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[संगीत]
एक गरीब और नादार आदमी जिसका नाम अब्दुल्लाह था। मजदूरी की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर सफर कर रहा था। इत्तेफाक से एक शहर में उसे कुछ काम मिल गया और वह अल्लाह की नयामत से जिंदगी गुजारने लगा ताकि कुछ पैसे जमा कर सके।
अचानक उसे मजदूरी से हाथ धो बैठना पड़ा। उसने इधर-उधर काम की तलाश की मगर कोई काम ना मिला। इसलिए मजबूरन बैठ गया और अपने जमा किए हुए पैसों को खर्च करने लगा। दिल में कहने लगा कि पराए मुल्क में जिंदगी गुजारना बहुत मुश्किल है। मेरी जमाशुदा रकम जल्द खत्म हो जाएगी और दोबारा तंगदस्त और तिही दस्त हो जाऊंगा।
अब माह शव्वाल शुरू हो गया था और मेरा नाम भी अब्दुल्लाह है जो एक अच्छा और नेक महीना है। बेहतर होगा कि अपने शहर वापस चला जाऊं और बाकी मानदा रकम तिजारत में लगा दूं। इस तरह दोस्तों के साथ आराम से रहूंगा।
अब्दुल्लाह ने उसी रात अपना सामान बांधा और रकम भी उसी में छुपाकर एक गठरी बना ली। फिर अपने साथी के पास गया जो उसी तरह मुसाफिर था और एक ही किराए के मकान में रहते थे। अब्दुल्लाह ने अपने साथी को अलविदा कहा और शहर के बाहर कारवान सराय में जाकर कयाम कर लिया ताकि दूसरे दिन सुबह कारवान के साथ वतन रवाना हो।
वह रात को दूसरे मुसाफिरों की तरह कारवान सराय के सहन में अपनी गठरी के पास बैठ गया और मुसाफिरों की हलचल देखने लगा। इसी दौरान उसकी नजर दीवार पर पड़ी जहां लिखा था सामान की हिफाजत और देखभाल मुसाफिर की अपनी जिम्मेदारी है। अब्दुल्लाह ने दिल में कहा कि बिल्कुल दुरुस्त कहते हैं। यहां मुसाफिरों की भीड़ है। कोलों, गद्दारों और अपनों की आमद और रफ्त जारी है। अगर सराय के मालिक की 40 आंखें भी हो तो सब लोगों को नहीं पहचान सकता। क्योंकि चोर भी ताजिरों के लिबास में घूमते रहते हैं।
अब्दुल्लाह अपनी जगह बैठा दूसरों को देख रहा था। अचानक उसे एहसास हुआ कि उसे नींद आ रही है। उसने गठरी को करीब खींच लिया और उस पर तकिया लगा लिया। मगर उसने सोचा कि मैं इस तरह सुबह तक नहीं बैठ सकता। इसलिए गठरी की रस्सियां अपने हाथों से बांध ली और उसके पहलू में लेट कर सो गया।
सुबह सवेरे जब कारवान की रवानी का वक्त हुआ तो अब्दुल्लाह भी उठ बैठा। उसने देखा कि गठरी की रस्सियां तो उसके हाथों से बंधी है मगर गठरी का कुछ पता नहीं क्योंकि किसी चोर ने रस्सियां काट दी थी और गठरी ले गया था। अब्दुल्लाह ने आंखें मलने लगा और उठ खड़ा हुआ। उसने देखा कि ख्वाब में नहीं बल्कि जाग रहा है और चोर उसकी जमा पूंजी ले गए हैं। वह डरा और फरियाद करने लगा। ऐ लोगों ऐ लोगों कोई शख्स मेरी गठरी ले गया है। मेरी रकम चली गई है। मेरी गठरी में हजार दहम थे। सराय का दरवाजा बंद कर दो। मैं सबकी तलाशी लूंगा।
बाहर वालों ने यकीन ना किया और कहने लगे कि शायद यह खुद चोर हो और अफरातफरी पैदा करना चाहता हो। मगर जिन लोगों ने उसे रात को देखा था उन्हें यकीन था कि गठरी चोर ही ले गए हैं। अगर कोई उसे देख लेता तो जरूर पकड़ लेता। मगर सब अपने काम और आराम में मशगूल थे। सराय के मालिक ने भी लिख रखा था कि सामान की हिफाजत मुसाफिर की अपनी जिम्मेदारी है।
अब्दुल्लाह ने मुसाफिरों का सामान अच्छी तरह देख लिया मगर गठरी का कोई निशान ना मिला। इसलिए अहले कारवान कहने लगे अक्सर ऐसा इत्तफाकन हो जाता है। अब ज्यादा गम ना करो। रकम दोबारा मिल सकती है और सामान दोबारा खरीदा जा सकता है। जाओ और अल्लाह का शुक्र अदा करो कि तुम्हें कोई गाड़ी के नीचे ना कुचल लिया। सामान की चोरी होना भी एक सबक है। इसके बाद हवास जमा रखोगे। जब रकम ज्यादा होती है तो उसकी ज्यादा हिफाजत की जाती है। हम रास्ते में तुम्हारी मदद कर देंगे ताकि अपने शहर पहुंच जाओ।
मगर अब्दुल्लाह ने वापसी का इरादा तर्क कर दिया था। इसलिए कहने लगा नहीं खाली हाथ घर और शहर लौटना मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरा सफर का पहला कदम गलत साबित हुआ। मैं यहीं रहूंगा ताकि अपनी रकम की तलाश करूं। जब कारवान ने हरकत की तो अब्दुल्लाह ने दोबारा अहले कारवान का सामान देखा। मगर उसकी गठरी का कोई निशान ना मिला। इसलिए उगता गया मगर अल्लाह की रजा के लिए उन्हें अलविदा कहा।
वह निहायत परेशान था कि अब क्या करूं और जिंदगी का आगाज कैसे करूं। अब्दुल्लाह शहर की तरफ लौटा मगर उसका दिल ना चाहता था कि अपनी जाए रिहाइश पर लौटे। वह अपने दोस्तों को कल रात अलविदा कह चुका था। वह सोच रहा था कि मैं उन्हें किस मुंह से कहूंगा कि मैं अपनी पहली मंजिल पर गठरी की हिफाजत ना कर सका और मेरी एक अरसे की कमाई जाया हो गई। शायद इस तरह मेरा मजाक उड़ाए। अगर मैं साहिब सरवत के ठिकाने पर गया तो दूसरों पर बोझ बनूंगा। जबकि उनकी जिंदगी मुझसे भी बदतर है। वह गमगीन और परेशान चल रहा था। मगर उसके पांव आगे ना बढ़ रहे थे।
इसी दौरान वह मस्जिद के दरवाजे पर पहुंच गया जहां उसने उस शहर में आते वक्त पहली रात गुजारी थी। बेइरादा दाखिल हो गया। वह थका मांदा था। इसलिए एक फटी पुरानी चटाई पर बैठ गया जो एक कोने में पड़ी थी। वह गहरी सोच में डूबा हुआ था। क्योंकि हर तरफ खामोशी थी इसलिए जल्द ही उसे नींद ने घेर लिया और वहीं लेट गया।
मगर अभी वह ख्वाब ओबेदारी की हालत में था कि टकटक की आवाज से उठ बैठा। यह एक नाबीना गदागर था जिसे अब्दुल्लाह ने कई बार उस शहर में देखा था। नाबीना मस्जिद के किनारे खड़ा हो गया और कहा ए भाइयों ए बहनों क्योंकि नमाज का वक्त ना था और अब्दुल्लाह के अलावा कोई शख्स वहां ना था इसलिए उसने दिल में कहा कि यह गदागर क्या चाहता है शायद रकम मांगता होगा इसके अलावा इसका यहां क्या काम है अब्दुल्लाह ने कोई जवाब ना दिया।
इसी दौरान गदागर ने दोबारा अपना असर जमीन पर मारा और कहा कोई शख्स यहां मौजूद है अब्दुल्लाह फिर भी खामोश रहा और सोचने लगा कि यहां यहां कोई नहीं है। अगरचे अब्दुल्लाह यहां मौजूद है मगर वह तो खुद फूटी कौड़ी का मोहताज है। जब गदागर को यकीन हो गया कि यहां कोई शख्स मौजूद नहीं तो दोलान की तरफ बढ़ गया। जहां अक्सर बेघर मुसाफिर रात गुजारते थे। वहां पहुंचकर भी उसने लोगों को आवाजें दी। ऐ भाइयों कोई शख्स मौजूद नहीं जो मेरी रहनुमाई करे और रास्ता बताए।
अब्दुल्लाह ने दिल में कहा कि मालूम होता है कदागर इस जगह से वाकिफ है। अगर ऐसा ना होता तो सीधा दोलान की तरफ ना जाता। मालूम होता है इस वक्त रात को किसी खास गर्ज ओ मकसद के लिए आया है। यह भी मुमकिन है कि शहर ओ बाजार छोड़कर गदागरी के लिए मस्जिद में आ जाए। शायद इसका कोई खास मकसद होगा। अब्दुल्लाह ने चाहा कि उठकर उसकी मदद करे।
जब वह दुलान के करीब पहुंचा तो उसने देखा कि नाबीना अब भी लोगों को आवाज दे रहा है और कह रहा है यहां कौन सो रहा है मुझे वजू करा दो। अब्दुल्लाह ने दिल में कहा कि बस बेचारा नमाज पढ़ना चाहता है। बेहतर होगा कि उसकी मदद करूं। अब्दुल्लाह भी बगैर आवाज दिए दोलान में पहुंच गया और चाहा कि नाबीना के सवाल का जवाब दे। मगर किसी मसलहत की वजह से खामोश रहा।
नाबीना ने दोबारा कहा यह कौन है जो सांस ले रहा है मगर जवाब नहीं देता अब्दुल्लाह डर गया और अपने आप से कहा कि अब जबकि नाबीना सख्ती से बात कर रहा है तो मेरे लिए मुनासिब नहीं कि उसके करीब जाऊं इसलिए अपनी सांस रोक कर स्तंभ के किनारे खड़ा हो गया। गदागर कुछ आगे बढ़ा और कान खड़े कर दिए मगर उसे कुछ सुनाई ना दिया। जब उसे यकीन हो गया कि दोलान में कोई शख्स मौजूद नहीं तो वापस लौट कर दोलान का दरवाजा बंद कर दिया और दरवाजे को अपने असा के सहारे रोक दिया ताकि अगर कोई शख्स दरवाजा खोले तो असा के गिरने से खबरदार हो सके।
नाबीना आगे बढ़ा और मस्जिद की मेहराब के करीब आ गया। निहायत तेजी से सलाद की थाली और चंद फटी पुरानी किताबें तख्ते से उठाई और फर्श पर रख दी। फिर पत्थर की मदद से फर्श से ईंटें उखाड़ने लगा जिससे छोटा सा गड्ढा बन गया। नाबीना ने गड्ढे से एक चमड़े की थैली निकाली और जेब से कुछ निकालकर थैली में रख दिया और दोबारा गड्ढे में डालकर उस पर ईंटें और फर्श बिछा दिया। फर्श के कोनों को अच्छी तरह देख लिया। नमाज की किताबें और दूसरी चीजें भी तख्ते में रख दी और कुछ देर बैठकर दोलान में आ गया और खामोशी से लेट गया ताकि अच्छी तरह समझ ले कि यहां कोई शख्स मौजूद है या नहीं। जब उसे मुकम्मल तसल्ली हो गई तो जिस रास्ते से आया था उसी पर वापस चला गया।
जब गदागर चला गया तो अब्दुल्लाह कई किस्म के वसावसों में डूब गया कि जाकर देखूं कि थैली में क्या चीज है। वह आगे बढ़ा और उसी तरतीब से नमाज की थाली और किताबें एक तरफ रख दी और निहायत एहतियात से फर्श की ईंटें उखाड़ कर एक तरफ रख दी और थैली को गड्ढे से निकाल ली। उस थैली में 13 छोटी-छोटी थैलियां मौजूद थी जो सब की सब रकम से भरी थी। अब्दुल्लाह ने थैली बगल में दबाई और फर्श को उसी तरतीब से हमार कर दिया और मस्जिद के पिछवाड़े जा पहुंचा जहां हर तरफ खामोशी थी। उसने रकम गिनी तो देखा कि उसमें 1300 दीार मौजूद है। इसलिए कहने लगा यह रकम तो मेरे असबाब के ऐ मुताबिक है जो चोर ले गया है। मेरी गठरी में भी 1000 दीनार नकद और दूसरे सामान की कीमत 300 दीनार थी।
अब्दुल्लाह सोचने लगा कि अल्लाह ने मुझ पर रहम किया है और इस रहमत के फरिश्ते के जरिए मेरी रकम वापस मिल गई है। मगर नहीं अगर यह गदागर गायब फरिश्ता होता तो उसे फर्श में दफन ना करता बल्कि मुझे आवाज देता और कहता आओ अब्दुल्लाह यह रकम ले लो। हां, अब मुझे क्या करना चाहिए? अगर यह रकम ले लूं तो उसे लौटाने के लिए मुझे काफी वक्त की जरूरत होगी। और यह निहायत जुल्म होगा कि नाबीना गदागर की कमाई ले लूं। वह बेचारा गदागरी करता है और मैं उसकी रकम लेकर भाग जाऊं। अल्लाह को यह बात पसंद ना होगी। हां, अगर यह रकम बतौर कर्ज ले लूं तो कैसा होगा? वह तो गदागर है और लोग उसे रकम देते रहेंगे। मगर मैं तो गदागरी भी नहीं कर सकता। मुमकिन है उसकी जमा पूंजी और भी हो जिसे अपने घर या किसी दूसरी जगह छुपा रखा हो। बहरहाल ऐसा मालूम होता है कि उसे किसी पर भरोसा नहीं और ना ही कोई अमानत देने वाला जमा पूंजी छुपा देता है। बल्कि मैं इस रकम का ज्यादा मुस्तहिक होना गुनाह भी नहीं है। अगर मैं उसके पास जाकर कर्ज मांगता हूं तो मुझे साफ इंकार कर देगा। बस सर दस्त बगैर इजाजत रकम ले लेता हूं। और जब मेरे पास ज्यादा रकम होगी तो उसे तलाश करके लौटा दूंगा।
अब्दुल्लाह ने थैली बगल में दबाई रखी थी। वह आगे बढ़ा और अपने आप को तसल्ली देते हुए कहने लगा, इस मामले का फैसला इतना जल्द मुमकिन नहीं। अल्लाह ने गदागर को इसलिए भेजा है कि मेरी मदद करें। यही वजह है कि अल्लाह ने मुझे थका दिया था और मस्जिद में बिठा दिया था ताकि अपना माल हासिल कर लूं। हां, जब कोई शख्स बुराई करता है तो खुद शैतान बन जाता है और अपने आप को धोखा देता है। इस तरह अब्दुल्लाह ने भी अपनी दिलसोजी और परेशानी के बावजूद अपने आप को तसल्ली दी और वहां से जला दिया। उसने 300 दीनार से अपना जरूरी सामान खरीदा और 1000 दीनार अपने लिबास में छुपा ली। अब वह अपनी साबखा मंजिल पर ना गया और उस शहर से निकलने की तैयारी करने लगा। मगर फिर भी अपने काम से सख्त शर्मिंदा और नाराज था।
दूसरे दिन वह शहर में घूम फिर रहा था तो उसने नाबीना गदागर को लब गुनगुना रहा देखा मगर निहायत खुशहाल दिखाई देता था। अब्दुल्लाह ने उसका ताकुब किया जो मस्जिद की तरफ बढ़ रहा था। जब वहां पहुंचा तो गुजस्ता रात की तरह अपना काम करने लगा और उसका हाथ गड्ढे में पहुंच गया। जब उसने देखा कि थैली वहां नहीं तो हाथ पेशानी पर फेरा मगर कुछ ना कहा। उसने जेब से छोटी सी थैली निकाली और वहीं रखकर फर्श हमार कर दिया और दुल्हन में आकर बैठ गया।
अब्दुल्लाह ने दिल में कहा अगर वह इसी तरह बैठा रहा और गदागर ने मुझे तलाश कर लिया तो क्या होगा? उसने अपने आप को तसल्ली दी और कहा मैं जोहर तक यहीं रहूंगा। जब लोग नमाज के लिए आएंगे और आमदो रफ्त शुरू होगी तो चला जाऊंगा। गदागर गहरी सोच में डूबा था। उसके साथ ही अपनी जगह से उठा और बाहर चला गया।
अब्दुल्लाह ने दिल में कहा कि अब तो साबित हो गया है कि यह रकम मेरे लिए नहीं भेजी गई। मगर अब तो जो होना था सो हो चुका है। जब यह गदागर का मालिक बनता है तो उसे रकम की अभी जरूरत भी नहीं। अगर अल्लाह को मंजूर हुआ तो एक दिन उसकी रकम लौटा दूंगा और अपना हिसाब साफ कर लूंगा।
अब्दुल्लाह मुसाफिर था इसलिए अगले दिन एक कारवान के साथ अपने शहर लौट गया। उसने मुफ्त हासिल की हुई रकम तिजारत में लगा दी और फरमा में मालो असबाब बेचने लगा। जब उसका काम चल निकला तो एक दुकान ले ली और अनाज की खरीदो फरोख्त करने लगा। उसकी तजारत फलने फूलने लगी और बहुत जल्द मालदार बन गया। दो साल बाद कारवान के साथ मक्का गया और हाजी अब्दुल्लाह बन गया।
अब उसने इरादा कर लिया कि गदागर को तलाश करूं और बगैर इजाजत ली हुई रकम वापस करूं और उससे माफी मांगू। इसी तरह जब तीन साल गुजर गए तो एक दिन इत्तेफाक से जब वह अपने कामकाज के लिए जा रहा था तो उसने बाजार में वही नाबीना गदागर देखा। अब्दुल्लाह ने दिल में कहा, "यह गदागर खुदा है और इस शहर का मेहमान है। मेरा फर्ज बनता है कि उसके हाथ पर कुछ रकम रख दूं और पूछूं कि जब से तुम्हारी रकम गुम हुई है, तुम्हें कैसे हालात का सामना करना पड़ा है। अगर मैंने अपना कर्ज अभी उसे वापस कर दिया तो खुश होगा। मुमकिन है उसे रकम की जरूरत भी हो।
हाजी अब्दुल्लाह ने अपने आप से कहा, जब लोग किसी के मकरूज होते हैं तो खुश नहीं रहते। मगर खुद पसंदी और गुरूर उन्हें मजबूर करते हैं और समझते हैं कि हमारे कर्ज खवा को रकम की जरूरत नहीं। इसलिए कर्ज की अदा में ताखर करते हैं। बहरहाल हाजी अब्दुल्लाह आगे बढ़ा और गदागर के हाथ में एक सिक्का रख दिया और सोचने लगा कि जब मैं उससे असल मौजू पर बात करूंगा तो लाजमी तौर पर खुश होगा और कहेगा नहीं जनाब मेरी रकम वापस नहीं मिली। अल्लाह चोर पर लानत भेजे और उस रकम की दूसरी नाफरमानियों का इजहार करेगा। उसके बाद पूछूंगा कि तुम्हारी रकम कितनी थी जो चोरी गई है। जब वह अपनी दास्तान बयान करेगा तो मैं भी कह दूंगा खूब अब उसको लानत मलामत ना करो। शायद चोर का इल्म हो जाए। अगर चाहो तो तुम्हारे दिल की परेशानी दूर करने के लिए तैयार हूं और उसी अंदाज के मुताबिक तुम्हें रकम दे सकता हूं। मुझे नेक दिल समझकर कबूल कर लो और मैं भी आसूदा खातिर हो जाऊंगा।
हाजी अब्दुल्लाह अपने ख्याल के मुताबिक शरीज ढूंढ रहा था। इसलिए गदागर से पूछने लगा मैंने सुना है चंद साल कबल तुम्हारी रकम गुम हो गई थी। क्या मिल गई थी? मगर गदागर ने हाजी अब्दुल्लाह के अंदाजे के मुताबिक गुफ्तगू ना की और हाजी अब्दुल्लाह की बातें सुनते ही उसका हाथ पकड़ लिया और फरियाद करते हुए कहने लगा चोर चोर ऐ लोगों मेरी मदद करो मैंने चोर तलाश कर लिया है आओ मेरी मदद करो इस शख्स ने मेरी रकम चोरी की है।
गदागर के शोर घुल से कई लोग जमा हो गए और हाजी अब्दुल्लाह परेशान होकर कहने लगा ए शरीफ आदमी खामखा क्यों तोहमत लगाते हो मैं तुम्हारा हाल अहवाल पूछ रहा था अगर वाकई तुम्हारी कोई चीज गुम हुई है तो मैं उसकी तलाश के लिए तैयार हूं मगर तुम तो मुझ पर झूठा इल्जाम लगाते हो मैं तुम्हारी रकम के चोर को नहीं पहचानते मैंने तो सिर्फ यही सुना था कि तुम्हारी रकम गुम हुई है। इसके अलावा मुझे किसी चीज का इल्म नहीं है। हां, अब मुझे बताओ कि तुम्हारी रकम कितनी थी? मगर रोने धोने और चिल्लाने का तो कोई फायदा नहीं। क्या तुम अपनी भलाई नहीं चाहते?
गदागर ने अपनी आवाज और भी बुलंद कर दी और कहा मेरी रकम का चोर तुम हो। ए लोगों मेरी मदद करो। मुझे रकम की अभी जरूरत नहीं। मगर मेरी ख्वाहिश है कि इस बेइंसाफ चोर को काजी के यहां ले जाऊं और उससे मदद मांगो। सिपाही को बुलाओ। दरगाह को इत्तला दो। मुझे काजी की अदालत तक ले जाओ। जब तक मेरा मकसद हासिल ना हो इस चोर को माफ ना करूंगा।
इस दौरान कई लोग जमा हो गए थे जो कह रहे थे मुमकिन है इस गदागर को शक हुआ हो। बहरहाल हकीकत मालूम हो जाएगी। उसके बाद हाजी अब्दुल्लाह से कहने लगे तुम फिक्र ना करो। यह गदागर का बाशिंदा नहीं बल्कि मुसाफिर है और दो-तीन दिन से यहां आया है। मुमकिन है उसे धोखा हुआ हो। इसलिए उसे ज्यादा परेशान ना करो। अगर काजी के यहां गए तो तुम्हें जमानत पर रहा करवा दिया जाएगा। सिपाही और दरगाह को इद दिला दे दी गई। सिपाही आए और नाबीना गदागर के पास ले गए। गदागर ने कहा मेरी रकम चोरी गई है। अब मैंने चोर पकड़ लिया है और आपके सामने है। इसलिए बेहतर होगा कि उसे गाजी के यहां ले जाऊं और अपना मुकदमा साबित कर।
हाजी अब्दुल्लाह ने कहा खामखा मुझ पर इल्जाम लगाया जा रहा है। मैं चाहता था कि उसकी मदद करूं इसलिए कि मैंने सुना था कि उसकी रकम गुम हुई है। मेरी ख्वाहिश है कि महज अल्लाह की रजा के लिए उसकी परेशानी दूर करूं। मुझे क्या मालूम था कि मुझसे उलझ पड़ेगा। तोहमत लगाएगा और मेरी इज्जत बर्बाद करेगा। इस शहर में मेरा अच्छा खासा कारोबार है। मुझे चोरी की क्या जरूरत है। बेहतर होगा कि काहाजी के पास जाए। मुझे भी इस शख्स से शिकायत है। मस्खराबाजी नहीं है। क्या गदागर की इमदाद करना गुनाह तो नहीं है? खामखा के झगड़ों या शोरशराबे से रकम नहीं मिल सकती।
दरगाह ने मजबूरन उन्हें काजी के पास भेज दिया। काजी ने दोनों की शिकायतें और बयान सुने और गदागर से कहा मैं इसका जामिन हूं। अब यह भाग नहीं सकता। मैं मामले की तहकीक करूंगा।
जब नाबीना गदागर और अब्दुल्लाह अलग-अलग हो गए तो काहाजी ने दोनों के बयान अलग-अलग लिए। हाजी अब्दुल्लाह ने दो बार अपने अल्फाज दोहराए और कहा मैंने चंद बातें सुनी थी इसलिए चाहा कि उसका तमाम वाक्यात दरियाफ्त करूं। अगर सच हुआ तो उसकी इमदाद करूं। मगर इस बेइंसाफ ने मुझे बेइज्जत करने में कोई कसर ना छोड़ी। इसलिए अपने किए से पशेमान हूं। मुझे क्या मालूम था कि यह गदागर ऐसी हरकत करेगा।
काजी ने गदागर से भी अलग-अलग दरियाफ्त किया और कहा तुम्हारा नाबीना होना कोई गुनाह नहीं है। मगर गदागरी कोई अच्छा पेशा नहीं है। तुझे इस शख्स का ममनून होना चाहिए था कि यह तुम्हारी मदद करना चाहता था। अगर तेरी रकम चोरी हुई है तो उसका मुतालबा कर सकते हो। मगर बगैर सबूत ऐसा नहीं किया जा सकता। तुझे कैसे मालूम है कि तेरी रकम का चोर यही शख्स है?
गदागर ने कहा, जनाब, मेरे पास पूरा सबूत और दलील मौजूद है। मुझे मालूम है कि जो शख्स बुरा काम करता है, चाहे वह कितना ही बेइंसाफ क्यों ना हो, वह जहनी और दिली तौर पर परेशान रहता है। बल्कि ऐसा शख्स अपनी जात से भी शर्मिंदा होता है और चारों तरफ हाथपांव मारता है ताकि खौफ और डर से हासिल करे। इस तरह वह अपने आप को धोखा देता है। मगर अक्सर उसकी सोच उसके लिए बहुत बुरी बदनामी बन जाती है। गदागर ने कहा जब मेरी रकम गुम हुई थी तो मैंने इरादा कर लिया था कि किसी से जिक्र ना करूंगा। इसलिए एक राज की तरह अपने दिल में छुपाए रखूंगा। मैं जानता था कि यह राज मेरे और चोर के अलावा कोई दूसरा नहीं जानता। इसलिए अगर किसी ने इस मौजू की तरफ इशारा भी कर दिया तो खुद वही चोर होगा। मैं हर वक्त लोगों को दुआएं देता हूं ताकि अल्लाह मेरी रकम की हिफाजत करे। इस तरतीब से चोर भी समझता था कि शायद लोगों को चोर का इल्म हो जाए और मैं भी नतीजा और अंजाम का मंतजिर रहा। अगर यह शख्स चोर ना है तो उसे कैसे मालूम है कि मेरी रकम चोरी गई है। हालांकि मैंने आज तक किसी से जिक्र ना किया है।
काजी ने कहा बहुत उम्दा दलील है। इसके बाद हाजी अब्दुल्लाह को अलदा बुलाया और कहा तुमने किससे सुना था कि इस गदागर की रकम गुम हुई है। हाजी अब्दुल्लाह ने कहा मुझे दुरुस्त याद नहीं है। अलबत्ता कई लोग कह रहे थे कि उसकी रकम गुम हुई है। बल्कि उसने खुद भी आपको बताया है। काजी ने कहा हां उसने खुद आज बताया है मगर उससे पहले किसी से जिक्र ना किया था। अगर तुम्हें याद हो कि जिस शख्स ने तुझे यह वाकया बताया है तो उसकी निशानानदेही करो। उसके बाद तुमसे हमारा कोई वास्ता ना होगा। इस सूरत में हम तुमसे माफी मांगेंगे और बाजार में भी मुनादी करवा देंगे कि गदागर को शक हुआ था। इस तरह
तुम्हारी इज्जत महफूज़ रहेगी। हाजी अब्दुल्लाह ने कहा, "मैं किसी का नाम नहीं ले सकता, इसलिए कि मुझे याद नहीं कि मैंने कहां से सुना था।"
काजी ने कहा, "इस तरह तुम पर इल्जाम साबित हो सकता है। अब इसके दो रास्ते हैं। या तो तुझे नजरबंद रखा जाए ताकि मामला साफ हो सके, मगर तुम्हारी नजरबंदी से शोरशराबा हर तरफ फैल जाएगा, जो तुम्हारे लिए बहुत बुरी बदनामी होगी। हां, एक दूसरा रास्ता भी है कि तुम जो कुछ जानते हो उसका तदारीक करो और हमें चोर का पता बता दो, ताकि हम मामले की तह तक पहुंच सकें और रकम भी उसके मालिक को वापस मिल जाए। बहरहाल, तुम्हारी भलाई यही है कि चोर की तलाश में हमारी मदद करो।"
हाजी अब्दुल्लाह ने कुछ सोचा और काजी से कहा, "मैं देख रहा हूं कि काम मुश्किल बनता जा रहा है। अब जबकि मामला यहां तक पहुंच गया है, तो सच्चाई से बेहतर कोई चीज नहीं है। मेरी जिंदगी की दास्तान यह है कि मैंने मस्जिद से उस दिन रकम उठा ली थी, इसलिए कि मैं अपने आप को मुस्तहिक समझता था और समझता था कि रकम कर्ज के तौर पर ली है। आज भी मेरा इरादा भलाई का था और चाहता था कि अपनी गलती की तिला करूं और हलाल करूं। मगर मुझे इतना मालूम ना था कि मामला यहां तक पहुंच जाएगा। अब आप जो हुक्म दें मुझे मंजूर है। गदागर की रकम 1300 दीनार थी। अब मैं 1500 दीनार देने के लिए तैयार हूं, ताकि मामला दब जाए और मेरी इज्जत भी बच जाए।"
काजी ने कहा, "बारक अल्लाह! हमेशा निजात सच्चाई में होती है। अब अपनी बात मुखतसर करो, इसलिए कि हमारे भी कई काम हैं।" हाजी अब्दुल्लाह से 1500 दीनार ले लिए गए।
गदागर ने कहा, "यहां तक तो काम दुरुस्त हो गया है।" उन्होंने कहा, "बहुत खूब, यह रकम ले लो और यहां दस्तखत करो या अंगूठा लगा दो।"
गदागर ने कहा, "यह रकम मेरा माल है। मगर इस मामले में मुझे बहुत तकलीफ पहुंची है। इसलिए जरूरी है कि तमाम कस्सा लिखा जाए कि इस शख्स ने फला तारीख को मेरी रकम चोरी की है और अब वापस दे दी है, ताकि इस बेइंसाफ चोर को आपके सामने शर्मिंदगीगी उठानी पड़े और तमाम हाजरीन इस पर दस्तखत भी करें।"
काजी ने कहा, "हम भी यही चाहते हैं। मगर अब जबकि तुमने रकम ले ली है, तो तुम्हें हक नहीं पहुंचता कि यहां से बाहर जाकर लोगों से कहो और हाजी अब्दुल्लाह को बदनाम करो।" गदागर ने कहा, "नहीं करूंगा।" इसलिए तमाम वाक्यात लिखे गए। रकम गदागर को दी गई और सब लोग चले गए।
हाजी अब्दुल्लाह ने भी सुकून का सांस लिया और दिल में कहा, "बहुत बुरा मामला हुआ है। मगर अब आंसूदा हो गया हूं।"
मगर दूसरे दिन गदागर फिर काजी की अदालत में खड़ा था और अपनी शिकायत बयान कर रहा था। वह कहता था, "चोर को बुलाया जाए।" उससे पूछा गया, "ए शरीफा इंसान, अब तो मुकदमे का फैसला हो गया है। गदागर जब इस बात को तस्लीम करता है कि उसने 3 साल कब रकम चोरी की थी और अब वापस की है, इसलिए किस्सा खत्म हो गया।"
गदागर ने कहा, "मैंने उसे कर्ज ना दिया था। मैं इस रकम से अनाज खरीदना चाहता था। मगर आज मुझे मालूम हुआ है कि 3 साल कबल के मुकाबले में अनाज की कीमत दुगनी हो गई है। मैं 3 साल कबल 1300 मन अनाज खरीद सकता था। मगर अब इस रकम में 650 मन अनाज मिल सकती है। इसलिए हाजी अब्दुल्लाह को यह खसट पूरा करना चाहिए। वरना मैं भी अपना मामला वापस लेता हूं और बाजार जाकर हाजी अब्दुल्लाह से मामला खुद तय करता हूं।"
काजी ने कहा, "मेरे ख्याल के मुताबिकों तुमने राजीमंदी जाहिर कर दी है और मुकदमे का फैसला हो चुका है। अगर तुम जिद करते हो तो उसे बुला लेते हैं। तहम खामखा झगड़ा मोड़ लेने में कोई फायदा नहीं है।"
गदागर ने कहा, "मैंने असल रकम वसूल कर ली है और रसीद भी दे दी है। मगर मेरे ख्याल में अब तक गाय का सर मटके में फंसा हुआ है।"
हाजी अब्दुल्लाह आया और कहने लगा, "यह शख्स अब क्या कहता है?" उन्होंने कहा, "यह कहता है कि मैंने यह रकम अनाज खरीदने के लिए जमा की थी। मगर अब अनाज की कीमत दुगनी हो गई है।"
हाजी अब्दुल्लाह बहुत परेशान हुआ और कहने लगा, "मैं इज्जतदार शख्स हूं और एक आम गदागर से उलझना ना चाहता। चलो इसका यह मुतालबा भी तस्लीम कर लेते हैं। वह रकम मुझे वापस दे दे और 1300 मन अनाज लेकर चला जाए। अनाज की बारबरदारी का किराया भी मैं अदा कर दूंगा, ताकि अपने शहर ले जाए।"
गदागर ने कहा, "मैं किसी चोर से कोई चीज नहीं खरीदता और अपनी हलाल रकम हराम ना करूंगा। मैं अपना खसट नकद की सूरत में पूरा करूंगा और समझूंगा कि अपना हक ले लिया है।"
हाजी अब्दुल्लाह बहुत परेशान था, मगर रसवाई की रोकथाम भी जरूरी समझता था। इसलिए कहने लगा, "आओ बाबा, यह 1300 दीनार मजीद ले लो। अब जाओ और हाजी अब्दुल्लाह के हक में दुआ करो।" दोनों ने सुकून का सांस लिया और चले गए।
दूसरे दिन सुबह नाबीना गदागर फिर आ गया और कहने लगा, "मुझे रकम मिल गई है, इसलिए चाहता हूं कि अनाज खरीदूंगा।" गदागर ने कहा, "मुझे हाजी अब्दुल्लाह से शिकायत है।"
काजी ने कहा, "तुझे अब कौन सी शिकायत है? तुमने तो खेल तमाशा बना लिया है और रोजाना नया मुकदमा दायर कर देते हो। मुकदमे का फैसला हो चुका है। अब तुम्हें कोई हक नहीं पहुंचता कि हाजी अब्दुल्लाह की जात से नाजायज फायदा उठाओ। वह शरीफ इंसान है, इसलिए उसने तुम्हें दुगनी रकम दे दी है। हां, अब क्या कहना चाहते हो?"
गदागर ने कहा, "जब तमाम मुतालबा तस्लीम कर लिए हैं और मुझे दुगनी रकम दे दी है और आपके मुताबिक वह शरीफ और अच्छा इंसान भी है। मगर क्या मैं इंसान नहीं हूं? क्या मुझे हका नहीं पहुंचता कि आसूदगी से जिंदगी गुजारूं? क्या मेरी पेशानी पर लिखा है कि हमेशा गदागरी करूं? क्या मैं अनाज की खरीदो फरोख्त ना करूं और इज्जत से जिंदगी गुजारूं, ताकि अच्छा इंसान बनूं?"
उसे कहा गया, "क्यों नहीं, तुम्हें भी हक हासिल है। हम भी चाहते हैं कि तुझे यही बातें समझाई जाएं कि गदागरी ना मुनासिब और ना शरीफाना पेशा है। इससे सिवाय सुस्ती और बेशर्मी के कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि सेहतमंद लोगों को इस पेशे से जुर्माना भी किया जाता है। हां, तुझे अपनी रकम मिल गई है। जाओ और अपने काम में लग जाओ और गदागरी ना करो। अब हाजी अब्दुल्लाह से तुम्हारा क्या लेना है?"
गदागर ने कहा, "यही हाजी अब्दुल्लाह मेरी बदबख्ती का सबब बना है। मैं तीन साल कबल चाहता था कि गदागरी से हाथ धो लूं और अनाज की फरोख्त करूं। मगर यह बेइंसाफ चोर मेरी जमा पूंजी ले गया। इसलिए मुझे मजबूरन मजीद तीन साल गदागरी करनी पड़ी। इस दौरान कई तकलीफ का सामना करता रहा और चोर की गिरफ्तारी की फिक्र में मुबतला रहा। हां जनाब काजी, मैं तीन साल तमाम लोगों से बद्दुआ करता रहा। इस तरह मेरी उम्र के तीन कीमती साल तबाह हो गए हैं। मैंने हाजी अब्दुल्लाह से कोई बुराई ना की, मगर उसने तो मुझसे बुराई की है। बेशक उसने मेरी रकम लौटा दी है, मगर मेरी उम्र के तीन साल ना लौट आए। मेरे तीन सालों की परेशानी की तिला ना की। उसने मेरे तीन सालों की बेखवाबियों की गदागरी का बोझ मेरी गर्दन पर डाल दिया। जनाब काजी, अब मैं अपने तीन सालों के गैर मुनासिब और गैर शरी कामों के जुर्माने का दावा करता हूं। मैं चाहता हूं कि मेरा यह खसट पूरा किया जाए और यह खसट हाजी अब्दुल्लाह अदा करे या मेरी उम्र के तीन साल मुझे लौटा दे।"
काजी और उसके साथी हंसने लगे और हाजी अब्दुल्लाह को हाजिर होने का हुक्म दिया। काजी और उसके साथियों ने हाजी अब्दुल्लाह से कहा, "देखो गदागर की बातें तुम्हारे ख्याल में दुरुस्त हैं या नहीं।"
हाजी अब्दुल्लाह को एक तरफ अपनी इज्जत का खतरा महसूस हो रहा था और दूसरी तरफ जवाब देने के लिए उसके पास अल्फाज ना थे। इसलिए मजबूरन कहने लगा, "गदागर की बातें दुरुस्त हैं।" इसलिए गदागर से कहने लगा, "जनाबे महतरमा, छिलके और खाल उतार कर साफसाफ कहो कि आप कितनी रकम के एवज अपनी राजीमंदी का इजहार करोगे, ताकि मेरा पीछा ना करो और अपने काम में मशगूल हो जाओ।"
गदागर ने कहा, "मेरी रकम चोरी की और मुझे सिवाय गदागरी के कहीं का ना छोड़ा, बल्कि तुम इस रकम की बदौलत इस मर्तबा पर पहुंचे। अगर तुम सच पूछते हो तो शर्माओ, मेरा था और काम तुमने किया। अगर तुम्हारा असबाब आधा आबांट ले तो मैं भी तुम्हारी तरह मालदार बन सकता हूं।"
हाजी अब्दुल्लाह ने कहा, "अब तुम खुद ही देख रहे हो कि कितने बेइंसाफ इंसान हो।"
गदागर ने कहा, "बेइंसाफ तो तुम खुद हो कि एक नाबीना गदागर की रकम छीन ली। मैं उस दिन तुम्हारे लिए रहमत का फरिश्ता था, मगर अब अज़ाब का फरिश्ता हूं। अगर तुमने उस दिन बुराई ना की होती तो आज गिरफ्तार ना होते। अगर मैं गलत कह रहा हूं तो मेरी बात की तरदीद करो, वरना मेरा हक अदा करो। या फिर अब भी हो सकता है कि मेरी जिंदगी के तीन साल मुझे लौटा दो, ताकि जवान तरोताजा बनकर अपने कामकाज के लिए जाऊं और अपनी रकम से तिजारत करूं।"
हाजी अब्दुल्लाह निहायत परेशान था कि इस बदमिजाज गदागर से क्या कहे। उसने कुछ सोचा और कहा, "मैंने जिस दिन तुम्हारी रकम उठाई थी, तो मैं तुमसे भी ज्यादा बेरो मददगार और मुस्तहिक था। मेरी रकम कारवान सराय में चोरी हो गई थी, जो 1300 दीनार थी। इसलिए इस हादसे ने मुझे इस काम पर मजबूर कर दिया और तुम्हारी रकम बतौर कर्ज ले ली। मगर अब तुम्हारी बातें दुरुस्त नहीं है। मैं तुम्हें जवान ना बना सकता हूं और ना ही अपना नस्व सरमाया तुम्हें सौंप सकता हूं। अगर मैंने उस दिन बुराई की है तो तुम आज बुराई कर रहे हो। हां, मैं अपनी बुराई से पशेमान हूं, इसलिए तुम भी बेइंसाफी ना करो। अलबत्ता, मैं इस बात के लिए तैयार हूं कि तुम्हारी खुशहाली के लिए हमारे पास जो कुछ मौजूद है, एक दूसरे पर रख दें और शरीक में काम शुरू कर दें। तुमने गदागरी की है और मैंने चोरी की है। हम दोनों का काम एक दूसरे से मिलताजुलता है। शायद तुम अकेले अनाज की फरोख्त ना कर सकोगे, मगर मैं यह काम कर सकता हूं। अगर हम दोनों अच्छे इंसान बनकर रहे तो हमारी खूब गुजरेगी। हां, यह तो तुमने ना बताया कि तुम्हारा नाम क्या है।"
गदागर ने कहा, "हसन।"
हाजी अब्दुल्लाह ने कहा, "बहुत खूब। मैं अब्दुल्लाह हूं। हमारे पास जो कुछ है, इकट्ठा मिला लेते हैं और अपना तजारत का नाम अब्दुल्लाह ओ हसन अनाज फरोश रख लेते हैं। क्या अब राजी हो?"
गदागर ने कहा, "अब एक चीज बाकी रह गई है। मेरी कुछ रकम रमजान के पास है। अगर उसे भी अपने हमराह शामिल कर लें और तीनों हम नानो निमतें बांटें तो खूब गुजरेगी। बल्कि रमजान का काम भी चल पड़ेगा। उसने भी बड़ी सख्तियां बर्दाश्त की है।"
अब्दुल्लाह ने पूछा, "यह रमजान कौन है?"
गदागर ने कहा, "रमजान वही शख्स है जिसने तुम्हारी रकम और गठरी कारवान सराय में चोरी की थी, बल्कि उसने भी तुम्हारे ख्याल के मुताबिक वह रकम बतौर कर्ज ली थी, क्योंकि रमजान मेरा वाकिफ था। उसने उसी रात मुझे तमाम वाकया बता दिया था और मुझे उसकी रास्तगोई बहुत पसंद आई। मगर मैंने अपनी रकम गुम होने की दास्तान किसी से ना बताई थी। अलबत्ता, कुछ अरसा तक मस्जिद के खादिम से बद्दुआ करता और कई बार उसका इम्तिहान भी लिया। मगर उसका कोई गुनाह साबित ना हुआ। मैंने उसके बाद भी कई बार अपनी रकम वहां रखी, मगर गुम ना हुई। इसलिए समझ गया कि यह उसका कार नहीं है। अब रमजान भी इस शहर में मौजूद है। उसने भी तुम्हारी रकम अलग रखी है और इस शहर में तुम्हारी तलाश में आया है। बल्कि मैं तो समझता हूं कि रमजान तुमसे बेहतर है कि तुमने मेरी तलाश में एक कदम भी ना उठाया। मैं भी उसके हमराह इसीलिए आया था कि खुदा करे अपनी थैली तलाश कर लूं। अब जब कि तुमने कारवान सराय में अपनी आसानी के गुम होने का बताया, तो मेरे दिल में ख्याल पैदा हुआ कि दरवाजे के तख्ते किस खूबसूरती से आपस में जुड़े हुए हैं। इसी तरह हम तीन अफराद भी इकट्ठे मिलकर खाएंगे, पिएंगे और तिजारत करेंगे।"
हाजी अब्दुल्लाह ने कुछ सोचा और कहा, "अच्छी तजवीज है। मैंने अपनी रकम उसे बखशने का फैसला कर लिया है। अब आओ ताकि रमजान के पास चलें।"
जब दोनों रमजान के पास पहुंचे, तो अब्दुल्लाह ने देखा कि यह रमजान तो वही शख्स है जो पराए मुल्क में उसके हमराह रहता था। मगर वहां उसने अपना नाम तब्दील कर रखा था। तीनों अफराद अपनी गुजिश्ता रसवाई, पशेमानी और बेसरो सामानी के बावजूद सर जोड़कर बैठ गए और कहने लगे, "अब गुजिश्ता वक्त को भूल जाएं और बेहतर काम करें।" उन्होंने अपना सरमाया एक दूसरे पर रख दिया और अनाज की बड़ी दुकान बना ली, जिस पर लिख दिया अब्दुल्लाह हसन और अली अनाज फरोश।
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