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श्री विद्या साधक में क्या-क्या योग्यता होनी चाहिए और किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए? श्री विद्या साधक का उद्देश्य क्या होना चाहिए? श्री विद्या साधक का उद्देश्य क्या होना चाहिए? बैठिए।
पराचित का नाम है श्री। उसको प्राप्त कराने वाली अभिव्यक्त करने वाली विद्या का नाम है श्री विद्या। श्री का अर्थ है पराचित जिसको हम सच्चिदानंद स्वरूप ब्रह्म कहते हैं उसी को शाक प्रस्थान में पराचित कहते हैं। श्री विद्या श्री का अर्थ है पराचित उसको प्राप्त कराने वाली जो विद्या है उसका नाम है श्री विद्या जो मातृ शक्ति है माताएं हैं उनके रूप में साक्षात श्री देवी भगवती ही अभिव्यक्त है।
किसी मातृ शक्ति का अपमान ना हो। यह ध्यान रखना चाहिए। श्री विद्या के उपासकों को किसी का अपमान ना हो। लेकिन विशेषकर मातृशक्ति के प्रति पूर्ण सम्मान हो। अपनत्व हो। मर्यादा की रक्षा की सीमा में जीवन यापन करें तो श्री विद्या जल्दी फलती है।
पृथ्वी में पांच गुण है। शब्द स्पर्श रूप रस गंध जल में शब्द स्पर्श रूप रस तीन चार गुण है। तेज में शब्द स्पर्श रूप तीन गुण है। वायु में शब्द स्पर्श दो गुण है। आकाश में एक गुण है। शब्द कारण का गुणकारी में अनुगत होता है। नीचे से विचार करें 5 चार तीन दो एक 15 ऊपर से विचार करें एक दो तीन चार पांच 15 15 गुणों के कारण ही पंचदशी विद्या में 15 अक्षर हो जाते हैं। इन सब की अभिव्यक्ति ओम एकाक्षरा ब्रह्म से हुई है। आकाश की अभिव्यक्ति कहां से बोल रहा हूं? गोपाल उत्तर तापनी उपनिषद से बोल रहा हूं। इसीलिए ओम को मिला दें तो सोसी विद्या की सिद्धि भी हो जाती है। तो पंचदशी सोडसी विद्या ये तत्व के द्योतक होते हैं।
श्री विद्या वाले जो हैं वे भगवती के प्रति मातृ शक्ति के प्रति आस्था हो और श्री विद्या के नाम पर मदिरा मांस इत्यादि अभक्ष पदार्थों का सेवन ना करें। यह पहली आवश्यकता है। तय संध्या बोलते हैं चार बार ध्यान के मुख्य अवसर हैं। मध्य रात्रि में अवश्य मध्य रात्रि में जो साधना होती है उसका नाम तुरिय संध्या तुर माने चतुर्थ कम से कम चार बार उनको आसन पर बैठकर देवी की आराधना करनी चाहिए। लेकिन देवी के सौंदर्य माधुरी के प्रति या अन्य जो स्त्रियां हैं उनके सौंदर्य माध्य के प्रति गलत आकर्षण ना हो मातृ बुद्धि बनी रहे यह श्री विद्या के उपासकों के लिए मुख्य चीज है और जहां कहीं इस विद्या का प्रसार ना करें यह ब्रह्म विद्या है।
पूज्य गुरुदेव धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज श्री विद्या के महान दिग्गज आचार्य मनीष थे। उनके जीवन में श्री विद्या अवतीर्ण थी और दक्षिण भारत के भी व्यक्ति आकर उनसे दीक्षा लेते थे। हमने कभी दीक्षा की भावना नहीं व्यक्त की तो एक दिन एकांत में कहा क्यों हो? तुम शाल में उत्पन्न हो। फिर भी श्री विद्या के बारे में कुछ पूछते नहीं। हमने कहा बहुत बड़ी भूल हुई क्षमा कीजिए ये कृपा देखिए लोग पीछे पड़ते थे बहुत मुश्किल से श्री विद्या की दीक्षा देते थे कि हमको उन्होंने कहा क्यों हो तुम शांत कुल में उत्पन्न हो कभी तुमने श्री विद्या के बारे में कुछ पूछा ही नहीं ब्रह्म विद्या के बारे में तो फिर उन्होंने हमने कहा बहुत बड़ी भूल हुई हमको दीक्षा चाहिए ठीक है मुहूर्त आने पर फिर कहा आज बहुत बढ़िया मुहूर्त एक बार में एक मंत्र की दीक्षा उन्होंने कहा तुम लिखने पढ़ने वाले हो तीन अक्षर से लेकर 16 अक्षर तक और महा सुरसी सब मंत्र लिख के हाथ से दे दिया सबका उपदेश कर दिया फिर उन्होंने एक विचित्र बात कही मुझसे बहुतों ने श्री विद्या की दीक्षा ली लेकिन धन मान के अर्जन में उसका उपयोग किया देखो मैंने कभी श्री विद्या का उपयोग धन मान के अर्जन जन्म नहीं किया। ये धन मान के अर्जन की विद्या है। ऐसा मत समझना। ब्रह्म विद्या है।
कल ही महर्षिकेश ब्रह्मचारी जी इनका नाम क्यों लेता हूं? ये भोजन परोसते हैं तो उस समय भी हमारा अध्ययन ही चलता है। जो ग्रंथ लिखते कंप्यूटर सुनाते जाते हम भी कुछ बोलते जाते इसलिए तो हम बता रहे थे श्री विद्या जो है ब्रह्म विद्या ही है। श्री चक्र की बात कह रहे थे उसमें रेखा गणित बीज गणित सब श्री चक्र का जो निर्माण होता है उसमें अंकामनाय अक्षरामय रेखाय तीनों की पराकाष्ठा है केवल श्री यंत्र के निर्माण की कहां कौन सी चीज है कौन अक्षर है कौन अंक है कितने क्या है कोई समझ ले तो रेखा गणित में बीज गणित में और सामान्य गणित में अंक गणित में वो माहिर हो जाए श्री विद्या श्री यंत्र श्री यंत्र में संक्षेप में कहता हूं मंत्र का पर्यावसान तंत्र में होता है तंत्र का पर्यावसान यंत्र में होता है श्री विद्या की पूर्ण दीक्षा मुझे प्राप्त है श्री विद्या का महा अभिषेक भी मुझे प्राप्त किसी से कहा आज तक श्री विद्या में जानता हूं मुझसे दीक्षा ले लो किसी से कहा जिनको थोड़ा सा ज्ञान है वो प्रचार करते मैं श्री विद्या अपने लिए श्री विद्या ओ साहब वाशुतोष नारायण इत्यादि ढेर के ढेर चले चली हो गए शिव विद्या के नाम पर मुझे तो पूज्य गुरुदेव ने सारे मंत्र एक साथ दिया और यहां तक कि अपनी एक गुप्त लाल डायरी उनके पास थी वो दी उन्होंने कहा दो पृष्ठ जो है अपना लिखा हुआ हाथ से पढ़ा नहीं जाता पाठ नहीं किया जाता चिन्मयानंद से लिखवा लो तुम्हारे पास समय कम होगा ये गुप्त डायरी है श्री विद्या रत्नाकर आदि में भी यह सामग्री नहीं है इसको मैंने अपने लिए रखा दो पृष्ठ का पाठ कर लेना। इसी से सब कुछ मिल जाएगा। तुम्हारे पास अधिक समय नहीं है। लेकिन धन मान के लिए इस विद्या का उपयोग नहीं होना चाहिए। तो ब्रह्म विद्या है। मंत्र तंत्र यंत्र तीनों का संवेद स्वरूप से विद्या है। ये बात बहुत सुन लोग प्रसन्न हो रहे होंगे। दर्शन भले ही ना समझ में आवे। मंत्र तंत्र यंत्र तो हमारा आपका जो कारण शरीर है मंत्रात्मक है परा पराशक्ति कौन परावाक उसी में स्थित है सूक्ष्म शरीर जो है तंत्रात्मक है स्थूल शरीर यंत्रात्मक है यह हमारा तीनों शरीर श्री कौन है श्री यंत्र है श्री कौन है भगवत तत्व आत्म तत्व पराचित स्वरूप आत्म तत्व श्री है और मंत्रात्मक कारण शरीर है। तंत्रात्मक सूक्ष्म शरीर है। यंत्रात्मक स्थूल शरीर है। और पूज्य गुरुदेव ने हमसे कहा था भावनोपनिषद का अध्ययन करना। संयोग सा धातु उस पर में अच्छा भगवान शंकराचार्य का भाष्य भी उस पर है संयोग स धातु भावनोपनिषद केवल एक पृष्ठ का ही उपनिषद है वो तत्व जितना ब्रह्म विद्या में प्रयुक्त और विनियुक्त तत्व है उन्हीं को मंत्र तंत्र यंत्र का रूप देकर श्री विद्या का रूप दिया गया मैंने विस्तार पूर्वक कुछ संकेत में उत्तर दिया नारायण विचार तो है भगवान स्वास्थ्य और समय देंगे ही लगभग 1200 पष्ठों में हो सकता है 1500 पृष्ठ भी लग जाए। मंत्र तंत्र यंत्र आदि परिशीलन नामक ग्रंथ लिखने का विचार है। संभवत कुछ पृष्ठ लिखे भी जा चुके हैं। 400 या 450 पृष्ठ कंप्यूटर में बंद होंगे। अभिनव गुप्त जी ने जो तंत्रालोक नामक ग्रंथ लिखा और तंत्रसार नामक ग्रंथ लिखा उसका भी सारांश उसमें सनहित करना है। पूज्य गुरुदेव ने जो श्री विद्या वस्या श्री विद्या रत्नाकर नामक ग्रंथ लिखा उसका भी पूरे योग दर्शन वेदांत दर्शन सांख्य वैशेषिक आदि इन सबको ढालना भी है। भगवत कृपा से संयोग सदैव ऐसी भावना है। मंत्र तंत्र यंत्र आदि परिशीलन नामक ग्रंथ 400 से अधिक पृष्ठों में कंप्यूटर में है। 1500 2000 पृष्ठों तक यह तंत्र का अद्भुत ग्रंथ हो सकता है। नारायण बचपन में विद्यार्थी जीवन में अपने रामकृष्ण डालमिया के यहां पुस्तकालय से लेकर 52 तंत्र ग्रंथों का अध्ययन किया था। किस ग्रंथ का क्या नाम है इधर हमने ध्यान नहीं दिया लेकिन 52 तंत्र ग्रंथों का हमसे हमारे जो अग्रज महोदय थे श्रीदेव झा पंडित प्रवर श्री देव झा उनके मार्गदर्शन में 52 तंत्र ग्रंथों का हमने छोटी आयु में अध्ययन किया था नारायण