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प्यारे दोस्तों, आपने खलीफा हारून रशीद का नाम तो सुना होगा। खलीफा हारून रशीद बगदाद के हाकिम थे। कहते हैं कि हारून रशीद के जमाने में बगदाद में एक बहुत बड़ा ताज़िर था। उसका एक बेटा था जिसका नाम अबुल हसन था। बाप के मरने के बाद अबुल हसन ने सारी दौलत को दो हिस्सों में बांटा। एक हिस्से से उसने बड़े-बड़े मकान और दुकानें खरीदीं। उन मकानों और दुकानों के किराए से उसका खर्च बहुत अच्छी तरह चलने लगा। दूसरे हिस्से को उसने नकद रुपए की शक्ल में रखा। उसको वह अपने ऐशो आराम और सैर तफरीक पर खर्च करता। हर वक्त उसके घर पर यार दोस्तों की भीड़ लगी रहती। तमाम दिन नाच गाने और हंसी मजाकर होते। बड़ी शानदार दावत होती। इस तरह उसके दिन ईद और रातें शबे बारात की तरह गुजर रही थीं।
अबुल हसन भी सुबह से शाम तक उसी में मग्न रहता। उसके दोस्तों का यह हाल था कि जिसे देखिए अबुल हसन की मोहब्बत का दम भर रहा है। इस तरह अबुल हसन अपने दोस्तों के साथ मजे में जिंदगी गुजार रहा था। आखिर साल भर के अंदर वह सारा रुपया खत्म हो गया। रुपए का खत्म होना था कि दोस्तों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। अगर कोई दोस्त रास्ते में मिल भी जाता तो मुंह फेर कर दूसरी तरफ चला जाता। अबुल हसन को इस बात का बड़ा अफसोस हुआ कि जिन लोगों को वह अपना दोस्त समझता था और जो हर वक्त साए की तरह उसके साथ लगे रहते थे, वो दरअसल सब उसके रुपए पैसे के दोस्त थे।
अबुल हसन पर अपने दोस्तों के इस सुलूक का बहुत असर हुआ और उसने तय किया कि वह बगदाद के लोगों की सोहबत में ना बैठेगा और ना उनको कभी खाने पीने की दावत ही देगा और ना कभी उनके घर जाएगा। लेकिन रोजाना शाम को वह बगदाद के पुल पर चला जाता और जो कोई परदेसी मुसाफिर नजर आता उसे अपने साथ लाता और उसकी खूब खातिर तवाजो करता। उसे एक रात के लिए अपने यहां मेहमान रखता और सुबह को उसे रुखसत कर देता। लेकिन वह कभी किसी बगदाद के रहने वाले को अपने घर ना बुलाता। इस तरह उसने दोस्ती का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म कर दिया। इसलिए कि जिन मुसाफिरों को वह मेहमान रखता, उनसे दोबारा ना मिलता था।
एक मर्तबा उसी तरह शाम को वह मुसाफिर की तलाश में बाहर निकला तो उसे बगदाद के पुल पर एक बहुत शरीफ आदमी नजर आया जो सूरज से मूसल का सौदागर मालूम होता था। उसे देखकर ही अबुल हसन समझ गया कि यह जरूर मूसल का सौदागर है। लेकिन सच्ची बात यह है कि ना तो वह कोई परदेसी था और ना मूसल का सौदागर। यह खुद बगदाद के हाकिम थे। खलीफा हारून रशीद। खलीफा का कायदा यह था कि वह कभी-कभी भेष बदलकर बगदाद के गली कूचों में घूमा फिरा करते थे। इस तरह उनको अपनी रियाया का सही हाल मालूम हो जाता था। इस मर्तबा खलीफा ने मूसल के सौदागर का भेष बनाया। लेकिन अबुल हसन यह ना समझ सका कि यह खलीफा है। वह तो यही समझा कि यह मूसल के सौदागर है।
अबुल हसन ने आगे बढ़कर उन्हें बड़े अदब से सलाम किया और कहा, "खुदा आपका भला करे। मेरी ख्वाहिश है कि आज की रात आप मेरे मेहमान रहें और सुबह को जहां चाहें चले जाएं।" फिर अबुल हसन ने खलीफा को बताया कि वह सिर्फ परदेसियों की ही खातिर मदारत करता है। खलीफा ने जब जरा तकफ किया तो अबुल हसन ने कहा, "आप इसका ख्याल ना करें। खुदा की मेहरबानी से मेरे घर में उसका दिया हुआ बहुत कुछ मौजूद है और आपको कोई तकलीफ ना होगी।" खलीफा को यह आदमी बहुत अजीब सा लगा। लेकिन उन्होंने अबुल हसन की दावत कबूल कर ली।
अबुल हसन खलीफा को लेकर घर आया और यहां उनको बड़ी इज्जत के साथ बिठाया और उनकी खूब खातिर मदारत की। जब खाने से फग हो गए तो फिर अबुल हसन ने कहा, "आपको देखकर अंदाजा होता है कि आपने सारी दुनिया की सैर की है और आपका तजुर्बा बहुत ज्यादा है। यह मेरी खुशकिस्मती है कि मेरी मुलाकात एक ऐसे आदमी से हुई है जिसने सारी दुनिया देखी है। आज की रात मुझे भी आपके तजुर्बे से फायदा पहुंचेगा।" खलीफा ने अबुल हसन का शुक्रिया अदा किया और कहा कि अपना सारा हाल बयान करो कि तुम क्यों सिर्फ परदेसियों को मेहमान के तौर पर लाते हो और यहां बगदाद में तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है।
अबुल हसन ने अपना सारा हाल खलीफा हारून रशीद को कह सुनाया कि किस तरह मैंने दोस्तों के साथ रंगलियों में अपनी आधी पूंजी खत्म कर दी और अब दोस्तों ने मेरा साथ छोड़ दिया है। इसीलिए मैंने अब तय किया है कि सिर्फ परदेसियों की खातिर मदारत करूंगा। परदेशियों की दोस्ती में यह फायदा है कि यह थोड़ी देर की रहती है और मैं उसके बाद उनसे दोबारा नहीं मिलता। इसीलिए आपसे भी यह बात कहना चाहता हूं कि अगर आज के बाद मैं आपसे दोबारा ना मिलूं तो आप मुझसे नाराज ना हों। मैं अपने उसूल पर मजबूती से कायम हूं और बहुत दिनों से इस पर अमल कर रहा हूं।
खलीफा ने कहा, "तुमने यह बहुत अच्छा फैसला किया है। लेकिन मेरा जी चाहता है कि तुमने जो मेरी खातिर मदारत की है, उसके बदले में मैं भी तुम्हारी दावत करता। लेकिन मैं तुम्हारे उसूल को तोड़ना नहीं चाहता। इसलिए मेरी ख्वाहिश है कि इसके बदले मैं तुम्हारे काम आ सकूं। शायद मेरे जरिए तुम्हारी कोई ख्वाहिश पूरी हो जाए। हालांकि मैं एक सौदागर हूं। लेकिन बड़े-बड़े लोग मेरी बात मानते हैं। अगर तुमको मेरी मदद की जरूरत हो तो बताओ, क्योंकि मैं कल सुबह तुम्हारे उठने से पहले चला जाऊंगा। और यह मैं तुमको यकीन दिलाना चाहता हूं कि मैं तुम्हारे दूसरे दोस्तों की तरह नहीं हूं। मुझे अपना भाई समझो।"
अबुल हसन ने कहा, "ए भाई मूसल के सौदागर, मुझे दुनिया में किसी चीज की जरूरत नहीं है। खुदा का दिया हुआ मेरे घर में सब कुछ मौजूद है। मैं तो खुद आपका शुक्रिया अदा करता हूं कि आपने मेरा इतना ख्याल किया कि मेरी दावत कबूल कर ली और मेरे घर मेहमान के तौर पर आए और मेरे साथ खाना खाया। मुझे यहां किसी किस्म की तकलीफ नहीं है। अलबत्ता एक बात बताऊं। आप जानते हैं कि बगदाद के हर मोहल्ले में एक मस्जिद है। इसी तरह हमारे मोहल्ले में भी एक मस्जिद है। उस मस्जिद का इमाम बहुत खराब आदमी है। उसके चार दोस्त हैं। वह भी उतने ही खराब हैं। खुदा की इबादत करने के बजाय वह लोगों से झगड़ा करते फिरते हैं। उन लोगों ने सारे मोहल्ले को परेशान कर रखा है। हर आदमी उनसे तंग आ चुका है। नेक और अच्छे आदमियों के तो यह लोग खासतौर पर दुश्मन हैं। मैं तो उनसे इतना चढ़ता हूं कि अगर मुझे एक दिन की बादशाहत मिल जाए तो मैं उनके 100-100 कोड़े लगवा दूं ताकि फिर वह अपने काम से काम रखें।"
खलीफा ने कहा, "यह तो ठीक है और खुदा करे कि खलीफा तुमको 24 घंटे के लिए बगदाद का बादशाह बना दे। मेरी दुआएं तुम्हारे साथ हैं।" अबुल हसन ने कहा, "मैं भी आपसे कैसी बेवकूफी की बातें कर रहा हूं। भला ऐसा भी कहीं हो सकता है कि मैं 24 घंटे के लिए खलीफा बन जाऊं। यह तो मैंने कहने के लिए एक बात कह दी। आपको इस वक्त मेरी बात पर हंसी आ रही होगी। अगर खलीफा मेरी बात सुन ले तो यकीनन मुझे पागलखाने में बंद कर देंगे। दरअसल यह बातें मैंने ऐसे ही कह दीं। इनका जिक्र किसी से मत करना।" खलीफा ने कहा, "इसमें हंसने की क्या बात है? मेरा भी यही ख्याल है कि ऐसे इमाम को जरूर सजा मिलनी चाहिए।"
अबुल हसन ने कहा, "अरे छोड़ो उस नालायक इमाम की बात। यह वक्त बुरे आदमियों का जिक्र करने का नहीं। आओ हम तुम एक-एक गिलास शरबत का पिएं और फिर चलकर इत्मीनान से सोएं। इसलिए कि तुमको सुबह सवेरे जाना है।" जब अबुल हसन यह कह रहा था तो खलीफा ने एक बात और सोची। उन्होंने अबुल हसन के गिलास में एक पाउडर डाल दिया। उस पाउडर में यह असर था कि उससे आदमी चंद घंटों के लिए बेहोश हो जाता था। इसका नतीजा यह हुआ कि जैसे ही उसने गिलास खत्म किया, उस पाउडर ने अपना असर किया और वह बेहोश हो गया।
खलीफा ने अपने गुलाम को आवाज दी जो बाहर उनका इंतजार कर रहा था और उससे कहा, "इस आदमी को अपने कंधों पर उठाकर महल में ले चलो। अलबत्ता इसका घर याद रखना, क्योंकि इस आदमी को यहां फिर वापस लाना है।" गुलाम ने अबुल हसन को अपने कंधों पर डाल लिया। आगे-आगे खलीफा और पीछे-पीछे अबुल हसन को अपने कंधों पर लिए हुए गुलाम। इसी तरह खलीफा हारून रशीद उसको लेकर महल में आ गए और महल के लोगों से कहा, "इस आदमी के कपड़े उतार कर इसको मेरे सोने के कपड़े पहना दो और फिर इसे मेरे बिस्तर पर लिटा दो।"
इसके बाद खलीफा ने महल के तमाम लोगों को, वजीर और दरोगा को बुलाया। महल की काम करने वाली कनीज को आवाज दी और उनसे कहा, "कल सुबह-सुबह तुम लोग यहां आओ और इस आदमी को, जो मेरे बिस्तर पर लेटा है, अपना खलीफा समझो और इसके साथ इसी तरह पेश आओ जैसा कि मेरे साथ पेश आते हो और इसके हर हुक्म की इस तरह पाबंदी करो जैसे मेरे हुक्म को मानते हो। अगर कोई इसका हुक्म ना मानेगा तो उसको सख्त सजा दी जाएगी।"
फिर खलीफा ने अपने वजीर जाफर को बुलाया और उससे कहा, "ए जाफर, मैं कल तक इस आदमी को खलीफा के इख्तियार देता हूं। यह जो कोई हुक्म दे, उस पर अमल करो। जिसको रुपया पैसा देने के लिए कहे, उसको रुपया पैसा दो। जिसको सजा देने के लिए कहे, उसको सजा दो। किसी काम के लिए मुझसे पूछने की जरूरत नहीं। इसको जरा सी देर के लिए भी यह शक पैदा ना होने देना कि वह खलीफा नहीं है या यह कि मैं इससे मजाक कर रहा हूं।"
अगले दिन खलीफा के कहने के मुताबिक सब लोग वहां आ गए। जब अबुल हसन की आंख खुली, उसने देखा कि वह एक शानदार कमरे में लिटा हुआ था। यह कमरा तरह-तरह के सामान से सजा हुआ था। महल का हर आदमी अपनी-अपनी जगह पर अदब से खड़ा हुआ था। उसने देखा कि हर तरफ कीमती साजो सामान रखा हुआ है। दीवारों पर रंग-बिरंगे पर्दे लगे हुए हैं। उसके बिस्तर के चारों तरफ बहुत ही खूबसूरत कनी खड़ी हुई हैं। उनके पीछे अमीर वजीर और उनके पीछे गाने वाले हैं। एक आलीशान मेज पर खलीफा की पोशाक रखी हुई है, जिसको वह फौरन पहचान गया।
इस मंजर को देखकर पहले तो अबुल हसन घबरा गया। उसने सोचा कि मैं जरूर कोई ख्वाब देख रहा हूं। कहीं ऐसा भी हो सकता है कि मैं खलीफा बन जाऊं। यह सोचकर उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। जरा सी देर में एक कनीज ने बढ़कर कहा, "अलीजा, आपके जागने का वक्त हो गया है।" अब तो अबुल हसन की हैरत का कोई ठिकाना नहीं रहा। पास से हल्के-हल्के बाजे की आवाजें सुनाई दीं। उसने दिल में कहा, "ए अबुल हसन, क्या तुमको कभी इस तरह उठाया गया है? हे अबुल हसन, तुम कहां आ गए हो? यह तुम्हारा घर है या शाही महल? तुम जाग रहे हो या सो रहे हो?"
अबुल हसन ने कनीज की तरफ देखकर कहा, "यह तुम क्या कहती हो? तुमने मुझे गलत समझा। मैंने तुमको इससे पहले कभी नहीं देखा और ना मेरा इस महल से कोई ताल्लुक है। मेरी समझ में नहीं आता कि मैं यहां कैसे आ गया। अगर तुम कुछ बता सकती हो तो बताओ। तुम्हारा क्या नाम है और तुम कौन हो?" कनीज ने कहा, "मेरा नाम शेरी है और मैं आपकी कनीज हूं। आप हमारे हाकिम हैं। ऐसा मालूम होता है कि आपकी नींद खराब हो गई है, इसलिए आप ऐसी बातें कर रहे हैं। वरना सच तो यह है कि आप ही हमारे हाकिम हैं।"
यह सुनकर अबुल हसन ने बड़े जोर का कहखा लगाया और अपने तकिए पर सर रखकर लेट गया। फिर बड़ी तेजी के साथ उठा और बोला, "मेरी समझ में अब भी कुछ नहीं आता। सच बताओ कि मैं कौन हूं?" "आप हमारे हाकिम खलीफा हारून रशीद हैं।" सब ने एक साथ जवाब दिया। अबुल हसन को फिर भी यकीन नहीं आया। उसने अपनी उंगली दांतों से काटी यह देखने के लिए कि जाग रहा हूं या सो रहा हूं। लेकिन जैसे ही उसने उंगली काटी, उसको बहुत तकलीफ हुई। लेकिन यह बात कितनी अजीब है कि कल तक वह अबुल हसन था और आज खलीफा है।
फिर उसने तमाम गुलामों और कनीजों से कहा, "सच-सच बताओ, मैं कौन हूं? यह मजाका का वक्त नहीं है।" सब ने एक साथ कहा, "आप हमारे खलीफा हारून रशीद हैं। और हम सब आपके वफादार गुलाम हैं। आपके हुक्म को मानने वाले।" अबुल हसन ने कहा, "तुम सब झूठे हो। क्या तुम मेरे बारे में मुझसे ज्यादा जानते हो?" अब वजीर जाफर आगे बढ़ा और उसने हाथ जोड़कर कहा, "हम सबके खलीफा, हमारे कसूर माफ करें। आज काफी देर हो गई, वरना पहले तो आप बहुत जल्द उठा करते थे। और मेरी दरख्वास्त है कि आप चलकर सल्तनत के कामकाज की देखभाल करें। हम सब आपके हुक्म का इंतजार कर रहे हैं।" यह कहकर उसने हाथ बढ़ाकर सहारा दिया और अबुल हसन को उठाकर बिठा दिया।
शेरी शाही लिबास लेकर बढ़ी। वह अबुल हसन को एक और कमरे में ले गई। यहां उसने गुलाब के अर्क से मुंह-हाथ धोया और अबुल हसन को शाही लिबास पहना दिया। फिर शेरी ने बढ़कर खिलाफत का ताज उसके सर पर रख दिया। और सोने का एक डंडा, जो खलीफा के हाथ में रहता था, अबुल हसन को दे दिया। यह डंडा खिलाफत की निशानी समझा जाता है। अबुल हसन उसको लेकर बड़ी शान से शाही तख्त की तरफ बढ़ा। फिर तो वह सचमुच का खलीफा बनकर तख्त पर बैठ गया। उसके बाद सब दरबारी अपनी-अपनी जगह आकर बैठ गए। अबुल हसन बार-बार अपने शाही लिबास को देख रहा था और खुश हो रहा था। वजीर जाफर ने खड़े होकर कई बार झुक-झुक कर सलाम किए और वह भी आदाब बजा लाए और तख्त के पास आकर बैठ गए। वजीर जाफर ने दुआ दी कि खलीफा हारून रशीद पर हमेशा खुदा का साया रहे और वह हजारों साल तक सलामत रहे और अपनी रियाया को इसी तरह पालते-पूसते रहे।
अब तो अबुल हसन को थोड़ा-थोड़ा यकीन होने लगा कि मैं जाग रहा हूं और वाकई खलीफा हूं और सारा दरबार मेरा अपना दरबार है। फजीर जाफर ने कहा कि मुल्क के तमाम अमीर और फौज के सरदार बाहर मौजूद हैं और आपकी इजाजत का इंतजार कर रहे हैं। अब आप इजाजत दें तो वह सलाम के लिए हाजिर हों और दरबार में अपनी जगह लें। अबुल हसन ने कहा, "दरबार के दरवाजे खोल लो। सबको आने की इजाजत है।" उसके बाद सब सर झुकाए हुए आए और आदाब बजा लाए। फिर अपनी-अपनी जगह पर अदब से खड़े हो गए।
अबुल हसन के सामने एक-एक करके तमाम मुकदमे पेश किए गए। अबुल हसन ने खलीफा की हैसियत से हर मुकदमे को गौर से सुना और हर एक को अपनी बात कहने का मौका दिया और सही-सही फैसला कर दिया। खलीफा हारून रशीद पीछे एक कमरे में बैठे हुए सारा हाल अपनी आंखों से देख रहे थे। उन्हें इस बात की खुशी थी कि अबुल हसन ने जो फैसला किया, वह सोच-समझकर, इंसाफ और अकलमंदी से किया।
अचानक अबुल हसन की नजर कोतवाल शहर पर पड़ी। अबुल हसन को जैसे कोई बात अचानक याद आ गई हो। उन्होंने उससे कहा, "ऐ कोतवाल, तुम हमारी पुलिस के सबसे बड़े अफसर हो। तुम्हारे पास शहर का सारा इंतजाम है। मैं तुमको हुक्म देता हूं, तुम यहां से सीधे फला मोहल्ले की मस्जिद के इमाम के पास जाओ। वहां तुमको मस्जिद में इमाम और उसके चार साथी मिलेंगे। तुम उनको गधों पर उल्टा बिठाकर सारे शहर में घुमाओ और चिल्ला-चिल्ला कर कहते जाओ कि यह सजा इन लोगों को इसीलिए दी जा रही है कि यह दूसरों के मामलात में दखल दिया करते हैं और अपने पड़ोसियों को परेशान करते रहते हैं और अपने काम से लापरवाही करते हैं। जब सारे शहर में इनको घुमा-फिरा दो तो फिर इन पांचों को 100-100 कोड़े लगाओ।" कोतवाल ने कहा, "आपके हुक्म की अभी तामील होगी।"
यह सुनकर अबुल हसन बहुत खुश हुआ और खुश होकर उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। उसके बाद अबुल हसन ने वजीर जाफर से कहा, "इस वक्त खजांची को हुक्म दिया जाए कि 1000 सोने की अशरफियां लेकर उसी मोहल्ले में जाए और वहां मालूम करे कि अबुल हसन का घर कहां है। तुमको उसका घर मालूम करने में मुश्किल ना होगी। क्योंकि अबुल हसन बहुत शरीफ आदमी है और वह किसी से झगड़ा नहीं करता और ना किसी की बात में दखल देता है। इसीलिए मोहल्ले के सब लोग उससे मोहब्बत करते हैं। वहां पहुंचकर अबुल हसन की मां से मिलो और उससे कहो, 'ऐ अबुल हसन की मां, हमारे खलीफा अबुल हसन से बहुत खुश हैं क्योंकि वह बहुत शरीफ आदमी है और वह परदेसियों को अपने यहां मेहमान रखता है और उनका ख्याल रखता है।'" खजांची ने अबुल हसन के हुक्म की तामील की और वजीर ने इत्तला दी कि अबुल हसन की मां को 1000 अशरफी दे दी गई है। यह सुनकर अबुल हसन बहुत खुश हुआ और उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा।
उसके बाद अबुल हसन ने जाफर वजीर से पूछा, "क्या कोई और मामला है जो इस वक्त यहां पेश किया जाएगा?" जाफर वजीर ने कहा, "जहां पनाह, आज के सारे काम आपके हुक्म के मुताबिक हुए। इस तरह आज का काम खत्म होता है।" अबुल हसन ने दरबार बर्खास्त कर दिया और दरबार के अफसर और फौज के सरदार बाहर चले गए और अबुल हसन वजीर जाफर के साथ फिर महल में दाखिल हुए। अबुल हसन के दाखिल होते ही ऐसा लगा जैसे कि सारा महल खुशियों से जगमगा उठा हो। यहां हर तरफ से भीनी खुशबू आ रही थी। वह एक कमरे में दाखिल हुआ। वहां एक से एक खूबसूरत औरत इस्तकबाल के लिए मौजूद थी। अबुल हसन को अपनी तरफ आते देखकर वह हाथ बांधकर खड़ी हो गई। अब हर तरफ से हल्के-हल्के बाजे की आवाजें आने लगीं।
जब अबुल हसन बैठे तो यह सब औरतें भी उनके आसपास बैठ गईं। अबुल हसन ने दिल में कहा, "यह लोग सही कहते हैं। मैं वाकई हारून रशीद हूं। मैं देख सकता हूं, सूंघ सकता हूं, चल सकता हूं, सुन सकता हूं। कदम-कदम पर मेरा इस्तकबाल हो रहा है। फिर मेरे खलीफा होने में कमी ही क्या रह गई? यहां हर एक मेरे हुक्म का इंतजार कर रहा है। अब इसमें कोई शक नहीं रहा कि मैं खलीफा हारून रशीद नहीं हूं। हर जगह मेरा हुक्म माना जाता है।"
अबुल हसन के सामने मजेदार खाना रखा गया। उसने इतना अच्छा खाना जो देखा तो उसकी भूख और बढ़ गई। उसने खूब मजे लेकर खाना शुरू कर दिया। जो औरतें पास बैठी थीं, उनसे भी कहा कि तुम सब खाओ। सात खूबसूरत औरतें पंखा झुला रही थीं। अबुल हसन ने कहा, "एक पंखा काफी है। आओ तुम सब भी मेरे पास बैठ जाओ और खाना खाओ।" उसने खास तौर पर उस कनीज को अपने पास बिठाया जिसका नाम शेरी था। दूसरी तमाम कनीज़ें पहले तो खामोश रहीं, लेकिन अबुल हसन के दोबारा कहने पर बैठ गईं।
जब खाना खत्म हुआ तो कुछ कनीजें एक सोने का बर्तन लाईं और गुलाब के अर्क से अबुल हसन के हाथ धुलाए गए और इत्र में बसे हुए खुशबूदार तौलिए से उसके हाथ पोछे गए। उस कमरे में से अबुल हसन को लेकर यह कनीजें एक और कमरे में आईं जहां सोने-चांदी की प्लेटों में तरह-तरह के फल रखे हुए थे। यहां भी बाजों की हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं। कुछ लड़कियों ने बढ़कर अबुल हसन का इस्तकबाल किया। अबुल हसन ने खुद भी फल खाए और बाकी सबको भी तकसीम किए। सब ने खलीफा का तोहफा समझकर कबूल किया।
यहां से अबुल हसन को तीसरे कमरे में लाया गया। इस कमरे में दुनिया के बेहतरीन मेवे, मिठाइयां और हलवे रखे थे। अबुल हसन ने यहां भी थोड़ा बहुत खाया और सबसे खाने के लिए कहा। उसके बाद यहां से अबुल हसन को एक और कमरे में ले गए। यह कमरा उन दोनों कमरों से भी ज्यादा शानदार था। एक से एक खूबसूरत रंगीन बोतलें शरबतों से भरी हुई थीं। उस कमरे में जो कनी थीं, उनमें एक खास बात यह थी कि वह अलग-अलग रंगों की रेशम की पोशाकें पहने हुई थीं। उन्होंने जिस रंग के कपड़े पहन रखे थे, उस रंग का शरबत अबुल हसन के सामने पेश किया। अबुल हसन ने मजा लेकर शरबत पिया। उसने इतना जायकेदार शरबत इससे पहले कभी नहीं पिया था।
जब शाम हुई तो घंटों नाच और गाना होता रहा और वह देर तक हंसी-मजाक की बातें करता रहा। जब रात का वक्त आया तो अबुल हसन को नींद आने लगी। खलीफा के हुक्म से उस कनीज ने, जिसका नाम शेरी था, अबुल हसन को एक शरबत का गिलास भर कर दिया और उसमें वही पाउडर मिला दिया जिससे आदमी बेहोश हो जाता है। और अबुल हसन से कहा, "यह शरबत मेरे हाथ से पी लीजिए। फिर मैं आपको बहुत अच्छा गाना सुनाऊंगी।" लेकर खूब मजा लेकर पिया। कनीज ने गाना शुरू किया। जब वह गाना गा चुकी तो अबुल हसन का जी चाहा कि उसकी तारीफ करें। लेकिन वह मुंह खोल कर रह गया। मुंह से आवाज ना निकली और उसे नींद आ गई।
अब खलीफा बाहर आए। उन्होंने नौकरों को हुक्म दिया कि अबुल हसन को फिर वही कपड़े पहना दिए जाएं जो वह यहां महल में आने से पहले पहने हुए था। जब अबुल
सब्र करो। इसके अलावा कोई चारा नहीं।
अबुल हसन बड़ा अच्छा आदमी था। खुदा उसको जन्नत नसीब करे। मलिका जुबैदा ने उसी वक्त शेरी को 100 अशरफिया दी ताकि अबुल हसन के कफ़न दफन का अच्छा इंतजाम हो जाए।
अब शेरी अपने घर में आई और कमरे का दरवाजा बंद करने के बाद उसने बड़े जोर का कहखा लगाया। अबुल हसन उसकी आवाज सुनकर उठ बैठा और अशरफियाओं की थैली देखकर बहुत खुश हुआ। अबुल हसन ने कहा, "अब मेरी बारी है खलीफा के पास जाने की। जैसे ही तुम मलिका के पास गई थी। देखो मैं भी कामयाब होता हूं या नहीं। एक बार खलीफा ने भी तो मुझसे मजाक किया था। आज मुझे खलीफा से बदला लेने का मौका मिला है।"
यह कहकर उसने शेरी को अपनी जगह पर लिटाया और अपनी आंखों में प्याज मल्ली और रोता हुआ खलीफा के पास पहुंच गया। खलीफा उस वक्त दरबार में थे। खलीफा और दरबार के तमाम आदमी अबुल हसन को इस हाल में देखकर घबरा गए क्योंकि उन्होंने इससे पहले उसे कभी इस हाल में नहीं देखा था। अबुल हसन खलीफा को देखकर और जोर से रोया। "हाय मेरी प्यारी शेरी, अब मैं तुझे कहां पाऊंगा?"
यह सुनकर खलीफा समझ गया कि शरी का इंतकाल हो गया। खलीफा की आंखों में आंसू आ गए। दरबार के सब लोग रोने लगे। खलीफा ने कहा, "अबुल हसन मेरे भाई, मुझे भी तुम्हारी बीवी की मौत का बहुत गम है। लेकिन खुदा की मर्जी में कौन दखल दे सकता है? सच्ची बात यह है कि शैरी जैसी औरत और कहां मिल सकती है। लेकिन मैं तुमसे यही कहूंगा कि अब सब्र करो और इस वक्त उसके कफ़न दफन का इंतजाम करो।"
उसके बाद खलीफा ने वजीर जाफर से कहा कि खजांची से कहकर फौरन 100 अशरफियां दे दो ताकि शेरी के दफन करने का इंतजाम हो सके।
अब अबुल हसन यह 100 अशरफियां लेकर अपने घर में दाखिल हुआ और उसने कहकहे लगाते हुए शेरी को उठाया और कहा, "देखो तुम ही मल्लिका से अशरफिया की थैली लेकर नहीं आई। मैं भी खलीफा से अशरफियान लेकर आया हूं।" वह दोनों बेहद खुश हुए।
उधर खलीफा जल्दी से दरबार का काम खत्म करके मलिका जुबैदा के महल में गए। वहां क्या देखते हैं कि जुबैदा मसरी पर पड़ी हुई है और बेहद गमगीन है। खलीफा ने कहा, "मेरी प्यारी मलिका, उदास मत हो। खुदा की मर्जी में कौन दखल दे सकता है? मैं जानता हूं कि शेरी की मौत का सदमा तुमको बहुत होगा। लेकिन अब क्या किया जाए? सब्र करो। मैं जानता हूं कि तुम शेरी से कितनी मोहब्बत करती थी।"
मलिका ने कहा, "जहां पनाह, आप गलत समझे। मेरी कनी शेरी खैरियत से है। मौत तो अबुल हसन की हुई है। हाय बेचारा अबुल हसन कितना अच्छा आदमी था। खुदा उसको जन्नत में जगा दे।"
खलीफा ने कहा, "अबुल हसन की मौत का गम मत करो। अबुल हसन तो अच्छी तरह है। मौत तो शेरी की हुई है। अबुल हसन ने अभी खुद आकर मुझे इत्तला दी है ताकि वह शेरी को दफन करने का इंतजाम करें। मुझे भी शेरी की मौत का बेहद अफसोस है। वो तुमसे कितनी मोहब्बत करती थी।"
मलिका जुबैदा ने कहा, "जहां पनाह, वैसे तो आपकी आदत है कि अक्सर मजाक करते हैं लेकिन यह वक मजाक का नहीं है। यह मेरी कनीज नहीं मरी बल्कि अबुल हसन की मौत हुई है। आप खुद सोचिए कि आपका अपना आदमी अबुल हसन मर गया है और आप गलती से शेरी को मुर्दा समझ रहे हैं।"
अब खलीफा को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने नाराज होकर कहा, "जुबैदा, तुमको मेरी बात का यकीन क्यों नहीं आता? अबुल हसन जिंदा है और बिल्कुल ठीक है। वह खुद मेरे पास अपनी बीवी की मौत की इत्तला देकर गया है।"
जुबैदा ने कहा, "यह बिल्कुल गलत है। मैं हरगिज़ नहीं मान सकती। अभी एक घंटा पहले शरी मेरे पास आई थी रोती पीटती हुई। मैंने खुद उसे 100 अशरफिया दी हैं। मुझे बिल्कुल यकगीन है कि अबुल हसन मरा है। आप या तो गलत समझ रहे हैं या फिर मुझसे मजाक कर रहे हैं।"
अब तो खलीफा का गुस्सा और बढ़ गया। उसने अपने खास गुलाम को आवाज दी और कहा, "जाओ अबुल हसन के घर और यह देखकर आओ कि कौन मरा है और फौरन यहां आकर इत्तला दो।"
जब वह गुलाम चला गया तो खलीफा ने कहा, "जुबैदा, अभी तुमको मालूम हो जाएगा कि कौन सच्चा है और कौन झूठा।" जुबैदा ने कहा, "मुझे पहले से यकीन है कि शेरी जिंदा है और अबुल हसन मर गया है। इसलिए कि मैंने शेरी को अपनी आंख से देखा है।"
खलीफा के हुक्म के मुताबिक गुलाम अबुल हसन के यहां गया। अबुल हसन अपने मकान की खिड़की से देख रहा था। उसे यकीन था कि खलीफा और मलिका में बहस होगी और वह जरूर किसी ना किसी को सच्ची बात मालूम करने के लिए भेजेंगे। इसलिए जैसे ही अबुल हसन ने गुलाम को अपने घर की तरफ आते हुए देखा वह समझ गया कि खलीफा ने इस गुलाम को भेजा है। उसने शेरी से कहा, "शेरी, तुम जल्दी से चुपचाप कफ़न में मुंह छुपा कर पड़ जाओ।" शेरी उसी तरह लेट गई।
जरा सी देर में गुलाम भी आ गया। उसने कहा, "अबुल हसन, एक अजीब बात है। मल्लिका जुबैदा कहती है कि तुम मर गए हो। तुम्हारी बीवी जिंदा है। खलीफा ने मुझे सही बात मालूम करने के लिए भेजा है।"
अबुल हसन ने कहा, "तुम खुद अपनी आंख से देख लो कि मैं कितनी मुसीबत में मुब्तला हूं। मल्लिका भी सच कहती है कि शेरी के बगैर मैं मुर्दे से भी ज्यादा मुर्दा हूं। और शेरी इतनी अच्छी औरत थी कि मर जाने के बाद भी उसका नाम महल में जिंदा रहेगा।"
वह गुलाम शेरी का मुंह कफन में ढका हुआ देखकर चला गया और खलीफा से बोला, "जहां पनाह, अबुल हसन तो खैरियत से है लेकिन उसकी बीवी जरूर मर गई है मैं उसकी लाश कफन में लपेटी हुई देखकर आया हूं लेकिन बीवी की मौत का असर अबुल हसन पर भी बहुत है और वह बहुत परेशान है।"
मलिका ने कहा, "मैंने थोड़ी देर पहले खुद अपनी आंख से शेरी को देखा है। मैं कैसे मान लूं कि वह मर गई है। तुम्हारा गुलाम झूठ है। मैं इसकी बात नहीं मान सकती।" यह कहकर उसने अपनी एक कनीज को बुलाया और उसे हुक्म दिया कि जाओ जाकर देख कर आओ कि कौन मरा है। "यह कमबख्त गुलाम झूठ बोलकर खलीफा को खुश करने की कोशिश कर रहा है कि वह सच्चे हैं और मैं झूठ ही हूं।"
कनीज ने कहा, "हमने तो खुद थोड़ी देर पहले शेरी को आपके पास रोते पीटते देखा था। वह इतनी जल्दी कैसे मर सकती है? मौत तो अबुल हसन की हुई है।" जुबैदा ने कहा, "मैं क्या करूं? खलीफा को यकीन नहीं आता इसलिए तो मैं तुमको भेजती हूं। तुम देख कर आओ और सही बात पता कर कर आओ।"
फिर जुबैदा ने खलीफा से कहा, "अगर आप इजाजत दें तो मैं भी अपनी कनीज को भेजकर मालूम कर लूं। आपका गुलाम तो झूठा है।" खलीफा ने कहा, "तुम मेरी बात क्यों मानने लगी? उन्होंने कनीज को हुक्म दिया कि जाओ तुम भी देख कर आओ।"
इधर अबुल हसन और शेरी खिड़की में बैठे हुए देख रहे थे। वह समझ गए कि जुबैदा हरगिज़ गुलाम की बात नहीं मानेगी और वह अपनी किसी कनीज को भेजेंगी। इतने में उनकी नजर उस कनीज पर पड़ी जो हाल मालूम करने के लिए आ रही थी। अबुल हसन तेजी से गया और मुर्दे की तरह कफन में जाकर पड़ गया।
जब कनीज दाखिल हुई तो उसने देखा कि शेरी के कपड़े फटे हुए हैं। बाल खुले हुए हैं और बुरी तरह बिलक-बिलख कर रो रही है। अबुल हसन की लाश कफन में लिपटी पड़ी है। शेरी को इस हाल में देखकर उसे बड़ा दुख हुआ। उसने शेरी के सर पर हाथ फेरा और उसे तसल्ली दी और काफी देर तक उसके पास बैठी रही। फिर चलते हुए बोली, "बहन, अब मैं चलती हूं क्योंकि खलीफा और मलिका में बड़ा झगड़ा हो रहा है। मलिका कहती है कि अबुल हसन मरा है और खलीफा कहते हैं कि शेरी की मौत हुई है। अब मैं मलिका को इत्मीनान दिलाती हूं कि आपकी शेरी जिंदा है।"
कनीज ने आकर सारा हाल मलिका को सुनाया। अब तो खलीफा को भी फिक्र हुई कि आखिर यह क्या बात है। खलीफा ने कहा, "हम सब झूठे हैं। अब बेहतर यही है कि हम सब अबुल हसन के घर चले और खुद अपनी आंख से देखें कि क्या कस्सा है।"
जरा सी देर में खलीफा और मलिका गुलामों और कनीजों के साथ अबुल हसन के घर गए। अबुल हसन और शेरी ने दूर से उन्हें आते देखा तो वह परेशान हो गए। शेरी ने कहा, "अब बताओ क्या करोगे?" अबुल हसन ने कहा, "आओ अब हम तुम दोनों इस कफन में लेट जाइए।" चुनांचे खलीफा के आने से पहले दोनों चुपचाप कफन में पड़ गए।
जब खलीफा और जुबैदा आए तो वह देखकर घबरा गए। "अरे, यह तो दोनों मरे पड़े हैं।" जुबैदा ने बड़े दुख के साथ कहा, "अफसोस कि तुम अपने शौहर की मौत की ताब ना ला सकी।" खलीफा ने कहा, "जुबैदा, तुम गलत समझ रही हो। गम से शेरी की मौत नहीं हुई। शैरी तो पहले ही मर चुकी थी। बेचारा अबुल हसन अपनी बीवी के गम में मर गया।"
अब फिर दोनों में बहस शुरू हो गई। आखिर एक मर्तबा मलिका ने कहा, "अब हसन की कनीज कहां है? उन्हें ठीक बात मालूम होगी। उन्होंने ही दूसरे की लाश पर कफ़न डाला होगा।" खलीफा ने कहा, "कहां है वह सब की सब? जो कोई इस भेद को खोलेगा, मैं उसे 1000 अशरफिया दूंगा।"
जैसे ही खलीफा ने यह बात कही, अबुल हसन कफ़न फेंक कर उठ खड़ा हुआ और बोला, "मेरे प्यारे खलीफा, आप सही कहते हैं कि मैं बाद में मरा। शेरी की मौत के गम में आप 1000 अशरफियां मुझे दें।" मलिका जुबैदा और उसकी कनीज़ें डर के मारे इधर-उधर भागने लगीं। लेकिन खलीफा सब कुछ समझ गए कि अबुल हसन ने उनसे मजाका किया है और खलीफा से पुराने मजाक का बदला लिया है।
अब शेरी उठी और दौड़ती हुई मलिका जुबैदा के कदमों पर गिर पड़ी और कहने लगी, "मेरी प्यारी मल्लिका, इनाम मुझे दिलवाइए। मैंने मुझे मार डाला। मैं बाद में मरी।" यह सुनकर मलिका को भी हंसी आ गई और वह भी बात समझ गई।
उसके बाद अबुल हसन ने सारा वाकया सुनाया जिसको सुनकर खलीफा को सच्ची बात मालूम हो गई। अब फिर खलीफा को बड़े जोर की हंसी आई और वह बोले, "अबुल हसन, तुम मुझे हंसाते हंसाते मार डालोगे।"
उसके बाद खलीफा ने शेरी और अबुल हसन को एक हजार अशरफियाओं दी और हुक्म दिया कि आइंदा से अबुल हसन को हर महीने 1000 अशरफियां तनख्वाह के तौर पर दी जाए ताकि फिर इनको मरने की जरूरत ना पड़े। खलीफा और मलिका को ऐसा महसूस हुआ कि जैसे अबुल हसन और शेरी को दोबारा जिंदगी मिल गई है और वह बेहद खुश हुए कि मोहब्बत भी बढ़ गई। फिर तो अबुल हसन और शेरी दोनों मजे में हंसीखुशी जिंदगी गुजारने लगे।
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