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Pakistan Stock Exchange - Full 5 Hours Course

Get Rich 1014:31:30

Transcription

दोस्तों, मैं आपके लिए स्टॉक मार्केट में पूरी सीरीज लेकर आया हूँ जिसकी आज फर्स्ट एपिसोड है। इस सीरीज में आपको बिल्कुल शुरू से लेकर आखिर तक स्टॉक मार्केट के बारे में तमाम इनफॉर्मेशन दूँगा। स्टॉक मार्केट क्या है, यह कैसे काम करती है, इसमें कैसे इन्वेस्ट कर सकते हैं और इससे पैसे कैसे कमा सकते हैं, जैसे स्कूल में जाकर हम एबीसी से सीखते हैं, बिल्कुल इसी तरह मैं आपको सब कुछ बिल्कुल स्टार्ट से समझाऊँगा।

और सीरीज स्टार्ट करने से पहले आपको एक बात बताना चाहूँगा कि स्टॉक मार्केट कोई रॉकेट साइंस नहीं है और आपको बहुत ज़्यादा दिमाग लगाने की भी ज़रूरत नहीं है। यह मैं नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे अमीर इन्वेस्टर वॉरेन बफेट कहते हैं। [संगीत] [संगीत]

तो चलिए इस सीरीज की फर्स्ट एपिसोड स्टार्ट करते हैं। तो सबसे पहली बात, स्टॉक मार्केट क्या है? स्टॉक मार्केट को समझने के लिए मैं आपको बहुत सिंपल सी मिसाल देता हूँ। फ़र्ज़ करें एक लड़का है असीम, उसका लिमो बनाने का स्टॉल है और वो इस स्टॉल से बहुत प्रॉफिट बना रहा है। लेकिन अब वो अपना बिज़नेस बड़ा करने का सोच रहा है, यानी वो अपना बिज़नेस एक्सपेंड करना चाहता है। लेकिन उसके पास बिज़नेस बड़ा करने के लिए पैसे नहीं हैं। तो अब वो फैसला करता है कि वो अपनी कंपनी को पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर पब्लिकली लिस्ट करेगा, जिसको आईपीओ यानी इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग कहते हैं। जिसका मतलब यह है कि नॉर्मल लोग, जैसे आप और मैं, हम असीम को एक सर्टेन अमाउंट पे करेंगे, मिसाल के तौर पर ₹10 पे करेंगे और उसके बिज़नेस का कुछ हिस्सा, शेयर की सूरत में, उससे खरीदकर उसकी कंपनी में हिस्सेदारी यानी शेयरहोल्डर्स बन जाएँगे। जिसका मतलब यह होगा कि यह कंपनी अब उसकी नहीं रही, बल्कि उसी कंपनी में हम भी हिस्सेदार बन गए हैं।

तो असीम हमारे पैसों से क्या करेगा? असीम हमारे पैसे इस्तेमाल करेगा बिज़नेस को और बड़ा करने के लिए और बिज़नेस में नई इनोवेशन्स लाने के लिए, मिसाल के तौर पर नए ड्रिंक्स वगैरह। और हमें शेयर खरीदने का क्या फ़ायदा होगा? शेयर खरीदने के बेसिकली दो फ़ायदे होते हैं। नंबर वन: कैपिटल गेन। किसे कहते हैं कैपिटल गेन? कैपिटल गेन का मतलब है प्रॉफ़िट फ्रॉम द सेल ऑफ़ एन इन्वेस्टमेंट। मतलब कि जैसे आपने असीम के बिज़नेस का ₹10 का एक शेयर खरीदा था, फ़्यूचर में जब असीम का बिज़नेस अच्छा परफ़ॉर्म करेगा और ज़्यादा लोगों को बिज़नेस का पता चलेगा, तो असीम के बिज़नेस की डिमांड बढ़ेगी और जो शेयर आपने ₹10 का खरीदा था, वो शेयर ₹20 का हो जाएगा। तो आपके ओरिजिनल शेयर की वैल्यू जो ₹10 से ₹20 हुई है, इस ₹10 की डिफ़रेंस को कैपिटल गेन कहते हैं। और डिविडेंड किसे कहते हैं? डिविडेंड का मतलब है कंपनी शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड देती है। बहुत सी कंपनियाँ, जैसे कि गूगल, फ़ेसबुक और अमेज़न वगैरह, अपने शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड नहीं देते। क्यों? वो इसलिए क्योंकि कंपनी कहती है कि हम प्रॉफ़िट को बिज़नेस में री-इन्वेस्ट करके अपने शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड के निस्बत ज़्यादा फ़ायदा पहुँचा सकते हैं। वो कैसे? वो ऐसे कि हम साल के तौर पर फ़र्ज़ करेंगे गूगल का एक शेयर ₹100 का है, तो गूगल उसे ₹100 के शेयर पे ₹5 डिविडेंड अनाउंस करता है। तो इस तरह आपको ₹100 पर ₹5 का फ़ायदा हुआ। लेकिन अगर गूगल अपने शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड नहीं देता और सारे प्रॉफ़िट को बिज़नेस में ही वापस री-इन्वेस्ट कर देता है, तो इसके नतीजे में गूगल ज़्यादा अच्छा परफ़ॉर्म करेगा, जिसके नतीजे में गूगल की शेयर प्राइस ऊपर जाएगी और जो शेयर आपने ₹100 का लिया था, वो ₹110 का हो जाएगा। तो इस तरह जहाँ आपको ₹5 का फ़ायदा हो रहा था, इस तरह आपको ₹100 पर ₹10 का फ़ायदा होगा।

नंबर टू: स्टॉक मार्केट में कितना रिस्क है? यह सवाल बहुत ज़्यादा पूछा जाता है, इसलिए वीडियो के इस पार्ट को ध्यान से समझिएगा। यह आपके सामने के-100 इंडेक्स का चार्ट है कि पाकिस्तान स्टॉक मार्केट ने 1995 से 2021 तक कैसा परफ़ॉर्म किया है। और अगर आप लॉन्ग टर्म देखें, तो टाइम के साथ-साथ स्टॉक मार्केट ऊपर गई है। 1995 में के-100 इंडेक्स 2000 पॉइंट्स के आसपास था और आज 46000 पॉइंट को टच कर रहा है। तो लॉन्ग टर्म स्टॉक मार्केट हमेशा प्रॉफ़िट ही देती है। वॉरेन बफ़ेट से पूछते हैं कि उनका क्या कहना है स्टॉक मार्केट के रिस्क के बारे में? स्टॉक मार्केट बिज़नेस स्टॉक मार्केट का हिस्सा समझ के नहीं, बल्कि बिज़नेस का हिस्सा समझ के खरीदें और जब आप अच्छे बिज़नेस खरीदेंगे, तो प्रॉफ़िट अपने आप ही हो जाएगा। यहाँ आता है दूसरा पॉइंट कि लोग कहते हैं स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करने के लिए बहुत ज़्यादा नॉलेज चाहिए, लेकिन यह भी बहुत बड़ा मिथ है। पीटर लिंच, जो बहुत मशहूर अमेरिकन इन्वेस्टर हैं, वो कहते हैं इसका मतलब है कि अगर आपको सिंपल अरिथमेटिक आती है, तो आप स्टॉक मार्केट को आसानी से समझ के उसमें इन्वेस्ट कर सकते हैं। एक और बहुत बड़ा मिथ है कि स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करने के लिए बहुत सारे पैसे चाहिए। गलत! आप सिर्फ़ ₹5000 से स्टॉक मार्केट में इन्वेस्टमेंट शुरू कर सकते हैं।

तो अगली बात कि स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट कैसे करें? स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करना काफ़ी आसान है। स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करने के लिए आपको एक ट्रेडिंग अकाउंट की ज़रूरत है और एक डीसी सब अकाउंट की। ट्रेडिंग अकाउंट वो अकाउंट होता है जो आपका ब्रोकर के पास खुलता है, जो आपको डायरेक्टली पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज से कनेक्ट करता है, जिसकी मदद से आप शेयर्स खरीद और बेच सकते हैं। और डीसी सब अकाउंट ज़रूरत क्यों है? यह हम अभी थोड़ी देर में देखते हैं। पहले यह जानते हैं कि ब्रोकर के साथ अकाउंट कैसे खुलवा सकते हैं? इसका प्रोसीजर भी काफ़ी आसान है। अब जिस स्टॉक ब्रोकर के साथ अकाउंट खुलवाना चाहते हैं, आप उनके ऑफ़िस जाएँ। वो आपसे कुछ बेसिक सी इनफ़ॉर्मेशन लेंगे, जैसे आपका नाम, पता, बैंक अकाउंट नंबर, आपकी सोर्स ऑफ़ इनकम और जितनी अमाउंट आपने इन्वेस्ट करनी है, उस अमाउंट का क्रॉस चेक लेंगे और कुछ दिनों में आपका अकाउंट खुल जाएगा। तो पाकिस्तान में कौन-कौन से स्टॉक ब्रोकर हैं? पाकिस्तान में बहुत से स्टॉक ब्रोकर्स हैं, जैसे कि अकड़ सिक्योरिटीज़, आईजीआईसी, बाम कैपिटल और आरिफ़ लिमिटेड वगैरह हैं।

तो अगली बात, डीसी क्या है और इसकी ज़रूरत क्यों है? डीसी एक डिपॉजिटरी कंपनी है। यह नाम सुनकर ही अंदाज़ा हो जाता है कि यह ऐसी कंपनी है जिसमें कुछ चीज़ डिपॉजिट की जाती है। तो डीसी में क्या डिपॉजिट किया जाता है? डीसी में सिक्योरिटीज़, यानी कंपनी के शेयर्स डिपॉजिट किए जाते हैं और कौन शेयर सेल कर रहा है, कौन परचेज़ कर रहा है, इसका सारा रिकॉर्ड रखा जाता है। मिसाल के तौर पे आपने किसी कंपनी के शेयर्स खरीदे हैं, तो प्रीवियस इन्वेस्टर से चेंज होकर वो शेयर आपके नाम पर करने वाली कंपनी डीसी होगी। इस तरह पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में होने वाली तमाम ट्रेडिंग का रिकॉर्ड डीसी रखती है। तो इसकी ज़रूरत क्यों है? इसकी ज़रूरत इसलिए है कि पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर इतने ज़्यादा शेयर्स डेली ट्रेड होते हैं कि उन तमाम शेयर्स को अपने पास स्टोर करना पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज के लिए नामुमकिन है। और दूसरा, लोगों को उन पर ट्रस्ट भी इतना ख़ास नहीं है। इसलिए इस सब मसाले के सॉल्यूशन के लिए सीडी, यानी सेंट्रल डिपॉजिटरी कंपनी बनाई गई, एक ऐसी कंपनी जिस पर स्टॉक एक्सचेंज को भी भरोसा हो, ब्रोकर को भी और इन्वेस्टर को भी। और डीसी सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान यानी SECP और गवर्नमेंट ऑफ़ पाकिस्तान दोनों से अप्रूव्ड है।

अच्छा, जरा ध्यान से सुनिएगा। अगर आप डेली ट्रेड करना चाहते हैं, यानी शेयर्स डेली सेल और परचेज़ करना चाहते हैं, तब तो डीसी सब अकाउंट ठीक है। लेकिन अगर आप शेयर्स को लंबे अर्से के लिए होल्ड करना चाहते हैं, यानी कई सालों के लिए होल्ड करना चाहते हैं, तब मैं आपको मशवरा दूँगा कि आप डीसी इन्वेस्टर अकाउंट भी ज़रूर खुलवाएँ। अब ये डीसी इन्वेस्टर अकाउंट क्या है? डीसी इन्वेस्टर अकाउंट वो अकाउंट होता है जिसमें आपके शेयर्स का फ़ुल कंट्रोल सिर्फ़ आपके पास होता है। इसलिए लॉन्ग टर्म के लिए अगर आप होल्ड करना चाहते हैं, तो डीसी इन्वेस्टर अकाउंट ज़रूर खुलवाएँ। कभी-कभी ऐसा होता है कि जिस ब्रोकर के साथ आपने अकाउंट खुलवाया होता है, वो ब्रोकर अपने क्लाइंट्स के सारे शेयर्स बेचकर फ़्रॉड करके भाग जाता है। वैसे ऐसा बहुत कम होता है, लेकिन फिर भी इस चीज़ की पॉसिबिलिटी होती है। लेकिन अगर आपके शेयर्स डीसी इन्वेस्टर अकाउंट में पड़े होंगे, तब आपके शेयर्स आपके अलावा कोई और बेच नहीं सकता और फ़्रॉड के ज़ीरो परसेंट चांसेस हो जाएँगे। इसलिए एक तो हमेशा किसी बहुत अच्छे ब्रोकर के साथ अकाउंट खुलवाएँ और दूसरा, अगर आप शेयर्स होल्ड करना चाहते हैं, तो डीसी इन्वेस्टर अकाउंट में खुलवाएँ और अपने शेयर डीसी सब अकाउंट से डीसी इन्वेस्टर अकाउंट में ट्रांसफ़र कर दें।

तो आज के लिए इतना ही। बाकी इनफ़ॉर्मेशन इंशाअल्लाह इससे अगली वीडियो में दूँगा। तो चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन पे लास्ट में क्लिक कीजिएगा ताकि आपको मेरी फ़्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफ़िकेशन मिल सके।

हेलो दोस्तों! पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज की बेसिक्स की दूसरी क्लास में आपका स्वागत है। दोस्तों, जैसे मैंने आपको बताया, मैं एबीसी की तरह, बिल्कुल शुरू से आपको स्टॉक मार्केट के बारे में सब समझा रहा हूँ। इसलिए जो चीज़ मैं आपको बता रहा हूँ, इन चीज़ों को ध्यान से समझिएगा और वीडियो को स्किप मत कीजिएगा। आखिर तक ज़रूर देखिएगा क्योंकि इन्हीं चीज़ों से आपकी बेस बनेगी और यही चीज़ आगे आने वाली क्लासेस में भी और इन्वेस्टिंग के टाइम भी आपके काम आएंगी। इसलिए वीडियो को ध्यान से समझिएगा और अगर कोई चीज़ समझ नहीं आती तो नीचे कमेंट सेक्शन में मुझसे पूछ लीजिएगा।

तो सबसे पहले मैं आपको बताऊँगा कि बैंक से मिलने वाले इंटरेस्ट और स्टॉक मार्केट से मिलने वाली डिविडेंड में फ़र्क क्या होता है। फिर मैं आपको बताऊँगा कि प्रमोटर किसे कहते हैं और फ़ेस वैल्यू, बुक वैल्यू और मार्केट वैल्यू किसे कहते हैं। ये चीज़ आगे जाकर आपके बहुत काम आने वाली है। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। तो दोस्तों, जैसे हम बैंक में पैसे रखते हैं तो हमें इंटरेस्ट मिलता है, वैसे ही जब हम किसी कंपनी की शेयर्स खरीदते हैं तो कंपनी हमें डिविडेंड देती है। यानी उसे कंपनी को एक फ़ाइनेंशियल ईयर के बाद जो प्रॉफ़िट होता है, उस प्रॉफ़िट का कुछ हिस्सा वो अपने शेयरहोल्डर्स को देती है, जो डिविडेंड कहलाता है। डिविडेंड की ऑफ़िशियल डेफ़िनेशन है: अ सम ऑफ़ मनी पेड रेगुलरली बाय अ कंपनी टू इट्स शेयरहोल्डर्स आउट ऑफ़ इट्स प्रॉफ़िट। हर कंपनी की मीटिंग होती है जिसमें डिसाइड किया जाता है कि शेयरहोल्डर्स को कितना डिविडेंड देना है।

तो अब जान लेते हैं कि डिविडेंड में और जो बैंक में इंटरेस्ट पर मिलता है, इन दोनों में क्या फ़र्क है। फ़र्ज़ करें जून 2021 में आपने किसी बैंक में 3 साल के लिए फ़िक्स्ड डिपॉजिट करवाया और बैंक आपको कहता है कि वो 6% के हिसाब से आपको हर साल प्रॉफ़िट देगा। तो जब आपने एक दफ़ा फ़िक्स्ड डिपॉजिट करवा दिया, तो अब बैंक अपने रेट्स को आपके लिए चेंज नहीं कर सकता। उसको 6% के हिसाब से ही आपको तीन साल तक प्रॉफ़िट देना पड़ेगा जब तक आपका फ़िक्स्ड डिपॉजिट मैच्योर नहीं हो जाता। लेकिन अगर आपके फ़िक्स्ड डिपॉजिट करवा देने के बाद बैंक अपने प्रॉफ़िट रेट्स को रिवाइज़ कर देता है और अनाउंस करता है कि आज से 2 महीने बाद, अगस्त से, जो लोग फ़िक्स्ड डिपॉजिट करवाएँगे, उनको 6% के बजाय 5% के हिसाब से इंटरेस्ट दिया जाएगा, तो आपके फ़िक्स्ड डिपॉजिट पे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि बैंक ने आपसे ऑलरेडी तीन साल के लिए 6% के हिसाब से एग्रीमेंट कर लिया है। लेकिन जो नए आने वाले इन्वेस्टर्स होंगे, उनको 5% के हिसाब से ही प्रॉफ़िट दिया जाएगा। तो बेसिकली कहने का मतलब ये है कि जिस रेट पर जितने अर्से के लिए फ़िक्स्ड डिपॉजिट करवा दिया जाए, बैंक उसे रेट को डिपॉजिटर के लिए चेंज नहीं कर सकता। और एक और बात कि जब हम बैंक में पैसे रखते हैं, नॉर्मल सेविंग्स अकाउंट में, तो बैंक उसे पर भी 5 से 6% देता है और यह प्रॉफ़िट देना बैंक की मजबूरी है क्योंकि स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के रूल्स के तहत बैंक को हर सूरत कुछ ना कुछ प्रॉफ़िट ज़रूर देना है अकाउंट होल्डर को। लेकिन ऑन द अदर हैंड, स्टॉक एक्सचेंज पर जो कंपनी लिस्टेड होती हैं, उनके लिए कोई स्पेसिफ़िक डिविडेंड की अमाउंट देना ज़रूरी नहीं है। जैसे कि टोयोटा का शेयर तक़रीबन ₹1300 के आसपास है और 2019 में टोयोटा ₹1200 के शेयर पे ₹119 डिविडेंड दे रहा था, लेकिन 2020 में कोरोनावायरस की वजह से यू-टर्न है, सिर्फ़ ₹30 डिविडेंड दिया। तो कंपनी के लिए डिविडेंड की स्पेसिफ़िक अमाउंट देना ज़रूरी नहीं है और कंपनी के लिए डिविडेंड देना भी ज़रूरी नहीं है। कंपनी बहुत ज़्यादा प्रॉफ़िट में जा रही होती है, लेकिन फिर भी डिविडेंड नहीं देती, जैसे कि पाकिस्तान इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल और फ़ौजी फ़ूड्स वगैरह। वो क्यों? इस सवाल का जवाब मैंने इससे पिछली क्लास में दे दिया है, जिसको आप टॉप राइट हैंड पर क्लिक करके देख सकते हैं।

तो अगली बात कि बैंक के इंटरेस्ट और स्टॉक मार्केट के डिविडेंड पर कितना टैक्स लगता है? बैंक्स के इंटरेस्ट पर जो टैक्स लगता है, वो होल्डिंग टैक्स कहलाता है और वो फ़ाइलर्स के लिए 10 और 20% और नॉन-फ़ाइलर्स के लिए 15 और 30% है। आपने किसी बैंक में 1 साल के लिए फ़िक्स्ड डिपॉजिट करवाया, तो अगर आपको प्रॉफ़िट ₹500,000 तक मिल रहा है, तब फ़ाइलर्स के लिए टैक्स 10% है और नॉन-फ़ाइलर्स के लिए 20%। लेकिन अगर आपका प्रॉफ़िट ₹500,000 से एक्सीड कर जाता है, तब फ़ाइलर्स के लिए टैक्स 15% है और नॉन-फ़ाइलर्स के लिए 30%। आप बेशक एक साल के लिए फ़िक्स्ड डिपॉजिट करवाएँ या 5 साल के लिए, टैक्स का यही रेट है। लेकिन अगर आप स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करते हैं, तो चीज़ जरा मुख़्तलिफ़ है। स्टॉक मार्केट में आप दो तरह से पैसे कमाते हैं, एक कैपिटल गेन के थ्रू और एक डिविडेंड के थ्रू। स्टॉक मार्केट में दो तरह के टैक्स हैं, एक कैपिटल गेन टैक्स और एक होल्डिंग टैक्स। अगर आप फ़ाइलर हैं, तो आपको टैक्स 15% कटेगा, लेकिन अगर आप नॉन-फ़ाइलर हैं, 30% कटेगा। मिसाल के तौर पर आपने किसी कंपनी का शेयर ₹200 का खरीदा और एक महीने बाद ₹210 का सेल कर दिया, तो ₹200 आपका कैपिटल था और ₹10 उस पर गेन, तो उस ₹10 पर टैक्स कटेगा, फ़ाइलर का ₹1.5 और नॉन-फ़ाइलर का ₹3। लेकिन अगर आप किसी कंपनी का शेयर चार साल तक होल्ड करके रखते हैं और 4 साल के बाद सेल करते हैं, तब आपका कोई कैपिटल गेन टैक्स नहीं कटेगा और आप टैक्स एक्ज़ेम्प्ट हो जाएँगे। मसलन, आपका ₹200 का शेयर चार साल बाद ₹500 का हो गया है, तो जब आप अपना शेयर सेल करेंगे, तो आपको पूरा ₹500 मिलेगा और ₹1 भी टैक्स नहीं कटेगा। और डिविडेंड पे कितना टैक्स लगता है? डिविडेंड पर भी फ़ाइलर्स के लिए 15% और नॉन-फ़ाइलर्स के लिए 30% टैक्स रेट है। लेकिन यह टैक्स आप नहीं, बल्कि जिस कंपनी का शेयर आपने लिया हुआ है, वो कंपनी देगी। फ़र्ज़ करें कोई कंपनी है, वो ₹100 डिविडेंड अनाउंस करती है, तो अगर आप फ़ाइलर हैं, तो कंपनी आपको ₹85 दे देगी और बाकी के ₹15 आपके अकाउंट में क्रेडिट कर देगी। जैसे शेयर को चार साल से ज़्यादा होल्ड करके आप कैपिटल गेन टैक्स से बच सकते हैं, लेकिन डिविडेंड की सूरत में नहीं बच सकते। बैंक के इंटरेस्ट की तरह यह टैक्स भी आपको लाज़मी देना होगा।

तो नेक्स्ट बात कि प्रमोटर कौन होता है और फ़ेस वैल्यू, बुक वैल्यू और मार्केट वैल्यू में क्या फ़र्क है? दोस्तों, जब भी कोई आदमी बिज़नेस शुरू करता है, तो उसे बिज़नेस शुरू करने वाले इंसान को प्रमोटर कहते हैं। और लाज़मी नहीं है कि कंपनी का एक ही प्रमोटर हो, कंपनी के मल्टीपल प्रमोटर्स भी हो सकते हैं। मिसाल के तौर पे किसी कंपनी को पाँच लोगों ने मिलकर स्टार्ट किया है, तो वो पाँचों लोग उस कंपनी के प्रमोटर्स कहलाएँगे। अगली बात कि फ़ेस वैल्यू किसे कहते हैं? फ़र्ज़ करें जिन पाँच लोगों ने मिलकर बिज़नेस स्टार्ट किया है, उन पाँचों ने 10-10 लाख इन्वेस्ट किए हैं, तो इस इन्वेस्टमेंट का प्रूफ़ भी तो चाहिए। उनको प्रूफ़ के तौर पर उनको कंपनी के शेयर्स दिए जाएँगे। अब ये इन पाँचों पर डिपेंड करता है कि वो शेयर की कितनी वैल्यू रखना चाहते हैं। ज़्यादातर कंपनियाँ शेयर की वैल्यू ₹10 ही रखती हैं क्योंकि इससे हिसाब-किताब करना कंपनी के लिए आसान होता है। तो इस हिसाब से हर प्रमोटर के पास एक लाख शेयर्स होंगे और जो ₹10 एक शेयर की प्राइस डिसाइड की है, वो कंपनी की फ़ेस वैल्यू कहलाएगी। अब फ़र्ज़ करें इन पाँचों ने डिसाइड किया है कि हम आईपीओ लॉन्च करेंगे और कंपनी को पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर पब्लिकली लिस्ट करेंगे। तो आईपीओ लॉन्च करने के बाद भी कंपनी की फ़ेस वैल्यू ₹10 ही रहेगी और कंपनी हमेशा फ़ेस वैल्यू के ऊपर ही डिविडेंड अनाउंस करती हैं। जैसे कि टोयोटा इंडस मोटर्स का शेयर तक़रीबन ₹1240 के आसपास चल रहा है और रिसेंटली टोयोटा ने 300% इंटरिम डिविडेंड अनाउंस किया है। तो यह 300% करंट शेयर प्राइस जो कि 1240 है, उसका नहीं, बल्कि फ़ेस वैल्यू जो कि ₹10 है, उसका 300% है। इसलिए 300% डिविडेंड सिर्फ़ ₹30 बना है।

तो अगली बात, बुक वैल्यू किसे कहते हैं? टोटल एसेट्स माइनस इट्स टोटल लायबिलिटीज़। फ़र्ज़ करें एक हार्डवेयर शॉप है, उस शॉप के पास 10 लाख रुपए कैश है, 20 लाख उसने कहीं इन्वेस्ट किए हुए हैं, 40 लाख का वो प्लॉट है जहाँ वो शॉप है और 30 लाख रुपए शॉप में इक्विपमेंट्स पड़े हुए हैं। तो टोटल एसेट्स उस हार्डवेयर शॉप के पास एक करोड़ रुपए के हैं। और दूसरी तरफ़ उस कंपनी पे 40 लाख का कर्ज़ा है और 5 लाख रुपए उस शॉप के मंथली एक्सपेंसेस हैं, यानी एम्प्लॉयीज़ की सैलरी और बिल्स वगैरह। तो अगर एक करोड़ रुपए की कंपनी के सारे एसेट्स बेच दिए जाएँ और कंपनी का सारा कर्ज़ा जो कि 40 लाख है, वो अदा कर दिया जाए और सारे मंथली एक्सपेंसेस भी जो कि 5 लाख रुपए हैं, पे कर दिए जाएँ, तो एक करोड़ में से ये 45 लाख ख़र्च करके जो 55,000,000 बचेंगे, उससे कंपनी की बुक वैल्यू कहलाएगी। और नेक्स्ट है मार्केट वैल्यू। मार्केट वैल्यू कैलकुलेट करना बहुत आसान है। मार्केट वैल्यू कैलकुलेट की जाती है करंट मार्केट प्राइस मल्टीप्लाई बाय टोटल आउटस्टैंडिंग शेयर्स। मतलब अगर अग्रो की करंट शेयर प्राइस 316 है और अग्रो के टोटल आउटस्टैंडिंग शेयर्स हैं 576 मिलियन, तो 313 को टोटल नंबर ऑफ़ शेयर्स से मल्टीप्लाई करें, तो आंसर आता है ये, यानी अग्रो की करंट मार्केट वैल्यू 182 बिलियन रुपीस। तो आई होप आपको ये तमाम बातें समझ आ गई होंगी। लेकिन अगर फिर भी आपकी कोई सवाल है, तो आप मुझसे नीचे कमेंट सेक्शन में पूछ सकते हैं। बाकी चीज़ इंशाअल्लाह इससे अगली वीडियो में। तो चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ़्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफ़िकेशन आपको मिल सके।

हेलो! ट्रेड सेटलमेंट से मुराद है कि जब आप शेयर्स खरीदते हैं, तो बेसिकली बिहाइंड द सीन क्या हो रहा होता है और शेयर्स कैसे और कब आपकी डीसी अकाउंट में ट्रांसफ़र होते हैं। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, स्टॉक मार्केट में दो तरह की इन्वेस्टिंग होती है। एक होती है इंट्राडे ट्रेडिंग, जिसमें सेम दिन ही शेयर बाय भी होते हैं, सेल भी होते हैं और सेम दिन ही सारी सेटलमेंट होती है। और दूसरी होती है डिलीवरी ट्रेडिंग, जिसमें आप शेयर लॉन्ग टर्म के लिए होल्ड करके रखते हैं और सारे सेटलमेंट तीन दिन के अंदर-अंदर होती है। तो जब आप शेयर खरीदते हैं, तो पैसे तो उसी वक़्त आपके अकाउंट से कट जाते हैं, लेकिन शेयर उसी वक़्त आपको डीसी अकाउंट में नहीं आते। इसका बेसिकली 3 दिन का प्रोसीजर होता है, जिसे टी+2 यानी ट्रेड डेट प्लस टू डेज़ कहा जाता है। आपका सारा शेयर एग्ज़ीक्यूट करने के लिए बेसिकली तीन ऑर्गेनाइज़ेशन इन्वॉल्व्ड होती हैं: PSE यानी पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज, NCCPL यानी नेशनल क्लियरिंग कंपनी ऑफ़ पाकिस्तान लिमिटेड और डीसी यानी सेंट्रल डिपॉजिटरी कंपनी। NCCPL का नाम आप पहली दफ़ा सुन रहे होंगे, तो चलिए आपको इसका थोड़ा सा इंट्रोडक्शन दे देता हूँ। NCCPL वो बॉडी है जो बेसिकली पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में पैसों का लेन-देन करती है। जब आप शेयर्स खरीदते हैं, तो आपको नहीं पता होता कि आप किससे खरीद रहे हैं। सिमिलरली, शेयर्स बेचने वाले को भी नहीं पता होता वो किसको शेयर्स बेच रहा है। तो क्या गारंटी है कि शेयर सेल करने वाला पैसे लेकर परचेज़र को शेयर दे देगा और क्या गारंटी है कि शेयर परचेज़ करने वाला शेयर लेकर सेलर को पैसे दे देगा? तो सबसे पहले हम टी+2 को समझते हैं। टी का मतलब होता है, आपने किसी कंपनी की शेयर्स मंडे को खरीदे हैं, तो शेयर्स आपके डीसी अकाउंट में वेडनेसडे को आएंगे। लेकिन अगर बीच में कोई छुट्टी आ जाती है, मिसाल के तौर पर ट्यूसडे को कोई पब्लिक हॉलीडे है, तो फिर शेयर्स थर्सडे को आपके डीसी अकाउंट में आएंगे। तो इस हिसाब से मंडे ट्रेड डेट, ट्यूसडे टी+1 और वेडनेसडे टी+2, इन केस नो हॉलीडे।

तो अब चलते हैं ट्रेड सेटलमेंट की तरफ़, जहाँ पर आपको ये सारा कॉन्सेप्ट क्लीयरली समझ आ जाएगा। फ़र्ज़ करें एक बांदा (व्यक्ति) है ख़ालिद, तो वो डायरेक्टली पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज को ये लोग अप्रोच नहीं करेंगे। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज इंडिविजुअल फ़ैसलों को नहीं पहचानता, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज सिर्फ़ जानता है अपने ट्रेडिंग मेंबर्स को। तो इन दोनों को ट्रेडिंग मेंबर के थ्रू पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज को अप्रोच करके शेयर परचेज़ करनी होंगी। सिमिलरली, शेयर्स किससे लेकर किसको देने हैं, ये काम भी डीसी डायरेक्ट नहीं कर सकता क्योंकि अपैरेंटली इम्पॉसिबल है। डीसी कहता है मुझे भी एक इंटरमीडिएट चाहिए जिसके साथ मैं मिलकर काम करूँ। तो यह इंटरमीडिएट कहलाएगा पॉज़िटिव पार्टिसिपेंट। और इसी तरह NCCPL भी कहता है मैं इतनी ज़्यादा ट्रांज़ैक्शन्स डायरेक्टली हैंडल नहीं कर सकता, मुझे भी एक मिडिलमैन चाहिए जिसके साथ मैं काम करूँ, जो सारा कुछ मेरे behalf पे देखे। और वो मिडिलमैन ट्रेडिंग मेंबर और क्लियरिंग मेंबर होता है। ख़ालिद और फ़ैसल का स्टॉक ब्रोकर है आरिफ़ लिमिटेड। अब जैसे बैंक अकाउंट भी होगा और एक डीसी अकाउंट भी होगा। सिमिलरली, ब्रोकर्स का भी बैंक अकाउंट भी होगा और डीसी अकाउंट भी होगा। जो बैंक अकाउंट होगा वो कहलाएगा क्लियरिंग मेंबर अकाउंट और जो डीसी के पास अकाउंट होगा, वो कहलाएगा डेडीकेटेड पूल अकाउंट। तो मान लेते हैं बाम कैपिटल का बैंक अकाउंट है एलाइड बैंक में और आरिफ़ एंड बाबे लिमिटेड का बैंक अकाउंट है स्कोशिया बैंक में। तो आप समझ लेते हैं कि ये सारी सेटलमेंट कैसे होगी। फ़र्ज़ करें मंडे को ख़ालिद कहता है कि उसने पाकिस्तान सुजुकी की 100 शेयर्स खरीदने हैं ₹300 के और लाइकवाइज़ फ़ैसल कहता है उसने पाकिस्तान सुजुकी के शेयर्स बेचने हैं ₹300 के। तो ये दोनों अपने-अपने स्टॉक ब्रोकर के पास ऑर्डर प्लेस करेंगे। थ्रू वेबसाइट ये ऑर्डर्स जाएँगे बाम कैपिटल के पास और आरिफ़ लिमिटेड के पास जो कि फ़ैसल का स्टॉक ब्रोकर है। तो ट्यूसडे को, यानी टी+1, NCCPL और डीसी ये दोनों इधर लिस्ट ऑफ़ ऑब्लिगेशन इशू करेंगे बाम कैपिटल और आरिफ़ लिमिटेड दोनों को। NCCPL बाम कैपिटल से कहेगा आप ₹30,000 भेज दें अपने क्लियरिंग बैंक अकाउंट में और आरिफ़ लिमिटेड को कहेगा कि आप ₹30,000 रिसीव करने के लिए रेडी हो जाएँ। तो सेम दिन बाम कैपिटल NCCPL की डिमांड के मुताबिक़ ₹30,000 अपने क्लियरिंग बैंक में जमा कर देगी और सेम दिन यानी टी+1 को डीसी आरिफ़ लिमिटेड को कहेगा कि आप पास हो चुके पाकिस्तान सुजुकी के शेयर्स अपने डेडीकेटेड पूल अकाउंट में ट्रांसफ़र कर दें और बाम कैपिटल को कहेगा कि आप शेयर्स रिसीव करने के लिए रेडी हो जाएँ। आरिफ़ लिमिटेड ट्रांसफ़र कर देगा जो उसने डीसी के पास खुलवाया हुआ है। और टी+2 यानी वेडनेसडे को ₹30,000 बाम कैपिटल के बैंक अकाउंट से, यानी एलाइड बैंक से आरिफ़ एंड बाबे लिमिटेड के अकाउंट में ट्रांसफ़र कर देगा और सेम दिन यानी टी+2 को आरिफ़ लिमिटेड के डेडीकेटेड पूल अकाउंट से शेयर्स चले जाएँगे बाम कैपिटल के पूल

भी कभी-कभी ऐसे होता है कि कंपनी इंटरिम डिविडेंड अनाउंस तो कर देती हैं, लेकिन फिर कोई एक्सपेंस आ जाता है या किसी और वजह से कंपनी वह इंटरिम डिविडेंड कैंसिल कर देती है। और कानून के मुताबिक कंपनी ऐसा कर सकती हैं। लेकिन अगर कंपनी फाइनल डिविडेंड अनाउंस कर दे तो उसको फिर वो कैंसिल नहीं कर सकती, और वो डिविडेंड कंपनी को हर सूरत देना ही देना है।

एक और बात, पाकिस्तान में कंपनी का फाइनेंशियल ईयर सिर्फ दो तरीके से गुजरते हैं। जैसे कुछ तो नॉर्मल, यानी जनवरी से 31 दिसंबर तक साल गुजरते हैं, और कुछ जो ऐसे हैं जिनका जून तक साल गुजरता है। जैसे जब पाकिस्तान में बजट पेश होता है तो रकम जुलाई से अगले साल 30 जून तक का होता है। ऐसे ही अक्सर कंपनी 30 जून को खत्म करती हैं।

तो अब बात करते हैं कि आप डिविडेंड कैसे हासिल कर सकते हैं। ध्यान रखना पड़ता है डिविडेंड डिक्लेरेशन डेट, एक्स डिविडेंड डेट, रिकॉर्ड डेट और पेमेंट डेट होती है। जिस दिन कंपनी, जैसे कि एक क्वार्टर खत्म होने के बाद जब कंपनी बोर्ड मीटिंग करेगी और क्वार्टरली रिपोर्ट पेश करेगी और साथ ही डिविडेंड भी अनाउंस करेगी तो वो डेट डिविडेंड डिक्लेरेशन डेट कहलायेगी। सिमिलरली, साल खत्म होने के बाद जिस डेट को कंपनी एनुअल जनरल मीटिंग करती है और साथ ही डिविडेंड भी अनाउंस करती है तो वो डेट भी डिविडेंड डिक्लेरेशन डेट ही कहलायेगी। और इंटरिम डिविडेंड और फाइनल डिविडेंड की डिक्लेरेशन डेट कैसे देखते हैं, यह मैं आपको वीडियो के एंड पर डिटेल्स से समझाऊँगा।

तो नेक्स्ट इम्पॉर्टेन्ट डेट है रिकॉर्ड डेट। रिकॉर्ड डेट होती है जिस डेट पे आपका कंपनी का शेयर होल्डर होना मैंडेटरी है। कंपनी सिर्फ उसको ही डिविडेंड देती है जिसका नाम कंपनी की शेयर बुक में किसी स्पेसिफिक डेट को होता है। जब कंपनी डिविडेंड डिक्लेयर करती है तो साथ ही रिकॉर्ड डेट भी अनाउंस करती है। जैसे मैंने इसे पिछली वीडियो में सेटलमेंट के साइकिल समझाया था, तो इसका मतलब है इससे ज्यादा लेट करेंगे तो आपको डिविडेंड नहीं मिलेगा।

यहाँ आते हैं, शुरू करते हैं एक्स डिविडेंड डेट, यानी एक्सक्लूडिंग डिविडेंड डेट। होती है जिस दिन शेयर खरीदने पर आपको डिविडेंड नहीं मिलता, और यह डेट रिकॉर्ड डेट से एक दिन पहले पड़ती है। अब मैं आपको डिविडेंड का पूरा साइकिल समझाता हूँ जिससे चीजें आपके लिए बहुत ज्यादा क्लियर हो जाएँगी। फ़र्ज़ करें एक कंपनी है एबीसी लिमिटेड, वो सितंबर का क्वार्टर खत्म होने के बाद एक तारीख अक्टूबर को बोर्ड मीटिंग करती है, जिसमें वो डिविडेंड डिक्लेयर करती है और साथ ही तीन नवंबर को रिकॉर्ड डेट भी अनाउंस करती है। यानी आपके पास ऑलमोस्ट डेढ़ महीने का टाइम फ्रेम है शेयर खरीदने के लिए अगर आप डिविडेंड हासिल करना चाहते हैं तो। और आपने इस टाइम पीरियड में शेयर्स बाय करने हैं और होल्ड करके रखे हैं क्योंकि यहां पर तीन नवंबर को कंपनी की शेयर ट्रांसफर बुक में नाम होना लाज़मी है। फ़र्ज़ करें आप 9 अक्टूबर को सेल कर रहे हैं तो 12 अक्टूबर को शेयर उस दूसरे के नाम हो जाएँगे जिसको आपने शेयर किये हैं और आप डिविडेंड की दौड़ से बाहर हो जाएँगे। तो आपने शेयर बाय करने हैं और एक्स डिविडेंड डेट तक होल्ड करके रखने हैं। तो हमारे एग्जाम में डिविडेंड पाने के लिए आप मैक्सिमम शेयर खरीदेंगे तो आपको डिविडेंड नहीं मिलेगा। यानी अगर आप दो नवंबर को भी शेयर खरीदेंगे तो आपको डिविडेंड नहीं मिलेगा क्योंकि शेयर्स आपके नाम ट्रांसफर होंगे 4 नवंबर को और चार नवंबर को कंपनी की शेयर ट्रांसफर बुक क्लोज होगी।

अब बुक क्लोज होने से पहले क्या होता है? हर कंपनी बेसिकली रिकॉर्ड डेट से अगले 7 से 10 दिनों के लिए बुक क्लोज़ड डेट भी अनाउंस करती है। यानी हमारी फ़र्ज़ करें अगर तीन नवंबर रिकॉर्ड डेट है तो उससे अगले दिन यानी 4 नवंबर बुक क्लोज़र डेट होगी और हर कंपनी साथ से 10 दिनों के लिए अपनी शेयर ट्रांसफर बुक क्लोज रखती है। तो मान लेते हैं 4 से 10 नवंबर तक इन सात दिनों के लिए कंपनी अपनी शेयर ट्रांसफर बुक क्लोज रखेगी। ये सिर्फ़ मिसाल के लिए समझा रहा हूँ, वर्ना हर कंपनी की बुक क्लोज़ड डेट डिफरेंट होती है। तो 4 से 10 तारीख तक इन सात दिनों में शेयर्स किसी और के नाम ट्रांसफर नहीं होंगे। और जोर एक और डेट पर आते हैं, तीन नवंबर को शेयर होल्डर के नाम पर ही शेयर ट्रांसफर बुक 7 दिनों के लिए फ़्रीज़ हो जाएगी। तो कंपनी ऐसा क्यों करती हैं? कंपनी ऐसा इसलिए करती हैं ताकि वह सारा कुछ सही से देख के सही-सही लोगों तक उनके डिविडेंड पहुँचा दें और कोई कन्फ्यूज़न ना हो। अगर शेयर्स मुसलसल किसी और के नाम ट्रांसफर होते रहेंगे तो कंपनी को सही से पता नहीं लगेगा कि किसको डिविडेंड देना है और किसको नहीं। तो ऐसी कन्फ्यूज़न ना हो इसलिए कंपनी रिकॉर्ड डेट से अगले 7 से 10 दिनों के लिए शेयर ट्रांसफर बुक क्लोज रखती है।

एक और बोनस आपको बताता चलूँ कि अगर कोई कंपनी रिकॉर्ड डेट अनाउंस नहीं करती और सिर्फ़ बुक क्लोज़र डेट ही अनाउंस करती है तो मोस्ट प्रोबेबली उससे पिछली वर्किंग डेट रिकॉर्ड डेट का रही होगी। मिसाल के तौर पे कोई कंपनी रिकॉर्ड डेट अनाउंस नहीं करती और कहती है कि बुक क्लोज़ 5 जून से 12 जून है तो इसका मतलब है रिकॉर्ड डेट 4 जून को होगी और आप मैक्सिमम 2 जून तक के शेयर खरीद सकते हैं डिविडेंड हासिल करने के लिए। आई होप दिस कॉन्सेप्ट इस क्लियर।

तो अगली बात है कि शेयर कब सेल कर सकते हैं? अच्छा, शेयर सेल कर सकते हैं एक्स डिविडेंड डेट को क्योंकि वह दिन है एक्सक्लूडिंग डिविडेंड डेट, यानी विदाउट डिविडेंड। और उस दिन जो भी शेयर खरीदेगा उसको डिविडेंड नहीं मिलेगा। और आप अगर किसी भी दिन अपने शेयर्स सेल कर सकते हैं लेकिन एक्स डिविडेंड डेट को भी आप शेयर सिर्फ़ तभी सेल कर सकते हैं अगर आपने शेयर्स पहले किसी टाइम बाय करके रख लिए हैं और शेयर एक्स डिविडेंड डेट से पहले ही आपके नाम हो गए हैं। यानी फ़र्ज़ करें अगर आप फर्स्ट नवंबर को शेयर्स खरीदते हैं तो शेयर्स आपके नाम 3 नवंबर को होंगे। तो अगर आपने शेयर अपने नाम होने से पहले ही दो नवंबर को, जो कि एक्स डिविडेंड डेट है, उस डेट को सेल कर दिए तो आप डिविडेंड कैसे लेंगे? तो अगर बिल्कुल लास्ट डे पर, यानी हमारे केस में फर्स्ट नवंबर को आप शेयर खरीद रहे हैं तो रिकॉर्ड डेट से अगले दिन यानी 4 नवंबर को आप शेयर सेल कर सकते हैं। लेकिन अगर आपने पहले से शेयर खरीद रखे हुए हैं, मान ने 12 अक्टूबर को ही आपने शेयर खरीद लिए थे तो ज़ाहिर है शेयर आपके नाम 15 अक्टूबर को ट्रांसफर हो गए होंगे। तो इसके इसमें अब दो नवंबर को, एक्स डिविडेंड डेट है, स्पेसिफिकेशन कर सकते हैं।

यहाँ मैं आपको और क्लियर समझाना चाहूँगा और इसको बहुत डिटेल से समझिएगा। फ़र्ज़ करें अगर कोई कंपनी है जो कहती है उसके रिकॉर्ड डेट है 14 जून 2021 और 14 जून 2021 को है मंडे। तो इस केस में एक्स डिविडेंड डेट 1 दिन पहले यानी 13 जून, सॉरी इतवार की नहीं बल्कि लास्ट फ्राइडे की यानी 11 जून 2021 की होगी। वो क्यों? वो इसलिए क्योंकि T+2 सिर्फ़ बिज़नेस डेज़ पे ही ऑपरेट होता है। ऐसा नहीं है कि आप फ्राइडे को शेयर्स बाय करें और संडे को आपको डीसी अकाउंट में ऐड हो जाएँ। अगर आप फ्राइडे को शेयर्स बाय करेंगे तो वो थर्ड बिज़नेस डे को, यानी ट्यूसडे को आपकी डीसी अकाउंट में ऐड होंगे। इसी वजह से अगर किसी कंपनी के रिकॉर्ड डेट मंडे को पड़ रही हो तो लास्ट डेट जिस दिन आप शेयर बाय कर सकते हैं डिविडेंड हासिल करने के लिए वो पिछले वीक का थर्सडे बनता है। इसलिए थर्सडे के लिए फ्राइडे को आपके नाम ट्रांसफर हो जाएंगे जो कि हर रिकॉर्ड डेट। तो आई होप दिस कॉन्सेप्ट इस क्लियर।

तो इसके प्रैक्टिकल एग्जांपल अच्छे से समझते हैं। लोग पूछते हैं कि हम शेयर खरीदें और डिविडेंड लेकर शेयर सेल कर दें तो इसमें हमें फायदा होगा? तो इस तकनीक में 100% गारंटी नहीं है कि आपको हमेशा फायदा होगा या नहीं। वो क्यों? वो इसलिए कि जब हम डिविडेंड हासिल करें और डिविडेंड हासिल करने के बाद शेयर्स बेच दें तो जब सारे इन्वेस्टर्स अपने शेयर सेल करना शुरू कर देंगे तो इसका नतीजे में शेयर प्राइस गिर जाएगी क्योंकि शेयर की सप्लाई ज़्यादा हो जाएगी और डिमांड कम, यानी शेयर्स बेचने वाले ज़्यादा हो जाएँगे और शेयर्स खरीदने वाले कम। मिसाल के तौर पे एक कंपनी है जिसका शेयर ₹100 का है और वो ₹10 डिविडेंड अनाउंस करती है। तो आइडियल सीनारियो तो यही होगा ₹100 का शेयर खरीदें, ₹10 डिविडेंड हासिल करके ₹100 का ही शेयर वापस सेल कर दें और पर शेयर ₹10 प्रॉफिट बना लें। लेकिन अब जब एक्स डिविडेंड डेट आएगी तो मार्केट में सारे इन्वेस्टर्स अपने शेयर सेल करना शुरू कर देंगे और जो शेयर ₹100 का था वो एक्सेसिव सप्लाई की वजह से 80-90 का रह जाएगा। तो इसलिए हाथ से जहाँ आपको ₹100 पर ₹10 का फायदा होना था उल्टा नुकसान हो जाएगा क्योंकि आपका ₹100 वही है वहीं रहा और उल्टा शेयर सेल करने से आपको ब्रोकरेज भी लग गई। तो डिविडेंड लेकर शेयर बेचने की ये स्ट्रेटेजी आपको फायदा देगी या नहीं इसकी 100% गारंटी नहीं है, आपके चांसेस 50-50 हैं। कभी शेयर प्राइस नीचे आती है और कभी नहीं, हर सिचुएशन डिफरेंट हो सकता है।

तो नेक्स्ट डेट है पेमेंट। ये वो डेट होती है जिस दिन कंपनी अपने शेयर होल्डर्स को डिविडेंड का अमाउंट उनके बैंक अकाउंट्स में क्रेडिट कर देती है और यह डेट फिक्स नहीं होती। ज्यादातर कंपनी रिकॉर्ड डेट के एक-डेढ़ महीने बाद डिविडेंड की पेमेंट कर देती हैं। तो चलिए इन सारी डेट्स का एक क्विक रीकैप कर लेते हैं। डिविडेंड डिक्लेरेशन डेट होती है जिस दिन कंपनी डिविडेंड अनाउंस करती है। एक्स डिविडेंड डेट होती है जिस दिन शेयर खरीदने पर आपको डिविडेंड नहीं मिलता। डिविडेंड रिकॉर्ड डेट होती है जिस दिन आपका कंपनी का शेयर होल्डर होना जरूरी है और डिविडेंड पेमेंट डेट होती है जिस दिन शेयर होल्डर्स को पेमेंट मिल जाती है।

तो अब आप सोच रहे होंगे कि डिविडेंड हासिल करने का सही तरीका क्या है और कौन से शेयर होल्डर्स होते हैं जो डिविडेंड से फायदा उठाते हैं? तो मैं आपको सिर्फ़ अपनी थॉट्स बताता हूँ, आप चाहे तो मेरी बात से बिल्कुल डिसएग्री कर सकते हैं। तो मेरे मुताबिक डिविडेंड सिर्फ़ लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर के लिए होते हैं। ऐसा नहीं कि डिविडेंड हासिल करके शेयर सेल कर दिया, इस तरह आपके रिटर्न्स बहुत मिनिमम से होंगे या होंगे ही नहीं। वॉरेन बफेट कहते हैं कि आपको डिविडेंड रे इन्वेस्ट करने चाहिए। यानी मिसाल के तौर पर एक कंपनी है जिसका शेयर ₹50 का है और वह कंपनी एनुअल ₹3 डिविडेंड देती है और आपने उस कंपनी के 500 शेयर्स खरीदे हुए हैं तो इस हिसाब से कंपनी आपको 1500 डिविडेंड देगी। अब अगर आप इन पैसों को खर्च करने की बजाय उसी कंपनी में वापस रे इन्वेस्ट कर दें, यानी मज़ीद शेयर खरीद लें तो आपके 500 शेयर्स बढ़कर 530 हो जाएंगे और नेक्स्ट ईयर आपको 1500 से ज़्यादा डिविडेंड मिलेंगे। इसी तरह अगर आप डिविडेंड रे इन्वेस्ट करते जाएं तो कुछ सालों के बाद आप बहुत ज़्यादा अमीर हो जाएंगे। इसको कहते हैं कंपाउंडिंग और आइंस्टीन इसके बारे में कहते हैं कंपाउंड इंटरेस्ट वंडर ऑफ़ दी वर्ल्ड, यानी कंपाउंडिंग दुनिया का आठवाँ अजूबा है। और वॉरेन बफेट की जुबान में इसको कहते हैं स्नोबॉल इफेक्ट, जैसे ऊपर से बर्फ की बॉल बना के फेंको तो नीचे पहुँचने तक वो बहुत बड़ी हो जाती है। इसी तरह अगर आप डिविडेंड रे इन्वेस्ट करते रहे तो एक टाइम आएगा कि आप इतने अमीर हो जाएंगे कि शायद आप पूरी कंपनी ही खरीद लें। मैं मज़ाक नहीं कर रहा, वॉरेन बफेट ने भी अपनी सारी दौलत ऐसे ही बनाई है और अब वो 12 से ज़्यादा कंपनी के होल ओनर हैं, यानी ये 12 कंप्लीट टोटल उनकी हैं और 45 कंपनी में पार्शल ओनर हैं। तो अकॉर्डिंग टू वॉरेन बफेट और मेरा मशवरा भी यही है कि आपको हमेशा लॉन्ग टर्म के लिए सोचना चाहिए और हमेशा लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्टिंग करनी चाहिए। स्टॉक मार्केट से जितने भी लोग अमीर बने हैं वह सब लॉन्ग टर्म इन्वेस्टिंग करके ही अमीर बने हैं, डेली ट्रेडिंग से कोई भी अमीर नहीं बना।

तो यह तो थी मेरे थॉट्स अबाउट डिविडेंड। चलिए अब मैं आपको बताता हूँ कि पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में डिविडेंड डिक्लेरेशन डेट्स कैसे देखते हैं।

चलिए दोस्तों, मैं आपको बताता हूँ कि आपने डिविडेंड डिक्लेरेशन डेट वगैरह आप कैसे देखनी है। सबसे पहले गूगल के ऊपर आपने लिखना है DPSX, ठीक है। इधर है ये डाटा पोर्टल पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज का। इसके ऊपर आपने क्लिक करना है। डिविडेंड देखना चाहते हैं कि उसने डिविडेंड कब अनाउंस किया था, कब माइनस ए रहा है कुछ तो आप मेरे आने पर सर्च बार में इधर आपने कंपनी का नाम लिखना है। फ़र्ज़ करें मैं देखना चाहता हूँ कि होंडा ने कितना डिविडेंड दिया है। क्वार्टर का मतलब चाहिए था तो इसकी डेट जो है गुज़र चुकी है, उसकी क्या डेट थी, कैसे गुज़र रही है सारा कुछ अब हम देखते हैं। इधर आपने नीचे आना है, इधर आपने आना है इस अनाउंसमेंट सेक्शन में, इधर आपने आने के फाइनेंशियल रिजल्ट्स में, इधर ये देखें फाइनेंशियल ईयर फॉर दी ईयर एंडेड मार्च 31, 2021, मार्च 31, 2021, ठीक है। इधर अब आपने डॉक्यूमेंट देखने के लिए, डॉक्यूमेंट्स आप देखना चाहते हैं या नहीं, व्यू में आएँगे। व्यू में आएँगे तो आपके सामने डॉक्यूमेंट खुल जाएगा। तो नीचे कैश डिविडेंड लिखा हुआ है तो इसका मतलब है ये डॉक्यूमेंट था जो हम ढूंढना चाह रहे थे। जितने भी कोई भी कंपनी उसके जो डिविडेंड होंगे, वो जितने भी ये फाइनेंशियल रिजल्ट्स फॉर ये जितने भी इस तरह के शुरू हो रहे होंगे फाइनेंशियल रिजल्ट्स फॉर से जितने भी डॉक्यूमेंट शुरू हो रहे होंगे, सारे के सारे डॉक्यूमेंट होंगे वो यही होंगे हमारी कंपनी के। तो जितने भी फाइनेंशियल रिजल्ट्स फॉर से डॉक्यूमेंट शुरू मार्च 31 इसको व्यू कर लेंगे। यहाँ पे देखिए कैश डिविडेंड है। दूसरा डॉक्यूमेंट देख लेते हैं। दूसरा ये डॉक्यूमेंट है [संगीत] इसके अंदर है। तीसरा ये फाइनेंशियल डॉक्यूमेंट जो होंगे ना जो फाइनेंशियल रिजल्ट्स फॉर शुरू हो रहे होंगे, सारे के सारे जो डिविडेंड होते हैं वो इनके अंदर, जिसे कहते हैं इन डॉक्यूमेंट डिक्लेयर होते हैं। तो अब ये जो है डेट है, यानी कि 25 मई 2021 को जो है ये डॉक्यूमेंट पब्लिश हुआ था, उसको हम खोल लेते हैं। तो यह वाला डॉक्यूमेंट हमें चाहिए, वो चीज़ नहीं पता चलेंगे। इसको अपने ऊपर आकर कर देना, डॉक्यूमेंट पीडीएफ ओपन ओपन। ये जो कंपनी है ये जनवरी से दिसंबर तक, ये जुलाई से जून तक नहीं। इसका जो साल होता है वो अप्रैल से अगले साल मार्च तक। इसके जो है 12 महीने जो है ये इस तरह से गुज़रते हैं। ठीक है तो यह आ जाएगी क्या कहते हैं 25 मई 2021। तो यह जो 25 मई 2021 है, यह जो है डिविडेंड की डिक्लेरेशन डेट भी कहलायेगी। ठीक है। अब नीचे कहते हैं क्या कह रहे हैं। यह कह रहे हैं कि दिस इज़ टू इनफॉर्म दैट डी बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ऑफ़ डी कंपनी इन देयर मीटिंग हेल्ड बाय वीडियो कॉन्फ्रेंस ऑन ट्यूसडे, मई 25, 2021, 9:00 AM, हैज़ रिकमेंडेड डी फॉलोइंग, यानी कि बोर्ड मीटिंग हुई थी, सारा कुछ हुआ था, उन्होंने अनाउंस किया कि कैश डिविडेंड देंगे 45.2% का, यानी कि ₹4.52 पैसा जो है ये डिविडेंड वो कर रहे हैं डिक्लेयर कर रहे हैं कि इतना डिविडेंड देंगे। ठीक हो गया। अब आपने आना है नीचे, नीचे जब आप आएँगे तो ये देखें 25 मई को है डिविडेंड डिक्लेयर हो गया था। 25 मई को डिविडेंड डिक्लेयर हुआ था और जो रिकॉर्ड डेट है वो है जून 17 की। ठीक है, यानी कि जून 17 को आपका कंपनी का शेयर होल्डर होना जरूरी है। तो इसलिए हाथ से जो 16 जून होगी वो कहलायेगी एक्स डिविडेंड डेट। ठीक है और जो 15 तारीख होगी वो आखिरी दिन होगा अगर आप डिविडेंड हासिल करना चाहते हैं तो। ये देखें नीचे इन्होंने जो है शेयर ट्रांसफर बुक क्लोज़ की भी जो है ना वो बताया कि देखें 17 जून जो है वो रिकॉर्ड डेट है, 18 जून से जो है वो क्लोज़र डेट होगी। हमेशा जो डेट होती है वो रिकॉर्ड डेट से जो नेक्स्ट होता है वो बुक क्लोज़र होता है। ठीक है। अब हम इसको देख लेते हैं अंदर कैलेंडर के अंदर आकर, 17 जून जो है इनकी है रिकॉर्ड डेट। ठीक है तो 17 जून, 18 जून, 17 जून जो है रिकॉर्ड डेट और जो 16 जून होगी ये होगी एक्स डिविडेंड डेट, यानी कि आपके पास 15 तारीख तक का टाइम है शेयर खरीदने के लिए अगर आप डिविडेंड हासिल करना चाहते हैं तो। तब हमारी कैलकुलेशन ठीक है या नहीं है या मैं कैसे पता चलेगा? इसके एक सिस्टम है कि आपने आना है इधर वापस गूगल पे आना है। इधर एक स्टॉक ब्रोकर है उनका नाम है अकड़ ट्रेड, ठीक है। अकड़ सिक्योरिटी ट्रेड के ऊपर आना है, डॉक्यूमेंट है, डॉक्यूमेंट वो करेंगे। जी 18 तारीख को जो है बुक्स क्लोज़ हो जाएँगी। ठीक है 18 तारीख है। ठीक है, 18 तारीख जो हो जाएगी इसका मतलब है कि जो रिकॉर्ड डेट है वो है 16 जून और यही जो एक्स डिविडेंड डेट है ये भी इधर यही लिखी हुई कि 16 जून जो है एक्स डिविडेंड डेट है, यानी अगर बस आपके पास 15 तारीख तक जो है टाइम है, यानी कि जो 15 जून है वो लास्ट डेट होगी कंपनी के डिविडेंड हासिल करने के लिए। तो 15 जून को आप शेयर खरीदेंगे और 17 जून को जो है वो आपके नाम हो जाएगा, रिकॉर्ड डेट होगी और 18 जून को आपकी जो बुक्स है वो क्लोज़ हो जाएँगी। अच्छी तरह से आपको एक और ये बात जो है बताता चलूँ कि देखें जब इन्होंने अपना डिविडेंड डिक्लेयर किया था उसके बाद जो स्टॉक प्राइस खरीदना शुरू कर दिया तो ये देखें जो शेयर प्राइस के चक्कर के नॉर्मली जिसे कहते हैं देखें 338, 341, 339 इतने का चल रहा था वो डिविडेंड डेट की वजह से जो है 392 तक का चला गया, यानी कि ऑलमोस्ट ₹60 का जिसे कहते हैं आपको इज़ाफ़ा हो गया। ठीक है और बाद में जो एक्स डिविडेंड डेट जो थी 16 तारीख थी, वो 16 जून, इधर देख लेते हैं। 16 जून को जो था ये 365 का था आपका जो शेयर थोड़ी देखें। 16 जून के बाद जो है नीचे नीचे आ गया। दूसरा मैंने आपको वीडियो के अंदर बताया था एक्स डिविडेंड डेट सॉरी, जब डिविडेंड डिक्लेयर होगा तो जितने भी लोग हैं सारे शेयर्स खरीदेंगे। अभी देखें इन्होंने जो है एक शेयर फ़र्ज़ करते हैं 392 का एक शेयर जो है कंपनी का खरीदा है और एक शेयर के ऊपर इनको कितना डिविडेंड मिल रहा है? एक शेयर के ऊपर इनको डिविडेंड मिल रहा है जी 4.52 का, खुद देखने को ₹30 लॉस हुआ है तो ₹30 लॉस हो गए। फ़र्ज़ कर लेंगे चलेंगे चार या पाँच रुपए भी मिल जाते हैं तो फिर भी आपको एक शेयर के ऊपर जो है ₹25 का जैसे कहते हैं लॉस हो रहा है। तो ये मैंने आपको पहले भी बताया था कि जो लॉन्ग टर्म शेयर होल्डर्स होते हैं डिविडेंड सिर्फ़ उनके लिए होता है। इस तरह आपको जो है क्या नाम है शेयर खरीद के डिविडेंड हासिल करके शेयर बेचने की ये जो स्ट्रेटेजी होती है ये इतनी अच्छी जैसे कहते हैं नहीं होती है। आपको इस स्ट्रेटेजी के अंदर जैसे कहते हैं नुकसान हो सकता है। ठीक है जो पाकिस्तान के अंदर इंडस मोटर कंपनी के नाम से जो अपडेट करती है। ठीक है, है इसको हमने खोली, इसको भी हम नीचे आएँगे। डॉक्यूमेंटेशन देखना चाह रहे हैं इसका हम यहाँ से कर देंगे बंद। इसको हम करेंगे पीडीएफ पर क्लिक। ठीक है इसको डाउनलोड कर लेंगे। अच्छा इनका जो फाइनेंशियल ईयर फाइनेंशियल रिजल्ट्स फॉर दी क्वार्टर एंड 9 मंथ्स एंडेड मार्च 31, यानी कि ये जो इंडस मोटर कंपनी वाला है इनका जो है जुलाई से जून तक जो है इनका साल गुज़रता है, यानी कि मार्च के बाद उनके 9 महीने एंड हो गए और जून के बाद जो इनका पूरा का पूरा जो है साल एंड हो जाएगा। ठीक है इसको हम देख लेते हैं इन्होंने क्या किया? इनकी जो है डेट वो है अप्रैल 28, 2021, यानी कि 28 अप्रैल जो है ये होगी डिविडेंड की डिक्लेरेशन डेट। ठीक है, अप्रैल 28 से 12 मई तक का आपके पास जो है कि काफ़ी ज़्यादा टाइम था अगर आप शेयर खरीदना चाहते हैं तो। ये देखें ये जो 12 मई है, 12 मई को 12 मई जो इनके रिकॉर्ड डेट होगी, 13 मई जो है इनके बुक क्लोज़र डेट होगी। अब हम देखते हैं कि यही सारा का सारा सीन है या नहीं। जैसा मैं को आ जाते हैं तो ये देखें 12 मई जो थी ये थी रिकॉर्ड डेट, 13 मई जो थी ये थी बुक क्लोज़र डेट। तो अगर 12 मई जो है रिकॉर्ड डेट है तो इस हिसाब से एक्स डिविडेंड डेट होनी चाहिए 11 मई की और क्या कहते हैं जो आपकी लास्ट डेट होनी चाहिए शेयर्स बाय करने की होनी चाहिए 10 तारीख, यानी कि मंडे को। 10 मई को आप शेयर खरीदेंगे तो 12 मई को रिकॉर्ड डेट वाले दिन आपके शेयर्स जो है डीसी अकाउंट में ऐड हो जाएँगे। लेकिन इस केस में ऐसा नहीं होगा। वो क्यों? क्योंकि 10 तारीख से लेकर 15 तारीख तक थी छुट्टी, यानी कि ईद उल फितर। तो 10 तारीख से 15 तारीख तक जितनी भी जो ऑपरेशन से बिज़नेस ऑपरेशन से ये सारे के सारे सस्पेंडेड थे। ठीक है, है उससे पिछले वर्किंग डे पे चली जाएगी यानी कि 6 और 7 को ये तारीख चली जाएगी यानी कि 7 को बुक क्लोज़ होंगी। तो इस हिसाब से जो 6 तारीख होगी वो होगी आपकी रिकॉर्ड डेट, 5 तारीख हो गई आपकी एक्स डिविडेंड डेट और 4 तारीख को आप शेयर खरीद सकते हैं ताकि 6 तारीख को आपके अकाउंट में ऐड डीसी अकाउंट में ऐड हो जाए और आपको इसका जो शेयर है वो मिल सके। अब मैं सही कह रहा हूँ या नहीं ये अब हम जा के देखते हैं एक ही ट्रेड की वेबसाइट पे। ठीक है इधर हम आ जाएँगे तो इधर जो है वैसे नहीं आएगा क्योंकि पुरानी है अनाउंसमेंट है, इनको हम कर देते हैं आज तक की जितनी भी अनाउंसमेंट हम कहते हैं मैं सारी की सारी जो है दिखा दो, है तभी सारी खुल गई है इसको कंट्रोल करते हैं इंडस, इंडस मोटर कंपनी है, क्यों क्योंकि 5 मई की 13 तारीख को छोटी ईद की छुट्टी थी, जिस दिन डेट थी उससे एक दिन पहले रिकॉर्ड डेट थी 12 तारीख, उस दिन भी छोटी ईद थी। तो ये दोनों डेट्स ले जाएँगे पिछली वर्किंग डे पे। तो इस हिसाब से जो 12 था, 12, 13 थी ये बन गई 6, 7, ठीक है। 7 तारीख को जो बुक्स थी वो क्लोज़ हो गई। 6 तारीख जो है आपकी रिकॉर्डिंग [संगीत] फाइनेंशियल ईयर फॉर डी हाफ ईयर एंडेड मार्च 31, 2021, यानी कि इनका जो मार्च के बाद आधा साल खत्म हो रहा है। इसमें इसका मतलब है कि इनका जो फाइनेंशियल ईयर है वो अक्टूबर से स्टार्ट होता है। नीचे आते रहे फ्रॉम जून 15, 2021 टू जून 21। ठीक है तो इसकी जो रिकॉर्ड डेट होगी वो क्या होगी? 15 तारीख को अगर जो है अपनी शेयर ट्रांसफर बुक क्लोज़ कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि जो 14 तारीख होगी वो होगी रिकॉर्ड डेट और जो सिर्फ़ पिछला वर्किंग डे होगा 11 जून वो कहलाएगा एक्स डिविडेंड डेट। तो आपके पास 10 तारीख तक का टाइम है। 10 तारीख का टाइम था अगर आप इसका शेयर हासिल करना चाहते हैं तो। ये जो 10 तारीख थी वो कहलाती है शेयर आपके अकाउंट में ऐड होने से अगले दिन 15 तारीख वो क्लोज़ हो जानी थी। इसको भी हम देख लेते हैं सही है या नहीं, गूगल क्रोम कर लेते हैं। मेरा शुगर में, मेरा शुगर में लगी 15 तारीख जो है इनकी 11 तारीख ही बन रही है क्योंकि देखें 15 तारीख को जो है किताबें बंद हो जाएँगी, शेयर ट्रांसफर बुक क्लोज़ हो जाएगी। 14 तारीख जो है वो बन जाएगी रिकॉर्ड डेट और उससे जो पिछला फ्राइडे होगा वो कहलाएगा एक्स डिविडेंड डेट। तो आपके पास 10 तारीख तक का टाइम था अगर आप उसका डिविडेंड हासिल करना चाहते हैं तो। जब आपको ये चौथी और आखिरी वो बताता हूँ देखने इधर हम आ जाते हैं शेयर में आके हम देख लेते हैं जी टर्ग को। ठीक है, हमें देख लिया जो कंपनी है। ठीक है पीडीएफ डाउनलोड कर देते हैं इनको हम यहाँ से डाउनलोड करते हैं। इसकी डिविडेंड डिक्लेरेशन डेट हो जाएगी। ठीक है तो 18 को रिकॉर्ड डेट है या नहीं इधर से कर देते हैं टर्ग। ठीक, रिकॉर्ड डेट लेकिन 17.5.2011 की बजाय यह कह रहा है 10.6.2019 [संगीत] 6 कैसे हो गई? कंपनी जो होती है वो कभी-कभी नॉन प्रॉफिट ऐलान डिविडेंड एंड बुक क्लोज़र। ठीक है, इसको हम यहाँ से व्यू कर लेते हैं। इधर हमें कुछ भी नहीं पता चलेगा। ठीक है जो 29 अप्रैल को मीटिंग हुई थी जिसके बाद 40% मिनिमम डिविडेंड देना था। तो अब ये जो डेट है ये रिवाइज़ होगी हमारी जो शेयर ट्रांसफर बुक होगी वो होगी 14 जून को बंद। ठीक है, 14 जून को जो बंद होगी तो इसलिए हाथ से जो रिकॉर्ड डेट हो जाएगी वो हो जाएगी 11। तो 11 रिकॉर्ड डेट होगी तो इसलिए हाथ से जो 1

मतलब यह है कि अगर आगे पास ₹1200 का एक शेयर था तो कंपनी आपको एक एडिशनल शेयर अवार्ड करेगी। इसका मतलब ये नहीं है कि अब आपके पास ₹1200 के दो शेयर्स हो जाएंगे और आपकी टोटल इन्वेस्टमेंट ₹1200 + ₹2400 हो जाएगी। इसका मतलब ये है कि जहां आपके पास ₹1200 का एक शेयर था अब आपके पास ₹600 के दो शेयर्स हो जाएंगे।

तो अगर बोनस शेयर और स्टॉक स्प्लिट से चीजें हैं तो फिर इन दोनों में फर्क क्या है? बोनस शेयर और स्टॉक स्प्लिट में फर्क ये है कि बोनस शेयर कंपनी अपने रिज़र्व में से देती है, यानी जो उसके पास पैसे पड़े होते हैं उसमें से देती है और कंपनी के फेस वैल्यू चेंज नहीं होती। लेकिन अगर कंपनी स्टॉक स्प्लिट करती है तो कंपनी के रिज़र्व में से कोई पैसे कम नहीं होते, लेकिन कंपनी के फेस वैल्यू चेंज हो जाती है। जैसे मैं पिछली वीडियो में बता चुका हूं कि कंपनी ज्यादातर अपनी फेस वैल्यू ₹10 ही रखती हैं। तो अगर स्टॉक स्प्लिट होगा तो कंपनी की फेस वैल्यू ₹10 से फ़र्ज़ करके ₹5 हो जाएगी। ऐसा करने से आपको जो डिविडेंड मिलता है उसपे फर्क पड़ेगा। अगर स्टॉक्स प्लेट होता है 2*1 की रेश्यो में तो अब आपके पास ₹1200 के एक शेयर की बजाय ₹600 के दो शेयर्स हो जाएंगे और कंपनी की फेस वैल्यू भी आधी हो जाएगी, यानी ₹10 से ₹5 हो जाएगी।

अब अगर कंपनी 100% डिविडेंड अनाउंस करती है तो आपको पर शेयर ₹5 डिविडेंड मिलेगा और आपके दो शेयर्स आपको ₹10 डिविडेंड देंगे। लेकिन अगर कंपनी बोनस शेयर अनाउंस करती है तो आपके ₹1200 के शेयर ₹600 के तो हो जाएंगे लेकिन कंपनी के फेस वैल्यू ₹10 ही रहेगी और अब अगर कंपनी 100% अनाउंस करती है तो आपको पर शेयर ₹10 डिविडेंड मिलेगा और आपके दो शेयर आपको ₹20 डिविडेंड देंगे। तो ये बेसिकली फर्क है स्टॉक स्प्लिट और बोनस शेयर में। और बोनस शेयर की एक-दो प्रैक्टिकल एग्जांपल भी मैं आपको वीडियो के नेक्स्ट पार्ट में दूंगा।

तो अब मैं आपको बताता हूं राइट शेयर किसे कहते हैं। राइट, यह नाम से ही पता लग रहा है कि इसका मतलब है हक, यानी अगर कोई कहता है उसका मतलब है यह मेरा हक है, वो वाला हक। तो राइट शेयर क्या है और कंपनी यह क्यों इशू करती हैं? सबसे पहली बात, क्या सिर्फ वही कंपनी इशू कर सकती है जिसने पहले से मार्केट में एक दफा शेयर्स इश्यू कर दिए हो, यानी जिस कंपनी ने ऑलरेडी आईपीओ इश्यू कर दिया हो, जो ऑलरेडी पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट हो, सिर्फ वही कंपनी राइट शेयर इश्यू कर सकती है। तो कोई भी कंपनी राइट शेयर क्यों इशू करती है? कंपनी राइट शेयर इसलिए इशू करती है क्योंकि उसको ज़्यादा पैसों की जरूरत होती है।

तो अब आप सोच रहे होंगे अगर पैसे चाहिए तो कंपनी लोन क्यों नहीं लेती? कंपनी अक्सर लोन इसलिए नहीं लेती क्योंकि अगर कंपनी लोन लेगी तो उनको वो लोन वापस भी करना पड़ेगा और सोद समेत वापस करना पड़ेगा और इस तरह से कंपनी पर काफी ज़्यादा फाइनेंशियल बर्डन आ जाता है। तो कंपनी पैसे भी रेज़ कर लें और उन पर फाइनेंशियल बर्डन भी ना पड़े, इस तरह से कंपनियां राइट शेयर इशू करती हैं। फ़र्ज़ करें एक कंपनी है जिसको ₹100 की जरूरत है। अब अगर वो कंपनी ₹100 कर्जा लेती है तो उसको सोद के साथ ₹110 वापस करने पड़ेंगे। लेकिन अगर कंपनी ₹100 कर्जा लेने की बजाय ₹100 के नए शेयर इश्यू करके पैसे रेज़ कर लेती है तो अब वो बाउंड नहीं है पैसा वापस करने के लिए। अगर कंपनी की कैपेसिटी हुई तो वो प्रॉफिट को मार्केट में डिविडेंड दे देगी वर्ना सारे पैसे वापस बिज़नेस में ही रे-इन्वेस्ट कर देगी। और कंपनी डिफरेंट रीज़न की वजह से राइट शेयर इशू करती हैं, कभी कर्ज़ वापस करना होता है, कभी बिज़नेस की एक्सपेंशन करनी होती है वगैरा वगैरा। मैं आपको वीडियो के नेक्स्ट पार्ट में डिटेल्स से मुख्तलिफ़ कंपनियों के बारे में बताऊंगा कि उन्होंने राइट शेयर कब और क्यों इश्यू किए हैं।

तो अब मैं आपको राइट शेयर का एक कॉन्सेप्ट समझाता हूं जिससे चीज़ें आपके लिए काफी क्लियर हो जाएंगी। और इनको राइट शेयरिंग कहा जाता है। यह भी मैं आपको बताता हूं। फ़र्ज़ करें एक कंपनी है एबीसी लिमिटेड जिसके टोटल 10 लाख शेयर्स हैं। अब कंपनी को ज़्यादा पैसों की जरूरत है तो कंपनी डिसाइड करती है कि वो 500,000 नए शेयर इश्यू करेगी। अब जब नए शेयर्स इश्यू होंगे तो कंपनी एक्ट के मुताबिक जो कंपनी के एक्ज़िस्टिंग शेयर होल्डर्स हैं कंपनी को उनको ही सबसे पहले ऑफर करने पड़ेंगे। इसलिए इसको कहते हैं राइट शेयर, यानी एक्ज़िस्टिंग शेयर होल्डर का यह राइट है कि अगर कंपनी नए शेयर इश्यू करे तो सबसे पहले उसे ही ऑफर करे। अब मान लें कंपनी 2*1 की रेश्यो में राइट शेयर ऑफर करती है तो इसका मतलब ये है कि जिसके पास भी कंपनी के ऑलरेडी दो शेयर्स हैं उसके पास ये हक है कि वो कंपनी से एक नया शेयर और खरीद सके। मसलन अगर किसी के पास 100 शेयर्स हैं तो वो 50 नए शेयर्स खरीद सकता है, किसी के पास 10 शेयर्स हैं तो वो पाँच और अगर किसी के पास 50 शेयर हैं तो वो 25।

अच्छा अभी इधर एक बात का ध्यान दें कि एक्ज़िस्टिंग शेयर होल्डर्स के पास राइट है कि वो नए शेयर्स खरीदें, ऑब्लिगेशन नहीं है। यानी फ़र्ज़ करें अगर आप किसी ऐसी कंपनी के शेयर होल्डर हैं जो राइट शेयर लॉन्च करती है तो आप पर लाज़िमी नहीं है कि आपने नए शेयर्स खरीदने ही खरीदने हैं। आप शेयर खरीदना चाहते हैं तो खरीदें, नहीं खरीदना चाहते तो बेशक मत खरीदें। या थोड़े से शेयर खरीदना चाहते हैं तो बेसिकली थोड़े ही खरीद लें। मतलब आपके पास किसी कंपनी के ₹5000 के शेयर्स हैं तो आप खरीदें बाकी बेशक ना खरीदें। यहां मिलती है छूट कि आपका यह राइट शेयर खरीदने का राइट ट्रांसफरेबल भी होता है। यानी फ़र्ज़ करें कंपनी जो राइट शेयर ऑफर कर रही है अगर आप वो शेयर खुद नहीं खरीद सकते या खरीदना चाहते तो आपके पास ये राइट है कि आप कंपनी को बोलेंगे ये शेयर मेरे बताए हुए किसी बंदे को सेल कर दें। फिर कंपनी को आपकी मर्ज़ी के बंदे को ही वो शेयर सेल करने पड़ेंगे। लेकिन अगर शेयर ना आप खुद खरीदते हैं ना किसी और को रेफ़र करते हैं तो फिर ये शेयर कोई भी खरीद सकता है, कंपनी का प्रमोटर भी ये शेयर खरीद सकता है।

राइट शेयर की प्राइस कैसे डिसाइड करती है? तो कंपनी राइट शेयर की प्राइस मार्केट में करंट शेयर की प्राइस को मद्देनज़र रखते हुए डिसाइड करती है। लेकिन ज़्यादातर कंपनी करंट मार्केट प्राइस से कम प्राइस में शेयर ऑफर करती है। यानी फ़र्ज़ करें कोई कंपनी है जिसका एक शेयर मार्केट में ₹100 का चल रहा है तो कंपनी आपको नया ₹70 में ऑफर करेगी। नीचे वाली वीडियो को क्लिक करें, नोटिफ़िकेशन मिल सकें। हेलो दोस्तों, इस वीडियो में आपको बताऊंगा कि आप बोनस शेयर कैसे देख सकते हैं। आपने गूगल पर आना है, इधर आपने टाइप करना है पीएसएक्स फ़ाइनेंशियल अनाउंसमेंट। इधर आपने सबसे पहले लिंक क्लिक करनी है। वो इस कॉलम के अंदर आ जाता है और इससे पिछले कॉलम के अंदर अनाउंसमेंट की जगह बताई जाती है कि कौन सी जगह पर कंपनी ने नोटिस की है। दूसरा भी देखेंगे फ़ाइनल डिविडेंड अनाउंस किया है, वायर, वायर का मतलब है ये रेंटेड, यानी कि साल खत्म होने के बाद जो इनकी एनुअल रिपोर्ट थी उसके अंदर इन्होंने ये अनाउंस किया। और इधर आती है बुक क्लोज़्ड डेट, यानी कि बुक क्लोज़्ड डेट जो है कब जो है कंपनी की जो है किताबें बंद हो जाएंगी। तो उसे एक दिन पहले रिकॉर्ड डेट होती है। तो रिकॉर्ड डेट से दो दिन पहले तक आपने शेयर खरीदना होता है।

तो अब इधर हम देखते हैं बोनस शेयर आप कैसे ढूंढ सकते हैं। इधर आप लोग कंट्रोल + F प्रेस करना है, ब्रैकेट ओपन "बी" लिखना है और ब्रैकेट क्लोज़ इशू की है। मिसाल के तौर पर सर्विसेज़ को देख लेते हैं। इसमें जो है 31.12.2021 के बाद 2021, यानी कि 221 को कंपनी की जो किताब है वो क्लोज़ हो रही हैं, यानी कि 22 तारीख को जो है बुक क्लोज़ हो जाएगी, उसे एक दिन पहले जो है रिकॉर्ड डेट होगी, उसे एक दिन पहले जो एक्सक्लूज़न डेट होगी और 20 तारीख को जो है बोनस इशू हो गया होगा। तो अब मैंने जैसा आपको बताया था कि बोनस इशू हो जाने के बाद जो कंपनी की शेयर प्राइस होती है वो कम हो जाती है, तो इसकी भी मैं आपको अभी डेमोंस्ट्रेशन देता हूं। आपने इधर गूगल पर आना है, डीपीएस, इधर आपने इस लिंक को क्लिक करना है। इधर आपने आना है मार्केट अप्रैल 2021। तो जैसे 22 अप्रैल 2021 जो चीज़ की बुक क्लोज़ डेट दो दिन पहले रिकॉर्ड डेट थी तो 20 तारीख को जो इसकी शेयर प्राइस कम हो जानी चाहिए। तो इधर अब हम देखते हैं 19 तारीख को देखेंगे ₹1180 की शेयर प्राइस, सिर्फ़ 20 तारीख को, दो दिन पहले जो कि रिकॉर्ड डेट थी, उस दिन को जो है शेयर प्राइस कम हो गई है क्योंकि जो शेयर डबल हो गए होंगे उसे कहते हैं, यानी कि जिसके पास एक शेयर था उसके पास अब दो शेयर हो गए होंगे। तो जिसके पास पहले ₹1100 उसी का एक ही शेयर था उसके पास अब ₹630 के दो शेयर हो गए होंगे और यह जो प्राइस होती है और जो कंपनी है वो भी मैं आपको जैसा आपने वापस इसी कॉलम के अंदर आना, इधर "बी" लिखा हुआ था, "बी" की जगह आपने लिख देना है "आर"। "आर" का मतलब है राइट शेयर। जितने भी कंपनी ने राइट शेयर दिए होंगे वो सारे के सारे जो हैं आपको ये ब्राउज़र होगा वो बता देगा। तो टोटल जो है आठ कंपनी ने राइट शेयर इश्यू किए हुए हैं।

अब दूसरा देख लें, मान लेते हैं ये वेव्स है, इसमें 50% जो है राइट शेयर जिसे कहते हैं इशू की है, यानी कि जिसके पास भी कंपनी के दो शेयर होंगे उसके पास जो है कि एक्स्ट्रा शेयर लेने का राइट है। अब देखिए लिखा हुआ आता है "अन-प्रीमियम ऑफ़ रुपीस 5%," यानी कि कंपनी की जो फेस वैल्यू होती है वो ₹10 होती है तो ये टोटल जो है ₹15 का शेयर इश्यू करेंगे क्योंकि ₹10 फेस वैल्यू और उसके ऊपर ₹5 जो है ये प्रीमियम ले रहे हैं। तो अब इस कंपनी ने ये शेयर क्यों इशू किया है ये भी मैं आपको बताता हूं। आपने वापस इसी जगह पे आना, इधर अनाउंसमेंट में, इधर आपने आना है कंपनी के अनाउंसमेंट पे, इधर आपने कंपनी का नाम लिखना है, वेव्स कंपनी कर देना है सर्च। इधर आपने वापस कंट्रोल + F करना है। रिकॉर्ड डेट है वो 17/4 थी, यानी कि आपके पास जो है काफी ज़्यादा तकरीबन महीने का टाइम था इसके शेयर खरीदने के लिए अगर आप इसके राइट शेयर जो है लेना चाहते थे। बेसिक डिविडेंड हो जाए, बेशक बोनस शेयर हो जाए, बेशक राइट शेयर हो जाए, इन सब को जो प्रोसीजर होता है, रिकॉर्ड डेट का, एक्सक्लूज़न डेट का वो सेम होता है। अगर आपको नहीं पता कि ये रिकॉर्ड डेट वगैरा क्या कुछ होता है तो उसके ऊपर मैंने ऑलरेडी एक वीडियो बनाई हुई है जिसका लिंक आपकी स्क्रीन पर टॉप राइट कॉर्नर पे शो हो रहा होगा। इस वीडियो को जा के आप देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि किस तारीख को अगर आप शेयर लेंगे तो आप ये राइट शेयर और बोनस शेयर और डिविडेंड की जिसे कहते हैं एलिजिबल हो सकते हैं। इस तरह जो आपके सामने डॉक्यूमेंट जिसे कहते हैं खुल जाएगा। अब इन्होंने हर कंपनी का जो है डिक्लेरेशन ऑफ़ राइट इश्यू जो होगा डॉक्यूमेंट इसी तरह का होगा। इसके अंदर नीचे आकर एक ये होगा पर्पस ऑफ़ दिस राइट इश्यू, यानी कि जो कंपनी है ये राइट इश्यू कर रही है तो ये क्यों कर रही है? इसमें बिज़नेस की एक्सपेंशन करनी है, इसमें लोन उतारना है या इसमें क्या करना है? तो जितने भी जो है पर्पस ऑफ़ राइट शेयर के अंदर ही कंपनी की सारी की सारी जो है उन्होंने अपनी अपना रीज़न दिया होता है कि ये जो है राइट शेयर क्यों इश्यू कर रहे हैं। दूसरा ये कंपनी है, इसको बेसिकली जो है बिज़नेस एक्सपेंशन के लिए जो है राइट शेयर चाहिए, यानी कि बिज़नेस एक्सपैंड इसमें करना है। इस तरह से इसको जिसे कहते हैं पैसों की ज़रूरत है और इधर राइट इश्यू की अगर प्राइस देखें तो देखें ₹15। दूसरा मैंने आपको बताया था प्रीमियम ऑफ़, प्रीमियम ऑफ़ रुपीस फाइव है, इसका मतलब है यानी कि ₹15 इसलिए कि ₹10 कंपनी की जो है पर शेयर वैल्यू होगी और ₹10 के ऊपर ये ₹5 एक्स्ट्रा सोच रहे हैं। इधर अगर क्वांटम फ़्रेंडशिप फ़ॉर एवरी 100 ऑर्डिनरी शेयर हेल्ड बाय द शेयर होल्डर ऑफ़ द कंपनी, यानी कि रिकॉर्ड डेट के ऊपर जितने भी जिस बंदे ने शेयर खरीदे होंगे उसकी 50% जो है राइट शेयर मसलन जिसे कहते हैं खरीद सकता है और इन्होंने जो है ₹15 के ऊपर पर राइट, एक राइट शेयर जो इश्यू कर रहे हैं। और दूसरा मैंने आपको बताया था मार्केट प्राइस से जो है कम प्राइस के ऊपर जो शेयर होता है वो इशू होता है। तो ये जो कंपनी है इसने इसकी जो अनाउंसमेंट डेट है वो है मार्च 19, 2021। तो हम देखते हैं मार्च 19, 2021 पे कंपनी का जो अपना शेयर था वो कितने पे ट्रेड कर रहा था और ₹15 का इश्यू कर रहे हैं, इन दोनों में कितना डिफ़रेंस था। अब 19 मार्च को शेयर है वो ₹22 के ऊपर ट्रेड कर रहा था तो यानी कि आपको जो एक शेयर था वो मार्केट प्राइस से ₹7 कम पे मिल रहा था। तो ये जो एक्ज़िस्टिंग शेयर होल्डर्स होते हैं इनका राइट होता है कि एक और शेयर उनको पहले दिया जाए और जो कंपनी होती है वो राइट शेयर जो है मार्केट प्राइस से कम पे जिसे कहते हैं एक्ज़िस्टिंग शेयर होल्डर्स को ऑफर करती है। लेकिन लाज़िमी नहीं है। कभी-कभी जो मार्केट प्राइस है उसके ऊपर, ये कभी मार्केट प्राइस से ज़्यादा प्राइस के ऊपर भी कंपनी है वो राइट शेयर इश्यू करती है जब उनको ज़्यादा कैपिटल की रिक्वायरमेंट होती है। तो आई होप आपको यह छोटी सी वीडियो पसंद आई होगी, समझ आई होगी। फिर भी अगर आपकी कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं और इस वीडियो का पहला पार्ट देखने के लिए अपनी स्क्रीन पर देखी नीचे वाली वीडियो को क्लिक करें।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की छठी क्लास में आपका स्वागत है। दोस्तों, जब भी कोई किसी कंपनी का स्टॉक खरीदा है तो वो मोस्टली प्राइमरी मार्केट की बजाय सेकेंडरी मार्केट से खरीदना है। तो आज मैं आपको बताऊंगा प्राइमरी मार्केट किसे कहते हैं और सेकेंडरी मार्केट किसे कहते हैं और इन दोनों में फर्क क्या है। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, अगर आप बैलेंस या हायर शेयर खरीदना चाहते हैं तो आपके लिए एक बुरी खबर है कि आप इनका शेयर नहीं खरीद सकते। वो क्यों? वो इसलिए क्योंकि ये कंपनी पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट ही नहीं है और जो कंपनी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट ना हो उसका शेयर आप नहीं खरीद सकते। ये पब्लिक लिमिटेड कंपनी नहीं है। अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और पब्लिक लिमिटेड कंपनी, इन दोनों में फर्क क्या है? तो मैं आपको इन दोनों का सबसे बेसिक सा फर्क बता देता हूं, डिटेल इंशाल्लाह इससे आगे आने वाली वीडियो में दूंगा। तो दोस्तों, प्राइवेट लिमिटेड कंपनी वो कंपनी होती है जिसकी ओनरशिप उस कंपनी के फाउंडर, मैनेजमेंट या एक ख़ास ग्रुप ऑफ़ प्राइवेट इन्वेस्टर्स के पास होती है और ऐसी कंपनी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट नहीं होती। जब के पब्लिक लिमिटेड कंपनी वो कंपनी होती है जिसमें कंपनी का कुछ पोर्शन, यानी कंपनी की कुछ ओनरशिप नॉर्मल पब्लिक को शेयर्स की सूरत में आईपीओ के ज़रिए बेच दी जाती है और ऐसी कंपनी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने के लिए एलिजिबल होती है। तो यह सबसे बेसिक फ़र्क है प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और पब्लिक लिमिटेड कंपनी में। ये सब मैं आपको एक मिसाल के ज़रिए समझाता हूं। फ़र्ज़ करें एक कंपनी है एबीसी लिमिटेड, वो अपना बिज़नेस एक्सपैंड करना चाहती है और स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होना चाहती है। तो जाहिर है बिज़नेस एक्सपेंशन के लिए वो पैसे रेज़ करेगी और पैसे रेज़ करने के लिए उसे आईपीओ करना पड़ेगा। जिसमें इन्वेस्टर्स एबीसी लिमिटेड को पैसे देंगे और एबीसी लिमिटेड इन्वेस्टर्स को शेयर देगी। याद रहे, आईपीओ के शेयर खरीदने के लिए आपको किसी भी स्टॉक ब्रोकर की ज़रूरत नहीं होती और ना ही आप स्टॉक एक्सचेंज को अप्रोच करते हैं। आईपीओ के लिए आपको सिर्फ़ एक डीमैट या इन्वेस्टर अकाउंट की ज़रूरत होती है जिसमें आप अपने शेयर्स रिसीव कर सकें, बैंक अकाउंट की ज़रूरत होती है जिससे आप कंपनी को पैसे दे सकें। आपने सिंपली अपने बैंक से एबीसी लिमिटेड को पैसे देने हैं और एबीसी लिमिटेड बदले में आपको शेयर दे देगी। तो ये जो सारा प्रक्रिया होगा जिसमें पैसे इन्वेस्टर से कंपनी को गए और शेयर्स कंपनी से इन्वेस्टर को गए, इसको हम कहेंगे ये सारा प्रक्रिया प्राइमरी मार्केट में एग्ज़ीक्यूट हुआ है क्योंकि इसमें कहीं भी पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज या किसी भी स्टॉक ब्रोकर की कोई इंवॉल्वमेंट नहीं है। इसमें डीलिंग डायरेक्ट इन्वेस्टर और कंपनी के दरमियान हो रही होती है। लेकिन जब एक दफ़ा आईपीओ का प्रक्रिया कंप्लीट हो जाएगा और जो शेयर्स आपने आईपीओ में खरीदे थे वो स्टॉक एक्सचेंज पर सेल-परचेज़ के लिए, यानी ट्रेडिंग के लिए लिस्ट हो जाएंगे, फिर हम कहेंगे ये सेल-परचेज़ सेकेंडरी मार्केट में हो रही है क्योंकि यहां दो इन्वेस्टर एक दूसरे से डील कर रहे हैं और इनको कनेक्ट करने के लिए स्टॉक एक्सचेंज भी इंवॉल्व हो गई है। तो बेसिकली प्राइमरी मार्केट में डील कंपनी और इन्वेस्टर के दरमियान डायरेक्ट हो रही होती है, लेकिन सेकेंडरी मार्केट में, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज इस चीज़ में वहां ट्रांज़ैक्शन दो इन्वेस्टर के दरमियान हो रही होती है। तो ये प्राइमरी और सेकेंडरी मार्केट का एक बेसिक सा कॉन्सेप्ट है। अब मैं आपको प्राइमरी मार्केट की, यानी आईपीओ की थोड़ी बेसिक सी डिटेल समझाता हूं कि प्राइमरी मार्केट में ट्रेड बेसिकली एग्ज़ीक्यूट कैसे होता है। डिटेल्स इंशाल्लाह इससे आगे आने वाली वीडियो में दूंगा। तो फ़र्ज़ करें एबीसी लिमिटेड आईपीओ लाती है अगस्त 2021 में और एक शेयर की प्राइस अनाउंस करती है ₹30। अब शायद आप सोच रहे होंगे ये ₹30 शेयर की प्राइस कैसे डिसाइड हुई है? ये मैं आपको इंशाल्लाह इससे आगे आने वाली वीडियो में डिटेल्स से समझाऊंगा क्योंकि ये जरा कॉम्प्लिकेटेड कॉन्सेप्ट है। तो जब एबीसी लिमिटेड आईपीओ लाती है तो साथ में डेट्स भी अनाउंस करेगी जिस दिन आप कंपनी के शेयर्स खरीद सकते हैं। मान लीजिए कंपनी शेयर्स खरीदने की डेट अनाउंस करती है 19-20 अगस्त। तो ये दो डेट्स कहलाएंगे। फिर आपको सेकेंडरी मार्केट में जाकर शेयर खरीदने पड़ेंगे। तो फ़र्ज़ करें ₹30 पर, तो पहले आप कंपनी को ₹3000 देंगे उसके बाद कंपनी का अपना एडमिन प्रक्रिया स्टार्ट हो जाएगा यानी कि इस इन्वेस्टर से कितने पैसे आए हैं और उसको कितने शेयर्स अलॉट करने हैं और इस काम में मसलन 3 से 4 दिन लग जाएंगे। मसलन 21 अगस्त को ये प्रक्रिया स्टार्ट हो जाएगा और 24 अगस्त को ख़त्म हो जाएगा। तो 24 अगस्त के बाद मसलन 2-3 दिन और लगेंगे शेयर्स आपकी डीमैट अकाउंट में आते-आते और इस सारे प्रक्रिया से पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज की इंवॉल्वमेंट कहीं भी नहीं होगी इसलिए ये सारा प्रक्रिया हज़ बिन एग्ज़ीक्यूटेड इन द प्राइमरी मार्केट। तो जब ये सारा प्रक्रिया कंप्लीट हो जाएगा फिर इसके बाद मसलन कुछ दिन लगेंगे यानी 8-10 दिन और लगेंगे कंपनी के शेयर्स पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पे लिस्ट होते-होते। फिर जब एक दफ़ा जो स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट हो जाएंगे तो आप इन शेयर्स को इज़ीली बाय और सेल कर सकते हैं। लेकिन अगर आप अपने शेयर बेचना चाहते हैं तो आप शेयर कंपनी को ही वापस सेल नहीं कर सकते, सेल कर सकते हैं और स्टॉक एक्सचेंज जितने [संगीत] और कंपनी के दरमियान डायरेक्ट होती है और इसमें स्टॉक एक्सचेंज की किसी भी तरह की कोई इंवॉल्वमेंट नहीं होती। लेकिन सेकेंडरी मार्केट में, जिसको स्टॉक एक्सचेंज भी कहते हैं, वहां डील इन्वेस्टर-कंपनी के बजाय दो इन्वेस्टर्स के दरमियान हो रही होती है। आई होप दिस कॉन्सेप्ट समझ आया होगा। तो अगली बात की अगर अभी तक आपने मेरा चैनल सब्सक्राइब नहीं किया तो चैनल को सब्सक्राइब कर लें और आज की वीडियो आपको कैसी लगी इस बारे में अपने फ़ीडबैक से मुझे कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताइएगा। अपना ख़्याल रखिएगा, अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाज़त। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज, दोस्तों आज मैं आपको बताऊंगा कि स्टॉक मार्केट में किसी भी शेयर की प्राइस ऊपर-नीचे क्यों और कैसे जाती है। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, किसी भी स्टॉक की प्राइस बेसिकली सप्लाई-डिमांड फ़ॉर्मूला के तहत चेंज होती है। अगर किसी स्टॉक की डिमांड ज़्यादा और सप्लाई कम है तो उसकी प्राइस ऊपर चली जाएगी और अगर किसी स्टॉक की डिमांड कम और सप्लाई ज़्यादा है तो उसकी प्राइस नीचे चली जाएगी। जैसे हम सबको पता है ईद उल अज़्हा आने वाली है तो पूरे साल जानवरों की कीमतें बहुत ज़्यादा हैं क्योंकि पूरे साल उनकी डिमांड भी बहुत ज़्यादा है। लेकिन जब ईद गुज़र जाएगी तो जानवरों की डिमांड कम हो जाएगी जिसके नतीजे में उनकी कीमतें भी कम हो जाएंगी। सेम यही फ़ॉर्मूला स्टॉक मार्केट में भी अप्लाई होता है। और जैसे जानवर खरीदते वक़्त बारगेनिंग हो रही होती है, यानी जानवर बेचने वाला अपनी डिमांड बताता है और खरीदार अपनी ऑफ़र बताता है और एक प्राइस पे वो फ़ाइनल हो जाता है। इसी तरह स्टॉक मार्केट में भी बारगेनिंग होती है और हर स्टॉक के साथ एक एलटीपी बिल्ड होता है, जिसको आप बोली भी कह सकते हैं, वो प्राइस होती है जो शेयर खरीदने वाला शेयर बेचने वाले को ऑफ़र कर रहा होता है, जो शेयर बेचने वाला शेयर खरीदने वाले से डिमांड कर रहा होता है और एलटीपी यानी लास्ट ट्रेडेड प्राइस वो प्राइस होती है जिस पर लास्ट ट्रेड एग्ज़ीक्यूट हुआ होता है, यानी जिस प्राइस पर लास्ट शेयर डी फ़ाइनल हुआ होता है। जैसे स्क्रीनशॉट में दिखा रहा हूं और यहां लिखा हुआ है ₹9040 हुआ है।

अब आप सोच रहे होंगे मैं बताऊंगा कि अगर बायर और सेलर्स प्राइस पर एग्री ही नहीं करते तो ट्रेड एग्ज़ीक्यूट कैसे होगा? बहुत अच्छा सवाल है। ये सब कुछ समझने के लिए आपको स्टॉक मार्केट में ऑर्डर टाइप समझनी होंगी। स्टॉक मार्केट में कितनी तरह के ऑर्डर्स प्लेस होते हैं? फ़िलहाल मैं आपको सिर्फ़ इस वीडियो से रिलेटेड ऑर्डर टाइप्स बताता हूं, डिटेल इंशाल्लाह इससे नेक्स्ट वीडियो में बताऊंगा। तो हमारे पास एक होता है लिमिट ऑर्डर और एक होता है मार्केट ऑर्डर। इनकी डिटेल जानने से पहले आपके लिए एक बार जानना बहुत ज़रूरी है कि स्टॉक मार्केट में पहले आओ पहले पाओ की पॉलिसी इम्प्लीमेंट होती है, यानी फ़र्ज़ करें एक ही कंपनी का स्टॉक दो इन्वेस्टर्स से सेम रेट पे सेल कर रहे हैं तो जो लाइन में आगे लगा हुआ होगा, यानी जिसने पहले सेल ऑर्डर प्लेस किया होगा उसका शेयर पहले बिकेगा। चलिए अब आपको लिमिट ऑर्डर और मार्केट ऑर्डर की डिटेल्स बताता हूं। दोस्तों, लिमिट ऑर्डर वो ऑर्डर होता है जिसमें इन्वेस्टर अपनी मर्ज़ी की प्री-डिटरमाइंड प्राइस सेट करता है और ये ऑर्डर तभी एग्ज़ीक्यूट होता है जब इन्वेस्टर को अपनी मर्ज़ी का आइडियल बायर या सेलर मिलता है। तो अगर कोई ₹30.50 पैसे के हिसाब से स्टॉक सेल करने के लिए एग्री हो गया तो मेरा ऑर्डर एग्ज़ीक्यूट हो जाएगा वर्ना वैसे का वैसा ही मार्केट में लगा रहेगा और कभी भी एग्ज़ीक्यूट नहीं होगा। इम्प्लीमेंट होगा अगर सेलर लिमिट ऑर्डर लगता है ₹30 पर आस्क प्राइस के हिसाब से तो अगर तो कोई इस प्राइस पे स्टॉक खरीदने के लिए एग्री हो गया तो ठीक वर्ना ये ऑर्डर वैसे का वैसा ही लगा रहेगा और कभी भी एग्ज़ीक्यूट नहीं होगा। और अगर इस पर्टिकुलर शेयर की प्राइस करेंटली ₹30.60 पैसे के आसपास चल रही है, यानी ₹30.62 पैसे या ₹30.63 पैसे तो शेयर इसी रेट पर ट्रेड होता रहेगा। नेक्स्ट है मार्केट ऑर्डर। दोस्तों, लिमिट ऑर्डर एग्ज़ीक्यूट होने में मार्केट ऑर्डर बहुत ज़्यादा हेल्पफुल साबित होते हैं और मार्केट ऑर्डर ही सबसे कॉमन टाइप ऑफ़ ऑर्डर्स होते हैं। मार्केट ऑर्डर में इन्वेस्टर कोई प्री-डिटरमाइंड प्राइस सेट नहीं करते हैं, यानी जैसे ही आप बाय पर क्लिक करते हैं तो उसी वक़्त, यानी उसी माइक्रो सेकंड आपका ऑर्डर एग्ज़ीक्यूट हो जाता है और आपको लिमिट ऑर्डर की तरह वेट नहीं करना पड़ता। जब भी मार्केट ऑर्डर होता है तो उसे माइक्रो सेकंड में जो सबसे रीज़नेबल आस्क प्राइस डिमांड हो रही होती है ब्रोकर उसे रेट पर ऑर्डर एग्ज़ीक्यूट करने की कोशिश करता है। अगर आप किसी शेयर को बाय करने के लिए मार्केट ऑर्डर प्लेस करते हैं और जिस माइक्रो सेकंड में आपका ऑर्डर प्लेस हुआ है उस टाइम पर मार्केट में दो सेलर्स हैं जिन्होंने अपने शेयर्स सेल करने के लिए लिमिट ऑर्डर प्लेस किए हुए हैं तो दोनों में से जिसकी आस्क प्राइस ज़्यादा रीज़नेबल होगी आपको उसे रेट पे शेयर मिल जाएंगे। यानी फ़र्ज़ करें एक इन्वेस्टर ने आस्क प्राइस लगाई हुई है ₹30.60 पैसे और दूसरे इन्वेस्टर ने आस्क प्राइस लगाई हुई है ₹30.62 पैसे तो आपको ₹30.60 पैसे के हिसाब से शेयर्स मिल जाएंगे।

तो अब बात करते हैं ये शेयर प्राइस ऊपर-नीचे कैसे मूव करती है। दोस्तों, फ़र्ज़ करें कोई कंपनी है, टेक्नोलॉजी कंपनी है जिसका शेयर ट्रेड हो रहा है ₹45-₹50 के आसपास। लेकिन कंपनी अनाउंस करती है कि उसने कोई ऐसी टेक्नोलॉजी इज़ाद कर दी है जो दुनिया में पहले किसी ने नहीं की और ये टेक्नोलॉजी दुनिया बदल देगी। तो जैसे ही ये न्यूज़ आएगी जाहिर है हर कोई इस कंपनी के शेयर्स खरीदना चाहेगा क्योंकि इस कंपनी में ग्रो होने का बहुत ज़्यादा प्रॉस्पेक्ट नज़र आ रहा है। तो अब जब इस कंपनी के शेयर्स की डिमांड बहुत ज़्यादा हो जाएगी तो जो सेलर्स हैं, यानी जिनके पास इस कंपनी के शेयर्स ऑलरेडी हैं ज़ाहिर है उनका अपर हैंड हो जाएगा और वो अपनी मर्ज़ी की प्राइस डिमांड करना शुरू कर देंगे। ये मैं आपको एक एग्ज़ांपल के ज़रिए समझाता हूं। फ़र्ज़ करें फ़ैसल, इब्राहिम और हसन। फ़ैसल के पास इस कंपनी के 500 शेयर्स हैं, इब्राहिम के पास 1000 और हसन के पास 2500, यानी कुल मिलाकर इन

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में ज्यादातर तीन किस्म के ऑर्डर लगते हैं: लिमिट ऑर्डर, मार्केट ऑर्डर और स्टॉप लॉस ऑर्डर। इससे पिछली वीडियो में मैंने आपको बताया था मार्केट ऑर्डर क्या होता है और लिमिट ऑर्डर क्या होता है। तो इस वीडियो में मैं आपको बताऊंगा स्टॉप लॉस ऑर्डर क्या होता है। लेकिन अगर आपने मेरी इससे पिछली वीडियो नहीं देखी, तो मैं हाईली रिकमेंड करूंगा कि पहले आप वो वीडियो देख लें क्योंकि इस वीडियो को समझने के लिए आपका मार्केट ऑर्डर और लिमिट ऑर्डर का कॉन्सेप्ट क्लियर होना बहुत जरूरी है। तो बिना टाइम वेस्ट किए, चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं।

स्टॉप लॉस दोस्तों, यह नाम सुनकर ही समझ आ जाती है कि यह ऑर्डर लॉस को स्टॉप यानी नुकसान को रोकने के लिए लगाया जाता है। और यह ऑर्डर सिर्फ सेल के लिए ही वैलिड होता है। यानी जब मार्केट ओपन होगी, तब अगर आपने ऑर्डर प्लेस कर दिया, तो अगर आपकी मर्जी की प्राइस पर आने पर मार्केट ऑर्डर में कन्वर्ट हो जाता है। और दूसरा होता है स्टॉप लिमिट ऑर्डर, जो आपकी मर्जी की प्राइस पर आने पर लिमिट ऑर्डर में कन्वर्ट हो जाता है। क्योंकि स्टॉक मार्केट में टाइम लाखों करोड़ शेयर ट्रेड हो रहे होते हैं, इसलिए अचानक प्राइस मूवमेंट, जिससे वोलैटिलिटी भी कहते हैं, उसे बचने के लिए स्टॉप लॉस ऑर्डर काफी ज्यादा मुफीद साबित होता है। तो स्टॉप लॉस किसे कहते हैं? इन दोनों में फर्क क्या है? और ये कब, कैसे और क्यों लगाते हैं? इन तमाम सवालों के जवाब में आपको एक सिंपल सी एग्जांपल के जरिए समझाता हूँ।

दोस्तों, फ़र्ज़ करें आपको शेयर खरीदते हैं ₹50 का। तो जाहिर है आपका प्राइमरी मकसद तो यही होगा कि इस शेयर को महंगा करके बेच दें। यानी ₹50 का शेयर लिया है, तो इसको 52-53 रुपए का बेचते हैं। लेकिन क्योंकि स्टॉक मार्केट में लॉस का भी खतरा रहता है, इसलिए अपनी शेयर साइड के लिए आप स्टॉप लॉस ऑर्डर लगा देते हैं ₹45 का। ₹45 का इसलिए क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि स्टॉक थोड़ा तो नीचे जाता है, लेकिन बाउंस करके वापस ऊपर आ जाता है। यानी आपने स्टॉक खरीदा ₹50 का, तो हो सकता है स्टॉक 48-49 रुपए तक नीचे जाए और वापस ट्रांस करके ₹50 से ऊपर वापस आ जाए। तो अब आप कहते हैं 48-49 तक में लॉस बर्दाश्त कर सकता हूँ, लेकिन अगर स्टॉक ₹45 रुपए तक नीचे चला गया, फिर मैं इसको एस सून एज़ पॉसिबल सेल करना चाहता हूँ क्योंकि मुझे नहीं लगता बिना टैरिफ़ पे जाने के बाद ये इतनी जल्दी ऊपर आएगा। तो अब आप सिंपल स्टॉप लॉस ऑर्डर प्लेस कर देंगे ₹45 का, जो एकदम मार्केट ऑर्डर की तरह व्यवहार करेगा। यानी ₹45 पे जाके आपका स्टॉप लॉस ऑर्डर स्टॉक एक्सचेंज पे एकदम मार्केट ऑर्डर प्लेस हो जाएगा और जो भी पहली बेस्ट प्राइस मिलेगी, उस पे आपका ट्रेड एग्जीक्यूट हो जाएगा। इस ऑर्डर में गारंटी नहीं है कि आपको एग्जैक्ट ₹45 ही पर शेयर मिलेंगे। वो क्यों? वो इसलिए क्योंकि ये आगे जाके एकदम मार्केट ऑर्डर की तरह एग्जीक्यूट होगा। लेकिन अगर आप चाहते हैं आपको एग्जैक्ट आपके मर्जी की प्राइस मिले, फिर आप प्लेस करेंगे स्टॉप लिमिट ऑर्डर, जिसमें आप एक ट्रिगर प्राइस सेट करेंगे और एक लिमिट प्राइस सेट करेंगे। यानी फ़र्ज़ कर लें आप ट्रिगर प्राइस सेट करते हैं ₹46 और लिमिट प्राइस सेट करते हैं ₹45 रुपए। इसका मतलब यह है कि आप कहेंगे कि अगर स्टॉक ₹46 पर जाता है तो मेरा स्टॉप लॉस ऑर्डर एक्टिव हो जाए, लेकिन क्योंकि मेरी लिमिट प्राइस ₹45 रुपए है, इसलिए मैं ₹45 रुपए से कम प्राइस में शेयर्स सेल करने के लिए रेडी नहीं हूँ। यानी मुझे ₹45 से ₹46 के दरमियां ही अपने शेयर सेल करने हैं। और अगर शेयर प्राइस ₹45 से नीचे जाती है तो मैं अपने शेयर सेल नहीं करूंगा। तो ये बेसिकली सिंपल सा कॉन्सेप्ट होता है स्टॉप लॉस ऑर्डर का।

तो अगली बात कि अगर अभी तक आपने मेरा चैनल सब्सक्राइब नहीं किया, तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकॉन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि आपको मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो के नोटिफिकेशन मिल सकें। और आज की वीडियो आपको कैसी लगी, इस बारे में अपने फीडबैक से मुझे कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा। अपना रखिएगा बहुत सा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

है तो मैन लेते हैं सेलिंग साइट पर फैसल का ऑर्डर सबसे पहले प्लेस हुआ, एग्जीक्यूट हो जाएगा। तो स्टॉक एक्सचेंज पर एलटीपी यानी लास्ट ट्रेडेड प्राइस ₹200 शो होगी। तो इब्राहीम और हसन देखे कहेंगे कि हमारे शेयर तो बहुत ज्यादा डिमांड में हैं, लोग दो-दो ₹100 देने को तैयार हैं। तो इब्रा अल्टीमेट ऑर्डर लगा देता है ₹250 आसपास के हिसाब से। और आखिर में हसन लिमिट ऑर्डर लगा देता है ₹350 अस प्राइस के हिसाब से। अब स्टॉक एक्सचेंज पर एक और मार्केट ऑर्डर लग जाता है 3500 शेयर्स का कि मुझे इस कंपनी के 350 शेयर्स चाहिए, चाहे जिस मर्जी रेट में मिले। तो इसमें इब्राहीम का लिमिट ऑर्डर पहले प्लेस हुआ था, तो जाहिर है पहले एग्जीक्यूट भी उसी का ऑर्डर होगा। और इस तरह एलटीपी ₹200 से ₹250 हो जाएगी। फिर हसन का ऑर्डर एग्जीक्यूट होगा और जून देखते ही देखते ₹45 पे ₹50 वाला शेयर ₹350 भी ट्रेड होना शुरू हो जाएगा। से यही कॉन्सेप्ट दूसरे सिनेरियो में भी अप्लाई होगा कि अगर किसी कंपनी का शेयर ₹200 के आसपास ट्रेड कर रहा है, लेकिन कंपनी को लेकर कोई बुरी खबर आ जाती है कि कंपनी को किसी वजह से बहुत बड़ा लॉस हो गया है, तो अब बायर्स का अपर हैंड हो जाएगा और स्टॉक सेल करने वाले मार्केट ऑर्डर लगाना शुरू कर देंगे। और ₹200 से ₹150 रुपए हो जाएगी। फिर कोई और बायर आएगा जो लिमिट ऑर्डर लगा देगा ₹120 बिट प्राइस के हिसाब से और इस तरह एलटीपी ₹150 रुपए से ₹120 रुपए हो जाएगी। एंड सो ऑन। एक और बात का बहुत ज्यादा ध्यान रखें कि मैं यह सब आपको सिर्फ मिसाल देने के लिए समझा रहा हूँ, वर्ना स्टॉक एक्सचेंज पे एक टाइम लाखों करोड़ रुपए के शेयर ट्रेड हो रहे होते हैं।

तो अगली बात कि अगर अभी तक आपने मेरा चैनल सब्सक्राइब नहीं किया, तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकॉन पे क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि आपको मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफिकेशन मिल सके। और आज की वीडियो आपको कैसी लगी, इस बारे में अपने फीडबैक से मुझे कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा। अपना रखिएगा बहुत सा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज। दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में ज्यादातर तीन किस्म के ऑर्डर लगते हैं: लिमिट ऑर्डर, मार्केट ऑर्डर और स्टॉप लॉस ऑर्डर। इससे पिछली वीडियो में मैंने आपको बताया था मार्केट ऑर्डर क्या होता है और लिमिट ऑर्डर क्या होता है। तो इस वीडियो में मैं आपको बताऊंगा स्टॉप लॉस ऑर्डर क्या होता है। लेकिन अगर आपने मेरी इससे पिछली वीडियो नहीं देखी, तो मैं हाईली रिकमेंड करूंगा कि पहले आप वो वीडियो देख लें क्योंकि इस वीडियो को समझने के लिए आपका मार्केट ऑर्डर और लिमिट ऑर्डर का कॉन्सेप्ट क्लियर होना बहुत जरूरी है। तो बिना टाइम वेस्ट किए, चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं।

स्टॉप लॉस दोस्तों, यह नाम सुनकर ही समझ आ जाती है कि यह ऑर्डर लॉस को स्टॉप यानी नुकसान को रोकने के लिए लगाया जाता है। और यह ऑर्डर सिर्फ सेल के लिए ही वैलिड होता है। यानी जब मार्केट ओपन होगी, तब अगर आपने ऑर्डर प्लेस कर दिया, तो अगर आपकी मर्जी की प्राइस पर आने पर मार्केट ऑर्डर में कन्वर्ट हो जाता है। और दूसरा होता है स्टॉप लिमिट ऑर्डर, जो आपकी मर्जी की प्राइस पर आने पर लिमिट ऑर्डर में कन्वर्ट हो जाता है। क्योंकि स्टॉक मार्केट में टाइम लाखों करोड़ शेयर ट्रेड हो रहे होते हैं, इसलिए अचानक प्राइस मूवमेंट, जिससे वोलैटिलिटी भी कहते हैं, उसे बचने के लिए स्टॉप लॉस ऑर्डर काफी ज्यादा मुफीद साबित होता है। तो स्टॉप लॉस किसे कहते हैं? इन दोनों में फर्क क्या है? और ये कब, कैसे और क्यों लगाते हैं? इन तमाम सवालों के जवाब में आपको एक सिंपल सी एग्जांपल के जरिए समझाता हूँ।

दोस्तों, फ़र्ज़ करें आपको शेयर खरीदते हैं ₹50 का। तो जाहिर है आपका प्राइमरी मकसद तो यही होगा कि इस शेयर को महंगा करके बेच दें। यानी ₹50 का शेयर लिया है, तो इसको 52-53 रुपए का बेचते हैं। लेकिन क्योंकि स्टॉक मार्केट में लॉस का भी खतरा रहता है, इसलिए अपनी शेयर साइड के लिए आप स्टॉप लॉस ऑर्डर लगा देते हैं ₹45 का। ₹45 का इसलिए क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि स्टॉक थोड़ा तो नीचे जाता है, लेकिन बाउंस करके वापस ऊपर आ जाता है। यानी आपने स्टॉक खरीदा ₹50 का, तो हो सकता है स्टॉक 48-49 रुपए तक नीचे जाए और वापस ट्रांस करके ₹50 से ऊपर वापस आ जाए। तो अब आप कहते हैं 48-49 तक में लॉस बर्दाश्त कर सकता हूँ, लेकिन अगर स्टॉक ₹45 रुपए तक नीचे चला गया, फिर मैं इसको एस सून एज़ पॉसिबल सेल करना चाहता हूँ क्योंकि मुझे नहीं लगता बिना टैरिफ़ पे जाने के बाद ये इतनी जल्दी ऊपर आएगा। तो अब आप सिंपल स्टॉप लॉस ऑर्डर प्लेस कर देंगे ₹45 का, जो एकदम मार्केट ऑर्डर की तरह व्यवहार करेगा। यानी ₹45 पे जाके आपका स्टॉप लॉस ऑर्डर स्टॉक एक्सचेंज पे एकदम मार्केट ऑर्डर प्लेस हो जाएगा और जो भी पहली बेस्ट प्राइस मिलेगी, उस पे आपका ट्रेड एग्जीक्यूट हो जाएगा। इस ऑर्डर में गारंटी नहीं है कि आपको एग्जैक्ट ₹45 ही पर शेयर मिलेंगे। वो क्यों? वो इसलिए क्योंकि ये आगे जाके एकदम मार्केट ऑर्डर की तरह एग्जीक्यूट होगा। लेकिन अगर आप चाहते हैं आपको एग्जैक्ट आपके मर्जी की प्राइस मिले, फिर आप प्लेस करेंगे स्टॉप लिमिट ऑर्डर, जिसमें आप एक ट्रिगर प्राइस सेट करेंगे और एक लिमिट प्राइस सेट करेंगे। यानी फ़र्ज़ कर लें आप ट्रिगर प्राइस सेट करते हैं ₹46 और लिमिट प्राइस सेट करते हैं ₹45 रुपए। इसका मतलब यह है कि आप कहेंगे कि अगर स्टॉक ₹46 पर जाता है तो मेरा स्टॉप लॉस ऑर्डर एक्टिव हो जाए, लेकिन क्योंकि मेरी लिमिट प्राइस ₹45 रुपए है, इसलिए मैं ₹45 रुपए से कम प्राइस में शेयर्स सेल करने के लिए रेडी नहीं हूँ। यानी मुझे ₹45 से ₹46 के दरमियां ही अपने शेयर सेल करने हैं। और अगर शेयर प्राइस ₹45 से नीचे जाती है तो मैं अपने शेयर सेल नहीं करूंगा। तो ये बेसिकली सिंपल सा कॉन्सेप्ट होता है स्टॉप लॉस ऑर्डर का।

तो अगली बात कि अगर अभी तक आपने मेरा चैनल सब्सक्राइब नहीं किया, तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकॉन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि आपको मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो के नोटिफिकेशन मिल सकें। और आज की वीडियो आपको कैसी लगी, इस बारे में अपने फीडबैक से मुझे कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा। अपना रखिएगा बहुत सा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की नाइंथ क्लास में खुशामदी। दोस्तों, आज मैं आपको बताऊंगा शॉर्ट सेलिंग किसे कहते हैं। तो बिना टाइम वेस्ट किए, चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, स्टॉक मार्केट से प्रॉफिट कमाने का नॉर्मल तरीका तो यह है कि पहले आप सस्ते में स्टॉक बाय करें, बाद में जब स्टॉक महंगा हो तो उसे सेल करें। मतलब पहले आप ₹100 का स्टॉक बाय करेंगे और बाद में ₹105 का सेल करेंगे और पर शेयर ₹5 का प्रॉफिट बना लेंगे। लेकिन शॉर्ट सेलिंग में इससे बिल्कुल उल्टा होता है। यानी मसलन पहले आप ₹105 का स्टॉक सेल करेंगे और बाद में ₹100 का बाय करके ₹5 पर शेयर प्रॉफिट बनाएंगे। लेकिन ये सब होगा कैसे? इसका बहुत सिंपल सा कॉन्सेप्ट है जो मैं आपको एक सिंपल सी एग्जांपल के जरिए समझाता हूँ। यह है जैन, जो अंदाजा लगाता है कि होंडा पाकिस्तान की सेल्स इस साल इतनी अच्छी नहीं है, जिसका नतीजा में होंडा की स्टॉक प्राइस नीचे गिरने वाली है। तो अपने इस प्रिडिक्शन से फायदा उठाने के लिए जैन अपने स्टॉक ब्रोकर को फोन करता है कि मैं होंडा का एक शेयर शॉर्ट करना चाहता हूँ। अब जैन का ब्रोकर जैन को कहीं से ढूंढ के होंडा का एक शेयर उधार देगा, जिसको मार्केट में ₹400 का बेच देगा। प्रिडिक्शन सही साबित हो जाती है और होंडा कंपनी अनाउंस करती है कि उनके इस साल सेल्स उतनी अच्छी नहीं हुई, जिसके नतीजे में इन्वेस्टर्स अपने शेयर धड़ाधड़ बेचना शुरू कर देते हैं और होंडा की शेयर प्राइस ₹400 से ₹200 पर आ जाती है। अब जैन के अकाउंट में जो ₹400 पड़े हुए हैं, उनमें से ₹200 के शेयर खरीद कर अपने ब्रोकर को वापस देगा जो उसने उधार लिया था और इस तरह ₹200 का प्रॉफिट बना लेगा। लेकिन शॉर्ट सेलिंग में सब कुछ अच्छा ही नहीं होता। फ़र्ज़ करें अगर जैन की कैलकुलेशन रॉन्ग हो जाती और होंडा कंपनी अनाउंस करती उसकी सेल पिछले साल के निस्बत 20% ज्यादा हुई हैं, तो इसके नतीजे में हो सकता था शेयर प्राइस ₹400 से ₹600 पर चली जाती। फिर अपने ब्रोकर को वापस देना पड़ता जिस पर उसे अपनी जेब से ₹200 देने पड़ते हैं। इसलिए शॉर्ट सेलिंग जहां प्रॉफिटिंग है वहाँ काफी रिस्की है क्योंकि इसमें आपका प्रॉफिट तो कैलकुलेट होता है लेकिन आपके लॉसेस अनलिमिटेड हो सकते हैं। मसलन जैसे ₹400 के शेयर शॉर्ट किया था, तो शेयर मैक्सिमम ₹400 तक नीचे जा सकता था और जैन मैक्सिमम ₹400 ही प्रॉफिट बना सकता था। लेकिन अगर शेयर ₹400 से बढ़कर ₹1600 हो जाता तो जितना उसको प्रॉफिट हो सकता था उससे ट्रिपल उसको नुकसान हो जाता क्योंकि ₹400 तो ऑलरेडी उसके पास अकाउंट में शेयर बेच के लेकिन शेयर खरीद कर वापस करने के लिए उसको ₹1200 अपनी जेब से देने पड़ते। इसलिए जो स्टॉक मार्केट में नए-नए आते हैं उनको मैं यही मशवरा दूंगा कि रिस्की चीजों से जरा दूर रहिए और शॉर्ट टर्म प्रॉफिट के पीछे ना भागिए, बल्कि वॉरेन बफेट, जो हिस्ट्री के ग्रेटेस्ट इन्वेस्टर हैं, उनकी तरह हमेशा लॉन्ग टर्म इन्वेस्टिंग करें।

तो अगर आपको आज की वीडियो पसंद आई है तो चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाले तमाम वीडियो की नोटिफिकेशन आपको मिल सकें। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज। दोस्तों, आज मैं आपको पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज की वेबसाइट के बारे में कुछ चीजें समझाऊँगा। लेकिन वीडियो स्टार्ट करने से पहले एक बात कहना चाहता हूँ कि आप लोग अक्सर पूछते हैं कि यह कोर्स कब खत्म होगा? तो इस कोर्स के इंशाअल्लाह टोटल 55 से 60 क्लासेस होंगी, शायद दिसंबर तक भी हो जाए। और आप लोग कहते हैं कि वीडियो जल्दी अपलोड किया करें। तो ट्रस्ट मी, ये वीडियो को बनाने में बहुत ज्यादा मेहनत लगती है, जो मैं सिर्फ आपके लिए कर रहा होता हूँ। और मेरी पूरी कोशिश होती है कि वीडियो जल्द जल्द बनाकर अपलोड किया करूँ, लेकिन फिर भी मेरी कुछ पर्सनल लिमिटेशंस होती हैं। आप लोग वीडियो को इतना पसंद कर रहे हैं, इतना प्यार दे रहे हैं, उसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। राइट साइड में एक psx.com.pk और एक डाटा पोर्टल वेबसाइट है dpsx.com.pk। तो अगर आपको किसी भी कंपनी की कोई इनफॉरमेशन चाहिए हो, जैसे कि उसकी शेयर प्राइस, डिविडेंड, बोनस शेयर, राइजर वगैरा, तो इन तमाम चीजों की मालूमात आपको डाटा पोर्टल वेबसाइट यानी dpsx.com.pk से मिलेंगे। तो जब आप डाटा पोर्टल ओपन करेंगे, तो आपके सामने सबसे पहले के 100 इंडेक्स का या के 400 का ओपन होगा। तब इंडेक्स क्या होते हैं, ये मैं आपको आगे आने वाली वीडियो में डिटेल्स से समझाऊँगा। आज सिर्फ कंपनी पेज के बारे में आपको कुछ बातें बताऊँगा। और अगर आप नहीं जानते कि किसी भी कंपनी को स्टॉक एक्सचेंज पर कैसे ढूंढते हैं, तो इससे पहले मैंने ऑलरेडी एक वीडियो बनाई हुई है, जिसको आप टॉप राइट लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं। तो जब भी आप किसी कंपनी का पेज ओपन करेंगे, तो आपके सामने कुछ इस तरह का डाटा शो होगा। यह जो आपके सामने चार्ट शो हो रहा है, यह आपको बताता है कि पूरे दिन में कंपनी की स्टॉक प्राइस कितनी ऊपर या नीचे गई। इसका टाइम भी आप अपनी मर्जी से सेट कर सकते हैं। जैसे वन डे का मतलब है एक दिन का, टुडे का मतलब है आज का, फर्स्ट जनवरी से करंट तारीख तक का डाटा। मसलन अगर मैं 25 जुलाई को वन डे पर क्लिक करूँ, तो ये मुझे फर्स्ट जनवरी 2021 से लेकर 25 जुलाई 2021 तक का सारा डाटा दे देगा। और थ्री इयर्स, फाइव इयर्स का मतलब है 3 साल, 5 साल का डाटा। अच्छा, एक बात याद रखें, इस वीडियो में मैं आपको बिल्कुल बेसिक बेसिक चीजें समझा रहा हूँ। यानी जिन चीजों को ज्यादा डिटेल एक्सप्लेनेशन की जरूरत नहीं है, सिर्फ वही चीजें समझा रहा हूँ। जिन चीजों को ज्यादा डिटेल एक्सप्लेनेशन की जरूरत है, उनको हम इस वीडियो में स्किप कर रहे हैं। वह इंशाअल्लाह आगे आने वाली वीडियो में बताऊँगा। तो नेक्स्ट लिखा हुआ है ओपन। ओपन का मतलब है कि जब सुबह 9:30 पर मार्केट ओपन हुई थी, तो इस शेयर का जो सबसे पहले एग्जीक्यूट हुआ था, यानी इस शेयर का सबसे पहला जो सौदा हुआ था, वो इस पार्टिकुलर प्राइस पर यानी 89.82 पैसे पर हुआ था। ओपनिंग प्राइस को आप दिन की सबसे पहली एलटीपी यानी लास्ट ट्रेडेड प्राइस भी कह सकते हैं। अगर आप नहीं जानते एलटीपी किसे कहते हैं, तो मेरी क्लास 7 देख लें, उसमें मैंने डिटेल से यह चीज समझाई हुई है। नेक्स्ट लिखा है हाई। हाई का मतलब है कि पूरे दिन में, यानी मार्केट ओपन होने से मार्केट क्लोज होने तक, इस पूरे दिन में इस शेयर का सबसे महंगा सौदा कितने का हुआ है। जैसे इस शेयर की हाई प्राइस ₹90.90 पैसे लिखी हुई है। इसका मतलब है कि मार्केट ओपन होने से अभी तक शेयर का सबसे महंगा सौदा ₹90 के हिसाब से हुआ है। अच्छा, यह स्क्रीनशॉट जो है, यह 15 जुलाई 2021 सुबह 10:34 का है। तो इसका मतलब यह है कि मार्केट ओपन होने से अभी तक यानी सुबह 9:30 से लेकर 10:34 तक इसका सबसे महंगा सौदा ₹90 शेयर के हिसाब से हुआ है। जब मार्केट 4:00 बजे पर क्लोज होगी, तो हो सकता है इसकी हाई प्राइस चेंज हो जाए। सिमिलरली, नेक्स्ट लिखा हुआ है लो। जिस तरह हाई होता है, उसका अपोजिट होता है लो, कि पूरे दिन में किसी भी शेयर का सबसे सस्ता सौदा कितने का हुआ है। जैसे इस शेयर के लो प्राइस ₹89.50 लिखी हुई है। इसका मतलब है कि मार्केट ओपन होने से अभी तक शेयर का सबसे सस्ता सौदा ₹89.50 के हिसाब से हुआ है। नेक्स्ट लिखा हुआ है वॉल्यूम। वॉल्यूम का मतलब है कि पूरे दिन में किसी भी कंपनी के टोटल कितने शेयर्स ट्रेड हुए। पूरे दिन में किसी भी कंपनी के टोटल कितने शेयर्स का सौदा हुआ है। मतलब फ़र्ज़ करें एक बंदा है कासिम, जिसने 100 शेयर्स बेचे हैं और एक बंदा है फैसल, जिसने कासिम से 100 शेयर्स खरीदे हैं, तो वॉल्यूम 200 नहीं बल्कि 100 दिखाएगी, क्योंकि जो टोटल नंबर ऑफ़ शेयर्स बाय और सेल हुए हैं, वो 100 ही है। और जैसे यहां 86,813 लिखा हुआ है, इसका मतलब है कि पूरे दिन में अभी तक इतने शेयर्स का सौदा हुआ है। नेक्स्ट है सर्किट ब्रेकर्स। एक तरफ लिखा हुआ है 83.86 और दूसरी तरफ लिखा हुआ है 96.56। इसका मतलब है कि अगर स्टॉक की प्राइस 83.86 तक नीचे गिर गई, तो लोअर कैप लग जाएगा और अगर स्टॉक की प्राइस 96.56 पैसे तक ऊपर चली गई, तो अप्पर कैप लग जाएगा। अब लोअर कैप और अप्पर कैप क्या होता है, यह कॉन्सेप्ट थोड़ा सरल नहीं है, इसलिए इस टॉपिक को मैं इस वीडियो के लिए छोड़ रहा हूँ। यह सब मैं आपको इंशाअल्लाह आगे आने वाली वीडियो में समझाऊँगा। ताकि जब भी मैं नई वीडियो अपलोड करूँ, तो उसका नोटिफिकेशन आपको मिल सके। तो नेक्स्ट हमारे पास है डे रेंज। ये पहले वाला ही कॉन्सेप्ट है हाई एंड लो वाला, बस इसको थोड़े शॉर्ट में दे दिया है, कि स्टॉक एक दिन में सबसे ऊपर कितना गया और सबसे नीचे कितना गया। अच्छा अब ये जो ब्लैक डॉट है सेंटर में, ये रिप्रेजेंट कर रहा है कि इस शेयर का लास्ट रेट किस प्राइस पे एग्जीक्यूट हुआ था। जैसे ऊपर एलटीपी लिखी हुई है ₹90.40 पैसे, तो यह प्राइस ₹89.50 और ₹90.90 के दरमियां फल करती है, इसलिए यह ब्लैक डॉट इस बार के सेंटर में है। नीचे लिखी हुई है आस्क प्राइस, आस्क वॉल्यूम, बिड प्राइस। ये सब चीजें मैंने क्लास नंबर सेवन में बता चुका हूँ, इसलिए इस वीडियो में इन चीजों को मैं स्किप कर रहा हूँ। उससे नीचे लिखा हुआ है डीसीपी। डीसीपी का मतलब है लास्ट डे क्लोजिंग प्राइस, यानी करंट डेट से पिछले दिन शेयर किस रेट पर बंद हुआ है। आज 15 जुलाई 2021 का है, तो एलडीसीपी बता रही है कि 14 जुलाई 2021 को इस शेयर का लास्ट प्राइस ₹89.82 पैसे के हिसाब से हुआ था। इसलिए अगर आप देखें तो एलटीपी के आगे एक छोटा सा अप या डाउन का ऐरो बना हुआ है और आगे 0.58 लिखा हुआ है। इसका मतलब है कि डीसीपी ₹89.82 पैसे के मुकाबले में यह शेयर अभी 0.58 पैसे महंगा ट्रेड कर रहा है। आगे लिखा है P/E रेशियो, जिसको वैल्यू कहते हैं, उससे आगे लिखा हुआ है हेयरकट और उससे आगे लिखा हुआ है पे आउट रेशियो। इन तीनों टर्म्स को बहुत ज्यादा डिटेल एक्सप्लेनेशन की जरूरत है, इसलिए इन तीनों चीजों को हम इस वीडियो में स्किप कर रहे हैं। नीचे लिखा हुआ है वन ईयर चेंज 53.12% और उससे आगे लिखा हुआ है वाईटीडी चेंज -3.04%। अब जो वन ईयर चेंज 53.12% लिखा हुआ है, इसका मतलब है कि 1 साल पहले यानी जुलाई 2020 के निस्बत यह शेयर 53.12% महंगा ट्रेड कर रहा है और आगे लिखा है -3.04%, यानी साल शुरू होने से अब तक, यानी फर्स्ट जनवरी 2021 से 15 जुलाई तक यह 3.04% वैल्यू खो चुका है। तो यह थी आज की वीडियो। अगर आपको यह वीडियो पसंद आई है, तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकॉन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 11th क्लास में खुशामदी। दोस्तों, आप लोगों के बहुत ज्यादा सवाल आ रहे हैं CDS अकाउंट से रिलेटेड। यह CDS सब अकाउंट खुलवाए हैं या CDS इन्वेस्टर अकाउंट खुलवाए? इन अकाउंट्स को कैसे खुलवा सकते हैं? इन दोनों में फर्क क्या है? किस अकाउंट को खुलवाना ज्यादा अच्छा है? वगैरा वगैरा। तो आपके इन तमाम सवालों के जवाब में आपको इस वीडियो में देने वाला हूँ। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। तो सबसे पहली बात CDS समझ लें, एक बैंक की तरह का होता है। जैसे आप बैंक में अकाउंट खुलवाते हैं, वैसे ही आप CDS में भी अकाउंट खुलवाते हैं। तो अब CDS इन्वेस्टर अकाउंट और CDS सब अकाउंट में फर्क क्या है? दोस्तों, CDS इन्वेस्टर अकाउंट और CDS सब अकाउंट में सबसे बड़ा फर्क यह है कि CDS इन्वेस्टर अकाउंट के जरिए पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में ट्रेडिंग नहीं कर सकते हैं। अब ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे मैंने क्लास थ्री में बताया था कि पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज, CDS और NCCPL इन तीनों इंटरमीडिएट्स इंडिविजुअल किसी भी इंसान को रिकॉग्नाइज नहीं करते, यानी पहचानते नहीं हैं। यह पहचानते हैं सिर्फ अपने मेंबर को, यानी स्टॉक ब्रोकर को। स्टॉक ब्रोकर का समझ लें एक मेन अकाउंट खुला होता है CDS के साथ और उसके मेन अकाउंट के अंडर ही मेरे और आप जैसे इन्वेस्टर्स के सब अकाउंट खुले होते हैं, जिसके जरिए हम शेयर्स बाय या सेल कर रहे होते हैं। इसलिए शेयर्स बाय या सेल करने के लिए हमें स्टॉक ब्रोकर की भी जरूरत होती है और उसके मेन अकाउंट के अंदर जो हमारा CDS सब अकाउंट खुला होता है, उसकी भी जरूरत होती है। तो CDS इन्वेस्टर अकाउंट फिर क्यों खुलवाना चाहिए? CDS इन्वेस्टर अकाउंट इसलिए खुलवाना चाहिए क्योंकि जैसे मैंने क्लास वन में भी बताया था कि CDS इन्वेस्टर अकाउंट आपका अपना इंडिविजुअल अकाउंट होता है। यानी इस अकाउंट का सारा कंट्रोल, सारा होल्ड सिर्फ आपके पास होता है। लेकिन ऑन द अदर हैंड जो आपका CDS सब अकाउंट होता है, उसका सारा कंट्रोल आपके स्टॉक ब्रोकर के पास होता है और वो जब चाहे आपके शेयर्स बेच दे और जब चाहे आपके अकाउंट में पड़े हुए पैसों से शेयर्स खरीद ले। तो अगर आप लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर हैं, तो क्या पता अगले 10 सालों में आके ब्रोकर पर कोई फाइनेंशियल क्राइसिस आ जाए, उसकी अपनी गलती की वजह से और अपने लॉसेस को कवर करने के लिए वो आपके लाखों रुपए के शेयर्स बेच दे। इसलिए अगर आप डेली ट्रेडिंग करना चाहते हैं, फिर आपके लिए सब अकाउंट ठीक है। अगर आप कुछ महीने तक भी शेयर्स होल्ड रखना चाहते हैं, यानी 4-6 महीने तक होल्ड रखना चाहते हैं, फिर भी सब अकाउंट ठीक है। लेकिन अगर आप काफी सालों के लिए शेयर्स होल्ड करना चाहते हैं, फिर CDS सब अकाउंट इतना सिक्योर्ड नहीं है और आपको शेयर्स अपने सब अकाउंट से अपने इन्वेस्टर अकाउंट में ट्रांसफर कर देनी चाहिए। अब जो शेयर्स कैसे ट्रांसफर होंगे, इसका काफी सिंपल सा तरीका है। जिस तरह एक बैंक अकाउंट से दूसरे बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर होते हैं, सिमिलरली ऐसे ही शेयर्स भी एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट में ट्रांसफर हो जाते हैं। बस आपने अपने ब्रोकर को कॉल करनी है और वो आपका सारा प्रोसीजर बता देगा। अब अगला सवाल यह है कि सब अकाउंट और इन्वेस्टर अकाउंट खुलवाए कैसे? तो उसका तरीका भी बहुत आसान है कि अगर आप CDS इन्वेस्टर अकाउ

एलडीसी भी है। उसका 7:30 बनता है। तो इस कंपनी को अपर लॉक और लोग तब लगेगा जब इसकी शेयर प्राइस इसकी 7.5% ऊपर या नीचे जाएगी। इसलिए कोई भी कंपनी जो पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पे लिस्टेड है, उसको अपर लॉक या लोअर लॉक तब लगता है जब वो अपनी डीसीपी से ₹1 या ₹750 नीचे चली जाए, whichever is higher। आई होप दिस कॉन्सेप्ट क्लियर। तो अगली बात करिए, अपर लॉक और लोअर लॉक लगता ही क्यों है? ये इसलिए लगता है ताकि मार्केट में जो न्यूज़ सर्कुलेट हो रही है, ट्रेडर्स उसको अच्छे तरीके से देखभाल लें, कि कहीं उनके स्टैटिसटिक्स, जो ऑब्जर्वेशन, गलत तो नहीं है? क्या किसी गलत वजह से पैनिक में आके या किसी गलत खबर को सच्चा मान के तो वो बहुत ज्यादा शेयर्स खरीदने या बेचने नहीं लग जाएँ। इसलिए इस चीज को ऑब्जर्व करने के लिए upper logger लोअर लॉक लगता है ताकि traders को सोचने समझने का टाइम मिल सके कि क्या वो सही फैसला ले रहे हैं या नहीं।

अब अगर सर्किट ब्रेकर का कॉन्सेप्ट ना होता तो क्या होता? फर्ज़ करें कोई ट्रेडर है जिसने किसी कंपनी का शेयर लिया ₹100 का। आधे घंटे बाद वो शेयर एकदम नीचे आ गया 12-15 पे और उसे बेचारे ने पैनिक में आकर वो शेयर बेच दिया। अब दो घंटे बाद वो शेयर 150 का हो गया। तो इस बेचारे की सारे जमा पूंजी खत्म हो जाएगी, कि इस बेचारे ने ₹100 का शेयर लिया और सिर्फ 10, ₹12 में बेच दिया। ऐसा ना हो, इसलिए मार्केट में सर्किट ब्रेकर लगाया जाते हैं, कि एक तो ट्रेडर मार्केट को assess कर ले कि उनका फैसला सही है या नहीं, और अगर स्टॉक बेचना भी है तो मिनिमम लॉस के साथ बेचे, ताकि ट्रेडर्स को बहुत ज्यादा नुकसान ना हो।

अब आप शायद सोच रहे होंगे कि जब सर्किट ब्रेकर हिट होता है तो उसके बाद क्या होता है? तो मैं पहले आपको एक अपर लॉक का एग्जांपल देता हूँ, फिर उसके बाद एक लोअर लॉक एग्जांपल दूँगा। जब भी अपर लॉक हिट होता है तो कुछ भी इतना खास नहीं होता। जिस प्राइस पे अपर लॉक हिट होता है, नेक्स्ट डे उस प्राइस के आसपास ही शेयर वापस ओपन हो जाते हैं, ट्रेड होने लग जाता है। जैसे अगर आप स्क्रीनशॉट में देखें तो सर्विस ग्लोबल फुटवियर लिमिटेड का 27 जुलाई 2021 को अपर लॉक हिट हुआ था और इसकी शेयर प्राइस दिन की मैक्सिमम लिमिट, यानी 61 रुपए 98 पैसे पे चली गई थी और इस शेयर की ट्रेडिंग होल्ड हो गई थी, यानी बंद हो गई थी। लेकिन उससे नेक्स्ट डे, 28 जुलाई 2021 को इस शेयर की ट्रेडिंग वापस नॉर्मल शुरू हो गई थी, नए प्राइस लिमिट के साथ, और ये शेयर investors के लिए फिर से ओपन हो गया। 27 जुलाई 2021 को इसका लोअर लॉक हिट हुआ था और इसकी शेयर प्राइस दिन की मिनिमम लिमिट, यानी ₹22.99 पैसे पे आ गई थी और उससे नेक्स्ट डे, 28 जुलाई को साथ नॉर्मली ट्रेड होने लग गया था। तो ये सारा कॉन्सेप्ट होता है सर्किट ब्रेकर का। उम्मीद है आपको आज की वीडियो पसंद आई होगी। जाने से पहले चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकॉन पे क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा, ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 13 क्लास में ख़ुशामदी। दोस्तों आज मैं आपको बताऊँगा मार्केट लॉट क्या होता है, रेगुलर मार्केट कौन सी होती है, और ऑड लॉट मार्केट कौन सी होती है। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों जब आप पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में इन्वेस्ट करते हैं, तो कुछ कंपनी ऐसी हैं जिनका आप सिर्फ़ एक शेयर भी खरीद सकते हैं, लेकिन कुछ कंपनी ऐसी हैं जिनका आप एक शेयर नहीं खरीद सकते और आपको उनका पूरा एक मार्केट लॉट खरीदना पड़ता है। अब मार्केट लॉट क्या होता है? दोस्तों, सिंपल सा बात है, मार्केट लॉट कहते हैं बंडल ऑफ़ शेयर्स को। और मार्केट में शेयर की प्राइस के हिसाब से डिफरेंट अमाउंट ऑफ़ शेयर्स होते हैं। जैसे कुछ अर्सा पहले तक यह हिसाब था कि शेयर सिर्फ़ लॉट्स में ही सेल परचेज़ होते थे, और आप इंडिविजुअल एक या दो शेयर नहीं खरीद या बेच सकते थे। अगर किसी कंपनी के शेयर की प्राइस ₹100 तक थी, तो उसके एक मार्केट लॉट में 500 शेयर्स होते थे, और आप इसके मल्टीपल में ऑटोमेटिकली 500 शेयर्स खरीद लेंगे। दो लॉट खरीद लेंगे तो 1000, और तीन लॉट खरीदेंगे तो डेढ़ हज़ार। इसी तरह से ₹500 के दिन में फ़ॉल करते थे, तो उसके एक लॉट में 100 शेयर्स होते थे, और सेम पहले वाला ही कॉन्सेप्ट। खरीदेंगे तो 100 खरीदेंगे, दो लॉट्स खरीद लेंगे 200 शेयर्स खरीदेंगे, वगैरह वगैरह। और ये मार्केट लॉट का मैरिट NCCPL हर 6 महीने बाद रिवाइज़ करता रहता है। यानी इस पिक्चर में लिखा हुआ है सिफ़ारिश से ₹100 तक की शेयर प्राइस के स्टॉक का कम से कम 500 शेयर्स का लॉट होगा। हो सकता है कल को NCCPL बोले कि लॉट्स 500 से कम करके 300 कर रहे हैं या 200 कर रहे हैं, वगैरह वगैरह। आप यूँ समझ लें, मैं आपको ड्राइविंग सिखा रहा हूँ, और जब आपको ड्राइविंग आ जाएगी तो गाड़ी कोई भी हो आप उसे आराम से चला लेंगे।

तो अब यह जो मार्केट लॉट है, यह सिर्फ़ रेगुलर मार्केट में ही एप्लीकेबल होता है, यानी मार्केट लॉट आपको सिर्फ़ रेगुलर मार्केट में ही फ़ॉलो करना होता है। और रेगुलर मार्केटिंग सबसे पॉपुलर मार्केट होती है, यानी स्टॉक मार्केट में 99% ट्रेड रेगुलर मार्केट में ही एग्ज़ीक्यूट हो रहे होते हैं। लेकिन जैसे मैंने आप को क्लास फ़ाइव में बताया था कि अक्सर कंपनी बोनस शेयर अनाउंस करती हैं। तो फ़र्ज़ करें कोई कंपनी है, कंपनी जिसकी शेयर प्राइस है ₹150। अब ये कंपनी उस कैटिगरी में फ़ॉल कर रही है जिसके एक लॉट में 100 शेयर्स होते हैं। अब ये कंपनी 37% बोनस शेयर अनाउंस करती है, यानी कि जिसके पास भी इस कंपनी के 100 शेयर्स होंगे वो बेचना चाहता है रेगुलर मार्केट में, बिकॉज़ शेयर्स लॉट्स में बिकते हैं, और इस कंपनी के एक लॉट में 100 शेयर्स हैं, तो 37 शेयर्स कैसे बिकेंगे? और ना ही अब्बास 63 एडिशनल शेयर ले सकता है कि सो शेयर्स का लॉट पूरा करके एक पूरा लॉट सेल कर दे। तो इसका क्या सॉल्यूशन है? इसका सॉल्यूशन है ऑड लॉट मार्केट। ऑड लॉट मार्केट वो मार्केट होती है जिसमें आप किसी भी किस्म के टेढ़े-मेढ़े शेयर्स खरीद या बेच सकते हैं। टेढ़े-मेढ़े शेयर से मुराद, शेयर जो रेगुलर मार्केट में ट्रेडिंग के लिए एलिजिबल नहीं होते, वो ऑड लॉट मार्केट में ट्रेड होते हैं। अब एक लॉट के अलावा जो अब्बास के पास 37 एडिशनल शेयर्स हैं, अब्बास चाहे तो या तो इन शेयर्स को ऑड लॉट मार्केट में सेल कर दे, या चाहे तो ऑड लॉट मार्केट से 63 शेयर्स एडिशनल खरीद कर 100 शेयर्स का एक लॉट कंप्लीट करके रेगुलर मार्केट में पूरा एक लॉट सेल कर दे। अब्बास क्या करेगा? इस वीडियो पसंद आई होगी और आपका मार्केट लॉट, रेगुलर मार्केट और ऑड लॉट मार्केट का कॉन्सेप्ट क्लियर हो गया होगा। जाने से पहले चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकॉन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा, ताकि मेरी फ़्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत ख़्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 14th क्लास में ख़ुश आमदी। दोस्तों आपने अक्सर सुना होगा कि KSE 100 इंडेक्स में 300 पॉइंट्स का इज़ाफ़ा, या KSE 100 इंडेक्स में 150 पॉइंट्स की कमी। तो ये इंडेक्स क्या होते हैं? पहले मैं आपको इंडेक्स का बेसिक कॉन्सेप्ट समझाऊँगा, और बाद में मैं आपको पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज के बारे में डिटेल्स बताऊँगा। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। तो इंडेक्स क्या होता है? दोस्तों, इंडेक्स बेसिकली ढेर सारी कंपनी की परफ़ॉर्मेंस को एक साथ में रिप्रेज़ेंट कर रहा होता है। तो ये सारी कंपनी ऑल टुगेदर कैसा परफ़ॉर्म कर रही हैं? अब पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में डिफ़रेंट टाइप्स के इंडेक्स होते हैं, जिनके बारे में मैं आपको वीडियो में आगे चल के बताऊँगा। अब जैसे कि KSE 100 इंडेक्स, जो पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज का सबसे बड़ा इंडेक्स है, जो स्टॉक एक्सचेंज की सबसे बड़ी कंपनी है। अब फ़्री फ़्लोट एनालाइज़ेशन कैलकुलेट करने का फ़ॉर्मूला है, और अब मार्केट कैपिटलाइज़ेशन किसे कहते हैं? दोस्तों, मार्केट कैपिटलाइज़ेशन से मुराद है कंपनी की मार्केट वैल्यू। अब मार्केट कैपिटलाइज़ेशन कैलकुलेट करने के भी दो तरीके होते हैं। एक होता है बेस्ड ऑन फ़ुल कैप मेथोडोलॉजी, और दूसरा होता है बेस्ड ऑन फ़्री फ़्लोट मेथोडोलॉजी। पहले मैं आपको फ़ुल कैप मेथोडोलॉजी का कॉन्सेप्ट समझाता हूँ, ताकि आपके लिए फ़्री फ़्लोट मेथोडोलॉजी को समझना आसान हो जाए। दोस्तों, फ़ुल कैप मेथोडोलॉजी के ज़रिए मार्केट कैपिटलाइज़ेशन को कैलकुलेट करने का फ़ॉर्मूला है: करंट शेयर प्राइस मल्टीप्लाई बाय टोटल नंबर ऑफ़ आउटस्टैंडिंग शेयर्स। मतलब कोई कंपनी है जिसके टोटल शेयर्स हैं 2000, और उसके एक शेयर की प्राइस है ₹50, तो 2000 को 50 से मल्टीप्लाई करें, तो आंसर आता है 1 लाख। मतलब इस कंपनी की मार्केट कैपिटलाइज़ेशन ₹1 लाख है, बेस्ड ऑन फ़ुल कैप मेथोडोलॉजी। नेक्स्ट है, लेकिन जहाँ शेयर प्राइस टोटल नंबर ऑफ़ आउटस्टैंडिंग शेयर से मल्टीप्लाई हुई थी, वहाँ टोटल नंबर ऑफ़ शेयर की जगह फ़्री फ़्लोट क्या है? दोस्तों, टोटल आउटस्टैंडिंग शेयर्स का मतलब है कंपनी ने जितने भी टोटल शेयर इशू किए हुए हैं वो। जैसे इस पिक्चर में अगर आप देखें तो सूई गैस के टोटल ट्रेडेड शेयर्स हैं, लेकिन फ़्री फ़्लोट शेयर्स सिर्फ़ 28 करोड़ हैं। फ़्री फ़्लोट शेयर्स वो वाले शेयर्स होते हैं जो रिस्ट्रिक्टेड शेयर्स के अलावा नॉर्मल पब्लिक के पास अवेलेबल होते हैं ट्रेड करने के लिए। अब रिस्ट्रिक्टेड शेयर्स क्या होते हैं? ये मैं इंशाअल्लाह आपको किसी और वीडियो में डिटेल से बताऊँगा। फ़िलहाल आप बस ये समझ लें, रिस्ट्रिक्टेड शेयर्स आप खरीद या बेच नहीं सकते, वो शेयर्स लॉक होते हैं। तो अब जैसे हमारी एग्ज़ांपल में कंपनी के टोटल 2000 शेयर्स हैं। अब फ़र्ज़ करें इनमें से 1500 शेयर्स रिस्ट्रिक्टेड हैं, तो पीछे बचे 500 शेयर्स जो नॉर्मल पब्लिक के पास मौजूद हैं ट्रेडिंग के लिए, वो कहलाएँगे फ़्री फ़्लोट। तो जब हम कंपनी की मार्केट कैपिटलाइज़ेशन निकालते हैं बेस्ड ऑन फ़्री फ़्लोट मेथोडोलॉजी, तो KSE 100 इंडेक्स में सो ऐसी कंपनी शामिल हैं जो फ़्री फ़्लोट मेथोडोलॉजी के एतबार से सबसे बड़ी हैं। और KSE 100 इंडेक्स हमें उन तमाम 100 कंपनी का एक रिपोर्ट कार्ड बना के पेश करता है कि ऑल टुगेदर ये सब कंपनी कैसा परफ़ॉर्म कर रही है। और ये इंडेक्स ही पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज का सबसे बड़ा और इम्पॉर्टेंट इंडेक्स है, जो कि पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज की 85% मार्केट कैपिटलाइज़ेशन को रिप्रेज़ेंट करता है। तो जब हम सुनते हैं कि KSE 100 इंडेक्स में 100 पॉइंट्स की कमी या 200 पॉइंट्स का इज़ाफ़ा हो गया है, तो ये कमी या इज़ाफ़ा इस वजह से होता है कि उस इंडेक्स में जो कंपनी मौजूद होती हैं उनकी शेयर प्राइस ऊपर या नीचे जा रही होती है, जिसकी वजह से इंडेक्स भी ऊपर या नीचे जा रहा होता है। अब एक बहुत सिंपल सी एग्ज़ांपल ले लेंगे। फ़र्ज़ करें 100 कंपनी में से 60 कंपनी की शेयर प्राइस ऊपर गई है और 40 के नीचे गई है, तो इंडेक्स अच्छा परफ़ॉर्म करेगा और पॉइंट्स में इज़ाफ़ा होगा, क्योंकि मेजॉरिटी कंपनी ने अच्छा परफ़ॉर्म किया है। लेकिन अगर 100 कंपनी में से 60 कंपनी की शेयर प्राइस नीचे गई है और सिर्फ़ 40 के ही ऊपर गई है, तो इंडेक्स बराबर करेगा और इंडेक्स पॉइंट्स की कमी हो जाएगी, क्योंकि मेजॉरिटी कंपनी ने बुरा परफ़ॉर्म किया है। और पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज इन 100 कंपनी की कंपोज़िशन को, यानी लिस्ट को, वक्तन-फ़वक्तन रिवाइज़ करता रहता है, यानी चेंज करता रहता है, क्योंकि एक मैरिट है जिसके तहत कंपनी सिलेक्ट की जाती है कि KSE 100 इंडेक्स में डालने के लिए। और टाइम के साथ-साथ कुछ कंपनी जो मैरिट में पूरा नहीं उतरती हैं तो उनको निकाल के जो कंपनी मैरिट पे पूरा उतरती हैं उनको डाल दिया जाता है। फ़िलहाल के KSE 100 इंडेक्स में जो कंपनी मौजूद हैं, उन सब के लिस्ट मैं आपको इस वीडियो की डिस्क्रिप्शन में दे दूँगा जिससे आप जाकर देख सकते हैं। तो आई होप आपका इंडेक्स का कॉन्सेप्ट क्लियर हो गया होगा कि इंडेक्स बेसिकली क्या होता है। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में फ़िलहाल टोटल 11 इंडेक्स हैं: KSE 100, KSE 30, ऑल शेयर इंडेक्स, NITPG इंडेक्स, UP9 इंडेक्स, और सबसे इम्पॉर्टेंट KSE 100 है। लेकिन मैं फिर भी आपको बाकी सब इंडेक्स का भी बता देता हूँ। अभी मैंने आपको बताया कि KSE 100 इंडेक्स का। अब मैं आपको बताता हूँ कि KSE 30 का। दोस्तों, KSE 30 इंडेक्स में पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज की टॉप 30 मोस्ट लिक्विड कंपनी शामिल हैं, बेस्ड ऑन फ़्री फ़्लोट मेथोडोलॉजी। अब लिक्विड कंपनी से क्या मुराद है? इस सबसे पहले आपको लिक्विडिटी समझनी होगी। दोस्तों, फ़ाइनेंस की दुनिया में लिक्विडिटी से मुराद है किसी भी चीज को आप कितनी जल्दी कैश में कन्वर्ट कर सकते हैं, यानी एसेट कितनी जल्दी कैश में कन्वर्ट हो सकता है। जैसे आपका बैंक अकाउंट सबसे ज़्यादा लिक्विड फ़्रेंडली एसेट है, क्योंकि आप अपने बैंक अकाउंट में पड़े पैसों को विभिन्न सेकंड में कैश में कन्वर्ट कर सकते हैं विद द हेल्प ऑफ़ एटीएम कार्ड। बैंक अकाउंट को आप समझ लें पानी है, लेकिन जो आपका घर है वो इल लिक्विड एसेट्स हैं, यानी समझ लें वो बर्फ है, क्योंकि आप अपने घर या गाड़ी को फ़ौरन से बेच के विभिन्न सेकंड में कैश में कन्वर्ट नहीं कर सकते। घर या गाड़ी को बेचकर कैश में कन्वर्ट करने के लिए आपको काफ़ी ज़्यादा टाइम चाहिए, इसलिए घर या गाड़ी इतने लिक्विड फ़्रेंडली एसेट्स नहीं हैं जितना बैंक अकाउंट है। यही प्रिंसिपल स्टॉक्स में भी अप्लाई होता है। कुछ स्टॉक्स बहुत लिक्विड फ़्रेंडली होते हैं, लेकिन कुछ स्टॉक इतने ज़्यादा लिक्विड फ़्रेंडली नहीं होते और आपको कई दिन लग सकते हैं उनको सेल करते-करते। KSE 30 इंडेक्स में 30 वो कंपनी शामिल हैं जो फ़्री फ़्लोट मेथोडोलॉजी के हिसाब से सबसे ज़्यादा लिक्विड फ़्रेंडली हैं, यानी जो स्टॉक फ़ौरन से आप सेल कर सकते हैं, जिनके रेडी बायर्स मार्केट में मौजूद हैं। और फ़िलहाल के KSE 30 इंडेक्स में कौन-कौन सी कंपनी शामिल हैं, इसके लिस्ट भी मैं आपको इस वीडियो की डिस्क्रिप्शन में दे दूँगा। नेक्स्ट है NITPG, ये इंडेक्स KSE 100 इंडेक्स में जो टॉप 50% फ़्री फ़्लोट स्टॉक्स हैं उनकी परफ़ॉर्मेंस को रिप्रेज़ेंट करता है। नेक्स्ट है UP9 इंडेक्स। यह इंडेक्स KSE 100 इंडेक्स में शामिल उन टॉप नाइन कंपनी को रिप्रेज़ेंट करता है जो फ़्री फ़्लोट में सबसे बड़ी हैं, एक्सक्लूडिंग ऑयल एंड गैस सेक्टर। यानी फ़र्ज़ करें नंबर कोई ऑयल कंपनी आ रही है, तो ये इंडेक्स उस कंपनी को स्किप करके उससे अगली वाली कंपनी को शामिल कर लेगा। तो इस तरह से नौ कंपनीज़ को पूरा करेगा। नेक्स्ट है NCG। ये इंडेक्स KSE 100 की उन टॉप 15 कंपनी को रिप्रेज़ेंट करता है जो फ़्री फ़्लोट मेथोडोलॉजी के एतबार से सबसे बड़ी हैं। इससे नेक्स्ट है KMI 30। ये वन ऑफ़ द मोस्ट पॉपुलर इंडेक्स पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज का, और ये इंडेक्स उन 30 कंपनी को रिप्रेज़ेंट करता है जो एकदम मोस्ट लिक्विड फ़्रेंडली हैं, यानी जिनके शेयर्स खरीदना और बेचना आसान हो, और दूसरा जो शरिया कम्प्लेंट हो, यानी इस्लामी शरिया के मुताबिक कंपनीज़ हों। इसी वजह से इस इंडेक्स में कोई भी बैंक शामिल नहीं है, क्योंकि उनका सोर्स ऑफ़ इनकम सूद होता है, और कोई भी ऐसी कंपनी शामिल नहीं है जो शराब बनाकर बेचती हो या हरम गोश्त के कारोबार करती हो या किसी और हरम काम में, सिगरेट्स वगैरह। नेक्स्ट है, सबसे बड़ी सेल परचेज़ होते हैं। नेक्स्ट है, नाम शरिया कम्प्लेंट कंपनी मौजूद है, इरेस्पेक्टिव ऑफ़ अन्य मैरिट। यानी इस्लामी शरीयत के मुताबिक जो कंपनी पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पे लिस्टेड कम कर रही हैं, वो तमाम कंपनीज़ के इस इंडेक्स में मौजूद हैं। मजीठी ये इंडेक्स सेक्टर बेस्ड है, यानी सिर्फ़ एक सेक्टर पे फ़ोकस है और वो है ऑयल एंड गैस। और OGT है, की फ़ुल एब्रिविएशन है ऑयल एंड गैस ट्रेडिशनल सेक्टर इंडेक्स। इस इंडेक्स में सिर्फ़ तीन कंपनीज़ शामिल हैं: OGDC, यानी ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड, PPL, यानी पाकिस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड, और POL, यानी पाकिस्तान ऑयल फ़ील्ड लिमिटेड। इसके बाद नेक्स्ट इंडेक्स है BKTI, यानी बैंकिंग सेक्टर ट्रेडिशनल इंडेक्स। ये इंडेक्स पाकिस्तान में जो बैंक्स मौजूद हैं उनके परफ़ॉर्मेंस को बता रहा होता है, और इस लिस्ट में टोटल नौ बैंक हैं, जिसके लिस्ट में आपको इस वीडियो की डिस्क्रिप्शन में दे दूँगा। और लास्ट है ऑल शेयर इंडेक्स। इस इंडेक्स में पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पे लिस्टेड तमाम कंपनी जो हैं वो मौजूद हैं। क्लियर हो गया होगा कि इंडेक्स बेसिकली क्या होता है, कैसे काम करता है, और पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में वो कैसे काम करते हैं। तो जाने से पहले चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकॉन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा, ताकि मेरी फ़्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख़्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 15 क्लास में ख़ुश आमदी। दोस्तों, आज मैं आपको बताऊँगा कि आप पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में डायरेक्टली कैसे इन्वेस्ट कर सकते हैं और इनडायरेक्टली कैसे इन्वेस्ट कर सकते हैं, और इन दोनों के क्या फ़ायदे और नुक़सान हैं। अगर आप पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में इन्वेस्टमेंट करना चाहते हैं तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। कि आप ब्रोकर के साथ अकाउंट खुलवाएँ और अपनी मर्ज़ी से जिस कंपनी के चाहें शेयर्स खरीद लें। और इनडायरेक्टली इन्वेस्ट करने के तरीके ये हैं कि आप म्यूचुअल फ़ंड के थ्रू इन्वेस्ट करें। इस वीडियो में मैं बस आपको एडवांटेजेस और डिसएडवांटेजेस बताऊँगा कि वो इन दोनों में क्या हैं। दोस्तों, स्टॉक मार्केट में लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट करते हुए आपको मल्टीपल चीज़ों का ध्यान रखना पड़ता है: क्या आपके पास स्टॉक मार्केट की फ़ुल नॉलेज है या नहीं? और अगर आपके पास स्टॉक मार्केट की फ़ुल नॉलेज है भी, तो क्या आपके पास इतना टाइम है कि आप देख सकें कि इस कंपनी में इन्वेस्ट करके आपको ज़्यादा फ़ायदा होगा? क्योंकि अगर आप लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्टिंग करना चाहते हैं तो आपको कंपनी को, उसके बिज़नेस को देखना पड़ेगा, कि बिज़नेस प्रॉफ़िट में जा रहा है या नहीं? कंपनी की P/E रेश्यो कितनी है? पास्ट में कंपनी की कैसी परफ़ॉर्मेंस रही है? क्या कंपनी मुसलसल ग्रो कर रही है या नहीं? क्या कंपनी कंटीन्यूअस डिविडेंड दे रही है या नहीं? और अगर डिविडेंड नहीं दे रही तो क्या वो कंपनी अपने प्रॉफ़िट को किसी ऐसी जगह इन्वेस्ट कर रही है जहाँ पर से शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड के निस्बत ज़्यादा फ़ायदा हो? यानी अगर कंपनी डिविडेंड नहीं दे रही तो कंपनी की परफ़ॉर्मेंस इतनी अच्छी होनी चाहिए कि उसकी शेयर प्राइस मुसलसल बढ़ रही हो। कंपनी के फ़्री फ़्लोट शेयर्स की परसेंटेज कितनी है? या कंपनी को अहल लोग चला रहे हैं या नहीं? यानी कंपनी की मैनेजमेंट किन लोगों के हाथों में है? कंपनी के फ़्यूचर के क्या प्लान्स हैं? इस कंपनी के कम्पिटीटर्स के साथ परफ़ॉर्म कैसे कर रहे हैं? वगैरह वगैरह। फिर एंड में सबसे ज़रूरी बात कि इन सब चीज़ों को मद्देनज़र रखते हुए क्या इस कंपनी का शेयर रीज़नेबल प्राइस पर मिल रहा है या नहीं? कहीं इस कंपनी का शेयर महँगा तो नहीं मिल रहा? या जितना इसको आइडियली होना चाहिए, उतने का ही मिल रहा है? जो भी किसी कंपनी के शेयर की आइडियल वैल्यू होती है, उसको इंट्रिंसिक वैल्यू कहते हैं। इंट्रिंसिक वैल्यू को आप इस तरह समझें: जैसे सेब है, हम सबको पता है कि सेब बहुत फ़ायदेमंद फल है। अब कोई शॉपकीपर सेब के बेइंतिहा फ़ायदे बताना शुरू करता है और कहे कि सेब वेट लॉस के लिए अच्छा होता है, दिल के लिए अच्छा होता है, इसे खाने से शुगर नहीं होती, इसको खाने से कैंसर होने के चांसेस कम हो जाते हैं, इसको खाने से अस्थमा अटैक नहीं होते, इसको खाने से हड्डियाँ मज़बूत होती हैं, ये दिमाग के लिए अच्छा होता है, वगैरह वगैरह। और कहे सेब के इतने ज़्यादा फ़ायदे हैं तो मैं सिर्फ़ ₹5000 किलो बेचूँगा। ये एक हँसी की बात है, क्योंकि बेसिकली सेब के कोई जितने मर्ज़ी फ़ायदे हों, ₹5000 किलो सेब की कीमत समझ में नहीं आती। जो उसके इंट्रिंसिक वैल्यू है, वो ₹150 किलो ही है। बस इससे ज़्यादा महँगा होगा तो आप कहेंगे, जितने मर्ज़ी फ़ायदे हों सेब के, पर मैं ये फल नहीं खरीदूँगा, मैं कोई और फल खरीद लूँगा जिसकी कीमत रीज़नेबल हो। इसी तरह जिस कंपनी का स्टॉक खरीदना चाहते हैं, उस कंपनी के स्टॉक की भी एक इंट्रिंसिक वैल्यू होगी, यानी कि रीज़नेबल प्राइस। मतलब कोई कंपनी है, ये बहुत प्रॉफ़िट में रही है, इंडस्ट्री को डोमिनेट कर रही है, लेकिन आपने अंदाज़ा लगाया है ये कंपनी भले जितनी मर्ज़ी प्रॉफ़िट में जा रही हो, भले जितनी मर्ज़ी अच्छी हो, लेकिन इसकी शेयर प्राइस ₹200 से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन मार्केट में इस कंपनी की इतनी तारीफ़ें हो रही हैं कि कंपनी का शेयर ₹800 का बिक रहा है। तो जिन लोगों के पास इतना टाइम और नॉलेज नहीं है कि वो कंपनी की सारी प्रोफ़ाइल देख के इसकी इंट्रिंसिक वैल्यू का अंदाज़ा लगा सकें, और उन्हें सुनाई बातों में आकर ₹800 का शेयर खरीद लेंगे। लेकिन ये दरअसल कंपनी के शेयर की झूठी वैल्यू है, और झूठ कितनी देर तक बोला जा सकेगा? एक टाइम आएगा इस कंपनी की शेयर प्राइस ₹200 के आसपास आ ही जाएगी, और अगर दोस्तों तक नहीं भी आती तो 220-230 तक तो आ ही जाएगी। फिर जिन्होंने कंपनी को एनालाइज़ करके वेट किया होगा इसकी शेयर प्राइस नीचे आने का, यानी इंट्रिंसिक वैल्यू तक आने का, उनको तो फ़ायदा हो गया होगा, लेकिन जिन्होंने सुनाई बातों में आकर महँगे शेयर खरीद लिए होंगे, उन बेचारों को भारी नुक़सान उठाना पड़ेगा और वो ये कहकर स्टॉक मार्केट छोड़ देंगे कि स्टॉक मार्केट सट्टा है, जुआ है, हालाँकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। अब अगर आपने लोगों की बातों में आकर ₹5000 का शेयर ले लिए हैं तो इसमें तो आपकी गलती हुई ना? लोग तो बाद में सस्ते से खरीद कर भरपूर फ़ायदा उठा लेंगे। ख़ैर, इस वीडियो का यही मक़सद है कि क्या आपके पास इतना टाइम और इतनी नॉलेज है कि आप कंपनी को और उसकी शेयर प्राइस को सही से जज कर सकें? अगर आपका जवाब हाँ है, फिर तो आपको स्टॉक मार्केट में डायरेक्टली इन्वेस्ट कर देना चाहिए। लेकिन अगर आपके पास फ़िलहाल इतनी नॉलेज नहीं है या अगर नॉलेज है भी और टाइम नहीं है, और फिर आप इनडायरेक्ट स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट कर दें, यानी म्यूचुअल फ़ंड्स के थ्रू। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में इन्वेस्ट करने का क्या फ़ायदा होगा? इससे पहले मैं आपको म्यूचुअल फ़ंड का थोड़ा सा इंट्रोडक्शन दे देता हूँ। दोस्तों, म्यूचुअल फ़ंड बेसिकली एसेट मैनेजमेंट कंपनी रन कर रही होती है, जो आपके पैसे पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में इन्वेस्ट करती है, और तक़रीबन पाकिस्तान में मौजूद हर बड़ा बैंक एसेट मैनेजमेंट कंपनी रन कर रहा है। जैसे हबीब बैंक, बल एसेट मैनेजमेंट के नाम से कंपनी रन कर रहा है, आराम से एसेट मैनेजमेंट कंपनी रन कर रहे हैं, नेशनल बैंक ऑफ़ पाकिस्तान, एनवी फ़ंड मैनेजमेंट के नाम से कंपनी रन कर रहा है, वगैरह वगैरह। इन कंपनी में जाकर आप अपना इन्वेस्टमेंट अकाउंट खुलवाते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे आप बैंक में जाकर अपना बैंक अकाउंट खुलवाते हैं। और ये कंपनी आपके ही हिसाब से आके पैसे पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में इन्वेस्ट करती हैं। म्यूचुअल फ़ंड में बस आपने अपने पैसे जाके एसेट मैनेजमेंट कंपनी को दे देने होते हैं, फिर वो जैसे चाहे जहाँ चाहे आपके पैसे इन्वेस्ट करें। लेकिन हर मंथ एसेट मैनेजमेंट कंपनी एक फ़ंड मैनेजर रिपोर्ट ज़रूर इशू करती है, जिसमें वो सारी डिटेल्स बताती है कि वो टोटल कितने पैसे मैनेज कर रही है और उन्होंने पैसे किन-किन कंपनी में इन्वेस्ट किए हुए हैं। मैंने फ़ंड मैनेजर रिपोर्ट के ऊपर एक डिटेल वीडियो बनाई हुई है, जिसको आप टॉप लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं। और आप लोग अक्सर पूछते हैं कि म्यूचुअल फ़ंड में पैसे देकर क्या हम अपनी मर्ज़ी से इन्वेस्ट करेंगे? तो इसका जवाब है नहीं

हैं म्युचुअल फंड के थ्रू पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में इन्वेस्ट करने का नुकसान क्या है? तो इसका नुकसान ये है कि आपके पैसे बहुत सारी 30, 40, 50, 100 कंपनी में इक्वली इन्वेस्ट होते हैं। और जब उन ढेर सारी कंपनी में से सिर्फ किसी एक कंपनी की शेयर प्राइस बहुत ज्यादा बढ़ती है, तो आपको बहुत ज्यादा फायदे नहीं होता, क्योंकि आपके पैसे उन तमाम कंपनी में इक्वल इन्वेस्ट होते हैं। लेकिन इसका फायदा भी होता है कि अगर उन ढेर सारी कंपनी में से किसी एक कंपनी की शेयर प्राइस गिरती है, तो आपको बहुत ज्यादा नुकसान भी नहीं होता। और एक और नुकसान यह भी होता है कि जब एसेट मैनेजमेंट कंपनी आपके पैसे हैंडल कर रही होती है और आपको प्रॉफिट बनाकर दे रही होती है, तो वो फ्री चार्ज नहीं करती। यानी अगर आपने 1 लाख इन्वेस्ट किया है और कुछ ₹2 लाख हो गए हैं, तो यह जो आपको ₹1 लाख प्रॉफिट हुआ है, अगर आप इसको निकालते हैं, तो इस 1 लाख पर 7000 रुपये एसेट मैनेजमेंट कंपनी वाले अपनी फी काट लेंगे। लेकिन ऑन दी अदर हैंड, अगर आपने डायरेक्ट स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट किया है, तो वह सारा प्रॉफिट आपका अपना होगा।

दोस्तों, स्टॉक मार्केट में आप जितनी जल्दी इन्वेस्टिंग स्टार्ट करेंगे, उतना ज्यादा आपको प्रॉफिट होगा। इसकी छोटी सी एग्जांपल ये ले लें कि 1993 का एक शेयर 50-55 का था और अब वही एक शेयर 565700 का है। मैं ये आपको बिल्कुल रिकमेंड नहीं कर रहा कि अब आप जाके नेस्ले का शेयर ले लें, मैं बस आपको एक एग्जांपल दे रहा हूं। आप पिछले 20 साल की हिस्ट्री देखेंगे, तो पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पे लिस्टेड हर बड़ी कंपनी ने प्रॉफिट ही दिया है। इसलिए आप जितनी जल्दी इन्वेस्टिंग स्टार्ट कर सकते हैं, कर दें। जितनी जल्दी आप इन्वेस्टिंग स्टार्ट कर देंगे, उतना ज्यादा आपके अमीर होने के चांसेस बढ़ेंगे। इसलिए मेरा सुझाव आपको यही होगा कि जब तक आप स्टॉक मार्केट सीखते हैं, तब तक म्युचुअल फंड के थ्रू इनडायरेक्टली पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में इन्वेस्ट करें।

आई होप इस वीडियो से आपने काफी कुछ सीखा होगा। तो जाने से पहले चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स 2016 बेसिकली दो तरह के होते हैं। एक होते हैं टेक्निकल एनालिसिस और एक होते हैं फंडामेंटल एनालिसिस। मैंने आप लोगों से पूछा कि पहले आप कौन सा एनालिसिस समझना चाहते हैं, तो मेजॉरिटी ने कहा फंडामेंटल एनालिसिस। और यही एनालिसिस मेरा फेवरेट भी है। तो पहले मैं फंडामेंटल एनालिसिस पे सीरीज बनाऊंगा, फिर टेक्निकल एनालिसिस पे भी सीरीज बनाऊंगा। आज की वीडियो में मैं आपको फंडामेंटल एनालिसिस की कुछ बेसिक सी बातें समझाऊंगा। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं।

दोस्तों, फंडामेंटल एनालिसिस तब काम आते हैं जब आपने किसी भी कंपनी में लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्टिंग करनी होती है, यानी कई सालों के लिए इन्वेस्टिंग करनी होती है। इसमें बेसिकली आप एक सीक्वेंस में एनालिसिस करते हैं, यानी इकोनॉमी, इंडस्ट्री एंड कंपनी। पहले आप मुल्क की इकोनॉमी को देखते हैं कि वो किस तरफ जा रही है। दूसरे, जिस इंडस्ट्री में कंपनी काम कर रही होती है, उस इंडस्ट्री को देखते हैं कि वो कैसा परफॉर्म कर रही है। और आखिर में कंपनी को देखते हैं कि वह कैसा परफॉर्म कर रही है। इसको आप उल्टा भी कर सकते हैं, यानी पहले कंपनी को एनालाइज करें, फिर इंडस्ट्री को और फिर इकोनॉमी को, जैसे आपको बेहतर लगे। क्योंकि फंडामेंटल एनालिसिस लॉन्ग टर्म के लिए काम आते हैं, इसलिए इन सब चीजों को देखना बहुत जरूरी है।

इकोनॉमी एनालिसिस में आप मुल्क के इकोनॉमिक्स डाटा पे फोकस करते हैं, यानी मुल्क की जीडीपी वगैरा किस रेट पे ग्रो कर रही है और फ्यूचर में किस रेट पे ग्रो करेगी। ये बस मैं आपको बिल्कुल बेसिक सी बातें बता रहा हूं। फ्यूचर में ये तमाम चीजें मैं डिटेल से आपको समझाऊंगा। इंडस्ट्री एनालिसिस में आप पूरी इंडस्ट्री पे फोकस करते हैं, यानी ये इंडस्ट्री ओवरऑल कैसा परफॉर्म कर रही है, प्रॉफिट में जा रही है या नहीं। मसलन, अगर आप ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में इन्वेस्ट करना चाहते हैं, तो पहले तो आप देखेंगे कि मुल्क में ये इंडस्ट्री प्रॉफिट में जा रही है या नहीं। और अगर प्रॉफिट में जा रही है, तो इस इंडस्ट्री में कौन सी कंपनी है जो प्रॉफिट में जा रही है, जिन्होंने इस इंडस्ट्री को डोमिनेट किया हुआ है। और एंड में आप कंपनी को एनालाइज करेंगे, जिसमें आपका 95% टाइम होगा। इसमें मल्टीपल चीजें आपको देखनी हैं, जैसे कि प्राइस टू बुक वैल्यू। बहुत सारी चीजें होती हैं, जो मैं डिटेल से आपको फ्यूचर में आने वाली वीडियो में समझाऊंगा।

फंडामेंटल एनालिसिस में आगे फिर से दो सब-कैटेगरीज़ होती हैं, एक क्वालिटेटिव और एक क्वांटिटेटिव एनालिसिस। वो वाले एनालिसिस होते हैं जिनको आप क्वांटिफाई कर सकते हैं, जैसे कि प्राइस टू अर्निंग रेश्यो वगैरा। और क्वालिटेटिव एनालिसिस वो वाले एनालिसिस होते हैं जिसमें आप कंपनी की क्वालिटी एनालाइज करते हैं कि इसकी मैनेजमेंट वगैरा कितनी कंपिटेंट है एंड ऑल दैट, जो मैं डिटेल से आपको अपकमिंग वीडियो में बताऊंगा। फंडामेंटल एनालिसिस दुनिया के तमाम प्रोफेशनल इन्वेस्टर्स करते हैं, जैसे कि वॉरेन बफेट, चार्ली मंगर, रे डेलियो वगैरा। और इन्होंने लॉन्ग टर्म इन्वेस्टिंग से बिलियन बनाई है। लेकिन याद रखें, लॉन्ग टर्म इन्वेस्टिंग से अगर आप अमीर होना चाहते हैं, आपको काफी सालों के लिए शेयर्स होल्ड करके रखने पड़ेंगे। मैं दो से तीन दिन बाद क्वांटिटेटिव एनालिसिस पर एक वीडियो अपलोड करूंगा और उससे मसलन दो से तीन दिन बाद क्वालिटेटिव एनालिसिस पर एक वीडियो अपलोड करूंगा, जिसमें मैं आपको बिल्कुल बेसिक सी बातें बताऊंगा। और डिटेल्स इंशाअल्लाह इससे आगे आने वाली वीडियो में समझाऊंगा। तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

अस्सलाम वालेकुम। अगर आपने कोई सेकंड हैंड गाड़ी खरीदी हो, तो जाहिर है आप करंट ओनर से उसके पेपर्स मांगेंगे कि पता चले गाड़ी वाकई इसकी है या नहीं, या कहीं चोरी की तो नहीं है। आप उससे मेंटेनेंस हिस्ट्री मांगेंगे कि पता चले गाड़ी प्रॉपर्ली मेंटेन हुई है या नहीं। प्रॉपर एनालिसिस करके फिर आप गाड़ी लेंगे। यही हिसाब स्टॉक मार्केट में भी है। आप बगैर फंडामेंटल एनालिसिस के कोई भी स्टॉक नहीं ले सकते। वैसे टेक्निकल भी है, लेकिन अगर आप वॉरेन बफेट की तरह प्रॉपर्ली इन्वेस्ट करके अमीर बनना चाहते हैं, तो आपको भी हर कंपनी के फंडामेंटल एनालिसिस करने होंगे। फंडामेंटल एनालिसिस में शामिल है क्वांटिटेटिव एनालिसिस और क्वालिटेटिव एनालिसिस। और आज हम बात करेंगे क्वांटिटेटिव एनालिसिस के बारे में। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। [संगीत]

क्वांटिटेटिव एनालिसिस कंपनी की फाइनेंशियल स्टेटमेंट को देखकर किया जाता है। और फाइनेंशियल स्टेटमेंट में बेसिकली शामिल है बैलेंस शीट और इनकम स्टेटमेंट। बैलेंस शीट में कंपनी की एसेट्स लिखी जाती हैं, यानी कि हर वह चीज जिसकी कंपनी मालिक है। और लायबिलिटी में लिखी जाती है हर वह चीज यानी कि जो उसे कंपनी पर कर्जा है और उसे वो कर्जा वापस करना है। जो 20 साल पुरानी मशीन है तो बैलेंस शीट पर शुरू से लेकर आखिर तक की उन तमाम 20 मशीनों को ऐसा लिखा जाएगा। लेकिन फैक्ट्री को वापस करना है वो बैलेंस शीट की लायबिलिटी में लिखा जाएगा। इन शॉर्ट, एवरीथिंग यू ओन इज़ एसेट एंड एवरीथिंग यू ओ इज़ लायबिलिटी। वीडियो को आगे बढ़ाने से पहले अगर आपने अभी तक मेरा चैनल सब्सक्राइब नहीं किया तो चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन पर क्लिक करके ऑल को प्रेस कीजिएगा ताकि आपको मेरी आने वाली हर नई वीडियो को नोटिफिकेशन मिल सके।

तो नेक्स्ट है इनकम स्टेटमेंट। हर बिजनेस प्रॉफिट के लिए ही किया जाता है, लेकिन बिजनेस प्रॉफिट में जा रहा है या लॉस में, यह हमें कैसे पता चलेगा? यह बात हमें इनकम स्टेटमेंट देखकर पता चलेगी। बैलेंस शीट पे बिजनेस की शुरू से लेकर आज तक के तमाम एसेट्स और लायबिलिटी लिखी जाती है, लेकिन इनकम स्टेटमेंट सिर्फ लास्ट एक साल की बनाई जाती है, यानी 1 जनवरी से 31 दिसंबर तक कि प्रॉफिट हुआ है या लॉस हुआ है। और इनकम स्टेटमेंट रेवेन्यू से शुरू होती है और नेट इनकम पर खत्म होती है। सबसे पहले कॉस्ट ऑफ गुड्स को सब्सट्रैक्ट किया जाता है, फिर एम्प्लॉइज़ की सैलरी और बाकी एक्सपेंसेस को सब्सट्रैक्ट किया जाता है। इसके बाद आता है ईबीआईटी, यानी अर्निंग बिफोर इंटरेस्ट एंड टैक्स। फिर इंटरेस्ट पे करके और टैक्स देकर जो पैसा बचता है, उसको नेट इनकम या प्रॉफिट आफ्टर टैक्सेशन कहते हैं। क्योंकि हमें कंपनी में लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्ट करना है, इसलिए हमारे लिए ये जानना बहुत जरूरी है कि कंपनी ग्रो कर रही है या डिक्लाइन पर है। लेकिन सिर्फ एक साल की इनकम स्टेटमेंट पढ़कर कंपनी को जज करना सही बात नहीं है, क्योंकि कभी-कभी कंपनी ओवरऑल बहुत अच्छी होती है, लेकिन एक आधा साल बुरा परफॉर्म कर जाती है। जैसे कि कोरोनावायरस की वजह से इस साल बहुत ही अच्छी-अच्छी कंपनी लॉस में गई होंगी, लेकिन इसका हरगिज़ ये मतलब नहीं है कि वो कंपनी बुरी है। इसलिए किसी कंपनी को अच्छी तरह जज करने के लिए कम से कम कंपनी की लास्ट 5 से 10 साल की इनकम स्टेटमेंट को देखना चाहिए और फिर डिसाइड करना चाहिए कि कंपनी खरीदने लायक है या नहीं। नेक्स्ट वीडियो में हम क्वालिटी के बारे में बात करेंगे। तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि आपको मेरी अगली आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन मिल सके। अस्सलाम वालेकुम।

आज की वीडियो बहुत इंटरेस्टिंग होने वाली है। इससे पिछली वीडियो में हमने बात की थी क्वांटिटेटिव एनालिसिस के बारे में, जिसको आप ऊपर दिए गए टॉप राइट लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं। आज हम बात करेंगे क्वालिटेटिव एनालिसिस के बारे में। इस एनालिसिस में कंपनी की क्वालिटी को चेक करते हैं, और कंपनी की क्वालिटी कैसे चेक करते हैं, यह आपको इस वीडियो के आखिरी तक जरूर पता चल जाएगा। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। [संगीत]

लेकिन जो सबसे ज्यादा इम्पॉर्टेंट चीजें हैं, वो मैं आपके साथ शेयर करूंगा। सबसे पहले हम ये देखते हैं कि कंपनी के मैनेजमेंट कितनी कॉम्पिटेंट है, क्योंकि कंपनी की लॉन्ग टर्म ग्रोथ कंपनी की टॉप मैनेजमेंट के फैसलों पर ही डिपेंड करती है। मैनेजमेंट पर ही डिपेंड करता है कि कौन सी न्यू प्रोडक्ट्स रिलीज करनी हैं। मैनेजमेंट पर ही डिपेंड करता है कि किसी स्पेसिफिक प्रोडक्ट को कैसे एडवरटाइज करना है, कैसे मार्केट करना है। मैनेजमेंट पर ही डिपेंड करता है कि वो अपने स्टॉक्स वापस खरीद के शेयरहोल्डर वैल्यू को इंक्रीज करना चाहती है या नहीं। मैनेजमेंट पर ही डिपेंड करता है कि वो अपने फंड्स कैसे यूटिलाइज करती है। और मैनेजमेंट पर ही डिपेंड करता है कि वो डिविडेंड देना चाहती है या नहीं। ये सब फैसले मैनेजमेंट ही करती है। मैनेजमेंट अच्छी होगी तो वो अच्छे फैसले करेगी और कंपनी फ्यूचर में भी ग्रो करेगी। तो आप भी सही फैसला करके चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि आपको मेरी इनफॉर्मेशन से भरपूर फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफिकेशन मिल सके।

तो मैनेजमेंट कैसे जज करते हैं? सबसे पहले आप कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में कौन-कौन लोग हैं और कितने समय से वो इस कंपनी में काम कर रहे हैं, ये देखें। अगर वही लोग काफी समय से कंपनी में काम कर रहे हैं और कंपनी मुसलसल प्रॉफिट में जा रही है, तो यह एक अच्छा साइन है कि इस कंपनी को अकलमंद लोग चला रहे हैं। लेकिन अगर टॉप मैनेजमेंट में मुसलसल चेंज आ रही हैं, तो ये एक रेड सिग्नल हो सकता है और इस कंपनी से जरा दूर रहना ही ठीक है। और आपको मैनेजमेंट के लोगों की ऑनेस्टी भी चेक करनी होगी। अब किसी की शकल पे तो नहीं लिखा होता वो ईमानदार है या नहीं। इसलिए आपको सारी मैनेजमेंट, यानी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और सीईओ या मैनेजिंग डायरेक्टर के नाम नोट करनी हैं। फिर आपने उन लोगों को जाके गूगल पे सर्च करके उनके बारे में मैक्सिमम इनफॉर्मेशन हासिल करनी है कि क्या इन पर कोई फ्रॉड का केस या स्कैंडल तो नहीं बना हुआ, क्या ये मैनेजमेंट ट्रस्टवर्दी है या नहीं। अगर आपको कोई फ्रॉड का केस, घोटाला या अनयूजुअल बात नज़र नहीं आती, तो कंपनी अच्छी है। लेकिन अगर कोई फ्रॉड का केस बना हुआ है, तो इस कंपनी से दूर रहने में ही भलाई है। पर आप कंपनी की टॉप मैनेजमेंट को लिंक्डइन पर भी सर्च करके उनके बारे में इनफॉर्मेशन हासिल कर सकते हैं कि इनकी एजुकेशन, पोजीशन कितनी है और ये कहाँ से बड़े सर्विसेज दे रहे हैं, क्या इस फील्ड को सर्व करने की कैपेबिलिटी इनमें है या नहीं। और जिस कंपनी में आप इन्वेस्ट करना चाहते हैं, उस कंपनी के पास्ट को आपको देखना पड़ेगा कि कहीं कंपनी पे कोई फ्रॉड का केस तो नहीं बना हुआ। इसको आप गूगल पर जाकर ऐसे सर्च करेंगे: कंपनी का नाम लिखें और आगे फ्रॉड लिखें। इसी तरह कंपनी नाम प्लस घोटाला, कंपनी नाम प्लस डिस्प्यूट, कंपनी नाम प्लस कोर्ट केस। और अगर आपको पता लगे कि कंपनी का पास्ट रिकॉर्ड इतना अच्छा नहीं है, तो ऐसी कंपनी से दूर ही रहिए।

और अगली चीज देखना बहुत जरूरी है, वो है कंपनी की कैपिटल एलोकेशन। कैपिटल एलोकेशन का मतलब है कि कंपनी अपने पैसों को कैसे यूटिलाइज करती है। मिसाल के तौर पर हो सकता है कि दो कंपनी साल में 20-20 करोड़ रुपये कमा दें, और दूसरी कंपनी उन पैसों को सही जगह लगाकर कंपनी को ग्रो करती जाए। आपको ऐसी कंपनी ढूंढनी है जो अपना पैसा सही जगह लगाकर कंपनी को ग्रो करती जाए। अगर कंपनी की कैपिटल एलोकेशन ठीक है, तो इसका मतलब कंपनी की मैनेजमेंट अच्छी है। पर कैपिटल एलोकेशन को कैसे जज करते हैं, इस बारे में हम अगली वीडियो में डिटेल्स से बात करेंगे।

डिसरप्शन को कंसीडर करना भी बहुत जरूरी है। टेक्नोलॉजी डिसरप्शन का मतलब है कि इस कंपनी को नई इनोवेशन्स बहुत जल्दी रिप्लेस तो नहीं कर देंगी। मिसाल के तौर पे जैसे केबल टीवी को YouTube और Netflix ने रिप्लेस कर दिया है, येलो टैक्सी बिजनेस को करीम और Uber ने रिप्लेस कर दिया है, पेट्रोल कार्स को इलेक्ट्रिक कार्स रिप्लेस कर रहे हैं एंड ऑल दैट। इसलिए टेक्नोलॉजी डिसरप्शन सेक्टर को भी कंसीडर करना बहुत जरूरी है। नेक्स्ट है कंपनी का मोअट। दुनिया की एक ऐसी किलेबंदी है, जिसमें पानी भर के मगरमच्छ छोड़ दिए जाते हैं ताकि कोई भी कैसल में दाखिल ना हो सके। वैसे ही क्या इस कंपनी का भी कोई मोअट है या नहीं? यानी कि जिस कंपनी में आप इन्वेस्ट करना चाहते हैं कि उसको कोई और कंपनी आसानी से रिप्लेस कर सकती है या नहीं? मिसाल के तौर पर जैसे पाकिस्तान में Suzuki की मोटरसाइकिल लो कॉस्ट, रिलायबिलिटी और आफ्टर सेल सर्विसेज के लिए जानी जाती है। यानी कि Suzuki मोटर्स पाकिस्तान में सस्ती और रिलायबल गाड़ी देती है, और Suzuki की मेंटेनेंस बहुत आसान है और पूरे मुल्क में उनका नेटवर्क फैला हुआ है। और बाकी कंपनी के लिए इसी चीज को कंप्लीट करना बहुत मुश्किल है। और यही वजह है कि Cherry, Hyundai Santro और Daihatsu Charade आईं, लेकिन सब फ्लॉप हो गईं, और Suzuki बगैर किसी खतरे के Mehran जैसी गाड़ी पाकिस्तान में 33 साल तक बेचती रही है। तो आप ऐसी कंपनी ढूंढनी है जिसकी एक तरह से इंडस्ट्री में मोनोपोली हो और उसको कोई भी आसानी से कंप्लीट ना कर सके।

नेक्स्ट है रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन। रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन का मतलब है कि क्या कंपनी अपने ओनर या ओनर के रिलेटिव्स के साथ किसी तरह के पैसों की लेन-देन तो नहीं कर रही। लेकिन ये हर दफ़ा गलत भी नहीं है। इसके बकायदा रूल्स एंड रेगुलेशन्स हैं। और अगर रूल्स एंड रेगुलेशन्स के अंदर ये सब हो रहा है, तो ठीक है। लेकिन अगर रूल्स से हटके हो रहा है, तो यह अलार्मिंग है। वो रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन की डिटेल्स आपको हर कंपनी की एनुअल रिपोर्ट में मिल जाएगी। तो रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन कब गलत है? मिसाल के तौर पे अगर कंपनी अपने ओनर या ओनर के रिलेटिव्स को मार्केट रेट से कम या 0% इंटरेस्ट पे लोन दे रही है, तो यह एक रेड फ्लैग है और ऐसी कंपनी से आपको थोड़ा दूर ही रहना चाहिए। या अगला सिनेरियो ये भी हो सकता है कि अगर कंपनी के ओनर ने अपने पर्सनल काम के लिए बैंक से लोन लिया है और कंपनी ओनर के पर्सनल लोन की गारंटी देती है। तो कंपनी पर नजर रखते हुए लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्टिंग करनी चाहिए। उम्मीद करता हूँ आपको आज की वीडियो पसंद आई होगी। अगर आप किसी और चीज के बारे में भी जानना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट सेक्शन में मुझे जरूर बताइएगा। और अगर आपको आज की वीडियो पसंद आई है, तो वीडियो को लाइक और चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा। [संगीत]

हेलो दोस्तों, पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज दोस्तों एनुअल रिपोर्ट में दो बहुत जरूरी स्टेटमेंट्स होती हैं: बैलेंस शीट जो बिजनेस में मौजूद होती हैं, और इनकम स्टेटमेंट में सिर्फ आखिरी 12 महीना की इनफॉर्मेशन दी जाती है कि सिर्फ इन आखिरी 12 महीनों में बिजनेस में कहाँ पे और क्या-क्या खर्चा हुआ है। और एक साल में बिजनेस में दो तरह के खर्चे होते हैं। एक खर्चा वो होता है जिससे कोई एसेट बनता है जो बिजनेस को लॉन्ग टर्म के लिए फायदा देता है, यानी जिसका फायदा बिजनेस को एक फाइनेंशियल ईयर खत्म होने के बाद तक भी होता रहता है। और एक खर्चा वो होता है जिसका फायदा बिजनेस को उस साल खत्म होने से पहले तक ही रहता है। मिसाल के तौर पर एक पेट्रोल स्टेशन है जो 2011 में खुला था। अब जाहिर है इस पेट्रोल स्टेशन के बहुत सारे रेगुलर खर्चे होंगे, मसलन हर महीने पेट्रोल खरीदना, मुलाज़िमों की तनख़्वाह देना, बिजली के बिल वगैरा देना। तो ये जो रेगुलर खर्चे हो रहे हैं ये रेवेन्यू एक्सपेंडिचर कहलाएंगे। और अब साल 2021 में इस पेट्रोल स्टेशन पर दो नए पंप इंस्टॉल किए गए हैं। अब ऐसा तो नहीं है कि ये पंप सिर्फ एक फाइनेंशियल ईयर के अंदर-अंदर तक ही फायदा देंगे। जाहिर है ये पंप लॉन्ग टर्म चलेंगे, यानी 15, 20 साल, जो शायद उससे भी ज्यादा देर तक फायदा पहुंचाते रहेंगे। तो ये जो दो नए पंप इंस्टॉल हुए हैं, ये कैपिटल एक्सपेंडिचर हैं। और मसलन अगर पंप के पास थोड़ी सी खाली जगह पड़ी हुई है और ओनर ने वहाँ पे एक कार वॉश इंस्टॉल कर दिया है, तो जाहिर है ये बिजनेस की एक्सपेंशन हुई है और ये कार वॉश बहुत अर्से तक फायदा पहुंचाएगी। तो ये भी कैपिटल एक्सपेंडिचर ही कहलाएगा। यानी संक्षेप में, रेवेन्यू एक्सपेंस वो वाला एक्सपेंस होता है जिससे आपका कोई भी एसेट नहीं बनता, जो आपके बिजनेस को स्मूथली रन करने में काम आता है, जिसका फायदा आप एक फाइनेंशियल ईयर के अंदर-अंदर कंज्यूम कर लेते हैं। ऑन दी अदर हैंड, कैपिटल एक्सपेंस वो होता है जिससे आपके बिजनेस का कोई एसेट बनता है और जिसका फायदा आपको एक फाइनेंशियल ईयर के बाद तक भी होता रहता है। ये दोनों टर्म्स, कैपिटल एक्सपेंस और रेवेन्यू एक्सपेंस आगे चल के हमारे बहुत काम आने वाले हैं। तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़।

अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 20वीं क्लास में कुछ शानदार बातें दोस्तों। अगर आपने सैथ मिल्स लिमिटेड के एनुअल रिपोर्ट में स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस यानी इनकम स्टेटमेंट को देखें, तो इसमें एक सिंपल स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस है, जिसको सेपरेट या स्टैंडअलोन स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस भी कह सकते हैं, और एक कंसोलिडेटेड स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस है। तो इन दोनों में फर्क क्या है? आज मैं आपको इसी के बारे में बताऊंगा। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं।

दोस्तों, स्टॉक मार्केट में बेसिकली दो तरह की कंपनी ऑपरेट कर रही होती हैं। एक कंपनी वो होती है जो सिर्फ अपना ही बिजनेस देखती है और करती है, यानी बाकी किसी और बिजनेस में उसकी इंवॉल्वमेंट या इन्वेस्टमेंट वगैरा नहीं होती। और एक वो कंपनी होती है जिसने आगे से कई और कंपनियों में भी इन्वेस्ट किया होता है। इसी वजह से स्टॉक मार्केट में चार टर्म्स यूज़ होती हैं: पैरेंट कंपनी, होली ऑन्ड सब्सिडियरी, सब्सिडियरी और एसोसिएट। जो मैं आपको एक एग्जांपल के जरिए समझाता हूं। दोस्तों, फर्ज़ करें एक कंपनी जो कपड़ों का कारोबार करती है, और इस कंपनी के पास 200 करोड़ रुपये जमा हो गए हैं। और अब इस कंपनी के मालिक सोचते हैं कि कुछ पैसे कहीं इन्वेस्ट करने चाहिए, यानी इन पैसों से कुछ और कंपनी वगैरा खरीदी जानी चाहिए। अब इनको एक और कपड़ों की ही कंपनी पसंद आती है, जिसका नाम है कंपनी B, जिसकी मार्केट वैल्यू है 50 करोड़ रुपये। और ये उस कंपनी के तमाम शेयर्स खरीद के वो पूरी कंपनी खरीद लेते हैं। इसके बाद इनको एक IT कंपनी पसंद आती है, कंपनी C, जिसकी मार्केट वैल्यू ₹100 करोड़ है, और ये 51 करोड़ के शेयर खरीद के उस कंपनी के 51% मालिक बन जाते हैं। अब इनको एक इलेक्ट्रॉनिक कंपनी भी पसंद आती है, कंपनी D, जिसकी मार्केट वैल्यू ₹396 करोड़ है, और ये 99 करोड़ के शेयर खरीद के उस कंपनी के 25% मालिक बन जाते हैं। तो अब कंपनी A ने तीन कंपनियां खरीदी हैं: एक कंपनी B जो टेक्सटाइल कंपनी है, जिसको पूरी कंपनी ने लिया है, एक कंपनी C जो IT कंपनी है, जिसको 51% कंपनी ने खरीद लिया है, और एक कंपनी D जो इलेक्ट्रॉनिक कंपनी है।

तो हमारे सीनारियो में कंपनी A हुई पैरेंट कंपनी, क्योंकि कंपनी B और C को होल्ड किया हुआ है, कंपनी D हुई एसोसिएट। अब ऐसा क्यों है? दोस्तों, फाइनेंस की दुनिया में अगर कोई कंपनी किसी दूसरी कंपनी की मोर देन 50% की ओनर है, तो वो उसे पैरेंट कंपनी की सब्सिडियरी कहलाती है, यानी हमारे केस में कंपनी C कंपनी A की सब्सिडियरी है, क्योंकि कंपनी C को 51% खरीदा हुआ है। और अगर पैरेंट कंपनी ने किसी कंपनी को पूरा, यानी 100% खरीदा है, तो वो उसे पैरेंट कंपनी की होली ओन्ड सब्सिडियरी कहलाती है, जैसे हमारे केस में कंपनी A ने कंपनी B को पूरा खरीदा हुआ है, तो कंपनी B कंपनी A की होली ओन्ड सब्सिडियरी है। और अगर पैरेंट कंपनी किसी दूसरी कंपनी की लेस देन 50% की ओनर है, तो यह उसे पैरेंट कंपनी की एसोसिएट कहलाएगी, जैसे हमारे सीनारियो में कंपनी D को 25% खरीदा हुआ है, इसलिए कंपनी D कंपनी A की एसोसिएट है। अब फर्ज़ करें कि कंपनी B जो स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड ही नहीं है, उसका कैसे पता चलेगा कि वो पैरेंट कंपनी की सब्सिडियरी है या एसोसिएट? तो इस केस में अगर पैरेंट कंपनी के पास मोर देन 50% वोटिंग राइट्स हैं, तो वह सब्सिडियरी कहलाएगी, यानी कंपनी ने 1% भी है, तो बाकी 49% का कंट्रोल जिसके मर्ज़ी के पास हो, फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि कंपनी A के पास की वैल्यू 51% है, यानी मेजॉरिटी है। आई होप दिस कॉन्सेप्ट इज़ क्लियर। अगर आपको पहले देखा हमने समझ नहीं आई, तो कोई बात नहीं, वीडियो के इस पार्ट को बार-बार देखें, आपको इंशाअल्लाह जरूर समझ आ जाएगी।

तो अब फर्ज़ करें कि कंपनी A जो स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड है, उसका अपना टेक्सटाइल का बिजनेस है, यानी पाकिस्तान के बहुत से शहरों में इनके आउटलेट्स होंगे। मसलन पाकिस्तान में इस टेक्सटाइल कंपनी की 100 ब्रांचेज़ हैं। अब अगर हमने इस कंपनी के शेयर्स खरीदते हैं और ये कंपनी हमें 100 स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस पकड़ा दे कि पाकिस्तान में मौजूद हर ब्रांच के स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस। आप खुद देख लें कि हम प्रॉफिट में जा रहे हैं या नहीं। तो हम तो पागल हो जाएंगे इतने स्टेटमेंट पढ़ते-पढ़ते। इसलिए ये काम कंपनी खुद करती है और अपनी तमाम 100 ब्रांचेज़ की रिपोर्ट कंपाइल करके हमें एनुअल रिपोर्ट में ऐसा होल एक ही स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस देगी, जिसको देख के हमें पता लगेगा कि कंपनी प्रॉफिट में जा रही है या नहीं। अब ये जो एक इनकम स्टेटमेंट हो गई, ये सेपरेट यानी सिंपल स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस के आएगी। लेकिन कंपनी B और C भी तो हैं जो प्रॉफिट कर रही हैं, उनका हमें कैसे पता चलेगा? जाहिर है वो तो कंपनी A का हिस्सा हैं, तो उनके लिए होती है कंसोलिडेटेड स्टेटमेंट, जिसमें कंपनी का अपना बिजनेस भी और उसके अंडर बाकी जितने और बिजनेस भी काम कर रहे होते हैं, उन सबकी परफॉर्मेंस भी इंक्लूड होती है। एनुअल रिपोर्ट में बेसिकली पाँच स्टेटमेंट्स होती हैं: स्टेटमेंट ऑफ फाइनेंशियल पोजीशन यानी बैलेंस शीट, स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस यानी इनकम स्टेटमेंट, स्टेटमेंट ऑफ कम्प्रिहेंसिव इनकम, स्टेटमेंट ऑफ चेंज इन इक्विटी और स्टेटमेंट ऑफ कैश फ्लो यानी कैश फ्लो स्टेटमेंट। इसलिए पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पे लिस्टेड जितनी

के वाकई आप ही कंपनी इतने प्रॉफिट में गई है? इस साइड नहीं तो कंपनी तो बेचारी पागल हो जाएगी क्योंकि उसे कंपनी के हजारों शेयर और होंगे। सभी उठ के कंपनी की ऑफिस चले जाएंगे, कंपनी की बुक्स देखने। और अगर हम जाकर चेक नहीं करते तो फ्रॉड होने के चांसेस हैं। तो इसका क्या तरीका है कि हमें चल जाए कंपनी सच बोल रही है और हमें कंपनी ऑफिस भी ना जाना पड़े?

इस सब के सॉल्यूशन के लिए हर कंपनी जो स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड है, उसको इंटरनेशनल ऑडिटिंग स्टैंडर्ड पर चलते हुए हिदायत दी जाती हैं कि वो एक ऑडिटर हायर करें जो इंडिपेंडेंट जाकर कंपनी की सारी बुक्स चेक करेगी। कंपनी ने एनुअल रिपोर्ट में जो फिगर शो किए हैं वो दुरुस्त हैं या नहीं? ये सारे रूल्स एंड रेगुलेशन शेयर होल्डर के आसान आने के लिए बनाए गए हैं ताकि शेयर होल्डर्स के साथ किसी किस्म का फ्रॉड ना हो सके। अगर आप ऑडिटर रिपोर्ट में देखें तो सबसे ऊपर लिखा हुआ है “इंडिपेंडेंट ऑडिटर रिपोर्ट”। इसका मतलब है कि ऑडिटर का यह कहना है कि हमें किसी ने खरीद नहीं लिया, हम बिल्कुल इंडिपेंडेंट हैं। अगर सही है तो सही कहेंगे और अगर गलत है तो वो गलत कहेंगे। और डिटेल रिपोर्ट में सबसे इंपॉर्टेंट लाइन होती है ये: “In our opinion, the consolidated financial statements present fairly, in all material respects, the consolidated financial position of the group.” “ट्रू एंड फेयर व्यू” का मतलब है कि ऑडिटर ने जो सारी बैलेंस शीट वगैरा चेक की है, नॉलेज हर चीज रिलायबल है, यानी भरोसा करने के लायक है। जैसे हमें बैंकिंग हिस्ट्री दिखाएं, सेल्स की हिस्ट्री वगैरा दिखाएं, हर चीज दिखाएं। फिर ऑडिटर हर चीज देखता है, सारी बुक्स वगैरा चेक करता है और वेरीफाई करता है कि एनुअल रिपोर्ट में जो इनफॉरमेशन कंपनी ने दी है वो सच है या नहीं।

अब कभी-कभी किसी कंपनी की ऑडिट रिपोर्ट में ऑडिटर कहता है “फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स are true and fair except for one or two points”, तो इसलिए ऑडिटर रिपोर्ट के पैराग्राफ वगैरा आपको सारे ध्यान से पढ़ने चाहिए। लेकिन ऑडिटर रिपोर्ट पढ़ने का ये मतलब नहीं है कि कंपनी की फाइनेंशियल पोजीशन अच्छी है। ऑडिटर बस नंबर कंफर्म करके बताता है कि अगर कंपनी लॉस में जा रही है तो कंपनी ने सही से बताया है कि वो लॉस में जा रही है या नहीं। और अगर कंपनी प्रॉफिट में जा रही है तो वो भी सही से बताया है या नहीं। मिसाल के तौर पे एक कंपनी है जो कहती है उसे इस साल 20 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, तो ऑडिटर ये चेक करेगा कि वाकई 20 करोड़ रुपए का ही नुकसान हुआ है या कम ज्यादा हुआ है। कंपनी की ओवरऑल फाइनेंशियल पोजीशन कैसी है, ये आपने खुद डिसाइड करना है। ऑडिटर बस एनुअल रिपोर्ट में दिए गए नंबर्स कंफर्म करता है। बिजनेस की हेल्थ कैसी है, ये आपने खुद चेक करना है। आप यूं समझ लें कि आप डॉक्टर हैं, कंपनी पेशेंट है और ऑडिटर नर्स है। नर्स बस आपको पेशेंट की टेस्ट करके बताएगी कि बीपी कितना है, शुगर वगैरा कितनी है। अब पेशेंट ओवरऑल किस हालत में है, ये आपको डॉक्टर खुद जज करना है।

इसी ऑडिटर रिपोर्ट में नीचे आकर एक सेक्शन आता है कि “ऑडिट मैटर्स” के नाम से। आसान अल्फाज़ में इसका ये मतलब है कि जब ऑडिटर को लगता है कि कंपनी में किसी जगह को इंप्रूव करने की जरूरत है, तो वो उसके बारे में कंपनी को मशवरा देता है। मिसाल के तौर पे एक कंपनी है जिसने अपनी स्टेटमेंट ऑफ प्रॉफिट और लॉस, यानी इनकम स्टेटमेंट में वो वाला प्रॉफिट भी डाल दिया है जो चीज अभी तक कस्टमर को पहुंची ही नहीं है, यानी हैंडओवर नहीं हुई। मिसाल के तौर पे एक ऑटोमोबाइल कंपनी है जिसके पास अभी पेंडिंग में 50 गाड़ियां पड़ी हुई हैं जो उसने कस्टमर को डिलीवर करनी है और बाकी का पेमेंट भी लेना है। तो कंपनी वो गाड़ी कस्टमर को डिलीवर किए बगैर ही उन 50 गाड़ियों का प्रॉफिट भी इनकम स्टेटमेंट में लिख देती है। तो ऑडिटर इस बात की तरफ ही कंपनी को आगाह कर सकता है: “आप प्रॉफिट तभी रिकॉर्ड करें जब कस्टमर तक चीज डिलीवर हो जाए और पेमेंट आपके बैंक अकाउंट में आ जाए।” क्योंकि हो सकता है कुछ गाड़ियां कैंसिल करवा ली जाएं या उन 50 गाड़ियों में से किसी को कस्टमर तक पहुंचने से पहले ही नुकसान हो जाए, जैसे आजकल हमें सोशल मीडिया पर अक्सर नजर आ रहा होता है कि कहीं कल किसी ट्रक का एक्सीडेंट हो जाता है और गाड़ी कस्टमर तक डिलीवर होने से पहले ही एक्सीडेंट का शिकार हो जाती है जिसकी वजह से कंपनी को एक्स्ट्रा खर्चा पड़ जाता है। तो इसलिए ऑडिटर कहता है जब चीज सेफली कस्टमर को डिलीवर हो जाए तब आप उसका प्रॉफिट अपनी बुक्स में रिकॉर्ड करें। तो यह बेसिकली मकसद होता है ऑडिट मैटर्स का।

आई होप आपको ऑडिटर रिपोर्ट और ऑडिट मैटर्स दोनों अच्छे से समझ आ गए होंगे। फिर भी अगर आपकी कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं। और अगर वीडियो पसंद आई हो तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो को नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज।

दोस्तों, आज मैं आपको बताऊंगा कि किसी भी कंपनी के स्टेटमेंट ऑफ फाइनेंशियल पोजीशन, यानी बैलेंस शीट में आपको क्या-क्या मिलता है, यानी बैलेंस शीट के क्या-क्या कंटेंट हैं और उनमें से कुछ कंटेंट की डिटेल में आज आपके साथ शेयर करूंगा। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, किसी भी कंपनी के बैलेंस शीट में आपको बेसिकली तीन चीजें मिलती हैं, दो सेक्शंस: एक इक्विटी एंड लायबिलिटी का सेक्शन होता है जिसके अंदर आपको इक्विटी और लायबिलिटी की डिटेल्स मिलती है, और दूसरा सेक्शन असेट्स का होता है जिसमें आपको कंपनी के असेट्स, यानी संपत्तियों की इनफॉर्मेशन मिलती है। एक शेयर कैपिटल एंड रिजर्व्स, और दूसरा लायबिलिटी। लायबिलिटी फिर आगे से दो सब-कैटेगरीज़ में डिवाइड होती है: एक नॉन करंट लायबिलिटी और दूसरा करंट लायबिलिटी। इसी तरह हर कंपनी के लिए लेकिन हर कैटेगरी की कंपनी डिफरेंटली परफॉर्म करती है। इसी वजह से उनकी बैलेंस शीट भी कुछ डिफरेंट हो सकती है। मिसाल के तौर पर एक बैंक है, वो भी ये सब चीज़ें लिखेगा और एक गाड़ियां बनाने वाली कंपनी है, वो भी ये सब चीज़ें लिखेगी, लेकिन एक बैंक बिल्कुल डिफरेंटली परफॉर्म करता है एस कंपेयर टू ऑटोमोबाइल कंपनी। इसलिए डिपेंडिंग ऑन द कंपनी, बैलेंस शीट में कुछ चीज़ें डिफरेंट देखने को मिल सकती हैं जो मैं आपको फ्यूचर में आने वाली वीडियो में विद एग्जांपल, डिटेल्स से बताऊंगा, इंशाअल्लाह। तो अब बात करते हैं शेयर कैपिटल एंड इक्विटी।

शेयर कैपिटल एंड इक्विटी के अंडर में कुछ चीज़ें बेसिक होती हैं जो हर कंपनी की एनुअल रिपोर्ट में आपको देखने को मिलती हैं, जिसमें शामिल होता है: ऑथराइज्ड कैपिटल, इश्यूड, सब्सक्राइब्ड एंड पेड-अप कैपिटल और शेयर प्रीमियम। अब ऑथराइज्ड कैपिटल क्या होता है? कोई भी कंपनी जितने मैक्सिमम नंबर ऑफ शेयर इश्यू कर सकती है उसको ऑथराइज्ड कैपिटल कहते हैं। मिसाल के तौर पे एक कंपनी है, कंपनी A, जो मैक्सिमम 10 लाख शेयर इश्यू कर सकती है और हर शेयर की वैल्यू ₹10 रखती है। ये ₹10 लाख इज़ इक्वल टू वन करोड़। यानी इस कंपनी का ऑथराइज्ड कैपिटल हुआ 1 करोड़। अब कंपनी डिसाइड करती है कि उसको 10 लाख शेयर नहीं करने, वो सिर्फ 7 लाख ही इश्यू करना चाहती है। अब कंपनी ये जो 70 लाख रुपए फेस वैल्यू के 7 लाख शेयर इश्यू करेगी ये आ जाएंगे इश्यूड, सब्सक्राइब्ड एंड पेड-अप कैपिटल के अंदर। अब कंपनी ने ऐसा क्यों किया है कि सिर्फ 7 लाख इश्यू किए हैं और पूरे 10 लाख शेयर्स क्यों शो नहीं किए? कंपनी ने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि अगर कंपनी का फ्यूचर में दोबारा कभी पैसे रेज़ करने की जरूरत पड़े तो कंपनी के पास में कुछ शेयर्स की अमाउंट पड़ी हो जिसके वो दोबारा पब्लिक को इश्यू करके पैसा रेज़ कर ले। अगर कंपनी सारे ही शेयर इश्यू कर देगी तो बाद में अगर कंपनी को पैसे की जरूरत पड़ेगी तो कंपनी का अपना ऑथराइज्ड कैपिटल बढ़ाना पड़ेगा जिसके लिए उसे शेयर होल्डर्स के अप्रूवल की जरूरत पड़ेगी, गवर्नमेंट वगैरा के अप्रूवल की जरूरत पड़ेगी जो कि टाइम कंज्यूमिंग होता है। इसलिए हमेशा हर कंपनी ऑथराइज्ड कैपिटल से कम ही शेयर से शुरू करती है ताकि बाद में वक्त आने पर बगैर किसी झंझट के फटाफट से शेयर इश्यू करके मज़ीद पैसा रेज़ कर ले।

अब इसके बाद आता है शेयर प्रीमियम। शेयर प्रीमियम वो अमाउंट होती है जो कंपनी फेस वैल्यू के ऊपर पर शेयर एक्स्ट्रा चार्ज करती है। मिसाल के तौर पे जैसे हमारे केस में कंपनी ने 7 लाख शेयर्स इश्यू किए ₹10 फेस वैल्यू के हिसाब से, जो कि ₹70 लाख बनते हैं। तो कंपनी कहती है हम ₹10 के शेयर्स नहीं बेचेंगे बल्कि हम ₹30 के हिसाब से शेयर्स बेचेंगे, यानी एक शेयर पे ₹20 ज्यादा लेंगे। अब ये जो ₹20 ज्यादा लेगी कंपनी, ये हम कहेंगे कि कंपनी पर शेयर ₹20 प्रीमियम चार्ज कर रही है। और ऐसे 7 लाख शेयर जो ₹70 लाख के बन रहे थे, वो अब ₹70 लाख की बजाय ₹2 करोड़ 10 लाख के बनकर इश्यू होंगे। अब इन ₹2 करोड़ 10 लाख में से ₹70 लाख रुपए लिखे जाएंगे कंपनी की शेयर कैपिटल अमाउंट में और ₹70 लाख के ऊपर जो एक्स्ट्रा ₹1 करोड़ 40 लाख एक्स्ट्रा चार्ज किए गए हैं कंपनी की तरफ से, वो शेयर प्रीमियम के अंदर लिखे जाएंगे। आई होप दिस कॉन्सेप्ट क्लियर है। नेक्स्ट बात करते हैं लायबिलिटी की। बैलेंस शीट में दो तरह की लायबिलिटी लिखी जाती है: एक करंट लायबिलिटी और एक नॉन करंट लायबिलिटी। सबसे पहली बात, लायबिलिटी कहते किसे हैं? लायबिलिटी का मतलब होता है वो पैसे जो कंपनी को देना होते हैं, जो कंपनी ने कर्ज़ लिया होता है। करंट लायबिलिटी वो वाली लायबिलिटी होती है या कर्ज़ होता है जो कंपनी ने एक साल के अंदर-अंदर देना होता है, यानी अगली एनुअल रिपोर्ट तैयार करने से पहले। और नॉन करंट लायबिलिटी वो वाली लायबिलिटी या कर्ज़ होता है जो कंपनी ने एक साल के बाद देना होता है। मिसाल के तौर पे एक कंपनी है जिसने ₹36,00,000 का कर्ज़ लिया है अगले 3 साल में अदा करने के लिए, यानी हर साल ₹12,00,000। तो ये कर्ज़ दो हिस्सों में बँट के आधा करंट लायबिलिटी में लिखा जाएगा और आधा नॉन करंट लायबिलिटी में। यानी ₹12 लाख लिखे जाएंगे करंट लायबिलिटी में क्योंकि ये ₹12 लाख कंपनी ने एक साल के अंदर-अंदर अदा करने हैं और बाकी के ₹24 लाख लिखे जाएंगे नॉन करंट लायबिलिटी में क्योंकि ये ₹24 लाख रुपए कंपनी ने एक साल के बाद, यानी अगले 2 साल में अदा करनी है। इसी तरह जब इसे अगले साल की एनुअल रिपोर्ट बनेगी तो करंट लायबिलिटी में फिर से ₹12 लाख रुपए लिखे जाएंगे जो एक साल के अंदर-अंदर अदा करने हैं और नॉन करंट लायबिलिटी में बाकी के ₹12 लाख रुपए लिखे जाएंगे जो एक साल के बाद अदा करने हैं, क्योंकि टोटल 3 साल का कर्ज़ है जिसमें से एक साल का कर्ज़ कंपनी पिछले साल उतार चुकी है और 2 साल बाकी है फ्यूचर में। इन तमाम चीजों की डिटेल विद एग्जांपल इंशाअल्लाह मैं आपको समझाऊंगा।

अब नेक्स्ट बात आती है कंपनी की मालिकी और जिसको कंपनी कैश में कन्वर्ट कर सकती है, यानी जो कंपनी के एसेट्स होते हैं या वो चीज़ जिसे कंपनी रेवेन्यू जेनरेट करती है, यानी पैसा बनाती है। अब एसेट्स की भी लायबिलिटी की तरह दो टाइप्स होती हैं: एक करंट और एक नॉन करंट। असेट्स वो वाले एसेट्स होते हैं जिनको विदइन फाइनेंशियल ईयर, यानी एक माली साल के अंदर-अंदर कंपनी कैश में कन्वर्ट कर सकती है। करंट एसेट में सबसे बड़ा एसेट होता है कंपनी के अकाउंट में पड़ा हुआ पैसा। उनके ज़ाहिर है वो पैसा एक साल के अंदर-अंदर कंपनी आसानी से कैश में कन्वर्ट कर सकती है। या कंपनी ने अगर कहीं पर शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट की हुई है तो वो भी करंट एसेट कंसीडर होगा, यानी अगर कंपनी के पास पड़े हुए हैं और कंपनी ने 6 महीने के लिए उनका फिक्स डिपॉजिट करवा दिया है तो वो भी करंट एसेट होगा क्योंकि 6 महीने बाद कंपनी उन पैसों को कैश में कन्वर्ट कर लेगी। चलो सागर कुछ मिसालें दी हैं वर्ण करंट एसेट्स और भी बहुत तरह के होते हैं। कंपनी की बैलेंस शीट से प्रैक्टिकल पढ़ के समझाऊंगा, इंशाअल्लाह। तो बेसिकली कोई भी चीज़ जिसको कंपनी एक साल के अंदर-अंदर कैश में कन्वर्ट कर सके उसको करंट एसेट कहते हैं और जो चीज़ कंपनी एक साल के अंदर-अंदर कैश में कन्वर्ट ना कर सके या ना करना चाहे उसको नॉन करंट एसेट कहते हैं। नॉन करंट एसेट्स वो वाले एसेट्स होते हैं जिनको कंपनी कैश में कन्वर्ट कर तो सकती है लेकिन एक साल के अंदर-अंदर नहीं कर सकती या करना नहीं चाहती, जैसे कि बिल्डिंग या मशीनरी वगैरा। ज़ाहिर है कंपनी जो टेक्सटाइल का काम करती है तो उसके पास बिल्डिंग या मल्टीपल बिल्डिंग्स होंगी जहाँ वो फैक्ट्री ऑपरेट करती होगी और उस बिल्डिंग में मशीनस भी होंगी। अब ज़ाहिर है वो बिल्डिंग भी एसेट है और वो मशीनस भी एसेट है जिनसे कंपनी रेवेन्यू जेनरेट कर रही है। अब कंपनी को बेच के कैश में कन्वर्ट कर तो सकती है लेकिन वो कंपनी ऐसा क्यों करेगी? अगर बिल्डिंग और मशीन बेच देगी तो बिज़नेस कैसे करेगी? कोई भी कंपनी ये नहीं चाहेगी कि वो एक साल के अंदर-अंदर ये सब सेल करके कैश में कन्वर्ट कर दे क्योंकि कंपनी के इंटेंशन्स हैं कि कंपनी कई सालों तक इस बिल्डिंग से फ़ायदा उठाए, इन मशीन से फ़ायदा उठाए। तो नॉन करंट एसेट बेसिकली वो वाले एसेट्स होते हैं जिनको कंपनी लॉन्ग टर्म के लिए होल्ड करके रखना चाहती है और एक साल के अंदर-अंदर कैश में कन्वर्ट नहीं कर सकती या करना नहीं चाहती। इस सबकी डिटेल में आपको फ्यूचर में आने वाली वीडियो में विद एग्जांपल, इंशाअल्लाह। आई होप आपको ये सारे कॉन्सेप्ट क्लियर हो गए होंगे और आपको आज की वीडियो से काफ़ी कुछ सीखने को भी मिला होगा। अगर आपको कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं। और अगर आपको वीडियो पसंद आई है तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पे क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो के नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाज़त। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज।

दोस्तों, इससे पिछली वीडियो में मैंने आपको बैलेंस शीट की कुछ बेसिक समझ दी थी, कि बैलेंस शीट के क्या-क्या कंटेंट होते हैं और उन कंटेंट्स के कुछ बेसिक से कॉन्सेप्ट समझा दिए थे। और आज से मैं आपको बैलेंस शीट की फ़र्दर डिटेल्स समझाना शुरू करूंगा। लेकिन यहां एक सवाल पैदा होता है कि किसी भी कंपनी में इन्वेस्ट करने से पहले उसे कंपनी की बैलेंस शीट पढ़नी ही क्यों चाहिए? तो इसका बहुत सिंपल सा जवाब है कि किसी कंपनी में इन्वेस्ट करने से पहले उसे कंपनी की बैलेंस शीट आपको इसलिए पढ़नी चाहिए कि बैलेंस शीट पढ़कर आपको यह पता लगेगा कि कंपनी की ओवरऑल फाइनेंशियल हेल्थ कैसी है, यानी कंपनी पर कर्ज़ कितना है, यानी लायबिलिटी कितनी है और कंपनी के एसेट्स कितने हैं, यानी संपत्तियाँ कितनी हैं। कहीं संपत्तियों से ज़्यादा कर्ज़ तो नहीं है कि बाद में कंपनी कर्ज़ उतार ना पाए और कंपनी दिवालिया हो जाए? और क्या कंपनी की इतनी कैपेसिटी है कि अगर वो कर्ज़ उतार भी दे फिर भी प्रॉफ़िट में जा सके? अगर कंपनी फाइनेंशियली स्ट्रांग है तो ज़ाहिर है कि इन द लॉन्ग रन कंपनी की शेयर खरीदकर आपको फ़ायदा ही होगा। इसलिए किसी भी कंपनी के शेयर्स खरीदने से पहले उसे कंपनी की बैलेंस शीट पढ़ना बहुत ज़रूरी है। और आज मैं आपको नॉन करंट एसेट्स समझाऊंगा विद एग्जांपल। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, आपको बैलेंस शीट समझने के लिए जिस कंपनी की मैंने बैलेंस शीट सिलेक्ट की है वो टोयोटा पाकिस्तान है जो इंडस मोटर के नाम से पाकिस्तान में ऑपरेट करती है।

बैलेंस शीट के नॉन करंट एसेट्स में सबसे पहले आपको प्रॉपर्टी, प्लांट एंड इक्विपमेंट देखने को मिलेंगे जिसको पीपीएंडई कहते हैं। अब इसकी डिटेल बताने से पहले मैं आपको एक बात बताना चाहूंगा कि एसेट्स की भी दो टाइप्स होती हैं: एक टैन्जिबल और एक इन्टैन्जिबल। टैन्जिबल एसेट्स वो होते हैं जो फ़िज़िकल फ़ॉर्म में एक्ज़िस्ट करते हैं, यानी जिन्हें आप टच कर सकते हैं, जैसे लैंड, बिल्डिंग, इक्विपमेंट, मशीनरी, फ़र्नीचर और इन्वेंटरी वगैरा। और इन्टैन्जिबल एसेट्स वो एसेट्स होते हैं जो फ़िज़िकल फ़ॉर्म में एक्ज़िस्ट नहीं करते, यानी जिन्हें आप टच नहीं कर सकते, जैसे कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर, पैटेंट्स वगैरा। इसी तरह किसी भी कंपनी के जो कमर्शियल होते हैं, यानी ऐड वगैरा होते हैं, वो भी इन्टैन्जिबल एसेट्स में ही आते हैं क्योंकि उन ऐड के नतीजे में पब्लिक तक उस प्रोडक्ट की अवेयरनेस पहुँचती है, फिर पब्लिक उस प्रोडक्ट को परचेज़ करती है जिसका नतीजे में कंपनी को प्रॉफ़िट होता है। इसलिए किसी भी कंपनी के टीवी कमर्शियल्स जो होते हैं वो उसकी कंपनी के इन्टैन्जिबल एसेट्स होते हैं। और कोई ऐसी चीज़ जो कंपनी को किसी भी किस्म का फाइनेंशियल फ़ायदा पहुँचा सके वो एसेट कहलाती है। यानी ऐसे एसेट्स जो फ़िज़िकल फ़ॉर्म में एक्ज़िस्ट करते हैं जिसमें कंपनी ऑपरेट कर रही होती है वो प्लॉट आता है जिस पर वो बिल्डिंग बनी होती है और भी। इसके अलावा कोई ऐसी प्रॉपर्टी जहाँ से बिज़नेस को किसी भी किस्म का फाइनेंशियल फ़ायदा पहुँच रहा हो पीपीएंडई में इंक्लूड होती है। सेकेंडली, पीपीएंडई में वो मशीनरी आती है जो कंपनी यूज़ कर रही होती है। जैसे टोयोटा है तो ऑब्वियसली इस कंपनी के पास हैवी मशीनरी होगी जिसकी हेल्प से वो गाड़ियाँ असेंबल करती होगी। वो कंप्यूटर्स आते हैं जो कंपनी यूज़ कर रही होती है। फिर इसके अलावा टूल्स भी आते हैं जैसे रेंच, प्लस वगैरा। कहने को ये काफ़ी छोटी चीज़ें हैं लेकिन कंपनी कोई भी चीज़ अनरिकॉर्डेड नहीं छोड़ती। अगर कंपनी में एक सुई भी आती है तो उसकी कॉस्ट भी कंपनी बैलेंस शीट में इंक्लूड करती है। इसके अलावा पीपीएंडई में फ़र्नीचर भी आता है जो कंपनी यूज़ करती है और आखिर में इसके अलावा कंपनी जो गाड़ियाँ कंपनी प्रोड्यूस करती है वो भी पीपीएंडई में इंक्लूड होती हैं।

हम इस सबके सामने अंत में देखेंगे कि लायबिलिटी की वैल्यू इस साल कितने रुपए है और लास्ट ईयर कितने रुपए की थी। जैसे प्रॉपर्टी, प्लांट एंड इक्विपमेंट के आगे सन 2020 के अंडर ₹1,64,200 लिखा हुआ है और ऊपर “रुपीज़ इन 000” लिखा हुआ है। इसका मतलब है कि आप इस गिवन अमाउंट को 1000 से मल्टीप्लाई करें तो आपको एग्ज़ैक्ट फ़िगर आ जाएगा कि सन 2020 में टोयोटा कंपनी की पीपीएंडई की क्या वैल्यू है। अब इस अमाउंट को 1000 से मल्टीप्लाई करें तो आंसर आता है ₹1,642,00,000 यानी टोयोटा कंपनी के एसेट्स की वैल्यू सन 2020 में ₹1,642,00,000 है। इसके बाद मेंशन है इन्टैन्जिबल एसेट्स और जैसे मैंने बताया कि वो वाले एसेट्स हैं जो फ़िज़िकल फ़ॉर्म में एक्ज़िस्ट नहीं करते, जैसे कि कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर वगैरा जिसकी अमाउंट ₹72,550 है। नेक्स्ट है लॉन्ग टर्म लोन एंड एडवांसेस। लोन का मतलब होता है कर्ज़ लेना पड़ता है। लेकिन जब आपने किसी को कर्ज़ दिया हो तो वो कर्ज़ आपका एसेट बन जाता है क्योंकि वो पैसे आपको वापस लेने होते हैं। अब आप सोच रहे होंगे टोयोटा कंपनी तो गाड़ियाँ बनाती है तो ये कंपनी कैसे किसी को कर्ज़ दे सकती है? बिल्कुल, टोयोटा कंपनी गाड़ियाँ ही बनाती है लेकिन कंपनी अपने एम्प्लॉयीज़ को इंटरनल लोन ज़रूर देती है जो कंपनी का एसेट बन जाता है और फिर कंपनी बैंक की तरह ही विद इंटरेस्ट वो लोन अपने एम्प्लॉयीज़ से वापस लेती है। इसलिए अगर कंपनी ने कर्ज़ दिया हो तो वो एसेट बन जाता है, कर्ज़ लिया हो तो वो लायबिलिटी बन जाती है। नेक्स्ट है लॉन्ग टर्म डिपॉजिट्स। ये नाम सुनके ही अंदाज़ा हो जाता है कि वो पैसे हैं जो कंपनी ने कहीं पे इन्वेस्ट किए हुए हैं। अब क्योंकि ये नॉन करंट एसेट्स के अंदर आ रहे हैं इसका मतलब है कि ये पैसे कंपनी ने कहीं पर लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्ट किए हुए हैं जो कंपनी को एक साल के बाद मिलेंगे। अब ये इन्वेस्टमेंट एक साल से लेकर कई सालों तक की हो सकती है और डिफरेंट जगह पर हो सकती है, जैसे कि स्टॉक मार्केट में भी हो सकती है, किसी बैंक के साथ लॉन्ग टर्म फिक्स्ड डिपॉजिट भी हो सकता है और रियल एस्टेट में भी हो सकती है। और लास्ट में है एक टॉपिक जो मैं इंशाअल्लाह आगे आने वाली किसी वीडियो में डिटेल से कवर करूंगा, लेकिन मैं बस आपको इसका एक बेसिक सा कॉन्सेप्ट समझा देता हूँ। डिफ़र्ड टैक्स बेसिकली एसेट्स में भी आता है और लायबिलिटी में भी आता है। जब भी एसेट्स में आता है तो इसको डिफ़र्ड टैक्स एसेट्स कहते हैं और जब ये लायबिलिटी में आता है तो इसको डिफ़र्ड टैक्स लायबिलिटी कहते हैं। बेसिकली होता ऐसे है कि कंपनी अक्सर अपना साल का टैक्स ज़्यादा पे कर देती है, यानी ओवरपे कर देती है। अब ओवरपे क्यों होता है इसकी डिटेल में किसी और वीडियो में आपको बताऊंगा। बेसिकली होता ऐसे है कि जो टैक्स की ओवरपेमेंट हो चुकी होती है वो ओवरपेमेंट अगले साल कंपनी को टैक्स रिलीफ़ की सूरत में वापस दी जाती है जो कि डिफ़र्ड टैक्स एसेट बन जाता है। मिसाल के तौर पर कंपनी का ₹100 टैक्स बन रहा था और कंपनी ने ₹150 टैक्स दे दिया तो अगले साल कंपनी को ₹50 का टैक्स रिलीफ़ मिलेगा। जो इसी वजह से टोयोटा कंपनी का सन 2019 में कोई डिफ़र्ड टैक्स एसेट नहीं था लेकिन सन 2020 में कंपनी के अकाउंट में डिफ़र्ड टैक्स एसेट की अमाउंट शो हो रही है। इसका मतलब है कि टोयोटा कंपनी का जितना टैक्स बनता था कंपनी ने ऑब्वियसली उससे ज़्यादा टैक्स पे कर दिया था जो कि अब उनका डिफ़र्ड टैक्स एसेट बन गया है। आई होप आपको ये सारे कॉन्सेप्ट क्लियर हो गए होंगे और आपको आज की वीडियो से काफ़ी कुछ सीखने को भी मिला होगा। अगर आपको वीडियो पसंद आई है तो वीडियो को लास्ट में लाइक कीजिएगा और जाने से पहले चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली मेरी तमाम वीडियो के नोटिफिकेशन आपको मिल सकें। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाज़त। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज।

24वीं क्लास में कुछ शांति। दोस्तों, इससे पिछली वीडियो में मैंने आपको नॉन करंट एसेट्स, यानी लॉन्ग टर्म एसेट्स की डिटेल्स बताई थी विद एग्जांपल। अगर आपने वो वीडियो नहीं देखी तो टॉप राइट हैंड पर लिंक शो हो रहा होगा, उस पर क्लिक करके आप उस वीडियो को देख सकते हैं। तो आज की वीडियो में मैं आपको करंट एसेट्स, शॉर्ट टर्म एसेट्स की डिटेल्स बताऊंगा विद एग्जांपल। और एग्जांपल के लिए हम पिछली वीडियो की तरह टोयोटा की बैलेंस शीट ही यूज़ करेंगे। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। सबसे पहली बात, करंट एसेट्स, यानी शॉर्ट टर्म एसेट्स से क्या मुराद है? दोस्तों, करंट एसेट्स बेसिकली वो वाले एसेट्स होते हैं जिनको कंपनी एक साल के अंदर-अंदर कैश में कन्वर्ट करने वाली होती है। अब टोयोटा की बैलेंस शीट को देखें तो करंट एसेट्स में सबसे पहले मेंशन है स्टोर्स एंड स्पेयर्स। स्टोर्स एंड स्पेयर्स बाकी चीजों के मुक़ाबले में इतनी ज़्यादा वैल्यू नहीं रखते। जैसे आप जहाँ भी देखें तो बाकी चीजों के मुक़ाबले में इनकी वैल्यू काफ़ी कम है। स्टोर्स एंड स्पेयर्स बेसिकली वो आइटम होते हैं जो कंपनी के प्रोडक्शन प्रक्रिया में कम आते हैं, जो काफ़ी छोटे-छोटे स्पेयर पार्ट्स होते हैं। जैसे अगर एक लकड़ी की चेयर बन रही है तो उसमें सबसे ज़्यादा लकड़ी यूज़ होगी, उसके बाद थोड़ी सी अमाउंट ग्लू वगैरा। तो वो ग्लू और कल स्टोर्स एंड स्पेयर्स वगैरा के अंदर आ सकते हैं। इसके नेक्स्ट है स्टॉक इन ट्रेड। स्टॉक इन ट्रेड में रॉ मटेरियल आता है, फ़िनिश्ड प्रोडक्ट आती है और भी इसके अलावा बाकी इक्विपमेंट्स वगैरा आते हैं। अगर आप फ़र्दर डिटेल देखना चाहते हैं कि आपको वाकई पता लगे कि किस हेडिंग के अंदर क्या-क्या चीज़ें आ रही हैं, यानी किसी भी फ़िगर की फ़र्दर डिटेल अगर आप जानना चाहते हैं तो एनुअल रिपोर्ट में एक सेक्शन होता है “नोट्स टू द फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स” का, जिसमें आप कंपनी की फ़र्दर डिटेल देख सकते हैं। अब जैसे स्टॉक इन ट्रेड के आगे नोट की हेडिंग के नीचे स्टॉक इन ट्रेड के आगे नाइन लिखा हुआ है। इसका मतलब है कि इस अमाउंट की फ़र्दर डिटेल हमें नोट नंबर नाइन पर मिल जाएंगी। अब अगर हम नोट नंबर नाइन पर जाएँ तो वहाँ हमें कुछ ऐसी डिटेल्स शो होंगी। सबसे ऊपर लिखा हुआ है “इन हैंड”, इसका मतलब है कि ये वो चीज़ें हैं जो कंपनी के पोज़िशन में हैं, यानी कंपनी के कब्ज़े में हैं, यानी कंपनी के पास इन हैंड मौजूद हैं, इसीलिए यहाँ “इन हैंड” लिखा हुआ है जिसमें रॉ मटेरियल, यानी कच्चा माल शामिल है, वर्क इन प्रोग्रेस शामिल है। वर्किंग प्रोग्रेस से मुराद वो प्रोडक्ट होती है जो अभी कंप्लीट नहीं हुई होती, यानी जो इन प्रोग्रेस होती है, इसीलिए इसको वर्क इन प्रोग्रेस कहा जाता है। इसके बाद फ़िनिश्ड प्रोडक्ट लिखी हुई है, फ़िनिश्ड प्रोडक्शन

नहीं लेती यानी कोई भी चीज गिरवी नहीं रख पाती। मिसाल के तौर पर कंपनी A है, कंपनी A जिसको 10 कार्स चाहिए और कंपनी B छह से आठ महीने में दे देंगे। तो अगर टोयोटा कंपनी बगैर कोई चीज गिरवी रख पाए यूं ही गाड़ियां बेच देगी, तो हम कहेंगे ये ट्रेड अनसिक्योर्ड है। लेकिन अगर टोयोटा कंपनी कहती है कि ठीक है, हम आपको गाड़ी बेच देते हैं, लेकिन आप इन 10 गाड़ियों की अमाउंट जितनी भी चीज गिरवी रखना ताकि अगर आप 6 महीने तक पेमेंट ना कर सकें, तो जो चीज आपने गिरवी रखवाई होगी हम उसे चीज को सेल करके अपने पैसे वसूल कर लेंगे, तो इसको हम कहेंगे ट्रेड सिक्योरिटी। लिखा हुआ है इसका मतलब है कि टोयोटा कंपनी ने किसी को उधार पर गाड़ियां सेल की हैं बगैर किसी कोलेटरल के यानी बगैर किसी चीज को गिरवी रखना।

अब ऐसे इन्वेस्टर के लिए यह हमारे लिए थोड़ी सी खतरनाक बात है कि आखिर इतनी ज्यादा मात्रा में गाड़ियां टोयोटा ने किसी को उधार पर बेची ही क्यों है और वो भी बगैर किसी कोलेटरल के? अब इसके डिटेल जानने के लिए हमें नोट 10 पर जाना पड़ेगा। अब नोट नंबर 10 पर आएँ तो इस ट्रेड की डिटेल में लिखा है गवर्नमेंट एजेंसिज यानी यह गाड़ियां गवर्नमेंट को बेची गई हैं। लेकिन हमारा आगे एक इन्वेस्टर कंसर्न है कि बेशक गवर्नमेंट है, लेकिन उधार पर क्यों बेची गई है? कोई कोलेटरल क्यों नहीं लिया गया? तो इस बात का जवाब इन्होंने नीचे दिया हुआ है: देश बैलेंस रिलेटेड टू वेरियस कस्टमर, प्राइमरिली गवर्नमेंट ऑर्गेनाइजेशन, फ्रॉम होम देयर इज़ नो रीसेंट हिस्ट्री ऑफ़ डिफॉल्ट। यानी इसका मतलब है कि इन्होंने जितनी भी गाड़ियां उधार पे बेची हैं, मेजॉरिटी गाड़ियां गवर्नमेंट को ही बेची हैं और इसलिए बेची हैं क्योंकि गवर्नमेंट ने कभी भी डिफॉल्ट नहीं किया, यानी ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि गवर्नमेंट ने टोयोटा कंपनी से गाड़ियां हाथ पर खरीद ली हों और उनको टाइम पर पेमेंट ना की हो। इस गुड बिज़नेस रिलेशनशिप हिस्ट्री की वजह से ही कंपनी ने बगैर किसी कोलेटरल के गवर्नमेंट को दोबारा उधार पर गाड़ियां बेची हैं। तो यह सारी डिटेल लोन की है। इसका मतलब है कि यह 29 लाख वाली अमाउंट कंपनी को इसी साल रिसीव हो जाएगी।

नेक्स्ट है शॉर्ट टर्म प्री पेमेंट। शॉर्ट टर्म प्री पेमेंट का मतलब है कि कंपनी ने किसी चीज की एडवांस में ही पेमेंट कर दी है यानी ड्यू डेट आने से पहले ही पेमेंट कर दी है। जैसे जब आप कोई घर रेंट पे लेते हैं, तो आप दो-तीन महीने का रेंट एडवांस में दे देते हैं, जिससे सिक्योरिटी भी कहा जाता है। तो बैलेंस शीट की जुबान में उसे सिक्योरिटी को प्री पेमेंट कहते हैं। अब प्री पेमेंट किसी भी चीज की हो सकती है, जैसे बिल्डिंग का रेंट भी हो सकता है और इंश्योरेंस वगैरा भी हो सकती है।

इससे नेक्स्ट है एक्रूड रिटर्न। एक्रूड रिटर्न उसे प्रॉफिट को कहते हैं जो कंपनी का होता तो है, लेकिन अभी तक उसको रिसीव नहीं हुआ होता। मिसाल के तौर पे अगर कंपनी ने 1 करोड़ कहीं पे इन्वेस्ट किया है और 6 महीने बाद उसको एक करोड़ 10 लाख रुपए वापस मिल रहे हैं, तो ये 10 लाख रुपए एक्रूड रिटर्न के ले जाएंगे क्योंकि वो 10 लाख रुपए हैं कंपनी के ही, लेकिन अभी तक उसे रिसीव नहीं हुए। इसी तरह कोई भी पैसे जो कंपनी के ही हों, लेकिन उसका अभी तक रिसीव ना हुए हों, वो एक्रूड रिटर्न कहलाते हैं।

नेक्स्ट है अदर रेसीवेबल्स। छोटी-मोटी अमाउंट आती है जो कंपनी ने रिसीव करनी होती है। यह ऐसी अमाउंट होती है जो किसी स्पेशल हेड के अंडर नहीं आती, बस छोटी-मोटी रिसीविंग होती है, इसलिए इनको अदर रेसीवेबल्स में डाल देते हैं। इसके बाद है टैक्सेशन नेट। यह मैं इसे पिछली वीडियो में बता चुका हूँ कि वो अमाउंट होती है जो कंपनी को टैक्स रिलीफ की सूरत में मिलती है, टैक्स ज्यादा पे कर देने की वजह से।

इसके बाद है शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट। शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट का मतलब है कि वो वाले पैसे हैं जो कंपनी ने थोड़े से समय के लिए कहीं पे फिक्स्ड डिपॉजिट वगैरा करवाए हुए हैं, जो कि कंपनी को इसी फाइनेंशियल ईयर के अंदर-अंदर रिसीव हो जाएंगे। अब इसके भी डिटेल्स देख लेते हैं नोट नंबर 15 पे। अब नोट 15 में यह डिटेल्स लिखी हुई है कि कुछ पैसे कमाने टीडीआर यानी डिपॉजिट रिसीव्ड में इन्वेस्ट किए हुए हैं, कुछ ट्रेजरी बिल्स में और कुछ पाकिस्तान इन्वेस्टमेंट बोर्ड में। आपको आज की वीडियो से काफी कुछ सीखने को मिला होगा। अगर आपके कोई सवाल हैं, तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं। और अगर आपको यह वीडियो पसंद आई है, तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में ऐसी आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 25वीं क्लास में खुशामदी। दोस्तों, आज की वीडियो में मैं आपको नॉन करंट लायबिलिटी और करंट लायबिलिटी की डिटेल्स बताऊंगा विद एग्जांपल। नॉन करंट लायबिलिटी वो वाली लायबिलिटी होती हैं जो कंपनी ने एक फाइनेंशियल ईयर के बाद यानी एक साल के बाद क्लियर करनी होती है, और करंट लायबिलिटी वो वाली लायबिलिटी होती हैं जो कंपनी ने एक फाइनेंशियल ईयर के अंदर यानी एक साल के अंदर-अंदर ही क्लियर करनी होती है। इन सब चीजों को समझने के लिए हम पिछली वीडियो से स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, नॉन करंट लायबिलिटी में सबसे पहले लिखा हुआ है लॉन्ग टर्म लोन। लॉन्ग टर्म लोन का मतलब है कि यह वह वाला कर्जा है जो कंपनी ने एक साल के बाद चुकाना है। अगर इसकी डिटेल हम नोट 20 पर जाकर देखें, तो यहां लिखा हुआ है कुछ लोन कंपनी ने स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के रीफाइनेंसिंग प्रोग्राम के अंडर लिया हुआ है और कुछ कर्जा लोन पेमेंट ऑफ़ वेजेस एंड सैलरी टू एम्प्लॉयीज के लिए लिया हुआ है।

नेक्स्ट है डिफर्ड रेवेन्यू। डिफर्ड रेवेन्यू एक्रूड रेवेन्यू का बिल्कुल अपोजिट होता है। जैसे एक्रूड रेवेन्यू उन पैसों को कहते हैं जो कंपनी के होते हैं, लेकिन अभी तक कंपनी को रिसीव नहीं हुए होते। इसी तरह डिफर्ड रेवेन्यू वो वाले पैसे होते हैं जो कंपनी ने किसी काम को करने के लिए एडवांस में ले लिए होते हैं और उन पैसों के बदले उसे काम को यानी उसे ऑब्लिगेशन को भी कंपनी ने पूरा करना होता है। यानी पूरे साल की पेमेंट एडवांस में कर देते हैं, तो वह पैसे कंपनी ने आपको पूरे साल की सर्विसेज देने की ऑब्लिगेशन पूरी करनी है। इसके बाद है डिफर्ड टैक्सेशन। जैसे मैंने बताया था कि टैक्स एसेट में भी आता है और लायबिलिटी में भी। तो यह लायबिलिटी है। अब देखें 2019 में टोयोटा कंपनी का टैक्स एसेट्स था। अब यह ऐसा क्यों होता है कि टैक्स कभी लायबिलिटी बन जाता है, कभी एसेट बन जाता है? इस सब का एक इन्वेस्टर के लिए जानना ज़रूरी नहीं है। यह बस अकाउंटिंग पीरियड का थोड़ा बहुत सीन होता है। वैसे अगर आप कहेंगे, तो मैं इस पर भी एक वीडियो बनाकर आपको सब एक्सप्लेन कर दूँगा। तो यह सब तो थी नॉन करंट लायबिलिटी यानी वह वाली लायबिलिटी जो कंपनी ने एक साल के बाद क्लियर करनी है। अब नेक्स्ट है करंट लायबिलिटी यानी वह लायबिलिटी जो कंपनी ने एक साल के अंदर-अंदर क्लियर करनी है। इसमें सबसे पहले लिखा हुआ है करंट पोर्शन ऑफ़ डिफर्ड रेवेन्यू। इसका मतलब है जो नॉन करंट लायबिलिटी का डिफर्ड रेवेन्यू है उसका कुछ पोर्शन कंपनी ने इस साल पूरा करना है। यानी जो ऑब्लिगेशन कंपनी ने डिफर्ड रेवेन्यू की पूरी करनी है, उसमें से इतनी अमाउंट यानी 28420 की ऑब्लिगेशन कंपनी ने इस साल पूरी करनी है और बाकी की 1 साल के बाद। इसी तरह आगे लिखा हुआ है करंट पोर्शन ऑफ़ लॉन्ग टर्म लोन। अब अगर आपको याद हो, मैंने क्लास 22 में बताया था कि अगर कंपनी 3600000 लोन लेती है, जो उसने तीन सालों में अदा करना है, तो 24 लाख रुपए नॉन करंट लायबिलिटी में लिखे जाएंगे और 12 लाख रुपए करंट लायबिलिटी में। तो यह जो करंट पोर्शन ऑफ़ लॉन्ग टर्म लोन है, यह वह पैसे हैं जो कंपनी ने लॉन्ग टर्म लोन के इस साल अदा करने हैं और बाकी के 1 साल के बाद। यानी इन ₹479326 में से ₹123425 कंपनी ने इस साल चुकाए हैं और बाकी के एक साल के बाद। इसके बाद है अनक्लेम्ड डिविडेंड। अनक्लेम्ड डिविडेंड वह वाली डिविडेंड होते हैं जो कंपनी ने तो इशू कर दिए होते हैं, लेकिन शेयरहोल्डर्स ने अभी तक उनका क्लेम नहीं लिया होता। इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी ने शेयरहोल्डर को डिविडेंड की पेमेंट की ही नहीं है, बल्कि अनक्लेम्ड डिविडेंड का यह मतलब है कि कंपनी ने शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड की पेमेंट कर दी है, लेकिन किसी भी वजह से शेयरहोल्डर्स ने अभी तक अपनी डिविडेंड क्लेम नहीं किए। वैसे तो डिविडेंड की पेमेंट बैंक अकाउंट में भी रिसीव हो सकती है, लेकिन कुछ लोग डिविडेंड की पेमेंट बैंक अकाउंट की बजाय चेक के थ्रू रिसीव करना पसंद करते हैं, जो कि उनके घर पर डिलीवर होता है। अब शायद किसी ऐसे शेयरहोल्डर को चेक नहीं मिला हो या कोई डिविडेंड क्लेम करना ही भूल गया हो। बहरहाल, किसी भी वजह से क्योंकि ऐसा नहीं होता कि कंपनी वह पैसे वापस ले ले। इसके बाद है ट्रेड पेएबल्स। वह वाले पैसे होते हैं जो कंपनी ने किसी को देने होते हैं। अब वो पैसे टैक्स वगैरा की मद में भी हो सकते हैं, कस्टम ड्यूटी वगैरा भी हो सकती है, बिल्स की पेमेंट भी हो सकती है, रेंट भी हो सकता है, किसी कंपनी की पेमेंट भी हो सकती है और गवर्नमेंट लेवी वगैरा भी हो सकती है। इस सब की डिटेल आप कंपनी के एनुअल रिपोर्ट में नोट 21 पे देख सकते हैं। और किसी कंपनी के एनुअल रिपोर्ट कैसे डाउनलोड करते हैं, इस पर भी मैं एक वीडियो बना चुका हूँ, जिसका लिंक मैं डिस्क्रिप्शन में भी दे दूंगा और ऊपर टॉप कॉर्नर में भी दे दूंगा। और आखिर में है एडवांस फ्रॉम कस्टमर एंड डीलर्स। अब नोट 23 पर जाकर इसकी डिटेल्स देखें तो यहां लिखा हुआ है कस्टमर एंड डीलर्स ने रिस्पेक्टिव डीलर वगैरा से वसूल किए हुए हैं और अब कंपनी ने कस्टमर और डीलर्स को इतनी अमाउंट की गाड़ियां और स्पेयर पार्ट्स प्रोवाइड करनी है। तो आई होप आपको यह सारे कॉन्सेप्ट क्लियर हो गए होंगे और आपको आज की वीडियो से काफी कुछ सीखने को भी मिला होगा। अगर आपके कोई सवाल हैं तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं और अगर आपको यह वीडियो पसंद आई है तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में ऐसी आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 26वीं क्लास में सुशांत। दोस्तों, लास्ट की चार वीडियो में हम बैलेंस शीट को कंप्लीट डिटेल में समझ चुके हैं, और आज की वीडियो में मैं आपको एनुअल रिपोर्ट के दूसरी इम्पॉर्टेन्ट स्टेटमेंट यानी स्टेटमेंट ऑफ़ प्रॉफिट एंड लॉस, जिसको इनकम स्टेटमेंट भी कहते हैं, उसके बारे में बताऊंगा। एनुअल रिपोर्ट में बेसिकली तीन इम्पॉर्टेन्ट स्टेटमेंट होती हैं, और मैं आपको उन तीनों स्टेटमेंट के बारे में समझाकर आखिर में कुछ इम्पॉर्टेन्ट रेश्योज़ के बारे में बताऊंगा कि हम उन रेश्योज़ को कैसे खुद से फाइंड आउट कर सकते हैं और कैसे इंटरप्रेट कर सकते हैं, यह कैसे समझ सकते हैं वह हमें कंपनी के बारे में क्या बता रही है कि क्या कंपनी इन्वेस्टिंग के लिए अच्छी है या नहीं। आज की वीडियो इनकम स्टेटमेंट के बारे में होने वाली है, तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। इनकम स्टेटमेंट यानी स्टेटमेंट ऑफ़ प्रॉफिट एंड लॉस हमें यह बताती है कि कंपनी ने आखिरी के 12 महीने में यानी लास्ट फाइनेंसियल ईयर में टोटल कितने पैसे कमाए, इस टाइम पीरियड में कंपनी के क्या-क्या खर्चे रहे और साल खत्म होने के बाद कंपनी प्रॉफिट में गई है या लॉस में। इनकम स्टेटमेंट समझने से पहले मैं आपको रेवेन्यू, एक्सपेंसेस, प्रॉफिट और लॉस इन चारों कॉन्सेप्ट्स के बारे में समझाऊंगा क्योंकि इनको समझे बगैर हमारे लिए इनकम स्टेटमेंट को समझना ज़रा थोड़ा सा मुश्किल हो जाएगा। तो सबसे पहले है रेवेन्यू। रेवेन्यू उन पैसों को यानी उसे अमाउंट को कहते हैं जो किसी भी चीज को बेच के यानी सेल करके कंपनी को टोटल रिसीव हुई होती है। नेक्स्ट है एक्सपेंसेस। एक्सपेंसेस का मतलब होता है जो कंपनी के खर्चे हैं। इसके बाद है प्रॉफिट। प्रॉफिट तो हम सबको ही पता है, उसे अमाउंट को कहते हैं जो कंपनी को माली मुनाफा हुआ कहलाए जाएंगे। रेवेन्यू यानी यह कंपनी को टोटल अमाउंट रिसीव हुई है अपनी प्रोडक्ट बेचकर। अब इस गाड़ी को बनाने के लिए जाहिर है कंपनी का अपना भी खर्चा आया होगा। तो हम कहते हैं यह गाड़ी बनाने पर कंपनी का खर्चा आया है 3400000 तो यह 34 लाख जाएंगे एक्सपेंसेस। अब रेवेन्यू में से एक्सपेंसेस माइनस करें तो आंसर आता है 2 लाख रुपए कहलाए जाएंगे कंपनी का प्रॉफिट। लेकिन गाड़ी किसी भी वजह से टोयोटा कंपनी ने 3600000 की बजाय 32 लाख की बेची होती तो हम कहते कंपनी को घाटा रहता। लेकिन अब प्रॉफिट की जगह 2 लाख का लॉस लिखा जाता। तो किसी भी कंपनी की इनकम स्टेटमेंट यानी स्टेटमेंट ऑफ़ प्रॉफिट एंड लॉस बेसिकली हमें यही बताती है कि पिछले 1 साल में कंपनी का रेवेन्यू कितना बना है, कंपनी के एक्सपेंसेस कितने रहे हैं और आखिर में साल खत्म होने के बाद कंपनी प्रॉफिट में गई है या लॉस में। यह तो बेसिक प्रॉफिट और लॉस का कॉन्सेप्ट है, लेकिन इनकम स्टेटमेंट में यह सारी चीजें काफी डिटेल में मेंशन होती हैं कि रेवेन्यू कहाँ से जेनरेट हुआ, एक्सपेंसेस क्या-क्या रहे और एंड में प्रॉफिट या लॉस कितना हुआ कंपनी को। इसलिए मैं आपको प्रॉफिट एंड लॉस प्रैक्टिकल कंपनी की इनकम स्टेटमेंट से समझाता हूँ और एग्जांपल के लिए हम प्रीवियस वीडियो की तरह टोयोटा की स्टेटमेंट लेंगे। तो यह है टोयोटा की स्टेटमेंट ऑफ़ प्रॉफिट एंड लॉस यानी इनकम स्टेटमेंट। इसमें सबसे पहले लिखा हुआ है रेवेन्यू फ्रॉम कांट्रैक्ट्स विद कस्टमर यानी यह कंपनी का टोटल रेवेन्यू है नॉर्मल ऑपरेशन से यानी पिछले 1 साल में कंपनी ने जितना भी टोटल पैसा कमाया है, इन्वेस्टमेंट वगैरा के अलावा, गाड़ियां और स्पेयर पार्ट्स सेल करके, वो इतना है यानी 179 मिलियन रुपीज़। अब रेवेन्यू मेंशन करने के बाद इनकम स्टेटमेंट में से अमाउंट माइनस होना शुरू हो जाती हैं यानी सबट्रैक्ट होना शुरू हो जाती हैं जितने भी कंपनी के एक्सपेंसेस वगैरा हुए होते हैं उनकी। इसके बाद है कॉस्ट ऑफ़ सेल्स। कॉस्ट ऑफ़ सेल्स को कॉस्ट ऑफ़ गुड्स सोल्ड या कॉक्स भी कहते हैं और यह कंपनी का एक्सपेंस होता है जो प्रोडक्ट को रेडी करने पर आया होता है। यह इनकम स्टेटमेंट है, तो मोस्ट प्रोबेबली 162 मिलियन रुपीज़ वो वाली अमाउंट होगी जो गाड़ियां और गाड़ियों के स्पेयर पार्ट्स वगैरा को रेडी करने पर आई होगी। कॉस्ट ऑफ़ सेल्स में रॉ मटेरियल यानी कच्चे माल की अमाउंट शामिल होती है और लेबर की अमाउंट शामिल होती है। इसके अलावा बाकी के खर्चे कॉस्ट ऑफ़ सेल्स के अंडर नहीं लिखे जाते। अच्छा एनुअल रिपोर्ट में जितनी भी अमाउंट इस तरह ब्रैकेट में लिखी जाती हैं, उनको माइनस करना होता है यानी सबट्रैक्ट करना होता है क्योंकि यह अमाउंट ज्यादातर कंपनी का एक्सपेंस होता है या लॉस होता है। इसी वजह से कॉस्ट ऑफ़ सेल्स को भी ब्रैकेट में लिखा गया है क्योंकि यह कंपनी का एक्सपेंस है। अब रेवेन्यू में से कॉस्ट ऑफ़ सेल्स को माइनस करें तो हमारे पास 16 मिलियन का ग्रॉस प्रॉफिट आ गया है यानी यह टोटल प्रॉफिट है जो प्रोडक्ट को सेल करके आया है। अभी इसमें से किसी भी किस्म के एक्सपेंसेस डिडक्ट नहीं हुए। इसके बाद इनकम स्टेटमेंट में एक्सपेंसेस यानी खर्चे आना शुरू हो जाते हैं जिसको ग्रॉस प्रॉफिट में से माइनस करना होता है। जैसे यहां भी लिखा हुआ है डिस्ट्रीब्यूशन एक्सपेंसेस, एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंसेस और अदर ऑपरेटिंग एक्सपेंसेस। इन तीनों हेडिंग में जो कंपनी के पिछले 1 साल में हुए हैं यानी जो कंपनी के डे टू डे बिज़नेस ऑपरेशन को चलाने में काम आते हैं, वह एक्सपेंसेस में शामिल हैं। जो कंपनी गाड़ियां डिलीवर करती है, उसके एक्सपेंसेस कंपनी के होते हैं, वह तमाम इसमें शामिल हैं, जो कि 3.1 मिलियन हैं। तब आपके पास एक्चुअल फिगर शो होंगे। तो 16 मिलियन ग्रॉस प्रॉफिट में से जब यह 3.1 मिलियन के एक्सपेंसेस माइनस हुए तो पीछे 13 मिलियन रुपीज़। अब इसमें से तकरीबन 7.30 लाख कंपनी ने वेलफेयर फंड में दिए तो पीछे बचे 12.7 मिलियन रुपीज़। अब यहां लिखा हुआ है अदर इनकम। अदर इनकम बेसिकली वो इनकम होती है जो कंपनी के नॉर्मल ऑपरेशंस के अलावा कहीं और से जेनरेट हुई होती है। अब जैसे हमने बैलेंस शीट में देखा था कि कंपनी ने काफी डिफरेंट जगह पर इन्वेस्टमेंट की हुई है, तो यह इनकम मोस्ट प्रोबेबली वहीं से जेनरेट हुई होगी। अगर हम नोट 35 पर जाकर इसकी डिटेल्स भी चेक करें, तो यहां लिखा हुआ है कि कंपनी की कुछ इनकम बैंक डिपॉजिट से आई है, कुछ मार्केट ट्रेजरी बिल सेल करके, कुछ इनकम म्युचुअल फंड से आई है। कुछ अनरियलाइज़्ड गेन होता है जो अभी सिर्फ ऑन पेपर एक्ज़िस्ट करता है। मसलन अगर आप कोई 20 लाख का प्लॉट खरीदते हैं और कुछ अर्से बाद उसकी मार्केट वैल्यू 30 लाख रुपए हो जाती है, तो यह जो 10 लाख रुपए मार्केट वैल्यू बढ़ी है, इसको हम कहेंगे यह आपका अनरियलाइज़्ड गेन है क्योंकि यह जो प्राइस बढ़ी है, वह तक सिर्फ ऑन पेपर बढ़ी है यानी अभी तक आपको वह 10 लाख रुपए प्रॉफिट की सूरत में नहीं मिले हैं। लेकिन अगर आप वह प्लॉट 30 लाख रुपए का सक्सेसफुली बेच देते हैं, तो यह जो आपको 10 लाख का प्रॉफिट हो गया है, इसको हम गेन कहेंगे या रियलाइज़्ड गेन कहेंगे। इसलिए किसी भी एसेट का प्रॉफिट जब तक सिर्फ ऑन पेपर एक्ज़िस्ट करता है, तो उसको अनरियलाइज़्ड गेन कहते हैं, लेकिन जब उसे एसेट को सेल करके प्रॉफिट हो जाए तो फिर उसको गेन या रियलाइज़्ड गेन कहा जाता है। इसके बाद से आए हैं कुछ पैसे म्युचुअल फंड के यूनिट सेल करके। जैसे कंपनी के स्टॉक्स होते हैं, वैसे म्युचुअल फंड के यूनिट्स होते हैं। मैंने एक छोटी सी सीरीज़ बनाई है म्युचुअल फंड पर जिसको आप टॉप राइट हैंड कॉर्नर पर क्लिक करके देख सकते हैं। बाकी आप वीडियो पॉज़ करके कंपनी की इनकम देख सकते हैं। तो वापस इनकम स्टेटमेंट पर आएँ तो कंपनी को अदर इनकम की मदद में 5.5 मिलियन रुपीज़ का फायदा हुआ है और कंपनी का प्रॉफिट 12.7 मिलियन से जम्प करके 18.3 मिलियन रुपीज़ हो गया है। इसके बाद फिर से कुछ एक्सपेंसेस कंपनी शो किए हुए हैं। फ़ाइनेंस कॉस्ट। इसके बाद में इसकी डिटेल नोट 36 पे देखें तो यहां लिखा हुआ है इंटरेस्ट ऑन लॉन्ग टर्म लोन फ़ैसिलिटी यानी जो कंपनी ने लॉन्ग टर्म लोन लिया हुआ है, उस पर 1.9 मिलियन कंपनी ने इंटरेस्ट पे किया है। ₹1 लाख कंपनी ने बैंक चार्जेज़ की मद में पे किए हैं। जैसे हम सबको पता है एक साल बाद बैंक कुछ अपने सर्विस चार्जेज़ काटता है और जब आप पैसे ट्रांसफ़र भी करते हैं तो उस पर भी बैंक कुछ काटता है। तो इस तरह के बैंकिंग चार्जेज़ वगैरा पर कंपनी ने ₹1 लाख पूरे साल का ओवरव्यू देती है कि कंपनी ने सालभर में टोटल कितने पैसे कमाए, कहाँ से कमाए, कहाँ खर्च किए और एंड पर कंपनी को कितने पैसे का प्रॉफिट या लॉस हुआ है। आई होप आपको यह सारे कॉन्सेप्ट क्लियर हो गए होंगे और आपको आज की वीडियो से काफी कुछ सीखने को मिला होगा। अगर आपके कोई सवाल हैं तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं और अगर आपको यह वीडियो पसंद आई है तो चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को लास्ट में प्रेस कीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफिकेशन आपको मिल सके। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की आखिरी और सबसे इम्पॉर्टेन्ट स्टेटमेंट यानी कैश फ़्लो स्टेटमेंट के बारे में बताऊंगा विद एग्जांपल। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, कैश यानी पैसा और फ़्लो यानी बहाव, यानी कैश फ़्लो स्टेटमेंट वो स्टेटमेंट होती है जो कंपनी के पैसे का बहाव बताती है। अब किसी भी चीज का बहाव एक अंदर की तरफ़ होता है और एक बाहर की तरफ़। सिमिलरली कैश फ़्लो स्टेटमेंट भी कंपनी के पैसे का सारा बहाव बताती है कि कितना पैसा कंपनी के अंदर आया, जिसको कैश इनफ़्लो कहते हैं और कितना पैसा कंपनी से बाहर गया, जिसको कैश आउटफ़्लो कहते हैं। यानी कैश फ़्लो स्टेटमेंट वो स्टेटमेंट होती है जो बताती है कि कितना पैसा कंपनी ने कमाया, कितना खर्च किया और एंड पर कंपनी के पास कितना पैसा बचा। अब आप सोच रहे होंगे यह सारी चीज तो इनकम स्टेटमेंट भी बताती है, तो इस स्टेटमेंट की क्या ज़रूरत है? आप बिल्कुल सही हैं, प्रॉफ़िट एंड लॉस इनकम स्टेटमेंट भी बताती है, लेकिन इनकम स्टेटमेंट बेसिकली एक्रूअल मेथड में बनाई जाती है और कैश फ़्लो स्टेटमेंट कैश मेथड पे। अब कैश मेथड क्या है और एक्रूअल मेथड क्या है? अगर आपको याद हो, मैंने क्लास 24 में आपको एक्रूड रिटर्न के बारे में बताया था। एक्रूड रिटर्न उसे प्रॉफिट को कहते हैं जो कंपनी का होता तो है, लेकिन अभी तक उसको रिसीव नहीं हुआ होता। मिसाल के तौर पे अगर कंपनी ने 1 करोड़ कहीं पे इन्वेस्ट किया है और 6 महीने बाद उसको एक करोड़ 10 लाख रुपए वापस मिलने हैं, तो ये 10 लाख रुपए एक्रूड रिटर्न के ले जाएंगे क्योंकि वो 10 लाख रुपए हैं कंपनी के ही, लेकिन अभी तक उसे रिसीव नहीं हुए। इसी तरह कोई भी पैसे जो कंपनी के ही हों, लेकिन उसको अभी तक रिसीव ना हुए हों, वो एक्रूड रिटर्न कहलाते हैं। तो एक्रूअल मेथड वो मेथड होता है जिसमें प्रॉफ़िट जो लॉस तभी काउंट कर लिया जाता है जबकि ट्रांज़ैक्शन इनकर्ड होती है। यानी अगर कंपनी ने उधार पर कोई सामान बेचा है, तो अगर अभी कंपनी को पैसे रिसीव नहीं भी हुए, फिर भी इनकम स्टेटमेंट में कंपनी में प्रॉफ़िट रिकॉर्ड कर लेगी। और कैश फ़्लो स्टेटमेंट बनती है कैश मेथड पे यानी स्टेटमेंट में कोई लॉस या प्रॉफ़िट तब रिकॉर्ड किया जाता है जब वाकई कैश की ट्रांज़ैक्शन हो जाती है। मिसाल के तौर पर एक सीमेंट कंपनी है जिसने टोटल ₹1 करोड़ की सेल्स की है, लेकिन कंपनी ने 60 लाख की सेल कैश में की है और 40 लाख की उधार पे। तो इनकम स्टेटमेंट प्रॉफ़िट पूरा ₹1 करोड़ ही शो होगा, लेकिन कैश फ़्लो स्टेटमेंट में प्रॉफ़िट सिर्फ ₹60 लाख शो होगा। तो इस एक्रूअल मेथड और कैश मेथड की डिफरेंस की वजह से अक्सर कंपनी का इनकम स्टेटमेंट का प्रॉफ़िट कैश फ़्लो स्टेटमेंट के प्रॉफ़िट से थोड़ा ऊपर नीचे हो जाता है। इसके अलावा भी दोनों स्टेटमेंट में कुछ डिफ़रेंस होते हैं जो मैं आपको वीडियो में आगे चलकर बताऊंगा। पहले मैं आपको कैश फ़्लो स्टेटमेंट की बेसिक समझाऊँगा, फिर प्रैक्टिकल कंपनी की कैश फ़्लो स्टेटमेंट पढ़कर बताऊंगा। कैश फ़्लो फ्रॉम ऑपरेटिंग एक्टिविटीज़ इंडिकेट्स द अमाउंट ऑफ़ मनी अ कंपनी ब्रिंग्स इन फ्रॉम इट्स ओंगोइंग रेगुलर बिज़नेस एक्टिविटीज़ सच ऐज़ मैन्युफ़ैक्चरिंग एंड सेलिंग गुड्स और प्रोविजनिंग ऑफ़ सर्विस टू इट्स कस्टमर। यानी कैश फ़्लो फ्रॉम ऑपरेटिंग एक्टिविटीज़ में तमाम वो अमाउंट लिखी जाती हैं जो कंपनी के मेन बिज़नेस से जुड़ी होती हैं यानी जो पैसा कंपनी ने अपने मेन बिज़नेस से कमाया होता है और जो पैसा कंपनी ने अपने मेन बिज़नेस को चलाने के लिए खर्च किया होता है, सिर्फ़ वो कैश फ़्लो फ्रॉम ऑपरेटिंग एक्टिविटीज़ में लिखा जाता है। इसके अलावा कहीं और से जेनरेट हुआ प्रॉफ़िट या कहीं और खर्च किया गया पैसा इस हेडिंग के अंडर नहीं लिखा जाता। जैसे इसे पिछली वीडियो में हमने देखा था कि कंपनी काफी डिफ़रेंट जगह पर इन्वेस्टमेंट करती हैं जैसे म्युचुअल फंड्स वगैरा में, तो वहाँ से जो प्रॉफ़िट जेनरेट होता है वह कैश फ़्लो फ्रॉम ऑपरेटिंग एक्टिविटीज़ में नहीं लिखा जाता। फिर एंड में कैश फ़्लो फ्रॉम ऑपरेटिंग एक्टिविटीज़ की सारी अमाउंट को आपस में ऐड करके बताया जाता है कि ऑपरेटिंग एक्टिविटी से कंपनी ने टोटल कितना जेनरेट किया या आउटफ़्लो किया। यह मैं आपको वीडियो में आगे चल के एग्जांपल के ज़रिए समझाऊँगा जिससे कि आपका कॉन्सेप्ट बिल्कुल क्लियर हो जाएगा। इसके बाद आता है कैश फ़्लो फ्रॉम इन्वेस्टिंग एक्टिविटी। कैश फ़्लो फ्रॉम इन्वेस्टिंग एक्टिविटी, यह नाम सुनके ही अंदाजा हो जाता है कि इस सेक्शन में वो वाली अमाउंट लिखी जाती है जो कंपनी की इन्वेस्टमेंट वगैरा से रिलेटेड होती है। अब इन्वेस्टमेंट ज़रूरी नहीं है कि म्युचुअल फंड वगैरा में ही हो। कंपनी अगर अपने बिज़नेस से पैसे रीइन्वेस्ट करती है, तो वह इन्वेस्टमेंट यहीं लिखी जाएगी। इसके अलावा अगर कंपनी म्युचुअल फंड, बॉन्ड या सर्टिफ़िकेट वगैरा में इन्वेस्ट करती है, तो वह अमाउंट भी यहीं लिखी जाएगी। और कंपनी ने जो पुराने इन्वेस्टमेंट्स बेची होती हैं जैसे कि म्युचुअल फंड और बॉन्ड वगैरा में तो वहाँ से जो कंपनी को प्रॉफ़िट जेनरेट होता है, उसकी डिटेल भी कंपनी कैश फ़्लो फ्रॉम इन्वेस्टिंग एक्टिविटीज़ में ही

लिखा हुआ है कोश जेनरेटेड फ्रॉम ऑपरेशंस इसका मतलब है जो टोटल अमाउंट कंपनी के में बिजनेस जेनरेट हुई है वह इतनी है यानी 16 मिलियन रुपीज। अब क्योंकि यह फिगर पॉजिटिव में शो हो रहा है, तो इसका मतलब है की कंपनी ने 16 मिलियन रुपीस का कैश इनफ्लो जेनरेट किया है यानी अपने बिजनेस से कंपनी ने प्रॉफिट बनाया। कंपनी से डेढ़ लाख रुपए बाहर गए हैं। जितनी भी अमाउंट फ्लो होता है, यानी इस अमाउंट को माइंस करना होता है। सारी इनफॉरमेशन एक्युरेटली नहीं बता सकता और वह इसलिए नहीं बता सकता क्योंकि हर कंपनी की कैश फ्लो स्टेटमेंट में जो डिटेल्स मेंशन होती हैं वो थोड़ी बहुत मुश्किल होती है। जैसे आपके सामने यह तीन मुस्लिम कंपनी की ऑपरेटिंग एक्टिविटीज की डिटेल शो हो रही है और इन तीनों का हमने इसकी डिटेल एक दूसरे से कुछ मुक्त है। मैं आपको बस कैशलेस ट्रीटमेंट का एक में ओवरव्यू दे देता हूं जिससे की आपके लिए बाकी कंपनी की कैरक्टर स्टेटमेंट को पढ़ना बहुत आसान हो जाएगा।

कैश फ्लो स्टेटमेंट में जो सबसे इंपॉर्टेंट चीज देखनी होती है वो इन तीनों सेक्शन का सेपरेट नेट कैश इनफ्लो या आउट फ्लो देखना होता है और स्टेटमेंट के एंड पर ओवरऑल कैशलेस स्टेटमेंट का नेट कैश इनफ्लो या आउट फ्लो देखना होता है। एक्टिविटीज परफॉर्म करने के बाद कंपनी रेट किया है या आउट फ्लो यानी साल खत्म होने के बाद कंपनी बेफिक्रे हमें बताता है की कंपनी ने अपने बिजनेस से एंड ऑफ डी ईयर कैश इनफ्लो जेनरेट किया है या आउट फ्लो। जैसे होंडा की कैटलॉग स्टेटमेंट का कैश फ्लो फ्रॉम ऑपरेटिंग एक्टिविटीज का सेक्शन पॉजिटिव 12 मिलियन का फिगर शो कर रहा है। इसका मतलब है की होंडा कंपनी ने अपने बिजनेस से 12 मिलियन रुपीज का कैश इनफ्लो जेनरेट किया है यानी कंपनी के बिजनेस से 12 मिलियन रुपीज कंपनी के अंदर आए हैं। वहीं ये एक और कंपनी की कैश फ्लो स्टेटमेंट है जहां इस कंपनी ने ऑपरेटिंग एक्टिविटी से 81 मिलियन रुपीज का कैश आउटफ्लो जेनरेट किया है। कंपनी के अपने बैंक अकाउंट से 81 मिलियन रुपीज लग गए हैं। है तो कैश फ्लो फ्रॉम ऑपरेटिंग एक्टिविटीज में हर चीज को पढ़ने से ज्यादा जरूरी एंड वाली अमाउंट को देखना होता है की ओवरऑल कंपनी ने नेट कैश इनफ्लो जेनरेट किया है या आउट फ्लो।

इसी तरह कैश फ्लो स्टेटमेंट नेक्स्ट सेक्शन होता है कैश लो फ्रॉम इन्वेस्टिंग एक्टिविटी का और इस सेक्शन में कंपनी अपनी इन्वेस्टमेंट की सारी डिटेल बताती है की वो पैसा कहां इन्वेस्ट कर रही है। बेशक वो कंपनी अपने ही बिजनेस में वापस पैसा रे इन्वेस्ट कर रही हो या कहीं और उसकी सारी डिटेल हमें इस सेक्शन में मिलती है। जैसे अगर होंडा की कैश फ्लो स्टेटमेंट का कैश फ्लो फ्रॉम इन्वेस्टिंग एक्टिविटीज का सेक्शन देखें तो यहां सबसे पहले लिखा हुआ है परचेज ऑफ प्रॉपर्टी प्लांट एंड इक्विपमेंट। प्रॉपर्टी प्लांट एंड इक्विपमेंट को अक्सर कंपनी फिक्स्ड कैपिटल एक्सपेंडिचर भी कहती है और इसका मतलब है की यह पैसे यानी 3.8 मिलियन रुपीज वो पैसे हैं जो कंपनी ने अपने ही बिजनेस में वापस रे इन्वेस्ट की है। इसलिए यह फिगर नेगेटिव में शो हो रहा है। पर्चा यह मिसाल के तौर पर अगर आप अपने बिजनेस के लिए ₹1 लाख का लैपटॉप खरीदते हैं तो लैपटॉप बेशक आपका एसिड है लेकिन उसको खरीदने के लिए ₹1 लाख आपकी जेब से ही बाहर गए हैं तो वो ₹1 लाख आपका कैश आउटफ्लो कहलाएगा। इसलिए जितने भी इन्वेस्टमेंट कंपनी वापस अपने ही बिजनेस में करती है या म्युचुअल फंड वगैरा में करती है वो सारे फिगर नेगेटिव में शो होते हैं क्योंकि वो सारे पैसे कंपनी से बाहर जा रहे होते हैं यानी कंपनी का कैश आउटफ्लो हो रहा होता है। और पास में जो कंपनी ने इन्वेस्टमेंट की होती है उसके नतीजे में जो कंपनी को प्रॉफिट पहुंचता है उसकी डिटेल भी इसी सेक्शन में मेंशन होती है। जैसे यहां लिखा हुआ है प्रोसीड फ्रॉम डिस्पोजल ऑफ प्रॉपर्टी प्लांट एंड इक्विपमेंट और प्रोसीड फ्रॉम डिस्पोजल ऑफ शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट। इसका मतलब है जैसे सबसे ऊपर कंपनी 744 का कैश इनफ्लो विज़न रेट किया तो जब आप इन सारे फिगर को 1000 से मल्टीप्लाई करेंगे तब आपके पास रियल अमाउंट शो होगी। इसी तरह नीचे लिखा हुआ है डिविडेंड रिसीवड और इंटरेस्ट रिसीवड और जब इस सेक्शन की सारी अमाउंट को आपस में ऐड किया तो कलेक्टिवली हमारे पास 3 मिलियन रुपीस का नेट कैश आउटफ्लो आ रहा है फ्रॉम इन्वेस्टिंग एक्टिविटी।

और लास्ट में है कैटलॉग फ्रॉम फाइनेंसिंग एक्टिविटी। जैसे मैंने पहले भी बताया इस सेक्शन में कंपनी की फाइनेंस से रिलेटेड इनफॉरमेशन होती है जैसे की कंपनी ने अपने बिजनेस को चलाने के लिए जो कर्जा लिया है और जो पुराने कर्जे उसने चुकाए हैं उसकी सारी इनफॉरमेशन यही मेंशन होती है। उसकी इनफॉरमेशन भी यही मेंशन होती है। जैसे यहां सबसे ऊपर लिखा हुआ है शॉर्ट टर्म लोन फ्रॉम रिलेटेड पार्टी के अंदर आए हैं इसलिए इसको कैश इनफ्लो कहेंगे और इसीलिए यह अमाउंट पॉजिटिव में शो हो रही है और इसके पीछे शॉर्ट टर्म लिखा हुआ है इसका मतलब है की कंपनी ने ये कर्जा एक साल के अंदर अंदर ही वापस करना है। और इस हेडिंग के आगे देखें तो 2021 के अंडर कुछ भी नहीं लिखा हुआ बल्कि 2020 की कॉलम के 2.1 मिलियन रुपीस की अमाउंट मेंशन है। इसका मतलब है की कंपनी ने शॉर्ट टर्म लोन 2020 में एक्वायर किया था। उसके बाद लिखा हुआ है शॉर्ट टर्म लोन फ्रॉम रिलेटेड पार्टी रिपेयर्ड यानी की वो अमाउंट है जो कंपनी ने कर्जे की मदद से रेप की है यानी कर्जा उतारा है इसलिए 2.3 मिलियन का फिगर नेगेटिव में शो हो रहा है क्योंकि यह पैसा कंपनी से बाहर गया है यानी ये कंपनी का कैश आउट फ्लो है। फिर लिखा हुआ है लॉन्ग टर्म फाइनेंस कर्जा ही लिया है बस लॉन्ग टर्म फाइनेंस और शॉर्ट टर्म लोन में यह फर्क होता है की शॉर्ट टर्म लोन कंपनी ने एक साल के अंदर-अंदर उतारना होता है जबकि लॉन्ग टर्म लोन उतारने के लिए कंपनी को एक साल से ज्यादा का वक्त दिया जाता है। नेक्स्ट है लॉन्ग टर्म फाइनेंस रिपेयर्ड ये भी वो लोन है जो कंपनी ने रिपे किया है यानी ये भी कंपनी का कैश आउट फ्लो है इसलिए ये फिगर भी नेगेटिव में शो हो रहा है क्योंकि यह पैसा कंपनी से बाहर गया है। और एंड में है डिविडेंड पे यानी की वो पैसे हैं जो कंपनी ने डिविडेंड की सूरत में अपने शेरहोल्डर्स को दिए हैं। यह फिगर भी नेगेटिव में शो हो रहा है क्योंकि ये भी कंपनी का कैश आउट फ्लो है। और एंड में जब कैटलॉग फ्रॉम फाइनेंसिंग एक्टिविटीज के सारे अमाउंट को आपस में ऐड किया तो कंपनी ने 500000 38000 का नेट कैश इनफ्लो जेनरेट किया है।

अब जैसे मैंने पहले भी बताया कैश फ्लो स्टेटमेंट के आखिर में तीन अमाउंट मेंशन होती है नेट इंक्रीज और डिक्रीज इन क्रिएशन कैश एंड कैश इक्विवेलेंट्स अत डी बिगिनिंग ऑफ डी ईयर और कैश एंड कैश यानी की साल शुरू होने से पहले कंपनी के पास कितना पैसा था, साल में कंपनी के पास कितना पैसा आया या गया और साल खत्म होने के बाद कंपनी के पास कितना पैसा बचा। तो होंडा के सुनहरे में आते डी एंड ऑफ डी ईयर 9 मिलियन रुपीज का नेट कैश इनफ्लो जेनरेट हुआ है। तो इस नान मिलियन को जब नेट कैश आते डी बिगिनिंग ऑफ डी ईयर में ऐड किया तो साल के एंड पर 14.9 मिलियन की अमाउंट बची जो की कंपनी का कैश एंड कैश स्टेटमेंट की डिटेल। अगर आपको आज की वीडियो पसंद आई है तो इसे अपने दोस्तों और फैमिली मेंबर के साथ जरूर शेयर कीजिएगा और अगर आपको कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 28 क्लास में खुशब दोस्तों। आज से मैं आपको फाइनेंशियल रेश्योस के बारे में बताना शुरू करूंगा। फाइनेंशियल रेश्योस बेसिकली वह मैट्रिक होता है जिसकी मदद से इन्वेस्टर्स यह पता लगाते हैं की कंपनी कैसा परफॉर्म कर रही है। इन रेश्योस को हम कंपनी के फाइनेंशियल स्टेटमेंट यानी बैलेंस शीट, इनकम स्टेटमेंट और कैशलेस स्टेटमेंट की मदद से फाइंड आउट करते हैं। फाइनेंशियल रेश्योस के जरिए किसी भी कंपनी की बेसिकली तीन टाइप के एनालिसिस करते हैं: एक लिक्विडिटी एनालिसिस, एक सॉल्वेंसी एनालिसिस और एक एफिशिएंसी एनालिसिस। आज की वीडियो में मैं आपको लिक्विडिटी एनालिसिस के बारे में बताऊंगा। तो वीडियो को स्टार्ट करने से पहले चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिये।

तो लिक्विडिटी एनालिसिस किसे कहते हैं? लिक्विडिटी एनालिसिस में बेसिकली इन्वेस्टर्स यह देखने की कोशिश करते हैं की कंपनी अपनी करंट लायबिलिटी को कितनी जल्दी और कितनी आसानी से पेबैक कर सकती है। लिक्विडिटी एनालिसिस हम बैलेंस शीट की मदद से करते हैं। लिक्विडिटी एनालिसिस में सिंपली करंट असेट्स को करंट लायबिलिटी से डिवाइड किया जाता है और पता लगाया जाता है की कंपनी कितनी आसानी से अपनी करंट लायबिलिटी को पे ऑफ कर सकती है। क्योंकि करंट लायबिलिटी वह वाली लायबिलिटी होती हैं जिनको एक साल के अंदर-अंदर ही पेबैक करना होता है और करंट असेट्स वह एसिड होते हैं जो एक साल के अंदर-अंदर ही कैश में कन्वर्ट किए जा सकते हैं। इसलिए करंट असेट्स को करंट लायबिलिटी से डिवाइड करना। मैक्स टोटल सेल्स में इन्वेस्टर ज्यादातर का इस्तेमाल टोटल करंट लायबिलिटी से डिवाइड किया जाता है और आपके पास करंट रेशों आ जाती है। फॉर एग्जांपल यह कंपनी है और इस कंपनी के टोटल करंट एसेट की मलिक है 1 करोड़। कंपनी पर टोटल करंट लायबिलिटी हैं 80 लाख की। तो जब हम एक करोड़ को 80 लाख से डिवाइड करेंगे यानी सिम्पलीफाई करेंगे तो हमारे पास जवाब आएगा 1.25। अब ये 1.25 जाएगी कंपनी की करंट रेशों। यूजुअली करंट रेश्यो जितनी ज्यादा होती है कंपनी को उतना अच्छा कंसीडर किया जाता है। लेकिन एक इन्वेस्टर के पास किसी भी कंपनी की सही पिक्चर तब आती है जब उसे इंडस्ट्री में मौजूद सारी कंपनी को एनालाइज किया जाए जिससे पता लग सके की इंडस्ट्रीज स्टैंडर्ड क्या चल रहा है और इस स्पेसिफिक कंपनी की क्या सिचुएशन है। याद रहे कोई भी रेश्यो इंडस्ट्रीज वेरी करती है। मिसाल के तौर पर किसी एक इंडस्ट्री के लिए 1.25 की करंट रेश्यो काफी अच्छी हो सकती है और किसी दूसरे इंडस्ट्री के लिए काफी बुरी। इसलिए इंडस्ट्री में मौजूद सारी कंपनी को एनालाइज करना चाहिए और फिर किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए की कंपनी किस पोजीशन पर स्टैंड कर रही है।

गैस अगर आपको वीडियो पसंद आ रही है तो आगे बढ़ाने से पहले प्लीज वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा। कंपनी की प्रोडक्ट होती हैं है उनको कंपनी इतनी जल्दी कैश में कन्वर्ट नहीं कर सकती क्योंकि पाउडर को सेल होकर कैश में कन्वर्ट होने में टाइम लगता है। तो कोई रेशों कैलकुलेट करने के लिए करंट ऐसे में ऐसे इन्वेंटरी को माइंस करके रिमेनिंग एसिड को करंट लायबिलिटी से डिवाइड किया जाता है ताकि पता लगे की अगर कंपनी को जरा ज्यादा जल्दी अपनी करंट लायबिलिटी उतारनी है तो कंपनी की कैसी पोजीशन है। मिसाल के तौर पे अगर कंपनी एक ही क्विक रेशों कैलकुलेट करनी है तो इस 1 करोड़ के टोटल एसेट में से हम 30 लाख की इन्वेंटरी को माइंस कर देंगे और 70 लाख की जो रिमेनिंग एसेट्स बचे हैं उनको ₹80 लाख की टोटल लायबिलिटी से डिवाइड कर देंगे। अब जब ऐसा करेंगे तो हमारे पास आंसर आएगा 0.875। तो ये 0.875 कंपनी की क्विक रेशों है। तो हम कैश और मार्केट टेबल सिक्योरिटी को प्लस करेंगे यानी इस 30 लाख और 20 लाख को प्लस करेंगे और 80 लाख से डिवाइड कर देंगे। जब ऐसा करेंगे तो हमारे पास आंसर आएगा 0.625। तो यह 0.625 कंपनी की कैश रेशों जाएगी। कैश रेशों बेसिकली वर्स्ट के सिनेरियो को प्रिडिक्ट करने के लिए निकाली जाती है की अगर एक तरह से कंपनी पे क़यामत आ जाए, मुस्लिम सारे क्रेडिटर्स और बैंक्स वगैरा बोलेंगे हमें आज ही सारा कर्जा वापस करें तो इस तरह की पैनिक सिचुएशन में कंपनी कहां स्टैंड कर रही है। कैश रिज़र्व इन्वेस्टर से ज्यादा क्रेडिटर्स के लिए जरूरी होती है जिन्होंने कंपनी को कर्जा वगैरा दे रखा होता है। तो यह थी सारे लिक्विडिटी रेशों की डिटेल। अगर आपको आज की वीडियो पसंद आई है तो वीडियो को लाइक करना और अपने दोस्तों और फैमिली मेंबर्स के साथ शेयर करना मत भूलिएगा और अगर आपको कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं, या मुझे इंस्टाग्राम या ट्विटर पर मैसेज करके पूछ सकते हैं। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कितनी लाइवस्टा है यानी कंपनी पर कितना कर्जा है। अगर कंपनी कर्जा लेती जा रही है और उसको उतारने की कैपेसिटी कंपनी में नहीं है तो इसका मतलब है कंपनी की फाइनेंशियल पोजीशन खराब होती जा रही है और जिसके नतीजे में कंपनी की शेयर प्राइस गिरना शुरू हो जाएगी और आपकी इन्वेस्टमेंट डूबना शुरू हो जाएगी। तो डेट टू इक्विटी रेश्यो हमें काफी अच्छी पिक्चर दे देती है कंपनी के कर्जे के बारे में और किसी भी कंपनी के सॉल्वेंसी एनालिसिस करते वक्त काम आती है। दोस्तों, जैसे लिक्विडिटी एनालिसिस में हम देखते हैं की कंपनी अपनी शॉर्ट टर्म लायबिलिटी को कितनी आसानी से पे ऑफ कर सकती है, वैसे ही सॉल्वेंसी एनालिसिस में देखते हैं की कंपनी अपनी शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों लायबिलिटी को कितनी आसानी से पे ऑफ कर सकती है, यानी कंपनी ओवरऑल किस पोजीशन पर स्टैंड कर रही है। सॉल्वेंसी एनालिसिस में डेट टू इक्विटी के अलावा भी कुछ रेश्योस होती हैं जो मैं आपको आगे आने वाली वीडियो में समझाऊंगा। तो वीडियो को स्टार्ट करने से पहले आपसे एक रिक्वेस्ट है की अगर अभी तक आपने चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया तो चैनल को अभी सब्सक्राइब कर लें ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो आप तक पहुंचती रहे। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं।

तो गैस डेट टू इक्विटी रेश्यो हम यह जानने के लिए निकालते हैं की कंपनी अपनी फाइनेंशियल ऑब्लिगेशन को कितनी आसानी से पूरा कर सकती है। टोटल लायबिलिटी डिवाइडेड बाय इक्विटी। पहले समझते हैं इक्विटी किसको कहते हैं। इक्विटी बेसिकली वह पैसा होता है जो शेयर होल्डर से बिलॉन्ग करता है। यानी फर्ज करें एक करोड़ 70 लाख टोटल एसेट में से जब कंपनी एक करोड़ रुपए की टोटल लायबिलिटी उतारेगी तो जो पीछे 70 लाख रुपए बचेंगे वो इक्विटी कहलाएगी। यानी की 70 लाख रुपए वो पैसे हैं जो कंपनी के शेयर होल्डर से बिलॉन्ग करते हैं। अब अगर इसी कंपनी की हमने डेट टू इक्विटी रेश्यो निकालनी है तो हम टोटल डेट को यानी एक करोड़ को डिवाइड कर देंगे टोटल इक्विटी से यानी ₹70 लाख से तो हमारे पास आंसर निकल के आएगा 1.42। अब ये 1.42 कंपनी की डेट टू इक्विटी रेश्यो जाएगी। डेट टू इक्विटी रेश्यो जितनी कम होती है कंपनी को उतना अच्छा कंसीडर किया जाता है। मिसाल के तौर पर अगर इस कंपनी की इक्विटी भी एक करोड़ होती और लायबिलिटी भी एक करोड़ होती तो रेश्यो निकल के आती वन और अगर कंपनी के टोटल लायबिलिटी एक करोड़ होती और इक्विटी दो करोड़ होती तो रेश्यो निकल के आती 0.5। इसीलिए किसी भी कंपनी की डेट टू इक्विटी रेश्यो कम कर रही होती है उसे ट्रैक्टर मौजूद बाकी कंपनी को भी एनालाइज करना चाहिए ताकि पता चले ओवरऑल कोई भी रेश्यो कितनी चल रही है इंडस्ट्री में यानी इंडस्ट्रीज स्टैंडर्ड क्या है और फिर किसी नतीजे पे पहुंचना चाहिए। मसलन ये 1.42 की रेश्यो किसी इंडस्ट्री के लिए काफी अच्छी हो सकती है और किसी इंडस्ट्री के लिए काफी बुरी। तो ये थी सारी डेट टू इक्विटी रेश्यो की डिटेल। अगर आपको आज की वीडियो पसंद आई है तो वीडियो को लाइक करना और अपने दोस्तों और फैमिली मेंबर्स के साथ शेयर करना मत भूलिएगा और अगर आपको कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

वीडियो स्टार्ट करने से पहले अगर आप चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो आप तक पहुंचती रहे। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, डेट टू एसेट रेश्यो भी डेट टू इक्विटी रेश्यो की तरह एक सॉल्वेंसी रेश्यो ही है। अगर आप नहीं जानते रेश्यो क्या होती है तो मेरी इससे पिछली वीडियो देख लें जिसमें मैंने ये सब चीज डिटेल से बताई है जिसका लिंक टॉप पर है। बेसिकली कंपनी की फाइनेंशियल हेल्थ जानने के लिए निकाली जाती है। इस रेश्यो से हमें यह पता चलता है की कंपनी की टोटल एसेट्स कितने परसेंट लोन से बने हुए हैं। नॉर्मल बात है, जैसे बैंकिंग वगैरा, और वह क्यों यह आपको आगे की वीडियो में बताऊंगा। तो वीडियो में आगे बढ़ाने से पहले प्लीज वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा। तो डेट टू एसेट हम टोटल डेट को टोटल एसेट से डिवाइड करके फाइंड आउट करते हैं। मिसाल के तौर पर एक कंपनी है जिस पर टोटल डेट यानी टोटल कर्जा 10 करोड़ रुपए का है और कंपनी के टोटल एसेट 40 करोड़ के हैं। तो जब हम इस इक्वेशन को सॉल्व करेंगे तो आंसर आएगा 0.25 जो की एक बहुत अच्छी रेशों है। इसका मतलब है की कंपनी के सिर्फ 25% एसेट्स से लोन फंडेड है और बाकी के 75% एसेट्स के मुकाबले में कंपनी पे कोई कर्जा नहीं है। इसका मतलब है की अगर कंपनी को अपनी डेट फौरन उतारनी भी पड़े तो कंपनी अपने 25% एसेट्स सेल करेगी और आसानी से सारी डेट उतार देगी और बाकी के 75% एसेट्स से बिजनेस को आसानी से चला लेगी। लेकिन फर्ज करें कंपनी के टोटल एसेट्स 10 करोड़ के हैं और उसके एसेट्स सिर्फ 5 करोड़ के हैं, इस इक्वेशन को सॉल्व करके आंसर आएगा टू यानी कंपनी 200% डेट फंडेड है यानी कंपनी जितने भी एसेट्स सेल कर दे फिर भी पीछे पांच करोड़ रुपए का कर्जा रह जाएगा और कंपनी को बैंकरूप्सी के लिए फाइल करना पड़ेगा। ऐसी कंपनी से तो बिल्कुल ही दूर रहना चाहिए। हमेशा कोशिश करें, इस का ख्याल रखना चाहिए की अगर कंपनी कर्जा ले रही है तो उसे उतना ही ज्यादा प्रॉफिट जेनरेट कर रही है या नहीं। तो यह थी सारे डेट टू एसेट रेशों की डिटेल। अगर आपको आज की वीडियो पसंद आई है तो वीडियो को लाइक करना और अपने दोस्तों और फैमिली मेंबर्स के साथ शेयर करना मत भूलिएगा और अगर आपको कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में मुझसे पूछ सकते हैं। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 31 क्लास में खुशामदी दोस्तों। आज मैं आपको एक बहुत इंपॉर्टेंट रेश्यो के बारे में बताने वाला हूं जिसे प्राइस इंडिकेटर कहते हैं। इस रेश्यो से इन्वेस्टर को काफी हद तक यह अंदाजा हो जाता है की कंपनी का शेयर अपनी फेयर वैल्यू पर मिल रहा है या नहीं। जैसे हम सब जानते हैं स्टॉक मार्केट में सप्लाई एंड डिमांड से शेयर प्राइस ऊपर नीचे जाती है। तो कभी-कभी किसी शेयर की फेयर वैल्यू में साल के तौर पर 20-25 होती है लेकिन एक डिमांड की वजह से वह शेयर 140 रुपए पर चला जाता है। तो कोई शेयर जिसकी फेयर वैल्यू 25-30 है उसको 140-150 रुपए का खरीदना बेवकूफी है। अगर आप नहीं जानते शेयर प्राइस कैसे डिसाइड होता है तो मैं आपको आगे की वीडियो में डिटेल से समझा दूंगा। इसके अलावा भी काफी कुछ देखना होता है स्टॉक खरीदने से पहले। उसकी फेयर वैल्यू या इंट्रिसिक वैल्यू जानने के लिए और फेयर वैल्यू फाइंड आउट करने के लिए ही पीई रेश्यो एक ऑफ़ दी मोस्ट इंपॉर्टेंट मैट्रिक्स है। तो वीडियो स्टार्ट करने से पहले अगर आप चैनल पर नए हैं तो चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो आप तक पहुंचती रहे। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं।

दोस्तों, पीई रेश्यो का फॉर्मूला है करंट शेयर प्राइस डिवाइडेड बाय ईपीएस यानी अर्निंग पर शेयर। करंट शेयर प्राइस वो होती है जो फिलहाल शेयर की चल रही होती है और अर्निंग पर शेयर का मतलब होता है की एक शेयर पर कंपनी कितने पैसे कमा रही है। ईपीएस फाइंड आउट करने का फॉर्मूला होता है प्रॉफिट आफ्टर टैक्स डिवाइडेड बाय टोटल नंबर ऑफ़ शेयर्स। फॉर एग्जांपल, अब फर्ज करें इस शेयर की करंट मार्केट प्राइस चल रही है ₹500 और ईपीएस 20 है। तो पीई रेश्यो फाइंड आउट करने के लिए हम करंट शेयर प्राइस को ईपीएस से डिवाइड कर देंगे और इस कंपनी की पीई रेश्यो निकल के आएगी 25। अब इस 25 का क्या मतलब है? इस 25 का मतलब है की कंपनी का एक शेयर कंपनी के 25 टाइम्स अर्निंग पे बिक रहा है यानी इन्वेस्टर को ₹1 कमाने के लिए ₹25 लगाना पड़ रहे हैं। अब सवाल यह पैदा होता है की 25 की पीई रेश्यो अच्छी है या बुरी? पहले से यह बात की सारी रेश्योस खुद से कैलकुलेट करने की जरूरत नहीं है। जैसे कोई भी और रेश्यो जो मैंने आज तक बताई है या फ्यूचर में बताऊंगा यह सारे रेश्योस डिफरेंट वेबसाइट जैसे की investing.com वगैरा पर ऑलरेडी मौजूद होती हैं। यह सारा कुछ मैं आपको इसलिए बता रहा हूं ताकि आपका कॉन्सेप्ट क्लियर हो और आपको यह पता लगे की कोई रेश्यो कंपनी के बारे में क्या बता रही है। मैं फ्यूचर में आपके लिए एक स्पेशल डेडीकेटेड वीडियो भी बनाऊंगा जिसमें मैं आपको बताऊंगा की किन-किन वेबसाइट से इनफॉरमेशन लेकर आप कंपनी के एनालिसिस कर सकते हैं। तो आगे बढ़ाने से पहले प्लीज वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा। आपका हर एक लाइक चैनल के लिए बहुत ज्यादा हेल्पफुल साबित होता है। तो रही बात की 25 की पीई रेश्यो कैसी है तो ये कंपनी पर और जिस इंडस्ट्री यानी सेक्टर में कंपनी काम कर रही होती है उस पर डिपेंड करता है। मसलन फर्ज करें जिस इंडस्ट्री में ये कंपनी काम कर रही है उस इंडस्ट्री की एवरेज पीई रेश्यो 15 की है तो इंडस्ट्रीज स्टैंडर्ड के मुताबिक यह कंपनी ओवर वैल्यू दिखाई दे रही है। और इसी इंडस्ट्री में एक और कंपनी है जिसकी पीई रेश्यो 10 और करंट शेयर प्राइस ₹120 है। अब देखा जाए तो कंपनी का शेयर भी काफी महंगा है और पीई रेश्यो भी ज्यादा है। और कंपनी में इन्वेस्ट करने से पहले उसके प्रॉफिट पर भी नज़र डालनी चाहिए। मान लीजिये कंपनी बता रही है की कंपनी को सिर्फ 3 करोड़ का प्रॉफिट हुआ है और कंपनी के टोटल 25 लाख शेयर्स हैं जिससे कंपनी की ईपीएस 12 निकल के आई और पीई रेश्यो 10। अब एक इन्वेस्टर हमेशा कोशिश करता है की किसी ऐसी कंपनी में इन्वेस्ट करें जिसका एक प्रोमाइजिंग फ्यूचर हो और अपेरेंटली कंपनी भी दूर-दूर तक कंप्लीट नहीं कर सकती क्योंकि कंपनी 50 करोड़ का बिजनेस कर रही है और कंपनी का प्रॉफिट सिर्फ 3 करोड़ का है। लेकिन यह चीज भी देखना काफी नहीं है। हमें इन दोनों कंपनी की हिस्ट्री भी देखनी होगी की कंपनी किस स्पीड पे ग्रो कर रही है। अगर हम पहली कंपनी की हिस्ट्री देखें तो 3 साल पहले कंपनी की ईपीएस 10, शेयर प्राइस 150, शेयर प्राइस है और पीई रेश्यो तीनों ऊपर जा रही है यानी कंपनी ग्रो कर रही है, यानी सही डायरेक्शन में जा रही है। और अगर दूसरी कंपनी की ग्रोथ देखें तो 3 साल पहले कंपनी की ईपीएस 11, शेयर प्राइस 110 और पीई रेश्यो फिर से 10 थी और इस साल ईपीएस 12, शेयर प्राइस 120 और पीई रेश्यो अगेन 10 है तो कंपनी स्लो है, शेयर प्राइस भी आहिस्ता आहिस्ता ऊपर जा रही है और पीई रेश्यो तो पिछले 3 सालों से कांस्टेंट 10 पर ही अटकी हुई है। इसका मतलब है की अगर कंपनी ग्रोथ नहीं कर रही फिर भी कंपनी ईपीएस दे रही है। इसलिए सिर्फ पीई रेश्यो देख के यह नहीं करना चाहिए की शेयर सही प्राइस पर मिल रहा है या नहीं बल्कि कंपनी को उसके सेक्टर की बाकी कंपनी से कंपेयर करके फिर किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए की इस कंपनी की शेयर्स आपको बाय करने हैं या नहीं। तो वीडियो पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा और चैनल को भी सब्सक्राइब कर लीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो आप तक पहुंचती रहे। अपना रखिएगा बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम।

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 30वीं क्लास में खुशामदी दोस्तों। आज मैं आपको एक और बहुत इंपॉर्टेंट रेश्यो के बारे में बताने वाला हूं जिसे आरओई यानी रिटर्न ऑन इक्विटी रेश्यो कहते हैं। गैस स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करके प्रॉफिट जेनरेट करने के लिए रेश्योस का सारा पार्ट प्ले करती है। अब जितने अच्छे तरीके से इन रेश्योस को समझेंगे उतनी ही आसानी से रेश्योस को इंटरप्रेट करके कंपनी को एनालाइज कर सकेंगे और यह पता लगा सकेंगे की कंपनी आपको फ्यूचर में कितना अच्छा रिटर्न देगी। मैं आपको क्लास 28 से ऑनवर्ड जितनी भी रेश्योस के बारे में बता रहा हूं उनको बहुत ध्यान से समझिये, बार-बार वीडियो देखें क्योंकि इन्वेस्टिंग करते वक्त आपका सबसे बेहतर लेकिन दोस्तों यह रेशों जिन्हें तो वीडियो स्टार्ट करने से पहले अगर आप चैनल पर नए हैं तो चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो आप तक पहुंचती रहे। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं।

दोस्तों रिटर्न ऑन इक्विटी के जरिए बेसिकली इन्वेस्टर्स यह पता लगाते हैं की कंपनी कितने प्रॉफिट में जा रही है। जैसे सॉल्वेंसी रेश्यो हमें ये बताती है की कंपनी की डेट सिचुएशन कैसी है, वैसे ही प्रॉफिट एबिलिटी रेश्यो हमें यह बताती है की कंपनी की प्र

हम बैलेंस शीट से लेंगे 40 करोड़ और प्रॉफिट अपने टेस्ट जानने के लिए हम जाएंगे कंपनी की इनकम स्टेटमेंट पे। तो इनकम स्टेटमेंट हमें बता रही है कि कंपनी ने टोटल 20 करोड़ की सेल्स की है और सारे खर्चे निकल के, इंटरेस्ट पे करके, टैक्स वगैरा सब कुछ दे दिला के कंपनी के पास 8 करोड़ रुपए बचे हैं। जो कंपनी का प्रॉफिट है, यानी प्रॉफिट आफ्टर टैक्स है। यानी वह पैसे हैं जो शेयर होल्डर्स के हैं। यानी 20 करोड़ में से इंटरेस्ट के पैसे बैंक के, टैक्स के पैसे गवर्नमेंट के और बाकी के पैसे शेयर होल्डर्स के। मतलब 40 करोड़ इक्विटी पर इन्वेस्टर ने इस साल 8 करोड़ रुपए का रिटर्न कमाया। कितने परसेंट रिटर्न बनता है, यह जानने के लिए हम नेट इनकम को इक्विटी से डिवाइड करके 100 से मल्टीप्लाई कर देंगे। तो जवाब आएगा शेयर होल्डर्स ने अपनी इन्वेस्टमेंट पर 20% रिटर्न कमाया है। और कॉमन सेंस की बात है कि रिटर्न ऑन इक्विटी जितना ज्यादा हो, कंपनी को उतना अच्छा कंसीडर किया जाएगा। लेकिन यह भी बिल्कुल दुरुस्त नहीं है।

फ़र्ज़ करें एक और कंपनी है, कंपनी बी, जो इसी इंडस्ट्री में ऑपरेट करती है, जिसकी सारी सिचुएशन कंपनी ए जैसी है। कंपनी बी की इक्विटी 40 करोड़ की बजाय सिर्फ 20 करोड़ है और लायबिलिटी 20 करोड़ की बजाय 40 करोड़ है। तो इस कंपनी की ROE निकलेगी 8 करोड़ डिवाइडेड बाय 20 करोड़ मल्टीप्लाई 100। देखिए, इन्वेस्टिंग नहीं करनी चाहिए, बल्कि सारे डॉट को आपस में कनेक्ट करना चाहिए और फिर देखना चाहिए कि इस कंपनी में पैसा लगाना एक साउंड इन्वेस्टमेंट है या नहीं। इन्वेस्टिंग से पहले किसी भी कंपनी की पूरी फाइनेंशियल सिचुएशन को देखना चाहिए और उसे इंडस्ट्री में मौजूद बाकी कंपनियों से भी जरूर कंपेयर करना चाहिए। और सिर्फ अच्छी, यानी ज्यादा ROE वाली कंपनी में डायरेक्ट इन्वेस्ट नहीं कर देना चाहिए। तो कुल मिलाकर बात ये है कि यही है, सिर्फ ये नहीं है। मैं इस वीडियो का एक सेकंड पार्ट भी बनाऊंगा जिसमें मैं आपको एक और बहुत जरूरी और बहुत इंटरेस्टिंग बात बताऊंगा। और वो क्रिटिकल है। 20% का रिटर्न शेयर होल्डर्स को इक्विटी में मिल रहा है, यानी ये ROE है। जितने पैसों में आपने मार्केट से शेयर खरीदा है, उसे पर नहीं। तो नेक्स्ट वीडियो इसी टॉपिक पर होगी, इसलिए चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन पर क्लिक करके ऑल को जरूर प्रेस कर लीजिएगा, ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो का नोटिफिकेशन आपको मिल जाए। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 32 क्लास नहीं देखी तो पहले वो देखें, क्योंकि फिर ये आपको इस वीडियो की समझ आएगी। तो वीडियो स्टार्ट करने से पहले अगर आप चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लीजिएगा, ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो आप तक पहुंचती रहे। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, जैसे हमने देखा कि कंपनी ए की टोटल इक्विटी 40 करोड़ है। अब फ़र्ज़ करें कंपनी ए के टोटल 20 लाख शेयर्स हैं। जिसका मतलब है कि अगर आज कंपनी को लिक्विड किया जाए, यानी कारोबार बंद करके कंपनी के सारे एसेट्स बेच के सब शेयर होल्डर्स को उनके पैसे वापस दे दिए जाएं, तो 40 करोड़ के इक्विटी 20 लाख शेयर्स पर इक्वली डिवाइड होगी। जिसका मतलब है कि एक शेयर पर शेयर होल्डर को ₹200 दिए जाएंगे। बीपीएस, यानी बुक वैल्यू पर शेयर। अब इस कंपनी का शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर 350 रुपए का ट्रेड हो रहा है। तो इसका मतलब यह नहीं है कि शेयर होल्डर को 20% का रिटर्न हो रहा है। जो कीमत इस वक्त शेयर की चल रही है, यानी 350, वो मिल रहा है। जो उसके हिस्से की कंपनी में एक्चुअल इन्वेस्टमेंट हुई है। एक्चुअल इन्वेस्टमेंट से मुराद है कि जाहिर है कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने के लिए आईपीओ इशू किया होगा और इन्वेस्टर से पैसा उठाया होगा, जिसके बदले में शेयर होल्डर को कंपनी में हिस्सेदारी दी होगी, यानी कंपनी के शेयर्स दिए होंगे। तो इन्वेस्टर ने जो पैसा कंपनी को दिया है, उसे पर कंपनी ने 20% रिटर्न किया है। फ़र्ज़ करें आपने 350 के शेयर खरीदा और एक साल रखने के बाद बेच दिया और इस एक साल में आपको ₹50 डिविडेंड भी मिला और एक साल बाद जब आपने शेयर बेचा तो वह ₹400 का भी हो गया। तो 350 आपकी इन्वेस्टमेंट थी और उसे पर आपको ₹100 रिटर्न मिला, जो कि 28.5% बनता है। तो यहां इस बात को समझिए कि 28.5% रिटर्न जो है वो कंपनी से, कंपनी के बिजनेस रिलेटेड होती है, इंडिविजुअल शेयर होल्डर से नहीं। कंपनी शेयर होल्डर का रिटर्न एनुअल रिपोर्ट में नहीं लिखा जाता। शेयर खरीदकर इतने का बेचा और इतना डिविडेंड हासिल किया, ये बिल्कुल शेयर्स के ऊपर इन्वेस्टर्स को जो भी प्रॉफिट या लॉस हो रहा है, कंपनी का उससे लेना-देना नहीं है। वो इन्वेस्टर्स का पर्सनल मैटर है। आपको ₹50 डिविडेंड मिला, वो आपका प्रॉफिट था, कंपनी का नहीं। तो कंपनी उसे रिपोर्ट नहीं करेगी। आपने शेयर 350 का खरीद के 400 का बेचा, वो भी आपका प्रॉफिट था, कंपनी का नहीं। 20% रिटर्न ऑन इक्विटी है। तो अब सवाल यह पैदा होता है कि वह शेयर जिसकी बुक वैल्यू ₹200 है, वह 350 का क्यों मार्केट में ट्रेड हो रहा है? तो इसका जवाब देने से पहले प्लीज वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा, क्योंकि आपके लाइक से मेरा कॉन्फिडेंस नेक्स्ट वीडियो बनाने के लिए बहुत ज्यादा बूस्ट होता है। तो अब ऐसा इसलिए है क्योंकि स्टॉक प्राइस बहुत ज्यादा फैक्टर्स को देखते हुए डिसाइड होती है, सिर्फ बुक वैल्यू पर शेयर को देख के नहीं। हम स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करते वक्त यह सोचते हैं कि यह कंपनी मैक्सिमम टाइम तक ऑपरेशन में रहेगी, मैक्सिमम टाइम तक प्रॉफिट में जाएगी और टाइम टू टाइम अपना बिजनेस भी एक्सपेंड करती जाएगी। फ़ॉर एग्जांपल, अगर कंपनी पर डेट काफी कम है, कंपनी ग्रो कर रही है, हर साल शेयरहोल्डर्स इक्विटी भी इंक्रीज होती जा रही है, कंपनी का प्रॉफिट भी इंक्रीस हो रहा है, डिविडेंड रेगुलर बेसिस पर शेयर होल्डर्स को दिए जा रहे हैं, तो यह सारी चीजें स्टॉक प्राइस पर इंपैक्ट डालेंगी और जब कंपनी की परफॉर्मेंस एनुअल रिपोर्ट में अच्छी नज़र आएगी, तो अल्टीमेटली स्टॉक की प्राइस ऊपर जाएगी और इन्वेस्टर्स अपने शेयर बुक वैल्यू से कई गुना महंगे बेचेंगे, यानी प्रीमियम पर बेचेंगे। मसलन, अगर आप 350 का शेयर खरीदते हैं और कंपनी साल का ₹50 डिविडेंड देती है, तो अगले 7 सालों में आपकी इनिशियल इन्वेस्टमेंट पूरी हो जाएगी और उसके बाद सारा प्रॉफिट आपको एक्स्ट्रा मिल रहा होगा। और ऑन दी अदर हैंड, जो आपने शेयर 350 का खरीदा होगा, हो सकता है वो सात साल बाद ₹1000 का हो जाए, क्योंकि यही प्रॉफिटेबिलिटी का साइकिल रिपीट होगा और फिर आप अगले इन्वेस्टर से प्रीमियम चार्ज करेंगे कि मुझे मेरे 350 वाले शेयर के ₹1000 दो। क्योंकि जब मैंने शेयर खरीदा था तब इसकी बुक वैल्यू ₹200 थी और इक्विटी 40 करोड़ थी। अब इसकी बुक वैल्यू 200 से बढ़कर 700 हो गई है और इक्विटी 40 करोड़ से बढ़कर 500 करोड़ हो गई है और कंपनी थ्रू आउट हिस्ट्री अच्छा परफॉर्म करती आई है और उम्मीद है आगे भी अच्छा परफॉर्म करेगी। रेशियो ये है, इसका ये मतलब है कि आपके द्वारा कंपनी में ऑन पेपर इन्वेस्टमेंट हुई है, उसे पर कंपनी कितना रिटर्न जेनरेट कर रही है। क्योंकि आखिर में, एंड ऑफ दी डे, वो पैसा आपका है। तो ये थी आज की वीडियो। अगर आपको आज की वीडियो पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा और अपने फ्रेंड्स एंड फैमिली मेंबर्स के साथ भी जरूर शेयर कीजिएगा। अपना ख्याल रखिएगा। बहुत सारा ख्याल। अगली वीडियो तक के लिए मुझे दीजिए इजाजत। अल्लाह हाफ़िज़। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 34 क्लास में खुशहाली गैस। आज मैं आपको एक और बहुत इंपॉर्टेंट रेश्यो के बारे में बताऊंगा, जो इन्वेस्टिंग करते वक्त बहुत काम आती है और वो रेशियो है रिटर्न ऑन कैपिटल एंप्लॉयड, जिसको ROCE भी कहते हैं। तो वीडियो स्टार्ट करने से पहले अगर आप चैनल पर नए हैं तो प्लीज चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लीजिएगा ताकि मेरी फ्यूचर में आने वाली तमाम वीडियो आप तक पहुंचती रहे। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। कि कंपनी के पास जितना भी पैसा है, या लोन की सूरत में है, जितना भी कैपिटल है, उसे पर कंपनी कितना अर्न कर रही है। अब कंपनी के ओनर्स के पास सिर्फ 40 लाख हैं, तो ये 40 लाख कहलाया जाएगा कैपिटल, यानी वो पैसा जो ओनर्स का है। और बाकी के 60 लाख इकट्ठा करने के लिए कंपनी लोन लेती है और टोटल ₹1 करोड़ से बिजनेस स्टार्ट करती है। तो कंपनी ने जो टोटल पैसा बिजनेस में इन्वेस्ट किया है वो 1 करोड़ है। अब ये 1 करोड़ कहलाया जाएगा कैपिटल एंप्लॉयड। 40 लाख कैपिटल जो ओनर का पैसा है और एक करोड़ कैपिटल एंप्लॉयड, यानी जो टोटल पैसा बिजनेस में लगा है। अब रिटर्न ऑन कैपिटल एंप्लॉयड कैलकुलेट करने का फॉर्मूला का बेसिक कॉन्सेप्ट है EBIT डिवाइडेड बाय कैपिटल एंप्लॉयड। लेकिन अब डिफरेंट इन्वेस्टर्स कैपिटल एंप्लॉयड को डिफरेंट तरीके से कैलकुलेट करते हैं। पहले मैं आपको बताता हूं EBIT किसे कहते हैं, फिर मैं आपको डिफरेंट मेथोडोलॉजी बताऊंगा कैपिटल एंप्लॉयड कैलकुलेट करने की। तो EBIT का मतलब है अर्निंग बिफोर इंटरेस्ट एंड टैक्स। यानी वो पैसे होते हैं जिस पर अभी कंपनी ने इनकम टैक्स और बैंक का इंटरेस्ट नहीं दिया होता, लेकिन बाकी सारे खर्चे वगैरा निकल लिए होते हैं। जो टोटल सेल्स होती है उसको रेवेन्यू कहते हैं। रेवेन्यू में से कॉस्ट ऑफ़ सेल्स, यानी माल तैयार करने का जो खर्चा होता है, उसको माइनस करें तो ग्रॉस प्रॉफिट आ जाता है। ग्रॉस प्रॉफिट में से एक्सपेंसेस माइनस करें तो EBIT आ जाता है। फिर EBIT में से बैंक का इंटरेस्ट माइनस करें तो प्रॉफिट बिफोर टैक्स आ जाता है और फिर एंड में प्रॉफिट बिफोर टैक्स में से टैक्स माइनस करें तो प्रॉफिट आफ्टर टैक्स आ जाता है, जिसको नेट इनकम भी कहते हैं, जो कंपनी का टोटल प्रॉफिट होता है। ये सब चीजें मैंने बैलेंस शीट सीरीज़ में डिटेल्स से समझाई हैं। आप टॉप राइट कॉर्नर पर क्लिक करके मेरी बैलेंस शीट वाली सीरीज़ देख सकते हैं। अब हम ROCE कैलकुलेट करने के लिए उसे करते हैं प्रॉफिट आफ्टर टैक्स या किसी और अमाउंट को क्यों नहीं? तो इसका जवाब देने से पहले हम ROCE के फॉर्मूला समझ लेते हैं। फिर मैं आपको बताऊंगा। EBIT डिवाइडेड बाय शेयर होल्डर्स इक्विटी प्लस लॉन्ग टर्म लायबिलिटी। दूसरा फॉर्मूला बताता हूं, तो दूसरा फॉर्मूला है EBIT डिवाइडेड बाय शेयर होल्डर्स इक्विटी प्लस लॉन्ग टर्म लोन। और तीसरा फॉर्मूला है EBIT डिवाइडेड बाय इक्विटी प्लस शॉर्ट टर्म एंड लॉन्ग टर्म लोन। अब कुछ इन्वेस्टर्स इक्विटी और सारी लॉन्ग टर्म लायबिलिटी को कैपिटल एंप्लॉयड कहते हैं। कुछ इन्वेस्टर्स कहते हैं नहीं, सिर्फ इक्विटी और लॉन्ग टर्म लोन ही कैपिटल एंप्लॉयड है। और कुछ इन्वेस्टर्स कहते हैं ये दोनों मेथड गलत है, बल्कि इक्विटी और लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म दोनों लोन को मिलाकर कैपिटल एंप्लॉयड बनता है। लेकिन सारे इन्वेस्टिंग मेथड में एक चीज सेम है और वो ये, ROCE कैलकुलेट करते वक्त न्यूमरेटर में EBIT लिखा जाता है। तो अब बात आई EBIT को ही क्यों लिखा जाता है? तो इसका जवाब ये है, हमें एक तरह से कंपनी की जेनुइन अर्निंग्स का पता चलता है कि कंपनी ने असल में कैपिटल एंप्लॉयड पे कितना पैसा कमाया है। कंपनी A और कंपनी B, अगर प्रॉफिट आफ्टर टैक्स को देखें तो दोनों कंपनी का प्रॉफिट आफ्टर टैक्स सेम है, यानी 35 लाख रुपए। लेकिन सिर्फ प्रॉफिट आफ्टर टैक्स को देखकर इन्वेस्टिंग नहीं होती। इन्वेस्टिंग से पहले एनालिसिस करते वक्त इन्वेस्टर्स और चीजों को बहुत ध्यान से एनालाइज करते हैं। यूं समझ लें बिल्कुल खाल उतारने हैं। तो अब अगर हम इन दोनों कंपनी के इनकम स्टेटमेंट एनालाइज करें, तो दोनों कंपनी ने 35 लाख का प्रॉफिट कमाया, दोनों कंपनी का एक करोड़ का रेवेन्यू था। लेकिन अब कंपनी B का EBIT 60 लाख है और कंपनी A का 30 लाख, जिसका मतलब है कि कंपनी B ज्यादा एफिशिएंट तरीके से बिजनेस किया है, एस कंपेयर टू कंपनी A। बेसिक कंपनी A से कम है और कंपनी B से कम है। लेकिन कंपनी B बहुत ज्यादा एफिशिएंट तरीके से रन कर रही है एस कंपेयर टू कंपनी A। इस तरह आपकी क्वालिटेटिव एनालिसिस भी एक तरह से हो जाते हैं कि मैनेजमेंट की क्वालिटी काफी अच्छी है, जो अपने एक्सपेंसेस मिनिमाइज और प्रॉफिट मैक्सिमाइज कर रही है, यानी अकलमंद लोग इस कंपनी को चला रहे हैं। तो होपफुली कंपनी का फ्यूचर ब्राइट है। तो रिटर्न ऑन कैपिटल एंप्लॉयड, ROCE का मकसद ही यही होता है कि हमें पता चले कंपनी ने अपने कैपिटल एंप्लॉयड पे कितना रिटर्न कमाया है। अब एग्जांपल के लिए हम कंपनी B को ROCE के तीनों मेथड से एनालाइज करके देखते हैं। तो ये है कंपनी B का इनकम स्टेटमेंट। अब अगर फर्स्ट फॉर्मूला यूज करें, 60 लाख को डिवाइड करेंगे 2 करोड़ 40 लाख से, तो हमारे पास आंसर आएगा 0.22। और दूसरा फॉर्मूला यूज करें, 60 लाख को डिवाइड करेंगे 2 करोड़ 10 लाख से, तो हमारे पास आंसर आएगा 0.30। और तीसरा फॉर्मूला यूज करें, 60 लाख को डिवाइड करेंगे 2 करोड़ 30 लाख से, तो हमारे पास आंसर आएगा 0.28। अब देखा जाए तो आंसर्स काफी डिफरेंट हैं और अब सवाल ये पैदा होता है कि इनमें से सबसे यूजफुल मेथड कौन सा है रिटर्न ऑन कैपिटल एंप्लॉयड कैलकुलेट करने का? तो जो मेथड इन्वेस्टर्स यूज करते हैं और जो मेथड मुझे भी रीज़नेबल लगता है वो थर्ड है, शॉर्ट टर्म एंड लॉन्ग टर्म लोन। क्योंकि अगर ये दोनों मिला दें तो ही कंपनी का कैपिटल एंप्लॉयड बनता है। इक्विटी प्लस लोन। क्योंकि नॉन करंट लायबिलिटी में डिफॉल्ट आ जाता है। कैपिटल एंप्लॉयड फाइंड आउट करना ही सेंसिबल लगता है। जो पैसा कंपनी का अपना है और जो पैसा कंपनी ने कर्जे के तौर पे उठाया है, वही रियल अमाउंट बनती है जिसकी मदद से कंपनी बिजनेस रन कर सकती है। और जब आप किसी भी कंपनी को एनालाइज करते हैं तो कोशिश करें एक ही मेथड से कंपनी को एनालाइज करें। और किसी भी कंपनी के एनालिसिस करने से पहले कोशिश करें पास की मैक्सिमम जितनी इंफॉर्मेशन है इकट्ठी कर सकते हैं वो करें। और इन्वेस्टिंग से पहले इंडस्ट्री में मौजूद बाकी कंपनियों के साथ भी कंपनी को जरूर कंपेयर करें और फिर डिसीजन लें कि इस कंपनी में आपको इन्वेस्ट करना है या नहीं। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज। दुनिया के सबसे अमीर इन्वेस्टर वॉरेन बफेट क्या कह रहे हैं? [हंसी] तो वॉरेन बफेट कह रहे हैं अच्छा बिजनेस वो होता है जो एसेट्स पे हाई रेट ऑफ़ रिटर्न जनरेट करें और बहुत अच्छा बिजनेस वो होता है जो एसेट्स पे हाई रेट ऑफ़ रिटर्न जनरेट करें और साथ में ग्रो भी हो। तो आज की वीडियो रिटर्न ऑन एसेट्स के बारे में होने वाली है। लेकिन मुझे चाहिए ढेर सारे लाइक्स। तो वीडियो स्टार्ट करने से पहले प्लीज वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। दोस्तों, रिटर्न ऑन एसेट्स रेशियो हमें ये बताती है कि कंपनी अपने एसेट्स के मुकाबले में कितना प्रॉफिट जेनरेट कर रही है। ये सब मैं आपको एक एग्जांपल के ज़रिए समझाता हूं। ये है हसन। अब हसन दो कंपनी को एनालाइज कर रहा है। अब दोनों कंपनी की बैलेंस शीट पे एसेट्स का अमाउंट सेम है, यानी पांच-पांच करोड़ रुपए। यानी दोनों कंपनी एक जैसे एसेट्स से काम कर रही हैं। तो होपफुली इनका प्रॉफिट भी सेम होना चाहिए। लेकिन जब इन दोनों कंपनी की इनकम स्टेटमेंट देखिए, तो अब टेक्सटाइल्स का प्रॉफिट आफ्टर टैक्स एक करोड़ है और डीसी टेक्सटाइल का 70 लाख। यानी डीसी टेक्सटाइल अपने एसेट्स को उतना एफिशिएंटली यूज़ नहीं कर रही जितना अब टेक्सटाइल्स कर रही है। दोनों कंपनी के पास 5 करोड़ एसेट्स हैं, लेकिन प्रॉफिट में बहुत डिफरेंस है। अब हो सकता है या तो उसकी प्रोडक्ट डिलीवरी रेट है या उसकी मैनेजमेंट कंपनी की बाहर हाल कुछ ना कुछ गड़बड़ जरूर है, जिसकी वजह से डीसी टेक्सटाइल उतना रिटर्न नहीं जनरेट कर रही जितना ये कर सकती है। तो ये तो हमें बैलेंस शीट और इनकम स्टेटमेंट देख के पता लग गया कि एबी टेक्सटाइल का रिटर्न ऑन एसेट्स ज़्यादा है। लेकिन प्रॉपर एनालिसिस के लिए कंपनी की रेशियो निकालना जरूरी होता है, क्योंकि फिर ही हम कंपनी को सही से एनालाइज कर सकते हैं और पता लगा सकते हैं कि इस पार्टिकुलर कंपनी में इन्वेस्ट करना ठीक है या नहीं। तो ROE जानने, रिटर्न ऑन एसेट्स कैलकुलेट करने का फॉर्मूला है प्रॉफिट डिवाइडेड बाय टोटल एसेट्स। अब टेक्सटाइल्स की ROE रेशियो कैलकुलेट करने के लिए हम सिंपली एक करोड़, जो कि प्रॉफिट आफ्टर टैक्स है, उसको 5 करोड़ के टोटल एसेट्स से डिवाइड कर देंगे। तो आंसर आएगा 0.2, यानी 20%。 यानी अब टेक्सटाइल्स जेनरेट कर रही है, यानी 14%。 जिसका मतलब है कि अब टेक्सटाइल्स अपने रिसोर्सेज़ को बहुत अच्छे से मैनेज कर रही है एस कंपेयर टू डीसी टेक्सटाइल। लेकिन वॉरेन बफेट कहते हैं कि अच्छा बिजनेस वो होता है जो अपने एसेट्स पे हाई रेट ऑफ़ रिटर्न जनरेट करें। तो अब हाई कितना हाई होना चाहिए? ये आपको पता लगेगा इंडस्ट्री में मौजूद बाकी कंपनी को एनालाइज करके। ये इंडस्ट्री में एवरेज रेशियो क्या चल रही है और क्या ये पार्टिकुलर कंपनी अप टू दी मार्क है या नहीं। और वॉरेन बफेट कहते हैं बहुत अच्छा बिजनेस वो होता है जो एक तो अच्छा ROE जनरेट करें और साथ-साथ ग्रो भी करें। अब ग्रोथ कैसे पता लगेगी? ग्रोथ हमें पता लगेगी कंपनी की पास्ट परफॉर्मेंस को देख के। तो पास्ट परफॉर्मेंस के लिए जितना हो सके मैक्सिमम कंपनी की हिस्ट्री देखनी चाहिए कि कंपनी स्टेडी पेस से ग्रो कर रही है या नहीं या ऑप्शन डाउन ए रहे हैं कंपनी में। और एक और बात का ध्यान रखना चाहिए कि अगर किसी कंपनी की कोई रेशियो एकदम से बहुत ज्यादा ऊपर या नीचे चली जाती है तो उसके पीछे रीज़न क्या है? मिसाल के तौर पर अगर किसी कंपनी की ROE 10% से चल रही है काफी अच्छे से और रीसेंट ईयर में एकदम से 8-9% बिगड़ गई है तो इसकी क्या वजह है? तो इसकी एक वजह ये हो सकती है कि शायद कंपनी के एसेट्स एकदम से ज़्यादा हो गए हों। मसलन, हो सकता है कंपनी के एसेट्स पहले 5 करोड़ के हों और अगले साल एसेट्स 30-35 करोड़ के हो गए हों जिसकी वजह से ROE गिरकर 7-8% हो गई हो। तो अगर ऐसा है कि कंपनी के एसेट्स ज्यादा हो गए हैं और ROE गिर गई है तो इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है। इसका मतलब ये नहीं है कि कंपनी बुरा परफॉर्म कर रही है, बल्कि ये एक पॉजिटिव साइन है कि कंपनी ने अपने एसेट्स बढ़ाए हैं। और अगर एसेट्स बढ़ जाएं तो एकदम से प्रॉफिट में उतना ही जाम नहीं आता, जिसके नतीजे में ROE कम हो जाती है। कंपनी की ROE क्यों कम हो गई है? तो इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है। बस कंपनी को कुछ टाइम दें। मोस्ट प्रोबेब्लली कंपनी अपनी नेट इनकम बढ़ाकर वापस 14-15% के पास ले जाएगी। अस्सलाम वालेकुम। जिसको ICR, यानी इंटरेस्ट कवरेज रेशियो भी कहते हैं। तो आगे बढ़ाने से पहले प्लीज वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिएगा और चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। तो टाइम्स इंटरेस्ट अर्न्ड रेशियो क्या है? टाइम्स इंटरेस्ट अर्न्ड रेशियो बताती है कि कोई भी कंपनी अपने कर्जे के इंटरेस्ट को कितनी आसानी से उतार सकती है। क्योंकि ज़ाहिर है जब भी कोई बैंक कंपनी को कर्जा देता है तो उसे कंपनी से एक खास इंटरेस्ट रेट चार्ज करता है। जैसे अगर आप घर बनाने के लिए लोन लेते हैं तो आपकी सैलरी का सिर्फ इंटरेस्ट की पेमेंट में ही चला जाता है। और अनफॉर्चूनेटली आजकल पाकिस्तान को इंटरेस्ट पेमेंट करने में जरा दिक्कत आ रही है। इसी तरह अक्सर कंपनी को भी अपने इंटरेस्ट की पेमेंट करने में दिक्कत आती है, जो कंपनी और इन्वेस्टर्स दोनों के लिए एक बहुत खतरे की बात है। तो TIE हमें यही बताती है कि कंपनी अपने इंटरेस्ट की पेमेंट आसानी से कर पा रही है या नहीं। रेशियो कैलकुलेट करने का फॉर्मूला है EBIT डिवाइडेड बाय इंटरेस्ट एक्सपेंस। जिससे मैं आपको एक एग्जांपल के ज़रिए समझाता हूं। फ़र्ज़ करें दो कंपनी हैं, कंपनी A और कंपनी B। दोनों ने 1 करोड़ का कर्जा लिया है 10% इंटरेस्ट रेट के हिसाब से, जिसका मतलब है कि इन दोनों कंपनी ने साल का 10-10 लाख इंटरेस्ट भरना है। अब कंपनी A का EBIT 50 लाख है। तो इन दोनों कंपनी की TIE रेशियो कैलकुलेट करने के लिए 50 लाख को 10 लाख से डिवाइड कर देंगे। तो कंपनी A और कंपनी B। कंपनी A इंटरेस्ट भरने के लिए 5 गुना पैसा कम रही है और कंपनी B सिर्फ 1 गुना। कंपनी B को अच्छा कंसीडर नहीं किया जाता क्योंकि इसका मतलब है कि अगर कंपनी पर थोड़ा सा भी मुश्किल वक्त आ गया और कंपनी अपना कर्जा ना उतार सकी तो कंपनी के बैंकरप्ट होने के चांसेस बहुत ज्यादा हैं। मिसाल के तौर पर कंपनी A ने 50 लाख कमाए और 10 लाख इंटरेस्ट भरा। अब अगर किसी साल वो अच्छा बिजनेस नहीं करती और उसका EBIT हो जाता है, मतलब 20-30 लाख हो जाता है, फिर भी वो 10 लाख रुपए इंटरेस्ट आराम से भर देगी। लेकिन ऑन दी अदर हैंड, कंपनी B अच्छा बिजनेस नहीं करती और इसकी टोटल इनकम 10 लाख हो जाती है तो इंटरेस्ट पेमेंट भरने के बाद तो कंपनी लॉसेस में चली जाएगी और कुछ नहीं कहा जा सकता कि कंपनी वापस प्रॉफिट की तरफ आएगी भी या नहीं, जिसके नतीजे में इन्वेस्टर की इन्वेस्टमेंट डूबने के बहुत ज्यादा चांसेस हैं। इसलिए हम अपने इन्वेस्टिंग के रूल में यही कहते हैं कि किसी ऐसी कंपनी में इन्वेस्ट करना चाहिए जिसके TIE रेशियो 3 या 3 से ज्यादा की हो, ताकि कंपनी अपने इंटरेस्ट की पेमेंट आसानी से भर सके। लेकिन इन्वेस्टिंग से पहले सेक्टर में मौजूद बाकी कंपनी को भी जरूर एनालाइज करें ताकि आपको पता चले कि सेक्टर की एवरेज रेशियो क्या चल रही है और इस पार्टिकुलर कंपनी की क्या रेशियो है। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज। 37 क्लास में खुशहाली गैस। आज की वीडियो में मैं आपको एक और बहुत इंपॉर्टेंट रेशियो के बारे में बताऊंगा, जिसको DSI, या डेज़ सेल्स इन इन्वेंटरी भी कहते हैं। तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। कि कोई भी कंपनी अपनी इन्वेंटरी को, यानी अपने समान को कितनी जल्दी बेच के कैश में कन्वर्ट कर रही है। क्योंकि इससे हमें कंपनी की एफिशिएंसी का पता चलता है कि कंपनी अपना समान बेचने में कितनी एफिशिएंट है। कोई भी कंपनी जाहिर है जितनी जल्दी अपना समान बेचेगी, यानी जितने कम दिनों में अपना समान बेचेगी, उतनी जल्दी प्रॉफिट बनाएगी और उसे कंपनी को उतना अच्छा कंसीडर किया जाएगा। ये सब मैं आपको एक प्रैक्टिकल एग्जांपल के ज़रिए समझाता हूं। तो DSI, यानी डेज़ सेल्स इन इन्वेंटरी कैलकुलेट करने का फॉर्मूला है: इन्वेंटरी डिवाइडेड बाय कॉस्ट ऑफ़ गुड्स सोल्ड मल्टीप्लाईड बाय 365। इन्वेंटरी हमें मिलेगी बैलेंस शीट से, कॉस्ट ऑफ़ गुड्स सोल्ड की अमाउंट हमें मिलेगी इनकम स्टेटमेंट से और 365 से हम इसको इसलिए मल्टीप्लाई करेंगे क्योंकि एक साल में 365 डेज होते हैं। इसलिए 365 से मल्टीप्लाई करके हमें ये पता चलता है कि साल के मुकाबले में कंपनी कितनी तेजी से अपना समान बेच रही है। तो मसलन, DSI कैलकुलेट करने के लिए हमने नेस्ले की बैलेंस शीट से इन्वेंटरी लेंगे। याद रखें, इन्वेंटरी हमेशा करंट एसेट्स में शुमार होती है, क्योंकि इन्वेंटरी को एक साल के अंदर-अंदर ही कंपनी ने कैश में कन्वर्ट कर लेना होता है। तो बैलेंस शीट से हम 26 लाख और 1 करोड़ 62 लाख की अमाउंट लेंगे एस एन इन्वेंटरी। क्योंकि स्टोर्स एंड स्पेयर्स और स्टॉकिंग ट्रेड ही कंपनी की इन्वेंटरी बनती है और इन दोनों अमाउंट को आपस में ऐड कर देंगे तो आंसर आएगा 1 करोड़ 88 लाख। कॉस्ट ऑफ़ गुड्स सोल्ड हमें इनकम स्टेटमेंट से मिलती है और जब ऐसा करेंगे तो आंसर आएगा 0.22। अब इस नंबर को हम मल्टीप्लाई कर देंगे 365 से। ऐसा करेंगे तो आंसर आएगा 82.2, यानी तकरीबन 82 डेज़ में कंपनी अपनी इन्वेंटरी को कैश में कन्वर्ट कर लेती है। अब यहां आपके ज़हन में एक सवाल आ रहा होगा, जो आना भी चाहिए, कि करंट इन्वेंटरी तो 1 करोड़ 88 लाख की है, तो कॉस्ट ऑफ़ गुड्स सोल्ड 8 करोड़ 40 लाख के कैसे हो गए? और अगर साल का सारा माल 82 डेज़ में सेल हो जाता है तो बाकी 83rd डे कंपनी क्या कर रही होती है? तो इसका जवाब है कि 83rd डे कंपनी मेरी वीडियो लाइक कर रही होती है, इसलिए फटाफट आप भी कर दें। तो यहां एक बात समझिए कि कंपनी के पास करंट, यानी मौजूदा इन्वेंटरी 1 करोड़ 88 लाख में कन्वर्ट हो गई। अनूप 56 लाख सामान्य रख सकता होगा। तो अब पूरा साल बिकेगा लेकिन करंट इन्वेंटरी उसकी पांच छह लाख की ही रहेगी क्योंकि इससे ज़्यादा समान उसके दुकान में आ ही नहीं सकता। लेकिन जो उसने पूरे साल में टोटल माल बेचा है, यानी कॉस्ट ऑफ़ गुड्स और जो उसकी सेल्स है वो तो कई करोड़ों की होगी। तो इसका मतलब है कि करंट इन्वेंटरी उसके पास 5 लाख की ही रहती है। अब मान लेते हैं उसकी कॉस्ट ऑफ़ गुड्स 25 लाख है और करंट इन्वेंटरी 5 लाख। तो अगर उसकी DSI निकालनी है तो हम 5 लाख को 25 लाख से डिवाइड कर देंगे और 365 से मल्टीप्लाई कर देंगे। तो आ

वजह से अगर डीसी ज्यादा हो रही है तो ये कंपनी के लिए एक अलार्मिंग बात है और इन्वेस्टर को इसे जरूर एनालाइज करना चाहिए कि यह डीसी ज्यादा क्यों हो रही है। अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज वीडियो स्टार्ट करते हैं दोस्तों।

एंटरप्राइज वैल्यू एक बहुत इंपॉर्टेंट मेजर होता है और यह बहुत कम आता है जब भी इन्वेस्टर किसी कंपनी को इन्वेस्टमेंट के लिए एनालाइज करते हैं। एव को बहुत ज्यादा रेशियो से भी कंपेयर किया जाता है जैसे कि आई सी टू सेल्स, एक्सपेक्टेड ईवी/टू सेल्स, ईवी/टीवी यानी एंटरप्राइज वैल्यू कहते किसे हैं? एंटरप्राइज वैल्यू एक तरह से कंपनी की रियल वैल्यू को कहते हैं कि असल में कंपनी की क्या कीमत है। यह सब मैं आपको एक एग्जांपल से समझाता हूँ। मान लीजिये एक करोड़ रुपए यानी अगर आपने कंपनी है तो आपको एक करोड़ देकर यह कंपनी खरीदनी पड़ेगी। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। और वह क्यों ऐसा नहीं है? वो इसलिए ऐसा नहीं है क्योंकि जब किसी चीज के फायदे होते हैं तो जाहिर है साथ में नुकसान भी होते हैं। मतलब जब आपने यह कंपनी एक करोड़ की खरीद ली तो इसका मतलब है कि इसके ओनर अब आप हैं, जिसका मतलब है कि अब इस कंपनी के सारे लेन-देन भी आपके जिम्मे हैं। तो जब यह कंपनी आप खरीदेंगे तो जाहिर है इसके कर्जे भी अब आपको देने होंगे। तो फ़र्ज़ करें इस कंपनी पर टोटल कर्ज़ा है 60 लाख का, जिसका मतलब है कि कर्जा भी अब आपको देना है। जिसका मतलब है कि कंपनी आपको टोटल ₹1 करोड़ 60 लाख की पड़ेगी। लेकिन असल में चीज थोड़ी सी डिफरेंट है। और वह कैसे? वह ऐसे। इंटरप्राइजेज वैल्यू का फॉर्मूला है मार्केट कैप प्लस माइनस डेब्ट। क्योंकि आपने सारी कंपनी जो खरीद ली है और आपने एक करोड़ 60 लाख दिए, उसमें से 20 लाख आपको वापस मिल गए तो पीछे बचे एक करोड़ 40 लाख। तो अब ये ₹1 करोड़ 40 लाख हिलाई जाएगी कंपनी की एंटरप्राइज वैल्यू यानी कंपनी को खरीदने का असली खर्चा 1 करोड़ 40 लाख है क्योंकि इसमें आपके सारे शेयर्स की कीमत भी शामिल है और कर्जे की भी और जो कंपनी का कैश था वो भी आपका है। तो इंटरप्राइज वैल्यू से चीजों को कंपेयर करके हमें मज़ीद क्लेरिटी मिल जाती है कि कंपनी किस पोजीशन पे स्टैंड कर रही है।

अस्सलाम वालेकुम। पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज कोर्स की 39 क्लास में खुशामदी गैस आज की वीडियो कहते हैं तो चलिए वीडियो स्टार्ट करते हैं। कि कंपनी अपने प्रॉफिट आफ्टर टैक्स का कितने परसेंट प्रॉफिट अपने शेयरहोल्डर्स को दे रही है? कि कंपनी अपने प्रॉफिट आफ्टर टैक्स का कितने परसेंट प्रॉफिट बिजनेस में वापस री-इन्वेस्ट कर रही है? फ़र्ज़ करें एक कंपनी ने साल का एक करोड़ प्रॉफिट कमाया, जिसमें से 40 लाख शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड की सूरत में दे दिया तो ये 40 लाख कहलाया जाएगा पे आउट और बाकी का 60 लाख बिजनेस में ही वापस री-इन्वेस्ट कर दिया तो ये 60 लाख कहलाया जाएगा प्लॉ बैक यानी 40% है और 60% प्लॉ बैक रेशियो। तो अब इस रेशियो को जानने का फायदा क्या होता है और इसको हम कैसे इंटरप्रेट कर सकते हैं? तो इस रेशियो का फायदा तब होगा जब आप ये वीडियो लाइक कर देंगे इसलिए फटाफट से लाइक बटन पर क्लिक कर दें। जोक्स अपार्ट, ये पता चलता है कि कंपनी अपना पैसा कहाँ और कैसे खर्च कर रही है। फ़ॉर एग्ज़ैम्पल एक कंपनी है जो पिछले चार-पांच सालों से अपने प्रॉफ़िट का 40% दे रही है और 60% बिज़नेस में वापस री-इन्वेस्ट कर रही है तो उसे 60% री-इन्वेस्टमेंट के अंदर ग्रोथ में जाहिर है कंपनी को ग्रो होना चाहिए यानी उसका प्रॉफ़िट इंक्रीज होना चाहिए जिसके नतीजे में उसकी शेयर प्राइस ऊपर जानी चाहिए। लेकिन अगर पिछले चार-पांच सालों में कंपनी में कोई खास ग्रोथ नज़र नहीं आ रही तो इसका मतलब है कि कंपनी पिछले 4-5 सालों से बिज़नेस में जितना भी पैसा वापस री-इन्वेस्ट कर रही है वो सारा पैसा एक तरह से बर्बाद हो रहा है। अगर पिछले चार-पांच सालों से कंपनी का प्रॉफ़िट नहीं बढ़ रहा तो इसका मतलब है कि 60% प्लॉ बैक का कंपनी को शेयरहोल्डर्स को कोई फ़ायदा नहीं हो रहा। यानी कंपनी की मैनेजमेंट को समझ ही नहीं आ रही कि पैसा बिज़नेस में कहाँ और कैसे खर्च करना है जिसका मतलब है कि इस कंपनी का शेयर बेचने में ही भलाई है क्योंकि यहाँ आपका पैसा ग्रोथ नहीं होगा। और वो इसलिए ग्रो नहीं होगा क्योंकि आप आगे और कोई और अच्छी अपॉर्चुनिटी की तलाश में निकल जाएंगे और जब वह शेयर बेचेंगे तो उसके नतीजे में शेयर प्राइस नीचे आ जाएगी और बेशक कंपनी यहाँ कोई डिविडेंड दे रही हो लेकिन उसका फायदा नहीं है क्योंकि स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करने का फायदा ही तब है जब आपको डिविडेंड भी मिले और कैपिटल गेन भी। डिविडेंड बेसिकली ना मिले लेकिन कम से कम कैपिटल गेन बहुत ज्यादा जरूरी है यानी बेसिकली आपको डिविडेंड ना दे कंपनी लेकिन टाइम टू टाइम आपके शेयर की प्राइस लॉन्ग टर्म में ऊपर जानी चाहिए और वो तभी जाती है जब कंपनी का प्रॉफ़िट इंक्रीज हो।

तो अब बात आई कि हम पे आउट रेशियो कैलकुलेट कैसे करें? तो इसके फॉर्मूलेस काफ़ी इज़ी हैं। पे आउट का फॉर्मूला है डिविडेंड बाय अर्निंग पर शेयर यानी कंपनी है जो एक शेयर में ₹20 डिविडेंड दे रही है और उसकी अर्निंग पर शेयर ₹50 है तो 20 को 50 से डिवाइड कर देंगे तो आंसर आएगा 0.4 यानी कि कंपनी का पे आउट 40% है। प्लॉ बैक का फॉर्मूला है 1 - पायो तो आंसर आएगा 0.6 यानी 60%। लेकिन यहाँ एक और चीज का भी ध्यान रखना चाहिए कि कभी-कभी कंपनी अपने शेयरहोल्डर्स को खुश करने के लिए कर्जा लेकर डिविडेंड दे देती है या अपने बैंक अकाउंट में पड़े हुए पैसों से डिविडेंड दे देती है। यानी एक कंपनी है जिसने साल का ₹30-40 रुपए डिविडेंड देना है तो ज़ाहिर है हर साल इन्वेस्टर इतना डिविडेंड एक्सपेक्ट कर रहे होंगे। लेकिन अगर किसी साल कंपनी अच्छा परफॉर्म नहीं करती तो वो कर्जा लेकर डिविडेंड दे देगी या अपने बैंक में पड़े हुए पैसों से डिविडेंड दे देगी। मतलब एक कंपनी है जिसने एक शेयर पर ₹40 डिविडेंड दिया है लेकिन उस साल उसकी अर्निंग पर शेयर ₹25 है तो यह पे आउट रेशियो निकल के आएगी ₹25 हैं तो उसने ₹40 डिविडेंड कैसे दे दिया? जाहिर है यह अपने बैंक में पड़े हुए पैसों से डिविडेंड दिया है और शेयरहोल्डर्स खुश हो जाते हैं कि कंपनी प्रॉफिट में गई है हालांकि ऐसा नहीं है। मिसाल के तौर पे साल 2016 में यूनिलीवर ने अपनी 1178% पे आउट किया था यानी 2016 में यूनिलीवर की अर्निंग पर शेयर थी तकरीबन ₹207 और कंपनी ने डिविडेंड पर शेयर दिया था तकरीबन ₹370 रुपए। तो जब कंपनी ने एक शेयर पे कमाए ही ₹207 हैं तो ₹370 डिविडेंड कैसे दे दिया? इस साल यूनिलीवर ने अपने बैंक में पड़े हुए पैसों से डिविडेंड दिया था। लेकिन 2016 के बाद कंपनी वापस प्रॉफिट में चली गई थी और 2017 में पे आउट रेशियो 93% पे आ गई थी। लेकिन कोई बड़ी कंपनी ज़्यादा पे आउट कर सकती है लेकिन अगर कोई छोटी कंपनी ऐसा करें तो उसके लिए उसे रिकवर करना जरा मुश्किल हो सकता है। इन्वेस्ट नहीं करना चाहिए बल्कि पूरी एनुअल रिपोर्ट पढ़कर, कंपनी की हिस्ट्री देख के हर चीज को एनालाइज करके फिर डिसीजन लेना चाहिए कि इस कंपनी में इन्वेस्टमेंट है या नहीं।