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एक वक्त की बात है। एक शहर में एक ताज़िर रहता था जिसके तीन बेटे थे। ताज़िर अपने तीनों बेटों से बहुत प्यार करता था। लेकिन सबसे छोटे बेटे यूसुफ को सबसे ज्यादा चाहता था। वो उसे एक पल के लिए भी अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देता था।
जब दोनों बड़े भाइयों ने देखा कि वालिद यूसुफ से ज्यादा प्यार करते हैं और उसका ख्याल रखते हैं तो वह यूसुफ से जलने लगे। इस बात से ताजिर बहुत फिक्रमंद रहने लगा कि पता नहीं उसकी मौत के बाद बड़े बेटे यूसुफ को जिंदा छोड़ेंगे या नहीं। उसने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बुलाया और कहा कि मेरी मौत के बाद मेरे बेटों में कोई झगड़ा नहीं होना चाहिए।
कुछ अरसा बाद जब ताजिर बहुत बीमार हो गया और उसे लगा कि अब वो नहीं बचेगा। तो उसने अपने तीनों बेटों को पास बुलाया और उनसे कहने लगा सुनो जिंदगी कुछ ही दिनों की है। हर चीज यहीं रह जाती है और इंसान खाली हाथ कब्र में जाता है। इसलिए कभी लालच मत करना। तीनों भाई मिलजुलकर रहना। इसी में तुम्हारी भलाई है। दुख दर्द में एक दूसरे के काम आना। एक दूसरे से कभी हसद मत करना। अपनी बूढ़ी मां का एहतराम करना और कभी उसका दिल मत दुखाना। यह कहकर वह वफात पा गया।
घर में सब जगह मातम छा गया। जिसने भी ताजिर की मौत के बारे में सुना उसका दिल भर आया। ताजिर को मरे हुए कुछ ही दिन हुए थे कि सलीम और कलीम ने यूसुफ को परेशान करना शुरू कर दिया। किसी ना किसी बहाने उसे सताने लगे। जब वो मां से शिकायत करता तो वह उल्टे उसे मारते पीटते। मां बेचारी बूढ़ी थी। लाख समझाती और चिल्लाती। पर वो भला उसकी कब सुनते थे। उल्टे उसे भी बदतमीजी से डांटते धमकाते थे।
जब दोनों बड़ों की ज्यादती हद से ज्यादा बढ़ गई तो तंग आकर यूसुफ ने अपने रिश्तेदारों और खैर ख्वाहों को बुलाया और उनके सामने अपनी परेशानी रखी। सब ने यूसुफ के हक में फैसला दिया। इस पर दोनों भाई और भी गुस्से में आ गए और यूसुफ को खूब मारा पीटा। मुकदमा कई बार चला लेकिन हर बार फैसला युसुफ के हक में ही हुआ।
अक कुछ दिन अमनो अमान से गुजरे थे कि सलीम और कलीम के दिल में फिर से हसद की आग भड़क उठी। उन्होंने यूसुफ को नित नए तरीकों से परेशान करना शुरू कर दिया। यूसुफ ने उन्हें लाख समझाया कि देखो तुम मेरे बड़े भाई हो। मेरी और तुम्हारी लड़ाई से सबको शर्म आएगी। जो भी सुनेगा हम पर लानत करेगा। भाइयों का आपस में लड़ना झगड़ना बहुत शर्म की बात है। मगर उन दोनों के दिल में तो शैतान था। वो छोटे भाई की कब सुनते थे।
एक दिन मौका पाकर दोनों ने यूसुफ को पकड़ लिया और उसे बेरहमी से मारा पीटा कि वो बेहाल होकर रह गया। बात अदालत तक पहुंची। मुकदमा चला और सलीम अब कलीम की सारी दौलत बर्बाद हो गई। इसी तरह धीरे-धीरे वह भिखारी बन गए और तबाह हो गए।
अब सुनिए कि इन दोनों ने आपस में सलाह की। कहा कि इस यूसुफ के बच्चे ने तो हम दोनों भाइयों को कंगाल कर दिया है। बदनामी अलग हुई है। हर बार हमारे वार से बच जाता है और उस पर सितम यह कि मां भी उसी नालायकन की तरफदारी करती है। हर दम उसी का नाम लेती है। हमें तो अपना बेटा ही नहीं समझती।
सलीम ने जवाब दिया, बेशक आप ठीक कहते हैं भाईजान। मां ने तो हमें बिल्कुल ही भुला दिया है। यूसुफ उसकी आंख का तारा है, राज दुलारा है और हम किसी गिनती में ही नहीं। सलीम ने कहा, मजे की बात तो यह है कि अब्बा हुजूर ने जो हिस्सा मां को दिया था, मां ने वो यूसुफ को दे दिया है। यह नाइंसाफी नहीं तो और क्या है?
सलीम बोला, भाईजान, मेरी मां ने तो मां के पास जो कुछ बचा है, वह हमें छीन लेना चाहिए। कलीम ने कहा मुझे तुम्हारी राय से इत्तेफाक है। इसके सिवा कोई चारा नहीं हमारे पास। अगर ऐसा नहीं किया तो यूसुफ सब कुछ हड़प कर जाएगा और जो कुछ उसके पास है वह भी छीन लेगा।
बूढ़ी मां रोती हुई यूसुफ के पास आई और सारी कहानी कहने लगी। अब बेटा मुझे भी उन्होंने तबाह कर दिया और खुद भी तबाह हुए। कुछ ऐसे गुमराह हुए हैं और अब तुमको भी मुसीबत में डाला है। बेहतर है कि अब आप मेरे मकान पर चले आइए। जो कुछ खाने पीने का मेरे पास है आप खाइए। वह दोनों सच्चाई से भटक गए हैं। अल्लाह ने चाहा तो जल्द अपने की सजा पाएंगे और बहुत पछताएंगे।
यूसुफ ने इन बातों से मां का दिल बहलाया। ढाढ़स बंधाई और तसल्ली दी। जब मां का कलेजा ठंडा हुआ तो उसने नेक बेटे को दुआएं दी। यूसुफ मेहनती और जफाकश लड़का था। वो अपना और अपनी मां का पेट पालने के लिए मछेरा बन गया। उसने एक जाल खरीदा और दरियाओं और झीलों से मछलियां पकड़ पकड़ कर लाने लगा। मछलियों को बेचकर जो कुछ कमाता खुद खाता और मां को भी खिलाता।
मगर उन दोनों भाइयों ने कोई काम नहीं किया। वो भिखारियों के गिरोह में शामिल हो गए। रिश्तेदार देखते तो यूसुफ की मेहनत और मशकत की तारीफ करते और इन दोनों भाइयों पर लानत करते। जब दोनों भूखे मरने लगे तो मां बेचारी को फिर रहम आ गया। क्या करती? आखिर थी तो बेटों की मां। बेटों की हालत देखकर दिल भर आया। चोरी छुपे उनको भी कुछ दे देती। और यूसुफ के आने से पहले उन्हें घर से रुखसत कर देती।
एक दिन यह तीनों मिलकर खाना खा रहे थे कि यूसुफ आ गया। उसे देखकर मां और दोनों भाइयों का रंग उड़ गया कि अब यूसुफ बहुत नाराज होगा और तीनों को डांट डपट कर घर से निकाल देगा। मगर यूसुफ ने किसी से कुछ नहीं कहा बल्कि और भी हमदर्दी से पेश आया। मां से कहने लगा, अम्मा जान मेरे भाइयों को और कुछ खाने को दीजिए। मैं हरगिज़ नाराज नहीं हऊंगा। भाई भाई लड़ा करते हैं मगर अलग नहीं होते हैं।
फिर वह उनसे मुखातिब हुआ। आप लोग बहुत दिनों के बाद तशरीफ लाए। सच पूछिए तो मेरा दिल भी बहुत घबरा गया था। अगर आप ना आते तो मैं खुद आता। वो बोले भैया हम दोनों शर्म के मारे नहीं आते थे और अपने किए पर पछताते थे। शैतान ने हमको बहकाया था। बुरे तरीके से खाए थे। हम तुमसे माफी मांगते हैं और कसम खाते हैं कि आगे कोई बुरी हरकत नहीं करेंगे।
यूसुफ ने कहा भाईजान अब मुझसे क्यों माफी मांगते हैं? मैं तो आपसे छोटा हूं। माफी मांगनी है तो अम्मा जान से मांगिए। यूसुफ के इस अच्छे रवय पर उसकी मां बहुत खुश हुई। कहा बेटा अल्लाह तुम्हें हमेशा खुश और कामयाब रखे। शराफत इसी का नाम है। अच्छे लोगों को हसद से क्या काम? यूसुफ ने भाइयों से कहा आप मेरे साथ रहिए और जो दाल दलिया मिले खाइए। सलीम और कलीम बहुत एहसानमंद हुए और यूसुफ से वादा किया कि वह उसे शिकायत का कभी मौका नहीं देंगे।
एक महीने तक यूसुफ ने अपने भाइयों की खूब खिदमत की। अच्छे से अच्छा खाने को दिया और बढ़िया से बढ़िया चीजें खरीदता था। रात को चारों मिलकर खाना खाते और हंसीखुशी सोते। सलीम और कलीम अब ना तो यूसुफ से लड़ते झगड़ते और ना अपनी मां की बात काटते।
एक दिन यूसुफ जाल लेकर शिकार करने निकला। उसने पहली बार जाल फेंका तो जाल खाली निकला। उसने दूसरी बार जाल फेंका। मगर इस बार भी जाल खाली निकला। तीसरी बार जाल डाला तो इस बार भी किस्मत ने मायूसी दिखाई। दूसरी जगह जाकर जाल फेंका कि शायद यहां से मछलियां चली गई हो मगर फिर भी जाल खाली ही निकला। मछली का कहीं पता नहीं चला। इसी तरह पूरे दिन जाल डालता रहा। मगर हर बार जाल खाली ही बाहर आया। अफसोस करता हुआ घर जाता था कि आज खाने को कुछ भी नहीं मिलेगा।
जब नानबाई की दुकान पर पहुंचा तो देखा कि लोग पैसे देकर रोटी खरीद रहे हैं। यह गरीब चुपचाप खड़ा देखता रहा। अचानक नानबाई की नजर उस पर पड़ी तो बोला आओ भाई यूसुफ क्या रोटी नहीं खरीदोगे? कितने की लोगे? यूसुफ ने कुछ जवाब नहीं दिया। तो नानबाई समझ गया कि आज उसके पास पैसे नहीं होंगे। तभी चुपचाप खड़ा है और कुछ नहीं बोल रहा। तब वो बोला यूसुफ भाई रोटी तो ले लो। पैसे बेशक कल दे देना। कल ना हो तो परसों दे देना। हम तुम्हें जानते हैं। पैसे नहीं है तो वह भी ले लो। जब होंगे तो दे देना। या फिर जितनी मेहनत करो सब मुझे दे देना।
यूसुफ ने नानबाई से रोटी सब्जी ली और दिल में सोचा कि अल्लाह बड़ा मेहरबान और रहम वाला है। कल इंशा्लाह यह मुसीबत नहीं पड़ेगी। उस दिन जरूर मछली हाथ लगेगी। घर जाकर खाना खाया और सुबह को फिर जाल उठाया। मगर शाम को नाकाम वापस आया। यहां तक कि सात दिन तक लगातार जाता रहा और खाली हाथ वापस आता रहा। नाना बाई ने कह दिया था कि मैं रोटी लगातार देता जाऊंगा। मुंह नहीं फेरूंगा।
सात दिन के बाद उसने ठान ली कि अब चलके बरा-ए कारून झील पर किस्मत आजमानी चाहिए। वहां जाकर झील में जाल डालने ही वाला था कि एक शख्स घोड़े पर सवार नजर आया। बढ़िया कपड़े पहने था और सर से पांव तक अमीरी के ठाट थे। उसने घोड़े से उतर कर यूसुफ से कहा अस्सलाम वालेकुम यूसुफ ने जवाब दिया वालेकुम अस्सलाम उस शख्स ने कहा अगर हमारा एक काम करो तो हम तुम्हें इनाम से मालामाल कर देंगे तुम्हारा दामन सोने चांदी से भर देंगे यूसुफ ने सोचा मैं इसे जानता नहीं पहचानता नहीं यह मेरा नाम क्यों जानता है और इतना मेहरबान क्यों हो रहा है आखिर हिम्मत करके उससे पूछ लिया मैं तो आपको बिल्कुल नहीं जानता आप मुझसे क्यों वाकिफ हैं उसने कहा तुम्हें कौन नहीं जानता उस्मान नामी ताजिर के सबसे छोटे बेटे हो मां के फरमाबरदार हो भाइयों के गम में साथी हो यूसुफ ने सोचा कहीं यह फरिश्ते तो नहीं यह तो मेरे बारे में एक-एक बात जानता है उस शख्स ने युसुफ की हैरानी देखकर कहा मियां क्यों वहम में पड़ते हो मेरा और अपना वक्त बर्बाद करते हो जो मैं कहता हूं करो अल्लाह ने चाहा तो मालामाल हो जाओगे इस पर यूसुफ बोला अच्छा तो बताओ क्या कहते हो उसने कहा तुम जरा जरा दुआ पढ़ो। यूसुफ ने दुआ पढ़ी और खुद उस शख्स ने भी पढ़ी। फिर रेशम का एक लच्छा देते हुए कहा, रेशम की डोरी से मेरे हाथपांव बांधकर मुझे झील में फेंक दो। जब मेरे पांव पानी की सतह पर नजर आए तो जाल डालकर मुझे बाहर निकाल लेना।
यूसुफ ने कहा, "यह क्या कह रहे हो? तुम मुझे किस गुनाह में फंसाना चाहते हो? मैं तो एक गरीब मछेरा हूं। इंसानों को डुबोने का धंधा नहीं करता। इस काम के लिए तुम किसी और को ढूंढो। मुझसे तो यह नहीं हो पाएगा।"
उस शख्स ने कहा तुम बेकार में डरते हो फायदे से बचते हो यकीन मानो तुमसे कोई नहीं पूछेगा कोई कुछ नहीं कहेगा तुम्हारा बाल भी बीका नहीं होगा क्या तुम दौलतमंद नहीं बनना चाहते क्या तुम गुरबत की जिल्लत आमेज धंधे से बचना नहीं चाहते यूसुफ बोला अजीब बात है तुम खुद डूब कर मर रहे हो और मुझे दौलतमंद बना रहे हो मेरी तो अकल हैरान है यह कैसी मुसीबत में डाला है उसने कहा तुम कोई फिक्र मत करो बस जो मैं कहूं उस पर अमल करते जाओ। दो दिन में अमीर हो जाओगे। ऊंचे तबके में जगह पाओगे।
तब यूसुफ बोला अच्छा तो बताओ मुझे क्या करना है? उसने कहा तो मैं कह रहा था कि रेशम की डोरी लो और मुझे उठाकर झील में फेंक दो। जब मेरे हाथ पानी की सतह पर नजर आए तो जाल डालकर मुझे बाहर निकाल लेना। वरना मेरी जान जाएगी और तुम्हारे हाथ कुछ नहीं आएगा। अगर पांव ऊपर आए तो समझ लेना कि मैं मर गया। दुनिया से चला गया। इसके बाद मेरा घोड़ा ताजिरों के बाजार में ले जाना और उसे सामान समेत सफिया नामी एक यहूदी औरत के हाथ बेच देना। वो तुम्हें 1000 सोने के सिक्के दे तो ले लेना नहीं तो मना कर देना।
यूसुफ ने उस शख्स की बात पर अमल करते हुए पहले तो उसके हाथपांव बांधे और फिर उठाकर झील में फेंक दिया। अब इंतजार करने लगा कि देखिए क्या होता है। थोड़ी ही देर गुजरी थी कि उसके पांव पानी की सतह पर नजर आए। यूसुफ ने समझा वह मौत के करीब हुआ। यही सोचकर उसका घोड़ा और सामान लेकर सफिया यहूदी के पास पहुंचा। यहूदी औरत ने घोड़े को देखते ही पहचान लिया और 1000 सोने के सिक्के देकर यूसुफ को रुखसत किया।
यूसुफ को जब सिक्के मिले तो नानबाई की दुकान पर आया। जो कुछ देना था उसको दिया। रोटी लेकर कसाई की दुकान पर गया। गोश्त लिया। सब्जी खरीदी और घर वापस आया। सब ने मिलकर खाना खाया। मां बहुत खुश हुई और पूछा क्यों बेटे इतने सारे सोने के सिक्के कहां से ले आए हो? यूसुफ ने जवाब दिया अम्मा जान यह राज की बात है। तुम्हारी तसल्ली के लिए सिर्फ इतना बता सकता हूं कि मैंने कहीं से यह चुराए नहीं है और ना धोखे से किसी से लिए हैं।
मां को तसल्ली देकर दूसरे दिन फिर उसी झील पर गया। अल्लाह का नाम लेकर जाल फेंका और मछलियों के फंसने का इंतजार करने लगा। अभी उसे वहां बैठे थोड़ी देर गुजरी थी कि फिर एक और शख्स उसी तरह आता दिखाई दिया जैसा कि कल आया था। वैसे ही घोड़े पर सवार था। उसने आते ही कहा अस्सलाम वालेकुम और घोड़े से उतर पड़ा। यूसुफ ने जवाब दिया वालेकुम अस्सलाम या शेख। फरमाइए मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूं? उसने सवाल किया। क्या कल कोई शख्स आया था और इस झील में डूबा था? तुमने उसका घोड़ा और दूसरा सामान एक यहूदी को बेचा।
यूसुफ डर गया और सोचने लगा यह शख्स कौन है? अगर मैं सच बोलता हूं तो मारा जाता हूं और अगर झूठ बोलता हूं तो भी मारा जाता हूं। आखिर हिम्मत करके जवाब दिया मैं तो आज इस झील पर शिकार करने आया हूं। मैं क्या जानू कल कौन आया था और उस पर क्या बीती?
उस शख्स ने कहा तुम बेकार में झूठ बोल रहे हो। मुझे सब मालूम है। तुमने रेशम की डोरी से उसको बांधा और इस झील में फेंक दिया। जब तुम्हें यकीन हो गया कि वह मर चुका है तो तुमने उसका घोड़ा और दीगर सामान सफिया यहूदी के पास जाकर बेच दिया। उसने तुम्हें 1000 सोने के सिक्के दिए जिनमें से तुमने कुछ नानबाई को दिए और बाकी अपनी मां को दे दिए। क्या यह सब झूठ है?
अब तो यूसुफ पर खौफ छा गया। उसके हाथपांव भूल गए। सोचा बचना मुश्किल है। जरूर यह शख्स सब कुछ खड़ा देखता रहा था। दिल में पछताया कि बेकार में उस शख्स की बात मानी। वाकई लालच बुरी बला है। फिर अल्लाह से दुआ करने लगा कि अगर आज जान बची तो आगे ऐसी हरकत नहीं करूंगा। किसी की बात पर कान नहीं धरूंगा।
वो शख्स यूसुफ को डरा हुआ देखकर बोला तुम किस मुसीबत में पड़ गए हो? मैं तुम्हें गिरफ्तार करने का इरादा नहीं रखता। मैं तो तुम्हें 1000 सोने के सिक्के और दिलवाना चाहता हूं। तब यूसुफ ने कहा, हां, तुम सच कहते हो। तुमसे पहले भी यहां एक शख्स आया था। मगर मैं कसम खाकर कहता हूं कि मैंने उसे अपनी मर्जी से झील में नहीं डुबोया था। जैसा उसने कहा था मैंने किया।
वो बोला मेरी भी यही गुजारिश है कि मुझे भी इसी तरह बांधकर झील में फेंक दो। अगर मेरे हाथ नजर आए तो जाल डालकर बाहर निकाल लेना। अगर पांव नजर आए तो समझ लेना कि मौत के करीब हुआ। मेरा घोड़ा और सामान उसी यहूदी के हाथ बेच देना जिसके हाथ तुमने पहले शख्स का सामान बेचा था। वो तुम्हें 1000 सोने के सिक्के दे तो ले लेना नहीं तो मना कर देना।
यूसुफ ने उसे भी रेशम की डोरी से बांधा और झील में फेंक दिया। थोड़ी देर इंतजार किया कि देखिए अब क्या होता है। अचानक उसने देखा कि उसके पांव पानी की सतह पर नजर आए। यूसुफ समझ गया कि वह मर चुका है। उसी वक्त उसका घोड़ा और सामान लिया और सफियां यहूदी के हाथ 1000 सोने के सिक्कों में बेच दिया। सिक्के लेकर यूसुफ ने सामान खरीदा और सीधा घर पहुंचा।
मां ने पूछा बेटा यह सिक्के हर रोज कहां से लाते हो? यूसुफ ने जवाब में सारी बात सुना दी। इस पर मां ने कहा बेटा अब ना जाना लालच में जान मत गवाना। यूसुफ ने जवाब दिया मां जो वह कहते हैं वो मैं करता हूं और सिक्कों से झोली भरता हूं। वो यहूदी जो मुझे सिक्के देता है, घोड़ा और सामान ले लेता है और अफसोस के साथ कहता है हाय लालच ने इसकी जान ली।
मां ने कहा बेटे मैं हैरान हूं कि वह कैसे लोग हैं जो खुशी-खुशी जान देते हैं और अपना माल तुम्हारे हवाले कर देते हैं। यूसुफ ने कहा मां मेरा इसमें क्या जाता है? मुफ्त में हर रोज माल हाथ आता है। मैं जानबूझकर तो किसी को पानी में नहीं डुबोता हूं।
तीसरे दिन एक शख्स आया और यूसुफ का नाम लेकर पुकारा। यूसुफ ने सोचा यह फिर लोग मेरा नाम कहां से जानते हैं? मानो बरसों से मुझे पहचानते हो। तीसरे ने वही करने को कहा जो वह पहले कर चुका था। यूसुफ ने उसे भी झील में फेंक दिया और इंतजार करने लगा कि देखो यह मरता है या जीता है। अचानक उस शख्स के दोनों हाथ पानी से बाहर निकले। यूसुफ ने फुर्ती से जाल फेंका और उसे बाहर निकाल लिया। उसके हाथ में दो सुर्ख रंग की चमकती हुई मछलियां थी। ऐसी मछलियां जो यूसुफ ने इससे पहले कभी नहीं देखी थी। मछलियां क्या थी? वह तो दो लाल याकू थे जिनसे लाल रोशनी की चमक निकल रही थी। उसने पानी से बाहर आते ही इन मछलियों को एक संदूक में बंद किया और यूसुफ का शुक्रिया अदा किया कि मेरी जान बचाई। तेरी मदद मेरे काम आई।
यूसुफ ने पूछा भाई एक बात पूछना चाहता हूं। ठीक ठीक बताओगे? वो बोला हां जरूर पूछो। तब यूसुफ ने पूछा तुमसे पहले भी दो शख्स इस झील पर आए थे। दोनों को उनकी मर्जी के मुताबिक मैंने झील में डाल दिया और वो डूब गए। उनकी वसीयत के मुताबिक उनका माल असबाब मैंने सफिया नामी यहूदी के हाथ बेच दिया। अब मुझे यह बताओ कि वह दोनों क्यों डूब गए थे और तुम क्यों नहीं डूबे? तुम कैसे जिंदा बचे?
उसने जवाब दिया, डूबने वाले दोनों शख्स मेरे सगे भाई थे। एक का नाम अब्दुल सलाम था और दूसरे का नाम अब्दुल अहद। मेरा नाम अब्दुल समद है। हम भाइयों को हमारे वालिद ने जादू के जरिए छुपे हुए खजाने मालूम करने का इल्म सिखाया था। जब हम इस इल्म में माहिर हो गए तो दूरदूर के जिन्न हमारे गुलाम हुए। जब हमारे वालिद का इंतकाल हुआ तो हम भाइयों ने गवाहों के सामने वालिद की तमाम जायदाद आपस में बराबर बांट ली। सिर्फ एक किताब के बंटवारे पर झगड़ा हुआ। यह किताब लाजवाब थी और सोने का ढेर भी इसकी कीमत नहीं चुका सकता था। इस किताब में बेशुमार छुपे हुए खजानों का राज दर्ज था। इसलिए हम में से हर एक यही चाहता था कि यह किताब उसे मिल जाए।
अब सुनिए कि अफवान नामी एक शेख हमारे वालिद का खादिम था। वह भी जादू और अमलियात से वाकिफ था। हमने यह किताब उसे दी कि हमें इसके बारे में कुछ बताएं। उसने किताब पढ़ने के बाद यह कहा कि तुम में से जो यह किताब लेना चाहे उसे चाहिए कि शहर बाबुल नामी जगह पर जाए और वहां से एक तलवार और एक नक्शा लाए। उस तलवार की खासियत है कि अगर पूरी फौज मुकाबले पर आ जाए और कोई शख्स उस तलवार को चमकाए तो तमाम फौज में खलबली मच जाए। नक्शे की एक खासियत है कि जिस मुल्क को चाहे देख ले और जिस मुल्क को चाहे उसको जला दे। अगर तुम चारों में से कोई खजाना बताएगा तो यह किताब पाएगा।
हमने पूछा यह भी तो बताओ कि खजाना अल कामरान कौन से मुल्क में मिलेगा? उसने जवाब दिया अलमरान शहर मशरिक के बादशाह की सल्तनत में वाक है। तुम्हारे वालिद बयान करते थे कि उन्होंने इस खजाने को खोजने की कोशिश की थी मगर नाकाम रहे। मगर इतना हुआ कि मशरिक के बादशाह भागकर एक झील पर गए जो मिस्र में वाक है और वह कह रहे थे कि उनका पीछा करते आए मगर कामयाब ना हुए। शेखा ने आगे पढ़कर देखा तो मालूम हुआ कि काहिरा के करीब एक झील है जिसमें लाल रंग की दो मछलियां हैं। यह मछलियां दरअसल जिन्न है और उन्हीं की मदद से वह खजाना हासिल हो सकता है। जो इन जिन्नों को बाहर निकालेगा वो अपनी मदद से कामयाब हो जाएगा। तब एक-एक करके मेरे दो भाई इस झील में डूब कर मर गए। तीसरे ने कहा कि भैया हमें खजाने का शौक नहीं है और वो अब यहूदी का रूप बदलकर सफिया के नाम से कारोबार करता है। अब अगर तुम मेरे साथ चलो तो शहर बाबुल को मखनास में वो खजाना हमें मिल जाएगा।
यूसुफ ने कहा मैं तुम्हारे साथ जाने से रहा। लालच बुरी बला है। कौन जाने मेरी जान जाए या
तुम्हारी मौत आए। लहजा तुम अकेले ही जाओ। मैं तो मछली पकड़ता हूं। भला अल कामरान का खजाना तुम्हें को मुबारक हो।
तब अब्दुल समद ने कहा, मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूं कि अब हम तुम सगे भाई हैं। कभी तुमसे धोखा नहीं करूंगा। जो कहोगे मानूंगा।
यूसुफ बोला, मैं अपनी बूढ़ी मां और दो बेकार भाइयों को किसके भरोसे छोड़कर जाऊंगा। खुदा जाने वहां से कब वापस आऊंगा। मेरे बाद तो वह भूखे मर जाएंगे।
अब्दुल समद ने कहा, "यह महज बहाना है। मुझसे 1000 सोने के सिक्के लो और घर वालों को दो। अगर ज्यादा की जरूरत हो तो कहो।"
यूसुफ की मां ने कहा, बेटे मुझे इस बुढ़ापे में छोड़कर कहां जाओगे और कब तक आओगे? कब्र में पांव लटकाए बैठी हूं। पता नहीं कब [संगीत] दुनिया से चली जाऊं और तुम्हें देखने की हसरत दिल में ही लिए मर जाऊं। मेरी मानो तो ना जाओ। जो रूखी सूखी अपने वतन में [संगीत] मिल जाती है उसे ही गनी मत जानो।
मगर यूसुफ ने मां को तसल्ली देकर और समझा बुझाकर राजी किया और अब्दुल समद के साथ रवाना हो गया।
यूसुफ और अब्दुल समद दोपहर से रात तक सफर करते रहे। अचानक यूसुफ को भूख महसूस हुई तो उसने कहा मुझे तो बहुत जोर की भूख लगी है। अल्लाह के लिए कुछ खिलाओ पिलाओ भूखा मरा जा रहा हूं।
अब्दुल समद बोला अच्छा तो मांगो। क्या मांगते हो? क्या खाना चाहते हो? जो कहोगे वही दूंगा।
यूसुफ ने कहा अच्छा तो मुर्गा कोरमा मंगवाओ। बासमती चावलों का पुलाव लो। मछली के कबाब मंगाओ। दूध और शहद लो। इस तरह उसने 24 खानों का नाम लिया।
यूसुफ ने सोचा मुर्गा और कबाब कहां से आया? किसने पकाया? अब्दुल समद ने जब उसे हैरान देखा तो बोला यह सब जादू का जोर है। मैं चाहूं तो हजारों कस्म का खाना मंगवाऊं और जितने आदमियों को चाहो खिलाऊं।
अब्दुल समद ने खाना खिलाकर और पानी पिलाकर प्लेटें और बर्तन रखे और पूछा भला तुम्हारे नजदीक काहिरा से हम कितने फासले पर हैं?
यूसुफ ने जवाब दिया, मुझे क्या मालूम तुम ही बताओ।
तब अब्दुल समद ने कहा, तो सुनो, यह घोड़ा नहीं जिन्न है। यह एक साल का सफर एक दिन में [संगीत] तय करता है।
यह सुनकर यूसुफ और भी हैरान हुआ कि अजीब लोगों से वास्ता पड़ा है। कोई जिन्न है और कोई घोड़े पर सवार है। चार दिन इसी तरह चलते रहे। पांचवें दिन शहर फारस में दाखिल हुए। शहर में पहुंचे तो हर शख्स ने अब्दुल समद को सलाम किया और उसका हाथ चूमा। चलते-चलते एक दरवाजा मिला। उस पर उसने दस्तक दी। दरवाजा खुला तो एक लड़की नजर आई। अब्दुल समद ने कहा, बेटी रहीमा शहर नसीह तो खोलना। लड़की बोली, "ए भाईजान, आपका हुक्म आंखों पर अब भी खोलती हूं।"
उधर अब्दुल समद ने अपने घोड़े से कहा, "ले अब रुखसत हो।" इसके साथ ही जमीन [संगीत] फट गई और घोड़ा उसमें गायब हो गया।
यूसुफ बोला ऐ अल्लाह तेरा शुक्र है। तेरी रहमत और करम के सबब मैं इस जिन्न की पीठ [संगीत] पर से सही सलामत उतरा।
जब शहर में दाखिल हुए तो यूसुफ उसकी शान को देखकर हैरान रह गया। अब्दुल समद ने संदूक को खोला और एक बहुत कीमती पोशाक निकाली और यूसुफ को पहनाई। 40 तरह के खाने मेज पर रखे और यूसुफ से कहा बेझिझक खाओ। जरा भी तकफ मत करो। इस घर को अपना घर ही समझो।
यूसुफ ने कहा अल्लाह की [संगीत] कसम मुझे यह सब चीजें बहुत पसंद है। यूसुफ यहां 20 दिन तक रहा।
एक दिन अब्दुल [संगीत] समद ने कहा यूसुफ अब चलो मेरे साथ। आज ही खजाना मिलने का इमकान है। चलो।
यूसुफ ने कहा, ठीक है। मुझे क्या ऐतराज हो सकता है? वो शहर से बाहर निकले। अब्दुल समद घोड़े पर सवार हुआ और यूसुफ दूसरे घोड़े पर। चलते-चलते [संगीत] एक नदी मिली। अब्दुल समद घोड़े से उतरा और कहा तुम भी उतरो जल्दी करो देर मत करो यूसुफ फौरन उतर कर उसके पास आया इन घोड़ों को घोड़ों के रखवालों को सौंप कर वो आगे बढ़े वो एक हमार जगह पर पहुंचे जहां कालीन और तकिए बिछाए गए थे दोनों ने बैठकर खाना खाया [संगीत] खाने के बाद अब्दुल समद ने वह दोनों संदूक से निकाले और उन पर जादू किया [संगीत] तो आवाजें आने लगी अल्लाह के लिए हमें बचाओ हम पर रहम करो इतने में कुछ पर्दे इधर-उधर उड़ने लगे और उनमें से दो आदमी निकल आए जिनकी मुट्ठी बंधी हुई थी। उन्होंने कहा, "अच्छा, अब यह बताइए कि [संगीत] क्या हमें जलाओगे या वादा करो कि खजाना बताओगे?" अगर बताओगे तो रिहाई पाओगे?" उन्होंने जवाब दिया, हम वादा करते हैं।
तब अब्दुल समद ने यूसुफ से कहा, जब मैं मंत्र पढूं और अगरबत्ती आग पर डालूं, तो नदी का पानी [संगीत] सूख जाएगा। तब एक सुनहरा दरवाजा दिखाई देगा। तुम फौरन नदी में उतर जाना और दरवाजे पर जाकर दस्तक देना। थोड़ी देर इंतजार करने के बाद फिर दस्तक देना। फिर इंतजार करना। इसके बाद तीन बार दस्तक देना। तब एक आवाज आएगी कि कौन है? तुम कहना मैं यूसुफ हूं और मछलियां पकड़ता हूं। जब दरवाजा खुलेगा तो एक हबशी गुलाम नंगी तलवार लिए तुम्हारी तरफ आएगा। वो आते ही तुमसे कहेगा कि अपनी गर्दन झुकाओ। मैं तुम्हारा सर काटूंगा। इस मौके पर तुम जरा भी डरना मत और फौरन गर्दन झुका देना। फिर देखना क्या होता है। एक बार फिर ध्यान से सुन लो कि उस हबशी गुलाम से मुकाबला बिल्कुल मत करना वरना जान जाएगी।
इसके बाद एक और दरवाजे पर जाना। वहां भी इसी तरह दस्तक देना। इस बार एक घुड़सवार हाथ में भाला ली दिखाई [संगीत] देगा। देखते ही देखते तुम्हारी तरफ लपकेगा। मगर खबरदार तुम हाथ मत उठाना। फिर तमाशा देखना।
इसके बाद तीसरे दरवाजे पर जाना और इसी तरह दस्तक देना। इस बार एक शख्स तीर कमान लिए दिखाई देगा। वो तुम पर तीर चलाने के लिए चिल्लाएगा। तुम डरना मत। बहादुरी से डटे रहना मगर हाथ मत उठाना। फिर देखना [संगीत] क्या होता है।
यहां से मुड़कर चौथे दरवाजे पर जाना। दरवाजा खुलते ही एक खूंखार शेर दहाड़ता हुआ तुम पर हमला करने की कोशिश करेगा। तुम अपनी जगह से जरा भी इधर-उधर मत होना। वरना एक ही पंजे से तुम्हें फाड़ कर रख देगा। यहां तुम्हें एक हबशी गुलाम मिलेगा और तुमसे तुम्हारा नाम पूछेगा। तुम बिना डरे अपना नाम बता देना। वह तुमसे कहेगा कि छठे दरवाजे में जाओ। वहां पहुंचकर कहना यहां दरवाजा खुलवा दें। इस आवाज के साथ ही छठा दरवाजा खुल जाएगा। तब तुम देखोगे [संगीत] कि दो काले सांप फन फैलाए तुम पर झपट रहे हैं। इन सांपों से कुछ ना कहना। बस खामोशी से खड़े रहना। बस फिर जो कुछ होगा तुम्हारे हक में बेहतर ही होगा।
यहां से जब तुम सातवें दरवाजे में दाखिल होगे तो सामने से तुम्हारी मां दिखाई देगी। वो तुम्हें अपने [संगीत] गले से लगाना चाहेगी। तुम उसके करीब मत जाना। उसे तलवार सौंप कर खामोश खड़े रहना। वो तुमसे कहेगी आओ बेटा मेरे पास आओ। तुम जवाब देना। नहीं मां मैं आपसे दूर ही भला। इस पर वह तुम्हारे करीब आएगी। तुम्हें एक पल भी देरी किए बिना उसकी दोनों टांगे काट देना। उस वक्त तुम पर जाहिर हो जाएगा कि वह तुम्हारी [संगीत] मां नहीं बल्कि जादूगरनी थी। जादूगरनी के गिरते ही सारा जादू खत्म हो जाएगा। वहां तुम सोने के ढेर पाओगे और खुशी से फूले ना समाओगे।
आगे बढ़ोगे तो एक पर्दा दिखाई देगा। उसे तलवार से उठा देना। सुल्तान अल कामरान तख्त पर लेटा आराम कर रहा होगा। उसके सर पर एक चमकती [संगीत] हुई चीज दिखाई देगी। वही नक्शा है, नजूम है जिसकी बहुत धूम है। नक्शे के अलावा अल कामरान के हाथ से जादू की अंगूठी भी उतार लेना। मगर खबरदार डरना मत। निडर होकर चले जाना और मेरी हिदायत के खिलाफ कोई काम ही मत उठाना। नहीं तो बहुत [संगीत] पछताओगे और मुफ्त में जान गवाओगे।
यूसुफ को यह सब हिदायतें देने के बाद अब्दुल समद ने एक मंत्र पढ़ा और खुशबूदार लकड़ी को आग में जलाया। फौरन नदी सूख गई और साफ दिखाई देने लगी। देखते ही देखते रेत की परत फट गई और खजाने का दरवाजा खुल गया। अब्दुल समद ने कहा देर मत करो। यूसुफ हाथ में तलवार लिए तिलिस्मी दरवाजे में दाखिल हुआ। अंदर जाते ही दरवाजे पर दस्तक दी मगर कोई जवाब ना आया। दूसरी बार दस्तक दी। इस पर भी कोई जवाब ना मिला। फिर उसने यह बात याद कर ली। तीन बार दस्तक दी तो फौरन आवाजें आई। दरवाजे पर कौन है? यूसुफ बोला मैं यूसुफ हूं। मछेरा हूं। अचानक दरवाजा खुल गया। दरवाजा खुलते ही एक डरावनी सूरत का गुलाम हबशी तलवार लहराता हुआ यूसुफ की तरफ बढ़ा और करीब आकर गरजा। यूसुफ अपनी गर्दन झुका दो। मैं तुम्हारा सर काटना चाहता हूं। यूसुफ पहले तो बहुत डरा। हाथपांव कांपने लगे। फिर अब्दुल समद की नसीहत याद आ गई। उसने फौरन गर्दन झुका दी। उसके गर्दन झुकाते ही हबशी ने खौफनाक वार किया। यूसुफ डर कर पीछे हटा तो क्या देखा है कि गुलाम हबशी फर्श पर तड़प रहा है। दो-तीन बार तड़प कर वो ठंडा हो गया। यूसुफ ने सोचा कैसी अजीब बात है। मैंने गर्दन झुकाई और गुलाम हबशी मौत के घाट उतर गया।
फिर वो दूसरे दरवाजे पर गया। दस्तक दी तो आवाज आई। तुम कौन हो? क्या चाहते हो? यूसुफ ने कहा मैं अंदर दाखिल होना चाहता हूं। तब फौरन ही दरवाजा खुल गया। यूसुफ अंदर दाखिल हुआ तो सामने से घुड़सवार हाथ में लंबा सा भाला लिए उसकी तरफ दौड़ा। वो बिल्कुल नहीं डरा और जहां था वहीं खड़ा रहा। सवार भाला लिए जब उसके नजदीक पहुंचा तो जोर से पुकारा ऐ यूसुफ यहां से भाग जा नहीं तो यह भाला तेरे आरपार हो जाएगा। मगर यूसुफ अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला। आखिरी बार जब सवार ने भाला उछाला तो इस बार भी एक चीख सुनाई दी। यूसुफ चौंक कर पीछे हटा तो क्या देखा है कि वो [संगीत] शख्स फर्श पर मरा पड़ा है। यूसुफ को और भी हैरानी हुई कि यह अजीब दुनिया है जिसमें कत्ल करने वाला खुद ही कत्ल हो जाता है और मरते वक्त पानी भी नहीं मांगता है।
इसके बाद यूसुफ तीसरे दरवाजे पर पहुंचा। दस्तक दी तो यह दरवाजा भी खुल गया। क्या देखा है कि एक खौफनाक सूरत का हबशी हाथ में तीर कमान लिए उसकी तरफ बढ़ता चला आ रहा है। करीब आकर बोला है यूसुफ मछेरे भाग जा। नहीं तो मेरा तीर तेरे सीने के आरपार होगा। लेकिन यूसुफ अपनी जगह से बिल्कुल नहीं हिला। तीर अंदाज ने वार करना चाहा तो सनसनाती आवाज के साथ [संगीत] तीर खुद उसके सीने में घुस गया और वो खौफनाक चीख के साथ ढेर हो गया। यूसुफ की हैरानी बढ़ती गई कि मुझे मारने वालों को ना जाने कौन इतनी जल्दी खत्म कर देता है। अजीब राज है। [संगीत] कुछ समझ में नहीं आता।
इसके बाद चौथे दरवाजे में दाखिल हुआ तो क्या देखा है कि एक खौफनाक शेर गुस्से में उसको घूर रहा है। अभी वह कुछ ही कदम गया होगा कि शेर पूरी ताकत से दहाड़ा। यूसुफ के पसीने छूट गए और उसे यूं लगा कि जैसे झलझला आ गया हो। डर कर पीछे हटने को था कि अब्दुल समद की नसीहत याद आ गई। कांपतेकांपते वहीं खड़ा रहा। शेर एक बार फिर दहाड़ा और [संगीत] यूसुफ पर झपटा। यूसुफ समझा अब मौत आई। लेकिन वहां तो कुछ और ही तमाशा हुआ। जैसे ही शेर झपटा उसका सीना तीरों से छलनी हो गया और वह खून से लथपथ होकर जमीन पर लौटने लगा।
यूसुफ हैरान होता हुआ पांचवें दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे पर पहुंचा ही था कि सामने से एक हबशी गुलाम आता दिखाई दिया। करीब पहुंचकर उसने पूछा तुम कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है? यूसुफ ने कहा मैं यूसुफ हूं। गुलाम ने कहा तो अब छठे दरवाजे पर जाओ और कहो कि यहां आवाज के साथ ही दरवाजा खुल गया और वह उसमें दाखिल हो गया। अचानक दो काले सांप फन फैलाए उस पर झपटे। वो बिल्कुल नहीं डरा बल्कि आगे ही आगे चलता रहा। इस पर दोनों सांप एक दूसरे से लड़ने लगे और लड़ते-लड़ते खत्म हो गए।
छठे दरवाजे से निकलकर यूसुफ सातवें दरवाजे में दाखिल हुआ तो क्या देखा है कि उसकी बूढ़ी मां खुशख उसकी तरफ चली आ रही है। उसे देखते ही वो अब्दुल समद की नसीहत भूल गया और मोहब्बत से बेकबू होकर उससे लिपट गया। बस फिर क्या था? धड़ाधड़ कोड़े बरसने लगे और उसे ऐसी मार पड़ी कि यूसुफ बेहोश होकर फर्श पर गिर गया। खा जाने के गुलाम ने उसे उठाया और कमरे से बाहर फेंक दिया।
अब्दुल समद ने यूसुफ को बेहोश पाया तो वहां से उठाया। नदी का पानी छिड़का। जब यूसुफ को होश आया तो उसने अब्दुल समद को सारी बात तफसील से सुनाई। इस पर अब्दुल समद ने कहा, अरे बदकिस्मत तूने मेरी हिदायत पर अमल क्यों नहीं किया। मैंने कहा था ना कि जादूगरनी होगी जो तेरी मां का रूप बदलकर [संगीत] तुझे धोखा देगी। लेकिन तू ऐसा नादान निकला कि सब कुछ भूल गया। अब एक साल के बाद कहीं यह दिन फिर आएगा। यह कहकर सामान बांधा और शहर फारस को वापस [संगीत] आया।
एक साल तक अब्दुल समद ने युसुफ को खूब खिलाया पिलाया और बढ़िया कपड़े पहनाए। जब एक साल खत्म हो गया तो उसको लेकर फिर रवाना हुआ। नदी पर पहुंचकर वही काम दोहराया तो पानी सूख गया। यूसुफ को नए सिरे से हिदायत दी और जादू नगरी में भेजा।
इस बार यूसुफ ने एहतियात बरती। उसने छह दरवाजे पार किए और जब सातवें पर पहुंचा तो यहां फिर अपनी मां से सामना हुआ। मगर इस बार उसको पिछली मार और पिटाई खूब [संगीत] याद थी। इसलिए जादूगरनी के चक्कर में नहीं आया। करीब पहुंचकर तलवार का एक ऐसा भरपूर वार किया कि जादूगरनी की दोनों [संगीत] टांगे काट कर रख दी। जादूगरनी के गिरते ही सारा जादू खत्म हो गया। आगे बढ़कर अलकामरान को देखा। नक्शे वाला सामान उसके सर पर चमक रहा था। उसने नक्शा उतारा और फिर उसके हाथ से जादू की अंगूठी भी उतार ली और इसके अलावा भी जो कुछ मिला सब हथिया लिया।
जब वह यह सारी चीजें लेकर चला तो चारों तरफ खुशी के नगाड़े बजने लगे। खजाने के रखवाले उसके पास जमा हो गए और ऊंची आवाज में दुआ मांगने लगे। ऐ अल्लाह यूसुफ की हमेशा हिफाजत करना। हमेशा उसकी मदद करना। यूसुफ ने तमाम चीजें अब्दुल समद को दे दी। उसने मारे खुशी के उसे गले लगाया और शुक्रिया अदा किया। फिर दोनों शहर फारस को वापस आए।
अब्दुल समद ने कहा भाई यूसुफ तुमने [संगीत] मेरे लिए अपना वतन छोड़ा। रिश्तेदारों और करीबियों से दूर हुए। अब यह बताओ कि तुमको क्या दूं?
यूसुफ ने जवाब दिया, मुझे वह दे दीजिए जिसके जरिए आप हर चीज मंगवाते हैं।
अब्दुल समद ने फौरन संदूक यूसुफ [संगीत] के हवाले किया और कहा, इसके अलावा एक और चीज दूंगा जिससे खजाने एक इशारे में हाथ आएंगे। जो आप मांगेंगे [संगीत] वो पाएंगे। मगर खबरदार किसी और पर यह बात जाहिर ना होने पाए। दूसरे तक [संगीत] यह बात ना जाए।
यूसुफ अपने वतन को रवाना हुआ। घर पहुंचा तो मां देखकर [संगीत] बहुत खुश हुई। गले लगाया, चूमा और सफर के हालात पूछे। यूसुफ ने बस इतना ही बताया कि सफर खतरनाक था मगर कामयाब रहा।
मां ने कहा, बेटे अगर कुछ लाए हो तो हमें भी दो। कई बार भूखी रह चुकी हूं।
यूसुफ ने हैरान होकर कहा, मां, एक दिन सिक्के दिए, दूसरे दिन फिर हजार दिए और जाते वक्त हजार और देकर गया था। वो सब क्या हुए? कहां गए?
मां ने रोते हुए जवाब दिया। तेरे भाइयों ने तिजारत के बहाने तमाम सिक्के मुझसे ले लिए और मुझे घर से निकाल दिया।
यह सुनकर यूसुफ को बहुत दुख हुआ। आंखों में आंसू आ गए। कहने लगा मां जरा भी मत घबराओ। जो चाहे पहनो जो चाहे खाओ। मुझे जो कुछ मिला है तुम्हारी दुआओं का असर है। नहीं तो मैं क्या और मेरी बिसात क्या?
मां ने कहा बेटा बाजार से जाकर गोश्त और रोटी तो लो।
यूसुफ हंस पड़ा और कहने लगा बाजार जाने की क्या जरूरत है? मां तुम जो खाओगी अभी हाजिर हो जाएगा। मगर उसकी मां उसको मजाक समझी और मुस्कुरा कर रह गई।
इस पर यूसुफ ने संदूका खोला। यूसुफ ने कहा बेहतरीन किस्म के खाने लेकर आओ। जब सब खाने हाजिर हो गए तो यूसुफ की मां बहुत हैरान हुई और बोली बेटा यह सब कहां से आया? कौन लाया? जरा मुझे भी तो बताओ।
यूसुफ ने कहा खबरदार इसका जिक्र जुबान पर मत लाना। जब कभी जिस किसी चीज की जरूरत हो इसके जरिए मंगवा लेना। खुद भी खाना, भाइयों को भी खिलाना और इसके अलावा गरीबों और जरूरतमंदों की परवरिश भी करना।
दोनों मां-बेटे अभी खाना खा ही रहे थे कि इतने में वह दोनों भाई भी आ गए। एक ताजिर के बच्चे ने उनको खबर दी थी कि तुम्हारा भाई घोड़े पर सवार आया है और एक जिन्न अपने साथ लाया है। यह दोनों भाई अपने-अपने दिल में पछताने लगे। सोचा काश मां से बुरी तरह पेश ना आते। उस बेचारे को ना सताते और जरूर वह उसे कह देगी और हमें पनाह नहीं मिलेगी।
यूसुफ ने उठकर सलाम किया और हमदर्दी से पेश आया। फौरन अपने साथ खाने पर बिठा लिया। यह क्योंकि कई दिन के भूखे थे इसलिए खूब [संगीत] पेट भर कर खाया। जो बाकी बचा यूसुफ ने कहा भाई शाम को खाएंगे गर्म [संगीत] करके मजे उड़ाएंगे। यूसुफ कहने लगा तुम फिक्र मत करो शाम को और आ जाएगा। अल्लाह भिजवाएगा।
इस पर दोनों ने बचा हुआ खाना गरीबों और मोहताजों में बांट दिया। उन्होंने पेट भरकर खाया और देने वालों को हजारों दुआएं दी।
जब 1520 दिन गुजर गए तो एक दिन बड़े भाई सलीम ने अपने [संगीत] भाई कलीम से कहा क्यों भाई? इसका क्या मतलब है कि यूसुफ सुबह शाम हमें वह खाने खिलाता है जो बादशाहों को भी नसीब नहीं होते होंगे। उस पर तुर्रा यह कि बाजार से कभी कुछ खरीदते देखा ना बावर्ची को पकाते देखा। अगर यूसुफ से पूछते हैं तो वह कहां बताएगा? और जब हमारी समझ में नहीं आता तो नौकरों की समझ में भला खाक आएगा। उन्होंने यह मंसूबा सोचा कि यूसुफ की गैर मौजूदगी में जाकर मां से पूछते हैं। मिन्नत करते हैं। उम्मीद है काम बन जाएगा। बस यही सोचकर मां के पास पहुंचे और कहा हमको भूख लगी है। कुछ खाने को दो।
उनकी मां गरम-गरम [संगीत] खाना लाई तो उन्होंने पूछा अम्मा जान यह गरम-गरम खाना कहां से आया और इस कदर जल्द किसने पका लिया?
मां सीधी साधी औरत थी। सब कह दिया कि इस संदूक में [संगीत] जादू के जोर से यह खासियत है कि जो चीज मांगो मिल जाती है पल भर में पकती है। मगर तुम यह राज किसी [संगीत] को मत कहना नहीं तो फिर कुछ हाथ ना आएगा।
वो बोले भला यह भी कोई बात है। ऐसा राज और हम खोलें। अरे नहीं नहीं क्या पागलपन है। हम तुम इत्मीनान रखो मां। यह राज हमारे सीने में यूं दबा [संगीत] रहेगा जैसे कब्र में मुर्दा।
अब सुनिए कि सलीम ने खाना खाने के बाद कलीम से कहा, भाई, यह तो अच्छी चीज यूसुफ के हाथ आई है। मगर यह मौका किस्मत आजमाने का है। किसी तरकीब से इसे हथियाना चाहिए।
कलीम ने कहा, बेशक आप ठीक कहते हैं। [संगीत] जितनी जल्दी मुमकिन हो, हमें यूसुफ से यह चीज छीन लेनी चाहिए। यह संदूक ले लेना चाहिए।
सलीम कुछ देर सोचता रहा। फिर एक तरकीब सोची। कलीम से कहने लगा, सबसे अच्छी तरकीब यह है कि बजाय वह चीज छीनने के हम यूसुफ को क्यों ना ठिकाने लगा दें। रास्ता साफ हो जाएगा। [संगीत] कहो कैसी तरकीब है?
कलीम बोला, जो कुछ आपने सोचा है, बिल्कुल ठीक है। इस नालायक बच्चे का इलाज यही है। जब तक यह जिंदा है, हमारी किस्मत नहीं चमक सकती।
दोनों भाई एक दिन समुद्री जहाज के कप्तान के पास गए और उसे अपना मतलब यूं बयान किया। हम तीन भाई हैं। बाप के मरने पर जायदाद [संगीत] हम तीनों भाइयों में बांट दी गई। मगर एक भाई निकम्मा निकला और उसने अपनी और हमारी सब दौलत लुटा दी। अब इससे हम तंग आ गए हैं और चाहते हैं कि इससे छुटकारा पाए। लहजा आप मेहरबानी कीजिए और इस निकम्मे को हमसे खरीद लीजिए। अब जो भी कीमत लगाएंगे हमें मंजूर है। बस यूं समझ लीजिए कि ऐसा करके आप हम पर बड़ा एहसान करेंगे।
कप्तान ने कहा यह तो बड़ी आसान बात है। तुम इसको मेरे पास भेज दो। मैं इसे समंदर को रवाना कर दूंगा और वहां से वह कभी वापस ना [संगीत] आएगा। फिर कभी तुम्हें ना सताएगा।
इस पर दोनों भाई बोले अल्लाह आपका भला करे और आपका नसीब बुलंद करे। हम आपका एहसान जिंदगी भर ना भूलेंगे। आपको दुआएं देंगे। आपके बच्चों का भला चाहेंगे।
तब कप्तान ने पूछा अच्छा यह बताओ कि तुम अपने भाई को कितने में बेचना [संगीत] पसंद करोगे?
वो बोले जो आप देंगे हम खुशी से कबूल करेंगे।
कप्तान ने पूछा 40 सिक्के मुनासिब रहेंगे।
उन्होंने जवाब दिया जी हां 40 सिक्कों में जरूर बेच डालेंगे। आपका कहना मानेंगे। शाम को आप फला जगह पर आइएगा तो हमको वहीं पाएंगे।
कप्तान ने कहा अच्छा तो अब तुम जाओ मैं तुम्हें वहीं मिलूंगा।
दोनों भाई यूसुफ के पास गए। सलीम ने उसका हाथ चूमा और कहा भाई हमारा एक दोस्त है जो कई बार हमको दावत दे चुका है। हम चाहते हैं कि एक दिन हम भी उसकी दावत करें। मगर यह सोच कर खामोश हो जाते हैं कि उन्हें बिठाएंगे कहां और खिलाएंगे क्या?
यूसुफ ने कहा इसमें फिक्र की कौन सी बात है? अपना मकान जो मौजूद है यही ले आओ और जो चाहे खिलाओ। हमारी तरफ से पूरी इजाजत है।
अब सुनिए कि रात को कप्तान, उसके साथी
और इन तीनों भाइयों ने मिलकर खाना खाया और जब रात ज़्यादा हो गई तो मिठाई आई। सबको खिलाई। जब नींद आने लगी और आराम किया तो लोगों ने यह काम किया कि पाँचों ने मिलकर उसका मुँह बंद किया और उसे जहाज़ पर सवार कर दिया।
सुबह उठे तो दोनों भाइयों ने अपनी माँ से कहा, "माँ, यूसुफ अभी तक नहीं उठा। आज बहुत सोया है।" माँ ने कहा, "बेटा, जाओ उसे जगा दो। बहुत दिन चढ़ाया है। उठा दो उसे।" उन्होंने पूछा, "वो कहाँ सोता है?" माँ ने कहा, "मेहमानों के साथ एक ही कमरे में है।" उन्होंने कहा, "मालूम होता है यूसुफ मेहमानों के साथ चला गया। हम शायद सोते ही थे कि वो लोग चल दिए और अजीब नहीं कि उनके साथ वो वतन से कहीं बाहर चला गया हो।"
इस पर माँ बहुत रोई। इन दोनों ने कहा, "दूर हो कमबख़्त! तू यूसुफ को इतना अज़ीज़ रखती है। हम सामने नहीं होते तो रोती है ना धोती है और जब वो नज़र से दूर होता है तो उसकी मोहब्बत का दम भरती है, रो-रो कर बुरा हाल करती है।" वो बोली, "बेटा, तुम मेरी आँखों के तारे हो, वह भी मेरा कलेजा है, मगर तुम निकम्मे हो और वह कमाऊ पूत है।" यह सुनते ही दोनों भाई आग बबूला हो गए और माँ को बहुत भला बुरा कहा। फिर कोठरी में जाकर रात के सिक्के और वह जादू का संदूक छीन लिया।
अब सुनिए कि यूसुफ बेचारा मुसीबत का मारा एक साल तक समंदर में रहा।
साल भर के बाद जहाज़ एक मुख़ालिफ़ हवाओं वाले पहाड़ के पास पहुँचा तो वह चट्टान से टकराकर टुकड़े-टुकड़े हो गया और यूसुफ के सिवा कोई भी ज़िंदा न बचा। सब पानी में डूब गए। यूसुफ को एक लहर ने किनारे पर फेंक दिया। काफ़ी देर के बाद होश आया तो अल्लाह का शुक्र अदा किया कि उसने नई ज़िंदगी दी।
चलते-चलते एक जगह पर अरबों की एक आबादी मिली। यूसुफ ने अपना हाल बताया तो उनमें से एक शख़्स ने जो जेद्दा का रहने वाला था, उससे कहा कि एक शख़्स काहिरा का रहने वाला है, उसकी नौकरी करोगे? इस पर वो शख़्स उसे अपने साथ लेकर जेद्दा को रवाना हुआ। फिर जेद्दा से अपने मालिक के साथ मक्का मुकर्रमा पहुँचा और वहाँ अब्दुल समद से मुलाक़ात हुई।
यूसुफ ने जब अपना हाल सुनाया तो उसे बहुत अफ़सोस हुआ और अपने घर ले जाकर बढ़िया कपड़े पहनाए और फिर जादू के ज़ोर से सब हाल साफ़-साफ़ देख लिया और यूसुफ को बताया कि तेरे दोनों भाई दमिश्क मुल्क शाम की क़ैद में हैं। उन्होंने तेरे साथ धोखा किया तो अल्लाह ने उन्हें यह सज़ा दी कि बादशाह ने उन्हें हमेशा के लिए क़ैदख़ाने में डाल दिया। तेरी माँ का शाही महल ने वज़ीफ़ा तय कर रखा है जिससे वह अपनी ज़िंदगी सुकून से गुज़ार रही है। बस तेरी जुदाई का ग़म है। जब तू उसे याद आता है तो फूट-फूट कर रोती है। ख़ुद रोती है और दूसरों को रुलाती है।
इसके बाद अब्दुल समद ने उसे एक तिलिस्मी अंगूठी दी और कहा, "जब किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो इस अंगूठी को रगड़ देना। फ़ौरन एक जिन्न दिखाई देगा और जो तू कहेगा पूरा करेगा।" यूसुफ ने शुक्रिया अदा किया और उससे रुख़सत हुआ।
कुछ दूर जाकर उसने जादू की अंगूठी को रगड़ा। फ़ौरन एक जिन्न ज़ाहिर होकर अदब से बोला, "हुक्म मेरे मालिक।" यूसुफ ने कहा, "मुझे काहिरा पहुँचा दो।" जिन्न ने फ़ौरन उसको उठाया और चश्मे वाले बगीचे में काहिरा में उतार दिया। यूसुफ अपनी माँ के घर में दाख़िल हुआ और जिन्न वहाँ से ग़ायब हो गया।
माँ ने यूसुफ को देखा तो बढ़कर गले लगाया और मारे ख़ुशी के रो पड़ी। यूसुफ ने भाइयों की शरारत का हाल सुनाया। उसे बड़ा दुख हुआ। मगर यूसुफ ने माँ को तसल्ली दी और फ़ौरन अंगूठी रगड़ी। अंगूठी का जिन्न फ़ौरन हाज़िर हुआ। अदब करके कहा, "हुज़ूर, हुक्म फ़रमाइए, ग़ुलाम आपकी क्या ख़िदमत कर सकता है?" यूसुफ ने कहा, "बादशाह के क़ैदख़ाने से हमारे भाइयों को छुड़ा लो। देर मत करो।"
सलीम और कलीम दोनों बहुत बुरी हालत में थे और कहते थे कि इस ज़िंदगी से तो मौत बेहतर है। जिन्न ने उन दोनों को उठाकर हवा में उड़ाया और फ़ौरन घर पर लाया। यूसुफ ने कहा, "आप लोगों को देखकर बड़ा दिल ख़ुश हुआ।" इस पर उन दोनों ने मारे शर्म के गर्दन नीचे कर ली और शर्मिंदगी के बाइस रोने लगे। तब यूसुफ ने उनसे कहा, "भाई, रोने से क्या फ़ायदा? तुम्हारा कोई क़सूर नहीं। सब शैतान की करतूत है।"
यूसुफ अब दौलतमंद होना चाहता था। माँ से कहा, "इंतज़ार करो।" जिन्न को हुक्म दिया, "बादशाह का सारा ख़ज़ाना उठा लो। एक पैसा भी मत छोड़ना।" जिन्न ने बादशाह के ख़ज़ाने के तमाम हीरे-जवाहरात और सोना-चाँदी उठाया और कहा, "हुज़ूर, एक मोती तक नहीं छोड़ा। सारा ख़ज़ाना उठा लाया हूँ।"
इसके बाद यूसुफ ने उसे दूसरा हुक्म दिया, "रातोंरात मेरे लिए सोने का एक आलीशान महल बनाओ और ख़ूब सजाओ। मगर सुबह न होने पाए कि महल तैयार हो जाए। नहीं तो तुम्हारी ख़ैर नहीं।" इन लोगों ने तो खाना-पीना शुरू किया और उधर जिन्न ने अपने भाई-बंधुओं को इकट्ठा किया और महल बनाने लगा।
कुछ देर बाद जिन्न ने आकर बताया कि हुज़ूर, महल तैयार हो गया है। चल कर देख लीजिए। उस वक़्त यूसुफ अपनी माँ और भाइयों के साथ महल देखने गया। सब तारीफ़ करने लगे। महल बेमिसाल था। यूसुफ ने माँ से पूछा, "अम्मा जान, इसमें रहना पसंद करेंगी?" माँ ने जवाब दिया, "बेटे, इस महल में रहना कौन पसंद नहीं करेगा?"
इस पर यूसुफ ने जिन्न को हुक्म दिया, "40 ख़्वाजा सरा, 40 ख़ादिम और 40 ग़ुलाम हबशी ले आओ।" वो फ़ौरन ईरान, हिंदुस्तान और सिंध से सारी चीज़ें ले आए। फिर वही जिन्न यूसुफ के हुक्म से बढ़िया-बढ़िया कपड़े लाया। यह कपड़े पहनकर यूसुफ बादशाह मालूम होता था और उसके दोनों भाई सल्तनत के वज़ीर दिखाई देते थे। महल के एक हिस्से में सलीम, एक में कलीम और एक में यूसुफ और उसकी माँ रहते थे। शहज़ादों जैसी शानदार ज़िंदगी गुज़ारते थे।
अब बादशाह की सुनिए। एक दिन उसने ख़ज़ांची से कहा कि ख़ज़ाने में से फ़लाँ-फ़लाँ जवाहरात निकालो। ख़ज़ांची ने ख़ज़ाना देखा तो ज़ोर से चीख़ मारी और बेहोश हो गया। जब होश आया तो बादशाह के पास हाज़िर हुआ और अर्ज़ की कि हुज़ूर, ग़ज़ब हो गया। हुज़ूर का ख़ज़ाना रातोंरात ख़ाली हो गया। एक मोती, एक सोने का सिक्का तक नहीं रहा।
बादशाह ने पूछा, "हमारे ख़ज़ाने को कौन ले गया? और यह कैसे हुआ? दरवाज़े सब के सब बंद थे। कल ख़ज़ाना मैंने ख़ुद देखा और आज ग़ायब। न कोई दरवाज़ा तोड़ा गया, न चोर आया, ख़ुदा जाने।" सोचा, शायद संदूक़ तो मौजूद है। फिर ख़ुद उठकर ख़ज़ाना देखा तो हाथ मलने लगा।
इतने में एक फ़ौजी अफ़सर ने आकर बताया, "हुज़ूर, कल रात को मैंने एक अजीब बात देखी। रातोंरात राजगीरों और मज़दूरों ने एक महल बनाया और अब इस महल में आपके दो क़ैदी सलीम और कलीम बादशाहों की तरह रहते हैं।" बादशाह ने कहा, "बस, मैं समझ गया। सलीम और कलीम का भाई जो बड़ा शातिर जादूगर है, यह सब उसी की करतूत है। वही इन बातों की जड़ है। किसी अफ़सर को भेजकर अभी पकड़वा कर हाज़िर करो।"
वज़ीर ने कहा, "हुज़ूर, जल्दबाज़ी न फ़रमाइए। जब वह एक रात में महल खड़ा कर सकता है तो एक अफ़सर को क्या समझता है? और अगर उससे बदला लेना चाहते हैं तो मैं उसकी दावत करता हूँ। उससे मेरा और उसका दोस्ताना बढ़ेगा। दोस्ती के बाद ऐसा मज़ा चखाऊँगा कि बस याद ही तो करेगा। एक बार तो आपके क़दमों में डाल दूँगा। आगे आपकी मर्ज़ी।"
तब अमीर उस्मान को बुलाकर हुक्म दिया कि यूसुफ के पास जाओ और उससे कहो कि तुम्हें बादशाह सलामत ने याद फ़रमाया है और इस वक़्त बुलाया है। अब सुनिए कि अमीर उस्मान बड़ा घमंडी और मकरूर था। यूसुफ के महल के फाटक पर एक कुर्सी पर बैठा था। अमीर को जो देखा तो कुर्सी पर ही बैठा रहा। अपनी जगह से नहीं हिला। 50 आदमी अमीर के साथ थे।
अमीर ने पूछा, "ए ग़ुलाम, तेरा मालिक कहाँ है?" उसने जवाब दिया, "अब भी अंदर है। महल में मौजूद है।" इस पर अमीर को और भी गुस्सा आया। वो बहुत चिल्लाया। तलवार खींच कर क़त्ल करना ही चाहता था कि वो ख़्वाजा सरा जो असल में जिन्न था, झपटा और चार घूँसे ज़ोर से मारे कि अमीर का दम निकल गया। इस तरह ज़मीन पर पटका कि हड्डी-पसली एक हो गई।
कुछ देखने वाले भागकर जान बचाई और वापस जाकर बादशाह को सारी कहानी सुनाई। बादशाह को गुस्सा आया। उसने 100 सिपाहियों को हुक्म दिया कि यूसुफ के महल की तरफ़ चलें। जब ख़्वाजा सरा के सामने आए तो वह समझ गया कि मेरी पिटाई को आए हैं। यह सोच कर उठा और सबको वो मार दी कि छठी का दूध याद आ गया।
एक जो इस लड़ाई में भाग गया था, उसने बादशाह को जाकर सारा हाल सुनाया। अब बादशाह ने 200 फ़ौजी भेजे कि ख़्वाजा सरा को ज़िंदा गिरफ़्तार करके लाओ। 200 फ़ौजी हथियार लगाकर ख़्वाजा सरा के मुक़ाबले को चले। जब वहाँ पहुँचे तो देखा कि एक कमज़ोर सा ख़्वाजा सरा दरवाज़े पर बैठा पहरा दे रहा है। उन्हें यक़ीन आया कि इतना कमज़ोर इंसान और 100 से ज़्यादा सिपाहियों को पीछे धकेल दे, नामुमकिन है।
वो बिना डरे आगे बढ़े और एक अफ़सर ने उससे कहा, "बेहतर इसी में है कि अपने आप को हमारे हवाले कर दो। नहीं तो हमारी तलवारें तुम्हारे जिस्म के ऊपर ख़र्च कर देंगी।" जिन्न ने उनकी यह बातचीत सुनी तो आग बबूला हो गया और गुस्से में बिखर कर यूँ झपटा जैसे शेर अपने शिकार पर झपटता है। पलक झपकने में बहुत से सिपाही ढेर हो गए। कुछ भागकर जान बचाने में कामयाब हो गए।
बादशाह ने जब यह सुना तो और भी हैरान हुआ। उसी वक़्त वज़ीर-ए-आम को हुक्म दिया कि अभी 500 तजुर्बेकार सिपाहियों को लेकर जाओ और इस गुस्ताख़ को पकड़ लो। इस पर वज़ीर ने कहा, "हुज़ूर, आपका हुक्म सर आँखों पर, लेकिन मेरी सलाह पर और ग़ौर फ़रमा लीजिए। फिर जो जी चाहे हुक्म दीजिए। ग़ुलाम की सलाह यह है कि यूसुफ इस तरह क़ाबू में न आएगा। मैं अकेला जाता हूँ और सुलह करके उसे यहाँ लेकर आता हूँ।"
बादशाह इस सलाह से मुत्तफ़िक़ हुआ और वज़ीर को यूसुफ के पास भेजा। वज़ीर महल के दरवाज़े पर पहुँचा तो ख़्वाजा सरा पहरे पर बैठा था। वज़ीर चुपके से उसके क़रीब जा बैठा और बड़े ही नरम लहजे में पूछा, "क्यों हज़रत, आपके मालिक इस वक़्त कहाँ हैं?" उसने जवाब दिया, "मेरे मालिक महल में मौजूद हैं। फ़रमाइए क्या हुक्म है?"
तब वज़ीर बोला, "उनसे कहिए कि बादशाह सलामत ने आपकी दावत की है और आपको याद फ़रमा रहे हैं।" जिन्न ने कहा, "आप यहीं ठहरिए। मैं अभी आता हूँ।" यह कहकर वह अंदर गया और अपने मालिक यूसुफ से अमीर के आने और 50 से 200 आदमियों के हारने का हाल सुनाया। फिर कहा कि अब बादशाह का वज़ीर आया है। उसने आपको बुलवाया है।
यूसुफ ने हुक्म दिया, "वज़ीर को बुलाना और तुम भी उसके साथ हो।" वज़ीर अंदर जाकर देखा तो हैरान रह गया। ऐसी शानो-शौकत तो उसके बादशाह की भी न थी। यूसुफ ने वज़ीर को अच्छे कपड़े तोहफ़े में दिए और ख़ूब इनाम-ओ-इकराम देकर रुख़सत किया।
वापस आकर वज़ीर सीधा बादशाह के दरबार में पहुँचा और सारा हाल सुनाया। बादशाह ने वज़ीर के कपड़े देखे तो हैरान रह गया। वज़ीर की बातों और इतनी क़ीमती चीज़ों ने बादशाह के इश्तियाक़ को और बढ़ाया। वो अपना पूरा लश्कर लेकर यूसुफ की गिरफ़्तारी को चला।
उधर यूसुफ ने जो सुना कि बादशाह लश्कर समेत चलता है तो उसने फ़ौरन जादू की अंगूठी रगड़ी और जिन्न हाज़िर हुआ तो उसको हुक्म दिया कि 500 ताक़तवर जिन्न इंसानों के रूप में कपड़े पहनकर महल के बाहर खड़े हो जाएँ ताकि बादशाह देखते ही डर जाए और मुक़ाबले का ख़्याल दिल में न लाए।
बादशाह यूसुफ के महल के सामने पहुँचा तो पहरे पर खड़े लंबे-चौड़े सिपाहियों को देखकर क़दम रुक गए। उसने अपने सिपाहियों को पीछे ही खड़ा किया। ख़ुद वज़ीर के साथ यूसुफ के सामने आया और झुक कर सलाम किया। यूसुफ ने बैठे-बैठे उसके सलाम का जवाब दिया।
बादशाह समझ गया कि अपने भाइयों का बदला लेगा, हरगिज़ नहीं छोड़ेगा। इतने में यूसुफ ने कहा, "ऐ बादशाह, ग़रीब रहकर माल छीनना और फिर उन्हें क़ैद में डाल देना कहाँ का इंसाफ़ है? मेरे ख़्याल में तो यह बादशाह की शान के ख़िलाफ़ है।"
बादशाह ने जवाब दिया, "हुज़ूर, लालच ने मुझे अंधा कर दिया था।" और साथ यह भी कह दिया कि बदला लेने के बजाय माफ़ कर देना बेहतर है। इस पर यूसुफ ने कहा, "अल्लाह आप पर रहम करे। हमने आपको माफ़ किया। अब आप तशरीफ़ रखिए और हमारे साथ बैठकर खाना खाइए।"
खाना खाने के बाद यूसुफ ने बादशाह को भी बहुत क़ीमती तोहफ़े दिए और अनोखे हीरों की एक माला भी तोहफ़े में दी। अब तो बादशाह हर रोज़ यूसुफ के यहाँ आने लगा। वही हर तरह का हुक्म सुनता और मुल्क के काम निपटाता। इस यूसुफ और बादशाह की मोहब्बत दिन-ब-दिन बढ़ने लगी।
एक दिन बादशाह ने अकेले में वज़ीर से कहा, "मुझे डर है कि यूसुफ मेरा तख़्त छीन कर मुझे क़त्ल कर डाले।" वज़ीर ने कहा, "आप तो यूँ ही ख़ौफ़ खाते हैं। यूसुफ को क्या पड़ी है कि आपका तख़्त छीने। वो तो आपसे ज़्यादा दौलत, जायदाद और शानो-शौकत का मालिक है। लिहाज़ा आपका तख़्त छीनकर वो क्या करेगा? और अगर आप ज़्यादा ही डरते हैं तो यूँ कीजिए कि शहज़ादी की शादी यूसुफ से कर दीजिए। इस तरह साँप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी।"
बादशाह को यह सलाह बहुत पसंद आई। दूसरे दिन यूसुफ को अकेले में बुलाया और कहने लगा, "यूसुफ बेटा, मेरी उम्र काफ़ी हो चुकी है। ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं। पता नहीं कब बेवफ़ाई कर जाए। चाहता हूँ कि मरने से पहले तख़्त और अपनी बेटी की शादी का मसला हल कर जाऊँ। तो मेरी गुज़ारिश है कि तुम मेरी बेटी से शादी कर लो और मेरा तख़्त भी सँभाल लो। मैं बची हुई ज़िंदगी अल्लाह की याद में गुज़ारना चाहता हूँ।"
यूसुफ ने कहा, "बादशाह सलामत, मुझे क्या ऐतराज़ हो सकता है। ग़ुलाम को आपका फ़रमान दिल और जान से क़बूल है।" यूसुफ इतना ख़ुश हुआ कि ख़ुशी से फूले न समाया। बादशाह ने धूमधाम से अपनी इकलौती बेटी की शादी यूसुफ से की। तख़्त यूसुफ के हवाले कर दिया और ख़ुद तन्हाई में बैठकर अल्लाह का नाम जपने लगा।
यूसुफ जब बादशाह बना तो दोनों भाइयों को अपना वज़ीर मुक़र्रर किया और निहायत रहमदिली से और इंसाफ़ से हुकूमत करने लगा।
कुछ दिन बाद सलीम ने कलीम से कहा, "अब यह बताओ कि यूसुफ की ग़ुलामी कब तक करेंगे और कब तक उसकी ख़ुशामद करते रहेंगे? जब तक वह ज़िंदा है, हम दोनों ग़ुलामी में पड़े रहेंगे। हाँ, उसके मरने के बाद यक़ीनन आराम करेंगे।" कलीम ने कहा, "भाई, तुम मुझसे ज़्यादा अक़लमंद और तजुर्बेकार हो। कोई तरकीब निकालो और इसे मार डालो।"
सलीम ने कहा, "अगर मैं किसी तरकीब से इसको मार डालूँ और दिलो-दिमाग़ से कोई आसान तरकीब निकालूँ तो मेरी बादशाहत में वज़ीर का ओहदा क़बूल करोगे या नहीं?" कलीम ने जवाब दिया, "आपकी बादशाहत में वज़ीर का ओहदा मेरी ख़ुशनसीबी की निशानी है। मैं तह दिल से आपकी ग़ुलामी क़बूल करूँगा। बस आप यूसुफ को रास्ते से हटा दें।"
लालच ने कलीम की आँखों को ढक दिया। भाई की मोहब्बत का ज़रा भी ख़्याल न किया। जान लेने पर आमादा और तैयार हो गया। सलीम से कहा, "यूसुफ को शिकार के बहाने जंगल में ले चलते हैं। वहाँ मौक़ा पाकर काम तमाम कर डालेंगे।"
अगले दिन दोनों भाई शिकार के बहाने यूसुफ को साथ ले गए। यूसुफ ने सब अमीरों और वज़ीरों से कह दिया था कि वो उसके साथ न जाएँगे। वो अपने भाइयों के साथ सैर करेगा। जंगल में पहुँचे तो एक जगह मौक़ा पाकर सलीम ने यूसुफ पर तलवार का वार किया और वह घोड़े से नीचे गिर गया।
अब यह दोनों भाई वापस आए और मशहूर कर दिया कि यूसुफ को खूँख़ार शेर ने अपना शिकार बना लिया। आते वक़्त सलीम ने यूसुफ की उँगली से जादू की अंगूठी भी उतार ली। यूसुफ की बीवी ने जब यह सुना तो मारे ग़म के बेहोश हो गई। उसने जिन्न को हुक्म दिया कि मेरे भाई कलीम को मार डालो। जिन्न ने हुक्म की तामील की।
सलीम उससे छुटकारा पाने के बाद बहुत ख़ुश हुआ कि अब इस लंबी-चौड़ी बादशाहत का मालिक वो होगा। लाखों लोग उसे झुक कर सलाम करेंगे। लेकिन मौत ने उसे यह दिन देखना नसीब न होने दिया। यूसुफ की बीवी ने शरबत में ज़हर मिला दिया और सलीम को पिला दिया। सलीम ने यह शरबत पीते ही एड़ियाँ रगड़-रगड़ कर हमेशा की नींद सो गया।
अब सुनिए कि यूसुफ ज़ख़्मी हो गया था। ख़ून बेतहाशा बह रहा था। इतने में एक तजुर्बेकार हकीम जड़ी-बूटियाँ तलाश करता उधर से निकला। उसने यूसुफ को ज़मीन पर गिरा देखा तो चोट से ख़ून अभी जारी था। फ़ौरन थैली से एक सफ़ूफ़ निकालकर ज़ख़्म पर लगाया। ख़ून बहना बंद हो गया।
फिर एक दवा पिलाई। यूसुफ ने आँखें खोल दीं। हकीम के पूछने पर उसने बताया कि वह इस मुल्क का बादशाह है। हकीम यह सुनकर बहुत ख़ुश हुआ और उसको बजाय महल में ले जाने के अपने घर ले गया। वहाँ इलाज किया। अच्छा खिलाया-पिलाया और कुछ दिन बाद जब वह बिल्कुल सेहतमंद हो गया तो हकीम यूसुफ के साथ अपने मुल्क में वापस आया।
यहाँ पहुँचकर बीवी ने सारा हाल सुनाया। सुनकर दिल को बहुत दुख हुआ कि लालच ने उसके भाइयों को मौत के मुँह में पहुँचा दिया। उसने हकीम को वज़ीर बनाया और फिर नए सिरे से अद्ल और इंसाफ़ से बादशाहत करने लगा।