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जमाना एक अदीम की बात है। किसी जगह एक सुल्तान अहमद था जो अपनी रायत को बहुत सताता रहता था। उसने आवाम को लूट लूट कर सोने, चांदी और लाल जवाहरात की इतनी दौलत बटोर ली थी कि अब उसकी समझ में ना आता था कि इस दौलत का क्या किया जाए।
एक दिन उसने अपने मुल्क के बेहतरीन कारीगरों को इकट्ठा करके उनको हुक्म दिया। एक सुनहरी झाड़ी का दरख्त बनाओ। इसका तना हीरे का, शाखें, याकूद की, पत्तियां जामरूद की और फल मोंंगे के हो। इसकी पत्तियां इतनी घनी हो कि सूरज की एक किरण भी उनके बीच से ना गुजर सके।
सुल्तान की यह हिदायत सुनकर रायत में हलचल मच गई। लोग कहने लगे जब तक यह झाड़ी बनकर तैयार हो जाएगी, सुल्तान शायद हमें बिल्कुल नंगा कर देगा और भूखों मरने पर मजबूर कर देगा। मगर सुल्तान ने नाराजगी जाहिर करने वालों को सख्त सजाएं दी। किसी की गर्दन काट दी तो किसी को जिंदा दरिंदों के पास फेंक दिया। इस तरह उसने लोगों के मुंह बंद कर दिए।
3 साल के अंदर वह झाड़ी बनकर तैयार हो गई। सुल्तान ने अपना पलंग इस झाड़ी के नीचे रखवा दिया और रातों को वहीं सोने लगा। एक दिन सुबह को वह बीदार हुआ तो उसने अपने दाएं गाल पर सूरज की गर्मी महसूस की। उसने आंखें खोली तो क्या देखता है कि झाड़ी की जामरूद की पत्तियों से नीले आसमान का एक छोटा सा टुकड़ा नजर आ रहा है और इस छोटे से सुराख से सूरज की एक किरण उसके गाल पर पड़ रही है।
सुल्तान गरज उठा। अरे कोई चोर मेरी झाड़ी की एक पत्ती छीन ले गया है। जो कोई इस चोर को पकड़ कर लाएगा उसको मैं एड़ी से छोटी तक सोने से लाद दूंगा। सुल्तान के दाएं हाथ के मंत्री ने मशवरा दिया। सुल्तान आलम रात को झाड़ी के अर्धगिर्द 40 पहरीदार खड़े कर दीजिएगा। वह चोर को जरूर पकड़ लेंगे। मंत्री की बात सुल्तान को पसंद आई और उसने ऐसा ही किया। 40 हथियार बंद पहरीदार झाड़ी की निगाहबानी करने लगे। मगर आधी रात के वक्त वह सब के सब खड़े ही खड़े सो गए।
सुबह को सुल्तान की आंख खुली तो उसने देखा कि झाड़ी की पत्तियों के बीच जो छोटी सी खुली जगह थी वह बढ़कर दो गुनी हो गई है। सुल्तान को इतना गुस्सा आया, इतना गुस्सा आया कि उसके सर का एक-एक बाल सुई की तरह खड़ा हो गया। जल्लाद सुल्तान ने गला फाड़ कर पुकारा। काले कपड़ों में मलबूस 14 जल्लाद काले गधों की तरह आ हाजिर हुए और अपनी तलवारें नंगी करके एक आवाज में कड़क कर पूछा, किसकी मौत आई है? किसका सिर तन से जुदा किया जाए। इन सबको कत्ल कर दो। सुल्तान ने पहरीदारों की तरफ इशारा करते हुए कहा।
मगर दाएं हाथ के मंत्री ने कहा सुल्तान आलम अगर रोज 40 सिपाहियों की गर्दनें काटते रहेंगे तो थोड़े ही दिनों में आपकी फौज ही खत्म हो जाएगी। बेहतर होगा कि आप इन सबको जिंदा दरिंदों के पास फेंक दें और झाड़ी के आसपास दूसरे पहरीदार खड़े कर दें। ऐसा ही किया गया। इन 40 पहरीदारों को जिंदा दरिंदों के पास फेंक दिया गया।
सुल्तान के तीन जवान बेटे थे। सबसे बड़े बेटे ने बाप से कहा, अब्बा जान आप इजाजत दें तो आज रात मैं झाड़ी के पास पहरा दूं। मैं चोर को जरूर पकड़ लूंगा। सुल्तान राजी हो गया। रात शुरू हुई तो सबसे बड़ा शहजादा पहरा देने लगा। आधी रात तक तो वह झाड़ी के पास खड़ा पहरा देता रहा। मगर फिर उसकी आंख लग गई। सुबह को आंखें खोलते ही सुल्तान ने देखा कि झाड़ी की पत्तियों के बीच जो सुराख था वह कई गुना बड़ा हो चुका है। उसने फौरन ही अपने बड़े बेटे को मौत की सजा सुना दी।
अब सुल्तान के मंझले बेटे ने अपने बाप से कहा अब्बा जान अब मैं झाड़ी के पास पहरा दूंगा। अगर मैं चोर को ना पकड़ सका तो भाईजान के साथ मुझे भी कत्ल करवा दीजिएगा। मगर मंझले शहजादे को भी कामयाबी नसीब ना हुई। आधी रात के बाद उस पर भी नींद गालिब आ गई। सुबह होते-होते पत्तियों के बीच एक और खाली जगह बन गई जो कमोबेश थाली जितनी बड़ी थी। मारे गौस के सुल्तान की आंखें जैसे माथे पर चढ़ गई। बिल्कुल उस बिल्ली की तरह जिसकी ह्क में चरबा का कोई बड़ा सा टुकड़ा अटक जाता है।
जल्लाद सुल्तान ने पुकारा। मगर इसी में सबसे छोटा शहजादा बोल उठा। अब्बा जान आप इजाजत दें तो तीर का मैन लेकर मैं झाड़ी की हिफाजत करूं। मैं चोर को तीर चलाकर मार डालूंगा। सुल्तान ने इजाजत दे दी। अंधेरा छा गया तो छोटा शहजादा तीर कमान संभाल गोरी से इधर-उधर देखता हुआ झाड़ी के नीचे पहरा देने लगा। आधी रात के वक्त उसे नींद आने लगी तो उसने छुरी से अपनी एक उंगली थोड़ी सी काटकर जख्म पर नमक और मिर्च छिड़क दी और दर्द ने नींद को कोसों दूर भगा दिया।
फजल फटने से थोड़ा सा पहले अचानक एक अजीब और गरीब किस्म का परिंदा कहीं से उड़ता हुआ आया और झाड़ी पर बैठ गया। वह चोंच से लेकर पंजों तक सारा का सारा अलग-अलग किस्म के हीरे जवाहरात का था। झाड़ी की एक टहनी पर बैठकर वह परिंदा इस तरह चहचहाने लगा कि जमीन और आसमान गूंज उठे। शहजादे का बिल्कुल जीना चाहता था कि इस अदीम मसाला मुगनी पर तीर मारे। मगर उसने जी कड़क कर उस पर तीर चला दिया। उसके हाथ हालांकि कांप गए और तीर परिंदा को सिर्फ छू कर निकल गया। उसके बाजू का बस एक पंख उखड़ कर नीचे गिर पड़ा। परिंदा उड़ गया।
सुबह को सुल्तान बेदार हुआ तो छोटा शहजादा एक हाथ में तीर कमान संभाले और दूसरे हाथ में परिंदा का वह पंख लिए उसके पास आया और कहा यह लीजिए इस परिंदे का पंख जो रोज रात को हमारी झाड़ी की पत्तियां तोड़कर ले जाता था। वह एक तोता-ए शहर है। मगर मैं उसे मार ना सका। उसका नगजमा इतना शरण था कि मेरे हाथ लरज गए और मैं उसका एक पंख ही गिरा सका। सुल्तान ने वह पंख हाथ में लेकर देखा तो उसका मुंह खुला का खुला रह गया। यह एक पंख इस सारी दौलत से भारी था जो सुल्तान टैक्सों की शक्ल में अपने सारे मुल्क से सात सालों में वसूल करता रहा था।
सुल्तान बहुत खुश हुआ और जिंदा दरिंदों के पास पड़े हुए सिपाहियों और अपने दोनों बेटों को रिहा कर देने का हुक्म दे दिया। उसी दिन उसने सारे शहर में यह ऐलान करवाया जो कोई इस परिंदे को पकड़ कर लाएगा वह मेरे साथ तख्त पर बैठेगा और मेरे साथ सारे मुल्क पर हुकूमत करेगा। मगर अगर परिंदा को कोई भी पकड़ कर ना ला सका तो मैं सारे शहर को जलाकर राख कर दूंगा।
सुल्तान के बड़े बेटे और मंझले बेटे ने अपने हाथ सीनों पर रखकर झुककर सुल्तान को सलाम किया और कहा अब्बा जान इजाजत दीजिए तो यह काम हम अंजाम दें। सुल्तान राजी हो गया। दोनों शहजादों ने ताज़िर जैसे कपड़े पहन लिए और घोड़ों पर सवार होकर शहर से निकल गए।
तीन दिन गुजर गए। सबसे छोटे शहजादे को ख्याल आया। मेरे दोनों भाई तो इस परिंदे को पकड़ने से रहे और मुमकिन है कि अब्बा जान गुस्से में सच में ही सारे शहर को मटा कर रख दें। मुझे भी जाना चाहिए। यह सोचकर वह अपने बाप के पास गया और कहा अब्बा जान मुझे भी मौका दीजिए कि आपकी खिदमत करूं। मैं बहुत चाहता हूं कि इस जादुई परिंदे को पकड़ कर लाऊं। मैं तो चला ही जाऊंगा। चाहे आप इजाजत दें या ना दें। सुल्तान बिल्कुल ना चाहता था कि छोटा शहजादा भी चला जाए। मगर वह अपनी बात पर अड़ा रहा तो मजबूर होकर हां करना पड़ा।
छोटा शहजादा सफर पर निकला और अपने घोड़े को सरपट दौड़ाते हुए एक हफ्ते में अपने भाइयों को जा लिया। अब तीनों एक साथ चलने लगे। चलते-चलते वे एक ऐसे मकाम पर पहुंचे जहां से तीन तरफ को रास्ते जाते थे। जहां से यह तीनों रास्ते शुरू होते थे, वहां एक-एक पत्थर पड़ा हुआ था। इनमें से एक पत्थर पर लिखा था। जो इस रास्ते पर जाएगा, वह जरूर लौट कर आएगा। दूसरे पत्थर पर लिखा था जो इस रास्ते पर चलेगा उसको खतरे का सामना करना पड़ेगा और तीसरे पत्थर पर लिखा था जो इस रास्ते पर चलेगा वह लौट कर ना आएगा।
बड़े भाई ने पहला रास्ता एक हथियार किया मंजले भाई ने दूसरे रास्ते पर चला और सबसे छोटे भाई के लिए तीसरा रास्ता रह गया जिसके पत्थर पर लिखा था कि जो इस रास्ते पर चलेगा वह लौट कर ना आएगा। थोड़ी दूर चलने के बाद मंझले भाई को डर लगने लगा और वह अपना रास्ता छोड़कर बड़े भाई से जा मिला। यह दोनों चलते-चलते एक अजनबी शहर में पहुंच गए। घोड़ों से उतरे। एक दुकान से एक-एक प्याला दही लिया और धूप में बैठकर खाने लगे। खा चुके तो वहीं बैठे-बैठे एक दूसरे के बालों में कंघी करने लगे।
बिल्कुल सामने सुल्तान का महल था। शहजादी अपने कमरे से निकलकर ऊपरी बरामदे में आई तो उसकी नजर इन दोनों भाइयों पर पड़ी। उसने सोचा यह कितने बेअदब हैं कि मेरे सामने बैठकर बालों में कंघी कर रहे हैं। वह एक सेब खा रही थी। झुंझुलाकर उसने वह सेब इन दोनों पर फेंक दिया। सेब ठीक ना पड़ा। यानी बड़े भाई के ठीक सर पर आ लगा। उसने सर उठाकर देखा तो सामने बालकोने में एक हसीन लड़की दिखाई दी। उसने सोचा मालूम होता है कि इस हसीना को मुझसे मोहब्बत हो गई है। यह सोचकर वह अपने छोटे भाई के साथ अपनी जगह पर डटा रहा।
शाम को शहजादी की एक कनीज उनके पास आकर सख्त लहजे में कही। तुम लोग यहां क्यों बैठे हो? चले क्यों ना जाते? बड़े भाई ने जवाब दिया। शहजादी को मुझसे मोहब्बत हो गई है। यहां तक कि उसने मेरे लिए सेब का एक टुकड़ा फेंका। मुझसे हंसी बोली। भला अब मैं कैसे चला जाऊं? जल्दी से यहां से दफा हो जाओ। नहीं तो शहजादी गुस्से में आकर तुम लोगों की गर्दन कटवा देगी। कनीज ने कहा, दोनों भाई घबराकर तुरंत वहां से खिसक गए।
वह दोनों उसी शहर में रहने लगे। उनको कोई काम करना ना आता था। उनके पास जो कुछ भी था, उसे उन्होंने कुछ दिनों में ही खा पीकर खत्म कर दिया। अब नौबत यहां तक आ गई कि वह रातों को सड़कों पर सोने लगे। तब वह लाचार होकर लोगों की चाकरी करने लगे। बड़ा भाई एक कहवा खाने में नौकर हो गया। उसका काम ग्राहकों को कहवा नान वगैरह लाकर देना था। मंजला भाई एक तंदूर खाने के चूल्हे में लकड़ियां डालने का काम करने लगा।
अब उनको यहां छोड़कर जरा छोटे भाई का हाल सुनिए। छोटा भाई दिन रात बराबर चलता रहा। दरियाओं को पार करता, झीलों को पीछे छोड़ता, रेगिस्तानों से गुजरता और पहाड़ों को पार करता हुआ बराबर आगे बढ़ता रहा। उसके पास जो खाना था वह खत्म हो गया। सिर्फ एक सूखी रोटी बाकी रह गई। वह चलते-चलते आखिरकार एक चश्मे तक पहुंचा जिसके किनारे एक बहुत बड़ा और घना चरख्त था। उसने घोड़े से उतर कर उसे चार के तने से बांध दिया। थैले में जो सूखी रोटी पड़ी थी उसको निकाला और चश्मे के पानी में भिगोकर खाने ही वाला था कि दफतन दूर से एक गर्द और धुआं का बादल सा नजर आया। गौर से देखने पर पता चला कि एक बहुत ही बड़ा बंदर सरपट दौड़ता हुआ उसी तरफ आ रहा है।
यह देखकर शहजादा डर गया और रोटी वहीं छोड़कर दरख्त पर चढ़ गया। बंदर दौड़ता हुआ आया और रोटी पर टूट पड़ा। देखते ही देखते उसे खा गया। फिर अपना मुंह फिराया और निगाहें उठाकर इंसान की बोली में शहजादे से कहा, नीचे उतर आओ। शहजादे ने सोचा कि रोटी से उसका पेट ना भरा मुझको भी खा जाना चाहता है। यह सोचकर वह और ऊपर चढ़ गया। बंदर भी नीचे की एक शाख पर चढ़ गया और शहजादे से मुखातिब होकर कहा ऐ आदमजाद नीचे उतर आओ। यहां आदमी चले तो पैर जले। परिंदा उड़े तो पर जले। ऐसी जगह तुम कैसे आ गए?
शहजादा दरख्त से नीचे उतर आया और सारा किस्सा बंदर को सुना दिया। आखिर में उसने बहुत उदास होकर कहा अगर मैं इस तोताए शहर को ढूंढ ना पाया तो मेरे बाप सारे शहर को राख का ढेर बना देंगे। कहते हैं कि जिसने तुम्हें एक बार रोटी खिलाई हो उसे 40 बार झुक कर सलाम करो। बंदर ने कहा मैंने तुम्हारी रोटी ना खाई होती तो अच्छा था। मगर अब खा चुका हूं तो तुम्हारे एहसान का बदला चुकाना ही पड़ेगा। चलो अपने घोड़े पर सवार हो जाओ। किस्मत ने साथ दिया तो हम दोनों इस परिंदे को जरूर ढूंढ लेंगे और शहर को तबाही से बचा लेंगे।
वह दोनों घोड़े पर सवार होकर चल पड़े। चलते-चलते वह एक बाघ तक पहुंचे जो एक ऊंची दीवार से घिरा हुआ था। दोनों घोड़े से उतरे। बंदर ने शहजादे से कहा, "मैं इस दीवार के नीचे से एक सुरंग खोद दूंगा। तुम पांच दिन तक मेरा इंतजार करो। अगर मैं इस अवधि में ना लौटा, तो तुम जहां से आए हो, वहीं लौट जाना।" यह कहकर बंदर सुरंग खोदने लगा।
पांच दिन गुजर गए। छठे दिन बंदर वापस आ गया और उसने शहजादे से कहा, मैंने इस पंजरे के नीचे तक सुरंग खोद दी है जिसमें सात पर्दों के अंदर वही तोता-ए शहर बंद है। तुम सुरंग के इस सिरे तक पहुंचकर पहरीदार के सो जाने का इंतजार करो। जब वे सो जाएं तो तुम पंजरे को उठाकर वापस चले आना। मगर देखो पंजरे पर पड़े हुए पर्दे को ना हटाना।
शहजादे ने बंदर की बातें खूब अच्छी तरह जहन नशीन कर ली और जमीनदोज रास्ते पर चल दिया। मंजिल पर पहुंचकर वह पहरी के सोने का इंतजार करने लगा। जब दसों पहरीदार सो गए तो वह उनके पास से गुजर कर पंजरे तक पहुंच गया और उसे उठा लिया। अचानक उसने सोचा कि पंजरे के अंदर कहीं कोई दूसरा परिंदा तो नहीं है। यह ख्याल आते ही बंदर की नसीहत भूलकर वह पंजरे का पर्दा उठाने लगा। सबसे ऊपरी पर्दा थोड़ा सा ही उठाया था कि दफतन पर वह जोर से चहचहा उठी कि वह बुत बनकर खड़ा रह गया और पंजरा उसके हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ा। पहले जाग गए। उन्होंने शहजादे को पकड़ लिया और ले जाकर सुल्तान के पास खड़ा कर दिया।
सुल्तान ने फौरन जल्लादों को बुलाकर हुक्म दिया। इसके दोनों हाथों को कोहनी तक काट डालो। मगर सुल्तान के मंत्री ने इससे कहा सुल्तान आलम आप इस नौजवान को सजा देने में जल्दबाजी ना कीजिए। आइए पहले इससे यह पूछ लें कि आखिर इसको इस परिंदे की क्या जरूरत थी। सुल्तान राजी हो गया। शहजादे ने उसे सारा किस्सा कह सुनाया। इसके बाद मंत्री ने सुल्तान से कहा, "अगर हमने एक परिंदा की खातिर इस बहादुर नौजवान को कत्ल कर दिया, तो दुनिया में हमारी रुसवाई होगी।" बेहतर होगा कि आप इसको कोई मुश्किल काम बता दें।
मंत्री की बात सुल्तान को पसंद आई और उसने शहजादे से कहा, जिस तरफ सूरज गरूब होता है, तुम उस तरफ चलो। घोड़े पर 9 महीने चलने के बाद एक शहर मिलेगा। उस शहर के सुल्तान की बेटी सोने के एक संदूक में सोती है। तुम उस लड़की को लाकर मुझे दोगे तो मैं तुम्हें यह तोता-ए शहर दे दूंगा।
शहजादा बंदर के पास लौट आया और तमाम बातें बता दी। वह दोनों फिर घोड़े पर सवार होकर चल पड़े। 9 महीने तक बराबर चलते रहे और आखिरकार एक शहर के पास पहुंच गए। वह शहर के बाहर एक मैदान में रुके और बंदर सुरंग खोदने लगा। 9 दिनों और नौ रातों के बाद वह अपना काम पूरा करके शहजादे के पास लौट आया और उससे कहा, जिस महल में सुल्तान की बेटी रहती है, वहां तक मैंने सुरंग बना दी है। तुम इस रास्ते से जाकर महल में दाखिल हो जाओ। फिर 40 चीड़े चढ़कर और 40 कमरों से गुजर कर ऊपर दालान में आ जाना। मलिका ए हसीना वहीं 40 कनीजों के घेरे में सोने के एक संदूक के ऊपर बैठी रहती है। नींद आने लगती है तो वह संदूक का ढक्कन खोलकर उसके अंदर लेट जाती है। तुम पहले संदूक के अंदर देख लेना कि शहजादी की आंखें बंद हैं या खुली हुई हैं। आंखें खुली हो तो सो रही हो तो संदूक को उठाकर चल देना। मगर अगर उसकी आंखें बंद हो तो रहने देना।
बंदर ने जैसा कहा था वैसे ही शहजादा महल में दाखिल होकर ऊपरी दालान तक पहुंच गया। दरवाजे से झांक कर देखा तो शहजादी संदूक के ऊपर बैठी हुई थी और उसके चारों ओर 40 कनी मौजूद थी। शहजादी इतनी हसीन थी कि जो देखता होश और हवास खो बैठता। थोड़ी देर के बाद शहजादी संदूक के अंदर लेट गई। कनी भी संदूक के चारों ओर सो गई। तब शहजादा ने दबे पांव जाकर संदूक के अंदर देखा। शहजादी की आंखें बंद थी। यह देखकर शहजादे को चुपके से खिसक जाना चाहिए था। मगर शहजादी का हुस्नो जमाल देखते ही वह बेकाबू हो गया और बंदर की नसीहत भूलकर शहजादी के ऊपर झुकता हुआ उसे चूमना चाहा। उसकी सांसों की गर्मी से शहजादी के चेहरे पर बादल छा गए और उसने अपनी आंखें खोल दी।
शहजादे को देखते ही उसने चीख कर पूछा तू कौन है? तुझे क्या चाहिए? चीख सुनकर कनी जाग गई। उन्होंने शहजादे को पकड़ लिया और मशकीजा कसकर उसे सुल्तान के पास ले गई। सुल्तान ने गुस्से में आकर इसके कत्ल का हुक्म दे दिया। मगर उसके मंत्री ने कहा जहां पनाह अगर हमने इसे कत्ल कर दिया तो सुबह होते यह खबर सारे शहर में फैल जाएगी। फिर हम दुनिया को क्या मुंह दिखाएंगे? बेहतर होगा कि आप इसको कोई मुश्किल सा काम बता दें।
सुल्तान राजी हो गया और उसने शहजादे से कहा। मैंने सुना है कि यहां से 9 महीने की दूरी पर बहरा एक खजर है और इसके बीचोंबीच अलमास का एक टापू है। वहां अर्जुकी नाम का एक जादूगर रहता है जिसके पास स्याह शाहीन नाम का एक घोड़ा है। वह घोड़ा एक महीने का रास्ता पलकों की झपक में तय कर लेता है। तुम वह घोड़ा लाकर मुझे देना और मेरी पेटी को ले जाना।
शहजादा बंदर के पास लौट आया और आठ आंसू रोते हुए सारा कस्सा उसको सुना दिया। बंदर ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, "शहजादे, तुम परेशान मत हो। किस्मत ने साथ दिया तो मैं घोड़ा तुम्हें दिला दूंगा। दोनों फिर चल पड़े। वह रेगिस्तान, ब्याबान और पहाड़ों को पार करते हुए चलते गए और आखिरकार एक बेज़मीर समंदर उनके सामने नजर आया। इसको देखकर शहजादा उदास हो गया और उसने बंदर से कहा, "हम इसको कैसे पार करेंगे? डूब कर मर ना जाए।"
बंदर ने उसे तसल्ली दी। हर काम में दिल मजबूत करके लग जाना चाहिए। घबराने की कोई जरूरत नहीं। यह कहकर बंदर समंदर के नीचे एक सुरंग खोदने लगा। 40 दिन बीते, 40 रातें गुजरी तो वह अपना काम पूरा करके वापस आया और शहजादे से कहा, "मैंने घोड़े की अगली टांगों के नीचे तक जमीन दोज रास्ता बना दिया है। सुरंग के इस सिरे पर पहुंचकर सुराख से अपना सिर बाहर निकालना। तुम्हें देखकर घोड़ा हिनहिनाए नहीं लगेगा। यह सुनकर जादूगर अपने बिस्तर से उठकर घोड़े के पास आएगा और उसे एक कोड़ा मारकर वापस चला जाएगा। उसके जाने के बाद तुम दोबारा सुराख से अपना सिर बाहर निकालना। घोड़ा फिर हिनहिनाएगा। फिर जादूगर आएगा और उसे एक कोड़ा मारकर वापस चला जाएगा। तब तुम आहिस्ता से बाहर निकल आना। और इससे पहले कि घोड़ा हिनहिनाए। तुम उसका मुंह किशमिश वाले इस थैले में ठूस देना और इससे कहना सदे अफसोस स्याह शाहीन तुम कब तक इस जालिम के हाथों मारपीट खाते रहोगे यह कहकर फौरन घोड़े को लेकर वहां से निकल जाना रेन लगाम वगैरह की फिक्र मत करना जल्दी से खिसक लेना।
बंदर की बात ज़हन में बिठाकर शहजादा जमीन दोज रास्ते पर रवाना हो गया और सुरंग के इस सिरे पर पहुंचकर सुराख से अपना सिर बाहर निकाला आहट पकड़ कर घोड़े ने अपने कान खड़े कर लिए। तुम ऊपर उठा ली और बेचैन होकर नाचने लगा। फिर उसने शहजादे को देख लिया और जोर जोर से हिनहिनाने लगा। जादूगर आ गया। कद जैसे मीनार, दोनों कंधे जैसे चार के दरख्त, मुंह जैसे कोई गढ़ा, आंखें जैसे दो पुराने बोरी, नाक बिल्कुल तंदूर जैसी और किसी बहुत बड़े हाथी जैसा जिस्म। आते ही जादूगर यह कहते हुए घोड़े पर टूट पड़ा। लानत हो तुझ पर जलील कहीं का यहां कौन सा इंसान आ सकता है जिसकी तू बू पकड़ गया है यहां तो इंसान चले तो पैर जले परिंदा उड़े तो पर जले यह कहते हुए जादूगर ने घोड़े की पीठ पर एक खींच कर मारा और लौट गया। उसके चले जाने के बाद शहजादे ने दोबारा अपना सिर बाहर निकाला घोड़ा फिर हिनहिनाने लगा जादूगर फिर आया और घोड़े पर बरस पड़ अरे तुझे मौत आ जाए आखिर किस इंसान की ब पकड़ गया तू कहां है
वह इंसान चाहे आसमान पर हो या जमीन [संगीत] के नीचे, वह मुझसे बच ना सकता। पकड़ कर उसे कच्चा खा जाऊंगा।
जादूगर घोड़े को घोड़ा रसीद करके फिर [संगीत] चला गया।
तब शहजादा उछल कर ऊपर चढ़ा और जल्दी से आकर किशमिश का थैला घोड़े के सर से लटका दिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, "अरे यार, तुम कब तक इस जादूगर के दस्तेनगर रहोगे? कब तक इसकी मार खाते रहोगे?"
यह कहते हुए शहजादा उछल कर घोड़े पर चढ़ गया और उसे डांड लगा दी। घोड़े ने अपने सिर को [संगीत] झटका दिया और उड़ान को फड़फड़ाया। उसके दोनों तरफ पंख निकल आए और वह किसी [संगीत] चील की तरह आसमान की तरफ उड़ चला। उसके सुम के नीचे से एक बिजली सी कंडी जाकर जादूगर के माथे पर लगी और वह जाग उठा।
वो रोक जा, रोक जा चिल्लाता हुआ और अपने दोनों हाथ फैलाए घोड़े के पीछे दौड़ पड़ा। घोड़ा समंदर की तरफ उड़ने [संगीत] लगा। जादूगर उसके बहुत करीब पहुंच गया और उसकी दुम पकड़ने ही वाला था कि [संगीत] उसने अपनी पिछली टांगे जोर से झटक कर जादूगर के मुंह पर जबरदस्त [संगीत] दलती मारी। उसका मुंह सड़े गले पुराने कपड़े की तरह फट गया। वह समंदर के पानी में गिर पड़ा और डूब गया।
9 महीने का रास्ता घोड़े ने 9 दिनों में तय [संगीत] कर लिया। अचानक शहजादे ने देखा कि सोने वाले संदूक के अंदर सोती हुई शहजादी का शहर है और शहर के दरवाजे के सामने बंदर बैठा अखरोट तोड़-तोड़ कर खा रहा है।
"अब क्या करेंगे?" बंदर ने शहजादे से पूछा।
शहजादे ने जवाब दिया, "अब क्या करना है? अब घोड़े को देकर [संगीत] उसके बदले में लड़की को ले लेंगे।"
"अरे, तुम भी क्या बातें करते हो? भला ऐसे [संगीत] घोड़े को कैसे दे देंगे?"
"एक बात सुनो। मैं इकलाबाजी खाकर घोड़ा बन जाऊंगा। तुम दोनों घोड़ों [संगीत] को लेकर सुल्तान के पास जाना और इससे कहना कि इन घोड़ों में से किसी एक को चुन लो। सुल्तान मुझको चुन लेगा।"
बंदर क्लाबाजी खाकर एक [संगीत] घोड़ा बन गया। एक ऐसा घोड़ा जिसके आगे स्याह शाहीन नाम का घोड़ा एक गद्दे से भी गया गुजरा लगता था।
शहजादा दोनों घोड़ों को लेकर [संगीत] शाही महल की तरफ रवाना हुआ। सुल्तान अपने महल में बैठा हुआ था। खिड़की से दो [संगीत] काले रंग के बहुत खूबसूरत चमकते चमकीले घोड़ों को देखकर उसने अपने मंत्री से कहा, "इस आदमी को बुलाओ। इसके घोड़े हमें बहुत पसंद आ गए हैं। [संगीत] इसने बेचे तो हम खरीद लेंगे।"
शहजादे को सुल्तान के पास लाया गया। "तुम्हारे घोड़ों के क्या दाम है?" सुल्तान ने शहजादे से पूछा।
"मैं इनको नहीं बेचूंगा।" शहजादे ने जवाब दिया, [संगीत] "इनमें से एक को मैं आपको आपकी बेटी के बदले में दे दूंगा।"
"अरे बेवकूफ!" सुल्तान [संगीत] ने कहा, "घोड़े के बदले में लड़की भी दी जाती है?"
तब शहजादे ने कहा, "मालूम होता है कि आप अपनी कही हुई बात भूल गए हैं। [संगीत] आप ही ने तो कहा था कि स्याह शाहीन नाम का घोड़ा लाकर दूंगा तो मैं अपनी बेटी तुम्हें दे दूंगा।"
सुल्तान लाजवाब हो गया और उसने अपने मंत्री से पूछा कि अब क्या किया जाए? मंत्री ने कहा, "मर्द आदमी कोई बात कहकर उससे मुकर ना जाता। [संगीत] शेर जिस रास्ते से जाता है उस रास्ते से ना हटता। आपको अपना वादा पूरा करना पड़ेगा।"
सुल्तान ने शहजादे से कहा, "हम दोनों घोड़ों को ले लेंगे। एक का दाम सोने से चुकाएंगे और दूसरे के बदले में हम अपनी बेटी को दे [संगीत] देंगे।"
"आप अपनी बेटी को देकर इन घोड़ों में से किसी एक को ले लीजिए।" शहजादे ने जवाब दिया, "दूसरा मेरे पास रहेगा और आपकी बेटी इस पर सवारी [संगीत] क्या करेगी?"
"इन घोड़ों में से कौन सा ज्यादा अच्छा है?" सुल्तान ने अपने मंत्री से पूछा। मंत्री ने स्याह शाहीन को पसंद किया। मगर सुल्तान [संगीत] को बंदर का घोड़ा ज्यादा पसंद आया क्योंकि उसने बंदर के घोड़े को ले लिया और इसके बदले में अपनी बेटी को उसी संदूक के अंदर जिसमें वह सोती [संगीत] थी, शहजादे को दे दिया।
बंदर घोड़े को किसी तरह अस्तबल में तो ले आया गया, मगर उसने किसी तरह अपने आप को बांधने ना दिया। वह दोनों कान खड़े करके दुम ऊपर उठाकर [संगीत] अपनी बाग चबा उठता और करीब आने वाले की टांगों से मारने और काटने की कोशिश करता रहा। क्योंकि उसको अस्तबल के अंदर [संगीत] यूं ही खुला छोड़कर दरवाजे पर बाहर से आदमी के सिर जितना बड़ा ताला लगा दिया गया। अस्तबल की छत पर 40 पहरीदार [संगीत] खड़े कर दिए गए। खुद सुल्तान उसके पास अपना पलंग रखवाकर रात को वहीं सोया।
मगर रात को घोड़े ने फिर से बंदर की शक्ल अख्तियार कर ली। दीवार की एक दरार से बाहर आ गया और भाग खड़ा हुआ। सुबह हुई [संगीत] और सुल्तान ने रोशन दान से अस्तबल के अंदर झांका तो देखा कि घोड़ा गायब है। वह इधर-उधर दौड़ने और शोर मचाने लगा। मंत्री दौड़ता हुआ आया और सुल्तान को तसल्ली देने लगा।
"स्याह शाहीन जादूगर अर्जुकी का [संगीत] घोड़ा था और जादू का हुक्म तो अच्छी बुरी तमाम रूहों पर चलता है। शायद जादूगर अपने घोड़े को वापस [संगीत] ले गया है। इसी घोड़े के लालच में आज तक कितने ही सुल्तानों के सिर कट चुके हैं। आप परेशान ना हो। यही गनीमत है कि जादूगर [संगीत] ने हमें कोई नुकसान ना पहुंचाया। और यह बात भी है कि आपकी बेटी एक सुल्तान की मलिका बनने वाली है और घोड़ों में से [संगीत] एक उसके पास है।"
"अच्छा, अब इन्हें यहीं छोड़ दीजिए और शहजादे का हाल सुनिए।"
शहजादी को संदूक लेकर उड़ने वाले घोड़े स्याह शाहीन पर सवार शहजादा इस शाही बाग तक आ पहुंचा था, जहां तोता-ए [संगीत] शहर था। शहजादे ने देखा तो बंदर बाग की दीवार के पीछे बैठा अखरोट तोड़-तोड़ [संगीत] कर खा रहा था।
"अब क्या करेंगे?" बंदर ने शहजादे से पूछा।
"अब क्या करना है?" शहजादे ने [संगीत] जवाब दिया, "बस अब लड़की को देखकर तोताए शहर को ले लेंगे और घर चलेंगे।"
"अरे नादान!" [संगीत] बंदर ने कहा, "एक परिंदे के बदले में लड़की को कैसे दे दिया जाए? मुनासिब यह है कि मैं एक कलाबाजी [संगीत] खाकर एक लड़की बन जाऊं। ऐसी लड़की जिसके सामने यह शहजादी 9 साल की बूढ़ी से भी गई गुजरी लगे। तुम हमें दोनों को सुल्तान के पास ले जाना। सुल्तान मुझको चुन लेगा।"
"क्यों ना मैं अकेली ही सुल्तान के पास चली जाऊं?" शहजादे ने कहा।
"नहीं, ऐसा मत करना।" बंदर ने जवाब [संगीत] दिया, "ईमानदारी से काम लेना चाहिए। सुल्तान खुद पसंद कर ले ताकि बाद में उसे पछतावा [संगीत] ना हो।"
बंदर एक बहुत हसीन लड़की बन गया। शहजादा दोनों लड़कियों को लेकर महल के दरवाजे पर पहुंच गया। सुल्तान ने [संगीत] खिड़की से इसे देखा और किसी खादिम से कहा, "दरवाजे पर जो भी खड़ी खड़ा है, उसे कुछ दे दो।"
मगर मंत्री ने इससे कहा, "वह नौजवान कोई भी खड़ी [संगीत] नहीं है। यह तो वही शहजादा है जिसे आपने हसीन शहजादी को ले आने के लिए दूर मुल्क में [संगीत] भेजा था।"
सुल्तान ने शहजादे को अंदर बुलाया और इससे पूछा, "अच्छा तो बताओ। तुम हमारा बताया हुआ काम कर लाए?"
"जी हां हुजूर, कर लाया हूं।" शहजादे ने जवाब दिया।
"लड़की कहां है?" सुल्तान ने पूछा।
शहजादे ने कहा, "आपने एक लड़की को लाने को कहा था। मैं दो लड़कियां ले आया हूं। इनमें से जो आपको ज्यादा पसंद हो, ले लीजिए। [संगीत] दूसरी मेरे पास रहेगी।"
दोनों संदूक खोले गए। दोनों लड़कियां एक साथ उठी और खड़ी हो गई। इन दोनों का हुस्न ओ जमाल देखकर सुल्तान दंग रह गया। फिर सुल्तान ने अपने मंत्री से पूछा, "इनमें से [संगीत] किसको लिया जाए?"
मंत्री ने शहजादी की तरफ इशारा किया। मगर सुल्तान [संगीत] को वह लड़की ज्यादा पसंद आई जो असल में बंदर थी क्योंकि सुल्तान ने उसी को ले लिया और इसके बदले में तोता ए [संगीत] शहर के हवाले कर दिया।
शहजादा शहर से बाहर निकल आया। वह घोड़े स्याह शाहीन पर सवार [संगीत] हो गया और अपने एक घुटने पर शहजादी वाला संदूक और दूसरे घुटने पर तोता ए शहर को रखे घोड़े [संगीत] को उड़ाता हुआ अपने मुल्क की तरफ रवाना हो गया।
इधर सुल्तान ने बड़ी धूमधाम [संगीत] से बंदर शहजादी से शादी रचाई। यह धूमधाम एन ए उरू [संगीत] पर थी कि बंदर चुपके से उठी। अपनी असल शक्ल अख्तियार करके दीवार [संगीत] की एक दरार से बाहर आई और 9 दो 11 हो गई।
अब शहजादे का हाल सुनिए।
शहजादा अपने घोड़े को उड़ाता हुआ [संगीत] एक मुकाम पर पहुंचा जहां चार का एक पुराना दरख्त था। यहां पहुंचकर उसने देखा कि बंदर [संगीत] पहले ही से चार के नीचे बैठा अखरोट तोड़-तोड़ कर खा रहा है।
"अब क्या करेंगे?" बंदर ने पूछा।
"अब मैं अपने घर चला जाऊं?" शहजादे ने जवाब दिया।
बंदर ने कहा, "नहीं, पहले तुम मेरे साथ मेरे घर चलो। दो-चार रोज मेरे यहां मेहमान रहो, फिर अपने [संगीत] घर चले जाना।"
"तुम्हारा घर तो किसी पहाड़ पर कोई तंग और तारिक सुराख होगा। मैं उस सुराख में घुस भी ना पाऊंगा।" शहजादे ने [संगीत] जवाब दिया।
लंगूर हंस कर बोला, "अरे, अभी तक तुम्हें [संगीत] यह मालूम ना हो पाया कि मैं कौन हूं।"
शहजादा बंदर के साथ चल पड़ा। वह एक [संगीत] पहाड़ को पार करके एक बड़े फटक के सामने जा रखे जिस पर बहुत खूबसूरत नक्श और सोने के कंधे लगे [संगीत] हुए थे। अंदर दाखिल हुए तो शहजादे ने देखा कि एक निहायत ही उम्दा बाग है। चारों तरफ रंग बिरंगे खूबसूरत गुलाब [संगीत] के फूल खिले हुए हैं। चिड़ियाओं चहचहा रही हैं। नाले में साफ-साफ पानी बह रहा है। एक तरफ एक [संगीत] छोटा सा तालाब है और उसके ऊपर बिद मजनून झुका हुआ है। दरख्तों पर कई किस्म के फल पक गए हैं और टिप टिप कर रहे हैं। बाग के चारों कोनों में चार [संगीत] मकान हैं जो सब सोने के बने हुए हैं और हर एक में 40 कमरे हैं। हर कमरे में नौ उम्र परियां बैठी हैं, लिखने पढ़ने में मशरूफ हैं।
बंदर ने एक कलाबाजी खाई और अब वह एक निहायत ही खूबसूरत परी बन गई। ऐसी खूबसूरत लड़की जो शायद ही कभी किसी मां ने जन्म दिया हो। [संगीत]
शहजादा तीन दिन तक परी के पास मेहमान रहा। चौथे दिन वह जाने लगा तो [संगीत] परी ने अपनी छोटी से एक बाल तोड़कर उसे दिया और कहा, "कभी तुम्हें किसी मुश्किल का सामना हो जाए [संगीत] तो इस बाल के एक सिरे को जला देना। मैं फौरन हाजिर हो जाऊंगी।"
शहजादे ने परी से पूछा, "तुमने मेरे ऊपर इतना एहसान किया, मेरी बराबर मदद करती रही। इसकी क्या वजह है?"
तब परी ने बताया, [संगीत] "जिस दिन तुमसे मेरी मुलाकात हुई, उससे बहुत दिन पहले एक दफा मैंने फल देखा था। तो मुझ पर यह खुला था कि जहां सूरज गरूब होता है, वहां एक मुल्क है जिसका सुल्तान बहुत [संगीत] ही जालिम है। वह अपनी रायत को भूखों मारकर हीरे जवाहरात का एक झाड़ी [संगीत] का दरख्त बना रहा है। जब यह झाड़ी बनकर तैयार हो जाएगी तो एक दिन उसी [संगीत] झाड़ी के खातिर वह सारे शहर को मिटाने पर तुला जाएगा। इस सुल्तान के तीन बेटे हैं। सबसे छोटा बेटा सोचेगा कि अगर इस झाड़ी [संगीत] की वजह से बाप ने सारे शहर को तबाह और बर्बाद कर दिया तो यह बदतरीन बात होगी और इरादा कर लेगा कि मैं इस परिंदे को जरूर पकड़ कर लाऊंगा [संगीत] जो इस झाड़ी की पत्तियां छीन कर ले जाता है। जब मुझ पर यह सब राज खुला [संगीत] तो मैंने सोचा कि यह नौजवान गरीब लोगों की खातिर अपनी जान तक कुर्बान करने पर तैयार है तो मैं किस तरह यहां तख्त पर बैठी खुशियां [संगीत] मनाती, गुलझड़े उड़ाती रहूं? क्योंकि मैं सात साल तक बराबर तुम्हें तलाश करती रही और आखिरकार तुम मिल ही गए।"
शहजादे ने परी का शुक्रिया [संगीत] अदा किया और उसे अलविदा कहकर शहजादी को साथ ले और तोता-ए शहर वाले पंजरे को उठाए अपने रास्ते पर रवाना हो गया।
चलते-चलते शहजादा [संगीत] उस मकाम पर पहुंचा जहां वह अपने भाइयों से जुदा हुआ था। उसने अपने घोड़े को रोक लिया और सोचने लगा, "मेरे भाई अब कहां होंगे? क्यों ना मैं उन्हें तलाश कर लूं?" यह तय करके वह एक गुफा की तरफ चला। लड़की और परिंदे वाले पंजरे को उस गुफा के अंदर छोड़कर खुद उस रास्ते पर [संगीत] चल दिया जिस पर उसका बड़ा भाई गया था।
चलते-चलते वह एक शहर में पहुंचा। एक कहवा खाने में उसने देखा कि [संगीत] उसका बड़ा भाई ग्राहकों की सेवा करता फिर रहा है। शहजादे ने घोड़े पर बैठे-बैठे कहवा खाने [संगीत] के मालिक से पुकार कर कहा, "अरे कहवा खाने वाले, जरा अपने इस नौकर से मेरे लिए खाना और कहवा सामने की कारवा सराय में भेज देना।"
कहवा खाने के मालिक [संगीत] ने अपने नौकर को बुलाकर कहा, "यह ले, इस सामने की कारवा सराय में दे आ। देख, जरा संभाल कर ले जाना। कहीं गिरा ना दे।" यह कहते हुए उसने नौजवान के गाल पर एक थप्पड़ रसीद किया।
खाना लेकर वह अपने छोटे [संगीत] भाई के पास आया तो छोटे भाई ने उससे कहा, "आइए, बैठ जाइए और यह खाना आप खुद खाइए।"
"नहीं, मैं ऐसा ना करूंगा। [संगीत] मालिक नाराज हो जाएगा।" बड़े भाई ने कहा।
छोटे भाई ने इसरार किया, "डरिए मत। वह नाराज ना होगा।"
बड़ा भाई बैठ गया और खाने लगा। खा चुका तो छोटे भाई ने उससे पूछा, "आप कहां के रहने वाले हैं?"
"मैं कहवाने में नौकर हूं। [संगीत] यहीं का रहने वाला हूं। यहीं पैदा हुआ हूं।" बड़े भाई ने जवाब दिया।
छोटे भाई ने कहा, "मुझसे छुपाने की [संग संगीत] जरूरत नहीं। मैंने आपको पहचान लिया है। आप सच बता दें तो मैं आपको आपके वतन पहुंचा कर दूंगा।"
बड़ा भाई रो पड़ा और [संगीत] अपनी आपबीती शुरू से आखिर तक सुना दी। तब छोटे भाई ने पूछा, "आप अपने छोटे भाई को देखें तो क्या उसे पहचान लेंगे?"
"हां, पहचान लूंगा।" [संगीत] उसने जवाब दिया।
"कैसे पहचान लेंगे?" छोटे भाई ने पूछा।
"उसकी एक निशानी है।" [संगीत] बड़े भाई ने कहा, "उन दिनों की बात है जब हम अभी छोटे-छोटे बच्चे थे। एक दिन मैं घोड़े को पानी पिलाने के लिए नदी पर ले जा रहा था, तो छोटा भाई जिद करने लगा कि मुझे भी साथ ले चलो। वह घोड़े के पीछे [संगीत] दौड़ने लगा। घोड़े ने उसे दलाई मारी। उसके बाएं कंधे पर उसका निशान बाकी रह गया। [संगीत]"
"आपने इस बेचारे को तसल्ली दी होती। घोड़े पर बिठाकर सैर करा दी होती। आखिर ऐसा क्यों ना किया?" छोटे भाई ने पूछा।
"वह मुझे एक आंख ना भाता था। बस इसीलिए ऐसा ना किया।" बड़े भाई ने [संगीत] जवाब दिया।
"आपके छोटे भाई की जो निशानी है, वह इससे मिलती जुलती तो नहीं है।" यह कहते [संगीत] हुए छोटे भाई ने अपना बाया कंधा खोल कर दिखाया। बड़ा भाई उसके पैरों में गिर पड़ा और सिसकने लगा। छोटे भाई ने उसे उठाया और उसके आंसू पोछे।
फिर वह अपने बड़े [संगीत] भाई को लेकर बाजार गया और उसे अच्छे-अच्छे कपड़े और एक घोड़ा खरीद दिया। इसके बाद यह दोनों मंजले भाई की तलाश में निकल पड़े। पुलाव बेचने वाले की दुकान में मंजले भाई का वही हाल था जो सालन बेचने [संगीत] वाले के पास बड़े भाई का था। छोटे भाई ने मंजले भाई को भी अच्छा सा लिबास और एक घोड़ा खरीद दिया। और तीनों भाइयों ने एक साथ अपने वतन की राह ली।
छोटा शहजादा अपने बाप के लिए अच्छे-अच्छे तोहफे ले [संगीत] जा रहा था। बड़े और मंझले भाइयों ने इन तोहफों को देखा तो मारे हसद के अपने सुकून और आराम खो बैठे। छोटे भाई [संगीत] ने जो जो एहसान किए थे, वो सब उन्होंने भुला दिए थे और दोनों मिलकर छोटे भाई को [संगीत] मार डालने का मंसूबा बनाने लगे।
मगर संदूक में लेटी हुई लड़की ने उनकी बातें सुनी। शाम को यह लोग रात बसर करने के लिए एक नदी के किनारे रुके तो लड़की ने छोटे शहजादे को अपने पास [संगीत] बुलाकर उससे कहा, "तुम्हारे भाई तुमसे साजिश कर बैठे हैं। वो तुम्हें मार डालना चाहते हैं। तुम कहीं छिप जाओ।"
रात हो गई। बड़े और मंझले भाई दोनों सोने लटे। छोटा भाई थोड़ी देर तक लेटा रहा और जब उसके दोनों भाई सो गए तो वह चुपके से उठ गया। उसने अपनी [संगीत] दरी पर बहुत सी मिट्टी डालकर उसे अपनी चादर से ढक दिया और खुद एक तरफ छिप गया। सुबह के करीब दोनों भाई उठे और छोटे भाई की दरी के पास आए और उसे उठाकर नदी में फेंक दिया। वह यह काम करके लौट रहे थे कि अचानक पानी के छिपछिप [संगीत] करने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने मुड़कर देखा तो छोटा भाई किनारे पर बैठा मुंह हाथ धो रहा था। अपनी साजिश को नाकाम होते देखकर [संगीत] उन्हें बड़ा दुख हुआ। वह फौरन घोड़ों पर सवार हुए और छोटे भाई को वहीं छोड़कर बड़ी सरहद से आगे चले गए।
वह थोड़ी दूर जाकर रेत के [संगीत] टिले पर रुक गए। यहां उन्होंने एक जगह रेत में एक तेज सी तलवार को सीधा गाड़ दिया और इसके पास बैठकर खुद को कमर तक रेत से ढक लिया। छोटा भाई वहां पहुंचा तो उसने अपने भाइयों को इस हालत में देखकर उनसे पूछा, "आप लोगों ने अपने आप को रेत में क्यों गाड़ लिया है?"
"ताकि कमर [संगीत] और टांगे दर्द से बचे रहे।" बड़े भाई ने जवाब दिया, "आओ, तुमको रेत में गाड़ दें। तुम्हारी टांगे भी हमेशा [संगीत] ठीक रहेंगी।"
छोटा शहजादा घोड़े से उतरा। बड़े भाइयों ने उसे भी कमर तक रेत में गाड़ दिया। थोड़ी देर में तपती रेत से उसकी टांगे [संगीत] जलने लगी और उसने तड़प कर कहा, "हाय, मेरी टांगे झुलस गई।"
बड़े भाइयों ने मशवरा दिया, "तुम जरा अपनी टांगे [संगीत] हिलाओ। रेत ठंडी हो जाएगी।"
छोटे शहजादे ने अपनी टांगे हिलाई तो गाड़ी हुई तलवार से उसकी दोनों टांगे काट दी। बड़े भाइयों ने उसकी दोनों आंखें निकाल ली और उसे वहीं छोड़कर लड़की, [संगीत] परिंदा और घोड़े को लेकर चले गए।
चलते-चलते बड़े और मंझले शहजादे दोनों अपने शहर पहुंच गए और जो कुछ लाए थे, वह सब अपने बाप [संगीत] को दे दिया। सुल्तान बहुत खुश हुआ। उसने लड़की को अपने बड़े बेटे की दुल्हन [संगीत] करार दिया और में उसके रहने का इंतजाम कर दिया। 40 कनी उसकी सेवा और हिफाजत करने लगी। घोड़े स्याह शाहीन को सुल्तान ने [संगीत] अपने अस्तबल में बांधवा दिया और तोता-ए शहर के पंजरे को हीरे जवाहरात की झाड़ी से लटका [संगीत] दिया।
तोता-ए शहर बैठी रही। चहचहाने का नाम तक ना लिया। घोड़ा किसी को [संगीत] अपने पास भटकने ना देता था। कोई सामने से आता तो उसे काटता और कोई पीछे से आता तो उसे दलती मारता। लड़की 40 कनीजों [संगीत] से घिरी हुई दिन रात बराबर अपने संदूक में लेटी रहती थी। सर तक ना उठाती थी।
अब इनको यहीं छोड़कर आइए। जरा छोटे शहजादे का हाल सुनिए।
तीन दिन और तीन रातें गुजरने के बाद [संगीत] छोटा शहजादा होश में आया। उसे परी का दिया हुआ बाल याद आया और उसने उस बाल को जला दिया। पलक झपकते [संगीत] ही परी अपनी कनीजों के साथ अपने तख्त पर आ हा हाजिर हुई। आते ही उसने शहजादे से पूछा, "ऐ आदमीजाद, तुम्हें किसने नुकसान पहुंचाया है?"
छोटे शहजादे ने [संगीत] सारा हाल उसे कह सुनाया। तब परी ने उसे अपने तख्त पर लिटाया और अपनी कनीज [संगीत] को हुक्म दिया, "इसको मेरे बाप के पास वाकिफ एक को एक काफ ले चलो।" उसने अपनी कनीज को अपने बाप के नाम एक [संगीत] खत भी दिया जिसमें उसने लिखा, "वालिद मोहतरम, मेरी आपसे यह गुजारिश है कि आप इस आदमी [संगीत] जात को जिंदगी के समंदर में नहलाएं और हमारे रिवाज व तरीकों से इसका इलाज करवाए। 40 दिनों के बाद जब यह ठीक हो जाए तो वापस [संगीत] मेरे पास भेज दें। यह मेरे लिए एक सगे भाई की तरह अजीज है।"
परियों ने छोटे शहजादे को दुनिया के सिरे पर वाकिफ कोहे काफ में अपनी मल्लिका के बाप के पास पहुंचा [संगीत] दिया। 40 दिनों के अंदर-अंदर शहजादा बिल्कुल तंदुरुस्त और पहले से भी ज्यादा खूबसूरत बन गया। परियों ने उसको तख्त पर [संगीत] बिठाकर फिर वापस मल्लिका के पास ले आई।
परियों की मल्लिका ने शहजादे से कहा, "मैं तुमको इस हालत में अपने बाप के पास ना जाऊंगी। तुम्हारा हुलिया किसी अजनबी फकीर जैसा हो [संगीत] जाए। तब मैं तुमको पहुंचा दूंगी। वहां पहुंचने पर अगर मालूम हुआ कि तुम्हारे बाप ने लड़की की शादी तुम्हारे बड़े भाई से कर दी है और उसको अपनी जगह तख्तेशाही पर बिठा दिया है तो हम शहर में दाखिल ही ना होंगे। बाहर ही बाहर से चले [संग संगीत] आएंगे। और अगर यह सब अभी ना हो पाया है तो मैं इस लड़के से तुम्हारी शादी कर [संगीत] दूंगी।"
3 महीने तक परी ने छोटे शहजादे को अपने पास रो के रखा। इस अवधि में शहजादे के सर [संगीत] के बाल इतनी लंबी हो गए कि उसकी पेशानी को ढक लें। उसके नाखून भी बहुत बढ़ गए। तब परी ने छोटे शहजादे [संगीत] को फिर अपने तख्त पर बिठाया और दोनों उसके वतन की तरफ उड़ चले।
परी ने तख्त [संगीत] को शहर के बाहर छोड़ दिया और छोटे शहजादे का हाथ पकड़े महल को ले चली। जब वे महल में आए तो सुल्तान [संगीत] अपने तख्त पर बैठा हुआ अपने मंत्री से गुफ्तगू कर रहा था। वह बहुत उदास [संगीत] होकर कह रहा था, "कितनी ही महीनों से मैं फिक्र और परेशानियों की दलदल [संगीत] में फंसा हुआ हूं। परिंदा जब से आया है, कभी एक बार भी ना बोला। आज तक घोड़ा एक बार भी ना हिनहिनाया और लड़की है कि कुछ खाने पीने तक का नाम ना लेती।"
यह कहते कहते [संगीत] अचानक उसने देखा कि नौजवान भिखारी आंगन में खड़ा है। उसने नौजवान को पुकारा, "ए, इधर आओ।"
छोटे शहजादे ने निगाहें उठाई तो देखा कि उसके दोनों भाई बाप [संगीत] के दाएं बाएं बैठे हैं। उसने तख्त की तरफ जैसे ही पहला कदम बढ़ाया तो तो एहर [संगीत] चहचहा उठी। इस तरह कि सुनने वालों के दिल मोम की तरह पिघल गए। शहजादे ने एक कदम और बढ़ाया तो घोड़ा स्याह शाहीन [संगीत] अस्तबल में जोर से हिनहिनाया। शहजादे ने तीसरा कदम उठाया ही था कि लड़की संदूक से बाहर आ गई और अपने हाथों [संगीत] में झड़ी साज लेकर 40 कनीजों के बीच गाना बजाना और नाचना शुरू कर दिया।
सुल्तान किल उठा [संगीत] और उसने छोटे शहजादे से कहा, "ए अजनबी फकीर, तुम हमारे लिए बड़ी खुशी लेकर आए हो।" यह कहते हुए उसने तश्तरी भर अशरफियां छोटे शहजादे [संगीत] के ऊपर उछाल दी।
तब शहजादे ने कहा, "मैं कोई अजनबी फकीर नहीं हूं। आप जरा [संगीत] तो शहर को देखिए।"
"ऐसा भी होता है कि चिड़िया बोले?" सुल्तान ने हैरानी से पूछा।
इसमें अचानक तो एए शहर बोल पड़ी और इसने सुल्तान को [संगीत] सारा कस्सा शुरू से आखिर तक सुना दिया। यह कस्सा सारे शहर में फैल गया। यह मालूम होने पर कि शहर को तबाही से [संगीत] किसने बचाया है, शहर के तमाम बाशिंदे छोटे शहजादे की हिफाजत के लिए [संगीत] उठ खड़े हुए। सुल्तान ने जब देखा कि उसकी हुकूमत का खतमा हो रहा है तो वह अपने दोनों बड़े [संगीत] बेटों के साथ शहर से भाग खड़ा हुआ।
बड़ी धूमधाम के साथ संदूक वाली हसीन शहजादी से छोटे [संगीत] शहजादे की शादी हुई। 40 दिन तक सारे शहर में खुशियां मनाई गई और शादी की दावत [संगीत] खाई गई। जब यह सब कुछ हो चुका तो परी अपने मुल्क वापस चली गई। जाते वक्त [संगीत] उसने अपने सर का एक बाल तोड़कर छोटे शहजादे को दिया और कहा, "जब कभी तुम्हें मुझे देखने की ख्वाहिश हो, इस बाल को जला दो। बस मैं फौरन हाजिर हो जाऊंगी।"
इस तरह [संगीत] आवाम सुल्तान के जबर और जुल्म से छुटकारा पा गए और छोटे शहजादे की आरजुएं पूरी हो गई।
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