📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

14) Fiqh - Haiz o Nifaas (Masla 124 - 146) - Class 14 || Dr. Mahboob Abu Asim Hafizahullah

Dr. Mehboob Abu Asim32:58

Transcription

से आगे को जा रहा है और मगर का टाइम आगे कम थोड़ा सुस्ती से जा रहा है। इसलिए कम टाइम और भी कम हो रहा है हमारे पास। कोशिश करें साथी नमाज आपकी इधर हो और नमाज के फौरन बाद ही कोशिश किया करें। यानी के अकार करने के फौरन बाद आगे आ जाए ताकि जो हमें न का टाइम मिल जाए।

बला तो साबका दर्स में हमने क्या पढ़ा था? तम के बारे में। ल त के मसाइल माशाल्लाह। तो क्या होता है? वैसे मम का लफी माना किस चीज का इरादा करना और इस्लाही तौर पर त से क्या मुराद है? इबादत की नियत से चेहरे और हाथ पर मट्टी से मसा करना। जी हां। और यह इस्लाम की दन दन की दी हुई रुख में से रुखसत। रुखसत क्या होती है? यानी असल हुकम से हटकर जिसमें आसानी दी गई हो। आसानी क्या दी गई है? कि पानी की जगह पर मट्टी से तम करना। तो तम बताया था कि दो चीजों के लिए किया जाता है। य दो हाल तों में किया जाता है। कौन सी दो हालत है? एक पानी ना मिले और दूसरा पानी इस्तेमाल ना कर सके।

पानी ना मिलने का माना क्या है? कि पानी आसपास कहीं हो ही ना। अगर आपके पास पीने का पानी है, पानी है इतना जो पीने का है सिर्फ आपके लिए, तो क्या उससे वजू करना जरूरी होगा? हाँ जी। अगर आपको पता है कि और पानी नहीं मिलेगा, यह पानी सिर्फ आपके पीने ही की जरूरत के लिए है, तो आप उससे वजू करना जरूरी नहीं है। ब कर सकते हैं। सम। इसी तरह पानी अगर सेल हो रहा है तो क्या खरीदना जरूरी है? हाँ। अगर आप खरीद सकते हैं, अगर आपके पास खरीदने की गुंजाइश है, तो आपको खरीदना होगा। या नहीं कि सिर्फ फ्री में पानी मिले तो तबी है बस। अगर सेल भी हो रहा है और आप खरीद सकते हैं तो तब भी वधू के लिए पानी खरीदना होगा। तो यह है पानी ना मिलने का और पानी इस्तेमाल ना कर सकने का क्या माना है? आदमी बीमार है या मौसम बहुत ज्यादा ठंडा है, पानी से ठंडा है, उसको गर्म करने का को जरिया नहीं है और इतने ठंडे पानी से अगर ससल या वजू करते हैं तो आदमी को जान का खतरा है। जरा गौर कीजिए, जान का खतरा है। सिर्फ य नहीं कि मुश्किल मुश्किल तो होती है, तो जान का खतरा है। इस हालत में भी मम किया जा सकता है। लेकिन अगर जान का खतरा नहीं है, पानी इस्तेमाल किया जा सकता है तो असल यह है कि पानी से वजू या ससल किया जाए। अच्छा इसमें हमने यह भी पढ़ा था किम की शर्त क्या है? छह शर्त क्या क्या है? हाँ करने वाला मुसलमान हो। यानी अगर किसी ने गैर इस्लाम से पहले तम किया, उसके बाद कलमा पढ़ा है तो उसको दोबारा तम करना होगा। और अकलमंद हो। अगर उसकी अकल नहीं है, उसका किया हुम का फायदा नहीं। इसी तरह बच्चा है तो समझदार हो, तमीज हो और नियत हो। ममम भी इबादत है, इसके लिए नियत होनी चाहिए। और क्या है? पानी ना मिलना हो या पानी का इस्तेमाल ना कर सकना हो और मट्टी पाक हो जिससे तम किया जा रहा है।

अच्छा मुखर अंदाज से चलते हैं आगे। तम का तरीका क्या है? हाँ जी, तम का तरीका क्या है? आप बताएंगे। हाँ [संगीत] मुंह के ऊपर से ऐसे मुंह के ऊपर से फिरेंगे या एक ही बार मट्टी पर हाथ मारकर। मट्टी से मुराद जहाँ भी गर्द गुबार हो, मट्टी हो या टेबल है आपके पास कोई भी ऐसी चीज है उसम गर्द गुबार है तो दोनों हाथ मारेंगे और हाथों को अगर ज्यादा मट्टी लगी फिर झाड़ने की जरूरत है वरना जरूरत नहीं है। समझ? हाथों के एक दूसरे पर फेर और चेहरे पर फेर ऐसे बस। ये ममम का तरीका है चाहे आपने बदु की जगह पर तम करना हो या गुसल की जगह पर तम करना हो, एक ही तरीका है दोनों का। अच्छा हमने यह भी जिक्र किया था कि तम्मम किन चीजों से खत्म हो जाता है? जिन से वजू टूटता है उन तमाम चीजों से तम्मम भी खत्म हो जाता। और ज्यादा पानी का मिल जाना, पानी का पाया जाना, पानी आ जाना, पानी मिल जाए तो फिर भी या पानी के इस्तेमाल इस्तेमाल करने के काबिल हो जाना। पानी ठंडा था, गर्म करने का गुजरिया नहीं था अब गर्म करने का गुजरिया आ गया तो अब आप जो है उस पानी को इस्तेमाल कर सकते हैं तो तब भी आपका वजू खत्म हो जाएगा।

आगे चलते हैं आज के मसाइल लेते हैं। आज के मसाइल हैं हैद, निफास के मसाइल, मेंसस के और बच्चा पैदा होने के बाद जो ब्लीडिंग होती है इनके मसाइल और यह खवातीन के मसाइल हैं। लेकिन मर्दों को भी मालूम होना चाहिए। समझे ना? ताकि अपने घरों में इस तरह की चीजों को इन के मालूम होनी चाहिए ताकि घरों में इस तरह की चीजें आती हैं और पता हो कि हमने किस तरह से उनकी गाइडेंस करनी है। हैज जो है, मेंसस जो है बगैर किसी मर्ज के वह एक नेचुरल तबी खून है कि जो औरत के रहम से मुकरा औकात में निकलता है। यानी इसको इसीलिए पी का नाम भी दिया जाता है। मंथली पीरियड होता है। खवातीन को अल्लाह ताला ने फिी तौर पर उनके अंदर चीज रखी है और यह उनकी सेहत के लिए है। उनकी सेहत के लिए है। अल्लाह ता अल्लाह ताला की जो हिकमत है इसके अंदर। तो और नेचरल नेचरल खून है। य नहीं कि बीमारी का खून है। बीमारी का खून आएगा आगे उसका जिक्र होगा। यह नेचरल खून है। तो महीने में मख सूस दिनों में निकलता है। किसी को ज्यादा किसी को थोड़ा, किसी के दिन ज्यादा होते हैं किसी के थोड़े होते हैं। और इसी तरह जब बच्चा पैदा होता है तो बच्चा पैदा होने से पहले फौरन पहले या उसके बाद कई दिन तक यह खून भी निकलता है। हाँ पहले खून को जो महाना पीरियड है उसको हैज कहते हैं और दूसरे खून को निफास कहते हैं। समझे? निफास कहते हैं जो बच्चा पैदा होने के बाद खून जारी होता है। तो यह है हैज निफास। तो इस्लाम के अंदर इस खून के अलग से अह कामात है। तो उसमें हैज निफास की ना तो उम्र कोई इसकी उम्र कीने के लिमिट है। किस उम्र में हैद आता है और किस उम्र में बंद होता है? लेकिन अमूमन उलमा ने कहा है कि तकरीबन नौ साल की उम्र में हैद आ सकता है। वैसे तो इसके बाद आता है ज्यादातर लेकिन बाज हालात में नौ साल की उम्र में भी आ सकता है। और अमूमन 50 साल की उम्र के बाद यह बंद हो जाता है। उमूमन। लेकिन शाद नादर हालात में मुमकिन है 50 साल के बाद भी चलता रहे। लेकिन यह इसका इसी तरह दिनों के लिहाज से भी इसकी कोई लिमिट नहीं है। बाद खवातीन को थोड़े दिन आता है एक दिन दो दिन तीन दिन और बाद को ज्यादा दिन आता रहता है। हत्ता कि 15 पंद्रह दिन तक चलता है। समझे ना? तो इस तरह से तो यह है इसके हवाले से तो ना तो इसकी कोई उम्र के लिहाज से को मुद्दत मुकर्रर है और ना ही दिनों के लिहाज से इसका तालुक होता है। खानदानी मामलात, बाज खानदान में जल्दी आ जाता है बाद में देर से आता है। खोराक, मौसम इस तरह की चीज काफी इसमें असर अंदाज होती है।

अच्छा उसके बाद यह कि जिसने जिक्र किया है कि नौ साल से 50 साल तक ज्यादातर चलता है तो हैज निफास में जो चीजें हराम हो जाती हैं क्या है? हैज निफास में नमाज पढ़ना मना है। नमाज पढ़ना जायज ही नहीं है। नी कि नमाज नहीं होती, नमाज पढ़ना जायज ही नहीं है। और इसी तरह रोजा भी रखना जायज नहीं है। बल्कि अगर सूरज गुरूब होने से दो मिनट पहले भी हैज या निफास आ गया तो रोजा टूट गया, उस रोजे को कज करना होगा। हाँ नमाज को कजा नहीं किया जाएगा। जो नमाज छूटती है मैसेज की वजह से या नि हैज निफास की वजह से इस नमाज को कजा नहीं किया जाएगा। लेकिन छूटे हुए रोजे जो हैं उनको कजा किया जाएगा। ऐसे ही अगर को उमरा हज उमरा करने जाता है जाती है औरत उसके लिए तवाफ करना मना है जब तक मन से खून आ रहा है। कुरान को छूना पकड़ना मना है क्योंकि कुरान के लिए आदमी का अगर बावजू होना शर्त है तो यह तो उससे बढ़कर है। हम मिस्त्री करना मना है। अल्लाह ताला का फरमान है के हैज की जगह से औरतों से अलग रहो, उनसे दूर रहो। इसी तरह आपका फरमान है हदीस में अत लम सली औरत को जब हैज आता है तो ना तो रोजा रखती है और ना ना नमाज पढ़ती है और ना रोजा रखती है। तो यह वो चीज है कि जो औरत के लिए हैज निफास की हालत में मना है कि जब तक इस कैफियत में है उसके लिए इस तरह की चीज करना जायज नहीं, मना उसके मना है। इसी तरह औरत को हैज की हालत में तलाक देना हराम और नाजायज है। और क्या तलाक हो जाती है? नहीं होती। इस उलमा का है और रा कल यही है कि तलाक वाकई नहीं होती हैज की हालत में अगर खाव तलाक दे दे बीवी को। पहली बात तो तलाक देना मना है, हराम जा है और अगर तलाक दे भी दे तो उस तलाक का असर नहीं, वो तलाक वाकई नहीं होती उलमा के स कल के मुताबिक।

अच्छा उसके बाद यह भी के हैज से जो चीजें साबित हो जाती हैं या हैज आने से क्या चीज वाजिब हो जाती है? हैज के खत्म होने पर या मेंस के खत्म होने पर गुसल करना वाजिब है क्योंकि य नापाकी की कैफियत है जिस तर जनात है। इसी तरह यह भी है इसमें गुसल करना होगा जिस तरह के गुसल जनात किया जाता है इसी तरह हैद आने से बच्ची का बालिग होना साबित हो जाता है। अगर कोई बच्ची है 12 13 14 साल की उसको मेनस आ गए तो इससे आने से क्या है? बच्ची बालिग हो जाती है, उसका बुलूग साबित हो जाता है। इसी तरह हैज से इद्दत शुमार होती है। इद्दत का ताल्लुक होता है तलाक वगैरह से या खांद के फौत हो जाने से इस की चीजों से। तो इस हैज के साथ जो है इद्दत भी शुमार की जाती है। इस हैज से इद्दत शुमार होती है। इसी तरह हैज का आना अमूमन इस बात की दलील है कि रहम में हमल नहीं है। हमल ना होने की दलील है। प्रेगनेंसी ना होने की दलील है हैज का आना किसी औरत को प्रेगनेंसी ना होने की दलील है। तो यह है हैज के जो आसार होते हैं के जो असरात होते हैं।

हैज औरत के लिए हमने बताया था कि जो चीज मना है उसी में एक यह भी है कि उसका बगैर जरूरत के मस्जिद में ठहरना। तो चूंकि एक नापाकी की कैफियत है तो बगैर दरूद के मस्जिद में ठहरना उसके लिए मना है। और अगर कोई जरूरत हो, जरूरत से मुराद बाज उलमा इजाजत देते हैं कि जिस तरह को इल्मी दर्स हो ऐसी जगह पर बैठने की कोशिश करें जहाँ नमाज ना पढ़ी जाती हो और इस इस चीज का ख्याल करें कि किसी तरह के खून वगैरह इस की चीजें जो है वो वहाँ पर ना गिर सके क्योंकि आप सला सलम ने औरतों को ईदगाह में आने का हुक्म दिया ईद की नमाज के लिए हत्ता के यानी कि उन औरतों को भी आने का हुक्म दिया कि जिनको जिन्होंने नमाज नहीं पढ़ना होती। अच्छा वो नमाज तो नहीं नहीं पढ़ेंगे तो फिर आके क्या करेंगी? कि ताकि मुसलमानों की दुआ में शरीक हो और फरमाया के अयाल मुसल्ला के जो या लोगों की नमाज पढ़ने की जगह है उससे अलग होकर बैठे। इससे यकीन किया जाता है कि औरत का मेनस की हालत में मस्जिद में बैठना जायज नहीं है। असल यही है और अगर उसको किसी वजह से किसी जरूरत के तहत बैठना पड़ता है तो ऐसी जगह पर बैठे जहाँ नमाज ना पढ़ी जाती हो। बाकी एक हदीस में आता है कि ला। यह हदीस जो है य जफ हदीस है इसलिए हमने कहा है कि अगर कोई जरूरत है तो उस द के तहत औरत मस्जिद में जिस तर के इल्मी दूस है इस तरह की चीज है तो उसमें एक साइड पर बैठ सकती है ताकि इनसे इन चीजों से फायदा उठा सके। इसी तरह हैज मेंसस की हालत में औरत से हम बिस्ती करना मना है, सोहबत करना मना है। और अगर उससे सोहबत कर ली जाए तो इने अब्बास रला ताला अन का फतवा है कि उसे कफारा देना होगा। एक दीनार या आधा दीनार। दीनार जो आपके जमाने का दीनार था जो एक दीनार तकरीबन 4.25 ग्राम का था सोना, सोने का दीनार होता था। इतना दीनार जो है उसका सदका कफे के तौर पर देना होता है।

131 नंबर मसले में है शुरू होते ही रोजा खत्म हो जाता है। जिसने जिक्र किया ना कि अगर फर्ज करें सूरज गुरूब होने से दो मिनट पहले ही मेनस आ गए तो उससे रोजा टूट जाएगा और बाद में उस रोजे को कजा करना होगा। इसी तरह अगर फजर से फजर तुलू होने से पहले मेनस खत्म हो गए तो उस दिन का रोजा रखना होगा। फजर रू होने से पहले पहले मेंस बंद हो गए खत्म हो गए तो उस दिन का रोजा औरत को रखना होगा चाहे वो गुसल जो है फजर के अजान के बाद भी कर ले। यानी फर्ज करें कि न फजर के दो चार मिनट पहले बंद खत्म होते हैं। पाँच मिनट पहले। वैसे तो आमतौर पर इसमें टाइम लगता है लेकिन हम फर्ज करें कि अगर पाँच मिनट पहले पता चल गया कि मैस खत्म हो चुके हैं अब पाँच मिनट में गुसल तो नहीं कर सकेगी तो वो रोजे की नियत करेगी। सहरी करने का अगर उसके पास चांस है सहरी कर ले और गुसल जो है चाहे फजर तुलू हो के बाद भी कर ले तो मुश्किल नहीं है। तो मालूम क्या हुआ? अगर मगरिब से पहले, सूरज गुरूब होने से पहले मेंसस आ गए तो रोजा टूट जाता है और अगर फजर से पहले पहले मेंस खत्म हो गए तो उस दिन का रोजा रखना होगा। यह वो चीज है जिसे हमें समझने की जरूरत है और ना समझने की वजह से हम जानते हैं हमें मालूम होता है कि बहुत से लोग जो हैं इनमें तरह तरह की गलतियों का शिकार होते हैं या रोजे रखते नहीं और क के दिन को रोजे छोड़े होते हैं या हैज की के हाथ में रोजे जा रहे होते हैं तो ये चीज मना है। इसलिए हमें जरूरत है इन चीजों को जानने की। इसी तरह हमने जिक्र किया है कि मेनस की हालत में नमाज पढ़ना औरत के लिए मना है। नमाज पढ़ना मना है उसके लिए। जी तो नमाज पढ़ना मना है। लेकिन नमाज के हवाले से भी मालूम होना चाहिए। मसजिद उसमें तफसील है। अगर औरत ने अजान हो गई, नमाज नहीं पढ़ी थी और मेसेज शुरू हो गए। अब वह इस नमाज को कब पड़ेगी? यानी फर्ज करें क्या अजान के दस ग्यारह मिनट बाद मेसेज आ गए। अभी तक उसने नमाज नहीं पढ़ी थी तो क्या उसको ये नमाज पढ़ना होगी? अब तो नमाज नहीं पड़ेगी, अब तो मेनसे शुरू हो गए। हाँ, इस नमाज को कजा करेगी क्योंकि ये नमाज उस पर फर्ज हो चुकी। जब नमाज का वक्त दाखिल हो गया तो नमाज उस पर फर्ज हो गई। मैं चाहता हूँ इन मसाइल को जरा गौर से सुनिए और समझने की कोशिश कीजिए क्योंकि बारीकी के मसाइल हैं। औरत को अगर अजान शुरू, अजान हो गई, अजान के बाद मेनसेज हो गए तो जिस नमाज के लिए अजान हुई है वो नमाज उसको पढ़ना होगी। अगर इस वक्त नहीं पढ़ सकी मेनस होने से पहले पहले तो फिर उसको मेनस खत्म होने के बाद उस नमाज को कजा करना होगा। नी फर्ज करें अभी मगरिब की अभी असर की नमाज की मिसाल ले ले आप के। असर की नमाज के बाद मेनस आ गए अजान के बाद और अभी तक उसने नमाज नहीं पढ़ी थी। अब उसको क्या करना होगा? जब मेनस खत्म होंगे तो उसके बाद यह असर की नमाज उसको कजा करना होगी। सिर्फ यह नमाज जिसका वक्त दाखिल हुआ था और उसके बाद की नमाज हफ्ता बार जो उसके मेंस चलते रहे वो नमाज कजा नहीं करना। किसलिए? हाँ, फर्क क्या है? फर्क ये है कि ये नमाज उस पर इस हालत में थी कि वो पाक थी, नमाज पढ़ना उसके लिए जायज था इसलिए उसको नमाज पढ़ना है। लेकिन बाकी जो नमाज आ रही हैं मैनस के दौरान हाँ ये वो नमाज हैं कि जिसका उसको हुक्म नहीं है। फर्क ये दोनों में कि जिस नमाज का वक्त शुरू हो चुका था उसके बाद मेनसेज शुरू हुए तो ये नमाज उस पर फर्ज हो चुकी थी। अगर उसने उस वक्त नहीं पढ़ी तो बाद में पढ़ना होगी। लेकिन वो नमाज जो मैनस के दौरान आ रही है इन नमाज को कजा करने की जरूरत नहीं है। यह नमाज कजा नहीं की जाएगी। लेकिन रोजे के बारे में हम जिक्र किया कि रोजे बाद में कजा किए जाते हैं। तो यह है जी हाँ। इसी तरह हैज खत्म होने के बाद जिस नमाज का वक्त बाकी हो उसे अदा करना होगा। यानी फर्ज करें असर की नमाज की बात कर रहे थे किसी औरत का उसके मेनस खत्म हो गए सूरज गुरूब होने से पहले। तो असर की नमाज का वक्त है ना अभी। असर की नमाज का वक्त कब तक है? हाँ, सूरज गुरूब होने तक। असल उसका वक्त सूरज गुरूब होने तक है। वैसे हम इशाला तफसील बयान करेंगे नमाज के मसाइल में कि इसमें क्या तफसील है। लेकिन असर की नमाज का वक्त सूरज गुरूब होने तक है। तो किसी औरत के मेनस खत्म हो गए सूरज गुरूब होने से पहले। अब अगरचे उसको नहाते गुसल करते सूरज गुरूब हो भी जाए तो तब भी उसको असर की नमाज पढ़ना होगी। किसलिए? क्योंकि असर की नमाज का वक्त उस पर आया और वह इस हालत में थी कि वह पाक हो चुकी थी। पाक होने का माना कि उसे नमाज पढ़ने का हुक्म आ चुका था इसलिए उसे नमाज पढ़ना होगी। तो कहने का मकसद कि वो नमाज कि जिसका वक्त बाकी हो और मेनस खत्म हो जाए वो नमाज उसे पढ़ना होगी। अगर उसी वक्त में पढ़ सके तब भी। अगर उसका वक्त निकल भी जाए गुसल करते करते तब भी उसको बाद में पढ़ना होगी। इसी तरह हैज के हाथ में क्या चीज की जा सकती है? क्या नहीं की जा सकती है? हैज और जो है अकार कर सकती है। सुबह शाम के अकार हैं, सोने के अकार हैं, मुख्तलिफ तरह की दुआएँ हैं। समझे ना? आप सला सलम ने औरतों को ईदगाह में आने का हुक्म दिया। किसलिए? कि ताकि मुसलमानों की वो ईद में उनकी दुआ में शरीक हो। अगर नमाज वो नहीं पढ़ना लेकिन ताकि दुआ में शरीक हो। इससे मालूम क्या हुआ कि हैज की हालत में औरत अकार, दुआएँ हर चीज कर सकती है। तो यह चीज भी की जा सकती है। इसी तरह हैज औरत क्या कुरान की तिलावत कर सकती है? इसमें उलमा का काफी बड़ा इख्तिलाफ है। लेकिन जो सही है वो यह है कि किसी हदीस में किसी सही हदीस में जफ हदीस आती है लेकिन किसी सही हदीस में हैज औरत को कुरान पढ़ने से मना नहीं किया गया। कुरान की तिलावत से अगर उसको जबानी याद है, मोबाइल से पढ़ रही है या कुरान को अगर पकड़ना मना है उस जिक्र किया। कुरान को पकड़ना मना है। लेकिन अगर कुरान को पकड़ने की जरूरत हो तो उलमा कहते हैं कि गुलाब के साथ हाथों पर कोई ग्लोज पहनकर या कपड़ा लपेट कर पकड़ सकती है। इस हालत में तो इस तरह से कुरान की तिलावत कर सकती है। तो हैज की हालत में कुरान की तिलावत की जा सकती है और खुसूस जिन औरतों को कुरान की तिलावत की जरूरत होती है किनको जरूरत होती है? बाज औरतों को। और कुरान सीख रही है, हिफ्ज कर रही है। समझे ना? हाफिज है कुरान की। उसको जरूरत है बारबार कुरान दोहराने की। कुरान हिफ्ज कर रही है। इस तरह कुरान की तालीम दे रही है, पढ़ा रही है। समझे ना? इस तरह की कैफियत होती है तो अलबत्ता अमूमन कहने का मकसद कि किसी सही हदीस में हैजा औरत को कुरान पढ़ने से कुरान की तिलावत करने से मना नहीं किया गया। जो इस बारे में हदीस आती है जफ है इसलिए उलमा का सही कल है कि हैज की हालत में औरत कुरान की तिलावत कर सकती है। लेकिन कुरान को पकड़ने से इन चीजों से जो है एहतियात करें। अगर पकड़ने की जरूरत हो तो फिर गुलाब या कपड़ा लपेट कर हाथों पर इस पकड़ा जाए। इस तरह हैज की हालत में औरत से बीवी से हर चीज की जा सकती है सवाय सोहबत करने के, जमा करने से सिर्फ इस चीज से मना किया गया है। और हैज औरत के कपड़ों का हुक्म क्या है? हैज औरत के कपड़ों का हुक्म क्या है और बाकी उसके जिस्म का हुक्म क्या है? हमारे अमूमन समझा जाता है कि हैज के हाथ में औरत नापाक है, उसके जिस्म भी नापाक है, कपड़े भी नापाक हो गए। ये तसव्वुर गलत है। हैज औरत के कपड़े पाक हैं जब तक उन पर खून ना लगे। हाँ, खून लग गया तो खून नापाक है, जरी बात है। लेकिन अगर खून नहीं लगा तो कपड़े पाक हैं। और अगर खून लग भी गया कहीं पर तो उस उस जगह को धो ले, कपड़ा पाक हो जाएगा। समझे ना? अगर मेनसर का खून कपड़े को लग गया तो कपड़ा नापाक है लेकिन कहाँ से नापाक है? सिर्फ उस जगह से जहाँ खून लगा है उतनी जगह धो ले, पूरे कपड़े को धोने की जरूरत नहीं है, उतनी जगह को धो ले तो बाकी कपड़ा पाक हो जाएगा। और खून नहीं लगा तो कपड़ा पाक है चाहे हैज के हाथ में कपड़े को पहना भी गया हो तब भी मुश्किल नहीं है। इसी तरह हैज औरत का जिस्म भी पाक है। जिस्म पाक होने का माना कि वह अगर कोई उसका खाव उसके साथ बैठता है कोई किसी के साथ इस तरह की सभी चीजें की जा सकती हैं। आप सला सलम ने हजरत आयशा से कहा कि मुझे कपड़ा दो। आप मस्जिद में बैठे हुए थे और आपका हुजरा और मस्जिद की दीवार एक एक थी। तो आप खिड़की से हजरत आयशा से कपड़ा मांगते हैं। तो हजरत आयशा कहती कि मैं तो मेनस में हूँ। तो आप कहते कि तुम्हारे मेनस तुम्हारे हाथ में नहीं है। यानी मकसद कहने का क्या है कि तुम्हारा हाथ पाक है। उन्होने समझा कि मैं तो चूँकि नापाकी के हाथ में कैसे करूँ? आप कहते कि तुम्हारी नापाकी तुम्हारे हाथ में नहीं है। और यह वो इस्लाम की अजीम तरीन तालीमात है। दिनों के अंदर यहूदियों के अंदर क्या करते थे कि इस हालत में औरत को ऐसे घर से एक तरफ निकाल देते थे, घर के कोने में जब तक मेनस खत्म ना होते वो औरत वहीं पर बेचारी बंद होती। किसी के साथ बैठना उठना खाना पीना सब उनकी हर चीज बंद हो जाती थी। लेकिन इस्लाम में हर चीज की इजाजत दी है सवाय जिन चीजों का हमने जिक्र किया है। नमाज, रोजा है, या सोहबत करना इस तरह की चीजें बाकी हर चीज की इजाजत दी है। समझे ना? अच्छा तो इसका मतलब यह हुआ कि हैज औरत के साथ बैठकर ना खाना खाया जा सकता है पानी पिया जा सकता है। बल्कि अगर कहीं से उसने खाना खाया है वही खाना खाया जा सकता है। अल्लाह के ी ह आशा कहीं से पानी पीती है जिस बर्तन से पानी पीती है जहाँ से वो मुँह रख के पानी पीती है आप वही मुँह रख के पानी पीते हैं। यानी मोहब्बत का अंदाज देखिए। अच्छा हैज बंद कैसे होता है? हैज खत्म होने की क्या दलील है? कैसे पता चलता है कि खत्म हो गया? उसमें बा खवातीन को हैज के खत्म होने पर वाइट डिस्चार्ज होता है जिसको अरबी में जो है उसको कुतुल बदा का नाम दिया जाता है। वाइट डिस्चार्ज होता है हैज खत्म होने पर। तो यह हैज के खत्म होने की दलील है। हैज खत्म होने। क्योंकि असल में मसला क्या है कि हैज निफास के मसाइल ऐसे यानी के बारीकी के मसाइल हैं। ऐसे उलझे हुए मसाइल हैं कि इसको उलमा कहते हैं कि औरतों से ज्यादा कोई नहीं जानता। समझे ना? हत्ता कि बड़े-बड़े उलमा भी इनम इन चीजों के अंदर हैरान होते हैं कि यहां पर क्या बड़े-बड़े अजीबो गरीब मसाइल आते हैं। तो इससे बाज औकात औरत को एक दिन हैज आया दूसरे दिन बंद हो गया, कुछ घंटे चला कुछ घंटे बंद हो गया इस तरह के मसाइल चलते रहते हैं। तो अगर हैज का खून जारी है जारी रहता है अ बतर दिन का हिस्सा तो वो हैज शमार होता है। बा कात मुमकिन है कि दिन का कुछ हिस्सा चले कुछ हिस्सा बंद हो जाए तो वो हैज सारा शमार होगा जब तक मुकम्मल तौर पर बंद ना हो जाए। मुकम्मल बंद होने की उसकी निशानी क्या होती है? जिसे हम जिक्र करते थे के बा और सभी के साथ नहीं होता है लेकिन अ ब औरतों को वाइट डिस्चार्ज होता है खत्म होने पर। वाइट डिस्चार्ज होता है जो उसके खत्म होने की दलील है। अच्छा बाज खवातीन को हैज आने से पहले और हैज खत्म होने के बाद भी डिस्चार्ज होता है लेकिन वो हैज का खून नहीं होता। वो क्या है? एक गदला किस्म का खून होता है यानी सुरखी उसमें यानी के कह लीजिए के पीला, जर्द होता है या थोड़ा स्याही मायल होता है। इस तरह का यानी डिस्चार्ज होता है वो खून नहीं होता। तिया फरमा है कि हैज खत्म होने के बाद इस तरह का डिस्चार्ज जो है हम उसको कुछ शुमार नहीं करते थे। यानी उसको उसको हैज नहीं मानते। उसमें औरत नमाज पढ़ेगी, रोजा रखेगी, हर चीज करेगी। तो अलबत्ता हैज खत्म होने के बाद या उससे पहले इस तरह के जो डिस्चार्ज आते हैं और खुसूस यानी के हैज खत्म होने के कुछ देर के बाद या शुरू होने से कुछ वक्त पहले इस तरह की चीज जो है हैज में शुमार नहीं होती। उसमें औरत नमाज पड़ेगी, रोजा रखेगी सारे वो काम करेगी कि जो नी आम औरत करती हैं।

अच्छा इसी तरह हैज खत्म होने के लिए, बंद करने के लिए हैज बंद करने के लिए के लिए क्या कोई मेडिसिन इस्तेमाल की जा सकती है? किसी वक्त जरूरत के तहत अक्स बतर खवातीन हज उमरे के लिए जाती है तो उनको खतरा होता है कि मेनस ना शुरू हो जाए तो फिर बाज औकात मेडिसिन इस्तेमाल करती हैं। उसमें उलमा का फतवा ये है कि अगर इन मेडिसिन के इस्तेमाल करने में कोई नुकसान ना हो तो इस्तेमाल की जा सकती है। हैज बंद करने के लिए मेडिसिन बंद

करने के लिए या रोकने के लिए अभी तक आए नहीं ताकि रुके रहे या आ चुके हैं उनको बंद करना है। तो अगर मेडिसिन ऐसी इस्तेमाल की जा सके जिससे कोई नुकसान ना हो तो उसकी करने की इजाजत है। लेकिन अगर उसका नुकसान है तो फिर इंसान को देखना चाहिए कि अपने आप को नुकसान में ना डाले। तो यह थे चंद मोटे-मोटे मसाइल जो मेनसे से मुताल्लिक हैं और जो निफास बच्चा पैदा होने के बाद से मुत, उस निफास में मज़ीद चीजें आएंगी आगे भी। अच्छा, उसके बाद हैज़ के साथ दूसरा मसला है। इहाँ हमने ज़िक्र किया था कि हैज़ क्या है? नेचुरल खून है, तबी खून है जो औरतों को आता है। एक है बीमारी का खून, के बा औरत बीमार, बीमार होने की वजह से उनको उनको ब्लड आता है, खून आता है। इसको कहते हैं इहाँ तो इस्तिहाज़ा के जो अहकामात हैं, हैज़ से अलग हैं। बल्कि इस्तिहाज़ा की हालत में औरत आम कैफ़ियत में है, आम औरतों की तरह है। नमाज़, रोज़ा, हर चीज उसके उसी तरह होगी जिस तरह आम हालत में होती है अगर उसको खून आ रहा है। समझे ना? इस इन दोनों चीजों को समझना बहुत ज़रूरी है। तो इस हैज़ वो खून है जो बाख़वातीन को किसी बीमारी वगैरह की वजह से आता है और यह महीना भर या ज़्यादा दिन जारी रहता है। बाद को आता ही रहता है, मुसलसल जारी रहता है, बंद होता ही नहीं और बाद को महीने के अज़ अक्सर दिन जारी रहता है। इसको इस इस्‍तिहाज़ा का नाम दिया जाता है। इसके अहकामात हैज़ के अहकामात से मुख़्तलिफ़ हैं। चुनांचे इस्तिहाज़ा की हालत में औरत पाक होती है, उसे वो तमाम अमाल करने की इजाजत है जो पाक औरत करती हैं। उफ़्फ़, माती है कि नबी के साथ आपकी एक जौज़ा हालत इस्तिहाज़ा के बावजूद तक़ाफ़ किया करती थी। आपकी एक बीवी, आपके जौज़ा मुतार्रा तक़ाफ़ करती थी इस्तिहाज़ा की हालत में। इसका मतलब क्या हुआ? कि इस्तिहाज़ा की हालत में औरत जो है वो नॉर्मल हालत में है। नमाज़ पढ़ेगी, रोज़ा रखेगी, तक़ाफ़ करेगी। समझे? अच्छा, अब यहाँ पर अहम मसला यह है कि कैसे फ़र्क किया जाए कि हैज़ क्या है और इस्‍तिहाज़ा क्या है? तो उसमें हैज़ और इस्तिहाज़ा के खून में, ब्लड में तीन-तीन बड़े फ़र्क हैं। हैज़ और इस्तिहाज़ा के खून में तीन बड़े फ़र्क हैं। हैज़ का खून जिस बताया है कि है तो नेचुरल, लेकिन नेचुरल होने के बावजूद वह गाढ़ा होता है, बदबूदार होता है और उसमें स्याही माइल होता है। उसके अंदर जो है सिर्फ़ सुरख़ नहीं होता बल्कि उसके अंदर इनके आप कह लीजिए कि स्याही माइल होता है, उसमें काफ़ी ब्लैकनेस ये चीज होती है। तो यह हैज़ का खून, जबक जो इस्तिहाज़ा का खून है वह आम खून की तरह, आपकी उंगली पर ज़ख़्म लगा, जो खून यहाँ से निकलेगा, इस इस्तिहाज़ा का खून ऐसा ही होता है। आम ब्लड है, उसकी ना कोई स्मेल है और सुरख़ है और वो गाढ़ा नहीं होता, बल्कि आम ब्लड की तरह, आम खून की तरह पतला खून होता है। समझे ना? इस्तिहाज़ा का खून। तो यह है हैज़ और इस्तिहाज़ा के खून में फ़र्क, ताकि किसी ख़ातिन को अगर इस तरह का मसला हो तो उसको पता हो कि कब उसको हैज़ आ रहा है और कब उसका इस्तिहाज़ा का खून है। समझे ना? अच्छा, अब इसमें यह भी है कि ख़वातीन को इस हैज़ और इस्तिहाज़ा में फ़र्क कैसे करेंगी? एक तो फ़र्क आपको यह बता दिया जिसके खून के अंदर ये फ़र्क मौजूद है कि हैज़ का खून अलग है, इस्तिहाज़ा का अलग है। उसका तो मसला बिलकुल वाज़ेह क्लियर है। उसके लिए तो मुश्किल नहीं है कि जब हैज़ आए तो नमाज़ पढ़ना छोड़ दे, रोज़ा नहीं रखे और जब हैज़ खत्म हो गया, आम खून आना शुरू हो जाए, वो इस्तिहाज़ा है, उसमें नमाज़ पढ़े, हर चीज़ करे। लेकिन बाक़ी ख़वातीन के क्या होता है? उनके ब्लड के अंदर कोई फ़र्क होता ही नहीं है। एक ही तरह का खून आता रहता है। एक ही तरह का खून आता रहता है, इस्तिहाज़ा है उसको, लेकिन एक ही तरह का खून आ रहा है, कुछ पता नहीं कि हैज़ का है या दूसरा है। अब इसमें भी बाक़ी ख़वातीन को यह कैफ़ियत शुरू होती है, पहले उनको आता था कुछ साल तक, उसके बाद इस्तिहाज़ा शुरू हुआ या फ़र्ज़ करो पहले 10 साल तक हैज़ आता रहा, 10 साल के बाद इस्तिहाज़ा शुरू हो गया। अब 10 साल की उसकी रूटीन तो है ना, हर महीने में फ़र्ज़ करो छह दिन, सात दिन, उसके मुस्तक़िल दिन थे जिसमें उसको हैज़ आता था। अब क्या करेगी ये औरत? इन दिनों में नमाज़ छोड़ देगी जब उसको हैज़ आता था और बाक़ी दिनों में वो नमाज़ पढ़ेगी। तीसरी हालत यह है कि बाक़ी ख़वातीन को हैज़ आता ही है, हैज़ के साथ ही इस्तिहाज़ा शुरू हो गया यानी ब्लड आना शुरू हुआ तो बंद हुआ ही नहीं, चलता ही मुसलसल, पहले हैज़ नहीं आता था, एक बार शुरू हुआ उनका। अब उसकी साफ़ का कोई उसकी रूटीन भी नहीं है कि जिसको देखा जाए, इसकी रूटीन ये थी। उसके लिए फिर क्या करना होगा? उसके लिए आपका फ़रमान है कि छह या सात दिन जो अमूमन औरतों का पीरियड होता है, इतने दिन नमाज़ छोड़ेगी महीने के अंदर और बाक़ी दिनों में नमाज़ पढ़ेगी। तो यह थे मोटे-मोटे अहकामात के हवाले से। अगरचे इसमें काफ़ी तफ़सील है, इंशाअल्लाह आप किताब को पढ़िए, आपको इसमें मिल जाएंगी। लेकिन मैं चाहूँगा किताब को जरा गौर से देखिए, पढ़िए क्योंकि हमने टाइम के इतने थोड़ा होने की वजह से इन चीजों को मुख़्तसर अंदाज़ से ज़िक्र किया है और ख़वातीन के हवाले से अगर उनके कोई मसाइल हैं तो इंशाअल्लाह वक़्त वगैरह पर वो पूछ सकती हैं बला।