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के बदले जफा कर रहे हैं। मैं क्या कर रहा हूँ? वो क्या कर रहे हैं? क्या खा रहे हो? मिठाई खा रहा हूँ। खाओ, शौक से खाओ। तुम्हारा रिश्ता जो ढूँढा जा रहा है, मेरी शादी हो रही है। हाँ, तुम्हारा रिश्ता पक्का हो गया, और तुमने मुझे बताया भी नहीं। बस बहुत हो गया। जब मोहब्बत का जवाब मोहब्बत से दे नहीं सकती हूँ, बस अब या तुम मेरे हो जाओ या फिर मुझे किसी और का होश आने दो। देखो, तुम भी देखो। ये कबीर है ना? लड़की कौन थी इसके साथ? तुम क्या करना चाह रही हो? किस हक से मेरे बेटे के साथ गई थी? फँसाना चाहती हो इसे? मैं लेकर गया था इसे शॉपिंग कराने। कबीर, तुम कुछ नहीं जानती। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि मैं कुछ भी करना चाहूँ तो मुझे यहाँ कोई रोक नहीं सकता। देख रही हूँ कैसे अपनी माँ के आगे खड़ा हो गया। तुम्हारे लिए मुझे, मुझे कबीर को उस लड़की के साथ देखकर बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा। ये बेचैनी क्यों नहीं जा रही? बेचैनी नहीं है, मोहब्बत की तड़प है जो तुम्हें कभी भी सुकून नहीं देगी। कबीर के सिवा ना तुम्हें कोई दिखाई देगा, ना कुछ सुनाई देगा, ना कुछ समझ आएगा। इतने दिन की बातों से क्यों नहीं बता देती? जो होगा वो देखा जाएगा।
उसे 100 दफ़ा पुकारा है दिल ने, मगर मेरे दिल की बात वो सुन ना सका। जो आँखों में थे मेरे आँसुओं की तरह बिखरी वो ख्वाहिशें चुन ना सका। अकेले चलते चलते हो साये जैसे ढलते रहे। क्यों ये फ़ासले सदा दिल में आ गए? वो मिला क्यों था अगर उससे बिछड़ना था? मुक़द्दर दिल का था शायद मुझे आख़िर बिखरना था। तमन्ना क्यों थी जीने की अगर वो ही मेरा ना था? कोई ऐसा दर्द देने निकल जाए, निकल जाए। तुझे चाहना, मोहब्बत से मिलना, तुझे अभी मुझ में वो लगन बाकी तो है। ये बेइंतिहा तेरे बिन सो लगना मेरा, मेरी साँसों में अगर बाकी तो है। हो जो तेरी रात जागे मेरी रहे, मिल के प्यार के ज़ आसमान हो। वो मिला क्यों था अगर उससे बिछड़ना था? मुक़द्दर दिल का था शायद मुझे आख़िर बिखरना था। तमन्ना क्यों थी जीने की अगर वो ही मेरा ना था? कोई ऐसा दर्द दे निकल जाए, निकल जाए। जिऊँ मैं जरा मुझे दे तू दिल में जगा, मिले मुझको धूप में साया तेरा। तेरे बिन नहीं सुकूँ जिंदगी में, कहीं भीगू जरा है दिल बंजर मेरा, अंधेरे मेरे गहने सितारों से पहले, मेरे गम की रात में हो तू कह कशा हो। वो मिला क्यों था अगर उससे बिछड़ना था? मुक़द्दर दिल का था शायद मुझे आख़िर बिखरना था। तमन्ना क्यों थी जीने की अगर वो ही मेरा ना था? कोई ऐसा दर्द दे निकल जाए, जान निकल जाए।
जान यूँ तो उनसे और मिलना होता हमारा, और क्या और क्या होता? क्या हुआ? ये बातें बहुत अच्छी लगीं। कुछ दिनों की ये मुलाक़ातें बहुत अच्छी लगीं। उससे जो कुछ हो सकी बातें बहुत अच्छी लगीं। तारा तारा ता तारा तारा तारा। मैं समंदर के किनारे पर था और हवा बहुत ठंडी थी। वो हवा थी या मेरी मोहब्बत का कोई गुज़रता पहर था? जो मुझे नापसंद था, इस बात का जवाब तो मुझे मिला नहीं। क्योंकि कुछ दिनों की ये मुलाक़ातें बहुत अच्छी लगीं। उससे जो कुछ हो सकी बातें बहुत अच्छी लगीं। हाल दिल उसको सुनाना हौसले की बात थी। हौसले की ये करामत बहुत अच्छी लगी। दिल में था कि सब कह दूँ, मगर जो दिल में था दिल में रह गया। बाद मुद्दत उसकी दावत पर जो उसके घर गया, फिर उसी घर में मदार रातें बहुत अच्छी लगीं। इतना सब कुछ दिल में रह गया कि अब दिल की सुनूँ तो सिर्फ़ मेरी आवाज़ें गूंजती हैं। वो जा रही थी और हाले दिल आँखों से बह रहा था। हाले दिल का एक लम्हा मेरी आँखों से होता हुआ मेरे जूते पर जा गिरा। वो जूता आज भी मैं पहनने की हिम्मत नहीं करता। कुछ दिनों की ये मुलाक़ातें बहुत अच्छी लगीं। उससे जो कुछ हो सकी बातें बहुत अच्छी लगीं। त ता तारा तारा।