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जावेद अख्तर । इंटरव्यू 1 । सांगली नास्तिक परिषद 2023

Indian Brights' Society1:11:16

Transcription

आपले कवि हृदयाचे, रसिका मनाचे, आपल्या लेखणीतल्या गद्यानी, पद्यानी, तल्या संवादा तल्या, खटक तल्या मूर्ख. आपल्या सगं आयुष्यात रंगत आणणे असे जावेद डॉक्ट आपल्या मध्ये आहेत. त्यांची मुलाखत इथे घेणार आहेत. डॉक्टर ज्ञानेश पाटिल अतिशय उत्सुक तेने अपन जाची वाट बघतो त्या सत्रा आपण आता शुरुआत करूया.

जावेद सर आपका बहुत-बहुत स्वागत. सर मेरा पहला सवाल आपसे यह है जैसे कि हम सब जानते हैं हमारा जो समाज है, जो सोसाइटी है प्री डोमिनेंटली एक रिलीजियस श्रद्धालु भगवान की कल्पना में आस्था रखने वाले हम ज्यादा से ज्यादा लोग हैं. ये उनकी एक और विशेषता है कि वह नास्तिकता को या नास्तिक होने को उतना काइंडली नहीं देखते. दूसरी तरफ जो एवरेज एथिस्टरॉन तो आपको मैं जब भी देखता हूं तो यह समस्या आपके बारे में मुझे नहीं लगती. आप हमेशा समाज से जुड़े हुए रहते हैं, समाज के प्रति आप काफी पॉजिटिव रहते हैं. आपने कई बार कहा है कि जो एवरेज हिंदुस्तानी इंसान है वह बेवकूफ नहीं है या फिर यह जो देश है उसे वह बर्बाद नहीं होने देगा. यूथ के बारे में भी आप काफी ऑप्टिमिस्टिक रहते हैं. तो यह जो आपका ऑप्टिमिस म है यह कहां से आता है?

देखिए एक तो आपको बताऊं कि जिसे आज हम बड़ा बुरा वक्त कहेंगे और समझते हैं, वह भी क्या है. दुनिया में 13 मुल्क आज भी हैं जहां अगर आप यह अनाउंस कर दे कि आप नास्तिक है तो आपको फांसी की सजा और बहुत दूर नहीं है. एकाद तो पड़ोस में है. आप बोल दीजिए कि मैं नहीं मानता हूं इस धर्म को जिसमें मैं पैदा हुआ था और मेरा इस पर कोई बिलीफ नहीं है. इतना काफी है आपको फांसी देने के लिए. तो फिर भी आज जब हम कहते हैं कि देखो फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन जो है कम हो रहा है और ये जो नेगेटिव फोर्सेस है वो बढ़ रही है और यह हो रहा है, वो हो रहा है और ऐसा तो कभी नहीं था तब भी आप यह सम्मेलन कर रहे हैं और ऐसा सम्मेलन हिंदुस्तान में पॉसिबल है तो हमको अपनी ब्लेसिंग भी काउंट करना चाहिए. जहा हम शिकायत करते हैं हमको बहुत ज्यादा की आदत है तो ये हमें कम लग रहा है. ये जो जिसे हम कम कह रहे हैं ना, इतना भी दुनिया में बहुत सारे मुल्क है जिन्ह नसीब नहीं है. ये सच है.

बाकी ये है कि जैसे एक बच्चा होता है, वो धीरे-धीरे बड़ा होता है तो उसमें समझ बढ़ती है. ऐसे ही समाज होते हैं, ऐसे ही संस्कृति होती है जो बढ़ती हैं हजारों साल में. तो कहीं ना कहीं उनके अंदर एक विजडम जेनेटिकली अब तो यह साइंस भी मानती है कि सर्टन विजडम सर्टन एटीट्यूड जो है वो जीनस में ट्रेवल करते हैं. तो कहीं ना कहीं एक सर्टन सेंसिबिलिटी आपकी जीनस में ट्रेवल करती है. दूसरी यह क्या आप किसी को भी हिंदुस्तान की को ले लीजिए आदमी को और उसके जब फैमिली ट्री ढूंढेंगे आप तो चाहे चार पीढ़ी के बाद या 40 पीढ़ी के बाद आया वो किसी किसान के घर से जो हिंदुस्तानी है व उसकी जड़े कहीं ना कहीं खेती में है किसानी में है. किसान बाय टेंपरामेंट जो है व एक्सट्रीमिस्ट नहीं होता है. उसका टेंपरामेंट नहीं.

देन दिस सस बीन सिटी कंट्री एंड लैंड ऑफ प्लेंटी एक्सट्रीमज आता है एक्सट्रीम हालात से आप देखिए कि जिन मुल्कों में रिसोर्सेस कम है, जिन मुल्कों में जीना बहुत टफ है उसकी जियोग्राफी की वजह से उसकी टोपोग्राफी की वजह से उसमें शॉर्टेज ऑफ वाटर की वजह से शॉर्टेज ऑ कल्टीवेटिंग लैंड की वजह से वहां पर एक हर्शनेस आएगी कल्चर में. लेकिन जहां सब कुछ अवेलेबल है यह आप कमाल का एक यह है जो हमारे नॉर्थ इंडिया में यह जो मैदान है गंगा जमुना का यह साल में दो फसले आपको पिछले 5000 साल से दे रहा. अमेरिका में क्या होता है दो साल आप अगर कोई फस खेत जोत लेते हैं तो उसे तीन साल के लिए छोड़ देते हैं ताकि फिर उसके केमिकल वापस ऊपर आ सके. आप साल में दो फसले 4000 5000 साल से उगा और उगे चला जा रहा है. तो जहां इतना प्लेंटी था वहां एक्सट्रीमिस्ट एटीट्यूड आते नहीं. तो हम जेनेटिकली एक्सट्रीमिस्ट एटीट्यूड के लोग नहीं है. मगर जैसे जैसे कभी कभी शरीफ आदमी को शौक होता है यार मेरे सारे दोस्त बदमाशी करते हैं मैं घर में बैठा रहता हूं मैं भी आज कुछ बदमाशी करूंगा तो उसी तरह कभी-कभी हिंदुस्तानियों को जोश आता है जरा हम भी एक्सट्रीमिस्ट बनेंगे बहुत हो गया यह भी एक्सट्रीमिस्ट है वो भी हम क्यों नहीं है. मगर वो उनका अंदर से चूंकि उनका जेनेटिक कोड वो नहीं है धीरे धीरे धीरे करके वापस आ जाते हैं. ये आप हिंदुस्तान की हिस्ट्री देखेंगे तो ये है आम आदमी जो लीडर रहे हैं आज पॉलिटिकल लीडर होते हैं पहले राजे महाराजे नवाब बादशाह राजा महाराजा होते थे साम्राज और उनके वर्चू और उनका वाइस सब अलग होता था. मैं एक आम इंसान की बात कर रहा ह. मैं यह बिलीव करता हूं कि आम हिंदुस्तानी बाय टेंपरामेंट एक्सट्रीमिस्ट नहीं. चलो कुछ लोगों को इसकी खुशी हुई एक साथ वो बैठ उने ताली बजाई थी.

जी जावेद सर एक तर्क ऐसा दिया जाता है कि कई सारे जो आर्ट फॉर्म्स है वह कहीं ना कहीं रिलीजन का सहारा लेकर या रिलीजन की प्रेरणा से विकसित हुए जैसे कई सारे मंदिर बने तो मूर्ति कला या स्थापत्य कला वास्तु कला का विकास हुआ या फिर चित्रकला का विकास जैसे अजंता के केव पेंटिंग्स है या फिर पोएट्री जो है अर्ली पोएट्री जो है वो भगवान के स्तुति के बारे में है तो तो यह जो सारी पोएट्री है ये रिलीजन के आधार से बड़ी है तो एज एन एथिस्टरॉन है आर्ट के लिए?

देखिए जिन लोगों ने ये साउथ में ऐसे टेंपल है कि पहाड़ी ली है और ऊपर से काटना शुरू कि और काटते काटते पहले एक मंदिर का बाहर का हिस्सा बना दिया फिर उसमें दरवाजा काटा फिर अंदर काटा तो अंदर एक कमरा बन गया फिर उसी में डेटी को काट दिया बना दिया कि एक पूरे का पूरा मंदिर जो है व एक पत्थर का मामूली काम नहीं. य किया माइकल एंजेलो ने आप कभी जाएंगे इटली जो लोग गए उन्होंने स चपल जो देखा व ढाई बरस तक आदमी ने छत पर उल्टा लेट के पेंट किया है उल्टा लेट प और क्या चीज है व सि चप जो उसने पिटा स्टेचू बनाया है जहां पर वो मदर मेरी जीसस को क्रूसिफिकेशन के बाद गोज में लिए हुए क्या स्टैचू है जो मजस का उसने स्टैचू बनाया है तो क्या स्टैचू है देखते रहिए हैरान जो बना है डेविड का आपकी सांस रुक जाएगी ऐसा स्ट. लेकिन अगर क्रिश्चियनिटी नहीं होती तो क्या माइकल एंजेलो पान की दुकान खोल लेता क्या करता फिर वो नहीं मनाता कुछ. यह आदमी जिसने ऐसे मंदिर बनाए एक पत्थर को काट के अगर वहां उसके पास धर्म नहीं होता तो कुछ नहीं बनाता व क्या करता व पान बड़ी की दुकान खोलता. वह आर्टिस्ट थे यह लोग थे जिनके पास पैसा था जिनके पास अपॉर्चुनिटी थी जो आपको हायर करते थे कि भाई तुम यह काम करो हम तुम्हें पैसा देंगे या तुम यह काम करो इसलिए काम करना बहुत नेक है और बहुत अच्छा है तो करते थे व कि यह बहुत भला काम है. अगर यह भला काम सो कॉल्ड भला काम नहीं होता तो कोई दूसरा भला काम होता. अगर वो अच्छे लोग थे तो अच्छा काम करते अगर वो आर्टिस्ट थे तो आठ बनाते ही. बल्कि सच तो यह है के अगर यह ना होता अगर जैसे इस्लाम में आप तस्वीर नहीं बना सकते तो ईरान के कितने पेंटर है बचार तस्वीर नहीं ईरान में तो फिर भी बनाने लगे बाद में बहुत जगह थे टर्की में उसम अगर उन्हें फ्रीडम होती तो शायद और भी कुछ पच्ची पेंटिंग करते वो भी बन जाते ररा की तरह वो भी बन जाते मती बड़े बड़े पेंटर्स की तरह. तो हुआ यह है कि जहां धर्म के पास पावर थी धर्म के पास पैसा था और धर्म आपको एक्साइट करता था कि तुम यह काम करोगे तो बहुत अच्छा काम होगा तो करते थे वो. यह ना होता कुछ और होता.

जो कम्युनिस्ट सोवियत यूनियन था क्या उसमें पेंटिंग नहीं बनाई गई उसमें रेवोल्यूशन की बहुत खूबसूरत पेंटिंग बनाई ग ये लोग भी कुछ बनाते ये आर्टिस्ट इस वजह से नहीं थे कि धर्म आया था इनका धर्म पब्लिसाइज हो गया इसलिए कि य आर्टिस्ट थे तो धर्म को इनका एहसान मानना चाहिए कि यह धर्म का एहसान मानेंगे.

जी हमने जैसे सब जानते हैं अभी हमारा भारत का चांद्रयान मिशन सक्सेसफुल रहा चंद्रयान मिशन उसके बाद कुछ दिनों के बाद के जो चेयरमैन थे सोमनाथ सर उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि वह बेसिकली एक एक्सप्लोरर है और वह जैसे बाहरी दुनिया को एक्सप्लोर करते हैं स्पेस रिसर्च के जरिए वैसे एक आंतरिक दुनिया है जिसे वह एक्सप्लोर करते हैं उनकी आध्यात्मिकता या स्पिरिचुअलिटी के जरिए तो इस सिलसिले में मेरे दो सवाल है क्या स्पिरिचुअलिटी या आध्यात्मिकता ऐसी कोई जरूरत पूरी करती है इंसान की जो जरूरत शायद हम एस्ट होने की वजह से समझ नहीं पाते क्योंकि हमें वो ऑर्गन नहीं है एक तो यिक दुनिया क्या है आंतरिक दुनिया क्या बाहर की दुनिया से अलग है?

एक कहीं अफ्रीका के जंगलों में शायद आज भी कोई ट्राइब मिल जाए जो कैनिबल जो इंसान को खाता है हो सकता है मिल जाए कभी तो था आज है कि नहीं है मालूम नहीं मुझे. उस उस आदमी की जो कैनिबल है जिसको बचपन से माने आदमी खिलाया है और उसको आदत है मानते लोग पकड़ के लाते हैं व आदमी को काट के खा लेते हैं तो बच्चे के लिए जैसे आपको सब्जी तरकारी की आदत हो इसकी आदत है उसका जो आंतरिक विश्व है उसमें क्या आदमी को खाने से कोई डिस्टरबेंस होता है नहीं होता तो क्यों नहीं होता. यह आंतरिक जो है यह आंतरिक है नहीं यह बाहर का ही रिफलेक्शन है. अगर आप कोई जो सच्चा वेजिटेरियन है उसको आप धोखे से मीट खिला देंगे उसे मालूम होगा य मीट है ही थ उसकी आंत अति जो विश्वास है और दुनिया है वो उसे रिजेक्ट कर देगी मगर जो नॉन वेजिटेरियन बचपन से आराम से खाएगा तो ये आंतरिक जो है कहीं आसमान से नहीं उतरता यह आंतरिक बाहर की दुनिया से बनता है तो इतना कुछ आप ज्यादा आंतरिक को वैल्यू मत दीजिए. उसके बाद जहां जहां आपकी समझ में बातें नहीं आ रही है और वेग जहां जहां ग्रे एरिया है ठीक से लाइट नहीं पड़ रही है लॉजिक की रीजन की आप उसको रोमट साइज करते यह देखो धुला धुला अरे धुला तो रोशनी डालो इस धुला क्यों है तो ये किस्सा यह है कि यह हम अपनी जहालत की या अपनी नॉलेज की कमी की या अपने आधा शिक्षक होने की की जो पूजा करते हैं और उसकी बहुत इज्जत करते हैं आप देखिएगा एक आम रिलीजस आदमी बोलता है क्या आपको पता है एक पत्ती कैसे बन जाती है अब तो मालूम है लेकिन कहते थे अरे भाई नहीं मालूम तो शर्मिंदा होने की बात है कि हमें नहीं मालूम है इसमें गर्व की क्या बात है कि हमको यह भी नहीं पता हमको यह भी नहीं पता ये ये जो है जो आरिक है वो रिफ्लेक्शन है बाहर का अगर बाहर ठीक होगा तो आपका आंतरिक भी बेहतर होगा.

इसी सिलसिले में जो अगला सवाल था कि साइंटिस्ट के अंदर साइंटिफिक टेंपरामेंट ना होना या साइंटिस्ट का रिलीजस होना इसे आप कैसे देखते क्योंकि आम आदमी जो तर्क देता है कि वही बात है कि इसको स्निया क ये यह एक बीमारी है और क्योंकि इतने लोगों को है तो आपको कहने की हिम्मत नहीं होती लेकिन है बीमारी भाई आपको तो धर्म बताता था व चंद्रलोक है वहां तो चंद्रलोक आपको मिला आपका ज वहां लैंड किया तो चंद्रलोक के कुछ लोग आए थे कि भ ये क्या लैंड कर गया तो चंद्रलोक का क्या हुआ वो कहां गया स मैं हिंदी सिनेमा के बारे में बोलना चाहूंगा किसके बारे में हिंदी सिनेमा के बारे में बात करते आजाने मेरा वक पॉइंट निकाल लिया जी आजादी के बाद जो भी आर्टिस्ट मेनली हिंदी समा में आए वो आदर खुद लेफ्टिनेंट लार्ज हम कह सकते हैं कि हिंदी सिनेमा कई सालों से सेकुलर मूल्यों का पक्षधर रहा है पिछले कुछ सालों में यह जो बैलेंस है वह बदलता आपको देख रहे क्योंकि अभी नसरुद्दीन शाह सर ने एक इंटरव्यू में कहा कि अभी जो फिल्में बनती है वो जितनी ज्यादा जिंगस्टड फिल्में बनेगी उतनी वो पॉपुलर हो रही है ऐसा ट्रेंड है कुछ फिल्मों के नाम भी लिए उन्होंने तो आप इसे कैसे देखते हैं?

इस बात से हमें एक बात समझनी चाहिए हिंदी सनमा भी वो जिसे आप आंतरिक दुनिया की बात कर रहे थे वह आंतरिक दुनिया ही है समाज की. किसी ने बहुत अच्छी बात कही है कि मुझे किसी समाज के एडवर्टाइजमेंट दिखाओ और मैं तुम्हें उस समाज के बारे में हर बात बता दूंगा उससे आपको मालूम हो जाएगा कि इस समाज की मोरालिटी क्या है और इस समाज के एस्पिरेशन क्या है इसके संस्कार क्या है और इसकी आकांक्षाएं क्या है आपको पता यही फिल्म है. फिल्म अलग अलग समय में जब चेंज हुई है और आज जो आप कह रहे किसी हद तक ऐसा पूरी हद तक नहीं किसी हद तक वो भी सच है तो यह क्यों हुआ है जो समाज में होता है वह कहीं ना कहीं सिनेमा में एंटर होता है. समाज सिनेमा का हिस्सा नहीं है सिनेमा समाज का हिस्सा है और जो वहां रिफ्लेक्ट होगा वो सिनेमा में आएगा कभी जानबूझ के आएगा कभी अनजाने में आएगा.

यह समाज जब मेरा बचपना था जो कि बहुत कई स साल पहले की बात है तो वह उस समय जो मिडिल क्लास थ जो मध्य वर्ग था हिंदुस्तान वो पढ़े लिखे लोगों का था इसलिए कि म मध्य वर्ग में आप आ सकते थे अगर आप वकील है डॉक्टर है इंजीनियर है या आप सिविल सर्विसेस में है या आप टीचर है प्रोफेसर तो चार्टर्ड अकाउंटेंट है तो कोई आपके पास विद्या है तब आप मिडिल क्लास में होंगे वरना कैसे होंगे. यह जो एक्सटेंडेड फैमिली होती थी जमींदारों की भी आप लोग जहां है आपको बात पता हो कि यहां पर जो बड़े जमींदार है उनके जो बच्चे शहर जाते थे वहां पढ़ते थे और वह पढ़े लिखे होते थे और वह यह सारे काम बड़े बड़े करते थे.

जब इंडस्ट आया तो इंडस्ट हर चीज लाइफ में पैकेज आते हैं अच्छा बुरा नहीं आता है हर पैकेज में कुछ अच्छा होता है कुछ बुरा होता है और आप सोचते रहते पहले वाला पैकेज अच्छा था ये अच्छा इस पैकेज में क्या हुआ इंडस्ट हुआ हर बड़ी इंडस्ट्री अपने चारों तरफ बहुत सारी नसरी इंडस्ट्री बनाती एक आदमी साइकिल की बहुत बड़ी शॉप लुधियाना में है अब वो लुधियाना की जो कंपनी है वो तीलिया जो है साइकिल की खुद नहीं बना वो एक जो वो है क्राफ्टमेड तीलिया देनी वो लग गया उसने अपने साथ तीन चार आदमी रख लिए दूसरे आदमी को कहा ये गद्दी का ऊपर का जो चमड़ा है काट के यह तुम दोगे हमें वो बना रहे हैं तो होता यह है कि जब बड़ी इंडस्ट्री आती है तो छोटी-छोटी अंसरी पैदा होती है. इस छोटी छोटी लरी ने हिंदुस्तान में कम से कम 15 करोड़ आदमी 80 में मिडिल क्लास मेंला. एक तो जब इंडस्ट्री फैली तो वहां नौकरियां मिली इस इंडस्ट्री में हर आदमी काम करने वाला बहुत पढ़ा लिखा नहीं था यह जो काम करने वाले लोग थे यह क्राफ्टमेड केटेड इंटेलेक्चुअल्स स्कॉलर्स नहीं थे इनकी एक नई जनरेशन पैदा हुई और ये इतने बड़े थे इनकी मर्जी से फिल्में बनी इनकी मर्जी से गाने लिखे गए इनकी मर्जी से पॉलिटिक्स चली.

मैं पर्सनली सरकार ले खटिया जाड़ा लगे या चोली के पीछे क्या है को उसी पैकेज का हिस्सा समझता हूं जिसमें एल के अडवाण की स्पीस. यह एक पैकेज है. चोली के पीछे क्या है जैसे गाने 1940 में भी बने और 50 में बने लेकिन किसी घर में सुने नहीं गए कभी. मैं तो कितने घर जहा आ साल की लड़की न साल की बच्ची जो है व देखि साब हमारी बच्ची कितना अच्छा डांस करती है बेटा करके दिखाओ अंकल को यह मैंने पहले नहीं देखा था. तो हुआ यह कि जो इंटेलेक्चुअल एस्थेटिक गिरावट समाज में आई वह फिल्म में भी दिखाई दी गीत में भी दिखाई दी और जो राजनीति थी उसम भी दिखाई. 1950 में ऐसे लोग मुसिपालिटी के लीडर होते थे नेहरूवियन टाइम में येय इतने बड़े लीडर ही नहीं हो सकते. कम्युनलिज्म जो है 8 ने इन्वेंट नहीं की है कमम तो बहुत पहले से थी लेकिन वो कम्युनल लीडर में भी क्लास होती थी व जब बात करते थे तो पढ़े लिखे लोगों की तरह करते थे उनके कमम का एक्सप्रेशन भी एक डिसेंट और एक स्टिक तरीके से होता. तो ये जो आया भोंडा पन ये फिल्म में भी आया ये राजनीति में में भी आया हर जगह अलग अलग थोड़ी है लोग वाटर टाइड कंपार्टमेंट में तो नहीं रहता समाज उसी तरह से अगर एक छोटी मोटी वेव उठी है रिवाइवलिस्ट की कुछ इमेजिनरी कुछ रियल तो वो आपको फिल्मों में झलकता हुआ दिखाई देगा. लेकिन बाय एंड लार्ज जो मैस कम्युनिकेशन है और जो मास इंटरटेनमेंट है वो कंडीशन है सेकुलर होने के लिए उसका इसके अलावा रास्ता ही नहीं है. तो वो तो हो जाएगा बीच में यह भी दो चार बन जाएंगी कुछ चलेंगी कुछ नहीं चलेंगी और यही हुआ है कि कुछ चली कुछ नहीं चली और कुछ ऐसी चल गई जिनको रोकने के लिए पूरी ताकत लगा दी गई थी यह तो चलना ही नहीं चाहिए तो जनता ने कहा यह तो हम चला के रहेंगे. तो यह है मतलब यह साफ दिखाई देता है कि कहीं जो ऑडियंस है कहीं जो कॉमन मैन है अब यह क्या होता है एक अंग्रेजी में कहावत है वि राद शिस्ट सेक्सिस्ट लेकिन बहरहाल अब है कि हस्बैंड इज द लास्ट पर्सन टू नो द सेम वे द रूलर द लास्ट पीपल टू नो के जमीन नीचे से निकल रही है कौन जाके उनको बोलेगा भाई मरना उसे है तो हकीकत यह है कि आप यह फिल्मों का हिट होना जिन्हे पूरा राइट विंग ने रोकने की कोशिश की ये इतनी बड़ी हिट हुई है कि पहले हुई नहीं थी कभी कोई यह कोई स्टेटमेंट जा रहा है इस स्टेटमेंट को समझिए या सिर्फ यह फिल्म इतनी कमाल की थी कि 500 और 600 करोड़ का बिजनेस कर लिया जो आज तक किसी ने नहीं किया था लोगों ने कहा कि और हम कुछ करें ना करें यह पिक्चर तो हम देखेंगे तो यह मैसेज मैं नहीं जानता कि अभी तक हस्बैंड को पता चला है कि नहीं पता चला लेकिन यह हो रहा है.

जी अ एक समस्या ऐसी बताई जाती है कि जो लाइक माइंडेड पीपल है उनका गुट जल्दी बन जाता है जैसे रिलीजियस पीपल है एस्ट उसमें लेफ्ट आउट हो जाता है जैसे शराब पीने वाले लोग जल्दी दोस्त बन जाते हैं एक दूसरे से और जो शराबी नहीं होता वह उनकी कंपनी में नहीं जाता तो कुछ मिस आउट कर जाता है तो आपको एस एन आर्टिस्ट कभी प्रोफेशनली नुकसान हुआ आपके व्यूज की वजह से?

नहीं मुझे नहीं लोग बोलते हैं देखिए मुझे कैंसर नहीं हुआ इसका मतलब नहीं है कि दुनिया में कैंसर नहीं होता. मेरा किसी मैं ट्रेन के नीचे नहीं आया इसका मतलब नहीं है कि ट्रेन के नीचे कोई नहीं आता है. मैं मेरी आंखें जो है वो नहीं चली गई इसके मतलब नहीं है कि लोगों की आईसाइट नहीं जाती है. होता है मेरे साथ मैं बोलू मेरे साथ यह हुआ और प्र कुछ नहीं. मैं यह जरूर है कि कभी कभार लोगों से पंगा हो गया उन्होंने कहा यार इसके साथ तो काम नहीं करे मैंने ने क इससे अच्छी कोई बात ही नहीं है यह सब हुआ लेकिन यह कि उसका कोई ताल्लुक ना मेरी पॉलिटिकल सोशल आइडियो जीी से उन्हें विचार को बातों का पताही क्या मासूम लोग है तो उनको तो इसमें माफ कीजिए हां जरा ईगो हो जाती है काम में कभी कभार तो हुआ तो कोई बात नहीं ठीक है हमने कहा ठीक है ना सही मगर झगड़े हुए बहुत बायकॉट भी हुए बाकायदा बायकॉट हुए मेरे तो जब मैं लड़ रहा था कॉपीराइट के लिए आर्टिस्ट की और म्यूजिशियन की इंडिया में तो मीटिंग करके बायकॉट किया गया मुझे रेजोल्यूशन पास किया गया वो एक दूसरी बात में उसका ना मेरी आइडलोजी ताल्लुक है और ना मेरे जिस वर्ग में पैदा हुआ हूं उससे तालुक.

सर रिचर्ड डॉकिंस ने इंटरव्यू में कहा है कि वह कल्चरल क्रिश्चन है मतलब क्रिश्चियनिटी का जो रिलीजियस पार्ट है वो उससे ताल्लुक नहीं रखते लेकिन जो कल्चरल पार्ट है वो उससे कोई तराज नहीं आप भी सारे ट्रेडीशन त्योहार सब मनाते कल्चरल मुस्लिम बहुत लिमिटेड फॉर्म में हूं मैं जो तमिलनाडु का मुस्लिम है मैं उसका कल्चरल साथी नहीं हूं मैं जो केरला में है कि बंगाल में है मैं उसके साथ नहीं हूं उतना मेरा आइडेंटिफिकेशन उससे नहीं है मेरे आइडेंटिफिकेशन के लिए जरूरी है कि आदमी को हिंदी और उर्दू बोलना आती हो इनम से एक पहला यह जरूरी मैं अगर चला जाऊंगा अमेरिका वहां मुझे एक अरब मिलेगा जो मुसलमान है और एक कायस्थ मिलेगा कि ब्राह्मण मिलेगा जो यूपी का रहने वाला तो मेरा तो रिश्ता इससे बनेगा उससे नहीं बन सकता मेरा जहां तक मैं लखनऊ का हूं वहां पर अगर गाव तकिया गजल कबाब बिरयानी यह जो है अगर मुस्लिम कल्चर है तो मैं मुस्लिम कल्चर में इसके अलावा अगर कोई कल्चर है तो वह

मेरा नहीं है। मेरा तो यह है। यह लिस्ट जिसके पास भी है, उसका नाम कुछ हो, वो किसी भी जात में पैदा हुआ हो, वो मेरे कल्चर का है। और इससे जो बाहर है, मैं तमिलनाडु जाऊं, वो तमिल बोलता है, तो मैं उससे क्या बात करूंगा? उसका नाम होगा उमर अब्दुल्ला या कुछ भी। मैं क्या करूंगा? मेरे काम का नहीं। वो मेरे काम का नहीं।

आपको अजीब बात बताऊं? आइडेंटिटी कैसे बनी? आई वाज़ इनवाइटेड टू कराची। इससे पहले, अभी तो लाहौर में गया था। एक बार कराची फेस्टिवल में बुलाया तो मैं गया। वैसे भी मैं देखना चाह रहा था क्या है। तो वहां पार्टी जो सेक्रेटरी थे, सिंध गवर्नमेंट के चीफ सेक्रेटरी, उन्होंने अपने घर पर डिनर रखा, मुझे बुलाया। अब इंट्रोडक्शन हो रहा है। उसे, उससे ये हमारे दोस्त हैं, भगवान दास साहब। भगवान दास ही नाम था। भगवान दास साहब और यह एमएनए, यानी मेंबर ऑफ नेशनल असेंबली। पहला मेरा रिएक्शन यह हुआ कि यार, ये मेरा आदमी यहां का फंसा हुआ है। पहला मेरा एक प्रोटेक्टिव फीलिंग हुई उसके बारे में। तो मैंने दो-चार मिनट बात की इधर-उधर की। लेकिन वो रेपो उससे मेरा एक सेकंड में हो गया। उसने अगले दिन मुझे घर बुलाया, अपने बच्चों से, बीवी से मिलाया। तो अब उतने जो बैठे हुए थे, वो उर्दू भी बोल रहे थे और वो मुसलमान नाम भी थे उनके। मगर मेरा उनसे ज्यादा आइडेंटिफिकेशन इससे हुआ कि यह मेरा आदमी इधर फंसा हुआ है। तो डिपेंड करता है कि किस सिचुएशन में आप किससे मिलते हैं। आपकी आइडेंटिटी जो है, बंधी-टिकी नहीं है। आपकी आइडेंटिटी चेंज होती रहती है। मतलब अगर मैं यहां पर कोई लखनऊ को मिलेगा तो एकदम उससे बहुत अच्छी तरह मिलने लगूंगा। लेकिन अगर मुझे सिलिकॉन वैली में जो महाराष्ट्रीयन मिलते, उनसे इतने अरे यार, आप यहां कैसे? बड़े फख्र से मुझे पता नहीं था कि सिलिकॉन वैली में इतने महाराष्ट्रीयन हैं। एंड दे आर डूइंग सो वेल। मैं यही सोचता था, भाई तमिलन जाते हैं, केरला के जाते हैं, महाराष्ट्रीयन अपने घर में खुश रहते हैं। लेकिन वहां बहुत दे आर डूइंग वेरी वेल, वेरी वेल। तो ये है आइडेंटिटी। जो मेरी मुस्लिम आइडेंटिटी है, वो यूपी की, अवध की है, उर्दू की है, गजल की है, शामी कबाब की है, बिरयानी की है और गाव तक की है। बस। और उसी के साथ मैं टोटली एथ हूं। यह जो है, बिरयानी के साथ मुल्ला जी को खाना पड़ेगी मेरे साथ। यह रियलिटी है।

सर, कुछ सवाल ऑडियंस से आए हैं। एक सवाल ऐसा है कि जो धर्म सत्ता और रिलीजन और पेट्रियार्की, यह एक ही कॉइन की दो साइड्स हैं और नास्तिकता फेमिनिज्म की तरफ कैसे देखता है?

देखिए, मैं एक हार्डकोर फेमिनिस्ट हूं और इस हद तक हूं कि जो एपिक्स बॉडी है हिंदुस्तान में वुमन राइट्स के लिए लड़ने के लिए, एंपावर के लिए, उनका एंथम मैंने लिखा है। मुझे बहुत जगह बुलाया जाता है वुमन एंपावरमेंट पर बोलने के लिए। एंड दिस टॉपिक व्हिच इज वेरी क्लोज टू माय हार्ट। तो एक मेरा सवाल है। जब इतना मेरे दिल में मोहब्बत और इज्जत है, मैं बिलीव करता हूं। अभी मैं अभी कह रहा था इन लड़कियों से कि 50 साल लगे, कि 100 साल लगे, यह दुनिया औरत टेक ओवर कर लेगी। और उसका रीजन मैं बताऊं, मैं क्यों कहता हूं? यह नहीं कि पोएटिक जस्टिस है। नहीं, पोएटिक जस्टिस नहीं है। दुनिया में यह लॉजिकल होती है चीजें। दो चीजें हुई हैं जिनका देखने में आपस में कोई संबंध नहीं है। एक क्या? दुनिया के हर समाज में औरत को एक बहुत छोटी सी जगह पर कैद कर दिया गया कि बस इतने एरिया में तुम घूम फिर सकती हो। इससे आगे तुम नहीं जा सकती। इससे आगे तुम कोई काम नहीं कर सकती। अरे भाई, चलो औरतों को साइंस नहीं आती है और वो मैथमेटिक्स में कमजोर होती है, ये सब झूठ है। लेकिन मान लेता हूं। उन्हें रंग का तो सेंस होता है। उन्हें म्यूजिक का तो सेंस होता है। दुनिया के ज्यादातर फोक सॉन्ग औरतों के बनाए हुए हैं। अगर औरतों को रंग का सेंस होता है, तो कोई पिकासो, कोई रेम्ब्रांट, कोई मति क्यों नहीं पैदा हुई दुनिया में? तुमने उसे पैदा नहीं होने दिया। अगर उसे म्यूजिक का सेंस होता है, तो कोई बीथोवेन, कोई बाख क्यों नहीं बना? कोई औरत इसलिए कि तुमने उसे बनने नहीं दिया। उसके टैलेंट को कुचल दिया। हकीकत ये है। और अब वो धीरे-धीरे बंधन टूट रहे हैं। लेकिन अभी बहुत लंबा रास्ता है। अभी भी बहुत लंबा रास्ता है। आप ऐसा मत समझिए सब हो गया है।

अब मैं यह सब कहने के बाद, मैंने यह राइट अर्न किया है कि मैं एक सवाल औरतों से करूं। आप लोगों को अकल नहीं है कि सारे मजहब आपके खिलाफ हैं? आप लोग मर्दों से ज्यादा धर्म मानते हैं? प्रॉब्लम यह नहीं है। प्रॉब्लम मैं बताता हूं क्या है। इन्हें अच्छा पति नहीं मिलता, इसलिए अच्छा भगवान ढूंढती हैं। सच ये है कि भैया, अगर रियल में नहीं है, तो अनरियल में ही हो जाए कुछ। यह सारे धर्म जो हैं, जो आप अपने बच्चों को सिखाते हैं, आप क्या तैयार कर रहे हैं? आप फ्रॉड बच्चों को बना रहे हैं। अपने बच्चों को जब आप उन्हें धर्म सिखा रहे हैं, इसलिए कि ये हर धर्म दुनिया का एंटी-वुमन है। वो औरतों को सेकेंडरी समझता है। आप यह चीज क्यों सिखाते अपने बच्चों को? यह जब लड़की का मैं अखबार में पढ़ता हूं कि एक घर में दहेज के लिए लड़की जला दी गई, तो मैं सच कहता हूं, मुझे उसके मां-बाप से नफरत हो जाती है। यह लड़की ससुर, सास ने और नंद ने नहीं जलाई है। यह लड़की मां-बाप ने जलाई है। यह कैसी लड़की आपने पाली थी कि वो जल गई?

एक चाइना में एक डिश है। हम अपनी बेटियों को कैसे पालते हैं? या आप लोग करते हैं, आप करती औरत, और आपको नहीं करना चाहिए। वहां क्या करते हैं? अंडे से जैसे ही चूजा निकला, केतकर साहब, उसको एक लकड़ी के फ्रेम केस में बिठा दे और मेवा खिला। फिर वो चूजा मोटा होना शुरू होता है, फंसता है, तो उसने से निकाल के उससे बड़े केस में बिठा। फिर मेवा खिलाते रहते हैं। फिर वो उसमें फंसने लगता है, तो उसे करते-करते करते पूरा चिकन बन जाता है। और बहुत मोटा-ताजा। उसने जिंदगी में मूव नहीं किया कभी। वो केसेस में चलता रहा। उसके बाद जब उसे पकाया जाता है, तो उसमें हड्डी नहीं होती। हड्डी होती नहीं। दैट इज हाउ वी ब्रिंग अप अ डॉटर। आप अपनी बेटियों की हड्डियां ही नहीं बनने देते। तो जलेगी नहीं तो क्या होगा? मेरी बेटी को जला के दिखाए कोई। इतना मारेगी सीधा कर। बेटी, अब तुम जा रही हो, अब तुम पराई हो गई। क्यों पराई हो गई? जरा सी गड़बड़, फौरन आ जाना वापस। मैं तो यह सिखाऊंगा अपनी बेटी। तो यह गलत मोरालिटी, यह जो है, एक दासी का रूप। हर रिलीजन में बीवी को एक सपोर्टिंग कास्ट में लिया गया है। आप ये बच्चों को सिखा रहे हैं। और फिर आप कहते हैं, हमें इक्वलिटी चाहिए। और अगली जनरेशन को इक्वलिटी मिलेगी? नो थैंक्स टू यू। नो थैंक्स टू योर रिलीजन। औरत यहां तक पहुंची है, इन स्पाइट ऑफ योर रिलीजन, नॉट बिकॉज ऑफ इट। तो कम से कम अब, अब सोचिए। आप दुश्मनी करते हैं अपने बच्चों से भी, लड़के से भी और लड़की से भी, उसे धर्म सिखा के। जो सध जी, एक सवाल यह आया है कि जब आपका जन्म हुआ तो आपके वालिद, ये आप सही कह रहे हो, ये हुआ था। ये बहुत दिनों बाद मैंने एक न्यूज़ सुनी जो सच है जी। तो आपके कान में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पढ़ा गया? तो आपने जोया और फरहान के कान में क्या पढ़ा था? यह सवाल आया।

सर, मैंने तो उनके कान में कुछ भी नहीं पढ़ा। सच बात है। लेकिन मैं यही बात शायद थोड़ी देर पहले कहां कह रहा था कि मेरी लाइफ में रिलीजन है। मेरी लाइफ में रिलीजन एक विलन की तरह है जिससे मैं लड़ता हूं और जिससे इस बारे में मैं सोचता हूं, तो मुझे गुस्सा आता है और मैं लोगों को कन्वेंस करना चाहता हूं। उनकी लाइफ में है नहीं। मतलब कि यह बुरा है। बुरा होने के लिए भी तो होना चाहिए ना? वो है ही नहीं। उनके दो बेटियां पैदा हुई, उसके फरहान के। वो हॉस्पिटल में जो फॉर्म था, उसमें एक होता था रिलीजन। उसके आगे उसने बगैर किसी तकलीफ के या कोई रेवलरी बने बगैर, नॉट एप्लीकेबल लिखा। नहीं, कोई हमारा नहीं है मजहब। उसम कोई गुस्सा, कोई इंटेंसिटी, कोई पैशन भी नहीं हमारा। कोई धर्म नहीं है। नहीं, खतम। तो मेरे बच्चे टोटली रिलीजियस हैं। टोटली। उनका कोई संबंध ही नहीं है। उनको मालूम ही नहीं ठीक से कि ये सब भी दुनिया में है। कुछ वेगली सुनते हैं। मतलब अभी मेरी बेटी ने वो बनाई, मेड इन हेवन। तो उसमें एक वो था कि वो लड़की जो है, मुस्लिम फैमिली दिखाती है, जिसमें वो जो बीवी है, उसका हस्बैंड जो दूसरी शादी कर रहा है। तो वो जाकर कोर्ट में जा, ये उसका। तो अब ये निकाह का एक सीन था। तो मुझे उसने फोन किया, हाउज निकाह हैपन? उसने तो कभी देखा ही नहीं अपनी लाइफ में। तो मैंने कहा, भा, मुझे भी ठीक से पता नहीं है। मैं कुछ दोस्तों से पूछ-पाछ के बताऊंगा। तो किसी से करवा के उनको कैसे बोलते हैं, क्या बोलते हैं। मैंने विजवा दिया। मगर फॉर हर, निकाह उतना ही फैमिलियर था जितना के अंटार्कटिका में एस्किमोस कैसे शादी करते हैं। तो उतना उन्हें पता ही नहीं। उसका कुछ संबंध ही नहीं। उन्होंने अपनी जिंदगी में घर में कोई रिलीजियस बात देखी नहीं। मुझे याद है, फरहान आठ साल का था और आठ साल का बच्चा बहुत बड़ा बच्चा होता है। ये कोई ऐसा नहीं होता, घुटनों पर चल रहा है। वन डे ही केम बैक फ्रॉम द स्कूल। मुझे इतना क्लियर याद है। तो वो मेरे पास आया, बहुत ही हैरत से सीधा। एंड आर वी मुस्लिम? तो उसे आठ साल की उम्र में पहली बार वो स्कूल में किसी ने कहा होगा। उसे मैंने कहा, देखो बेटा, क्या है? अब बड़ा मुश्किल होता है बच्चों को समझाना। इसलिए कि ये आप उनको एलिनिएट कर दें। देयर इज नो गॉड। घबरा जाएगा बच्चा कि सारे तो टीचर तो कहती है, गॉड है। बच्चे कहते हैं, गॉड है। मेरा बाप बता रहा, गॉड नहीं है। तो संभाल के चलना पड़ता है। तो मैंने कहा, देखो बेटा, क्या होता है कि कोई भी आदमी पैदा हो, तो किसी ना किसी सिटी में तो पैदा होगा ना भाई? वो बॉम्बे में पैदा होगा, पुणे में पैदा होगा, जबलपुर में पैदा होगा, कलकत्ता में। कोई तो सिटी होगा। नहीं तो गांव होगा, नहीं तो डिस्ट्रिक्ट होगी। कहां पैदा होगा? कहीं तो पैदा होगा ना? इसी तरह लोग हैं, वो किसी ना किसी कम्युनिटी में पैदा होते हैं। तो उसकी कोई पोटेंस नहीं है। उसकी क्या बहुत इंपॉर्टेंस है? तुम किस शहर में पैदा हुए हो? तुम क्या कर रहे हो? क्या नहीं करते हो? ये इंपॉर्टेंट है। और तुम्हारे दोस्त हैं, वो कहीं और पैदा हुआ था, किसी और शहर में। तो इसी तरह ये जो कम्युनिटी है, ये पॉपुलेशन के सिटीज हैं। अलग-अलग सिटीज हैं पॉपुलेशन के। उम कहीं तो पैदा ही होता। तुम ये हो गए। तो ये बात फिर वो आके पूछते थे, दोनों बच्चे मुझे। ये गॉड गेट्स एंग्री ऑन दिस? इफ वी डू दिस? तो मैंने उन्हें कभी नहीं कहा। जो और छोटे थे, जब पांच साल, छह साल, तो मैंने कभी नहीं कहा कि देयर इज नो गॉड। तो यस, यस, गॉड गेट्स। यू कैन लीव गॉड। गॉड से प्रॉब्लम नहीं है। जब गॉड को आप क्लासिफाई कर देते हैं और उसे पर्टिकुलर बना देते हैं, तो प्रॉब्लम शुरू होता है। गॉड जेनेरिक है। ये बड़ा होगा, ठीक है। जैसे टूथ फेरी को भूल जाएगा, जैसे सैंटा क्लॉस को भूल जाएगा, वैसे गॉड को भी भूल जाएगा। जहां इसे आपने क्लासिफाई किया, वो वाला गॉड। उसमें फिर क्या है कि टूथ फेरी तो भूल जाएगा, सैंटा क्लॉस भी भूल जाएगा और भी जो भूत होते हैं, दोपहर में बच्चों को पकड़ के ले जाते हैं, अगर धूप में खेलते बच्चे, वो सबको भूल जाएगा। लेकिन ये भगवान नहीं भूलेगा। तो इसको कोई पर्टिकुलर गॉड मत बताओ। वो वाला गॉड। फिर ये लिपट जाएगा। इस जेनेरिक गॉड छोड़ देगा और छोड़ दिया। जी। और एक बात मैं कहना चाहूंगा, जो मेड इन हेवन, जोया अख्तर ने बनाई है, जैसे सर ने कहा, उसमें एक निकाह का सीन है। वो सीरीज मैंने देखी है और उस सीन में एक बुद्धिस्ट वेडिंग का सीन शायद पहली बार किसी फिल्म या टेलीविजन ने दिखाया है। तो ये जो वैरायटी जो उन्होंने की है सीरियल में, मैं उनको कांग्रेचुलेशन करना चाहूंगा। आपके जरिए थोड़ा मुझे भी कर दीजिए। जी, जी।

एक सवाल आया है कि आपके जो टीवी पर डिबेट्स होते हैं रिलीजियस गुरुस के साथ, जग्गी वासुदेव या श्री श्री रविशंकर या इनके साथ। तो ये डिबेट्स के बाद क्या आपको थ्रेट्स वगैरह आते हैं उनके डिसिपल्स से?

वो तो देखिए, मेरा मुझे बड़ा आराम है। मुझे, मैं भी अभी दिखा दूंगा, मेरे पास फोन मेरी जेब में है। मुझे टच, दोनों तरफ से गालियां आती हैं। तो जिस दिन एक तरफ से गाली आना बंद हो गई, उस दिन मैं परेशान हो जाऊंगा कि अभी मैं कुछ गड़बड़ कर रहा। ये क्या हो रहा है? दोनों तरफ से कैसे नहीं आ रही? तो वो कुछ ना कुछ चलता रहता है। कभी इधर, कभी उधर, कभी आगे, कभी पीछे। तो मैं चार दफा बॉम्बे पुलिस ने मुझे प्रोटेक्शन दिया। मांगा, मैंने एक बार भी नहीं था। वो खुद ही। मैं दिल्ली से वापस आया, अभी आखरी जो था, तो घर पर बाहर वो जीप खड़ी हुई है, कुछ पुलिस वाले लॉबी में बैठे। तो मैं, क्या, क्या हुआ भाई? तो वो साहब ने बोला है, क्या एक थ्रेट, थ्रेट परसेप्शन। तो अभी कुछ दिन, इससे पहले भी हमेशा पुलिस वाले खुद भेज देते। चार में से तीन बार आया मुझे मुसलमानों की वजह से और एक बार आया हिंदुओं की। तो अभी जो है, हिंदुओं के पास राइट है दो और बार करने का। तो चलता रहता है। तीन उनके भी हो जाएंगे ना? तीन इधर हैं। अभी क्या करें? अब वो एक जमाने में, अभी तो बहुत कॉमन हो गया है ये। जब ये उ चला था, ये अपनी शाबान, तो मैं और शबाना, कभी भी मर्डर हो जाएगा, ऐसा लगता था। इतना बड़ा था। फिर ये हिजाब पर जब बहस हुई थी, बुरखे पे। देखो, हिजाब इतना बुरा नहीं लगता। चलो भाई, वो गोल, ये ईस्टर्न यूरोपियन औरत भी बांधती है। ऐसा कुछ नहीं है। फेस तो दिख रहा है ना? ये बुर्का, शटल कॉक जो है, ये मुझे नहीं। एक और चली जा रही है, शटल कॉक चली जा रही है, काले रंग की। ये दिस इज रॉन्ग। आपको फेस, आप नहीं छुपा सकते पब्लिक। दिस इज अगेंस्ट सिक्योरिटी। दिस इज अगेंस्ट द डिग्निटी ऑफ द सोसाइटी। नॉट ओनली यू, योर डिग्निटी तो गई। सोसाइटी, म सोसाइटी में सिर्फ लुचे घूम रहे हैं क्या? और आपका फेस, आप आपकी उम्र हो चुकी है 56 साल और 60 साल। आप फेस अपना छुपाए क्यों? अपने को फ्लर्ट कर रही है? कौन देखने वाला है आपका फेस? तो ये, ये मुझे पसंद नहीं। ये बुर्का जो है ना, ये दिस इज अनवे। और बाकी ये जो है, जो बांधे हुए हैं सर पे, क्यों बांधे? हमारे बचपन में तो कभी हमने देखा नहीं। मैं तो अलीगढ़ में रहा हूं, यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ा। मैं अलीगढ़ में था बचपन में, एक स्कूल में, तो सब देखते थे। इतनी लड़कियां, कोई नहीं बांधती थी। कोई नहीं था। लखनऊ में, भोपाल में, जहां मैं कॉलेज में था, कोई लड़की को मैंने हिजाब बांधे नहीं। दे। ये हिजाब जो है, आया पेट्रोल। ये पेट्रोल डॉलर के में लिपटा हुआ। इसी में बांध के लाए थे। ठीक है। उसको ज्यादा इगोई बनाने की जरूरत नहीं। बा, बा, क्या कर? हमारा क्या बिगाड़? उसके कान में आवाज कम जा रही होगी। कान दोनों बंद हैं। मगर अफसोस है। दिस इज नॉट मेजर इशू। इससे ज्यादा बड़े आप लोग अभी बात कर रहे थे पर्सनल लॉ की।

देखिए, जो राइट विंग है, वो कहता है कि हिंदुस्तान में माइनॉरिटी का पपमेंट हुआ। ये बिल्कुल बेबुनियाद बात नहीं है। इसमें थोड़ी सच्चाई है। और वो सच्चाई यूं है कि हिंदुस्तान में माइनॉरिटी का जो राइट विंग था, उसका पपमेंट सेकुलर माइनॉरिटी का नहीं हुआ। अभी मैं आपको कई बातें बताता हूं, आप बड़े हैरान होंगे। सेकुलर मुसलमान जो है, या जो लिबरल मुसलमान है, वो किसी भी पार्टी को काम का नहीं लगता। ये बेकार है। वो जो है, आंखों में सुरमा लगाए, टोपी पहने, दाढ़ी, ऊंचा पजामा। ये है आदमी। हमें ये चाहिए। क्यों? उसकी सिंपल रीजन ये है कि हिंदुस्तान के ज्यादातर मिनस्क्यूल छोड़ दीजिए, जो एक-एक परसेंट या डेढ़ परसेंट होंगे। बाकी जो पॉलिटिशियन हिंदुस्तान के, रिस्पेक्टिव ऑफ द पार्टी, उनकी हिंदुस्तान में दो लोगों के बारे में ओपिनियन बहुत खराब है। एक मुसलमानों के बारे में और एक हिंदुओं के बारे में। उनकी ओपिनियन अच्छी नहीं। वो समझते हैं बड़े घटिया लोग। अगर हम इस घटिया मुसलमान को लेंगे, तो ही मुसलमान हमारे पीछे आएंगे। अगर कोई पढ़ा-लिखा समझदार मुसलमान लिया, तो इनके पीछे कौन आएगा? जब राइट होता है, या एक स्टेटमेंट आता है ऐसा, जो कि शॉकिंग हो कि ये इस आदमी ने क्या कह दिया, इस राइट विंग हिंदू लीडर ने, और पुलिस की हिम्मत नहीं पड़ती उसे गिरफ्तार करने की, तो क्या पुलिस उस एक इंडिविजुअल से डरती है? क्या सरकार उस इंडिविजुअल से डरती है? नहीं। वो आम हिंदू से डरती है। वो समझती है कि अगर इसको गिरफ्तार कर लिया, तो आम हिंदू नाराज हो जाएगा। तो आम हिंदू के बारे में क्या राय है इनकी? अच्छी राय कैसे हो सकती है? तो ये हिंदुओं को और मुसलमानों को बहुत ही घटिया और खराब समझते हैं। और इन्होंने हमेशा यही किया शुरू से। जो भी पार्टी पावर में आई है, जो पार्टी पावर में नहीं है, इस मामले में उनकी पॉलिसी एक रही। के जो सबसे शाही इमाम, अरे जिस शाही इमाम के पास हिंदुस्तान का होने वाला प्राइम मिनिस्टर जाए, उस आदमी की मुसलमानों के बारे में राय क्या होगी कि ये उनका लीडर है? या हो सकता है? तो इसके मतलब तुम्हारी राय खराब है इनके बारे में। और वो हिंदू लीडर भी पैदा हुए हैं फॉर एक्सट्रीम राइट विंग के, जिन्होंने कहा, हां जी, ये राइट जो हुआ है, मैंने कराया। ये मैंने अपने लड़के भेजे थे राइट के लिए। आप जानते हैं। और सरकार की हिम्मत नहीं हुई उन्हें अरेस्ट करने की। क्यों? इसलिए कि उनकी राय हिंदुओं के बारे में खराब। अगर इस आदमी को हमने अरेस्ट किया, तो हिंदू तो नाराज हो जाए। तो हिंदुस्तान के पॉलिटिशियन के लिए जरूरी है, वो आम जनता के लिए, जो हिंदू और मुसलमान दोनों हैं, अपनी ओपिनियन थोड़ी सी बेहतर करें। आम जनता ने उन्हें कोई रीजन नहीं दिया है। सच बात तो ये है। इमरजेंसी में ये शाही इमाम जो था, ये कौन लाया था? ये लाए थे अटल बिहारी वाजपेयी जी और आडवाणी जी। जो पहला वहां पर वोट हाउस क्लब पर जलसा हुआ था, जिंदगी में पहली बार पब्लिक, इतने बड़े पब्लिक प्लेटफार्म पर, ये इन दोनों के साथ था शाही इमाम। तो आपको शाही इमाम मिला था और कोई नहीं मिला? तो आपकी क्या राय होगी मुसलमानों के बारे में? और उस इमरजेंसी में कांग्रेस के खिलाफ अगर म्युनिसिपल लैंप पोस्ट खड़ा कर देते, तो वो भी जीत जाता। लेकिन शाही इमाम ने फतवा दिया कि ये तीन जो दिल्ली में, ये जो चांदनी चौक वगैरह का एरिया है, इसमें तीन मुसलमान जो खड़े हुए हैं, इनको आप वोट दीजिएगा। वो तीनों हारे। राय नहीं। हिस्ट्री आप वो देख लो। तो ये जो है, अपीजमेंट। 1956 में आया हिंदू कोड बिल। इट वाज वेरी टिमिड सा था। उसके ऊपर जनसंघ ने हंगामा कर दिया कि आप ये क्या कर रहे हैं? हमारा धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं आप। लेकिन वो आया और उसे पास किया गया। फिर उसके बाद धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे उसे इंप्रूव करते रहे। 2005 में उन्होंने बेटी को भी इक्वल को पार्टनर प्रॉपर्टी में इन्हेरिटेंस। पर्सनल लॉ को हाथ क्यों नहीं लगाया? आप तो सेकुलर हैं। आपके लिए दोनों लॉ बराबर होने चाहिए। मुस्लिम पर्सनल लॉ में बना था, अ कमेटी हेडेड बाय ब्रिटिशर। वो जो बना था लॉ, वो आज तक वही था। ये पहली बार उसमें दखल दिया है प्रेजेंट गवर्नमेंट ने कि इंस्टेंट डिवोर्स को बैन किया। वरना इतने वर्षों तक आपने उसे हाथ नहीं लगाया। क्यों? क्यों आप तो सेकुलर हैं। और आपने ये चेंज किया। हिंदू कोड बिल बनाया और उसे इंप्रूव किया। इसमें क्यों आपको चार्ट? तो आप अपीज कर रहे थे ना? फंडामेंटल को भगती है। ये जो हो रहा है, इसमें एक रियलिटी है। और आइंदा भी आप अगर अब ये दूसरा हो रहा है, अब हिंदू फंडामेंटली किया जा रहा है। वो भी इक्वली गलत है। ये बोलते मुसलमान टेररिस्ट होते हैं। मुसलमान हिंदुस्तान में 20 करोड़ मुसलमान। ये जो पूरा प्रॉब्लम कश्मीर का अपने पीक पीरियड पर जब था, तो इंटेलिजेंस रिपोर्ट थी कि कोई 10 से 12 हजार ये हैं मुजाहिदीन अक्रॉस द बॉर्डर, दोनों तरफ मिला के। हिंदुस्तान का अगर 1% मुसलमान टेररिस्ट हो, तो इस मुल्क में 20 लाख टेररिस्ट होंगे। अगर हाफ परसेंट हो, तो 10 लाख होंगे। अगर पॉइंट 4 परसेंट हो, तो 5 लाख होंगे। 0.01% हो, तो तो 4 लाख होंगे। 10-12 हजार थे वो। एंड यू आर विलिंग टू बिलीव, भैया, इनको घर नहीं देना चाहिए। ये क्या मालूम टेररिस्ट?

हो, क्या हो? ये क्या आपको पट्टी पढ़ाई गई है और आपने पढ़ भी ली? तो है क्या कि खराब करते हैं एक्सट्रीमिस्ट। गलत स्टेटमेंट देते हैं एक्सट्रीमिस्ट, गलत स्टैंड लेते हैं। मतलब दे वर डाइंग के ये चेंज ना होने पाए। इंस्टेंट डिवोर्स, जबकि यह बांग्लादेश में बैन है, यह इजिप्ट में बैन है, यह लिबिया में बैन है, यह सीरिया में बैन है। यह तो मुस्लिम कंट्री है भाई, उन्होंने बैन किया हुआ है। हिंदुस्तान में क्यों था? माइनॉरिटी का ख्याल रखना। माइनॉरिटी का तुम ये ख्याल रख रहे हो? अपनी औरत को एक मिनट में घर से निकाल दे। वाह, क्या ख्याल है! और वो औरत तो माइनॉरिटी है ही नहीं ना, इंडिया की सिटीजन है वो। वो तो आसमान से उतरी है। तो यह सारी गलतियां की गई हैं ना, जिसे हम भुगत रहे हैं। तो कम से कम 90% तो शायद सरकार चेंज हो जाए। तो इतना तो रखिए कि अब यह गलती ना कीजिएगा। आपको डर क्या है? मैं पूछता हूं। मैंने अभी टीवी पर पूछा कि भैया, तुम ये जितने मुल्ला हैं, जितने हरी टोपी वाले, दे विल गिव देयर राइट आर्म टू सेंड देयर चिल्ड्रन टू अमेरिका। इन्ह अमेरिका का बड़ा फिक्र। तो वहां तो कॉमन सिविल कोड है, तो वहां कैसे रहते हो? और क्यों जाना चाहते हो वहां? तुम सिंगापुर में कैसे रहते हो? तुम हांगकांग में कैसे रहते हो? कि तुम्हें इंडिया में चाहिए, बाकी जगह चलेगा? तो आप इनके साथ इंसाफ तब कर सकेंगे जब आप इनकी गलत बातों को साफ बोलेंगे। ये बर्दाश्त नहीं होगा। ठीक है, हम तुम्हारा घर भी नहीं जलने देंगे, दुकान भी नहीं जलने देंगे। और यह तुम, यह जो है अपना, यह कानून गलत नहीं रख सकते। आप दूसरा काम करते। यहां उन्हें गलत कानून रखने देते, वो उनकी दुकान जलने देते। 75 साल से मैं तो यही देख रहा हूं। तो दोनों जगह आप गलत काम कर रहे हैं। आपसे मतलब है एस्टैब्लिशमेंट, वो किसी भी पार्टी का हो। सबने एक लाइन से यही काम किया। कोई नहीं जो कहे हमने नहीं किया। तो ये बंद होना चाहिए। यह तमाशा तब बंद होगा जब आप ईमानदारी से और सच्चे दिल से सेक्युलर होंगे। इवन हैंडेडली, चाहे वह माइनॉरिटी हो कि मेजॉरिटी। मेजॉरिटी ने ठेका नहीं लिया सेक्युलर होने का। उतना ही जिम्मेदारी माइनॉरिटी की। और वह उनको सुनना रना, वो भी नहीं करेंगे। वो कहेंगे भैया, हम ही क्यों?

ये सर, एक ऑडियंस में से क्वेश्चन आया है कि यूजुअली जो सोशल रिफॉर्म होता है, वो अगर किसी धर्म के अंतर्गत मतलब इंटरनल मामले के बारे में हो, तो उसी धर्म के लोग अपोज करके कुछ रिफॉर्म क्रिएट करते हैं। ओके। आप आइए मुंबई, एक-दो मौलवियों से मिलवा दूंगा, ठीक हो जाएंगे आप। कभी नहीं करेंगे। ये मर जाएंगे और उनमें से काफी ऐसे हैं जो मर जाएंगे कुछ दिनों में, लेकिन, लेकिन ये चेंज नहीं होंगे। ये भूल जाइए। ये आपको इंपोज ही करना पड़ेगा। आपसे कह रहे हैं कि जो हार्डकोर राइट विंग हिंदू थे, जब वो कहते कि हां भाई, हिंदू कोड बिल बनना चाहिए, तब हम बनाते। ऐसा तो आपने नहीं किया। आपने तो उनकी मर्जी के खिलाफ बनाया था। वो तो इतने लड़ मर रहे थे। नहीं, आपको कोई इंसाफ का लॉ ऐसा नहीं हो सकता जो हर एक को खुश करे। पॉसिबल नहीं। ये लॉ क्या हो गया? बीजेपी ने बंद कर दी इंस्टेंट डिवोर्स और खराब कानून बना के की, लेकिन की ना? क्या किया इन्होंने? कुछ नहीं। आप इन्हें ज्यादा ढील देंगे तो ये सर पर चढ़ जाएंगे। आप बोल रहे भैया, देखो, ये सेक्युलर मुल्क है। यहां ये एक्सेप्टेबल है, ये एक्सेप्टेबल नहीं। हम तुम्हारी जो सही डिमांड है, वो हम मानते हैं। वो हम मानेंगे, उसके लिए हम लड़ेंगे। लेकिन हम तुम्हारी गलत डिमांड को नहीं मान सकते। ये गलत डिमांड मानते हैं और सही नेसेसिटी पे कुछ नहीं करते। ये दोनों गलत काम करते। राइट। सो सर, प्रिसाइज क्वेश्चन ये था कि हमें मुस्लिम कम्युनिटी में से दूसरे हमी दलवाई कब मिलेंगे? क्योंकि वो काफी एक्सटेंट तक इंटरनल। ऐसा नहीं है किसी भी वक्त में। और ये आज से नहीं, मैं कहूंगा 400-500 साल से। अगर आप देखेंगे, मुस्लिम राइटर्स को लीजिए, मुस्लिम पोएट्स को लीजिए, दे आर एक्सट्रीमली सेक्युलर पीपल। दुनिया में जितनी लैंग्वेजेस हैं, वो शुरू होती हैं रिलीजियस पोएट्री से, हिम से, भजन से, इन प्रेज ऑफ द डेटी, इन प्रेज ऑफ द गॉड। ये वो। उसके बाद धीरे-धीरे दे ट्रांसफॉर्म और दूसरे टॉपिक भी उसमें आना शुरू होते हैं। चाहे रोमांस हो, रोमांस से आगे जाते हैं, सोशल इश्यूज हो, वगैरह। उर्दू पोएट्री इज वन पोएट्री इन द वर्ल्ड जो पहले दिन से एनोनिमस थी, एंटी-रिलीजियस नैरो माइंडेडनेस। पहले दिन। मैं आपको 350 साल पहले, 400 साल पहले के शेर सुनाऊंगा, आप कहेंगे यार, तो कोई लिख जाए तो मर्डर हो जाएगा। ऐसी पोएट्री है उसकी। एक किकर साहब, ये 350 साल पहले का शेर है। ये मीर का एक कंटेंपरेरी था। के काबा जो ढह गया है, तो क्या जाए गम है? शेख, शेख जो है, वाइज जो है, ये नासे जो है, जाहिद जो है, ये सब रिलीजियस फिगर्स हैं जिनको इंसल्ट किया जाता है उर्दू गजल में। दे आर विलेन एंड हीरो इज द आशिक और रिस्पा। ये हीरो। कि अगर काबा टूट गया है, डिस्ट्रॉय हो गया है, तो उसमें क्या गम की बात है? कौन से गम की जगह है? कुछ कसरे दिल नहीं। ये दिल का पैलेस थोड़ी है। काबा जो ढह गया है, तो क्या जाएगा में शे। कुछ कसरे दिल नहीं। के बनाया ना जाएगा। ये अच्छा निजात है। उर्दू लफ्ज़ है मोक्ष के सं। कि साहब, अगर मोक्ष मिलेगा तो जन्नत में चले जाएंगे। और अगर मोक्ष नहीं मिला तो जहन्नुम में जाएंगे। निजात। मीर का शेर है। अब ये भी 300 साल पुराना जाए है। जी, निजात के गम में कि मेरा दिल उसी के गम में लगा रहता जाए है जी। निजात के गम में ऐसी जन्नत गई जहन्नुम में। अरे भाई, कुरान में जिक्र है ना इसका, जन्नत का? के जन्नत ऐसी होगी, वैसी होगी, वगैरह-वगैरह। तो गालिब कहता है, हमको मालूम है जन्नत की हकीकत, लेकिन दिल के बहलाने को गालिब ये ख्याल अच्छा है। तो तो कुरान को डिनाई कर रहा है ना? तो भरी हुई। अच्छा, फिर दूसरी तरफ ये भी एक किसी ने मुझे कॉपी दिखाई थी, हिंदुस्तान हमारा। कि यहां पर एक ही जिल्द थी। ये दो वॉल्यूम मेरे फादर ने एडिट किए थे। हिंदुस्तान हमारा। कई सौ साल की उर्दू पोएट्री का सिलेक्शन है जो हमारे यहां की डेटी पर, हमारे त्यौहारों पर, हमारे शहरों पर, हमारे रुत पर, कल्चर पर जो पोएट्री उर्दू में सालों हुई। सवा सौ आपको कृष्ण पर कितनी उर्दू पोएट्री मिलेगी? कोई हद नहीं। कृष्ण, राधा, शिव, पार्वती, कितनी मिलेगी? होली, दिवाली, जन्माष्टमी, कितनी पोएट्री मिलेगी? मैं दावे से कहता हूं कि हिंदुस्तान की किसी भाषा में होली पर उर्दू से बेटर पोएट्री नहीं है। दावे से बोल रहा हूं। और वो किताब आप लोग मंगवा सकते हैं। राजकमल जो है, अपना है दिल्ली का पब्लिशिंग हाउस। हिंदुस्तान हमारा, दो वॉल्यूम में आप मंगा के। पहले तो सिर्फ उसकी व देख लोगे ना, सूची उसकी, फेहरिस्त देख लोगे, इंडेक्स। उसी से परेशान हो जाओगे। हिंदुस्तान का कोई पॉलिटिकल फिगर नहीं है। हिंदुस्तान का जब से फ्रीडम मूवमेंट हुआ, कोई ऐसा मौका नहीं है। चाहे वो क्विट इंडिया का हो, चाहे वो नॉन-कॉपरेशन का हो, चाहे कोई भी हो, गांधी जी की मरण व्रत हो, जो जिस पर आपको उर्दू में कमाल की पोएट्री नहीं मिलेगी। अच्छा, महारानी जोधाबाई हो, जो पोयम है, ये बनारस के घाट हो, गंगा जी पर हो, आपको जो पोएट्री मिलेगी, वो अनबिलीवेबल है। इस रुख को कोई जानता नहीं। ये सेक्युलर लोग थे, तो लिखा था। और ये इतने बड़े पोएट बने रहे, इसलिए कि ऑडियंस सेक्युलर थी। वरना ये बड़े नहीं बनते। जो उर्दू पोएट्री सुन रहे थे, अगर उन्होंने ये पोयम और ये शायरी एप्रिशिएट की, तो उनमें भी तो कोई सेक्युलरिज्म होगा। आपने इन सबको बुलाकर तीन मुल्ला पकड़ लिए। मुल्ला हिंदुस्तान के मुसलमान का रिप्रेजेंटेटिव नहीं है। हिंदुस्तान का रिप्रेजेंटेटिव है कपड़ा बुनने वाला मुसलमान, बुनकर जो मेरठ में, कैंची बनाता है, चाकू बनाता है, जो भागलपुर में रेशम का काम करता है, जो बनारस में साड़ी बनाता है। 13-14% मुसलमान जो है, परसेंट से ऊपर आर्टिस्ट रजिस्टर्ड मुसलमान इंडिया। ये है लोग। इनसे कभी बात भी नहीं की गई। जब अनाउंस हुआ था पाकिस्तान का, आप हिस्ट्री पढ़ लीजिएगा, मेरी राय नहीं है। 3000 बुनकरों ने दिल्ली में आकर जुलूस निकाला था उसके खिलाफ। क्या हमको नहीं चाहिए पाकिस्तान? हम बनारस में खुश हैं। उसका कोई जिक्र नहीं मिलता आपको। एक पार्टी फॉर्म की थी जिसके लीडर को कत्ल कर दिया गया। तो ये फलां वोटिंग हुई थी, उसमें तो सब मुसलमानों ने मुस्लिम लीग को वोट दिया। कौन सी वोटिंग? जो सिर्फ वो लोग कर सकते थे जिनके पास प्रॉपर्टी थी। वो यूनिवर्सल फ्रेंचाइजर तो ये बड़े-बड़े जमींदार, नवाब, अमीर, बिजनेसमैन, बोहरी और ये अमीर लॉयर्स बॉम्बे के, ये थे प्रो-पाकिस्तान लोग। इन्हें अलग अपना बना। इन्हें अपना नोट पर तस्वीर छपा नहीं थी। उन्हें मालूम था यहां तो गांधी जी की छपेगी। तो एक मुल्क ऐसा तो जा मेरी तस्वीर छपे। आम आदमी नहीं था साथ में। गलत। लेकिन ये तो चले गए वो। आम आदमी इधर रह गया। अब सजा उसको मिल रही है, व्हिच इज रॉन्ग। कहा आप बोलिए। आम हिंदू को ले लीजिए। वो किसी जगह काम करता हो, वो चाहे पुलिसमैन हो, वो दुकानदार हो, वो किसी स्कूल में पढ़ाता हो, म्युनिसिपल स्कूल। उसे टाइम है उसके पास एनर्जी है ये सब गलत काम करने का? उसको अपने बच्चों को अच्छे स्कूल भिजवाना है। अच्छा, हम पुलिस से जरा सिज कम करते हैं। आप एक आम पुलिस वाले की हालत देखिए क्या है? ना उसे आप प्रॉप। एक जगह पर एक बहुत बड़ा प्लॉट लिया गया था बॉम्बे में। भाई, यहां जो पुलिसमैन जो है, जूनियर ऑफिसर, उनके क्वार्टर बनेंगे। वो जमीन बहुत प्यारी। वहां सब बड़े-बड़े ऑफिसर के ह्यूज फ्लैट बन गए। और नीचे जो है, वो वो बन गया एक डिपार्टमेंटल स्टोर बड़ा सा। तो उससे इतना पैसा मिलता है कि इनको अपना महीने का पैसा भी नहीं देना पड़ता। तो वो घर नहीं है उनके पास। 18-18, 20-20 घंटे आप उससे ड्यूटी कराते हो। तो ऐसा नहीं है कि पुलिस को आप विलेन बना के देखें। आम आदमी, वो हिंदू है कि मुसलमान है? वो जिंदगी से जूझ रहा है। उसको दो वक्त की रोटी, बच्चे को अच्छा स्कूल, बीवी को ठीक इलाज, यही नहीं करवा पा रहा। उसके पास कहां फुर्सत है बाकी काम? लेकिन आप उसे ऐसी जगह डाल देते हो कि उसके पास चारा ही नहीं है। उसकी बाकी आइडेंटिटी आप क्रश कर देते हो। उसको सिर्फ बता देते हो तू हिंदू है या मुसलमान। उसकी तो 2500 आइडेंटिटी है। भगवान दास से जब मैं मिला था, तो मेरी कोई और आइडेंटिटी थी। मैं जब पोएट्री की महफिल में बैठता हूं, मेरी कोई और आइडेंटिटी होती है। जब मैं फिल्म राइटर, मेरे पास कितने डायरेक्टर हैं। मैं 40 साल, 45 साल से शायरी कर रहा हूं। आज तक मेरे कई डायरेक्टर ने एक बार नहीं पूछा, आप पोएट्री भी लिखते हैं? एक शेर सुनाइए। उन्होंने कभी मुझसे नहीं सुना, ना मैंने सुना है। मैं क्यों तकलीफ दूं बेचारा को? वो ज्यादा से ज्यादा अपने गाने की बात करते हैं। मैं गाना लिख देता हूं। उनका वो एक अलग डिपार्टमेंट है। फिर हमारे कोई दूसरे लोग हैं, जैसे यहां हम बैठे, ये कोई दूसरी दुनिया है। तो अलग-अलग मुकाम पे आपकी अलग-अलग आइडेंटिटी होती है। मैं क्रिकेट से इंटरेस्ट है मुझे, टेनिस से। वहां में कोई और दोस्त है। आप क्या करते हो कि सारी आइडेंटिटी को क्रश करके एक बस, जो तेरा धर्म? कोई री।

रंग जी, काफी सारे सवाल हैं, लेकिन समय की पाबंदी है। हालांकि ये एस्टा कान्फ्रेंस है, फिर भी यह तो हो नहीं सकता कि जावेद साहब हमारे बीच में हों और हम उनकी पोएट्री ना सुनें। हम तो नहीं। ऐसा कोई जरूरी नहीं। मैंने बताया, मेरे प्रोड्यूसर ने आज तक नहीं। ऐसा क्या नहीं? आपके सजेस्ट करने से पहले भी ये तय हुआ था कि हम तो सुनेंगे। स। फिर भी मैं चाहूंगा। देखिए, मैं तो यहां आप ही लोगों से मिलने आया हूं और मुझे बहुत खुशी में आया। अब एक बात मैं और बताऊं, आप समझेंगे ये कहानी बना रहा है, पर ये कहानी नहीं। 70-80 में हमारा काम बड़ा अच्छा चल गया था। 80 में भी तब तक टीवी नहीं थी, ये ये नहीं था, तो था क्या कि जब नाम बताया जाता था मेरा, ये वो है, तो लोग पढ़ी दो हाथ मिलाते, लेकिन पहचानता कोई नहीं था। रोड पर जा रहा तो कोई नहीं पहचानता। हमारी सूरत तो स्क्रीन पर आती नहीं। तो अब क्या था, जब सक्सेसफुल हो गए, तो लोग साइनिंग बड़े-बड़े अमाउंट देते थे। ये ली, ये पैसा रखिए, हमारे लिए। किस ये नहीं होता कि वो स्क्रिप्टरी। आप तो ये पैसा रख लीजिए, हमारे लिए। अब आप एक स्क हमने ले लिया, खा गए पैसा। एक बार नहीं, कम से कम दो या तीन बार। अब मैं होटल के कमरे में बैठा हूं, कागज सामने रखा है, पेन है और कुछ समझ में नहीं आ रहा क्या लिखूं। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन बैठा हूं, उठता हूं, फिर बैठ जाता हूं, सोचता हूं। तो मुझे ऐसा लगने लगता था कि भैया, जो मैं लिख सकता था, वो मैं लिख चुका। अब मैं अंदर से खाली हो चुका हूं। ये आदमी जिसने मुझे इतने पैसे दे दिए, बेवकूफ को पता नहीं कि मैं तो लिख ही नहीं सकता। पैसे मैं इसके खा गया हूं। तो अब मैं करूं क्या? तो मैं सोचता था, फैंटेसी थी मेरी, मैंने किया नहीं। मैं किसी दूसरे शहर चला जाऊं, वहां अपना नाम बदल के कोई दूसरा काम करने लगूं, भाग जाऊं। और एवरी टाइम जिस शहर के बारे में मैं सोचता था, वो था सांगली। अच्छा, सांगली क्यों? ये मेरी बाद में समझ। सांगली चला जाऊं। फिल्म इंडस्ट्री में मुझे कभी कोई आदमी नहीं मिला था जिसने कहा कि मैं सांगली का हूं। और ना मेरी किसी से मुलाकात हुई कि जो सांगली का हो। ये लोग जब आए थे, अभी अपना प्रता वगैरह, ये तो मैं जिंदगी में पहली बार सांगली के किसी इंसान से मिला। तो मैं सोचता था, यार, शहर पेपर में नाम छपता रहता तो शहर तो अच्छा ही होगा, बड़ा है, सुना। वहां इंडस्ट्री है और वो होता है शुगर केन और ये और वो। तो और वहां से इधर कोई नहीं, इधर से वहां कोई नहीं जाता। वो सबसे सेफ जगह। वहां मुझे पहचानने कोई नहीं आएगा। तो इतने दिनों बाद अब आना हुआ। उस वक्त बुरे वक्त में आप लोग ने मेरी मदद नहीं की, तो मैं यहां आया हूं। मुझे कोई जल्दी नहीं है। आप लोग को हो सकती है। आप सुबह से बैठे हैं। आपको कुछ भी पूछना हो, जितनी भी देर हो, मैं उल्टा सीधा जो भी जवाब दे सकता हूं, मैं जरूर। आपने पार्टीशन का जिक्र किया, तो मेरा एक जस्ट क्यूरियोसिटी से सवाल है, क्योंकि पार्टीशन के बारे में मैंने बहुत सारा पढ़ा है, सब कुछ किया है। तो पार्टीशन के बाद शायद कोई और भी जवाब दे पाएगा। आप ज्यादा बेहतर जवाब दे सकते हैं कि मैंने ऐसा सुना था कि बाद में बैरिस्टर जिन्ना वापस इंडिया आना चाहते थे। कौन? क्या? अरे भाई, आए होंगे। अब क्या किया जाए? नहीं आना चाहते थे? हमेशा के लिए आना चाहते थे? उन्होंने रिग्रेट किया? मैंने जो किया है, उसके लिए? उन्होंने जो किया था, उसके लिए रिग्रेट किया? ऐसा मैंने कहीं पढ़ा तो नहीं कि उन्होंने रिग्रेट किया। वो तो बड़ी जल्दी मर ही गए डेढ़ साल के अंदर। उनकी डेथ हो गई। और उसमें भी अक्सर वो बीमार थे। जो मरी-वरी कोई हील स्टेशन है, वहां पर थे। उनसे कोई मिलने-मिलने भी नहीं जाता था। जब उनकी डेथ हुई, ही वाज इन कराची, आई थिंक। तो उनकी जो एंबुलेंस थी, वो ब्रेक हो गई रास्ते में। तो कोई 40-45 मिनट कायदे आजम पाकिस्तान जो थे, वो उसमें पड़े हुए थे एंबुलेंस में, जो हाईवे पर खड़ी हुई थी। 40-45 मिनट तक कोई आया भी नहीं। ये सब तो मैंने पढ़ा है। लेकिन वो वापस आना चाह रहे थे, ये मुझे नहीं मालूम। इतना जरूर मालूम है कि पार्टीशन के कुछ दिनों पहले वो नेगोशिएट कर रहे थे कुछ प्रॉपर्टी बॉम्बे में। तो मतलब उनका इरादा कुछ और प्रॉपर्टी भी खरीद लूं। तो एक प्रॉपर्टी तो उधर बना ही रहे थे, दूसरी इधर भी थोड़ी। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि दिल्ली से, यूपी से, बिहार से, मध्य प्रदेश से, बिहार नहीं, बिहार के लोग जतर उधर गए थे। ई पाकिस्तान जो होता था, बांग्लादेश। ये जो लोग गए थे, इनमें से अक्सर वापस आना चाहते थे और आना शुरू कर दिया था। और अल्टीमेटली गवर्नमेंट इंडिया ने कानून बनाया जो सिर्फ वेस्ट पाकिस्तान के लिए था, ई पाकिस्तान के लिए नहीं। क्या आपको अब इधर आने में परमिट लेना पड़ेगा? जो कि बहुत से लोग सरकार में नाखुश। जवाहरलाल नेहरू, ये तो पता नहीं कितनों को वापस बुला लेगा। लेकिन शायद कुल मिलाकर 5000 आदमी वापस आए परमिट लेके। वो गए थे। उनको बाकी को आने नहीं दिया गया। और भी लोग आना चाहते थे। आम। उनको वहां जाकर लगा कि हमने गलती कर दी। एंड दे वांटेड टू कम बैक। ये मैंने सुना है बहुत से पाकिस्तानियों से कि उनकी जो नानी थी या उनकी दादी जो थी, वो कहती थी जब मर जाऊं मैं, तो मुझे किसी भी तरह से जाके मुरादाबाद में बरी करवाना। मुझे यहां नहीं दफन होना। या मुझे आजमगढ़ भेज देना मेरी बॉडी को, या रामपुर में करवा देना, या बनारस में करवा देना। ये बहुत कॉमन। कि उनकी ये फैंटेसी थी कि कम से कम मैं मरूं तो दफन इंडिया में तो। वो चली गई थी फैमिली चली गई, वो चली गई, लेकिन उनके दिल में वही रहा। उनको अपने शहर से उनका रिश्ता टूटा नहीं। लालू खेत एक एरिया है जहां ज्यादातर यही है रिफ्यूजी इंडिया के। तो आप जब वहां पर दुकानों का नाम पढ़ते जाओगे, तो आपको बड़ा अफसोस होगा। के अमृतसर स्वीट्स, व दिल्ली, फलां, लखनऊ, फलां, कानपुर, ये गोरखपुर। उनकी दुकानों पर उनके शहरों के नाम। पिछले दिन एक बात हुई थी, जो मुझे बहुत इनसेंसिटिव लगी। बेंगलुरु में कोई मिठाई की दुकान है कराची वाला। और उसके ऊपर लोगों ने प्रोटेस्ट किया। और उन्होंने कहा कि कराची वाला हटा दीजिए और कराची नाम मत। ये शर्म आनी चाहिए। ये वो लोग हैं सीधे-साधे सिंधी, जो वहां रहते थे। उनकी जमीन वहां पर। ये मुस्लिम लीग ने और फिनेटिक्स ने उनको वहां से निकाल दिया। जिस जमीन में और जिस शहर में उनके नस्लें रही थी, वो उसका नाम तो अपने पास रखेगा। तुम उससे नाम भी छीनना चाहते हो? तुम्हें शर्म नहीं आती? उसका वो जमीन है, उसकी जहां से उसे निकाला गया। वो उसे आज भी याद करता है। तुम्हें उसकी याद पर ऐतराज है? कैसे आदमी हो भाई तुम? सब कुछ छिन गया, मगर अपना वो कराची नाम लिए बैठा है। ये कराची क्या किसी के बाप का है जो वहां पर बैठा है? इसकी भी जमीन थी, इसका भी घर था। और जो लोग कह रहे थे, तुम कराची हटा दो, ये वो लोग हैं जो अपने शहर से मोहब्बत करना नहीं जानते। जावेद सर, प्रश्न उत्तर सेशन नाटका नंतर चालू राहील. उद्या सुद्धा एक स्लॉट उपलब्ध करून देतो. सूचना क्रमांक एक. दुसरी सूचना, जावेद सरानी आपल्या सा तीन पुस्तक दिलेली आहेत आणि तुम्हाला सगळ्यांना आनंदाने सांगायला वाटेल की त्या पुस्तकाचा विकृत जे काही पैसे येतील ते ब्राइट सोसायटी साठी त्यांनी द्याय ठरवलेल आहे. थैंक यू. थैंक यू. थैंक यू डॉक्टर ज्ञानेश आ. थैंक यू फॉर बीइंग हियर. थैंक यू सर फॉर बीइंग हियर एंड थैंक यू फॉर गिविंग सच अ वंडरफुल इंटरव्यू. थैंक यू सो मच. वी कंक्लूड हियर.