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श्रीपाल मैनासुंदरी - 3 -30th, Sept पू.श्री नियमदर्शनाजी- Shripal Mainasundari, Pu.Niyamdarshanaji m.

JIT motiongraphics23:38

Transcription

जीवन की दिव्यता और भव्यता को जानने के लिए आए हुए जिज्ञासु संसार में डॉक्टर तो बहुत हैं, लेकिन सफल डॉक्टर कौन हो सकता है? सक्सेसफुल डॉक्टर कौन हो सकता है? उसकी बीमारी का बराबर डायग्नोसिस कर लेता है और उसे बीमारी के ऊपर निश्चित औषधि जानता है, उसका बराबर इलाज करता है, वही एक सफल डॉक्टर बन सकता है। जिसमें यह सारे गुण हैं, वह सक्सेसफुल डॉक्टर बन सकता है।

वैसे ही एक सफल अध्यापक उसी प्रकार से वह पढ़ता है, उसके लिए मेहनत करता है, वह एक सफल अध्यापक कहलाता है। इसी प्रकार एक सफल उपदेश कौन हो सकता है? सफल उपदेश कौन हो सकता है? जो श्रोताओं को जानता है, श्रोताओं की रुचि किसमें है, वो जानता है, उनकी जिज्ञासा क्या है, वह जानकर के उनकी जिज्ञासा का यथायोग्य समाधान कर देता है, वही एक सफल उपदेश कहलाता है, सफल वक्ता कहलाता है, सफल प्रवचनकार कहलाता है।

ऐसे ही हमारे अनंत लब्धि के निदान भगवान महावीर के प्रथम पत्र शिष्य गदर गौतम स्वामी एक सफल उपदेश नहीं, परंतु 14000 साधुओं के नायक, मात्र नायक नहीं, सफल नायक, मात्र नायक नहीं, थे। एक शिष्य थे, वह भी सफल होते हैं, लेकिन सफल शिष्य भी कौन होता है? जो गुरु के प्रति पूर्णता समर्पित होता है और ज्ञान को भीतर में ग्रहण करता है, ज्ञान प्राप्ति के लिए जो उद्यम करता है और उसी प्रकार जिसका जीवन आचरण होता है, वह एक सफल शिष्य कहलाता है। तो ऐसे सफल शिष्य, सफल नायक, सफल उपदेश सकते हमारे गौतम स्वामी, जिन्होंने सम्राट श्रेणी की जिज्ञासा को शांत करने के लिए और समस्त जो भी श्रोतागण वहां पर उपस्थित थे, जिज्ञासु थे, उन जिज्ञासुओं की जिज्ञासा का समाधान करने के लिए श्रीपाल कथानक का वर्णन किया, जो नवपथ की महिमा बताता है।

कल हमने सुना चंपा नगरी, जहां पर शरत राजा राज्य करते थे। दोनों का जीवन बहुत ही शुभपूर्वक, आनंदपूर्वक बीत रहा था। सब कुछ था, परंतु संतान नहीं थी। संतान के बिना घर सूना था, लेकिन राजा और रानी दोनों को धर्म सत्ता और कर्म सत्ता पर विश्वास था कि हमारे योग में होगा, हमारे उदय में होगा, हमारी पुण्य वाणी का योग होगा, तो जरूर मिलेगा। परंतु उसके लिए उन्होंने कोई भी उपचार नहीं किए और पुण्य वाणी का उदय हुआ और एक सुंदर, शालो राजकुमार को महारानी ने जन्म दिया। श्रीपाल, जिसका नाम रखा। 5 वर्ष का श्रीपाल हो चुका है और अचानक एक दिन शरत राजा की मृत्यु हो जाती है। प्रवेट्टना के कारण चारों तरफ दुख का वातावरण छाया हुआ है। महारानी कमल प्रभा के ऊपर तो बहुत बड़ा दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है कि भगवान ने वर्षों के बाद तो खुशियां दी और वह खुशियां भी कुछ ही क्षणों में छीन ली हैं। अब कैसे होगा ये जिंदगी? कैसे बीतेगी ये जिंदगी?

"जिंदगी एक पहेली है, कभी दुश्मन तो कभी सहेली है। जिंदगी एक पहेली है, कभी दुश्मन तो कभी सहेली है। चुप कर देखा तो महफिल है यारा, अपनी अपनी जगह अकेली है। छूकर देखा तो महफिल है यारा, अपनी अपनी जगह अकेली है।"

यह जिंदगी एक ऐसी पहेली है। अनमोल पेड़ के धराशाही होने से जैसे सारे पंछी दुखी हो जाते हैं, उसी प्रकार चंपा नगरी का वातावरण की मृत्यु के पश्चात सारी नगरी शोक के सागर में डूबी हुई है। महारानी कमल प्रभा, जिसके दुखों का हम वर्णन भी नहीं कर सकते हैं। ऐसे चारों तरफ दुख का उदासी भरा वातावरण छाया हुआ है।

लेकिन इन सब में एक व्यक्ति ऐसा है, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए योजना बना रहा है। वीर दमन, जो अपने सपनों को साकार कर रहा है। उसको अंधा बना दिया, लेकिन श्रीपाल अभी छोटा करना है, तो यह राज्य सिंहासन मुझे ही चाहिए, इस पर मेरा ही हक़ है। इस प्रकार वह एक राज्य लिप्सा, एक लालच से ग्रसित हो चुका है। और देखिए, सत्ता और संपत्ति का नशा ऐसा होता है कि इसमें यदि सगा बाप भी विरोध करता है ना, तो वह भी कांटे की तरह लगने लगता है, वह भी दुश्मन की तरह लगने लगता है। इतिहास में देख लीजिए ना, कैसे-कैसे उदाहरण हैं। अरे कोनिक ने क्या किया था? अपने ही सेज बाप को जेल में डाला। औरंगजेब ने क्या किया था? उसने भी यही काम किया था। पिता मुझे राज्य नहीं देंगे, इस डर से उन्होंने अपने पिता को खुद ही जेल में डाल दिया और ऊपर से इतने जुल्म ढल गए।

तृष्णा बड़ी भयंकर चीज है। जब यह तृष्णा जाग जाती है भीतर में, तो व्यक्ति को सामने कुछ भी दिखाई नहीं देता। संबंध दिखते, ना रिश्ते दिखते, ना मानवता दिखती, कुछ भी दिखाई नहीं देता। बस उसे जो पाना है, तो पाना ही है। "तृष्णा तू न गई मेरे मन से, तृष्णा तू न गई मेरे मन से। बांके कृष्ण जन्म के साथी पाखी।" कृष्णन से कृष्ण तू न गई मेरे मन से, कृष्ण तू न गई मेरी मैन से।

कृष्ण बड़ी भयंकर चीज है। वीर दमन को श्रीपाल एक कांटे की तरह नजर आ रहा है और उसकी योजना बन रही है। अकेला नहीं है, कई साथी भी उसको इस योजना को बनाने में सहयोग दे रहे हैं। देखिए, संसार ऐसा है, जहां दिन है तो रात भी है। कुछ अच्छे लोग हैं, तो बुरे लोगों की भी कमी संसार में नहीं है। ऐसे कुछ बुरे लोग मिल गए, जो थोड़े से लालच के खातिर आज उसे वीर दमन को साथ दे रहे हैं, गलत काम करने के लिए उसको उकसा रहे हैं कि वीर दमन, तुम सही सोच रहे हो, यह राज्य सिंहासन पर अधिकार तो तुम्हारा ही है। देखिए, ऐसे-ऐसे लोग भी संसार में हैं। इसीलिए तो कहा है, "इस देश को दुश्मनों से नहीं, गद्दारों से खतरा है। इस देश को दुश्मनों से नहीं, गद्दारों से खतरा है। खजाने को चोरों से नहीं, पहरेदारों से खतरा है। खजाने को चोरों से नहीं, पहरेदारों से खतरा है।"

ऐसे ही बस लालच में आकर के उसी मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य जो हैं, वीर दमन की पार्टी में मिल गए और योजना शुरू हो चुकी है। योजना बन रही है कि श्रीपाल को किसी भी तरह से खत्म कर देना है, इस श्रीपाल को खत्म कर देना है। गुप्त मंत्रणा चल रही है और वीर दमन उन साथियों से कह रहा है, एक कमरे में अलग जाकर के उनकी योजना बन रही है। वीर दमन कह रहा है कि आज श्रीपाल भले ही छोटा है, लेकिन मेरी जिंदगी के रास्ते का कांटा है। इस कांटे को यदि अभी नहीं उखाड़ उखाड़ दूं, तो आगे चलकर के यह कांटा मेरी पूरी जिंदगी के रास्ते को कांटों से भर देगा। इसके लिए इसको किस पद्धति से खत्म करना है, कैसे खत्म करना है, योजना बन रही है।

देखिए, यह एक समय था, वीर दमन श्रीपाल का सगा चाचा था और यह समय था कि उसको महारानी कमल प्रभा को सांत्वना देनी चाहिए थी, उनके दुख में थोड़ा सहानुभूति दिखानी चाहिए थी और श्रीपाल की जिंदगी का पालन पोषण, उन उसको संस्कारी करना, उसको राज्य के योग्य बनाना, राजा के योग्य बनाना, यह जिम्मेदारी लेने का कार्य दमन का था। परंतु क्या कर रहा है? वह उसी को खत्म करने की योजना बना रहा है।

इधर महारानी कमल प्रभा को विश्वास था कि कोई बात नहीं, श्रीपाल के पिता चले गए, लेकिन उसके चाचा हैं, उसकी जिम्मेदारी जरूर लेंगे, उसको सुरक्षित और संस्कृत करेंगे। उसको विश्वास था, लेकिन बस यही बात होती है, जब हम किसी पर अत्यंत विश्वास कर लेते हैं ना, तो विश्वास का घाट हुए बिना रहता नहीं है। इसीलिए कहा है, "दूरी अधिक वहीं मिलती है, जो अधिक पास होता है। दूरी अधिक वहीं मिलती है, जो अधिक पास होता है। सर अधिक वहां मिलता है, जहां सन्यास होता है।" नहीं मिलता है। धोखा अक्सर हमें दुश्मनों के बीच में नहीं मिलता है। धोखा अक्सर हमें दुश्मनों के बीच में, हम धोखा वही खाते हैं, जहां विश्वास होता है। हम धोखा वही खाते हैं, जहां विश्वास होता है।

इसलिए किस पर कितना विश्वास करना, यह भी हमें थोड़ा सा सोच समझकर के कदम उठाना चाहिए। कई बार होता है, हम अपने घर की कुछ विशेष बात किसी को बता देते हैं और उस व्यक्ति के पेट में टिकते नहीं, और किसी को बता देता है, जहां नहीं बताना है, वहां बता देता है और फिर हम परेशानी में आ जाते हैं। इसलिए भगवान ने बताया है कि गंभीर बनिए, गंभीर बनिए। हर बात हर किसी को बताने के जैसी नहीं होती है। विश्वास की कसौटी पर उनको कसिए और फिर बाद में अपना दिल उनके पास में खोलिए। तो यहां पर भी ऐसा ही हुआ है। महारानी कमल प्रभा को विश्वास था अपने देवर के ऊपर, लेकिन देवर ने ही घाट करने की योजना बना ली है। योजना चल रही है, चर्चा चल रही है और चलते-चलते देखिए, मंत्री माटी सागर जो था, उसने यह गुप्त चर्चा सुन ली है। कहते हैं, मरने वाले की अपेक्षा बचाने वाले के हाथ लंबे होते हैं और मंत्री माटी सागर ने जैसे ही इस गुप्त चर्चा को सुन लिया, तब रानी के हितेषी मंत्री मनीष माटी सागर ने तुरंत जाकर के महारानी कमल ब्रह्मा के पास जाकर के यह सूचना दे दी है कि महारानी जी, श्रीपाल को उसकी जान को बहुत बड़ा खतरा है। इस प्रकार की गुप्त यंत्रणा यहां पर जो है, चल रही है।

"राजा करूं मैं खुद चंपा का, यह हाली उसने थन। मंत्री और श्रीपाल को मारन सी को पलटाई प्रधान भी डेल अरणी ते सब ही बात सुनाई हो श्रीपाल ईश्वर।"

मंत्री माटी सागर ने महारानी कमल प्रभा को यह सूचना दी है और कहा है कि बस, कैसे भी हो, आप रातों-रात श्रीपाल को लेकर के चंपा से बहुत दूर चली जाइए। इसके जीवन की सुरक्षा करना बहुत जरूरी है। यह सुनकर के महारानी कमल प्रभा को बहुत बड़ा शोक लगा कि क्या कह रहे हो मंत्री? तुम ऐसा नहीं हो सकता है। मेरे छोटे भाई के समान मेरे देवर हैं, इतना अच्छा व्यवहार मेरे साथ में उनका है और वह इस प्रकार सोच सकते हैं? नहीं, यह नहीं हो सकता है।

महारानी शोक कर रही है। देखिए, आज भी धरती पर ऐसे कई किस्से बनते हैं। अभी तो आरती की आरती नहीं होती, इधर बंटवारे की बातें शुरू हो जाती हैं। इधर बंटवारे की बातें शुरू हो जाती हैं। यह संसार की स्थिति बड़ी विचित्र है। मंत्री माटी सागर कमल प्रभा को समझा रहे हैं कि महारानी, शोक करने का समय नहीं, बातें करने का समय नहीं है। बस आप जितनी जल्दी हो सके, फटाफट यहां से श्रीपाल को लेकर के रावण हो जाइए, क्योंकि यह समय बड़ा विकट है। समय निकल जाएगा, यह भी समय आया है, तो निकल जाएगा। जैसे ही समय निकल जाएगा, श्रीपाल बड़े हो जाएंगे, तो अपने आप इस राज्य सिंहासन की शोभा फिर से बढ़ाएंगे। परंतु इस समय इनके सुरक्षा करना बहुत जरूरी है। इसलिए आप विचार मत कीजिए और तुरंत रातों-रात निकल जाइए।

और देखिए, महारानी कमल प्रभा ने अपना मन पक्का बना लिया है कि बस मंत्री ने कहा है, तो बात सत्य है। कानों से देखिए, आंखों से सुनी हुई बात सत्य है और महारानी कमल प्रभा तो राजश्री पाल को अपने गोद में लेकर के वहां से निकल गई है। आधी रात को राजमहल से महारानी श्रीपाल के साथ निकल पड़ी है। मंत्री माटी सागर उनको छोड़ने के लिए राज्य की सीमा तक पहुंचते हैं। आगे महारानी को अकेले चलना है। रात का समय है और जंगल के रास्ते में महारानी अपने छोटे बेटे को लेकर के जा रही है। विचार चल रहा है कि जिंदगी भी कैसी है? इस जिंदगी के बेल पर सभी अंगूर खट्टे नहीं होते, कुछ मीठे भी होते हैं और कुछ खट्टे भी होते हैं। यह जिंदगी का आज कैसा मोड़ आया है? वह सुकोमल महारानी, जिसने कभी जमीन का स्पर्श तक नहीं किया, इतने सुख वैभव में पड़ी हुई, वह महारानी आज बिना पैरों के कुछ पहने हुए अपने बेटे को लेकर के जंगल में जा रही है। चारों तरफ भयानक सन्नाटा है, भीषण जंगल है और उस जंगल में आधी रात का समय, चारों तरफ जंगली पशुओं की दहाड़े, शेरों की गर्जना, हाथियों की चिंघाड़े, यह सब आवाज है। इतना भयानक वासीम है और महारानी बस तेज कदमों से चली जा रही है, चली जा रही है। परिस्थिति, एक समय था, एक आवाज लगे तो 10 व्यक्ति दौड़कर की आते थे, पूछने के लिए कि क्या जरूरत है और आज 10 आवाज लगाए तो एक भी सुनने वाला कोई नहीं है। यह कैसी स्थिति है? हे रे, भाग गई, यह कैसा भाग्य आज आया है कि ऐसा या मोड़ इस जिंदगी में आया है कि महारानी कमल प्रभा बस अपने भाग्य को, अपने कर्मों को देखते हुए चली जा रही है। मन में बस एक ही आकांक्षा है कि कैसे भी हो, मेरे पुत्र की रक्षा हो। पुत्र की रक्षा के लिए मां ने अपनी जान भी जोखिम में डाल दी है। मां की ममता और मां का वात्सल्य क्या होता है, इनको हम शब्दों में कह नहीं सकते हैं। परंतु आज मां के ऊपर जो है, बहुत लेखनी चली है, बहुत कामयाब गीत, शास्त्र के शास्त्र रचे गए हैं। एक शब्दों में कहूं तो मां क्या है? मां वह प्राथमिक पाठशाला है, जो पुरुष को महापुरुष बना देती है, जो पुरुष को महापुरुष बना देती है। किसी ने कहा भी है, "आई खर्च के असते लेकर ची माहिती।"

"आई चिक्कथा के वर्णमवी"

एक छोटा सा किस्सा याद आ रहा है। मुंबई का अंकित नाम का एक लड़का, जिसने खुद ने यह घटना लिखी थी। वह अंकित नाइंथ क्लास में पढ़ रहा था। परीक्षा चल रही थी और स्टडी करने के लिए अपने फ्रेंड के घर जा रहा है। मां से उसने कहा, "मम्मी, मैं फ्रेंड के घर पढ़ करने के लिए जा रहा हूं। एक घंटे में वापस लौट आऊंगा।" मां को यह अंकित अपने फ्रेंड के घर गया, पढ़ कर रहे हैं और उनके घर के इज्जत सामने क्रिकेट का ग्राउंड था और बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। अब आप सोचिए, पढ़ में मन लगने वाला था क्या? इधर पढ़ कर रहे हैं, सामने क्रिकेट खेल रहे हैं। कौन बच्चा सर और शांति से पढ़ में मन लगाकर पढ़ कर सकता है? दोनों के दोनों पढ़ छोड़कर के खेलने के लिए ग्राउंड पर पहुंच गए। क्रिकेट खेल रहे हैं। अब खेल में समय का पता चलता नहीं है। एक घंटे से डेढ़ घंटा हो गया। अंकित अभी तक घर नहीं आया। मां उसको ढूंढते ढूंढते बराबर ग्राउंड पर पहुंच गई। थोड़ा सा चित्र सामने लाइए ना। नौवीं और दसवीं के बच्चे हैं, क्रिकेट खेल रहे हैं सभी और मां ग्राउंड पर पहुंच गई। बिल्कुल दुर्गा का रूप लेकर के, बिल्कुल दुर्गा का रूप लेकर के पहुंच गई। अंकित का ध्यान गया, सामने मां खड़ी है और आंखें बड़ी है। मां की आंखें बड़ी है। अंकित थोड़ा डर गया। नजदीक आकर थोड़ा गुस्से में आकर के भी मां से कहता है, "मम्मी, तुम्हें यहां आने की क्या जरूरत थी? तुम्हें यहां आने की जरूरत क्या थी? मैं आने ही वाला था, बोल करके गया था।"

ए जाऊंगा तब मम्मी ने सिर्फ छोटा सा प्रश्न पूछा, "तुझे पता है ना, कल तेरा पेपर है? यहां पता है?" मम्मी से बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है। मैंने मेरी वैसे भी पढ़ हो चुकी है और फिर मम्मी थोड़ा सा खेल लिया तो क्या फर्क पड़ता है? आप भी मम्मी थोड़ा सा कंप्रोमाइज नहीं करती हो। इस प्रकार उसे अंकित ने मम्मी के सामने जब यह अंतिम दो वाक्य बोले, तो उसे मम्मी ने जो जवाब दिया, बहुत सही जवाब दिया, बहुत सुंदर जवाब दिया। मां ने कहा, "बेटा, तू कहता है, मैं इस उम्र में नहीं खेलूंगा, तो तुम्हारी उम्र में खेलूंगा? खेलूंगा क्या? तो मेरा सवाल यही है कि तुम इस उम्र में पढ़ नहीं करोगे, तो क्या मेरी उम्र में पढ़ करोगे या नहीं? परंतु तुम्हारा पेपर है, इसलिए बात चल रही है और बेटा, तू मुझे घर से क्या बोल कर के गया था? मम्मी, 1 घंटे में लौटूंगा। डेढ़ घंटा, पौने दो घंटा हो गए हैं, तो झूठ बोलने लगा है।"

इस प्रकार यदि अभी से तेरी एक झूठ बोलने की आदत पड़ गई, आगे तू कॉलेज में जाएगा, दोस्तों के संग कहीं घूमेगा, बोलेगा कुछ और, कहीं और जाएगा। मैं तेरा भविष्य अंधकार में देखना नहीं चाहती हूं। इसलिए अभी से यह आदत नहीं चाहिए। झूठ बोलने की आदत नहीं चाहिए। पढ़ का बोल करके गया है और गया खेलने के लिए। यह गलत आदत यदि अभी से लग गई, तो आगे यह गलत आदत बहुत भयानक स्वरूप ले सकती है। इसलिए अभी से इसको कंट्रोल करना बहुत जरूरी है। अंकित, मैं तेरा भविष्य अंधकार में देखना नहीं चाहती हूं।

अंकित समझ गया, मां की बात समझ में आ गई है, गले उतर गई है और मम्मी से सॉरी कहा है उसने। इसलिए याद रखना, ऐसे कभी-कभी गुस्से का स्वरूप, दुर्गा का स्वरूप लेने वाली मां हिटलर नहीं होती है, हितकर होती है। मैंने एक बार भी पहले कहा था, कभी-कभी जब डांटती है, कभी हाथ भी उठ जाता है मां का, कभी उसको बंद करके भी रखती है, कभी बंद करके भी रखती है, लेकिन वह हिटलर नहीं होती है, हितकर होती है। उसको मात्र हमारे हित की चिंता होती है कि हम एक अच्छे इंसान बनें, हमारे भीतर के सद्गुणों का विकास हो, यही उसका एक लक्ष्य होता है। इसलिए कभी-कभी उसको ऐसे कदम भी उठाने पड़ते हैं। तो कोई बात नहीं, मां कभी की तीतर तू मजला करशील मारे।

आई के ऊपर, मां के ऊपर तो जितना बोले उतना कम है। और भी कुछ घटनाएं हैं, जो बहुत ही हार्ट टच घटना है, पर हमारी घड़ी 9:30 बजाने आ गई है और सर रहा, तो इस विषय को हम कल और देखेंगे। बोलिए भगवान महावीर स्वामी।