ़र उठा। बूढ़ी का शुक्रिया अदा किया और दुआ के साथ वहाँ से रवाना हो गया। थोड़ी देर बाद वह बादशाह के महल [संगीत] पहुँच गया और चिट्ठी मल्लिका को दे दी।

मल्लिका ने चिट्ठी पढ़ी जिसमें लिखा था कि यह लड़का निहायत नेक, होशियार और अक्लमंद है और शहज़ादी रोशन आरा से शादी करने [संगीत] के लिए बेहतरीन इंतख़ाब है। इसलिए बादशाह के आने से पहले इसका निकाह शहज़ादी से [संगीत] करवाना। मल्लिका ने सोचा कि कैसे बादशाह किसी अजनबी से रोशन आरा की शादी कर सकते हैं। लेकिन फिर उसने चिट्ठी [संगीत] पर बादशाह की मुहर देखी जिससे यह साबित हुआ कि यह लड़का सच बोल रहा है। यही सोचकर मल्लिका ने शहज़ादी का निकाह ज़फ़र से कर दिया।

कुछ दिनों बाद जब बादशाह अपने महल वापस आया तो उसे पता चला कि उसकी बेटी का निकाह इसी लड़के से हो चुका है जिसे वह मरवाना चाहता था। [संगीत] यह सुनकर बादशाह गुस्से से भर गया और मल्लिका से पूछा, "तुमने यह क्यों [संगीत] किया?" मल्लिका ने कहा, "बादशाह सलामत, जैसा कि आपने चिट्ठी में लिखा था, वैसा ही मैंने किया है।" बादशाह ने गुस्से में आकर मल्लिका से चिट्ठी दिखाने को कहा। जब मल्लिका चिट्ठी लाई और बादशाह ने उसे पढ़ा, तो इसमें कुछ और ही लिखा था। यह देखकर बादशाह गुस्से में आ गया और सिपाहियों से कहा, "जाओ और फ़ौरन ज़फ़र को पकड़ कर ले आओ।"

सिपाही फ़ौरन रवाना हो गए। ज़फ़र को पकड़ कर बादशाह के पास ले आए। बादशाह गुस्से [संगीत] में आकर ज़फ़र से बोला, "तुमने धोखे से मेरी बेटी के साथ निकाह तो कर लिया, मगर मैं तुम्हें अपना दामाद किसी हाल में क़बूल ना करूँगा। तुम एक किसान के बेटे हो और हम बादशाह हैं।" ज़फ़र ने बादशाह की बात सुनकर कहा, "बादशाह सलामत, मैंने आपके साथ किसी क़िस्म की गद्दारी या धोखा नहीं किया है।" इतने में शहज़ादी रोशन आरा को ख़बर मिली [संगीत] और वह दौड़ती हुई अपने शौहर ज़फ़र के पास पहुँची। तो क्या देखती है कि ज़फ़र को सिपाहियों ने पकड़ रखा है।

बादशाह ने [संगीत] ज़फ़र की बात सुनकर कहा, "तुम मुझे बेवकूफ़ बनाना चाहते हो। लेकिन मैं [संगीत] तुम्हें कभी अपना दामाद ना मानूँगा और तुम्हारा सर अलग कर दूँगा।" यह सुनकर शहज़ादी रोशन आरा फ़ौरन आगे आई और कहा, "अब्बा हुज़ूर, पहले मेरा सर अलग करना पड़ेगा, फिर [संगीत] ही आप मेरे शौहर का कुछ बिगाड़ सकते हैं।" दोनों की बातें जारी ही थीं कि इतने में एक ग़ुलाम आया और बादशाह से कहा, "महाराज, बाहर एक फ़क़ीर दरवेश आए हैं और वह फ़ौरन आपसे मिलना चाहते हैं।" बादशाह ने फ़क़ीर को अंदर बुलाने का [संगीत] हुक्म दिया।

फ़क़ीर दरवेश अंदर आए। बादशाह ने उठकर फ़क़ीर को सलाम किया और उनसे मिलने का मक़सद पूछा। फ़क़ीर [संगीत] दरवेश ने कहा, "बादशाह सलामत, लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं।" बादशाह ने जवाब दिया, "नहीं बाबा, मैंने आपको ना [संगीत] पहचाना।" फ़क़ीर दरवेश मुस्कुराते हुए बोले, "बादशाह सलामत, मैं वही हूँ जिसे तुमने 14 साल पहले मिला था, जब तुमने तक़दीर का लिखा मिटाने की बात की थी।" जैसे ही फ़क़ीर ने यह बात कही, बादशाह हैरत से ठिठक गया और सारी पुरानी बातें याद आ गईं।

फ़क़ीर दरवेश [संगीत] मुस्कुराते हुए बोले, "तो क्या बादशाह सलामत, तक़दीर का लिखा मिटा लिया तुमने?" बादशाह ने निगाहें झुका कर कहा, [संगीत] "नहीं बाबा जी, मैं तक़दीर के सामने हार गया।" फ़क़ीर दरवेश ने कहा, "मुक़द्दर के आगे कोई नहीं [संगीत] जीत सकता। इसलिए अब तुम इस किसान के बेटे को अपना दामाद क़बूल करो और अपनी सल्तनत [संगीत] का तख़्त इसे सौंप दो।" बादशाह ने कहा, "बाबा जी, जैसा आपने कहा है वैसा ही होगा।" फ़क़ीर दरवेश ने शहज़ादी रोशन आरा और ज़फ़र को सारी [संगीत] कहानी सुना दी और बादशाह को भी समझाकर वहाँ से रवाना हो गए।

बादशाह ने ज़फ़र से माफ़ी [संगीत] माँगी और अपनी सल्तनत उसे सौंप कर फ़क़ीर दरवेश के साथ जंगल में जाकर अल्लाह [संगीत] की इबादत करने लगा। इसके बाद ग़ुलाम किसान का बेटा ज़फ़र बादशाह बन गया और अपने माँ-बाप को भी [संगीत] महल में बुला लिया। इस तरह सब ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िंदगी गुज़ारने लगे।