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Taqdeer Ka Likha Jaroor Milta Hai | Sabr Aur Emaan Ne Badli Taqdeer | Islamic Moral Story #urdustory

Mr. MR Voice 31:47

Transcription

पुराने जमाने की बात है जब मुल्क शाम की सर जमीन पर अब्दुल मालिक इबने इब्राहिम नाम के एक नेक दीनदार और खुदा परस्त शख्स की रियासतें फैली हुई थी। इबने इब्राहिम सिर्फ दौलत का ही नहीं बल्कि इल्मो अखलाक का भी मालिक था। उसका शुमार शहर के उन इज्जतदार अफराद में होता था जिनकी सखावत और दरियादिली की मिसालें दी जाती थी।

मगर वक्त ए मेरे अजीज बड़ा ही जालिम और नामुनसफ होता है। यह कभी किसी के ओदे या उसकी नेकी को देखकर नहीं बदलता। एक दिन अचानक ही इबने इब्राहिम के कारोबार पर कुदरत की कैसी मार पड़ी कि मुल्क माली की रौनकें चरागा की लौ की मानिंद बुझने लगी। तजारत में लगातार संगीन नुकसान होने लगा। कर्जों का बोझ पहाड़ की तरह सर पर मंडलाने लगा। और जिन लोगों को उसने कभी अपने हाथों से नवाजा था, वही अब तकाजे के लिए उसके दरवाजे पर जमा होने लगे। वह हसीन और जमालदार हवेली जो कभी इबने इब्राहिम की शोहरत का पता देती थी, अब वीरानी और खामोशी का शिकार होने लगी।

इबने इब्राहिम ने हर मुमकिन कोशिश की। अपने सारे जवाहरात और कीमती असबाब को बेच डाला ताकि कर्जों का हासिल अदा कर सके। लेकिन हालात उसके काबू से बाहर हो चुके थे। उसका सबसे बड़ा हिम्मती सहारा उसकी जौजा आयशा थी जो सख्त से सख्त इम्तिहान में भी सब्र और ईमान का दामन नहीं छोड़ती थी। आयशा ने कभी अपने शौहर पर शिकवा या गम का इजहार नहीं किया बल्कि हर सुबह उसे तसल्ली देती और अल्लाह पर यकीन रखने की तालीम देती।

एक रात जब इबने इब्राहिम गमों में डूबा सजदे में पड़ा गिड़गिड़ा रहा था तो आयशा ने उसके पास आकर बड़े नरम लहजे में कहा, "ऐ मेरे शौहर, यह दुनिया फानी है। यहां की दौलत और जिल्लत सब आरजी है। हमारा असल खजाना तो आखिरत का है। याद रखो अल्लाह अपने बंदों को कभी लावारिस नहीं छोड़ता। यह मुश्किलात सिर्फ हमारे ईमान की आजमाइश हैं।"

इबने इब्राहिम को अपनी बीवी की इन बातों से दिल को सुकून तो मिला लेकिन जमाने की सख्तियां कम नहीं हुई। जल्द ही उसे अपनी सारी जायदाद बेचकर शहर के एक मामूली और तंग हिस्से में एक टूटे फूटे मकान में मुंतकिल होना पड़ा। दौलत और शोहरत की बुलंदी से गुरबत और तन्हाई की गहराई में गिरना इबने इब्राहिम के लिए एक अजीम सदमा था।

इस नए और अनजाने माहौल में उसका गुजारा महज उसकी जौजा आयशा के हाथों से बनाई गई चीजों को बाजार में बेचकर होता था। वह रोज सुबह सब्र का लिबास पहनकर घर से निकलती और शाम को थकी हारी वापस लौटती। उनके तीन छोटे-छोटे मासूम बच्चे थे जिनके पेट भरने की फिक्र उन्हें हमेशा रहती थी। इबने इब्राहिम जो कभी हुक्मरान की तरह जिंदगी गुजारता था, अब एक मजदूर की तरह बाजार में काम की तलाश में मारामारा फिरता था। लेकिन उसकी बदकिस्मती उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। हर जगह से उसे मायूसी ही हाथ लगती थी। उसकी यह हालत देखकर पुराने अहबाब और दोस्तों ने भी उससे किनारा कर लिया। गोया कि वह कोई अछूत हो।

इस संगीन वक्त में इबने इब्राहिम अक्सर रात के तन्हा पहरों में आंसू बहाता और अपनी गुजस्ता जिंदगी को याद करके अफसोस करता। लेकिन आयशा उसे समझाती थी, "ऐ मेरे अजीज, खुदा की मर्जी पर राजी रहना ही मोमिन की पहचान है। यह भी गुजर जाएगा। अपनी दुआओं में ताकत रखो क्योंकि एक मजबूर की आह और दुआ को अल्लाह कभी रद्द नहीं करता।"

मगर सब्र की भी एक हद होती है। एक दिन उनके सबसे छोटे बेटे की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उसे तेज बुखार आया और वह रात भर बेचैन रहा। इबने इब्राहिम और आयशा के पास इलाज के लिए एक पैसा भी ना था। उन्होंने अपनी किस्मत को कोसा और खुदा के हुजूर सर झुकाया।

इबने इब्राहिम को याद आया कि उनके कदीमी दोस्त हामिद जो शहर के अमीर लोगों में शुमार होते थे, उससे मदद मांगी जा सकती है। हालांकि इबने इब्राहिम का गुरूर और अना उसे ऐसा करने से रोक रहे थे। लेकिन बच्चे की जान का सवाल था। वह उसी वक्त पुरानी और फटी हुई पोशाक पहनकर हामिद के शाहाना महल की तरफ चल पड़ा।

जब वह हामिद के दरवाजे पर पहुंचा तो चौकीदार ने उसे अंदर जाने से मना कर दिया। इबने इब्राहिम ने इल्तजा की, "मेहरबानी करके मेरे दोस्त हामिद को मेरा नाम बता दो। मैं इबने इब्राहिम हूं। मुझे बहुत जरूरी काम है।" चौकीदार ने बेदिली से अंदर जाकर हामिद को खबर दी। हामिद जो अपने अहम मेहमानों के साथ गुफ्तगू में मशरूफ था, ने जब इबने इब्राहिम का नाम सुना तो उसने नफरत से कहा, "उसे कह दो कि मैं उसे नहीं जानता। मेरा उससे कोई ताल्लुक नहीं। मैं किसी और नादार आदमी से मुलाकात नहीं करता। कह दो कि वह यहां से चला जाए।"

इबने इब्राहिम के कानों में जब यह बेरहम अल्फाज पहुंचे तो उसका दिल टूट गया। उसकी आंखों से आंसू बह निकले। यह सिर्फ इंकार नहीं था। यह उसकी इज्जत नफ्स पर एक सख्त जर्ब थी। वह उसी वक्त गम और मायूसी के आलम में वापस लौट पड़ा और उसके होठों पर सिर्फ या अल्लाह का वजीफा था। उस रात घर पहुंचकर उसने आयशा से माफी मांगी कि वह अपने बेटे के लिए कुछ नहीं कर सका।

उस तन्हा रात जब शहर सो रहा था, इबने इब्राहिम अपने बेटे के सिराने बैठा। अल्लाह के सामने हाथ फैलाए रो रहा था। उसकी आंखों से बहते आंसू सजदे की जगह को नम कर रहे थे। उस मजबूर की आह उस रात अर्श इलाही तक पहुंची थी और उसकी दुआ कबूलियत के दरवाजे खटखटा रही थी। जमाना इस बात का गवाह है कि जब कोई बंदा तन्हाई और बेबसी के आलम में सिर्फ अपने रब की तरफ रुख करता है तो परवरदिगार उसकी पुकार को नजरअंदाज नहीं करता।

बच्चे का गम और दोस्त हामिद की रुसवाई ने इब्राहिम की रूह को झिंझोड़ कर रख दिया था। और उसी थकान और बेचैनी में उसने जब नम आंखों के साथ अपने पुराने और खस्त हाल बिस्तर पर पलकें मूदी तो उसे एक अजीबोगरीब ख्वाब आया जो उसकी जिंदगी को एक नया मोड़ देने वाला था। उसने एक ख्वाब में देखा कि वह एक पानी और घास रहित सेहरा में खड़ा है, जहां दूर-दूर तक रेत के सिवा कुछ नहीं है। अचानक एक नूरानी और बुजुर्ग शख्सियत उसके सामने जाहिर होती है, जिनके चेहरे पर रहमत और सुकून की झलक है। वह बुजुर्ग शख्सियत इब्राहिम की तरफ इशारा करती है और गहरी आवाज में कहती है, "ए इब्राहिम, तूने दौलत खो दी मगर तूने सब्र का खजाना पा लिया। तेरी दुआ मंजिल तक पहुंच चुकी है। तेरी आजमाइश का वक्त अब तकरीबन खत्म होने वाला है। मशरिक की तरफ कदम बढ़ा। एक लंबा और संगीन सफर तेरा मुंतजिर है। जिस वक्त तू सुल्तान के मेहमान खाने में पहुंचेगा, वहां तुझे एक अजीम राज मिलेगा, जिसके बारे में सिर्फ और सिर्फ तुझे ही इल्म होगा। याद रख, इस सफर में तेरी ही ईमानदारी और सच्चाई ही तेरी असल रहबर होगी।"

इतना कहकर वह नूरानी शख्सियत गायब हो जाती है और इब्राहिम की आंख खुल जाती है। वह पसीने से शराबोर था, लेकिन उसके दिल में एक अजीब सी रोशनी और पुरज्म इरादा जन्म ले चुका था। उसने फौरन वजू किया और नमाज़ फज्र अदा की।

जब आयशा उठी तो उसने देखा कि इब्राहिम का चेहरा पहले से कहीं ज्यादा तरोताजा और मुतमिन नजर आ रहा है। उसने अजीज से पूछा, "क्या बात है मेरे सरताज? आज आपकी आंखों में एक नई चमक है। गोया कि गम का बाग अब उम्मीद के फूलों से महक रहा हो।" इब्राहिम ने तफसील के साथ उसे अपने ख्वाब का माजरा सुनाया। आयशा जो इल्मोदीन की मालिक थी, ख्वाब सुनकर मुस्कुराई और इत्मीनान से बोली, "बेशक यह खुदा का इशारा है। आप देरी ना करें। आप सफर पर रवाना हो। मैं और हमारे बच्चे सब्र और दुआओं के साथ आपका इंतजार करेंगे। हमारे पास जो थोड़ा सा राशन बचा है, मैं उसे आपके लिए एक हीरा कर देती हूं। आपका सफर कैसा भी हो, यह जान लें कि अल्लाह का करम आपके हमराहा के होगा।"

इब्राहिम को अपनी नेक और बाईमान जौजा पर बेपनाह का अचर महसूस हुआ। उसने रवानगी से पहले अपने बीमार बच्चे को प्यार किया, आयशा के सर पर शफकत से हाथ फेरा और अपने पुराने और मामूली से झोले में राशन और एक नक्शा रखकर मशरिक की तरफ अपने सफर का आगाज किया।

यह सफर आसान नहीं था। तंग रास्तों, पहाड़ों और जंगलों से गुजरते हुए इब्राहिम को कई दिन और रातें तनहाई में गुजारनी पड़तीं। उसके पास खाने को कम था और प्यास शिद्दत से सताती थी। लेकिन जब भी उसका ईमान डगमगाने लगता, उसे ख्वाब में सुनी हुई बुजुर्ग शख्सियत की आवाज याद आ जाती और वह नई हिम्मत के साथ आगे बढ़ जाता।

एक शाम जब वह एक सूखी नदी के किनारे पहुंचा तो उसकी तकदीर में एक और आजमाइश लिखी थी। कुछ बदमाश और लुटेरे अचानक उसके सामने नुमाया हुए। उन्होंने इब्राहिम को बेबस देखकर हमला कर दिया। यह सोचकर कि उसके पास कोई कीमती चीज होगी। इब्राहिम ने मुकाबला करने की जुर्रत नहीं की क्योंकि वह कमजोर था और लड़ने के काबिल नहीं था। लुटेरों ने उसका मामूली सा झोला छीन लिया, जिसमें उसका सारा राशन और वह नक्शा था। जब उन्हें झोले में सिर्फ कुछ सूखी रोटियां और पानी की एक बोतल मिली तो उन्होंने गुस्से में आकर इब्राहिम को जख्मी किया और बेरहमाना तरीके से उसे वहीं छोड़ दिया।

इब्राहिम दर्द से कराह रहा था और उसका दिल मायूसी से भर गया। वह जमीन पर लेटा हुआ था और सोच रहा था कि क्या खुदा ने उससे अपना मुंह मोड़ लिया है? क्या उसकी दुआ सच में रद्द हो गई? उस वक्त उसे आयशा की नसीहत याद आई। कठिनाई और मुश्किल वक्त में कभी सब्र का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। उसने दर्द को बर्दाश्त करते हुए मुश्किल से हिम्मत की और धीरे-धीरे उठकर बैठा। उसने अपने जख्मों पर मिट्टी लगाई और अपनी बेबसी का इजहार सिर्फ अल्लाह के सामने किया। वह जानता था कि अब उसके पास पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है। अब उसका सफर सिर्फ अल्लाह के भरोसे पर है।

उसी सुबह की पहली किरण के साथ वह फिर से अपने सफर पर रवाना हुआ। लुटेरों ने उसका नक्शा तो छीन लिया था, लेकिन इब्राहिम के ज़हन में उस ख्वाब का हर एक मंजर और बुजुर्ग शख्सियत की हर एक बात नक्श थी। वह सिर्फ मशरेखर की तरफ चलता रहा। भूख और प्यास की शिद्दत को सब्र के साथ झेलता रहा।

कई दिनों के इस कठिन सफर के बाद आखिरकार उसे दूर से एक शहाना इमारत का नजारा दिखा, जिसके मीनार आसमान से बातें कर रहे थे। उसके दिल में एक आस जगी कि यही वह मेहमान खाना सुल्तान हो सकता है जिसका जिक्र ख्वाब में हुआ था। वह अपने टूटे फूटे हाल और थके हारे जिस्म के साथ उस अजीम इमारत की तरफ कदम बढ़ाने लगा। उसके होठों पर अब शिकायत नहीं बल्कि अल्लाह का शुक्र था कि उसने उसे यहां तक पहुंचाया।

यह सच में किसी सुल्तान का मेहमानखाना एक खास मालूम होता था, जिसकी दीवारों और दरवाजों पर अमीर और जरी काम की नक्खाशी की गई थी और जिसकी चमकीली छतें आसमान से बातें कर रही थीं। इब्राहिम का जिस्म थका हारा था। उसके कदमों में अब हिम्मत बाकी नहीं थी और उसकी फटी हुई पोशाक उसकी गुरबत का खुला ऐलान कर रही थी। वह हिचकिचाता हुआ उस अजीम दहलीज की तरफ बढ़ा, जहां दो ऊंचे खुद वाले और हथियारबंद चौकीदार शान के साथ तैनात खड़े थे।

इब्राहिम ने बड़ी टूटती और कमजोर आवाज में उनसे गुफ्तगू की इजाजत मांगी। चौकीदार जो शाहाना लिबास में थे और दुनियावी एतबार से इब्राहिम को बेहद हकीर समझ रहे थे, ने उसे ठोकर भरे लहजे में जिद्दक दिया, "ए फकीर, किस झुर्रत से तूने इस दरबार के करीब आने की सोची? क्या तेरी आंखें इतनी अंधी हो गई हैं कि तुझे तमीज नहीं कि शाही और आलीशान दरवाजों पर बेघरत लोग नहीं आते। यहां सिर्फ खास मेहमानों का दाखिला है। दफा हो जा यहां से वरना सजा दी जाएगी।" एक चौकीदार ने अपना भाला दिखाते हुए सख्त अल्फाज कहे।

इब्राहिम को बीते रोज हामिद के दरवाजे पर मिली रुसवाई याद आई। मगर सब्र और ईमान का लिबास उसने अब तक नहीं उतारा था। उसने दुआ की और फिर से इल्तजा की। उसका चेहरा अल्लाह के डर से पीला पड़ चुका था। "ऐ मेरे मेहरबान दोस्तों, मैं जानता हूं कि मेरी शक्ल सूरत और मेरी पोशाक इस मुकाम के लायक नहीं है। मगर मुझे एक अजीम और निजी अमानत के बारे में सुल्तान को इत्तला देनी है, जो सिर्फ और सिर्फ शाही खानदान से मुतालिक है। यह राज जवाब के जरिए मुझ तक पहुंचा है। मेरी गुजारिश है कि आप मेरे इस मामूली से पैगाम को सुल्तान के वजीर तक पहुंचा दें।"

चौकीदार ने हंसते हुए एक दूसरे की तरफ देखा और कहा, "सुनो तो जरा इसकी बात, यह खानाबदोश हमें शाही राजों की इत्तलाह दे रहा है। अरे ओह, तू कौन है? कोई जिन्न है या पागल। चल आगे बढ़ाया और अपनी राह ले।"

इब्राहिम ने हार नहीं मानी। उसे मालूम था कि यह उसकी आखिरी मंजिल है और उसे यहां से खाली हाथ नहीं लौटना है। उसने अपनी आंखों में ईमान का पानी भरकर कहा, "मैं तुम्हें खुदा की कसम देता हूं। मेरा यह पैगाम जरूर पहुंचाओ। अगर सुल्तान को यह नागवार गुजरा तो मैं हर तरह की सजा के लिए तैयार हूं। मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि मैं मुल्क-ए शाम से आया हूं, और मेरे पास दफनशुदा खजाने की असल और पुख्ता जानकारी है, जो सुल्तान की खानदानी दौलत है।"

दफनशुदा खजाने का नाम सुनते ही चौकीदारों के चेहरों का रंग उतर गया। उन्हें मालूम था कि सुल्तान बरसों से एक खानदानी अमानत की तलाश में हैं, जिसका जिक्र पुरानी किताबों में है। यह बात इतनी अहम थी कि उसे नजरअंदाज करना उनके बस की बात नहीं थी। एक चौकीदार झटपट महल के अंदर भागा और यह अहम खबर वजीर आजम तक पहुंचाई। वज़ीर ने खबर सुनकर पहले तो ताज्जुब किया। फिर फौरन इब्राहिम को अंदर बुलाने का हुक्म दिया।

इब्राहिम जब शाही दरबार में दाखिल हुआ तो उस महल की शानो शौकत देखकर उसकी आंखें चकाचौंध हो गई। सोने और चांदी से सजी हुई दीवारें, कीमती फर्श और जरी लिबास में लिपटे हुए अहले दरबार, यह मंजर उस शाम की गुरबत से कोसों दूर था जो इब्राहिम ने झेली थी। वजीर ने उसे एक मामूली से आसन पर बैठने को कहा और बड़ा धंगीन अंदाज में सवाल किया, "ए अजनबी, तेरी हिम्मत की दाद देनी पुटाया देगी। मगर जान ले कि अगर तेरी बात गहलत साबित हुई और कोई तेरी सजा सखा तो होगी। बोल, क्या है वह राज जो तू हमें बताने आया है और तू कौन है?"

इब्राहिम ने अदब से सर झुकाया और सच्चाई के साथ अपनी सारी राम कहानी सुना दी। अपने माजी की दौलत, किस्मत का पलटना, कर्जदारियों का बोझ, बीमार बेटा, दोस्त हामिद की बेरुखी, ख्वाब का इशारा और सफर के दौरान लुटेरों की साजिश। वज़ीर और तमाम अहले दरबार ताज्जुब से उसकी बातें सुन रहे थे। उसकी सच्चाई और सादगी में एक अजीब सी कशिश थी। जब इब्राहिम ने खजाने का असल और पुखता निशान बताने के लिए तफसील में इशारा दिया तो वजीर ने फौरन इस खबर को सुल्तान तक पहुंचाने का इरादा किया। उन्होंने इब्राहिम को वहीं ठहरने का हुक्म दिया और उसे शाही आराम और मेहमान नवाजी का यकीन दिलाया।

इब्राहिम को सुकून मिला। उसकी आंखों में अब इंतजार था। इंतजार उस घड़ी का जब खुदा की तरफ से मिला हुआ यह अमानत अपने सही मालिक तक पहुंचेगी और वह यह देखेगा कि मजबूर की आह में कितनी ताकत होती है। वजीर ने फौरन इब्राहिम को शाही मेहमान का दर्जा देते हुए खिदमत करने का हुक्म दिया। शाही खादिमों ने इब्राहिम को एक आरामदेह कमरे में मुंतकिल किया, जहां कीमती कालीन बिछे थे और इत्र की खुशबू फैली हुई थी। उसने नहा धोकर सफाई की और साफ सुथरे लिबास पहने। मगर उसके दिल में अब भी मायूसी की बजाय अल्लाह पर भरोसा था। रात भर वह नींद की आगोश में नहीं गया बल्कि नफिल नमाज और जिक्र में मशरूफ रहा। अपने बच्चों, अपनी ज़ौजा आयशा और अपने अज़म सफर के खत्म की दुआ करता रहा।

अगली सुबह जब आफताब की पहली किरण ने महल के गुंबदों को रोशन किया तो वजीर की तरफ से बुलावा आया कि सुल्तान ने इब्राहिम से खुद मुलाकात करने का इरादा किया है। इब्राहिम तहजीब और अदब का दामन थामे दरबार खास की तरफ चल पड़ा। दरबार का मंजर किसी जन्नत के बाग से कम नहीं था। सुल्तान तख्त शाही पर जलवा अफरोज़ थे। उनके रोशन चेहरे पर इंसाफ और सुकून की झलक थी। उनके इर्दगिर्द तमाम रियासत काजी और उलमा इकराम मौजूद थे। इब्राहिम ने झुककर तस्लीम पेश की और अदब से खड़ा हो गया।

सुल्तान जिनका शाही नाम अब्दुल अजीज था, ने गहरी और पुरसर आवाज में इब्राहिम से मुखातिब होते हुए कहा, "ए शख्स, तूने हमारे वजीर को एक अजीब और ताज्जुब भरी खबर दी है। हमें इल्म है कि हमारे बाप दादा का एक खानदानी खजाना कहीं दफन है, जिसकी तलाश में बरसों से कोशिशें की जा रही हैं। मगर नाकामी के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा। तू शाम के मुल्क से सफर करके आया है। तेरी पोशाक और तेरा हाल तेरी गुरबत की गवाही देते हैं। क्या तू वाकई उस जमानत का राजदार है? अगर तेरी बात झूठी निकली तो तेरा अंजाम क्या होगा? इसका तुझे अंदाजा है।"

इब्राहिम ने आंखों में ईमान और दिल में सच्चाई भरकर जवाब दिया, "ऐ जमाना-ए अली, मैं झूठ से पनाह मांगता हूं। मैं एफकोत एक मजबूर और बेबस बंदा हूं, जिसका दीन और अखलाक उसे झूठ बोलने की इजाजत नहीं देता। यह इत्तला मुझ तक दुनियावी जरिए से नहीं के जरिए पहुंची है, जिसे मैंने परवरदिगार का इशारा समझा है। मैं कसम खाता हूं, खजाने की असल जगह का राज मेरे सीने में महफूज़ है।"

सुल्तान अब्दुल अजीज ने इब्राहिम की आंखों में झांका। उन्हें उसके चेहरे पर सच्चाई की झलक नजर आई। उन्होंने अपने वजीर खास मोहम्मद को इशारा किया कि इब्राहिम को अकेले में ले जाकर तफसील से खुलासा कराएं। इब्राहिम को एक निजी हुजरे में ले जाया गया, जहां वजीर और सुल्तान का एक विश्वास पात्र मुंशी मौजूद थे। मोहम्मद ने नरमी से पूछा, "अब बता ए इब्राहिम, क्या है वह राज? तूने कहा था कि यह खानदानी दौलत है। हमें इल्म है कि दौलत की कमी नहीं है बल्कि उस खजाने में एक कदीमी मुहर और एक अहम अहदनमा भी है, जिसका असल मालिक ही मुल्क का हाकिम कहलाएगा। क्या तुझे उस मुहर या अहदनामा के बारे में कुछ मालूम है?"

इब्राहिम ने गहरी सांस ली और आहिस्ता से कहा, "ऐ वजीर आजम, मैं खजाने की असली जगह बताने से पहले एक बात साफ कर देना चाहता हूं। खसवाब में बुजुर्ग शख्सियत ने मुझे सिर्फ दफनशुदा खजाने का राज बताया था, लेकिन कोई मोहर या अहदनामा का जिक्र नहीं किया था। मेरी इत्तलाह का ताल्लुक सिर्फ उस दौलत की जायदाद से है जो जमीन के अंदर छिपी हुई है। इस इमारत से ज्यादा दूर नहीं एक सूखी हुई नदी है, जिसके किनारे तीन पुराने और लंबे खजूर के दरख्त खड्ड रहे हैं। उन तीनों दरख्तों के बीच की जमीन सुल्तान की खानदानी अमानत को अपने सीने में दफन किए हुए है। इस जायदाद की हिफाजत के लिए उस जमाने में खास अल्फाज़ से एक जादुई हर्स लगाई गई थी, जिसे तोड़ने के लिए सिर्फ एक तरीका है।"

वजीर हैरानी से पूछा, "कैसा तरीका? क्या कोई लफ्ज़ है या कोई नक्शा?" इब्राहिम का चेहरा गमगीन हो गया। उसने कहा, "वह हर्स तब टूटेगी जब मुल्क शाम से आया हुआ एक मजबूर और हाथ का मोहताज शख्स, जो तीन दिन तक भूखा रहा हो, उस जगह पर खड़ा हो और सच्चे दिल से अपने मालिक के हुजूर अपनी मजबूरी का इजहार करें और तीन बार या करीम कहे। मेरी गुजारिश है कि आप फौरन खुदाई का इंतजाम करें। मैं तीन दिन से भूखा हूं और मेरे माजी की हालत आप जानते हैं। मैं तमाम शर्तों को पूरा करता हूं।"

वजीर मोहम्मद ने तफसील से इब्राहिम की बात नकल की और सुल्तान के सामने पेश किया। सुल्तान अब्दुल अजीज ने फौरन अपने अजीम काजी और उलमा को तलबा तलब किया। उन्होंने इब्राहिम की बात को कुरान और हदीस की रोशनी में तौलने का इरादा किया। उलमा ने तकरीर की कि दुआ और मजबूरी का इल्म बद्ध अजीम है। बेशक एक मजबूर और सच्चे मोमिन की आह में इतनी ताकत होती है कि वह कुदरत के राजों को भी खोल सकती है। इस तरह की जादुई हर्स का तुर्द सिर्फ ईमान और खुदा पर भरोसे से ही हो सकता है। यह बात बिल्कुल हकीकी हो सकती है।

सुल्तान ने शाम होते ही इब्राहिम और तमाम अहले दरबार को लेकर सूखी हुई नदी के किनारे जाने का फैसला किया। जब वे मुकर्रर जगह पहुंचे तो नजारा वही था जो इब्राहिम ने बयान किया था। तीन पुराने और ऊंचे खजूर के दरख्त। सुल्तान ने काजी की इजाजत से इब्राहिम को आगे बढ़ने का हुक्म दिया। इब्राहिम ने अपने फटे पुराने लिबास को याद किया। अपनी गुरबत को याद किया और अपने बीमार बच्चे और सब्र करने वाली ज़ौजा आयशा को दिल में महसूस किया। उसने उन लुटेरों और दोस्त हामिद की बेरुखी को भी याद किया जिसने उसे इस मंजिल तक पहुंचाया था।

इब्राहिम उस जगह पर खड़ा हो गया। उसकी आंखों में आंसू थे और उसने पूरी कायनात को गवाह बनाते हुए तीन बार सच्ची इल्तजा के साथ कहा, "या करीम, या करीम, या करीम।" अचानक एक अजीब और रूहानी वाक्या हुआ। जमीन जोर से कांपी और जहां इब्राहिम खदहराया था, वहां रेत हटने लगी और एक बड़ा और लोहे का दरवाजा जाहिर हो गया। चारों तरफ माहौल में एक पुर असरार खामोशी छा गई। सुल्तान, वजीर और तमाम अहले दरबार इस चमत्कार को देखकर हैरान थे। यह बेशक अल्लाह की कुदरत और एक मजबूर की दुआ की कुबूलियत का वाकया था। वहां मौजूद हर एक शख्स की जुबान पर मालिक कायनात की कुदरत और मजबूर इब्राहिम की सच्चाई की तारीफ थी। जमीन का कांपना और लोहे का भारी दरवाजा जाहिर होना यह वाकया किसी जादू या अफसाने से कम ना था, बल्कि यह इस बात का खुला सबूत था कि जब इंसान अपने तमाम दुनियावी सहारे छोड़कर सिर्फ और सिर्फ खुदा की तरफ रुख करता है तो खुदा उसकी फरियाद को बेसहारा नहीं छोड़ देता।

सुल्तान अब्दुल अजीज ने अपने शाही चौकीदारों को फौरन हुक्म दिया कि मेहमानखाना से मजबूत फौज और कुल हदियां मंगवाई जाए ताकि लोहे के उस अजीम दरवाजे को तोड़ा जा सके। क्योंकि दरवाजा सदियों से जंग लग चुका था, इसलिए चंद घंटों की जद्दोजहद के बाद दो मुश्किल उसे खोल दिया गया। दरवाजे के पीछे एक अंधेरा और तंग सीढ़ी थी जो जमीन के बहुत नीचे की तरफ जा रही थी। वजीर मोहम्मद ने बद एहतियात के साथ शाही मशालें जलाई और इब्राहिम के साथ मिलकर उस तारीख रास्ते पर कदम रखा। जब वे काफी नीचे उतरे तो एक अजीम और रोशन तहखाना उनके सामने नुमाया हुआ। यह तहखाना बेशक किसी अजीम सुल्तान की दौलत को महफूज़ रखने के लिए बनाया गया था। तहखाने की तारीकियां सोने और जवाहरात की चमक से रोशन हो उठीं। वहां हजारों अशरफियां, जवाहरात के ढेर, कीमती याकूद और नीलम से भरे संदूक मौजूद थे। खजाना इतना बेशुमार था कि पूरा दरबार भी उसे देखकर ताज्जुब में डूब गया। यह खजाना सिर्फ दौलत ही नहीं थी बल्कि मुल्क की कदीमी शान और शौकत की पहचान भी थी।

जब तमाम अहले दरबार दौलत को देखकर पुरजोश हो रहे थे तो इब्राहिम ने तहखाने के बीच में रखी एक मामूली सी लकदिद ही की पेटी की तरफ इशारा किया। वजीर ने फौरन उस पेटी को खुलवाया। पेटी के अंदर दौलत या जवाहरात नहीं थे, बल्कि एक पुराना और खस्ता हाल चमदरहे का दस्तावेज रखा था, जिसके साथ एक जंग लगी चांदी की अंगूठी थी। सुल्तान ने शौक से वह दस्तावेज अपने हाथ में लिया। यह दस्तावेज पुराने जमाने की असली हदनमा थी, जिस पर सुल्तान के बाप दादा की शाही मोहर लगी थी। इस अहदनुमा में लिखा था, "ए इंसानों, यह दौलत जो तुम देख रहे हो, यह सिर्फ एक वसीला है। असल खजाना यह है कि तुम इंसाफ करो। गरीबों और मजलूमों की आह को नजरअंदाज ना करो। अगर रियासत का हाकिम इस दौलत को गलत नियत से इस्तेमाल करेगा तो यह दौलत खुद ही तबाही का सबब बन जाएगी। इस खजाने का राज उसी वक्त खुलेगा जब कोई ऐसा शख्स इस दहलीज तक पहुंचेगा जो सच्चाई, सब्र और ईमानदारी की हर आजमाइश में सफल हो। यह इल्म हमेशा याद रखना कि एक मजबूर की आह और दुआ 100 फौज से ज्यादा ताकतवर होती है। इस अंगूठी को वह शक हाउस पहनेगा जिसने सच्चाई से इस अमानत को हासिल करने में हमारी मदद की।"

सुल्तान अब्दुल अजीज ने दस्तावेज पे रहा तो उनकी आंखों में पानी आ गया। वह फौरन उस अजीम फलसफे को समझ गए कि दौलत से बढ़कर अब अखलाक और दीनदारी होती है। उन्होंने फौरन तहखाने में ही इब्राहिम की तरफ रुख किया। सुल्तान अपने तख्त से उतरे और इब्राहिम को अपने सीने से लगाया। "ए इब्राहिम, तू सिर्फ मेहमान नहीं है। तू हमारे मुल्क के लिए खुदा की तरफ से भेजा गया रहबर है। तेरी मजबूरी ने हमें असल दौलत का राज बताया है। तेरी सच्चाई ने इस अमानत को हासिल करने में हमारी मदद की है। यह सारी दौलत जो हम देख रहे हैं, इसका असल सबब तू है। तेरी सब्र है और तेरी दुआ है," सुल्तान ने पुरजोश अंदाज में कहा।

सुल्तान ने फौरन मुंशी को हुक्म दिया कि इब्राहिम को उसी वक्त रियासत का वजीर दौलत मुकर्रर किया जाए ताकि वह नेक नियती और ईमानदारी से इस दौलत को रियाया की भलाई में इस्तेमाल कर सके। साथ ही सुल्तान ने उस चांदी की अंगूठी को खुद अपने हाथों से इब्राहिम की उंगली में पहनाया। यह इनाम सिर्फ ओहदा नहीं था। यह सब्र और ईमान की जीत का ऐलान था। इब्राहिम ने फौरन सजदे में गिरकर अल्लाह का शुक्र अदा किया।

इब्राहिम ने अदब से सर उठाया और सुल्तान से इल्तजा की, "ऐ जमाना-ए अली, मैं इस अजीम ओहदे के लायक नहीं हूं। मैं तो सिर्फ एक मजबूर हूं। मेरी असल दौलत मेरी ज़ौजा आयशा और मेरे मासूम बच्चे हैं जो मुल्क शाम में मेरी राह देख रहे हैं। मेरी गुजारिश है कि आप मुझे इजाजत दें कि मैं पहले अपने घर की तरफ लौट जाऊं और अपनी तन्हा ज़ौजा को इस खुशी में शामिल करूं।"

सुल्तान इब्राहिम की सादगी और नेक नियती को देखा और मुस्कुराए। उन्होंने फौरन इब्राहिम के लिए एक शाही काफिले का इंतजाम किया, जिसमें भरपूर राशन, कपड़े, दवाइयां और सोने की अशरफियां शामिल थीं, ताकि वह फौरन अपने मुल्क की तरफ रवाना हो सके।

रवानगी से पहले सुल्तान ने अपने वजीर मोहम्मद को हुक्म दिया कि वह शाम के शहर में जाकर इब्राहिम के पुराने दोस्त हामिद को तलब करें। हामिद जो अब भी अपनी दौलत पर गुरूर कर रहा था, शाही तलब पर हैरान होकर दरबार में हाजिर हुआ। सुल्तान ने हामिद की तरफ सख्त निगाहों से देखा और कहा, "ए हामिद, तूने उस शख्स को धुत्कारा जो तेरे दरवाजे पर मदद मांगने आया था, जिसने कभी तेरे लिए सखावत की थी। तूने एक गरीब और बीमार बच्चे के बाप को मायूस किया। क्या इंसानियत का तकाजा यही था? आज तुझे मालूम होना चाहिए कि तूने इब्राहिम को अकेला छोड़ देकर सिर्फ एक दोस्त को नाराज नहीं किया, बल्कि खुदा के एक मजबूर बंदे की आह को नजरअंदाज किया, जिसकी वजह से आज अल्लाह ने इब्राहिम को अजीम मर्तबा और हमें यह खजाना अता किया है।" हामिद शर्मिंदगीगी से पानीपानी हो गया और सर झुका कर माफी मांगने लगा। सुल्तान ने उसे माफ किया, मगर यह नसीहत दी कि दौलत पर कभी घमंड ना करना और हमेशा नेक नियती से काम लेना।

इब्राहिम शाही रौनक और इज्जत के साथ मुल्क शाम की तरफ लौटा। जब वह अपने पुराने टूटे फूटे घर के पास पहुंचा तो उसने देखा कि आयशा अब भी सब्र और दुआ में मशरूफ है। वह शाही काफिले को देखकर पहले तो हैरान हुई। फिर जब इब्राहिम गोद्दे से उतरा और उसे आवाज दी तो आयशा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने दौधकर इब्राहिम को गले लगा लिया। उनके बच्चे जो अब तनादुरुस्त हो चुके थे, खुशी से झूम उठे। इब्राहिम ने आयशा को सफर का हर मजरा तफसील से सुनाया और सुल्तान से मिले अजीम इनाम और वजीर के ओहदे के बारे में बताया। आयशा की आंखों में आंसू थे, मगर वे गहम के नहीं बल्कि शुक्र और इत्मीनान के आंसू थे।

इब्राहिम और आयशा ने फैसला किया कि वे शाही दौलत को सिर्फ अपने लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे। इब्राहिम ने सुल्तान की खिदमत में हाजिर होने से पहले अपने शहर में एक अजीम खैरात खाना कायम किया और तमाम गरीबों और मोहताजों की मदद की। इब्राहिम ने वजीर की हैसियत से जिंदगी बसर की, मगर उसकी सादगी, ईमानदारी और सब्र कभी कम नहीं हुई। वह हमेशा याद रखता था कि उसे यह इज्जत और यह मर्तबा सिर्फ अपनी मजबूरी की आह और अल्लाह पर यकीन रखने की वजह से हासिल हुआ है। इस तरह इब्राहिम ने यह साबित कर दिया कि ईमान की दौलत और सब्र की अजमत दुनिया की हर दौलत से बड़ी होती है, और यह कि अल्लाह की नजर में एक मजबूर और नेक बंदे की दुआ की कुबूलियत में कोई शक नहीं होता।

कहानी का अंजाम यह नसीहत देता है कि कठिनाई और मुश्किल वक्त में कभी सब्र का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। प्यारे दोस्तों, अगर आपको हमारी यह वीडियो पसंद आई हो, तो हमारी इस वीडियो को एक लाइक जरूर कर दें। कमेंट में अपनी राय का इजहार जरूर करें और ऐसे ही पुराने जमाने की और इस्लामी कहानी देखने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर दें। वीडियो पूरा देखने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।