Transcription
नालंदा, यह नाम आपने कभी ना कभी तो सुना ही होगा, या शायद अपनी किताबों में कभी पढ़ा भी होगा।
नालंदा यूं तो एक छोटा सा नाम है, लेकिन इसके पीछे का इतिहास, इसकी उपलब्धियां और इसका मुकाम बहुत बड़ा है।
दुनिया में आज ना जाने कितने ही इंटरनेशनल स्कूल्स, कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीज हैं, लेकिन वर्ल्ड की पहली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी होने का खिताब इसी नालंदा के पास है।
आज जहां भारतीय बच्चे हायर एजुकेशन के लिए विदेश जाकर पढ़ना प्रेफर करते हैं, वहीं एक जमाना ऐसा भी था जब पूरी दुनिया से बच्चे भारत आया करते थे और यहीं, इसी नालंदा में, क्योंकि यह दुनिया के सबसे ज्यादा जानेमाने कॉलेजेस में से एक थी।
यही तो है जो अपने जमाने में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस कहलाती थी।
बौद्ध मठ की तरह बनी यह यूनिवर्सिटी ऑक्सफोर्ड और यूरोप की सबसे पुरानी मानी जाने वाली बोलोनी यूनिवर्सिटी से भी 500 साल से ज्यादा पुरानी थी।
इसके अस्तित्व की कहानी आज से लगभग 1500 साल पहले की है, जब भारत के बिहार राज्य में एक विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के तौर पर जाना जाता था।
नालंदा महाविहार वर्ल्ड की शुरुआती रेजिडेंशियल यूनिवर्सिटीज में भी इसका नाम शामिल था और वर्ल्ड की ग्रेट ओल्डेस्ट यूनिवर्सिटीज में भी यह अपना नाम शुमार रखती है।
लेकिन अफसोस कि आज हम इसे मूर्त रूप में नहीं देख सकते, क्योंकि आज हमारे सामने देखने को सिर्फ इसके अवशेष हैं।
पहले यहां पर देश-दुनिया से बच्चे पढ़ने आया करते थे और आज देश-दुनिया से इसके अवशेषों को देखने वालों की कोई कमी नहीं है।
नालंदा के अवशेषों को संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है, जो कि उस समय की गवाही देते हैं जब नालंदा महाविहार अपनी प्रगति के चरम पर था।
अब सवाल यह है कि ऐसा क्या था नालंदा में जो इसे इतना खास, इतना प्रसिद्ध और इतना इंपॉर्टेंट बनाता था?
और ऐसा हुआ क्या कि अचानक नालंदा भारत में कहीं गुम हो गया?
कैसे हुआ नालंदा का पतन?
कौन था इसके लिए जिम्मेदार?
नालंदा ने भारत को क्या सौगात दी?
और नालंदा के पतन के साथ हमने क्या खो दिया?
यह सब कुछ और नालंदा यूनिवर्सिटी से जुड़ा और भी बहुत कुछ हम जानेंगे आज की इस डॉक्यूमेंट्री में, जिसका नाम है "नालंदा यूनिवर्सिटी" और आप देख रहे हैं इफिनिटी स्म टीवी।
तो चलिए शुरू करते हैं नालंदा यूनिवर्सिटी के इस सफर को ताकि हम जान सकें भारत की इस महान और अनमोल धरोहर के बारे में।
नालंदा महाविहार यानी नालंदा यूनिवर्सिटी, इंडिया की हिस्ट्री में एक प्रसिद्ध प्राचीन शिक्षा के केंद्र के रूप में अपनी जगह रखती है।
इसकी अपनी हिस्टोरिकल सिग्निफिकेंट है और आखिर यह वर्ल्ड की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटीज में से एक है।
लगभग 14 हेक्टेयर एरिया में फैली यह नालंदा यूनिवर्सिटी, स्थापना के करीब 700 साल बाद तक दुनिया भर में शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बनी रही।
महाविहार सिस्टम पर बनी यह यूनिवर्सिटी एक रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स जैसी थी, जिसमें स्टूडेंट्स रहा करते थे और बुद्धिस्ट टीचिंग्स और फिलॉसफी को सीखा करते थे।
आपको पता है नालंदा का नाम कितना खास है?
यह हमें इसके अर्थ को जानकर पता चलेगा, क्योंकि नालंदा वर्ड संस्कृत के तीन शब्दों से मिलकर बना है, जो है "ना", "आलम" और "दा", जिसका अर्थ होता है "नॉलेज का अनस्टॉपेबल फ्लो", यानी कभी भी ना रुकने वाला ज्ञान का प्रवाह।
इसी तरह महाविहार वर्ड भी अपने आप में काफी खास है, क्योंकि "महाविहार" का मतलब भव्य होता है और यहां "विहार" का मतलब मॉनेस्ट्री है, यानी भिक्षुओं का मठ।
यानी नालंदा महाविहार बुद्धिस्ट मॉनेस्टिक स्कॉलर्स के लिए एक भव्य रेजिडेंशियल इंस्टीट्यूशन रहा, जो नॉलेज की चाहत रखने वालों को ज्ञान से भरता गया।
नालंदा यूनिवर्सिटी, जिसका पूरा नाम नालंदा महाविहार हुआ करता था, भारत के इतिहास के उन तीन मेजर लर्निंग सेंटर्स में से एक था, जो फोर्थ से नाइंथ सेंचुरी के बीच भारत में स्थापित हुए।
यह तीन लर्निंग सेंटर्स यानी यूनिवर्सिटीज थीं: तक्षशीला, विक्रमशीला और नालंदा।
इनमें से तक्षशीला सबसे पहले अस्तित्व में आई और आज यह पाकिस्तान में लोकेटेड है।
चाणक्य, जो कि विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ थे, वह इस यूनिवर्सिटी में टीचर हुआ करते थे।
उन्हीं की तरह पाणिनी भी वह नाम है, जो कि इस यूनिवर्सिटी में टीचर रहे।
पाणिनी संस्कृत व्याकरण शास्त्र के महान आचार्य थे।
गुरुकुल सिस्टम फॉलो करने वाली इस यूनिवर्सिटी में वैदिक लिटरेचर, वेदांग और उपनिषदों की शिक्षा दी जाती थी।
इसी तरह विक्रमशीला यूनिवर्सिटी, जो कि भारत के बिहार राज्य के भागलपुर जिले में स्थित है, वह भी एक प्रेस्टिजियस यूनिवर्सिटी थी।
आठवीं सेंचुरी में राजा धर्मपाल ने इसे स्थापित किया था।
ना केवल भारत से, बल्कि विदेशों से भी स्टूडेंट यहां पर एजुकेशन लेने आते थे।
यह भी बुद्धिस्ट मॉनेस्ट्री हुआ करती थी।
अब अगर नालंदा के बारे में जाने तो मगध साम्राज्य में स्थित यह विशाल बौद्ध मॉनेस्ट्री पटना से लगभग 95 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में बिहार शरीफ शहर के पास स्थित है।
आज यह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में भी शामिल है।
फिफ्थ सेंचुरी सीई से 1200 सीई तक यह शिक्षा का केंद्र बनी रही।
माना जाता है कि बुद्ध कई बार यहां पर आए थे।
यही वजह है कि इस समय में नालंदा बौद्ध शिक्षा के केंद्र के रूप में भी जाना जाता था।
गुप्त साम्राज्य के समय में, फिफ्थ सेंचुरी सीई में नालंदा महाविहार की उपस्थिति हुई।
इसे गुप्त एंपरर कुमार गुप्त प्रथम ने बनवाया था ताकि इसे नॉलेज का ऐसा सेंटर बनाया जा सके, जहां पूरी दुनिया से स्कॉलर्स खींचे चले आएं।
वैसे गुप्त काल नालंदा के लिए सुनहरा समय साबित हुआ।
इस दौर में भारत में आर्ट, साइंस, लिटरेचर के फील्ड में बहुत सी उपलब्धियां हासिल की गई और ज्ञान का केंद्र बन चुकी नालंदा भी इन सभी उपलब्धियों का हिस्सा रही।
गुप्त काल भारत के लिए गोल्डन एज कहा जाता है।
इसका यही कारण है कि इस समय में नालंदा सहित पूरे भारत में शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में तरक्की देखी गई।
गुप्त काल में इस महाविहार ने इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसोर्सेस में काफी ग्रोथ करी थी।
इसके कैंपस में बहुत सी इमारतें बनीं, लाइब्रेरीज, लेक्चर हॉल्स और टीचर्स और स्टूडेंट्स के लिए क्वार्टर्स भी बने।
तो इतना सब होने का कारण था शिक्षा लेने वालों को सारी सुख-सुविधाएं देना और उनकी संख्या को बढ़ाना ताकि ज्ञान का विस्तार हो सके और भारत का यह महाविहार पूरी दुनिया में अपने ज्ञान का परचम लहरा सके।
गुप्त किंग अशोक ने भी इस महाविहार के विकास के लिए बहुत से काम किए।
उसने नालंदा में बहुत से मठ, विहार और मंदिर बनवाए।
गुप्त काल में अपना अस्तित्व पाने वाली यह यूनिवर्सिटी बहुत ही फली-फूली और इसने काफी विस्तार किया और ज्ञान के महान केंद्र के रूप में अपना नाम भी बुलंद कर लिया।
आगे चलकर, सेवंथ सेंचुरी में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने भी इस यूनिवर्सिटी को और बेहतर बनाने पर जोर दिया।
राजा हर्षवर्धन के राज में नालंदा ने और भी ज्यादा विस्तार किया और विकास किया।
वैसे उसके बाद आए पाल वंश ने नालंदा के भवनों, मंदिरों और मठों को विस्तृत करने के अलावा इस यूनिवर्सिटी के प्रचार करने के महत्व को भी समझा।
उन्होंने इसके लिए प्रयास किए कि एशिया के अलग-अलग भागों से स्कॉलर्स और स्टूडेंट ज्यादा से ज्यादा संख्या में यहां पर आएं और शिक्षा ग्रहण करें।
उनके प्रयासों ने महाविहार को प्राचीन भारत में ज्ञान और शिक्षा के महान केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया।
लेकिन ज्ञान का यह परचम हमेशा नहीं लहरा सका।
हम आज उस महान नालंदा महाविहार को नहीं देख सकते।
उस यूनिवर्सिटी को तेजी से ग्रो करते हुए देखना हमारे लिए संभव नहीं है, क्योंकि आज उस ज्ञान के केंद्र नालंदा के सिर्फ अवशेष बचे हैं।
जिन्हें देखकर यह तो पता लगता है कि नालंदा एक विशाल, भव्य और विकसित शिक्षा केंद्र रहा होगा, लेकिन वह विश्वविद्यालय सा रहा होगा।
कितने विद्यार्थी और कितने शिक्षक वहां पर रहा करते थे?
वहां कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाते थे?
और कौन से विद्वान उस महाविहार से जुड़े हुए थे?
यह सब हम कभी नहीं जान पाते अगर यूएन सांग ना होते।
यूएन सांग, सातवीं सेंचुरी के चाइनीज बुद्धिस्ट मंग थे, लेकिन बस इतना ही नहीं, वह एक स्कॉलर, ट्रैवलर और ट्रांसलेटर भी थे।
यूएन सांग को ज्ञान प्राप्ति की इच्छा भारत तक ले आई, जहां नालंदा में रहकर के उन्होंने शिक्षा ग्रहण की।
उन्होंने भारत की नालंदा यूनिवर्सिटी के बारे में अपने चाइनीज ट्रैवलॉग में विस्तार से लिखा।
आज इसी ट्रैवलॉग के आधार पर हम भारतीय यह जान पाए हैं कि नालंदा अपने समय में कैसा विश्वविद्यालय हुआ करता था।
उनकी ट्रैवलॉग का टाइटल था "ग्रेट टैंग रिकॉर्ड्स ऑन द वेस्टर्न रीजंस"।
साथ ही उनकी बुक "सीयू की" में भी इंडिया के एजुकेशन सिस्टम के बारे में बताया गया है।
उनके बाद एक और चाइनीज ट्रैवलर युजिंग भी भारत आए और उन्होंने भी नालंदा में शिक्षा ली।
यहां से जाने के बाद युजिंग ने भी नालंदा में मंस के जीवन पर विस्तार से लिखा।
इन्हीं के आधार पर आज हम जानते हैं कि बिहार के राज ग्रह में गुप्त साम्राज्य के दौरान स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय, कुमारगुप्त, कन्नौज के राजा हर्ष और बाद में पाल एंपायर के समय में फला-फूला।
इस यूनिवर्सिटी में तकरीबन 10,000 स्टूडेंट्स और 2,000 टीचर्स हुआ करते थे।
नालंदा एक आर्किटेक्चरल मास्टर पीस हुआ करता था।
यह पूरी तरह से चमकदार लाल ईटों से बना था।
इसकी दीवारें ऊंची थीं और प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार था।
इसके कंपाउंड में कई मंदिर, स्तूप, क्लासरूम्स, मेडिटेशन हॉल्स हुआ करते थे।
मंदिरों में भगवान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित थीं।
इस कंपाउंड में कई झीलें और बाग भी थे।
नालंदा यूनिवर्सिटी का परिसर प्रार्थना कक्षा और लेक्चर हॉल से घिरा और काफी खुला हुआ था।
इसके गार्डन बेहद खूबसूरत थे।
बाहर से देखने पर यह किले जैसा दिखाई देता था।
इसका विशाल कैंपस आठ सेपरेट कंपाउंड्स में डिवाइडेड था।
खुली हवा वाली कक्षा और पानी के स्रोत के रूप में कुएं हुआ करते थे।
आठ कंपाउंड्स के अलावा यहां पर कम्युनिटी किचन, स्टोरेज एरियाज, मंदिर, स्तूप और उन छात्रों और शिक्षकों के स्मारक भी थे, जिनकी यहां पर रहते हुए मृत्यु हो गई थी।
यहां एक क्लास रूम में 30 से ज्यादा स्टूडेंट्स बैठ सकते थे और टीचर यानी कि आचार्य के बैठने के लिए एक छोर पर एक ऊंचा मंच बनाया गया था।
स्टूडेंट्स के रहने के लिए हर एक स्टूडेंट को एक चौकोर छोटा कमरा मिला करता था, जिसमें खिड़की और एक दरवाजा होता था।
इन कमरों की दीवारें इतनी मोटी थीं कि तेज गर्मी में नेचुरल कूलिंग दे सके और तेज सर्दी में कमरे को गर्म कर सके।
इसमें लगभग 300 कमरे थे।
नालंदा में कई डिपार्टमेंट्स या स्कूल थे, बिल्कुल जैसे कि आज एक यूनिवर्सिटी में हुआ करते हैं।
जैसे स्कूल ऑफ हिस्टोरिकल स्टडीज, स्कूल ऑफ इकोलॉजी एंड एनवायरमेंट स्टडीज, स्कूल ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज, फिलॉसफी और कंपैरेटिव रिलीजस।
दर्शन और धर्म की शिक्षा में यह विश्वविद्यालय लंबे समय तक एशिया की संस्कृति पर अपना प्रभाव जमाए रहा।
स्टूडेंट्स के लिए इस परिसर में रहना और खाना मुफ्त होता था, लेकिन यहां पर रहने और शिक्षा लेने के लिए उन्हें खुद की काबिलियत को साबित करना होता था।
जो कि इतना आसान नहीं था, क्योंकि नालंदा का पढ़ाने का स्तर बहुत ज्यादा हाई था।
इस महाविहार में शिक्षा लेने के लिए एंट्रेंस टेस्ट क्लियर करना जरूरी था, बिल्कुल जैसे आज हुआ करता है।
आप यह जानकर शायद चौक जाएंगे कि भारत में इतनी शताब्दियों पहले भी एंट्रेंस टेस्ट हुआ करते थे।
जो भी इन परीक्षाओं में पास होते थे, सिर्फ वही स्टूडेंट्स नालंदा में रहकर के पढ़ाई किया करते थे।
यूएन संघ के अनुसार, एक स्टूडेंट का पहला एंट्रेंस टेस्ट तो नालंदा का गेटकीपर ही ले लेता था, क्योंकि वह खुद एक विद्वान था।
जो कि नालंदा में प्रवेश के लिए आने वाले विद्यार्थियों की नॉलेज के स्तर को टेस्ट कर करता था।
जो भी उसके टेस्ट में पास होते थे, केवल वही विद्यार्थी आगे की प्रक्रिया में हिस्सा ले सकते थे।
उससे बातचीत के दौरान यूएन संघ ने यह अनुभव किया था कि "मैं खुद को स्कॉलर समझता हूं, लेकिन इस महाविहार के गेटकीपर का ज्ञान तो मुझसे कहीं ज्यादा है।"
इस बात से यूएन सांग बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे और नालंदा में ज्ञान प्राप्त करने की उनकी इच्छा और भी ज्यादा प्रबल हो गई।
उनके ज्ञान के आधार पर उन्हें यह अवसर मिला भी, क्योंकि उन्होंने एंट्रेंस टेस्ट को पास कर लिया था।
पास हुए स्टूडेंट्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स के सामने इंटरव्यू में भी शामिल होते थे।
जो भी इस इंटरव्यू में सफल होते थे, उन्हें भारत के कोने-कोने से आई ज्ञानी विद्वान गुरुओं से पढ़ने का अवसर मिलता।
नालंदा के सिर्फ एंट्रेंस टेस्ट ही टफ नहीं हुआ करते थे, बल्कि यहां का एग्जामिनेशन सिस्टम भी बहुत ही स्ट्रिक्ट था।
स्टूडेंट को हायर लेवल पर जाने के लिए भी टेस्ट और एग्जाम्स क्लियर करने होते थे, बिल्कुल जैसे आज एक से दूसरी क्लास में पहुंचने के लिए एग्जाम पास करना होता है।
वैसे ही उस समय भी हुआ करता था।
अब यह कहना तो मुश्किल है कि एग्जाम तब से टफ हुआ करते थे या आज के एग्जाम।
वैसे यह एग्जाम स्टूडेंट की उनके सब्जेक्ट्स में मास्टरी का टेस्ट लेते थे।
स्टूडेंट की अंडरस्टैंडिंग और रीजनिंग एबिलिटीज का पता इन टेस्ट से चलता था।
इतने टफ प्रोसेस को फॉलो करते हुए अगले स्तर में क्लास में पहुंचते हुए स्टूडेंट अपने सब्जेक्ट में एक्सपर्ट बन जाते थे।
और नालंदा के इतने विद्वान स्टूडेंट्स जब देश-दुनिया के कोने-कोने में जाकर ज्ञान प्रसारित करते थे, तो नालंदा की रेपुटेशन और भी ज्यादा बढ़ जाती थी।
पहले से भी ज्यादा स्टूडेंट्स नालंदा में पढ़ने के लिए अपनी किस्मत आजमाने को तैयार रहते थे।
इसी उम्मीद में कि उन्हें नालंदा में प्रवेश मिल जाए और वह इस महावीर का हिस्सा बन जाएं।
यहां पर आचार्यों के पढ़ाने का तरीका भी काफी प्रभावी था।
या यूं कह लें कि टीचिंग मेथड बहुत ही इफेक्टिव था।
हर सात स्टूडेंट्स पर एक टीचर हुआ करते थे ताकि टीचर अपने हर स्टूडेंट पर पूरा ध्यान दे सके।
हर स्टूडेंट की प्रॉब्लम को सॉल्व करना और उसे आगे बढ़ाना वह अपना दायित्व समझते थे।
यहां पर केवल किताबी ज्ञान ही नहीं दिया जाता था, बल्कि स्टूडेंट की अंडरस्टैंडिंग पर जोर दिया जाता था।
तभी तो नालंदा के क्लासरूम्स में लेक्चर, डिबेट्स और डिस्कशंस बहुत कॉमन थे।
यहां पर पढ़ाने का यही तरीका था ताकि स्टूडेंट्स की क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ाया जा सके।
यहां पर टीचर्स हर स्टूडेंट की लर्निंग एबिलिटीज और जरूरतों को ध्यान में रखकर पढ़ाया करते थे।
नागार्जुन, जो कि एक जानेमाने बुद्धिस्ट फिलोसोफर थे और आर्यदेव, जिन्होंने बुद्धिस्ट फिलोसोफी पर लिखा और नागार्जुन की टीचिंग्स को एक्सपेंड किया, वह दोनों ही नालंदा के महान स्कॉलर थे।
इनके अलावा शांति देवा, धर्म कीर्ति और वसु बंधु भी ग्रेट स्कॉलर थे, जिन्होंने बुद्धिस्ट थॉट, लॉजिक और नॉलेज को बढ़ाने में बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन दिया।
यूं तो नालंदा में हर विषय पर गहन ज्ञान दिया जाता था, लेकिन यहां पर गणित और खगोल विज्ञान में हासिल की गई उपलब्धियां सबसे खास मानी जाती हैं।
क्योंकि भारतीय गणित के जनक आर्य भट्ट इस यूनिवर्सिटी के हेड हुआ करते थे।
ऐसा माना जाता है कि उन्होंने ही तो शून्य को एक अंक के रूप में मान्यता दी थी।
और यह तो आज हम सभी जानते हैं कि शून्य के बिना तो हमारे पास कंप्यूटर भी नहीं होते।
नालंदा यूनिवर्सिटी शुरुआती समय में केवल बौद्ध शिक्षा पर ही जोर देती थी।
तब इस विश्वविद्यालय के करिकुलम में केवल बुद्धिस्ट स्क्रिप्चर, फिलोसोफी और लॉजिक जैसे विषय हुआ करते थे।
बौद्ध शिक्षा और दर्शन का प्रचार करने के लिए यह यूनिवर्सिटी नियमित तौर पर अपने सर्वश्रेष्ठ विद्वानों और प्रोफेसरों को चीन, कोरिया, जापान, इंडोनेशिया और श्रीलंका जैसे स्थानों पर भेजती थी।
ऐसा करने से बौद्ध धर्म तेजी से पूरे एशिया में फैलने और स्थापित होने में सफल होने लगा।
लेकिन बाद में यहां पर शिक्षा का दायरा बढ़ने लगा और नालंदा के करिकुलम में बुद्धिस्ट टीचिंग्स के अलावा नॉन-बुद्धिस्ट टीचिंग्स भी शामिल होने लगीं।
ऐसे में केवल धर्म की शिक्षा देने की बजाय यहां पर आर्किटेक्चर, मेडिसिन, ग्रामर, मैथमेटिक्स जैसे बहुत सारे सब्जेक्ट्स की नॉलेज दी जाने लगी।
यह यूनिवर्सिटी इंडिया के बाहर भी इतनी फेमस होती चली गई कि ना केवल भारत के कोने-कोने से, बल्कि चीन, तिब्बत, कोरिया, जापान, पर्शिया, टर्की और इंडोनेशिया जैसे कई देशों से स्टूडेंट यहां पर आने लगे।
इसका करिकुलम और एजुकेशन सिस्टम इतना इनोवेटिव था कि स्टूडेंट के पास बहुत से सब्जेक्ट्स स्टडी करने का अवसर होता था।
वह अपने इंटरेस्ट और एबिलिटी के दम पर अपनी रुचि के विषय चुना करते थे और उनमें विस्तार से ज्ञान प्राप्त करते थे।
यह सब जानकर आपका मन भी खुशी से भर रहा है कि उस समय में भारत शिक्षा में कितना आगे था।
इतना आगे कि दुनिया भर से स्कॉलर्स यहां पर आना चाहते थे।
नालंदा में पढ़ने को खुद की खुशकिस्मती समझते थे।
जानते हैं इसका एक अहम कारण क्या था?
यहां की लाइब्रेरी।
जी हां, पुस्तकालय, जो कि हर विश्वविद्यालय में हुआ करता है, लेकिन नालंदा का पुस्तकालय सबसे महान, सबसे विशाल और सबसे समृद्ध था।
वो कैसे? आइए जानते हैं।
नालंदा महाविहार की लाइब्रेरी एजुकेशनल किताबें, स्कॉलर्स नोट्स और करिकुलम बुक से भरी हुई थी।
इस लाइब्रेरी का नाम था "धर्म गुंज", जिसका अर्थ होता है "माउंटेन ऑफ नॉलेज", यानी सत्य का पर्वत।
यह धर्म गुंज नौ मंजिला इमारत थी और इसके तीन भाग थे: रत्न रंजक, रत्नो दधि और रत्न सागर।
महान ग्रंथों, उपनिषदों और गहन ज्ञान से भरपूर लेखन सामग्री, न लाख से ज्यादा किताबें इन इमारतों की शोभा थी।
यह लाइब्रेरी नालंदा की शान थी, जो कि एक हमला झेलने के बाद नालंदा को मिली।
असल में, विस्तार और प्रशस्ति पाने वाली इस विख्यात यूनिवर्सिटी ने कई सारे हमले झेले।
कई बार तो यह ज्ञान का मंदिर अस्त व्यस्त और ध्वस्त किया गया।
कारण कभी राजनीतिक रहा, तो कभी लूटपाट और कभी व्यक्तिगत रंजिश भी।
वैसे नालंदा पर तीन हमले हुए।
पहला हमला हुण ने किया 455 एडी से 470 एडी के बीच, जब समुद्रगुप्त गुप्त साम्राज्य का शासक हुआ करता था।
तब हुण ने नालंदा पर हमला कर दिया।
हुण एक सेंट्रल एशियाई ट्राइबल ग्रुप था।
उनके हमला करने का कोई स्पेसिफिक रीजन तो पता नहीं चलता, सिवाय इसके कि उन्हें सिर्फ ऐसी कीमती चीजें चुरानी थी, जो कि इस यूनिवर्सिटी में रखी गई थीं।
तो ऐसे में यह हमला ज्यादा गंभीर तो नहीं था।
इससे उबरना नालंदा के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं रहा।
और फिर राजा स्कंदगुप्त ने नालंदा को हुए नुकसान की क्षति पूर्ति करवा दी।
साथ ही नालंदा के परिसर और भवनों में कुछ सुधार भी करवाए गए।
यही वह समय था जब नालंदा में विश्व प्रसिद्ध लाइब्रेरी धर्म गुंज स्थापित की गई।
और इसके साथ ही नालंदा का गौरव पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया।
लेकिन फिर नालंदा ने दूसरा हमला झेला।
यह हमला हुआ गौदास राजवंश के द्वारा, अर्ली सातवीं सेंचुरी में।
बंगाल के राजा ने यह हमला किया।
उस समय कन्नौज के राजा थे हर्षवर्धन।
इस हमले के कारण राजनीतिक थे।
राजा हर्षवर्धन और राजा गौदास के बीच विवाद की स्थिति रहा करती थी, जिसके चलते गौदास ने हर्षवर्धन से बदला लेने के लिए उसके साम्राज्य के गौरव माने जाने वाले नालंदा पर हमला साधा और उसे नुकसान पहुंचाया।
शुक्र है कि यह हमला भी ज्यादा घातक नहीं था।
और इसे झेलने के बाद भी नालंदा फिर से खड़ी हो गई, ज्ञान का प्रकाश बनकर आगे।
राजा हर्षवर्धन ने इस यूनिवर्सिटी को फिर से बनवाया और नालंदा में नॉलेज शेयर करने का सिलसिला जारी रहा।
यह सिलसिला आज तक जारी रह सकता था, अगर नालंदा पर तीसरा और सबसे घातक हमला ना हुआ होता।
12वीं शताब्दी का अंत नालंदा का अंत लेकर आया।
साल था 1193 एडी, जब बख्तियार खिलजी के हमले ने सब कुछ तबाह कर दिया।
उस एक हमले ने ऐसी तबाही मचाई कि उससे नालंदा ना झूट सका, ना फिर से खड़ा हो सका और ना ही अपना अस्तित्व बचाए रख सका।
इतिहासकारों के अनुसार, बिहार पर सबसे पहले विजय पाने वाला मुस्लिम शासक मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ही था।
दक्षिण अफगानिस्तान की तुर्क जाति का बख्तियार खिलजी एक क्रूर आक्रांता था, जो सब कुछ हथिया लेना चाहता था।
जो हर जगह सिर्फ अपना साम्राज्य चाहता था और अपनी राह में आने वाले हर इलाके को अपने कब्जे में कर लेता था।
लेकिन नालंदा तो कोई साम्राज्य नहीं था।
फिर वह कैसे खिलजी की क्रूरता का शिकार हुआ?
सच कहें तो नालंदा का ज्ञान, दूसरों की मदद करने की सीख और सहयोग की भावना ने नालंदा के अस्तित्व पर खतरा डाल दिया।
अब यूं तो अपने ज्ञान का सही जगह, सही तरह उपयोग करना ही श्रेष्ठ गुण होता है, लेकिन नालंदा के लिए यह विपरीत साबित हुआ।
असल में, नालंदा के अस्तित्व के खो जाने का यह अफसोस जनक किस्सा वहां से ही शुरू होता है, जहां क्रूर और स्वार्थी खिलजी की सेहत खराब होती है।
हर हकीम की दवा इलाज के बाद भी उसकी सेहत में कोई सुधार नहीं आता और उसकी सेहत में तेजी से गिरावट आती जाती है।
ऐसे में फिक्र मंद खिलजी को यह बताया गया कि नालंदा महाविहार के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख राहुल श्रीभद्र उसकी बीमारी का इलाज कर सकते हैं।
यह सुनकर खिलजी भड़क गया, क्योंकि वह किसी भी गैर मुस्लिम से इलाज करवाना स्वीकार नहीं कर सकता था।
लेकिन जब उसकी हालत बिगड़ती चली गई, तो उसे राहुल श्री भद्र से मिलने और उपचार करवाने के लिए मानना ही पड़ा।
जब राहुल श्री भद्र खिलजी का उपचार करने आए, तो खिलजी ने उनके सामने एक शर्त रख दी।
उसने कहा कि "तुम बिना किसी दवा के मेरा इलाज करो और अगर तुम ऐसा नहीं कर पाओगे, तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगा।"
साथ ही यह भी साबित हो जाएगा कि मेरे हकीम से ज्यादा ज्ञान किसी के भी पास नहीं है।
राहुल श्री भद्र ने यह शर्त मान ली।
वह एक महान आयुर्वेद ज्ञाता थे।
उन्होंने इस शर्त का हल तुरंत निकाल लिया और खिलजी को रोजाना पढ़ने के लिए कुरान दी।
उन्होंने खिलजी से कहा कि उसे नियमित रूप से कुरान पढ़नी है और वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा।
अब यह जानकर खिलजी बड़ा हैरान हुआ, लेकिन उपचार के लिए उसने ऐसा करना शुरू कर दिया।
देखते ही देखते, खिलजी की सेहत में सुधार आने लगा और वह जल्दी ही स्वस्थ भी हो गया।
यह जानकर खिलजी बेचैन हो गया कि बिना दवा के कैसे मुझे स्वस्थ कर दिया।
और जब उसे सच पता चला, तो वह चौक गया।
असल में, राहुल श्री भद्र ने कुरान के पन्नों पर औषधि का लेप लगाया था।
और जब खिलजी नियमित रूप से कुरान पढ़ता, तो अपनी उंगलियों पर थूक लगाकर पन्ने पलटता।
ऐसा करने से उसके मुंह में दवा जाती रही, जिससे उसे सेहत में लाभ मिलता गया।
यह जानकर, जहां एक आम आदमी आभार महसूस करता, आयुर्वेद के ज्ञान को सरता और स्वस्थ होकर खुश होता, वहीं पर क्रूर खिलजी ने अपना आप खो दिया।
वह पूरी तरह स्वस्थ हो चुका था, लेकिन वह यह सहन ना कर सका कि आयुर्वेद में इतनी ताकत है कि एक मरते हुए इंसान को स्वस्थ कर दे।
और उसके हकीमो का इलाज आयुर्वेद से बहुत ही कमतर है।
बस इस भावना ने उसके अंदर घर कर लिया और वह नफरत, जलन और हीन भावना से ग्रस्त हो गया।
उसने ठान लिया कि इस ज्ञान को वह पूरी तरह नष्ट कर देगा।
और इसकी इसी सोच ने नालंदा में हाहा मचा दिया।
उसे पता चला कि नालंदा के ज्ञानी आचार्यों के लिए यहां का पुस्तकालय ज्ञान का स्रोत है।
बस उसी समय उसने इसको मिटा देने का मन बना लिया और अपनी सेना को साथ लेकर नालंदा में प्रवेश कर लिया।
उसने किसी को नहीं बख्शा।
वहां पर रह रहे स्टूडेंट्स और टीचर्स सबको मौत के घाट उतार दिया।
जो उसके सामने आया, उसकी सेना उन्हें खत्म करती चली गई।
लोगों को जिंदा जला दिया गया।
कोई रहम नहीं, कोई गलानी नहीं, बस नालंदा के ज्ञान को भस्म करने का इरादा।
फिर चाहे वह आचार्यों और विद्यार्थियों के पास हो या नालंदा की लाइब्रेरी में मौजूद हो, उसे सब कुछ खत्म कर देना था।
उसकी हीन भावना ने सब कुछ तबाह कर दिया।
ज्ञान का खजाना कहीं जाने वाली नालंदा लाइब्रेरी जला दी गई।
3 लाख से ज्यादा किताबें जलने लगीं।
भारत के ज्ञान का एक सूर्य डूब गया।
भारत की प्राचीनतम यूनिवर्सिटीज में शामिल नालंदा का अस्तित्व मिट गया।
इसकी लाइब्रेरी लगभग तीन महीनों तक धू-धू करके जलती रही और राख हो गया ज्ञान का खजाना।
इस तबाही का कारण सिर्फ हीन भावना।
काश ऐसा ना हुआ होता, काश नालंदा का अस्तित्व बरकरार रहता।
खैर, फारसी इतिहासकार मिन्हाज आई सिराज ने अपनी पुस्तक "तबक आई नासरी" में लिखा है कि कैसे हजारों बौद्ध भिक्षुओं को मार दिया गया ताकि बुद्धिज्म को मिटाया जा सके और इस्लाम को स्थापित किया जा सके।
उस कठिन समय में, मौत के मंजर के बीच, युं सांग ने अपनी सूझबूझ से काम लिया और नालंदा की अनमोल धरोहर को सहेजने का प्रयास किया।
वह नालंदा की जलकर ढेर होती किताबों में से कुछ को बचाने में सफल हुए और खिलजी की सेना की नजरों से बचते-बचाते अपने साथ संस्कृत की कई किताबें लेकर अपने देश चीन पहुंच गए।
जहां जाकर उन्होंने अपनी यात्रा का वृतांत यानी ट्रैवलॉग लिखा और उसमें नालंदा से जुड़ी हर एक बात को विस्तार से बताया।
अपने साथ लगभग 700 किताबें ले जाने में सफल हुए।
यूएन सांग ने उनमें से कुछ का ट्रांसलेशन भी किया और इस तरह नालंदा के ज्ञान का एक छोटा सा अंश ही सही, हमें वापस मिल सका।
शुक्रिया यूएन सांग।
वैसे नालंदा के अलावा विक्रम शीला यूनिवर्सिटी भी उस समय में मेजर लर्निंग सेंटर बन चुकी थी।
इसलिए बख्तियार खिलजी ने उसे भी जलाकर राख कर दिया।
अफसोस, नालंदा महाविहार ने जो तबाही का मंजर देखा, उसके बाद वह इतिहास में कहीं खो गया।
सबने उसे भुला दिया।
एक लंबा अरसा बीत गया।
इस दौरान नालंदा गुमनामी के गर्त में डूबा रहा।
लेकिन साल 1812 में, जब स्कॉटिश सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन हैमिल्टन को जमीन के नीचे नालंदा महाविहार के सुराग मिले।
और उसके बाद साल 1861 में सर एलेक्जेंडर कनिघम ने इन अवशेषों की पहचान प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी के रूप में की, तो नालंदा का जिक्र फिर से छड़ा।
खोज की गई, खुदाई की गई और आज हम जो देखते हैं, वह 5 लाख वर्ग फीट में नालंदा यूनिवर्सिटी के अवशेष हैं, जिन्हें खुदाई के दौरान बाहर निकाला गया है।
ऐसा माना जाता है कि यह सिर्फ यूनिवर्सिटी का 10 प्रतिशत ही है।
अभी तो बहुत खोज और खुदाई बाकी है।
इन अवशेषों को गौर से देखेंगे, तो कई दीवारों पर आग से जलने के निशान आज भी आपको नजर आएंगे।
लेकिन कहते हैं कि ज्ञान को कोई नहीं मिटा सकता।
ज्ञान के पास अपनी बोली होती है, अपनी भाषा होती है, जिसे कुछ समय भले ही दबाया जा सकता हो, लेकिन हमेशा के लिए खामोश नहीं किया जा सकता।
ऐसा ही हुआ नालंदा के साथ भी।
गुमशुदा हो चुकी नालंदा को फिर से पहचाना गया, सराहा गया, संभाला गया।
और बीते कुछ सालों में इस प्राचीन महाविहार को फिर से खड़ा करने के लिए प्रयास तेज हुए।
साल 2009 में इसे यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट डिक्लेयर किया गया।
और साल 2014 में नई नालंदा यूनिवर्सिटी बनकर तैयार हो गई, जिसने प्राचीन नालंदा के ज्ञान को अपना आधार बनाया।
और मॉडर्न एडवांसमेंट्स की मदद से ज्ञान का एक नया केंद्र भारत को दिया।
ओरिजिनल नालंदा महाविहार की हिस्टोरिकल लेगसी बनी।
यह नई नालंदा यूनिवर्सिटी लर्निंग एंड रिसर्च सेंटर की तरह ग्रो करने का पोटेंशियल रखती है।
बिहार के राजगीर हिल्स में लगभग 450 एकड़ जमीन पर बनी यह नई नालंदा, और यह प्राचीन नालंदा के अवशेषों से कुछ दूरी पर ही बनाई गई है।
भारत की ज्ञान की धरोहर को संजोने की यह वाकई में एक सराहनीय कोशिश रही।
और फिर भारत के ज्ञान को तो पूरी दुनिया सराहती रही है।
खुद तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा ने एक बार कहा था कि "हम लोगों को जो भी बौद्ध ज्ञान मिला, वह सब नालंदा से आया था।"
तो ऐसे में क्या हमें अपने देश के गौरव पर गर्व नहीं करना चाहिए?
क्या हमें अपने ज्ञान को श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए?
और क्या इसका सम्मान करने और इसके प्रसार में अपनी भूमिका नहीं रखनी चाहिए?
सोचिए जरूर।
और इसी के साथ नालंदा यूनिवर्सिटी पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री यहीं पर कंप्लीट होती है।
इस बारे में आपकी क्या राय है?
आप क्या कहते हैं?
अपना प्यार और सपोर्ट हमें जरूर दीजिएगा।
मिलेंगे जल्दी ही और ऐसी डॉक्यूमेंट्री के साथ।
तब तक के लिए एक्सप्लोर करते रहिए इफिनिटी स्म टीवी को।
तो रूबी कहेगी फिलहाल के लिए धन्यवाद।