📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

हरिदासवर्य श्रीगोवर्धन की महिमा-भाग १|Glories of Haridāsa varya Śrī Govardhana Part1|Venu Gīta Day20

Amarendra Dāsa Official1:09:56

Transcription

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानञ्जनशलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

नमो विष्णुपदाय कृष्णप्रेष्ठाय भूतले।

श्रीमते भक्तिवेदान्त-स्वामिन् इति नामिने॥

नमस्ते सरस्वति देवि गौरवाणि प्रचारिणे।

निर्विशेष-शून्यवाद-पाश्चात्य-देश-तारिणे॥

जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द।

श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्त वृन्द॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

सभी भक्तों के चरणों में मेरा सादर दंडवत प्रणाम। आप सभी के आशीर्वाद, कृपा प्रसाद से दैनिक तौर पर ग्रंथराज श्रीमद् भागवत के अंग्रेजी और हिंदी सत्र का एक दैनिक आस्वादन हो पा रहा है। यह सब हमारे निज कोई योग्यता या बल से नहीं, सभी गुरुजनों के, वैष्णवों के, संतों के, श्री चैतन्य महाप्रभु के, श्री राधा श्याम सुंदर की ही कृपा से हो पा रहा है। तो आप ऐसे अपनी कृपा बनाए रखें ताकि प्रभु कंठ को, वाणी को, जीभ को, शब्दों को निमित्त बनाकर अपने ही भागवत के इस बड़े सुंदर श्लोकों का विस्तार करने का प्रयास कर पाए। हरे कृष्णा।

तो जैसे हमने कल कहा कि क्रमानुसार सातवें श्लोक के बाद आठवां श्लोक और आठवें श्लोक के बाद नौवें श्लोक का रसपान होना चाहिए। रसास्वादन होना चाहिए। परंतु क्योंकि कल श्री गिरिराज गोवर्धन धारण पूजा की लीला है और यह एक वार्षिक तौर पर कार्तिक के महीने में गिरिराज की सेवा होती है। अन्नकूट का महोत्सव होता है। वृंदावन में और पूरे विश्व में जहां श्री गिरिराज गोवर्धन विराजमान हैं। यह बहुत बड़ा उत्सव है। तो इसी उपलक्ष से, इसी पर्वानुसार हम क्रम को थोड़ा भंग करके नौवें श्लोक के बजाय 18वें श्लोक का रसास्वादन करने का प्रयास करेंगे। क्योंकि इसी वेणु गीत के 18वें श्लोक में श्री हरिदास वर्य गिरिराज गोवर्धन की अपार महिमा श्री सुखदेव गोस्वामी एक श्लोक के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

हतायं अद्रबला हरिदास वरियो यद राम कृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद मानम तनोति सहगो गणयोस्तयो यत पानीय सूय वस कंदर कंद मूले।

गोपियां इस अध्याय में श्री गिरिराज गोवर्धन की महिमा गाती हैं और कहती हैं कि अबला, अबला माने हे सखियां, हे सखी, हे गोपियों। यह अयम अद्रही संस्कृत में अयम तब कहा जाता है जब कोई निकटवर्ती हो, कोई पास हो, किसी के सानिध्य में होकर यदि उंगली करके ऐसे कहा जाए, एक वस्तु को संकेत या इंगित करके कहा जाए तब अयम शब्द का प्रयोग हुआ। तो यह एक सर्वनाम है, पुरुष जातीय सर्वनाम है, पुरुषोत्तम लिंग अथवा पुल्लिंग जिसे कहते हैं। तो अयम अद्रही, हे गोपियों, यह अद्री जो है, अद्री का अर्थ है पर्वत। यह पर्वत जो है, हंत, हंत शब्द की जो व्याख्या है, थोड़े क्षण में करेंगे। तो हंत, अयम अद्रही, यह अद्री जो है, अबला संबोधन में हे गोपियों, यह अद्री, ये पर्वत जो हैं, ऐसे इंगित करके कहते हैं, संकेत करके कहते हैं, यह हमारे पास में जो उपस्थित विराजमान, यह जो पर्वत है, जो शिखर हैं, यह हरिदास वरी है। हरिदास दासों में इनका सर्वश्रेष्ठ नाम है। कई प्रकार के हरिदास हैं। भक्त जो हैं, कई प्रह्लाद महाराज भी भक्त हैं। भक्त शिरोमणि हैं। ध्रुव महाराज भी भक्त शिरोमणि हैं। अंबरीश महाराज भी भक्त शिरोमणि हैं। युधिष्ठिर महाराज जो पांडव हैं, यह भी भक्त शिरोमणि हैं। वैसे देखा जाए तो फिर गजेंद्र, हनुमान जी, गरुड़, जटायु, सबकी नाम इसी गिनती में आ सकती है। यहां गोपियों के मनोभाव अनुसार कहते हैं कि यदि एक बात बनाई जाए कि यह भक्त के बाद यह भक्त, यह भक्त के स्थान के बाद यह भक्त का स्थान, ऐसी एक बड़ी सुंदर अगर संकलन की जाए तो सर्वोच्च अव्वल नंबर पर हरिदासों में वर्य, वर्य माने वर, सर्वश्रेष्ठ। नटवर जैसे कहते हैं, नटवर वपु, वहां वर का अर्थ हुआ श्रेष्ठ। तो हरिदासों में जिनका सर्वश्रेष्ठ स्थान है, यह अयम अद्री, यह इन पर्वत रूपी श्री गिरिराज गोवर्धन का है।

यह किनके मुख से उदित है? यह श्लोक गोवर्धनो जयति शैल कुलाधिराजो यद गोपिका उदितो हरिदास वरियो। ऐसे श्री सनातन गोस्वामी पाद ने श्री बहद भागवतामृत नामक ग्रंथ में लिखा कि गोवर्धनो जयति शैल कुलाधिराजो। कि शैल कहते हैं पर्वत को, कुल कहते हैं परिवार को और राज कहते हैं राजा। शैल कुल आधिराजो, अधिराज सभी पर्वतों में, सभी शिखरों में, उनके कुल में यदि मुकुट मणि रूपी अधिराज हो, राजा हो, महाराज हो। गोवर्धनो जयति शैल कुलधिराजो। श्री सनातन गोस्वामी पाद कहते हैं श्री गिरिराज गोवर्धन को सभी पर्वत के कुटुंब में, परिवार में अधिराज अथवा राजा के रूप में, नृत्य के रूप में, सर्वश्रेष्ठ के रूप में यह घोषित किया गया। जयति, उनकी जय हो, उनकी जय हो। किनके मुख से यह उदित हुआ? यद गोपिका भी उदितो हरिदास वरियो। गोपियों के मुख से यह बात निकली। ऐसे सनातन गोस्वामी जी कहते हैं।

अब यह तो बात भागवत के सिद्धांत से भी स्पष्ट है। यह पूरा अध्याय गोपियों के द्वारा ही, उन्हीं का प्रेम उद्गार है। तो यह गोपिका भी उदितो हरिदास वरियो। यह तो सिद्ध है कि ब्रजांगनाय जिनको सर्वश्रेष्ठ प्रेम ध्वजा मानी जाए। इन्हीं के मुख से घोषित किया गया कि श्री गिरिराज गोवर्धन सभी भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। परंतु श्री रघुनाथ दास गोस्वामी ने इसमें और एक बात जोड़ी। वह यह कहते हैं कि जिस प्रकार चंद्र से चंद्र रस, सोम रस निश्रित होता है या पाया जाता है, उसी प्रकार रघुनाथ दास गोस्वामी पाद कहते हैं श्री राधा रानी के मुख चंद्र से अमृत सोमरस के रूप में यह हरिदास वर्गीय, यह शब्द, यह नामकरण निश्रित हुआ, उदित हुआ, आविर्भूत हुआ। कहते हैं कि श्री गिरिराज गोवर्धन वृंदावन के लिए तिलक हैं। ऐसे रघुनाथ दास गोस्वामी कहते हैं। वृंदावन यदि एक शरीर धारी हो तो गिरिराज गोवर्धन तिलक हैं। यदि एक व्यक्ति का दर्शन करें, तिलक हो या ना हो, यह पहली चीज भक्त देखता है। किन्ही के मस्तक पर, किसी के ललाट पर यदि तिलक हो, ऊर्ध्व पुंड्र तिलक हो, यहां तुलसी हो, तो यह नहीं देखा जाता कि कौन से देश का है, कौन से जाति का है, क्या उसका पृष्ठभूमि, क्या है उसकी भूत में उसने कौन से पाप अर्जन किए, यह कोई कुछ नहीं देखा जाता। कंठ में यदि कंठी हो और माथे पर यदि तिलक हो, तो व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है। और यही किसी के यदि कंठ पर तिलक, कंठी ना हो और माथे पर यदि तिलक ना हो, तो तत्क्षण भक्त कहते हैं, प्रभु तिलक नहीं है, मैं लाया हूं तिलक, आप तिलक लगाना चाहेंगे, कंठी लगाना चाहेंगे, आप तिलक लगाना चाहेंगे। कोई भक्त कहेगा, अरे अरे, कंठी तो मैं पहना था, शायद कहीं टूट गई होगी, तिलक तो मैं धारण किया था, कहीं पसीने के कारण, गर्मी के कारण कहीं निकल गई होगी, पिघल गई होगी। हां प्रभु जी, आप दे दीजिए तिलक, दे दीजिए। तो तिलक एक वैष्णवता का एक प्रमुख लक्षण है, प्रमुख चिन्ह। शास्त्र में तो इतना वर्णन आया कि तिलक धारण करने पर भगवान विष्णु की एक मूर्ति नहीं, परंतु एक विग्रह, मंदिर, देवगृह, एक घर बांधने के जैसे, जैसे भगवान के लिए घर बांधना माने मंदिर स्थापना करना, जितना पुण्य एक विष्णु मंदिर स्थापना करने में है, उतना ही पुण्यजन हो जाता है एक तिलक के धारण करने से। और व्यक्ति यदि दिन में एक दो बार तिलक धारण करे, तो दिन के दो-दो विष्णु मंदिर बनाने की, निर्मित करने की उनको पुण्यार्जन हो जाता है। ऐसे शास्त्र में वर्णन आया। श्री हरि भक्ति विलास नामक ग्रंथ में भी तिलक की विशेष महिमा है। गोपी चंदन की विशेष रज की, तिलक की, गोपी चंदन की तिलक की विशेष महिमा है। श्री चैतन्य महाप्रभु भी जब श्री राधा कुंड गए थे, तो कुंड से उन्होंने तिलक धारण किया। ऐसे वर्णन आया।

कहने का तात्पर्य यह है, श्री गिरिराज गोवर्धन वृंदावन के तिलक हैं और कहा जाता है, उपमा दी जा रही है। जैसे वृंदावन शरीर है तो गिरिराज गोवर्धन तिलक हैं। जैसे तिलक को देखने पर व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है, तो गिरिराज का दर्शन करने पर व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है, खिल जाता है। उसी प्रकार उपमा यदि चंद्र और सोमरस की दी जाए, तो श्री राधा रानी के राधिका वक्र चंद्रात करके श्री रघुनाथ दास गोस्वामी ने वर्णन किया कि श्री राधा रानी का मुख मंडल जो है, यह चंद्र है और चंद्र से जैसे सोमरस निकलता है, वैसे इस मुख चंद्र से सोमरस रूपी नामकरण हरिदास वर्य, यह शब्द निकला। कहने का तात्पर्य यह है कि यह श्लोक हंताय अध रबला हरिदास वरियो यद राम कृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद, यह श्लोक श्री राधा रानी के मुख चंद्र से ही मिश्रित सोमरस रूपी नामकरण हुआ। कृष्ण का नामकरण तो गर्गाचार्य जी ने किया। गिरिराज का नामकरण तो श्री राधा रानी ने किया। कितनी बड़ी बात है। इसलिए शायद इसी कारण की वजह से ठाकुर ने गिरिराज को ऊपर धारण कर दिए। बोले आप इतने महान हो कि हमारा नामकरण तो गर्गाचार्य ने किया, पर आपका नामकरण तो श्री राधा रानी ने किया, तो आपका स्थान तो हमारे से ऊपर है। ऐसे मानो रसिकों का भाव है।

हंतायम अध रबला हरिदास वरियो। यहां हंत का अर्थ क्या हुआ? हंत का अर्थ है हाय हाय, कैसा दुख है। हे गोपियों, हे अबला, परस्पर श्री राधा रानी कह रही हैं, कैसा दुख है कि हमारे जीवन में वह सौभाग्य नहीं जो इन पर्वत रूपी श्री हरिदास वर्य गोवर्धन के जीवन में है। हंत का अर्थ दुख है, क्लेश है। हाय हाय, हमारा जीवन तो हम तो हतभागिनी निकली। हमारे जीवन में सौभाग्य रूपी अर्क अथवा सूर्य का उदय नहीं हुआ। परंतु यह पर्वत रूपी, अधिराज रूपी, अध्री रूपी, हरिदास वर्य गिरिराज गोवर्धन, यह सौभाग्यशाली हैं। हाय, हमारा जीवन, वो कैसे परिवर्तित हो, वो हाय, वो दिन कब आए कि हम गोपी देह को भले त्यागे, हम पत्थर देह बन जाएं, पर यह सौभाग्य हमें प्राप्त हो। कौन सा सौभाग्य? यद राम कृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद। गिरिराज गोवर्धन की ऐसी महिमा है कि भगवान अपने चरण से गिरिराज गोवर्धन को स्पर्श करते हैं। कोई पादुका नहीं। प्रभु अपने नंगे पांव से, अपने अत्यंत सुकोमल, चिन्ह युक्त चरणों से, अच्छे विकसित पुष्प रूपी चरण हैं। अभी प्रभु क्योंकि नवयुवक हो गए। उस कथा में, अंग्रेजी कथा में प्रभु कहीं रेंगते हैं, कहीं चलते हैं और यहां वेणुगीत की कथा में प्रभु नवयवनम च, नवयुवक हैं। तो प्रभु अपने चरणों से गिरिराज गोवर्धन के केवल सिर पर नहीं, कहीं माथे पर नहीं, पूरे शरीर को अपने चरण के चिन्ह से अंकित करते हैं। ऐसा कोई भक्त नहीं जिसको इतना सौभाग्य हो। कोई कहेगा, कर तर्क वितर्क करके, बलि महाराज भी तो सौभाग्यशाली थे। उनके सिर पर भी कहीं वामन देव ने चरण अंकित किया था, पर एक बार किया। वह भी वामन देव ने किया, ब्रज के कृष्ण चंद्र ने, राधा रमण ने एक बार किया होता तो हम मानते। यह तो दिन प्रतिदिन हजारों बार प्रभु चरण रखते हैं। प्रत्येक शीला पर एक-एक दो-दो चरण चिन्ह। आप देखिए कहीं वृंदावन में, हर दिशा में एक न एक चरण पहाड़ी तो आपको प्राप्त है। कहीं नंदग्राम में भी चरण पहाड़ी है। कहीं वृंदावन के मंदिरों में भी कहीं चरण पहाड़ी है। आप राधा दामोदर में देख लीजिए। गिरिराज की इतनी बड़ी शीला है, भव्य शीला है। जब श्री सनातन गोस्वामी पाद को ठाकुर स्वयं श्याम सुंदर स्वयं भेंट स्वरूप में दिए। सनातन गोस्वामी प्रतिदिन गिरिराज की परिक्रमा लगाते थे। वृद्धा अवस्था में भी और ठाकुर श्याम सुंदर कहने लगे, आप ऐसे ना करो, हमारे हृदय में पीड़ा होती है। आप इतने वयोवृद्ध हैं और आप इतने बुढ़ापे में चलते हैं, परिक्रमा प्रदक्षिणा करते हैं। हमारे हृदय को ठेस पहुंचती है। आप ऐसे ना करो। सनातन गोस्वामी जी कहे, आप हमारे और हमारे आपके चरणों के प्रति प्रेम जो है, इसके बीच में ना आए। आपको अधिकार नहीं। हे कृष्ण, हमारे और हमारे आपके चरणों के प्रति जो प्रेम है, इसके बीच में आप ना आया करें। आपका कोई अधिकार नहीं। ऐसे कहकर तो ठाकुर जी भी पराजित हो गए। उन्होंने गिरिराज के शीला पर अपने चरण अंकित किए और उसी शीला को सनातन गोस्वामी को दे दिए। कहे कि यही गिरिराज है। अब आगे से आप इन्हीं की परिक्रमा कीजिए। तो वह शीला, प्रभु के चरण अंकित गिरिराज गोवर्धन की शीला, आज भी राधा दामोदर मंदिर में पाई गई। मैं आशा करता हूं कि सबने दर्शन किया होगा। जहां ठाकुर जी की लकुटी का भी निशान है, कहीं चरण चिन्ह का भी निशान है, कहीं गाय के खुर के भी निशान है। और इस प्रकार बड़े सुंदर चिन्ह अंकित हैं गिरिराज के शीला में। बड़ी सुंदर।

तो गिरिराज को वह सौभाग्य है जो बलि महाराज को है, जो अहल्या को है, जो कालिया को है। कोई कहेगा कि रामचंद्र ने अहिल्या को पत्थर स्वरूप में एक बार चरण से, चरण धोली से स्पर्श कर दी, तो अहिल्या का सौभाग्य। कहीं बलि महाराज का सौभाग्य। कहीं नाग पत्नियों की प्रार्थना से और यमुना के जल रस में वास करने का जो सौभाग्य कालियों को मिला, मिला और फिर प्रत्येक फण पर प्रभु ने जो चरण अंकित किया, यह सब सौभाग्य हजारों, लाखों, करोड़ों बार यदि इसकी गणना की जाए तो गिरिराज की एक शीला के पास भी नहीं। क्योंकि गिरिराज प्रतिदिन ऐसे नहीं कि जीवन ने, उनके जीवन काल में, कालिया के जीवन काल में एक बार, बलि महाराज के जीवन काल में एक बार, अहिल्या के जीवन काल में एक बार, प्रभु के चरण धोली स्पर्श हुई। परंतु गिरिराज गोवर्धन की ऐसी महिमा कि प्रत्येक दिन, प्रत्येक शीला, प्रभु 12-1 घंटे, ऐसे नहीं कि रोज आए और एक बार चरण रख के चले गए। ना, खेलते हैं ठाकुर गिरिराज पर। तो खेलते हैं लुका-छुपी की खेल होती है। कहीं आंख मिचौली की लीला होती है। बड़ी सुंदर-सुंदर रसमई लीला, सख्य लीला भी होती है। कहीं माधुरी लीलाएं भी होती हैं। गिरिराज बड़े रसिक वैष्णव हैं। जो अपने प्रत्येक शीला, प्रत्येक कंदर, प्रत्येक गुफा, प्रत्येक कुंड, प्रत्येक सरोवर, प्रत्येक वन में, प्रत्येक वृक्ष के फूल, फल, पत्तों से, कहीं झरनों से ठाकुर की सेवा करते हैं। और प्रत्येक दिन 12 घंटे प्रभु वहां छलांग लगाते हैं, कहीं नृत्य करते हैं, दौड़ते हैं, गाते हैं और सूर्योदय पर आते हैं। गिरिराज को चरण अंकित करते हैं और सूर्यास्त तक वही विहार विचरण करते हैं। ऐसे प्रत्येक दिन वृंदावन प्रभु थे, तो प्रत्येक दिन गिरिराज का दर्शन। और केवल प्रभु नहीं, यद राम कृष्ण चरण स्पर्श प्रमोद। दूसरे पंक्ति में आया, राम के साथ कृष्ण आते थे। राम का अर्थ है बलराम जी। कालिया के जीवन में देख लीजिए, बलराम। बलि महाराज के जीवन में देख लीजिए, अहिल्या के जीवन में देख लीजिए, यह वर्णन नहीं आया कि लक्ष्मण जी ने चरण रख दिया कहीं। या तो आप बलराम जी ने कालिया के फणों पर नृत्य किया। परंतु यहां ठाकुर जी तो पूरी टोली को ले आए गिरिराज गोवर्धन पर। राम आए, कृष्ण आए और केवल राम और कृष्ण नहीं। तीसरे पंक्ति में आता है मानम तनोति सः। साथ आए कौन-कौन? गो गणयोस्तयो। तत कि गो भी, गौ माता को ले आते हैं गिरिराज। क्योंकि गौ माता भी प्रसन्न है। गिरिराज गोवर्धन के शरीर के जो रुमावली, बाल हैं, यह कह सकते हैं कि चिन्मय शरीर में जो रोमावली है, यही इस जगत के बड़े सुंदर, सुकोमल, स्वादिष्ट घास के रूप में उदित हुए। तो गिरिराज गोवर्धन के जो घास हैं, यह मानो उन्हीं के श्री अंग के रुमावली हैं। इतना अद्भुत। तो गाय भी आती हैं। कहीं बछड़े भी आते हैं और सब अपने चारों चरणों से गिरिराज के ऊपर। फिर बलराम जी हैं और फिर गणय, गण शब्द आया। गो गणयो तयोरत। तो गो गण का अर्थ है गो समूह अथवा गो अलग और गण का अर्थ है मित्र, सखागण। तो कहीं श्रीदामा भी हैं, सुदामा भी हैं, वसुदामा भी हैं, किंकणी भी हैं, स्टोक्स कृष्ण भी हैं, अर्जुन भी हैं, लवंग भी हैं, सब सखागण भी हैं और गौ गण भी हैं, बछड़े भी हैं, अन्य पशु भी हैं और ठाकुर जी भी हैं, बलदाऊ जी भी हैं। और यह प्रत्येक दिन की लीला है। और गिरिराज के श्री अंग, श्री विग्रह पर यही बस प्रभु अपने चरणों से पाद सेवनम, भक्त ठाकुर के करते हैं। उनके चरण छापते हैं। यहां ठाकुर आकर अपने चरण बस गिरिराज के प्रत्येक कंदर, प्रत्येक गुफा, प्रत्येक शीला पर अंकित करके अपनी चरण सेवा गिरिराज से करा लेते हैं। तो यद राम कृष्ण चरण, चरण स्पर्श प्रमोद, उस स्पर्श से प्रमोद, गिरिराज गोवर्धन प्रमोदित होते हैं, संतुष्ट होते हैं और मानम तनोति, मान देते हैं कृष्ण को। मान माने सम्मान करते हैं कृष्ण का। इसका सीधा अर्थ है, सेवा करते हैं। मानम तनोति सह गो गणयो तयोरत। कृष्ण की सेवा, बलराम की सेवा, गौ समूह की सेवा, ग्वाल सखागण की सेवा कैसे होती है? चौथी पंक्ति पर पानीय। पानीय का अर्थ है जलाशय। कहीं कुंड हो, राधा कुंड, श्याम कुंड, गोविंद कुंड, अप्सरा कुंड, नवल कुंड, इंद्रकुंड, सुरभ कुंड। गिरिराज गोवर्धन, आप कहीं परिक्रमा का सौभाग्य कभी देख लें, तो कितने कुंड? तो यह पानीय में सब बात उसी एक शब्द में आ गई। कुंड के साथ-साथ सरोवर भी हैं वृंदावन में। कहीं नदी भी हैं वृंदावन में। कहीं छोटे-छोटे पोखरे भी हैं वृंदावन में। जैसे नारद कुंड है। कहीं ग्वालपोखर है, ग्वालपोखरा। कहीं श्री सूरदास जी ने जहां भजन की, वो स्थली चंद्र सरोवर है। कहीं मानसी गंगा है। तो जलाशय की कोई कमी नहीं। कहीं संकर्षण कुंड, कहीं ऋणमोचन कुंड, कहीं ऐरावत कुंड। चलते-चलते दो-दो कदम पर कुंड है गिरिराज में। तो पानीय का अर्थ है, इतने पानी, जलाशय के स्रोत। कृष्ण, बलराम कहीं पानी पीने लगे, कहीं जल क्रीड़ा करने लगे, कहीं केवल मुख प्रक्षालन करें, कुछ पालिए, केवल मूध होने के लिए मुख प्रक्षालन करने के लिए एक कुंड। क्या सौभाग्य है, सभी कुंड के जल वहां जो मछली होंगी, वहां जो इथम शरद स्वच्छ जलम पद्माकर सुगंधिन, वहां के जो पद्माकर होंगे, सोचिए ठाकुर आके जल प्रक्षालन करके उन्हीं के अधरामृत, उन्हीं के उच्छिष्ट को प्रदान करें, तो क्यों ना खिले पूर्णतया यह कमल इस जगत के जल से यदि कमल खिल सकता है, तो अप्राकृत प्रभु के अधरामृत रस से क्यों ना खिले। तो कहा गया पानीय। कहीं झरने होते हैं गिरिराज गोवर्धन पर, वाटरफॉल। तो यह भी पानीय में आ गया। सूर्यवसा। सूर्यवस कहते हैं घास को। सूय वस, यह कहते हैं घास के लिए। कहीं पाठ्यंतर में श्री भागवत के कहीं पाठ भेद में सुय वस के बजाय भूय वस शब्द आया। भू, भूय वस, इसका अर्थ है कि कहीं भू देवी, भूवस, कहीं बैठने का स्थान, कहीं विचरण करने का स्थान। गिरिराज गोवर्धन तो भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्न सिंहासन भी अपने में धारण करते हैं। कहीं कृष्ण, बलराम आकर बैठे हैं। ऐसी लीलाएं हैं। बड़ी अद्भुत अद्भुत लीलाएं हैं। श्री जीव गोस्वामी पाद वर्णन करते हैं। कृष्ण और बलराम अपने सखागण के साथ कई बार राजा-प्रजा की लीला खेलते हैं। राजा-प्रजा की लीला। अच्छा, इस लीला में क्या होती है? वैसे तो बड़ी लीला है, बस एक संकेत देने के लिए एक क्षण में कुछ कह देते हैं। श्री जीव गोस्वामी पाद ने वर्णन किया, कहीं श्रीदामा राजा बन गए। वो एक राज्य सिंहासन पर ऐसे बैठ गए। एक रत्नवेदी हो गई। रत्न सिंहासन पर ऐसे श्रीदामा बैठ गए। फिर यहां चार सखा, वहां चार सखा, यह मंत्री बनकर बैठ गए। कहीं मंडलीभद्र बैठे हैं, कहीं तो कृष्ण बैठे हैं, कहीं उज्जवल बैठे हैं, कहीं अर्जुन बैठे हैं। यह मंत्री हो गए। श्री रामा यहां हैं और चार मंत्री हैं सखागण। और फिर आ गए कृष्ण, बलराम। कृष्ण, बलराम आते हैं। कहीं सुबल सखा आते हैं और यह नट बनकर आते हैं। नट बनकर आते हैं। नट माने डांसर। तो रंगे यथा नटवरो कचगा गाय मानव। यह श्लोक से भी यह लीला देखिए। तीन बात को मिला रहे हैं। एक तो गिरिराज गोवर्धन की महिमा जहां यह लीलाएं होती हैं। दूसरी श्री जीव गोस्वामी ने यह राजा-प्रजा की जो लीला लिखी। और तीसरी आठवें श्लोक, वेणु गीत में वर्णन आया कि मध्य बिरे चतुरलम पशुपाल गोठ्याम रंगे यथा नटवरों को चगाए। मानो यह तीनों बातों को मिलाकर यह बात कही जा रही है कि कहीं राज्य सभा, राज्य दरबार बनाई गई, सब गिरिराज गोवर्धन पर। कहीं गुफा है, कहीं कंदर हैं, कहीं रत्नवेदी है, सिंहासन। सिंहासन पर श्रीदामा बैठ गए और यहां से चार मंत्री रूपी सखा, यहां चार मंत्री रूपी सखा बैठ गए। वो जय जयकार कर रहे हैं, हमारे राजा की जय हो, श्री राम राजा की जय हो, हमारे महाराज की जय हो। फिर यहां नट बनकर सुबल आए। कहीं बलराम आए, कहीं ठाकुर आए, दाऊ जी आए, कहीं लाला आए और आकर कहीं बड़े सुंदर नटवर वपु बनकर आए। यथा नटवरो क्वच गाय मानव। मध्य। अब यहां मध्य का अर्थ हुआ, राज्यसभा में आ गए। तो मंत्री कहते हैं, सरकार, आपकी प्रसन्नता के लिए हम यह घोषणा करना चाहते हैं कि यहां दूरवर्ती कोई दो नट आए हैं और यह दो नट केवल आपकी स्तुति सुनकर, आपकी महिमा सुनकर यह हृदय में इच्छा धारण किए हैं कि आपके चरण के पास आकर आपकी प्रसन्नता के लिए कोई नृत्य गान कला की प्रस्तुति हो। तो श्रीमा बैठे हैं, कहते हैं, पेश किया जाए। तो फिर ठाकुर जी इस पक्ष में और सुबल सखा इस पक्ष में, कहीं बलराम जी इस पक्ष में। तो नटवरो के द्विवचन में उस लीला का भी संकेत हुआ। तो दो सखा आ गए, कृष्ण हैं, कहीं बलराम हैं अथवा कृष्ण हैं, सुबल हैं अथवा बलराम जी और सुबल, ऐसे दो-दो करके आए। कहते हैं, महाराज की जय हो, श्री राम महाराज की जय हो। अरे महाराज, आज फिर आगे कृष्ण कहते हैं, हमारी वाणी की सामर्थ्य नहीं कि आपकी महिमा हम गा पाएं। यह सब सत्य है, क्योंकि श्रीदामा कौन हैं? श्री राधा रानी के भाई हैं। तो कृष्ण अपनी बात को रख रहे हैं, वहां नट बनकर आए हैं, पर अपनी बात को कह रहे हैं। आपकी महिमा की जय हो। आप इतने महान हैं। आप इतने पुण्यवान।

हैं। वरना यह पद आपको प्राप्त नहीं होता। यह जो पद आपको प्राप्त हुआ है, अब सब दो-दो अर्थ में कह रहे हैं ठाकुर क्योंकि कहते हैं यह जो स्वर्ण पद आपको प्राप्त है। बाहरी दृष्टि से स्वर्ण पद का अर्थ है राजा का पद। अंदरूनी दृष्टि से स्वर्ण पद का अर्थ है श्री राधा रानी बृजभानु नंदिनी के भाई होने का स्वर्ण पद। आपको जो प्राप्त है हे राजा हम आपकी प्रशंसा कैसे करें? हमारी जिव्हा में वो सामर्थ्य नहीं। हे राजा आपके श्री अंग की महिमा कौन वर्णन कर सके नेत्र में उतनी सामर्थ्य नहीं कि आपके इस नवयुवक शरीर का हम दर्शन कर पाए ओ राजा आपके ये बलवान बलिष्ठ जो भुजाएं हैं इसकी महिमा कौन गा सके आप तो सभी दुष्टों को दानवों को उनके दर्प को गंजन करने में सर्वसमर्थ अर्थात उनके मान को भंजन करने के लिए गर्व को क्षम शमन करने के लिए आप में सामर्थ्य है।

ऐसे करके करके एक-एक करके ठाकुर कहते हैं हमारे त्वचा इंद्रियां त्वक इंद्रियां में वो सामर्थ्य नहीं कि हम हमारे मस्तक के त्वचा को आपके चरण के त्वचा के नीचे भी रख पाए। हमारी कोई योग्यता नहीं। हमारी बुद्धि में इतनी सामर्थ्य कहां कि आपके जो विशाल राज्य है, आपका जो पराक्रम है, आपका जो ऐतिहासिक आपकी महिमा है, इसका वर्णन, इसका पकड़, इसको ग्रहण करने की बुद्धि में सामर्थ्य नहीं।

हम में बस केवल एक इच्छा है। तो श्री राम बैठे हैं। प्रसन्न है। ऐसे देख रहे हैं ठाकुर को। बोलो क्या करना चाहते हो? तो ठाकुर कहते हैं महाराज हमें केवल यह इच्छा है कि आपके राज्य में उपस्थित होकर आपके लिए कोई नृत्य कला की प्रस्तुति हो। नट बनकर आपके नेत्रों को संतोष प्रदान करें। ठीक। राजा कहते हैं पेश किया जाए। फिर वहां सुबल हैं। सुबल क्वच गाय मानो ताल देते हैं और कुछ बोलने लगते हैं। तो कोचे गाय मानो से वहां शब्द बना और ठाकुर रंगे यथा जैसे रंग मंच पर नट नृत्य करता है वैसे श्रीदामा सखा को रिझाने के लिए क्योंकि जीवन में बड़ी उपकार की अब याचना करने वाले ठाकुर आगे जाकर श्री राधा रानी के प्रियतम श्री कृष्ण चंद्र भगवान की जय। तो अपनी बात को छिपा छिपाकर भेंट रूप में जब राजा प्रसन्न होते हैं तो यह बात सत्य है कि कहीं नट बनके कोई आए तो राजा को प्रसन्न करे तो राजा अपने हृदय निकट जो हार होता है सुवर्ण कांतीय हार वो नट को प्रस्तुत करता है। तो यही भाव से यह नट रूपी श्याम सुंदर बड़े सुंदर नटवर वपू बनके नटराज बनके अपने राजा प्रजा की ये खेल चलती रहती है। बड़े सुंदर उसमें गहरे बातें हैं और लीला में भी कई कई-क अच्छे-अच्छे बातें श्री जीव गोस्वामी पाद ने कहा परंतु हम संकेत यहां इसलिए दे रहे हैं क्योंकि भय वस शब्द पे अर्थ हुआ भू ये वस का अर्थ हुआ बैठने के स्थान जहां से संदर्भ आया कि गिरिराज गोवर्धन के तलहटी पर बैठने वाले बड़े सुंदर स्थान जैसे राज सिंहासन है कहीं गिरिराज की शीलाएं कई रत्न रत्न सिंहासन रत्न वेदी के रूप में विराजमान तो गिरिराज गोवर्धन ऐसे भूव ऐसे बड़े सुंदर स्थान को प्रस्तुत करते हैं जहां कृष्ण बलराम सखा ये सब राजा प्रजा कहीं ये सब चोर पुलिस जो इस जगत में कहा जाता है ये सब विकृत स्वरूप है ठाकुर जी भी खेलते हैं तो गिरिराज गोवर्धन ने भूव बस माने कहीं बैठने के स्थान कहीं रत्नवेदी सिंहासन के रूप में कहीं लेटने के स्थान उनके गुफाओं में गिरिराज की गुफाओं में कहीं लेटने के स्थान है। ठाकुर जी कहीं छिपने आंख में छोनी लीला हो रही है। लुकापी का खेल चल रहा है। तो ठाकुर जी को छिपने के लिए स्थान चाहिए। ठाकुर जी बड़े नटखट बड़े ऐसे जादूगर इतने नटखट कि इतने चंचल कि छिपने की बात आई तो ऐसे गुफा ऐसे कंदर में जाकर छिप गए कि ना श्रीदामा ना सुदाम ना वसुदाम ना सुबल ना बलदाऊ कोई ना पकड़ पाए और जाके सो गए अंदर अपनी गुफा में ठाकुर जी जो योग निद्रा रूप में विष्णु के रूप में शेष शाही के रूप में तो विराजमान कहीं अंदर जाके गिरिराज के कंधर भय वस के रूप में कहीं शयन करने की भी व्यवस्था कहीं ठाकुर को रेंटवेंट देने की आवश्यकता नहीं है। अपना ही मनसा प्रकृते जातो गिरि गोवर्धनो महान शास्त्र में वर्णन आया कि श्री राधा रानी ने श्री श्याम सुंदर से एक बार कहा कि हे प्रभु यदि आप हमारी भक्ति से प्रसन्न हैं तो हम केवल एक ही इच्छा करते हैं कि हम आप हमें कृपया करके एक भेंट स्वरूप विहार स्थली दे दीजिए जहां हमें किन्ही से छिपने की आवश्यकता नहीं हम स्वच्छंद आपके साथ सखियों के साथ हम विहार कर सके यह कहते कहते ठाकुर ने तथास्तु करके मनसा प्रकृति जातो गिरि गोवर्धनो महान गिरिराज गोवर्धन को अपने हृदय से प्रकट किया तो गिरिराज की प्रत्येक शीला यह प्रत्यक्ष प्रभु के हृदय में स्थित श्री राधा रानी के लिए प्रेम का ही एक विकार है हु इज गिरिराज ही कम्स फ्रॉम द हार्ट ऑफ कृष्णा कहीं भविष्यत पुराण कहीं स्कंद पुराण कहीं पद्म पुराण कहीं गर्ग संहिता में ऐसे अच्छे-अच्छे बातें गिरिराज के विषय में कही गई कि एक दूसरे प्रमाण में कहा गया कि राधा और कृष्ण दोनों ने तपस्या की वृंदावन में दोनों ने तपस्या की वैसे नरवत लीला है उनको तपस्या करने की क्या आवश्यकता परंतु एक दूसरे का चिंतन करने लगे समाधि में यही उनकी तपस्या है यही प्रेम समाधि है तो कृष्ण और श्री राधा रानी दोनों तपस्या करने लगे और कहा जाता है कि कई हजारों वर्ष के बाद उनके दोनों के श्री अंग से तेजस्वी 21 ऊर्जा शक्ति प्रकट हुई। 21 उसमें से 10 जो ऊर्जा शक्तियां हैं इन 10 से 10 वन बने। दूसरे 10 से 10 गांव बने। तो 10 और 10 हो गए 20। अभी 21वा जो है उन दोनों के हृदय से प्रज्वलित एक रोशनी के रूप में एक ज्योति के रूप में वो एक दोनों के हृदय से निकली और एक रूप बनके गिरिराज गोवर्धन के रूप में प्रकट हो गए।

तो यदि सोचा जाए कि गिरिराज भगवान है कि भक्त हैं? ये ये प्रश्न पूछा जाए गिरिराज भगवान है कि भक्त हैं? क्योंकि यह शंका होती है। कई कहते हैं गिरिराज भक्त हैं। कई कहते हैं कृष्ण भगवान कृष्ण ही गिरिराज के रूप में अवतरित हुए हैं। तो इस प्रश्न का समाधान इस लीला से हो जाता है। क्योंकि शास्त्र में कहा गया राधा रानी के हृदय और श्री कृष्ण के हृदय की तपस्या ज्योति तप ज्योति ही एकत्व एकत्व को प्राप्त हो के गिरिराज गोवर्धन के रूप में इस जगत में प्रकट हुई। तो श्री राधा रानी के हृदय में कौन है? श्री कृष्ण है। कृष्ण कौन है? भगवान है तो राधा रानी के हृदय से जो आया अंश है वो भगवत स्वरूप होगा तो इसीलिए गिरिराज कौन है भगवान है कृष्ण है और कृष्ण के हृदय में कौन है भक्ति मती श्री राधा रानी है तो उनके हृदय से आया हुआ अंश क्या है भक्ति श्रेष्ठ भक्त श्रेष्ठ हरिदास वरी है तो कृष्ण के हृदय से आई राधा रानी यह भक्ति स्वरूपा और राधा रानी के हृदय से आए कृष्ण यह भगवत स्वरूप तो इन दोनों का मिश्रण होकर जो गिरिराज गोवर्धन है। यह भगवान भी हैं और भक्त शिरोमणि भी है। दोनों बात एक ही लीला से स्पष्ट है।

श्रीला प्रभुपाद जी ने आदि लीला चैतन्य चरितामृत के छठवें अध्याय के एक तात्पर्य में लिखा श्री चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव संदर्भ में श्रील प्रभुपाद जी लिखते हैं कि विष्णु के कोई भी अवतार में कोई यह उनको बाधित नहीं कर सकता कि तुम भक्त नहीं बन सकते। भगवान के कोई भी अवतार में यह बाधा नहीं डाली जा सकती। यह रोक-टोक नहीं डाला जा सकता कि तुम आप प्रभु आप भगवान होकर भी भक्त नहीं बन सकते। यह रोक-टोक कोई नहीं डाल सकता क्योंकि प्रभु असीमित है। यदि यह कह दे कि प्रभु भक्त नहीं बन सकते। तो आपने भगवान के भगवतता पर एक प्रश्न चिन्ह उठाया क्योंकि भगवान असीमित है अनंत है। जाही अनादि अनंत अखंड अभेद अछेद सुवेद बतावे। यदि वेद कहते हैं अनंत हैं तो अनंत परिस्थिति हो सकती है। असीमित संभावनाएं हो सकती हैं। तो प्रभु अगर भगवान होकर केवल भगवान ही रहे तो यह बात हमने उन पर एक लक्ष्मण रेखा रख दी, एक बाधा रख दी। और यही प्रभु को यदि असीमित छोड़ दिया। ऐसे प्रभुपाद जी लिखते हैं तात्पर्य में। प्रभु को यदि असीमित छोड़ दिया तो वह भक्त बन सकते हैं। इसमें प्रश्न चिन्ह कहा भक्त कभी भगवान नहीं बन सकता क्योंकि हम सीमित हैं। हम छोटे हैं। प्रभु तो अपरंपार हैं। भक्त भगवान नहीं बन सकता और ना चाहता है भगवान बनने का। क्योंकि भगवान से प्रेम करने, भक्ति और सेवा करने में जो सौभाग्य सुख है वह भगवान में एकत्व मिश्रित होकर मग्न होने में नहीं है। प्रभु के ज्योति में तल्लीन होने का जो सुख है वो तो निम्न श्रेणी का है। अलग होकर भक्त होकर प्रभु को रिझाना भक्ति भाव से यह तो उत्तम श्रेणी का सुख है। कहने का आशय यह है भक्त भगवान ना बन सकता है ना बनना चाहता है। परंतु भगवान तो भक्त बन सकते हैं और बनना चाहते हैं। तो जैसे कृष्ण राधा रानी के भाव राधा भाव द्विती सुवलित होकर कलयुग में अवतरित हुए और महाप्रभु के रूप में अवतार लिए वैसे ही महाप्रभु कृष्ण भी हैं और राधा रानी भी राधा कृष्ण ना ही अन्य तो यदि यह कहा जाए श्रीमन महाप्रभु भगवान है तो यह भी अटल सत्य है। यह कहा जाए कि भक्त शिरोमणि श्री राधा रानी ही है तो यह भी अटल सत्य है। उसी प्रकार श्री गिरिराज गोवर्धन को कहा जाए कि यह कृष्ण है तो यह अटल सत्य है। परंतु यह कहा जाए कि यह कृष्ण का सर्वश्रेष्ठ भक्त है तो यह भी अटल सत्य है। यह सिद्ध है। ठीक है?

अब इसके आगे कहा जाए कि ये दोनों पक्ष में कौन सा पक्ष और भारी है? दो पक्ष हो सकते हैं। गिरिराज कृष्ण है और गिरिराज भक्त शिरोमणि है। तो इन दोनों पक्ष में किसका पलटा भारी है? कहां पलड़ा भारी है? कौन और गहरा है? कौन सा पक्ष और बलवान है, शक्तिशाली है? तो उस पक्ष में कहा गया यदि कृष्ण की सेवा करें और कृष्ण की भक्त की सेवा करें। यह दोनों पक्ष में कृष्ण की संतुष्टि अधिक कहां होती है? अपने सेवा से अधिक यदि उनकी भक्त की सेवा की जाए तो कृष्ण प्रसन्न है। है ना? यह तो कहा गया कि राम ते अधिक राम कर दासा। यह तो कहा गया अब मोहि भाव भरोसा हनुमंता बिनु हरि कृपा मिलह नहीं संता। प्रभु प्रसन्न होते तो संत का दर्शन कराते हैं। गोस्वामी जी ने यह भी सिद्ध किया। तो प्रभु को प्रसन्न करना हो तो उनकी सेवा तो करनी है पर उससे अधिक उनके भक्तों की सेवा करें तो प्रभु संतुष्ट होते हैं। दूसरी बात प्रभु और उनके भक्त में और दयालु कृपालु कौन है? प्रभु तो दयालु हैं परंतु उनके शुद्ध भक्त और कृपालु हैं। इसको ऐसे समझा जा सकता है। प्रभु तो हर योनि में जब हम जन्म लेते हैं तो परमात्मा के रूप में आते हैं। परंतु जब शुद्ध भक्त बाहर मिलते हैं। तभी तो अंदर अंतचिंतित जो परमात्मा है इनकी उपस्थिति का अनुभव होता है। प्रभु तो वैसे हर योनि में हमारे साथ चलते हैं। परंतु उससे तो माया बिल्कुल नष्ट नहीं हुई। पर बाहर से एक शुद्ध भक्त क्या हमारे जीवन में आ गए? अब बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की ओर हो गई। तो दया किनकी अधिक है? राम होते-होते सीता देवी का अपहरण हुआ। परंतु जब हनुमान पार गए, लांग कर समुद्र को पार किए। तभी तो लंका को आग लगी। तभी तो सीता देवी उस अशोक वाटिका से कुछ क्षण में आगे मुक्त हो गई। तो कहने का तात्पर्य यह है कि सीता रूपी भक्ति माया रूपी रावण के इस अशोक वाटिका रूपी जगत में फंसी है और हम परमात्मा रूपी प्रभु राम से दूर हैं। उनके उपस्थिति में भी हम अनुपस्थित हैं। उनकी भक्ति सेवा में परंतु हनुमान रूपी जब शुद्ध भक्त आते हैं। कृपा करते हैं। लंका रूपी अविद्या इस संसार के हमारे अंतश्चिंतित जो भौतिक ब्रह्मांड है हमारा इसमें आग लगा देते हैं। जैसे हनुमान रूपी हनुमान आए लंका को आग लगा दिए वैसे गुरु आते हैं और हमारे पाप प्रवृत्ति अपराध प्रवृत्ति माया जन्य जो विषय लालसा की सुख इच्छा सब में पूरा चिंगारी नहीं ये तो पूरा दावा लगा देते हैं और सीता रूपी भक्ति अब प्रभु राम से मिलन करने योग्य हो जाती है तो दो बातें हमने कही एक तो कृष्ण की सेवा से अधिक कृष्ण की भक्त की सेवा में कृष्ण की संतुष्टि और दूसरी कृष्ण से अधिक उनके भक्त दयालु होते हैं हम पर। तो इन दोनों बातों से यदि गिरिराज को कृष्ण मानकर सेवा की जाए उससे अधिक गिरिराज को अगर भक्त शिरोमणि मानकर सेवा की जाए तो कृष्ण की संतुष्टि है और हमें भी अधिक कृपा मिलती है जब यह सोचे कि यह भक्तों में सर्वश्रेष्ठ है। तो हमारा हमारा उद्धार कृपा से और प्रभु की संतुष्टि दोनों पक्ष सही है। कृष्ण गिरिराज को कृष्ण मानकर सेवा करना गिरिराज को हरिदास वर्य मानकर सेवा करना। परंतु इन दोनों में यह पक्ष अधिक भारी है कि यह कृष्ण के दासों में सर्वश्रेष्ठ हरिदास वरी हैं।

तो पानीय सखाओं को सखियों को जल कहीं कुसुम सरोवर की लीला कहीं गोविंद कुंड की लीला कहीं मानसी गंगा की नौका विहार की लीला सब पानीय में आ गया। सख्य लीला, वात्सल्य लीला, माधुरी लीला, दास्य लीला सभी प्रकार की लीलाएं पानिया में कहीं कुंड में, कहीं झूलन लीला हो रही है गिरिराज की तलहटी में तो कहीं पाश क्रीड़ा हो रहा है राधा और कृष्ण के बीच कहीं चतुरंगा की लीला हो रही है। कहीं बंसी चोरनी की लीला चोर की चोरी की लीला हो रही है श्री राधा रानी द्वारा। कहीं वन विहार की लीला हो रही है। कहीं नौका विहार लीला हो रही है। यह सब पानीय और भूय वस इन दोनों शब्द में आया। भू का अर्थ है स्थान। बैठने का स्थान, छिपने का स्थान, विहार करने का स्थान। और पानीय का अर्थ है जल क्रीड़ा। जल पीने के लिए, चरण धोने के लिए, कहीं स्नान करने के लिए, मुख प्रक्षालन करने के लिए, नौका विहार सजाने के लिए सब पानीय और भूव। इसको यदि सूय्यवस मानकर चला जाए जैसे भागवत में पाया गया दो प्रकार हैं जैसे हमने कहा पाठ्य भेद में सूय्यवस और भूवस तो भूवस की परिभाषा तो हुई विस्तार हुआ अब सूय्यवस सूय्यवस का अर्थ है वैसे संस्कृत में सूय्यवस शब्द नहीं है दीर्घ उकार शब्द नहीं है छोटी उ की मात्रा ही होती है लंबी उ की मात्रा शब्द नहीं है सु यवस सुष्ु सौष्टव शब्द है सु माने अच्छा जैसे सुभाष शब्द आया कहीं सु के प्रत्यय लगाकर कई शब्द बनते हैं तो स्वागत शब्द में भी स्वच्छ शब्द में भी हमने देखा स्वागत में भी सु करके आगत आया तो स्वागत वैसे इथम शरद स्वच्छ जल में भी हमने कहा सु के साथ अच्छ शब्द लगा तो स्वच्छ हुआ तो यही भी यहां भी सु छोटी उ की मात्रा है परंतु यह काव्य में ठीक है कई छंद बसंत तिलक का छंद है यह तो इसको छंद भंग ना हो इसलिए कहीं कहते कहते सूय वस को सू करके दीर्घ उकार लगाकर छंद को ठीक कर दिया सूय्यवसा का अर्थ है सुकोमल घास जिसको पाकर जो गौ समूह है बड़े स्वादिष्ट बड़े शरीर को पुष्ट पुष्टि प्रदायक स्वास्थ्य प्रदायक दूध प्रदान करती हैं। जिस घास को पाने पर गो का वर्धन हो, गो के स्वास्थ्य का वर्धन हो और यह जिनकी रोमावली हो, वही बड़े भक्त शिरोमणि को गोवर्धन शब्द आया। गो माने गो समूह गाय माता और वर्धन का अर्थ है स्वास्थ्य का वर्धन। वर्धन संस्कृत में भी हिंदी में भी आता है। वर्धन माने बढ़ाना गौ जिस जिनके रोमावली रूपी घास को पाकर रसमय घास को पाकर स्वादिष्ट सुकोमल घास को पाकर अपने शरीर में दूध ग्रहण करती हैं। जिस दूध से कृष्ण और पूरे ब्रज का पुष्टिकरण होता है। वो बड़े हरिदास वर्य को गोवर्धन कहा गया। साथ-साथ देखिए यह वर्धन शब्द दो धातु से बन सकता है। वर्ध धातु है और एक वृद्ध धातु है। दोनों धातुओं से वर्धन शब्द बनता है। एक का अर्थ है बढ़ाना। जैसे गोवर्धन में बढ़ाया गो के स्वास्थ्य को बढ़ा दिया। एक का अर्थ है घटाना। एकदम विपरीत अर्थ। अर्थात खंडित करके तोड़ के नष्ट कर देना। गो का एक और अर्थ बिजली है। विद्युत बिजली थंडर बोल्ट तो श्री बलदेव विद्या भूषण पाद ने यह एक बड़ी सुंदर अह गोवर्धन शब्द की एक परिभाषा लिखी कि एक अर्थ है गोवर्धन का कि जो अपने रोमावली से घास प्रदान करके रसमय घास प्रदान करके यह रसमय हम इसलिए बारंबार कह रहे हैं क्योंकि प्रभु के चरण रखने पर गिरिराज गोवर्धन के शरीर में कंपन होता है। हाय मेरे इष्ट आए ठाकुर जी आए, कृष्ण आए और उन्होंने अपने चरण से मुझे स्पर्श किया। हा क्या सौभाग्य है? यह सोचकर सुख के कारण जिनके शरीर में कंपन होकर रोमांच होता है, वह रोमांच रूपी रस आनंद समुद्र को गाय जब पाती है, उनका दूध बड़ा स्वादिष्ट और भक्तिमय रसमय होता है। जिसको मैया यशोदा पाकर अपने रसोई घर में ले जाकर श्री राधा रानी को सौंपती हैं। राधा रानी उसी दूध से कहीं मिठाई बनाती है और उस मिठाई का पान अह स्वादिष्ट भाव से श्री श्याम सुंदर करते हैं। तो श्याम सुंदर जब चखते हैं वो क्या चखते हैं? श्री राधा रानी के मनोभाव। श्री राधा रानी जब बनाती है तो क्या स्वाद लेती है? श्री यशोदा रानी के दूध दोहन की जो सेवा है देखो यशोदा रानी कृष्ण से कितना प्रेम करती है कि इतने हजारों लाखों गाय में से 108 प्रमुख गाय का चयन करके उन्हीं का गोदोहन करके उसी दूध को साथ लाई कृष्ण श्री राधा रानी के रसोई घर में बनाते बनाते प्रसाद बनाते समय दूध के कहीं मिठाई बनाते बनाते जो मनोभाव श्री राधा रानी रखती है उसका रसपान ठाकुर करते हैं। श्री राधा रानी बनाते बनाते कहती है ओो श्री यशोदा रानी के भक्ति का क्या कहें। उन्होंने देखो गोदोहन करके स्वादिष्ट पद्मगंध गाय के इस दूध को यहां मुझे प्रस्तुत किया। श्री राधा रानी गोद दोहन करते सोचती ये गाय की कैसी महिमा है। यह सब प्रभु से कितना प्रेम करते हैं। कृष्ण पास आए केवल स्पर्श करने पर दूध की एक मानो वर्षा होने लगती है। ठाकुर तो कई बार गौ के गोद दोहन के समय गौ के थन को पकड़ कर कहीं पिचकारी के रूप में अपने सखा के ऊपर दूध की पिचकारी मारते हैं। गौ उतना प्रेम करे ठाकुर से। तो ठाकुर जी डूबे हैं यशोदा रानी के भाव से श्री राधा रानी के भाव में। श्री राधा रानी डूबी है यशोदा रानी के भक्तिमय भाव में। यशोदा रानी डूबी है वृंदावन के जो गौ इनके भाव में और गौ डूबी है गिरिराज गोवर्धन के इस अद्भुत भक्ति में। देखो कितना प्रेम गिरिराज करते हैं। ठाकुर जी चरण क्या रख दिए। रोमांच हो गया, रोमावली हो गई। और इन्हीं के हृदय का जो प्रेम है, यह घास के रूप में रस के रूप में हम चख रहे हैं। और गिरिराज रस ले रहे हैं सीधा प्रभु के चरण रस से। तो रस स्वरूप तो प्रभु हैं। रस के महासागर स्रोत उद्गम स्थान तो ठाकुर जी हैं। ठाकुर जी के चरण का रस गिरिराज में। गिरिराज के हृदय का प्रेम रस यहां कहीं घास में घास से चले गौ माता में। गौ माता का जो दूध है यशोदा रानी धरती है। यशोदा रानी गो दोहन करके उस दूध को कहीं राधा रानी को और श्री राधा रानी प्रभु के रूप माधुरी का दर्शन स्मरण करते-करते बड़े सुंदर भाव से दूध के कहीं मिठाई बनाती हैं। और ठाकुर जी जब चखे इन सभी भक्तों के अलग-अलग भक्तिमय रस को एक-एक अम दूध के इस मिठाई के चखने पर ठाकुर केवल जिव्भा से ना चखें। ठाकुर जी तो हृदय से चकते हैं। अंगानियस सकलेंद्र वृत्त मंती और जब ठाकुर ऐसे पाकर अपना उच्चिष्ट अपने थाली पर छोड़ते हैं तो कृष्ण वक्त भुजोचिष् प्रसादम परमादरात दानम धनिष्ठ या देवी किमानेशाम तेग्रतः श्री रघुनाथ दास गोस्वामी अपने स्वरूप में मंजरी स्वरूप में उस थाली को ले आते हैं। धनिष्ठा सखी के धनिष्ठा सखी जाकर ठाकुर जी की थाली ले आती है। तो धनिष्ठा सखी के हाथ से उस थाली को ले आकर श्री राधा रानी के हाथ में सौंपती हैं श्री रघुनाथ दास गोस्वामी अपने स्वरूप में कहते हैं अब श्री राधिके आप वो चखना जो ठाकुर चके ठाकुर वो चखे जो आप चके आप वो चखे जो मैया चके मैया वो चके जो गौ माता आस्वादन करे गौ माता वो आस्वादन करे जो गिरिराज गोवर्धन आस्वादन करे और गिरिराज गोवर्धन वो आस्वादन करे जो ठाकुर रस स्वरूप अपने चरण के रज से स्पर्श से जो आनंद का एक उल्लास एक तरंग उठता है। यह अद्भुत ब्रज की एक रीति कि हर भक्त अपने आप को नीचा समझकर पहले के भक्त की प्रशंसा उनके भक्ति उन्हीं के सद्गुण में ही डूबे। कहीं गौ ये ना सोचे अरे कैसी सौभाग्य कैसी महिमा है मेरी कि मैं ठाकुर को दूध पिलाती हूं। कहीं गिरिराज सोचे अरे मेरा क्या महिमा क्या सौभाग्य कि मैंने अपने घास से पूरे ब्रज को पुष्ट किया ऐसे कदापि नहीं क्योंकि यह तो भक्ति के सिद्धांत के विरुद्ध चलता है भक्त वो है जो दीनहीन अकिंचन रहे दूसरों के चरणों में नमस्कार करें जीवन में प्रत्येक प्रतिकूल परिस्थिति को कोई प्रतिकार प्रतिशोध किए बिना उसको स्वीकारिए प्रभु के प्रसाद के रूप में तो यहां पानीय सूय वस का अर्थ है घास और भूवस का अर्थ है कहीं रत्नवेदी पानीय सूय वस कंदर कंद मूल कंदर कहते हैं गुफा संस्कृत में वैसे कंदर की बड़ी बड़ी सुंदर व्याख्या की जाए जा सकती है कम जलम दीते ए भी इति कंधरा कंदरा का

अर्थ है जल को, यदि दो जो दो भागों में यदि बाट करने की, विभक्त करने की कहीं उसको बंटवारा करने की यदि क्षमता किसी में हो, उसको कहते हैं कंदर। कम माने जल और धीर्यते माने उसको, उसके गति को कहीं, उसके निश्रित होते हुए प्रवृत्ति को दो भागों में, दो पक्ष में यदि विभक्त करने की प्रवृत्ति किन्ही में हो, तो उसको कंदर कहते हैं।

इसका अर्थ यह है कि कंदरा या एक गुफा वो है, जहां पे इतने पत्थर होते हैं कि जल कहीं लग जाए तो पत्थर के दोनों पक्ष से फिर प्रवाहित हो। इसको कहते हैं कंदर। तो कहीं धूप लगती है तो ठाकुर कंदरा में बैठे रहते हैं अंदर। और यह कंदरा भी बड़ी अद्भुत गिरिराज में जो गुफाएं हैं, जो कंदर हैं, कहीं अंदर गीत चलती है, कहीं निद्रा की अवस्था, कहीं पीने के लिए रसमय पदार्थ हैं, खाने के लिए कहीं खाद्य है, पीने के लिए कहीं पेय है, ये सब कंदरा में उपलब्ध। प्रत्येक कंदर कहीं कल्पवृक्ष के समान ठाकुर जैसा चिंतन करे, गिरिराज वैसे उपस्थित करें।

कई बार ये कंदर इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि ठाकुर जी कहीं भागते भागते कहीं दो धोती फिसल जाती है, तो ठाकुर जी उस धोती को बांधने के लिए बाल गोपाल के रूप में, छोटे रूप में, तो कहीं वत्सपाल से गोपाल बने, तो छ वर्ष के होंगे, गिरिराज की ओर आने लगे। गिरिराज की तलहट और भाग-भाग कर कहीं पीछे से धोती निकल रही, कहीं आगे से धोती निकल रही है, तो गुफा कंदरा में जाकर अपने धोती को बांधने के लिए भी बड़ी सुविधा है।

देखिए, अगर व्यक्ति आसपास हो तो कहीं संकोच होगा, कहीं लज्जा होगी कि कहीं वस्त्र यदि अपने स्थान से निकल रहा हो तो लोग देखेंगे, कहीं लज्जा की बात है, तो व्यक्ति थोड़ा संकोच में होगा। परंतु यदि कोई ऐसे कमरे में चले जाए, कोई ना हो, तो व्यक्ति फिर वस्त्र बदलता है। कहीं धोती है, कहीं कुछ और है, तो वस्त्र बदल लेता है। गिरिराज तो व्यक्ति हैं, परंतु ऐसे स्तंभित अवस्था में खड़े हैं, प्रभु के चरण स्पर्श से, प्रभु के स्मरण से, ऐसे लगता है कि उनके कंधन में कोई है ही नहीं। अगले बार आप कोई कमरे में चले जाएं और उनकी दीवार एकदम चुपचाप होती है। दीवार तो बोलती नहीं। वैसे तो दीवार कहीं मुहावरे में यह कहा जाता है कि दीवार के केवल कान होते हैं। यह नहीं कहा जाता कहीं दीवार के कहीं मुख है, कि कहीं नासिका है, तो कहीं आप कहीं चले जाए, कल कहीं स्नान गृह में आप प्रवेश करें, तो जो दीवार होती है, यह दीवार तो हमें नहीं देख पाती, ना बोल पाती है हमसे, तो गिरिराज गोवर्धन वो सुविधा ठाकुर को देते हैं। व्यक्ति होकर भी स्तंभित अवस्था में चुपचाप खड़े हैं। ठाकुर क्योंकि हिले डुले तो ठाकुर जी कहीं लज्जित हो जाएगी, कोई देख रहा है मुझे, धोती फिसल रही है, कोई बोल रहा है, कोई देख रहा है। पर गिरिराज स्तंभित अवस्था में भक्ति के ऐसे स्तंभ अवस्था में खड़े हैं, और कंदरा के रूप में प्रभु को ऐसे बड़े सुंदर वातावरण प्रस्तुत करते हैं। अरे ठाकुर, आप छिपना चाहो तो छिप जाएं। आप कहीं विहार करके कहीं विश्राम करना चाहो तो आप विश्राम करें। कहीं आप बैठकर कुछ खाद्य, कोई पेय पदार्थ पाना चाहे तो वह भी करें। कहीं वस्त्र निकल जाए, आप उसको भी बांधना चाहे तो वह भी कर सकते हैं। तो यह सब कंदरा की बड़ी महिमा है।

और फिर कंदमूल, कंदमूल कहते हैं फल, फूल, पत्ते इत्यादि। श्री गिरिराज गोवर्धन में हमारे श्री जीव गोस्वामी पाद ने कहा कि ये पानीय, सूय, वस, कंदर, कंद मूल, ये चौथी जो पंक्ति है, इसको विस्तार करते हुए श्री जीव गोस्वामी पाद ने वर्णन किया कि गिरिराज गोवर्धन बड़ी सेवा करते हैं। ऐसी सेवा करते हैं, कोई और भक्त नहीं कर पाता। कैसी सेवा? चलिए सुन लेते हैं। कहा गया कि गिरिराज गोवर्धन पहली बात तो हम 21 बात गिनाएंगे, एक-एक करके क्रमशः 21 बातों को गिनाया जाएगा श्री जीव गोस्वामी के द्वारा।

तो पहली बात विग्रह सेवा में पहली बात होती है कि ठाकुर को अपने स्थान से कहीं आसन ग्रहण कराया जाए। प्रभु आप आए, इस स्थान पात्र में आप विराजे, तो आसनम कहते हैं इसको, कि प्रभु का स्वागत किया जाए, उनको स्नान पात्र में विग्रह हो, शालिग्राम हो, कोई राधा कृष्ण की विग्रह, गौर निताई के विग्रह, कृष्ण बलराम के विग्रह को कहीं स्वागत करके आसन दिया जाए, यह पहली सेवा होती है। तो गिरिराज वो देते हैं, क्योंकि प्रत्येक गिरिराज की शीला यह ठाकुर जी के लिए बैठने का बड़ा सुंदर स्थान, बड़ी-बड़ी शीलाएं होती हैं, जहां ठाकुर बैठते हैं। जहां हम कह रहे थे कि राजा प्रजा की खेल खेली होती है, खेलना होता है। और गिरिराज ऐसे अद्भुत सेवक हैं। आप देखे होंगे कई ऐसी गाड़ियां हैं, जहां पर बैठने पर कहीं ठंड हो बाहर, तो आप हीटर तो ऑन ही कर सकते हैं। उसके साथ-साथ कहीं सीट वार्मर भी होता है। आप यह ऑन करो, तो आपके सीट भी गर्म हो जाने हो सकते हैं। कहीं बाहर ठंड हो, आप सीट में बैठ जाएं, तो वहां फिर गर्मी का अनुभव होता है। तो इसका स्रोत कहां है? यह तो गिरिराज में है। गिरिराज के पत्थर, शिलाएं ऐसे सुंदर हैं कि बहुत ठंड हो, तो प्रभु जब चरण रखें, तो प्रत्येक शीला गरम गरम रहे। तो शरीर को बहुत अच्छा लगता है, और बड़ी गर्मी हो बाहर, तो हर एक शीला ऐसे शीतल, ऐसे शीत प्रदायक, तो ठाकुर बैठे या चलें, यह शिलाएं गर्म होती हैं, कहीं कभी ठंड होती है। तो यह पहली सेवा है आसन वाली सेवा।

दूसरी सेवा है स्वागत की सेवा। ठाकुर जी का स्वागत होता है। अभी जैसे कोई अतिथि आए घर में, तो हम सेवा कैसे करते हैं, कहीं कहीं गीत गाते हैं। कोई वरिष्ठ गुरु आए, तो करताल मृदंग लेकर कीर्तन करके उनका स्वागत किया जाता है। तो यहां कहा जाता है कि श्री गिरिराज गोवर्धन इतने प्राणी, इतने पंछी, इतने पशुओं के एक घर हैं, एक गृह हैं। तो ठाकुर जब वन में प्रवेश कर रहे हैं। यह तो हमने पहले देखा, ठाकुर जी के वन में प्रवेश करते-करते सभी पक्षी गूंजने लगती हैं, गूंजने लगती हैं, गाने लगती हैं। तो ऐसे कहा जाता है कि श्री गिरिराज गोवर्धन ही अपने पंछी समूहों को, अपने पक्षी समूहों को साथ लाकर कहते हैं, भैया तुम वहां खड़े हो, आप यहां खड़े रह, आप यहां विराजे, और जब ठाकुर आए, तो यहां से कहीं तोते, यहां से कहीं कपोत, यहां से कहीं मोर, तो कोई नृत्य कर रहा है, कोई गान कला में प्रवीण है। ऐसे करते-करते ठाकुर जी को बड़े सुंदर-सुंदर गीत, पद रचना से, अलग-अलग रंग के, अलग-अलग आकृति के, अलग-अलग स्थान में विराजमान, प्राय बतागा मुनयवनेसिन पक्षी गाकर स्वागतम कृष्णा, सुस्वागतम कृष्ण करके स्वागत करते हैं गिरिराज में। तो ये दूसरी सेवा हुई।

अब तीसरी सेवा है पाद्य। पाद्य कहते हैं प्रभु के चरण धोने की। जैसे चरण कहीं साधु आते हैं या प्रभु होते हैं, प्रभु के विग्रह हैं, तो चरणामृत होता है, अभिषेक होता है। कोई बड़े संत आते हैं, तो उनके चरण धोने की, चरण प्रक्षालन की एक महिमा है। तो वैसे गिरिराज करते हैं ठाकुर जी के लिए। कैसे करते हैं? अपने झरनों के रूप में, और इस झरनों में कहीं दुर्व के पत्ते होते हैं, कहीं अलग-अलग तुलसी के पत्ते होते हैं। तो ठाकुर के चरणों में भी बड़े-बड़े सुकोमल, सुंदर, स्वादिष्ट और सुगंधित जल से उनके चरण की प्रक्षाल, उनकी उनके प्रक्षालन हो जाती है। गिरिराज वो सेवा करते हैं। जैसे कोई व्यक्ति आए गर्मी में, उनको आप अच्छे से कोई आम्र के या कोई फल के एक रस का, आप एक जूस बनाकर पिलाएं। व्यक्ति आराम से बैठकर पाए, तो हृदय में एक ठंडक और शरीर में भी एक ठंडक अनुभव होता है। वैसे प्रभु इतना चलके आते हैं दूर से, वृंदावन से, ब्रज से चलकर आते हैं गिरिराज की ओर। गिरिराज स्वागतम, स्वागतम करके पहले आसन, फिर स्वागत, और अभी पाद्य, चरण धोने के लिए झरने हैं गिरिराज में, जिसमें तुलसी के पत्ते हैं, कहीं दुर्व के, कहीं समा के, अलग-अलग बीज बोए गए, गिरिराज ने सब व्यवस्था कर दी, तो ठाकुर जी चरणविद होते हैं, तो उनको बड़ा आनंद आता है। ये तीसरी सेवा।

अब चौथी सेवा है अर्घ्य सेवा। अर्घ्य सेवा कहते हैं कहीं जल पीने पीने को दे दिया। कहीं जल पीने को दे दिया। यह अर्घ्य सेवा होता है। इसके लिए कई कुंड हैं, कई कुंड हैं। अब यह कुंड है विशेष करके केवल प्रभु के अर्घ्य सेवा के लिए, केवल जलपान करने के लिए।

पांचवी सेवा है आचमनीय सेवा। आचमनीय सेवा माने मुख, मुंह पानी पीकर कहीं मुख प्रक्षालन करने के लिए। तो इसके लिए अलग कहीं नदियां हैं, और इसमें भी गिरिराज गोवर्धन अलग-अलग ऐसे नैसर्गिक लता, कहीं औषधि, इन सबका मिश्रण करके चरण धोने का जो सुख है, मुख में पानी पीने का जो सुख है, और मुख धोकर प्रक्षालन करने का जो सुख है, ये तीनों अलग जल गिरिराज का है। परंतु गिरिराज कहीं मुंह धोने में कहीं अलग औषधि का प्रयोग, कहीं पीने में अलग बीज का प्रयोग, और कहीं पैर धोने में जो चरण प्रक्षालन की सेवा है, चरण धोने की सेवा है, इसमें झरनों में कहीं अलग पत्ते, कहीं अलग घास, कहीं अलग बीज, कहीं अलग लता, कहीं अलग औषधि करके चरण पीना और प्रक्षालन। यह सब अलग-अलग कुंड से, अलग-अलग स्रोत से और अलग-अलग मिश्रण से सेवा हो रही है। यह हो गई पांचवी सेवा। गिनते रहें, 21 आने वाली है। जी, गिर हमारे श्री जीव गोस्वामी पाद ने जगत को कृत कृत किया, यह रत्न देकर।

फिर छवी बात, इसको कहते हैं मधुपर्क सेवा। मधुपर्क सेवा। मधुपर्क कहते हैं कहीं दूध का मिश्रण, कहीं शहद, कहीं मकरण से की जाए, उसको मीठा बनाया जाए। अच्छा सुंदर पेय पदार्थ है, पीने के लिए बड़ा स्वादिष्ट है, मीठा है। इसको मधुपर्क कहते हैं। जैसे हम कई चरणामृत, पंचामृत पीते हैं, तो कई बच्चे देखे जाते हैं। वो एक बार पीते हैं, बोले प्रभु जी, एक और बार देना। यह प्रवृत्ति कहां से आई? ठाकुर से आई। ठाकुर जी गिरिराज के पास गए, तो मधुपर्क पीते हैं, तो एक बार में तो संतुष्टि नहीं होती। एक और बार कहीं घूंट घूंट कर पी लिए, कहीं बलराम जी पी रहे हैं, कहीं सखागण पी रहे हैं, कहीं ठाकुर जी पी रहे हैं। तो इसको कहते हैं मधुपर्क। यह मधुपर्क कहां से आया? कहा गया कि गिरिराज गोवर्धन पर जो भी गौ माता आए, और जो भी वहां पर दूध की धारा बहे, गिरिराज उस दूध को धारण करते हैं, और साथ-साथ गिरिराज के वृक्षों से कहीं वृक्षों के मध्य भाग से मिश्रित कहीं शहद टपके, तो उस शहद और इस दूध को मिश्रित करके मधुपर्क बना के श्याम सुंदर को पवाए। ऐसे श्री जीव गोस्वामी पाद कहे। यह कोई काल्पनिक नहीं है, चिन्मय वृंदावन धाम में यह सब होता है। केवल नित्य वृंदावन गोलोक में नहीं कह रहे हैं, इस भूलोक के गिरिराज में भी होता है। हम अंधे हैं, हम देख नहीं पा रहे हैं, महामाया का पर्दा हम पर लगा है। गिरिराज पर नहीं। श्री जीव गोस्वामी जो इतने प्रकांड विद्वान हैं, जो शास्त्र के मर्मज्ञ हैं, जो शास्त्रज्ञ हैं, रसिक वैष्णव कुल मुकुट मणि श्री जी रूप गोस्वामी के कृपा पात्र शिष्य हैं, अनुयाई हैं, वो कोई कपोल कल्पित काल्पनिक बात कोई बात जोड़कर हमें नहीं बताएंगे। यह सब अक्षरश सत्य है।

अगले बार गिरिराज जाएं, अगले बार वृंदावन जाएं, तो अवश्य गिरिराज जाएं। अवश्य गिरिराज जाएं और परिक्रमा लगाएं, और जब परिक्रमा लगाएं, तो इस दास के लिए प्रार्थना करें। इस दास का स्मरण करें और दास के लिए प्रार्थना करें। आप सब करें, कोई एक करें, तो हम इसी आप सबके टुकड़ों से ही पल रहे हैं हम। आप सबके आशीर्वाद, कृपा प्रसाद से ही हमारा कुछ उद्धार हो सकता है। तो छवीं बात है मधुपर्क, जहां दूध और शहद का मिश्रण होकर गिरिराज ठाकुर को पवाते हैं।

अब सातवीं बात है जल। अब कहें भैया, चरण धोने के जल हो गए, पीने के जल हो गए, कहीं मुख धोने के जल हो गए। अब यह कौन सा जल है? यह नहाने का जल है। यह ठाकुर कहीं थक जाए, कहीं पसीने से लथपथ हो जाए, प्रसवित हो जाए, तो अब यह अपने केवल स्नान हेतु जल है। यह कई सारे गिरिराज में कई सारे जलाशय केवल स्नान के लिए हैं।

अब आठवां है वस्त्र। अब कहेंगे गिरिराज वस्त्र कैसे दें ठाकुर को? आप सब जानते हैं कि पहले के जमाने में वृक्ष से ही वस्त्र बनता था। जैसे बड़े-बड़े जो योगी होते थे, वो ट्री बार्क कहते हैं उसको, केवल वृक्ष को ही एक स्रोत बनाकर उसी के अंश से अपने शरीर को ढकते थे। तो कई-कई ऐसे वृक्ष हैं गिरिराज की तलहटी पर, जो अपने स्वर्ण कांतीय शरीर से प्रभु को पीत वस्त्र ओढ़ने के लिए देते हैं। वो वृक्ष भी कैसे स्वर्णकांत हैं, ताकि ठाकुर देखें और सोचे, कहीं वृषभानु नंदिनी तो नहीं, और वे पास जाएं, और वह वृक्ष कहे, हम वृषभानु नंदिनी नहीं, हम वृषभानु नंदिनी की दासियां हैं, और आपको हमारे शरीर से भेंट स्वरूप, जैसे द्रौपदी ने अपना वस्त्र दिया, जैसे गोपियों ने चीरहरण में अपना वस्त्र दिया, तो हम भी श्री राधा रानी की दासी स्वरूप हैं, हम वृक्ष रूप में यहां गिरिराज में भजन परायण हैं, तो हम भी अपना वस्त्र आपको देना चाहते हैं, जो वृक्ष को ओढ़ते हुए, जो वृक्ष का शरीर है, इसी से पीत स्वर्ण कांत विभ्रत वास कनक कपीशम बनके प्रभु को भेंट स्वरूप में मिला। यह आठवीं बात।

अब नौंवा बात, पहला आसन, दूसरा स्वागत, तीसरा पाद्य, चौथा अर्घ्य, पांचवा आचमन, छठवां मधुपर्क, सातवां जल, आठवां वस्त्र। अब नौवां, नौवां है गंध। गंध माने सुगंध। कहीं ठाकुर को भी सेवा में गंध अर्पण किया जाता है, जिसको कहीं कहीं चंदन का लेप, हरि चंदन, यह भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थ होते हैं। तो इसको सब गंध कहा जाए। कहीं हरिचंदन, कहीं हरिताल से बनाया हुआ, कहीं गैरिक के बनाया हुआ। यह सब एकदम नैसर्गिक धातु गिरिराज गोवर्धन पे उपलब्ध है, जिससे अलग-अलग सुगंध ठाकुर को कहीं अभी मंदिर में चले जाएं, तो भक्त हाथ में सुगंध देते हैं, जो ठाकुर को अर्पित आरती में, तो यह भी गिरिराज की सेवा है। गिरिराज अपने तलहटी में जहां-जहां वृक्ष, जहां-जहां पुष्प, जहां-जहां फल, जहां-जहां धातु, उसको पीसकर, कहीं चंदन, कहीं हरिचंदन, करी, कहीं हरिताल, कहीं गैरख, अलग-अलग प्रकार के धातुओं से अलग-अलग सुगंध, अलग-अलग ऋतु अनुसार अलग-अलग सुगंध ठाकुर को अर्पित करते हैं। ये नौं।

दसवां है पुष्पर्पण। पुष्प का अर्पण, कहीं मालती का पुष्प, कहीं मल्लिका का पुष्प, कहीं कुंद का पुष्प, कहीं मंदार का पुष्प, कहीं पद्म का पुष्प, कहीं तुलसी के पत्ते, ये सब गिरिराज गोवर्धन नाना प्रकार भोरी मात्रा में कृष्ण को अर्पण करते रहते हैं। हर लीला में, हर एक दिन, हर एक स्थान में, तो पुष्प का भी अर्पण हुआ।

फिर 11वां, यह है धूप। धूप कहते हैं जिसको हम अगरबत्ती कहते हैं। इसको धूप कहा जाता है। धूप। अब कोई कहे, गिरिराज धूप कहां से लाए? इसमें कहा गया कि कई बार गिरिराज गोवर्धन पर कहीं धुआं निकलती है। कहीं ऐसे कहा गया कि दो पत्थर को कहीं परस्पर घर्षित करने पर कहीं धुआं निकले। कहीं दो बैल कहीं झगड़ा करें। ऐसे कहा जाता है, कहीं गिरिराज पर दो बैल यदि युद्ध करें, तो कहीं पत्थर पर पैर रख देते हैं अपने भार में, तो उस संघर्ष में, उस संग्राम में, कहीं एक दूसरे को पीटने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि यह तो नैसर्गिक है कि दो बैल एक गाय को प्राप्त करने के लिए वो लगे रहते हैं, तो उस प्रकार कहीं गिरिराज गोवर्धन पे भी कहा गया कि दो गाय कभी परस्पर युद्ध करने का प्रयास करें, तो नैसर्गिक धुआं निकलता है। कहीं पत्थर पर पैर रख दिया, दो पत्थर घिस गए, घर्षण हुआ, तो उससे कहीं धुआं निकलने लगा पर्वत पर नैसर्गिक। कोई आग नहीं लगाता, कहीं कुछ जलाता नहीं, पर नैसर्गिक कहीं धुआं निकले, तो ऐसा प्रतीत होता है कि गिरिराज स्वयं अपने अगरबत्ती, अपने धूप रूपी धुएं से कृष्ण के स्वागत आरती उतारने में तैयार हैं।

फिर दीप। अब बताएं, गिरिराज दीप कैसे अर्पण करें? हम तो दामोदर अष्टकम गा के कार्तिक महीने में दीप अर्पण करते हैं। गिरिराज दीप अर्पण कैसे करें? ये 12वां कहा गया कि गिरिराज के जो पत्थर हैं, शिलाएं हैं, कई बार खंडित होती है, आधी होती है। तो अंदर के शिला का जो भाग है, वो चमकता है। वो चमकता है। तो दिन में प्रातः काल में जब सूर्योदय होता है, तो सूर्य की किरण लगते हैं अलग-अलग शिलाओं पर, और कई उसमें खंडित है, टूटे हैं। तो अंदर के चमकते हुए रत्नमय भाग को जब सूर्य किरण स्पर्श करें, तो पूरा ऐसे चमकने लगता है, जैसे कि मानो गिरिराज अपनी शीलाओं के ज्योति शक्ति से ही कृष्ण की आरती उतार रहा हो। ऐसे वर्णन आया। एक जैसे अंधकार में दीप लगाने पर ज्योत जागृत होती है, वैसे गिरिराज चमकते-चमकते अपनी शीलाओं के अंदर के भाग से ठाकुर के स्वागत में उपस्थित हैं। यह हुआ 12वां।

अब 13वां, यह सुनने के लिए हमें 24 घंटे रुकना होगा, क्योंकि यह 13वें से हम चर्चा कल करेंगे। कल गिरिराज की पूजा दिन है, वार्षिक घाट है। तो कल इस वार्षिक घाट पर गिरिराज गोवर्धन पूजा के दिवस पर हम 13वें अंक से आगे ले जाएंगे। और भी बड़ी-बड़ी सुंदर बातें टीका सहित इस श्लोक का कल एक चर्चा विवेचन प्रयास होगा। जो भी त्रुटियां हैं, आप सब मुझे क्षमा कर दीजिए, और जो भी हृदय में आपको आनंद उल्लास की अनुभूति हुई है या होएगी, या हुई होगी, इस सब के लिए आप दास के लिए प्रार्थना कीजिए। हम हमें आप अपने प्रार्थना में प्रभु के चरणों में मति रहे, यह एकमात्र अभिलाषा है। ऐसी प्रार्थना करके हमें आप रक्षा कीजिए। वांछा कल्पभ्य कृपा सिंधुभ्य एवच पत नाम पावनभ्यो वैष्णवभ्यो नमो नमः। ग्रंथराज राज श्रीमद् भागवतम की जय। गिरिराज गोवर्धन की जय। शील प्रभुपाद की जय।