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हर दिन पत्थर को औजार बनाते-बनाते अब तो हाथ भी पत्थर जैसे हो गए हैं। लेकिन आज यह काला पत्थर कुछ अलग लग रहा है।
ये क्या था? जैसे किसी ने वापस देखा हो। नहीं, ये आग का धोखा नहीं। ये मैं ही हूँ शायद। लेकिन पत्थर में चेहरा कैसे दिख सकता है? थोड़ा और रगड़ता हूँ। शायद यार नहीं है। ये पत्थर नहीं, कोई नया जादू है। अरे, ये तो सच में मैं हूँ।
बाल, आँखें सब कुछ इतना साफ जैसे पत्थर में कोई दूसरा संसार छिपा हो जो अब सामने आ गया। पानी में चेहरा तो हमेशा हिलता रहता है, पर इस पत्थर में सब एकदम साफ दिखता है जैसे रोशनी ने सच पकड़ लिया हो।
बस ऐसे रगड़ो राख और रेत से। देखो, धीरे-धीरे चमक खुद आ रही है। मेहनत से पत्थर भी शीशा बन जाता है। देखो, यह पत्थर कोई जादू नहीं है, मेहनत का नतीजा है। बस रेत, राख और धैर्य चाहिए, और यह तुम्हें तुम्हारा चेहरा दिखा देगा।
अब यह पत्थर सिर्फ चेहरा नहीं दिखाता। यह तो पूरे गाँव में रोशनी फैला रहा है। हर घर में अब अपनी चमक है। देखो, आग का रंग भी इसमें कैद हो गया है।
यह पत्थर अब सिर्फ औजार नहीं रहा। यह तो एक कहानी बन गया है। हमारी कहानी। पत्थर से रोशनी बनाना। कौन सोच सकता था? शायद यहीं से इंसान ने खुद को पहचानना शुरू किया।