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FISCAL POLICY | CLASS -12 | ISC | ECONOMICS| Shubham Jagdish | 8112601234 | #shubhamsambhallega

SHUBHAM JAGDISH38:09

Transcription

[संगीत]

हेलो गुड इवनिंग एवरी बडी,

माय नेम इज शुभम जगदीश एंड वेलकम बैक टू द चैनल।

जैसे इतने सालों में शुभम जगदीश ने संभाला है, पूरी कोशिश करूंगा कि इस बार भी शुभम संभाल लेगा।

रेडी?

सो हेलो गुड इवनिंग एवरी बडी, माय नेम इज शुभम जगदीश एंड वेलकम बैक टू द चैनल।

सो आज क्लास 12थ इकोनॉमिक्स का अगेन चैप्टर नंबर 16 में लेकर आया हूं।

दिस इज फिस्कल पॉलिसी।

और एक वीडियो में मैं पूरा टॉपिक कंप्लीट कराने वाला हूं।

सो बॉस, यह बहुत ही इंपॉर्टेंट चैप्टर है।

बहुत सारे बच्चों की डिमांड थी और जैसा कि प्रॉमिस किया था, वैसे एक ही वीडियो में पूरा कंटेंट हम कंप्लीट कराने वाले हैं।

एंड बिफोर आई बिगिन, मैं आपको बताना चाहता हूं कि एथ ऑफ दिसंबर से हमारा मच अवेटेड परसेंटेज बूस्टर कोर्स शुरू होने जा रहा है।

जिसमें मैं आपको पढ़ाने जा रहा हूं तीनों सब्जेक्ट्स।

तीनों सब्जेक्ट्स के यहां पर प्राइसिंग भी लिखी हुई है।

अगर लगता है तो आप एनरोल कर सकते हैं।

इसके साथ तीन बुक सेट्स आपके घर पर डिलीवर की जाएंगी।

मतलब कोई भी सैंपल पेपर, कुछ भी आपको खरीदना नहीं पड़ेगा सेपरेटली।

और साथ में, साथ में इसके अंदर आपको एक्सेस मिलेगा गेस्ट पेपर्स का, सैंपल पेपर्स का, डीपीपी का एंड लॉट मोर।

तो चलो भाई, जल्दी से बढ़ते हैं हम लोग अपने चैप्टर की तरफ।

और यह चैप्टर क्या है?

यह चैप्टर है हमारा पब्लिक फाइनेंस।

पब्लिक फाइनेंस क्या है?

बहुत सारा टॉपिक इस चैप्टर में ऐसा है जो हमारे सिलेबस में नहीं है।

सो आई हैव केप्ट इट अ पॉइंट कि जितना सिलेबस में है, मैंने केवल वही वही चीजें कंप्लीट कराई हैं फॉर 2025 बोर्ड इम्तिहान।

ठीक है बच्चों?

चलो शुरू करते हैं।

पब्लिक फाइनेंस होता क्या है?

इट इज अ ब्रांच ऑफ नॉलेज व्हिच इज कंसर्न विद द इनकम एंड एक्सपेंडिचर ऑफ पब्लिक अथॉरिटीज।

जब मैं पब्लिक अथॉरिटीज के बारे में बात करता हूं, तो मैं सरकार के बारे में बात कर रहा हूं।

सरकार कहां से पैसा लाती, कहां-कहां खर्चा करती है, उसके बारे में पढ़ना पब्लिक फाइनेंस कहलाता है।

अब मीनिंग एंड इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ फिस्कल पॉलिसी देखना है।

क्या होता है?

फिस्कल पॉलिसी इज डिफाइंड एज द पॉलिसी अंडर व्हिच द गवर्नमेंट यूजेस द इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ़ टैक्स सेशन, पब्लिक एक्सपेंडिंग एंड पब्लिक बोरोंग टू अचीव वेरियस ऑब्जेक्टिव्स ऑफ इकोनॉमिक पॉलिसी।

याद करो चैप्टर नंबर 12, जहां पर हम लोगों ने एक्सेस डिमांड और डेफिसिट डिमांड को सही करने के दो मेथड्स पढ़े थे।

एक फिस्कल पॉलिसी और एक मॉनेटरी पॉलिसी।

मॉनेटरी पॉलिसी आप ऑलरेडी बैंकिंग के चैप्टर में पढ़ चुके हो।

फिस्कल पॉलिसी भी मैंने आपको वहां पर पढ़ाई थी।

आज उसी बात को हम लोग डिटेल में डिस्कस करने जा रहे हैं।

फिस्कल पॉलिसी में क्या होता है?

गवर्नमेंट के पास कुछ इंस्ट्रूमेंट्स हैं।

इंस्ट्रूमेंट्स बोले तो क्या-क्या गवर्नमेंट के पास है?

टैक्सेशन, पब्लिक स्पेंड और पब्लिक बोरोंग।

इन तीन इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल करते गवर्नमेंट इंफ्लेशन, डिफ्लेशन जैसी सिचुएशन को कंट्रोल करने का काम करती है।

ठीक है?

बात समझ में आ गई सब बच्चों को?

चले आगे बढ़े।

अब अगला टॉपिक है ऑब्जेक्टिव्स ऑफ फिस्कल पॉलिसी।

ये हमारे सिलेबस में नहीं है, तो मैं इसको क्लियर लिख देता हूं।

नॉट इन सिलेबस।

ठीक है ना?

यह पीडीएफ आप लोग जरूर से जरूर डाउनलोड कर लेना।

इसमें सारे नोट्स फ्री ऑफ कॉस्ट आपको अवेलेबल हो जाएंगे मेरे एप्लीकेशन के अंदर।

तो मैं क्या करना है?

डिस्क्रिप्शन में लिंक है या ऑब्सेशन एंड एंट्रेंस ए डाउनलोड कर लो।

उसका स्टडी मटेरियल का सेक्शन है।

वहां पर आपको फ्रीली अवेलेबल करा दिया जाएगा।

अब बात करते हैं ये बस पब्लिक रेवेन्यू क्या होता है?

पब्लिक रेवेन्यू मतलब सरकार के पास पैसा किस-किस सोर्सेस से आएगा।

तो इनकम ऑफ द गवर्नमेंट फ्रॉम ऑल इट्स सोर्सेस इज कॉल्ड पब्लिक रेवेन्यू।

अब पब्लिक रेवेन्यू के खूब सारी चीजें हैं।

जैसे देयर आर मेनली थ्री इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ फिस्कल पॉलिसी।

एक तो होता है टैक्स, मतलब सरकार के पास पैसा आने वाला टैक्स से।

दूसरा आने वाला है, यहां पर मैं और लिखता हूं, पब्लिक बोरोंग के थ्रू पैसा आने वाला है।

यहां पर प्लीज पब्लिक एक्सपेंडिचर मत लिखो, बिकॉज ये इंस्ट्रूमेंट्स के बारे में बताया गया कि गवर्नमेंट के पास कितने-कितने इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं।

यह चीज हम लोगों ने ऑलरेडी एक बार देख ली है।

तो एक काम करते हैं, इसको यहां से कर देते हैं आउट।

ठीक है भैया, तुम हो जाओ आउट।

क्योंकि हम लोगों ने इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ फिस्कल पॉलिसी ऑलरेडी पढ़ लिया है।

देयर यू आर।

ठीक है ना भाई?

चले गए।

इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ फिस्कल पॉलिसी क्या होती है?

आपको पता चल गया ना?

टैक्सेशन होता है, पब्लिक स्पेंडिंग होता है, पब्लिक बोरोंग होता है।

पब्लिक रेवेन्यू के सोर्सेस क्या होते हैं?

अब सरकार के पास किस-किस सोर्सेस से पैसा आएगा?

या तो टैक्स के थ्रू पैसा आएगा या नॉन टैक्स के थ्रू पैसा आएगा।

आओ जरा देखते हैं कि सरकार के पास पैसा कहां से मिलने वाला है।

सबसे पहली चीज पढ़ने जा रहे हैं हम लोग टैक्सेशन।

टैक्सेशन पढ़ते समय आपको यह पता होना चाहिए कि टैक्सेस का मतलब क्या होता है।

वो पेमेंट सबको देना ही देना है।

ठीक है ना भाई?

अ कंपलसरी कंट्रीब्यूशन फ्रॉम पर्सन टू द गवर्नमेंट टू डिफ्रे द एक्सपेंसेस इंकर्स इंटरेस्ट ऑफ ऑल विदाउट रेफरेंस टू स्पेशल बेनिफिट्स कन्फर्ट।

आपको कोई स्पेशल बेनिफिट मिले या ना मिले, कॉमन बेनिफिट हम सभी लोग को मिल रहा है।

उस कॉमन बेनिफिट को अवेल करने के लिए हर एक इंसान को कुछ ना कुछ कंपलसरी कंट्रीब्यूशन देना पड़ता है, जिसको हम लोग टैक्सेशन कहते हैं।

जैसे आप घर से बाहर निकल रहे हैं, आपके पास रोड है, पुलिस की सिक्योरिटी है, आर्मी की सिक्योरिटी है।

तो आपके घर में पानी आ रहा है, बिजली आ रही है।

यह कॉमन चीजें जो आप सभी को मिल रही हैं, उसके लिए जो आपको कुछ कंपलसरी कंट्रीब्यूशन देना पड़ेगा, उसको बोला जाएगा टैक्सेस।

अब टैक्सेस के टाइप्स भी हैं।

उससे पहले नेचर है।

नेचर सिलेबस में नहीं है।

वाह भाई वाह, नॉट इन सिलेबस, नॉट इन सिलेबस।

ठीक है ना?

अच्छा, मैं आपको बता देता हूं टैक्सेस के दो टाइप्स भी होते हैं।

दो टाइप्स कौन-कौन से हैं?

एक होता है डायरेक्ट टैक्स, एक होता है मेरी जान डायरेक्ट टैक्स।

और दूसरा होता है इनडायरेक्ट टैक्स।

अभी डायरेक्ट टैक्स और इनडायरेक्ट टैक्स क्या है, ना आगे हम पढ़ने वाले हैं।

नेचर आपके सिलेबस में नहीं है।

अब जरा देखते हैं कि ये डायरेक्ट टैक्स क्या है।

बेटा डायरेक्ट टैक्स क्या होता है, जिसका बर्डन हम किसी और के ऊपर शिफ्ट नहीं कर सकते।

जैसे मेरी इनकम है, मेरी वेल्थ है, उसके ऊपर मेरे को ही टैक्स देना है।

उसे बोलेंगे डायरेक्ट टैक्स।

वेयर एज इनडायरेक्ट टैक्स क्या होता है?

जो कंज्यूम करेगा, वो टैक्स देगा।

जैसे जो मोबाइल खरीदने वाला फोन खरीदेगा, मोबाइल फोन पर टैक्स उसी को देना पड़ेगा, जो उसका कंज्यूमर होगा।

सबको टैक्स देने की जरूरत नहीं है।

मतलब इनडायरेक्ट टैक्स का बर्डन शिफ्ट किया जा सकता है ऑन टू द कंज्यूमर।

बट डायरेक्ट टैक्स का बर्डन किसी और के ऊपर शिफ्ट नहीं किया जा सकता है।

आपका एक छोटा सा होमवर्क है, डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स के बीच में कोई चार डिफरेंस आप जरूर प्रिपेयर करें।

Instagram's इट टू द गवर्नमेंट इन द फर्स्ट इंस्टेंस।

द इंसीडेंस ऑफ़ अ टैक्स रेफर्स टू द मनी बर्डन ऑफ़ अ टैक्स ऑन द पर्सन हु अल्टीमेटली पेज इट।

मतलब बर्डन उसी के ऊपर पड़ेगा, जिसको अल्टीमेटली पे करना है।

आसान भाषा में ठीक है ना?

अ डायरेक्ट टैक्स इज दैट टैक्स, हुज बर्डन इज बन बाय द सेम पर्सन ऑन हुम इट इज लिविड।

जिसके ऊपर टैक्स लगाया जाएगा, उसी को पे करना होगा।

एग्जांपल क्या?

अगर आप इसका एग्जांपल लिखना चाहो, तो इसका एग्जांपल क्या होगा?

इसका एग्जांपल होगा इनकम टैक्स, जिसकी इनकम उसको टैक्स देना है।

फिर इसकी वेल्थ टैक्स।

इसका अगला एग्जांपल इनकम टैक्स, वेल्थ टैक्स।

आगे बढ़े।

अब इनडायरेक्ट टैक्स क्या होता है?

बाबू, आओ जरा देखो।

एन इनडायरेक्ट टैक्स इज़ द टैक्स व्हिच इज़ इनिशियली इंपोज्ड ऑन एंड पेड बाय वन इंडिविजुअल, बट द बर्डन ऑफ व्हिच इज़ पास्ड ओवर टू सम अदर इंडिविजुअल, हु अल्टीमेटली बियर्स इट।

मतलब इसका बर्डन उसके ऊपर पड़ेगा, जो एक्चुअल में वो पर्टिकुलर कमोडिटी को कंज्यूम कर रहा होगा।

जैसे इनडायरेक्ट टैक्स का एग्जांपल गुड्स एंड सर्विस टैक्स, जीएसटी।

भैया जीएसटी वो पे करेगा, जो उस पर्टिकुलर गुड्स को कंज्यूम करने वाला है।

समझ में आया?

ठीक है ना?

आगे बढ़ते हैं भाई।

अब मेरिट्स ऑफ डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स नॉट इन सिलेबस।

भाई, बहुत सारा टॉपिक है इस चैप्टर में जो सिलेबस में नहीं है।

इसलिए मैं ना आपके सामने मार्क करता जा रहा हूं कि ये सिलेबस में नहीं है।

नाइ दर डी मेरिट्स है, नॉट इन सिलेबस।

यह भी टॉपिक सिलेबस में नहीं है।

ना डायरेक्ट टैक्स का, ना इनडायरेक्ट टैक्स का, दोनों के ना मेरिट्ज है, ना डी मेरिट सिलेबस में है।

किसी के स्कूल में पढ़ाए गए हैं, तो मुझे जरूर बताइएगा।

अब आगे बात करते हैं हम लोग बात करने जा रहे हैं प्रोग्रेसिव, रिग्रेसिव और प्रोपोर्शनल टैक्सेशन की।

साथ में डिग्रेसिव टैक्सेशन भी होता है, उसके बारे में पढ़ेंगे।

प्रोपोर्शनल टैक्सेशन क्या होता है?

बड़ा आसान है।

अ टैक्स इज कॉल्ड प्रोपोर्शनल व्हेन द रेट ऑफ टैक्सेशन रिमेंस द सेम एज द इनकम ऑफ द टैक्स पेयर इंक्रीजस।

भैया, इनकम बढ़ रही है, लेकिन टैक्स का जो रेट है, वो कांस्टेंट है।

वो क्या है?

कांस्टेंट।

इसको क्या बोलेंगे?

प्रोपोर्शनल टैक्सेशन।

व्हेन द रेट ऑफ टैक्सेशन रिमेंस द सेम एज द इनकम ऑफ द कंज्यूमर इंक्रीज।

इसको प्रोपोर्शनल टैक्सेशन बोलते हैं।

कोई दिक्कत वाली बात नहीं।

प्रोग्रेसिव टैक्सेशन क्या बोलते हैं?

आओ देखो।

अ टैक्स इज कॉल्ड प्रोग्रेसिव व्हेन द रेट ऑफ टैक्सेशन इंक्रीजस एज द टैक्स पेयर्स इनकम इंक्रीजस।

इंडिया में यही वाला टैक्स लगता है।

जैसे इनकम बढ़ेगी, बाबू, टैक्स का जो रेट होगा, वो भी बढ़ेगा।

इसको बोलेंगे प्रोग्रेसिव टैक्सेशन।

ठीक है ना बेटा जी?

आगे बढ़ा जाए।

रिग्रेसिव टैक्सेशन ये बेहतरीन है।

रिग्रेसिव टैक्सेशन का मतलब क्या होता है?

इन व्हिच द रेट ऑफ टैक्सेशन डिक्रीजस एज अ टैक्स पेयर्स इनकम इंक्रीजस।

मतलब इनकम बढ़ेगी, टैक्स रेट कम हो जाएगा।

ऐसा टैक्सेशन सबसे बढ़िया लगता है मुझको।

इनकम बढ़े, टैक्स कम हो जाए।

सिंपल।

अब आते हैं अगले टैक्सेशन पर, जो है डिग्रेसिव टैक्सेशन।

मजेदार है, पेपर में पूछा जा सकता है।

देखो, अ टैक्स इज कॉल्ड डिग्रेसिव व्हेन द रेट ऑफ प्रोग्रेशन इन टैक्सेशन डज नॉट इंक्रीज इन द सेम प्रोपोर्शन एज द इंक्रीज इन इनकम।

मान लेते हैं 20 पर इंक्रीज हो रहा है इनकम में और 5 पर इंक्रीज हो रहा है टैक्स में।

तो मतलब समझ पाए?

इनकम ज्यादा रेशो से बढ़ रही है, टैक्स कम रेशो से बढ़ रहा है।

उसको बोलेंगे डिग्रेसिव टैक्सेशन।

सब बच्चों को एक-एक बात समझ में आ गई?

आंखों के रस्ते दिल में क्लियर हो रही है।

अब आते हैं इस पूरे चैप्टर का सबसे इंपॉर्टेंट टॉपिक, जो पेपर में बाहे फैलाकर आपका इंतजार करेगा।

अभी मैंने आपको बताया था ना इंस्ट्रूमेंट्स टैक्सेशन पढ़ लिया।

अब पढ़ने जा रहे हैं पब्लिक एक्सपेंडिचर।

अब पब्लिक एक्सपेंडिचर मतलब क्या?

सरकार पैसा खर्च कहां-कहां करती है?

पब्लिक एक्सपेंडिचर रेफर्स टू द एक्सपेंसेस इंकर्स अथॉरिटीज।

पब्लिक अथॉरिटीज मतलब सेंट्रल गवर्नमेंट, स्टेट गवर्नमेंट एंड लोकल बॉडीज।

फॉर इट्स ओन मेंटेनेंस, एज आल्सो फॉर मीटिंग द एंड।

ये एंड है।

ठीक है ना?

एंड आल्सो मीटिंग द कलेक्टिव नीड्स ऑफ द सिटीजंस।

एंड फॉर प्रमोटिंग देयर इकोनॉमिक एंड सोशल वेलफेयर।

मतलब वो पैसा जो सरकार की कोई भी अथॉरिटी खुद को चलाने के लिए खर्चा कर रही है, समाज के कल्याण के लिए खर्चा कर रही है, वह सब कुछ आएगा पब्लिक एक्सपेंडिचर के अंदर।

ठीक है ना भाई?

टाइप्स ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर इज नॉट देयर इन द सिलेबस।

ठीक है ना भाई?

तो टेंशन मत लेना।

ग्रोथ ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर इज नॉट देयर इन द सिलेबस।

अब है क्या?

सिलेबस में इंपॉर्टेंस ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर।

यहां से या तो केस स्टडी मिलने वाला है या तो यह टॉपिक आपको सबसे ज्यादा मार्क्स का मिलने वाला है इन द अपकमिंग बोर्ड एग्जामिनेशन 2025।

तो मैंने पूरा आंसर आपको लिख कर दिया है।

नोट्स को बस तुम्हें डाउनलोड करना है और तुम्हारी दे बल्ले बल्ले, दे शावा शावा हो जाएगा।

ठीक है ना?

बहुत इंपॉर्टेंट है।

सबसे पहले हम बात करने जा रहे हैं सरकार पैसा कहां-कहां खर्चा करेगी, जिससे देश में प्रोडक्शन बढ़ जाए।

प्रोडक्शन काहे का?

प्रोडक्शन ऑफ गुड्स एंड सर्विसेस।

मतलब सरकार कैसे पैसे खर्चे करे, जिससे देश के अंदर गुड्स एंड सर्विसेस का प्रोडक्शन बढ़ जाए।

हम ये बात करने जा रहे हैं इंपॉर्टेंस ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर के बारे में।

बात करने जा रहे हैं इफेक्ट ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर के बारे में।

आओ जरा देखा जाए।

पब्लिक एक्सपेंडिचर पब्लिक एक्सपेंडिचर हेल्प्स इन जनरेटिंग इनकम फॉर वेरियस इंडिविजुअल एंड फर्म्स एज अ रिजल्ट ऑफ़ परचेस ऑफ़ गुड्स एंड सर्विसेस एंड फैक्टर सर्विसेस फ्रॉम द पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन डिफेंस।

देखो, ध्यान पढ़ना।

यहां से पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन डिफेंस, एडमिनिस्ट्रेशन एंड डेवलपमेंट एक्टिविटीज क्रिएट्स डिमांड फॉर वेरियस टाइप्स ऑफ गुड्स एंड सर्विसेस।

एंड देयर बाय क्रिएट्स इनकम फॉर दोज इंडिविजुअल्स एंड फर्म्स हु प्रोड्यूस दीज गुड्स।

कहना क्या चाहते हैं सर?

आप कहना यह चाहते हैं जब सरकार पैसा खर्च करती है डिफेंस के ऊपर।

ठीक है ना?

सरकार पैसा खर्च करती है डेवलपमेंट एक्टिविटीज के ऊपर और बाकी सारी चीजों पर।

तो इन पर्टिकुलर फील्ड से एसोसिएटेड लोगों की इनकम बढ़ती है।

जैसे कि मैं तुमको एकदम बेसिक एग्जांपल दूं।

सरकार ने नितिन गडकरी साहब ने बोला कि लखनऊ से लेकर हम कानपुर तक की एक हाईवे बना रहे हैं।

एक्सप्रेसवे बना रहे हैं, जो कि एक्चुअल में बन रहा है।

जितने बच्चे लखनऊ कानपुर गए होंगे, उनको पता होगा एक एक्सप्रेसवे बन रहा है।

अब एक्सप्रेसवे बन रहा है, तो रोड बन रही है।

रोड बनने में जितने भी लोग शामिल हैं, मतलब लेबर्स, रॉ मटेरियल, जो कंपनी वो बना रही है, वह सारे ही लोगों का रोजगार मिलने वाला है।

उन सारे ही लोगों को बहुत सालों से पैसे मिलते चले जा रहे हैं।

तो सरकार पैसा खर्च कर रही है डेवलपमेंट एक्टिविटीज से और भलाई हो रही है लोगों की।

क्लियर है कि नहीं?

क्लियर बात समझ में आ गई।

अगला पॉइंट देखो।

पब्लिक एक्सपेंडिचर कैन हेल्प इन इंक्रीजिंग प्रोडक्शन इन द इकॉनमी बाय इंक्रीजिंग द एफिशिएंसी ऑफ द पीपल।

बात समझना।

सरकार कह रही है कि हम देश में प्रोडक्शन बढ़ा सकते हैं जब हम लोगों की एफिशिएंसी को बढ़ा दें।

अब ये लोगों की एफिशिएंसी कैसे बढ़ सकती है?

आओ देखो।

पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन एजुकेशन, मेडिकल सर्विसेस, सैनिटेशन एंड चीप हाउसिंग फैसिलिटी इंक्रीजस द प्रोडक्टिविटी, प्रोडक्टिव एफिशिएंसी ऑफ द पीपल एट लार्ज।

कहना क्या आता है?

जब हम लोगों को एजुकेशन दे देंगे, स्किल सिखा देंगे, हम लोगों को हाउसिंग फैसिलिटी दे देंगे, मेडिकल सर्विसेस दे देंगे।

ठीक है ना?

सैनिटेशन, साफ-सुथरी जगह दे देंगे।

तो लोगों की प्रोडक्टिविटी ऑटोमेटिक बढ़ने लग जाएगी।

पढ़े लिखे लोग हैं, ठीक-ठाक घर है, मेडिकल फैसिलिटी मिल रही है।

तो वो अच्छे से काम कर सकते हैं।

तो प्रोडक्टिविटी एट अ होलिस्टिक लेवल, एट अ लार्ज लेवल विल स्टार्ट इंक्रीजिंग।

बात समझ में आ गया है?

इसकी वजह से देश में प्रोडक्शन बढ़ने लगेगा।

तीसरा पॉइंट देखो।

पब्लिक एक्सपेंडिचर कैन बी यूज्ड टू क्रिएट ह्यूमन स्किल्स थ्रू एजुकेशन एंड ट्रेनिंग।

दिस विल इंक्रीज एबिलिटी ऑफ़ द पीपल टू वर्क।

एज इट इनेबल्स देम टू प्रोड्यूस मोर।

अब क्या है?

लोगों को एजुकेशन मिल गई।

अब अगर लोगों को स्किल मिल जाए, मतलब अगर एक बंदा है, जिसको फर्नीचर का काम आ गया, तो फर्नीचर का काम करने लग जाएगा।

इसको वेल्डिंग का काम आ गया, वेल्डिंग का करने लग जाएगा।

किसी को घर बनाने का काम आ गया, तो वह उस तरह का काम करने लग जाएगा।

अगर स्किल भी मिल जाए लोगों को साथ-साथ, तो मजे ही मजे प्रोडक्शन बढ़ने लगेगा।

तो सरकार किस पर पैसा खर्च करेगी?

ह्यूमन स्किल्स बनाने के लिए।

ठीक है ना?

इसलिए स्किल इंडिया मूवमेंट इंडिया में लॉन्च हुआ है।

आगे बढ़ते हैं।

पब्लिक एक्सपेंडिचर कैन बी यूज्ड एज अ मींस ऑफ़ प्रोडक्शन, प्रोड्यूस एसेंशियल रॉ मटेरियल एंड अदर इंपॉर्टेंट इनपुट्स इन द पब्लिक सेक्टर।

दिस हेल्प्स इन रिमूविंग वेरियस शॉर्टेजेस, लाइक शॉर्टेजेस ऑफ स्टील, फर्टिलाइजर।

सो एज टू इंश्योर स्मूथ प्रोडक्शन।

अब भाई, देखो समझना।

य क्या पॉइंट बोल रहा है?

पॉइंट बोल रहा है फैक्ट्री में तो समान बन जाए, लेकिन रॉ मटेरियल ही नहीं होते हैं।

पावर की शॉर्टेज होती है।

ठीक है ना?

तो इस तरह से सरकार को क्या करना चाहिए?

रॉ मटेरियल का प्रोडक्शन बढ़ा देना चाहिए ताकि फैक्ट्रीज को रॉ मटेरियल की शॉर्टेज ना हो।

जब फैक्ट्रीज को रॉ मटेरियल की शॉर्टेज नहीं होगी, पावर की शॉर्टेज नहीं होगी, तो ऑटोमेटिकली देश के अंदर प्रोडक्शन बढ़ने लग जाएगा।

ये चार पॉइंट पढ़े।

अभी दो पॉइंट और हैं इसी पॉइंट के अंदर।

फिफ्थ पॉइंट देखो।

पब्लिक एक्सपेंडिचर इज हेल्पफुल इन प्रमोटिंग द डेवलपमेंट ऑफ बेसिक एंड की इंडस्ट्री, सच एज कैपिटल गुड्स इंडस्ट्रीज।

भाई, सरकार को पैसा खर्चा करना चाहिए बहुत कैपिटल इंटेंसिव इंडस्ट्रीज को डेवलप करने के लिए।

वो इंडस्ट्री जिसमें बहुत सारा पैसा खर्चा होता है, वो इंडस्ट्री जिसमें मशीनरी का प्रोडक्शन होता है, ताकि उस मशीनरी से बाकी गुड्स को बनाया जा सके।

तो सरकार को कोशिश करनी चाहिए कैपिटल इंडस्ट्रीज को डेवलप करना चाहिए।

इसको हम इंडस्ट्रियल इंडस्ट्रीज को डेवलप करने की बात कर रहे हैं।

ठीक है ना?

बात समझ में आया?

अगर सरकार बड़ी-बड़ी मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स बनाने लग जाएगी, तो लोगों को मशीनरी इजली मिल जाएगी।

जब लोगों को मशीनरी मिल इजली मिल जाएगी, तो देश में प्रोडक्शन बढ़ने लग जाएगा।

आगे बढ़ते हैं।

पब्लिक एक्सपेंडिचर इंकडम प्रोवाइड सोशल सिक्योरिटी स्कीम्स, सच एज ओल्ड एज पेंशंस, अनइंप्लॉयमेंट अलाउंस, सिकनेस बेनिफिट्स, फ्री एजुकेशन एंड मेडिकल फैसिलिटी।

इंक्रीज द परचेसिंग पावर ऑफ लो इनकम ग्रुप्स एंड हेंस देयर एबिलिटी टू वर्क इंक्रीजस।

जब लोगों को ना फ्री में बहुत सारी चीजें मिलने लग जाती हैं।

लेट्स से भाई, हम प्रोडक्शन तो कर रहे हैं, लेकिन कंज्यूम कौन करेगा?

कंज्यूम वही करेंगे, जो हमारे यहां लोग काम कर रहे हैं।

वही लेबर्स, वही लोग जो हमारे यहां फैक्ट्री में काम करते हैं।

वही लेबर्स जो किसी और फैक्ट्री में काम करते हैं, वही तो कंज्यूम करेंगे।

अब उनकी इनकम भी तो बढ़ानी है।

तो सरकार ने क्या किया?

ओल्ड एज पेंशन देना शुरू कर दिया।

ठीक है ना?

अनइंप्लॉयमेंट बेनिफिट्स देना शुरू कर दिए ताकि लोगों के पास पैसा आएगा।

जब लोगों के पास पैसा आएगा, तो उनकी परचेसिंग पावर बढ़ेगी।

और जब परचेसिंग पावर बढ़ेगी, तो डिमांड बढ़ेगी।

मतलब एक तरफ प्रोडक्शन बढ़ रहा है, दूसरी तरफ डिमांड बढ़ रहा है।

इक्विलियम कैन बी अचीव्ड।

तो ये आप पॉइंट लाइन बाय लाइन प्रिपेयर कर लीजिएगा।

पेपर में ये बाहे फैलाकर आने वाला है।

यहां तक समझ में आया?

चलिए बढ़े अगले टॉपिक की तरफ।

चलो भाई बढ़ते हैं।

चलो बाबू सेकंड पॉइंट पर आते हैं।

सेकंड पॉइंट क्या कह रहा है?

इफेक्ट्स ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन इन्वेस्टमेंट।

सर इन्वेस्टमेंट।

अब देखो यहां पर कहना क्या चाहते हैं?

सरकार कैसे-कैसे पैसा खर्चा करेगी, जिससे विदेश से पैसा, विदेश से इन्वेस्टमेंट हमारे देश में आ सके।

मतलब मैं यहां पर यह बताना है कि सरकार के वो कौन-कौन से स्टेप्स हैं।

सरकार के खर्चे कैसे यूटिलाइज हो रहे हैं टू ब्रिंग द फॉरेन इन्वेस्टमेंट न टू द कंट्री।

आओ जरा देखते हैं।

सबसे पहला पॉइंट।

पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन मेंटेनेंस ऑफ लॉ एंड ऑर्डर क्रिएट्स कॉन्फिडेंस इन द माइंड्स ऑफ इन्वेस्टर्स एंड हेंस इट इनकरेजेस देम टू अंडरटेक इन्वेस्टमेंट।

अगर तुम इंडियन से पूछोगे कि पाकिस्तान में पैसा इन्वेस्ट करेंगे क्या?

नहीं।

ठीक है ना?

तो कैसे पैसा इन्वेस्ट करता है फॉरेनर किसी भी कंट्री में?

जिस कंट्री में लॉ एंड ऑर्डर बहुत बढ़िया है।

जैसे इंडिया में पिछले कई सालों में, स्पेशली यूपी में लॉ एंड ऑर्डर बहुत सुधरा है।

आप लोगों ने देखा होगा।

ठीक है ना?

तो लॉ एंड ऑर्डर सुधरने की वजह से विदेश वालों को लगता है कि यार ये पर्टिकुलर जगह बड़ी बढ़िया है।

मेरी इन्वेस्टमेंट सेफ होगी।

तो चलो इस पर्टिकुलर कंट्री में, इस पर्टिकुलर कंट्री के स्टेट में पैसा इन्वेस्ट करना शुरू करते हैं।

बात समझ में आ रही है?

तो पहला तो है कि सरकार जब लॉ एंड ऑर्डर में पैसा खर्चा करेगी, फॉरेन इन्वेस्टमेंट अट्रैक्ट होगा।

दूसरा पॉइंट देखते हैं।

पब्लिक एक्सपेंडिचर कैन बी डायरेक्टली यूज्ड टू क्रिएट सोशल ओवरहेड्स इन द फॉर्म ऑफ ह्यूमन कैपिटल।

जिस जगह पर लगेगा कि बड़े स्किलफुल लोग रहते हैं, बड़ा ज्यादा पढ़े-लिखे लोग हैं, बड़े अच्छे लेबर क्लास हैं, वहां पर फॉरेनर्स पैसा लगाना चाहते हैं।

वहां से फॉरेन इन्वेस्टमेंट आने के चांसेस होते हैं।

बिकॉज़ यहां पर बड़े स्किलफुल लेबर्स मिल जाएंगे।

अच्छा काम भी कर लेंगे, कम पैसे भी लेंगे।

कंपनी को मजे-मजे भी आ जाएंगे।

समझ में आ रही बात?

तीसरा पॉइंट।

क्रिएशन एंड मेंटेनेंस ऑफ इकोनॉमिक ओवरहेड्स, सच एज पावर, इरिगेशन, ट्रांसपोर्ट, कम्युनिकेशन।

वुड मोटिवेट द प्रोड्यूसर्स टू अंडरटेक इन्वेस्टमेंट्स।

जिस जगह पर बड़ा अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर फैसिलिटी है, जहां पे रोड्स बने हैं, डम्स बने हैं, ब्रिजे बने हैं, बने हैं सब कुछ अच्छा मिल रहा है, वहां पर फॉरेन इन्वेस्टमेंट अट्रैक्ट होती है।

कि हां भैया, इस पर्टिकुलर जगह जाएंगे, पैसा लगाएंगे और बढ़िया-बढ़िया मुनाफा कमा लेंगे।

अगला पॉइंट।

द गवर्नमेंट मे प्रोवाइड फाइनेंशियल असिस्टेंसिया स्टिमुलेटिंग।

सरकार आपको सब्सिडी दे देगा, टैक्स में रिबेट दे देगा।

कहेगा फ्री पावर ले लो, फ्री वाटर ले लो, फ्री फैसिलिटी ले लो।

बस हमारी कंट्री में आके पैसा लगाओ ताकि बढ़िया-बढ़िया यहां के लोगों को रोजगार मिलना शुरू हो जाए।

तो ये भी एक गवर्नमेंट का खर्चा है, जिससे फॉरेन इन्वेस्टमेंट को लाया जा सकता है।

अब हम बात करने जा रहे हैं इफेक्ट ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन इनकम डिस्ट्रीब्यूशन।

इनकम डिस्ट्रीब्यूशन का मतलब क्या है?

हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच में बहुत ज्यादा दूरियां हैं।

इस दूरी को सरकार खर्चों से कैसे कम कर सकती है?

आओ जरा देखते हैं।

पहला पॉइंट।

पब्लिक एक्सपेंडिचर कैन बी डिवाइडेड, कैन बी यूज्ड, कैन बी यूज या यूज्ड टू हेल्प द पुअर सेक्शन ऑफ द सोसाइटी एंड देयर बाय रिड्यूस इन इक्वलिटी ऑफ इनकम।

कैसे?

जरा पहला पॉइंट देखें।

पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन सोशल सिक्योरिटी एंड वेलफेयर मेजर्स, लाइक फ्री एजुकेशन, फ्री मेडिकल फैसिलिटी, सोशल सिक्योरिटी स्कीम्स, लाइक ओल्ड एज पेंशंस, अनइंप्लॉयमेंट रिलीफ, कैन बी गिवन टू द प्रायोरिटी टू हेल्प द पुअर।

अब भाई, अमीरों के पास तो बड़े-बड़े हॉस्पिटल्स हैं, वो पैसा दे सकते हैं।

गरीब लोगों के पास पैसा नहीं।

तो गरीब को फ्री एजुकेशन, गरीब को फ्री हाउसिंग फैसिलिटी, गरीब को फ्री मेडिकल फैसिलिटी ये देंगे।

तो अमीर और गरीब के बीच में जो दूरियां हैं, वो कम हो जाएगी।

अगला पॉइंट देखते हैं।

बेटा, सेकंड पॉइंट।

पब्लिक एक्सपेंडिचर इंकडम प्रोवाइड सब्सिडीज ऑन आर्टिकल्स ऑफ कॉमन कंसंट, लाइक फूड ग्रेस, कैन आल्सो हेल्प द पुअर पर्सन एंड देयर फॉय इंप्रूव इनकम डिस्ट्रीब्यूशन।

भाई, अमीरों के पास तो फूड ग्रेंस खरीदने का पैसा है, कोई दिक्कत वाली बात नहीं।

लेकिन गरीब के पास तो अनाज खरीदने का पैसा नहीं है।

तो गरीबों को सस्ते रेट पर, एकदम सब्सिडाइज रेट पर आप फूड ग्रेंस प्रोवाइड कर रहे हैं।

खाना प्रोवाइड कर रहे हैं, जो पीडीएस सिस्टम से प्रोवाइड भी किया था।

राशन कार्ड बनता है ना हमारे देश में?

पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम्स हैं।

वहां पर सस्ते रेट में गरीब लोगों को राशन मवैया कराया जा सकता है।

मतलब प्रोवाइड कराया जा सकता है।

इससे अमीर और गरीब के बीच में जो दूरी है, वो कम हो जाएगी।

आगे बढ़ते हैं।

पब्लिक एक्सपेंडिचर कैन बी इफेक्टिवली यूज्ड इन रिड्यूस रीजनल डिस्पैरेज एज वेल।

सब्सिडीज एंड फाइनेंशियल असिस्टेंसिया पर तो जा ही रहे हैं।

अब सरकार कुछ ऐसी सब्सिडीज प्रोवाइड करने लग जाए, जिससे नई फैक्ट्रीज, नया इन्वेस्टमेंट बैकवर्ड एरियाज में होने लगे, रूरल एरियाज में होने लगे।

जब बैकवर्ड और रूरल एरियाज में इंडस्ट्री सेटअप होने लग जाएंगी, तो वहां के लोगों को भी रोजगार मिलेगा।

जब वहां के लोगों को भी रोजगार मिलेगा, तो इनकम डिस्ट्रीब्यूशन जो है, अमीर और गरीब के बीच का, वो कम होने लग जाएगा।

समझ में आ गई सब बच्चों को?

य तक बात।

अब आके अगले पॉइंट पे देखते हैं।

इफेक्ट ऑफ पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन इकोनॉमिक ग्रोथ।

देश की तरक्की कैसे की जाए?

सरकारी पैसों को इस्तेमाल करते हुए, सरकार ऐसे पैसे कैसे खर्च करे, जिससे देश हमारा ग्रो करता जाए लगातार।

आओ जरा देखते हैं।

बेटा, पब्लिक एक्सपेंडिचर प्रमोट्स इकोनॉमिक डेवलपमेंट डायरेक्टली बाय डेवलपिंग इकोनॉमिक ओवरहेड्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर एंड एस्टेब्लिशिंग कैपिटल गुड इंडस्ट्रीज।

बेसिक एंड की इंडस्ट्रीज।

मतलब सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करे, कैपिटल गुड इंडस्ट्रीज को डेवलप करें, की इंडस्ट्रीज को डेवलप करेगी।

तो हमारे देश में जो इकोनॉमिक ग्रोथ है, वो तेजी से बढ़ने लग जाएगी।

अगला पॉइंट जरा देखो।

पब्लिक एक्सपेंडिचर में स्टीमुलेट इकोनॉमिक डेवलपमेंट इनडायरेक्टली बाय प्रोवाइड एजुकेशन, ट्रेनिंग एंड रिसर्च फैसिलिटी।

अगर सरकार एजुकेशन फैसिलिटी प्रोवाइड करेगी, ट्रेनिंग फैसिलिटी प्रोवाइड करेगी, रिसर्च एंड डेवलपमेंट की फैसिलिटी प्रोवाइड करेगी, तो देश की जो इकोनॉमिक ग्रोथ है, वो तेजी से बढ़ने लग जाएगी।

पब्लिक एक्सपेंडिचर ऑन एजुकेशन एंड ट्रेनिंग, पब्लिक हेल्थ, सोशल सिक्योरिटी स्कीम्स इंक्रीजस एफिशिएंसी एंड स्किल ऑफ़ द पीपल।

जब एफिशिएंसी और स्किल बढ़ेगी, तो प्रोडक्शन बढ़ने लगेगा।

प्रोडक्शन बढ़ेगा, तो हमारा देश तेजी से ग्रो करने लग जाएगा।

तो तुम कहीं ना कहीं ये फोर्थ पॉइंट पर देख रहे हो।

इस चौथे हेडिंग के अंदर जो स्टार्टिंग के तीन पॉइंट पड़े, सबका मर्जर यहीं आ जा रहा है।

जरा एनालाइज करके देखना।

सारे पहले, दूसरे, तीसरा जो इन्वेस्टमेंट बढ़ रहा था, प्रोडक्शन बढ़ रहा था, इनकम डिस्ट्रीब्यूशन बढ़ रहा था।

उन तीनों के पॉइंट मर्ज होकर आपको इकोनॉमिक ग्रोथ के अंदर मिल रहे हैं।

तो याद करने का अच्छा तरीका है।

पब्लिक एक्सपेंडिचर इन द फॉर्म ऑफ सब्सिडीज हेल्प्स इन स्टिमुलेटिंग एग्रीकल्चरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट।

अगर सरकार सब्सिडीज देगी, तो एग्रीकल्चर सेक्टर ग्रो करेगा, साथ ही साथ इंडस्ट्रियल सेक्टर ग्रो करेगा।

अगला पब्लिक एक्सपेंडिचर पॉलिसी कैन बी इफेक्टिवली यूज्ड टू रिड्यूस ग्लेयरिंग डिस्पेरटनेस, इनकम एंड वेल्थ।

टू रिड्यूस रीजनल डिस्पैरेज।

दस पब्लिक एक्सपेंडिचर हेल्प्स इन अचीविया जस्टिस।

मतलब सरकार कुछ इस तरह से खर्चा करें, जिससे हमारे रीजनल जो रूरल बैकवर्ड एरियाज हैं, वो भी डेवलप करने लगे।

अमीर और गरीब की जो दूरी होगी, वो भी कम होने लगे।

इससे पूरी देश में इकोनॉमिक ग्रोथ तेजी से हो सकेगा।

तो टिप ये है कि पॉइंट नंबर वन, पॉइंट नंबर टू, पॉइंट नंबर थ्री को पढ़ो।

उनके पॉइंट्स उठाओ और इकोनॉमिक ग्रोथ के पॉइंट्स में मर्ज कर कर लिखकर चले आओ।

आपको पूरे-पूरे नंबर मिल जाएंगे।

भाई, ठीक है ना?

अब आते हैं इकोनॉमिक पब्लिक एक्सपेंडिचर एंड इकोनॉमिक स्टेबिलिटी।

स्टेबिलिटी का मतलब क्या है?

भाई, बिजनेस साइकल में ना कभी रिसेशन आता है, कभी इंफ्लेशन आता है, कभी बूम आता है, कभी प्रोस्पेरिटी आता है।

हमारे इकोनॉमी के अंदर स्टेबिलिटी बनी रहनी चाहिए।

लगातार स्टेडी ग्रोथ होती रहनी चाहिए।

इसमें सरकार को क्या करना चाहिए?

आओ वो पॉइंट्स देखते हैं।

पहला पॉइंट देखो।

इकोनॉमिक इंस्टेबिलिटी इज अ कैरेक्टरिस्टिक फीचर ऑफ फ्री मार्केट इकोनॉमी।

भाई, इंस्टेबिलिटी तो हमेशा बनी रहेगी।

जैसे हमारे देश में फ्री मार्केट इकोनॉमी है।

मिक्स्ड इकोनॉमी का हम लोग एक बहुत बड़ा उदाहरण हैं।

यहां पर प्राइवेट सेक्टर फ्री इकॉनमी को फॉलो करता है और गवर्नमेंट सेक्टर सोशलिस्ट इकॉनमी को फॉलो करता है।

तो इस तरह की इकॉनमी में हमेशा इंस्टेबिलिटी बनी रहेगी।

तो अब सरकार क्या करें कि इंस्टेबिलिटी से स्टेबिलिटी की तरफ हम बढ़ जाएं?

द इकोनॉमी हैव बीन सफरिंग फ्रॉम बिजनेस साइकल्स करैक्टर साइज अल्टरनेटिंग पीरियड्स ऑफ बूम्स एंड डिप्रेशन।

मैंने बताया आपको हर समय अलग-अलग फेज आता है।

बूम्स के सम में क्या करना चाहिए?

डिप्रेशन के समय क्या करना चाहिए?

बूम मतलब इंफ्लेशन के समय क्या करना चाहिए?

डिफ्लेशन के समय क्या करना चाहिए?

सरकार को आओ देखते हैं।

आसानी से समझ में आ जाएगा।

ड्यूरिंग द पीरियड ऑफ डिप्रेशन।

डिप्रेशन मतलब डिफ्लेशन है।

ठीक है ना?

द गवर्नमेंट इज एक्सपेक्टेड टू रेज इट्स एक्सपेंडिचर।

भैया, पब्लिक एक्सपेंडिचर को बढ़ा देना चाहिए।

ड्यूरिंग द पीरियड ऑफ डिफ्लेशन या डिप्रेशन।

ठीक है ना भाई?

इंक्रीज इन पब्लिक एक्सपेंडिचर लार्जली इन द फॉर्म ऑफ डायरेक्ट पब्लिक इन्वेस्टमेंट ऑन अ मैसिव स्केल विल ऐड डायरेक्टली टू एग्रीगेट डिमांड इन द इकॉनमी एंड देयर बाय रिजल्ट इन इंक्रीज इन आउटपुट।

अब अगर डिफ्लेशन चल रहा है, लोगों के पास पैसा नहीं है, तो सरकार को उस समय पर पब्लिक एक्सपेंडिचर बढ़ा देना चाहिए।

जब सरकार नए-नए योजनाएं ले आएगी, पब्लिक एक्सपेंडिचर बढ़ाएगी, तो लोगों के पास इनकम आना शुरू हो जाएगा।

और जैसे बाबू, लोगों के पास इनकम आएगा, वो डिमांड करने लग जाएंगे और डिफ्लेशन की प्रॉब्लम दूर हो जाएगी।

ऑन द कांट्रेरी क्या होगा?

ड्यूरिंग द पीरियड ऑफ डिप्रेशन, द गवर्नमेंट इ एक्सपेक्टेड टू रेज एक्सपेंडिचर।

अच्छा, ये दोबारा हो गया है।

ओके, मैं यहां पर इसको थोड़ा सा सही कर देता हूं।

ठीक है ना?

मैं इसको थोड़ा सा करेक्ट कर देता हूं।

च पाटी, जिससे सब बच्चों को दिक्कत ना आए।

ठीक है?

आओ जरा देखते हैं।

मैं इसको और आसान भाषा में आपके लिए लिख देता हूं ताकि मेरे बच्चों को बिल्कुल आसानी से समझ में आ जाए।

आओ भाई, बिल्कुल आसानी से समझ में आ जाए।

चलो भाई, मैं लिख के दिखा रहा हूं आपको।

आओ देखो मैं क्या बोल रहा हूं।

बेटा, ड्यूरिंग डिफ्लेशन क्या करना चाहिए सरकार को?

ड्यूरिंग इन्फ्लेशन क्या करना चाहिए सरकार को?

इन्फ्लेशन बोलो इसको बूम की सिचुएशन बोल सकते हैं।

डिफ्लेशन बोलो इसको डिप्रेशन की सिचुएशन बोल सकते हैं।

ठीक है ना भाई?

क्या करना चाहिए इस केस में?

करना चाहिए पब्लिक एक्सपेंडिचर को बढ़ाना।

सरकार को पब्लिक एक्सपें को बढ़ा देना चाहिए।

जब बढ़ाएंगे, तो लोगों की इनकम बढ़ेगी और डिफ्लेशन जैसी सिचुएशन दूर हो जाएगी।

और यहां पर पब्लिक एक्सपेंडिचर को कम कर देना चाहिए।

सरकार को पब्लिक एक्सपेंडिचर कम करना चाहिए।

अगर कम करेंगे, तो लोगों के पास इनकम कम पहुंचेगी, डिमांड कम होगी और डिफ्लेशन जैसी सिचुएशन से निपटा जा सकता है।

तो यह आसान भाषा में जो मैंने दो पॉइंट लिखवाए हैं ना, इससे तुमको बढ़िया-बढ़िया चीजें समझ में आ जाएंगी।

क्लियर है कि नहीं?

क्लियर समझ में आई बात?

आगे बढ़ा जाए।

अब चलो बच्चा पाठी, हम लोग बढ़ते हैं अगले टॉपिक की तरफ।

अगला टॉपिक है हमारा पब्लिक डेट।

पब्लिक डेट पे बढ़ने से पहले मैं आपको एकदम लिटरल मीनिंग बताऊं।

पब्लिक डेट बोलो या पब्लिक बोरोंग बोलो, एक ही बात है।

तीन इंस्ट्रूमेंट्स पढ़े हैं ना हम लोगों ने?

सबसे पहला टैक्सेशन, दूसरा पब्लिक एक्सपेंडिचर, तीसरा पब्लिक बोरोंग।

ये पब्लिक बोरोंग के बारे में ही बात हो रही है।

पब्लिक बोरोंग का मतलब क्या होता है?

कभी-कभी सरकार ना आम जनता से पैसा उधार मांगती है।

उस चीज को बोलते हैं पब्लिक बोरोंग।

तो देखो, प डेट इज द डेट चच द गवर्नमेंट ओज टू इट्स सब्जेक्ट्स एंड टू द नेशनल्स ऑफ द अदर कंट्रीज।

जिससे भी पैसा उधार ले लेगी सरकार, उसको लिए यह पर्टिकुलर चीज पब्लिक डेट हो जाएगा।

हो सकता है हमारे देश के निवासियों से ले ले, हो सकता है विदेश कंट्री से किसी निवासियों से ले ले, विदेश कंट्री के फॉरेनर से लोन ले ले।

तो वो भी पब्लिक डेट कहलाएगा।

हमारे देश के लोगों से लोन ले ले, वो भी पब्लिक डेट कहलाएगा।

सिंपल है, पब्लिक डेट का मतलब समझ में आ गया।

अब क्या है?

हमारे सिलेबस में स्ट्रक्चर, टाइप्स ऑफ पब्लिक डेट हमारे सिलेबस में नहीं है।

शावा शावा, द बल्ले बल्ले।

रीजंस फॉर बोरो इंग्स बाय गवर्नमेंट, ये भी हमारे सिलेबस में नहीं है।

वाह भाई वाह, सिलेबस में है क्या?

सिलेबस में है मेथड्स ऑफ डेट रिडेंपशन।

ये इंपॉर्टेंट टॉपिक है, इसके सारे पॉइंट पढ़ना मेरी जान।

और यह पेपर बाहे फैलाकर इस 2025 में इंतजार कर रहा है।

यहां से एक टॉपिक तो आने ही आने वाला है।

मैंने सब कुछ लिख कर दे दिया है।

तो तुमको टेंशन वाली बात तो होनी नहीं चाहिए।

चलिए शुरू करें, बढ़ा जाए।

चलो बढ़ते हैं।

चलो, एक सिंपल सा तरीका बताता हूं मेथड्स ऑफ डेट रिडेंपशन का मतलब क्या है।

आपने जो पैसे किसी से लिए थे, अब आप उसको कैसे-कैसे वापस करेंगे?

पहला एग्जांपल पाकिस्तान का है।

रिपुडिएशन ऑफ डेथ, मतलब रिफ्यूज ऑफ डेट।

मतलब भाई साहब, कौन सा पैसा हमने कब लिया?

झूठ क्यों बोल रहे हो?

जानते नहीं हो क्या?

पहचानते नहीं हो क्या?

हमने तो पैसा लिया ही नहीं आपसे।

यह वो केस है, पाकिस्तान को पैसा दो और भूल जाओ।

ठीक है ना?

रिपुडिएशन ऑफ डेट क्या कहता है?

रिपुडिएशन मींस रिफ्यूज टू पे अ डेट बाय द गवर्नमेंट।

व्हेन द गवर्नमेंट रिपुडिएट पब्लिक डेट, इट डज नॉट रिकॉग्नाइज इट्स ऑब्लिगेशन टू पे द लोन।

इट रिफ्यूजेस टू पे द इंटरेस्ट एज वेल एज द प्रिंसिपल अमाउंट ऑफ डेट बिकॉज ऑफ फाइनेंशियल कंस्ट्रेंट्स।

सरकार सिरे से नकारा कर देगी।

भैया, कब पैसा लिया यार?

वही वाले हमारा बेस्ट फ्रेंड।

एक बार पैसा दे दो, भूल जाओ।

ठीक है ना?

वही वाला हाल है।

आते हैं रिफंडिंग।

रिफंडिंग का मतलब क्या?

ये बड़ा, ये भी पाकिस्तान का एग्जांपल है।

ठीक है ना?

रिफंडिंग इज द प्रोसेस बाय विच द गवर्नमेंट रेजस न्यू बंड्स टू पे ऑफ द मैचरिंग बंड्स।

मतलब एक लोन पे करने के लिए दूसरा लोन ले लो।

सिंपल।

दूसरा लोन लिया, उससे पहला लोन चुका दिया।

अब दूसरा लोन कैसे चुकाएंगे?

तीसरा लोन लेकर।

और तीसरा कैसे चुकाएंगे?

चौथा लेकर।

ऐसे चलता रहेगा।

मजे ही मजे।

इसको बोलते हैं रिफंडिंग।

दस द गवर्नमेंट टेक्स फ्रेश लोन टू रिपे एन ओल्ड लोन।

इन दिस केस, द मनी बर्डन ऑफ़ द डेट इज नॉट लिक्विडेटेड, बट इट इज पोस्टपोन टू सम फ्यूचर डेट।

हेंस, द टोटल बर्डन ऑफ द डेट कंटिन्यूज टू एक्यूम।

लगातार इस तरह से आपके ऊपर लोन बढ़ता ही चला जाता है।

तीसरा आता है डेट कन्वर्जन।

डेट कन्वर्ज मतलब एक लोन को दूसरे लोन में कन्वर्ट कर देना।

वापस नहीं कर रहे हैं, एक लोन को दूसरे लोन में कन्वर्ट कर दे रहे हैं।

आओ जरा देखो।

कन्वर्जन ऑफ पब्लिक डेट मींस एक्सचेंज ऑफ न्यू डेट फॉर द ओल्ड डेट।

इन दिस मेथड, द लोन इज एक्चुअली नॉट रिपेड, बट द फॉर्म ऑफ डेट इज चेंज।

द प्रोसेस ऑफ कन्वर्जन कंसिस्ट ऑफ कन्वर्टिंग अ हाई इंटरेस्ट रेट टू अ लो इंटरेस्ट डेट।

मतलब पहले लोन पर सरकार लेट से 12 पर इंटरेस्ट दे रही थी।

अब सरकार ने उसको कम करके 8 पर कर दिया है।

ओबवियसली बात है, सरकार का बर्डन कम हो जाएगा।

लेट्स से ₹ लाख पर 12 पर का ब्याज पर, आप सरकार ने पैसे लिए।

तो 1 चुकाने चाहिए।

अब सरकार ने 12 पर को घटा के 8 पर कर दिया।

अब सरकार को सिर्फ 188000 चुकाने पड़ेंगे।

मतलब ऑटोमेटिक सरकार ने 4000 का डेट पे कर दिया।

पे नहीं किया है, मगर लोन को कन्वर्ट कर दिया है।

समझ में आ रही बात?

अब आते हैं बजेट्री सरप्लस।

मतलब बजट में पहले से ही एक प्रोविजन बनाना कि हम इस बार अपने बजट में कुछ पैसा निकालकर लोगों का पैसा वापस करने वाले हैं।

इसको बोलते हैं बजेट्री सरप्लस।

सम टाइम्स, द गवर्नमेंट इज एबल टू जनरेट अ सरप्लस इन द बजट।

सरप्लस मतलब एक्स्ट्रा पैसे।

से इट कैन यूज दिस बजट।

इट कैन यूज दिस बजट सरप्लस टू पे ऑफ इट्स डेट टू द पीपल।

और यह बजट सरप्लस का पैसा लोगों को लोन चुकाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

पॉलिसी ऑफ सरप्लस बजट मे भी फॉलो एनुअली फॉर पेइंग ऑफ पब्लिक डेट।

ग्रेजुएट का पैसा बजट सरप्लस के थ्रू पे किया जा सकता है।

टर्मिनल एटीज मतलब क्या?

इंस्टॉलमेंट्स में लोगों का पैसा वापस करना।

यह बहुत इफेक्टिव मेथड है।

अंडर दिस मेथड, द गवर्नमेंट पेज इट्स डेट इन इक्वल एनुअल इंस्टॉलमेंट्स, व्हिच इंक्लूड्स इंटरेस्ट एज वेल एज द प्रिंसिपल अमाउंट ऑफ डेट।

धीरे-धीरे इंस्टॉलमेंट्स में पैसा वापस करने को हम लोग टर्मिनल एनटीजी फंड याद है?

पिक्चर देखिए।

किसी ने मुझसे शादी करोगी?

मुझसे शादी करोगी?

सलमान खान ने ना अलग गुल्लक बना रखे थे।

कि यह मां की आंखों के लिए, यह बहन की शादी के लिए या खुद के लिए।

ठीक है ना?

तो उसने क्या बनाए थे?

हर एक पर्पस के लिए सिंकिंग फंड बना लिया था।

वैसे ही सरकार भी लोन को चुकाने के लिए एक स्पेसिफिक फंड बना लेती है।

सिंकिंग फंड एक तरह का गुल्लक है।

इसमें पैसे डालती रहेगी, पैसे डालती रहेगी।

जब व गुल्लक भर जाएगा, तो उससे कलेक्ट किया हुआ पैसे से लोन चुका दिया जाएगा।

सम टाइम्स, द गवर्नमेंट एस्टेब्लिशेज अ सेपरेट फंड नोन एज सिंकिंग फंड फॉर द पर्पस ऑफ रीपेमेंट ऑफ इट्स डेट।

द गवर्नमेंट क्रेडिट्स सर्टेन अमाउंट ऑफ इट्स रेवेन्यू एव्री ईयर फॉर द रीपेमेंट ऑफ आउटस्टैंडिंग डेट।

द फंड इज यूज्ड फॉर द पेमेंट ऑफ ऑफ आउटस्टैंडिंग डेट, पेमेंट ऑफ इंटरेस्ट एंड अल्टीमेटली रीपेमेंट ऑफ लोंस एज द फॉल ड्यू।

बात समझ में आ रही है?

धीरे-धीरे पैसा इकट्ठा कर रहे हैं।

जब पैसा इकट्ठा हो जाएगा, तो लोन चुका दिया जाएगा।

उसे बोलते हैं सिंकिंग फंड।

आते हैं अगले स्टेट्यूटरी रिडक्शन इन द इंटरेस्ट रेट्स।

ये भी काफी इंपॉर्टेंट है।

बच्चे यहां तक पढ़ते ही नहीं हैं और स्किप करके चले जाते हैं।

इसलिए पढ़ना इस साल से जरूरी है।

बिकॉज पेपर एप्लीकेशन ओरिएंटेड आने वाला है।

कहां से पूछ लेंगे, कुछ नहीं पता है।

सम टाइम्स, द गवर्नमेंट टेक्स अ स्टेट्यूटरी डिसीजंस टू रिड्यूस द रेट ऑफ इंटरेस्ट पेबल ऑन इट्स पब्लिक डेट।

मतलब हमने इंटरेस्ट को कम कर दिया।

कन्वर्जन वाले जैसा ही है।

द क्रेडिटर्स आर फोर्सड टू एक्सेप्ट द रिड्यूस्ड रेट ऑफ इंटरेस्ट इन द व्यू ऑफ़ स्टेट्यूटरी पावर्स।

गवर्नमेंट कर रही है, आपके पास ऑप्शन नहीं है।

आपको एक्सेप्ट ही करना पड़ेगा।

ऑर्डिन, द गवर्नमेंट डज नॉट फॉलो दिस पॉलिसी ऑफ रिड्यूस द रेट ऑफ इंटरेस्ट जनरली।

ऐसा सरकार काम करती नहीं है, बिकॉज सरकार की रेपुटेशन इसमें बहुत खराब होती है।

आगे आते हैं कैपिटल लेवी।

कैपिटल लेवी मतलब आपके ऊपर खुद ही बहुत सारा टैक्स चार्ज कर देगी सरकार आपकी वेल्थ के ऊपर।

और वहां से जो पैसा आएगा, उससे ही आपका लोन चुका देगी।

यह बढ़िया एग्जांपल है।

कैपिटल लेवी का मतलब क्या है?

इट रेफर्स टू अ वेरी हैवी टैक्स ऑन प्रॉपर्टी एंड वेल्थ।

इट इज़ अ वंस फॉर ऑल टैक्स इंपोज्ड ऑन कैपिटल एसेट्स ऑफ़ सर्टेन वैल्यू।

अ कैपिटल लेवी इज़ जस्ट लाइक वेल्थ टैक्स, एज इट इज इंपोज्ड ऑन द कैपिटल एसेट्स।

इट इज इंपोज्ड ऑन रिच एंड प्र प्रॉपर्टीड इंडिविजुअल्स ऑन अ प्रोग्रेसिव स्केल।

दिस सिस्टम इज़ सजेस्ट टू पे द वॉर टाइम डेट बाय टैक्सिंग रिच सेक्शन ऑफ द कम्युनिटी।

अमीरों के ऊपर एकदम हैवी टैक्स लगा देंगे, उनकी प्रॉपर्टी के ऊपर।

उनकी प्रॉपर्टी के ऊपर एक हैवी टैक्स लगाया जाएगा।

वहां से जो पैसा आएगा, उससे लोन चुका दिया जाएगा।

इसको बोलते हैं कैपिटल लेवी करना।

आगे बढ़ते हैं एक्सपोर्ट सरप्लस करना।

एक्सपोर्ट सरप्लस।

अभी तक जितने मेथड पढ़े, उन सब से हम इंटरनल लोन चुकाते हैं।

एक्सपोर्ट सरप्लस से हम एक्सटर्नल, मतलब विदेश से लिया हुआ कर्जा चुकाते हैं।

इसमें होता क्या है?

वो हमारी जो इंडस्ट्रीज जो एक्सपोर्ट करती हैं, वहां से पैसा इकट्ठा करना और इससे लोन चुका देना।

कहना क्या चाहते हैं?

आओ जरा देखो।

इट कैन बी डन बाय क्रिएटिंग एन एक्सपोर्ट सरप्लस।

इफ फॉरेन लोंस आर इन्वेस्टेड इन दीज इंडस्ट्रीज, व्हिच प्रोड्यूस एक्सपोर्टेबल गुड्स।

द लोंस मे बी इजली रिपेड।

हाउ एवर, इफ द लोंस आर यूटिलाइज्ड फॉर अनपटडाउनेबल।

तुरंत चुका दिया।

इसको बोलते हैं एक्सपोर्ट सरप्लस।

तो भाई, यहां तक के पॉइंट बहुत इंपॉर्टेंट हैं और पेपर में आपसे पूछे जाएंगे।

अब लास्ट टॉपिक के ऊपर आते हैं डेफिसिट फाइनेंसिंग।

डेफिसिट फाइनेंसिंग का एकदम लिटरल मीनिंग है प्रिंटिंग ऑफ न्यू करेंसी।

जब सरकार को पैसे की जरूरत पड़े, क्या करना?

किसी और के पास तुरंत नोट छाप लो।

बिकॉज सरकार के पास कौन सी मशीन है नोट छापने की?

क्या आज ये नोट छापने की मशीन हम लोग के पास भी होती, तो मजा ही आ जाता।

तो डेफिसिट फाइनेंसिंग का मतलब क्या होता है?

मींस मीटिंग द डेफिसिट बिटवीन गवर्नमेंट एक्सपेंडिचर एंड रेवेन्यू थ्रू द क्रिएशन ऑफ न्यू मनी।

नया पैसा छाप के अपनी कमियों को दूर कर लेना, इसको कहते हैं डेफिसिट फाइनेंसिंग।

अब वाई डेफिसिट फाइनेंसिंग?

आहा, ये भी सिलेबस में नहीं है।

नेक्स्ट।

ठीक है ना?

तो यह हमारा टॉपिक सिलेबस में नहीं है।

एडवर्स इफेक्ट ऑफ डेफिसिट फाइनेंसिंग भी सिलेबस में नहीं है।

मजे ही मजे।

फिस्कल पॉलिसी इन एक्शन भी सिलेबस में नहीं है।

आगे बढ़ते हैं।

और यहां पर जाकर हमारा यह पूरा टॉपिक खत्म होता है।

दिस इज पटर नंबर 16, फिस्कल पॉलिसी।

फॉर ऑल ऑफ यू, मिलते हैं बहुत जल्दी एक नेक्स्ट वीडियो के साथ।

टिल देन, कीप स्माइलिंग एंड कीप लर्निंग।

जाकर ये नोट्स हमारी एप्लीकेशन से फ्री में आप डाउनलोड कर सकते हैं।

बाय बाय, लॉट्स ऑफ लव।